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Tuesday, December 31, 2013

जहाँ योगयोगेस्वर श्रीकृष्ण की बाल लीला और उनका गीता के उपदेश का एक-एक श्लोक शोध के परिणाम कि तरह है और वह स्वयं पुनः शोध करने योग्य है वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का राम वाण योग और उनका जीवन के हर प्रसंग और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार शोध का विषय है और शोध हो भी रही हैं।


जहां योग योगेश्वर श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में उद्धृत स्लोकों के माध्यम से (अर्जुन को दिए उपदेश से ) और अपनी बाल लीलाओं से समाज को शिक्षा दी वही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अपने जीवन दर्शन से ही समाज में हर अवस्था में जीवन जीने वाले के लिए शिक्षा दी है।


Friday, December 27, 2013

(#1) (अंत:करण 4 ) मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार; (#2) (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण; (#3) (तन्मात्रायें 5) गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द; (#4) (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद, हस्त, उपस्थ (nursing), पायु (मलद्वार|गुदा), वाक् (बोलने कि प्रक्रिया); (#5) ( महाभूत 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश| 24 तत्वों से आत्मा-शरीर-समाज प्रभावित होता है और आत्मा-शरीर-समाज से इस्वर प्रभावित होता है| अतः इन सभी २४ तत्वों में संतुलन अति आवश्यक है शरीर, समाज, आत्मा और इस्वर को शांति और संतुलन में रखने के लिए|--Shrimadbhagvat Geeta By Maharshi Ved Vyas|

(#1) (अंत:करण 4 ) मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार; (#2) (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण; (#3) (तन्मात्रायें 5) गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द; (#4) (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद, हस्त, उपस्थ (nursing), पायु (मलद्वार|गुदा), वाक् (बोलने कि प्रक्रिया); (#5) ( महाभूत 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश| 24 तत्वों से आत्मा-शरीर-समाज प्रभावित होता है और आत्मा-शरीर-समाज से इस्वर प्रभावित होता है| अतः इन सभी २४ तत्वों में संतुलन अति आवश्यक है शरीर, समाज, आत्मा और इस्वर को शांति और संतुलन में रखने के लिए|--Shrimadbhagvat Geeta By Maharshi Ved Vyas|

Tuesday, December 24, 2013

भगवान् शिव माता पार्वती से: धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)| -----श्रीराम चरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसी दास।


"गगन उड़ै राज पवन प्रसंगा, नीचही मिलहि कीच जल संगा"। ( जो लोग चन्दन कि तरह दृण विश्वासी होते है वे अपना स्वभाव नहीं छोड़ते हैं पर जो लोग विचलित होने वाली प्रकृति के होते हैं वे उस कण कि तरह होते हैं जो वायु के संग(अच्छी संगती) में आने पर आकाश पर चढ़ते हैं (उन्नति को प्राप्त होते है) और जल (अधोगामी प्रवृत्ति वाले) की संगती करने पर कीचड कि तरह अमर्यादित श्रेणी को प्राप्त होते हैं। -----श्रीराम चरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसी दास।


Wednesday, December 18, 2013

श्रीकृष्ण वह थे जिन्होंने श्रीराम के रूप में जीवन के अपूर्ण वादों के लिए रासलीला की जिसमे कामदेव कि चुनौती को स्वीकार कर काम को पराजित किया, सत्य कि स्थापना की और अपने जीवन को भी ज़रा (पूर्व में बालि) नामक बहेलिये के हांथों त्याग दिए सत्य को स्थापित करने के लिए। इस प्रकार पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम को प्राप्त हुए श्रीराम कि तरह। अतः मित्रों समाज को ऐसे श्रीराम और श्रीकृष्ण कि आवश्यकता है न कि रासलीला को चरित्रहीनता के रूप में परिभाषित कर असत्य, अनैतिक और अमानवीय कृत्य करने वालों की।*******जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण कहो या राम।


शैव और वैस्नव दोनों को जो मान्य है वह है भगवान् शिव का भगवान् श्रीराम (विष्णु अवतार) को संदर्भित कर कहा गया कथन: भगवान् शिव माता पार्वती से: धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)| ---- धन्य सो भूप निति जो करई(वह राजा धन्य है जो नीतियों के अनुसार शासन करता है)|"धन्य सो देश जह सुरसरि बहई(वह देश धन्य है जिसमे गंगा नदी बहती है) । ~--------धन्य नारी पतिव्रत अनुसरहीं|| धन्य सो भूप निति जो करई| धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)॥ सो धन धन्य प्रथम गति जाकी (वह धन धन्य है जो समाज के उपकार में लगाया जाय )। धन्य पुण्य रत मति सोई पाकी (वह बुद्धि धन्य है जो पुन्य के कार्य सामाजिक नवनिर्माण में लगाई जाय) ॥धन्य घरी सोई जब सतसंगा (वह समय धन्य है जो सत्संग करने में प्रयुक्त हुआ हो) । धन्य जन्म द्विज भगती अभंगा (जिस ब्राह्मण की भगति अटूट हो भगवान् राम के प्रति उसका जन्म धन्य है) ॥ सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (हे उमा-पार्वती वह कुल धन्य है जिसमे पूरे जगत के पूज्य और पवित्रता में भी सर्वश्रेष्ठ (सु-पुनीत) का जन्म हो इसका मतलब श्री राम का रघुकुल= इक्शाकुवंश= शूर्यवंश धन्य है)। श्रीरघुवीर परायण जेहिं नर उपज विनीत (विनय युक्त =विनम्रता और शिस्टाचारयुक्त व्यक्ति (RESPECTFUL= COURTEOUS =Gentleman =सज्जन पुरुष)=और ऐसे रघुवीर का परायण मतलब रघुवीर में अभीस्त श्रध्धा वाला वही हो सकता है जी जिसके अन्दर विनीत (विनम्रता-विनययुक्त) की उपज हो )


Friday, December 13, 2013

जानकारी के लिए दशरथ (कश्यप) के कुलगुरु वशिस्ठ तो वहीं वशुदेव (कश्यप) के कुलगुरु शांडिल्यगोत्रीय {शांडिल्य=कश्यप और वशिस्ठ के समवेत रूप} और नन्द के कुलगुरु गर्गगोत्रीय(कश्यप के पुत्र वरुण और वरुण के पुत्र बाल्मीकि तथा बाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज और भारद्वाज के शिष्य परम्परा कि संतान गर्ग) थे


जो कश्यप गोत्र दुनिया के सभी प्रकार के लोगों को सनातन हिन्दू धर्म में शरण देता है और जिसमे सर्वाधिक विष्णु अवतार हुए श्रीराम और श्रीकृष्ण समेत और सभी प्रकार के योग्य से योग्य देवता और विकराल दैत्य जन्म लिए अदिति और दिति के पुत्र के रूप में उसमे दुनिया के किशी भी प्रकार के व्यक्ति को सत्य के रास्ते पर लाने के लिए एक समान दंड का भी प्रावधान है वह चाहे छोटे समाज से आता हो या बड़े उसमे कोई विभेद नहीं। अतः कोई अपने को छोटे या बड़े समाज का बताकर अनावश्यक भेद-भाव का बखेड़ा खड़ा कर सामाजिक न्याय कि आड़ में बच नहीं सकता सत्य से उसे आज नहीं तो कल दंड स्वीकार करना ही होगा।


Thursday, December 5, 2013

रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को जो लोग जानते है वह यह भी जानते हैं कि रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ स्वयं संघ परिवार कहलाता है। मेरे विचार से अब जब अंतररास्ट्रीय सीमाएं एक दूसरे के लिए खोल दी गयी है भौगोलीकरण के कारन तो अंतररास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कि विशेष जरूरत है रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ-साथ इस विश्व व्यवस्था नियंत्रित करने के लिए और इस प्रकार एक अंतररास्ट्रीय संघ परिवार बनेगा जिसमे विभिन्न जाती, धर्म, संस्कृति और देश के लोग होंगे। इस प्रकार वसुधैव कुटुम्बकम कि भावना से पूरा विश्व ओत-प्रोत होगा न कि केवल भारत ही।*******वन्दे माँ (भारत माँ -पृथ्वी माँ) तरम।


पूरी दुनिया में शैव विचार धारा के लोग स्वतन्त्रता से भ्रमण कर सकते हैं खान-पान को ध्यान में रखते हुए पर वैष्णविस्ट विचार के लोगों को भारत या विशेष कर उत्तर भारत में भी व्यवस्थित रूप से रहने का अधिकार न दिया गया तो यह विश्व सुरक्षित रह पायेगा क्या? शैव विचार धारा से निवेदन वैष्णविस्टों पर तरह-तरह के आरोप लगाकर उनके जीवन दर्शन में विघ्न न उत्पन्न करें अन्यथा वे भी इसी अग्नि में जलेंगे और उनको वैष्णविस्टों से ज्यादा हानि होगी अगर भौगोलिकता का ज़रा भी ध्यान होगा उनको। वैसे मै कई बार कह चुका हूँ कि तिरंगा=त्रिदेव=त्रिमूर्ति (ब्राह्मण धर्म, क्षत्रिय धर्म और वैस्य धर्म) में से प्रत्येक इस दुनिया के एक तिहाई सत्ता के स्वामी हैं उनकी कोई भी जाती हो या जलवायु या भौगोलिकता पर आधारित धर्म हो इसमे संख्याबल का कोई असर नहीं पड़ता।


Tuesday, December 3, 2013

परिवारवाद, जातिवाद और धर्मवाद/सम्प्रदायवाद के झूंठे आरोप के कारण हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश और अपयश को ध्यान में रखकर मन में उपजे डर से सत्य का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए और विशेष कर उस देश में जिसका अभिस्थ दिशानिर्देश "सत्यमेव जयते" हो। वैसे सत्य को किशी संख्याबल की जरूरत नहीं है और न उसे साक्ष्य चाहिए फिर भी मानवता सत्य के कारन ही टिकी है तो सत्य के लिए साक्ष्य बनने में क्या जा रहा है। जय तिरंगा(=त्रिदेव=त्रिमूर्ति), जय हिन्द(जम्बू द्वीप:ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्डे), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


विशेष सन्देश: इस्लामियत रामाश्रयी के सामानांतर और ईसाइयत कृष्णाश्रयी के सामानांतर चलती है/चलता है जबकि ये गाय, गायत्री और गंगा पर श्रध्धा और विश्वास में अलग मत रखते हैं और यह अंतर केवल उनके उत्त्पत्ति स्थान के जलवायु और रहन-सहन से है। अतः मेरा भारतीय समाज से विनम्र निवेदन है कि हमें किशी धर्म से द्वेष और भय नहीं रखे वरन उच्च सभ्यता, संस्कृति और संस्कार को इस विश्व में बनाये रखने कि प्रतिस्पर्धा रखें अन्य धर्मों के साथ। और मै स्वामी जी की तरह ही पुनः दुहराता हूँ कि सनातन हिन्दू संस्कृति ही सभी धर्मों कि जड़ है।


पाँचों भूतों: पृथ्वी (स्थान=स्पेस=आधार), जल, आकाश (आकृति), अग्नी, वायु के स्वामी केदारेश्वर( शिव शंकर) ही हैं पर उनको मिलाने वाले हैं विष्णु तथा उसमे प्राण का संचार करने वाले हैं ब्रह्मा। अतः हम शिव का कोई आकार न मानकर एक लिंग के रूप में पूजते है।-----उसी प्रकार रूप-रंग, ध्वनि-शब्द-वाणी, स्पर्श, रस और गंध जैसी पांच वस्तुए जो किशी स्त्री या पुरुष में निहित है उससे मानवीय शरीर ही नहीं पूरा मानव समाज प्रभावित होता है और जो समाज या पुरुष/स्त्री इन सबसे प्रभावित होते हुए भी ( प्रभावित तो हर कोई होता इससे कोई इंकार नहीं कर सकता क्योंकि यह अकाट्य सत्य और परम विज्ञानं है इसे मै ही नहीं श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय के सुरु में ही दिया गया है-जिसे उस समय के लिए परमब्रह्म बने श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेशित किया है ) जो संतुलन नहीं खोता वह व्यक्ति और समाज श्रेष्ठ कहलाता है। ---------अतः मै यह कहना चाहूंगा की यह पांच वस्तुए नए रूप में विज्ञान की नयी नयी खोज के साथ आकर मानव तथा मानव समाज को प्रभावित करती है और विशेष रूप से कम्पुटर युग ने भारतीय समाज को भी प्रभावित किया इसमे कोई संदेह नहीं पर इसके दुस्परिनाम से भारतीय समाज बहुत ही अल्प समय तक प्रभावित रहा मतलब केवल १०-१४ (दस-चौदह) साल तक। हम भारतीय समाज की इसी विशेषता को बनाये रखने के लिए विश्व के इन तीन प्रमुख अधरों "ब्रह्मा, विष्णु, और महेश=शिव शंकर" की वंदना करे और विश्व शांति में योगदान करें: Vishesh: मेरा विरोध करने वाले धनपशु और बाहुबली व्यक्ति, देश और समाज २००१ में दंड पा चुके हैं और सायद अब अपने पिता-माता और गुरु के भी बाप बनने की हिम्मत करोड़ों वर्ष तक नहीं करेंगे वे लोग।


PRAYER तो LORD BRAHMA: ॐ, ॐ, ॐ, ॐ, ॐ,ॐ,ॐ। ॐ नमः ब्रह्मदेवाय।


PRAYER TO LORD SHIVA--------"गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं, गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्| भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं, भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्||"=(हे शिव आप) जो कैलाशपति हैं, गणों के स्वामी, नीलकंठ हैं, (धर्म स्वरूप वृष) बैल की सवारी करते हैं, अनगिनत गुण वाले हैं, संसार के आदि कारण हैं, प्रकाश पुञ सदृश्य हैं, भस्मअलंकृत हैं, जो भवानिपति हैं, उन पञ्चमुख (प्रभु) को मैं भजता हूँ।


---PRAYER TO LORD VISHNU: ----"शान्ताकारं भुजग-शयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगन-सदृशम् मेघ-वर्णं शुभाङ्गम्| लक्ष्मी-कान्तं कमल-नयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||"=जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।.-


Wednesday, November 20, 2013

युग परिवर्तन में और किशी विशेष विकाश में व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक जीवन के बहुत सारे नियमों का उल्लंघन होता है या कहे इन नियमों को नजर अंदाज किया जाता है और इस प्रकार विकास और परिवर्तन के साथ-साथ नियमों के उल्लंघन से या कहे इन नियमों को नजर अंदाज से पाप का भी जन्म होता। अतः कहा जाता है कि विकाश के साथ-साथ पाप का भी प्रादुर्भाव होता है और इस पाप से मुक्ति में किशी एक व्यक्ति या किशी समूह विशेष के स्वक्षंद जीवन या जीवन के अधिकारों की आहुति इस यज्ञ में देनी होती ही है या जीवन शक्ति कमजोर होती है विशेष कर वह व्यक्ति या उस व्यक्ति से घिरे हुए व्यक्ति या व्यक्ति समूह का जो संकल्प लेता है उस विकाश या परिवर्तन को करने का। और यही कारन है कि युग परिवर्तन और किशी विशेष विकाश का यश भोग सभी लोगों को नहीं मिल पाता है वे कितने भी योग्य हों। अतः युग परिवर्तन और विशेष विकाश की क्षमता विषय विशेष की योग्यता से ही नहीं वरन सामजस्य, धैर्यशीलता, कार्यकुशलता के साथ-साथ विषय विशेष की योग्यता से नापी जाती है।


Tuesday, November 19, 2013

Religion is a set of principles, morals, ethics, and rules set up to lead one's life. Philosophy is a discipline which deals with life, metaphysics, knowledge, and the ultimate truth. Both religion and philosophy have their own similarities and differences. Here similarities and difference does not mean that one is part of another.-----------So, there are a few similarities and differences between religion and philosophy. One needs to look beyond the surface meaning of both religion and philosophy to understand what they actually imply and how it is useful for one's life.


Yet another difference between religion and philosophy is the concept of belief. While almost all the philosophies do not accept the concept of belief, religion tends to bring in the belief angle quite a few times. In philosophy, something is considered true only if it is completely proven true on a long term basis by means of various forms of reasoning. If it is not, then it will not be considered the ultimate truth. However, in case of religion, a lot of things are supernatural, superstitious, and incredulous in nature that only the concept of belief can make people stand by those things. This is the reason why a lot of philosophers were against organized religions. However, there were a few exceptions where philosophers were religious in nature and stated that religious practices actually have hidden meanings and can help people understand the ultimate truth in life. This is especially common with some of the philosophers from the east.


One of the major differences between religion and philosophy is the need for rituals. While almost all the religions in the world have certain set of rituals which are to be followed by the followers of the respective religions, philosophy does not have any sort of rituals, as it is only a way of thinking. So, while a person can be philosophical without having to do any sort of practices or rituals, it is almost impossible for him to be religious without doing any sort of rituals or practices stated in that particular religion. This is one big difference which makes people say that religion and philosophy are mutually exclusive and cannot co-exist.


One can always argue that both religion and philosophy are one and the same and we just call them by different names. But it is not entirely true.--One of the major similarities between religion and philosophy is that they both deal with human life, human mind, its existence in the universe, the meaning of life, the ultimate truth, and so on. Both tend to make existence in this universe a lot less complicated by addressing issues such as knowledge, truth, life, and existentialism. Thus, one can always argue that both religion and philosophy are one and the same and we just call them by different names. But it is not entirely true.


श्रीकृष्ण अपने परमब्रह्म स्वरुप में: ईश्वरः (एकोदेवो) सर्व भूतानाम, बीजं माम सर्व भूतानाम (अहंब्रह्मास्मि)। सब प्राणियों में एक ही ईस्वर विराजमान है और सब प्राणियों का अनादि बीज मुझे ही जान। http://vandemataramvivekananddrvkprssbhupuau.blogspot.com/


गंगापुत्र भीस्म, भारद्वाज ऋषि पुत्र द्रोणाचार्य और सूर्यपुत्र कर्ण परशुराम के श्रेष्ठ शिष्य थे। गंगापुत्र भीस्म, भारद्वाज ऋषि पुत्र द्रोणाचार्य और सूर्यपुत्र कर्ण महाभारत के वे योध्धा थे जो पूरे पांडव सेना को मात दे सकते थे अगर श्रीकृष्ण ने चाल न चली होती। महादेव शिष्य और विष्णु अवतारी परशुराम में सब पौरुष होते हुए भी अपने क्रोध पर नियंत्रण के लिए कश्यप ऋषि (गोत्रियों) को अपने द्वारा जीती हुई जमीन दे कर अज्ञातवाश में शांति हेतु स्वयं जाना पड़ा था।


ऐसे नहीं कहा गया है जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण कहो या राम और इसमे से दोनों पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम होने कि परिक्षा इसी संसार ने ली थी। -----और इन दोनों के परमभक्त महावीर हनुमान=पीर बाबा=मंगलवारीय बाबा=अम्बवादेकर से ही सुचारु रूप से संसार चलता रहे तो कृष्ण और राम को कास्ट क्यों दिया जाय पुनः धर्म कि रक्षा के लिए अवतरित होने के लिए? वैसे भी इसी महावीर हनुमान=पीर बाबा=मंगलवारीय बाबा =अम्बवाडेकर ने एक बार काशीनरेश के प्राण भगवान् श्रीराम के हांथों से बचाकर सिध्ध किया था राम से बड़ा राम का नाम (कृष्ण से बड़ा कृष्ण का नाम) वैसे हनुमान ने भगवान् श्रीराम की भी प्रतिज्ञा पूरी करवाई थी शाम तक काशी नरेश का सिर भगवान् श्रीराम के गुरु विश्वामित्र के चरणों में सर नतमस्तक करवाकर। कहा गया है कि हनुमान, परशुराम, दुर्वाशा ऋषि और अश्वत्थामा अजर और अमर है तथा किशी न किशी रूप में इस जनमानस में उपस्थित रहते हैं। अंत में एक सामाजिक सौहाद्र के कथन के साथ मै सभी धर्मों को एक करता हूँ: गाय, गंगा और गायत्री को छोड़कर इस्लाम श्रीराममार्ग के सामानांतर और ईसाइयत श्रीकृष्णमार्ग के समानांतर चलता है और गाय, गंगा और गायत्री पर मतभेद या समानता उनके उत्पत्ति स्थान के जलवायु, जनजीवन और भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर है।


यह प्रयाग, काशी और गोरखपुर के विद्वतजन से पक्ष रखने के बाद ही मै पुनः यहाँ रखा रहा हूँ। दुनिया चलाने के कम से कम चार आधार है: १) धार्मिक, २ ) दार्शनिक, ३) सामाजिक और ४) राजनैतिक| दो सर्वोच्च आधार हैं धर्म और दर्शन इसके बाद सामाजिकता और राजनैतिक आधार का महत्व है। दूसरी श्रेणी में ५ ) आर्थिक और ६) नैतिक आधार को सम्मिलित किया जाता है और इस प्रकार छः आधार बनाते हैं: धार्मिक, दार्शनिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा नैतिक|वास्तव में दर्शन और धर्म एक सिक्के के दो पहलू हैं जिनमे एक सैद्धांतिक पक्ष है और दूसरा क्रियात्मक पक्ष पर दोनों को एक दूसरे का हिस्सा या दोनों एक है यह भी नहीं कह सकते हैं आप। । वैसे भी चारों या छहों को एक साथ न सही इनमे से कोई एक तो बहुसंख्यक मानते ही हैं।


Monday, November 18, 2013

विवेकानंद ने व्यवहार में वेदान्त दर्शन को अपनाया है और सभी दर्शनों का मूल अंश उसमे पाया है: वेदांत दर्शन: महर्षि व्यास: वेदांत का अर्थ है वेदों का अंतिम सिद्धांत। महर्षि व्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। इस दर्शन को उत्तर मीमांसा भी कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म जगत का कर्ता-धर्ता व संहार कर्ता होने से जगत का निमित्त कारण है। उपादान अथवा अभिन्न कारण नहीं। ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। साथ ही जन्म मरण आदि क्लेशों से रहित और निराकार भी है। इस दर्शन के प्रथम सूत्र `अथातो ब्रह्म जिज्ञासा´ से ही स्पष्ट होता है कि जिसे जानने की इच्छा है, वह ब्रह्म से भिन्न है, अन्यथा स्वयं को ही जानने की इच्छा कैसे हो सकती है। और यह सर्वविदित है कि जीवात्मा हमेशा से ही अपने दुखों से मुक्ति का उपाय करती रही है। परंतु ब्रह्म का गुण इससे भिन्न है। आगे चलकर वेदान्त के अनेकानेक सम्प्रदाय (अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि ) बने।


भारतीय दर्शन : न्याय दर्शन: महर्षि गौतम: महर्षि गौतम रचित इस दर्शन में इसमें न्याय की परिभाषा के अनुसार न्याय करने की पद्धति तथा उसमें जय-पराजय के कारणों का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।इसमें पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन है। पदार्थों के तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान की निवृत्ति होती है। फिर अशुभ कर्मो में प्रवृत्त न होना, मोह से मुक्ति एवं दुखों से निवृत्ति होती है। इसमें परमात्मा कोसृष्टिकर्ता, निराकार, सर्वव्यापक और जीवात्मा को शरीर से अलग एवं प्रकृति को अचेतन तथा सृष्टि का उपादान कारण माना गया है और स्पष्ट रूप से त्रैतवाद का प्रतिपादन किया गया है। वैशेषिक दर्शन: महर्षि कणाद:महर्षि कणाद रचित इस दर्शन में धर्म के सच्चे स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसमें सांसारिक उन्नति तथा निश्श्रेय सिद्धि के साधन को धर्म माना गया है। अत: मानव के कल्याण हेतु धर्म का अनुष्ठान करना परमावश्यक होता है। इस दर्शन में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य विशेष और समवाय इन छ: पदाथों के साधम्र्य तथा वैधम्र्य के तत्वाधान से मोक्ष प्राप्ति मानी जाती है। साधम्र्य तथा वैधम्र्य ज्ञान की एक विशेष पद्धति है, जिसको जाने बिना भ्रांतियों का निराकरण करना संभव नहीं है। इसके अनुसार चार पैर होने से गाय-भैंस एक नहीं हो सकते। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म दोनों ही चेतन हैं। किंतु इस साधम्र्य से दोनों एक नहीं हो सकते। साथ ही यह दर्शन वेदों को, ईश्वरोक्त होने को परम प्रमाण मानता है। सांख्य दर्शन:महर्षि कपिल: इस दर्शन के रचयिता महर्षि कपिल हैं। इसमें सत्कार्यवाद के आधार पर इस सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति को माना गया है। इसका प्रमुख सिद्धांत है कि अभाव से भाव या असत से सत की उत्पत्ति कदापि संभव नहीं है। सत कारणों से ही सत कार्यो की उत्पत्ति हो सकती है। सांख्य दर्शन प्रकृति से सृष्टि रचना और संहार के क्रम को विशेष रूप से मानता है। साथ ही इसमें प्रकृति के परम सूक्ष्म कारण तथा उसके सहित ख्ब् कार्य पदाथों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। पुरुष ख्भ् वां तत्व माना गया है, जो प्रकृति का विकार नहीं है। इस प्रकार प्रकृति समस्त कार्य पदाथो का कारण तो है, परंतु प्रकृति का कारण कोई नहीं है, क्योंकि उसकी शाश्वत सत्ता है। पुरुष चेतन तत्व है, तो प्रकृति अचेतन। पुरुष प्रकृति का भोक्ता है, जबकि प्रकृति स्वयं भोक्ती नहीं है। योग दर्शन:महर्षि पतंजलि: इस दर्शन के रचयिता महर्षि पतंजलि हैं। इसमें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। इसके अलावा योग क्या है, जीव के बंधन का कारण क्या है? चित्त की वृत्तियां कौन सी हैं? इसके नियंत्रण के क्या उपाय हैं इत्यादि यौगिक क्रियाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार परमात्मा का ध्यान आंतरिक होता है। जब तक हमारी इंद्रियां बहिर्गामी हैं, तब तक ध्यान कदापि संभव नहीं है। इसके अनुसार परमात्मा के मुख्य नाम ओ३म् का जाप न करके अन्य नामों से परमात्मा की स्तुति और उपासना अपूर्ण ही है। मीमांसा दर्शन: महर्षि जैमिनि: इस दर्शन में वैदिक यज्ञों में मंत्रों का विनियोग तथा यज्ञों की प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है। इस दर्शन के रचयिता महर्षि जैमिनि हैं। यदि योग दर्शन अंत: करण शुçद्ध का उपाय बताता है, तो मीमांसा दर्शन मानव के पारिवारिक जीवन से राष्ट्रीय जीवन तक के कत्तüव्यों और अकत्तüव्यों का वर्णन करता है, जिससे समस्त राष्ट्र की उन्नति हो सके। जिस प्रकार संपूर्ण कर्मकांड मंत्रों के विनियोग पर आधारित हैं, उसी प्रकार मीमांसा दर्शन भी मंत्रों के विनियोग और उसके विधान का समर्थन करता है। धर्म के लिए महर्षि जैमिनि ने वेद को भी परम प्रमाण माना है। उनके अनुसार यज्ञों में मंत्रों के विनियोग, श्रुति, वाक्य, प्रकरण, स्थान एवं समाख्या को मौलिक आधार माना जाता है। वेदांत दर्शन: महर्षि व्यास: वेदांत का अर्थ है वेदों का अंतिम सिद्धांत। महर्षि व्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। इस दर्शन को उत्तर मीमांसा भी कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म जगत का कर्ता-धर्ता व संहार कर्ता होने से जगत का निमित्त कारण है। उपादान अथवा अभिन्न कारण नहीं। ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। साथ ही जन्म मरण आदि क्लेशों से रहित और निराकार भी है। इस दर्शन के प्रथम सूत्र `अथातो ब्रह्म जिज्ञासा´ से ही स्पष्ट होता है कि जिसे जानने की इच्छा है, वह ब्रह्म से भिन्न है, अन्यथा स्वयं को ही जानने की इच्छा कैसे हो सकती है। और यह सर्वविदित है कि जीवात्मा हमेशा से ही अपने दुखों से मुक्ति का उपाय करती रही है। परंतु ब्रह्म का गुण इससे भिन्न है। आगे चलकर वेदान्त के अनेकानेक सम्प्रदाय (अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि ) बने। ------------------------------------------------------------------------------------ अन्य हिन्दू दर्शन: चार्वाक दर्शन वेदविरोधी होने के कारण नास्तिक संप्रदायों में चार्वाक मत का भी नाम लिया जाता है। भौतिकवादी होने के कारण यह आदर न पा सका। इसका इतिहास और साहित्य भी उपलब्ध नहीं है। "बृहस्पति सूत्र" के नाम से एक चार्वाक ग्रंथ के उद्धरण अन्य दर्शन ग्रंथों में मिलते हैं। चार्वाक मत एक प्रकार का यथार्थवाद और भौतिकवाद है। इसके अनुसार केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। अनुमान और आगम संदिग्ध होते हैं। प्रत्यक्ष पर आश्रित भौतिक जगत् ही सत्य है। आत्मा, ईश्वर, स्वर्ग आदि सब कल्पित हैं। भूतों के संयोग से देह में चेतना उत्पन्न होती है। देह के साथ मरण में उसका अंत हो जाता है। आत्मा नित्य नहीं है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जीवनकाल में यथासंभव सुख की साधना करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए अवैदिक दर्शनों का विकास: उपनिषदों के अध्यात्मवाद तथा तपोवाद में ही वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध एक प्रकट क्रांति का रूप ग्रहण कर लिया। उपनिषद काल में एक ओर बौद्ध और जैन धर्मों की अवैदिक परंपराओं का आविर्भाव हुआ तथा दूसरी ओर वैदिक दर्शनों का उदय हुआ। ईसा के जन्म के पूर्व और बाद की एक दो शताब्दियों में अनेक दर्शनों की समानांतर धाराएँ भारतीय विचारभूमि पर प्रवाहित होने लगीं। बौद्ध और जैन दर्शनों की धाराएँ भी इनमें सम्मिलित हैं।(From Wikipedia and Other Sources)

भारतीय दर्शन :  न्याय दर्शन: महर्षि गौतम: महर्षि गौतम रचित इस दर्शन में इसमें न्याय की परिभाषा के अनुसार न्याय करने की पद्धति तथा उसमें जय-पराजय के कारणों का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।इसमें पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन है। पदार्थों के तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान की निवृत्ति होती है। फिर अशुभ कर्मो में प्रवृत्त न होना, मोह से मुक्ति एवं दुखों से निवृत्ति होती है। इसमें परमात्मा कोसृष्टिकर्ता, निराकार, सर्वव्यापक और जीवात्मा को शरीर से अलग एवं प्रकृति को अचेतन तथा सृष्टि का उपादान कारण माना गया है और स्पष्ट रूप से त्रैतवाद का प्रतिपादन किया गया है।   वैशेषिक दर्शन: महर्षि कणाद:महर्षि कणाद रचित इस दर्शन में धर्म के सच्चे स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसमें सांसारिक उन्नति तथा निश्श्रेय सिद्धि के साधन को धर्म माना गया है। अत: मानव के कल्याण हेतु धर्म का अनुष्ठान करना परमावश्यक होता है। इस दर्शन में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य विशेष और समवाय इन छ: पदाथों के साधम्र्य तथा वैधम्र्य के तत्वाधान से मोक्ष प्राप्ति मानी जाती है। साधम्र्य तथा वैधम्र्य ज्ञान की एक विशेष पद्धति है, जिसको जाने बिना भ्रांतियों का निराकरण करना संभव नहीं है। इसके अनुसार चार पैर होने से गाय-भैंस एक नहीं हो सकते। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म दोनों ही चेतन हैं। किंतु इस साधम्र्य से दोनों एक नहीं हो सकते। साथ ही यह दर्शन वेदों को, ईश्वरोक्त होने को परम प्रमाण मानता है।   सांख्य दर्शन:महर्षि कपिल: इस दर्शन के रचयिता महर्षि कपिल हैं। इसमें सत्कार्यवाद के आधार पर इस सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति को माना गया है। इसका प्रमुख सिद्धांत है कि अभाव से भाव या असत से सत की उत्पत्ति कदापि संभव नहीं है। सत कारणों से ही सत कार्यो की उत्पत्ति हो सकती है। सांख्य दर्शन प्रकृति से सृष्टि रचना और संहार के क्रम को विशेष रूप से मानता है। साथ ही इसमें प्रकृति के परम सूक्ष्म कारण तथा उसके सहित ख्ब् कार्य पदाथों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। पुरुष ख्भ् वां तत्व माना गया है, जो प्रकृति का विकार नहीं है। इस प्रकार प्रकृति समस्त कार्य पदाथो का कारण तो है, परंतु प्रकृति का कारण कोई नहीं है, क्योंकि उसकी शाश्वत सत्ता है। पुरुष चेतन तत्व है, तो प्रकृति अचेतन। पुरुष प्रकृति का भोक्ता है, जबकि प्रकृति स्वयं भोक्ती नहीं है।  योग दर्शन:महर्षि पतंजलि: इस दर्शन के रचयिता महर्षि पतंजलि हैं। इसमें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। इसके अलावा योग क्या है, जीव के बंधन का कारण क्या है? चित्त की वृत्तियां कौन सी हैं? इसके नियंत्रण के क्या उपाय हैं इत्यादि यौगिक क्रियाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार परमात्मा का ध्यान आंतरिक होता है। जब तक हमारी इंद्रियां बहिर्गामी हैं, तब तक ध्यान कदापि संभव नहीं है। इसके अनुसार परमात्मा के मुख्य नाम ओ३म् का जाप न करके अन्य नामों से परमात्मा की स्तुति और उपासना अपूर्ण ही है।  मीमांसा दर्शन: महर्षि जैमिनि: इस दर्शन में वैदिक यज्ञों में मंत्रों का विनियोग तथा यज्ञों की प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है। इस दर्शन के रचयिता महर्षि जैमिनि हैं। यदि योग दर्शन अंत: करण शुçद्ध का उपाय बताता है, तो मीमांसा दर्शन मानव के पारिवारिक जीवन से राष्ट्रीय जीवन तक के कत्तüव्यों और अकत्तüव्यों का वर्णन करता है, जिससे समस्त राष्ट्र की उन्नति हो सके। जिस प्रकार संपूर्ण कर्मकांड मंत्रों के विनियोग पर आधारित हैं, उसी प्रकार मीमांसा दर्शन भी मंत्रों के विनियोग और उसके विधान का समर्थन करता है। धर्म के लिए महर्षि जैमिनि ने वेद को भी परम प्रमाण माना है। उनके अनुसार यज्ञों में मंत्रों के विनियोग, श्रुति, वाक्य, प्रकरण, स्थान एवं समाख्या को मौलिक आधार माना जाता है।  वेदांत दर्शन: महर्षि व्यास: वेदांत का अर्थ है वेदों का अंतिम सिद्धांत। महर्षि व्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। इस दर्शन को उत्तर मीमांसा भी कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म जगत का कर्ता-धर्ता व संहार कर्ता होने से जगत का निमित्त कारण है। उपादान अथवा अभिन्न कारण नहीं। ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। साथ ही जन्म मरण आदि क्लेशों से रहित और निराकार भी है। इस दर्शन के प्रथम सूत्र `अथातो ब्रह्म जिज्ञासा´ से ही स्पष्ट होता है कि जिसे जानने की इच्छा है, वह ब्रह्म से भिन्न है, अन्यथा स्वयं को ही जानने की इच्छा कैसे हो सकती है। और यह सर्वविदित है कि जीवात्मा हमेशा से ही अपने दुखों से मुक्ति का उपाय करती रही है। परंतु ब्रह्म का गुण इससे भिन्न है। आगे चलकर वेदान्त के अनेकानेक सम्प्रदाय (अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि ) बने। ------------------------------------------------------------------------------------ अन्य हिन्दू दर्शन: चार्वाक दर्शन वेदविरोधी होने के कारण नास्तिक संप्रदायों में चार्वाक मत का भी नाम लिया जाता है। भौतिकवादी होने के कारण यह आदर न पा सका। इसका इतिहास और साहित्य भी उपलब्ध नहीं है। "बृहस्पति सूत्र" के नाम से एक चार्वाक ग्रंथ के उद्धरण अन्य दर्शन ग्रंथों में मिलते हैं। चार्वाक मत एक प्रकार का यथार्थवाद और भौतिकवाद है। इसके अनुसार केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। अनुमान और आगम संदिग्ध होते हैं। प्रत्यक्ष पर आश्रित भौतिक जगत् ही सत्य है। आत्मा, ईश्वर, स्वर्ग आदि सब कल्पित हैं। भूतों के संयोग से देह में चेतना उत्पन्न होती है। देह के साथ मरण में उसका अंत हो जाता है। आत्मा नित्य नहीं है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जीवनकाल में यथासंभव सुख की साधना करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए  अवैदिक दर्शनों का विकास: उपनिषदों के अध्यात्मवाद तथा तपोवाद में ही वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध एक प्रकट क्रांति का रूप ग्रहण कर लिया। उपनिषद काल में एक ओर बौद्ध और जैन धर्मों की अवैदिक परंपराओं का आविर्भाव हुआ तथा दूसरी ओर वैदिक दर्शनों का उदय हुआ। ईसा के जन्म के पूर्व और बाद की एक दो शताब्दियों में अनेक दर्शनों की समानांतर धाराएँ भारतीय विचारभूमि पर प्रवाहित होने लगीं। बौद्ध और जैन दर्शनों की धाराएँ भी इनमें सम्मिलित हैं।(From Wikipedia and Other Sources)

श्रीमद्भागवत गीता में हर एक योग का वृहद् और अलग-अलग वर्णन है पर सम्पूर्ण गीता समझने के लिए सबको एक में मिलाना पड़ता है । उसी तरह आप मुझे पहले यहाँ देखिये तब मेरा कोई एक पोस्ट पूर्ण समझिये: वैसे सुकरात को विषपान के लिए बाध्य किया था और ईसामसीह को शूली पर लटकाया गया था पर मैं दोनों के लिए तैयार हूँ यदि आप एक सज्जन व्यक्ति बन सके। http://vandemataramvivekananddrvkprssbhupuau.blogspot.com/


Friday, November 15, 2013

दुनिया चलाने के कम से कम चार आधार है: १) धार्मिक, २ ) दार्शनिक, ३) सामाजिक और ४) राजनैतिक| Topmost and 2nd topmost base is Religion and Philosophy then Societal factor and last is Politics. Secondary base is : economic(आर्थिक) and ethical (नैतिक) thus it becomes धार्मिक, दार्शनिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा नैतिक|


तर्क बड़ा या आस्था इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है हिंदुओं के प्रथम पूज्य देव गणेश का टूटा हुआ एक दाँत जिसे विष्णु-अवतरधारी परशुराम ने तोड़ा था और अपनी ही योग समाधि कि रक्षा के लिए गणेश को नियुक्त किये महादेव शिव ने परशुराम से कोई नाराजगी नहीं प्रकट की उनके इस कृत्य के लिए अपने पुत्रों और पारवती के कहने पर भी। उन्होंने कहा कि पिटा के आज्ञा पालन के बदले जो तर्क वितर्क गणेश ने किया था उस पर परशुराम कि अपने गुरु महादेव से मिलने कि आस्था बड़ी थी॥ अतः परशुराम दंड के भागीदार नहीं है।


कृष्ण का न्याय दर्शन: पृथ्वी पर पापा का बोझ कम करने के लिए अगर कुरुवंश में कौरवों का नाश किये तो गांधारी के अभिशाप (महादेव के आशीर्वाद से उत्पन्न हुए १०० पुत्रों के विनाश का सूत्रधार श्री कृष्ण को मना था गांधारी ने और अपनी बुआ कुंती के पुत्रों का पक्ष लेने का आरोप लगाया था) और दुर्वाशा समेत अन्य ऋषियों के साथ जो मजाक यदुवंश के नवयुवक शुरू किये थे जिसमे कि श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध (श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्दुम्न के पुत्र) भी युवाओं में सम्मिलित थे को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ने जो विनाश यज्ञ किया यदुवंश के नाश का उसमे प्रथम आहुति अपनी दी थी ज़रा नमक बहेलिए से अपनी ह्त्या करवा कर।


Wednesday, November 13, 2013

परमब्रह्म श्रीकृष्ण कि ब्रह्मवाणी श्रीमद्भागवत गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जो विश्व के समस्त धर्मावलम्बियों और पन्थानुयायियों को एक ही मार्ग पर ला सनातन संस्कृति से जोड़ता है।


ब्रह्मा अगर किशी से डरकर बेद गलत पढ़े और ऋषि वशिस्थ के वंसज महर्षि व्यास उन चारों वेदों और अट्ठारह पुराणों को किशी से डरकर गलत संकलित करें तो स्वामी विवेकानंद के वेदांत दर्शन और परमब्रह्म श्रीकृष्ण कि ब्रह्मवाणी श्रीमद्भागवत गीता के पढने वाले का हो चुका कल्याण। जो सत्य है वह चाहे खुद मुझे भी अप्रिय हो तो क्या सामने लाने से नहीं डरना चाहिए। अतः आप समझ सकते हैं कि कितने समर्थ थे परमब्रह्म श्रीकृष्ण कि ब्रह्मवाणी श्रीमद्भागवत गीता को संकलित करने वाले ऋषि वशिस्थ के वंसज महर्षि वेद व्यास।


Friday, November 8, 2013

श्रीकृष्ण जब अर्जुन का मोह भंग करने के लिए स्वयं परमब्रह्म श्रीकृष्ण बने थे महाभारत में तो उन्होंने कहा था कि रूप, रस, शब्द, स्पर्श, गंध देह रूपी शरीर और देह रुपी समाज दोनों प्रभावित होते हैं। अतः मन रुपी घोड़े पर नियंत्रण रखने से व्यक्ति का शरीर और समाज संतुलित रहता है। तो मित्र वही कृष्ण अगर रास लीला करते है तो निश्चित रूप से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किये होंगे अलौकिक रूप से: अलौकिक इस लिए कि कालिया नाग का विष उन पर असर नहीं करता, पूतना का विषैला दूध असर नहीं करता और अनेको राक्षशों का बचपन में ही वध किया उन्होंने| क्या हर कोई ऐसा कर पायेगा? अतः ऐसे ही (Moon Dynasty: चंद्रवंशी:यदुवंसीय:वृष्णिवंशीय) क्षत्रिय श्रीकृष्ण को (Solar Dynasty: सूर्यवंशीय:इक्षाकुवंशीय:रघुवंशीय) क्षत्रिय श्रीराम के बचे हुए कर्मों का पूरा करने वाला नहीं कहा गया है। वैसे भी स्वयं परमब्रह्म श्रीकृष्ण ने कहा था कि धनुष धारियों में श्रीराम हूँ, अदिति (कश्यप) के बारह पुत्रों (आदित्यों) में विष्णु हूँ, मुनियों में नारद हूँ, ऋषियों में भृगु ऋषि हूँ और वृक्षों में पीपल हूँ। और इसी पीपल के नीचे शाक्य वंशीय गौतम गोत्रीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ और वे विष्णु के अवतार कहे गए हैं कुछ सन्दर्भों में तो उनके द्वारा चलाये गए बौद्ध सम्प्रदायी लोग हिन्दू से कैसे अलग हुए। अगर शक्यवंशीय गौतम गोत्रीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम विष्णु के अवतार तो त्रिदेव कि परिकल्पना से वे दूर कैसे और वे ही नहीं किशी भी धर्म के लोग दूर नहीं हो सकते तो कम से कम हिन्द (जंबू द्वीप = ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी तक के ) वासी है।


व्यक्ति अपने जीवन में असंख्य मनो दशाओं में जीता है लेकिन हर मनो दशा के अनुसार तरह-तरह के धर्म तो नहीं हो सकते पर सनातन हिन्दू धर्म जिसे ऋषि महर्षियों द्वारा वैज्ञानिक दृस्टि से संसोधित किया जाता रहा है और जिसका कोई एक चलने वाला नहीं वरन परमब्रह्म या ब्रह्म या परमेस्वर जिन्होंने श्रीस्ती का निर्माण किया को ही चलाने वाला ही कहा जा सकता है, उससे अलग हो जो अन्य धर्म चलाये गए हैं विभिन्न जलवायु में नियम पूर्वक जीने के लिए तो इससे तीन ही विश्व व्यापक धर्म कि ही व्यवस्था दी जा सकी है और वह है: १) हिन्दू और सम्मिलित, २) मुस्लिम और सम्मिलित तथा 3) ईसाई और सम्मिलित। यहाँ सम्मिलित का अर्थ सर्वव्यापक है इसे बताने कि जरूरत नहीं है यहाँ पर। इन तीनों के अंदर पर पूरे विश्व को चलाया जा सकता है इसमे कोई दो राय नहीं पुच्छल तारों कि तरह बहुत सारे धर्म को चलाने कि जरूरत नहीं है।


Thursday, November 7, 2013

भीम वृष्णिवंशीय (यदुवंश कि विशेष श्रेणी) क्षत्रिय श्रीकृष्ण कि बुआ कुंती और कुरु वंशीय क्षत्रिय पांडु के पुत्र तथा पवन देव के अंश थे। स्त्री कि मान और सम्मान कि रक्षा के प्रति दृण प्रतिज्ञा थे जिसका परिणाम था कि द्रौपदी को अपमानित, कुदृस्ति डालने वाले तथा हाँथ लगाने वाले दुशासन और दुर्योधन तथा कीचक उनके शिकार हुए। अपने बड़े भाई के आज्ञाकारी और भाइयों कि रक्षा के प्रति समर्पित थे जिसका प्रत्यक्ष उदहारण है कि कर्ण को इंद्र द्वारा दिए गए ब्रह्मास्त्र से जब अर्जुन के प्राण न बचने कि उम्मीद आयी तो वे अपने पुत्र घटोत्कच्छ को आत्महत्या हेतु भेज दिया मतलब कर्ण कौरव सेना कि रक्षा और स्वयं अपने प्राण कि रक्षा के लिए ब्रह्मास्त्र जरूर चलाता और उससे घटोत्कच्छ का मरना निश्चित था।>>> सबसे बड़ी बात कि भीम अपने भाइयों सहित अल्पसंख्यक थे और उनकी सेना भी छोटी थी तथा एक बात और कि संख्या ही सर्वोपरि तो श्रीकृष्ण किस लिए थे और भगवाध्वज पर बैठे हनुमान किश लिए थे? अतः मेरा कहना है कि मानवता कि दृष्टि में सब बराबर है मौलिक रूप से पर विलक्षण प्रतिभा भी कुछ होती है क्या?>>>>> जिस कृष्ण ने पांडवों के लिए माँ उत्तरा के पेट में पल रहे एक मात्र बचे हुए वंसज परीक्षित के प्राणों कि रक्षा की अपने जीवन के सम्पूर्ण सद्कर्मों में सत्य कि प्राप्ति का उद्देश्य बताकर परमब्रह्म से तो ऐसे में जय श्री कृष्ण कहने के बाद किशी पांडव कि अलग से जय कहने कि आवश्यकता रह जाती है क्या?


Wednesday, November 6, 2013

भारत को विश्व गुरु बनाने का संकल्प भारत के बहुत से महात्मा ले चुके हैं उसमे मै उनका सहयोग करना चाह रहा हूँ अपने विचार के माध्यम से पर मेरे विचार से गुरु साधन सम्पन्ना ज्यादा नहीं होता है अपने शीस्यों से जैसा कि गुरु वशिस्ठ और चाणक्य अपने को राजदरबार से जोड़ कर भी भोग विलाशिता से दूर सामान्य जीवन व्यतीत करते थे। अतः इस प्रकार के भारतीय जन और भारत कि परिकल्पना है मेरी पर गम्भीर स्थिति में गुरु के लिए श्रीराम और चन्द्रगुप्त मौर्य गुरु के रक्षार्थ बाध्य हों गुरु भक्ति में।


कम से कम चार आधार है दुनिया चलाने के १) धार्मिक, २ ) दार्शनिक, ३)सामाजिक और ४) राजनैतिक और इस प्रकार मै चार में से किशी एक के आधार पर भी अपने कथन को सही सिध्ध कर सकता हूँ।>>> सर्व प्रथम "प्रत्यक्षं किम प्रमाणम" । आप किश आधार पर कह रहे हैं कि मै किशी को बेवकूफ बना रहा हूँ। क्या भारत या किशी अंतररास्ट्रीय न्यायलय तथा भारतीय गृह मंत्रालय या किशी आयोग ने यह अधिकार दिया है आप को जिसमे किशी वाद के द्वारा आप ने सिध्ध किया हो कि मै ऐसा कर रहा हूँ ? मई जो लिखता हूँ और जो कहता हूँ उसका भारतीय या किशी अंतररास्ट्रीय न्यायलय तथा भारतीय गृह मंत्रालय या किशी आयोग समक्ष प्रमाण दूंगा। एक मित्र/सहपाठी के नाते आप से गुजारिस है कि आप अनाप सनाप टिपण्णी बिना किशी आधार के न किया कीजिये अन्यथा आप को मुझे मित्र समूह से बाहर करना पडेगा।


It is evident that forbearance, tolerance along with Ahimsa and universal acceptance are the parts and parcels of the lives of the Indians.


भारत माँ कि पुकार बहुत से लोग सुन रहे पर सत्य कौन उगले: वे व्यक्ति धन्य हैं जो रास्त्र हेतु सब कुछ अर्पित देते हैं तथा हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश और अपयश का उनको तनिक भी भय नहीं होता है।>>> द्वारका में एक बार कृष्ण अस्वस्थ हो गए। वैद्य ने कहा- किसी की चरणरज चाहिए, तभी उपचार होगा। चरणरज लाने की जिम्मेदारी नारद को सौंपी गई। वे रुक्मणि, सत्यभामा, जामवंती सहित ऋषिमुनियों के पास पहुंचे। कृष्ण की तीनों पटरानिया रुक्मणी, सत्यभामा, जामवंती भक्ति में फेल हो गई किसी ने भी रज नहीं दी। डर था कृष्ण को अपनी चरणरज देकर नर्क कौन जाएं। थके हारे नारद कृष्ण के पास लौटे और आप बीती सुनाई।---------कृष्ण मुस्कुराए और कहा एक बार ब्रज जाकर देख लें, वहां किसी की रज मिल जाए। नारद ब्रज पहुंचे तो कृष्ण के अस्वस्थ होने की सूचना से सभी चिंतित हो गए। राधा और गोपियां बहुत दु:खी थीं। जब पता चला चरणरज से कृष्ण स्वस्थ हो सकते हैं तो सभी अपनी रज देने को उतावली हुईं। नारद ने पूछा- तुम्हें नर्क का डर नहीं है। जवाब मिला- यदि कृष्ण स्वस्थ हुए तो उनके साथ नर्क भी स्वर्ग बन जाएगा। नारद की खुशी और आश्चर्य का ठिकाना न रहा। राधा की चरणरज ली और कृष्ण स्वस्थ हो गए। नारद को भी पता चला भगवान का सुख बड़ा है। यदि भगवान स्वस्थ और सुखी हैं तो नर्क भी स्वर्ग बन जाता है।


भारतीयों कि शक्ति को कमजोर करने के लिए पोषित किया जा रहा है दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र को जिससे कि योग्य भारतीय मानवीय संशाधन विश्व बाजार में स्वतः उतरता रहे प्रतिक्रया स्वरुप। यहाँ मै यह नहीं कह सकता कि यह विश्व मानवता या भारतीयों के लिए अच्छा है घातक है पर इसीलिए मै जरूर कहता हूँ कि आम भारतीय जो अभिकर्ता(एजेंट) नहीं है किशी दूसरे देश का और केवल देश को ही सब कुछ समझता है उसकी शक्ति कम कर न आंकी जाय विश्व पटल पर।>>>


Tuesday, November 5, 2013

दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र और साम-दाम-दंड-भेद रुपी अस्त्र का समाज हित में प्रयोग किया जाय तभी तक ठीक है न कि सत्य को पराजित करने में और संस्कार तथा संस्कृति को नस्ट करने में: जिसे अपने संस्कार से जीता जा सकता था उसे ब्रह्मास्त्र से जीतने कि जरूरत ही क्या थी अन्यथा ब्रह्मास्त्र अपने पास रखते हुए भी मै पिछड़ा अस्त्र, दलित अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र और साम-दाम-दंड-भेद का मुह तोड़ जबाब देने से पीछे क्यों रहता? जिसे अब भी सरम न आयी हो मुझे नीचा दिखाने में मै उसे ब्रह्मास्त्र का दर्शन मै करा सकता हूँ व्यक्तिगत तौर पर(न कि सार्वजनिक तौर पर) और बता सकता हूँ कि यह सहिस्णुता और सहनशीलता ही थी कि मै हर वार का जबाब देने में सक्षम होते हुए भी सब कुछ होता देखते रहा और मुझे आशा, विश्वास और आस्था थी ईस्वर पर कि की यह ईस्वर ही है जो बतायेगा कि मै अपने जीवन में किशी भोग और पराई वस्तु कि कामना ही नहीं किया और न आज तक मंदिर में जाकर ईश्वर से अपने लिए कुछ माँगा है इसके शिवा कि विश्व में सबका कल्याण हो पर इतना जरूर है कि जिस नैतिक रूप से गिरे हुए विश्व और भारतीय समाज कि मुझे आशंका थी बारह वर्ष पूर्व वह आज प्रबल रूप धारण किये हुए है इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा। पर आज भी भारतीय संस्कृति और संस्कार कि जननी और जनक निःस्वार्थ भाव से संस्कारित और सुसंस्कृत संतान को जन्म दे रहे हैं और व्यवस्था को नियंत्रिय करने में अपना पूरा सहयोग दे रहे हैं। जय हिन्द(जम्बूद्वीप=ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी , जय भारत(अखंड भारत=भरतखंड), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


सहिष्णुता (जो हिंदुत्व कि प्रथम पहचान है) यदि पशुता और क्रूरता में बदल जाता है किशी भी कारन वस् तो परिणाम जो होता है उससे शायद यह विश्व परिचित हो गया है अच्छी तरह से।


क्या आप ने कभी विचार किया है की कि आप हिन्दू या सनातन हिन्दू बनकर जीते रहे या सनातन हिन्दू संस्कृति अजर और अमर रहे इस लिए कोई अपने को मुसलमान या ईसाई बनाकर जी रहा हो रहा है? बात बहुत छोटी से है पर घाव बहुत गम्भीर है न ?--------------|---------||धन्य सो द्विज(ब्राह्मण) निज धर्म न टरई(अपना धर्म किशी कीमत पर न छोड़े)।।--------|------||धन्य जन्म द्विज भगती अभंगा (जिस ब्राह्मण की भगति अटूट हो भगवान् राम के प्रति उसका जन्म धन्य है)||


Sunday, October 27, 2013

श्रीराम और श्रीकृष्ण मिलकर श्रीराम ही बनायेंगे वे श्री राम-कृष्ण भले कहे जाय और यह बताता है की श्रीराम को अपना आदर्श श्री कृष्ण स्वयं क्यों मानते थे और उनके जीवन के शेष कर्मों को वे पूरा क्यों किये।>>>>>कृष्णमयी यमुना और राममयी गंगा मिलकर पुनः रामकृष्णमयी गंगा बनाती हैं यह है सरस्वती का प्रभाव और यही से तीन जन्म और कर्म के आधार पर धर्म (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) तथा जलवायु के आधार पर धर्म( हिन्दू और सम्मिलित , मुस्लिम और सम्मिलित और इसाई और सम्मिलित) धर्म बनते है जो पूरी दुनिया को चलाते हैं जिसमे मुस्लिम राममयी के सामानांतर और इसाई कृष्णमयी के सामानांतर चलते है। केवल अन्तर है सनातन हिन्दू धर्म में और अन्य धर्म में की वे गाय, गंगा और गायत्री के प्रति कैसा आचरण और आस्था रखते हैं। यह है प्रयाग का प्रभाव और सनातन हिन्दू धर्म का प्रवाह जो सबको सामान ऊर्जा देता है। अतः मई विशेष निवेदन करूंगा की जब जमुना और गंगा मिलकर गंगा ही बनाती हैं तो श्रीराम और श्रीकृष्ण मिलकर श्रीराम ही बनायेंगे वे श्री राम-कृष्ण भले कहे जाय और यह बताता है की श्रीराम को अपना आदर्श श्री कृष्ण स्वयं क्यों मानते थे और उनके जीवन के शेष कर्मों को वे पूरा क्यों किये। आप किशी आतंकवादी घटना का अपने श्रेष्ठ चरित्र से सामना कीजिये और देखिये जिस दिन आप दूसरों के प्रभाव में अपने चरित्र का स्वयं हनन नहीं करेंगे कोई आतंकवाद आप के सामने नहीं टिक सकता है।


When a person goes away from his native he seeks energy for life from every thing of his native i.e. living and non living, enemy and friend; and Physical Handicapped, MAD or in COMA, pet and independent animal and land.


धर्म की राजनीती करने वालों और आध्यात्मिक नेताओं के लिए भी कुछ गूढ़ रहस्य छोड़ देने चाहिए राजनेताओं को क्योंकि इस संसार को चलाने के लिए राजनेताओं की तरह वे भी एक से दूसरे धर्म के धार्मिक राजनीतज्ञों और आध्यात्मिक व्यक्तियों के संपर्क में रहते हैं तथा सामाजिक और भौगोलिक परिवेश को वे भी देखते रहते हैं।


मै फिर कहता हूँ सभी देवी और देवताओं से की कि चरित्रहीनता के दल-दल में आत्म ह्त्या करने से अच्छा है की आतंक के अस्त्र का सामना करें या सामना करते हुए मरें हम।


दुनिया अंदाज लगाए की विश्व की सर्वोच्च शक्ति भारत है या कोई और? मकरध्वज के पिता थे हनुमान और वे प्रयाग में थे। पिता बड़ा होता है या पुत्र? इशारों को अगर समझो तो राज रहने दो का जबाब यही था की अभी भी वक्त है सुधर जाओ और कभी कश्यप ऋषि के अनुरोध को नजर अंदाज नहीं करना नहीं तो स्थिति दुर्वाशा या महाविनाशक और महाशिव भगवान् भोले नटराज शिव संभालेंगे। जिसे दुनिया केवल 9 और 11 समझी वह तो 9-9 और 11-11 था और प्रयाग में दुनिया की धुरी संभाल रहा था।


सतयुग में ऋषियों की गाय का शूर्यवंशीय ग्वाला जो शिवांश राजा केदार का वध किया था तंग आकर जब वे बाद में जालन्धर की तरह शिव शक्ति में मद माते होकर दुराचार में लिप्त हो गए थे तो वह भी हनुमान की तरह शिवांश और माताओं बहनों और समाज की इज्जत-आबरू का रक्षक रहा होगा। मित्रों प्रभु (विष्णु: श्री राम या श्री कृष्ण कोई भी हो सकता है) प्रताप जेही कालहिं खाई ऐसा है हनुमान(=महावीर=बजरंगबली=अम्बवादेकर=अम्बेडकर=पीर बाबा=मंगलवारीय बाबा) के चरित्र का चित्रण जो अन्याय और अत्याचार तभी तक बर्दास्त करते हैं जब तक की श्री राम और श्री कृष्ण उनको विरोध करने से रोक रहे हों। पर आज बहुत से हनुमान, महावीर, बजरंगबली, अम्बवादेकर, अम्बेडकर, पीर बाबा और मंगलवारीय बाबा है जो सीता, पारवती, लक्ष्मी, सरस्वती और रुकमनी को ही चरित्र हीनता के दल दल में धकेले जा रहे हैं अपने तुछ्यस्वार्थ के लिए आम नारियों और स्त्रियों की बात तो दूर है।>>>>> मै फिर कहता हूँ सभी देवी और देवताओं से की कि चरित्रहीनता के दल-दल में आत्म ह्त्या करने से अच्छा है की आतंक के अस्त्र का सामना करें या सामना करते हुए मरें हम।


Friday, October 25, 2013

गोत्रों के श्रेस्ठता कि श्रेणी गौतम, वशिस्ठ, कश्यप, अंगारिसा/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/दुर्वासा और विश्वामित्र/कौशिक है।


और जिनके दिमाग में एन्टी-सवर्ण या एन्टी-ब्राह्मण का भूत सवार रहता है उनको मै बता देना चाहता हूँ कि जितने भी युग हुए हैं उनमे लडकिया ब्रह्मा के पुत्र राजा दक्ष कि ही पुत्री रही हैं चाहे वह राजा दक्षप्रजापति रहे हों या या अन्य कोई राजा दक्ष। तो मेरे मित्र ब्रह्मा के ये पुत्र राजा दक्ष कि पुत्रिया ब्राह्मण ही रही है और आप को यह भी पता होगा कि बिना स्त्री के या पत्नी के या प्रकृति के कोई श्रीस्ती नहीं चलती है तो कम से कम सबकी माँ इन्ही ब्राह्मण लड़कियों कि पुत्री होंगी। राजा दक्षा प्रजापति की विख्यात पुत्रियों कि जोड़ी सती (पारवती:महादेव शिव) और अदिति (कश्यप) जग जाहित्र है। और दक्ष कि अन्य सभी पुत्रियों से भी कश्यप ऋषि कि शादी हुई और उनकी जो पुत्रिया हुई उनसे अन्य ऋषियों कि शादी हुई। और इस प्रकार ऋषि परम्परा से मानव सभ्यता कि जब सुरु आत हो गयी तो इन्ही ऋषि संतानों से सृस्टि का विकाश हुआ।अतः आप अपने अभियान को किशी के एंटी नहीं वरन अपने संवर्धन के लिए चलाइये और आप सायद संवर्धन का मतलब समझते होंगे जैसा कि इसमे सामाजिक सौहार्द्र सहित अपना विकाश निहित है।


अयोध्या में भगवान् श्रीराम के राजदरवार में लव और कुश का पिता का और सीता को पति का अधिकार माँगने पहुचे बाल्मीकि स्वयं सबसे पहले ऋषि वशिस्ठ को प्रणाम करते हैं जो बताता है कि कश्यप गोत्रियों के लिए वशिस्ठ गोत्रीय कितने श्रद्धेय हैं? तब आप समझा सकते हैं कि गौतम इनके लिए कितने श्रध्धा और विश्व के पात्र हैं। और इसी लिए गोत्रों के श्रेस्ठता कि श्रेणी गौतम, वशिस्ठ, कश्यप, अंगारिसा/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/दुर्वासा और विश्वामित्र/कौशिक है।


वरुण के पिता कश्यप; बाल्मीकि और भृगु के पिता वरुण; भारद्वाज के गुरु बाल्मीकि; और गर्ग के गुरु भारद्वाज तो मित्रों श्रेस्ठ कौन भरद्वाज और गर्ग या कश्यप। यह गोपनीय जानकारी मैंने सार्वजनिक इस लिए की कि गर्ग और भारद्वाज स्वयं उस कश्यप को कम करके आंक रहे थे जो सभी सामजिक रूप से अलग-थलग और बहिस्कृत को पुनः सनातन हिन्दू धर्म में शरण देने के कारन मिश्रित गोत्र कि संज्ञा पा गया है। यह सामाजिक ढांचा ऐसे ही चलता है कि किशी का पतन होता है तो अच्छे कर्म से उसका उन्नयन भी होता है कश्यम गोत्र कि प्रथम सीढ़ी से अन्य गोत्र में।


देवताओं के गुरु (ब्रहस्पति देव) के गुरु भाई शुक्राचार्य (जिनके शिष्य दैत्य थे) के पास भी ज्ञान और विज्ञान कम नहीं परन्तु दैत्य हर युध्ध में पराजित हुए| अतः ज्ञान और विज्ञान का समाज में किस प्रकार प्रयोग हो रहा है यह निर्धारित कर ज्ञान और विज्ञान का सदुपयों सुनिश्चित किया जाय तो यह ज्ञान और विज्ञान के विकाश को और अधिक महत्व प्रदान करेगा तुलनात्मक रूप से कि ज्ञान और विज्ञान के विकाश की होड़ में हम मानवता ही खो दें| ऐसा करने से व्यक्ति विशेष के जीवन और सम्पूर्ण समाज के जीवन में और अधिक आनंद का संचार होगा|


एक तो मानव बनकर जीना कठिन है उससे भी कठिन है सम्मान सहित जीना उससे भी कठिन है एक सज्जन व्यक्ति बनकर जीना और सबसे कठिन है ब्राह्मण बनकर जीना| अतः जो ब्राह्मण बनकर न जी सका ब्रह्मण कुल में जन्म होते होते हुए भी तो निश्चित रूप से यह उस व्यक्ति की किशी दुर्बलता का परिचायक है उसे हम महान नहीं कह सकते और न तो वह व्यक्ति समाज लिए अनुकरणीय होगा। श्रेष्ठ वह व्यक्ति है जो इस सामाजिक उथल पुथल के बावजूद ब्राह्मण बनकर एक सम्मान जनक स्थिति में जीन की जिद्दोजहद बनैय हुए है और इसके लिए कोई बड़ा से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार है। ब्राह्मण कुल में जन्मे व्यक्ति के अलावा भी जो व्यक्ति ब्रह्मण जैसे चरित्र का निर्वहन कर रहे हैं वह भी तपस्या (वैश्य), बलिदान (क्षत्रिय) की श्रेणी से ऊपर उठाकर त्याग की श्रेणी में आ चुके हैं और उनके इस त्याग की परिक्षा उनके जीवन में अवस्य होगी है और उन्हें भी एक दिन मानवता की रक्षा या स्थापना हेतु ब्रह्मास्त्र बनाना पडेगा जो विश्व का सर्वोत्तम अस्त्र है" ।-


मेरे विचार से भारतीय जलवायु के अनुसार माता-पिता तथा भारत सरकार ऐसी परिस्थिति पैदा करें की स्नातकोत्तर होने के कुछ समय आगे और पीछे ही जो लोग शादी-शुदा जीवन यापन करना चाहते है उनकी शादी कर दी जाय इससे समाज पर बहुत अच्छा असर पडेगा। एक आम भारतीय नागरिक को भोले शिव और पारवती तथा श्री राम और सीता का अनुशरण करना चाहिए और वैसे भी सावन के पांच सोमवार और तेरस और शिव रात्रि को विशेष स्थान दिया जाता है भारत में शिव और पारवती जैसा प्रेम और दांपत्य जीवन पाने के लिए। यहाँ तक की योग्य और पुरुषार्थी वर पाने के लिए भी शिव भक्ति स्त्रियाँ करती है। कृष्ण की राह जहां-जहां सरल है वही लोग अनुसरण करते हैं और जहां कांटे दार राह है वहां से दूर जाते हैं जिसमे बचपन से जीवन में संकट और माता-पिता की दयनीय दशा भी सामिल है और माता-पिता के कस्ट दूर करने के लिए अभीस्त नन्द, यशोदा और राधा तथा अन्य गोपिकाओं के प्रेम का त्याग (पर आतंरिक रूप से नहीं त्यागा था किशी को भी) । पर दूर होने से आप बच नहीं सकते सच्चाई से। अतः भारतीय जलवायु और परिवेश में रहने वाले आम आदमी का जीवन तभी आदर्श होगा जब वह जीवन में भोले शिव और पारवती का तथा श्री राम और सीता को अपना आदर्श मानकर वैवाहिक अवस्था तक ब्रह्मचर्य का पालन करे न की इससे पूर्व ब्रह्मचर्य भंग कर दांपत्य जीवन में प्रवेश करे।


Thursday, October 24, 2013

कान्हां कही कही ग्वाल नचावत, हसत सबै मुस्कात। गोर नन्द जशोदा गोरी, तुम कट श्यामल गात। ---------इसी श्री कृष्ण जन्मास्टमी को उसी नक्षत्र और उसी राशि में जन्म लिए मेरे सुपुत्र कृष्णकान्त भी घनश्याम या श्यामल गात हैं| जाहिर सी बात है की मेरा कथन गवाल बालों के कथन से एकदम मिलता है।


श्री कृष्ण की 16108 रानियों में से 8 पटरानियाँ जन्म से ही केवक और केवल श्री कृष्ण को अपना पति मान ली थीं और शेष 16100 को बाद में नारद ने श्री कृष्ण से संबध्ध कराया। द्वारिका बसने के बाद बलराम कि तो शादी हो गयी पर राधा और गोपियों के प्रकरण के कारन श्री कृष्ण कि शादी नहीं हो रही थी तो भगवान् श्री कृष्ण को उपाय सुझाने के लिए कहा तो नारद ने सबसे कृष्ण के पास सन्देश भेजवाया और इस प्रकार कृष्ण 16108 नारियों के स्वामी बन गए। ध्यान देने योग्य बार यह है कि रुक्मणि के पुत्र प्रद्दुम्न को भी लोग कहते हैं कि श्री कृष्ण के भौतिक सम्बन्ध के पुत्र नहीं है जबकी कृष्ण के कई हजार पुत्र हुए है जो प्रमाण है कि विज्ञान उस समय भी कितना आगे था और इस प्रकार उनको अखंड ब्रह्मचर्य होने कि पदवी दी जाती है और यही है उनका वास्तविक इंद्रिय नियंत्रण जो रास लीला के बाद भी ब्रह्मचर्य रहे। अतः आम आदमी को रास लीला वाला कृष्ण बनाने से पहले कृष्ण जैसा दिव्या शक्तिवाला और इन्द्रियजित होना चाहिए।


कोई कितना भी बड़ा द्रविण (मतलब पुरुषार्थी और धन तथा संसाधन सम्पन्न) क्यों न हो यदि चरित्रहीन हो गया तो आर्य कहाँ रह गया वरन वह तो चरित्रहीन हो कर मृतप्राय हो गया और इसे सिध्ध करने कि जरूरत नहीं है अपितु इसे भगवान् श्रीराम ने ही सिध्ध कर दिया है रावण का दमन करके। एक आर्य का चरित्रवान और प्रगतिशील सच्चाई को पोषक होना अनिवार्य गुण है। आप प्रगतिशील सच्चाई को "सत्यम शिवम् सुंदरम" भी कह सकते हैं।


इक्शाकू वंश/रघुवंश/शूर्यवंश/कश्यप गोत्रीय के अनुसार चरित्रहीनता के दल-दल में आत्महत्या करने से अच्छा है आतंकवाद के अस्त्र से मर जाना।


परिवार का व्यक्तिगत संस्कार, समाज की सभ्यता और रास्ट्र की संस्कृति अमूल्य है और दस-बीस क्या सौ वर्षों में भी केवल थोड़ा सा ही परिवर्तन होता है। और यह सनातन हिन्दुओं की शक्ति का संबल है जिसने हजारों आक्रान्ताओं को झेला है, सहृदय सामना किया है, आज भी अनंत आकाश की तरह लोगों को हर्षाने वाला है और पति पावनी गंगा की तरह पवित्र है।


क्या संस्कार, सभ्यता और संस्कृति का मूल्य का क्रय-विक्रय कोई सर्वोच्च विश्व शक्ति कर सकती है? हमारी हिन्दू संस्कृति ही है जो हिन्द शब्द आज भी भारत सँजोए रखे है और जय भारत से पहले जय हिन्द कहता है जबकी हिन्द की सरहद इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी तक होती है और इसमे जो रास्त्र बने उनमे से कोई आज जय हिन्द का उद्घोस नहीं करता है। यह है हम जो यह कहते हैं की हारा तो चला जाता है पर हरा मतलब जबरदस्ती छीना गया कभी भी नहीं जाता मतलब कभी भी वापस आ सकता है। तो मित्रों बोलो क्या हम इसके लिए तैयार है? अगर भौगोलिक तौर पर नहीं तो कम से कम अपनी संस्कृति को इस जय हिन्द (जम्बू द्वीप: इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी है: यह जम्बू द्वीप का सम्पूर्ण भाग ही अखंड हिन्द है) की सीमा के छोर तक पहुंचा दो।>>>परिवार व्यक्तिगत संस्कार, समाज की सभ्यता और रास्ट्र की संस्कृति अमूल्य है और दस-बीस क्या सौ वर्षों में भी केवल थोड़ा सा ही परिवर्तन होता है। और यह सनातन हिन्दुओं की शक्ति का संबल है जिसने हजारों आक्रान्ताओं को झेला है, सहृदय सामना किया है, आज भी अनंत आकाश की तरह लोगों को हर्षाने वाला है और पति पावनी गंगा की तरह पवित्र है।


Tuesday, October 22, 2013

सनातन हिन्दू धर्म और अन्य धर्म में केवल आधारभूत अंतर है और वह यह है की आप सनातन धर्म, गाय और गायत्री मंत्र में आस्था और विश्वास रखते हैं की नहीं? लेकिन यह बहुत शूक्ष्म अंतर नहीं है अपितु इसमे समर्पण, भक्ति, ज्ञान, व्रत और त्याग के साथ-साथ बलिदान और तप भी आवश्यकता निहित है। गायत्री मंत्र परम तेजस्वी ऊर्जा के परम श्रोत परमब्रह्म परमेश्वर से अपने जीवन और जीवन के लिए संघर्ष के लिए अपने अन्दर निहित शक्तियों के लिए आभार व्याक्त करना है और प्रार्थना करना है जो परमब्रह्म इस ब्रह्माण्ड के पुरुष और प्रकृति दोनों को बनाया भी है और चलाता भी है। उससे अपने जीवन के लिए शक्ति मांगना भी है। गाय के साथ किसका किश प्रकार का आचरण रहा है और गाय जी जीवन की शक्ति दाता है इसी पर आधारित हो सनातन काल से गोत्र की कल्पना है जो आज भी चल रही है और जिसमे गौतम गोत्र सर्वोच्च है आज के सन्दर्भ में भी। और पतित पावनी-सुचित-पवित्रता में गंगा का उदहारण सम्पूर्ण मनवा के चरित्र के बारे में आज भी दिया जाता है। अतः जहां हिन्द (जम्बू द्वीप=इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्या कुमारी तक की भूमि हिन्द है न की केवल वर्तमान भारत या अखंड भारत ही) शब्द आज भी जीवित है उसी देश में गाय, गंगा, गायत्री और सनातन संस्कृति में श्रध्धा और विश्वाश भारत वंशियों को गौरव प्रदान करता है न की केवल सनातन हिन्दू धर्म के पालकों को ही।


There is only basic difference between Eternal (Sanatan) Hindu Religion and other religion that whether you have faith in Eternal (Sanatan) Religion, Gaaya (Cow), Gangaa (Ganges) and Gayatriy Mantra? But this is not a too little difference.>>>>Gayatri Mantra is prayer of highest luminous and highest energy source Parambrahm GOD who created the universe and also govern this Universe. And let this great Parambrahm God give us some of his energy to survive of life in this world. Behavior with cow and cow itself is the fact of origin of Gotra System in Hindu culture which of base of life too in ancient days. Purest and holy Ganges is the example for all in purification of Character.


Friday, October 18, 2013

सूर्य या अग्नि को शाक्षी मानकर पाँच बार गायत्री मंत्र का गंगा जल या अन्य जल के साथ आचमन करते हुए पाठ करने से सनातन हिन्दू धर्म, गाय, गंगा और गायत्री में श्रध्धा रखने वाले किशी धर्म या जाती के व्यक्ति का हिन्दू धर्म में प्रवेश हो जाता है।


अब सायद यह भी लोग जान गए होंगे की कैसे बाल्मीकि आदि कवी {प्रयाग की पवन भूमि के टोन्स नदी का किनारा और बाल्मीकि का स्नान प्रसंग(बहेलिये का मैथुन करते हुए पक्षी पर तीर चलाना और उसके विरोध में बाल्मीकि की संस्कृत में प्रथम कविता )}और रामायण आदि महाकाव्य है। और यह भी की सीता, लव और कुश के गुरुदेव और आश्रय दाता स्वयं भारद्वाज के गुरु महर्षि बाल्मीकी ही थे।


बाल्मीकि कश्यप ऋषि के पुत्र वरुण के पुत्र थे यह जान लेने के बाद किशी को संसय नहीं होगा की बाल्मीकी स्वयं गर्ग ऋषि के गुरु भारद्वाज के गुरु थे। इसीलिये जहाँ तुलसी दास भक्ति भाव से रामचरितमानस की रचना किये हैं वही महर्षि बाल्मीकी समभात्री भाव से रामायण की रचना किये हैं। और अयोध्या की भरी सभा में स्वयं यही बाल्मीकि श्रीराम के सीता की एक और अग्नि परिक्षा के निर्णय का विरोध भी किये थे और उनके निर्णय को वापस लेने के विनय को स्वीकार न करने के परिणाम स्वरुप सीता पृथ्वी की गोंद में समाहित हो गईं।


Thursday, October 17, 2013

भागवत=भ+ग+व+त: भागवत वह है जिससे भक्ति, ज्ञान, व्रत और त्याग का आचरण उत्पन्न हो। और जो भागवत है वही वैष्णव है।


उपनाम बाल्मीकी लिखते हैं: पुरानों के अनुसार कश्यप उनकी पत्नी अदिति के नौवे पुत्र "वरुण" के पुत्र थे बाल्मीकी और भृगु ऋषि। वन में बहुत वर्षों तक इस्वर की तपस्या में लीं हो जाने से उनके शरीर पर दीमक लग गए थे और दीमक के घर को बाल्मीकी कहते हैं अतः उसी के नाम पर इनका नाम बाल्मीकी पड़ा। वनवासी लोग उनके सम्मान में अपना उपनाम बाल्मीकी लिखते हैं और उनको अपना आदर्श मानते हैं।


That is why each TRIDEV have 1/3 power of total power of Parambrahma. It means Brahma, Vishnu and Mahesh have equal importance. Brahm Gyan, Shiv Shakti and Vishnu Bhakti have no alternative.


आपूर्ति (भरण- पोषण) और शिक्षण-प्रशिक्षण बंद कर हो जाने पर सुरक्षा का काम अधिक दिनों तक जारी रहेगा क्या?


आपूर्ति (भरण- पोषण) और सुरक्षा बंद हो जाने पर कोई शिक्षण-प्रशिक्षण और अनुसंधान अधिक दिनों तक जारी रह पायेगा क्या?


शिक्षण-प्रशिक्षण और सुरक्षा बंद हो जाने पर कोई उद्दयम (आपूर्ति, भरण-पोषण,व्यवसाय और उद्योग) अधिक दिनों तक जारी रह सकता है क्या?


Tuesday, October 15, 2013

सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (संसार के सबसे बड़े पूज्य उअर पवित्र श्री राम जन्म लिए हों)/श्री रघुवीर परायनहि (कराघुवीर का सबसे प्रिय) जेहिं नर उपज विनीत। धन्य सो देश जंह सुरसरी (गंगा) बहई। धन्य सो नारी(पत्नी) पतिब्रत अनुसरहीं। धन्य सो भूप (राजा) निति(न्याय) जो करइ। धन्य सो द्विज(ब्राह्मण) निज धर्म न टरई(अपना धर्म किशी कीमत पर न छोड़े)।। सो धन धन्य प्रथम गति (समाज के परोपकार और उद्धार के कार्य में लगाया जाय) जाकी। धन्य पुन्यरत(उत्थान और प्रगति के कार्य में) मति (ज्ञान) सोई पाकी॥ धन्य जन्म द्विज भागती अभंगा (इस्वर में अटूट भक्ति और आस्था)। धन्य घरी (समय) सोई जब सतसंगा।


ब्राह्मणों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने पर ही परशुराम ने कश्यप ऋषि को सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन कश्यप ऋषि को दे दिया जिसे उन्होंने क्षत्रिय राजाओं से जीता था। अतः कश्यप पुत्रों: श्री राम और श्री कृष्ण का उत्तर दायित्व है की ब्राह्मणों की यथा संभव रक्षा करें। रावन जैसे ब्राह्मण की बात नहीं हो रही है जिनका विनाश ही उचित है। परशुराम को पुनः ब्राह्मणों की रक्षा के लिए समाज में न उतरना पड़े मतलब ब्राह्मण अपने सुरक्षा में स्वयं न लग जायं अपने उत्तर दायित्व को छोड़कर।


अगर सप्तर्षि पुत्र हम तो ब्रह्मा, महेश और विष्णु:त्रिदेव पुत्र हम और तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य क्यों नहीं हम? विश्व भ्रमण करने वाले बताएं की वैष्णव ब्राह्मण तथा अन्य हिन्दू भारत और विशेषकर उत्तर भारत में ही अधिक नहीं पाए जायेंगे तो और कहाँ अधिक पाए जायेंगे जलवायु और खान-पान को ध्यान में रखते हुए?


कम से कम कश्यप गोत्रीय के लिए गौतम और वशिस्ठ गोत्रीय क्रमशः श्रध्धेय और आदरनीय सनातन थे, हैं और इस श्रीसती के अंत तक और उसके बाद भी रहेंगे। साथ ही अन्य गोत्रीय सम-सम्माननीय बने रहेंगे।


जो कश्यप गोत्र भूले विछुड़े और किशी भी समाज , जाती या धर्म से बहिस्कृत को पुनः सनातन हिन्दू धर्म में शरण देता है वह भी सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय नियमों का सबसे कड़ाई से पालन करवाता है। सूर्य या अग्नि को शाक्षी मानकर पाँच बार गायत्री मंत्र का गंगा जल या अन्य जल के साथ आचमन करते हुए पाठ करने से सनातन हिन्दू धर्म, गाय, गंगा और गायत्री में श्रध्धा रखने वाले किशी धर्म या जाती के व्यक्ति का हिन्दू धर्म में प्रवेश हो जाता है।


Monday, October 14, 2013

SURYA ya AGNI ke shakshy me 5 bar GAYATRI mantra ka Ganga jal ya jal ke achaman ke sath paath Sanatan Hindu Dharm, Gaaya, Ganga aur Gayatri me shradhdha rakhane vale kishi jati aur dharm ke vyakti ko Hindu dharm me pravesh de deta hai.


RAVAN: IF CHARACTER IS GONE EVERY THING IS GONE. If health is gone something is gone. If wealth is gone nothing is gone.>>>Happy Dashahara to you friends.


If constitution breaks Hindu classical rule then using benifites of gaps in constitution this damage automatically repaired. Social welfare: Because constitution is for the people and by the people.


Brahmin, Kshatriya and Vaishya intra(best way) and inter marriage are classically defined. Other case only after when both accept to be Brahmin,Kshatriya and Vaishya socially and constitutionally.


Vishv ka bhraman=daura karane vale batayen ki Vaishnav Brahman aur anya Vaishnav Hindu Bharat visheskar Uttar Bharat me he adhik nahi to aur kahan adhik paye jayenge?


Saptarshi putra ham to Brahma, Mahesh, Vishnu:TRIDEV putra ham to Brahman,Kshatriy, Vaishya kyo nahi ham?


Brahmano ke suraksha ki jimmedari par Kashyap rishi ko sampurn prithvi ka shasan Parashuram diye the. Atah Kashyap putron:SHRI RAM aur SHRI KRISHN ki jimmedari hai Brahmano ki raksha karana. Ravan jaise brahman ki baat nahee ho rahi jinaka vinash hi uchit hai. Parashuram ko punah samaj me Brahmano ki raksha me n aanaa pade.


Before reaching Sun and Mars first decide the social and environmental fate of the Earth.


If our friendship affected glory of our friend in his society for long duration in future then we should quit our friendship and join for new and this is a best friendship. Not only help in need but forever sacrifice to each and every thing related with ones life is original signature of friendship.


Dhanya so desh Surasari(=GANGA) jah bahai| Dhanya so Nari(=Patni) Patibrat anusarahi| Dhanya so Bhoop(=RAJA) niti(nyay) jo karai|Dhany so Dwij(=Brahman) nij dharm n tarai(apana dharm n chhode)/So dhan dhanya prathm gati (pratham gati=samaj paropkar v uddhar ke kary) jakee/Dhanya punya rat (punya rat=utthan v pragati ke karya) mati(=gyan) soi pakee// Dhanya janm Dwij (Brahmin) Bhagati Abhanga(Isvar me atoot bhakti)\Dhanya ghari(samay) soi jab satsanga(sajjanon ki sangati)/All the previous posts are the statement of Lord Shiva with goddess Parwati.*******So kul dhanya Uma sunu jagat pujya supuneet(Sansar ke sabase pujya pavan Shri Ram janm liye hon)/Shri Raghuveer parayanahi(ka sabase priya) jehi nar upaj vineet/


Tuesday, October 8, 2013

श्री राम नवमी, विजय दशमी और श्रीकृष्ण जन्मास्टमी केवल हिन्दूओं के ही नहीं वरन सम्पूर्ण भारतीय जनमानस के शीर्ष पर्व हैं।


जब आदर्श आत्मघाती हो जाए तो "सत्यम शिवम् सुन्दरम" न अपना कर "सत्यमेव जयते" ही अपनाया जाता है जैसा की न्यायालय में न्याय का आदर्श और सेना में वीरता का आदर्श वाक्य "सत्यमेव जयते" ही होता है लेकिन सुधारने का मौक़ा दिए विना दंड नहीं दिया जाता मतलब साफ है सभ्य समाज "सत्यम शिवम् सुन्दरम" के आदर्श को अपनाते हुए सामाजिक सामजस्य के लिए समझौता कर लेता है पर सम्पूर्ण हकीकत तो "सत्यमेव जयते" के आदर्श को अपनाने से आती है| अतः मेरे विचार से आप का पक्ष "सत्यमेव जयते" वाले ही अपनाएंगे तो आप के विचारों का हम सम्मान करते है"सत्यम शिवम् सुन्दरम" के आदर्श वाला होते हुए|


अपने अस्तित्व को बिना मिटाए हुए दूसरों के अस्तित्व को स्वीकार करना और सम्मान करना सामर्थ्शाली-पुरुसार्थी व्यक्तित्व का प्रथम लक्षण है और यही अहिंसा का सबसे प्रमुख उपदेश है| यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युथानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् | परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च: दुष्कृताम, धर्मं संस्थापनार्थाय सम्भावामी युगे युगे || अपने अस्तित्व को बिना मिटाए हुए दूसरों के अस्तित्व को स्वीकार करना और सम्मान करना सामर्थ्शाली-पुरुसार्थी व्यक्तित्व का प्रथम लक्षण है और यही अहिंसा का सबसे प्रमुख उपदेश है| ---------हम सत्यम शिवम् सुन्दरम के भी पुजारी हैं अतः तिरंगे में चार रंग ( अशोक चक्र नीला और केंद्र बिंदु पर अति सीमित स्थान पर है सफेद रंग के साथ) होने के बावजूद हम उसे तिरंगा ही कहते हैं|


This is very benificial to understant role of Sanatan Hindu Dharm in Baudh Dharm apart from Gautam Gotriy Kshatriya Kuvar Siddharth Gautam : There is nothing non-religious in Dr. Bheem RAO RAMJI Ambedakar, and his family names according Hindu Religion. Also Ambedakar Nagar District as a ex-part of Faizabad (Ayodhya) indicates that Ambedakar=Hanuman has got his place in his Lord's home Town in 1995. Bheem=Brother of Pandava (indirect son of Pavandev), Rao, Ramji=Maryada Purushottam Bhagvaan Ram, and Ambvaadekar=Ambedakar=Hanuman according my view and also Ramaa=Lakshami, Sarada=Saraswati and Savitaa=Wife of Sun or Glory of Sun. How Baudhisth and Shikhas and Jainism denie his relation with Sanatan Hindu Dharam in presence of embodied Shri Ram and Shri Krishna with Hanuman in this Universe and also I remind the fact that the Islam is parallel to Shriramism and Christianity is parallel to Shrikrishnaims. This is glori of the Sanatan Hindu Dharma.


विश्व के हर संविधान में लिखा है जब किशी मामले का निवारण संबिधान में वर्णित नियम से न हो तो न्यायाधीश को अपने "विवेक" से काम लेना चाहिए तो मेरे जैसा विवेक यह कहता है कि तथाकथित विश्व शक्ति कोई भी हो पर असली विश्व शक्ति यह हिंद भूमि का "अखंड भारत" है क्योंकि यह विश्व मानवता का निर्यातक देश है श्रीस्ति के प्रारंभ से ही| -


आदि शक्ति दुर्गा अपने में ही पारवती, लक्ष्मी और सरस्वती की सम्मिलित शक्ति हैं। अतः इनकी उपासना से इन तीनों शीर्ष देवियों की उपासना पूर्ण हो जाती है। ॐ ऐं हीं क्ली चामुण्डाय विच्चे। ॐ ऐं हीं दुम दुर्गाय नमः।


अगर रावण की लंका श्री राम के भक्त विभीषण के हाँथ में जाने पर भी संस्कार, धार्मिक गहनता और दर्शन में प्रयाग(काशी), अयोध्या और मथुरा की समानता नहीं पा सका तो अहिरावन का पाताललोक (वर्तमान विश्व का तथा कथित सर्व शक्तिशाली रास्त्र) हनुमान के पुत्र मकरद्ध्वज के हाँथ में जाकर भी कैसे संस्कार, धार्मिक गहनता और दर्शन में प्रयाग(काशी), अयोध्या और मथुरा की समानता पा सकता है।*******जय हिन्द, जय भारत, जय श्री राम, जय श्री कृष्ण।


शिव के आराध्य विष्णु और विष्णु के आराध्य शिव हैं। अतः विष्णु अवतारी श्री राम और श्री कृष्ण भी शिव के आराध्य और स्वयं शिव श्री राम और श्री कृष्ण के आराध्य। पर ब्रह्मा केवल विष्णु को आराध्य मानते हैं न की शिव को भी और यह भी सत्य है की ब्रह्मा किशी के आराध्य नहीं हैं।क्यों की ब्रह्मा पूजा की चाहत नहीं रखने वाले हैं वरन सम्मान चाहिए उनको और यही उनका सम्मान है की की यह सृस्ती अपनी ही रची है जो चल रही है अनवरत रूप से।


अर्थात : देवता बोले- देवी को नमस्कार है, महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार है। प्रकृति एवं भद्रा को प्रणाम है। हमलोग नियमपूर्वक जगदम्बा को नमस्कार करते हैं। रौद्रा को नमस्कार है। नित्या, गौरी एवं धात्री को बारम्बार नमस्कार है। ज्योत्स्नामयी, चन्द्ररूपिणी एवं सुखस्वरूपा देवी को सतत प्रणाम है। शरणागतों का कल्याण करने वाली वृद्धि एवं सिद्धिरूपा देवी को हम बारम्बार नमस्कार करते हैं। नैर्ऋती (राक्षसों की लक्ष्मी), राजाओं की लक्ष्मी तथा शर्वाणी (शिवपत्‍‌नी) स्वरूपा आप जगदम्बा को बार-बार नमस्कार है। दुर्गा, दुर्गपारा (दुर्गम संकट से पर उतारने वाली), सारा (सबकी सारभूता), सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा और धूम्रादेवी को सर्वदा नमस्कार है। अत्यन्त सौम्य तथा अत्यन्त रौद्ररूपा देवी को हम नमस्कार करते हैं, उन्हें हमारा बारम्बार प्रणाम है। जगत् की आधारभूता कृति देवी को बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में विष्णुमाया के नाम से कही जाती है, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में बुद्धिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में निद्रारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में क्षुधारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में छायारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में तृष्णारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में क्षान्ति (क्षमा) रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में जातिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में लज्जारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में शान्तिरूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में श्रद्धारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में कान्तिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में लक्ष्मीरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में वृत्तिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में स्मृतिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में दयारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में तुष्टिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में मातारूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में भ्रान्तिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो जीवों के इन्द्रियवर्ग की अधिष्ठात्री देवी एवं सब प्राणियों में सदा व्याप्त रहने वाली हैं उन व्याप्ति देवी को बारम्बार नमस्कार है। जो देवी चैतन्यरूप से इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। पूर्वकाल में अपने अभीष्ट की प्राप्ति होने से देवताओं ने जिनकी स्तुति की तथा देवराज इन्द्र ने बहुत दिनों तक जिनका सेवन किया, वह कल्याण की साधनभूत ईश्वरी हमारा कल्याण और मङ्गल करे तथा सारी आपत्तियों का नाश कर डाले। उद्दण्ड दैत्यों से सताये हुए हम सभी देवता जिन परमेश्वरी को इस समय नमस्कार करते हैं तथा जो भक्ति से विनम्र पुरुषों द्वारा स्मरण की जाने पर तत्काल ही सम्पूर्ण विपत्तियों का नाश कर देती हैं, वे जगदम्बा हमार संकट दूर करें।


माता का महा मंत्र: नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:। नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम्॥1॥रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धा˜यै नमो नम:। ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नम:॥2॥कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नम:। नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नम:॥3॥दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै। ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नम:॥4॥अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नम:। नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नम:॥5॥या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥6॥या देवी सर्वभेतेषु चेतनेत्यभिधीयते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥7॥या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥8॥या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥9॥या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥10॥या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥11॥या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥12॥या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥13॥ या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥14॥या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥15॥या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥16॥या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥17॥यादेवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥18॥या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥19॥या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥20॥या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥21॥या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥22॥या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥23॥या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥24॥या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥25॥या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥26॥इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या। भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नम:॥ 27॥चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥28॥स्तुता सुरै: पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।करोतु सा न: शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापद:॥29॥या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै-रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति न: सर्वापदो भक्ति विनम्रमूर्तिभि:॥30॥


Aadi Shakti Durga=PARVATI+LAKSHMI+SARASWATI. Om ain heen Dum Durgay Namah=Om ain heen cli Chamunday vichche.


Shri Ram Navami-Vijay Dashmi-Shri Krishna Janmastami are top most Parv of India.


Friday, October 4, 2013

These are the few Important facts which we need to remember with our daily life in present global environment.


Indian Independence - A Twist in the Tale As history moves, a lot of insightfully delightful trivia of history gets buried under a simplified black and white version of the historical experience. The popularity of the simplified version is because it is uncomplicated and clearly distinguishes the ‘good’ from the ‘bad’ - and therefore, is very convenient for the MSM and the 0/1-binary thinkers. History, on the other hand, is primarily amoral, and has a tendency of punching holes in the contemporary zeitgeist... While we often say that India got its independence from the British on August 15, 1947, actually, the British never ever ruled the entire India as we know it now - at least not technically. There was one part which was the British India (Direct Rule), and there was the other part consisting of 562 Princely States, covering roughly 40% of the land-mass of what we now call India (Indirect Rule). About 100+ of these Princely States were quite large, e.g., Travancore, Hyderabad, Baroda, Mysore, Kashmir, etc., while many were small “jagirdaris”... While British India was governed by the British Parliament, there were separate political arrangements with the princes, and these came under something somebody called “Chancellor of Indian Princes”. In early 1947, when England decided to free India, the British Parliament passed the Indian Independence Act (in June 1947, which marked the foundation of two separate nations - India and Pakistan). However, this Act did not apply to the Princely States. The freedom to these states was given by a separate Cabinet Memorandum, which declared that the British Government will cease to have any political or defense arrangements (“Power of Paramountcy”) with the Princely States. The memorandum was clear that the Princely States were free to decide to either join India or Pakistan before August 1947 - or devise their own sovereign political system for self-governance. Most of the Princely States were small and decided to join either India or Pakistan before independence (in return for a promise that the government will maintain their Princely perquisites, which finally got abolished in 1970-71). There were, however, three exceptions: Hyderabad (which had a population of around 1.4cr, with a Muslim Nizam Fath Jang Nawab Mir Osman Ali Khan Asaf Jah VII and around 80% Hindu population). The Nizam of Hyderabad either wanted to remain sovereign (and become a part of the British Commonwealth), or join Pakistan (which would have made an interesting map of Pakistan;)... Anyway, the state was annexed by India. Kashmir (with a Hindu Maharaja and a Muslim majority in the population, and, to make thing more complicated, an adjoining border with Pakistan) There is confusion about whether the Maharaja of Kashmir, Hari Singh ever signed the letter of accession with India or not - he had not done that till India and Pakistan became independent in August 1947. Some records say that he wanted to be a part of India, but by then the situation had gone out of hand, and the Indian army landed to curb the infiltration... etc. etc... but that remains a murky, messy situation... Even till date! And then there was Junagadh which was a very interesting case: Colonel H.H. Shri Diwan Nawab Sir Muhammad Mahabat Khanji III Rasul Khanji the Nawab of Junagadh was a Muslim and Junagadh had a large Hindu population. Geographically, it was a peculiar piece of the jigsaw in what was to become the two nations of India and Pakistan. It was a state in erswhile Saurashtra, surrounded by the Hindu Kathiawad regions (which had acceded to India) on three sides, and facing the Arabian Sea on the fourth. The Nawab, however, decided to join Pakistan, which predictably did not go very well with the local populace, and they revolted. The neighbouring states also added to the pressure by imposing a blockade (‘chakka jam’) against any grains, vegetables, or material en route to Junagadh. As the revolt grew, the Nawab fled to Pakistan along with his family, taking almost all the state treasury with him and leaving his Deewan (Prime Minister) to manage the affairs. The Deewan of Junagadh did the best that he could have done to bring the situation to normalcy but it continued to worsen. The newly formed Pakistan was still dealing with its own issues and could therefore not extend help to a distant Junagadh... and finally the Deewan wrote to Jinnah stating that since Pakistan was not able to help Junagadh, and have the situation was worsening, he would be handing over Junagadh to the Indian Government - which he did around October 1947, through a letter to the Regional Commissioner of Saurashtra, Mr Buch. A few months later a plebiscite was held in which more than 190,000 voted to be a part of India, while only 91 favoured to be a part of Pakistan (Pakistan contested the results, and the Indian government upheld it... as one would have anticipated). But here is the somewhat poetic twist to the story: The Deewan of Junagadh was a person called Sir Shah Nawaz Bhutto. His son, Zulfikar Ali Bhutto, grew up to be the Prime Minister of Pakistan (was executed by Zia-hl-Haq in 1977)... and his granddaughter, Benazir Bhutto served as the Prime Minister of Pakistan twice in the late 80s and the 90s.


An estimated 14.5 million people crossed the border in the months immediately after partition. Hundreds of thousands were killed in resulting clashes. The ruler of the autonomous Jammu and Kashmir princely state had not decided which side to join by August 1947. Pakistan, still believes the state should have become part of Pakistan, because the majority of its population is Muslim. However, the Hindu Maharaja finally agreed to join India in October 1947. Some of the more prominent freedom movements were: The Mutiny of 1857 This mutiny was the turning point of the freedom movement though it was suppressed by the British. It was the first organized freedom struggle on such a large scale and paved the way for further struggles for freedom. The Civil Disobedience Movement of 1929 It was decided to celebrate Indian Independence Day on the 26th of January. On this day the freedom fighters, spearheaded by Mahatma Gandhi, hoisted India’s National Flag. It was decided to completely disregard the orders of the British Government. The Dandi March of 1930 Gandhi led a 241-kilometer march to Dandi at the age of 61 and proceeded to make salt in defiance of the law by non-violent means. The British had to arrest millions to enforce the law, causing panic in the administration. This march, in fact, was the first strategy of the Civil Disobedience Movement. The Quit India Movement of 1942 The year 1942 is now identified more with the movie 1942: A Love Story, than it is with the Quit India Movement! This movement called for a widespread, non-violent struggle for India’s freedom. Before long there were revolts all over the country, demanding that the British ‘quit India’. Do you know: National Anthem - Jana Gana Mana National Animal - The Tiger National Bird - The Peacock National Flower - The Lotus


Dr. Annie Besant, a Britisher who supported India’s freedom struggle wholeheartedly and founded the Home Rule league in India. Ashfaqualla Khan, a revolutionary who was given the death sentence and kissed the noose before it went around his neck. In early 1947 British Prime Minster Clement Atlee announced that Britain would leave India no later than June 1948. The decision came after years of dissatisfaction and non-violent resistance, termed ‘satyagraha’ by Mahatma Gandhi. Newly appointed viceroy, Lord Louis Mountbatten, oversaw the birth of the modern states of India and Pakistan. They came into being at midnight on August 15 1947, as astrologers could not decide on an auspicious date. Mountbatten attended one transfer of power ceremony in Karachi on the morning of the 14th, and another at 11 pm in Delhi. Pakistan’s Independence Day is August 14, India’s is August 15. The border was drawn by a London lawyer Sir Cyril Radcliffe. Appointed head of the Boundary Commission on June 3 1947, he submitted his partition map on August 13. The Radcliffe Award split Pakistan into two separate areas, East Pakistan (today’s Bangladesh,) and West Pakistan, with India in between. Millions found themselves on the ‘wrong side’ of the border after August 1947’s Indian Independence Act.


Rani Laxmi Bai, the Queen of Jhansi, led her people into a battle against the British in which she fought like a tiger, and was killed heroically. Mahatma Gandhi, the father of the nation, led the country to freedom with his non-violent ideals. He remains a symbol of peace to this day. Sardar Vallabhai Patel was responsible for uniting the princely states into one country.----- Bal Gangadhar Tilak is remembered for his court statement in which he proclaimed ‘Swaraj is my birthright, and I will have it!’ . Bhagat Singh who threw a bomb when the Legislature was in session, and was arrested and hung. Maulana Abul Kalam Azad who was elected President of the Congress when he was just 35.


India woke up to freedom on this day, way back in 1947, after a struggle which spanned centuries. The British handed the rule of the country to the Indian leaders at the stroke of midnight. India’s Independence is celebrated on this day by hoisting the tri-coloured flag in the state capitals, and holding cultural programmes. Though schools and colleges may not have a holiday on this day, no academic work is done. Students and teachers gather for a flag hoisting ceremony and they sing the National Anthem. The rest of the country, however, usually enjoys a holiday on this day. It is a time when we must sit back and remember the freedom strugglers, without whom we may never have got our freedom.


The Indian National Flag: The Glorious history of the Indian Flag goes back to the year 1906, when it kissed the pious and sacred soil of India. The message was in the air and it was loud and clear for the British ‘the souls of millions have finally risen up from their profound slumber and it is now the British Government’s turn to sleep on their plan of ruling India any further’. The oldest and the first version of the NationalFlag was christened the ‘Saptarishi Flag’ and was hoisted in Stuttgart at the International Socialist Congress. The year 1921 witnessed the emergence of the next National Flag which was later redesigned after the suggestion of Mahatma Gandhi and had a new look to flaunt. It now contained a white strip and the ‘charkha’. Unfortunately it graced the Indian freedom struggle with its presence for a very short duration of time as it was not considered pertinent enough by the All India Congress Committee session in 1931. The story didn’t end at this point as, on August 6, 1931, the Indian National Congress formally gave it’s nod of approval and the Flag came into existence which was first hoisted on August 31st. However, it was compelled to step down and was taken over by it’s younger sibling which happens to be our current National Flag. So, after a great deal of transformation, the final National Flag breathed it’s first on July 22, 1947 on the cradle of India and mouthed it’s first words of freedom on 15th August. The man who showed the world the colorful power of three was Lt .Shri Pingali Venkayya. He painted India with the vibrant colors of saffron, white and dark green on the canvas of courage, sacrifice, patriotism, and renunciation.


The Wonderful Qualities of Twenty Four Spokes in Ashok Chakra: 1. Love, 2. Courage, 3. Patience, 4. Peacefulness, 5. Magnanimity, 6. Goodness, 7. Faithfulness, 8. Gentleness, 9. Selflessness, 10. Self-Control, 11. Self Sacrifice, 12. Truthfulness, 13. Righteousness, 14. Justice, 15. Mercy, 16. Gracefulness, 17. Humility, 18. Empathy 19. Sympathy, 20.Spiritual, Knowledge, 21. Moral, Values, 22. Spiritual Wisdom, 23. The Fear of God 24. Faith or Belief or Hope


The Ashoka Chakra: The ‘Ashoka Chakra’ literarily means the ‘wheel of the law’. It is derived from the Sanskrit word ‘Dharma Chakra’, which means wheel and has 24 spokes. The most prominent Indian Mauryan emperor, Ashoka the Great, built the ‘Ashoka Chakra’ during the 3rd century B.C. The ‘Ashoka Chakra’ is inscribed widely among the Lion Capital of Sarnath and the Ashoka Pillar. The ‘Ashoka Chakra’ is placed in the center of the National Flag of the Republic of India. It was adopted on 22nd July, 1947. It is rendered in a navy blue colour on a white background. In order to add historical ‘depth’ and separate the National Flag from that of the Indian National Congress (INC) the Gandhian spinning wheel is replaced with the spokes of the ‘Ashoka Chakra’ in the center of the flag.-----The ‘Ashoka Chakra’ can also be seen on the base of the Lion Capital of Ashoka which has been adopted as the National Emblem of India. The ‘Chakra’ signifies that there is life in ‘Movement’ and death in stagnation. The wheel represents the cycle or the self repeating process with the changing of time in life. The horse on the Right hand symbolises accuracy and speed. The Bull on the Left hand stands for hard work.


Who designed the Indian flag? Who designed the Indian flag? The Indian national flag was designed in 1916 by Pingali Venkayya from Machilipatnam. The tricolour flag designed by him, with a charkha in the centre was adopted by the Congress committee in 1931 at Karachi. On July 22, 1947, during an ad hoc meeting of the Constituent Assembly, it was approved as the National Flag of India with suitable modifications, wherein the Ashok Chakra was adopted in place of the charkha.---******* The oldest and the first version of the National Flag was christened the ‘Saptarishi Flag’ and was hoisted in Stuttgart at the International Socialist Congress.******According to Hindu religion, the Puranas mention that only 24 Rishis wielded the whole power of the Gayatri Mantra. These 24 rishi in Himalaya are represented through the 24 letters of Gayatri Mantra and originated from Saptarshi. The all the 24 spokes of Dharmachakra are representation of all these 24 rishis of Himalayas in which Vishvamitra is first and Yajnavalkya is last who governs the religion(Dharma). Also Ashok Chakra is known as Samta Moolak Chakra and Samay Chakra in which all the 24 spokes represented 24 hours of the day and symbol of the movement of the time.-*****The Color Check in TIRANGA: The Flag’s saffron color symbolizes courage and sacrifice=(Duty of Shiva), green stands for faith and fecundity(intellectual productivity of a creative imagination)=(Duty of Vishnu), the white in the center depicts the inscribed mélange of unity, truth and peace=(Duty of Brahma). Lastly, blue represents the color of the sky and the ocean =(SAMARASTA).----The Flag struts its stuff with the historical gem called the ‘Ashoka Chakra’ (or ‘Wheel of Law’). The ‘Chakra’ connotes the incessant growth of the nation and the virtue of justice in life. It is also seen on the Sarnath Lion Capital of Ashoka


The oldest and the first version of the National Flag was christened the ‘Saptarishi Flag’ and was hoisted in Stuttgart at the International Socialist Congress.


Raghupati Raghav Rajaram, Pateet Pawan Seetaram/ Isvar Allah Tero Nam, Sabako Sanmati De Bhagvaan//... Galat Raasta Aasaan hotaa hai suru me par sahee Rasta hameshaa kathin hotaa hai lekin ant sahee Raste ka hee hameshaa bhala hotaa hai. Isvar Allah tero nam does not say that you do not follow your religion or caste or community.


Vaishnav Jan to Tene Kahiye Yeer Parayee Jaane Re: Defination of Vaishnav: Man, Karm, Vaani, Roop, Rang, Aahaar aur Vihar se Ahinshak.


Indus valley's:Sapt Sandhav:Sapt Sindhu:Seven River:Sindh#Panch Nad: Panjab:Five River region's central point is Kashmir where the great Manu(Rishi Kashyap) and Shradhdha(his wife Aditi) originated humanity under direction of Tridev:Brahma+Vishnu+Mahesh.--Panjaab:Panch Nad:Panch Aab: Jhelum, Chinav, Ravi, Vyas and Sataluj Rivers; and Sindh:Sapt Nad:Sapt Shaindhav: Jhelum, Chinav, Ravi, Vyas, Sataluj, Kabul and Sindh (Indus) Rivers (Saraswati River also term here too in addition with the Saraswati at Prayag (Allahabad)).---Rig veda describes Saraswati River as one of seven major rivers of Vedic times, the others being, Shatadru (Sutlej), Vipasa (Beas), Askini (Chenab), Parsoni or Airavati (Ravi), Vitasta (Jhelum) and Sindhu (Indus)| Saraswati~Kabul River.-- Most of these rivers origin is/was Himalaya(Kashmir's origin itself is Himalaya).


In actual Hind(KASHMIR TO KANYAKUMARI AND IRAN TO SINGAPUR) means the region under influence of Indus Valley or under influence of Arya Culture. But it is only Great India which pray this great land first before pray his country. Jai Hind, Jai Bharat, Jai Shri Ram, Jai Shri Krishna.


HE RAM! KYA YAHI SWAMI VIVEKANAND AUR MOHANDAS KARAMCHAND GANDHI KE SAPANO KA BHARAT HAI? Kya isee liye Azad Hind Fauz bani aur kya isee liye Chandra Shekhar, Bhagat Singh jaise log saheed huye?


Saturday, September 28, 2013

हनुमान (अम्बवादेकर=अम्बेडकर) ने अहिरावन को मरकर पातालपुरी जो वर्तमान सर्वोच्च विश्व शक्ति है का शासन अपने पुत्र मकरध्वज को दे दिया था जो अहिरावन को मरने की युक्ति हनुमान को बताया था मायावी दीपक हनुमान द्वारा बुझाने पर। और इस प्रकार रामायण युध्ध के समय कैम्प से सोते हुए श्रीराम और लक्षमण को अहिरावन द्वारा चुरा लेने पर हनुमान ने अहिरावन को मार श्रीराम और लक्षमण को मुक्ति से छुडाया। हनुमान अपने गुरु सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला से सांकेतिक शादी की थी शूर्यदेव को गुरु दक्षिणा स्वरुप और विशेष निवेदन पर।


भगवान् शिव माता पार्वती से: "धन्य सो देश जह सुरसरि बहई । धन्य नारी पतिव्रत अनुसरहीं|| धन्य सो भूप निति जो करई । धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)॥ सो धन धन्य प्रथम गति जाकी (वह धन धन्य है जो समाज के उपकार में लगाया जाय )। धन्य पुण्य रत मति सोई पाकी (वह बुद्धि धन्य है जो पुन्य के कार्य सामाजिक नवनिर्माण में लगाई जाय) ॥धन्य घरी सोई जब सतसंगा (वह समय धन्य है जो सत्संग करने में प्रयुक्त हुआ हो) । धन्य जन्म द्विज भगती अभंगा (जिस ब्राह्मण की भगति अटूट हो भगवान् राम के प्रति उसका जन्म धन्य है) ॥ सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (हे उमा-पार्वती वह कुल धन्य है जिसमे पूरे जगत के पूज्य और पवित्रता में भी सर्वश्रेष्ठ (सु-पुनीत) का जन्म हो इसका मतलब श्री राम का रघुकुल= इक्शाकुवंश= शूर्यवंश धन्य है)। श्रीरघुवीर परायण जेहिं नर उपज विनीत (विनय युक्त =विनम्रता और शिस्टाचारयुक्त व्यक्ति (RESPECTFUL= COURTEOUS =Gentleman =सज्जन पुरुष)=और ऐसे रघुवीर का परायण मतलब रघुवीर में अभीस्त श्रध्धा वाला वही हो सकता है जी जिसके अन्दर विनीत (विनम्रता-विनययुक्त) की उपज हो )


शंकर सुमन केशरी नंदन तेज प्रताप महा जग वंदन- महावीर बिनावऊ हनुमाना, राम जाशु जस आप बखाना: हनुमान केशरी जैसे ब्राह्मण राजा के पुत्र और शंकर के अंश (शंकर के समान रूप और मन वाले) तथा विष्णु (श्रीराम और श्रीकृष्ण) के अनन्य भक्त मतलब पूर्ण वैष्णव हैं। यह है मारुतिनंदन पवन पुत्र हनुमान(अम्बवादेकर=अम्बेडकर) की विशेषता जो उनको त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की शक्ति से परिपूर्ण करता है। और यही पवन पुत्र ही अहिरावन के सभी मायावी दीपक जो विपरीत क्रम में रखे गए थे को एक साथ बुझा कर मकरध्वज को अहिरावन के नाश का संकेत दे सकते थे और केवल यही राज की बात एक कारन था की भगवान् श्रीराम और लक्षमण रावण के भाई अहिरावन (जो विश्व का सबसे बड़ा माफिया और समुद्री डकैत था) से हिन्साब चुकता कर वापस न आ सकते थे युध्ध कैम्प में उसी एक युध्ध की रात्रि में।


Patalpuri of Makardhwaj/AHIRAVAN is the so called super power country of present world.


29 September 1995 में ही हनुमान=अम्बवादेकर=अम्बेडकर स्वयं श्रीराम (अयोध्या-फैजाबाद) के भाई और समान हिस्सेदारी के पड़ोसी हो गए थे अम्बेडकरनगर जिले के निर्माण के साथ तो असमानता कहाँ रह गयी।


जहां वशुदेव के कुलगुरु गर्ग थे वही नन्द के कुलगुरु शांडिल्य और आप लोगों के लिए बता दूं की गर्ग भारद्वाज की शिष्य परम्परा के पुत्र थे और शांडिल्य का जन्म कश्मीर में कश्यप और वाशिस्थ के सम्मिलित संयोग से हुआ था।


Wednesday, September 25, 2013

कोई माने न माने भगवान् श्रीराम और भीम में एक समानता थी और वह यह थी की अपने वादे के लिए अपना नियम ही तोड़ देना: राम का सुग्रीव को दिया वादा और भीम का द्रौपदी(पांचाली) को दिया वादा। पर भगवान् राम ने सुग्रीव को उनका हक़ दिलाने के लिए केवल पेड़ की ओट ली राजा बाली को मारने के लिए (शूर्यवंशीय राजा बाली और उनके भाई सुग्रीव को जो वरदान था उसको साकार करने के लिए:भगवान् राम स्वयं शूर्यवंशीय थे यह विश्वविदित था और है भी) तो वही भीम ने सबके सम्मुख गदा युद्ध के नियमों का उल्लंघन कर दुर्योधन के जंघे में प्रहार करते हुए उसको परास्त किया। टिप्पणी: भीम को अपने गदा युध्ध के गुरु बलराम जो दुर्योधन के पुत्र लक्षमण के ससुर भी थे के क्रोध का सामना करना पडा और बलराम भीम द्वारा इस प्रकार अनौतिक ढंग से दुर्योधन को मारने पर भीम को मृत्युदंड देने जा रहे थे तब श्रीकृष्ण ने उनको किशी तरह से रोका था। लेकिन भगवान् राम स्वनियंत्रित स्वभाव के थे उनको कौन दंड दे सकता था अतः वह कृष्णावतार में ज़रा नामक बहेलिये का रूप राजा बाली को दे स्वयं को मृत्युदंड दिए।


Philosophy of justice given by Saptarshi Gautam. गौतम गोत्रीय ब्राह्मण/हिन्दू आत्म ह्त्या को मजबूर हों और आप गौतम गोत्रीय क्षत्रिय, सिध्धार्थ गौतम और इसामशीह की पूजा में व्यस्त हों सामाजिक समरसता के लिए यह कौन सा पाठ है? मौलिक समानता (जो मानव मात्र के लिए अति आवश्यक है वह समानता) ध्येय होना चाहिए न की हर तरह की समानता के लिए किशी को गलत रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर समता लाई जाय। यह समानता क्षणिक होगी क्योंकि किशी व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा अपना प्रभाव अवस्य दिखलायेगी कुछ समय उपरांत और उसकी नकारात्मक ऊर्जा ही केवल आप का साथ देगी अगर उसको गिराकर आप उसपे नियंत्रण करना चाहेंगे उस स्थिति में भी। The person who was Anti-Brahmin and even having middle class life status are himself acting as Brahmins (That action of Brahmins which was once on their Target). SAPTARSHI WERE FIRST BRAHMARSHI INDICATES FIRST WE ALL WERE SON of Brahmins then others. Imagine! how sanatan Sanskriti, from which all cultures originated, is still alive? What is role of these Brahmins in it?


स्वयं भगवान् श्रीराम द्वारा यह कथन "शिव द्रोही मोहि दास कहावा। सो नर मोहि सपनेहु नहीं पावा।"-----गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित श्रीराम चरित मानस में कहा गया है। मतलब श्रीराम को पाने के लिए प्रथमतः आप में शिव भक्तिभाव जरूरी है जो स्वयं प्रेम और करुना के सागर है।


इस प्रकार एक युग का अंत हो गया और दूसरे युग का आरम्भ हुआ हम लोगों के जीवन का आज। भगवान् श्रीराम का वन्वास चौदह साल का था यह मेरा वन्वास बारह साल का ही था।

इस प्रकार एक युग का अंत हो गया और दूसरे युग का आरम्भ हुआ हम लोगों के जीवन का आज। भगवान् श्रीराम का वन्वास चौदह साल का था यह मेरा वन्वास बारह साल का ही था।

दूसरा गीत था: "बिन फेरे हम तेरे" (जो मुझे जानने वाले हैं वे मेरा साक्षात्कार इस गीत से करने की कोशिस करेंगे जो मेरे साथ न्याय है क्या?)। मै जन्म ग्रह नक्षत्र और मंगलवार को जन्म लेने के कारन गिरिधारी (कृष्ण और हनुमान) जरूर हूँ पर मेरा साक्षात्कार और आदर्श श्रीराम हैं। फिल्म : बिन फेरे हम तेरे (१९७९) गीत : इन्दीवर संगीत : उषा खन्ना स्वर : किशोरकुमार -------------------------------------------------------------------------------------- तीसरा गीत था "मै निकला गद लेके, लाहौर आया एक् दिल छोड़ आया"| ----------------------------------------------------------------------------------------------- सजी नहीं बारात तो क्या आई ना मिलन की रात तो क्या ब्याह किया तेरी यादों से गठबंधन तेरे वादों से बिन फेरे हम तेरे (३) तन के रिश्ते टूट भी जाये टूटे ना मन के बन्धन जिसने दिया मुझको अपनापन उसीका है ये जीवन बांध लिया मन का बंधन जीवन है तुझ पर अर्पण सजी नहीं बारात तो क्या... तूने अपना माँ लिया है हम थे कहाँ इस काबिल जो एहसान किया जान देकर उसको चुकाना मुश्किल देह बनी ना दुल्हन तो क्या पहने नहीं कँगन तो क्या सजी नहीं बारात तो क्या ... जिसका हमें अधिकार नहीं था उसका भी बलिदान दिया भले बुरे को हम क्या जाने जो भी किया तेरे लिये किया लाख रहें हम शरमिंदा मगर रहे ममता ज़िन्दा सजी नहीं बारात तो क्या ... आँच ना आये नाम पे तेरे खाक भले ये जीवन हो अपने जहान में आग लगा दें तेरा जहान जो रौशन हो तेरे लिये दिल तोड़ लें हम दिल तो क्या जग छोड़ दें हम सजी नहीं बारात तो क्या ...

दूसरा गीत था: "बिन फेरे हम तेरे" (जो मुझे जानने वाले हैं वे मेरा साक्षात्कार इस गीत से करने की कोशिस करेंगे जो मेरे साथ न्याय है क्या?)। मै जन्म ग्रह नक्षत्र और मंगलवार को जन्म लेने के कारन गिरिधारी (कृष्ण और हनुमान) जरूर हूँ पर मेरा साक्षात्कार और आदर्श श्रीराम हैं।   फिल्म : बिन फेरे हम तेरे (१९७९) गीत : इन्दीवर  संगीत : उषा खन्ना  स्वर : किशोरकुमार  -------------------------------------------------------------------------------------- तीसरा गीत था "मै निकला गद लेके, लाहौर आया एक् दिल छोड़ आया"| ----------------------------------------------------------------------------------------------- सजी नहीं बारात तो क्या आई ना मिलन की रात तो क्या| ब्याह किया तेरी यादों से गठबंधन तेरे वादों से|| बिन फेरे हम तेरे (३)  तन के रिश्ते टूट भी जाये टूटे ना मन के बन्धन| जिसने दिया मुझको अपनापन उसीका है ये जीवन|| बांध लिया मन का बंधन जीवन है तुझ पर अर्पण| सजी नहीं बारात तो क्या...  ||तूने अपना माँ लिया है हम थे कहाँ इस काबिल| जो एहसान किया जान देकर उसको चुकाना मुश्किल|| देह बनी ना दुल्हन तो क्या पहने नहीं कँगन तो |क्या सजी नहीं बारात तो क्या ...  ||जिसका हमें अधिकार नहीं था उसका भी बलिदान दिया| भले बुरे को हम क्या जाने जो भी किया तेरे लिये किया|| लाख रहें हम शरमिंदा मगर रहे ममता ज़िन्दा| सजी नहीं बारात तो क्या ...  ||आँच ना आये नाम पे तेरे खाक भले ये जीवन |हो अपने जहान में आग लगा दें तेरा जहान जो रौशन हो||  तेरे लिये दिल तोड़ लें हम दिल तो क्या जग छोड़ दें हम| सजी नहीं बारात तो क्या ...||

1st गीत:सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है, ये बुझते दिए को न तुम याद करना। "गगनचढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥---गोस्वामी तुलसी दास"-------------चन्दन जैसा स्वभाव है तब तो सर्प का बिष भी असर नहीं करेगा और आप अपने सीतल स्वभाव से दूसरों को भी सीतलता प्रदान करते हुए भी अपनी स्वाभाविव गुण का त्याग नहीं करेंगे। पर यदि रज(मिटटी का सूक्ष्म कण) स्वभाव है आपका तो किससे आप मिलते हैं उसका गुण आप पर प्रभावी होगा जैसा की रज पानी का साथ करता है तो नीच कीचड बनता है और हवा का साथ करता है तो आसमान की उंचाइयां छूता है।--------- केदारेश्वर बनर्जी केंद्र , अल्लाहाबाद विश्वविद्यालय में अक्सर कम्प्यूटर से हमें अनायास ही तीन गीत आज से बारह साल पहले मेरे एक अनुज सुनाने लगते थी उनके पास बैठते ही: (तीन में से एक निम्न लिखित गीत प्रस्तुत है अन्य दो कुछ दिन बाद प्रस्तुत करूंगा) गीत: सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है-----Movie - Ek Bar Muskuraa Do---- Singer - Kishore Kumar

"गगनचढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥---गोस्वामी तुलसी दास"-------------चन्दन जैसा स्वभाव है तब तो सर्प का बिष भी असर नहीं करेगा और आप अपने सीतल स्वभाव से दूसरों को भी सीतलता प्रदान करते हुए भी अपनी स्वाभाविव गुण का त्याग नहीं करेंगे। पर यदि रज(मिटटी का सूक्ष्म कण) स्वभाव है आपका तो किससे आप मिलते हैं उसका गुण आप पर प्रभावी होगा जैसा की रज पानी का साथ करता है तो नीच कीचड बनता है और हवा का साथ करता है तो आसमान की उंचाइयां छूता है।---------
केदारेश्वर बनर्जी केंद्र , अल्लाहाबाद विश्वविद्यालय में अक्सर कम्प्यूटर से हमें अनायास ही तीन गीत आज से बारह साल पहले मेरे एक अनुज सुनाने लगते थी उनके पास बैठते ही: (तीन में से एक निम्न लिखित गीत प्रस्तुत है अन्य दो कुछ दिन बाद प्रस्तुत करूंगा)
गीत: सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है
Movie - Ek Bar Muskuraa Do
Singer - Kishore Kumar

सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है, ये बुझते दिए को न तुम याद करना।
हुए एक बीती हुई बात हम तो, कोई आंशू हम पर न बर्बाद करना॥

तुम्हारे लिए हम, तुम्हारे दिए हम, लगन की अगन में अभी तक जले हैं।
हमारी कमी तुको महसूस क्यों हो, तुम्हारी सुबह हम तुम्हें दे चले हैं।।
जो हर दम तुम्हारी ख़ुशी चाहते हैं, उदाश होक उनको न नाशाद करना।
सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है, ये बुझते दिए को न तुम याद करना।।

सभी वक्त के आगे झुकाते रहे हैं, किशी के लिए वक्त रुकता नहीं है।
चिराग अपनी धरती का बुझता है जब भी, सितारे तो अम्बर के होते नहीं हैं॥
कोई नाव तूफान में डूबे तो क्या है, किनारे तो सागर के होते नहीं हैं।
हैं हम डोलती नाव डूबे तो क्या है, किनारे हो तुम, तुम न फरियाद करना॥
सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है, ये बुझते दिए को न तुम याद करना।।

चमन से जो एक फूल बिछड़ा तो क्या है, नए गुल से गुलसन को आबाद करना।
सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है, ये बुझते दिए को न तुम याद करना।।

Dear friends! Within three month of my residence in Indian Institute of Science Bangalore, out of 24 month, one of person meet me and told the task for which you used is completed with your first D. Phil Degree from Kedareswar(K.) Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies, University of Allahabad, Allahabad, now you can go any of the top most country of the world for PDF or becoming permanent resident for such I will manage for VISA within no time. As you have passport at the present time thus leave the country with me. ----------I rejected his proposal and said thanks. Reality is that I, myself not want to go any where out side India even after my death too. Note: Total personality of a person: Potential energy (Family values+Social values+ Civilazation+Cultural values+National values+International values) + Kinetic energy (health+Wealth+Education)


राम ने केवल अपनी कार्यकुशलता, नैतिकबल और पुरुषार्थ से ही रावण पर विजय पायी थी यही सत्य नहीं वरन सीता के चरित्र ने राम को रावन पर विजय दिलाई थी अन्यथा सीता का स्वयं नैतिक पतन हो गया होता तो रावन पर विजय का प्रश्न ही कहाँ रह जाता। अतः सीता और श्रीराम का श्रेष्ठ चरित्र न केवल सामान्य जन मानस अपितु सप्तर्षियों के लिए भी आदर्श बन गया।


Monday, September 23, 2013

"Terror is better than Characterlessness". In connection with the comment from one of my Junior on it, I have following justification: अगर टिप्पणी हुई है चरित्र हीनता पर मेरे द्वारा तो वह शारीरिक, व्यक्तिगत, सामूहिक, संस्थागत, रास्ट्रीय और वैश्विक समाज में मानवमूल्यों के ह्रास रूपी चरित्र हीनता से है जिसका कि मुकाबला ही नहीं किया जा सकता है प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर दृण शक्ति के बल पर भी और यह दीर्घकालिक समय में किशी तरह नियंत्रण में आता है पर वही आतंक का मुकाबला दृण शक्ति के बल पर किया जा सकता है प्रत्यक्ष तौर पर ही।--------मै किशी भी तरह आतंकवाद को बढ़ावा नहीं दे रहा पर चरित्रहीनता की स्थिति पर आतंकवाद से ज्यादा ध्यान देने पर लोगों का ध्यान आक्रिस्ट कर रहा हूँ और उसे आतंकवाद से बड़ा सामाजिक क्षतिकारक मान रहा हूँ।

Characterlessness is sweet poison for a person and society

शूर्यवंश और चन्द्रवंश के बीच यदि सम्बन्ध को जाना जाता ठीक से तो इनमे मतभेद फैला राक्षस प्रवृत्ति के लोगों को शरण न दी जा सकती थी और वह यह है की आदित्य(शूर्य) और चन्द्र दोनों अदिति और कश्यप ऋषि के ही संतान थे जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण शूर्यवंश में कश्यप ऋषि(दसरथ) और अदिति(कौसल्या) तथा गुरु ऋषि वशिस्थ; और चन्द्रवंश में कश्यप ऋषि(वसुदेव) और अदिति(देवकी) तथा हस्तिनापुर चन्द्रवंशीय राजा दुष्यंत के समय के गुरु ऋषि कंव(कश्यप ऋषि के वंसज) और कुरुवंश(कौरव-पांडव), हस्तिनापुर जैसे चन्द्रवंशीय राजा के समय के गुरु व्याश/परासर ऋषि (उसी गुरु ऋषि वशिस्ठ के वंसज)। स्वयं मनु और श्रध्धा कोई और नहीं वरन कश्यप ऋषि और उनकी पत्नी अदिति ही थे जिनको मेरे बचपन से ही गालियों से नवाजा जा रहा था| ये लोगों की अज्ञानता भरी बातें उसके सम्बन्ध में मई कश्यप गोत्रीय हुए सुनता रहा था जो ब्रह्मा के वरदान श्रिति के संचालन में सभी ऋषियों में सर्व प्रथम मानव जन्म देने के लिए शरीर धारण किये थे(हिमालय और उसके निकट के पर्वतीय और मैदानी भागों में) और इसके वाद ही सभी ऋषि मानव जन्म देने को आगे बढे और गोत्र परम्परा की सुरु आत हुई। हिमालय और उसके निकट के पर्वतीय और मैदानी भागों मानव सभ्यता की सुरुआत हुई परन्तु जो ऋषि इसे जन्म दिए उनका प्राकट्य (पृथ्वी से सबसे प्राचीन यज्ञ प्रक्रिस्था यज्ञ से सप्तर्षि प्रकट हुए थे) प्रयाग(काशी) में हुई| अतः प्रयाग(काशी) प्रथम स्थान पर और हिमालय के निकट के क्षेत्र, पंजाब(सिंध) दूसरे स्थान पर आते हैं।


Saturday, September 21, 2013

सीतामढी वह पुण्यभुमि है जहा पर अखिल ब्रम्हान्ड नायिका जगत जननी मा सीता जी लोकापवाद से व्यथित हो अपने सतीत्व की प्रामाणिकता को सिद्ध करने हेतु मा वसुन्धरा के गोद मे समहित हो गयी थी ? चिरकाल से अपनी स्म्रीतियो को संजोये सीतामढी मे संत गोस्वामी तुलसीदास जी अपने काशी प्रयाग की यात्रा के दौरान सम्वत १६२८ मे यहा आये ? यहा गंगा के तट पर व्रित्ती ध्यान परायण होकर समाधिस्ठ हो गये ? यहा उन्होने महर्षि वाल्मिकी मा जानकी तथा लव कुश से सम्बन्धित सम्पुर्ण चरित्र को देखा ? गोस्वामी जी सीतामढी स्थान पर तीन दिन रुके थे जिसका उल्लेख सन्त वेणी माधव जी ने गोसाई चरित्रावली मे किया है? गोस्वामी जी अपनी असम्प्रग्यात समाधि से जानकर यहा की यथा स्थिती पर प्रकाश डालते हुए तीन कवित्त लिखे ? ये कवित्त उनके द्वारा रचित कवितावली के उत्तर कान्ड मे क्रमस! १३८, १३९, १४० मे वर्णित है? गोस्वामी जी इस स्थान को चिन्हित करने के लिए अपने हाथो से चार वट व्रिच्ह लगा कर सीतमढी शीर्षक की पुष्टी करते है ? ये सीतावट इतिहास कि गवाही देते आज भी मौजुद है ? इन्ही सीतावटो के मध्य वाल्मिकी आश्रम है ? जहा पर महर्ष वाल्मिकी द्वारा रामायण महाकाव्य की रचना की गयी ? इस आश्रम के निकट ही सीताधाम है ? जहा पर लव कुश का जन्म हुआ था ? आश्रम के पश्चिमी दिशा मे धरती का वह पवित्र भू भाग है जिसे सीता समहित स्थल कहते है? यही पर जगत वन्दनीय मा जानकी अपने सतीत्व की प्रामाणिकता देने के लिए प्रित्थ्वी देवी को साच्छी बनाकर जनमानस के बीच मे असत्य रुपी लोकापवाद पर सत्य रुपी सतीत्व की विजय पताका फ़हराते हुए मा वसुन्धरा के गर्भ मे समा गयी थी ? सीता समाहित स्थल यह दिव्य स्थान गंगा तट से उत्तर पश्चिम दिशा के कोने में स्थित है। यही वह महिमामयी पावन धरती है जहां नारी सनातन संस्कृति के साकार रुप मे अवतरित जगत माता सीता की अंतर्मयी पुकार को सुनकर वसुंधरा देवी प्रकट हुईं और सीताजी को अपने अंक मे समेटकर अपने रूप में समा गयी। जब सीताजी धरती में प्रवेश कर रही थी तो श्रीराम जी ने उन्हे रोकना चाहा। श्रीराम के हाथ सीताजी के केश लगे। यही केश इस वर्तमान समाहित स्थल में सीता केश के नाम से जाना जाता है। यह सीता केश एक विशेष प्रकार की घास है जो कि रात को जूगनुओ की तरह चमकती है तथा उखाड़ने पर इसके जड़ से रक्त जैसा लाल रंग का तरल पदार्थ निकलता है। इसी समाहित स्थल पर सीता माता के भव्य मंदिर का निर्माण किया गया जो कि दो तलों मे विभक्त हैं। मंदिर के ऊपरी तल पर स्थापित सोलह श्रृंगार से युक्त मां जानकी की मूर्ति दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर देती है। निचले तल मे बनी सीताजी की वनवासिन के रूप मे कारुणिक प्रतिमा श्रद्धालुओं की आंखों को नम कर देती है। राम प्रदत्त निर्वासन काल की यह सीता प्रतिमा बड़ी ही सजीव तथा अदभुत है।


Sita: "O Mother Earth, if it is true that I have never thought of anybody but Sri Rama, receive me in your arms. O Mother Earth, if it is true that I have always worshipped only Sri Rama, then please receive me. If my words are true at all, O Mother Earth, receive me in your arms." ---------------------------Valmiki sent his disciples to fetch Seetadevi from the ashrama. When Seetadevi arrived, Sri Rama said to her, "Seetha, swear before all the sages assembled here, that you loved me alone and are in truth a virtuous woman. Let the minds of all those who doubt you be cleared. Then I shall take you back." Sage Valmiki protested. He said to Sri Rama, "Lord Rama, Seeta is the most virtuous of women. Please do not test her again and again. Why should she again swear before this gathering? Her mind is already greatly hurt. Do not pain her again. You are verily Lord Mahavishnu, the great Protector of the Universe, and she is your divine consort, Mahalakshmi. Let there be no further test." ----But Sri Rama said the test was needed in order to remove the suspicion of people.-----Seetadevi stood with her head bowed. Tears flowed like a stream from her eyes. All the gods came down from heaven to witness the test of this most virtuous woman. Before all those gods and the rishis, Seeta prayed to the Earth Goddess, "O Mother Earth, if it is true that I have never thought of anybody but Sri Rama, receive me in your arms. O Mother Earth, if it is true that I have always worshipped only Sri Rama, then please receive me. If my words are true at all, O Mother Earth, receive me in your arms." -------As Seetadevi uttered these words, the Earth burst open, and a throne rose. Bhoodevi, the Goddess of the Earth, was seated on the throne, which was held up by four serpents. Bhoodevi drew Seethadevi into her arms and embraced her. In a moment, both disappeared into the earth with the throne. The earth, which had opened, closed again.-----------Seeing Seetha vanish underground, Sri Rama was in great misery. He wept loudly. Seetha was the daughter of Bhoodevi. She had again entered the mother's womb. Sri Rama prayed to Bhoodevi, his mother-in-law, to give his wife back to him; he blamed himself, craved for Seetha, and raved angrily. But it was all in vein.-------------Then Brahmadeva, the Lord of the Creation, appeared to him and soothed him. "Sri Rama," he said, "You -are no human being, but Lord Narayana. You were born a human being to kill the demon-king Ravana. That mission is over; you must now get back to your own world of Vaikunta. Your wife Seetadevi awaits you there as Lakshmi."------Sri Rama realized that these words were true. His sorrow subsided. The assembled gods and sages were filled with wonder. After some days Sri Rama left the earth and returned to Vaikuntha.


Seeing Seeta vanish underground, Sri Rama was in great misery. He wept loudly. Seeta was the daughter of Bhoodevi. She had again entered the mother's womb. Sri Rama prayed to Bhoodevi, his mother-in-law, to give his wife back to him; he blamed himself, craved for Seeta, and raved angrily. if you not return Sita then I will ABOUT TURN you with only one ARROW.But it was all in vein.-------------Then Brahmadeva, the Lord of the Creation, appeared to him and soothed him. "Sri Rama," he said, "You -are no human being, but Lord Narayana. You were born a human being to kill the demon-king Ravana. That mission is over; you must now get back to your own world of Vaikunta. Your wife Seetadevi awaits you there as Lakshmi." -------------Sri Rama realized that these words were true. His sorrow subsided. The assembled gods and sages were filled with wonder. After some days Sri Rama left the earth and returned to Vaikuntha.


Sita means who taken birth from SIT means HAL mean plaugh instrument.--Janaki, Vaidehi and Mithilesh Kumari are also name of Sita


Yadu and Kuru was from same origin Chandravansh and Kunti was a historical lady having marrige from Yadu to Kurv Vansh.


Ayodhya was centre capital of Raghuvanshiy-Ikshaakuvanshiy - Shooryavanshiy kings. Hastinapur, Meerut was centre capital of Kuruvanshiy-Chandravanshiy kings always.


Wednesday, September 18, 2013

To end his evils a Gwala killed him in several parts in Satyuga. Was this event make Lord Shiva angry with Gwala? Answer is, No, but there two temples of Lord Shiva came in existence: 1st Kedarnath, in memory of King Kedarnath, in Uttarakhand/Uttar Pradesh and 2nd Pashupatinath in Nepal, where the holy cow of a Gwala used to feeded Shiva (head of King Kedarnath reached there). ------Kedarnath name comes from King Kedar. King Kedar (partial incarnation of Lord Shiva), who ruled in Satyug (age of truth), had a dream, in which Lord Shiva guided him to this divine place. He had a daughter named Vrinda who was a partial incarnation of Goddess Lakshmi. He accompanied by his daughter Vrinda, found the Shivling (the holy symbol of Lord Shiva=known as Kedareswar=Kedarnath later) where the temple Kedarnath stands today. The king came back, but Vrinda stayed there. She performed austerities for several years and achieved nirvana there. Hence, the place is locally known as Vrindavan too. Later Kedarnath became proud with power of Lord Shiva and became evil(extreme moral wickedness activities). To end his evils a Gwala killed him in several parts in Satyuga. Was this event make Lord Shiva angry with Gwala? Answer is, No, but there two temples of Lord Shiva came in existence: 1st Kedarnath, in memory of King Kedarnath, in Uttarakhand/Uttar Pradesh and 2nd Pashupatinath in Nepal, where the holy cow of a Gwala used to feeded Shiva (head of King Kedarnath reached there).

Kedarnath name comes from King Kedar. King Kedar (partial incarnation of Lord Shiva), who ruled in Satyug (age of truth), had a dream, in which Lord Shiva guided him to this divine place. He had a daughter named Vrinda who was a partial incarnation of Goddess Lakshmi. He accompanied by his daughter Vrinda, found the Shivling (the holy symbol of Lord Shiva=known as Kedareswar=Kedarnath later) where the temple Kedarnath stands today. The king came back, but Vrinda stayed there. She performed austerities for several years and achieved nirvana there. Hence, the place is locally known as Vrindavan too. Later Kedarnath became proud with power of Lord Shiva and became evil(extreme moral wickedness activities). To end his evils a Gwala killed him in several parts in Satyuga. Was this event make Lord Shiva angry with Gwala? Answer is, No, but there two temples of Lord Shiva came in existence: 1st Kedarnath, in memory of King Kedarnath, in Uttarakhand/Uttar Pradesh and 2nd Pashupatinath in Nepal, where the holy cow of a Gwala used to feeded Shiva (head of King Kedarnath reached there).

Monday, September 16, 2013

HUNTER, JARA who killed Lord Krishna was king Bali of the era of Lord Ram| Although it was a curse of Durvash to end the most of prominent Yaduvanshi. Also Satya Baali, Saty Bhaamaa, Jambavati sub-queens in series with chief queen Rukmini and others queens of Lord Krishna relates him with the Lord Shri Ram era. TARA, MANDODARI AND SULOCHANA(PRAMILA) were among them. This is connection of Shri Krisna (in DWAPAR YUG) with Shri Ram (in TRETA YUG). Ashtabharya(s) or Ashta-bharya(s) of Lord Krishna in Dwaraka: Chief queen:Patrani(Rukmini and Satyabhama); and Jambavati, Kalindi, Mitravinda, Nagnajiti, Bhadra and Lakshmana.


Lord Krishna:VISHNU having luxurious life in Dwarika was born and died alone.---SITA:LAKSHMI born ploughing Earth, exiled, kidnapped, exilled by RAM and again came under Earth.------------------------Therefore be equal in both condition i.e. in High and low status of life.


Shri Ramchandra kripalu bhajman\ haran bhav bhay darunam\\ navkanj lochan kanj mukh kar kanj pad kanjarunam\\-----Raghupati Raghav Rajaram/Patit pavan Sitaram//--Sabko sanmati de bhagvan/Isvar Allah tero nam//--Vaishnav jan to tene kahiye peer parayee jaane re: Saptarshi Gautam's Nyay Darshan---Both post in previous order have same sense. RAM patit pavan aur bhav badha par lagane vaale hain.


अर्जुन जब स्वयम भारत थे जैसा की परमब्रह्म श्रीकृष्ण ने उनको भारत कहा था तो परीक्षित (कुमार उत्तर) स्वयं उत्तर प्रदेश के प्रतीक हुए और उनकी माँ और अर्जुन की पुत्र वधु उत्तरा स्वयं उत्तराखंड की प्रतीक हुई। अतः अब उत्तर प्रदेश का और विभाजन मंजूर नहीं है ।


Friday, September 13, 2013

शायद अब धीरे धीरे लोगों को यह समझा आ रहा है की इस्लाम श्रीराम के सामानांतर और इसाइयत श्रीकृष्ण के सामानांतर और इस प्रकार इस्लाम और इसाइयत सनातन हिन्दू धर्म के सामानांतर चलते हैं और एक दूसरे के परिपूरक और एक दूसरे के श्रोत भी हैं और यही समझ है मानवता को एक करने और मानवता को समझने की प्रथम सीढी। वैसे भी इस्लाम अनुयायी मुसलमान (मुसल्लम ईमान=पूर्ण रूपेण इमानदार=पूर्ण रूपेण सत्यानुयाई) और इसाइयत का दूसरा नाम ही पूर्ण प्रेम है तो "इस्लाम श्रीराम के सामानांतर और इसाइयत श्रीकृष्ण के सामानांतर" इस बात को समझने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। पर यहाँ यह भी बता दें की गाय, गंगा, गायत्री और रावण का उद्धार करने के बाद कश्यप गोत्रीय श्री कृष्ण के भी आदर्श कश्यप गोत्रीय श्रीराम के यहाँ भोज करने के लिए सबसे पहले तैयार होने वाले गर्ग, गौतम, शांडिल्य गोत्रीय ब्राह्मण और किशी भी ब्राह्मण का सम्मान और रक्षा हिन्दू का प्रथम कर्तव्य जो है, यह एक मात्र ऐसी शर्त है की इस्लाम और इसाइयत को श्रीराम और श्री कृष्ण के समानांतर बना देती है मतलब एक सामान्य हल्की सी दूरी लिए उसी रस्ते पर चलना जिस पर चलकर की पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम की प्राप्ती हो सके या कहें की परमब्रह्म=परमेश्वर=परमात्मा=अल्लाह=गाड(परमेश्वर) का साक्षात्कार हो सके। जय हिन्द (कश्मीर से कन्याकुमारी और इरान से सिंगापुर=जम्बूद्वीपे), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


नर से नारायण तभी बना जा सकता है जब अर्जुन की तरह हम नारायण में अपने को पूर्ण रूप से समर्पित कर दें या नारायण(इस्वर) में असीम श्रध्धा रखें मतलब अर्जुन से भारत बन जाय। नर और नारायण में उतना ही भेद है जितना की अर्जुन और श्री कृष्ण में: श्रीकृष्ण के लिए भी अपने ही पक्ष और विपक्ष में और अर्जुन के लिए भी अपने ही पक्ष और विपक्ष में फिर नारायण मतलब श्रीकृष्ण के लिए जीवित और मरे हुए में कोई अंतर नहीं क्योंकि सभी उसी में समाहित होते हैं और निकलते हैं परन्तु नर अर्जुन के लिए जीवित और मारे जाने वाले में अंतर है और वह यह अंतर है की नर मरे हुए को नहीं देख सकता विना नारायण की असीम कृपा के वह भी उतने ही क्षण के लिए जितने की अर्जुन देखे थे पर नारायण उसे दोनों स्थितियों (शारीरधारी और निराकार) में देख सकता है। अतः नर की नजर से कोई बाख भी जाय तो नारायण की नजर से कोई बाख नहीं पता है इस लोक में भी और उस लोक में भी। मानव शरीरधारी होते हुए भी नर से नारायण तभी बना जा सकता है जब अर्जुन की तरह हम नारायण में अपने को पूर्ण रूप से समर्पित कर दें या नारायण(इस्वर) में असीम श्रध्धा रखें मतलब अर्जुन से भारत बन जाय।


संत ह्रदय नवनीत समाना। कह कबिहिन पर कहई न जाना।। निज परिताप द्रवहिं नवनीते। पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ संत का ह्रदय नवनीत(मक्खन) के समान कोमल होता है इस बात को कवि लोग कहते हैं पर वे कहना ही नहीं जानते हैं मतलब ठीक-ठीक नहीं वर्णन कर पाते हैं। क्योंकि नवनीत तो स्वयं को बाहर से ताप दिए जाने से द्रवित होता है पर संत तो वे पावन लोग हैं जो परमार्थ जीवन धारण करते हैं और समाज में दूसरों के दुःख को दूर कर सुख प्रदान करने के प्रयास में दुःख के भागीदार होते हैं।

संत ह्रदय नवनीत समाना। कह कबिहिन पर कहई न जाना।। निज परिताप द्रवहिं नवनीते। पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ संत का ह्रदय नवनीत(मक्खन) के समान कोमल होता है इस बात को कवि लोग कहते हैं पर वे कहना ही नहीं जानते हैं मतलब ठीक-ठीक नहीं वर्णन कर पाते हैं। क्योंकि नवनीत तो स्वयं को बाहर से ताप दिए जाने से द्रवित होता है पर संत तो वे पावन लोग हैं जो परमार्थ जीवन धारण करते हैं और समाज में दूसरों के दुःख को दूर कर सुख प्रदान करने के प्रयास में दुःख के भागीदार होते हैं।

Monday, September 9, 2013

श्रीराम जो श्री कृष्ण के लिए भी आदर्श थे, को आदर्श मानकर चलने पर यदि परिस्थितिया यदि विपरीत दिशा में जाती हैं तो श्री कृष्ण को अपना आदर्श चुनने का रास्ता स्वयं खुला रहता है पर यदि आप श्री कृष्ण को ही आदर्श पहले से ही मानते हैं तो श्री कृष्ण से श्रीराम बनने के लिए ब्रह्मास्त्र से परीक्षित (कुमार उत्तर) की रक्षा अपने स्वयं के जीवन में किये गए सम्पूर्ण कर्मों का अभीस्ट लक्ष्य पूर्ण सत्य की प्राप्ती सिध्ध करते हुए करना पडेगा न की केवल पूर्ण प्रेम का प्रतीक बना कर ही। पूर्ण सत्य श्रीराम भी सीता माँ के धरती में समाहित होने के बाद सीता माँ से पूर्ण प्रेम की जो विह्वलता प्रकट किये थे राजधर्म को पूर्णता देने के पश्चात और इस प्रकार सीता का त्याग किये थे सीता को धरती से पुनः प्राप्त करने की सामर्थ्य रखते हुए भी, तो उसी से वे भी पूर्ण प्रेम और पूर्ण सत्य को प्राप्त कर भगवान् बने थे न कि केवल पूर्ण सत्य से ही। अतः प्रेम वह तरल है जो इस ब्रह्माण्ड को बांधकर रखता है चाहे यह गुरुत्वाकर्षण या नाभीकीय अल्प आयामी (सार्ट रेंज) बल ही क्यों न हो। सत्य इस प्रेम को पूर्णता तक पहुंचाता है जिससे परमब्रह्म(ब्रह्म) के साक्षात्कार होते है।


Saturday, September 7, 2013

Thursday, September 5, 2013

Swami Vivekanand used to cloths BHAGAVA, the DEVOTION IN SANATAN CULTURE| भग्गरागोति भगवा ' : जिसने राग भग्न किया कर लिया वह भगवान्‌. ' भग्ग्दोसोति भगवा ' : जिसने द्धेष भग्न किया हो वह भगवान्‌. ' भग्गमोहोति भगवा ,:जिसने मोह भंग कर लिया , भग्गमानोति भगवा: अभिमान नष्ट कर लिया , भग्ग किलेसोति भगवा: क्लेष भग्न कर लिया भगवान्‌|भवानं अंतकरोति भगवा:भव संस्कारों का अंत कर लिया , भग्गकण्ड्कोति भगवा:कंटक भग्न कर लिये वह भगवान्‌| भगवा भारत की प्रकृति और संस्कृति है , भगवा स्वभाव है, भगवा भाग्य संभावना है|Personality having character of BHAGAVA, as above is known as BHAGAVAN|


Gayatri Mantra is prayer of Savitra Dev (सवित्र देव) i.e. The God who generated every thing in the cosmos (Brahmand). His color is Bhagava=Lalima i.e. color of Bhagavan=GOD.------सवित्र देव का रंग कुछ और नहीं वरन लालिमा लिए होता है। अतः सनातन धर्म का प्रतीक लालिमा वाला या भगवा होता है जिससे असीमित ऊर्जा वाले भगवान् का तात्पर्य लिया जाता और जो ऊर्जा इस पूरे विश्व को नियंत्रित करती है। अतः भगवा से ही सभी रंगों का जन्म होता है और भगवा से ही इस ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ है अतः भगवा किशी धर्म के विरोध का प्रतीक न होकर सभी धर्मों को सनातन धर्म से बने होने का प्रतीक है जिसमे ऊर्जा या सकारात्मक ऊर्जा को विशेष महत्त्व दिया जाता है।


इससे ज्यादा क्या कहें की हमारे सभ्य, सुसंस्कृत और संस्कारित जीवन क्रम में गाय, गंगा और गायत्री का प्रत्येक अंश हमारे लिए में उपयोगी है। अतः सनातन हिन्दू धर्म के लिए ही नहीं वरन सनातन धर्म से उपजे अन्य धर्म के लिए भी गाय, गंगा और गायत्री पूज्यनीय हैं।


गायत्री महामन्त्र में समावेशित इस वैज्ञानिक अध्यात्म के सृष्टि विज्ञान एवं आत्म विज्ञान का सार रूप: गायत्री महामन्त्र के नौ शब्दों के रूप में नौ गुणों- १. तत्- जीवन विज्ञान, २. सवितुः- शक्ति संचय, ३. वरेण्यं- श्रेष्ठता। ४. भर्गो- निर्मलता, ५. देवस्य- दिव्य दृष्टि, ६. धीमहि- सद्गुण। ७. धियो- विवेक, ८. योनः- संयम, ९. प्रचोदयात्- सेवा की साधना करनी पड़ती है। और तब गायत्री महामन्त्र के चौबीस अक्षरों के रूप में चौबीस ग्रन्थियों- १. तत्- तापिनी, २. स- सफला, ३. वि- विश्वा, ४. तुर- तुष्टि, ५. व- वरदा, ६. रे- रेवती, ७. णि- सूक्ष्मा, ८. यं- ज्ञाना, ९. भर- भर्गा, १०. गो- गोमती, ११. दे- देविका, १२. व- वाराही, १३. स्य- सिंहनी, १४. धी- ध्याना, १५. म- मर्यादा, १६. हि- स्फुटा, १७. धि- मेधा, १८.यो- योगमाया, १९. यो- योगिनी, २०. नः- धारिणी, २१. प्र- प्रभवा, २२. चो- ऊष्मा, २३. द- दृश्या एवं २४ यात्- निरञ्जना का जागरण होता है। इससे गायत्री महामन्त्र के साधक में परमेश्वर की समर्थ अभिव्यक्ति १. सफलता, २. पराक्रम, ३. पालन, ४. कल्याण, ५. योग, ६. प्रेम, ७. धन, ८. तेज, ९. रक्षा, १०. बुद्धि, ११. दमन, १२. निष्ठा, १३. धारणा, १४. प्राण, १५. संयम, १६. तप, १७. दूरदर्शिता, १८. जागृति, १९. उत्पादन, २० सरसता, २१. आदर्श, २२. साहस, २३. विवेक एवं २४. सेवा के रूप में होती है।


गायत्री महामंत्र वेदों का एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है जिसकी महत्ता ॐ के लगभग बराबर मानी जाती है। यह यजुर्वेद के मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः और ऋग्वेद के छंद 3.62.10 के मेल से बना है। इस मंत्र में सवित्र देव की उपासना है इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र के उच्चारण और इसे समझने से ईश्वर की प्राप्ति होती है।----------------------गायत्री' एक छन्द भी है जो ऋग्वेद के सात प्रसिद्ध छंदों में एक है। इन सात छंदों के नाम हैं-गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, विराट, त्रिष्टुप् और जगती। गायत्री छन्द में आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण होते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों में त्रिष्टुप् को छोड़कर सबसे अधिक संख्या गायत्री छंदों की है। गायत्री के तीन पद होते हैं (त्रिपदा वै गायत्री)। अतएव जब छंद या वाक् के रूप में सृष्टि के प्रतीक की कल्पना की जाने लगी तब इस विश्व को त्रिपदा गायत्री का स्वरूप माना गया। जब गायत्री के रूप में जीवन की प्रतीकात्मक व्याख्या होने लगी तब गायत्री छंद की बढ़ती हुई महिता के अनुरूप विशेष मंत्र की रचना हुई हैं|


यह मंत्र चारों वेदों में आया है। इसके ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता सविता हैं। वैसे तो यह मंत्र विश्वामित्र के इस सूक्त के १८ मंत्रों मे केवल एक है, किंतु अर्थ की दृष्टि से इसकी महिमा का अनुभव आरंभ में ही ऋषियों ने कर लिया था, और संपूर्ण ऋग्वेद के १० सहस्र मंत्रों मे इस मंत्र के अर्थ की गंभीर व्यंजना सबसे अधिक की गई। इस मंत्र में २४ अक्षर हैं। उनमें आठ आठ अक्षरों के तीन चरण हैं। किंतु ब्राह्मण ग्रंथों में और कालांतर के समस्त साहित्य में इन अक्षरों से पहले तीन व्याहृतियाँ और उनसे पूर्व प्रणव या ओंकार को जोड़कर मंत्र का पूरा स्वरूप इस प्रकार स्थिर हुआ: (१) ॐ (२) भूर्भव: स्व: (३) तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्। मंत्र के इस रूप को मनु ने सप्रणवा, सव्याहृतिका गायत्री कहा है और जप में इसी का विधान किया है। गायत्री तत्व क्या है और क्यों इस मंत्र की इतनी महिमा है, इस प्रश्न का समाधान आवश्यक है। आर्ष मान्यता के अनुसार गायत्री एक ओर विराट् विश्व और दूसरी ओर मानव जीवन, एक ओर देवतत्व और दूसरी ओर भूततत्त्व, एक ओर मन और दूसरी ओर प्राण, एक ओर ज्ञान और दूसरी ओर कर्म के पारस्परिक संबंधों की पूरी व्याख्या कर देती है। इस मंत्र के देवता सविता हैं, सविता सूर्य की संज्ञा है, सूर्य के नाना रूप हैं, उनमें सविता वह रूप है जो समस्त देवों को प्रेरित करता है। जाग्रत् में सवितारूपी मन ही मानव की महती शक्ति है। जैसे सविता देव है वैसे मन भी देव है (देवं मन: ऋग्वेद, १,१६४,१८)। मन ही प्राण का प्रेरक है। मन और प्राण के इस संबंध की व्याख्या गायत्री मंत्र को इष्ट है। सविता मन प्राणों के रूप में सब कर्मों का अधिष्ठाता है, यह सत्य प्रत्यक्षसिद्ध है। इसे ही गायत्री के तीसरे चरण में कहा गया है। ब्राह्मण ग्रंथों की व्याख्या है-कर्माणि धिय:, अर्थातृ जिसे हम धी या बुद्धि तत्त्व कहते हैं वह केवल मन के द्वारा होनेवाले विचार या कल्पना सविता नहीं किंतु उन विचारों का कर्मरूप में मूर्त होना है। यही उसकी चरितार्थता है। किंतु मन की इस कर्मक्षमशक्ति के लिए मन का सशक्त या बलिष्ठ होना आवश्यक है। उस मन का जो तेज कर्म की प्रेरण के लिए आवश्यक है वही वरेण्य भर्ग है। मन की शक्तियों का तो पारवार नहीं है। उनमें से जितना अंश मनुष्य अपने लिए सक्षम बना पाता है, वहीं उसके लिए उस तेज का वरणीय अंश है। अतएव सविता के भर्ग की प्रार्थना में विशेष ध्वनि यह भी है कि सविता या मन का जो दिव्य अंश है वह पार्थिव या भूतों के धरातल पर अवतीर्ण होकर पार्थिव शरीर में प्रकाशित हो। इस गायत्री मंत्र में अन्य किसी प्रकार की कामना नहीं पाई जाती। यहाँ एक मात्र अभिलाषा यही है कि मानव को ईश्वर की ओर से मन के रूप में जो दिव्य शक्ति प्राप्त हुई है उसके द्वारा वह उसी सविता का ज्ञान करे और कर्मों के द्वारा उसे इस जीवन में सार्थक करे।


अ, उ, म इन तीनों मात्राओं से ॐ का स्वरूप बना है। अ अग्नि, उ वायु और म आदित्य का प्रतीक है। यह विश्व प्रजापति की वाक् है। वाक् का अनंत विस्तार है किंतु यदि उसका एक संक्षिप्त नमूना लेकर सारे विश्व का स्वरूप बताना चाहें तो अ, उ, म या ॐ कहने से उस त्रिक का परिचय प्राप्त होगा जिसका स्फुट प्रतीक त्रिपदा गायत्री है।गायत्री के पूर्व में जो तीन व्याहृतियाँ हैं, वे भी सहेतुक हैं। भू पृथ्वीलोक, ऋग्वेद, अग्नि, पार्थिव जगत् और जाग्रत् अवस्था का सूचक है। भुव: अंतरिक्षलोक, यजुर्वेद, वायु देवता, प्राणात्मक जगत् और स्वप्नावस्था का सूचक है। स्व: द्युलोक, सामवेद, आदित्यदेवता, मनोमय जगत् और सुषुप्ति अवस्था का सूचक है। इस त्रिक के अन्य अनेक प्रतीक ब्राह्मण, उपनिषद् और पुराणों में कहे गए हैं, किंतु यदि त्रिक के विस्तार में व्याप्त निखिल विश्व को वाक् के अक्षरों के संक्षिप्त संकेत में समझना चाहें तो उसके लिए ही यह ॐ संक्षिप्त संकेत गायत्री के आरंभ में रखा गया है।


गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी कहा गया है । वेदों से लेकर धर्मशास्त्रों तक समस्त दिव्य ज्ञान गायत्री के बीजाक्षरों का ही विस्तार है । माँ गायत्री का आँचल पकड़ने वाला साधक कभी निराश नहीं हुआ । इस मंत्र के चौबीस अक्षर चौबीस शक्तियों-सिद्धियों के प्रतीक हैं । गायत्री उपासना करने वाले की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं, ऐसा ऋषिगणों का अभिमत है । गायत्री वेदमाता हैं एवं मानव मात्र का पाप नाश करने की शक्ति उनमें है । इससे अधिक पवित्र करने वाला और कोई मंत्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है । भौतिक लालसाओं से पीड़ित व्यक्ति के लिए भी और आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु के लिए भी एकमात्र आश्रय गायत्री ही है । गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु,कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गए हैं, जो विधिपूर्वक उपासना करने वाले हर साधक को निश्चित ही प्राप्त होते हैं । भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर प्राणी को नित्य-नियमित गायत्री उपासना करनी चाहिए । विधिपूर्वक की गयी उपासना साधक के चारों ओर एक रक्षा कवच का निर्माण करती है व विभिन्न विपत्तियों, आसन्न विभीषिकाओं से उसकी रक्षा करती है । प्रस्तुत समय संधिकाल का है । आगामी वर्षों में पूरे विश्व में तेजी से परिवर्तन होगा । इस विशिष्ट समय में की गयी गायत्री उपासना के प्रतिफल भी विशिष्ट होंगे । प्रत्यक्ष कामधेनु की तरह इसका हर कोई पयपान कर सकता है । जाति, मत, लिंग भेद से परे गायत्री सार्वजनीन है । सबके लिए उसकी साधना करने व लाभ उठाने का मार्ग खुला हुआ है । विविध धर्म-सम्प्रदायों में गायत्री महामंत्र का भाव हिन्दू - ईश्वर प्राणाधार, दुःखनाशक तथा सुख स्वरूप है । हम प्रेरक देव के उत्तम तेज का ध्यान करें । जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर बढ़ाने के लिए पवित्र प्रेरणा दें । यहूदी - हे जेहोवा (परमेश्वर) अपने धर्म के मार्ग में मेरा पथ-प्रदर्शन कर, मेरे आगे अपने सीधे मार्ग को दिखा । शिंतो - हे परमेश्वर, हमारे नेत्र भले ही अभद्र वस्तु देखें परन्तु हमारे हृदय में अभद्र भाव उत्पन्न न हों । हमारे कान चाहे अपवित्र बातें सुनें, तो भी हमारे में अभद्र बातों का अनुभव न हो । पारसी - वह परमगुरु (अहुरमज्द-परमेश्वर) अपने ऋत तथा सत्य के भंडार के कारण, राजा के समान महान् है । ईश्वर के नाम पर किये गये परोपकारों से मनुष्य प्रभु प्रेम का पात्र बनता है । दाओ (ताओ) - दाओ (ब्रह्म) चिन्तन तथा पकड़ से परे है । केवल उसी के अनुसार आचरण ही उ8ाम धर्म है । जैन - अर्हन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार तथा सब साधुओं को नमस्कार । बौद्ध धर्म - मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ, मैं धर्म की शरण में जाता हूँ, मैं संघ की शरण में जाता हूँ । कनफ्यूशस - दूसरों के प्रति वैसा व्यवहार न करो, जैसा कि तुम उनसे अपने प्रति नहीं चाहते । ईसाई - हे पिता, हमें परीक्षा में न डाल, परन्तु बुराई से बचा क्योंकि राज्य, पराक्रम तथा महिमा सदा तेरी ही है । इस्लाम - हे अल्लाह, हम तेरी ही वन्दना करते तथा तुझी से सहायता चाहते हैं । हमें सीधा मार्ग दिखा, उन लोगों का मार्ग, जो तेरे कृपापात्र बने, न कि उनका, जो तेरे कोपभाजन बने तथा पथभ्रष्ट हुए । सिख - ओंकार (ईश्वर) एक है । उसका नाम सत्य है । वह सृष्टिकर्ता, समर्थ पुरुष, निर्भय, र्निवैर, जन्मरहित तथा स्वयंभू है । वह गुरु की कृपा से जाना जाता है । बहाई - हे मेरे ईश्वर, मैं साक्षी देता हूँ कि तुझे पहचानने तथा तेरी ही पूजा करने के लिए तूने मुझे उत्पन्न किया है । तेरे अतिरिक्त अन्य कोई परमात्मा नहीं है । तू ही है भयानक संकटों से तारनहार तथा स्व निर्भर ।


ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्| हिन्दी में भावार्थ: उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें । वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे| अलग-अलग अर्थ:(1) ॐ = ब्रम्हा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का संयुक्त रूप से बोध कराने वाला संकेत; 1.भूर्भुवः स्वः = तीनों देवों के अलग-अलग वास स्थान का संकेत है; 2. भूः =(श्री ब्रम्हा जी का); 3. भुवः =(श्री विष्णु जी का); 4. स्वः =(श्री महेश जी का); 5. तत्सवितुर्वरेण्यं = सूर्य द्वारा वरणीय अथवा सूर्य का भी उपास्य देव रूप उस; 6. भर्गो देवस्य = तेजस्वरूप देव का; 7. धीमहि = ध्यान करता हूँ; 8. धियो = बुद्धि; यो = जिससे; नः = हमारी; (जिससे हमारी बुद्धि) 9. प्रचोदयात् = शुद्ध रहे या सत्कर्म के प्रति उत्प्रेरित रहे। अलग-अलग अर्थ:(2) 1. ॐ = भारतीय धर्म; 2. भूः = आत्म विश्वास; 3. भुवः = कर्मयोग; 4. स्वः = स्थिरता; 5. तत् = जीवन विज्ञान; सवितु=शक्ति संचय; वरेण्यं=श्रेष्ठता; 6. भर्गो=निर्मलता; देवस्य=दिव्य दृष्टि; 7. धीमहि = सदगुण; 8. धियो=विवेक; योनः=संयम; 9. प्रचोदयात्=सेवा।


Gayatri Mantra has its origin in the Sanskrit phrase Gayantam Triyate iti, and refers to that mantra which rescues the chanter from all adverse situations that may lead to mortality. The Gayatri mantra is one of the oldest and most powerful of Sanskrit mantras. It is believed that by chanting the Gayatri mantra and firmly establishing it in the mind, if you carry on your life and do the work that is ordained for you, your life will be full of happiness. Aum Bhuh Bhuvah Svah Tat Savitur Varenyam Bhargo Devasya Dheemahi Dhiyo Yo nah Prachodayat ~ The Rig Veda (10:16:3)

The Gayatri Mantra
Gayatri Mantra has its origin in the Sanskrit phrase Gayantam Triyate iti, and refers to that mantra which rescues the chanter from all adverse situations that may lead to mortality. The Gayatri mantra is one of the oldest and most powerful of Sanskrit mantras. It is believed that by chanting the Gayatri mantra and firmly establishing it in the mind, if you carry on your life and do the work that is ordained for you, your life will be full of happiness.
Aum
Bhuh Bhuvah Svah
Tat Savitur Varenyam
Bhargo Devasya Dheemahi
Dhiyo Yo nah Prachodayat

~ The Rig Veda (10:16:3)
The Meaning
"O thou existence Absolute, Creator of the three dimensions, we contemplate upon thy divine light. May He stimulate our intellect and bestow upon us true knowledge."
Or simply,
"O Divine mother, our hearts are filled with darkness. Please make this darkness distant from us and promote illumination within us."
Let us take each word of the Gayatri Mantra and try to understand its inherent meaning.
The First Word Om (Aum)
It is also called Pranav because its sound emanates from the Prana (vital vibration), which feels the Universe. The scripture says "Aum Iti Ek Akshara Brahman" (Aum that one syllable is Brahman).
When you pronounce AUM:
A - emerges from the throat, originating in the region of the navel
U - rolls over the tongue
M - ends on the lips
A - waking, U - dreaming, M - sleeping
It is the sum and substance of all the words that can emanate from the human throat. It is the primordial fundamental sound symbolic of the Universal Absolute.
The "Vyahrities": Bhuh, Bhuvah & Svah
The above three words of the Gayatri, which literally means "past," "present," and "future," are called Vyahrities. Vyahriti is that which gives knowledge of entire cosmos or "ahriti". Thus, by uttering these three words, the chanter contemplates the Glory of God that illumines the three worlds or the regions of experience.
The Remaining Words
• Tat simply means "that" because it defies description through speech or language, the "Ultimate Reality."
• Savitur means "Divine Sun" (the ultimate light of wisdom) not to be confused with the ordinary sun.
• Varenium means "adore"
• Bhargo means "illumination"
• Devasya means "Divine Grace"
• Dheemahi means "we contemplate"
• Dhi means intellect
• Yo means "who"
• Nah means "ours"
• Prachodayat means "requesting / urging / praying"
The last five words constitute the prayer for final liberation through the awakening of our true intelligence.
Finally, it needs to be mentioned that there are a number of meanings of the three main words of this mantra given in the scriptures:
Various meanings of the words used in the Gayatri Mantra


Bhuh: Earth,Past,Morning,Tamas, Gross
Bhuvah: Atmosphere, Present,Noon, Rajas, Subtle
Svah: Beyond Atmosphere, Future,Evening,Sattwa,Causa

Tuesday, September 3, 2013

Indian constitution's aim is Satyamev Jayatey then how we can forget Shri Ram and his ancesstor Satya Harishchand.


Can we forget 24 Gayatri Mantra's Rishis of Ashok Chakra having 24 facts and Symbol of time? Only these 24 Gayatri Mantra Approved Rishis are in the Sanatan Dharma. 24 Rishis also generated by 7 fundamental Rishis. 1st Vishwamitra and 24rth Yagyawalk| 24 facts are: 1. Love,2. Courage, 3. Patience, 4. Peacefulness, 5. Magnanimity, 6. Goodness, 7. Faithfulness, 8. Gentleness, 9. Selflessness, 10. Self-Control, 11. Self Sacrifice, 12. Truthfulness, 13. Righteousness, 14. Justice, 15. Mercy, 16. Gracefulness, 17. Humility, 18. Empathy, 19. Sympathy, 20.Spiritual Knowledge, 21. Moral Values, 22. Spiritual Wisdom, 23. The Fear of God, 24. Faith or Belief or Hope.


विवेकानंद=विवेक+आनंद=सच्चिदानंद=अखिलानंद: जबकि विवेक का मतलब है अंतर्मन (अंतरात्मा) का विवेचनात्मक निष्कर्ष जिसे आप सत्यचित कहते हैं) और आनंद का अर्थ आप जानते ही हैं (आनंद वह प्रसन्नता जो अंतर्मन तक जाय और किशी भी विकार से ग्रषित न हो और जिसमे किशी भी प्रकार का मद न हो| (यह निः-संदेह आमोद प्रमोद की श्रेणी से अलग है परिभाषानुसार)


फेसबुक पर प्रयागराज, काशी, अयोध्या और मथुरा के क्षेत्रों में मानवता की गरिमा आज तक किस तरह बनी हुयी है? इस राज को उजागिर करने के ही दूसरे दिन ही मै दुर्घटना ग्रस्त हुआ इसमे गलती सामाने वाले की ही सही और अस्थायी तौर पर आयी पैर में और मुझे बात समझ में आ गयी अपनी दुर्घटना से और इसे स्वयं फेसबुक नियामक तंत्र ने फेसबुक से स्वयं तीसरे दिन हटा दिया (आप को बता दूं यहाँ पर की मै 2006 से आज तक सच्चाई और यम-नियम की बातें लिखता रहा ऑरकुट, ब्लॉग और फेसबुक पर पर कुछ नहीं हुआ सब सकारात्मक ही रहा। पर क्या बात हुई इस सम्बन्ध में सत्य के माध्यम से राज बताने में?)। तो मित्रों समाज, रास्त्र या विश्व समाज के व्यापक हित में जो राज हो उन्हें समाज में व्यक्त करना कटु सत्य से भी बढ़कर प्रायश्चित और दुःख का कारन बन जाता है।*******जय हिन्द, जय भारत,जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


Friday, August 30, 2013

आप लोगों में प्रेम और आशीर्वाद से मै अविभूत हूँ और मेर पास कोई शब्द नहीं की अपनी वाणी दे सकूं। केवल इतना कह सकता हूँ की एक रास्ट्रीय स्वयं सेवक होने के लिए रजिस्ट्रेशन हो ही यह जरूरी नहीं और मै इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हूँ, वरन आप अपने जीवन में पृथ्वी से आसमान पर की किशी भी ऊँचाई हों अपने अस्तित्व को पहचाने तथा जिस परिवार में, जिस समुदाय में और जिस समाज और देश में आप का जन्म हुआ उसके प्रति जो कर्त्तव्य हों उसे पूर्ण करते हुए अपनी सभ्यता, संस्कृत और संस्कार का जहां तक हो पालन करें तथा कर्त्तव्य परायण बने रहें, और इस प्रकार तीनों प्रमुख ऋणों से उरिन हों जीवन में, यह जरूरी होता है। मेरे जीवन में बहुत से कर्तव्यों की इति श्री नहीं हुयी है आप लोगों का यह प्रेम और मेर बच्चे को आशीर्वाद इस बात का प्रमाण है। -----------------------------मित्रों जिस तरह से विज्ञान सास्वत है उसी तरह से परमब्रह्म (ब्रह्म) भी सास्वत है| अतः परमब्रह्म जो त्रिदेव=त्रिमूर्ति=तिरंगा (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का संगम है इस बात को इंगित करता है की ब्रह्मा, विष्णु और महेश सास्वत और अजन्मा हैं। यह यह भी इंगित करता है की इनसे जनित सप्तर्षि यदि अजन्मा नहीं तो कम से कम शास्वत हैं इनका स्वरुप भले ही बदलाता रहता हो। और यह इंगित करता है की हम विश्व समुदाय के लोग एक ही सप्तर्षि परिवार के सदस्य है। जहां गंगा और जमुना की तीव्र धारा को सरवती से मिलने पर ठहराव आ जाता है उसी तीर्थराज=प्रयागराज=त्रिवेणी=अल्लाहाबाद(=परमब्रह्म=परमेश्वर= परमात्मा=अललाह के घर) से मै अपने को वापस लेता हूँ।


Vipra@Brahmin who take less and give more to the world. Dwij@Brahmin who treated as god of Earth due to his deed. Now both definition are with more community. Is it not exapansion of Brahamanism? "Brahm Satyam Jagat Mithya", it means even MITHYA have its existence according definition of MITHYA, therefore person who care for matter is also most important part of the world.Brahmin@Brahma janati sah Brahmanah therefore existance of Kshatriya and Vaisya needed for physical world. This is because all Saptarshi:Brahmarshi converted them in Rajarshi and Maharshi too.This is need of TIRANGA:TRIDEV:TRIMURTI. This is perfect history of humanity.


(३) तीसरा ऋण है- पितृ- ऋण ।। पितर हमें सुयोग बनाते हैं ।। हम भी भावी सन्तान को सुयोग बनावें ।। भावी पीढ़ी के उचित निर्माण के लिए ध्यान न दिया जायेगा, तो भविष्य अन्धकारमय बनेगा ।।-------आज कुसंस्कारों की बढ़ोत्तरी से नयी पीढ़ियाँ, उद्दण्डता, उच्छृंखलता, अवज्ञा, आलस, विलासिता आदि बुराइयों की ओर बढ़ रही हैं ।। इस बाढ़ को न रोका गया तो, भविष्य का ईश्वर ही मालिक है ।। इसलिए बच्चों को भविष्य के सुयोग्य नागरिक एवं महान सत्पुरुष बनाने के लिए प्रयत्न करते हुए पितृ- ऋण से उऋण होना चाहिए ।। अपने या पराये, जिन बच्चों की ऐसी सेवा की जाय, वह पितृ- ऋण की उऋणता ही है ।।-------------पितर का अर्थ गुरु भी है ।। जिस प्रकार सत्पुरुषों ने हमें सद्ज्ञान दिया और अच्छे मार्ग पर चलाने के लिए अनेक प्रकार प्रयत्न किये, वैसे ही हमारे लिए उचित है, कि दूसरों को सद्ज्ञान देने और सत्- मार्ग पर लगाने के लिए प्रयत्न करें ।। यह पितृ- परम्परा जारी रखने की भावना सब की हो, तो दूसरों को ऊँचा उठाने का प्रयत्न करते हुए सम्पूर्ण विश्व को सुयोग बनाया जा सकता है ।।


(2)देव ऋण: देव ऋण से छुटकारा यज्ञ द्वारा होता है ।। यज्ञ देव- शक्तियाँ परिपुष्ट कैसे होती हैं, उसका विज्ञान पीछे बताया जा चुका है ।। अध्यात्म क्षेत्र में यज्ञ का अर्थ है त्याग ।। अपने निवारण के लिए अपनी सामर्थ्य का न्यूनतम भाग उपभोग करना और अधिकतम भाग लोकहित के लिए लगा देना यही यज्ञ भावना है ।।---देव हमें नाना प्रकार के सुख- साधन देते हैं हमें किसी का कुछ नहीं लेना चाहिए? अवश्य ही देना हमारा कर्तव्य होना चाहिए 'देव' वे कहलाते हैं कि जो देते हैं ।। देने वालों की श्रेणी में अपने को रखने से भी हम देव बन सकते हैं ।।---------धन- देना ही दान नहीं है ।। ज्ञान, समय, श्रम, सलाह, सद्भाव, शिक्षा, सहयोग आदि देकर हम अपनी स्थिति के अनुसार दूसरों को बहुत कुछ देते रह सकते हैं ।। देने की भावना हो, तो प्रतिक्षण वैसे अवसर उपलब्ध हो सकते हैं ।। ऋषि- मुनि तो पूर्णतया निर्धन होते थे, पर वे इतना देते थे कि उनके दान की तुलना धन कुबेर भी नहीं कर सकते ।।-----------देने की किन्तु विवेक पूर्वक देना की भावना से हम देव ऋण से मुक्त होते हैं किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कायर एवम् पात्र- कुपात्र का विचार न किया जाय, तो वह दान हत्या के समान भयन्कर दुःखदायी भी होता है ।। इसलिए देव श्रद्धा से छुटकारा पाने के लिए विवेक पूर्ण त्याग करते रहने का हमें निरंतर प्रयत्न करना चाहिए ।।


(१) ऋषि- ऋण : ब्रह्मचर्य द्वारा ऋषि- ऋण से छुटकारा मिलता है ।। ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल स्त्री- सम्भोग न करना ही नहीं है, वरन् उसका वास्तविक तात्पर्य सभी इन्द्रियों का संयम करना और ब्रह्म में चरण रखना अर्थात आस्तिकता को अपनाना है ।।------इन्द्रियों के संयम से, शारीरिक और मानसिक शक्तियों की रक्षा होती है और असंयमी आचरण के कारण जो समय, धन, स्वास्थ्य एवं आत्मबल नष्ट होता है, वह बच जाता है ।। इस असंयम से बचे हुए और संयम द्वारा बड़े हुए बल को जब मनुष्य आस्तिकता में धर्म- मार्ग में लगता है, उसकी सर्वांगीण उन्नति होती है ।।-------ऋषि स्वयं महान होते हैं, हमें भी ऋषि- ऋण से मुक्त होने के लिए अपने को ज्ञान, धर्म, संगठन आदि सभी दृष्टियों से बलवान बनाना चाहिये ।। ऋषि, पक्ष की परम्पराओं को आगे बढ़ाने के लिये अपने को आदर्श एवं उदाहरण के रूप में उपस्थित कर सकें ।।


Saturday, August 24, 2013

स्वामी विवेकानंद ने वेदान्त दर्शन अपनाया था जिसमे विश्व के सब दर्शन समाहित हो जाते हैं और वे इसके लिए श्रीमद्भागवत को अपना मूल आधार बनाये थे, जिसमे वशिस्ठ गोत्रीय महर्षि वेद व्याश ने परमब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण और नरश्रेस्ठ के रूप में अर्जुन के बीच हुए वार्तालाप को संग्रहीत किया है। अतः स्वामी जी से ज्यादा या कहें तो वेद व्याश जी और गोस्वामी तुलसी दाश से ज्यादा मै कुछ नहीं कह सकता क्योंकि मै केवल जन्म वशिस्थ गोत्रियों के यहाँ लिया हूँ (पर संतान सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मणों का हूँ और निवाश सनातन गौतम गोत्रियों के यहाँ किया हूँ)। अतः आप श्रीमद्भागवत गीता या श्री राम चरित मानस को या किशी एक को अपना सकते हैं समयानुसार।

4 वेद और 18 पुराण जो केवल ब्रह्मा की वाणी के रूप में स्थान्तरित होते रहे है और श्रीमद्भागवतगीता जो कृष्ण के भाष्य के रूप में तैर रहे थे उनका संकलन द्वापरयुग में वशिष्ठ के कुल में जन्म लिए हुए व्यासः/परासर ने किया सुर उसे अक्षरों और वाक्यांशों में मूर्तरूप दिया और जिस वेदांत दर्शन की बात की जाती है और जिसे स्वामी विवेकानंद ने स्वामी रमा-कृष्ण परमहंश से प्रेरित हो  सम्पूर्ण विश्व के दर्शन को वेदांत दर्शन की परिधि में ला दिया उसका सम्पूर्ण श्रेय वशिष्ठ/पराशर कुल में जन्म लिए महर्षि वेद व्यासः को ही है।

वेदों पुरानों को जन्म ब्रह्मा ने भले ही दिया हो पर वर्तमान अवस्था में जो वेड स्वरुप है उसका संकलन वशिस्थ गोत्रीय महर्षि वेद व्याश ने ही किया है और इसी से वे वेद व्याश कहे गए हैं। अगर हम वेद, पुराण, उपनिषद्, ऋचाएं या अन्य धार्मिक महाग्रंथ या काव्य न पढ़ सके तो कम से कम श्रीमद्भागवत गीता का एक छोटा सा 20 रूपये का सम्पुट लेकर पढ़कर उसका कुछ अनुकरण कर सकते हैं जिसमे नर के रूप में अर्जुन सत्य और नारायण के रूप में श्रीकृष्ण सत्य हैं और वे बहुत से बातों को दर्शाते हैं और उसमे अन्य-अन्य कर्म और व्यवहार बताते हैं। पर अंततः निष्कर्ष निकलते हैं की कर्मंयेवाधिकरास्तु माँ फलेषु कदाचन:। मतलब अगर रन शेत्र में आ गए हो तो हे अर्जुन तुम युध्ध करो तुम्हारे हाथ में केवल युध्ध करना है। मतलब वही श्रीराम चरित मानस की दो चौपाइयों का निष्कर्ष "कर्मप्रधान विश्व करी राख। जो जस करइ सो तस फल चाखा।" तथा "होइहनि सोई जो राम रची राखा। को का तरक बढ़वाई साखा।"। अतः सकारात्मक बनिए सकारात्मक कर्म करिए यह कभी भी निष्फल नहीं जाएगा इस्वर इस जन्म में न हो सका तो अगले जन्म में आप को उसका परिणाम अवस्य देगा।


मित्र हम सप्तर्षियों या अस्तक ऋषियों को न भी माने तो भ्रिगुवंश, शूर्यवंश और चन्द्रवंश ने तो पूरे भारत को जोड़ दिया है जिन तीनों का केंद्र उत्तर प्रदेश है। -----तो हम क्या अब भी नहीं कह सकते की हम एक हैं? अब इससे ज्यादा क्या कहा जा सकता है की चरों वेदों को प्राप्त करने के बाद ब्रह्मा में विश्व के प्रथम यज्ञ को क्यों किया? उत्तर है सप्तर्षि प्राकट्य यज्ञ था यह और इसे त्रिदेव ने संपादित किया था। अतः प्रथमतः हम त्रिदेव या त्रिमूर्ति के पुत्र है उसके बाद सप्तर्षियों के पुत्र हैं जो प्रयागराज इलाहाबाद में प्रकट हुए थे ब्रह्म के यज्ञ द्वारा। दूसरी बात अगस्त्य ऋषि मलय देश (वर्तमान तमिलनाडु और केरल) के मलय पर्वत पर सप्तर्षियों के संयोग से पैदा हुए। अब यह अस्तक ऋषि समुदाय हुआ और उत्तर को दक्षिण भारत से जोड़ दिया। भ्रिगुवंशीय ब्राह्मण परशुराम ने केरल, कोंकण, मराठा, गुजरात को को जोड़ा उत्तर से, शूर्यवंश ने तमिल और कर्नाटका को को जोड़ा उत्तर से और चन्द्रवंश ने आन्ध्र को जोड़ा उत्तर से। पूर्व में बंगाल और पछिम में राजस्थान सदा उत्तर से जुड़े रहे हैं। तो मित्र हम सप्तर्षियों या अस्तक ऋषियों को न भी माने तो भ्रिगुवंश, शूर्यवंश और चन्द्रवंश ने तो पूरे भारत को जोड़ दिया है जिन तीनों का केंद्र उत्तर प्रदेश है। -----तो हम क्या अब भी नहीं कह सकते की हम एक हैं?


Friday, August 23, 2013

को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥----यहाँ अपना आश्रम बना कर रहने वाले भारद्वाज ऋषि भी इसका सम्पूर्ण वर्ण नहीं कर सके। ----- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इलाहाबाद नगर का नाम 'प्रयाग' है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ। उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण 'इलहवास' किया अर्थात जहाँ पर अल्लाह का वास है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम 'इलावास' पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण 'इलाहाबाद' कर दिया।-----------------इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियांँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता व पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुत: गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि। ----------तीर्थ द्विविध होते हैं, एक कामनाओं को पूर्ण करने वाले और दूसरे मोक्ष देने वाले। जिस तीर्थ में कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष की प्राप्ति दोनों ही एक साथ हो, वह एक मात्र तीर्थ प्रयाग है। यही वह तीर्थ है जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है इसीलिए प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:" ।

को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥----यहाँ अपना आश्रम बना कर रहने वाले भारद्वाज ऋषि भी इसका सम्पूर्ण वर्ण नहीं कर सके। ----- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इलाहाबाद नगर का नाम 'प्रयाग' है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ। उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण 'इलहवास' किया अर्थात जहाँ पर अल्लाह का वास है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम 'इलावास' पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण 'इलाहाबाद' कर दिया।-----------------इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियांँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता व पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुत: गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि। ----------तीर्थ द्विविध होते हैं, एक कामनाओं को पूर्ण करने वाले और दूसरे मोक्ष देने वाले। जिस तीर्थ में कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष की प्राप्ति दोनों ही एक साथ हो, वह एक मात्र तीर्थ प्रयाग है। यही वह तीर्थ है जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है इसीलिए प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:" ।

कोई रास्त्रियता से ऊपर उठने पर ही हम अंतररास्ट्रीय होता हैं पर इसका मतलब यह नहीं की रास्ट्रीय हितों का बलिदान देकर हम अन्तर्रस्त्रिय बने वरन हमारे अंतररास्ट्रीय कार्य ऐसे हों जो अपने रास्त्र के दीर्घ कालिक हित पर चोट न पहुंचाए वरन उससे अपने रास्त्र का भी हित हो। यही है हमारा वशुधैव कुटुम्बकम का पाठ। नेहरु, गांधी और सरदार पटेल को जोड़ने की कड़ी यही से हमें प्राप्त होती है।

कोई रास्त्रियता से ऊपर उठने पर ही हम अंतररास्ट्रीय होता हैं पर इसका मतलब यह नहीं की रास्ट्रीय हितों का बलिदान देकर हम अन्तर्रस्त्रिय बने वरन हमारे अंतररास्ट्रीय कार्य ऐसे हों जो अपने रास्त्र के दीर्घ कालिक हित पर चोट न पहुंचाए वरन उससे अपने रास्त्र का भी हित हो। यही है हमारा वशुधैव कुटुम्बकम का पाठ।  नेहरु, गांधी और सरदार पटेल को जोड़ने की कड़ी यही से हमें प्राप्त होती है।

We are first Indian then Hindu, Muslim and Christian.----मेरे देश की अस्मिता ही मिट जायेगी मेरे रहते तो तो हम किश बात के हिन्दू, किस बात के मुस्लिम और किश बात के इसाई। मतलब जिस देश की अस्मिता मिट गयी उस देश के धर्मावलम्बियों के रहते हुए तो सभी धर्मावलम्बी धर्मात्मा के नाम पर भिखारी कहे जायेंगे।---इतना तो जरूर है की जो भारत माँ नहीं कह सकता तो कम से कम उसे भारत रास्त्र कहने से उसे परहेज नहीं होना चाहिए है।-----At least we should protest against enemies of our country. We defeated or win it is based on our power. Then we can say, "I have proud of our country and religion".


Thursday, August 22, 2013

मेर संज्ञान में एक दर्जन से ज्यादा उत्तर प्रदेश की कुछ जातियां है जो सीधे-सीधे "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" से जुडी हैं वे अपने को किशी भी वर्ग (पिछड़ा/दलित) में क्यों न मानती हों मुझे कोई आपत्ति नहीं यदि वे गंगा के बहते हुए पानी में हाँथ धो रहे है। --------भारत में प्रत्येक जाती, "या तो ब्राह्मण धर्म या क्षत्रिय धर्म या वैश्य धर्म या इनमे से किशी दो धर्म या तीनो धर्म के पलकों से बनी है" और ये "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" सनातन हिन्दू धर्म के अनुशासिक अंग है जो शिक्षण, रक्षा-सुरक्षा और पोषण-परिपालन जैसे कर्तव्यों को आधार मान कर बनाए गए हैं और जिनमे पूरे विश्व के सभी धर्म समाहित हो जाते हैं जो धर्म किशी विशेष भौगोलिक जलवायु में उत्पन्न होने के आधार पर बने हैं। अतः जब शिक्षण, रक्षा-सुरक्षा और पोषण-परिपालन जैसे कर्तव्यों को समाज से अलग नहीं किया जा सकता है तो कम से कम "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" का अंत इस दुनिया से नहीं हो सकता और इस प्रकार अपने को "ब्राह्मण धर्म या क्षत्रिय धर्म या वैश्य धर्म या इनमे से किशी दो धर्म या तीनो धर्म से बना हुआ मानने वाली जातियों का भी अंत नहीं किया जा सकता है। पर हाँ जो जातियां अपने को "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" का किशी भी प्रकार अंग नहीं मानती हैं वे चाहें तो अपने को ख़त्म कर लें उनको कोई नहीं रोकेगा । मेर संज्ञान में एक दर्जन से ज्यादा उत्तर प्रदेश की कुछ जातियां है जो सीधे-सीधे "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" से जुडी हैं वे अपने को किशी भी वर्ग में क्यों न मानती हों मुझे कोई आपत्ति नहीं यदि वे गंगा के बहते हुए पानी में हाँथ धो रहे है। भारत में एक ऐसी जाती है या जाती समूह है जो शीधे-शीधे अपने को विष्णु का कुर्म अवतार मानता है और दूसरी जाती यदुवंशी, तीसरी मौर्यवंशीय इस प्रकार अन्य-अन्य पिछड़ी और दलित (दलित विरादरी शर्माती है अतः उनका नाम मै यहाँ नहीं लूंगा पर मई उनको भी जानता हूँ) जातियां आती जायेंगी जो "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" की अनुयायी हैं। अतः यह मत कहो की ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म और इनसे बनी जाती का अंत आप कर देंगे क्योंकि रेसैक्लिक(पुनर्निर्माण) की प्रक्रिया ही सनातन हिन्दू धर्म को चला रही है और इसकी जड़ें कितनी गहरी हैं कोई सोच भी नहीं सकता।*******जय हिन्द (ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीप=अनादि काल से आर्यावर्त क्षेत्र), जय भारत (विश्वामित्र और मेनका के नाती और शकुन्तला और हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत के पुत्र भारत का आर्यावर्त जिसे आप अखंड भारत या भारत + अखंड = भरतखंड कह सकते हैं), जय श्री राम, जय श्री कृष्ण ( इसी विष्णु अवतार श्री राम और श्री कृष्ण के लिए परशुराम अग्यातवास में चले जाते हैं और ब्रह्मा और शिव भक्त बन जाते हैं जामवंत:ब्रह्मा और हनुमान:शिव के रूप में)।


अगर साम्यवाद का या अन्य वाद का मतलब जाती और धर्म का अंत करना है तो उस साम्यवाद या अन्य वाद का अंत अपने आप हो जायेगा। समानता केवल उपरी आवरण से नहीं होती वल्कि अंतर्मन और ह्रदय से भी समानता स्थापित होती है और उसके लिए आन्दोलन नहीं अच्छे सामाजिक वातावरण की जरूरत होती है जिसमे सभी अपने कर्तव्यों के करने में आनंद महशूस करें । अतः जाती और धर्म के अंत करने का सपना छोड़ दें आप लोग वह भी भारत में। क्योंकि जाती और धर्म को मानने वाले किशी को दलित नहीं बनाते वरन सामजिक बुराइयां और सामाजिक आवारापन इसके लिए जिम्मेदार है।


वैसे तो राजनेताओं का एक ही धर्म होता है राजधर्म चाहे वे पक्ष में रहें या विपक्ष में फिर भी गांधी-नेहरु परिवार यदि हिन्दू(ब्राह्मण) है तो उसका गोत्र केवल और केवल कश्यप गोत्र हो सकता है क्योंकि अन्य गोत्र में उसका स्थान निहित नहीं होगा और न अन्य गोत्र की सीमा में वह आयेंगे क्योंकि अपनी पवित्रता की रक्षा में वे किशी को अपने से दूर तो कर सकते है पर शीधे-शीधे अपने में समाहित नहीं करते बिना कश्यप गोत्र में प्रवेश लिए। कारन पुनः श्रीराम और श्री कृष्ण सहित अधिकतम विष्णु अवतार देने वाले इस गोत्र में सबको समाहित करने की क्षमता है जो दूसरे धर्म से भी पुनः सनातम हिन्दू धर्म में प्रवेश का प्रथम द्वार जो बनता है। फिर भी गौतम और वाशिस्था गोत्रीय कश्यप गोत्र के लिए सबसे ज्यादा श्रद्धेय और आदरनीय है।When you cross any border (caste or religion's border) or enter in any other's border then you fall in the well of Kashyapa| Any transition in caste and religion without entry in Kashyap Gotra impossible.


Wednesday, August 21, 2013

प्रगतिशील सच्चाई का अनुसरण ही आर्यों की निशानी है और यही किशी पुरुष या स्त्री को श्रेष्ठ बनाता है। अतः इसी से किशी के आर्य होने का निर्धारण होता है न कि किशी की नश्ल और रंग से।-----सकारात्मकता ही पृथ्वी पर मानवता को नियंत्रित करती है। अतः सदैव सकारात्मक करे और सकारात्मक बनें और दूसरों को भी सकारात्मक बनायें और सकारात्मक करने के लिए प्रेरित करें। इसी में मानवता का कल्याण निहित है।

प्रगतिशील सच्चाई का अनुसरण ही आर्यों की निशानी है और यही किशी पुरुष या स्त्री को श्रेष्ठ बनाता है। अतः इसी से किशी के आर्य होने का निर्धारण होता है न कि किशी की नश्ल और रंग से।-----सकारात्मकता ही पृथ्वी पर मानवता को नियंत्रित करती है। अतः सदैव सकारात्मक करे और सकारात्मक बनें और दूसरों को भी सकारात्मक बनायें और सकारात्मक करने के लिए प्रेरित करें। इसी में मानवता का कल्याण निहित है।

Agar Tridevo ki kendriy shakti sthal aur Devi Sarswati tatha Saptarshiyon ke udgam sthal, Prayag ki jameen par hee sab kuchh hogaa to Vishv ke aur Bharat ke anya bhag me kyaa hoga. Atah yahaan sanketik hee sab kuchh hota rahe yahee shresth upay hai manavta ke liye.


Due to word Aditi's son Aditya=Shoorya, there is way that Shoorya generated Chandra, Indra, Vishwakarma and other gods. That is the CHANDRAVANSHIY are part of SHOORYAVANSHIY. Therefore also by this way SHOORYAVANSHIY AND CHANDRAVANSHIY ARE BROTHER.


Kashyapa Rishi and Aditi's son called Aditya: SHOORYA and their others sons are Chandra, Indra, Vishwakarma and other gods. Shoorya generated Shooryavansh or Solar Dynasty and Chandra generated Chandravansh or Moon Dynasty. Thus SHOORYAVANSHIY AND CHANDRAVANSHIY ARE BROTHER.


Shooryavansheey ya Raghuvansheey aur Chandravansheey ya Yaduvansheey ka udbhav Kashyap Rishi aur unaki patni Aditi se hee hua hai aur dono dharao, Ganga aur Yahuna ka milan bhee Prayag:Triveni hee hai.


पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिः| (Prthivii Shaantir-Aapah Shaantir-Ossadhayah Shaantih Vanaspatayah Shaantih) May there be Peace in the Earth, May there be Peace in the Water, May there be Peace in the Plants, May there be Peace in the Trees.

Note: Prithvi=Earth, Aapah=Water, Ossadhah=Plant, Vanaspatayah=Trees.

श्रीराम और श्रीकृष्ण का शास्त्र सम्मत वर्णित रूप मेघवर्णं (cloud color)=साँवला (न तो केवल शुभ्र ही और न तो केवल काला ही ) मतलब जिसमे मिला दो उसी जैसा। शुभ्र वर्ण तो केवल ब्रह्मा और शिव का है। विष्णु का शास्त्र सम्मत वर्णित रूप मेघवर्णं है|


वन्दे विष्णुम भवभयहरम सर्वलोकैकनाथम--------------> शान्ताकारम भुजगशयनम, पद्मनाभं सुरेशं| विश्वाधारं गगानासद्रषम, मेघवर्णं शुभान्गम|| लक्ष्मिकानतम कमल नयनं, योगिभिर्ध्यानागाम्यम| वन्दे विष्णुम भवभयहरम, सर्वलोकैकनाथमसर्वलोकैकनाथम|| Meaning: 1: (Salutations to Sri Vishnu) Who has a Serene Appearance, Who Rests on a Serpent (Adisesha), Who has a Lotus on His Navel and Who is the Lord of the Devas, 2: Who Sustains the Universe, Who is Boundless and Infinite like the Sky, Whose Colour is like the Cloud (Bluish) and Who has a Beautiful and Auspicious Body, 3: Who is the Husband of Devi Lakshmi, Whose Eyes are like Lotus and Who is Attainable to the Yogis by Meditation, 4: Salutations to That Vishnu Who Removes the Fear of Worldly Existence and Who is the Lord of All the Lokas.


The principle of Karma is rooted in the foundation of Dharm. It is based on the premise that the whole universal order is not the random combination of events, but is dominated by the immutable law of cause and effect. In Indian Philosophy, therefore, great importance is given to the Karmic law. Owing to this, very minute analysis of Karma is undertaken by the Indian Philosophers. ...every activity or action leaves its hidden impression n on the soul. That impression remains with the SOUL through its present life and also serves to identify it in the future life.


This Karma Yoga course will be the first of three sequential courses the Lakulish Yoga and Health Retreat will be presenting on Karma, Gyan and Bhakti Yoga.-------------Whatever the path name, the unalterable sequence is the same. First the body and mind need be purified. This first, or purificatory Stage, is known as Karma Yoga. Once purification of the body and mind is attained, then, and only then, can one pass from Karma Yoga and gain entrance to the second stage, that of Gyan Yoga or the path of Knowledge. When the phase of Gyan Yoga or knowledge completes, then, and only then, can one enter the final phase, that of true devotion or Bhakti Yoga that leads one to the final and ultimate goal of oneness with God. This Karma Yoga course will be the first of three sequential courses the Lakulish Yoga and Health Retreat will be presenting on Karma, Gyan and Bhakti Yoga.


Each and every social person in this world adopted at least on of the Yoga in his life out of four: Gyana Yoga, Dhyan Yoga, Karma Yoga and Bhakti Yoga. There may be many who can adopt more than one which depends on his skill.--------All others Yogas with these are: Hatha, Laya , Karma, Bhakti, Raja Yog, Gyan, Kriya, Mantra, Sahaj, Ashtang, Naad, Dhyan.


गिरीशं गणेशं सुरेशं महेशं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे---------------------- प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं जगन्नाथनाथं सदानंद भाजां | भवद्भव्य भूतेश्वरं भूतनाथं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || १ || गळे रुंडमालं तनौ सर्पजालं महाकालकालं गणेशाधिपालां | जटाजूटगंगोत्तरंगैर्विशिष्यं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || २ || मुदामाकरं मंडनं मंडयंतं महामंडलं भस्मभूषाधरं तं | अनादिंह्यपारं महामोहमारं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ३ || वटाधो निवासं महाट्टाट्टहासं महापापनाशं सदा सुप्रकाशं | गिरीशं गणेशं सुरेशं महेशं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ४ || गिरींद्रात्मजा संगृहीतार्थदेहं गिरौसंस्थितं सर्वदा सन्नगेहं | परब्रह्म ब्रह्मादिभिर्वंद्यमानं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ५ || कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं पदांभोजनम्राय कामं ददानं | बलीवर्धयानां सुराणां प्रधानं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ६ || शरच्चंद्र गात्रं गणानंद पात्रं त्रिनेत्रं धनेशस्य मित्रं | अपर्णा कलत्रं सदा सच्चरित्रं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ७ || हरं सर्पहारं चिताभूविहारं भवं वेदसारं सदा निर्विकारं | स्मशाने वसंतं मनोजं दहंतं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ८ || स्वयं यः प्रभाते नरश्शूलपाणेः पठेत् स्तोत्ररत्नं त्विहप्राप्यरत्नं | सपुत्रं सुधान्यं समित्रं कळत्रं विचित्रैः समाराध्य मोक्षं प्रयाति || फलशृति

Translation:-----------
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who is the Lord, Who is the Lord of our lives, Who is Vibhu, Who is the Lord of the world, Who is the Lord of Viṣṇu (Jagannātha), Who is always dwelling in happiness, Who imparts light or shine to everything, Who is the Lord of living beings, Who is the Lord of ghosts, and Who is the Lord of everyone. | | 1 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who has a garland of skull around the neck, Who has a net of snakes around His body, Who is the destroyer of the immense-destroyer Kāla, Who is the lord of Gaṇeśa, Whose matted -hair are spread-out by the presence of the waves of Gańgā falling on His head, and Who is the Lord of everyone. | | 2 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who scatters happiness [in the world], Who is ornating the universe, Who is the immense universe Himself, Who is possessing the adornment of ashes, Who is without a beginning, Who is without a measure, Who removes the greatest attachments, and Who is the Lord of everyone. | | 3 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who resides below a Vaṭa (Banyan) tree, Who possesses an immense laughter, Who destroys the greatest sins, Who is always resplendent, Who is the Lord of Himālaya, various tormentor-groups (Gaṇa ) and the demi-gods, Who is the great Lord, and Who is the Lord of everyone. | | 4 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who shares half of His body with the daughter of Himālaya ¹, Who is situated in a mountain (Kailāsa), Who is always a resort for the depressed, Who is the Ātman, Who is reverred by (or Who is worthy of reverence by) Brahma and others, and Who is the Lord of everyone. | | 5 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who holds a skull and a trident in the hands, Who endows the desires of those who are humble to His lotus-feet, Who uses an Ox as a vehicle ², Who is supreme and above various demi-gods, and Who is the Lord of everyone. | | 6 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who has a face like the Winter-moon, Who is the subject of happiness of G