Google+ Followers

Friday, May 31, 2013

विभीषण : अब मोहि भा भरोस हनुमंता बिनु हरी कृपा मिलही नहीं सन्ता। और परशुराम: राम रमापति कर धनु लेहूँ खैन्चाही चाप मिटहिं सन्देहूँ। जिसमे रामदूत हनुमान का मिलना ही हरी (श्रीराम) की कृपा मान ली जाती है; और एक में स्वयं के पास एक शिव के परम शिष्य का गौरव हाशिल करने के नाते पाए हुए शिव धनुष को परशुराम श्रीराम से अनुसंधान के लिए कहते है और इस प्रकार राम धनुष पर चाप चढाते हैं और परशुराम को अपना एक क्षत्रिय उत्तराधिकारी श्रीराम का मिल जाना जो सम्पूर्ण विश्व समाज को दुस्त, अहंकारी और राक्षसी प्रवित्तियों वाले लोगों से विहीन बना सकता है जिसके लिए स्वयं परशुराम द्रिन प्रतिज्ञ थे और जिसका पूर्वानुमान था की एक दिन कोई न कोई ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ क्षत्रिय मेरा कार्य पूर्ण करेगा। इस प्रकार राम का रावण सहित सम्पूर्ण दुष्टों और रक्षाशों का वध धुष यज्ञ के समय ही स्पस्ट हो गया था विद्वत जनों को जो उसमे उपस्थित थे। उसी प्रकार मुझे आशा है की मै पूर्णब्रह्मर्षि और सप्तर्षि भृगु ऋषि के पुत्र जमदग्नि की धरती (जौनपुर) पर पूर्णबह्मर्शी और सप्तर्षि गौतम ऋषि को उसी संस्कार और संस्कृति से पूर्ण युगों युगों तक पाऊंगा जो इस बारह वर्ष के समुद्र मंथन से ज्ञात हुआ है और इस मेरे गुरु क्षेत्र को विश्व ज्ञान का केंद्र बने रहने में जो भी हमें करना पडेगा यह दुर्वाशा अन्चल्वाशी और कश्यप गोत्रीय सब कुछ करेगा जो संभव हो सकेगा इस संसार में। जमदाग्निपुर इस संसार में अन्न में और ज्ञान में हमेशा सबसे आगे रहा है और रहेगा यह मेरा अपना वाक्य नहीं पर भृगु ऋषि के पुत्र जमदग्नि के कर्मों और तपस्या का असर है जिससे उन्होंने इसे शींचा है। जिस गौतम बुध्ध को ज्ञान लेने वन जाना पड़ा एक क्षत्रिय राज-घराने में रहते हुए भी उस गौतम बुध्ध की तुलना सप्तर्षि गौतम बुध्ध से करना बहुत बड़ी मूर्खता होगी क्योंकि स्वयम गौतम ऋषि वट वृक्ष की तरह कल्प वृक्ष थे ममता के और ज्ञान के सागर थे पर गौतम बुध्ध (सिद्धार्थ) का ज्ञान अधूरा का अधूरा ही रहा। कारन यह है की व्यक्ति अपने दुखों का कारन खुद है और अगर खुद कारन नहीं तो दुख कुछ दिन में अपने आप दूर होगा इस्वर में विश्वाश किजिये। जिसे इस्वर पर विशवास नहीं वह घर और संसार भी छोड़ दे तो दुखी ही रहेगा॥ हम राजा जनक के पास भी नहीं पाते हैं गौतम-बुध्ध को जो एक राजर्श्री थे और संसार का सार भी उनको ज्ञात था इसी लिए अपनी पुत्रियों और राज्य के किशी काम में कोई शीधा हस्तक्षेप नहीं करते थे। जो संसार के किशीदुःख से दूर हटना कहता है उसे पहले संसार शब्द का र्थ जानना पडेगा नहीं तो कई गौतम बुध्ध जन्म लेते रहें और हाल वही होगा जैसा चीन का और जापान का। मुझे विशवास है आने वाले युगों-युगों के लिए अगर दुष्टों से कोई ब्राह्मणों की रक्षा नहीं करेगा तो कम से कम शूर्यवंशीय और चन्द्र वंशीय कश्यप गोत्रीय अवस्य करेंगे और उनका सम्मान बनाए रखेंगे।---सत्यम ब्रुआत प्रियं ब्रुआत ना ब्रुआत सत्य-अप्रियम।


अगर आजमगढ़ तथाकथित आतंकवाद की फैक्ट्री कहा जाता है तो उसका भी एक रहस्य है: अगर यह दुर्वाशा का क्षेत्र है तो उसी के साथ एक गौतम गोत्रीय राजा (विक्रमजीत-विक्रमादित्य) के पुत्र आज़म के नाम पर इसका नामकरण भी हुआ है। अब दोनों घटनाएं एक साथ कैसे हो रही है: एक तरफ गौतम गोत्री अति ज्ञानवान और श्रद्धा-विस्वाश और दया के सागर दूसरी तरह आतंकवाद? आजमगढ़ में सर्वशक्तिशाली क्षत्रिय शासन जब अपनी शक्ति के कारन उत्तर भारत में सबसे अंत में मुस्लिम शासन की गिरफ्त में आया (इससे पूर्व वह हर आक्रमण का जबाब देता रहा और आशानी से अन्य स्थान के राजवंश की तरह मुस्लिम सत्ता स्वीकार नहीं की) उसी समय ईसायत-अंग्रेजों का पदार्पण भी हो चुका था भारत पर और इसाइयत सुरु हो चुकी थी अतः स्वाभिमान की रक्षा और ईसायत से रक्षा इसे तथा कथित आतंक की फैक्ट्री में बदल दिया (It is not only due to fact of Durvasa's Anger) जबकि भारत में अन्य गरीब हिन्दू जन इसाइयत को आसानी से स्वीकार कर लेता था/है पर मुसलमान इसे कठोरता से नकार देता है(मुसल्लम ईमान वाला =सम्पूर्ण ईमानदार=In actual you can not come to the complete truth therefor they come nearer to the complete truth)।*******जय हिन्द, जय भारत, जय श्री राम, जय श्री कृष्ण।


या देवी सर्व भूतेशु बुध्धि रुपें संसृता, या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपें संसृता, या देवी सर्वभूतेषु अर्थ-रूपेनु (संपदा) संसृता ही महिला की पहचान है: वही सरस्वती, वही पार्वती, वही लक्ष्मी और इस तरह आदि शक्ति दुर्गा (सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की सम्मिलित शक्ति एक साथ) भी है फिर भी संसार में राक्षस घूम रहे हैं और दुनिया भिखारी, अज्ञानी और शक्ति हीन क्यों है ?------------- जगत तारिणी, जगत जननी, जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी, वन्देमातरम शब्द महिला के एक स्वरुप के हैं अतः महिला शसक्तीकरण के साथ-साथ हम उनको जय जगदम्बे (अम्ब=माँ ) के रूप में भी देखना चाहते हैं जिसमे नवीनता के साथ साथ सुसंस्कृत, संस्कारयुक्त और एक प्रगतिशील सामाजिक सच्चाई के निर्वहन की भी शक्ति हो।-वन्देमातरम-माँ तुझे सलाम-We salute o my great mother जैसे शब्दों को महानता देते रहने के लिए।


रामचरित मानस उत्तर कांड में भगवान् शिव माता पार्वती को कुछ सप्रसंगा ब्याख्या देते हुए (काली माई गौरा पार्वती का ही स्वरुप है पर शिव जी के साथ उस काली माई के स्वरुप में नहीं रहती वरन विश्व की सबसे सुन्दर स्त्री रति से भी सुन्दर स्वरुप गौरा पार्वती के स्वरुप में रहती हैं) : धन्य सो देश जह सुरसरि बहई (वह देश धन्य है जहा भागीरथी-गंगा बहती हों)। धन्य नारी पतिव्रत अनुसरहीं (वह नारी धन्य है जो पतिब्रत का पालन करती हो) धन्य सो भूप निति जो करई (वह राज धन्य है जो नीतियों के अनुसार आचरण करता हो) । धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)॥ सो धन धन्य प्रथम गति जाकी (वह धन धन्य है जो समाज के उपकार में लगाया जाय )। धन्य पुण्य रत मति सोई पाकी (वह मति धन्य है जो पुन्य के कार्य मतलब सृजन या सामाजिक नवनिर्माण के कार्य में लगाई जाय) ॥ धन्य घरी सोई जब सतसंगा (वह समय धन्य है जो सत्संग करने में प्रयुक्त हुआ हो) । धन्य जन्म द्विज भगती अभंगा (जिस ब्राह्मण की भगति अटूट हो भगवान् राम के प्रति उसका जमन धन्य है) ॥ सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (हे उमा-पार्वती वह कुल धन्य है जिसमे पूरे जगत के पूज्य और पवित्रता में भी सर्वश्रेष्ठ (सु-पुनीत) का जन्म हो इसका मतलब रघुकुल=इक्शाकुवंश=शूर्यवंश धन्य है)। श्रीरघुवीर परायण जेहिं नर उपज विनीत (विनय युक्त =विनम्रता और शिस्टाचारयुक्त व्यक्ति =RESPECTFUL=COURTEOUS=Gentleman=सज्जन पुरुष)=और ऐसे रघुवीर का परायण मतलब रघुवीर में अभीस्त श्रध्धा वाला वही हो सकता है जी जिसके अन्दर विनीत (विनम्रता-विनययुक्त) की उपज हो ) ॥ तो आज सज्जन पुरुष की कमी हो गयी है विद्वान और ऋषि महर्षी तो बहुत ज्यादा हो गए हैं लेकिन आप ऋषि महार्श्री की अधिकता के बावजूद विनम्र और सज्जन पुरुष की कमी क्यों हो गयी है का प्रश्न करेंगे तो आप के लिए बता दूं की दैत्यों के गुर शुक्राचार भी एक ऋषि महर्षि थी और वे देवतायों के गुरु गुरु ब्रहस्पति से भी कई मायने में आगे थे अतः ऋषि महार्श्री भी अधिक हो कर क्या करेंगे यदि वे शुक्रचारियों के साथ हो लेंगे तो और अधिक नुक्सान हो जाता है। अतः विनम्र-सज्जन-विनययुक्त-विनीत-शिस्ताचारयुक्त व्यक्तियों की इस पूरे विश्व को अति आवश्यकता है विद्वान और ऋषि महर्षी न सही वे सामान्य शिस्ताचार कम से कम जानते हों।*******जय हिन्द (ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीप=अनादि काल से आर्यावर्त क्षेत्र), जय भारत (विश्वामित्र और मेनका के नाती और शकुन्तला और हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत के पुत्र भारत का आर्यावर्त जिसे आप अखंड भारत या भारत + अखंड = भरतखंड कह सकते हैं), जय श्री राम, जय श्री कृष्ण ( इसी विष्णु अवतार श्री राम और श्री कृष्ण के लिए परशुराम अग्यातवास में चले जाते हैं और ब्रह्मा और शिव भक्त बन जाते हैं हनुमान और जामवंत के रूप में)।


कहा जाता है की दुनिया में दो ही दया तथा मानवता के सागर हैं एक भोलेनाथ शिवशंकर महादेव और दूसरे सप्तर्षि में गौतम और दोनों की पत्नियो पर दैत्यों और देवताओं की कुद्रिस्ती पडी है अतः मै गौतम गोत्रीय क्षत्रिय से इस्लाम धर्म धारण करने वाले गौतम-गोत्रियों (आर्यमगढ़:आजमगढ़:महान्तमनगर वाशियों) पर गौतम गोत्रीय क्षत्रिय द्वारा चलाये गए धर्म (बौद्ध धर्म) और तथा कथित दया की मूर्ती इसामशीह द्वारा चलाये गए इसाई धर्म के अनुयायियों में "सत्यमेव जयते:मानवता की सीमा के माप दंड" के प्रति कितनी उदारता और विश्वसनीयता है की परिक्षा लेने का दायित्व शौपता हूँ पर मेरी परीक्षा में ये दोनों विश्वाश लायक नहीं हैं। अगर गौतम गोत्रीय क्षत्रिय द्वारा चलाये गए धर्म (बौद्ध धर्म) और तथा कथित दया की मूर्ती इसामशीह द्वारा चलाये गए इसाई धर्म के अनुयायियों में "सत्यमेव जयते" के प्रति कितनी उदारता और विश्वसनीयता है की परिक्षा जारी न रही अनवरत रूप से तो स्त्रियशक्ति का दुरुपयोग ये लोग करते रहेंगे भोलेनाथ शिवशंकर महादेव और गौतम ऋषि को नीचा दिखाने के लिए जो इस कश्यप के लिए अति प्रिय और श्रद्धेय हैं तथा मानवता की सीमा के माप दंड हैं।*******जय हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीपे), जय भारत (भरतखंडे), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


If a smallest particle with highest energy (i.e. itself PARAMBRAHM) can creat the whole universe then why Agastya Rishi (Kumbhaj Rishi) (who originated from all seven Saptarshi and who was resident of Malay Mountain in Tamil) was not able to contain water of all Oceans in a single small water container i.e. the KUMBH by his YOG and Knowledge power ? [अगर अपरम्पार ऊर्जा वाले एक सम्भावित शूक्ष्मतम कण से (स्वयं परमब्रह्म से ) इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के उत्पत्ति संभव हो सकती है तो क्या स्वयं सातों सप्तर्षियों से जनित तमिल के मलय पर्वत निवासी अगस्त्य ऋषि (कुम्भज ऋषि) सभी समुद्रों का जल एक कुम्भ=घडा में अपने ज्ञान और योग शक्ति से समाहित नहीं कर सकते]


कुछ लोगों की इक्षा थी की मई लोगों को विश्व के सबसे बड़े रहस्य से पर्दा उठा दूं तो वह भी हुआ और वे सब लोग जान गए की हनुमान भी अपने गुरु सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला से शादी की थी और वर्तमान में जिसे विश्व शक्ति कहा जात है उस पाताललोक में सुवर्चला से मकरध्वज नामक पुत्र की प्राप्ति भी हुई थी। शायद सशुराल का असर था की हनुमान अहिरावन को मार कर श्रीराम और लक्षमण को उस बंधन से छुडा कर लाये थे पाताललोक से जिस बंधन को तोड़ना श्रीराम और लक्षमण के लिए धर्म विरुध्ध था। ----------------------------अतः अब आप कहेंगे की हनुमान आजीवन ब्रह्मचारी कैसे हुए तो हनुमान सिर्फ अपने गुरु शूर्यदेव की आज्ञा का पालन किये थे गुरुदाक्षिना देने के रूप में और वैसे भी जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी (जिसका केवल अपनी एक पत्नी में ही आस्था है वह भी ब्रह्मचारी के सामान है: कश्यप और विश्वामित्र को छोड़कर बाकी सभी सप्तर्षि एक नारी व्यवस्था के ही थे: कश्यप को अपने पिता मारीच की आज्ञा के पालन स्वरुप ब्रह्मा के पुत्र दक्ष की सभी पुत्रियों से शादी करनी थी और केवल सती-पारवती (महादेव से) को छोड़ कर: ऐसा ब्रह्मा का अनुरोध था मारीच से अपने पुत्र दक्ष के दबाव में की सभी पुत्रियों की शादी केवल कश्यप ऋषि से होगी; और विश्वामित्र का अपनी पत्नी के अलावा एक स्वर्ग की अप्सरा मेनका से प्रेम का परिणाम मेरा देश भारतवर्ष है ही)।


First three days of Navratri puja rituals are dedicated to Goddess Durga. And the next three days to Goddess Lakshmi and the final three days are to Goddess Saraswati. Ya devi sarva bhutesu, shanti rupena sansitha Ya devi sarva bhutesu, shakti rupena sansthita Ya devi sarva bhutesu, matra rupena sansthita Namastasyai, namastasyai, namastasyai, namo namaha! Sarva mangala maangalye shive sarvaartha saadhike Sharanye trayambake Gauri Narayani namosthute Namoh devyai mahadevyai shivayai satatam namah Namah prakrutyai bhadraayai niyataah pranataahsma taam Annapoorne sadapoorne shankarah praanavallabhe Njana vairaagya sidhyardham bhikshaam dehi cha parvati


Mere Priya Mitron, Mai swayam kramsah Garg (Bharadwaaj Shisya paramparaa vyutpanna) Gotriy Shukla, Gautam Gotriy koi bhee Brahman, Shandilya (Vashisth-Kashyap vyutpanna) Gotriy Tiwari aur Vashiath Goriy Joshi ke baad hee sthaan paataa hoon. Mai (Kashyap Gotriy Pandey) kishi kaa sthaan grahan nahee kar sakaa aur n kar sakoongaa chahe Bhagvaan hee kyon n ho jaau| Aur yah bhee satya hai mere baad hee Bharadwaaj, Bhrigu, Atri aur Kaushik (later name Vishvamitra) tathaa Agastya (Kumbhaj) kaa sthaan aataa hai| vaise dwiteey pidhi ki baat n ho to Gautam, Vashisth aur Kashyap, Bharadwaaj, Bhrigu, Atri aur Kaushik(later name Vishvamitra) tathaa Agastya (Kumbhaj) kaa hee kram hai|---------Ab aap log apane janm aur sukarmon se apnaa sthaan in saptarshiyon me yaa astak (aathon) rishi me nischit kijiye agar bahut ghore parishram aur prayash apane jeevan me kiye hon udyam, samaaj, sanskriti aur vigyaan me| -----Mujhe nahee karanaa hai nayaa prayog par har sambhav prayas hogaa ki samaaj kaa hit ho mere karyon se|*******Jai Hind. Jai Bhart, Jai Shree Ram, Jai Shree Krishna|


Islamism is parallel to Shri Ramaism and Christianity is Parallel to Shri Krishnaism----------and 12.5% power, post, wealth and all things are of those Vishnu (who played role as Kachchhap or Kurm at the time of Churning of the ocean) including Kaali Maan (partial form of Aadi Shakti Durga) and Kapil Rishi: But this Vishnu means with Rasi name Giridhari as Vivek is not turned as black body although has done almost all work of Churning himself in Prayag-Allahabad but yes this was effect of wishes of Parampita Paramguru Parameshwar (My Gautam Goriya Mama ji) and his Parampita Paramguru Parameshwar, Shradhdey Shri “Vashistha Gotriya Joshi ji” and my Parampita who took me here in Prayag.( Vashistha=Greatest Guru of the world history; and Gautama=greatest Human of the world history, both are greater than God for a Kashyap Gotriya Like me)

Islamism is parallel to Shri Ramaism and Christianity is Parallel to Shri Krishnaism----------and 12.5% power, post, wealth and all things are of those Vishnu (who played role as Kachchhap or Kurm at the time of Churning of the ocean) including Kaali Maan (partial form of Aadi Shakti Durga) and Kapil Rishi: But this Vishnu means with Rasi name Giridhari as Vivek is not turned as black body although has done almost all work of Churning himself in Prayag-Allahabad but yes this was effect of wishes of Parampita Paramguru Parameshwar (My Gautam Goriya Mama ji) and his Parampita Paramguru Parameshwar, Shradhdey Shri “Vashistha Gotriya Joshi ji” and my Parampita who took me here in Prayag.( Vashistha=Greatest Guru of the world history; and Gautama=greatest Human of the world history, both are greater than God for a Kashyap Gotriya Like me)

Prayer to Lord Shri Rama (an ideal to Shri Krishna also) (Shri Rama-Vandana)

(आपदामपहर्तारं दातारां सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो-भूयो नामाम्यहम्॥१॥)
(रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥२॥ )
(नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम।
पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम॥३॥ )
(निवेदयत मां क्षिप्रं राघवाय महात्मने ।
सर्वलोकशरण्याय विभीषणमुपस्थितम् ॥ )
[Valmiki Ramayana 6.17.17]
(निवासवृक्षः साधूनामापन्नानां परा गतिः।
आर्तानां संश्रयश्चैव यशसश्चैकभाजनम्।। )
[Valmiki Ramayana 4.15.19]
रामात् नास्ति परोदेवो रामात् नास्ति परंव्रतम् ।
न हि रामात् परोयोगो न हि रामात् परोमखः ।।
(- श्रीपद्मपुराण , पातालखण्ड ३५।५१)
(सकृद् एव प्रपन्नाय तव अस्मि इति च याचते ||
अभयम् सर्व भूतेभ्यो ददामि एतद् व्रतम् मम | )
[Valmiki Ramayana 6.18.33B-34A]
(श्रीरामचंद्रचरणौ मनसा स्मरामि। श्रीरामचंद्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचंद्रचरणौ शिरसा नमामि । श्रीरामचंद्रचरणौ शरंणम् प्रपघे॥ )
(माता रामो मत्पिता रामचंद्र: । स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र:।
सर्वस्वं मे रामचंद्रो दयालु:। नान्य्ं जाने नैव जाने न जाने ॥ )
(अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः |
अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि || )
[Valmiki Ramayana 6.117.31]

ये त्वां देवम् ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् |
प्राप्नुवन्ति सदा कामानिह लोके पात्र च || )
[Valmiki Ramayana 6.117.32]

------------------------------------------------------------------------------------------------------------
1.
(आपदामपहर्तारं दातारां सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो-भूयो नामाम्यहम्॥१॥)
Who removes all types of adversity and agony of Jiva (living beings); Who bestows all types of favour, honour and wealth; By looking at whom, the world feel very pleased; to that Shri Rama, I bow again and again.
2.
(रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥२॥ )
My salutations to Lord Rama; To Shri Ramabadhra, To Shri Ramachandra, To the lord of Vedas, To the chief of Raghu clan, To the lord of all worlds, And to the Lord of Sitā.
3.
(नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम।
पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम॥३॥ )
Who has complexion and softness like that of a blue lotus, whose body parts are very soft; On whose left side resides his dear consort Sita; Who has a divine arrow and a beautiful bow in His hands, I pray to that Shri Rama who is the Lord of Raghu dynasty.
Above three Mantra-s of Lord Rama should be recited every morning as regular prayer before chanting the Guru-Mantra. The first Mantra is infallible Mantra in removing all kinds of sufferings of Jiva and bestows the grace of all merciful Lord Rama, the most superior. The second Mantra is one of the greatest Mantra-s of Lord Rama. It can be repeated as many times a devotee want with pleased mind. 3rd Mantra is Dhyan Mantra i.e. meditation Mantra on all attractive form of Lord Rama. During chanting this mantra, one should meditate on Lord Rama as described in the Mantra. This Mantra has a very deep meaning too. It represents whole Ramayana in one single verse.
How does it reflect the entire Ramayana?
नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं: The blue lotus like soft body parts are of child Rama, thus it is the description of the Baal-Leela of Lord Rama.
सीतासमारोपितवामभागम: By sages and saints, Sita was given seat on left Side of Lord Rama during their marriage, it is the description of the Vivah-Leela of Lord Rama.
पाणौ महासायकचारूचापं: By taking arrows and beautiful bow in hands, Lord Rama slayed all the evil demons, It is the description of exploits of Lord Rama in war i.e. Rann Leela.
रामं रघुवंशनाथम: After killing Ravana, the coronation (पत्ताभिषेकं) of Lord Rama was done on the throne of Ayodhya, then Lord Shiva, Lord Brahma and all deities made salutations in lotus feet of Lord Rama. Thus it is the description of Lord Rama's Rajya-Leela. It unveils how Lord Rama becomes the delight of all the worlds. Whole world became the world of Lord Rama.
After the Guru-Mantra or Ram Naam chanting, one should do Dvaya-Mantra (द्वय-मन्त्र) of Bhagavan Shri Ram at least nine times.
Okay, It is a very good prayer to Lord Rama.
But why to pray Lord Rama? Why to take the refuge of Lord Rama, alone?
Such questions may arise in the minds of beginners who want to learn the science of supreme one, Lord Rama. Why should one pray to Lord Rama? Why should one take the refuge of Lord Rama, alone? Answers of these questions are really not based upon some emotional appeals but verily backed upon clear declarations of all Vedic-scriptures and Vedic-philosphy. Veda-s clearly instruct us to pray and love one supreme personality and that is none other than lord Rama. Let's have some light on what vedic scriptures and VedAvatAr ShrI-mad VAlmIki-RAmAyana answers on above questions:-
• Lord Rama is the original personality of Godhead. How? We will see it in other pages of this website. For the time being one can see here:
• Lord Rama is the only one fit to be taken shelter of for all the worlds. Yes, it is very much true and approved by Godly sage Brahmarshi Valmiki through the mouth of Maharaj Vibheeshana in Yuddha Kaand of Shri-Mad Valmiki Ramayana.
(निवेदयत मां क्षिप्रं राघवाय महात्मने ।
सर्वलोकशरण्याय विभीषणमुपस्थितम् ॥ )
[Valmiki Ramayana 6.17.17]
Please inform immediately to high soled Rama, who is the only one fit to be taken shelter of for all the worlds. So I have come to him (to take his refuge).
• Lord Rama, alone is the ultimate refuge for all, whether one is a god, a demon, a human being (a man, a woman or a child), or a creature other than human-being such as a beast or bird, or belong to differnt social status such as poor or rich etc.
(निवासवृक्षः साधूनामापन्नानां परा गतिः।
आर्तानां संश्रयश्चैव यशसश्चैकभाजनम्।। )
[Valmiki Ramayana 4.15.19]

( साधूनाम् to the virtuous people, निवासवृक्षः a sheltering tree, आपन्नानाम् to the destitutes, परा ultimate / supreme, गतिः refuge, आर्तानाम् to the distressed, संश्रयश्चैव protector, यशसः fame, एकभाजनम् sole repository. )
Lord Rama is like a sheltering tree to the virtuous, an ultimate (supreme) refuge for the destitutes and a protector of the distressed. He is the only personality who deserves to be famous.
So who else apart from Lord Rama is suitable to be taken as ultimate refuge for Jiva-s?
• Lord Rama is Ishta-Deva of all deities including Lord Shiva, Lord Hanuman, Lord Ganesha, Lord Brahma, Lord Krishna etc. Proof from the self sufficient authority (Pramana), Shri-Mad Valmiki Ramayana:- इष्ट: सर्वस्य लोकस्य राम: - means Lord Rama is the IshTa-Deva of all the worlds. Lord Shiva, Lord Ganesha, Lord Hanuman, etc have become the worthy of worship by chanting 'Rama' Naam alone.
• All the deities reside in Lord Rama as Lord Rama is Sarva-Devamayam which means Shri Rama is the origin of all the deities (demi-gods and Vishnu-Tattva-s).
सर्वदेवमयो रामः स्मृतश्चार्त्तिप्रणाशनः ॥ (Skanda Purana)
It means "All the deities reside in Śrī Rāma or Śrī Rāma is the original root of everyone . Śrī Rāma destroys all type of agonies of his devotees."
So it is sufficient to serve lord Rama, the original cause of all causes, the origin of all, the original root which supports all. The leaves and branches of a tree which gets support and existence from the root, similarly Lord Rama is the root (origin) and support of the entire creation. There is none who has independent existence beyond Lord Rama. When one will worship the god of gods, Lord Rama, then there is no need of worshiping other gods. All the deities will be automatically pleased just by taking refuge into lotus feet of Lord Rama. Even the god of death fears from lord Rama. No one in whole world, not even Brahma-Vishnu-Mahesha can do any harm to the devotee of Lord Rama, once devotee asked the refuge at the lotus feet of Lord Rama. So it is said "give respect to all deities but Love Lord Rama alone".

• No god is superior than Lord Rama. Lord Rama is root or origin of all the deities. It is sufficient to serve directly to the root rather than serving the leaves. It will waste our time, and devotion, moreover it has been said that fruits of serving other deities except Lord Rama are also doubtful. If one gives water to the root, it nourishes all the leaves, fruits including other parts of tree. So if one directly worships the cause of all causes i.e. the most superior Lord Rama, all dieties will be automatically pleased, as they themselves worship the all pwowerful Lord Rama.
रामात् नास्ति परोदेवो रामात् नास्ति परंव्रतम् ।
न हि रामात् परोयोगो न हि रामात् परोमखः ।।
(- श्रीपद्मपुराण , पातालखण्ड ३५।५१)
No God is superior than Lord Rama; No penance has greater fruit than Lord Rama (the penance which is done for Lord Rama); no Yoga exists beyond Lord Rama (means Param-Yoga is to get the nearness of Lord Rama only); No sacrifice (Yajna) is greater than (that Yajna which is done for Lord Rama) Shri Rama. [...so said by - Padma Purāna 5.35.51]
So it is any time better to be devotee of Lord Rama alone and thus, be praying and worshiping the most superior god.
Okay, That's so nice to be a devotee of Rama as he is the Parabrahman, the most superior Lord, the root of all gods and who alone is fit to be taken as our refuge.
So how can one take refuge of Lord Rama? How can one become his devotee?
It is very simple to take refuge of Lord Rama. You need not have to abandon your duties towards your family or world, but you have to establish relation with Lord Rama.(How?)
Just say O' Lord Rama, "I am Yours", only by this much You can take refuge of Lord Rama or You can become devotee of Lord Rama and Lord Rama will be Yours. Then there would be no fear of anything as soon Rama become yours. This is also solemn pledge of Lord Rama in Shri-Mad Valmiki Ramayana.

(सकृद् एव प्रपन्नाय तव अस्मि इति च याचते ||
अभयम् सर्व भूतेभ्यो ददामि एतद् व्रतम् मम | )
[Valmiki Ramayana 6.18.33B-34A]
He who seeks refuge in me just once, telling me that "I am yours", I give him assurance of safety against all types of beings. This is my solemn pledge".
Above verse is also known as Charama Shloka of Valmiki Ramayana. Once Jiva takes the shelter of the most superior Lord Rama, it has no need to worry about anything as Lord Rama has taken vow to protect him from all kind of fears.
To feel the bliss of being in loving relation with the supreme one, a devotee should recite these SharaNagati Mantra-s at the end of their daily prayer:
Take SharaNagati (refuge) of the Supreme Lord Rama with following two Mantra-s shrIrAmachandra charaNau manasA smarAmi | shrIrAmachandra charaNau vachasA griNAmi | shrIrAmachandra charaNau shirasA namAmi | shrIrAmachandra charaNau sharaNam prapadye ||
(श्रीरामचंद्रचरणौ मनसा स्मरामि। श्रीरामचंद्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचंद्रचरणौ शिरसा नमामि । श्रीरामचंद्रचरणौ शरंणम् प्रपघे॥ )
O' My Lord Shri Rama, I remember your lotus feet in my mind, I praise them by my speech, I bow to them with my head, I take resort in them!
To feel the especial personal relationship with the most superior personality, Lord Rama, say this:

(माता रामो मत्पिता रामचंद्र: । स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र:।
सर्वस्वं मे रामचंद्रो दयालु:। नान्य्ं जाने नैव जाने न जाने ॥ )
O' My Lord Shri Rama, You are my mother, father, master and friend, indeed the kind-hearted Rama is all I have. I don't have any other relation apart from him, I really don't!
Thus as soon as one says "O, Shri Rama, I am Yours and You are mine", one becomes his devotee at that very instant.
So What is the fruit of being devoted to Shri Ram, the supreme personality of Godhead?
When Lord Rama sees a Jiva with his benign look then nothing more remains to be achieved as his look is supremely gracious and infallible (Amogham) for his devotees.

(अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः |
अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि || )
[Valmiki Ramayana 6.117.31]

ये त्वां देवम् ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् |
प्राप्नुवन्ति सदा कामानिह लोके पात्र च || )
[Valmiki Ramayana 6.117.32]
Lord Brahma says "O' Lord Rama, Your blessed sights on devotees are very powerful and infallible. The songs in praise of you never go invain. Those humans who are full of devotion to you will never be unsuccessful on this earth. Those who are devoted to you, the primeval (the first Lord) and the eternal lord, belonging to ancient times and the Supreme Person, will forever attain their desired objects here as well as hereafter (that even your supreme abode Saket Loka which is full of eternal supreme bliss Brahm-Ananda).

हनुमान की एक परिभाषा यह भी है: वे एक ब्राह्मण के पुत्र पर शिव की शक्ति और अंश है तथा विष्णु के आदेश पालक और भक्त हैं इस प्रकार वे के शिवांश वैस्नव हुए। अब बताइए की हनुमान क्या हुए? और क्या ये हनुमान (तिरंगे के चतुर्थ नीला रंग=चतुर्थ सिंह) किशी प्रकार से तिरंगे=त्रिदेव=त्रिमूर्ति के किशी तरह से विरोधी हुए? अतः संविधान की बात बाद में आती है मै चिर स्मरणीय मंगल पाण्डेय जी को बता दूं की आप के अनुयायी खुद गाय की चरबी और सूवर के मांस से बच नहीं पा रहे थे विदेश जाकर अतः मैंने स्वीकार कर लिया परम सत्य को की मई भी एक गोरा हूँ उन्ही गोरों की तरह जिन गोरे को आपने भगाने का बिगुल फूंका पर अंतर केवल इतना है की वे ठन्डे जलवायु में रहते हैं और मई गरम जलवायु में। लेकिन मै त्रिदेव और तिरंगे (वैसे अति गौंड चौथा भी रंग जरूर है हनुमान वाला) पूर्ण रूप से समर्पित हूँ और सनातन सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म के जन्मदाता देश का वाशी हूँ। अतः यह भी मनवा दिया गोर लोगों से की तिरंगा==त्रिदेव=त्रिमूर्ति विश्व विजयी हैं यह भारत की सीमा के अन्दर भले फहराया जाता है दिखलाने के लिए।---------------अब मुझे कुछ नहीं कहना है इस संविधान और अन्य किशी गूंध विषय में क्योंकि सभी संसार को चलाने के लिए बने हुए हैं और कुछ अपवाद हो जाते हैं पर संविधान का सम्मान कीजिये जहां तक हो सके सब ठीक होगा आज नहीं तो कुछ समय बाद ही सही पर समय का मूल्य भी आप को मिलेगा अगर देरी हुई तो इस्वर=परमात्मा=अल्लाह=गॉड देगा इस्वर द्वारा।जय हिन्द(इरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बूद्वीपे), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


अच्छा होता की कानून बनाने वाले तथा उनके परिवार के विदेश में बैठे लोग; और उनको अपना आराध्य और प्रेरणाश्रोत मानने वाले और उनके विदेश में बैठे लोग; तथा इसके साथ कानून की रोटी खाने वाले और उनके परिवार के विदेश में बैठे लोग खुद कानून का अक्षरसह पालन करते तो हमें उसका पूर्णतः पालन में और ख़ुशी होती| My first Guru who is my maternal uncle also keeped us away forever from his shadow in his early age but his lesson VIJAYEE VISHV TIRANGA=TRIDEV=TRIMURTI pyara jhanda uncha rahe hamara is justified by our best deed from PRAYAG this WILL CERTAINLY GIVE PEACE TO HIS SOUL.


• A feeling of sympathy and sorrow for the misfortunes of others was in Sanatan Hindu Religion even before the Gautam Budhdha i.e. Sidhdharth’s bith: The first poem of the literature i.e. of Valmiki is the real example of this which was originated at River Bank of “TAMSA” in presence of his disciple Bharadwaj. Vālmīki was going to the river Ganges for his daily ablutions. A disciple by the name Bharadvāja was carrying his clothes. On the way, they came across the Tamasa Stream. Looking at the stream, Vālmīki said to his disciple, "Look, how clear is this water, like the mind of a good man! I will bathe here today." When he was looking for a suitable place to step into the stream, he saw a Crane (bird) couple mating. Vālmīki felt very pleased on seeing the happy birds. Suddenly, hit by an arrow; the male bird died on the spot. Filled by sorrow its mate screamed in agony and died of shock. Vālmīki 's heart melted at this pitiful sight. He looked around to find out who had shot the bird. He saw a hunter with a bow and arrows, nearby. Vālmīki became very angry. His lips opened and he uttered the following words: मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥' Meaning: You will find no rest for the long years of Eternity, For you killed a bird in love and unsuspecting. Emerging spontaneously from his rage and grief, this was the first śloka in Sanskrit literature. Later Vālmīki Muni composed the entire Rāmāyaṇa with the blessings of Lord Brahmā in the same meter that issued forth from him as the śloka. Thus this śloka is revered as the "first śloka" in Hindu literature. Vālmīki Muni is revered as the first poet, or Ādi Kavi, and the Rāmāyaṇa, the first Kāvya. His first disciples to whom he taught the Rāmāyaṇa were Kuśa and Lava, the sons of Śrī Rāma.whole Ramayana given voice as poem first publicly by Lav and Kush in front of Public of Ayodhya (Kingdom of Kosal~Saket) in presence of all the family members and Gurus of Shri Ram. Even after listening the all Gaurav Gatha of his own by his recognized son, Shri Ram not ready to accept SITA and his son Lav and Kush without giving AGNI PARIKSHAA by Sita again. Although it can be justified for a King who sacrifice his own relation for satisfaction of people of his kingdom but in personal life of SITA the second AGNI PARIKSHA is not a best judgment if once it given for purity of her soul.


दुनिया के हर तरह के आदमी के लिए कश्यप गोत्र प्रथम पनाह दाता है सनातन धर्म में अतः भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगुलुरु 2007 से लेकर आज तक हर किशी सामाजिक स्थान और सामाजिक मीडिया पर जो व्याख्यान दिए गए और लेख लिखे गए है पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, रास्ट्रीय और अन्तार्रस्त्रिय स्तर पर इसके दुरुपयोग न हो इस सब को ध्यान में रखते हुए मै अपने को सीमित करता हूँ मानवता के कल्याण के लिए न की किशी व्यक्ति, व्यक्ति समूह, राजनैतिक संस्था या किशी संविधान के डर से। क्योंकि मानव कल्याण ही मेरा उद्देश्य था और वह अब काफी हद तक पूरा हो गया है और मै अपना सन्देश भी दे चुका हूँ मानवता को आगे ले जाने वालों के लिए अतः मै इस बात के साथ अपनी वाणी को विराम देना चाहता हूँ की "दया धर्म का मूल है और दया मजबूत ही को ज्यादा शोभा देती है अतः कोई धर्म चाहे ब्राह्मण धर्म हो, चाहे क्षत्रिय धर्म हो, चाहे वैश्य धर्म हो या सनातन धर्म से उपजे जलवायु आधारित धर्म में से हिन्दू धर्म हो, इस्लाम धर्म हो, या इसाई धर्म हो कोई नहीं कह सकता की व्यापक परिद्रिस्य को देखते हुए यदि सामाजिक, धार्मिक, रास्ट्रीय और अन्तार्रस्त्रिय हित को कोई चोट न पहुँचती हो तो दया न की जाय और सायद इसी लिए बहुत से लोग "सत्यमेव जयते" के स्थान पर "सत्यम शिवम् सुन्दरम" को अच्छा मानते हैं क्योंकि यह देर सवेर "सत्यमेव जयते" पर अंत में पहुंचा ही है क्यंकि इसमे भी सत्य के प्रति अभीस्थ आस्था है लेकिन व्यावहारिक परिस्थितिया और भूत-भविष्य के साथ दया का भी मिश्रण इसमें होता है"। मैंने 87.5%=गोरे और 12.5%=कुर्म अवतारी का अनुपात भी स्वीकार लिया है स्वयं के भी एक गोरे होने के साथ पर जलवायु और संस्कृति और पारिवारिक संस्कार की भिन्नता के साथ पर यह दबाव में नहीं कटु सत्य के स्वीकारते हुए लेकिन भारतीय समाज एक गोरे और कुर्म अवतारी का मिश्रण है यह भी स्वीकार किया है जिसमे उत्तर में ज्यादा गोर और दक्षिण में ज्यादा कुर्म अवतारी लोग पाए जाते हैं वह तब जबकि मेरे परिवार और रिश्तेदार में कुर्म अवतारी 12.5% के अनुपात में अवस्य है। ----------यह सब तथ्य मै न लिखा होता अगर मुझसे विश्व का सबसे बड़ा सत्य जिसे मै परिवार और गुरुजन के अनुकूल संस्कृति और संस्कार के समाज में नवनिर्माण में भाग लेने के लिए और उनके सम्मान को बचाए रखने के लिए तिलांजलि दे दी थी ऐसे में मेरी क्षमता और पुरुषार्थ पर व्यंग न किया गया होता| • इस्लाम सामानांतर चलता है राम मार्गी के और इसाययत चलती है कृष्ण मार्गी के यह अकाट्य सत्य है सनातन धर्म से उपजे सभी धर्मों का। जहा राम मार्गी तथा कृष्ण मार्गी दोनों हिन्दू धर्म का चरमोत्कर्ष है। क्योंकि हर पांच साल पर यहाँ युग बदलते हैं तो मौलिक नियमों के अतिरिक्त जो समकालीन नियम हैं उनको भी समय के साथ बदने की जरूरत होती है। उस बात के लिए मै कुछ नहीं कर सकता जिसमे संवैधानिक प्रणाली का दोस हो और जो दोस संविधान में आमूल चूल परिवर्तन न सही परन्तु जो कुछ भूतकालीन परिस्थिति को देखकर बना था पर वर्तमान परिस्थिति में परिवर्तित हो चुका हो और भविष्य में पुनः नयी चुनौतियों का सामना उससे न किया जा सके और जो सामाजिक सौह्र्द्र के लिए जो जरूरी हो वह परिवर्तन कर देना चाहिए: अन्यथा संविधान के सहारे यदि किशी वर्ग विशेष का नुकशान होता है तो वह नुकशान उठाने वाला वर्ग क़ानून की कमजोरियों का अपने हित में फायदा उठाएगा और आज भारत में यही हो रहा है जिसे कोई पार्टी या सामाजिक संगठन दूर नहीं कर सकता जब तक वर्तमान वास्तविक सच्चाई पर आधारित यम-नियम (संविधान) नहीं होगा क्योंकि हर पांच साल पर यहाँ युग बदलते हैं तो मौलिक नियमों के अतिरिक्त जो समकालीन नियम हैं उनको भी समय के साथ बदने की जरूरत होती है। श्रीमद्भागवत अध्याय दस-नौवा श्लोक: रूप (वाह्य और आतंरिक स्वरुप किशी व्यक्ति या वास्तु का) , रस (रस के विभिन्न प्रकार का अलग अलग प्रभाव ), स्पर्श ( स्नेहिल या खुरदरा या अन्य के विभिन्न प्रकार का अलग अलग प्रभाव) , गंध (गंध के विभिन्न प्रकार का अलग अलग प्रभाव ), स्वर-छंद ( ध्वनि: सुमधुर या कर्कस के विभिन्न प्रकार का अलग अलग प्रभाव) जैसे पांच वस्तुओं से मानव देह और देह रूपी संसार प्रबह्वित होता ही है अतः इनमे संतुलन बनाये रखना अति आवश्यक है मतलब समाज (संसार) और शरीर को वाह्य या आतंरिक नियंत्रण द्वारा संतुलित रखा जाना चाहिए। अध्याय एक-41वां श्लोक वर्ण संकर का उल्लेख है और इससे सम्बंधित अन्य विवरण 47 श्लोक तक। अध्याय दो में इसका निराकरण दिया है परमब्रह्म श्री कृष्ण द्वारा (केवल श्री कृष्ण नहीं वरन परमब्रह्म श्री कृष्ण) जिसे विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया गया है यह एक माया जनित व्यक्ति द्वारा सत्य और एक परमब्रह्म (जिसकी दुनिया में न कोई जन्म लेता है और न मरता अपितु विभिन्न प्रकार का कर्म करता हुआ अपना संसार में तैर रहा होता है) के सत्य का विसद वर्णन है अतः दोनों अपने अपने स्थान पर सत्य है।|*******जय हिन्द (इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीपे), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


मै वसिस्थ गोत्रीय दादी के मायके में केवल जन्म लिया हूँ अतः व्यास/परासर (जो वशिस्थ के वंसज थे) द्वारा संकलित चारों वेद और वेदांत के रूप में जाने जाने वाले श्रीमद्भागवत गीता से ज्यादा कुछ नहीं बता सकता। कुर्म अवतारी स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसे ब्राह्मण के सर्व्श्रेस्थ शिष्य और शूर्य के सामान आभा और गोरे-चमकीले शिष्य स्वामी विवेकानंद ने स्वयं कहा था की श्रीमद्भागवत गीता एक सम्पूर्ण विज्ञान और संसार का सार है जिसे जीवन में उतार कर न केवल अपना अपितु हम विश्व का कल्याण कर सकते हैं। अतः मै पुनः आप सभी से निवेदन करूंगा की उस युग में जब मेरे जैसे लोग एक ब्राह्मण का जीवन जी सकते हैं तो आप भी श्रीमद्भागवत गीता का अनुसरण करके देखियेगा तो पाइयेगा की आप का भी एक ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का जीवन जीना कोई विशेस कठिन नहीं है और तब आप को अनुभूति होगी की सनातन धर्म छोड़ना विवसता हो सकती है किशी की पर एक बहुत बड़ी गलती है यह।*******जय हिन्द (इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीपे), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण। चलते चलते एक प्रश्न छोड़ जाता हूँ की परशुराम ने राजा दसरथ का वध क्यों नहीं किया था अगर पृथ्वी पर से क्षत्रिय राजाओं को मिटा दिया था उन्होंने तो? क्या खेल है कश्यप ऋषि का जो दसरथ हुए थे और श्री राम कश्यप गोत्रीय हो गए जिनसे? दुनिया की कोई आदि देवी या कोई आदि देव (मतलब त्रिदेव ब्रह्म विष्णु और महेश भी) अकारण एक ब्रह्मचारी ब्राह्मण बालक की ह्त्या क्यों नहीं कर सकते? किशी दैत्य की क्या अवकात की वह ऐसे बालक की ह्त्या कर बच जाए? कारन: कश्यप ऋषि (जिनका केंद्र बिंदु कश्मीर है प्रयाग के बाद) के कहने पर परशुराम क्षत्रियों का नरसंहार बंद किये थे और उनके आज्ञा मान अज्ञात वास पर चले गए पहाड़ों पर लेकिन जाने से पहले वर्तमान गुजरात (पश्चिमी घाट के क्षेत्र), महारास्त्र (मराठवाडा), गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु (द्रविण) और केरल (मलय प्रदेश) समेत पूरा दक्षिण भारत कश्यप गोत्रीय ब्राह्मणों को शासन करने के लिए दे दिए थे। जैसा की विदित हो भगवान् श्रीराम भी कश्यप ऋषि (दसरथ) की ही संतान थे तो उनको अपना श्रेष्ठ समझ अपने पास रखे शिव धनुष को प्रदान करते हुए उनका सम्मान किये और श्री कृष्ण भी कश्यप ऋषि अवतार (वाशुदेव) को द्वापर में सुदर्शन चक्र से सम्मानित कर अपने से श्रेष्ठ और उत्तराधिकारी होने का गौरव प्रदान किया थे। और आप को बताना नहीं होगा की ये परशुराम स्वयं सप्तर्षि-भृगु ऋषि (जिनसे भृगु वंश=भृगु गोत्र ) के पौत्र और जमदग्नि ऋषि और रेणुका के पुत्र थे जिनको एक अहंकारी क्षत्रिय राजा ने अपनी गलत् बात माने से इंकार करने पर प्राण ह्त्या की थी। परसुराम के धनुर्विद्या में श्रेष्ठतम शिष्य गंगापुत्र देवब्रत (भीष्म पितामह) और द्रोणाचार्य हुए थे वैसे कर्ण ने भी शिक्षा ली थी और वह भी महान योद्धा था पर अपने को ब्राह्मण बता कर शिक्षा ली थी उसने अतः वह विद्या उसके अंतिम समय काम न आयी पर सबसे बड़ा दानी होने का गौरव उसे हाशिल हुआ है राजा बलि की तरह। अंत में यह कहना चाहूंगा की ऐसे कश्यप के लिए वशिष्ठ और गौतम का मान-सम्मान रखना अपने प्राणों से भी ज्यादा प्रिय है क्योंकि ये समाज में कोई अनीति करने की सोच भी नहीं सकते।


मै अपने स्वाध्याय पर और प्रमाणिक ग्रंथों से लिखा हूँ हर लेख और उसके विरोध में खड़े भारत के ही नहीं विश्व के किशी भी न्यायालय के उच्चतम न्यायाधीश को परास्त कर सकता हूं पर व्यवस्था में सहयोग मेरा दायित्व है क्योंकि आने वाली सन्तति हम लोगों से ही पाती है अतः इस विश्व व्यवस्था के सहयोग में समर्पित हूँ मतलव व्यवस्था फिर भी नहीं संभाली तो दुर्वाषा और महादेव को पुनः कस्ट कर उथल पुथल करना पड़ जाएगा जो अभी एक दसक से कुछ ही पहले की स्थिति से भी भयंकर रूप ले सकता है। सनातन हिन्दू धर्म ही सभी धर्मों का केंद्र है यह मुझे अब सिध्ध करने की क्या जरूरत जब विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने पहले ही सिध्ध कर दिया है उस स्थान पर जो इस समय अपने को विश्व शक्ति कहता है। *******जय हिन्द (इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीपे), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण। The Shrimad Bhagavad Gitã Arjuna Vishad Yoga (Part 3): Written By: Sadhu Bhadreshdas, Ph. D., D.Litt. and also read Bhagavadgītā related facts By Braja Dulal Mookherjee - 2002 . It is transition stage of the world society and Maharshi Yogi and other Swamis effort to establish Vaidik University and Vaidik Centrs in almost all part of the world is praise worthy in which some are in functioning. I have satisfied most of the Tamil Young Doctorate and Graduate within 2 year stay at IISc Bangalore where are majority of Tamil and his co-group Adhra.This was Kurmavatari dominant area. I give its credit to my Gotra Kashyapa, Mother's Gotra Gautam and Dadi's Gotra Vashistha and cret to also other Durvash/Atri and Jamadagni/Bhrigu for permanent residence in Azamgarh and Jaunpur, to Bharadwaj for Prayag residence as student and to Kausik (Vishvamitra) for residing and Indian National. and one interesting thing is IISc/Karnataka/Tamil/Malay(Keral) is itself place of eight Rishi's Kumbhaj (Agastya) generated by all seven rishis. (Note all seven Rishi generated at Prayag=Allahabad=Place of God or Allah or Paramatma but only Bharadwaj Rishi made it his own residence like GANESH near Kailas. Mere Graduation tak ke sabase priya aur nisthavan guru Kurmavatari hee the aur ve chahe jis Jati-Dharm se rahe hon meraa sthaan unake charanon me he rahegaa jahaan kaheen bhee ve milenge aur Mere Intermediate ke guru mere maam bhee hain mai unako dooari shreni me rakhataa hoon par maths ke Intermediate and High School ke "Varma ji" Guru ji ne mujhase Engineer ya Doctor hone ki aasha nahee kiye the varan ek poorn Manav banane ki aasha mukjhase vyakt kiye the atah mai Kishi bhee Prakar apane ghar se lekar vishv ke kishi bhee sthan ke Kurmaavatari se dwesh nahee kar saktaa par mai GORE aur KURMAAVTARI se asha karataa hoon ki race ki ladayee mat karo kyonki yah prakriti ke haanth me hai aur yah conserev rahegaa is sansar ko SUndar banane ke liye aur vaigyanik roop se har manav ko niyantriy rakhane ke liye.


गर्ग, गौतम और शांडिल्य द्वीतीय क्रम में शुध्धता की श्रेणी है गोत्रों में पर प्रयाग में उत्पन्न गर्ग भारद्वाज ऋषि की शिष्य परम्परा के व्यूत्पन है और कश्मीर उत्पन्न शांडिल्य कश्यप और वाशिस्थ के व्युत्पन है अतः सप्तर्षियों में आज भी गौतम शुद्धता में सर्व श्रेष्ठ और सर्व पूज्यनीय है। 24 मन्वान्तर ऋषि (अशोक चक्र की एक तीली) जो गायत्रीमंत्र के उपासक है जिसमे कौशिक (विश्वामित्र) प्रथम और याग्वाल्क्य चौबीसवे ऋषि है के संयोग से बने 24 तीलियों वाले अशोक चक्र (जिसे समय चक्र, धर्म चक्र, समता मूलक चक्र कहते है) का निर्माण होता है जिसे बौध्ध धर्म में धम्म चक्र भी कहते हैं और अपने आसमानी रंग के साथ यह तिरंगे=त्रिमूर्ति=त्रिदेव के मध्य भाग में शुभ्र=सफेद (त्याग और पवित्रता का प्रतीक) रंग के साथ केसरिया (बलिदान का प्रतीक) और हरा (समृध्ध और उद्यम का प्रतीक) के बाच आसन पाता है। अतः गायत्री जिसे सविता या शूर्य की पत्नी या कुछ लोग सूर्य की आभा कहते हैं के उपासक है हम मतलब हम उस शूर्य के उपासक है जिसमे अथाह ऊर्जा है और वह शूर्य केवल और केवल परमब्रह्म हो सकता है जो अत्यंत शूक्ष्म रूप (निराकार) में भी जितने भी शूर्य मंडल है उनका निर्माण कर सकता है। श्रीमद्भागवत अध्याय एक-41वां श्लोक वर्ण संकर का उल्लेख है और इससे सम्बंधित अन्य विवरण 47 श्लोक तक। अध्याय दो में इसका निराकरण दिया है परमब्रह्म श्री कृष्ण द्वारा (केवल श्री कृष्ण नहीं वरन परमब्रह्म श्री कृष्ण) जिसे विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया गया है यह एक माया जनित व्यक्ति द्वारा सत्य और एक परमब्रह्म (जिसकी दुनिया में न कोई जन्म लेता है और न मरता अपितु विभिन्न प्रकार का कर्म करता हुआ अपना संसार में तैर रहा होता है) के सत्य का विसद वर्णन है अतः दोनों अपने अपने स्थान पर सत्य है। A person related with all Seven Rishis have itself characteristics of eighth Rishi, Agastya=Kumbhaj Rishi (who generated by all seven rishi). I am Kashyap by heredity, related with Durvasa/Atri place Azamgarh, remained most of life in Jamadagni/Bhrigu place Jamadagnipur=Jaunpur, Mother from Gautam Gotra, Dadi from Vashisth Gotra and also born in hous of her father, my all four Mausis=Second mothers are of Bharadwaj Gotriy in Sasural, and nationality is Indian means place of Vishvamitras and Menaka's grandson Bharat's Aryavart=Akhand Bharat now only Bharatvarsh. Thus a person belonging from Gautam, Vashisth, Kashyapa, Bharadwaj/Angarisha, Bhrigu/Jamadagni, Durvash/Atri and Vishvamitra(Kaushik) means a person related with all Seven Rishis have itself characteristics of eighth Rishi, Agastya=Kumbhaj Rishi (who generated by all seven rishi).


Like Agastya (Kumbhaj) Rishi of Malay/Kerala/Tamil I will be (a common man not a rishi) available for you (humanity) because I also belongs from all seven Gotra like him if I counts my four Mausis (as called hers gotra in her sasural: Mausi is called second mother) having all four of Bhardwaj Gotra. At the end in according to Swami Vivekananda I request you to, either follow Ramayana/Ramacharit Manas or Srimadbhagvata Geetaa in your life and if you want to know more then you can follow both.---------- Life on the earth is shadow of PARAMBRAHMA=GOD=PARMATMA=ALLAH in which he takes a part to govern it.


गीता में कहा है कि परधर्मान्‍तर की बात भूलकर स्वधर्मान्‍तर पालन में ही मर मिटना श्रेयस्कर है-'स्वधार्मे निधानं श्रेय: परवर्मो भयावह:' (अ. 3, श्लो. 35)।---OR-----गीता ने तो स्वधर्मान्‍तर को भी छोड़ केवल स्वकर्म को ही कल्याण का साधन माना है-'स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिध्दिं लभते नर:।' (18/45) और यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ (9/27)| --श्रीमदभागवत में भी कहा है कि स्वधर्मान्‍तर पालन ही भगवान् की अराधना है। यह स्वधर्मान्‍तर पालन ही पापपुंज को जला देता है-'स्वधर्मान्‍तर आराधानमच्युतस्य यदीहमानो विजहात्यघौघम्' (5/10/23)। अपने प्रतिदिन और प्रतिपल के मामूली कामों पर भी कड़ी नजर रखो। ये काम ही भगवान् की पूजा हैं। इन्हीं से निस्तार होगा। ईमानदारी और सच्चाई से किया गया हरेक काम अराधना है, साधाना है, तपस्या है। इसी से कल्याण होगा। फिर धर्मान्‍तर सम्प्रदाय का झगड़ा कैसा? असली वेदान्त: सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दु:खभाग् भवेत्॥ ---------पण्डिता: समदर्शिन:'। 'निर्दोषं हि समं गता' आत्मौपस्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन॥--'आत्मवत्सर्वभूतेषु य: पश्यति स पण्डित|



Truth, Justice & Peace i.e. Satyamev Jayat is the MOTTO of the Jamboo-Dweep situated Bharatkhand(Akhand Bharat)|

मै इस बात पर अभिमान नहीं बल्कि गर्व महसूस करता हूँ की मै कश्यप गोत्र से हूँ और उसमे भी सनातन ब्राह्मण हूँ जिसमे किशी भी सांसारिक और शास्त्रीय नियम को तोड़ कर नियमतः समाज से अलग किये गए व्यक्ति के लिए सनातन धर्म में पुनः लौटने का अवसर प्रदान करता है। इसके साथ ही साथ यह बताना चाहूंगा की श्री राम और श्री कृष्ण समेत अधिकांश विष्णु अवतार इसी गोत्र में हुए हैं अतः इन नव आगंतुकों से यही निवेदन है की आप सबसे पहले श्री राम और श्री कृष्ण के अनुरूप व्यव्हार करें और उसके बाद अन्य गोत्रों में प्रवेश कीजिये अन्यथा कोई आप को स्वीकार नहीं करने वाला है केवल गोत्र का नाम अपने उपनाम से जोड़ने पर (मतलब कश्यप गोत्रीय हिन्दू के मार्ग से ही आप अपने उच्च कर्म द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इसके बाद अंतर्गोत्रिय विवाह द्वारा आप अन्य गोत्र जैसे गौतम, वशिस्थ, भरद्वाज/अन्गारिषा, भृगु (जमदग्नि/परशुराम), अत्रि (दुर्वाषा)), कौशिक (विश्वामित्र), और अगस्त्य आदि तक पहुँच सकते हैं)। इस बात को किशी भी जाती के विद्वान् जो पंडितों का काम विदेश में करते हों उनसे और ग्रामीण पुरोहितों से भी आप ज्ञात कर सकते हैं न की केवल प्रयाग(काशी) के प्रकांड ब्राह्मण विद्वान से ही। इसी लिए मै समभाव में व्यवहार करने पर विश्वाश रखता हूँ न की भय वस् प्रेम स्वीकार है मुझे और इसी लिए कश्यप गोत्र को त्रिवेणी (प्रयाग) के सामान विश्व का सबसे बड़ा संगम कहा हूँ विभिन्न धर्म और जातियों का जो सनातन हिन्दू धर्म में या तो सनातन रूप से है या अन्य धर्म से होते हुए सनातन हिन्दू धर्म से आये हैं या आते हैं। इस प्रकार इस गागर में सागर समाने वाले अंदाज में विश्व के समस्त धर्म और उन धर्मों से उपजे समस्त जातिओ को सादर नमस्कार करता हूँ और सत्कर्म के लिए उनको प्रेरित करता हूँ उस युग में जब विश्वबंधुत्व स्थापित हो गया है और ऐसे में अपने मूल्यों, संस्कारों और अपनी संस्कृति को उसमे समुन्नत बनाये रखना एक चुनौती हो गया हो। लेकिन याद रहे की स्थिर समाज में ही संविधान और यम नियम को परिभाषित किया जा सकता है और कार्य में पूर्णतः परिणित किया जा सकता है पर समाज जब टूट रहा हो व्यक्ति के निजी अस्तित्व या तो खतरे में हों या अस्तित्व को ही मिटा दिया गया हो तो यम-नियम और संविधान के अनुरूप उससे कार्य करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। अतः विश्व बंधुत्व के साथ-२ रास्ट्रीय अस्मिता भी सुरक्षित रखना हमारा प्रथम कर्त्तव्य है। अतः तरह से जिस तरह हम नव निर्माण तभी करना चाहते है जब हमारे पुराने निर्माण का समुचित प्रयोग हो रहा हो उसी तरह हम विश्व पटल पर हम चुनौती अगर प्रस्तुत कर रहें हों तो हमारा अपना रास्त्र भारत स्वयं एक मजबूत रास्त्र पहले होना चहिये।*******जय हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बूद्वीपे)), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण|


कलिप्रथम चरणे-------जम्बूद्वीपे (=)--भरतखण्डे(=) भारतवर्षे -----ब्रह्म पुराण, अध्याय 18, श्लोक 21,22, 23 में यज्ञों द्वारा जम्बूद्वीप की महानता होने को प्रतिपादन है-


ब्रह्म पुराण, अध्याय 18, श्लोक 21,22, 23 में यज्ञों द्वारा जम्बूद्वीप की महानता होने को प्रतिपादन है- तपस्तप्यन्ति यताये जुह्वते चात्र याज्विन ।।
दानाभि चात्र दीयन्ते परलोकार्थ मादरात्॥ 21॥
पुरुषैयज्ञ पुरुषो जम्बूद्वीपे (1) सदेज्यते ।।
यज्ञोर्यज्ञमयोविष्णु रम्य द्वीपेसु चान्यथा॥ 22॥
अत्रापि भारतश्रेष्ठ जम्बूद्वीपे (2)| महामुने ।।
यतो कर्म भूरेषा यधाऽन्या भोग भूमयः॥23॥

अर्थ- भारत भूमि में यदि लोग तपश्चर्या करते हैं, यज्ञ करने वाले हवन करते हैं तथा परलोक के लिए आदरपूर्वक दान भी देते हैं जम्बूद्वीप में सत्पुरुषों के द्वारा यज्ञ भगवान् का यजन हुआ करता है ।। ----यज्ञों के कारण यज्ञ पुरुष भगवान् जम्बूद्वीप में ही निवास करते हैं ।। इस जम्बूद्वीप में भारतवर्ष श्रेष्ठ है ।। यज्ञों की प्रधानता के कारण इसे (भारत को) को कर्मभूमि तथा और अन्य द्वीपों को भोग- भूमि कहते हैं|

श्री दुर्गा पूजनं में जम्बूद्वीप की महानता होने को प्रतिपादन है: ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे-------जम्बूद्वीपे (=)--भरतखण्डे(=) भारतवर्षे ---------(अपने नगर/गांव का नाम लें) पुण्य क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2068, तमेऽब्दे क्रोधी नाम संवत्सरे उत्तरायणे बसंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे चैत्र मासे शुक्ल पक्षे प्रतिपदायां तिथौ सोम वासरे (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया- श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं श्री दुर्गा पूजनं च अहं करिष्ये। तत्पूर्वागंत्वेन निर्विघ्नतापूर्वक कार्य सिद्धयर्थं यथामिलितोपचारे गणपति पूजनं करिष्ये।

• कहा गया है महिमा घटी समुद्र की रावन बसा पड़ोस तो उसी तरह जो विश्व शक्तियां भारत जैसे देश में रावण जैसा अपना अभिकर्ता(एजेंट) पालेंगी अपनी साख को विश्व में बनाये रखने के लिए उसकी (उस विश्व शक्ति की) मर्यादा का दमन दुर्वाषा और महादेव के माध्यम जारी रखा जाएगा ऐसा विचार कर श्रीराम और श्री कृष्ण विरोधी कार्य जाल उनके एजेंट बुने। मेरे लिए रास्त्रवाद विश्व बंधुत्व से पहले आता है और वह विश्वबंधुत्व जो रास्त्र वाद से परे हो उसे स्वेक्षचारी और स्वार्थी व्यक्तित्व प्रोत्शहित करते हैं। अतः मेरी तरह लोग जाती(धर्म) से वर्ण संकर नहीं तो कम से कम कर्म से वर्ण संकर बन रहे हैं । -फिर भी पूरी दुनिया में एक समान संवैधानिक व्यवस्था बना दी जाय तो मई दिखा दूंगा की पूरी दुनिया ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य है या इनका मिश्रित स्वरुप है---यही है तिरंगा=त्रिदेव=त्रिमूर्ति का चमत्कार। If people keep remember that Islam works parallel to Ramaism (Foot print of Shri Ram’s life) and Christianity works parallel to Krishnaism (Foot print of Shri Krishna’s life) then there will be no communal violence in India and world between these climates based (from the geographical region where they originated) religions. Thus existence of Hindus itself becomes important for the existence of the humanity.


क्या कोई इस बात पर कभी विचार करता है की रावन जैसा विद्वान ब्राह्मण राक्षस आज भी कहा जाता है अपने बुरे कर्मों की वजह से ही। बात सभ्यता, संस्कृति और पारिवारिक संस्कार के संरक्षण की है वर्ण संकर, अंतरजातीय और अंतर्धार्मिक में क्योंकि सभ्यता, संस्कृति और पारिवारिक संस्कार का कोई मूल्य नहीं होता है और कोई उद्योगपति इसे सीधे प्राप्त नहीं कर सकता अपने पुरुस के बल पर। हो सकता है की मै ही वर्ण संकर हूँ पर सामाजिक व्यवस्था (जो ठहरे हुए जल के सामान है और जिस एक मात्र ठहरे जल में ही कमल खिल सकता है मतलब संस्कारयुक्त पौध तैयार की जा सके) ही पर जो कुठाराघात करे तो वह गलत तो गलत ही होता है न और हाँ मै कर्म से वर्ण संकर हूँ एक गृहस्थ ब्राह्मण के घर का होने के नाते सभी काम उतना किया हूँ जितना की एक पढ़ाई करने वाला किशी दलित का लड़का भी न किया हो (हुया न एक वैश्य: उद्यमशील-पोसक ); भारतीय सैन्य सेवा दल (एन सी सी) थल सेना में तीन ज़ोन (आजमगढ़-जौनपुर (वाराणसी) -मिर्ज़ापुर) को अंक और शरीक परिक्षा के आधार पर प्रथम स्थान है मेरा (हुआ न क्षत्रिय:रक्षा-सुरक्षा और विनासक) ; और आज अल्लाहाबाद (प्रयाग) विश्वविद्यालय में शिक्षक हूँ (ब्राह्मण हुआ न: ज्ञान दाता, समाज से सुचिता और पवित्रता का परिचायक)) पर मई खुद जनता हूँ की सामान्यतः मुझे ब्राह्मण कह दिया जाता है जाती धर्म के नाते पर मई अपने को स्वयं एक पूर्ण ब्राह्मण नहीं पाता क्योंकि ब्राह्मण की सहन सीमा मुझसे भी कई गुना ज्यादा होनी चाहिए। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है की ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने-अपने क्षेत्र में भी एक दूसरे का सहयोग बहुत कम करने हैं अतः मेरी तरह लोग जाती(धर्म) से वर्ण संकर नहीं तो कम से कम कर्म से वर्ण संकर बन रहे हैं मेरी तरह। -------फिर भी पूरी दुनिया में एक समान संवैधानिक व्यवस्था बना दी जाय तो मई दिखा दूंगा की पूरी दुनिया ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य है या इनका मिश्रित स्वरुप है--------यही है तिरंगा=त्रिदेव=त्रिमूर्ति का चमत्कार। अगर किशी को अर्जुन के वर्ण संकर शब्द पर आपत्ति है और कृष्ण के शब्दों पर विश्वास है तो वे वर्ण संकर शब्द पर आपत्ति नहीं व्यक्त किये थे वरन वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सब्द का प्रयोग किये हैं और मेरे विचार से अपने दीर्घ कालिक समाज विरोधी कार्यों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही शूद्र बनते हैं किशी वाह्य दुनिया से नहीं आते हैं और आज के सम्बन्ध में विशेष रूप से किशी जाती विशेष को आप शूद्र नहीं कह सकते हैं मतलब सभी वर्गों के अमानवीय कार्य करने वाले शूद्र कहलाने के पात्र हैं जो दीर्घ कालिक अच्छे कर्म से इस शब्द की सीमा से बहार आ सकते हैं। क्या कोई इस बात पर कभी विचार करता है की रावन जैसा विद्वान ब्राह्मण राक्षस आज भी कहा जाता है अपने बुरे कर्मों की वजह से ही जबकि शूद्र तो केवल समय बध्ध और मानवीय समाज का शब्द है|*******जय हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बूद्वीपे)), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण|


{I was first ranked student in my class and out side my class till graduation and one never find me second class in practical. I have now a perfect satisfactory life status and family condition. I request all teachers to not miss behave with any of your student in his/her theory/practical marks on any ones interests because you may be God for him for particular time interval but not for all time). My Intermediate score 57% (Massive human revolution for Uttarakhand is responsible for this in which only one student any how crossed border of 60%) and M.Sc. score 59% (regional political enmity played a role while practical examiner indirectly declared excellent in practical by his praise) from Banaras Hindu University is not my real number but if I ultimately accepted it due to social responsibility then social, moral, cultural, national and family values should be made conserved by the people responsible for these marks obtained by me in examination and also they should also accept their present surrounding condition and status now.


• रावन के भाई अहिरावन का राज्य क्षेत्र मतलब पाताललोक (वर्तमान में वह देश है जो सर्वोच्च शक्ति है जैसा की शास्त्रों के अनुसार और वर्तमान भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार है) जिस पर हनुमान ने विजय अपने पुत्र मकरध्वज (अहिरावन के द्वारपाल) से उसके दुर्ग को भेदने की गुप्त जानकारी मिलने के बाद ही पायी थी और इस प्रकार राम और लक्षमण को उसके बंधन से मुक्त कराया जो बंधन तोड़ना राम और लक्षमण के लिए धर्म विरुध्ध था। जिसमे ज्ञान के साथ-साथ नैतिक चरित्र, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता और विनम्रता होती है वह ज्यादा शक्तिशाली होता है यदि अवश्यक आवस्यकता में बाधा नहीं पहुँच रही हो तब अन्यथा नंगे शरीर रहने वाले और पेट को भरने की भी रोटी जिसे न मिलाती हो उसे संस्कार और सभ्यता का उपदेश सही नहीं लगता है। रावन श्रीराम से हर मामले में श्रीराम से आगे था चाहे वह ज्ञान, विज्ञान, पुरुषार्थ हो या धन संपदा और यही नहीं वह त्रिलोकधिपति हो चुका था पृथ्वी लोक के लिए अपने भाइयों और पुत्रों के बल पर; और दूसरे वह ब्राह्मण भी था लेकिन एक सबसे बड़ी शक्ति की अधिकता राम के पास थी वह थी नैतिक चरित्र, संस्कार, संस्कृति और सभ्यता की और सभी देवी-देवताओं और ऋषि मुनियों को इसी से प्रभावित करते हुए आशीर्वाद अर्जित किया अंततः रावन पर विजय पाए|


श्रीमद्भागवत गीता ही स्वयं सिध्ध करता है की अर्जुन भी एक विलक्षण प्रतिभा थे और उनका अपमान एक कायर कह के करना वीरों का अपमान है जिनके ह्रदय में दया का समुद्र होता है: श्रीमद्भागवत गीता में परमब्रह्म बने हुए श्रीकृष्ण (जबकि अन्य सभी प्रसंग (स्थान) पर श्री कृष्ण केवल विष्णु के ही अवतार में थे) का उद्घोस: एको अहम् (ब्रह्म) द्वितियोनस्ति, एकोदेवो सर्वभूतानाम, बीजं मां सर्व भूतानाम": मतलब केवल एक ब्रह्म ही पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है; एक ही देव (मै ब्रह्म) सभी प्राणियों में व्याप्त हूँ; और सभी प्राणियों का मई ही अनादि बीज हूँ मतलव जब से सृस्ती चली है मई ही सभी प्राणियों का जन्म दाता हूँ । और दर्शन का यह स्वरुप भी है "ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या" मतलब इस ब्रह्माण्ड में केवल ब्रह्म ही सत्य है और यह संसार मिथ्या है पर क्या इस मिथ्या (सजीव और निर्जीव) अस्तित्व नहीं होता? हाँ मिथ्या भी अस्तित्व विहीन नहीं होती है वह माया रूपी जगत का सत्य होता है\ अतः श्रीमद्भागवत में परमब्रह्म श्रीकृष्ण अपने ब्रह्म स्वरुप में पूर्ण सत्य थे तो मायाजाल में फंसे अर्जुन अपने स्थान पर सत्य और पंडितों जैसा बचन बोल रहे थे जिसमे केवल एक कमी थी की वह क्षत्रिय धर्म से अलग हटकर बोल रहे थे और उनकी वीरता में कोई कमी नहीं थी और न वे स्वयं को मरने से डर रहे थे वरन वे तो कौरव पक्ष में खड़े अपने सभी सम्बन्धियों लोगों के मरने के अनुमान से दुखी थे। अतः अर्जुन मायामोह में फंसे व्यक्ति का हिस्स्सा थे श्रीमद्भागवत में और उनके तार्किक प्रश्न के बिना श्रीकृष्ण का ज्ञान भी अधूरा होता। अर्जुन को अनेको नाम से कृष्ण ने सुशोभित किया है: कौन्तेय, महाबाहु, धनञ्यज और स्वयं इंद्र की प्रेयशी उर्वशी भी अर्जुन के रूप लावण्य और वीरता से प्रभावित हो विवाह का प्रस्ताव रखती है जिसे अर्जुन उसे माता समान मान (इंद्रा अप्रत्यक्ष अर्जुन के पिता थे) ठुकरा देते हैं और उसके अभिशाप में अर्जुन को अज्ञातवास पूरे समय के दौरान अर्जुन की स्त्री का स्वरुप धारण करना ही पड़ गया। यह उनके आदर्श व्यवहार का प्रतीक है और द्रोणाचार्य के मगरमच्छ वाले घटना की परिक्षा में द्रोणाचार्य के प्राण की रक्षा अपने धनुष कौसल से करना और उनका विनम्र स्वभाव, उनका संस्कार, उनकी सभ्यता और उनकी संस्कृति उनकी वीरता में चारू चाँद लगा देते है।


जिस विकाश से पारिवारिक संस्कार (मानवीय संस्कारयुक्त सन्तति), समाज की सभ्यता और देश (रास्त्र) की संस्कृति यदि संरक्षित हो उसी विकाश की ही सीमा में भारत को विशेष रूप से रहना चहिये क्योंकि की यह अद्यतन(सनातन=ओल्डेस्ट) संस्कृति और सभ्यता का देश है जिसकी उत्पत्ति का केंद्र प्रयाग(काशी) है। जिसमे ज्ञान के साथ-साथ नैतिक चरित्र, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता और विनम्रता होती है वह ज्यादा शक्तिशाली होता है यदि अवश्यक आवस्यकता में बाधा नहीं पहुँच रही हो तब अन्यथा नंगे शरीर रहने वाले और पेट को भरने की भी रोटी जिसे न मिलाती हो उसे संस्कार और सभ्यता का उपदेश सही नहीं लगता है। रावन श्रीराम से हर मामले में श्रीराम से आगे था चाहे वह ज्ञान, विज्ञान, पुरुषार्थ हो या धन संपदा और यही नहीं वह त्रिलोकधिपति हो चुका था पृथ्वी लोक के लिए अपने भाइयों और पुत्रों के बल पर; और दूसरे वह ब्राह्मण भी था लेकिन एक सबसे बड़ी शक्ति की अधिकता राम के पास थी वह थी नैतिक चरित्र, संस्कार, संस्कृति और सभ्यता की और सभी देवी-देवताओं और ऋषि मुनियों को इसी से प्रभावित करते हुए आशीर्वाद अर्जित किया अंततः रावन पर विजय पाय (और इसके साथ ही पुलस्त्य ऋषि (रावण के बाबा=परपिता) के कुल के साथ एक जो राक्षस छल किया गया था पुलस्त्य ऋषि के यहाँ ब्राह्मण भोज में मांश मिला दिया था और जब परोशा गया था तो वही राक्षस ब्राह्मण वेश में इसको ब्राह्मण समूह को बता दिया और जिसके फल स्वरुप ब्राह्मणों का अभिशाप उनके कुल को मिला था सम्पूर्ण कुल को राक्षस हो जाने का और फिर बाद में ब्राह्मणों को जब सत्य से अवगत कराया गया की पुलस्त्य ऋषि को बदनाम करने के लिए किशी अन्य व्यक्ति में भंडारे में जा कर मांश मिलाया था तो वे उस श्राप को कुछ कम कर भगवान् के मानव अवतार से कुल का उद्धार जो सुझाया था वह भी पूरा हो गया जैसा की स्वयं श्रीराम विष्णु अवतार थे ही) | अतः जिसमे ज्ञान के साथ-साथ नैतिक चरित्र, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता और विनम्रता होती है वह ज्यादा शक्तिशाली होता है यदि अवश्यक आवस्यकता में बाधा नहीं पहुँच रही हो तब अन्यथा नंगे शरीर रहने वाले और पेट को भरने की भी रोटी जिसे न मिलाती हो उसे संस्कार का उपदेश और सभ्यता का उपदेश सही नहीं लगता है।*******जय हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बूद्वीपे)), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण|


If one cross borders of classically Hindu rituals and law then if he returns in Sanatan Hindu Dharm gets position first in Kashyap Gotra. And then rise as Vaisya, Kashriya and Brahmins by his good deed and behaviours| In world and even India climatically defined ratio: Parvati's Kali Avtar having 12.5% power and population and Gaur Avtar (Gaura-Parvati) having 87.5% population and power; and Kurm Avtar of Vishnu having 12.5% power and population to other Avtar of Vishnu having 87.5% power and population| सनातन हिन्दू धर्म में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म को सामाजिक तौर पर स्वीकार करने वालों के बीच की सादी भी शास्त्रीय शादी में आती है जबकि स्वधर्म (मतलब ब्राह्मण-ब्राह्मण, क्षत्रिय-क्षत्रिय और वैश्य-वैश्य) सर्व्श्रेस्थ है पारिवारिक संस्कार, सभ्यता और संस्कृति की दृष्टी से और पारिवारिक मजबूती की लिए भी। अन्य शादी में उस जोड़े से निकली संतान सनातन धर्म में सही पर कश्यप गोत्र के चक्रव्यूह में आ जाता है और उसे वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण के रूप में अपने को स्थापित करने के लिए परिक्रमा करनी पड़ती है। All the person having any climatological and geographical based religion who have humanity on this earth is either Brahmin or Kahstriya or Vaisya or of combination of any two or all three but even at a time they are also either Brahmin or Kahstriya or Vaisya. Therefore Brahman Dharm, Kshatriya Dharm and Vaisya Dharm are component of Sanatan Dharm not a caste only. (Sanatan Dharm: from which all climatological and geographical based religion originated)|


पुलस्त्य ऋषि=लंका के वंसज रावण (कश्यप ऋषि के पुत्र मायासुर=मेरठ के दामाद रावन) और कश्यप ऋषि (दसरथ)=अयोध्या=कोसल=साकेत के पुत्र श्रीराम के बीच का युध्ध कितने दिन चलता वैज्ञानिक युग में अगर हम यह मान लें की सप्तर्षियों का प्राकट्य स्थल प्रयाग ही है पर नहीं मानते है तो कम से कम इतना मन लीजिये की हम जिस संस्कार, संस्कृति, सभ्यता को जन्म दे रहे हैं वही हमारी आने वाली पीढ़ी पायेगी तो जब हम सप्तर्षि के ही पुत्र है या त्रिदेव के पुत्र हैं या त्रिदेव के संगम=परमब्रह्म परमेश्वर के ही पुत्र हैं तो धर्म का राज्य और सुराज स्थापित करने के लिए संघर्ष करें न की लोकतंत्र के गलत अर्थ जिसमे सुराज और लोकतंत्र को स्वेक्षाचार मन जा रहा है आज कल उसके लिए संघर्स करें। आप लोगों को यह बताना चाहता हूँ की रावन की एकल पत्नी ही थी और वह अत्यंत ही पतिव्रता और धार्मिक विचार वाली थी जिसका नाम था मंदोदरी। मंदोदरी मायासुर राक्षस की पुत्री थी जो वर्तमान मेरठ पर राज्य करता था और ऋषि कश्यप का पुत्र था (मैंने कई बार कहा है की ऋषि कश्यप के पुत्र केवल देवता, नर, नाग, किन्नर और मानव ही नहीं थे वरन राक्षश भी थे जिसमे से अदिति के द्वारा उत्पन्न पुत्र ही देवता और मानव थे अन्य बहनों [सती-पारवती (शिव) और अदिति (कश्यप ऋषि) को छोड़ दक्ष प्रजापति की बाकी सब कन्याओ से भी ऋषि कश्यप की शादी हुयी थी और कई पुत्र हुए थे अपने पिता मारीच के आज्ञानुसार किये गए विवाह से] बाकी सब उत्पन्न हुए थे। -----------इस प्रकार रावण कश्यप ऋषि का दामाद भी हुआ और उसकी असली शक्ति मंदोदरी हुई अंत्यंत पतिब्रता होने के नाते। --------इधर कश्यप ऋषि भी विष्णु के अनुरोध पर पुनः राजा दशरथ का अवतार लिए थे और श्रीराम के पिता भी थे तो इस प्रकार ये कैसी श्रिंखला बन जाती है अगर हम अपने को सप्तर्षि से जोड़ लें तो।----------पुलस्त्य ऋषि=लंका के वंसज रावण (कश्यप ऋषि के पुत्र मायासुर=मेरठ के दामाद रावन) और कश्यप ऋषि (दसरथ)=अयोध्या=कोसल=साकेत के पुत्र श्रीराम के बीच का युध्ध कितने दिन चलता वैज्ञानिक युग में अगर हम यह मान लें की सप्तर्षियों का प्राकट्य स्थल प्रयाग ही है पर नहीं मानते है तो कम से कम इतना मन लीजिये की हम जिस संस्कार, संस्कृति, सभ्यता को जन्म दे रहे हैं वही हमारी आने वाली पीढ़ी पायेगी तो जब हम सप्तर्षि के ही पुत्र है या त्रिदेव के पुत्र हैं या त्रिदेव के संगम=परमब्रह्म परमेश्वर के ही पुत्र हैं तो धर्म का राज्य और सुराज स्थापित करने के लिए संघर्ष करें न की लोकतंत्र के गलत अर्थ जिसमे सुराज और लोकतंत्र को स्वेक्षाचार मन जा रहा है आज कल उसके लिए संघर्स करें। और यही संस्कार, संस्कृति, सभ्यता के साथ साथ समृध्धि हमारा लक्ष्य हो इसी से हम गाँधी के राम राज्य और नेहरु के द्वारिका राज्य (कृष्ण राज्य) को प्राप्त करेंगे और पटेल की आत्मा को भी शांति पहुंचेगी।


वैज्ञानिक युग में हम यह मान लें की सप्तर्षियों का प्राकट्य स्थल प्रयाग ही है पर नहीं मानते है तो कम से कम इतना मन लीजिये की हम जिस संस्कार, संस्कृति, सभ्यता को जन्म दे रहे हैं वही हमारी आने वाली पीढ़ी पायेगी तो जब हम सप्तर्षि के ही पुत्र है या त्रिदेव के पुत्र हैं या त्रिदेव के संगम=परमब्रह्म परमेश्वर के ही पुत्र हैं तो धर्म का राज्य और सुराज स्थापित करने के लिए संघर्ष करें न की लोकतंत्र के गलत अर्थ जिसमे सुराज और लोकतंत्र को स्वेक्षाचार मन जा रहा है आज कल उसके लिए संघर्स करें। कश्यप ऋषि का प्रयाग के बाद दूसरा प्रमुख केंद्र कश्मीर ही है जिस दुर्गम और बर्फीले स्थान को उन्होंने ही मानव के आवास योग्य बनाया था अपने साडू भाई महादेव शिव शंकर जी के गणों की सहायता लेते हुए। पांडवों के एकल शेष मात्र वंसज और अभिमन्यु (अर्जुन पुत्र) तथा उत्तरा के पुत्र परीक्षित के भी न बच पाने की स्थिति में पांडवों की विजय का क्या मतलब था और परीक्षित को जीवित रखने के लिए श्री कृष्ण के जीवन में सम्पूर्ण सत्य प्राप्त करने के पूर्ण प्रयाश की परिक्षा हुई न की उनके रस लीला और राधा से प्रेम के ही एक मात्र प्रसंग की वैसे वह भी अलौकिक था और उसमे उनका ब्रह्मचर्य भंग नहीं हुआ था। या कुमार उत्तर को अस्वत्थामा द्वारा चलाये गए ब्रह्मास्त्र से श्री कृष्ण ने अंततः पूर्ण सत्य ही अपना उद्देश्य बता रक्षा की थी और उत्तर प्रदेश जिसका सिम्बल मछली और कमान पर धनुस और पेड़ की दो साखाये है उसी इंद्र के अंस और पंडू तथा कुंती के पुत्र अर्जुन और अर्जुन के पौत्र कुमार उत्तर (परीक्षित) को समर्पित है।


रावन राम का दामाद तो लडाई क्यों हुयी और सीता लक्ष्मण की बहन तो भौजाई क्यों हुई? यह हम बचपन से सुनते आये हैं "जिसमे रावन की धर्मपत्नी मंदोदरी मेरठ (अखंड भारत) के राजा मायासुर (तथाकथित राक्षस) जो कश्यप ऋषि का एक पुत्र था की पुत्री थीं और श्रीराम भी कश्यप ऋषि (दसरथ) के पुत्र थे तो मंदोदरी श्रीराम की भी लड़की हुईं और रावन दामाद" तथा समुद्र से ही लक्ष्मी जी जन्म ली थी और शेषनाग भी जो सीता और लक्षमण के रूप में जन्म लिए थे तो सीता लक्ष्मण की बहन हुईं की नहीं? रावन के साथ दूसरी विडम्बना यह थी की वह और उसके पिता ऋषि कुल के तो थे पर उसकी माता और पत्नी दोनों तथाकथित राक्षस कुल की थीं पर वे दोनों धर्म परायण और पतिपरायण-पतिव्रता जरूर थी। अतः मित्रों समाज से आसुरी शक्तियों को निकाल बाहर करने के लिए हमें संघर्षरत रहना चाहिए वह चाहे मेरा सम्बन्धी हो या रावण की तरह का कोई त्रिलोकधिपति (हो सकता है की एक दो क्षेत्र उसकी प्रभुसत्ता स्वीकार न किये हो इस संसार में उस समय तो क्या?)। यह जीवन चक्र, समय चक्र, धर्म चक्र, समता मूलक चक्र है या तो कहें परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश) का चक्र; या ब्रह्मा, विष्णु और महेश का चक्र; या सप्तर्षियों का चक्र; या अस्टक ऋषियों का चक्र(जिसमे अगस्त्य ऋषि भी सामिल हो) का या चौबॆश ऋषियों का (गायत्री मंत्र के उपासक ऋषि जिसमे विस्वमित्र-कौशिक से सुरु करके चबीसवें ऋषि याज्ञवल्क तक आते हैं) :तिरंगे के अशोक चक्र की चौबीस तीलियों में से एक तीली या एक रेखा एक ऋषि के प्रभाव को व्यक्त करती है। इस दुनिया में धर्म का राज कायम रहता है जब तक तभी तक इस पृथ्वी पर जीवन है और इसके लिए पंडित, मुल्ला, पादरी ही नहीं संसार के सभी प्रबुध्ध समुदाय का प्रयास रहता है की किशी भी धार्मिक लडाई में सम्पूर्ण धर्म या सम्पूर्ण इस्वर मतलब पूर्ण सत्य (सत्यमेव जयते: जो सामाजिक दबाव बस आसानी से यदा-कडा संभव नहीं हो पाता है प्रकाश में लाने में )समाज में देर सबेर लाया जाय और इसे "सत्यम शिवम् सुन्दरम" बनाया जा सके।*******जय हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बूद्वीपे)), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण|


विचार कीजिएगा इस अकाट्य सत्य पर की इस्लाम राममार्गी के समान्तर और इसाईयत क्रिश्न्मर्गी के सामानांतर काम करता है। सबसे बड़े सत्य माता-पिता को अत्याचारी कंश के बंधन से मुक्ति के कार्य में क्या त्यागा था इस बात पर विचार कर क्रिश्नामार्गी बनिये। और राम ने अपनी प्रजा की संतुस्ती और पिता के बचन की रक्षा हेतु क्या त्यागा था इस पर भी विचार कर राममार्गी बनिएगा । Shriram was Vishnu, Bharat and Satrughna was Mahavishnu (Dharmraj) and Lakshaman was Sheshnag (carrier of the earth); and Balram also was Sheshnag with Krisna as Vishnu| अतः यही सत्य है की "जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण कहो या राम"=गाँधी जी तो केवल राम से ही काम चला लिए:रह्गुपति राघव राजाराम पतित पवन सीताराम। ईस्वर अल्लाह तेरा नाम सबको सन्मति दे भगवान्=पर नेहरु जी तो चरित्र से ही कृष्ण बन गए और वे गाड के रस्ते पर चले जबकि सब उनको यही कहते राग गए की वे कर्म-कांड में विश्वास नहीं रखते थे जैसा की किम्बदन्ति है उनको ही दुलारा जाता था की "हाथी-घोडा पाल की जय कनैय्या लाल" की। इस प्रकार कृष्ण रत्न और राम रत्न के मिलने का विशेष प्रभाव था की हम वर्त्तमान में अपने को स्वतंत्र कहते हैं पर हैं अपनी इन्द्रियों के वस् में जिससे की स्वेक्शाचारी होते जा रहे हैं पर दूसरा व्यक्ति हमारी सीमा लांघ भी जाय हम सोये रहते हैं।


आप लोगों का मेरा पृष्ठ अवलोकन के लिए धन्यवाद और सप्रेम नमस्कार। फिर मिलेंगे पर अब लेखनी का विषय कुछ और होगा।--------अब भी समाज में कुछ नया शिखने के लिए रह गया की किस प्रकार कश्यप गोत्रीय का माया जाल श्रीराम और श्री कृष्ण समेत लगभग सभी विष्णु अवतार और तथा कथित राक्षस के बीच चलता रहा है जो दुनिया को रोमांचकारी बनाता रहा? लेकिन आज के समाज में आप लोगों से अनुरोध है की यह सब करने की कोई जरूरत नहीं है केवल जरूरत है तो सन्मार्ग पर चलने की। अन्य ऋषि इसी लिए अति शुध्ध कहे गए हैं पर अंत में सत्य को व्यापक तौर पर स्थापित करने के नाते ही गौतम और वशिस्थ के बाद कश्यप का 3rd स्थान जरूर आ जाता है पर अन्य ऋषि भी दुष्टों का दमन और समन करते हैं पर विकराल और अत्यधिक मायावी दैत्यों और राक्षसों का भौतिक शरीर में सीधा सामना कश्यप ऋषि ही करते रहे है अपने संतानों के माध्यम से और अधिकतर दैत्य उनसे ही सम्बंधित रहे हैं पारिवारिक रिश्तों में इस लिए भी। यहाँ तक की दुर्वाशा स्वयं कश्यप को पीछे से ही सहयोग देते रहे हैं या आशीर्वाद और अभिशाप से प्रभावित करते रहे है। अन्य छह ऋषि का आखिरी अस्त्र कश्यप और कश्यप का आखिरी अस्त्र दुर्वाशा और यही दुर्वाषा के भी धर्म चक्र=समय चक्र की रक्षा की प्रतिबध्यता का मूल मंत्र है जिसने श्रीराम और श्रीकृष्ण को भी अपनी माया रुपी सांसारिक लीला को समाप्त करने को बाध्य किया।--------ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सबका एक तिहाई ही अधिकार इस पृथ्वी पर है यह अलग बात है की कौन किश तरह अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य समझ रहा है अपने भौगोलिक और सामाजिक ताने बाने के अनुसार और जलवायु आधारित धर्म के अनुसार मुझे सनातन हिन्दू धर्म से अलग हुए धर्म में भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य देखने को मिलते हैं क्योंकि यह कर्म और जन्म आधारित दोनों है। धर्म की रक्षा का प्रमुख दायित्व कश्यप गोत्रियों का हमेशा रहा है क्योंकि की सबसे ज्यादा समाज को नुकसान भी यही करते हैं तो एक कश्यप गोत्रीय होने के नाते मैंने 2007 से वर्तमान दिन तक धर्म और समाज पर ही बोलता और लिखता रहा हूँ ऑरकुट से लेकर ब्लॉग और फेसबुक पर पर अब आज इससे सम्बंधित बातों का समापन हो रहा है इसी समय।*******जय हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बूद्वीपे)), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण|


श्रेष्ठतम जहाज, योग्यतम उपग्रह, और श्रेष्ठतम क्रूज मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) का करतब तो रोमांचकारी, प्राणी जगत में प्रसंसनीय और उपयोगी होता ही है इसमे कोई संदेह नहीं पर उसको प्रारंभिक या सम्पूर्ण कार्य के लिए ऊर्जा जमीन से ही मिलाती है न की आसमान से। इससे ज्यादा मै हर कार्य में नीव की पहली इंट बनाने वाले व्यक्ति, माता-पिता, और मात्री भूमि (वन्देमातरम) के महत्त्व के बारे में कुछ नहीं कहूंगा। साथ ही साथ लक्ष्मीनारायण, सीता-राम और राधे-कृष्ण जैसे प्रचलित शब्दों से तो भारतीय संस्कृति में पुरुस से ज्यादा स्त्री के महत्व के बारे में जो धारणा रही है वह पूरा विश्व समाज जनता ही है उसके बारे में क्या कहना जहां बिना भार्या के कोई धार्मिक-सामाजिक कार्य या अनुष्ठान नहीं पूरा होता है। वहा स्त्री को प्रथम पूज्य मन ही जाता है (यात्रा पूज्यन्ते नारी रमन्ते तत्र देवता)। --- ----पर आधुनिक युग में ऐसे लोगों के सर पर पैर रखकर लोग निकल जाते हैं पर पैर के नीचे जो दब गया वह किश हाल में है उसे सोचने की किसे फुर्सत और स्त्री को ढाल बनाकर अपने किशी प्रति द्वंदी को नीचे गिराने मतलब स्त्री का नाजायज प्रयोग करने वालों की कमी नहीं है। लेकिन नहीं यह देश अशोक चक्र (धर्म चक्र=समय चक्र=संता मूलक चक्र) पर विश्वाश रखता है अतः इस देश के नागरिक विश्व कल्याण भाव से नीव की इंट बनाते चले जा रहे हैं और भारतीय नारिया बिना किशी इर्ष्या और द्वेष भाव तथा अपने ज्ञान का बेजा उपयोग (किशी को धोखा देने वाली चालाकी) केवल अपने स्वार्थ्य के लिए किये बिना सभ्य समाज का कंधे से कंधा मिलकर साथ देती चली जा रही है तभी तो नव निर्माण जारी है और भारतीय संस्कृति भी क्षीण नहीं हो रही है समय के बदलने पर भी। और भारतीय नारिया आज के बदले हुए माहौल में अधिकांश घरों में आज भी आदर की दृष्टी से देखी जाती है जहा माडर्न का मतलब समय के साथ-२ चलना तो है पर सभ्यता और संस्कृति का ह्रास नहीं।


अगर यही गुप्त ध्येय है भारत की सभी राजनैतिक और धार्मिक संस्थाओं और दलों का की भारत के इस सबसे घने मानवीय संसाधन क्षेत्र (प्रयाग(काशी) समेत अवध, मथुरा और हरिद्वार क्षेत्र) का केवल राजनैतिक, सांस्कृतिक, अध्यात्मिक और शैक्षणिक विकाश हो औद्योगिक और अनुसंधानिक विकाश केवल आवश्यक आवस्यकता भर हो जिससे की अरब देशों सहित पूर्वी तथा पश्चिमी देशों (पूरे विश्व) को भारत से मानवीय संसाधन उपलब्ध कराया जाता रहे तो ऐसे में भारतीय मेधाओं की क्षमता केवल शोध पत्र के प्रकाशन की शंख्या और उसकी गुणवत्ता से ही क्यों आंकी जाती है जो अत्यल्प संशाधनों के साथ वे प्रस्तुत करते है। जरूरत आज इसी तरह अति उन्नत या सामान्य उन्नत क्षेत्र को माओवाद प्रभावित क्षेत्र को समझने की है जो प्राकृतिक संसाधन से तो परी पूर्ण हैं पर आदिवासी समाज का विकाश आज भी बहुजन समाज की पहली जिम्मेदारी न होकर केवल जिम्मेदारी अपनी राजनैतिक रोटी कमाने की ही है|*******जय हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बूद्वीपे)), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय


Saturday, May 4, 2013

राम ने देवी देवताओं और ऋषि मुनियों सबका आशीर्वाद लिया विजय श्री पाने में पर देवी दुर्गा जो नौ रूपों में पूजी जाती हैं अपनी शक्ति से दैत्यों का विना किशी बाहरी सक्ति के संहार किया अतः मात्री सक्ति सबसे बड़ी शक्ति है इसको पिता से भी बड़ा दर्जा दिया गया है लेकिन राम की महानता देखिये दर-दर की ठोकरे खाईं अपने स्वाभिमान और पित्र बचन की रक्षा में पर उन्होंने भरत के बारे में कहा था लक्षमण से "भरतहि होई न राज मद विधि हरिहर पद पायी" मतलब भरत को अयोध्या का सिंघासन क्या ब्रह्म-विष्णु-महेश का पद भी मिल जाए तो भी मद-घमंड नहीं होगा यह था एक बड़े भाई का अपने छोड़े भाइयों के प्रति विस्वास और आधिकारिक आदर्श वाक्य
भगवान् राम के लिए सीता माँ धर्म पत्नी थी और उनकी रक्षा अपनी मातृभूमि और स्वाभिमान की रक्षा थी और यह राम रावन युद्ध एक भारतीय नारी के सतीत्व की कहानी भी वयां करता है जिसके लिए राम में अपने को और लक्षमण सहीत वानर सेना को अतुलित बल वाले रावण के सामने लगा रख्खा था राम का सबसे प्रमुख आदर्श उनका माँ पिता एवं गुरु भक्ती थी: "प्रात काल उठी के रघुनाथा, मतुपितागुरु नवाही माथा मतलब मतपिताऔर गुरु उनके लिए प्रातः स्मरणीय थे उन्होंने अपनी जीत का श्रेय भी अपने कुलगुरु वशिष्ठ को दिया"गुरु वशिष्ठ कुलपूज्य हमारे जिनकी कृपा दनुज दल मारे" माता से भारी और पिता से उंचा कोई संसार में नहीं है और गुरु सर्वश्रेष्ठ है "गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वरः गुरुर साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः: ये आदर्श उनके द्वारा स्थापित किया गया