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Monday, July 29, 2013

I know my life is till 2057 but still I never gone against society and used my knowledge for maximum benifit for society and my Adarsh is Lord Shri Ram: detail about my life can be drawn by these data: Date of Birth (Actual): 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन (भारतीय शासकीय दिवस): राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha (1/2 of Kumbh Rashi and 1/2 of Makar Rashi) Rashi Name:Giridhari (Means Lord Krishna and Hanuman both) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)


Most Important for Indian Society: If I remember then I have given a written matter to our respectable teachers of Physics Department, Banaras Hindu University in February 2012 [ based on my memory for the same place (Kashi-Vanaras) and same time only] that in Satyug I was one of the Soorya Vanshiy Gwala who kept two part of the King Kedarnath who was a partial Avtar of Lord Shiva and Kedar Valley named after him. The reason behind this event was that the King Kedar was kept him busy in works against society and behaving like Jalandhar using power of Shiva. And I added that after helping in mission of a centre named with Kedareshwar (~Kedarnath) in Allahabad(Prayag) University, I get rid of all sin of that time in the present Yuga i.e. Kalyuga. I told that RAMESHWARM means RAM hee ISVAR hain. Thus asked question with the advocator of social justice in India (with reference to 5000 years old bad day revenge) that would you know that in the next birth which family you will get ~General, OBC or SC/ST, if not then how you want to take revenge for 5000 years with general caste if you have no record of yours after 60-80 years. I accept that social Justice which is beneficial for social harmony.


सनातन ब्राह्मण का पुत्र जब सत्य लिखेगा तो सामाजिक व्यवस्था चरमरा जायेगी जो ब्राह्मण के कर्म के विरुध्ध है| अतः कौन सी जाती ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के किस अनुपात से बनी है सार्वजानिक करना नहीं चाहता| आप सब भी कुछ कस्ट सहें सामाजिक व्यवस्था बनी रहने के लिए क्योंकि जीवन ही कठिन है और सभी संघर्ष कर रहे हैं जिसमे कुछ लोग संघर्ष कमजोर होने पर दूसरों पर दोसारोपन ज्यादा करते हैं| पर हाँ यह जरूरी है जो संघर्ष कर ऊपर आना चाहते हैं उनको जीवन देना पर जो लोग जागते हुए सोते हैं और दूसरों के भरोसे रहना चाहते हैं उनको कोई आगे नहीं ला सकता|


मै भी सोचा था की भगवान् श्री राम के लिए कोई मुसलमान कितना त्याग और बलिदान कर सकता है और श्री कृष्ण के लिए लिए कोई इसाई कितना तपस्या और प्रार्थना कर सकता है मै उससे कही अधिक करूंगा और मैंने किया भी वैसा ही कोई मेरे सानिध्य में कुछ दिन रहकर भी देखे तो| यही है इस्लाम का श्री राम के सामानांतर चलने का सत्य और इसाइयत का श्री कृष्ण के सामानांतर चलने का सत्य|


Friday, July 26, 2013

इस्लाम श्रीराम मार्ग के सामानांतर चलता है और इसाइयत श्रीकृष्ण मार्ग के सामानांतर चलता है और श्रीराम मार्ग और श्रीकृष्ण मार्ग हिन्दू धर्म के ही अङ्ग हैं| अतः हिन्दू के लिए इस्लाम और इसाइयत उत्प्रेरक तथा इस्लाम और इसाइयत के लिए हिन्दू धर्म उत्प्रेरक का काम करते हैं और इस प्रकार हम कह सकते हैं की हिंदुत्व के लिए इस्लाम और इसाइयत का रहना अति आवश्यक है जिससे की हिन्दू सो न जाएँ| लेकिन एक बात और है की इस्लाम और इसाइयत दोनों भारत के बहर जन्म लिए और उनका मुख्य केंद्र वही है तथा सनातन हिन्दू धर्म के लिए भारत केंद्र बिंदु है और हिन्दू धर्म के अनुकूल भारत की जलवायु सबसे ज्यादा उपयुक्त भी है| विश्व के अन्य भाग में इसका निर्वहन थोड़ा कठिन है और वहां इसका प्रसार ज्यादा नहीं हो सकता है| अतः कम से कम भारत में इसका संरक्षण जरूर होना चाहिए अन्य सभी धर्मों का समान आदर करते हुए और यह अन्य धर्मों के भी हित में ज्यादा महत्वपूर्ण है तथा इसे हिन्दू ज्यादती और हिन्दूवाद से न जोड़ा जाय क्योंकि आत्म रक्षा कोई अपराध नहीं वरन वह भी अहिंसा की परिभासा के तहत ही आता है|


मै यहाँ न किशी अंतरजातीय/अंतर्धार्मिक विवाह का समर्थन कर रहा और न विरोध कर रहा पर भारतीय शास्त्रीय नियम की बात कर रहा हूँ क्योंकि मुझे पता है सत्य असंख्य वर्ष तक नहीं बदला है धर्म और जाती परिवर्तन तो एक जीवन की बात है| -----भारतीय शास्त्र सम्मत शादी भी इसी क्रम में वर्णित है: प्रथम श्रेणी है ---ब्राह्मण-ब्राह्मण, क्षत्रिय-क्षत्रिय, वैश्य-वैश्य और द्वितीय श्रेणी है ----ब्राह्मण-क्षत्रिय, ब्राह्मण-वैश्य, क्षत्रिय-वैश्य इसके शिवा अगर दूसरे पक्ष या धर्म का कोई व्यक्ति अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य में से किशी एक धर्म को सामाजिक और संवैधानिक रूप से स्वीकार नहीं करता है तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की वह शादी शास्त्र सम्मत नहीं होती है|


मेरे मित्र और स्नातकोत्तर के सहपाठी कुलदीप ने गोत्र पर कुछ लिखने को कहा है: गोत्र-गौ इति गोत्रह मतलब गाय से गोत्र की उत्पत्ति होती है जिसे कहते हैं की गाय की छाया में जीवन विताना: कारन पुराने समय से ही मतलब सप्तर्षियों के समय से ही गाय, गंगा, और गायत्री-(मंत्र) के प्रति आचरण की शुध्धता ही मापक होती थी सिध्ध ऋषि की क्षमता की और पवित्रता की (यहाँ यह बता दें की गंगा हर काल में पृथ्वी लोक और देव लोक में भ्रमण करती रही हैं जिसका उदहारण है की मध्य प्रदेश के मध्य और महारास्त्र के सीमा पर भी कभी गंगा का अस्तित्व रहा है उस स्थान का नाम जो भी रहा हो और ये जगत तारिणी बहुत पहले से जानी जाती हैं और पारवती जी की बड़ी बहन होने का भी गौरव और ब्रह्मपुत्री भी कही गयी हैं ये)| वैसे भी गोत्र को आप गो तर मतलब गाय की छाया या गाय के सानिध्य पर निर्भर जीवन से है जिसमे गाय का दूध का खाने में उपयोग, गोबर का फसल उगाने में खाद के रूप में उपयोग, बछड़े का में उपयोग और मूत्र का औसधियों में उपयोग और इसी पर ऋषि और की जीवन प्रक्रिया निर्भर थी| वैसे भी गौतम का भी मतलब होता है गाय की छाया मतलब जिनकी सहजता, सरलता, विनम्रता, शुध्धता और अन्य सभी गुण गाय सद्रिस हो| -------इस प्रकार गाय, गंगा, गायत्री की संकृति में सप्तर्षि और उनके अन्य बने हुए क्लोन जो अपने को सिध्ध ऋषि साबित किये तो उनके उत्तराधिकारी उसी गोत्र के नाम से जाने गए और इस प्रकार सप्तर्षि गोत्र , उसके बाद अष्टक ऋषि गोत्र और उसके बाद चौबीस ऋषि गोत्र करके ब्राह्मणों में ही लगभग पचास गोत्र हैं पूरे भारत में और इसी प्रकार ब्राह्मणों के इन पचास गोत्रों के अनुसरण के साथ सभी जातियों के लगभग एक सौ से अधिक गोत्र हैं वर्तमान में और ये सभी गौतम, वशिस्थ, कश्यप, भारद्वाज/अन्गारिशा, जमदग्नि/भृगु, दुर्वाषा/सोमा/दत्त/अत्री, विश्वामित्र(कौशिक) और आठवें ऋषि अगस्त्य (कुम्भज) के ही पूर्वज और उनके उत्तराधिकारी के रूप में रहे हैं हर युग और काल में और गोत्र के रूप में जाने गए हैं| मतलब सभी लगभग सौ से अधिक गोत्र सप्तर्षियों से ही जनित हैं|


Wednesday, July 24, 2013

आज के भौगोलीकरण के युग में आवस्यकता है रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर एस एस ) के साथ अंतर-रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (ए आर एस एस) के निर्माण की जो देश के नागरिकों (किशी भी धर्म और जाती के क्यों न हों) के हित के बारे में रास्ट्रीय और अंतर्रास्त्रिय दोनों स्तर पर कार्य करे और इस प्रकार जो बफर नागरिक हैं देश के उनके हित पर कुठाराघात नहीं होगा केवल रास्ट्रीय स्तर पर कार्यरत रहने पर|


मै नहीं समझता की रास्ट्रवादी होना या रास्ट्रवादी बने रहने या भारत के प्रधानमंत्री बनने या बने रहने के लिए अमेरिकी व् चीनी वीजा या अमेरिकी व् चीनी यात्रा जरूरी है| यह किशी भारतीय राजनेता या राजनेताओं की क्या मंशिकता है? अमेरिकी वीजा पाने की ललक और कुछ राजनेताओं का उसके वीजा रोकने की मंशिकता क्या प्रदर्शित करती है? और क्या यह भारतदेश को एक गुलाम देश सिध्ध करने की मंशिकता नहीं है भारतीय राजनेताओं के द्वारा? सरदार वल्लभ भाई पटेल, नेहरु, गांधी और श्यामा प्रशाद मुखर्जी तथा पंडित दीन दयाल उपाध्याय क्या यही शिखाये थे?


Monday, July 22, 2013

What is meaning of all knowledge, science, 4 Ved, 18 Puran, Upanishad and many many Richaye and Mahakavya if they are not able to produce so many personality who perform his life like Shri Ram and Shri Krishna or perform same as these Lord,s foot mark.


जो श्री कृष्ण भाहभारत के किशी विशेष अवसर पर विष्णु अवतार से परमब्रह्म बने थे और कहा था "अहम् ब्रह्मास्मि", "एकोदेवो सर्वभूतानाम", "बीजं मां सर्व भूतानाम" वही परमब्रह्म श्री कृष्ण केवल अर्जुन को ही युध्ध के लिए राजी करने में अर्जुन के ऊपर विश्व के सभी ब्रह्म ज्ञान मतलब "श्रीमद्भागवत गीता" की बारिस कर दी तो क्या उनको किशी और को राजी कर युध्ध का नेत्रित्व नहीं सौपना चाहिए था अगर अर्जुन तैयार नहीं थे| हाँ "अहम् ब्रह्मास्मि", "एकोदेवो सर्वभूतानाम", "बीजं मां सर्व भूतानाम"भी सत्य है और परमब्रह्म श्री कृष्ण जो किये वह भी सत्य है क्योंकि किशी व्यक्ति के अन्दर छुपी प्रतिभा भी का अंश है और उसे दबाया नहीं जा सकता और किशी एक को एकाएक युध्ध के लिए तैयार करना सामाजिक विशवास के विरुध्ध होता क्योंकि कौरव पक्ष में खड़े विकत योध्धायों के सामने र्जुन का ही तीर बराबरी कर सकता था अतः अर्जुन कृष्ण का एक शसक्त माध्यम हुए जिनके प्रयोग और हनुमत सहयोग से कौरव------जैसे अधर्मी और संख्या बल वाले परस्त किये गए कृष्ण द्वारा| अतः मेरा विशेष अनुरोध है विश्व समाज से की कोई भी मानवीय प्रतिभा वेकार न जाय और सबके समुचित प्रयोग की रूप रेखा तैयार की जाय समता की भावना के साथ साथ|


 

वैसे सप्तर्षि सभी गुणों में पारंगत थे पर निम्न गुण उनकी पहचान है: गौतम: महामानवता का गुण; वाशिष्ठ: मूर्धन्य गुरु एवं पुरोहित; कश्यप: नव निर्माण एवं धर्म तथा समाज का विकाश; भारद्वाज/अन्गारिशा: ज्ञान और दर्शन के भण्डार; जमदग्नि/भृगु: कर्ण की तरह दानशील जिसके प्रयाक्ष उदहारण हैं उनके दधिची और विशेष कर क्षत्रिय राजाओं को परस्त कर कश्यप गोत्रीय ब्राह्मणों को राज्य सत्ता सौपने वाले परशुराम; दुर्वाषा/दत्त/सोमा/अत्री समाज में धर्म ध्वजा और समय की चाल को नियंत्रिय करने वाले; विश्वामित्र (कौशिक): ब्रह्मर्षि होते हुए भी क्षत्रिय गुण पराक्रम की अथाह क्षमता की विश्व में कोई मानव सामने न टी सके| -----------इन सबसे बने अस्तक ऋषि परम्परा के आठवे ऋषि अगस्त्य(कुम्भज) सभी ऋषियों के गुणों का संतुलन और सार हैं|


जिस मनु को दुनिया के लोग गाली देते हैं वे भी कोई और नहीं महादेव भोले शिवशंकर के शाड्हू भाई, कश्यप ऋषि ही हैं जिनकी पत्नी श्रद्धा कोई और नहीं सती पार्वती की बहन अदिति ही हैं| अतः आप सप्तर्षि की संतान अब शायद स्वयं नियमावली बनाकर अपनी गलत नियमावली का क्रोध मनु को गाली देकर नहीं मिटायेंगे मुझे ऐसा विश्वाश है| जिनका गोत्र महा संगम हो गया है लोगों को शरण देते देते उसी पर आप अपना क्रोध निकलते हैं पर हाँ यह भी सत्य है लोग गाली अपने बुजुर्गों को ही देते हैं आज के युग में | दुनिया का शायद ही कोई पिता होगा जो अपनी संतानों के लिए विष बोता होगा अतः मनु ने कोई गलती नहीं की है प्रथम मानवीय सभ्यता देकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के विश्सेस अनुरोध को स्वीकार कर| और मनु के बाद ही हर ऋषि मानवरूप में गोत्र पद्धति के रूप में आए|


मेनका और विश्वामित्र की पुत्री शकुन्तला और हस्तिनापुर के चन्द्र वंशीय राजा दुष्यंत के पुत्र भरत को अपने संरक्षण में रख अभीस्थ तेजस्वी चक्रवर्ती राजा (जिन्होंने अखंड भारत में आर्यावर्त राज्य स्थापित किया था) बनाने वाले कंव ऋषि कश्यप ऋषि के ही वंशज (कश्यप गोत्रीय) थे| इस प्रकार कश्यप और वशिस्ठ का चन्द्र ब्वंश और शूर्य वंश दोनों से नाता था: कश्यप/कंव:वशिस्ठ/परासर/व्यास (दसरथ/शूर्यवंश/रघुवंश/इक्शाकुवंश/रामायणयुग:वाशुदेव/चन्द्रवंश/महाभारतयुग)| कदापि मतलब नहीं की अन्य गोत्र सोते रहते हैं वरन अन्य का भी अति महत्वपूर्ण कार्य है अपने अपने क्षेत्र में मानव हित के लिए जो समान महत्त्व रखता है|


जब सामाजिक समभाव की स्थिति सर्वाधिक विष्णु अवतार देने वाले कश्यप गोत्रियों से भी नहीं संभालती है जो हर जाती, धर्म के व्यक्ति को सनातन हिन्दू धर्म में पुनः आश्रय देते हैं अपने प्रभुत्त्व और सत्कर्म के बल पर तो काल चक्र या धर्म चक्र या समता मूलक चक्र के रखवाले ऋषि दुर्वाशा की बारी आती है जिनके काल कूट चक्र के प्रभाव में स्वयं कश्यप गोत्रीय श्री राम और कश्यप गोत्रीय श्री कृष्ण को पुनः विष्णु रूप में लौटना पडा था रघुवंशियों/इक्षकुवंशियों/शूर्यवंशियों और यदुवंशियों/चंद्रवंशियों को नियंत्रिय करने के लिए इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है? और इसके बाद की स्थिति भगवान् शिव के नटराज नृत्य से सामूहिक विनाश की स्थिति है| अतः मानवता के विनाश का बुलावा है कश्यप के भी नियंत्रण से बाहर होना|


भारतीय समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ब्रह्म क्षत्रिय, ब्रह्म वैश्य क्षत्रिय, ब्रह्म वैश्य, वैश्य क्षत्रिय का संयोग है| अतः भारतीय समाज के बारे में कोई भ्रम न पला जाय की ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य में से किशी एक का अंत हो जाएगा और किशी एक का जिस दिन अंत "उसी दिन मानव समाज का अस्तित्व घोर संकट में आयेगा"|


अगर "गौरा पार्वती माँ" जनक की कुल देवी हैं तो "देव काली माँ" इक्शाकू वंश/रघुवंश/शूर्यवंश/कश्यप गोत्रीय की कुल देवी हैं जो सरस्वती, लक्ष्मी और काली (गौरा पार्वती का एक स्वरुप) के समूह की शक्ति हैं|


Friday, July 19, 2013

It is true that I can scarify and leave every thing related my life to preserve the fact related with character of Shri Ram and Shri Krishna at least in major part of the India if not in the world. Jai Hind (Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari=Jamboo dweepe), Jai Bharat (Bharatakhande=Akhand Bharat), Jai Shri Ram, Jai Shri Krishn| Jamboo dweepe , Bharatakhande and Aryavarte words come in Brahm Stuti and Durga Stuti Slokas|


I am writing such post not because of I belongs with Kashyap Gotra in which most of the Vishnu Avtar takes place including Shri Ram and Shri Krishna and which form the Sangam of Sanatam Dharm of all human diverted from their caste and religion, and neither because of I belongs with the village RAMAPUR of District Azamgarh (Place of residence of Durvasha) whose name comes after the name of Azam whose father was GAUTAM GOTRIY KSHATRIYA (Vikramajit~Vikramaditya) ----------------

I am writing such post not because of I belongs with Kashyap Gotra in which most of the Vishnu Avtar takes place including Shri Ram and Shri Krishna and which form the Sangam of Sanatam Dharm of all human diverted from their caste and religion, and neither because of I belongs with the village RAMAPUR of District Azamgarh (Place of residence of Durvasha) whose name comes after the name of Azam whose father was GAUTAM GOTRIY KSHATRIYA (Vikramajit~Vikramaditya) and neither because of I belongs with almost all seven Saptarshi Gotra (Gautam, Vashistha, Kashyapa, Bharadwaj/Angarissa, Jamadagni/Bhrigu, Durvasa/Atri and Vishvamitra(Kaushik) by residence and blood relation but as a resident of Prayag (ALLAHABAD=Place of Allah=GOD=ISVAR) from where all seven Saptrishi generated who became the generator of this humanity and also because I born in Vashistha Gotriy Dadi's land Jaunpur (Jamagagnipur, Jamdagni/Bhrigu) (gained education at Gautam Gotriy Mama's land Bishunpur, Jaunpur) and also the resident of Bharatvarsh (named after Vishvamitra's grand son, Bharat).

It is true that I can scarify and leave every thing related my life to preserve the fact related with character of Shri Ram and Shri Krishna at least in major part of the India if not in the world. Jai Hind (Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari=Jamboo dweepe), Jai Bharat (Bharatakhande=Akhand Bharat), Jai Shri Ram, Jai Shri Krishn| Jamboo dweepe , Bharatakhande and Aryavarte words come in Brahm Stuti and Durga Stuti Slokas|

Shri Ram and Shri Krishna both are the true representation of Perfect Truth and Perfect Love because in case of Shri Ram perfect truth have no doubt and in case of Shri Krishna perfect love have no doubt but we have proof that both are the true representation of Perfect Truth and Perfect Love 1) Let us come to know that at the time of Sita Prayan to Dharati Maan (Earth) Shri Ram become so disappointed in his love and in presence of his Guru Vashistha and other member of his kingdom he become angry with the Natur (Earth) and shouted to destroy the universe and at this time Vashistha played his role and tell nothing is impossible for you but this is an indication to you to leave this body soon and return in your Vishnu form. Is it not a unique perfect love with his only wife. 2) At the time of Mahabharta at the end when Aswatthama's Brahmastra to Kumar Uttar were controlled on the Shri Krishnaby praying to Brahma that if my all works in life comes on perfect truth at the end then this Brahmastra return to you without loss to Kumar Uttar. And also this is the event therefore Kumar Uttar called Pareekshit (Means in which there was examination of perfect truth of Shri Krishna)| I hope no one have any confusion now on the fact that Shri Ram and Shri Krishna both are the true representation of Perfect Truth and Perfect Love.


भारत वह देह या देश है जिसमे भगवान् के प्रति प्रेम और आस्था हो यह दो शब्दों से मिलकर बना है: भ (भगवान्)+आरत (प्रेम और आस्था में लीन)| श्रीमद्भागवत गीता में श्री कृष्ण भगवान् ने अर्जुन को कौन्तेय, महाबाहु, धनञ्जय के साथ साथ भारत शब्द से संबोधित किया है क्योंकि अर्जुन को भगवान् में अतिसय आस्था और प्रेम था यह तो देह मतलब शरीर धारी मानव की बात हुई| इसी प्रकार भारत देश वह देश है जिसके निवासी इस्वर में आस्था और प्रेम रखते हैं|


Thursday, July 18, 2013

Most Important Fact deleted from my post by some one which is benificial to understant Role of Sanatan Hindu Dharm in Baudh Dharm apart from Gautam Gotriy Kshatriya Kuvar Siddharth: There is nothing non-religious in Bheem RAO RAMJI Ambedakar and his family name according Hindu Religion also Ambedakar Nagar District as a ex-part of Faizabad (Ayodhya) indicates that Ambedakar=Hanuman has got place in his Lord's home Town. Bheem=Brother of Pandava (indirect son of Pavandev), Rao, Ramji=Maryada Purushottam Bhagvaan Ram, and Ambvaadekar=Ambedakar=Hanuman in my view and also in Ramaa=Lakshami, Sarada=Saraswati and Savitaa=Wife of Sun or Glory of Sun. How Baudhisth and Shikhas and Jainism denie his relation with Sanatan Hindu Dharam in presence of embodied Shri Ram and Shri Krishna with Hanuman in this Universe and also remind the fact that the Islam is parallel to Shriramism and Christianity is parallel to Shrikrishnaims. This is glori of the Sanatan Hindu Dharma.


कुछ लोगों की इक्षा थी की मई लोगों को विश्व के सबसे बड़े रहस्य से पर्दा उठा दूं तो वह भी हुआ और वे सब लोग जान गए की हनुमान भी अपने गुरु सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला से शादी की थी और वर्तमान में जिसे विश्व शक्ति कहा जात है उस पाताललोक में सुवर्चला से मकरध्वज नामक पुत्र की प्राप्ति भी हुई थी। शायद सशुराल का असर था की हनुमान अहिरावन को मार कर श्रीराम और लक्षमण को उस बंधन से छुडा कर लाये थे पाताललोक से जिस बंधन को तोड़ना श्रीराम और लक्षमण के लिए धर्म विरुध्ध था। ----------------------------अतः अब आप कहेंगे की हनुमान आजीवन ब्रह्मचारी कैसे हुए तो हनुमान सिर्फ अपने गुरु शूर्यदेव की आज्ञा का पालन किये थे गुरुदाक्षिना देने के रूप में और वैसे भी जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी (जिसका केवल अपनी एक पत्नी में ही आस्था है वह भी ब्रह्मचारी के सामान है: कश्यप और विश्वामित्र को छोड़कर बाकी सभी सप्तर्षि एक नारी व्यवस्था के ही थे: कश्यप को अपने पिता मारीच की आज्ञा के पालन स्वरुप ब्रह्मा के पुत्र दक्ष की सभी पुत्रियों से शादी करनी थी और केवल सती-पारवती (महादेव से) को छोड़ कर: ऐसा ब्रह्मा का अनुरोध था मारीच से अपने पुत्र दक्ष के दबाव में की सभी पुत्रियों की शादी केवल कश्यप ऋषि से होगी; और विश्वामित्र का अपनी पत्नी के अलावा एक स्वर्ग की अप्सरा मेनका से प्रेम का परिणाम मेरा देश भारतवर्ष है ही)।


कहा जाता है की दुनिया में दो ही दया तथा मानवता के सागर हैं एक भोलेनाथ शिवशंकर महादेव और दूसरे सप्तर्षि में गौतम और दोनों की पत्नियो पर दैत्यों और देवताओं की कुद्रिस्ती पडी है अतः मै गौतम गोत्रीय क्षत्रिय से इस्लाम धर्म धारण करने वाले गौतम-गोत्रियों (आर्यमगढ़:आजमगढ़:महान्तमनगर वाशियों) पर गौतम गोत्रीय क्षत्रिय द्वारा चलाये गए धर्म (बौद्ध धर्म) और तथा कथित दया की मूर्ती इसामशीह द्वारा चलाये गए इसाई धर्म के अनुयायियों में "सत्यमेव जयते:मानवता की सीमा के माप दंड" के प्रति कितनी उदारता और विश्वसनीयता है की परिक्षा लेने का दायित्व शौपता हूँ पर मेरी परीक्षा में ये दोनों विश्वाश लायक नहीं हैं। अगर गौतम गोत्रीय क्षत्रिय द्वारा चलाये गए धर्म (बौद्ध धर्म) और तथा कथित दया की मूर्ती इसामशीह द्वारा चलाये गए इसाई धर्म के अनुयायियों में "सत्यमेव जयते" के प्रति कितनी उदारता और विश्वसनीयता है की परिक्षा जारी न रही अनवरत रूप से तो स्त्रियशक्ति का दुरुपयोग ये लोग करते रहेंगे भोलेनाथ शिवशंकर महादेव और गौतम ऋषि को नीचा दिखाने के लिए जो इस कश्यप के लिए अति प्रिय और श्रद्धेय हैं तथा मानवता की सीमा के माप दंड हैं।*******जय हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीपे), जय भारत (भरतखंडे), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


या देवी सर्व भूतेशु बुध्धि रुपें संसृता, या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपें संसृता, या देवी सर्वभूतेषु अर्थ-रूपेनु (संपदा) संसृता ही महिला की पहचान है: वही सरस्वती, वही पार्वती, वही लक्ष्मी और इस तरह आदि शक्ति दुर्गा (सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की सम्मिलित शक्ति एक साथ) भी है फिर भी संसार में राक्षस घूम रहे हैं और दुनिया भिखारी, अज्ञानी और शक्ति हीन क्यों है ?------------- जगत तारिणी, जगत जननी, जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी, वन्देमातरम शब्द महिला के एक स्वरुप के हैं अतः महिला शसक्तीकरण के साथ-साथ हम उनको जय जगदम्बे (अम्ब=माँ ) के रूप में भी देखना चाहते हैं जिसमे नवीनता के साथ साथ सुसंस्कृत, संस्कारयुक्त और एक प्रगतिशील सामाजिक सच्चाई के निर्वहन की भी शक्ति हो।-वन्देमातरम-माँ तुझे सलाम-We salute o my great mother जैसे शब्दों को महानता देते रहने के लिए।


रामचरित मानस उत्तर कांड में भगवान् शिव माता पार्वती को कुछ सप्रसंगा ब्याख्या देते हुए (काली माई गौरा पार्वती का ही स्वरुप है पर शिव जी के साथ उस काली माई के स्वरुप में नहीं रहती वरन विश्व की सबसे सुन्दर स्त्री रति से भी सुन्दर स्वरुप गौरा पार्वती के स्वरुप में रहती हैं) : धन्य सो देश जह सुरसरि बहई (वह देश धन्य है जहा भागीरथी-गंगा बहती हों)। धन्य नारी पतिव्रत अनुसरहीं (वह नारी धन्य है जो पतिब्रत का पालन करती हो) धन्य सो भूप निति जो करई (वह राज धन्य है जो नीतियों के अनुसार आचरण करता हो) । धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)॥ सो धन धन्य प्रथम गति जाकी (वह धन धन्य है जो समाज के उपकार में लगाया जाय )। धन्य पुण्य रत मति सोई पाकी (वह मति धन्य है जो पुन्य के कार्य मतलब सृजन या सामाजिक नवनिर्माण के कार्य में लगाई जाय) ॥ धन्य घरी सोई जब सतसंगा (वह समय धन्य है जो सत्संग करने में प्रयुक्त हुआ हो) । धन्य जन्म द्विज भगती अभंगा (जिस ब्राह्मण की भगति अटूट हो भगवान् राम के प्रति उसका जमन धन्य है) ॥ सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (हे उमा-पार्वती वह कुल धन्य है जिसमे पूरे जगत के पूज्य और पवित्रता में भी सर्वश्रेष्ठ (सु-पुनीत) का जन्म हो इसका मतलब रघुकुल=इक्शाकुवंश=शूर्यवंश धन्य है)। श्रीरघुवीर परायण जेहिं नर उपज विनीत (विनय युक्त =विनम्रता और शिस्टाचारयुक्त व्यक्ति =RESPECTFUL=COURTEOUS=Gentleman=सज्जन पुरुष)=और ऐसे रघुवीर का परायण मतलब रघुवीर में अभीस्त श्रध्धा वाला वही हो सकता है जी जिसके अन्दर विनीत (विनम्रता-विनययुक्त) की उपज हो ) ॥ तो आज सज्जन पुरुष की कमी हो गयी है विद्वान और ऋषि महर्षी तो बहुत ज्यादा हो गए हैं लेकिन आप ऋषि महार्श्री की अधिकता के बावजूद विनम्र और सज्जन पुरुष की कमी क्यों हो गयी है का प्रश्न करेंगे तो आप के लिए बता दूं की दैत्यों के गुर शुक्राचार भी एक ऋषि महर्षि थी और वे देवतायों के गुरु गुरु ब्रहस्पति से भी कई मायने में आगे थे अतः ऋषि महार्श्री भी अधिक हो कर क्या करेंगे यदि वे शुक्रचारियों के साथ हो लेंगे तो और अधिक नुक्सान हो जाता है। अतः विनम्र-सज्जन-विनययुक्त-विनीत-शिस्ताचारयुक्त व्यक्तियों की इस पूरे विश्व को अति आवश्यकता है विद्वान और ऋषि महर्षी न सही वे सामान्य शिस्ताचार कम से कम जानते हों।*******जय हिन्द (ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीप=अनादि काल से आर्यावर्त क्षेत्र), जय भारत (विश्वामित्र और मेनका के नाती और शकुन्तला और हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत के पुत्र भारत का आर्यावर्त जिसे आप अखंड भारत या भारत + अखंड = भरतखंड कह सकते हैं), जय श्री राम, जय श्री कृष्ण ( इसी विष्णु अवतार श्री राम और श्री कृष्ण के लिए परशुराम अग्यातवास में चले जाते हैं और ब्रह्मा और शिव भक्त बन जाते हैं हनुमान और जामवंत के रूप में)।


कहा जाता है की दुनिया में दो ही दया तथा मानवता के सागर हैं एक भोलेनाथ शिवशंकर महादेव और दूसरे सप्तर्षि में गौतम और दोनों की पत्नियो पर दैत्यों और देवताओं की कुद्रिस्ती पडी है अतः मै गौतम गोत्रीय क्षत्रिय से इस्लाम धर्म धारण करने वाले गौतम-गोत्रियों (आर्यमगढ़:आजमगढ़:महान्तमनगर वाशियों) पर गौतम गोत्रीय क्षत्रिय द्वारा चलाये गए धर्म (बौद्ध धर्म) और तथा कथित दया की मूर्ती इसामशीह द्वारा चलाये गए इसाई धर्म के अनुयायियों में "सत्यमेव जयते:मानवता की सीमा के माप दंड" के प्रति कितनी उदारता और विश्वसनीयता है की परिक्षा लेने का दायित्व शौपता हूँ पर मेरी परीक्षा में ये दोनों विश्वाश लायक नहीं हैं। अगर गौतम गोत्रीय क्षत्रिय द्वारा चलाये गए धर्म (बौद्ध धर्म) और तथा कथित दया की मूर्ती इसामशीह द्वारा चलाये गए इसाई धर्म के अनुयायियों में "सत्यमेव जयते" के प्रति कितनी उदारता और विश्वसनीयता है की परिक्षा जारी न रही अनवरत रूप से तो स्त्रियशक्ति का दुरुपयोग ये लोग करते रहेंगे भोलेनाथ शिवशंकर महादेव और गौतम ऋषि को नीचा दिखाने के लिए जो इस कश्यप के लिए अति प्रिय और श्रद्धेय हैं तथा मानवता की सीमा के माप दंड हैं।*******जय हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीपे), जय भारत (भरतखंडे), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


Mere Priya Mitron, Mai swayam kramsah Garg (Bharadwaaj Shisya paramparaa vyutpanna) Gotriy Shukla, Gautam Gotriy koi bhee Brahman, Shandilya (Vashisth-Kashyap vyutpanna) Gotriy Tiwari aur Vashiath Goriy Joshi ke baad hee sthaan paataa hoon. Mai (Kashyap Gotriy Pandey) kishi kaa sthaan grahan nahee kar sakaa aur n kar sakoongaa chahe Bhagvaan hee kyon n ho jaau| Aur yah bhee satya hai mere baad hee Bharadwaaj, Bhrigu, Atri aur Kaushik (later name Vishvamitra) tathaa Agastya (Kumbhaj) kaa sthaan aataa hai| vaise dwiteey pidhi ki baat n ho to Gautam, Vashisth aur Kashyap, Bharadwaaj, Bhrigu, Atri aur Kaushik(later name Vishvamitra) tathaa Agastya (Kumbhaj) kaa hee kram hai|---------Ab aap log apane janm aur sukarmon se apnaa sthaan in saptarshiyon me yaa astak (aathon) rishi me nischit kijiye agar bahut ghore parishram aur prayash apane jeevan me kiye hon udyam, samaaj, sanskriti aur vigyaan me| -----Mujhe nahee karanaa hai nayaa prayog par har sambhav prayas hogaa ki samaaj kaa hit ho mere karyon se|*******Jai Hind. Jai Bhart, Jai Shree Ram, Jai Shree Krishna|


मुझसे जाति की बात अभी तक की होती है जबकि मैंने सभी प्रमुख धर्मों (जलवायु आधारित:हिन्दू, मुस्लिम, इसाई; और जन्म-कर्म आधारित: ब्राह्मण धर्म, क्षत्रिय धर्म, वैश्य धर्म) को एक कर दिया प्रयाग में बैठे हुए तो क्या कानून मई नहीं मानता। सामाजिक, धार्मिक, और दार्शनिक, अध्यात्मिक या अन्य सामाजिक सेवा के वही काम कीजिये जो संविधान में लिखा है उसके इधर उधर कुछ मत करिए अन्यथा आप को कानूनी दंड। मेरे भाई-बहन सब कानून ही कहेगा तो इस्वर-परमात्मा-अल्लाह-गाड किस लिए है?


मै अपने स्वाध्याय पर और प्रमाणिक ग्रंथों से लिखा हूँ हर लेख और उसके विरोध में खड़े भारत के ही नहीं विश्व के किशी भी न्यायालय के उच्चतम न्यायाधीश को परास्त कर सकता हूं पर व्यवस्था में सहयोग मेरा दायित्व है क्योंकि आने वाली सन्तति हम लोगों से ही पाती है अतः इस विश्व व्यवस्था के सहयोग में समर्पित हूँ मतलव व्यवस्था फिर भी नहीं संभाली तो दुर्वाषा और महादेव को पुनः कस्ट कर उथल पुथल करना पड़ जाएगा जो अभी एक दसक से कुछ ही पहले की स्थिति से भी भयंकर रूप ले सकता है। सनातन हिन्दू धर्म ही सभी धर्मों का केंद्र है यह मुझे अब सिध्ध करने की क्या जरूरत जब विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने पहले ही सिध्ध कर दिया है उस स्थान पर जो इस समय अपने को विश्व शक्ति कहता है। *******जय हिन्द (इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीपे), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


जिस विकाश से पारिवारिक संस्कार (मानवीय संस्कारयुक्त सन्तति), समाज की सभ्यता और देश (रास्त्र) की संस्कृति यदि संरक्षित हो उसी विकाश की ही सीमा में भारत को विशेष रूप से रहना चहिये क्योंकि की यह अद्यतन(सनातन=ओल्डेस्ट) संस्कृति और सभ्यता का देश है जिसकी उत्पत्ति का केंद्र प्रयाग(काशी) है। जिसमे ज्ञान के साथ-साथ नैतिक चरित्र, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता और विनम्रता होती है वह ज्यादा शक्तिशाली होता है यदि अवश्यक आवस्यकता में बाधा नहीं पहुँच रही हो तब अन्यथा नंगे शरीर रहने वाले और पेट को भरने की भी रोटी जिसे न मिलाती हो उसे संस्कार और सभ्यता का उपदेश सही नहीं लगता है। रावन श्रीराम से हर मामले में श्रीराम से आगे था चाहे वह ज्ञान, विज्ञान, पुरुषार्थ हो या धन संपदा और यही नहीं वह त्रिलोकधिपति हो चुका था पृथ्वी लोक के लिए अपने भाइयों और पुत्रों के बल पर; और दूसरे वह ब्राह्मण भी था लेकिन एक सबसे बड़ी शक्ति की अधिकता राम के पास थी वह थी नैतिक चरित्र, संस्कार, संस्कृति और सभ्यता की और सभी देवी-देवताओं और ऋषि मुनियों को इसी से प्रभावित करते हुए आशीर्वाद अर्जित किया अंततः रावन पर विजय पाय (और इसके साथ ही पुलस्त्य ऋषि (रावण के बाबा=परपिता) के कुल के साथ एक जो राक्षस छल किया गया था पुलस्त्य ऋषि के यहाँ ब्राह्मण भोज में मांश मिला दिया था और जब परोशा गया था तो वही राक्षस ब्राह्मण वेश में इसको ब्राह्मण समूह को बता दिया और जिसके फल स्वरुप ब्राह्मणों का अभिशाप उनके कुल को मिला था सम्पूर्ण कुल को राक्षस हो जाने का और फिर बाद में ब्राह्मणों को जब सत्य से अवगत कराया गया की पुलस्त्य ऋषि को बदनाम करने के लिए किशी अन्य व्यक्ति में भंडारे में जा कर मांश मिलाया था तो वे उस श्राप को कुछ कम कर भगवान् के मानव अवतार से कुल का उद्धार जो सुझाया था वह भी पूरा हो गया जैसा की स्वयं श्रीराम विष्णु अवतार थे ही) | अतः जिसमे ज्ञान के साथ-साथ नैतिक चरित्र, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता और विनम्रता होती है वह ज्यादा शक्तिशाली होता है यदि अवश्यक आवस्यकता में बाधा नहीं पहुँच रही हो तब अन्यथा नंगे शरीर रहने वाले और पेट को भरने की भी रोटी जिसे न मिलाती हो उसे संस्कार का उपदेश और सभ्यता का उपदेश सही नहीं लगता है।*******जय हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बूद्वीपे)), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण|


श्रेष्ठतम जहाज, योग्यतम उपग्रह, और श्रेष्ठतम क्रूज मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) का करतब तो रोमांचकारी, प्राणी जगत में प्रसंसनीय और उपयोगी होता ही है इसमे कोई संदेह नहीं पर उसको प्रारंभिक या सम्पूर्ण कार्य के लिए ऊर्जा जमीन से ही मिलाती है न की आसमान से। इससे ज्यादा मै हर कार्य में नीव की पहली इंट बनाने वाले व्यक्ति, माता-पिता, और मात्री भूमि (वन्देमातरम) के महत्त्व के बारे में कुछ नहीं कहूंगा। साथ ही साथ लक्ष्मीनारायण, सीता-राम और राधे-कृष्ण जैसे प्रचलित शब्दों से तो भारतीय संस्कृति में पुरुस से ज्यादा स्त्री के महत्व के बारे में जो धारणा रही है वह पूरा विश्व समाज जनता ही है उसके बारे में क्या कहना जहां बिना भार्या के कोई धार्मिक-सामाजिक कार्य या अनुष्ठान नहीं पूरा होता है। वहा स्त्री को प्रथम पूज्य मन ही जाता है (यात्रा पूज्यन्ते नारी रमन्ते तत्र देवता)। --- ----पर आधुनिक युग में ऐसे लोगों के सर पर पैर रखकर लोग निकल जाते हैं पर पैर के नीचे जो दब गया वह किश हाल में है उसे सोचने की किसे फुर्सत और स्त्री को ढाल बनाकर अपने किशी प्रति द्वंदी को नीचे गिराने मतलब स्त्री का नाजायज प्रयोग करने वालों की कमी नहीं है। लेकिन नहीं यह देश अशोक चक्र (धर्म चक्र=समय चक्र=संता मूलक चक्र) पर विश्वाश रखता है अतः इस देश के नागरिक विश्व कल्याण भाव से नीव की इंट बनाते चले जा रहे हैं और भारतीय नारिया बिना किशी इर्ष्या और द्वेष भाव तथा अपने ज्ञान का बेजा उपयोग (किशी को धोखा देने वाली चालाकी) केवल अपने स्वार्थ्य के लिए किये बिना सभ्य समाज का कंधे से कंधा मिलकर साथ देती चली जा रही है तभी तो नव निर्माण जारी है और भारतीय संस्कृति भी क्षीण नहीं हो रही है समय के बदलने पर भी। और भारतीय नारिया आज के बदले हुए माहौल में अधिकांश घरों में आज भी आदर की दृष्टी से देखी जाती है जहा माडर्न का मतलब समय के साथ-२ चलना तो है पर सभ्यता और संस्कृति का ह्रास नहीं।


Vaise Satya, Ahinsha, Astey(parayee vastu n lenaa) aur Aparigrah(asyakata se adhik grahan n karana) jaise anya sabhee dharmadesh chahe kishi bhee dharm ke hon sanatan dharm ki seemaa se bahar ke nahee vaise jaise mai yaa koi bhee vyati sanatan dharm ki seema se pare koi nayaa dharmik, adhyaatmik, darshanik yaa samajik gyaan samaj ko nahee de saktaa matlab sanatan dharm ke samudramay gyaan me sabhee dharm ke gyaan samahit ho jaate hai. Phir bhee sabhee dharm Vishv samaaj ko chalaane aur manav kalyaan ke liye ek ho jaate hai binaa kishi bhed bhaav ke atah sabhee dharmik sthaan ka samman sabhee dharmik vyaktiyon ka kartavya hai.


Jis Vivek Kumar Pandey ne spast shabdon me Gaura Parvati aur unke Kaali maai swaroop ke bare me anupaat ko spast kiyaa prakriti santulan aur usaki sundarataa ko banaye rakhane ke liye jo swayam jaroori aur prakriti ki santulal kshamataa me swayam nihit hai unakee KUL DEVI SWAYAM KAALI MAAI HEE HAI aur yah vishesh sanyog hai ki unake prathmik se snaatak star ke sabase priy aur yogya shikshak swayam Kurmavatari hee hain ve Brahman se lekar sabhee jaati se hain atah ve kishi ke saath bhed bhaav ki baat nahee kar sakte to nashlvaad yaa dalit virodhi hone kaa aarop niraadhar hai jahaa unakee official janm tithi unake pratham kakshaa ke kakshaa adhyaapak ne hee diyaa thaa jo swayam tathaakathit(Indian constitution say) dalit hai. Gauraa Parvati swayam prakriti aur Bhole Shiv Shankar swayam purush hai to prakriti shantulan unakaa kaam hai aur usake liye ve nav nirmaan aur vinash dono karate hain isame kishi ki kuchh nahee chalati hai atah aarop pratyaarop se bachana chahiye. Jai Hind, Jai Bharat, Jai Shri Raam, Jai Shri Krishna.


Yashodhara aur Rahul se poonchhana chahiye ki Saty, Ahinsha, Astey aur Apargrah se kaheen badhakar Satya aur Prem kyon hai aur isame sab kuchh kyon samahit hai jise Sidharth Gautam ne prapt kiyaa vah bhee apani jimmedari chhodkar matlab jitane din ve Isvar ki gyaan ke liye pratikshaa ki usase jyaadaa yashodhara ne unaki pratikshaa ki jinako aadhiraat ve chhodkar chale gaye the.


Rajneeti aur Saty mekeval ek antar hai ki aap rajneeti se saty tak pahunchate hain tab tak samaaj ko aap utane samay tak ke liye us vishay se sambandhit charcha me vyast kar sakte hai aur samay ko apnaa kaam karane kaa maukaa mil jaataa hai. Udaharan ke liye Shri Raam janm sthaan vaheen hain jahaan Raamlala hai yah akatya satya hai par jo vivaad hai isme vaj rajneeti hai isako bhee Raam charchaa kaa madhyam maanaa jaanaa chaahiye.


Bharateey Samvidhaan Bharateey Shasan Adhiniyam 1935 kaa 70% bhag aur America, Kanada, England samet 7 deshon ke samvidhaan ki nakal se banaa hai to is prakar adkikaansh roop se global hai kyonki Bharatiy Shasan Adhiniyam 1935 bhee Engaland vaalon ke shasan ke antargat banaa thaa atah usame kitanaa Bharateey samvidhaan nirmataon ka yogdaan hai aur is prakar vah kitanaa Bharateey ho payaa isa par prashn chinh khadaa hotaa hai un logon ke liye jo swaraaj me jeetaa huaa apane ko samajhate hai. Atah yah bhee eh karan hai ki swaraaj maan bhee liyaa jaay to bhee Suraaj sthaapit nahee ho paa rahaa hai Bharat me.


Balram aur Subhadra samet Bhagvaan Jagannaath=Jagadeesh=Akhilesh=Vishnu=Bhuvaneshvar=Shri Krishna se vishesh vinatee aur prarthna hai ki Bharat samet poore Vishv ke deshon me ve Shanti, Sauhardra aur Samridi laaye jisase vishv janmanas praphullit ho.


Jagatnaath, Jagadeesh aur Akhilesh jaise bharateey sanskriti ke shabd Vishv Bandhutv ko aur Vashudhaiv Kutumbakam kee Anaadi Bharateey bhavnaa ke pratyaksh pramaan hai aur Mandookopanishad ka Satyamev Jayate shabd jo Bharat ka ekmev Lakshya ghoshit kiyaa gayaa hai is desh ko aur adhik mahaan aur Gauravshaali hone ko prerit karataa hai atah hame aur dhairyavaan aur gyaanvaan tatha vigyaanvaan hone ki aavashyakataa hai.*******Jai Hind, Jai Bharat, Jai Shri Ram, Jai Shri Krishn.


Jahan Gaura Parvati(Durgaavatar yahee leti hai aur is avtar me ve Parvati+Lakshmi+Sarasvati hoti hai) ki pooja Shri Sita jee ne Shri Ram ko var ke roop me kiyaa thaa vahee usi Sita ko Vijay Dasami ke din Ravan se mukt karaane ke liye Shri Raam ne Durgaa maan ki poojaa me Kamal ke phool kam pad jaane par apani ek aankh nikaal kar chadaa diye poojaa ki thaali me aur Eknayan kahalaaye usee samay par Durgaa ji ne unaki aakha lauta deen aur phir yah vikiti turant mit gayee. Shri Raam ko Kamal nayan kahaa jataa thaa atah ve phool ke sthaan par apani aankha chadhaa diye. Mitron usee tarah kuchh meree pareekshaa Shri Raam aur Shri Krishna ne liyaa hai mere pair me fracture jaroor huaa aur punah theek ho gayaa atah jo kuchh huaa vah mere hit me huaa hai aur mai Isvar ko aur mere shubhchintakon ko meri taraph se dhanyavaad tathaa aabhaar.


Sanshkar, Sabhyata aur Sanskriti viheen Samaaj aur Samajik Vikash binaa lagaam ke Ghode ke samaan hotaa hai jo kab aap ko chhinn bhinn kar aap ke vinaash ko prapt ho yah kahaa nahee ja saktaa. Atah Sanshkar, Sabhyata aur Sanskriti jaisi sthitij urjaa aap kaa surakshaa kavach hai ise kripayaa aap nast n karen aur jahaan tak ho saken sanrakshit karen.


What is ASHOK CHAKRA:--------According to Hindu religion, the Puranas mention that only 24 Rishis wielded the whole power of the Gayatri Mantra. These 24 rishi in Himalaya are represented through the 24 letters of Gayatri Mantra. The all the 24 spokes of Dharmachakra are representation of all these 24 rishis of Himalayas in which Vishvamitra is first and Yajnavalkya is last who governs the religion(Dharma). Also Ashok Chakra is known as Samta Moolak Chakra and Samay Chakra in which all the 24 spokes represented 24 hours of the day and symbol of the movement of the time. Twenty Four Spokes: 1. Love 2. Courage 3. Patience 4. Peacefulness 5. Magnanimity 6. Goodness 7. Faithfulness 8. Gentleness 9. Selflessness 10. Self-Control 11. Self Sacrifice 12. Truthfulness 13. Righteousness 14. Justice 15. Mercy 16. Gracefulness 17. Humility 18. Empathy 19. Sympathy 20.Spiritual Knowledge 21. Moral Values 22. Spiritual Wisdom 23. The Fear of God 24. Faith or Belief or Hope


The Color Check in TIRANGA: The Flag’s saffron color symbolizes courage and sacrifice=(Duty of Shiva), green stands for faith and fecundity(intellectual productivity of a creative imagination)=(Duty of Vishnu), the white in the center depicts the inscribed mélange of unity, truth and peace=(Duty of Brahma). Lastly, blue represents the color of the sky and the ocean =(SAMARASTA). The Flag struts its stuff with the historical gem called the ‘Ashoka Chakra’ (or ‘Wheel of Law’). The ‘Chakra’ connotes the incessant growth of the nation and the virtue of justice in life. It is also seen on the Sarnath Lion Capital of Ashoka


Seven Continents: Asia, Europe, North America, South America, Australia, Africa, Antarctica. न मैं एशिया खंड हूँ, न उत्तरी अमेरिका खंड हूँ, न दक्षिणी अमेरिका खंड हूँ, न यूरोप खंड हूँ, न आस्ट्रेलिया खंड हूँ, न अफ्रीका खंड हूँ और न अन्तार्कतिका खंड हूँ मैं तो आप की पृथ्वी माँ हूँ | पर इससे पहले भारत माँ कि पुकार सुनना चाहिए कि हिंद (कश्मीर से कन्याकुमारी और इरान से सिंगापुर) तुम्हारा ही है| इस पुकार पर विचार करने कि लिए सबसे पहले "सत्यमेव जयते" का अनुयायी होना पड़ता है|


हर एक सामान्य भारतीय नारी से सीता और राधा की उम्मीद करना न्याय सांगत नहीं होगी सीता जैसी पवित्र आचरण वाली नारी जिसके चारित्रिक बल के कारन रावन हाँथ न लगा सका और राम की की विजय असली मायने में सफल हुई और साथ-२ सीता की भी नैतिक जीत भी हुई और राधा जिसने कृष्ण को प्रेम में जीता पर उनके सामाजिक पुण्य काम उनके माँ-बाप देवकी और बासुदेव को कंस के बंधन से छुड़ाने और उस जैसे पापी के वध के लिए हमेशा के लिए भुला दिया और दूसरा जीवन स्वीकार कर लिया अतः ऐसे चरित्र बल और बलिदान की क्षमता एक साक्षात् देवी माँ के अन्दर हो सकती है अतः सीता को आदर्श पत्नी होने के नाते राम के साथ पूजते है|


ॐ त्रयम्बकं यग्यामाहे सुगंधिपुस्ती वर्धनम उर्वरारुक्मिव बंधनती मृत्योर्मुक्षी मामृतात ॐ ऐं ही क्लिच्मुन्दाय विच्चे| Meaning: The four sacred Vedas, mankind's oldest scriptures, in tone, "To Rudra [Siva], Lord of sacrifice, of hymns and balmy medicines, we pray for joy and health and strength. He shines in splendor like the sun, refulgent as bright gold is He, the good, the best among the Gods." "He is God, hidden in all beings, their inmost soul who is in all. He watches the works of creation, lives in all things, watches all things.


काशी विश्वनाथ(वाराणसी) का उद्घोष "सत्यम शिवम् सुन्दरम" मानव समाज के सञ्चालन में तात्कालिक रूप से "सत्यमेव जयते" का आधार बनता है क्योंकि तात्कालिक रूप से इस्वर के अलावा कुछ भी पूर्ण सत्य नहीं रहता है हमारा परम्द्येय(दीर्घ कालिक) पूर्णसत्य होना चाहिए जिसका आंकलन जनता जनार्दन कुछ काल के बाद अपने आप करेगी तात्कालिक परिस्थिति यदि हमें तोड़ने वाली हो तो दूसरा रास्ता "सत्यम शिवम् सुन्दरम" का अपना लेना चाहिए जो हमें एक दिन "सत्यमेव जयते" पर अवस्य पहुंचाएगा गिरिधर गोपाल को मुरलीधर गोपाल कह देने मात्र से ब्रजेश-कृष्ण की महिमा को कोई चोट नहीं पहुँचती है|


पर जब आदर्श आत्मघाती हो जाए तो "सत्यम शिवम् सुन्दरम" न अपना कर "सत्यमेव जयते" ही अपनाया जाता है जैसा की न्यायालय में न्याय का आदर्श और सेना में वीरता का आदर्श वाक्य "सत्यमेव जयते" ही होता है लेकिन सुधारने का मौक़ा दिए विना दंड नहीं दिया जाता मतलब साफ है सभ्य समाज "सत्यम शिवम् सुन्दरम" के आदर्श को अपनाते हुए सामाजिक सामजस्य के लिए समझौता कर लेता है पर सम्पूर्ण हकीकत तो "सत्यमेव जयते" के आदर्श को अपनाने से आती है| अतः मेरे विचार से आप का पक्ष "सत्यमेव जयते" वाले का ही अपनाएंगे तो आप के विचारों का हम सम्मान करते है"सत्यम शिवम् सुन्दरम" के आदर्श वाला होते हुए|


हम सत्यम शिवम् सुन्दरम के भी पुजारी हैं अतः तिरंगे में चार रंग ( अशोक चक्र नीला और केंद्र बिंदु पर अति सीमित स्थान पर है सफेद रंग के साथ) होने के बावजूद हम उसे तिरंगा ही कहते हैं|


यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युथानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् | परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च: दुष्कृताम, धर्मं संस्थापनार्थाय सम्भावामी युगे युगे || -------------------------------------------------------------------------अपने अस्तित्व को बिना मिटाए हुए दूसरों के अस्तित्व को स्वीकार करना और सम्मान करना सामर्थ्शाली-पुरुसार्थी व्यक्तित्व का प्रथम लक्षण है और यही अहिंसा का सबसे प्रमुख उपदेश है|


विश्वामित्र (कौशिक) को विश्व-रथ भी कहते थे हैं कहा जाता है की जब वे प्रारंभ में ब्रह्म-ऋषि से राजर्षि बने थे तो पूरे विश्व में जिधर उनका रथ मुड जाता था था उधर ही उनकी विजय तय थी और इसी लिए उनका यह (विश्वरथ) नाम पडा और उनकी सत्ता पूरे विश्व में मानी गयी पर उनके प्रारंभ में ब्रह्मर्षि होने के नाते ब्राह्मणों के भी गोत्र कौशिक होते हैं । और पुनः उनके ब्रह्मरिशी होने के इतिहास से तो पूरा विश्व परिचित है जिनके नाती भरत के नाम से मेरे देश (अखंड भारत) का नाम भारतवर्ष पडा और पूरा भारतवर्ष आर्यावर्त बना।


अगर संभावित अति शूक्षमतम कण से परमब्रह्म की उत्पत्ति हो सकती है जिनसे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना हुई (जो पुनः परमब्रह्म में समा कर संभावित अति शूक्ष्मतम कण में पुनः परिवर्तित हो सकती है) तो अगस्त्य ऋषि या कुम्भज ऋषि जो सप्तर्षियों के एकमेव संयोग से जन्म लिए थे के द्वारा सातों महासागरों का जल एक छोटे से घड़े में क्यों नहीं समाहित किया जा सकता है और इस प्रकार केरल/तमिल के मलय (तत्कालीन नाम) देश में उत्पन कुम्भज ऋषि ज्ञान के भण्डार क्यों नहीं हो सकते हैं ?


जन्मभूमि प्रेम यही होता है की विश्वामित्र और अगस्त्य ऋषि के इन गुणों के रहते हुए भी श्रेणी यही होती हैं शुध्धता और श्रेष्ठता की : गौतम, वशिस्थ, कश्यप, भारद्वाज/अन्गारिषा, जमदग्नि/भृगु, दुर्वाषा/अत्री, विश्वामित्र/कौसिक और आगस्तय (कुम्भज)। --------इससे ज्यादा क्या कहूं की जो फेर बदल हुआ गर्ग (a generation of Disciple of Bharadvaj Gurukul), गौतम, शांडिल्य (derivative of Vasishtha and Kashyapa originated at Kashmir), वशिस्थ, कश्यप, भारद्वाज/अन्गारिषा, जमदग्नि/भृगु, दुर्वाषा/अत्री, विश्वामित्र/कौसिक और आगस्तय (कुम्भज) का वह द्वितीय स्तर का है न की प्रतह्म स्तर (केवल सप्तर्षि और उनसे उपजे अगस्त्य:कुम्भज ) का। इस प्रकार गौतम और वशिस्ठ आज तक सर्वश्रेस्थ है और आप गौतम गोत्रीय क्षत्रिय शिद्धार्थ:गौतम बुध्ध पर ही आज तक टिके हुए हैं। कश्यप गोत्र लगभग सभी विष्णु अवतार को जन्म दिया पर कश्यप गोत्र, गौतम और वशिस्ठ को सर-माथे पर चडाता है और उन्हें क्रमशः श्रद्धेय और पूज्य मानता है तो गौतम गोत्रीय क्षत्रिय सिध्धार्थ को भगवान् मान भी लिया जाय तो क्या वे गौतम ऋषि से ऊपर हो सकते हैं जो उनके अनादी जन्म दाता मतलब उनके गोत्र को ही जन्म दिए हैं।------


Wednesday, July 17, 2013

Satyamev Jayate to Satyam Shivam Sundaram and Satyam Shivam Sundaram to Satyamev Jayate is a clear cut picture to maintain the humanity on the Earth by India i.e. 1. Justice, 2. Truthfulness, 3. Patience, 4. Peacefulness, 5. Courage, 6. Goodness, 7. Faithfulness, 8. Gentleness, 9. Selflessness, 10. Self-Control, 11. Self Sacrifice, 12. Magnanimity, 13. Righteousness, 14. Love, 15. Mercy, 16. Gracefulness, 17. Humility, 18. Empathy, 19. Sympathy, 20.Spiritual Knowledge, 21. Moral Values, 22. Spiritual Wisdom, 23. The Fear of God, 24. Faith or Belief or Hope



Satyamev Jayate to Satyam Shivam Sundaram and Satyam Shivam Sundaram to Satyamev Jayate is a clear cut picture to maintain the humanity on the Earth by India i.e. 1. Justice, 2. Truthfulness, 3. Patience, 4. Peacefulness, 5. Courage, 6. Goodness, 7. Faithfulness, 8. Gentleness, 9. Selflessness, 10. Self-Control, 11. Self Sacrifice, 12. Magnanimity, 13. Righteousness, 14. Love, 15. Mercy, 16. Gracefulness, 17. Humility, 18. Empathy, 19. Sympathy, 20.Spiritual Knowledge, 21. Moral Values, 22. Spiritual Wisdom, 23. The Fear of God, 24. Faith or Belief or Hope

प्रिय भाइयों एवं बहनों एवं आदरनीय गुरुजन एवं मात्री-पित्रीजन,--------------------विश्व के हर संविधान में लिखा है जब किशी मामले का निवारण संबिधान में वर्णित नियम से न हो तो न्यायाधीश को अपने "विवेक" से काम लेना चाहिए तो मेरे जैसा विवेक यह कहता है कि अमेरिका तथाकथित विश्व शक्ति है पर असली विश्व शक्ति यह हिंद भूमि का "अखंड भारत" है क्योंकि यह विश्व मानवता का निर्यातक देश है श्रीस्ति के प्रारंभ से ही| ---------------------

देवताओं के गुरु (ब्रहस्पति देव) के गुरु भाई शुक्राचार्य (जिनके शिष्य दैत्य थे) के पास भी ज्ञान और विज्ञान कम नहीं परन्तु दैत्य हर युध्ध में पराजित हुए अतः ज्ञान और विज्ञान का समाज में किस प्रकार प्रयोग हो रहा है यह निर्धारित कर ज्ञान और विज्ञान का सदुपयों सुनिश्चित किया जाय तो यह ज्ञान और विज्ञान के विकाश को और अधिक महत्व प्रदान करेगा तुलनात्मक रूप से कि ज्ञान और विज्ञान के विकाश की होड़ में हम मानवता ही खो दें| ऐसा करने से व्यक्ति विशेष के जीवन और सम्पूर्ण समाज के जीवन में और अधिक आनंद का संचार होगा|----------विशेष: कोई समाज या समाजवाद सम्पूर्ण सत्य को जान सकता तो मानव के रूप में इस्वर की आवश्यकता ही क्या थी। -----------------अगर समाजवाद और सामाजिक न्याय का मतलब ब्राह्मणों को नीचा दिखाना है तो वह कभी भी फलीभूत नहीं होगा इस बात को मई सत्य करके अपनी जिन्दगी में दिखाया हूँ जबकि मुझे किशी जाती से कोई गिला नहीं पर मई उनसे दया की भींख भी नहीं मांगता कारण संख्याबल मत देखो कोई एक भी ब्रह्मण रहा सृस्ती में तो बह भी विश्व की एक तिहाई शक्ति का अकेले स्वामी होगा ब्रह्मा की तरह और जिस तरह तिरंगा मतलब ब्रह्मा + विष्णु + महेश का अस्तित्व बिना स्त्री के संभव है उसी तरह उसका भी अस्तित्व स्त्री के अभाव में भी संभव होगा अतः किशी स्त्री को सिखंडी, पूतना, सूर्पनखा की तरह प्रयोग भी किया जाय तो उसके पुरुषार्थ में कोई अंतर नहीं आयेगा। मै किशी भी बाप का संतान हूँ पर ब्रह्मण हूँ और मुझे उसी तरह ब्राह्मण और हिन्दू होने पर गर्व है जैसे किशी को क्षत्रिय और वैश्य होने पर गर्व है या ब्रह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनो एक साथ होने पर गर्व है पर उसे किस बात का गर्व जो इनमे से किशी एक सामाजिक स्टार को पाने के लिए संघर्ष कर रहा हो। हाँ उसे नस्ल सुधार का लालच अवश्य सताता है और इसके लिए किशी भी स्टार तक गिर सकता है और उसी स्तर पर तथा -------------------टिपण्णी: अगर ब्राह्मण श्रेष्ठ न होता तो कोई ज्योतिषी किशी तथाकथित राधा को अतिदुर्भाग्यशाली न बताता आज के 14 वर्ष पूर्व जो वर्तमान में दूसरे धर्म और जाती में शादी कर चुकी हैं। कृष्ण को किशी ने दुर्भाग्यशाली नहीं कहा बल्की होनहार अवस्य कहा है जबकि उनके माता और पिता की जीवन सतर ठीक नहीं था पर हाँ कुल उच्च था।--------- ------------------- जहां कृष्ण ने शिध्ध किया की की निजी प्रेम से ऊपर समाज कल्याण और माँ-बाप का कल्याण है: उनकी कारागार से मुक्ति दिलानी है वही शिव ने शिध्ध किया सच्चे प्रेम के लिए रास लीला जरूरी नहीं वरन अटूट आस्था अनिवार्य है। अतः कृष्ण के जीवन से कहाँ यह द्रिस्तिगोचार होता है की निजी प्रेम के लिए समाज कल्याण और माँ-बाप के कल्याण की भावना को तिलांजलि दे दी जाय हाँ यह जरूर था की वे दिव्य शक्ति होने के नाते कुछ ऐसा काम अवस्य किये थे जो था तो सम्पूर्ण सत्य के करीब पर आम सामाजिक भावना में सत्य से हट कर था|*******जय हिंद, जय भारत, जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण|

 

 

मैं क्या कर सकता हूँ? यह पूंछने वाले को मैं अत्यंत स्वाभिमान से बता रहा हूँ कि मेरा सुखी दाम्पत्य जीवन ही एक मात्र लक्ष्य नहीं था और न है वरन इसके साथ मुझे जो करना था वह मैं विश्व समाज, रास्ट्र, धर्म, जाती, कुटुंब और अपने लिए (सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए) कर चुका हूँ कुछ बाकी नहीं रखा हूँ  आप को जबाब देने के लिए भविष्य में: केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र कि स्थापना में विशेष सहयोग कर और उसे अस्तित्व में लाकर जिस वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र का विरोध अकारण वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान के क्षेत्र में बहुसंख्यक दक्षिण भारतीय भाई लोगों द्वारा किया गया था और इसके कार्यरत रहने पर प्रश्न चिन्ह लगाया था अनवरत रूप से| इस केंद्र को सदियों तक जीवित रखने के लिए मैंने भी आत्मघाती कदम उठाये थे जिसे इलाहाबाद (प्रयाग) विश्व विद्यालय के लोग जानते भी हैं| इस केंद्र कि स्थापना हो गयी है वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान के अध्ययन के लिए और मैं अपने लिए एक शिक्षक का पद भी इसी केंद्र में पा चुका हूँ| अतः इससे बढ़ा स्वाभिमानी जबाब क्या होगा मैं दक्षिण भारतीय भाइयों को भी उसी त्याग, तपस्या और बलिदान से मात दिया जिससे कि कंश मामा और उनके समर्थकों से|----------मेरा जिन देवियों ने अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन किया उन देवियों को धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिस तरह से कृष्ण कि बहन दुर्गा को स्वयं कृष्ण ने कंश वध और राम ने रावन वध के समय इन्ही से शक्ति और आशीर्वाद पाया था|-----------------------------मैं शक्ति कि देवियों पर उंगली उठाने वाली हर आशुरी शक्तियों का दमन करने का वादा करता| मैं यही भारत और विश्व स्वाभिमान के लिए करूंगा मुझसे प्रश्न पून्छनें वाले सुन लें| मैंने यह कुछ लिखा पढी जो की वह दुनिया में जीन्दगी को रोचक बनाने के लिए किया जिससे जीवन में नीरसता कि वजह से ब्रह्मा का वरदान खूबसूरत जीन्दगी से ऊब कर आत्म ह्त्या का मार्ग न अपनाए वरन सुखद भविष्य की आश में जीवित रहे इसके शिवा भविष्य का हर मंजर मैं २००१ में ही देखा लिया था और क्षत्रिय और वैश्य शक्तियों में ब्राह्मणों के प्रति जो द्वेष था वह यह कश्यप गोत्रीय (शूर्य्वंशीय) ब्राह्मन दूर कर समाज को बचाने में जुटा था कारण था कि पार्वती के शिवा ब्रह्मपुत्र दक्ष प्रजापति कि सभी कन्यायों की शादी कश्यप ऋषि से हुई थी जिसमे अदिति से देवता (आदित्य=शूर्य्वंशीय एवं सुरलोकवाशी) और बाकी लड़कियों से असुर(दानव), नर, किन्नर, नाग, और गरुण सब जन्म लिए थे अतः कोई कश्यप गोत्रीय ही किशी को नाग, दानव कह सकता है सामाजिक दोस को दूर करने के लिए बिना किशी भय के मानवता कि रक्षा के लिए और तो और यह हिन्दू धर्म का प्रथम प्रवेश द्वार भी है|*******जय हिंद (जम्बू द्वीपे: कश्मीर से कन्याकुमारी और इरान से सिंगापुर), जय भारत (भरतखंडे =अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण|

मेरे ऊपर कई परीक्षण हुए पर असफल रहे मुझे विचलित करने में और मुझे २००७ अक्टूबर से दिसम्बर, २००७ तक में ही, मतलब केवल तीन ही महीने में भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलूर में हिदू आतंकवादी होने का आरोप भी लगाया मेरे अपने तेज और निर्भीकता के डर के नाते क्योंकि वे मेरे पुरुषार्थ को ख़त्म हुआ समझ रहे थे पर मैं जीवित और सुरक्षित था अपने मूल स्वरुप में| ------------------ टिप्पणी: दान सुपात्र व्यक्ति को दिया जाय जिससे कि मानवता का ह्रास न हो यह विधि सम्मत है और इसी संदर्भ में यहाँ यह बता दें कि भगवान् विष्णु ने शिव जी से बारम्बार अनुरोध किया था कि भगवन आप किशी दुराचारी व्यक्ति को ऐसा कोई वरदान न दीजिये अपनी पूजा से प्रसन्न हो कर कि मानवता कि गति को वह बाधित कर दे या समाज का अधोपतन हो जसा कि शिव जी अवधार दानी कहे गए है और बहुत से दुराचारियों को मनवांछित वरदान दिए हैं जिससे मानवता त्रस्त हुई है|--------------------------अतः मैं आम मानव समाज से अनुरोध करूंगा कि सबसे बड़ा दान= कन्यादान किशी ऐसे पात्र मानव को कीजिये कि स्वयं आप और आप का समाज अधोगति को प्राप्त न हो और अगर आप के वस् में आप कि संतति न हो तो आप अपने द्वारा यह दान देना स्वीकार न करें| ---------------------------------------------------------रही बात किशी के पात्र होने के लिए उसके पिता के मानशिक विकृति कि अवस्था को जिम्मेदार ठहराने कि तो मानशिक विकृति या पागलपन यदि दवा से नियंत्रित हो तो वह उन लोगों के माता-पिता से अच्छा है जिनके माता-पिता कोमा कि अवस्था में चले गए हैं और अभी भी जीवित है या बहुत दिनों तक जीवित थे| जहां तक मुझे ज्ञात है मेरे कई मित्रों के परिवार के साथ ऐसा हुआ है और उनको लोग स्मार्ट कहते है और व्यक्तिगत रूप से मेल जोल भी है उन लोगों से जो दूसरों के दवा से नियंत्रित माता-पिता पागलपन पर उंगली उठाते है| *******जय हिंद(कश्मीर से कन्याकुमारी और इरान से सिंगापुर), जय भारतवर्ष, जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण|

 जलवायु आधारित धर्म (हिन्दू*, मुस्लिम* और इसाई*) अगर कोई भी नहीं तो ये धर्म=जाती: ब्राह्मन या क्षत्रिय या वैश्य अवश्य ही होगा जन्म या कर्म आधारित| (#1) (अंत:करण 4 ) मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार (#2) (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण (#3) (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद, हस्त, उपस्थ (nursing), पायु (मलद्वार|गुदा), वाक् (बोलने कि प्रक्रिया) (#4) (तन्मात्रायें 5) गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द (#5) ( महाभूत 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश| २४ तत्वों से २५ सवा तत्व आत्मा-शरीर-समाज प्रभावित होता है और इन २५ तत्वों से २६ सवा तत्व इस्वर प्रभावित होता है| अतः इन सभी २४ तत्वों में संतुलन अति आवश्यक है शरीर, समाज और इस्वर को शांति और संतुलन में रखने के लिए|--------------टिप्पणी: जो ११ (ग्यारह) अगस्त, २००१ दिन श्रीकृष्ण जन्मास्टमी के दिन दिए बचन को इस लिए झूंठा शिद्ध करे कि वह तथाकथित विश्व की महाशक्ति (आर्थिक और सामरिक) का अभिकर्ता (एजेंट) है तो वह मेरे जैसे लोगों के साथ संभव नहीं है यह अलग बात है वह उसका पालन किया गया कि नहीं किन्ही व्यक्तिगत, सामाजिक और रास्ट्र हित हेतु|------------------------------------------------- दुनिया का शक्ति संतुलन और शान्ति हिन्द (कश्मीर से कन्या कुमारी और इरान से सिंगापुर) को विस्वाश में लिए बिना संभव नहीं है|---------------- जब तक तीन देव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की परिकल्पना जीवित है तब तक तिरंगा रहेगा और इसके मध्य और केन्द्रीय नियंत्रण का भाग सफेद रंग और अशोक चक्र उसी तरह अजेय रहेगा जैसे केशरिया (सुरक्षा-क्षत्रित्व) और हरा(समृद्धि-वैस्यत्व)|*******जय हिंद(कश्मीर से कन्याकुमारी और इरान से सिंगापुर), जय श्रीराम|जय श्रीकृष्ण|

 

महामंगलेश्वर हनुमान जैसा ब्रह्मचर्य नहीं वरन सर्वश्रेष्ठ सती अनुसूइया के पुत्र मझुई और तवश नदी के संगम पर रमण करने वाले ऋषि दुर्वाषा है जो हनुमान की ही तरह अजर और अमर हैं और जिनका अभिशाप और आशीर्वाद दोनों ही कल्याणकारी है जिसका उदहारण कुन्तीपुत्र कर्ण और दुष्यंत पुत्र भरत है जिनको इसी बहाने कान्व ऋषि की परिवरिश मिली|राम और कृष्ण के जीवन की भी अवधि इस पृथ्वी पर वे ही निर्धारित करते हैं और ऐसा कोई ऋषि करने में सक्षम नहीं है| प्रत्यक्ष ब्रह्मा+विष्णु+महेश का सामना कोई भी व्यक्ति उनके आशीर्वाद से कर सकता है और विश्व की सब शक्तियां उनके सामने शून्य है|



विश्वामित्र की राजर्षि से ब्रह्मर्षि बनाने की इन्द्र के आदेशानुसार मेनका द्वारा परीक्षा लेना और उससे उत्पन्न संतति शकुन्तला के हस्तिनापुर के चन्द्रवंशीय राजा दुष्यंत से उत्पन्न पुत्र भरत को भरत को आर्यावर्त घोषित करवाने की भी शक्ति और तेज भी कश्यप ऋषि के वंशज कंव ऋषि (या कश्यप ऋषि पुनर्जन्म) ने उसी तरह दिया था जैसे की राजा दशरथ" का अवतार ले शूर्य्वंशीय राजा "राम" को वैस्नव और शैव को एक करने की शक्ति दी थी| अतः कश्यप ऋषि चन्द्रवंश और सूर्यवंश दोनों के लिए विश्वामित्र से भी ज्यादा प्रिय है| विशेष: बड़े लोग (ऋषि-महर्षि) अनजाने में गलती करके और उसके परिणाम स्वरुप गिर करके भी सामाजिक हित ही करते है उससे समाज की कोई हानि नहीं होती : " गिर कर क्षिती को भी सरसायें"| संदर्भित विचार: मेरे जैसे राम के गोत्र (कश्यप) लेकिन ब्राह्मन कुल में पैदा होने वाला राशि गत रूप से कृष्ण भी "जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण कहो या राम" ही कहता है| भारतीय संविधान जहां सीमित हो जाता है वहां स्वविवेक पर कई छीजे छोड़ दी जाती है और वह कोई न्यायाधीश "अपने अन्दर की आत्मा के सत्य)" से निर्णय देता है और इसी लिए "सत्यमेव जयते" को भारतीय संविधान से ऊपर माना जाता है| अतः जिसको यह सब यम-नियम-योग-विधान-संविधान और वियोग कुछ न समझ में आये वह सत्यनारायण भगवान् यानी सत्यमेव जयते की शरण में आ जाए| ये सत्यनारायण भगवान् जिस रथ पर सवार होते है उसका सारथी स्वयं धर्मराज/यमराज और सातों सूर्य के समां आभा वाले घोड़े "सप्तर्षि होते है" जो वर्तमान २४ ऋषियों के जन्मदाता है| दुनिया में सबसे सस्ती उपासना/अर्चना/पूजा/तपस्या/वंदना/साधना सत्यनारायण भगवान् की है और इसको निर्धन और बलवान दोनों अपनी श्रध्धा से कर सकते है यह है सनातन हिन्दू धर्म की सरलता और उदारता की जो केवल सत्य को ही माने वह भी हिन्दू है कोई आडम्बर की जरूरत भे नहीं अतः अब कौन धर्म बचा जो हिन्दू धर्म की परिधि से बहार हुआ|

 

स्वयं सर्व्श्रेस्थ ग्यानी और सभी चमत्कारों से युक्त श्री कृष्ण और धर्मराज युधिस्ठिर महाभारत में जगह-जगह पर मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम को आदर्श मानते हुए उनके जीवन में स्थापित हुए आदर्श को सप्रसंग उद्ध्वारित किये हैं और तो और सत्यबालि को भी राम-बालि प्रसंग से प्रेरित हो कृष्ण ने पटरानी बनाया सत्यभामा और सूर्य पुत्री यमुना की तरह सत्य एक मात्र सत्य पत्नी "रुकमनी" के साथ| अतः यह सत्य है की स्वयं श्री कृष्ण भी राम को लोक मर्यादा में राम को अपना आदर्श मानते थे पर कृष्ण राम न बन सके इसका कारण था राम सम्पूर्ण अलौकिक शक्ति (तीन अन्य भाइयों) के साथ जन्म लिए थे और उनको वशिस्थ जैसा कुल गुरु मिला जो उनके जीवन के अंतिम समय में भी कुलगुरु था वही कृष्ण अकेले जन्म लिए और कुलगुरु नहीं संदीपनी ऋषि के गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण की जहां से निकालने के बाद गुरु का आशीर्वाद ही साथ में था गुरु नहीं-मतलब गुरु से सुझाव लेने स्वय जाना पड़ता| कृष्ण को न तो दशरथ के समान प्रभावशाली और समर्थ पिता मिले और न "वृषभान" अपने को "जनक" जैसे के रूप में स्थापित कर सके| राम और कृष्ण में एक विशेष समानता थी की दोनों के सामरिक गुण के परीक्षक अजर-अमर परशुराम ही थे जिन्होंने बचपन के साहशिक कार्यों को देखते हुए (क्रमशः राम का विश्वामित्र यज्ञरक्षा-शिव धनुष भंजन और कृष्ण का कंश वध) दोनों से प्रभावित हो क्रमशः राम को अपना धनुष और कृष्ण को सुदर्शन चक्र दिया | दोनों पर त्रिमूर्ति की शक्ति के बराबर शक्ति वाले अजर-अमर ऋषि दुर्वाशा की विशेष कृपा थी और दोनों की मानव लीला को ही उन्होंने समाप्त करने का कारण अपने को ही बनाया क्योंकि समय चक्र या धर्म चक्र की रक्षा करने का वरदान किशी दुर्वाषा को ही होता है| दोनों के परम भक्त हनुमान थे और जो हनुमान परोक्ष रूप से अपने गुरु "सूर्य" की पुत्री "सुवर्चला" के पति और "मकरध्वज" के पिता होने का गौरव भी हाशिल किये जबकि प्रत्यक्ष रूप से हनुमान अजर-अमर-अविनाशी और ब्रह्मचारी ही होने का वरदान पाए थे| दोनों की आस्था का मिलन (चन्द्रवंश और शूर्यवंश) बिंदु तीर्थराज प्रयाग है जहां सूर्यपुत्री यमुना (श्री कृष्ण कि पटरानी) का मिलन शिवपुत्री गंगा से होता है फिर दोनों ही शिवपुत्री गंगा ही बन जाती है और जहा तक के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने का श्रेय राम के पूर्वज भागीरथ को जाता है| तो मै कहना चाहता हूँ कि आदर्श और श्रेष्ठ सूर्य हो सकता है पर इस श्रिस्ति का सुचारुरूप से सञ्चालन के आधे का हक़ चन्द्र को जाता है जो उसका भाई है|

अशोक चक्र या समय चक्र या धर्म चक्र जब दुर्वाशा तोड़ते हैं अनर्थ और अधर्म बढ़ जाने पर तो उसको जोड़ने की कला और निपुड़ता केवल और केवल कश्यप ऋषि को ही हाशिल है अन्य सभी ऋषि तो केवल बने बनाये नियम में ही काम कर पाते हैं या ब्रह्म, विष्णु और महेश की सरन में चले जाते है| |जब आप समाज के सबसे कमजोर से कमजोर व्यक्ति के जीवन के अधिकार और मानवीय अधिकार को सुरक्षित रखने का सच्चे हृदय से सकारात्मक प्रयास करेंगे तो समाज के सभी तबके का हित उसमे अपने आप निहित होगा और इसके लिए भारत के हर नेता को दीनदयाल और अम्बेडकर के साथ गाँधी और नेहरु बनाना पडेगा|  

 

ब्रह्मण का महत्त्व सामान सामाजिक स्तर पर रहने वालों के लिए इसी से समझ लेना चाहिए सम्पूर्ण विश्व को कि "ब्रह्मा = विष्णु = महेश" पर ये तीनो जब मिलते हैं तो परमब्रह्म ही बनता है न कि परम विष्णु या परम महेश| यहाँ जानने वालों से यह नहीं छिपा है कि अनादी हिन्दू धर्म का प्रथम विभाजन भी ब्रह्मा के कर्म और गुण से प्रेरित हो ब्राह्मन-शिक्षण, विष्णु के कर्म और गुण से प्रेरित हो वैश्य-पोषण और महेश (शिव) के कर्म और गुणसे प्रेरित हो क्षत्रिय-रक्षण के रूप में हुआ तो आप ब्राह्मन शक्ति को किस प्रकार पराजित कर रहे थे? .ब्रह्मण से जो भी मिला वह ब्राह्मन हो गया अपने प्रारंभिक स्वरुप में वह कभी भी बिना प्रभावित हुए नहीं लौटा| मै सब शक्तियों को समुचित सम्मान देकर कहता हूँ कि विश्व में ब्राह्मन सदा सर्वोच्च रहा है और रहेगा और इसका कारन है कि त्याग ही ब्राह्मन का परम धर्म है यदि यह त्याग समाज में सामाजिक समरसता और शांति कि स्थापना करता है| मै स्वयं इस बात का प्रमाण हूँ और श्रीमद्भागवत उपदेशित करते हुए कृष्ण (परमब्रह्म कृष्ण) कि हर बात पर खरा उतारूंगा| मै अपने जीवन में मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम को विश्व के इतिहाश का सबसे बड़ा आदर्श मानता हूँ और अपने से उच्च हर किशी भी व्यक्ति का सादर सम्मान करता हूँ चाहे वह किशी भी जाती और धर्म से क्यों न हो| मै हर क्षत्रिय, वैश्य का उतना ही सामान करता हूँ जितना कि किशी ब्राह्मन का पर अपने से उच्च ब्राह्मणों को गाय, गंगा और गायत्री के सामान पूज्य और पवित्र मानता हूँ| अगर क्षत्रिय और वैश्य आज के समाज कि आवश्यकता हैं तो ब्राह्मन परम आवश्यकता हैं अतः विश्व समाज को ब्राह्मणों के आलावा अन्य लोगों को भी ब्राह्मन बनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए न कि हतोत्शाहित|....ब्रह्मण का शाकाहारी होना ही एक मात्र लक्षण ऐसा है जो पारिवारिक, भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है बाकी सब हर स्थान पर एक है अतः मेरे विचार से यह बाध्यकारी नहीं है|

मैं तुलसी भी हूँ, मैं नीम भी हूँ, मैं पीपल भी हूँ, मैं बरगद भी हूँ और मैं खजूर भी हूँ - मैं हिन्दू भी हूँ, मैं मुस्लिम भी हूँ, मैं ईसाई भी हूँ|  

मैं सब नकाब और पर्दा हटवा दूं पर मुझे पूरा विस्वाश है की विश्व में जितने सूर्य है उनका आलोक मध्यम पड़ जाएगा और तो और लगभग सभी ऋषि महर्षियों की ज्ञानेन्द्रिया आम जनमानस के लिए ज्ञान का प्रकाश न उत्सर्जित कर स्वयं एक ज्ञान शून्य-ब्लैक होल (काला छिद्र) हो जायेंगी| स्त्री यदि स्वयं एक शक्ति और दुर्गा है तो वह किशी से शादी करने के बाद भी दुर्गा ही रहती है चाहे वह किशी धर्म और जाती से शादी करे| अगर यह चीज परदे में है तो उसे रहने देना चाहिए और उसका सम्मान करना चाहिए| मुझे आशा है की भारतीय उप महाद्वीप और अरब देश उसपर पश्चिमी सभ्यता नहीं थोपेंगे और न ही पश्चिमी खुलेपन को बढ़ावा देंगे तथा लाज और शर्म का पर्दा बने रहने देंगे क्योंकि राजर्षि ऋषि विश्वामित्र का ब्रह्मर्षि बनाने का प्रथम प्रयास बेकार गया था इससे तो ये भारतीय उप महाद्वीप (विषुवतीय और उसन कटिबंधीय देश) के लोग परिचित ही हैं|

हनुमान से बड़ा कोई भी अम्बे माँ का कोई भक्त और सपूत नहीं हुआ चाहे वह दुर्गा, पार्वती, सरस्वती, सीता (लक्ष्मी), अंजना, भारत माँ, पृथ्वी माँ या अन्य संभावित माँ हों| अतः सत्कर्म कीजिये, जय हनुमान का जाप कीजिये जय श्री राम के जाप के साथ और हर तरह की आधुनिक भव बाधा (जातिवाद, दलितवाद, अल्पसंख्यकवाद, सम्प्रदायवाद और आतंकवाद तथा उग्रवाद भी ) से मुक्ति पाइए| 



 ज्ञान, विज्ञान, विवेक और राजनीति का प्रथम कर्तव्य है की वह आम आदमी के जीवन में जीवन की इक्षा को बनाने रखे और उसके जीवन रुपी चिराग को झंझावातों से बचाकर आनंद भर दे जिस तरह भगवान् श्री कृष्ण ने देवकी और वाशुदेव तथा मथुरा वाशियों और राम ने ऋषि मुनियों के जीवन में आनंद भरा था| यह सब गुण जिसमे एक साथ हो और इसके अनुकूल आचरण करे तथा इस तरह दूसरों के आनंद से आनंदित हो वह है विवेकानन्द या सत्चिदानन्द|

Avidyayaa mrutyum teerthwaa vidyayaamrutamasnute ("अविद्यया मृत्युम तीर्थवा विद्यया अम्रुतमस्नुते ")=जब आप को अन्धकार में भी प्रकाश मिले वह ज्ञान है और जब ज्ञान कारन कुछ करने कि जब चेतना मिले वह जाग्रति बुद्धि है और जो चेतना इस्वर (सत्य) के दिव्य दर्शन कराये वह विवेक है "यह तीर्थराज (संगम:गंगा, जमुना और सरस्वती) प्रयाग का उद्घोस है | मुझे आशा है कि भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलूरु में जो मित्रगन हमें ऑरकुट पर नहीं पढ़े थे वे इसको पढ़कर अवस्य इस्वर (सत्य) के दर्शन अपने जीवन में करेंगे और करांगे तथा संसार से अज्ञानतारूपी अन्धकार मिटाने में मेरा सहयोग करेंगे| पर जो पहले से ही विवेकवान है वो लोग हमें क्षमा करेंगे मै कोई बडबोलापन दिखने कि चेस्था नहीं कर रहा यहाँ पर हां मै जबाब देह हूँ यहाँ कि सब वाणी का |

मित्रों जहां सूर्यनारायण सात सोने के समान आभा (चमकने) वाले घोड़ों के रथ पर सवार होते है वही सत्यनारायण सात सूर्य के समान आभा (चमकने) वाले घोड़ों के रथ पर सवार होते हैं, यह घोड़े कोई और नहीं बल्कि सप्त-ऋषि ही हैं इनमे से प्रत्येक की आभा और यस किशी सूर्य से कम प्रकाश देने वाला नहीं है इन सातों घोड़ों वाले रथ की लगाम को पकड़ने का साहस केवल सत्यनारायण=इसनारायण=ब्रह्म्कां त =शिवकांत=विष्णुकांत=परमब्रह्म (ब्रह्म-विशुन-महेश के साथ यदि कान्त हो तो = स्वामी: ब्रह्मा, विष्णु और महेश के भी स्वामी या इनकी सम्मिलित शक्ति परमब्रह्म)ही कर सकते हैं या सभी ऋषिओं के प्रसाद से उत्पन्न सीता और राम के सत्यपुत्र (निह्संदेश सीता और राम का खून) और महर्षि बाल्मीकी के शिष्य पुत्र लव और कुश| आज भी जिस किशी भी धार्मिक अनुष्ठान को सुरु किया जाता है हिन्दुओं में तो सत्यनारायण व्रत कथा के पूर्ण होने के बाद ही सुरु किया जाता है अतः जो लोग केवल सत्य और प्राकृतिक संतुलन के देवता को ही इस्वर मानते हैं यहाँ उनके किये इस सृष्टी को नियंत्रित करने वाला केवल एक सूर्य या रविन्द्र नहीं सात-सात रविन्द्र को नियंत्रित करने वाले तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ हुआ है: "तेजस्विनाधिमास्तु" यह है पूर्वांचल या अवध प्रान्त या कौसल| अतः आओ लव-कुश-ध्रुव-प्रहलाद बने हम| जहां पर राम जैसे पिता के आज्ञाकारी पुत्र पैदा हुए कश्यप गोत्र में वही विश्व के सबसे प्रतापी और आक्रांत पिता (हिरन्यकश्यप) को मात देने वाला पुत्र प्रहलाद भगत (नरसिंह) और अपनी पिता उत्तानपाद और विमाता को मात देने वाले ध्रुव (Vishnu made Pole Star) जैसा विष्णु आराधक पैदा हुआ है|

हाँ हम भीम का ह्रदय से सम्मान करते हैं यदि वे परोक्ष रूप से शिव-शंकर (वह शंकर जो विनाशकारी न हो)=शशिधर=राकेशधर=सुरेश=सतीश या स्वयं केशरी नाथ हों फिर भी हम उनको जय हिंद ही बोलेंगे या महाबली भीम जी जय बोलेंगे किशी कीचक या दुह्शासन के वध पर कुछ समय के लिए लेकिन जय भीम का जाप नहीं करेंगे| किशी का अभिवादन तो केवल जय राम या जय राम जी (इसमे जय कृष्ण या कृष्ण जी अपने आप निहित है) से हो सकता है या नमस्कार या नमस्ते से|

संसार के किशी भी व्यक्ति को संभव हो तो मांस भक्षण से दूर रहना चाहिए पर अन्य खाद्य पदार्थ ने होने कि विवशता हो तो "ॐ केशवाय नमः - ॐ नारायणाय नमः और ॐ माधवाय नमः" कह देना चाहिए आहार लेने के उपरान्त यह स्वीकार करते हुए कि हे नारायण, हे केशव और हे माधव मेरे इस कृत्य के लिए क्षमा कीजिये: यही हिन्दू धर्म की आचमन विधि ही है इसे विशेष रूप से हिन्दू रीती रिवाज में किये गए सादी समारोह में कन्यादान तक किशी भी व्यक्ति को परोक्ष रूप से विष्णु बनाने भी पढ़ा जाता है "मंगलम भगवान् विष्णु मंगलम गरुदाद्ध्वाजाह मंगलम पुन्दरीकाश मंगलम तानो हरी" के साथ | कारण यह है कि माधव का बनाया हुआ यह जीव निर्जीव संसार है और वही प्राकृतिक संतुलन के लिए उत्तर दाई है अतः उसका स्मरण करते हैं| गाय, गंगा (यमुना: सूर्यपुत्री + गंगा:शिव का सम्मिलन और अलग-अलग भी), गोमती, तुलसी, नीम, केला, आंवला, और पीपल भारतीय संस्कृति की पहचान है जहाँ तक इनकी सुरक्षा करें और इनका सदुपयोग करें दुरुपयोग न हो|

प्रेम ही वह एक मात्र तरल है जो पूरे ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करता है तथा प्रेम करने वाला कभी डरता नहीं यह राम और कृष्ण का ही उद्घोष है|| अतः निः स्वार्थ प्रेम करो माता से, पिता से, भाई से, कुटुंब से, अपने समाज से, जाती से, धर्म से, रास्ट्र से और विश्व जनमानस से| लेकिन एक प्रेम सबसे अलग है वह है पुत्र/पुत्री और अपनी पत्नी से जो स्वार्थ और जिम्मेदारी दोनों है| 

भीम ने बिना कोई श्रेय लिए अपने बड़े भाई धर्म राज युधिस्ठिर के लिए काम किया| जहां तक दुर्योधन (सुयोधन) के बध की बात है वह कृष्ण के अन्तर्यामी ज्ञान की वजह से और जंघे पर प्रहार की वजह से हुआ था (जो अनैतिक था तथा बलराम भीम को मृत्युदंड देने जा रहे थे क्योंकि उनको विश्वाश था की मेरे दोनों शिष्यों में अर्जुन का सामना दुर्योधन भले न कर सके पर भीम उसे कभी हरा नहीं सकते)| भीम का प्रमुख काम था दुशासन और कीचक का बध और हमें आशा है की वर्तमान और भविष्य में जो भी भीम के चरित्र का निर्वहन करे वह समाज में दुशासन (अनैतिक शासन) और कीचक (चरित्रहीन और ब्लात्कारिओं) का नाश करे अन्यथा जय भीम कहने का वह सही हकदार नहीं|  



राम की विजय का पूरा श्रेय सीता माता को जाता है: अगर सीता का सतीत्व जबाब दे जाता या सीता स्वयं रावण की बात मान लेती तो राम का सब प्रयाश बेकार जाता| वही राधा ने चाहे कृष्ण कि विवशता वश या हित हेतु (उनके धार्मिक काम के लक्ष्य में बाधक न बन्ने के लिए) या अपनी विवशता पिता वृषभान ने दबाव वश यशोदा के ही एक रिश्तेदार रायन (विष्णु आंशिक अंश) को अपना जीवन साथी स्वीकार कर लिया था| पर इससे राधा का मान कम नहीं हो जाता दोनों माँ लक्ष्मी और सरस्वती ही थी|

जिस केदारेश्वर (शिव-शंकर जी) और परमपिता ब्रह्मा की कृपा से रावण और मेघनाद (जिसमे कोई भी राक्षसी प्रवृत्ति नहीं थी और जो लक्ष्मण से किशी भी मायने में कम नहीं था का केवल यही दोष था की रावन उसका पिता था और ब्रह्मास्त्र से लक्षण के केवल मूर्छित होने पर वह रावण से बता दिया था की राम और रावण दिव्य शक्तियां हैं और आप सीता को वापस कर दीजिये) को अकूत शक्तियां और शिध्धियाँ हाशिल थी और वे नर-नारायण-देव-दानव सबके स्वामी बन गए थे और ऋषि-मुनी की सब सिध्धियों को जारी रखने भी में बाधक बन रहे थे उसी सर्वश्रेष्ठ शैव रावण ने रामेश्वरम में राम का पुरोहित बन शिव लिंग की स्थापना कर अपने मोक्ष प्राप्त करने का रास्ता खुद साफ कर लिया था हाँ शिव पूजन के बावजूद रावन की शक्ति का सामना करने के लिए कमल नयन राम ने अपने कमलवत नेत्र को भी शक्ति प्राप्त करने के लिए माँ दुर्गा को अंतिम दिन अर्पित करना पडा| इस पूरे लंका विजय में राम का साथ शैव होने के बावजूद राम (विष्णु)के सबसे बड़े साधक और रावन के भाई विभीषण(वि + भीषण=विशुद्ध और भीषण आस्था हो जिसको प्रभु विष्णु पर) का साथ एक ऐसा साधन था जिसने शुखेन वैद्य का लक्षमण मूर्छा के समय सहयोग दिलाया और रावण के मृत्यु के लिए नाभि में ही प्रहार का राज बताया क्योंकि राम बाण और स्वयं ब्रह्मास्त्र से रावण का कुछ भी बल बांका न होता| आप को यहाँ यह भी बता दे की ऋषिराज प्रतापभानु को नीचा दिखने का के लिए छल कर जो ब्राह्मणों का श्राप दिलाया गया था उसी का परिणाम था ऋषिराज प्रतापभानु के कुल का इतना बड़ा विनाश पर विभीषण सावित तो बचे ही| इस युध्ध ने प्रमाणित किया की ऋषिराज प्रतापभानु का प्रताप किसी मायने में राजा दसरथ के प्रताप से कम नहीं था| बात ब्राह्मणों के श्राप का था तो वह काम करता ही है पर अंत में वे सुधर कर इतना कहे ही थे की स्वयं विष्णु ही आप के कुल का उद्धार करने उतरेंगे और राक्षसी प्रवृत्ती का अंत करेंगे| इस राम रामण युध्ध में विशेष मायने है विश्व परिद्रिस्य में जहाँ महाभारत भारत की सीमा के अन्दर की बात है वही राम ने रामेश्वरम में रावण को पुरोहित मानकर जो शिव पूजा की वहां से विश्व में शैव और वैस्नव शक्ति को पुनः एक सूत्र में पिरोकर पूरे विश्व मानवता में शांति और धर्म का एक क्षत्र राज्य स्थापित हुआ|

आज आवश्यकता है राम और कृष्ण जैसे क्षत्रिय और यदुवंशी की तथा वशिष्ठ और संदीपनि जैसे गुरु की जिनकी अपने गुरु में इतनी भक्ति और समर्पण था की सब कुछ का श्रेय अपने गुरु को ही दे गए: "गुरु वशिस्थ कुल पूज्य हमारे, जाकी कृपा दनुज दल मारे|" और कृष्ण और बलराम ने संदीपनि गुरु की गुरु दक्षिणा स्वरुप अपने दैवीय शक्ति से गुरु जी के समुद्र में लापना हुए पुत्र हो पुनः जीवित कर गुरु को विद्यार्थी जीवन में ही दिव्यांश होने का साक्षात्कार दिया|

में यह भी कहना चाहूंगा की हनुमान (पवन देव और शिव शक्ति फलस्वरूप) और कुंती (दुर्वाषा के आशीर्वाद स्वरुप दिए गए किशी ईस्ट देव को बुलाने/पास जाने की युक्ति) की तरह पराक्रम और युक्ति होते हुए भी विश्व जनमानस जिसमे विशेष रूप से भारत को सूर्य या मंगल की परिक्रमा करने या पास बुलाने/जाने की जरूरत नहीं है यह बहुत बड़ा दंभ या मूर्खता होगी| ग्रहों और तारों और नक्षत्रों का अध्ययन पृथ्वी पर ही किशी प्रयोगशाला में विशेष युक्ति को अपना कर ही किया जाय तो सबसे श्रेष्ठ है जैसे भारतीय ऋषि महर्षि करते थे|

भगवान् श्री कृष्ण द्वारा अभुमंयु/उत्तरा पुत्र परीक्षित को ब्रह्मास्त्र के प्रयोग के बाद भी अपने को पूर्ण धर्मात्मा सिद्ध कर परमब्रह्म परमात्मा से जीवित करवा लेना एक ऐसे उदहारण हैं जो प्रमाणित करता है की कृष्ण ने सत्यम-शिवम्-सुन्दरम को अपनाते हुए "सत्यमेव जयते" का मार्ग अपनाया था जिसमे बाल्यकाल में कंश वध से लेकर पांडवों की रक्षा तक कही न कही व्यवहार में भी अपने में इस्वर की दिव्य ज्योंति को भी उजागर कर गए हैं आम मानव के बीच मानव जीवन में| राम के सर्वोच्च आचरण का कोई जबाब नहीं जो यम-नियम और सम्पूर्ण सत्य का पालन करते हुए दानवों से विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा से लेकर आज तक के इतिहाश और पौराणिक इतिहाश में भी सबसे शक्तिशाली और अधर्मी रावन के वध तक अलौकिक पूर्ण मानव जीवन प्रस्तुत किया जिसमे व्यवहार में दिव्य दर्शन कही नहीं हुए आम जन में किशी को कौशल्या के अलावा| मेरा वर्तमान ऋषि महर्षि (सामाजिक और वैज्ञानिक) से अनुरोध है कि आज जो शिद्ध नियम-युक्ति और आग्नेय अस्त्र (परमाणु बम और मिसाइल) बना रहे हैं उस तक पहुँच सामान्य लोगों या दानवी प्रवृत्ति वाले लोगों तक न हो| इसी प्रकार किशी भी ब्रह्मास्त्र या ब्रह्मास्त्र सामान युक्ति का प्रयोग केवल राम कृष्ण और परशुराम कि तरह धर्म (सत्य) का रक्षक ही कर सके न कि विवेकहीन व्यक्ति इसका उपयोग कर सके|

 सम्पूर्ण सत्य कोई धर्म अगर न अपना सके इस्लाम के अनुयायियों कि तरह पर सहिष्णु व्यक्ति होने के कर्तव्य के तहत तो "सत्यम-शिवम्-सुन्दरम" तो अपनाना ही पडेगा| अपने सत्कर्मों में "सत्यम-शिवम्-सुन्दरम" को अपना कर इस्वर को प्राप्त किया जा सकता है|

जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी: जननी और जन्मभूमी स्वर्ग से भी अधिक श्रेस्यकर हैं | वन्दे मातरम (हे माँ तुझे सलाम=हे माँ हम तुझे सैलूट करते है)....................| माँ और माँ के वन्दे के लिए हम शीश भी कटवा सकते हैं| यह भारतवर्ष के लिए ही नहीं हर देश के नागरिक का प्रथम कर्त्तव्य है अपनी जन्मभूमि के लिए सर्वस्य अर्पण पर विश्व धर्म को कोई नुकशान न पहुंचे मेरे अपने इस देश प्रेम से|

भगवान् श्रीकृष्ण में परमब्रह्म (ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सम्मिलित शक्ति) का स्वरुप धारण कर महाभारत के रणक्षेत्र (जव असत्य का विरोध करने वाला ही कोई नहीं बचा था तथा अर्जुन जैसे महारथी भी ब्राह्मन धर्म स्वीकार कर युद्ध से विरत रहने की सोच लिये महाविनाश से बचने के लिए ) में समय की गति को तब तक के लिए रोक दी थी जब तक की पूरी श्रीमद्भागवत गीता का उपदेश दे अर्जुन को युद्ध के लिए राजी नहीं कर लिए | जिस ब्रह्म में सप्तर्षि बनाए जिनसे चौबीस ऋषि हुए और जिसमे से प्रत्येक एक घंटे के समय का स्वामी होता है और सबको सम्मिलित कर इस चौबीस घंटे के समय चक्र बनाया तो इस समय चक्र या धर्म चक्र को निरूपित करने वाले अशोक चक्र को रोकने या उसकी गति विपरीत दिशा में करने या नस्ट कर शून्यकाल में परिवर्तित करने का अधिकार भी उसको है यदि वह अपने मूल उद्देश्य से दिग्भ्रमित हो समता मूलक समाज की स्थापना को गलत ढंग से परिभाषित करता हो और इस तरह समरस ( समाज के प्रत्येक वर्ग के बीच आत्मिक लगाव और सदभाव हो और किशी में भी दंभ न हो) समाज की स्थापना करने में सक्षम न हो| समय चक्र या धर्म चक्र या अशोक चक्र प्रतीक ही है घृणा पर प्रेम की विजय का और यही है समरस समाज का असली अर्थ और इसी उद्देश्य से ही भारतवर्ष के रास्ट्रीय ध्वज में अशोक चक्र को स्थान दिया गया है और जब किशी सरकार के कृत्य से समाज में घृणा फैले तो आप उसको समरस समाज का चहेता कैसे कहेंगे|

खूब जातिवाद और सम्प्रदायवाद करा लो यह २४ (चौबीस) ऋषियों का अशोक चक्र खुद समय चक्र बन अपना काम करता रहेगा और आप के हाँथ अन्य नेताओं की तरह शून्य ही आयेगा कारण एक तो कोई ऋषि नियम विरुध्ध अपनी संतान (सगोत्रीय) का भी नहीं अगर है भी तो एक ऋषि आप को उबारने की कोसिस भी करे पर २३ (तेईस) आप को नहीं छोड़ेंगे|

भारत ही नहीं विश्व के भी हार धर्म के अनुयायी पांच बार गायत्री मंत्र और सूर्य मंत्र पढ़कर सनातन धर्म हिन्दू धर्म के कश्यप गोत्र (हिन्दू धर्म) में स्थान पा सकते हैं| मेरे विचार से ब्रह्मण का कर्म (शिक्षण) लम्बे समय तक काम करते हुए सरस्वती स्तुति कर और ॐ नहम ब्रह्म्देवाय बोलकर कश्यप गोत्रीय ब्रह्मण धर्म (हिन्दू), दीर्घ समय क्षत्रिय कर्म (रक्षण) कर दुर्गा स्तुति कर और ॐ नमः शिवाय कह कश्यप गोत्रीय क्षत्रिय धर्म (हिन्दू) और दीर्घ समय वैश्य कर्म (पोषण) कर लक्ष्मी स्तुति कर और ॐ नमो भगवते वाशुदेवाय कह वैश्य धर्म (हिन्दू) में पुनः प्रतिस्थापित हो सकते हैं विश्व के हार धर्म और पंथ के अनुयायी आप तो केवल दलित की बात करते हैं जो पहले से ही हिन्दू धर्म के अनुयायी है बहुसंख्यक रूप से|

 सत्यमेव जयते: आम भारतीय समाज में आरक्षण के सबसे बड़े सकारात्मक लाभों में एक लाभ यह भी है है की इससे सवर्णों की झलक अभी भी ग्रामीण क्षेत्र में भी काफी मिल जाती है विशेष कर ब्राह्मन और क्षत्रिय की नहीं तो आज तक ये सभी लोग कायस्थ समाज की तरह गाँव छोड़ चुके होते और शहर तथा विदेश में ही इनकी उपस्थिति संभव हो पाती|

कश्मीर की कीमत पर पूरा भारत अगर दांव पर लग जाता है तो हम चुनौती स्वीकार कर लेंगे लेकिन कश्मीर को...........तो क्या हम कश्मीर को इसलिए छोड़ दें की केवल कश्मीर की जनता पकिस्तान के साथ जाना चाह रही या भारत से अलग रहना चाह रही है वरन इसके लिए पूरे भारत में जनमत सर्वेक्षण हो की क्या अधिकांश भारतीय कश्मीर को केवल कश्मीर की जनता की इच्छा के ऊपर छोड़ना चाहते है या नहीं|

प्रेम से कहो "विजयी विष तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा": जहाँ राम बाण और चक्र सुदर्शन भी न काम कर सके वहां समझ लीजिये की दुर्वासा जैसे परम सत्य, परम आशीर्वादी और क्रोधी, ब्रह्मचारी तथा परम तपस्वी ऋषि का प्रभाव है जिनकी लक्षमण और यदुवंशियों द्वारा की गयी अवहेलना ने क्रमशः स्वयं राम और कृष्ण के मानव शरीर त्याग पुनः विष्णु रूप धारण करने का ध्यान दिलाया.............................

सुदर्शन चक्र और राम बाण सम्पूर्ण सत्य का प्रतीक है जबकि अशोक चक्र धर्म (समय) और प्रेम का घृणा पर विजय का प्रतीक है | अतः अगर धर्म और प्रेम सत्य से परे होने लगता है तो सुदर्शन चक्र और राम बाण को अधिकार है की वह ऐसे अशोक चक्र (समय चक्र) को तोड़ सत्य स्थापना हेतु धर्म को पुनः सत्यशील बनने पर मजबूर करे|

भारत के प्रत्येक वर्ग का सहयोग है एक भारत माँ को ५०० (500) साल (from 1498 AD to till date ) (First voyage of Vasco-da-Gama to Goa to till date) में पुनः एक विश्व शक्ति बनाने में वह चाहे दलित और अल्पसंख्यक वर्ग का इसे उर्वरा बनाने की बात हो, वैश्य वर्ग का पौधरोपण और बागवानी करना हो, क्षत्रिय वर्ग का उसकी रक्षा तथा खून से सींचना रहा हो या ब्राह्मणों का स्वयं भस्म हो सूर्य की तरह ज्ञान का प्रकाश देना हो| यहाँ हम उन लोगों की बात कर रहे हैं जो जन्म और कर्म से ब्रह्मिन, क्षत्रिय और वैश्य तथा दलित और अल्पसंख्यक हैं क्योंकि इतने समय पश्चात बहुत से लोगों का धर्मान्तरण और जाती परिवर्तन होता रहा है| ये तिरंगा अपना रंग अनंत काल तक बिखेरे इसके लिए तिरंगे में नीले रंग के अशोक चक्र के तहत आने वाले वर्ग (दलित और अल्पसंख्य) को केशरिया (त्याग और बलिदान :क्षत्रिय), हरा (समृध्धि, तपस्या :वैश्य) और सफेद (सच्चाई, सदाचार, और समरसता: ब्राह्मन) के तहत आने वाले वर्ग से एक कदम और आगे आकर नीले आकाश (अम्बर) की तरह अपनी छाया अनवरत देते रहना चाहिए इस देश को स्वयं द्रवित होकर| इसा देश को अल्पसंखक सामज से बहुत कुछ मिला है चाहे उनके आन्काओं ने हमारे ऊपर किशी भी तरह से शासन किया हो| अल्ल्प्संख्यक समाज का अभीस्ट (अधिकतम भाग) भारतीय मूल का ही है उससे हमें कोई घृणा नहीं है और हम उनको सादर अपना भाई मानते है|| कोई भी समाज हो उसे प्रतिशोधात्मक भव से कभी काम नहीं करना चाहिए क्योंकि प्रतिशोध की भावना से किया गया काम स्वयं उसी समाज की प्रगति में बाधक होता है|

 सत्यमेव जयते: चेहरा बदल लेने से, परिवार बदल लेने से, घर बदल लेने से, जाती बदल लेने से, देश (रास्त्र) बदल लेने से या धर्म बदल लेने से सत्य कदापि नहीं बदलता है अगर ऐसा होता तो सम्राट अशोक हिन्दू सम्राट न कहलाकर बौद्ध सम्राट कहलाते|

अन्योनाश्रित (*Mutual dependent) सम्बन्ध है ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य में इनको कोई भी आक्रान्ता (terrorist: inland and outland) तलवार की धार से अलग नहीं कर सका और न कर पायेगा

सम्राट अशोक, अकबर, अब्रहम्लिंकन, जिन्ना, अब्दुल्गाफ्फार खान, और गाँधी, से लेकर ओबामा और मनमोहन तक कौन अपना धर्म नहीं मानता; गाँधी, नेहरु, सरदार वल्लभ भाई पटेल, सुभास चन्द्र बोसे, चंद्रशेखर आज़ाद, विस्मिल और भगत सिंह से लेकर हर एक महान नेता तक कौन अपनी जाती नहीं मानता tha| तो क्या ये लोग अपनी जाती और धर्म तक ही सीमित हैं? क्या हम इनको सम्प्रदायवादी या जातिवादी कहें? ऐसा नहीं क्योंकि इसमे सबसे प्रमुख महात्मा गाँधी अपने को एक वैश्य (वैस्नव-हिन्दू) मानते थे और इन्होने सर्व्श्रेस्थ काम किया आधुनिक समाज में हर जाती और सम्प्रदाय के हित में|

अतः इस वैश्विक युग में हम रास्त्रधर्म से एक और कदम ऊपर विश्व धर्म कि बात करें तभी लोकतंत्र कि सर्वोच्च इकाई "सत्यमेव जयते" पर हम पहुंचेंगे जिसमे सख्याबल का नहीं बल्कि इश्वरी शक्ति का एह्शास होता है| गाँधी और स्वामी विवेकानंद जैसे लोगों से सामान्यजन में प्रवाहित होने वाली स्फूर्ति का कारण यही शक्ति है|

 विश्व एक गाँव होने के लिए विश्व एक धर्म और विश्व एक जाती होना अनिवार्य नहीं है अगर होता तो सनातन धर्म जिसे आदि हिन्दू धर्म कहा जाता है में से बहुत सारे धर्म और जातियां नहीं बने होते| 

एक धर्म और एक जाती से संसार का चलाना तभी संभव होगा जब पूरा विश्व कर्म, वाणी और मन से महामानव या देव तुल्य व्यवहार करे



कर्म के आधार पर पूरे विश्व को मात्र तीन धर्म से चलाया जा सकता है जो है ब्राह्मण धर्म (शिक्षण), क्षत्रिय धर्म (रक्षण) और वैश्य धर्म (पोषण) अगर जलवायु (प्रकृति) के अनुसार धर्म के विभाजन को अनदेखा किया जाता है या यह विफल होता है वैश्वीकरण: विश्व एक गाँव कि व्यवस्था में| ही तीन विश्व के आदितम धर्म:सनातन धर्म का प्रथम विभाजित स्वरुप था और इसके बाद ही जलवायु के आधार पर धर्मों का विभाजन (हिन्दू (हिन्दू ,जैन, बौध और शिख), यहूदी, मुस्लिम, इसाई, और पारसी ) हुआ|

दलित समाज से ब्राह्मन, क्षत्रिय और वैश्य कि पुनर्स्थापना


विश्व में उत्तर वैदिक काल में दलित समाज की नीव तैयार हुई जब चतुर्थ वर्ण का आधार रखा गया जो ब्राह्मन ,क्षत्रिय और वैश्य को बहिस्कृत कर बनाया गया था पर आज के इस वैज्ञानिक युग में पुनः हर तरफ इस दलित समाज (तथाकथित शूद्र वर्ण ) से ब्राह्मन, क्षत्रिय और वैश्य तैयार हो रहे हैं पर आवश्यकता है कि हम किस नजरिये से सब कुछ होते देख रहे हैं| इतिहास अपने को दुहराता है जब सत्कर्म कर्म से कोई वैश्य, ब्राह्मन और क्षत्रिय बन जाता था उदाहरण है|

अगर धन संपत्ति ही सर्वोपरि है किशी को श्रेष्ठ शिध्ध करने के लिए तो हर देश को अमेरिका का प्रभुत्त्व मान कर अपने को अमेरिका में मिला लेना चाहिए

गाय, गंगा, गोमती, तुलसी, नीम, आम, बेल, आंवला, पीपल और बरगद का जो अपमान करे वह सच्चा भारतीय कहलाने का हक़दार नहीं



इंदिरा गाँधी परिवार यदि हिन्दू (ब्राह्मण) है तो उसका गोत्र केवल कश्यप गोत्र होगा दूसरा गोत्र उसे स्थान नहीं दे पायेगा| यही एक एक मात्र सर्वदा सर्व समर्थ गोत्र है ब्राह्मणों में जो किशी हिन्दू को अपनी जाती और धर्म से बिछुड़ने पर पुनः वापसी, पनाह और रक्षा कर सकता है|

कौन सा लोकतंत्र कहता है कि सत्य को न मना जाय| ये है सत्यमेव जयते कहे जाने वाले देश के सत्यमेव जयते का परिणाम| अगर भारत में कही भी आर्यावर्त का उदय काल आता है तो उसमे कश्मीर का नाम प्रमुखता से आता है और उसी कश्मीर को बसाने वाले कश्यप ऋषि ने दसरथ के रूप में अवतार ले राम जैसे पुत्र का पिता बन आर्यावर्त को चिरातानकाल तक सुद्रिड रहने कि शक्ति प्रदान किया|


"यत्र पूज्यते नारी रमन्ते तत्र देवता मतलब जहां नारियों को सम्मान मिलता है वहां देवतायों का निवास होता है" ऐसा भारतीय शास्त्र में वर्णित है तो हम भी घोसा, आपला, विद्योतमा और सावित्री जैसी प्राचीन भारतीय नारियों जो शास्त्र विद्या में पारंगत थी की तरह आज की इस नारी को भी उसका सम्मान और अधिकार क्यों न दें और अनावश्यक झगडे फसाद और आतंकवाद, जेहाद को ख़त्म करने में उनकी सहायता क्यों न लें वैचारिक और वैयक्तिक रूप से आप लोगों को पता होना चाहिए की विद्योतमा से भी आज के पुरुषों की तरह काशी जो विश्व की शिक्षा नगरी थी के पंडित और विद्वान शास्तार्थ के धराशायी हो जाते थे|

काशी विश्वनाथ(वाराणसी) का उद्घोष "सत्यम शिवम् सुन्दरम" मानव समाज के सञ्चालन में तात्कालिक रूप से "सत्यमेव जयते" का आधार बनता है क्योंकि तात्कालिक रूप से इस्वर के अलावा कुछ भी पूर्ण सत्य नहीं रहता है हमारा परम्द्येय(दीर्घ कालिक) पूर्णसत्य होना चाहिए जिसका आंकलन जनता जनार्दन कुछ काल के बाद अपने आप करेगी तात्कालिक परिस्थिति यदि हमें तोड़ने वाली हो तो दूसरा रास्ता "सत्यम शिवम् सुन्दरम" का अपना लेना चाहिए जो हमें एक दिन "सत्यमेव जयते" पर अवस्य पहुंचाएगा गिरिधर गोपाल को मुरलीधर गोपाल कह देने मात्र से ब्रजेश-कृष्ण की महिमा को कोई चोट नहीं पहुँचती है|  

Satyam Shivam Sundaram vs Satymev Jayate

पर जब आदर्श आत्मघाती हो जाए तो "सत्यम शिवम् सुन्दरम" न अपना कर "सत्यमेव जयते" ही अपनाया जाता है जैसा की न्यायालय में न्याय का आदर्श और सेना में वीरता का आदर्श वाक्य "सत्यमेव जयते" ही होता है लेकिन सुधारने का मौक़ा दिए विना दंड नहीं दिया जाता मतलब साफ है सभ्य समाज "सत्यम शिवम् सुन्दरम" के आदर्श को अपनाते हुए सामाजिक सामजस्य के लिए समझौता कर लेता है पर सम्पूर्ण हकीकत तो "सत्यमेव जयते" के आदर्श को अपनाने से आती है| अतः मेरे विचार से आप का पक्ष "सत्यमेव जयते" वाले का ही अपनाएंगे तो  आप के विचारों का हम सम्मान करते है"सत्यम शिवम् सुन्दरम" के आदर्श वाला होते हुए|

त्रयम्बकं यग्यामाहे सुगंधिपुस्ती वर्धनम उर्वरारुक्मिव बंधनती मृत्योर्मुक्षी मामृतात ॐ ऐं ही क्लिच्मुन्दाय विच्चे| Meaning: The four sacred Vedas, mankind's oldest scriptures, in tone, "To Rudra [Siva], Lord of sacrifice, of hymns and balmy medicines, we pray for joy and health and strength. He shines in splendor like the sun, refulgent as bright gold is He, the good, the best among the Gods." "He is God, hidden in all beings, their inmost soul who is in all. He watches the works of creation, lives in all things, watches all things.