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Friday, August 30, 2013

आप लोगों में प्रेम और आशीर्वाद से मै अविभूत हूँ और मेर पास कोई शब्द नहीं की अपनी वाणी दे सकूं। केवल इतना कह सकता हूँ की एक रास्ट्रीय स्वयं सेवक होने के लिए रजिस्ट्रेशन हो ही यह जरूरी नहीं और मै इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हूँ, वरन आप अपने जीवन में पृथ्वी से आसमान पर की किशी भी ऊँचाई हों अपने अस्तित्व को पहचाने तथा जिस परिवार में, जिस समुदाय में और जिस समाज और देश में आप का जन्म हुआ उसके प्रति जो कर्त्तव्य हों उसे पूर्ण करते हुए अपनी सभ्यता, संस्कृत और संस्कार का जहां तक हो पालन करें तथा कर्त्तव्य परायण बने रहें, और इस प्रकार तीनों प्रमुख ऋणों से उरिन हों जीवन में, यह जरूरी होता है। मेरे जीवन में बहुत से कर्तव्यों की इति श्री नहीं हुयी है आप लोगों का यह प्रेम और मेर बच्चे को आशीर्वाद इस बात का प्रमाण है। -----------------------------मित्रों जिस तरह से विज्ञान सास्वत है उसी तरह से परमब्रह्म (ब्रह्म) भी सास्वत है| अतः परमब्रह्म जो त्रिदेव=त्रिमूर्ति=तिरंगा (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का संगम है इस बात को इंगित करता है की ब्रह्मा, विष्णु और महेश सास्वत और अजन्मा हैं। यह यह भी इंगित करता है की इनसे जनित सप्तर्षि यदि अजन्मा नहीं तो कम से कम शास्वत हैं इनका स्वरुप भले ही बदलाता रहता हो। और यह इंगित करता है की हम विश्व समुदाय के लोग एक ही सप्तर्षि परिवार के सदस्य है। जहां गंगा और जमुना की तीव्र धारा को सरवती से मिलने पर ठहराव आ जाता है उसी तीर्थराज=प्रयागराज=त्रिवेणी=अल्लाहाबाद(=परमब्रह्म=परमेश्वर= परमात्मा=अललाह के घर) से मै अपने को वापस लेता हूँ।


Vipra@Brahmin who take less and give more to the world. Dwij@Brahmin who treated as god of Earth due to his deed. Now both definition are with more community. Is it not exapansion of Brahamanism? "Brahm Satyam Jagat Mithya", it means even MITHYA have its existence according definition of MITHYA, therefore person who care for matter is also most important part of the world.Brahmin@Brahma janati sah Brahmanah therefore existance of Kshatriya and Vaisya needed for physical world. This is because all Saptarshi:Brahmarshi converted them in Rajarshi and Maharshi too.This is need of TIRANGA:TRIDEV:TRIMURTI. This is perfect history of humanity.


(३) तीसरा ऋण है- पितृ- ऋण ।। पितर हमें सुयोग बनाते हैं ।। हम भी भावी सन्तान को सुयोग बनावें ।। भावी पीढ़ी के उचित निर्माण के लिए ध्यान न दिया जायेगा, तो भविष्य अन्धकारमय बनेगा ।।-------आज कुसंस्कारों की बढ़ोत्तरी से नयी पीढ़ियाँ, उद्दण्डता, उच्छृंखलता, अवज्ञा, आलस, विलासिता आदि बुराइयों की ओर बढ़ रही हैं ।। इस बाढ़ को न रोका गया तो, भविष्य का ईश्वर ही मालिक है ।। इसलिए बच्चों को भविष्य के सुयोग्य नागरिक एवं महान सत्पुरुष बनाने के लिए प्रयत्न करते हुए पितृ- ऋण से उऋण होना चाहिए ।। अपने या पराये, जिन बच्चों की ऐसी सेवा की जाय, वह पितृ- ऋण की उऋणता ही है ।।-------------पितर का अर्थ गुरु भी है ।। जिस प्रकार सत्पुरुषों ने हमें सद्ज्ञान दिया और अच्छे मार्ग पर चलाने के लिए अनेक प्रकार प्रयत्न किये, वैसे ही हमारे लिए उचित है, कि दूसरों को सद्ज्ञान देने और सत्- मार्ग पर लगाने के लिए प्रयत्न करें ।। यह पितृ- परम्परा जारी रखने की भावना सब की हो, तो दूसरों को ऊँचा उठाने का प्रयत्न करते हुए सम्पूर्ण विश्व को सुयोग बनाया जा सकता है ।।


(2)देव ऋण: देव ऋण से छुटकारा यज्ञ द्वारा होता है ।। यज्ञ देव- शक्तियाँ परिपुष्ट कैसे होती हैं, उसका विज्ञान पीछे बताया जा चुका है ।। अध्यात्म क्षेत्र में यज्ञ का अर्थ है त्याग ।। अपने निवारण के लिए अपनी सामर्थ्य का न्यूनतम भाग उपभोग करना और अधिकतम भाग लोकहित के लिए लगा देना यही यज्ञ भावना है ।।---देव हमें नाना प्रकार के सुख- साधन देते हैं हमें किसी का कुछ नहीं लेना चाहिए? अवश्य ही देना हमारा कर्तव्य होना चाहिए 'देव' वे कहलाते हैं कि जो देते हैं ।। देने वालों की श्रेणी में अपने को रखने से भी हम देव बन सकते हैं ।।---------धन- देना ही दान नहीं है ।। ज्ञान, समय, श्रम, सलाह, सद्भाव, शिक्षा, सहयोग आदि देकर हम अपनी स्थिति के अनुसार दूसरों को बहुत कुछ देते रह सकते हैं ।। देने की भावना हो, तो प्रतिक्षण वैसे अवसर उपलब्ध हो सकते हैं ।। ऋषि- मुनि तो पूर्णतया निर्धन होते थे, पर वे इतना देते थे कि उनके दान की तुलना धन कुबेर भी नहीं कर सकते ।।-----------देने की किन्तु विवेक पूर्वक देना की भावना से हम देव ऋण से मुक्त होते हैं किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कायर एवम् पात्र- कुपात्र का विचार न किया जाय, तो वह दान हत्या के समान भयन्कर दुःखदायी भी होता है ।। इसलिए देव श्रद्धा से छुटकारा पाने के लिए विवेक पूर्ण त्याग करते रहने का हमें निरंतर प्रयत्न करना चाहिए ।।


(१) ऋषि- ऋण : ब्रह्मचर्य द्वारा ऋषि- ऋण से छुटकारा मिलता है ।। ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल स्त्री- सम्भोग न करना ही नहीं है, वरन् उसका वास्तविक तात्पर्य सभी इन्द्रियों का संयम करना और ब्रह्म में चरण रखना अर्थात आस्तिकता को अपनाना है ।।------इन्द्रियों के संयम से, शारीरिक और मानसिक शक्तियों की रक्षा होती है और असंयमी आचरण के कारण जो समय, धन, स्वास्थ्य एवं आत्मबल नष्ट होता है, वह बच जाता है ।। इस असंयम से बचे हुए और संयम द्वारा बड़े हुए बल को जब मनुष्य आस्तिकता में धर्म- मार्ग में लगता है, उसकी सर्वांगीण उन्नति होती है ।।-------ऋषि स्वयं महान होते हैं, हमें भी ऋषि- ऋण से मुक्त होने के लिए अपने को ज्ञान, धर्म, संगठन आदि सभी दृष्टियों से बलवान बनाना चाहिये ।। ऋषि, पक्ष की परम्पराओं को आगे बढ़ाने के लिये अपने को आदर्श एवं उदाहरण के रूप में उपस्थित कर सकें ।।


Saturday, August 24, 2013

स्वामी विवेकानंद ने वेदान्त दर्शन अपनाया था जिसमे विश्व के सब दर्शन समाहित हो जाते हैं और वे इसके लिए श्रीमद्भागवत को अपना मूल आधार बनाये थे, जिसमे वशिस्ठ गोत्रीय महर्षि वेद व्याश ने परमब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण और नरश्रेस्ठ के रूप में अर्जुन के बीच हुए वार्तालाप को संग्रहीत किया है। अतः स्वामी जी से ज्यादा या कहें तो वेद व्याश जी और गोस्वामी तुलसी दाश से ज्यादा मै कुछ नहीं कह सकता क्योंकि मै केवल जन्म वशिस्थ गोत्रियों के यहाँ लिया हूँ (पर संतान सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मणों का हूँ और निवाश सनातन गौतम गोत्रियों के यहाँ किया हूँ)। अतः आप श्रीमद्भागवत गीता या श्री राम चरित मानस को या किशी एक को अपना सकते हैं समयानुसार।

4 वेद और 18 पुराण जो केवल ब्रह्मा की वाणी के रूप में स्थान्तरित होते रहे है और श्रीमद्भागवतगीता जो कृष्ण के भाष्य के रूप में तैर रहे थे उनका संकलन द्वापरयुग में वशिष्ठ के कुल में जन्म लिए हुए व्यासः/परासर ने किया सुर उसे अक्षरों और वाक्यांशों में मूर्तरूप दिया और जिस वेदांत दर्शन की बात की जाती है और जिसे स्वामी विवेकानंद ने स्वामी रमा-कृष्ण परमहंश से प्रेरित हो  सम्पूर्ण विश्व के दर्शन को वेदांत दर्शन की परिधि में ला दिया उसका सम्पूर्ण श्रेय वशिष्ठ/पराशर कुल में जन्म लिए महर्षि वेद व्यासः को ही है।

वेदों पुरानों को जन्म ब्रह्मा ने भले ही दिया हो पर वर्तमान अवस्था में जो वेड स्वरुप है उसका संकलन वशिस्थ गोत्रीय महर्षि वेद व्याश ने ही किया है और इसी से वे वेद व्याश कहे गए हैं। अगर हम वेद, पुराण, उपनिषद्, ऋचाएं या अन्य धार्मिक महाग्रंथ या काव्य न पढ़ सके तो कम से कम श्रीमद्भागवत गीता का एक छोटा सा 20 रूपये का सम्पुट लेकर पढ़कर उसका कुछ अनुकरण कर सकते हैं जिसमे नर के रूप में अर्जुन सत्य और नारायण के रूप में श्रीकृष्ण सत्य हैं और वे बहुत से बातों को दर्शाते हैं और उसमे अन्य-अन्य कर्म और व्यवहार बताते हैं। पर अंततः निष्कर्ष निकलते हैं की कर्मंयेवाधिकरास्तु माँ फलेषु कदाचन:। मतलब अगर रन शेत्र में आ गए हो तो हे अर्जुन तुम युध्ध करो तुम्हारे हाथ में केवल युध्ध करना है। मतलब वही श्रीराम चरित मानस की दो चौपाइयों का निष्कर्ष "कर्मप्रधान विश्व करी राख। जो जस करइ सो तस फल चाखा।" तथा "होइहनि सोई जो राम रची राखा। को का तरक बढ़वाई साखा।"। अतः सकारात्मक बनिए सकारात्मक कर्म करिए यह कभी भी निष्फल नहीं जाएगा इस्वर इस जन्म में न हो सका तो अगले जन्म में आप को उसका परिणाम अवस्य देगा।


मित्र हम सप्तर्षियों या अस्तक ऋषियों को न भी माने तो भ्रिगुवंश, शूर्यवंश और चन्द्रवंश ने तो पूरे भारत को जोड़ दिया है जिन तीनों का केंद्र उत्तर प्रदेश है। -----तो हम क्या अब भी नहीं कह सकते की हम एक हैं? अब इससे ज्यादा क्या कहा जा सकता है की चरों वेदों को प्राप्त करने के बाद ब्रह्मा में विश्व के प्रथम यज्ञ को क्यों किया? उत्तर है सप्तर्षि प्राकट्य यज्ञ था यह और इसे त्रिदेव ने संपादित किया था। अतः प्रथमतः हम त्रिदेव या त्रिमूर्ति के पुत्र है उसके बाद सप्तर्षियों के पुत्र हैं जो प्रयागराज इलाहाबाद में प्रकट हुए थे ब्रह्म के यज्ञ द्वारा। दूसरी बात अगस्त्य ऋषि मलय देश (वर्तमान तमिलनाडु और केरल) के मलय पर्वत पर सप्तर्षियों के संयोग से पैदा हुए। अब यह अस्तक ऋषि समुदाय हुआ और उत्तर को दक्षिण भारत से जोड़ दिया। भ्रिगुवंशीय ब्राह्मण परशुराम ने केरल, कोंकण, मराठा, गुजरात को को जोड़ा उत्तर से, शूर्यवंश ने तमिल और कर्नाटका को को जोड़ा उत्तर से और चन्द्रवंश ने आन्ध्र को जोड़ा उत्तर से। पूर्व में बंगाल और पछिम में राजस्थान सदा उत्तर से जुड़े रहे हैं। तो मित्र हम सप्तर्षियों या अस्तक ऋषियों को न भी माने तो भ्रिगुवंश, शूर्यवंश और चन्द्रवंश ने तो पूरे भारत को जोड़ दिया है जिन तीनों का केंद्र उत्तर प्रदेश है। -----तो हम क्या अब भी नहीं कह सकते की हम एक हैं?


Friday, August 23, 2013

को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥----यहाँ अपना आश्रम बना कर रहने वाले भारद्वाज ऋषि भी इसका सम्पूर्ण वर्ण नहीं कर सके। ----- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इलाहाबाद नगर का नाम 'प्रयाग' है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ। उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण 'इलहवास' किया अर्थात जहाँ पर अल्लाह का वास है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम 'इलावास' पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण 'इलाहाबाद' कर दिया।-----------------इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियांँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता व पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुत: गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि। ----------तीर्थ द्विविध होते हैं, एक कामनाओं को पूर्ण करने वाले और दूसरे मोक्ष देने वाले। जिस तीर्थ में कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष की प्राप्ति दोनों ही एक साथ हो, वह एक मात्र तीर्थ प्रयाग है। यही वह तीर्थ है जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है इसीलिए प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:" ।

को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥----यहाँ अपना आश्रम बना कर रहने वाले भारद्वाज ऋषि भी इसका सम्पूर्ण वर्ण नहीं कर सके। ----- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इलाहाबाद नगर का नाम 'प्रयाग' है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ। उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण 'इलहवास' किया अर्थात जहाँ पर अल्लाह का वास है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम 'इलावास' पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण 'इलाहाबाद' कर दिया।-----------------इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियांँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता व पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुत: गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि। ----------तीर्थ द्विविध होते हैं, एक कामनाओं को पूर्ण करने वाले और दूसरे मोक्ष देने वाले। जिस तीर्थ में कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष की प्राप्ति दोनों ही एक साथ हो, वह एक मात्र तीर्थ प्रयाग है। यही वह तीर्थ है जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है इसीलिए प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:" ।

कोई रास्त्रियता से ऊपर उठने पर ही हम अंतररास्ट्रीय होता हैं पर इसका मतलब यह नहीं की रास्ट्रीय हितों का बलिदान देकर हम अन्तर्रस्त्रिय बने वरन हमारे अंतररास्ट्रीय कार्य ऐसे हों जो अपने रास्त्र के दीर्घ कालिक हित पर चोट न पहुंचाए वरन उससे अपने रास्त्र का भी हित हो। यही है हमारा वशुधैव कुटुम्बकम का पाठ। नेहरु, गांधी और सरदार पटेल को जोड़ने की कड़ी यही से हमें प्राप्त होती है।

कोई रास्त्रियता से ऊपर उठने पर ही हम अंतररास्ट्रीय होता हैं पर इसका मतलब यह नहीं की रास्ट्रीय हितों का बलिदान देकर हम अन्तर्रस्त्रिय बने वरन हमारे अंतररास्ट्रीय कार्य ऐसे हों जो अपने रास्त्र के दीर्घ कालिक हित पर चोट न पहुंचाए वरन उससे अपने रास्त्र का भी हित हो। यही है हमारा वशुधैव कुटुम्बकम का पाठ।  नेहरु, गांधी और सरदार पटेल को जोड़ने की कड़ी यही से हमें प्राप्त होती है।

We are first Indian then Hindu, Muslim and Christian.----मेरे देश की अस्मिता ही मिट जायेगी मेरे रहते तो तो हम किश बात के हिन्दू, किस बात के मुस्लिम और किश बात के इसाई। मतलब जिस देश की अस्मिता मिट गयी उस देश के धर्मावलम्बियों के रहते हुए तो सभी धर्मावलम्बी धर्मात्मा के नाम पर भिखारी कहे जायेंगे।---इतना तो जरूर है की जो भारत माँ नहीं कह सकता तो कम से कम उसे भारत रास्त्र कहने से उसे परहेज नहीं होना चाहिए है।-----At least we should protest against enemies of our country. We defeated or win it is based on our power. Then we can say, "I have proud of our country and religion".


Thursday, August 22, 2013

मेर संज्ञान में एक दर्जन से ज्यादा उत्तर प्रदेश की कुछ जातियां है जो सीधे-सीधे "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" से जुडी हैं वे अपने को किशी भी वर्ग (पिछड़ा/दलित) में क्यों न मानती हों मुझे कोई आपत्ति नहीं यदि वे गंगा के बहते हुए पानी में हाँथ धो रहे है। --------भारत में प्रत्येक जाती, "या तो ब्राह्मण धर्म या क्षत्रिय धर्म या वैश्य धर्म या इनमे से किशी दो धर्म या तीनो धर्म के पलकों से बनी है" और ये "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" सनातन हिन्दू धर्म के अनुशासिक अंग है जो शिक्षण, रक्षा-सुरक्षा और पोषण-परिपालन जैसे कर्तव्यों को आधार मान कर बनाए गए हैं और जिनमे पूरे विश्व के सभी धर्म समाहित हो जाते हैं जो धर्म किशी विशेष भौगोलिक जलवायु में उत्पन्न होने के आधार पर बने हैं। अतः जब शिक्षण, रक्षा-सुरक्षा और पोषण-परिपालन जैसे कर्तव्यों को समाज से अलग नहीं किया जा सकता है तो कम से कम "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" का अंत इस दुनिया से नहीं हो सकता और इस प्रकार अपने को "ब्राह्मण धर्म या क्षत्रिय धर्म या वैश्य धर्म या इनमे से किशी दो धर्म या तीनो धर्म से बना हुआ मानने वाली जातियों का भी अंत नहीं किया जा सकता है। पर हाँ जो जातियां अपने को "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" का किशी भी प्रकार अंग नहीं मानती हैं वे चाहें तो अपने को ख़त्म कर लें उनको कोई नहीं रोकेगा । मेर संज्ञान में एक दर्जन से ज्यादा उत्तर प्रदेश की कुछ जातियां है जो सीधे-सीधे "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" से जुडी हैं वे अपने को किशी भी वर्ग में क्यों न मानती हों मुझे कोई आपत्ति नहीं यदि वे गंगा के बहते हुए पानी में हाँथ धो रहे है। भारत में एक ऐसी जाती है या जाती समूह है जो शीधे-शीधे अपने को विष्णु का कुर्म अवतार मानता है और दूसरी जाती यदुवंशी, तीसरी मौर्यवंशीय इस प्रकार अन्य-अन्य पिछड़ी और दलित (दलित विरादरी शर्माती है अतः उनका नाम मै यहाँ नहीं लूंगा पर मई उनको भी जानता हूँ) जातियां आती जायेंगी जो "ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म" की अनुयायी हैं। अतः यह मत कहो की ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म और इनसे बनी जाती का अंत आप कर देंगे क्योंकि रेसैक्लिक(पुनर्निर्माण) की प्रक्रिया ही सनातन हिन्दू धर्म को चला रही है और इसकी जड़ें कितनी गहरी हैं कोई सोच भी नहीं सकता।*******जय हिन्द (ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीप=अनादि काल से आर्यावर्त क्षेत्र), जय भारत (विश्वामित्र और मेनका के नाती और शकुन्तला और हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत के पुत्र भारत का आर्यावर्त जिसे आप अखंड भारत या भारत + अखंड = भरतखंड कह सकते हैं), जय श्री राम, जय श्री कृष्ण ( इसी विष्णु अवतार श्री राम और श्री कृष्ण के लिए परशुराम अग्यातवास में चले जाते हैं और ब्रह्मा और शिव भक्त बन जाते हैं जामवंत:ब्रह्मा और हनुमान:शिव के रूप में)।


अगर साम्यवाद का या अन्य वाद का मतलब जाती और धर्म का अंत करना है तो उस साम्यवाद या अन्य वाद का अंत अपने आप हो जायेगा। समानता केवल उपरी आवरण से नहीं होती वल्कि अंतर्मन और ह्रदय से भी समानता स्थापित होती है और उसके लिए आन्दोलन नहीं अच्छे सामाजिक वातावरण की जरूरत होती है जिसमे सभी अपने कर्तव्यों के करने में आनंद महशूस करें । अतः जाती और धर्म के अंत करने का सपना छोड़ दें आप लोग वह भी भारत में। क्योंकि जाती और धर्म को मानने वाले किशी को दलित नहीं बनाते वरन सामजिक बुराइयां और सामाजिक आवारापन इसके लिए जिम्मेदार है।


वैसे तो राजनेताओं का एक ही धर्म होता है राजधर्म चाहे वे पक्ष में रहें या विपक्ष में फिर भी गांधी-नेहरु परिवार यदि हिन्दू(ब्राह्मण) है तो उसका गोत्र केवल और केवल कश्यप गोत्र हो सकता है क्योंकि अन्य गोत्र में उसका स्थान निहित नहीं होगा और न अन्य गोत्र की सीमा में वह आयेंगे क्योंकि अपनी पवित्रता की रक्षा में वे किशी को अपने से दूर तो कर सकते है पर शीधे-शीधे अपने में समाहित नहीं करते बिना कश्यप गोत्र में प्रवेश लिए। कारन पुनः श्रीराम और श्री कृष्ण सहित अधिकतम विष्णु अवतार देने वाले इस गोत्र में सबको समाहित करने की क्षमता है जो दूसरे धर्म से भी पुनः सनातम हिन्दू धर्म में प्रवेश का प्रथम द्वार जो बनता है। फिर भी गौतम और वाशिस्था गोत्रीय कश्यप गोत्र के लिए सबसे ज्यादा श्रद्धेय और आदरनीय है।When you cross any border (caste or religion's border) or enter in any other's border then you fall in the well of Kashyapa| Any transition in caste and religion without entry in Kashyap Gotra impossible.


Wednesday, August 21, 2013

प्रगतिशील सच्चाई का अनुसरण ही आर्यों की निशानी है और यही किशी पुरुष या स्त्री को श्रेष्ठ बनाता है। अतः इसी से किशी के आर्य होने का निर्धारण होता है न कि किशी की नश्ल और रंग से।-----सकारात्मकता ही पृथ्वी पर मानवता को नियंत्रित करती है। अतः सदैव सकारात्मक करे और सकारात्मक बनें और दूसरों को भी सकारात्मक बनायें और सकारात्मक करने के लिए प्रेरित करें। इसी में मानवता का कल्याण निहित है।

प्रगतिशील सच्चाई का अनुसरण ही आर्यों की निशानी है और यही किशी पुरुष या स्त्री को श्रेष्ठ बनाता है। अतः इसी से किशी के आर्य होने का निर्धारण होता है न कि किशी की नश्ल और रंग से।-----सकारात्मकता ही पृथ्वी पर मानवता को नियंत्रित करती है। अतः सदैव सकारात्मक करे और सकारात्मक बनें और दूसरों को भी सकारात्मक बनायें और सकारात्मक करने के लिए प्रेरित करें। इसी में मानवता का कल्याण निहित है।

Agar Tridevo ki kendriy shakti sthal aur Devi Sarswati tatha Saptarshiyon ke udgam sthal, Prayag ki jameen par hee sab kuchh hogaa to Vishv ke aur Bharat ke anya bhag me kyaa hoga. Atah yahaan sanketik hee sab kuchh hota rahe yahee shresth upay hai manavta ke liye.


Due to word Aditi's son Aditya=Shoorya, there is way that Shoorya generated Chandra, Indra, Vishwakarma and other gods. That is the CHANDRAVANSHIY are part of SHOORYAVANSHIY. Therefore also by this way SHOORYAVANSHIY AND CHANDRAVANSHIY ARE BROTHER.


Kashyapa Rishi and Aditi's son called Aditya: SHOORYA and their others sons are Chandra, Indra, Vishwakarma and other gods. Shoorya generated Shooryavansh or Solar Dynasty and Chandra generated Chandravansh or Moon Dynasty. Thus SHOORYAVANSHIY AND CHANDRAVANSHIY ARE BROTHER.


Shooryavansheey ya Raghuvansheey aur Chandravansheey ya Yaduvansheey ka udbhav Kashyap Rishi aur unaki patni Aditi se hee hua hai aur dono dharao, Ganga aur Yahuna ka milan bhee Prayag:Triveni hee hai.


पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिः| (Prthivii Shaantir-Aapah Shaantir-Ossadhayah Shaantih Vanaspatayah Shaantih) May there be Peace in the Earth, May there be Peace in the Water, May there be Peace in the Plants, May there be Peace in the Trees.

Note: Prithvi=Earth, Aapah=Water, Ossadhah=Plant, Vanaspatayah=Trees.

श्रीराम और श्रीकृष्ण का शास्त्र सम्मत वर्णित रूप मेघवर्णं (cloud color)=साँवला (न तो केवल शुभ्र ही और न तो केवल काला ही ) मतलब जिसमे मिला दो उसी जैसा। शुभ्र वर्ण तो केवल ब्रह्मा और शिव का है। विष्णु का शास्त्र सम्मत वर्णित रूप मेघवर्णं है|


वन्दे विष्णुम भवभयहरम सर्वलोकैकनाथम--------------> शान्ताकारम भुजगशयनम, पद्मनाभं सुरेशं| विश्वाधारं गगानासद्रषम, मेघवर्णं शुभान्गम|| लक्ष्मिकानतम कमल नयनं, योगिभिर्ध्यानागाम्यम| वन्दे विष्णुम भवभयहरम, सर्वलोकैकनाथमसर्वलोकैकनाथम|| Meaning: 1: (Salutations to Sri Vishnu) Who has a Serene Appearance, Who Rests on a Serpent (Adisesha), Who has a Lotus on His Navel and Who is the Lord of the Devas, 2: Who Sustains the Universe, Who is Boundless and Infinite like the Sky, Whose Colour is like the Cloud (Bluish) and Who has a Beautiful and Auspicious Body, 3: Who is the Husband of Devi Lakshmi, Whose Eyes are like Lotus and Who is Attainable to the Yogis by Meditation, 4: Salutations to That Vishnu Who Removes the Fear of Worldly Existence and Who is the Lord of All the Lokas.


The principle of Karma is rooted in the foundation of Dharm. It is based on the premise that the whole universal order is not the random combination of events, but is dominated by the immutable law of cause and effect. In Indian Philosophy, therefore, great importance is given to the Karmic law. Owing to this, very minute analysis of Karma is undertaken by the Indian Philosophers. ...every activity or action leaves its hidden impression n on the soul. That impression remains with the SOUL through its present life and also serves to identify it in the future life.


This Karma Yoga course will be the first of three sequential courses the Lakulish Yoga and Health Retreat will be presenting on Karma, Gyan and Bhakti Yoga.-------------Whatever the path name, the unalterable sequence is the same. First the body and mind need be purified. This first, or purificatory Stage, is known as Karma Yoga. Once purification of the body and mind is attained, then, and only then, can one pass from Karma Yoga and gain entrance to the second stage, that of Gyan Yoga or the path of Knowledge. When the phase of Gyan Yoga or knowledge completes, then, and only then, can one enter the final phase, that of true devotion or Bhakti Yoga that leads one to the final and ultimate goal of oneness with God. This Karma Yoga course will be the first of three sequential courses the Lakulish Yoga and Health Retreat will be presenting on Karma, Gyan and Bhakti Yoga.


Each and every social person in this world adopted at least on of the Yoga in his life out of four: Gyana Yoga, Dhyan Yoga, Karma Yoga and Bhakti Yoga. There may be many who can adopt more than one which depends on his skill.--------All others Yogas with these are: Hatha, Laya , Karma, Bhakti, Raja Yog, Gyan, Kriya, Mantra, Sahaj, Ashtang, Naad, Dhyan.


गिरीशं गणेशं सुरेशं महेशं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे---------------------- प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं जगन्नाथनाथं सदानंद भाजां | भवद्भव्य भूतेश्वरं भूतनाथं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || १ || गळे रुंडमालं तनौ सर्पजालं महाकालकालं गणेशाधिपालां | जटाजूटगंगोत्तरंगैर्विशिष्यं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || २ || मुदामाकरं मंडनं मंडयंतं महामंडलं भस्मभूषाधरं तं | अनादिंह्यपारं महामोहमारं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ३ || वटाधो निवासं महाट्टाट्टहासं महापापनाशं सदा सुप्रकाशं | गिरीशं गणेशं सुरेशं महेशं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ४ || गिरींद्रात्मजा संगृहीतार्थदेहं गिरौसंस्थितं सर्वदा सन्नगेहं | परब्रह्म ब्रह्मादिभिर्वंद्यमानं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ५ || कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं पदांभोजनम्राय कामं ददानं | बलीवर्धयानां सुराणां प्रधानं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ६ || शरच्चंद्र गात्रं गणानंद पात्रं त्रिनेत्रं धनेशस्य मित्रं | अपर्णा कलत्रं सदा सच्चरित्रं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ७ || हरं सर्पहारं चिताभूविहारं भवं वेदसारं सदा निर्विकारं | स्मशाने वसंतं मनोजं दहंतं शिवं शंकरं शंभुमीशानमीडे || ८ || स्वयं यः प्रभाते नरश्शूलपाणेः पठेत् स्तोत्ररत्नं त्विहप्राप्यरत्नं | सपुत्रं सुधान्यं समित्रं कळत्रं विचित्रैः समाराध्य मोक्षं प्रयाति || फलशृति

Translation:-----------
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who is the Lord, Who is the Lord of our lives, Who is Vibhu, Who is the Lord of the world, Who is the Lord of Viṣṇu (Jagannātha), Who is always dwelling in happiness, Who imparts light or shine to everything, Who is the Lord of living beings, Who is the Lord of ghosts, and Who is the Lord of everyone. | | 1 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who has a garland of skull around the neck, Who has a net of snakes around His body, Who is the destroyer of the immense-destroyer Kāla, Who is the lord of Gaṇeśa, Whose matted -hair are spread-out by the presence of the waves of Gańgā falling on His head, and Who is the Lord of everyone. | | 2 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who scatters happiness [in the world], Who is ornating the universe, Who is the immense universe Himself, Who is possessing the adornment of ashes, Who is without a beginning, Who is without a measure, Who removes the greatest attachments, and Who is the Lord of everyone. | | 3 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who resides below a Vaṭa (Banyan) tree, Who possesses an immense laughter, Who destroys the greatest sins, Who is always resplendent, Who is the Lord of Himālaya, various tormentor-groups (Gaṇa ) and the demi-gods, Who is the great Lord, and Who is the Lord of everyone. | | 4 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who shares half of His body with the daughter of Himālaya ¹, Who is situated in a mountain (Kailāsa), Who is always a resort for the depressed, Who is the Ātman, Who is reverred by (or Who is worthy of reverence by) Brahma and others, and Who is the Lord of everyone. | | 5 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who holds a skull and a trident in the hands, Who endows the desires of those who are humble to His lotus-feet, Who uses an Ox as a vehicle ², Who is supreme and above various demi-gods, and Who is the Lord of everyone. | | 6 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who has a face like the Winter-moon, Who is the subject of happiness of Gaṇa (tormentor groups), Who has three eyes, Who is pure, Who is the friend of Kubera (controller of wealth), Who is the consort of Aparṇā (Pārvatī), Who has eternal characteristics, and Who is the Lord of everyone. | | 7 | |
I pray You, Śiva, Śańkara, Śambhu, Who is known as Hara, Who has a garland of snakes, Who roams around the cremation grounds, Who is the universe, Who is the summary of the Veda (or the One discussed by Veda) , Who is always dispassionate, Who is living in the cremation grounds, Who is burning desires born in the mind, and Who is the Lord of everyone. | | 8 | |
Those who study this prayer every morning with effulgence and emotions for Trident-holding Śiva, achieve Mokṣa, after having attained a dutiful son, wealth, friends, wife, and a colorful life. | | 9 | |

ॐ जय जगदीश हरे स्वामी* जय जगदीश हरे भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे, ॐ जय जगदीश हरे|----- By some one

ॐ जय जगदीश हरे
स्वामी* जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट,
दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे,
ॐ जय जगदीश हरे

जो ध्यावे फल पावे,
दुख बिनसे मन का
स्वामी दुख बिनसे मन का
सुख सम्पति घर आवे,
सुख सम्पति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का
ॐ जय जगदीश हरे

मात पिता तुम मेरे,
शरण गहूं मैं किसकी
स्वामी शरण गहूं मैं किसकी .
तुम बिन और न दूजा,
तुम बिन और न दूजा,
आस करूं मैं जिसकी
ॐ जय जगदीश हरे

तुम पूरण परमात्मा,
तुम अंतरयामी
स्वामी तुम अंतरयामी
पारब्रह्म परमेश्वर,
पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी
ॐ जय जगदीश हरे

तुम करुणा के सागर,
तुम पालनकर्ता
स्वामी तुम पालनकर्ता,
मैं मूरख खल कामी
मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता
ॐ जय जगदीश हरे

तुम हो एक अगोचर,
सबके प्राणपति,
स्वामी सबके प्राणपति,
किस विधि मिलूं दयामय,
किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति
ॐ जय जगदीश हरे

दीनबंधु दुखहर्ता,
ठाकुर तुम मेरे,
स्वामी ठाकुर तुम मेरे
अपने हाथ उठाओ,
अपने शरण लगाओ
द्वार पड़ा तेरे
ॐ जय जगदीश हरे

विषय विकार मिटाओ,
पाप हरो देवा,
स्वमी पाप हरो देवा,.
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
संतन की सेवा
ॐ जय जगदीश हरे

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणम् । नवकञ्ज लोचन, कञ्जमुख कर, कञ्जपद कञ्जारुणम् ॥१॥---------by -गोस्वामी तुलसीदास

॥ श्री रामचन्द्र कृपालु ॥


श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणम् ।
नवकञ्ज लोचन, कञ्जमुख कर, कञ्जपद कञ्जारुणम् ॥१॥

 
कंदर्प अगणित अमित छबि नव नील नीरज सुन्दरम् ।
पटपीत मानहुं तड़ित रूचि-शुची नौमि जनक सुतावरम् ॥२॥

भजु दीन बन्धु दिनेश दानव दैत्यवंशनिकन्दनम् ।
रघुनन्द आनंदकंद कोशल चन्द दशरथ नन्दनम् ॥३॥

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणम् ।
आजानुभुज शर चापधर सङ्ग्राम-जित-खर दूषणम् ॥४॥

इति वदति तुलसीदास शङ्कर शेष मुनि मनरञ्जनम् ।
मम हृदयकञ्ज निवास कुरु कामादि खलदलगञ्जनम् ॥५॥

गोस्वामी तुलसीदास

O mind! Revere the benign Shree Ramachandra, who can remove the fear of rebirths ।
Who has fresh lotus eyes, lotus face and lotus hands, feet like lotus and like the rising sun ॥1॥

His image exceeds myriad Cupids, like a fresh, blue-hued cloud — magnificent ।
His amber-robes appear like lightning, pure, captivating. Revere this groom of Janaka’s daughter ॥2॥

Sing hymns of the brother of destitute, Lord of the daylight, the destroyer of the clan of Danu-Diti demons ।
The progeny of Raghu, limitless 'joy', the moon to Kosala, sing hymns of Dasharatha’s son ॥3॥

His head bears the crown, ear pendants, tilak on forehead, his adorned, shapely limbs are resplendent
Arms extend to the knees, studded with bows-arrows, who won battles against Khara and Dooshana ॥4॥

Thus says Tulsidas, O joy of Shankara, Shesh (Nag), Mind and Sages ।
Reside in the lotus of my heart, O slayer of the vices-troops of Kaama and the like ॥5॥

Goswami Tulsidas

Monday, August 19, 2013

ब्रह्मा की मानों या न मानो (क्योंकि जन्म आप को मिल चुका है और इसके बाद रहे इसी से उनको काम) पर शिव और शिवा(पारवती) और विष्णु(श्रीराम ) और लक्ष्मी(सीता) की बात तो मानने का प्रयत्न करना ही पडेगा अगर ब्रह्मा का वरदान(श्रीसती सदा चलाती रहे=मानव जीवन पृथ्वी पर बना रहे) सत्य होना है तब के लिए, अन्यथा "शिव अगर कल्याणकारी भी हैं तो विनाशक भी हैं और विष्णु अगर प्रजापालक भी हैं तो अनुशाशक भी हैं"। जय हिन्द(कश्मीर से कन्याकुमारी और इरान से सिंगापुर मतलब जम्बूद्वीपे), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


धन्य सो देश जह सुरसरि बहई (वह देश धन्य है जहा भागीरथी-गंगा बहती हों)। धन्य नारी पतिव्रत अनुसरहीं (वह नारी धन्य है जो पतिब्रत का पालन करती हो) धन्य सो भूप निति जो करई (वह राज धन्य है जो नीतियों के अनुसार आचरण करता हो) । धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)॥ सो धन धन्य प्रथम गति जाकी (वह धन धन्य है जो समाज के उपकार में लगाया जाय )। धन्य पुण्य रत मति सोई पाकी (वह मति धन्य है जो पुन्य के कार्य मतलब सृजन या सामाजिक नवनिर्माण के कार्य में लगाई जाय) ॥ धन्य घरी सोई जब सतसंगा (वह समय धन्य है जो सत्संग करने में प्रयुक्त हुआ हो) । धन्य जन्म द्विज भगती अभंगा (जिस ब्राह्मण की भगति अटूट हो भगवान् राम के प्रति उसका जमन धन्य है) ॥ सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (हे उमा-पार्वती वह कुल धन्य है जिसमे पूरे जगत के पूज्य और पवित्रता में भी सर्वश्रेष्ठ (सु-पुनीत) का जन्म हो इसका मतलब रघुकुल=इक्शाकुवंश=शूर्यवंश धन्य है)। श्रीरघुवीर परायण जेहिं नर उपज विनीत (विनय युक्त =विनम्रता और शिस्टाचारयुक्त व्यक्ति =RESPECTFUL=COURTEOUS=Gentleman=सज्जन पुरुष)=और ऐसे रघुवीर का परायण मतलब रघुवीर में अभीस्त श्रध्धा वाला वही हो सकता है जी जिसके अन्दर विनीत (विनम्रता-विनययुक्त) की उपज हो ) ॥------------

रामचरित मानस उत्तर कांड में भगवान् शिव माता पार्वती को कुछ सप्रसंगा ब्याख्या देते हुए (काली माई गौरा पार्वती का ही स्वरुप है पर शिव जी के साथ उस काली माई के स्वरुप में नहीं रहती वरन विश्व की सबसे सुन्दर स्त्री रति से भी सुन्दर स्वरुप गौरा पार्वती के स्वरुप में रहती हैं) :
धन्य सो देश जह सुरसरि बहई (वह देश धन्य है जहा भागीरथी-गंगा बहती हों)। धन्य नारी पतिव्रत अनुसरहीं (वह नारी धन्य है जो पतिब्रत का पालन करती हो)
धन्य सो भूप निति जो करई (वह राज धन्य है जो नीतियों के अनुसार आचरण करता हो) । धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)॥
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी (वह धन धन्य है जो समाज के उपकार में लगाया जाय )। धन्य पुण्य रत मति सोई पाकी (वह मति धन्य है जो पुन्य के कार्य मतलब सृजन या सामाजिक नवनिर्माण के कार्य में लगाई जाय) ॥
धन्य घरी सोई जब सतसंगा (वह समय धन्य है जो सत्संग करने में प्रयुक्त हुआ हो) । धन्य जन्म द्विज भगती अभंगा (जिस ब्राह्मण की भगति अटूट हो भगवान् राम के प्रति उसका जमन धन्य है) ॥
सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (हे उमा-पार्वती वह कुल धन्य है जिसमे पूरे जगत के पूज्य और पवित्रता में भी सर्वश्रेष्ठ (सु-पुनीत) का जन्म हो इसका मतलब रघुकुल=इक्शाकुवंश=शूर्यवंश धन्य है)।
श्रीरघुवीर परायण जेहिं नर उपज विनीत (विनय युक्त =विनम्रता और शिस्टाचारयुक्त व्यक्ति =RESPECTFUL=COURTEOUS=Gentleman=सज्जन पुरुष)=और ऐसे रघुवीर का परायण मतलब रघुवीर में अभीस्त श्रध्धा वाला वही हो सकता है जी जिसके अन्दर विनीत (विनम्रता-विनययुक्त) की उपज हो ) ॥--------------------तो आज सज्जन पुरुष की कमी हो गयी है विद्वान और ऋषि महर्षी तो बहुत ज्यादा हो गए हैं लेकिन आप ऋषि महार्श्री की अधिकता के बावजूद विनम्र और सज्जन पुरुष की कमी क्यों हो गयी है का प्रश्न करेंगे तो आप के लिए बता दूं की दैत्यों के गुर शुक्राचार भी एक ऋषि महर्षि थी और वे देवतायों के गुरु गुरु ब्रहस्पति से भी कई मायने में आगे थे अतः ऋषि महार्श्री भी अधिक हो कर क्या करेंगे यदि वे शुक्रचारियों के साथ हो लेंगे तो और अधिक नुक्सान हो जाता है। अतः विनम्र-सज्जन-विनययुक्त-विनीत-शिस्ताचारयुक्त व्यक्तियों की इस पूरे विश्व को अति आवश्यकता है विद्वान और ऋषि महर्षी न सही वे सामान्य शिस्ताचार कम से कम जानते हों।*******जय हिन्द (ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीप=अनादि काल से आर्यावर्त क्षेत्र), जय भारत (विश्वामित्र और मेनका के नाती और शकुन्तला और हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत के पुत्र भारत का आर्यावर्त जिसे आप अखंड भारत या भारत + अखंड = भरतखंड कह सकते हैं), जय श्री राम, जय श्री कृष्ण ( इसी विष्णु अवतार श्री राम और श्री कृष्ण के लिए परशुराम अग्यातवास में चले जाते हैं और ब्रह्मा और शिव भक्त बन जाते हैं हनुमान और जामवंत के रूप में)।

भारतीय समाज में जिस वर्ग विशेष के कुछ ख़ास व्यक्तियों का आम नागरिकों द्वारा सबसे ज्यादा विरोध होता है भारत से लेकर पड़ोसी देश तक, "सामाजिक रूप से सामान्य जन को कुछ क्षति पहुँचने के कारन", शायद उन्ही की देन है की समाज में कुछ लोग आज भी श्रीराम और श्रीकृष्ण के चरित्र को अपनाने की उत्कट इक्षा जागृत होती है। अन्यथा वर्तमान समय में जब भ्रस्ताचार, अश्लीलता और चरित्रहीनता अपने चरम पर हैं कोई श्रीकृष्ण और श्रीराम जैसे चरित्र के बारे में सोचता ही नहीं जिन्होंने सत्य और नैतिक कर्त्तव्य के लिए अपने निजी जीवन के सबसे अमूल्य अंग का ही त्याग कर दिया था। यह जरूरी नहीं की हर प्रश्न का उत्तर दिया जाय अगर समाज का दीर्घकालीन हित प्रभावित न हो रहा हो तो पर इशारे कम नहीं दिए हैं हमने इन वक्तों में जिससे कुछ समझ में न आये।हम बिना अपराध किये बदनाम हो कर भी, मर कर भी और अपने को ज़िंदा जलाकर भी इस समाज में श्रीराम और श्री कृष्ण को ज़िंदा रखेङ्गे।जय हिन्द(कश्मीर से कन्याकुमारी और इरान से सिंगापुर मतलब जम्बूद्वीपे), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


Sunday, August 18, 2013

Saturday, August 17, 2013

दयालु मनुष्य, अभिमानशून्य व्यक्ति, परोपकारी और जितेंद्रीय ये चार पवित्र स्तंभ हैं, जो इस पृथ्वी को धारण किए हुए हैं। ये चारों गुण एक साथ मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र में समाहित होकर पृथ्वी की धारण शक्ति बन गए हैं। राम के इन्हीं वैयक्तिक सद्गुणों का उच्चतम आदर्श समाज के सम्मुख प्रस्तुत करते रहना मेरा प्रमुख उद्देश्य है। एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, भ्राता एवं आदर्श राजा- एक वचन, एक पत्नी, एक बाण जैसे व्रतों का निष्ठापूर्वक पालन करने वाले राम का चरित्र अधिकतम व्यक्तियों के सामने लाकर अहिंसा, दया, अध्ययन, सुस्वभाव, इंद्रिय दमन, मनोनिग्रह जैसे षट्‍गुणों से युक्त आदर्श चरित्र को अनुकरण करने के लिए प्रेरित करना मेरा उद्देश्य है।


मित्रों हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बूद्वीपे) के भारतवर्ष (भरतखंडे=मतलब अखंड भारत) भूभाग को नरभू मतलब मानव भूमि कहा गया है। अतः स्वयं सिध्ध है की मानवता की प्रथम भूमि भारत वर्ष ही है | जब यह नर भूमि है इसमे कोई संदेह नहीं और यह ऋषि भूमि भी जरूर है क्योंकि मानव की उत्त्पत्ति सर्व प्रथम ऋषियों से ही हुई जिनको स्वयं ब्रह्मदेव ने यज्ञ द्वारा(अप्रत्यक्ष रूप से) प्रयाग (प्राक-यज्ञ) में प्रकट किया था।--------विशेष: भारतीय मान्यता के अनुसार मानव जीवन इसी प्रकार हुआ और अमीबा से मानव तक के विकाश की कहानी हम वैज्ञानिक शिक्षा के एक विशेष क्रम को बनाये रखने के लिए ही पढ़ते हैं, अन्यथा हम ब्रह्म (परमब्रह्म=ब्रह्मा +विष्णु+महेश) को सर्व शक्ति शाली मानते हैं जिसकी कृपा से ब्रह्मा ने सप्तर्षि को पृथ्वी पर प्रकट किया प्रयाग में।


महाभारत के पहले दिन ही जहां अर्जुन एक धर्मभीरु नर की भूमिका में हैं वही परमब्रह्म श्री कृष्ण नारायण की भूमिका में है इसमे नर के रूप में अर्जुन भी सत्य हैं और नारायण के रूप में श्री कृष्ण भी सत्य है और इस प्रकार नर-नारायण का सशरीर संयोग बहुत ही दुर्लभ है जिसमे नारायण श्री कृष्ण ने अर्जुन को अनेकों नाम दिए हैं: जो इस्वर को और अपने लक्ष्य को सही अर्थों में जाने वही पार्थ है और जो इस्वर के प्रति सच्ची निष्ठा और अनुराग रखे वह भारत है, जो संसार में जितने भी प्रकार के धन हैं सबका स्वामी है वह धनञ्जय है, जो कुंती पुत्र है वह कौन्तेय है: इस प्रकार अर्जुन को इन सभी नामों से जाना जाता है: अर्जुन,धनञ्जय,पार्थ,पाकशासनि,अनीलबाजी, सव्यसाची, अनघ,ऐन्द्र,किरीटमाली,कौंतेय,भारत, धन्वी,श्वेतवाह,बासवी,शक्रात्मज,शक्रनन्दन,सुनर,नर|


Friday, August 16, 2013

स्वयं परमब्रह्म श्रीकृष्ण कहते हैं की मै श्रीराम हूँ तो श्रीराम और श्रीकृष्ण में भेद कहाँ रह गया| अतः इन दोनों के पग चिन्हों पर चलने वालों में भेद कहाँ और इस प्रकार इन दोनों के सामानांतर चलने वाले इसाई और मुसलमान में भेद कहाँ और इस प्रकार इंसान का इंसान में भेद कहाँ पर इसका मतलब यह नहीं की आप अपने धर्म को न माने और अमानुष की तरह व्यवहार करने लगें। क्योंकि जब आप एक बालक के रूप में होते है और आप का दिमाग अल्प विकशित होता है और तब से लेकर जीवन पर्यन्त धर्म आप को अपने जलवायु और समाज में जीना शिखाता है।


श्रीमद्भागवत गीता का अध्याय तेरह:क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग: पांचवा श्लोक-किशी व्यक्ति या समाज के जीवन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक---"महाभूतान्यहङ्‍कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ भावार्थ : पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध॥5॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध इन पाँच इन्द्रियों के विषय से देह रुपी संसार और मानवता रुपी संसार प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है। शब्द: वाणी या आवाज का अनुकूल या प्रतिकूल होना; स्पर्श: मधुर या कटु या खुरदरा; रूप: मोहक या विदूसक या भयंकर; रस: मीठा या कडवा या पिपासक; गंध: आकर्षक सुगंध या दुर्गन्ध, और इस प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध के अन्य भी प्रकार हो सकते हैं जो किशी व्यक्ति या समाज के जीवन को प्रभावित करते रहते हैं।


श्रीमद्भागवत गीता का अध्याय 10. विभूतियोग: प्रमुख श्लोक-शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ| पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‌ । झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ भावार्थ : मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ॥31॥


श्रीमद्भागवत गीता का अध्याय 10. विभूतियोग: कुछ प्रमुख श्लोक जो स्वयं परमब्रह्म श्रीकृष्ण का परिचय अदिति (कश्यप ऋषि की पत्नी) के पुत्र और इस प्रकार वृष्णि वंश के वंसज (वाशुदेव देवकी पुत्र )के रूप में करवाते हैं और उनके अन्य अन्य प्रमुख स्वरुप :

श्रीमद्भागवत गीता का अध्याय 10. विभूतियोग: कुछ प्रमुख श्लोक जो स्वयं परमब्रह्म श्रीकृष्ण का परिचय अदिति (कश्यप ऋषि की पत्नी) के पुत्र और इस प्रकार वृष्णि वंश के वंसज (वाशुदेव देवकी पुत्र )के रूप में करवाते हैं और उनके अन्य अन्य प्रमुख स्वरुप :

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥

भावार्थ : सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु- ये मुझमें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है॥6॥

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥

भावार्थ : हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ॥20॥

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्‌ ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥

भावार्थ : मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ॥21॥

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥

भावार्थ : मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात्‌ जीवन-शक्ति हूँ॥22॥

रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌ ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌ ॥

भावार्थ : मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ॥23॥

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्‌ ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥

भावार्थ : पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र हूँ॥24॥

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌ ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥

भावार्थ : मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ॥25॥

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥

भावार्थ : मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ॥26॥

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌ ॥

भावार्थ : हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ॥32॥

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥

भावार्थ : मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ। अक्षयकाल अर्थात्‌ काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ॥33॥

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥

भावार्थ : वृष्णिवंशियों में (यादवों के अंतर्गत एक वृष्णि वंश भी था) वासुदेव अर्थात्‌ मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात्‌ तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ॥37॥

कश्यप ऋषि हिमालय स्थित कैलाशपति भगवन भोले शिव शंकर के शाड्हू भाई(brother-in-law) थे यह विश्व विदित है ही।


"प्रयाग ही सप्तऋषियों का जन्म स्थान है जिनके द्वारा हिमालय की गोंद में अवस्थित क्षेत्र में कश्यप ऋषि (मनु) और उनकी पत्नी अदिति (श्रध्दा) द्वारा प्रथम संतानोत्तापत्ति हुई जिसके उपरांत अन्य सभी ऋषि के वंसज मानव सभ्यता को अंगीकार कर सम्पूर्ण मानव जीवन की सुरुआत हुई"। अतः पहले दोआब उसके बाद पंचाब की समझ को जहां तक हो सके अधिकतम लोगों में पुनर्स्थापित कर प्रयाग को गौरव प्रदान करना मेरा उद्देश्य था और शायद यह सुरुआत हो गयी है इसमे हमें संतुस्ती हुई है।


द्रौपदी और स्वयं कुंती को गर्व तो अर्जुन जैसे धनुर्धर पर था पर वे प्रेम ज्यादा भीम से करती थी उनके मात्री और स्त्री के प्रति समर्पण भाव के नाते।


अपने को ऐसा ढालो की हनुमान (अम्बवादेकर=अम्बेडकर) बनाने का भी मौक़ा मिले तो प्रभु (ठाकुर) श्रीराम अपने भाई भरत के समान गले लगाएं और एक जंगली डाकू बाल्मीकी को प्रभु की कृपा से बाल्मीकी बनने का मौक़ा मिले तो प्रभु (ठाकुर) का ऐसा साथ दीजिये की स्वयं प्रभु आप के ऐसे ऋणी हो जाय की अपने परिवार और पुत्रों के के सेवा करने का अवसर और गुरु होने का मौक़ा दे। अतः सेवा से हम क्या नहीं पा सकते हैं?


जब भीम बनाने का अवसर प्राप्त हो तो ऐसा भाई बने जो बिना किशी यस और कीर्ति के आशा के ब्रह्मास्त्र से भी भाइयों की रक्षा हेतु अपने पुत्र का बलिदान करें और स्त्री जाती की रक्षा और सम्मान हेतु कीचक, दुशासन और दुर्योधन का वध करें । लेकिन आज के भीम तो स्वयं कीचक, दुशासन और दुर्योधन की राह पर स्वयं चलने लगे है। अतः वे क्या कीचक, दुशासन और दुर्योधन का वध करेंगे या उनका विरोध करेंगे? अब भी समय है सही राह पर लौटने का और भीम जैसा अनुशासित और समर्पित भाई बनने का जो रास्त्र, समाज और परिवार का सहारा सुद्रिंड सहारा बन सके। अगर समाज उसके कार्यों का प्रतिफल अही देगा तो इस्वर अवस्य देगा इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में ही सही।


मै अपने पड़ोसी देशों को ही नहीं बल्की उनको उक्शाने वाले देशों और पूरे विश्व को बताना चाहूंगा की अगर भारत को सैनिक और कूटिनीतिक तौर पर बर्बाद करने का प्रयाश होगा तो उससे पूरा विश्व बर्बाद होगा अतः भारत पर कुद्रिस्ती न डालें वे लोग। यह मैं धार्मिक और आध्यात्मिक तौर पर बोल रहा हूँ और जिस प्रकार से हिन्दू धर्म के उदय के स्थान हिन्दुस्तान पर सैनिक और कूटिनीतिक चाल चली जा रही है अगर उसका अंत भारत की अंतरात्मा की आवाज को मृत करना है तो पूरी पृथ्वी से मानवता का विनाश निश्चित है इससे दुनिया का कोई देश नहीं बचेगा। JAI HIND, JAI BHARAT, JAI SHRI RAM, JAI SHRI KRISHNA|


Wednesday, August 14, 2013

सभी के मन को रमाने वाले, अर्थात आनन्दित करने वाले 'राम' है। *जो इस पृथ्वी पर राजा के रूप में अवतरित होकर भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं, वे 'राम' हैं। *जिनके नामोच्चार से हृदय में शान्ति, वैराग्य और दिव्य विभूतियों का पदार्पण होता है, वे 'राम' हैं। *जो इस पृथ्वी पर राक्षसों (दुष्प्रवृत्तियों को धारण करने वाले) का वध करते हैं, वे 'राम' हैं। *राहु के समान चन्द्रमा को निस्तेज करने वाले, अर्थात समस्त लौकिक विभूतियों को निस्तेज करके उच्चतम पुरुषोत्तम रूप धारण करने वाले 'राम' हैं।


*जो इस पृथ्वी पर राजा के रूप में अवतरित होकर भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं, वे 'राम' हैं।----*जो इस पृथ्वी पर राक्षसों (दुष्प्रवृत्तियों को धारण करने वाले) का वध करते हैं, वे 'राम' हैं।-----*सभी के मन को रमाने वाले, अर्थात आनन्दित करने वाले 'राम' है।---*राहु के समान चन्द्रमा को निस्तेज करने वाले, अर्थात समस्त लौकिक विभूतियों को निस्तेज करके उच्चतम पुरुषोत्तम रूप धारण करने वाले 'राम' हैं।----*जिनके नामोच्चार से हृदय में शान्ति, वैराग्य और दिव्य विभूतियों का पदार्पण होता है, वे 'राम' हैं।


स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व संध्या पर, "आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की पावन शुभकामना"। पंद्रह अगस्त केवल और केवल स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाया जाय न की अंग्रेजों के विरोध दिवस के रूप में क्योंकि वर्तमान समय में उन्ही अंग्रेजो से मिलकर वर्त्तमान अंतर्रास्त्रिय वैज्ञानिक व्यवस्था चल रही है देश में और अंग्रेजो से ज्यादा आतंरिक तंत्र लगा हुआ है देश को परतंत्र करने में। *******जय हिन्द, जय भारत, जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


ईसाइयत जहां श्री कृष्ण के समानांतर चलाती है वही वही इस्लाम श्री राम के सामानांतर चलता है और यही है पृथ्वी पर जीवन मंत्र।


रोम रोम में बसने वाले राम राम जीवन का मंत्र है। राम मृत्यु का मंत्र नहीं है। राम गति का नाम है, राम थमने, ठहरने का नाम नहीं है। सतत वितानीं राम सृष्टि की निरंतरता का नाम है। राम, महाकाल के अधिष्ठाता, संहारक, महामृत्युंजयी शिवजी के आराध्य हैं। शिवजी काशी में मरते व्यक्ति को (मृत व्यक्ति को नहीं) राम नाम सुनाकर भवसागर से तार देते हैं। राम एक छोटा सा प्यारा शब्द है। यह महामंत्र - शब्द ठहराव व बिखराव, भ्रम और भटकाव तथा मद व मोह के समापन का नाम है। सर्वदा कल्याणकारी शिव के हृदयाकाश में सदा विराजित राम भारतीय लोक जीवन के कण-कण में रमे हैं। श्रीराम हमारी आस्था और अस्मिता के सर्वोत्तम प्रतीक हैं। भगवान विष्णु के अंशावतार मर्यादा पुरुषोत्तम राम हिंदुओं के आराध्य ईश हैं। दरअसल, राम भारतीय लोक जीवन में सर्वत्र, सर्वदा एवं प्रवाहमान महाऊर्जा का नाम है।


निर्गुण ब्रह्म बनाम सगुण नाम यह एक अद्भुत सत्य है कि सगुण रूप में राम में समस्त मानवीय एवं दैवीय गुणों को प्रतिष्ठित करनेवाले महात्मा तुलसीदासजी भी राम को निराकार ब्रह्म का अवतार ही मानते हैं आचार्य केशवदास ने भी अपने महाकाव्य रामचंद्रिका में राम को निराकार, साकार और नराकार के रूप में प्रतिष्ठित किया है। वे निर्गुण अवस्था में राम को साक्षात् ब्रह्म के रूप में स्वीकारते हैं। सुधारवादी, पाखंड व कर्मकांड विरोधी संत कबीर के आराध्य भी राम ही हैं। वे अपने राम को सर्वथा निर्गुण, व्यापक, विश्वोतीर्ण एवं विश्वमय ईश्वर मानते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी रमैनी में कहा है कि उनके राम दशरथ सुत नहीं हैं, उनके राम असीम हैं। ‘दशरथ कुल अवतरि नहीं आया, नहिं लंका के राव सताया।’ वास्तव में राम अनादि हैं, निराकार हैं, निर्गुण हैं, परंतु भक्तों के स्नेहवश तथा ब्रह्मादि देवताओं की प्रार्थना से वे दाशरथि राम बनना स्वीकारते हैं। निर्गुण और सगुण राम का यह महाभेद मनुष्य ही नहीं वरन् देवताओं के भी मन-मस्तिष्क में भ्रम और अविश्वास उत्पन्न कर देता है। माता पार्वती की इस उलझन का, ऐसे ही भ्रम का वैज्ञानिक तरीके से भेदन करते हुए शिवजी कहते हैं, जैसे जल और ओले में भेद नहीं है, दोनों जल ही हैं, ऐसे ही निर्गुण और सगुण, निराकार और साकार एक ही हैं। श्रीरामचंद्रजी तो व्यापक ब्रह्म, परमानंद स्वरूप, परात्पर प्रभु और पुराण पुरुष हैं। प्रकाश के भंडार हैं, जीव, माया और जगत के स्वामी हैं। वे ही रघुकुल मणि श्री रामचंद्रजी मेरे स्वामी हैं। हे पार्वती ! जिनके नाम के बल से काशी में मरते हुए प्राणी को देखकर मैं उसे राम मंत्र देकर मुक्त कर देता हूँ वही मेरे स्वामी हैं। (बाल कांड: श्रीरामचरित मानस)


राम आखिर क्या हैं ? वास्तव में राम अनादि ब्रह्म ही हैं। अनेकानेक संतों ने निर्गुण राम को अपने आराध्य रूप में प्रतिष्ठित किया है। राम नाम के इस अत्यंत प्रभावी एवं विलक्षण दिव्य बीज मंत्र को सगुणोपासक मनुष्यों में प्रतिष्ठित करने के लिए दाशरथि राम का पृथ्वी पर अवतरण हुआ है। कबीरदासजी ने कहा है - आत्मा और राम एक है- आतम राम अवर नहिं दूजा। राम नाम कबीर का बीज मंत्र है। रामनाम को उन्होंने अजपाजप कहा है। यह एक चिकित्सा विज्ञान आधारित सत्य है कि हम २4 घंटों में लगभग २१६०० श्वास भीतर लेते हैं और २१६०० उच्छावास बाहर फेंकते हैं। इसका संकेत कबीरदाजी ने इस उक्ति में किया है- सहस्र इक्कीस छह सै धागा, निहचल नाकै पोवै। मनुष्य २१६०० धागे नाक के सूक्ष्म द्वार में पिरोता रहता है। अर्थात प्रत्येक श्वास - प्रश्वास में वह राम का स्मरण करता रहता है। राम शब्द का अर्थ है - रमंति इति रामः जो रोम-रोम में रहता है, जो समूचे ब्रह्मांड में रमण करता है वही राम हैं इसी तरह कहा गया है - रमते योगितो यास्मिन स रामः अर्थात् योगीजन जिसमें रमण करते हैं वही राम हैं। इसी तरह ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है - राम शब्दो विश्ववचनों, मश्वापीश्वर वाचकः अर्थात् ‘रा’ शब्द परिपूर्णता का बोधक है और ‘म’ परमेश्वर वाचक है। चाहे निर्गुण ब्रह्म हो या दाशरथि राम हो, विशिष्ट तथ्य यह है कि राम शब्द एक महामंत्र है। वैज्ञानिकों के अनुसार मंत्रों का चयन ध्वनि विज्ञान को आधार मानकर किया गया है। वाक्शक्ति के मनोशारीरिक प्रभावों को हम रोज देखते हैं। द्रौपदी के व्यंग्यबाण से विनाश को प्राप्त हुई अठारह अक्षौहिणी सेना की कथा हम जानते ही हैं लयबद्ध मधुर संगीत और शोर के क्रमशः सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों के लिए किसी वैज्ञानिक प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। भारतीय वैदिक मंत्रों का अध्ययन करने वाले पाश्चात्य वैज्ञानिक मानते हैं कि मंत्र जाप से उत्पन्न लयबद्ध ध्वनि तरंगें शरीर की समस्त क्रियाओं का नियमन करनेवाली अंतःस्रावी ग्रंथियों (इंडोक्राइन ग्लैंड्स) को प्रभावित करती हैं। ‘मिस्ट्री ऑव मंत्रास’ नामक पुस्तक में मुंबई के एक ख्यात चिकित्सालय में मंत्र दीक्षा द्वारा गंभीर रोगों से ग्रस्त रोगियों को रोगमुक्त करने के सफल प्रयोगों का विवरण दिया गया है। वास्तव में मंत्र जाप का स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर में अवस्थित क्रमशः ग्रंथियों एवं चक्रों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।


मंत्रों की वैज्ञानिकता ध्वनि के प्रभावों के मद्देनजर ही पुल पर से गुजरते समय सैनिकों को तालबद्ध होकर नहीं चलने दिया जाता है क्योंकि तालबद्ध गति के कंपन का आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) का यदि पुल की कंपन आवृत्ति से मिलान (मेच) हो जाए तो पुल भरभराकर टूट सकता है या मजबूत पुल में दरारें पैदा हो जाती हैं। राम जैसे शब्द मंत्र इसी ध्वनि सिद्धांत के तहत मानव शरीर एवं वातावरण में सकारात्मक परिवर्तन करने में सक्षम होते हैं। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि रेडियो प्रसारण में ध्वनि तरंगों को विश्वव्यापी बनाने के लिए विद्युत चुंबकीय तरंगों में रूपांतरित कर दिया जाता है ताकि इसकी गति कुछ मीटर प्रति सेकंड से बढ़ाकर एक लाख छियासी हजार मील प्रति सेकंड हो जाए। लेसर किरणें भी विद्युत-चुंबकीय तरंगे हैं। इन किरणों से एक फुट मोटी लोहे की चादर में आसानी से छिद्र किया जा सकता है और आँखों की सूक्ष्मतम शल्य चिकित्सा भी की जा सकती है। परंतु रेडियो प्रसारण या लेसर किरणें सिर्फ लक्ष्यभेदन ही करती हैं, रेडियो केंद्र या लेसर यंत्र पर इनका प्रभाव नहीं पड़ता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने बालकांड में इस वैज्ञानिक तथ्य को काव्यात्मक रूप देते हुए सुंदर व्याख्या की है- राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार तुलसी भीतर-बाहेर हूँ जो चाहसि उजियार। तुलसीदासजी कहते हैं कि ‘‘यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है तो मुख रूपी द्वार की जीभ रूपी देहली पर रामनाम रूपी मणि दीपक को रख। ’’ निःसंदेह राम नाम का निरंतर जाप करते-करते ऐसा अवसर जीवन में संभव है जबकि मंत्र ‘कंपन’ (वाइब्रेशंस) और शरीरगत विभिन्न ग्रंथियों तथा सूक्ष्म चक्रों के कंपन की आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) का मिलान (मेच) हो जाए तो अचानक स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर में क्रांतिकारी सकारात्मक प्रभाव प्रकट हो जाए। आत्मा और परमात्मा के मध्य की दूरियाँ (भवसागर) अचानक समाप्त हो जाएँ महावीर की तरह ‘केवल्य ज्ञान’ (अल्टीमेट ट्रूथ) या महात्मा बुद्ध की तरह ‘महाबोधि’ का अवतरण संभव हो जाए। कबीरदास जी के शब्दों में आत्मज्योति का प्रकाश उत्पन्न हो जाए, जो मोहिनी और ठगिनी माया के अंधकार को अचानक मिटा दे। प्रस्तुत पद में एक अन्य संत ने इसका वैज्ञानिक निरूपण बखूबी किया है- राम नाम जपते रहो जब लग घट में प्रान। कभी तो दीनदयाल के भनक पड़ेगी कान। यहाँ ‘कभी’ शब्द का प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण और गूढ़ है। भगवान बहरा कदापि नहीं है। यह तो एक वैज्ञानिक कथन है, मंत्र जपते-जपते अचानक एक ऐसा समय आ सकता है कि राम-जाप के कंपन की आवृत्ति का मिलान हो जाए और आत्मा व परमात्मा के बीच की ठोस दीवार भरभराकर टूट जाए। आत्मा और परमात्मा के बीच ‘राम सेतु’ का निर्माण हो जाए। वस्तुतः मंत्र वैज्ञानिक घटना है, धार्मिक या महज काव्यगत तथ्य नहीं है।


राम रसायन यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर में जो भी घटित होता है वह सब ‘विद्युत रासायनिक जैव क्रियाओं’ के परिणामस्वरूप होता है। हमारे शरीर की समस्त ग्रंथियों से विभिन्न रस निरंतर निःस्रत होते हैं। न केवल ग्रंथियों वरन अरबों-खरबों सूक्ष्म कोशिकाओं में रस का विनिमय निरंतर होता रहता है। यह अद्भुत समानता है कि उपनिषदों में परमात्मा की व्याख्या इस तरह की गयी है- रसौ वै सः अर्थात् वह रस है। महात्मा तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा में हनुमान जी के लिए कहा है- राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा। यह सर्वज्ञात है कि हनुमान जी के पास राम रसायन था ही। इस राम के निर्गुण रस से महात्मा कबीरदासजी भी खूब परिचित थे। उन्होंने कहा- ‘पीबत राम रस लगी खुमार’। राम रसायन के जरिये समाधि की खुमारी में डूबे कबीरदासजी ने कहा है- ‘कबीर कहै मैं कथि गया, कथि गये ब्रह्म महेश राम नाम ततसार है, सब काहू उपदेश।‘ सारे संसार को एक उपदेश दिया है और मैं वही कहता हूँ कि रामनाम ही वास्तव में सारवस्तु है।


राम है परम शरण कबीरदासजी ने कहा है- ‘नहिं राम बिन ठाँव।’ आचार्य रजनीश ने कबीर के इस परम सत्य की सुंदर व्याख्या की है- राम यह वचन अनूठा है। इस वचन में सारे वेद, सारे उपनिषद, सारी गीताएँ समा जाती हैं। यह छोटा-सा वचन ‘आणविक शक्ति’ जैसा है। एक छोटे-से ‘अणु’ में इतनी विराट ऊर्जा है। वचन तो साफ है, राम के बिना और कोई ठिकाना नहीं, कोई शरण नहीं, राम के बिना और कोई उपाय नहीं यहाँ राम का अर्थ ‘परमात्मा’ है, ‘अल्लाह’ है, ‘गॉड’ है। यहाँ राम का अर्थ उस तत्व से है, जिसमें हम सब जी रहे हैं, जिसमें हम सब श्वास ले रहे हैं, जिसके होने में हमारा होना समन्वित है। राम की शरण जाने का अर्थ है, अपने को मिटाकर सर्व की शरण जाना। जिस दिन इसके आगे कोई मंजिल न रहे, उस दिन आपके जीवन में धन्यता उदय होगी। उसके पहले धन्यता का कोई उदय नहीं हो सकता है।


राम नाम की लूट है भारतीय लोक जीवन में राम नाम की प्रभुसत्ता का विस्तार सहज देखा जा सकता हैं बच्चों के नाम में राम का सर्वाधिक प्रयोग इस तथ्य का अकाट्य प्रमाण है। अभिवादन के आदान-प्रदान में ‘राम-राम’, ‘जे रामजी की’, ‘जे सियाराम, ‘जै राम’ का उपयोग वास्तव में राम नाम के प्रति गहन लोक निष्ठा और श्रद्धा के प्रकटीकरण का माध्यम शताब्दियों से बना हुआ है। अभिवादन या बच्चों के नामों में राम के प्रयोगों का प्रयोजन यही रहा है कि बारंबार राम शब्द उच्चरित करने का सुअवसर सहज उपलब्ध रहे। इस बार-बार के जप से वातावरण और शरीर के भीतर सकारात्मक परिवर्तनों का धीमा निरंतर सिलसिला चलता रहे। तुलसीदासजी सहित अनेकानेक संतों ने कलियुग में नाम-संकीर्तन की महिमा का गुणगान किया है परंतु नाम और नामी के पारस्परिक संबंधों का खूबसूरती से वर्णन किया है तुलसीदासजी ने। यथा -‘समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परस्पर प्रभु अनुगामी।’ अर्थात् समझने में नाम और नामी दोनों एक से हैं, किंतु दोनों में परस्पर स्वामी और सेवक के समान प्रीति है। जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नाम के पीछे नामी चलते हैं। नाम लेते ही प्रभु श्रीराम वहाँ आ जाते हैं। राम नाम के इस अद्भुत प्रभाव से परिचित कबीरदासजी ने मानव जाति को आह्वान स्वरूप कहा है- ‘लूटि सकै तो लूटियाँ राम नाम भंडार। काल कंठ तै गहेगा रूँधे दसों दुवार।’ अर्थात् राम नाम का अक्षय भंडार यथाशक्ति लूट लो। जब काल तुम्हारे कंठ को दबोचेगा तब शरीर के दसों द्वार अवरुद्ध हो जाएँगें उस समय तुम चेतनाशून्य हो जाओगे और राम नाम का स्मरण कैसे कर सकोगे।


रामलीला की व्यापकता: ’चरम देह द्विज के मैं पायी। सुर दुर्लभ पुराण श्रुति गायी। खेलऊँ तहूँ बालकन्ह मीला। करऊँ सकल रघुनायक लीला।’

रामलीला की व्यापकता

जीवनपर्यंत राम के आभा मंडल में बने रहने के लिए हमारे लोक जीवन में रामलीलाओं का युग-युगांतरों से समावेश किया गया है। लोकप्रियता और व्यापकता की दृष्टि से रामलीला का हमारे जनजीवन में विशिष्ट स्थान है। इस नाट्य रूप में एक समूचे समुदाय की धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं कलात्मक अभिव्यक्ति होती है। रामलीला में दर्शकों का जितना सहज एवं संपूर्ण सहयोग होता है उतना किसी और नाट्य में असंभव-सा है। रामचरितमानस में रामलीला की ऐतिहासिकता के स्पष्ट संकेत हैं। उत्तरकांड में काक भुशुंडजी कहते हैं-
’चरम देह द्विज के मैं पायी। सुर दुर्लभ पुराण श्रुति गायी।
खेलऊँ तहूँ बालकन्ह मीला। करऊँ सकल रघुनायक लीला।’

सांसारिक मायाजाल में और प्रपंच में लीन रहते हुए भी मरते समय राममय रहने के लिए नामस्मरण, रामकथा, राम के नाम का अभिवादन अपरिहार्य है। इनके बिना दाशरथि भाव संभव नहीं-
‘राम नाम कहि राम कहि राम राम कहि राम
तनु परिहरि रघुबर बिरह राउ गयऊ सुरधाम’ अर्थात-राम-राम कहकर, फिर राम-राम कहकर, फिर राम कहकर राजा दशरथ भगवान राम के विरह में शरीर त्यागकर सुरलोक को सिधार गये।

वस्तुतः मंत्र वैज्ञानिक घटना है, धार्मिक या महज काव्यगत तथ्य नहीं है। ---रामः शब्द का अर्थ है -------- रमंति इति रामः जो रोम-रोम में रहता है, जो समूचे ब्रह्मांड में रमण करता है वही राम हैं इसी तरह कहा गया है - रमते योगितो यास्मिन स रामः अर्थात् योगीजन जिसमें रमण करते हैं वही राम हैं। इसी तरह ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है - राम शब्दो विश्ववचनों, मश्वापीश्वर वाचकः अर्थात् ‘रा’ शब्द परिपूर्णता का बोधक है और ‘म’ परमेश्वर वाचक है। चाहे निर्गुण ब्रह्म हो या दाशरथि राम हो, विशिष्ट तथ्य यह है कि राम शब्द एक महामंत्र है। वैज्ञानिकों के अनुसार मंत्रों का चयन ध्वनि विज्ञान को आधार मानकर किया गया है। वाक्शक्ति के मनोशारीरिक प्रभावों को हम रोज देखते हैं।


श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद: अथर्ववेदीय इस उपनिषद में भगवान श्रीराम की पूजा-विधि को पांच खण्डों में अभिव्यक्त किया गया है। प्रथम खण्ड में 'राम' शब्द के विविध अर्थ प्रस्तुत किये गये हैं-

श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद

अथर्ववेदीय इस उपनिषद में भगवान श्रीराम की पूजा-विधि को पांच खण्डों में अभिव्यक्त किया गया है।
प्रथम खण्ड में 'राम' शब्द के विविध अर्थ प्रस्तुत किये गये हैं-

*जो इस पृथ्वी पर राजा के रूप में अवतरित होकर भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं, वे 'राम' हैं।
*जो इस पृथ्वी पर राक्षसों (दुष्प्रवृत्तियों को धारण करने वाले) का वध करते हैं, वे 'राम' हैं।
*सभी के मन को रमाने वाले, अर्थात आनन्दित करने वाले 'राम' है।
*राहु के समान चन्द्रमा को निस्तेज करने वाले, अर्थात समस्त लौकिक विभूतियों को निस्तेज करके उच्चतम पुरुषोत्तम रूप धारण करने वाले 'राम' हैं।
*जिनके नामोच्चार से हृदय में शान्ति, वैराग्य और दिव्य विभूतियों का पदार्पण होता है, वे 'राम' हैं।

द्वितीय खण्ड में 'राम' नाम के बीज-रूप की सर्वव्यापकता और सर्वात्मकता का विवेचन किया गया है। राम ही बीज-रूप में सर्वत्र और सभी जीवात्माओं में स्थित हैं। वे अपनी चैतन्य शक्ति से सभी प्राणियों में जीव-रूप में विद्यमान हैं और स्वयं प्रकाश हैं।
तृतीय खण्ड में सीता और राम की मन्त्र-यन्त्र की पूजा का कथन है। इस बीजमन्त्र (राम) में ही सीता-रूप-प्रकृति और राम-रूप-पुरुष विहार करते हैं। भगवान राम ने स्वयं अपनी माया से मानवी रूप धारण किया और राक्षसों का विनाश किया।
चतुर्थ खण्ड में छह अक्षर वाले राम मन्त्र 'रां रामाय नम:' का अर्थ, देवताओं द्वारा राम की स्तुति, राम के राजसिंहासन का वैभव, राम-यन्त्र की स्तुति से प्राणी का उद्धार आदि का विवेचन है। साधक के ध्यान-चिन्तन में यही भाव सदा रहना चाहिए कि श्रीराम अनन्त तेजस्वी सूर्य के समान अग्नि-रूप हैं।
पांचवें खण्ड में यन्त्रपीठ की पूजा-अर्चना तथा भगवान राम के ध्यानपूर्वक आवरण की पूजा का विधान बताया गया है। भगवान राम की प्रसन्नता से ही 'मोक्ष' की प्राप्ति होती है। वे 'राम' गदा, चक्र, शंख और कमल को अपने हाथों में धारण किये हैं, वे भव-बन्धन के नाशक हैं, जगत के आधार-स्वरूप है, अतिमहिमाशाली हैं और जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, उन श्रीरघुवीर के प्रति हम नमन करते हैं। इस प्रकार की स्तुति करने वाले साधक को मोक्ष प्राप्त होता है।

*यह भगवान श्रीराम के स्वरूप को विष्णु के समान दर्शाया गया है और उन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना गया है।
*अन्त में, श्रीराम अपने धनुर्धारी मनुष्य-रूप में ही अपने सभी भ्राताओं के साथ वैकुण्ठलोक को जाते हैं।

Monday, August 12, 2013

Nothing remains to say about religions, thoughts and societies if we exclude the complete Eternal Hinduism.


"Karm Pradhan Vishv Kari Rakha|Jo jas karayee so tas Phal Chakha|| and Hoihayee Soi jo Ram Rachi Rakha| Ko Kaa Tarak Badhavayi Shakha|" after combining these two we get "Karmanye Vaadhikarestu Maan Phaleshu Kadachanah"| Therefore "Hoihayee Soi jo Ram Rachi Rakha| Ko Kaa Tarak Badhavayi Shakha" is also true and this comes in picture if we do some thing for any purpose: "Karm Pradhan Vishv Kari Rakha|Jo jas karayee so tas Phal Chakha||"


Parambrahm (Superpower of the Universe i.e. Combined form of Lord Brahma, Lord Vishnu and Lord Mahesh) generally called as Brahm but not only Brahma.


Do your best for humanity you will get reward by God if not by society

Namaskar! Please remember that Lord Shri Krishna being the Parambrahm (Superpower of the Universe i.e. Combined form of Lord Brahma, Lord Vishnu and Lord Mahesh) said to Arjuna:Mahabaho:Kaunteya:Dhananjaya:Bharat "Aham Brahmasmi, Eko Aham Dwiteeyonasti, Ekodevo Sarvabhootanam, Beejam Maan Sarvabhootanam" but even though he needed Arjuna to face Gangaputra Bheeshmapitamah, Guru Dronacharya, Kripacharya, Daanveer Karn and so many great warriors of Kaurava's Army. I mean to conclude even all of us have equal fundamental rights and power but who is genius and Industrious is more important not for society but for purpose of God. Therefore do your best for humanity you will get reward by God if not by society. In Shri Ramcharit Manas Goswami Shri Tulasi Das said "Karm Pradhan Vishv Kari Rakha|Jo jas karayee so tas Phal Chakha||------- and Hoihayee Soi jo Ram Rachi Rakha| Ko Kaa Tarak Badhavayi Shakha||" some person focus on second part "Hoihayee Soi jo Ram Rachi Rakha|Ko Kaa Tarak Badhavayi Shakha|| but it not means "Karm Pradhan Vishv Kari Rakha|Jo jas karayee so tas Phal Chakha||" is wrong but after combining these two we get "Karmanye Vaadhikarestu Maan Phaleshu Kadachanah"| Means work is in your hand so do your best what will be result please leave it on GOD. Thus Guru Vedavyas's Shrimadbhagvat Geeta and Shri Tulasi Das's Shri Ramcharit Manas come on the same conclusion that work is in our hand if we have a negative potential from past life then result will not come with equal positive potential that much work we have done but if we have zero or positive potential from past life then the resultant potential or resultant will be either equal to work done or more than work done. I hope you will try to understand me clearly if not by words but by heart (Bhaava se) and keep you Industrious and intelligent by your best deed. Jai Hind, Jai Bharat, Jai Shriram, Jai Shri Krishna|

This is the Eternal Hinduism, generated by Saptarshi, and known as parents of all religions, thoughts and sections of world societies. There is nothing more than this to say on religion and societies.


सभी पर्दा तो उठावा दूं पर इससे सभी शूर्य निस्तेज न हो जायेंगे मुझे यह संदेह है जो पहले से ही ओज विहीन हो गए है केवल ओस से प्रभावित हो। अतः पर्दा न उठाओ परदे में रहने दो। यह लाज का आवरण हटा तो फिर क्या होगा यह मेरे जैसे लोगों को ही पता है या बहुत अनुभवियों को पता है। अतः कुछ तो सरम की जाय और टीका टिप्पणी कम से कम अब बंद हो जाय अपनी नाकामियों को छुपाने के। अंत में मई यही कहूंगा की हिन्दू और उसके सहयोगी, मुस्लिम और उसके सहयोगी तथा इसाइयत और उसके सहयोगी संसार की आवश्यकता है और परस्पर अनंयोआश्रित है एक दूसरे पर। अतः गर्व से कहो हम हिन्दू है, गर्व से कहो हम मुस्लिम हैं और गर्व से कहो हम इसाई हैं और एक दूसरे का सम्मान करना सीखें।


Now tell Ravan was demon or diverted person due to high power and fear of death by human which make him corrupted. He never used force against Sita's will.



This is a great politics, one side himself Lord Vishnu in Form of Shri Ram and other side Gate Keeper of Lord Vishnu: Jai in form of Ravana and both were devotee of Lord Shiva as evidence Lord Shiva's Ling established in Rameshvaram Tamilnadu by Shri Ram taken place on the directin of one and only one great priest of Lord Shiva i.e. Ravana.


Lord Brahma given boon to Ravan that only man or monkey can kill you. Ravana had no problem from man or monkey because of the blessing of Lord Shiva. He was worried if Lord Vishnu takes Avtar as human can kill him therefore he gone against Lord Vishnu and thus Lord Shri Ram done rest work as Avtar of Lord Vishnu.


Lord Shiva need not company of demon but demon may need it. Many demons and their family gained power from worship of Lord Shiva for example Ravan, Bhasmasur, etc. Brahma's boon was also with Ravana.



Kashyap's son Mayasur demon's daughter Mandodari i.e. Princess from Meerut (Uttar Pradesh) was wife of demon king Ravana.-------While Kashyapa(King Dashrath)'s son Shri Ram defeated demon king Ravana. Because of this it is said that "Ravan Ram ka Damad to ladai kyun hui", and Sheshnag:Lakshaman and Lakshami:Sita have origin from Ocean and also because of this it is said that "Sita Lakshman ki bahan to Bhaujayee kyun hui"| It is because our deed makes us friend and enemy of each other although we are from one GOD i.e. Parampita Parambrahm Parameshvar who called Brahm or Parambrahm (Brahma+Vishnu+Mahesh). Ravana's son, MEGHNAD or INDRAJIT's maternal uncle's residence was very close to present Meerut Uttar Pradesh.




From previous two post it is clear that Rishi Bharadwaj was associated with the Shri Ram and also father of Ravana i.e. Vishrava. This is the greatest connection of Rishi Bharadwaj between Shri Ram's and Ravana's familty. And this represent a perfect proof for the lesson "Vashudhaiv Kutumbakam". It is because our deed makes us friend and enemy of each other although we are from one GOD i.e. Parampita Parambrahm Parameshvar who called Brahm or Parambrahm (Brahma+Vishnu+Mahesh)


When Lord Rama was returning from Lanka after killing the demon king Ravana, he got down from his 'Pushpak Viman' and paid a visit to Bharadwaja's hermitage. Even after He had gone to Ayodhya, Bharadwaja's mind used to be occupied by His thoughts.--------------Once while sage Yagyavalkya was returning after spending a whole month of Magha (eleventh month of the Hindu calendar) and after performing the religious rites during the Makar-Sankranti, sage Bharadwaja invited him to his hermitage to listen to the divine stories of Lord Rama. Sage Yagyavalkya obliged by telling the whole story which was then made public by the sage Bharadwaja. ----------The entire humankind is indebted to the sage Bharadwaja for having the knowledge of Lord Rama's divine story. Bharadwaj Rishi send self architectured "PUSPAK VIMAN" to take Shri Ram return from Lanka after killing the demon king Ravana.


Sage Bharadwaja had two daughters, one of whom was married to Maharshi Yagyavalkya and the other was married to sage Vishrava father of RAVAN. --------------Sage Vishrava had 2 sons- Kubera and Lokapala. Sage Bharadwaja was a great devotee of Lord Rama. While Lord Rama was going into exile, He had stayed at his Ashram at Prayagaraja for a night. In the hermitage, being joyful at Lord Rama's presence, he explained his deep love for Him in the following words: " Despite all my best efforts, I did not attain bliss until your thought came to my mind." ---On his way to the forest in order to see and request Lord Rama to return to Ayodhya, Bharat too spent his time in Bharadwaja's hermitage. Sage Bharadwaja treated Bharat and his companions so well that they were amazed.


Sage Bharadwaja was the brother of Devguru Brihaspati (teacher of the deities), and the son of 'Utathya'. Sage Bharadwaja loved to listen to Lord Rama's stories. He was a great devotee of Lord Vishnu and had great faith in the Almighty. He was also a supreme hermit and always engaged in listening to the stories of Shri Vishnu. He had his hermitage situated at a little distance from Prayag where thousands of recluse and hermits received knowledge regarding Yoga, devotion, the truth etc.


Friday, August 9, 2013

इसे सही समझोगे तब भी समाज के लिए लाभकारी और उल्टा समझोगे तब भी समाज के लिए लाभकारी

भगवान् विष्णु के द्वारपाल जय और विजय (रावन और उसके भाई) राजा प्रतापभानु और अरिमर्दन के रूप में जन्म लेकर अपने  कुल को मिले ब्राह्मणों के श्राप के नाते दूसरे जन्म में ब्राह्मण होते हुए भी रावन और कुम्भकर्ण के रूप में राक्षसी प्रवित्ति को प्राप्त हुए और राक्षसी प्रवित्ति रखते हुए किशी श्रेठ मानव द्वारा अपने मृत्यु के भय से भगवान् विष्णु का विरोध करते करते अंततः स्वयं इतना विष्णु मय हो गए स्वयं विष्णु (श्रीराम) के माध्यम से विष्णु में ही सामिल हो गए  अंततः।--------------------सकारात्मक राजनीती की ही तरह ही विरोध की राजनीती भी समाज के हित के लिए सकारात्मक अंत को प्राप्त करती है। यही है हमारा अन्य धर्म से अन्तर्विरोध की राजनीती।-----------------------------------जिस दिन इस समाज में श्री राम नहीं उस दिन कोई मुसलमान नहीं और कुरआन नहीं और जिस दिन इस समाज में
श्री कृष्ण नहीं उस दिन कोई इसाई नहीं और बाइबिल नहीं । अतः आप सभी को रमजान की पावन शुभ कामना।-----------------------------------मै जिस दुनिया का अनुमान किया था १४ (14) वर्ष पहले वही दुनिया आज कल चल रही है चाहे दूसरे लोगों को कुछ आश्चर्य लग रहा हो जैसा की मुझे भी पूर्वानुमान करते समय लगा था। अतः मुझे अपने बड़े भाइयों पर पूर्ण विश्वाश है की वे भारत को अच्छी राह पर ले जा रहे हैं और मै उनका सुसभ्य रूप से पूर्णतः सहयोग करूंगा धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, अनुसंधानिक, संशकारिक और सामाजिक तथा दार्शनिक रूप से, वे चाहे जिस जाती, धर्म और राजनैतिक दल से हैं
लेकिन इसके लिए उनको मेरे ऊपर विश्वाश करना होगा की मै देश, समाज, रास्त्र, और अन्तार्रस्त्रिय हर स्टार पर लिखता हूँ अतः वे उसमे किशी का पक्ष लेने के किशी आरोप में न फसें क्यंकि जिस तरह से उनका काम समाज सेवा है मै अपने को समाज के लिए बहुत पहले अर्पित कर चुका हूँ। जय हिन्द, जय भारत, जय श्रीराम, जय श्री कृष्ण।-------जिस दिन इस समाज में श्री राम नहीं उस दिन कोई मुसलमान नहीं और कुरआन नहीं और जिस दिन इस समाज में श्री कृष्ण नहीं उस दिन कोई इसाई नहीं और बाइबिल नहीं ।
अतः आप सभी को रमजान की पावन शुभ कामना।-----------------इसे सही समझोगे तब भी समाज के लिए लाभकारी और उल्टा समझोगे तब भी समाज के लिए लाभकारी जिस तरह से राम का नाम। राम का नाम उलटा रटते रटते बाल्मीकी उस तरह राम को प्यारे हो गए की उन्हें भाई तुल्य माना है।

Thursday, August 8, 2013

जिस दिन इस समाज में श्री राम नहीं उस दिन कोई मुसलमान नहीं और कुरआन नहीं और जिस दिन इस समाज में श्री कृष्ण नहीं उस दिन कोई इसाई नहीं और बाइबिल नहीं । अतः आप सभी को रमजान की पावन शुभ कामना।


मै जिस दुनिया का अनुमान किया था १४ (14) वर्ष पहले वही दुनिया आज कल चल रही है चाहे दूसरे लोगों को कुछ आश्चर्य लग रहा हो जैसा की मुझे भी पूर्वानुमान करते समय लगा था। अतः मुझे अपने बड़े भाइयों पर पूर्ण विश्वाश है की वे भारत को अच्छी राह पर ले जा रहे हैं और मै उनका सुसभ्य रूप से पूर्णतः सहयोग करूंगा धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, अनुसंधानिक, संशकारिक और सामाजिक तथा दार्शनिक रूप से, वे चाहे जिस जाती, धर्म और राजनैतिक दल से हैं लेकिन इसके लिए उनको मेरे ऊपर विश्वाश करना होगा की मै देश, समाज, रास्त्र, और अन्तार्रस्त्रिय हर स्टार पर लिखता हूँ अतः वे उसमे किशी का पक्ष लेने के किशी आरोप में न फसें क्यंकि जिस तरह से उनका काम समाज सेवा है मै अपने को समाज के लिए बहुत पहले अर्पित कर चुका हूँ। जय हिन्द, जय भारत, जय श्रीराम, जय श्री कृष्ण।-------जिस दिन इस समाज में श्री राम नहीं उस दिन कोई मुसलमान नहीं और कुरआन नहीं और जिस दिन इस समाज में श्री कृष्ण नहीं उस दिन कोई इसाई नहीं और बाइबिल नहीं । अतः आप सभी को रमजान की पावन शुभ कामना।


Tuesday, August 6, 2013

मित्रों राम नाम सत्य जब कहा जाता है तो इसमे अन्दर से कृष्ण नाम सत्य अपने आप जुडा होता है क्यंकि मै पहले ही बता चुका हूँ की श्रीकृष्ण भी श्रीराम को आदर्श मानते हैं महाभारत में धर्मराज युधिस्ठिर के साथ कई प्रसंग ऐसे आये हैं जो इसके गवाह हैं। अतः राम और कृष्ण में सत्य को लेकर कोई भेद नहीं पर कृष्ण आम जनमानस के लिए पूर्ण रूप से समझ से परे हैं ज्ञान और अनुभव की कमी के नाते। अतः उनके बारे में कुछ भ्रान्तिया है और लोग केवल राम नाम सत्य कहकर काम चलाते हैं और मेरे जैसे लोग राम नाम सत्य में कृष्ण नाम सत्य ही देखते हैं। अतः हम कह सकते हैं की राम नाम सत्य में अन्दर से कृष्ण नाम सत्य है या कहें की आतंरिक कोर दोनों की एक है। तो मित्रों राम नाम सत्य में अन्दर से कृष्ण नाम सत्य है इसलिए राम के समान्तर चलने वाली इस्लामियत विचारधारा और कृष्ण के समानांतर चलाने वाली ईसाइयत विचारधारा दोनों ही अंत में सत्य हैं या इनका भी अंत सत्य है।


कृष्ण के बारे में कुछ भ्रान्तिया है और लोग केवल राम नाम सत्य कहकर काम चलाते हैं और मेरे जैसे लोग राम नाम सत्य में कृष्ण नाम सत्य ही देखते हैं। अतः हम कह सकते हैं की राम नाम सत्य में अन्दर से कृष्ण नाम सत्य है या कहें की आतंरिक कोर दोनों की एक है और वह हैं सत्य सनातन भगवान् विष्णु जो पूर्ण वैस्नव मतलब न मृग छाल का वस्त्र , न मांसाहार, न नशापान और न सिंह की छल का आसन और न किशी एक को भी अपने वरदान से दैत्य स्वरुप में आने दिए जो मानवता को कोई नुकसान पहुचाये जैसा की ब्रह्मा और महेश के बारे में अत्यधिक प्रकाश में आता है की इन दोनों के वरदान प्राप्त बहुत से राक्षस पैदा हुए जो मानवता को नुकसान किये। भगवान् श्री राम और श्री कृष्ण दोनों विष्णु अवतारी थे अतः उनके बारे में मांसाहार व् नशापानकी जो बात करता है वह पूर्णतः अज्ञानी है। पूर्ण वैस्नव और पूर्ण ब्राह्मण बनकर केवल उत्तर भारत या भारत में ही बन कर रहा जा सकता है अन्य स्थान पर उनको कठिनाई होती है और ऐसे स्थान पर शैव विचार वाले हिन्दू ही सफल होते हैं और इसे लिए मई भी कहता हूँ कीकम से कम उत्तर भारत में ब्ब्रह्मानों और वैस्नावों को ब्राह्मण और वैस्नव बनकर रहने देनें में सहयोग दें क्योंकि वैसे भी कोई पूर्ण ब्राह्मण और पूर्ण वैस्नव बनकर जीने का कस्ट नहीं सह पा रहा है। इसमें यह भी जोड़ना चाहता हूँ की जिसदिन एक पूर्ण ब्राह्मण या एक कोई वैस्नव नहीं रहेगा तो महा प्रलय स्वयं महाशैव स्वयं भोले-व-शंकर-महादेव-नटराज लायेंगे।


अगर चाणक्य निति और विदुर निति से भारत सरकार का काम न चलता हो तो श्रीकृष्ण की कूटनिति और श्रीराम की स्वच्छ निति आर या पार की नीति शीघ्र अपनानी चाहिए और अगर हम पहले किशी का बुरा नहीं चाहे हैं तो सब ठीक ही होगा। यह ठीक है की देश में युध्ध के बाद आर्थिक दिक्कतें आती हैं पर हम युध्ध से पीछे न हटें और हटें भी तो उस अन्तार्रस्त्रिय शक्ति के सामने आने पर जिनकी सह पर ये हमले होते रहते हैं और अन्तार्रस्त्रिय विरादरी में उसका चेहरा बेनकाब हो अन्यता पड़ोसी देश के पास स्वयं इतनी शक्ति नहीं की वह इस तरह की कायराना हरकत करे जिसने कई बार हमसे मुंह की खाई है आर या पार के युध्ध में| अतः सभी राजनैतिक दलों के साथ मिलकर भारत सरकार अन्तार्रस्त्रिय परिदृश्य को सामने रखते हुए पड़ोसी देशों के बारे में कोई ठोस निति अपनाए जल्द से जल्द।


मैंने बाबा विश्वनाथ भोले शंकर की नगरी में स्थित श्रध्धेय श्री मदनमोहन(श्रीकृष्ण) मालवीय के प्रांगन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अपने भौतिक विज्ञान के श्रध्धेय गुरु देव को लिखे पत्र में स्वीकार किया था की मै ही सतयुग का वह शूर्यवंशीय ग्वाला हूँ जो उत्तराखंड के वर्तमान केदारनाथ के राजा केदारनाथ जो शिव शंकर के आंशिक स्वरुप थे और जिनके नाम पर यह केदाराथ नाम पडा उनको अपने शिवांश होने की शक्ति के दुरुपयोग समाज में घृणित कार्य में (जालंधर के सामान शिव शक्ति का दुरुपयोग) करने कारन आजिज आकर तलवार से दो भाग में खंडित कर दिया था| तो मित्रों कोई अपने ऊपर सार्वजनिक रूप से अपने गुरु के सामने अकारण किशी युग का तात्क्षनिक ज्ञान प्राप्त होने की वजह से किशी की ह्त्या का दोसी स्वीकार नहीं करता वह भी जो शिवांश हो उसकी ह्त्या का पर| भगवान् भोले की नगरी में मै 2012 फरवरी इसे स्वीकार किया था जो भी परिस्थियां मेरे सामने आयी थी उसके तहत| ---------तो यह घटना झूंठी नहीं है और यह कडाई से सिद्ध करता है की पुनर्जन्म होता है| ----------और मई इसे यह भी जोड़ा की प्रयाग(अल्लाहाबाद) विश्वविद्यालय में केदारेश्वर(केदारनाथ) के नाम से एक विज्ञानं केंद्र को बनाने में अपना अभीस्थ सहयोग कर मई इस पाप से मुक्ति पा ली| -------और अंतिम वाक्य था की रामेश्वरम मतलब राम ही इस्वर हैं (क्योंकि श्रीकृष्ण भी उनके द्वारा स्थापित आदर्श का सम्मान करते थे जैसे की धर्मराज युधिस्ठिर के साथ वार्ता में ये प्रसंग आते है)| अतः जब मै इस समय सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण परिवार से हूँ तो ब्राह्मण हूँ इसमे कोई संदेह नहीं और कश्यप गोत्रीय हूँ इस लिए क्षत्रिय और वैश्य दोनों ही नहीं ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों हूँ इसमे क्या संदेह? क्योंकि यह कश्यप गोत्र सभी जातियों का संगम भी है| मेरे मित्रों जाती और धर्म का झगड़ा और आरोप और प्रत्यारोप किस बात का? आप अपने जाती और धर्म का जहां तक हो सके पालन करें और दूसरों को करने दें परन्तु कुतर्क न करें की जो जाती और धर्म नहीं मानते है वे आज सबसे आगे हैं| मई इसे सिरे से खंडित कर चुका हूँ| जय हिन्द(इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बूद्वीपे), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण|


खूब जातिवाद और सम्प्रदायवाद करा लो यह २४ (चौबीस) ऋषियों का अशोक चक्र खुद समय चक्र बन अपना काम करता रहेगा और आप के हाँथ अन्य नेताओं की तरह शून्य ही आयेगा|


भगवान् श्रीकृष्ण में परमब्रह्म (ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सम्मिलित शक्ति) का स्वरुप धारण कर महाभारत के रणक्षेत्र (जव असत्य का विरोध करने वाला ही कोई नहीं बचा था तथा अर्जुन जैसे महारथी भी ब्राह्मन धर्म स्वीकार कर युद्ध से विरत रहने की सोच लिये महाविनाश से बचने के लिए ) में समय की गति को तब तक के लिए रोक दी थी जब तक की पूरी श्रीमद्भागवत गीता का उपदेश दे अर्जुन को युद्ध के लिए राजी नहीं कर लिए | जिस ब्रह्म में सप्तर्षि बनाए जिनसे चौबीस ऋषि हुए और जिसमे से प्रत्येक एक घंटे के समय का स्वामी होता है और सबको सम्मिलित कर इस चौबीस घंटे के समय चक्र बनाया तो इस समय चक्र या धर्म चक्र को निरूपित करने वाले अशोक चक्र को रोकने या उसकी गति विपरीत दिशा में करने या नस्ट कर शून्यकाल में परिवर्तित करने का अधिकार भी उसको है यदि वह अपने मूल उद्देश्य से दिग्भ्रमित हो समता मूलक समाज की स्थापना को गलत ढंग से परिभाषित करता हो और इस तरह समरस ( समाज के प्रत्येक वर्ग के बीच आत्मिक लगाव और सदभाव हो और किशी में भी दंभ न हो) समाज की स्थापना करने में सक्षम न हो| समय चक्र या धर्म चक्र या अशोक चक्र प्रतीक ही है घृणा पर प्रेम की विजय का और यही है समरस समाज का असली अर्थ और इसी उद्देश्य से ही भारतवर्ष के रास्ट्रीय ध्वज में अशोक चक्र को स्थान दिया गया है और जब किशी सरकार के कृत्य से समाज में घृणा फैले तो आप उसको समरस समाज का चहेता कैसे कहेंगे|


जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी: जननी और जन्मभूमी स्वर्ग से भी अधिक श्रेस्यकर हैं | वन्दे मातरम (हे माँ तुझे सलाम=हे माँ हम तुझे सैलूट करते है)....................| माँ और माँ के वन्दे के लिए हम शीश भी कटवा सकते हैं| यह भारतवर्ष के लिए ही नहीं हर देश के नागरिक का प्रथम कर्त्तव्य है अपनी जन्मभूमि के लिए सर्वस्य अर्पण पर विश्व धर्म को कोई नुकशान न पहुंचे मेरे अपने इस देश प्रेम से|


सम्पूर्ण सत्य कोई धर्म अगर न अपना सके इस्लाम के अनुयायियों कि तरह पर सहिष्णु व्यक्ति होने के कर्तव्य के तहत तो "सत्यम-शिवम्-सुन्दरम" तो अपनाना ही पडेगा| अपने सत्कर्मों में "सत्यम-शिवम्-सुन्दरम" को अपना कर इस्वर को प्राप्त किया जा सकता है|


भगवान् श्री कृष्ण द्वारा अभुमंयु/उत्तरा पुत्र परीक्षित को ब्रह्मास्त्र के प्रयोग के बाद भी अपने को पूर्ण धर्मात्मा सिद्ध कर परमब्रह्म परमात्मा से जीवित करवा लेना एक ऐसे उदहारण हैं जो प्रमाणित करता है की कृष्ण ने सत्यम-शिवम्-सुन्दरम को अपनाते हुए "सत्यमेव जयते" का मार्ग अपनाया था जिसमे बाल्यकाल में कंश वध से लेकर पांडवों की रक्षा तक कही न कही व्यवहार में भी अपने में इस्वर की दिव्य ज्योंति को भी उजागर कर गए हैं आम मानव के बीच मानव जीवन में| राम के सर्वोच्च आचरण का कोई जबाब नहीं जो यम-नियम और सम्पूर्ण सत्य का पालन करते हुए दानवों से विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा से लेकर आज तक के इतिहाश और पौराणिक इतिहाश में भी सबसे शक्तिशाली और अधर्मी रावन के वध तक अलौकिक पूर्ण मानव जीवन प्रस्तुत किया जिसमे व्यवहार में दिव्य दर्शन कही नहीं हुए आम जन में किशी को कौशल्या के अलावा| मेरा वर्तमान ऋषि महर्षि (सामाजिक और वैज्ञानिक) से अनुरोध है कि आज जो शिद्ध नियम-युक्ति और आग्नेय अस्त्र (परमाणु बम और मिसाइल) बना रहे हैं उस तक पहुँच सामान्य लोगों या दानवी प्रवृत्ति वाले लोगों तक न हो| इसी प्रकार किशी भी ब्रह्मास्त्र या ब्रह्मास्त्र सामान युक्ति का प्रयोग केवल राम कृष्ण और परशुराम कि तरह धर्म (सत्य) का रक्षक ही कर सके न कि विवेकहीन व्यक्ति इसका उपयोग कर सके|


यह भी कहना चाहूंगा की हनुमान (पवन देव-शिव शक्ति फलस्वरूप) और कुंती (दुर्वाषा के आशीर्वाद se किशी ईस्ट देव को बुलाने/पास जाने की युक्ति) की तरह पराक्रम और युक्ति होते हुए भी विश्व जनमानस जिसमे विशेष रूप से भारत को सूर्य या मंगल की परिक्रमा करने या पास बुलाने/जाने की जरूरत नहीं है यह बहुत बड़ा दंभ या मूर्खता होगी| ग्रहों और तारों और नक्षत्रों का अध्ययन पृथ्वी पर ही किशी प्रयोगशाला में विशेष युक्ति को अपना कर ही किया जाय तो सबसे श्रेष्ठ है जैसे भारतीय ऋषि महर्षि करते थे|


आज आवश्यकता है राम और कृष्ण जैसे क्षत्रिय और यदुवंशी की तथा वशिष्ठ और संदीपनि जैसे गुरु की जिनकी अपने गुरु में इतनी भक्ति और समर्पण था की सब कुछ का श्रेय अपने गुरु को ही दे गए: "गुरु वशिस्थ कुल पूज्य हमारे, जाकी कृपा दनुज दल मारे|" और कृष्ण और बलराम ने संदीपनि गुरु की गुरु दक्षिणा स्वरुप अपने दैवीय शक्ति से गुरु जी के समुद्र में लापना हुए पुत्र (PUNARDATTA) ko पुनः जीवित कर गुरु को विद्यार्थी जीवन में ही दिव्यांश होने का साक्षात्कार दिया

हिन्दू Banane yaa punah banane के लिए स्वेक्छा से ५ बार गायत्री मन्त्र और एक बार ॐ सूर्य देवाय नमः तथा हिन्दू धर्म के अनुकूल आचरण जरूरी है और आप स्वेक्छा से सभी देव स्थल में भ्रमण करें और तीज-त्यावर में भाग लें| इस तरह मुझे आशा है की koi bhee समुदाय अपने को कश्यप गोत्र में सामिल कर विदेशियों द्वारा kishi समुदाय ko आम हिन्दू से अलग होने पर विराम lagayaa jaay|

 

भीम ने बिना कोई श्रेय लिए अपने बड़े भाई धर्म राज युधिस्ठिर के लिए काम किया| जहां तक दुर्योधन (सुयोधन) के बध की बात है वह कृष्ण के अन्तर्यामी ज्ञान की वजह से और जंघे पर प्रहार की वजह से हुआ था (जो अनैतिक था तथा बलराम भीम को मृत्युदंड देने जा रहे थे क्योंकि उनको विश्वाश था की मेरे दोनों शिष्यों में अर्जुन का सामना दुर्योधन भले न कर सके पर भीम उसे कभी हरा नहीं सकते)| भीम का प्रमुख काम था दुशासन और कीचक का बध और हमें आशा है की वर्तमान और भविष्य में जो भी भीम के चरित्र का निर्वहन करे वह समाज में दुशासन (अनैतिक शासन) और कीचक (चरित्रहीन और ब्लात्कारिओं) का नाश करे अन्यथा जय भीम कहने का वह सही हकदार नहीं|


Love is the only fluid which control the living and non-living creature of the whole universe.This the teaching of Shri Ram and Shri Krishn |.प्रेम ही वह एक मात्र तरल है जो पूरे ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करता है तथा प्रेम करने वाला कभी डरता नहीं यह राम और कृष्ण का ही उद्घोष है|| अतः निः स्वार्थ प्रेम करो माता से, पिता से, भाई से, कुटुंब से, अपने समाज से, जाती से, धर्म से, रास्ट्र से और विश्व जनमानस से| लेकिन एक प्रेम सबसे अलग है वह है पुत्र/पुत्री और अपनी पत्नी से जो स्वार्थ और जिम्मेदारी दोनों है|


गुरु अगर शिद्ध्हस्त है और अपनी विद्या का व्यवसायी नहीं है तो गुरु, गुरु के परिवार और गुरुकुल के लिए प्राण से भी प्यारी किशी सजीव और निर्जीव सम्बन्ध और वस्तु को अर्पित कर देना विश्व में सर्वोच्च धर्म है इससे बड़ा धर्म माता पिता और रास्ट्र के लिए अपने को अर्पित होना भी नहीं कहलाता है|


संसार के किशी भी व्यक्ति को संभव हो तो मांस भक्षण से दूर रहना चाहिए पर अन्य खाद्य पदार्थ ने होने कि विवशता हो तो "ॐ केशवाय नमः - ॐ नारायणाय नमः और ॐ माधवाय नमः" कह देना चाहिए आहार लेने के उपरान्त यह स्वीकार करते हुए कि हे नारायण, हे केशव और हे माधव मेरे इस कृत्य के लिए क्षमा कीजिये: यही हिन्दू धर्म की आचमन विधि ही है इसे विशेष रूप से हिन्दू रीती रिवाज में किये गए सादी समारोह में कन्यादान तक किशी भी व्यक्ति को परोक्ष रूप से विष्णु बनाने भी पढ़ा जाता है "मंगलम भगवान् विष्णु मंगलम गरुदाद्ध्वाजाह मंगलम पुन्दरीकाश मंगलम तानो हरी" के साथ | कारण यह है कि माधव का बनाया हुआ यह जीव निर्जीव संसार है और वही प्राकृतिक संतुलन के लिए उत्तर दाई है अतः उसका स्मरण करते हैं| गाय, गंगा (यमुना: सूर्यपुत्री + गंगा:ब्रह्मापुत्री का सम्मिलन और अलग-अलग भी), गोमती, तुलसी, नीम, केला, आंवला, और पीपल भारतीय संस्कृति की पहचान है जहाँ तक इनकी सुरक्षा करें और इनका सदुपयोग करें दुरुपयोग न हो|


मित्रों जहां सूर्यनारायण सात सोने के समान आभा (चमकने) वाले घोड़ों के रथ पर सवार होते है वही सत्यनारायण सात सूर्य के समान आभा (चमकने) वाले घोड़ों के रथ पर सवार होते हैं, यह घोड़े कोई और नहीं बल्कि सप्त-ऋषि ही हैं इनमे से प्रत्येक की आभा और यस किशी सूर्य से कम प्रकाश देने वाला नहीं है इन सातों घोड़ों वाले रथ की लगाम को पकड़ने का साहस केवल सत्यनारायण=इसनारायण=ब्रह्म्कां त =शिवकांत=विष्णुकांत=परमब्रह्म (ब्रह्मा, विष्णु और महेश के भी स्वामी या इनकी सम्मिलित शक्ति परमब्रह्म) ही कर सकते हैं


मित्रों जहां सूर्यनारायण सात सोने के समान आभा (चमकने) वाले घोड़ों के रथ पर सवार होते है वही सत्यनारायण सात सूर्य के समान आभा (चमकने) वाले घोड़ों के रथ पर सवार होते हैं, यह घोड़े कोई और नहीं बल्कि सप्त-ऋषि ही हैं इनमे से प्रत्येक की आभा और यस किशी सूर्य से कम प्रकाश देने वाला नहीं है इन सातों घोड़ों वाले रथ की लगाम को पकड़ने का साहस केवल सत्यनारायण=इसनारायण=ब्रह्म्कां त =शिवकांत=विष्णुकांत=परमब्रह्म (ब्रह्म-विशुन-महेश के साथ यदि कान्त हो तो = स्वामी: ब्रह्मा, विष्णु और महेश के भी स्वामी या इनकी सम्मिलित शक्ति परमब्रह्म)ही कर सकते हैं

Avidyayaa mrutyum teerthwaa vidyayaamrutamasnute ("अविद्यया मृत्युम तीर्थवा विद्यया अम्रुतमस्नुते "). यह ज्ञान की नगरी काशी प्रान्त and Banaras Hindu University का उद्घोस (MOTO) है|“Into blinding darkness enter those who worship ignorance and into greater darkness those who worship knowledge alone”|जब आप को अन्धकार में भी प्रकाश मिले वह ज्ञान है और जब ज्ञान कारन कुछ करने कि जब चेतना मिले वह जाग्रति बुद्धि है और जो चेतना इस्वर (सत्य) के दिव्य दर्शन कराये वह विवेक है "यह तीर्थराज (संगम:गंगा, जमुना और सरस्वती) प्रयाग का उद्घोस है |


ज्ञान, विज्ञान, विवेक और राजनीति का प्रथम कर्तव्य है की वह आम आदमी के जीवन में जीवन की इक्षा को बनाने रखे और उसके जीवन रुपी चिराग को झंझावातों से बचाकर आनंद भर दे जिस तरह भगवान् श्री कृष्ण ने देवकी और वाशुदेव तथा मथुरा वाशियों और राम ने ऋषि मुनियों के जीवन में आनंद भरा था| यह सब गुण जिसमे एक साथ हो और इसके अनुकूल आचरण करे तथा इस तरह दूसरों के आनंद से आनंदित हो वह है विवेकानन्द या सत्चिदानन्द|


अगर किशी को अशांत हो रही हो और मानशिक कस्ट हो तो पीपल, बरगद, गुलर, आंवला और अशोक जैसे पांच वृक्षों की छाया ले और श्रीमन नारायण का जाप करे देवर्षि नारद की तरह|| तुलसी इन सभी से कई गुना ज्यादा अमूल्य है जहा भी रहेगी प्रभु विना बुलाये चले आयेंगे जाप की क्या जरूरत|


अंबेडकर के अर्थ से इस आंबेडकर शब्द का राम तथा माँ अम्बे- अम्बे (दुर्गा), अम्बे(सरस्वती), अम्बे(गौरी-पार्वती) का निकट सम्बन्ध है फिर इनके अनुयाइयों का राम और माँ अम्बे से भक्तों से दुराव पैदा किया जाना कोई विदेशी सामाजिक,राजनैतिक और सांस्कृतिक चाल तो नहीं?


हनुमान से बड़ा कोई भी अम्बे माँ का कोई भक्त और सपूत नहीं हुआ चाहे वह दुर्गा, पार्वती, सरस्वती, सीता (लक्ष्मी), अंजना, भारत माँ, पृथ्वी माँ या अन्य संभावित माँ हों| अतः सत्कर्म कीजिये, जय हनुमान का जाप कीजिये जय श्री राम के जाप के साथ और हर तरह की आधुनिक भव बाधा (आरक्षण, जातिवाद, दलितवाद, अल्पसंख्यकवाद, सम्प्रदायवाद और आतंकवाद तथा उग्रवाद भी ) से मुक्ति पाइए|


मैं सब पर्दा हटवा दूं पर मुझे पूरा विस्वाश है की विश्व में जितने सूर्य है उनका आलोक मध्यम पड़ जाएगा और तो और लगभग सभी ऋषि महर्षियों की ज्ञानेन्द्रिया आम जनमानस के लिए ज्ञान का प्रकाश न उत्सर्जित कर स्वयं एक ज्ञान शून्य-ब्लैक होल (काला छिद्र) हो जायेंगी| स्त्री यदि स्वयं एक शक्ति और दुर्गा है तो वह किशी से शादी करने के बाद भी दुर्गा ही रहती है चाहे वह किशी धर्म और जाती से शादी करे| अगर यह चीज परदे में है तो उसे रहने देना चाहिए और उसका सम्मान करना चाहिए| मुझे आशा है की भारतीय उप महाद्वीप और अरब देश उसपर पश्चिमी सभ्यता नहीं थोपेंगे और न ही पश्चिमी खुलेपन को बढ़ावा देंगे तथा लाज और शर्म का पर्दा बने रहने देंगे क्योंकि राजर्षि ऋषि विश्वामित्र का ब्रह्मर्षि बनाने का प्रथम प्रयास बेकार गया था इससे तो ये भारतीय उप महाद्वीप (विषुवतीय और उसन कटिबंधीय देश) के लोग परिचित ही हैं|


सत्यमेव जयते: जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गादपि गरीयसी-वन्देमातरम पर विश्वाश कीजिये और कर्तव्य परायण हो जाइए आप पर आरक्षण, जातिवाद,दलितवाद, अल्पसंख्यकवाद और धर्मवाद का कोई असर नहीं होगा और आप को सब सिद्धियाँ हांसिल होंगी :


विश्व के सबसे बड़े अम्बवादेकर (अम्बेडकर) हनुमान (श्री राम, श्री कृष्ण, सीता और स्वयं की माँ अंजना को समर्पित) ही थे दूसरे स्थान पर भीम ( भाई धर्मराज युधिस्ठिर और माँ कुंती को समर्पित) का स्थान आता है| अतः हम अम्बवादेकर (अम्बेडकर) के अनुयायियों से यही उम्मीद करते हैं की वे हनुमान और भीम का आचरण प्रस्तुत करें न की क्रमशः कालनेमि, दुह्शासन या कीचक का| ...वर्तमान भारतीय इतिहाश के भीम और हनुमान यदि अम्बेडकर हुए तो श्री राम और श्री कृष्ण क्रमशः रास्ट्रपिता मोहनदास करम चंद गाँधी-महात्मा गाँधी और प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु हुए| ...........................अतः जो लोग अपने को हनुमान या भीम समझते हैं और वे देवी जो अपने को शक्ति की देवी दुर्गा समझती हैं तो वे अपने को राम रत्न "श्री अटल बिहारी वाज पाई" और कृष्ण रत्न " प्रोफेस्सर मुरली मनोहर जोशी तथा डॉ. मनमोहन सिंह" और शक्ति की मूर्ति "इंदिरा" के समान अपने को लाने का प्रयास करें यदि भारत को आर्यावर्त पुनः बनाना है| यहाँ यह भी बता दूं आर्य होना उत्तर या दक्षिण पर या काला या गोरे पर निर्भर नहीं करता वरन इसके लिए प्रगतिशील सच्चाई को अपनाने की जरूरत भर है आप इसमे कटु सत्य से भी दूर रह कर सम्पूर्ण सत्य तक जा सकते हैं|


अशोक चक्र या समय चक्र या धर्म चक्र जब दुर्वाशा तोड़ते हैं अनर्थ और अधर्म बढ़ जाने पर तो उसको जोड़ने की कला और निपुड़ता केवल और केवल कश्यप ऋषि को ही हाशिल है अन्य सभी ऋषि तो केवल बने बनाये नियम में ही काम कर पाते हैं या ब्रह्म, विष्णु और महेश की सरन में चले जाते है| |जब आप समाज के सबसे कमजोर से कमजोर व्यक्ति के जीवन के अधिकार और मानवीय अधिकार को सुरक्षित रखने का सच्चे हृदय से सकारात्मक प्रयास करेंगे तो समाज के सभी तबके का हित उसमे अपने आप निहित होगा और इसके लिए भारत के हर नेता को दीनदयाल और अम्बेडकर के साथ गाँधी और नेहरु बनाना पडेगा|इसमे किशी भी प्रकार की जातिवादी राजनीति की दुर्गन्ध नहीं आयेगी और न आप को कोई जातिवादी कहेगा|


स्वयं सर्व्श्रेस्थ ग्यानी और सभी चमत्कारों से युक्त श्री कृष्ण और धर्मराज युधिस्ठिर महाभारत में जगह-जगह पर मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम को आदर्श मानते हुए उनके जीवन में स्थापित हुए आदर्श को सप्रसंग उद्ध्वारित किये हैं और तो और सत्यबालि को भी राम-बालि प्रसंग से प्रेरित हो कृष्ण ने पटरानी बनाया सत्यभामा और सूर्य पुत्री यमुना की तरह सत्य एक मात्र सत्य पत्नी "रुकमनी" के साथ| अतः यह सत्य है की स्वयं श्री कृष्ण भी राम को लोक मर्यादा में राम को अपना आदर्श मानते थे पर कृष्ण राम न बन सके इसका कारण था राम सम्पूर्ण अलौकिक शक्ति (तीन अन्य भाइयों) के साथ जन्म लिए थे और उनको वशिस्थ जैसा कुल गुरु मिला जो उनके जीवन के अंतिम समय में भी कुलगुरु था वही कृष्ण अकेले जन्म लिए और कुलगुरु नहीं संदीपनी ऋषि के गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण की जहां से निकालने के बाद गुरु का आशीर्वाद ही साथ में था गुरु नहीं-मतलब गुरु से सुझाव लेने स्वय जाना पड़ता| कृष्ण को न तो दशरथ के समान प्रभावशाली और समर्थ पिता मिले और न "वृषभान" अपने को "जनक" जैसे के रूप में स्थापित कर सके| राम और कृष्ण में एक विशेष समानता थी की दोनों के सामरिक गुण के परीक्षक अजर-अमर परशुराम ही थे जिन्होंने बचपन के साहशिक कार्यों को देखते हुए (क्रमशः राम का विश्वामित्र यज्ञरक्षा-शिव धनुष भंजन और कृष्ण का कंश वध) दोनों से प्रभावित हो क्रमशः राम को अपना धनुष और कृष्ण को सुदर्शन चक्र दिया | दोनों पर त्रिमूर्ति की शक्ति के बराबर शक्ति वाले अजर-अमर ऋषि दुर्वाशा की विशेष कृपा थी और दोनों की मानव लीला को ही उन्होंने समाप्त करने का कारण अपने को ही बनाया क्योंकि समय चक्र या धर्म चक्र की रक्षा करने का वरदान किशी दुर्वाषा को ही होता है| दोनों के परम भक्त हनुमान थे और जो हनुमान परोक्ष रूप से अपने गुरु "सूर्य" की पुत्री "सुवर्चला" के पति और "मकरध्वज" के पिता होने का गौरव भी हाशिल किये जबकि प्रत्यक्ष रूप से हनुमान अजर-अमर-अविनाशी और ब्रह्मचारी ही होने का वरदान पाए थे| दोनों की आस्था का मिलन (चन्द्रवंश और शूर्यवंश) बिंदु तीर्थराज प्रयाग है जहां सूर्यपुत्री यमुना (श्री कृष्ण कि पटरानी) का मिलन Brama पुत्री गंगा से होता है फिर दोनों ही Brahma पुत्री गंगा ही बन जाती है और जहा तक के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने का श्रेय राम के पूर्वज भागीरथ को जाता है| तो मै कहना चाहता हूँ कि आदर्श और श्रेष्ठ सूर्य हो सकता है पर इस श्रिस्ति का सुचारुरूप से सञ्चालन के आधे का हक़ चन्द्र को जाता है जो उसका भाई है|


अगर अम्बेडकर (हनुमान) के अनुयायी सुशासन नहीं स्थापित कर पा रहे हैं तो यह लक्ष्य गांधी (राम) और नेहरु (कृष्ण) के अनुयायियों को दे देना चाहिए और सुशासन की स्थापना में सहयोग करना चाहिए| जिस तरह मुस्लिम मत रामनुयाई शाखा के सामानांतर और इसाईयत क्रिश्नानुयायों के सामानांतर चलकर हिन्दू धर्म को परिस्कृत करने का काम करते हैं उसी तरह बौध्ध धर्म विशेष रूप से ब्राह्मणों के सामानांतर चल ब्राह्मणों का परिस्कार करता है और यह हिन्दू धर्म का ही अंग है| वर्तमान दिल्ली ही इन्द्रप्रस्थ (इन्द्र +प्रस्थ)=पांडवों की राजधानी है और उत्तर प्रदेश और उसका शासकीय चिन्ह (पेड़ की शाखा , धनुष और मछली-मछली की आँख) भी परोक्ष इंद्रपुत्र (अर्जुन) और अर्जुन की पुत्र वधु उत्तरा (अभुमंयु की पत्नी) के पुत्र परीक्षित (कुमार उत्तर) से संदर्भित है| यह सब पुरुषार्थ को समर्पित है तथा भारतीय तिरंगा भी त्रिमूर्ति को ही निरुपित कराता है पर ध्यान रहे सफेद रंग के साथ नीले रंग (चौथा रंग-गौण रंग) का अशोक चक्र=समाया चक्र=समता चक्र=धर्म चक्र भी भी है जो हनुमान की आवस्यकता बताता है| मैं इससे ज्यादा स्पस्ट कुछ भी नहीं कर सकता की क्या है भारतीय समाज में त्रिमूर्ती की परिकल्पना अतः मैं तो इन ब्राह्मन, क्षत्रिय और वैश्य से ही सभी जातियों और धर्मों को निर्मित मानता हूँ अतः आप सहमत न हों तो इसी बचे सनातन हिन्दू धर्म से जितना चाहे उतना ब्राह्मणों का ध्रुव विरोधी धर्म-सम्प्रदाय या समूह बना लीजिये और ब्राह्मणों का दमन कर लीजिये सम्पूर्ण विश्व शक्ति की एक तिहाई शक्ति ब्राह्मणों के पास हमेशा रहती है और रहेगी सदा ही इसे प्रदर्शित करने की जरूरत जल्दी नहीं पड़ती है और यह एक तिहाई शक्ति जब तक श्रीस्ति रहेगी तब तक ब्राह्मणों के ही पास रहेगी यह शक्ति प्रत्यक्ष, परोक्ष, संख्या बल से परे और अविनाशी है अन्यथा पूरा ब्रह्माण्ड परमब्रह्म में विलीन हो जाएगा|


भगवान् विष्णु (ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयं कपूर के सामान गौर वर्ण के है) के दश प्रमुख अवतार (मानवीय अवतार में पृथ्वी:आम जनमानस में आने पर रंग में परिवर्तन होता है) में से आठ प्रमुख अवतार जिसे हम मानवीय अवतार कह सकते है वे इस प्रकार हैं: वामन, परशुराम , राम , बलराम , कृष्ण , बुध्ध , नरसिंह , कुर्म (कच्छप नो कश्यप) और इन सभी में केवल कुर्म (कच्छप) अवतार को ही अतिकाला स्वीकार किया जा सकता है और बाकी सात में वे घन श्याम (cloud color) :बादल की तरह नील वर्ण वाले जिसका मतलब होता है आम भारतीय जिसे गोरा या सांवला कह सकता है अतः विश्व में १ और ७ (एक और सात) का अनुपात हो पूर्ण काले लोगों और (सांवले तथा गोरे) में तभी सामाजिक व्यवस्था चल पायेगी अन्यथा सब सामान रंग के लोगों (रंग: सामान रंग की नारी का सामान रंग के पुरुस का) से ही सम्बन्ध और रिश्ता बनाए और अपनी की गयी गलतियों का प्रतिशोध मेरे जैसे किशी व्यक्ति पर न उतारें क्योंकि यह परम विनाश बुलाने का दुस्शाहस है।---विशेस: राम और घन स्याम (कृष्ण) में केवल इतना अंतर होना चाहिए जितना की शिव-शंकर पुत्री "गंगा" और सूर्यपुत्री "यमुना" के जल में है, कहने का मतलब गंगा (राम) और यमुना (घन स्याम) जब भी त्रिवेणी पर सरसवती से मिलें तो पुनः गंगा ही कहला सकें। यही त्याग है कृष्ण का जो श्रेष्ठ होते हुए भी राम को ही श्रेष्ठ मानते है क्योंकि राम का अवलोकन जगत में श्रेष्ठ था और यही है "सत्यम-शिवम्-सुन्दरम" का "सत्यमेव जयते" को भी मात देने का मूलमंत्र। यही है सत्य्बाली, सत्यभामा और जामवंती और सूर्यपुत्री जमुना को अपनी पटरानी के रूप में सत्य्पत्नी रुकमनी और अनन्य प्रेयशी राधा के साथ अपनाने का रहस्य जिससे कृष्ण ने राम को और अधिक महिमा मंडित किया- मेरे विचार से सत्य साधक जानते होंगे की राम के युग में इन पात्रों का क्या सहयोग था राम को जगत आदर्शातम व्यक्ति शिध्ध करने में। -----------------------------------------------। जय श्री कृष्ण -----------------------जय श्रीराम। * श्री हरिशंकर की गति हरि ही जाने या स्वयं परमपिता ब्रह्मदेव।


पृथ्वी पर कही स्वर्ग है तो वह कश्मीर ही है और इस कश्मीर के मुरीद केवल हिन्दू धर्म संसथापक ऋषि मुनि ही नहीं मुहम्मद साहब और इसामशीह जैसे ऋषि मुनी भी थे|.............ॐ नमः शिवाय|ॐ नमः शिवाय|ॐ नमः शिवाय|.


महामंगलेश्वर हनुमान जैसा ब्रह्मचर्य नहीं वरन सर्वश्रेष्ठ सती अनुसूइया के पुत्र मझुई और तवश नदी के संगम पर रमण करने वाले ऋषि दुर्वाषा है जो हनुमान की ही तरह अजर और अमर हैं और जिनका अभिशाप और आशीर्वाद दोनों ही कल्याणकारी है जिसका उदहारण कुन्तीपुत्र कर्ण और दुष्यंत पुत्र भारत है जिनको इसी बहाने कान्व ऋषि की परिवरिश मिली|राम और कृष्ण के जीवन की भी अवधि इस पृथ्वी पर वे ही निर्धारित करते हैं और ऐसा कोई ऋषि करने में सक्षम नहीं है| प्रत्यक्ष ब्रह्मा+विष्णु+महेश का सामना कोई भी व्यक्ति उनके आशीर्वाद से कर सकता है और विश्व की सब शक्तियां उनके सामने शून्य है|


विद्याधनं सर्व धनम प्रधानम यह धन जिसके पास विनय के साथ हो वह धनराज पूरे विश्व पर राज करता है और इसके बाद ही विवेक और तत्पश्चात सत्यप्रेम की उत्पत्ति होती है| विशेष: सत्यप्रेम का आशय जो लोग जानते है उन्हें पता है की त्याग क्या है जो तपश्या और बलिदान दोनों से श्रेष्ठ है और जिसके पास सत्यप्रेम है उसकी सम्पूर्ण संसार में जय जयकार होती है| जय हिंद|


विज्ञान से भी परे राम और कृष्ण का अस्तित्व संभव है पर राम और कृष्ण से परे विश्व के किशी भी भी संत का कोई अस्तित्व नहीं है| ये ईसामसीह और अन्य सम्बंधित संत जिस तरह से परम प्रेम सागर-कृष्ण से परे नहीं उसी तरह मुहम्मद साहब और अन्य सम्बंधित संत का परम शिव सागर-राम से अलग कोई अस्तित्व नहीं।---------जय सियाराधे, जय माँ गौरी, जय माँ लक्ष्मी, जय माँ सरस्वती।


ब्राह्मण का महत्त्व सामान सामाजिक स्तर पर रहने वालों के लिए इसी से समझ लेना चाहिए सम्पूर्ण विश्व को कि "ब्रह्मा = विष्णु = महेश" पर ये तीनो जब मिलते हैं तो परमब्रह्म ही बनता है न कि परम विष्णु या परम महेश| यहाँ जानने वालों से यह नहीं छिपा है कि अनादी हिन्दू धर्म का प्रथम विभाजन भी ब्रह्मा के कर्म और गुण से प्रेरित हो ब्राह्मन, विष्णु के कर्म और गुण से प्रेरित हो वैश्य और महेश (शिव) के कर्म और गुणसे प्रेरित हो क्षत्रिय के रूप में हुआ तो आप ब्राह्मन शक्ति को किस प्रकार पराजित कर रहे थे?---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ब्राह्मण से जो भी मिला वह ब्राह्मन हो गया अपने प्रारंभिक स्वरुप में वह कभी भी बिना प्रभावित हुए नहीं लौटा| मै सब शक्तियों को समुचित सम्मान देकर कहता हूँ कि विश्व में ब्राह्मन सदा सर्वोच्च रहा है और रहेगा और इसका कारन है कि त्याग ही ब्राह्मन का परम धर्म है यदि यह त्याग समाज में सामाजिक समरसता और शांति कि स्थापना करता है| मै स्वयं इस बात का प्रमाण हूँ और श्रीमद्भागवत उपदेशित करते हुए कृष्ण (परमब्रह्म कृष्ण) कि हर बात पर खरा उतारूंगा| मै अपने जीवन में मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम को विश्व के इतिहाश का सबसे बड़ा आदर्श मानता हूँ और अपने से उच्च हर किशी भी व्यक्ति का सादर सम्मान करता हूँ चाहे वह किशी भी जाती और धर्म से क्यों न हो|-------------------------------------------------------------------------------------------मै हर क्षत्रिय, वैश्य का उतना ही सामान करता हूँ जितना कि किशी ब्राह्मन का पर अपने से उच्च ब्राह्मणों (गर्ग, गौतम, शांडिल्य) को गायत्री, गाय, गंगा, गोमती, के सामान पूज्य और पवित्र मानता हूँ| अगर क्षत्रिय-बलिदान और वैश्य-तपस्या आज के समाज कि आवश्यकता हैं तो ब्राह्मन-त्याग परम आवश्यकता हैं अतः विश्व समाज को ब्राह्मणों के आलावा अन्य लोगों को भी ब्राह्मन बनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए न कि हतोत्शाहित|---------------------------------------फिर दोहरा रहा हूँ क्यों कोई ब्राह्मन जल्दी नहीं बनाना चाहता: एक तो जीना कठिन है, फिर सम्मान के साथ जीना कठिन है, फिर सदजन(सज्जन) बनकर जीना कठिन है, और सबसे ज्यादा कठिन ब्राह्मन बनकर जीना है| Also Remember this: First Two River-Water then Five River-Water|=पहले दोआब=दोजल उसके बाद पंजाब=पन्चजल। विश्व का आधा भाग सूर्यवंशियों का और शेष आधा चंद्रवंशियों का। पूर्ण काले और गोरे+सांवले का अनुपात १:७(एक समनुपते सात) का हो नहीं तो गोरे का गोरे+सांवले (गोरी +सांवली स्त्रियों) से वैवाहिक सम्बन्ध और काले का कालों (काली स्त्रियों ) से। अगर सम्बन्ध रखना है तो अनुपात समाज में १:७(एक:सात) को समाज चलाने वाले बनाने का पूर्ण प्रयत्न करें नहीं तो सुन्दरता की परिकल्पना अधूरी हो जायेगी अगर गोरे भी प्रतिशोध मिटाने की कोशिस करेंगे। किशको सुन्दरता अच्छी नहीं लगती मेरे साथ एक महीने छोड़ दीजिये अन्यथा यह श्रीमद्भागवत गीता के चंद श्लोक देख लीजिये जिसमे परमब्रह्म कृष्ण के अर्जुन को दिए गए उपदेश का महर्षि व्यास द्वारा संकलित रूप समाहित है। ये सप्तर्षि उत्तर भारत के ही थे मेरे दक्षिण भारतीयों हम आप को ऊर्जा देते है आप मेरे हो यह दोनों सूर्य्वंस किष्किन्धा-बंगलोरे-बाली-सुग्रीव और अयोध्या-रघुकुल गवाह है अतः आप हमसे दुश्मनी न लीजियेगा फिर भविष्य में। विशेष: काली माइ जब गुस्सा होती हैं तो कपूर के सामान गोरे गौरा पारवती के पति शिव ही शांत करते हैं और जब शंकर जी क्रोधित होते हैं तो ब्रह्मण का ब्रह्मचर्य बच्चा उनके पैरों में बलि स्वरुप समर्पी कर दिया जाय तो वे शांत हो जाते हैं क्योंकि वे ब्रह्म ह्त्या नहीं करते हैं। जब पूरी दुनिया समाप्त हो रही थी तो वह बलि किया जाने वाला बच्चा कौन था? उत्तर सायद आप लोग शीघ्र जान गए होंगे लेकिन आप को संकेत दे रहा हूँ वह कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ही थी और यह काशी और अवध प्रान्त का ही था इसी लिए कोई त्रिपाठी कुछ कर न सका: मतलब त्रिफला का मतलब त्रिपाठी से भी बड़ा है| ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ| ।


पाँचों भूतों: पृथ्वी (स्थान=स्पेस=आधार), जल, आकाश (आकृति), अग्नी, वायु के स्वामी केदारेश्वर( शिव शंकर) ही हैं पर उनको मिलाने वाले हैं विष्णु तथा उसमे प्राण का संचार करने वाले हैं ब्रह्मा। अतः हम शिव का कोई आकार न मानकर एक लिंग के रूप में पूजते है।-----उसी प्रकार रूप-रंग, ध्वनि-शब्द-वाणी, स्पर्श, रस और गंध जैसी पांच वस्तुए जो किशी स्त्री या पुरुष में निहित है उससे मानवीय शरीर ही नहीं पूरा मानव समाज प्रभावित होता है और जो समाज या पुरुष/स्त्री इन सबसे प्रभावित होते हुए भी ( प्रभावित तो हर कोई होता इससे कोई इंकार नहीं कर सकता क्योंकि यह अकाट्य सत्य और परम विज्ञानं है इसे मै ही नहीं श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय के सुरु में ही दिया गया है-जिसे उस समय के लिए परमब्रह्म बने श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेशित किया है ) संतुलन नहीं खोता वह व्यक्ति और समाज श्रेष्ठ कहलाता है। ---------अतः मै यह कहना चाहूंगा की यह पांच वस्तुए नए रूप में विज्ञान की नयी नयी खोज के साथ आकर मानव तथा मानव समाज को प्रभावित करती है और विशेष रूप से कम्पुटर युग ने भारतीय समाज को भी प्रभावित किया इसमे कोई संदेह नहीं पर इसके दुस्परिनाम से भारतीय समाज बहुत ही अल्प समय तक प्रभावित रहा मतलब केवल १०-१४ (दस-चौदह) साल तक। हम भारतीय समाज की इसी विशेषता को बनाये रखने के लिए विश्व के इन तीन प्रमुख अधरों "ब्रह्मा, विष्णु, और महेश=शिव शंकर" की वंदना करे और विश्व शांति में योगदान करें: Vishesh: मेरा विरोध करने वाले धनपशु और बाहुबली व्यक्ति, देश और समाज २००१ में दंड पा चुके हैं और सायद अब अपने पिता-माता और गुरु के भी बाप बनने की हिम्मत करोड़ों वर्ष तक नहीं करेंगे वे लोग। -------------PRAYER TO LORD VISHNU: Shanta Karam Bhujaga Shayanam, Padmanabham Suresham. Vishvadharam Gagana Sadrusham, Megha Varnam Shubhangam. Lakshmi Kantam Kamala Nayanam, Yogibhir Dhyana Gamyam. Vande Vishnum Bhava Bhaya Haram, Sarva Lokaia Kanatham.-------PRAYER TO LORD SHIVA--------Girisham Ganesham Gale Neelvarnam, Gavendradhiroodem Gunateetroopam, Bhavm Bhasavaram Bhasmana Bhushitangam Bhavani klatram Bhaje Panchvaktram-----PRAYER तो LORD BRAHMA: ॐ, ॐ, ॐ, ॐ, ॐ,ॐ,ॐ। ॐ नमः ब्रह्मदेवाय।-----.--

पाँचों भूतों: पृथ्वी (स्थान=स्पेस=आधार), जल, आकाश (आकृति), अग्नी, वायु के स्वामी केदारेश्वर( शिव शंकर) ही हैं पर उनको मिलाने वाले हैं विष्णु तथा उसमे प्राण का संचार करने वाले हैं ब्रह्मा। अतः हम शिव का कोई आकार न मानकर एक लिंग के रूप में पूजते है।-----उसी प्रकार रूप-रंग, ध्वनि-शब्द-वाणी, स्पर्श, रस और गंध जैसी पांच वस्तुए जो किशी स्त्री या पुरुष में निहित है उससे मानवीय शरीर ही नहीं पूरा मानव समाज प्रभावित होता है और जो समाज या पुरुष/स्त्री इन सबसे प्रभावित होते हुए भी ( प्रभावित तो हर कोई होता इससे कोई इंकार नहीं कर सकता क्योंकि यह अकाट्य सत्य और परम विज्ञानं है इसे मै ही नहीं श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय के सुरु में ही दिया गया है-जिसे उस समय के लिए परमब्रह्म बने श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेशित किया है ) संतुलन नहीं खोता वह व्यक्ति और समाज श्रेष्ठ कहलाता है। ---------अतः मै यह कहना चाहूंगा की यह पांच वस्तुए नए रूप में विज्ञान की नयी नयी खोज के साथ आकर मानव तथा मानव समाज को प्रभावित करती है और विशेष रूप से कम्पुटर युग ने भारतीय समाज को भी प्रभावित किया इसमे कोई संदेह नहीं पर इसके दुस्परिनाम से भारतीय समाज बहुत ही अल्प समय तक प्रभावित रहा मतलब केवल १०-१४ (दस-चौदह) साल तक। हम भारतीय समाज की इसी विशेषता को बनाये रखने के लिए विश्व के इन तीन प्रमुख अधरों "ब्रह्मा, विष्णु, और महेश=शिव शंकर" की वंदना करे और विश्व शांति में योगदान करें: Vishesh: मेरा विरोध करने वाले धनपशु और बाहुबली व्यक्ति, देश और समाज २००१ में दंड पा चुके हैं और सायद अब अपने पिता-माता और गुरु के भी बाप बनने की हिम्मत करोड़ों वर्ष तक नहीं करेंगे वे लोग। -------------PRAYER TO LORD VISHNU: Shanta Karam Bhujaga Shayanam, Padmanabham Suresham. Vishvadharam Gagana Sadrusham, Megha Varnam Shubhangam. Lakshmi Kantam Kamala Nayanam, Yogibhir Dhyana Gamyam. Vande Vishnum Bhava Bhaya Haram, Sarva Lokaia Kanatham.-------PRAYER TO LORD SHIVA--------Girisham Ganesham Gale Neelvarnam, Gavendradhiroodem Gunateetroopam, Bhavm Bhasavaram Bhasmana Bhushitangam Bhavani klatram Bhaje Panchvaktram-----PRAYER तो LORD BRAHMA: ॐ, ॐ, ॐ, ॐ, ॐ,ॐ,ॐ। ॐ नमः ब्रह्मदेवाय।-----.--

ब्राह्मन, मुल्ला, और पादरी के न रहते हुए यदि समाज चल जाता तो इन मंदिर, मस्जिद और गिरिजाघरों में आप क्यों जाते हैं? क्या दीवार को पूजने? और हिन्दू धर्म के बगैर यदि ये दोनों (मुस्लिम और इसाई) विश्व समाज को चला लेते हिन्दू समाज की क्या जरूरत रहती और भी केवल एक जाती (एक तरह के कर्म से ही) से ही संसार चलाया जा सकता था तो ब्रह्मा-सरस्वती, विष्णु-लक्ष्मी और महेश-पार्वती क्यों बनी? इसका उत्तर सायद यही है की शिक्षण-ज्ञान, भरण-पोसन, और रक्षण और भक्षण (अत्याचार जब सम्भाले न संभाले) की जरूरत होती ---------------------------------------------------------------अतः शिव और शिवा (पार्वती=दुरा=गौरी=काली) को बताने वाला चाहिए की अनाचार हो रहा है कार्तिकेय (क्षत्रिय -क्षत्रिय) पर और अब गणेश (ब्रह्म क्षत्रिय) का विकाश हनुमान (क्षत्रिय ब्रह्म) स्वयं बर्दास्त नहीं कर पा रहे हैं और न संभाल पा रहे हैं। यह केवल और केवल एक व्यक्ति कर सकता है वह है परमब्रह्म जिसमे वैश्य + क्षत्रिय और ब्रह्मण सभी गुण हो और जो किशी एक कर्म से ऊपर भी हो। अतः वे सभी लोग जो निश्चित रूप से ब्रह्मण हों वही चाहे किशी भी जाती के हों वही निर्धारित करेंगे की प्रलय और सृजन में से किशे चुना जाय अतः पूरा विश्व समाज अपने से ब्राह्मणों को कभी भी दूर नहीं कर सकता।----------------------------------------------मै प्रथमतः सूर्य वंशीय हूँ इसमे कोई संदेह नहीं पर ग्वाला और क्षत्रिय हूँ इसमे क्या संदेह क्योंकि एक सूर्यवंशीय ब्रह्मण में ये सभी विशेषताए अपने आप निहित हैं: मै खेतिहर ब्रह्मण परिवार से अतः ग्वाला होने में क्या संदेह, भारतीय सेना के एन.सी.सी विंग (जौनपुर:वाराणसी--मिर्जापुर-आजमगढ़ मंडल) से प्रथम स्थान पाना क्षत्रिय होने से क्या कम है और ब्रह्मण मेरा कर्म और ११-११-२०७५ से १८-०४-२००८ तक ब्रह्मचर्य और एक पत्नी व्रता तो ब्रह्मण का कौन सा कर्तव्य निर्वहन नहीं किया। आप लोग मेरे जीवन भर मतलब अनुमानित कम से कम आयु, २०५७ तक और इबके बाद भी अगर रहगा तो मुझे ब्रह्मण ही पायेंगे मेरा वादा है और जो यह ब्लॉग पढ़ रहे हैं मेरे कार्यों और विचारों को आगे बढ़ाएंगे मुझे पूरा विश्वाश है।*******जय हिंद (इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी)। वन्देमातरम।


याद रखिये सप्तर्षियों पहले से ही ब्रह्मर्षि थे फिर विष्णु के अनुरोध पर २४ (चौबीस) ऋषि परम्परा हुई जिसमे महर्षि, राजर्षि और ब्रह्मर्षि के रूप में पुनः विभाजन हुआ अतः प्रारंभ में हम एक थे और हम सबका वह स्वरुप ब्राह्मन ही था तो ब्राह्मन का अस्तित्व कैसे मिट जाएगा| हो सकता है कि सभ्यता के विकाश के साथ-२ आप सात्विक आहार और विहार में न ही सही पर ब्रह्मनत्व आप स्वयं हाशिल कर लिए हों और आप कि तुलना में दूसरे आप से पीछे रह गए हों, पर पारिवारिक संस्कार किशी ब्राह्मन के इतनी जल्दी नहीं परिवर्तित होते अतएव समान सामजिक और आर्थिक स्तर पर आने पर ब्राह्मन के घर के बच्चे का संस्कार किशी क्षत्रिय और वैश्य के घर के बच्चे से बहुधा अलग ही रहता है कुछ (५%-७%) अपवाद को छोड़कर| अपवाद ही समाज के मार्ग दर्शक मान लिए जाय यह कौन सा लोकतंत्र है? घर और समाज का संस्कार और आचार विचार उसी तरह माने रखता है जैसा कि किशी देश के नागरिक के अपने लगभग एक समान क्रिया-कलाप (और संस्कृत) इस विश्व एक गाँव में| हाँ मैं यह बात स्वीकार करता हूँ कि इस सबके बावजूद हम एक दूसरे पर परस्पर निर्भर है और हमारी सहजीविता और सहभागिता और समर्पण भावना है कोई ऐसा समाज, रास्ट्र और विश्व को बनाने में जो सुसंस्कृत व्यक्तित्व, सुसंस्कृत नागरिक और सुसंस्कृत विश्व नागरिक को जन्म दे|-


प्रयाग ब्राह्मणों की शक्ति को याद दिलाता है : हिन्दू मान्यता के अनुसार सृष्टी के रचयिता ब्रह्मदेव ने सृष्टी के प्रारंभ में सप्तर्षियों के लिए प्रक्रिस्ता यज्ञ यही से किया अतः इसे "प्रयाग: सबसे प्राचीन यग्य का स्थान" कहा जाने लगा| यह विश्व इतिहास के सबसे बड़े दार्शनिक,ऋषि भारद्वाज के साथ-साथ सबसे बड़े तपोबली, ऋषि दुर्वाषा का भी स्थान" कहा गया है|-------------------------------------------------------------------------गंगा के दोआब से निकल कर पंजाब (पांच आब=पानी=नदी) होते हुए सप्तर्षि सप्त सैन्धव (सात सिन्धु= सात नदी) पहुंचे अतः दोआब (प्रयाग=गंगा और यमुना का मिलन और उसके प्रभाव का क्षेत्र काशी=काशी नगरी) कि सभ्यता विश्व कि सबसे पुरानी सभ्यता है| और आप इसी श्रिस्ति के एक पूर्ण विकशित मानव होकर भी दोआब और ब्रह्मा कि प्रथम संतान-ब्राह्मन के अस्तित्व का उपहास कर रहे थे हम जैसे बहुत से ब्राह्मणों के रहते हुए भी| आप कह दें कि कोई ब्राह्मन नहीं रह गया और हम आप से डर कर दासता वस् स्वीकार कर लें कि वैश्य और क्षत्रिय हैं और ब्राह्मन वास्तव में नहीं रहे तो ऐसी हमें स्वीकार नहीं है आप चाहे जितना विरोध मेरा कर लेते| अगर आप को कोई ब्रह्मण नहीं दिखाई देता था तो हमें कोई क्षत्रिय और वैसी नहीं दिखाई देता था जो की ब्राह्मणों को पहचान सके। आज भी एक तिहाई शक्ति ब्रह्मण ही है पूरे विश्व में यदि कर्म और जन्म दोनों को एक में मिलादें तो । हम जो जानते थे, देखते थे और समझते भी थे वही सिद्ध करना चाहते थे कि ब्राह्मन ही दुनिया के बाप हैं| और यही स्वामी विवेकानंद के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस भी कहा करते थे कि विश्व कि सर्वोच्च शक्ति ब्राह्मन ही हैं और उसका यह अधिकार नहीं कि वह सबका स्वामी बने इठलाये बल्की उसके कर्तव्य को उंचा बनाए रखने का मौलिक आधिकार देता है जिससे की सामाजिक समरसता कायम रखी जा सके|--


क्षत्रिय किस लिए और कब तक गैर क्षत्रिय बनकर जीवित रहेगा जब एक भी मूल क्षत्रिय (शिव शंकर) नहीं रहेगा इस श्रीस्ति में उसी प्रकार वैश्य किस लिए और कब तक गैर वैश्य बनकर जीवित रहेगा जब कोई एक भी मूल वैश्य (विष्णु) नहीं बचेगा इस श्रीस्ति में और उसी प्रकार ब्राह्मन किस तरह और कब तक गैर ब्राह्मन बनकर जीवित रहेगा जब कोई एक भी मूल ब्राह्मन (ब्रह्मा) नहीं रह जाएगा इस श्रीस्ति में मतलब केवल परमब्रह्म बने रहने से कुछ न हो सकेगा वे केवल आप संभाल सकते हैं इन तीनों को पर क्रिया शीलता तो तीनों मूल स्वरूपों में ही आयेगी| अतः (परमब्रह्म:ब्राह्मन+ क्षत्रिय +वैश्य)=तीनो एक साथ या पतित (तीनो में से कोई नहीं) बन कर कब तक इस संसार को कैसे चलाएंगे जब देवियाँ (सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती) अपने मूल स्वरुप में ९ (नौ) महीना भी नहीं रह पाएंगी स्थिर होकर आप के कृत्य से बच्चे को पालने तक का समय तो दूर| प्राकृतिक शक्ति स्वरूपनी दुर्गा (सरस्वती:सात्विक, लक्ष्मी:रजो और पार्वती (गौरी +काली:तमो)) का सम्मिलित स्वरुप हैं अतः ऐसा न हो कि स्त्री स्वयं दुर्गा बनकर रह जाय कहने का मतलब उसे स्वयं (सात्विक: ज्ञान और विवेक, रजो:धन और वैभव और तमो: मानशिक:दृण विश्वाश और शारीरिक बल) के सम्मिलित स्वरुप में उतरने के लिए विवास न किया जाय और उसे तीनो मूल स्वरुप ( सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती) में रहना हमारे लिए और साथ-२ श्रीस्ति के सञ्चालन के लिए भी ज्यादा शुभकारी है|------------------------------उपर्युक्त का आशय यह है कि संसार इस लिए चल रहा है कि अभी भी भी ब्रह्मा, क्षत्रिय और वैश्य इस संसार में हैं और जिनको बनाये रखने के लिए धर्म और जाती से ऊपर उठकर कम से कम ५% से १०% (पांच से दस प्रतिसत) लोग ऐसे है प्रयासरत रहते है लेकिन उनकी भी अपनी भी कोई मूल जाती, धर्म और निजी परिवार होता है जो उनको संबल प्रदान करता है सेवा रत रहने के लिए| अगर सत्यमेव जयते को आप मानते हैं तो यह भी सत्य ही है कि सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती का अपना स्वयं का एक मूल स्वरुप होता है जिसे अधितम समय तक बनाए रखा जाय अधिकतम तुलनात्मक रूप से कि उसे सम्मिलित स्वरुप में दुर्गा के रूप में ही देखा जाय| आप को दुनिया के गूढ़ रहस्य में ले जाने से ज्यादा अच्छा है इतना बता दिया जाना कि दुनिया का हर आतंकवाद (सामाजिक कैंसर) इस तीनो देवियों (सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती) या कहें तो तीनो देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) में असंतोष पैदा होने से ही होता है (किस प्रकार से विश्व में इन देवियों का नियंत्रण देवताओं द्वारा हो रहा है और अमुक के लिए क्या विशेष करने कि जरूरत है)| अगर आप लोक तांत्रिक तरीका भी अपनाते हैं तो यह देखिये कि शिक्षण, रक्षण और पोसन कर्ताओं में एक तिहाई का बंटवारा ठीक ढंग से हुआ कि नहीं: यही त्रिवेणी: गंगा+जमुना+सरस्वती (गंगा-ब्रह्मपुत्री-भागीरथी+ यमुना:कृष्ण पटरानी-कनुप्रिया + सरस्वती-ब्रह्मदेवी):प्रयाग का मूलमंत्र है|----------------------------------- वन्देमातरम।

क्षत्रिय किस लिए और कब तक गैर क्षत्रिय बनकर जीवित रहेगा जब एक भी मूल क्षत्रिय (शिव शंकर) नहीं रहेगा इस श्रीस्ति में उसी प्रकार वैश्य किस लिए और कब तक गैर वैश्य बनकर जीवित रहेगा जब कोई एक भी मूल वैश्य (विष्णु) नहीं बचेगा इस श्रीस्ति में और उसी प्रकार ब्राह्मन किस तरह और कब तक गैर ब्राह्मन बनकर जीवित रहेगा जब कोई एक भी मूल ब्राह्मन (ब्रह्मा) नहीं रह जाएगा इस श्रीस्ति में मतलब केवल परमब्रह्म बने रहने से कुछ न हो सकेगा वे केवल आप संभाल सकते हैं इन तीनों को पर क्रिया शीलता तो तीनों मूल स्वरूपों में ही आयेगी| अतः (परमब्रह्म:ब्राह्मन+ क्षत्रिय +वैश्य)=तीनो एक साथ या पतित (तीनो में से कोई नहीं) बन कर कब तक इस संसार को कैसे चलाएंगे जब देवियाँ (सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती) अपने मूल स्वरुप में ९ (नौ) महीना भी नहीं रह पाएंगी स्थिर होकर आप के कृत्य से बच्चे को पालने तक का समय तो दूर| प्राकृतिक शक्ति स्वरूपनी दुर्गा (सरस्वती:सात्विक, लक्ष्मी:रजो और पार्वती (गौरी +काली:तमो)) का सम्मिलित स्वरुप हैं अतः ऐसा न हो कि स्त्री स्वयं दुर्गा बनकर रह जाय कहने का मतलब उसे स्वयं (सात्विक: ज्ञान और विवेक, रजो:धन और वैभव और तमो: मानशिक:दृण विश्वाश और शारीरिक बल) के सम्मिलित स्वरुप में उतरने के लिए विवास न किया जाय और उसे तीनो मूल स्वरुप ( सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती) में रहना हमारे लिए और साथ-२ श्रीस्ति के सञ्चालन के लिए भी ज्यादा शुभकारी है|------------------------------उपर्युक्त का आशय यह है कि संसार इस लिए चल रहा है कि अभी भी भी ब्रह्मा, क्षत्रिय और वैश्य इस संसार में हैं और जिनको बनाये रखने के लिए धर्म और जाती से ऊपर उठकर कम से कम ५% से १०% (पांच से दस प्रतिसत) लोग ऐसे है प्रयासरत रहते है लेकिन उनकी भी अपनी भी कोई मूल जाती, धर्म और निजी परिवार होता है जो उनको संबल प्रदान करता है सेवा रत रहने के लिए| अगर सत्यमेव जयते को आप मानते हैं तो यह भी सत्य ही है कि सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती का अपना स्वयं का एक मूल स्वरुप होता है जिसे अधितम समय तक बनाए रखा जाय अधिकतम तुलनात्मक रूप से कि उसे सम्मिलित स्वरुप में दुर्गा के रूप में ही देखा जाय| आप को दुनिया के गूढ़ रहस्य में ले जाने से ज्यादा अच्छा है इतना बता दिया जाना कि दुनिया का हर आतंकवाद (सामाजिक कैंसर) इस तीनो देवियों (सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती) या कहें तो तीनो देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) में असंतोष पैदा होने से ही होता है (किस प्रकार से विश्व में इन देवियों का नियंत्रण देवताओं द्वारा हो रहा है और अमुक के लिए क्या विशेष करने कि जरूरत है)| अगर आप लोक तांत्रिक तरीका भी अपनाते हैं तो यह देखिये कि शिक्षण, रक्षण और पोसन कर्ताओं में एक तिहाई का बंटवारा ठीक ढंग से हुआ कि नहीं: यही त्रिवेणी: गंगा+जमुना+सरस्वती (गंगा-ब्रह्मपुत्री-भागीरथी+ यमुना:कृष्ण पटरानी-कनुप्रिया + सरस्वती-ब्रह्मदेवी):प्रयाग का मूलमंत्र है|----------------------------------- वन्देमातरम।

प्रयाग (अल्लाहबाद) और इसके समीपवर्ती क्षेत्र ही विश्व कि सबसे प्राचीन सांस्कृतिक केंद्र हैं इसको सत्यापित करने से भारत समेत विश्व के अन्य किशी स्थान का महत्त्व कम नहीं होता वरन यह पूरे विश्व मानवता (धर्म और राजनीति समेत अन्य-अन्य) को जोड़ने का एक सफल प्रयास है इस सम्पूर्ण सभ्य समाज के सूचना तकनीकि युग में प्रवेश कर जाने पर जबकि विश्व एक गाँव बन जाने के अति सन्निकट हैं हम या कहें कि अधिकतर स्थान के लिए विश्व एक गाँव हो चुका है|----------भारतवर्ष के उत्तर के सम्यक राज्य सूर्यवंश कि अनुभूति करते ही नहीं खुलकर व्यक्त भी करते हो पर मुझ सूर्यवंशी:कश्यप गोत्रीय ब्राह्मन ने गंगासागर (कपिल सागर मंदिर:पश्चिमबंगाल), रामेश्वरम (तमिलनाडु), किष्किन्धा-बंगलुरु:कर्णाटक और महारास्त्र में सूर्यवंश कि ज्योंति को पुनः प्रगाढ़ कर पूरे विश्व को राम और कृष्ण का सन्देश इन स्थानों से एक साथ प्रसारित करने और राम-कृष्ण जैसे रत्न कि प्राप्ति कि अभिलाषा जगाने का काम किया| इस बात के साथ कि सूर्य कि सीधी आभा से लोग बचकर चन्द्रमा कि शीतल छाया हर कोई पाना चाहता है पर उस चाँद को चमकीला किस सूर्य ने किया इसे नहीं भूलना चाहिए और उस परम ऊर्जा श्रोत का नाम है सूर्यवंश जिसकी स्थापना कश्यप ऋषि ने ही किया था जिसकी छाया में चन्द्रवंश भी पलता है|


जहां कृष्ण ने शिध्ध किया की की निजी प्रेम से ऊपर समाज कल्याण और माँ-बाप का कल्याण है: उनकी कारागार से मुक्ति दिलानी है वही शिव ने शिध्ध किया सच्चे प्रेम के लिए रास लीला जरूरी नहीं वरन अटूट आस्था अनिवार्य है। अतः कृष्ण के जीवन से कहाँ यह द्रिस्तिगोचार होता है की निजी प्रेम के लिए समाज कल्याण और माँ-बाप के कल्याण की भावना को तिलांजलि दे दी जाय हाँ यह जरूर था की वे दिव्य शक्ति होने के नाते कुछ ऐसा काम अवस्य किये थे जो था तो सम्पूर्ण सत्य के करीब पर आम सामाजिक भावना में सत्य से हट कर था अतः सामाजिक कल्याण और अपने भक्तों के कल्याण के लिए दो सच्चे दिलों को मिलाया था और परन्तु उसमे सामाजिक और पारिवारिक दोनों हित निहित थे। *******जय हिंद, जय भारत, जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण|


किशी कश्यप गोत्रीय (सूर्यवंशीय) ब्राह्मन को सत्य कहने से कौन रोक सका है: आप तो दलित अस्त्र से, मुस्लिम अस्त्र से और इसाई तथा बौध्ध अस्त्र से डरते थे पर दुनिया के गुरु कश्यप गोत्रीय ब्राह्मणों से डर नहीं लगा जो सभी को नियंत्रित करता है| आप संख्या बल से कश्यप गोत्रीय ब्राह्मन को झुकाना चाहते थे पर समुद्र में औंधे मुह गिर गया आप का अपना ही अस्त्र| क्या विडम्बना है भारतीय राजनीती कि कि यहाँ उद्धार कम लेकिन अस्त्र ज्यादा बन रहे हैं ब्राह्मन समाज के खिलाफ लड़ने के पर सब्दों में परिवर्तन अति निकट है जब लोग ब्राह्मणों को अपना आरम्भ मानेंगे जो सत्य है और उचित है प्रतीत होता है|----------अंत में याद रखिये एक तिहाई से कम शक्ति ब्राह्मणों कि कभी नहीं होगी और विश्व के एक तिहाई सत्ता के स्वामी होंगे वे उनकी संख्या चाहे एक भी हो यह उसी तरह जैसे एक क्षत्रिय और वैश्य क्रमशः एक तिहाई और एक तिहाई के स्वामी हैं और बिना किशी एक ब्राह्मन के, बिना किशी एक क्षत्रिय के और विना किशी एक वैश्य के यह सांसारिक जगत ही नहीं चलेगा|---------मिश्रित से स्वरुप से ज्यादा महत्वपूर्ण है यह अलग अलग स्वरुप। ------------


देवताओं के गुरु (ब्रहस्पति देव) के गुरु भाई शुक्राचार्य (जिनके शिष्य दैत्य थे) के पास भी ज्ञान और विज्ञान कम नहीं परन्तु दैत्य हर युध्ध में पराजित हुए अतः ज्ञान और विज्ञान का समाज में किस प्रकार प्रयोग हो रहा है यह निर्धारित कर ज्ञान और विज्ञान का सदुपयों सुनिश्चित किया जाय तो यह ज्ञान और विज्ञान के विकाश को और अधिक महत्व प्रदान करेगा तुलनात्मक रूप से कि ज्ञान और विज्ञान के विकाश की होड़ में हम मानवता ही खो दें| ऐसा करने से व्यक्ति विशेष के जीवन और सम्पूर्ण समाज के जीवन में और अधिक आनंद का संचार होगा|---------अतः मैं आप सब से अनुरोध है कि दैत्यों का अनुकरण कर अपने ज्ञान और विज्ञान के दुरुपयोग के बल पर तिरंगा को तीन भाग [सफेद:ब्राह्मन:ब्रह्मा का गुण:जीवन दाता एवं ज्ञान दाता (ब्रह्म ज्ञान और ब्रह्मास्त्र दुनिया में सर्व श्रेष्ठ कहे गए हैं), केशरिया:क्षत्रिय:महेश=शिवशंकर का गुण: रक्षा, सुरक्षा और विनाश-संहार और हरा:वैश्य=विष्णु का गुण: पालन पोषण एवं विकाश) में अलग कर इसके चौथे और केन्द्रीय भाग (नीले रंग का अशोक चक्र: सबकी ऊर्जा का असीमित श्रोत: सप्तर्षियों से जनित २४ ऋषियों कि निशानी: चौबीस घंटे का समय चक्र: समता मूलक चक्र) जो सबको जोड़ने और शक्ति देने का काम करता है को अलग मत कर दीजिये नहीं तो महा विनाश होगा| अगर तीनो में से किशी एक का ह्रास होता है तो शेष दो इस चक्र के मध्यम से ही उसकी भर पायी करते रहते हैं और इस तरह एक तिहाई हिस्से का संतुलन बना रहता है| --------------------------------ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य एक धर्म हैं और इस धर्म में जलवायु आधारित धर्म, मुस्लिम, इसाई और यहूदी सहित सभी धर्म आ जाते हैं यदि शिक्षा, समन्वय, समता और सहृदयता को ब्रह्मण की पहचान; रक्षा-सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर विनाश को एक क्षत्रिय की पहचान; तथा समृध्धि और सतत प्रयास को वैश्य की पहचान माना जाए विशुध्द रूप सेभारतीय जलवायु में परिभाषित ब्रह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की परिभाषा और बात-व्यवहार के साथ।---------विशेष: कोई समाज या समाजवाद सम्पूर्ण सत्य को जान सकता तो मानव के रूप में इस्वर की आवश्यकता ही क्या थी। जिस देश के संविधान में वर्णित सामाजिक न्याय को भ्रस्त तरीके से संख्याबल के आधार पर परिभाषित किया जा रहा हो उस देश से भ्रस्ताचार कैसे ख़त्म हो सकता है: कारन है की जो व्यक्ति प्रशाशनिक अधिकारीयों से और नेताओं से भी योग्य है और उसे सम्मान जनक स्थान न मिलता हो तो "जहां सच न सही वहां झूंठ सही" से काम चलाएगा इस तथा कथित सामाजिक न्याय से होने वाले अन्याय के प्रतिकार में हांलाकि यह मेरा नहीं व्यवहारिक सामाजिक प्रतिकारकी भावना वालों का विचार है।*******अगर समाजवाद और सामाजिक न्याय का मतलब ब्राह्मणों को नीचा दिखाना है तो वह कभी भी फलीभूत नहीं होगा इस बात को मई सत्य करके अपनी जिन्दगी में दिखाया हूँ जबकि मुझे किशी जाती से कोई गिला नहीं पर मई उनसे दया की भींख भी नहीं मांगता कारण संख्याबल मत देखो कोई एक भी ब्रह्मण रहा सृस्ती में तो बह भी विश्व की एक तिहाई शक्ति का अकेले स्वामी होगा ब्रह्मा की तरह और जिस तरह तिरंगा मतलब ब्रह्मा + विष्णु + महेश का अस्तित्व बिना स्त्री के संभव है उसी तरह उसका भी अस्तित्व स्त्री के अभाव में भी संभव होगा अतः किशी स्त्री को सिखंडी, पूतना, सूर्पनखा की तरह प्रयोग भी किया जाय तो उसके पुरुषार्थ में कोई अंतर नहीं आयेगा। मै किशी भी बाप का संतान हूँ पर ब्रह्मण हूँ और मुझे उसी तरह ब्राह्मण और हिन्दू होने पर गर्व है जैसे किशी को क्षत्रिय और वैश्य होने पर गर्व है या ब्रह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनो एक साथ होने पर गर्व है पर उसे किस बात का गर्व जो इनमे से किशी एक सामाजिक स्टार को पाने के लिए संघर्ष कर रहा हो। हाँ उसे नस्ल सुधार का लालच अवश्य सताता है और इसके लिए किशी भी स्टार तक गिर सकता है और उसी स्तर पर तथा कथित राधा के स्वामी भी हैं। ---------------------"एक तो मानव बनकर जीना कठिन है उससे भी कठिन है सम्मान सहित जीना उससे भी कठिन है एक सज्जन व्यक्ति बनकर जीना और सबसे कठिन है ब्राह्मण बनकर जीना अतः जो ब्राह्मण बनकर न जी सका ब्रह्मण कुल में जन्म होते होते हुए भी तो निश्चित रूप से यह उस व्यक्ति की किशी दुर्बलता का परिचायक है उसे हम महान नहीं कह सकते और न तो वह व्यक्ति समाज लिए अनुकरणीय होगा। श्रेष्ठ वह व्यक्ति है जो इस सामाजिक उथल पुथल के बावजूद ब्राह्मण बनकर एक सम्मान जनक स्थिति में जीन की जिद्दोजहद बनैय हुए है और इसके लिए कोई बड़ा से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार है। ब्राह्मण कुल में जन्मे व्यक्ति के अलावा भी जो व्यक्ति ब्रह्मण जैसे चरित्र का निर्वहन कर रहे हैं वह भी तपस्या (वैश्य), बलिदान (क्षत्रिय) की श्रेणी से ऊपर उठाकर त्याग की श्रेणी में आ चुके हैं और उनके इस त्याग की परिक्षा उनके जीवन में अवस्य होगी है और उन्हें भी एक दिन मानवता की रक्षा या स्थापना हेतु ब्रह्मास्त्र बनाना पडेगा जो विश्व का सर्वोत्तम अस्त्र है" ।---


Sunday, August 4, 2013

Brahmarshi then Rajarshi and then Maharshi indicates how category from Brahmin, Kshatriy and Vaisya comes from Saptarshi's son in which Manu and Shradha became first parent of human and they were Avatar of Kashyapa and Aditi and thus other Rishi's son came in common human life, this is brief history of Human life on the earth according Hindu mythology.


Kashyapa was brother-in-law of Shiva as Parvati (means Sati) was sister of Aditi. Thus Aditi's relation with Parvati(Sati) makes her husband Kashyapa, the Brother in-law of Shiva.


First Rajarshi was Vishvamitra=Vishvarth(Kaushik) descending from Brahmarshi due to his character of Kshatriya even he was Brahmarshi. In later history he again became Brahmarshi which is well known.


At the initial stage all the seven Saptarshi were Brahmarshi including Vishvamitra=Vishvarth(Kaushik) and no one was Rajarshi only and Maharshi only. For knowledge the highest order is Brahmarshi then Rajarshi and then Maharshi comes.


We are son of Saptarshi who were generated by Parambrahm(Brama+Vishnu+Mahesh). We accept view of development of human only by this process which taken place at Prayag(Prak+Yagya) i.e. Allahabad.


Secular does not means either Anti Christian or Anti Muslim or Anti Hinhu. Therefore protection of Hindu is not against constitution in India. Secularism does not say ruined any ones Sanskar, culture and civilisation but only give protection to all religion.


The god of Establishment, Shri Vishvakarma ji, who worshiped by technicians and Engineers was also son of Kashyap Rishi and his wife Aditi in addition with all god like Indra Chandra and Others. This matters in best estabishment capacity of Kashyapas than others.


Kashyap Rishi and Aaditi sons are called Aaditya which means the Sun it generated Solar Dynasty or Shooryavansh same as their son Chandra generated Moon Dynasty or Chandravans thus both are brother along with all gods excluding Great Gods:Tridev:Trimurti who are Ajanma or Madhav: no person given them birth. And I add that not only in India but in World there is no single place which is not under control either by Sooryavansh or by Chandravansh. This is glory of Shri Raam:Shooryavansh and Shri Krishna:Chandravansh.


A friends or countries whose act and behavior demolish our family's and country's family values, national values, civilization and culture, in which way better than a enemy. I can say even this friend gives us post of Kuber it is better to quite him.


Saturday, August 3, 2013

मूर्ख मित्र से चतुर दुश्मन ज्यादा हितकारी होता है इसमे कोई संदेह नहीं|


सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, धर्म और कुछ सन्दर्भों में जाती जब हम जीवन सुरु कर रहे होते है तब से हमें जीवन जीना सिखाते हैं और हमारे मानशिक विकाश के साथ-२ साथ प्रकृति और सामाजिक वातावरण में मनोवैज्ञानिक संतुलन स्थापित करने में सहयोग करते हैं ध्यान और मूर्ती पूजा दोनों सामिल हो सकते हैं| और इस प्रकार हमें एक दिशा और दशा मिलाती है समाज के लिए कुछ अच्छा करने की इसी लिए सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, धर्म और कुछ सन्दर्भों में जाती को मानना सामाजिक जीवन में जरूरी हो जाता है| जहां तक हो सके इसका पालन करना चाहिए और स्वयं मै ब्राह्मण धर्म का और इस प्रकार सनातन हिन्दू धर्म का पालन करता हूँ क्योंकि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म हिन्दू धर्म के ही अङ्ग है और एक दूसरे के पारी पूरक है और इसी से भारत की प्रत्येक जाती का जन्म हुआ है|

सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, धर्म और कुछ सन्दर्भों में जाती जब हम जीवन सुरु कर रहे होते है तब से हमें जीवन जीना सिखाते हैं और हमारे मानशिक विकाश के साथ-२ साथ प्रकृति और सामाजिक वातावरण में मनोवैज्ञानिक संतुलन स्थापित करने में सहयोग करते हैं ध्यान और मूर्ती पूजा दोनों सामिल हो सकते हैं| और इस प्रकार हमें एक दिशा और दशा मिलाती है समाज के लिए कुछ अच्छा करने की इसी लिए सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, धर्म और कुछ सन्दर्भों में जाती को मानना सामाजिक जीवन में जरूरी हो जाता है| जहां तक हो सके इसका पालन करना चाहिए और स्वयं मै ब्राह्मण धर्म का और इस प्रकार सनातन हिन्दू धर्म का पालन करता हूँ क्योंकि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म हिन्दू धर्म के ही अङ्ग है और एक दूसरे के पारी पूरक है और इसी से भारत की प्रत्येक जाती का जन्म हुआ है|

जाती ही क्या कहें मैंने तो इस्लाम राममार्गी के सामानांतर और इसाइयत क्रिश्नामार्गी के समान्तर कहकर भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के तीनों प्रमुख धर्मों (हिन्दू+; मुस्लिम+ और ईसाइयत+) को आपस में जोड़ दिया और किशी को विश्वाश न हो तो मेरे जैसा जीवन जी के देख ले उसे पता लग जाएगा की दुनिया को चलाने वाले किशी एक बिंदु पर आकर एक हो जाते हैं| राजनीती एक अलग चीज है जो समय विताने का साधन है पर सत्य की प्राप्ती उसका भी अभीस्थ उद्देश्य है पर धर्माचार्यों और धर्माधिकारियों से कुछ अलग हटकर उनका रास्ता है लेकिन आप उनको अधार्मिक नहीं कहा सकते हैं| वैसे भी जिसका भी कोई धर्म नहीं उसका भी मानव धर्म होता है जिस तरह से आप सभी धर्मों को मानाने वाले कम से कम मानव धर्म मानते ही हैं अगर आप का सामाजिक जीवन दानव तुल्य न हो| अतः राजनीती करने वाले आप को बताएँगे की सभी धर्म और जातियां अलग हैं जिससे जीवन आकर्षक हो और समय की गति के साथ जीवन चलता रहे पृथ्वी पर कोई जीवन से हिम्मत न हारे|


Greatest Hindu Emperor Ashok Maurya was son of Emperor Bindusara Maurya and grand son of Emperor Chandragupta Maurya whose mentor was a Brahmin know as Chanakya (Kautilya) or Vishnukant. And the Avadana texts mention that Ashok Maurya’s mother was Brahmin queen Subhadrangi, secondary wife of Bindusara . According to Ashokavadana, she was the daughter of a Brahmin from the city of Champa of Ajivika sector.-----------And this Greatest Hindu Emperor Ashok Maurya spread out the Baudhism in world around beyond its limit in period of Gautam Buddha(Gautam Gotriya Kshatriya Siddharth Gautam). Both Siddharth and Ashok’s back history was Sanatan Hindu Dharma.


Communal harmony as such is highly sensitive an issue and cannot be soft pedaled any more in view of our traditional value, com cultural heritage and secular(equal treatment of all religion and caste or panth by state) character of our state.-------------For the sake of maintaining communal harmony, the Greatest Mughal Emperor Akbar started a new religion Din-e-Iiahi. He made a Rajput lady his wife to gave equal respect is Hindu religion.-


Friday, August 2, 2013

A single state having Prayag, Kashi, Ayodhya and Mathura in one, why not better than a divided state of it. Be united Uttar Pradesh.


भक्त वह है जो अपने आराध्य और आराध्य की प्रतिमा के प्रति और उनसे सम्बंधित कार्यों के प्रति तन, मन और धन से समर्पित हो चाहे वह पास रहे या दूर रहे परन्तु पुजारी वह है जो अपने आराध्य या आराध्य की प्रतिमा के सानिध्य में ही रहे और उनके तथा उनसे सम्बंधित कार्यों के प्रति तन, मन और धन से समर्पित रहे| अतः गरुण अवतार भरत जी भगवान् श्री राम के भक्त हुए हनुमान की तरह और शेषनाग अवतार लक्ष्मण भगवान् श्रीराम के पुजारी|--------गरुण और शेषनाग दोनों भगवान् विष्णु के वाहन है जिनमे आपस में स्पर्धा रहती है और अधिकतम समय भगवान् विष्णु शेषनाग पर ही रहते हैं केवल विशेष प्रयॉजन में ही वायुमार्ग से चलने के लिए गरुण की सवारी करते हैं |


Thursday, August 1, 2013

गौतम ऋषि का सीता के गुरु होने का प्रस्ताव जो राजर्षि जनक को दिया गया था उसे सीता ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया था की वे अपनी स्त्री के साथ न्याय नहीं कर सके तो स्त्री को शिक्षा क्या देंगे? वैसे किशी को गौतम ऋषि को कटघरे में खडा करने के पहले उनके स्थान पर अपने को रखकर उनके जैसे श्रेष्ठतम मानवता वादी के त्याग की महिमा को समझना होगा और तब उनके न्याय पर उंगली उठानी चाहिए|


ओजोन परत का भी प्रतिसत बहुत कम है वायुमंडल में फिर भी पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने में इसका स्थान बहुत महत्वपूर्ण है और यह आक्सीजन का अप्रत्यक्ष स्रोत भी है|


गौतम गोत्रीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम (गौतम बुद्ध) के शिष्यों से मेरा केवल इतना कहना है की भगवान् श्री राम ने न्याय दर्शन समाज को देने वाले गौतम ऋषि के अपने पत्नी के साथ किये गए न्याय की आलोचना की थी की उनका यह कैसा न्याय अपनी पत्नी अहिल्या के साथ तिस पर भगवान् श्री राम के जीवन में ऐसा समय आया की लोग आज भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन में अपने पत्नी के प्रति किये गए न्याय की आलोचना करते हैं यद्यपि गौतम ऋषि और भगवान् श्रीराम अपने आदर्शों पर सही थे और उसमे कोई समझौता करने के लिए राजी नहीं हुए| अतः किशी भी धर्म के अनुयायी को सनातन धर्म की आलोचना कर उसे नीचा दिखाने से पूर्व उसमे जीवन जीने के तहत जो व्यापक स्वतन्त्रता, जीवन दर्शन और संस्कृति निहित है उस पर गहन विचार करना चाहिए|


• जहां श्री कृष्ण वृष्टि वंशीय/चन्द्र वंशीय थे वही श्रीराम रघुवंशीय/इक्शाकुवंशीय/शूर्यवंशीय थे और इस प्रकार भगवान् विष्णु की अदभुद लीला चन्द्र वंश और शूर्य वंश को एक कर देती है जो हमें एकता का पाठ पढ़ाती है और समाज में हर किशी की जरूरत है इस पर जोर देती है|


वृष्णि वंशीय (कश्यप गोत्रीय) श्रीकृष्ण यदुवंशीय हो जाते हैं केवल यशुदा और नन्द राय के द्वारा पालन और पोसन से तो मित्रों हमारे आप के बीच भी बहुत से ऐसे सम्बन्ध होते हैं जो हमारे जाती और कुल बंधन पर भारी पड़ जाते हैं फिर भी जिस तरह से कृष्ण ने गोकुल के अपने अभीस्ट प्रेमियों का त्याग करके अपने माता और पिता को कंश के बंधन से मुक्त कराया कंश का वध करके वह हमें मात्री और पित्री भक्ति में सब कुछ अर्पण करने को प्रेरित नहीं करता है क्या?


प्रिय मित्रों, हमें भी पता है की भारत ही नहीं विश्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा| अतः धैर्य बनाये रखिये कोई जादुई छड़ी नहीं की सब कुछ एक साथ ठीक हो जाय| हमें कुछ अच्छा और घटिया के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए|


Kalidas (who have anonymous name earlier before he enlightened knowledge) was a Gaur Varneey Gadavali young person whom Pundits of Varanasi catches while he cutting that branch of tree on which he was seating himself. There might not be a more foolish person than this in this world, it was assumption of Pundits. Pundits were in search of a foolish person to make arrangement of marriage of Vidyotma because Vidyotma defeated all Pundits of Varanashi (the Gyan Nagari of India). In the competition with Vidyotma Pundits miss spelled the signals of Kalidas to defeat the Vidyotma and thus a foolish person Kalidas became husband oh Vidyotma. Kalidash became Shekshapear of Sanskriti literature after slagging by Vidyotma. Kalidash was devotee of Kali Maan and this converted his name to Kalidash (Devotee of Kali).


मेरे पैर में चोट लग गयी और अस्थायी तौर पर कुछ कस्ट भी हुआ इसमे कोई बात नहीं पर चोट लगाने का कारन एक छोटे बच्चे की जान बचना था ( लूंगी और बनियान पहने और सर पर पगड़ी बंधे हुए इसके अभिभावक स्वयं कालिदास की तर्ज पर बिना दोनों दिशा में देखे इस बच्चे को पीछे बैठाकर सड़क पार करने लगे थे) इस लिए मेरे प्रभु श्रीराम के प्रति मेरे बचन और उनके आदर्श की रक्षा हुई यह मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार था|यह क्या आदर्श और क्या बचन था प्रस्तुत करना जरूरी नहीं यहाँ |