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Saturday, September 28, 2013

हनुमान (अम्बवादेकर=अम्बेडकर) ने अहिरावन को मरकर पातालपुरी जो वर्तमान सर्वोच्च विश्व शक्ति है का शासन अपने पुत्र मकरध्वज को दे दिया था जो अहिरावन को मरने की युक्ति हनुमान को बताया था मायावी दीपक हनुमान द्वारा बुझाने पर। और इस प्रकार रामायण युध्ध के समय कैम्प से सोते हुए श्रीराम और लक्षमण को अहिरावन द्वारा चुरा लेने पर हनुमान ने अहिरावन को मार श्रीराम और लक्षमण को मुक्ति से छुडाया। हनुमान अपने गुरु सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला से सांकेतिक शादी की थी शूर्यदेव को गुरु दक्षिणा स्वरुप और विशेष निवेदन पर।


भगवान् शिव माता पार्वती से: "धन्य सो देश जह सुरसरि बहई । धन्य नारी पतिव्रत अनुसरहीं|| धन्य सो भूप निति जो करई । धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)॥ सो धन धन्य प्रथम गति जाकी (वह धन धन्य है जो समाज के उपकार में लगाया जाय )। धन्य पुण्य रत मति सोई पाकी (वह बुद्धि धन्य है जो पुन्य के कार्य सामाजिक नवनिर्माण में लगाई जाय) ॥धन्य घरी सोई जब सतसंगा (वह समय धन्य है जो सत्संग करने में प्रयुक्त हुआ हो) । धन्य जन्म द्विज भगती अभंगा (जिस ब्राह्मण की भगति अटूट हो भगवान् राम के प्रति उसका जन्म धन्य है) ॥ सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (हे उमा-पार्वती वह कुल धन्य है जिसमे पूरे जगत के पूज्य और पवित्रता में भी सर्वश्रेष्ठ (सु-पुनीत) का जन्म हो इसका मतलब श्री राम का रघुकुल= इक्शाकुवंश= शूर्यवंश धन्य है)। श्रीरघुवीर परायण जेहिं नर उपज विनीत (विनय युक्त =विनम्रता और शिस्टाचारयुक्त व्यक्ति (RESPECTFUL= COURTEOUS =Gentleman =सज्जन पुरुष)=और ऐसे रघुवीर का परायण मतलब रघुवीर में अभीस्त श्रध्धा वाला वही हो सकता है जी जिसके अन्दर विनीत (विनम्रता-विनययुक्त) की उपज हो )


शंकर सुमन केशरी नंदन तेज प्रताप महा जग वंदन- महावीर बिनावऊ हनुमाना, राम जाशु जस आप बखाना: हनुमान केशरी जैसे ब्राह्मण राजा के पुत्र और शंकर के अंश (शंकर के समान रूप और मन वाले) तथा विष्णु (श्रीराम और श्रीकृष्ण) के अनन्य भक्त मतलब पूर्ण वैष्णव हैं। यह है मारुतिनंदन पवन पुत्र हनुमान(अम्बवादेकर=अम्बेडकर) की विशेषता जो उनको त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की शक्ति से परिपूर्ण करता है। और यही पवन पुत्र ही अहिरावन के सभी मायावी दीपक जो विपरीत क्रम में रखे गए थे को एक साथ बुझा कर मकरध्वज को अहिरावन के नाश का संकेत दे सकते थे और केवल यही राज की बात एक कारन था की भगवान् श्रीराम और लक्षमण रावण के भाई अहिरावन (जो विश्व का सबसे बड़ा माफिया और समुद्री डकैत था) से हिन्साब चुकता कर वापस न आ सकते थे युध्ध कैम्प में उसी एक युध्ध की रात्रि में।


Patalpuri of Makardhwaj/AHIRAVAN is the so called super power country of present world.


29 September 1995 में ही हनुमान=अम्बवादेकर=अम्बेडकर स्वयं श्रीराम (अयोध्या-फैजाबाद) के भाई और समान हिस्सेदारी के पड़ोसी हो गए थे अम्बेडकरनगर जिले के निर्माण के साथ तो असमानता कहाँ रह गयी।


जहां वशुदेव के कुलगुरु गर्ग थे वही नन्द के कुलगुरु शांडिल्य और आप लोगों के लिए बता दूं की गर्ग भारद्वाज की शिष्य परम्परा के पुत्र थे और शांडिल्य का जन्म कश्मीर में कश्यप और वाशिस्थ के सम्मिलित संयोग से हुआ था।


Wednesday, September 25, 2013

कोई माने न माने भगवान् श्रीराम और भीम में एक समानता थी और वह यह थी की अपने वादे के लिए अपना नियम ही तोड़ देना: राम का सुग्रीव को दिया वादा और भीम का द्रौपदी(पांचाली) को दिया वादा। पर भगवान् राम ने सुग्रीव को उनका हक़ दिलाने के लिए केवल पेड़ की ओट ली राजा बाली को मारने के लिए (शूर्यवंशीय राजा बाली और उनके भाई सुग्रीव को जो वरदान था उसको साकार करने के लिए:भगवान् राम स्वयं शूर्यवंशीय थे यह विश्वविदित था और है भी) तो वही भीम ने सबके सम्मुख गदा युद्ध के नियमों का उल्लंघन कर दुर्योधन के जंघे में प्रहार करते हुए उसको परास्त किया। टिप्पणी: भीम को अपने गदा युध्ध के गुरु बलराम जो दुर्योधन के पुत्र लक्षमण के ससुर भी थे के क्रोध का सामना करना पडा और बलराम भीम द्वारा इस प्रकार अनौतिक ढंग से दुर्योधन को मारने पर भीम को मृत्युदंड देने जा रहे थे तब श्रीकृष्ण ने उनको किशी तरह से रोका था। लेकिन भगवान् राम स्वनियंत्रित स्वभाव के थे उनको कौन दंड दे सकता था अतः वह कृष्णावतार में ज़रा नामक बहेलिये का रूप राजा बाली को दे स्वयं को मृत्युदंड दिए।


Philosophy of justice given by Saptarshi Gautam. गौतम गोत्रीय ब्राह्मण/हिन्दू आत्म ह्त्या को मजबूर हों और आप गौतम गोत्रीय क्षत्रिय, सिध्धार्थ गौतम और इसामशीह की पूजा में व्यस्त हों सामाजिक समरसता के लिए यह कौन सा पाठ है? मौलिक समानता (जो मानव मात्र के लिए अति आवश्यक है वह समानता) ध्येय होना चाहिए न की हर तरह की समानता के लिए किशी को गलत रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर समता लाई जाय। यह समानता क्षणिक होगी क्योंकि किशी व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा अपना प्रभाव अवस्य दिखलायेगी कुछ समय उपरांत और उसकी नकारात्मक ऊर्जा ही केवल आप का साथ देगी अगर उसको गिराकर आप उसपे नियंत्रण करना चाहेंगे उस स्थिति में भी। The person who was Anti-Brahmin and even having middle class life status are himself acting as Brahmins (That action of Brahmins which was once on their Target). SAPTARSHI WERE FIRST BRAHMARSHI INDICATES FIRST WE ALL WERE SON of Brahmins then others. Imagine! how sanatan Sanskriti, from which all cultures originated, is still alive? What is role of these Brahmins in it?


स्वयं भगवान् श्रीराम द्वारा यह कथन "शिव द्रोही मोहि दास कहावा। सो नर मोहि सपनेहु नहीं पावा।"-----गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित श्रीराम चरित मानस में कहा गया है। मतलब श्रीराम को पाने के लिए प्रथमतः आप में शिव भक्तिभाव जरूरी है जो स्वयं प्रेम और करुना के सागर है।


इस प्रकार एक युग का अंत हो गया और दूसरे युग का आरम्भ हुआ हम लोगों के जीवन का आज। भगवान् श्रीराम का वन्वास चौदह साल का था यह मेरा वन्वास बारह साल का ही था।

इस प्रकार एक युग का अंत हो गया और दूसरे युग का आरम्भ हुआ हम लोगों के जीवन का आज। भगवान् श्रीराम का वन्वास चौदह साल का था यह मेरा वन्वास बारह साल का ही था।

दूसरा गीत था: "बिन फेरे हम तेरे" (जो मुझे जानने वाले हैं वे मेरा साक्षात्कार इस गीत से करने की कोशिस करेंगे जो मेरे साथ न्याय है क्या?)। मै जन्म ग्रह नक्षत्र और मंगलवार को जन्म लेने के कारन गिरिधारी (कृष्ण और हनुमान) जरूर हूँ पर मेरा साक्षात्कार और आदर्श श्रीराम हैं। फिल्म : बिन फेरे हम तेरे (१९७९) गीत : इन्दीवर संगीत : उषा खन्ना स्वर : किशोरकुमार -------------------------------------------------------------------------------------- तीसरा गीत था "मै निकला गद लेके, लाहौर आया एक् दिल छोड़ आया"| ----------------------------------------------------------------------------------------------- सजी नहीं बारात तो क्या आई ना मिलन की रात तो क्या ब्याह किया तेरी यादों से गठबंधन तेरे वादों से बिन फेरे हम तेरे (३) तन के रिश्ते टूट भी जाये टूटे ना मन के बन्धन जिसने दिया मुझको अपनापन उसीका है ये जीवन बांध लिया मन का बंधन जीवन है तुझ पर अर्पण सजी नहीं बारात तो क्या... तूने अपना माँ लिया है हम थे कहाँ इस काबिल जो एहसान किया जान देकर उसको चुकाना मुश्किल देह बनी ना दुल्हन तो क्या पहने नहीं कँगन तो क्या सजी नहीं बारात तो क्या ... जिसका हमें अधिकार नहीं था उसका भी बलिदान दिया भले बुरे को हम क्या जाने जो भी किया तेरे लिये किया लाख रहें हम शरमिंदा मगर रहे ममता ज़िन्दा सजी नहीं बारात तो क्या ... आँच ना आये नाम पे तेरे खाक भले ये जीवन हो अपने जहान में आग लगा दें तेरा जहान जो रौशन हो तेरे लिये दिल तोड़ लें हम दिल तो क्या जग छोड़ दें हम सजी नहीं बारात तो क्या ...

दूसरा गीत था: "बिन फेरे हम तेरे" (जो मुझे जानने वाले हैं वे मेरा साक्षात्कार इस गीत से करने की कोशिस करेंगे जो मेरे साथ न्याय है क्या?)। मै जन्म ग्रह नक्षत्र और मंगलवार को जन्म लेने के कारन गिरिधारी (कृष्ण और हनुमान) जरूर हूँ पर मेरा साक्षात्कार और आदर्श श्रीराम हैं।   फिल्म : बिन फेरे हम तेरे (१९७९) गीत : इन्दीवर  संगीत : उषा खन्ना  स्वर : किशोरकुमार  -------------------------------------------------------------------------------------- तीसरा गीत था "मै निकला गद लेके, लाहौर आया एक् दिल छोड़ आया"| ----------------------------------------------------------------------------------------------- सजी नहीं बारात तो क्या आई ना मिलन की रात तो क्या| ब्याह किया तेरी यादों से गठबंधन तेरे वादों से|| बिन फेरे हम तेरे (३)  तन के रिश्ते टूट भी जाये टूटे ना मन के बन्धन| जिसने दिया मुझको अपनापन उसीका है ये जीवन|| बांध लिया मन का बंधन जीवन है तुझ पर अर्पण| सजी नहीं बारात तो क्या...  ||तूने अपना माँ लिया है हम थे कहाँ इस काबिल| जो एहसान किया जान देकर उसको चुकाना मुश्किल|| देह बनी ना दुल्हन तो क्या पहने नहीं कँगन तो |क्या सजी नहीं बारात तो क्या ...  ||जिसका हमें अधिकार नहीं था उसका भी बलिदान दिया| भले बुरे को हम क्या जाने जो भी किया तेरे लिये किया|| लाख रहें हम शरमिंदा मगर रहे ममता ज़िन्दा| सजी नहीं बारात तो क्या ...  ||आँच ना आये नाम पे तेरे खाक भले ये जीवन |हो अपने जहान में आग लगा दें तेरा जहान जो रौशन हो||  तेरे लिये दिल तोड़ लें हम दिल तो क्या जग छोड़ दें हम| सजी नहीं बारात तो क्या ...||

1st गीत:सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है, ये बुझते दिए को न तुम याद करना। "गगनचढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥---गोस्वामी तुलसी दास"-------------चन्दन जैसा स्वभाव है तब तो सर्प का बिष भी असर नहीं करेगा और आप अपने सीतल स्वभाव से दूसरों को भी सीतलता प्रदान करते हुए भी अपनी स्वाभाविव गुण का त्याग नहीं करेंगे। पर यदि रज(मिटटी का सूक्ष्म कण) स्वभाव है आपका तो किससे आप मिलते हैं उसका गुण आप पर प्रभावी होगा जैसा की रज पानी का साथ करता है तो नीच कीचड बनता है और हवा का साथ करता है तो आसमान की उंचाइयां छूता है।--------- केदारेश्वर बनर्जी केंद्र , अल्लाहाबाद विश्वविद्यालय में अक्सर कम्प्यूटर से हमें अनायास ही तीन गीत आज से बारह साल पहले मेरे एक अनुज सुनाने लगते थी उनके पास बैठते ही: (तीन में से एक निम्न लिखित गीत प्रस्तुत है अन्य दो कुछ दिन बाद प्रस्तुत करूंगा) गीत: सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है-----Movie - Ek Bar Muskuraa Do---- Singer - Kishore Kumar

"गगनचढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥---गोस्वामी तुलसी दास"-------------चन्दन जैसा स्वभाव है तब तो सर्प का बिष भी असर नहीं करेगा और आप अपने सीतल स्वभाव से दूसरों को भी सीतलता प्रदान करते हुए भी अपनी स्वाभाविव गुण का त्याग नहीं करेंगे। पर यदि रज(मिटटी का सूक्ष्म कण) स्वभाव है आपका तो किससे आप मिलते हैं उसका गुण आप पर प्रभावी होगा जैसा की रज पानी का साथ करता है तो नीच कीचड बनता है और हवा का साथ करता है तो आसमान की उंचाइयां छूता है।---------
केदारेश्वर बनर्जी केंद्र , अल्लाहाबाद विश्वविद्यालय में अक्सर कम्प्यूटर से हमें अनायास ही तीन गीत आज से बारह साल पहले मेरे एक अनुज सुनाने लगते थी उनके पास बैठते ही: (तीन में से एक निम्न लिखित गीत प्रस्तुत है अन्य दो कुछ दिन बाद प्रस्तुत करूंगा)
गीत: सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है
Movie - Ek Bar Muskuraa Do
Singer - Kishore Kumar

सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है, ये बुझते दिए को न तुम याद करना।
हुए एक बीती हुई बात हम तो, कोई आंशू हम पर न बर्बाद करना॥

तुम्हारे लिए हम, तुम्हारे दिए हम, लगन की अगन में अभी तक जले हैं।
हमारी कमी तुको महसूस क्यों हो, तुम्हारी सुबह हम तुम्हें दे चले हैं।।
जो हर दम तुम्हारी ख़ुशी चाहते हैं, उदाश होक उनको न नाशाद करना।
सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है, ये बुझते दिए को न तुम याद करना।।

सभी वक्त के आगे झुकाते रहे हैं, किशी के लिए वक्त रुकता नहीं है।
चिराग अपनी धरती का बुझता है जब भी, सितारे तो अम्बर के होते नहीं हैं॥
कोई नाव तूफान में डूबे तो क्या है, किनारे तो सागर के होते नहीं हैं।
हैं हम डोलती नाव डूबे तो क्या है, किनारे हो तुम, तुम न फरियाद करना॥
सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है, ये बुझते दिए को न तुम याद करना।।

चमन से जो एक फूल बिछड़ा तो क्या है, नए गुल से गुलसन को आबाद करना।
सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है, ये बुझते दिए को न तुम याद करना।।

Dear friends! Within three month of my residence in Indian Institute of Science Bangalore, out of 24 month, one of person meet me and told the task for which you used is completed with your first D. Phil Degree from Kedareswar(K.) Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies, University of Allahabad, Allahabad, now you can go any of the top most country of the world for PDF or becoming permanent resident for such I will manage for VISA within no time. As you have passport at the present time thus leave the country with me. ----------I rejected his proposal and said thanks. Reality is that I, myself not want to go any where out side India even after my death too. Note: Total personality of a person: Potential energy (Family values+Social values+ Civilazation+Cultural values+National values+International values) + Kinetic energy (health+Wealth+Education)


राम ने केवल अपनी कार्यकुशलता, नैतिकबल और पुरुषार्थ से ही रावण पर विजय पायी थी यही सत्य नहीं वरन सीता के चरित्र ने राम को रावन पर विजय दिलाई थी अन्यथा सीता का स्वयं नैतिक पतन हो गया होता तो रावन पर विजय का प्रश्न ही कहाँ रह जाता। अतः सीता और श्रीराम का श्रेष्ठ चरित्र न केवल सामान्य जन मानस अपितु सप्तर्षियों के लिए भी आदर्श बन गया।


Monday, September 23, 2013

"Terror is better than Characterlessness". In connection with the comment from one of my Junior on it, I have following justification: अगर टिप्पणी हुई है चरित्र हीनता पर मेरे द्वारा तो वह शारीरिक, व्यक्तिगत, सामूहिक, संस्थागत, रास्ट्रीय और वैश्विक समाज में मानवमूल्यों के ह्रास रूपी चरित्र हीनता से है जिसका कि मुकाबला ही नहीं किया जा सकता है प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर दृण शक्ति के बल पर भी और यह दीर्घकालिक समय में किशी तरह नियंत्रण में आता है पर वही आतंक का मुकाबला दृण शक्ति के बल पर किया जा सकता है प्रत्यक्ष तौर पर ही।--------मै किशी भी तरह आतंकवाद को बढ़ावा नहीं दे रहा पर चरित्रहीनता की स्थिति पर आतंकवाद से ज्यादा ध्यान देने पर लोगों का ध्यान आक्रिस्ट कर रहा हूँ और उसे आतंकवाद से बड़ा सामाजिक क्षतिकारक मान रहा हूँ।

Characterlessness is sweet poison for a person and society

शूर्यवंश और चन्द्रवंश के बीच यदि सम्बन्ध को जाना जाता ठीक से तो इनमे मतभेद फैला राक्षस प्रवृत्ति के लोगों को शरण न दी जा सकती थी और वह यह है की आदित्य(शूर्य) और चन्द्र दोनों अदिति और कश्यप ऋषि के ही संतान थे जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण शूर्यवंश में कश्यप ऋषि(दसरथ) और अदिति(कौसल्या) तथा गुरु ऋषि वशिस्थ; और चन्द्रवंश में कश्यप ऋषि(वसुदेव) और अदिति(देवकी) तथा हस्तिनापुर चन्द्रवंशीय राजा दुष्यंत के समय के गुरु ऋषि कंव(कश्यप ऋषि के वंसज) और कुरुवंश(कौरव-पांडव), हस्तिनापुर जैसे चन्द्रवंशीय राजा के समय के गुरु व्याश/परासर ऋषि (उसी गुरु ऋषि वशिस्ठ के वंसज)। स्वयं मनु और श्रध्धा कोई और नहीं वरन कश्यप ऋषि और उनकी पत्नी अदिति ही थे जिनको मेरे बचपन से ही गालियों से नवाजा जा रहा था| ये लोगों की अज्ञानता भरी बातें उसके सम्बन्ध में मई कश्यप गोत्रीय हुए सुनता रहा था जो ब्रह्मा के वरदान श्रिति के संचालन में सभी ऋषियों में सर्व प्रथम मानव जन्म देने के लिए शरीर धारण किये थे(हिमालय और उसके निकट के पर्वतीय और मैदानी भागों में) और इसके वाद ही सभी ऋषि मानव जन्म देने को आगे बढे और गोत्र परम्परा की सुरु आत हुई। हिमालय और उसके निकट के पर्वतीय और मैदानी भागों मानव सभ्यता की सुरुआत हुई परन्तु जो ऋषि इसे जन्म दिए उनका प्राकट्य (पृथ्वी से सबसे प्राचीन यज्ञ प्रक्रिस्था यज्ञ से सप्तर्षि प्रकट हुए थे) प्रयाग(काशी) में हुई| अतः प्रयाग(काशी) प्रथम स्थान पर और हिमालय के निकट के क्षेत्र, पंजाब(सिंध) दूसरे स्थान पर आते हैं।


Saturday, September 21, 2013

सीतामढी वह पुण्यभुमि है जहा पर अखिल ब्रम्हान्ड नायिका जगत जननी मा सीता जी लोकापवाद से व्यथित हो अपने सतीत्व की प्रामाणिकता को सिद्ध करने हेतु मा वसुन्धरा के गोद मे समहित हो गयी थी ? चिरकाल से अपनी स्म्रीतियो को संजोये सीतामढी मे संत गोस्वामी तुलसीदास जी अपने काशी प्रयाग की यात्रा के दौरान सम्वत १६२८ मे यहा आये ? यहा गंगा के तट पर व्रित्ती ध्यान परायण होकर समाधिस्ठ हो गये ? यहा उन्होने महर्षि वाल्मिकी मा जानकी तथा लव कुश से सम्बन्धित सम्पुर्ण चरित्र को देखा ? गोस्वामी जी सीतामढी स्थान पर तीन दिन रुके थे जिसका उल्लेख सन्त वेणी माधव जी ने गोसाई चरित्रावली मे किया है? गोस्वामी जी अपनी असम्प्रग्यात समाधि से जानकर यहा की यथा स्थिती पर प्रकाश डालते हुए तीन कवित्त लिखे ? ये कवित्त उनके द्वारा रचित कवितावली के उत्तर कान्ड मे क्रमस! १३८, १३९, १४० मे वर्णित है? गोस्वामी जी इस स्थान को चिन्हित करने के लिए अपने हाथो से चार वट व्रिच्ह लगा कर सीतमढी शीर्षक की पुष्टी करते है ? ये सीतावट इतिहास कि गवाही देते आज भी मौजुद है ? इन्ही सीतावटो के मध्य वाल्मिकी आश्रम है ? जहा पर महर्ष वाल्मिकी द्वारा रामायण महाकाव्य की रचना की गयी ? इस आश्रम के निकट ही सीताधाम है ? जहा पर लव कुश का जन्म हुआ था ? आश्रम के पश्चिमी दिशा मे धरती का वह पवित्र भू भाग है जिसे सीता समहित स्थल कहते है? यही पर जगत वन्दनीय मा जानकी अपने सतीत्व की प्रामाणिकता देने के लिए प्रित्थ्वी देवी को साच्छी बनाकर जनमानस के बीच मे असत्य रुपी लोकापवाद पर सत्य रुपी सतीत्व की विजय पताका फ़हराते हुए मा वसुन्धरा के गर्भ मे समा गयी थी ? सीता समाहित स्थल यह दिव्य स्थान गंगा तट से उत्तर पश्चिम दिशा के कोने में स्थित है। यही वह महिमामयी पावन धरती है जहां नारी सनातन संस्कृति के साकार रुप मे अवतरित जगत माता सीता की अंतर्मयी पुकार को सुनकर वसुंधरा देवी प्रकट हुईं और सीताजी को अपने अंक मे समेटकर अपने रूप में समा गयी। जब सीताजी धरती में प्रवेश कर रही थी तो श्रीराम जी ने उन्हे रोकना चाहा। श्रीराम के हाथ सीताजी के केश लगे। यही केश इस वर्तमान समाहित स्थल में सीता केश के नाम से जाना जाता है। यह सीता केश एक विशेष प्रकार की घास है जो कि रात को जूगनुओ की तरह चमकती है तथा उखाड़ने पर इसके जड़ से रक्त जैसा लाल रंग का तरल पदार्थ निकलता है। इसी समाहित स्थल पर सीता माता के भव्य मंदिर का निर्माण किया गया जो कि दो तलों मे विभक्त हैं। मंदिर के ऊपरी तल पर स्थापित सोलह श्रृंगार से युक्त मां जानकी की मूर्ति दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर देती है। निचले तल मे बनी सीताजी की वनवासिन के रूप मे कारुणिक प्रतिमा श्रद्धालुओं की आंखों को नम कर देती है। राम प्रदत्त निर्वासन काल की यह सीता प्रतिमा बड़ी ही सजीव तथा अदभुत है।


Sita: "O Mother Earth, if it is true that I have never thought of anybody but Sri Rama, receive me in your arms. O Mother Earth, if it is true that I have always worshipped only Sri Rama, then please receive me. If my words are true at all, O Mother Earth, receive me in your arms." ---------------------------Valmiki sent his disciples to fetch Seetadevi from the ashrama. When Seetadevi arrived, Sri Rama said to her, "Seetha, swear before all the sages assembled here, that you loved me alone and are in truth a virtuous woman. Let the minds of all those who doubt you be cleared. Then I shall take you back." Sage Valmiki protested. He said to Sri Rama, "Lord Rama, Seeta is the most virtuous of women. Please do not test her again and again. Why should she again swear before this gathering? Her mind is already greatly hurt. Do not pain her again. You are verily Lord Mahavishnu, the great Protector of the Universe, and she is your divine consort, Mahalakshmi. Let there be no further test." ----But Sri Rama said the test was needed in order to remove the suspicion of people.-----Seetadevi stood with her head bowed. Tears flowed like a stream from her eyes. All the gods came down from heaven to witness the test of this most virtuous woman. Before all those gods and the rishis, Seeta prayed to the Earth Goddess, "O Mother Earth, if it is true that I have never thought of anybody but Sri Rama, receive me in your arms. O Mother Earth, if it is true that I have always worshipped only Sri Rama, then please receive me. If my words are true at all, O Mother Earth, receive me in your arms." -------As Seetadevi uttered these words, the Earth burst open, and a throne rose. Bhoodevi, the Goddess of the Earth, was seated on the throne, which was held up by four serpents. Bhoodevi drew Seethadevi into her arms and embraced her. In a moment, both disappeared into the earth with the throne. The earth, which had opened, closed again.-----------Seeing Seetha vanish underground, Sri Rama was in great misery. He wept loudly. Seetha was the daughter of Bhoodevi. She had again entered the mother's womb. Sri Rama prayed to Bhoodevi, his mother-in-law, to give his wife back to him; he blamed himself, craved for Seetha, and raved angrily. But it was all in vein.-------------Then Brahmadeva, the Lord of the Creation, appeared to him and soothed him. "Sri Rama," he said, "You -are no human being, but Lord Narayana. You were born a human being to kill the demon-king Ravana. That mission is over; you must now get back to your own world of Vaikunta. Your wife Seetadevi awaits you there as Lakshmi."------Sri Rama realized that these words were true. His sorrow subsided. The assembled gods and sages were filled with wonder. After some days Sri Rama left the earth and returned to Vaikuntha.


Seeing Seeta vanish underground, Sri Rama was in great misery. He wept loudly. Seeta was the daughter of Bhoodevi. She had again entered the mother's womb. Sri Rama prayed to Bhoodevi, his mother-in-law, to give his wife back to him; he blamed himself, craved for Seeta, and raved angrily. if you not return Sita then I will ABOUT TURN you with only one ARROW.But it was all in vein.-------------Then Brahmadeva, the Lord of the Creation, appeared to him and soothed him. "Sri Rama," he said, "You -are no human being, but Lord Narayana. You were born a human being to kill the demon-king Ravana. That mission is over; you must now get back to your own world of Vaikunta. Your wife Seetadevi awaits you there as Lakshmi." -------------Sri Rama realized that these words were true. His sorrow subsided. The assembled gods and sages were filled with wonder. After some days Sri Rama left the earth and returned to Vaikuntha.


Sita means who taken birth from SIT means HAL mean plaugh instrument.--Janaki, Vaidehi and Mithilesh Kumari are also name of Sita


Yadu and Kuru was from same origin Chandravansh and Kunti was a historical lady having marrige from Yadu to Kurv Vansh.


Ayodhya was centre capital of Raghuvanshiy-Ikshaakuvanshiy - Shooryavanshiy kings. Hastinapur, Meerut was centre capital of Kuruvanshiy-Chandravanshiy kings always.


Wednesday, September 18, 2013

To end his evils a Gwala killed him in several parts in Satyuga. Was this event make Lord Shiva angry with Gwala? Answer is, No, but there two temples of Lord Shiva came in existence: 1st Kedarnath, in memory of King Kedarnath, in Uttarakhand/Uttar Pradesh and 2nd Pashupatinath in Nepal, where the holy cow of a Gwala used to feeded Shiva (head of King Kedarnath reached there). ------Kedarnath name comes from King Kedar. King Kedar (partial incarnation of Lord Shiva), who ruled in Satyug (age of truth), had a dream, in which Lord Shiva guided him to this divine place. He had a daughter named Vrinda who was a partial incarnation of Goddess Lakshmi. He accompanied by his daughter Vrinda, found the Shivling (the holy symbol of Lord Shiva=known as Kedareswar=Kedarnath later) where the temple Kedarnath stands today. The king came back, but Vrinda stayed there. She performed austerities for several years and achieved nirvana there. Hence, the place is locally known as Vrindavan too. Later Kedarnath became proud with power of Lord Shiva and became evil(extreme moral wickedness activities). To end his evils a Gwala killed him in several parts in Satyuga. Was this event make Lord Shiva angry with Gwala? Answer is, No, but there two temples of Lord Shiva came in existence: 1st Kedarnath, in memory of King Kedarnath, in Uttarakhand/Uttar Pradesh and 2nd Pashupatinath in Nepal, where the holy cow of a Gwala used to feeded Shiva (head of King Kedarnath reached there).

Kedarnath name comes from King Kedar. King Kedar (partial incarnation of Lord Shiva), who ruled in Satyug (age of truth), had a dream, in which Lord Shiva guided him to this divine place. He had a daughter named Vrinda who was a partial incarnation of Goddess Lakshmi. He accompanied by his daughter Vrinda, found the Shivling (the holy symbol of Lord Shiva=known as Kedareswar=Kedarnath later) where the temple Kedarnath stands today. The king came back, but Vrinda stayed there. She performed austerities for several years and achieved nirvana there. Hence, the place is locally known as Vrindavan too. Later Kedarnath became proud with power of Lord Shiva and became evil(extreme moral wickedness activities). To end his evils a Gwala killed him in several parts in Satyuga. Was this event make Lord Shiva angry with Gwala? Answer is, No, but there two temples of Lord Shiva came in existence: 1st Kedarnath, in memory of King Kedarnath, in Uttarakhand/Uttar Pradesh and 2nd Pashupatinath in Nepal, where the holy cow of a Gwala used to feeded Shiva (head of King Kedarnath reached there).

Monday, September 16, 2013

HUNTER, JARA who killed Lord Krishna was king Bali of the era of Lord Ram| Although it was a curse of Durvash to end the most of prominent Yaduvanshi. Also Satya Baali, Saty Bhaamaa, Jambavati sub-queens in series with chief queen Rukmini and others queens of Lord Krishna relates him with the Lord Shri Ram era. TARA, MANDODARI AND SULOCHANA(PRAMILA) were among them. This is connection of Shri Krisna (in DWAPAR YUG) with Shri Ram (in TRETA YUG). Ashtabharya(s) or Ashta-bharya(s) of Lord Krishna in Dwaraka: Chief queen:Patrani(Rukmini and Satyabhama); and Jambavati, Kalindi, Mitravinda, Nagnajiti, Bhadra and Lakshmana.


Lord Krishna:VISHNU having luxurious life in Dwarika was born and died alone.---SITA:LAKSHMI born ploughing Earth, exiled, kidnapped, exilled by RAM and again came under Earth.------------------------Therefore be equal in both condition i.e. in High and low status of life.


Shri Ramchandra kripalu bhajman\ haran bhav bhay darunam\\ navkanj lochan kanj mukh kar kanj pad kanjarunam\\-----Raghupati Raghav Rajaram/Patit pavan Sitaram//--Sabko sanmati de bhagvan/Isvar Allah tero nam//--Vaishnav jan to tene kahiye peer parayee jaane re: Saptarshi Gautam's Nyay Darshan---Both post in previous order have same sense. RAM patit pavan aur bhav badha par lagane vaale hain.


अर्जुन जब स्वयम भारत थे जैसा की परमब्रह्म श्रीकृष्ण ने उनको भारत कहा था तो परीक्षित (कुमार उत्तर) स्वयं उत्तर प्रदेश के प्रतीक हुए और उनकी माँ और अर्जुन की पुत्र वधु उत्तरा स्वयं उत्तराखंड की प्रतीक हुई। अतः अब उत्तर प्रदेश का और विभाजन मंजूर नहीं है ।


Friday, September 13, 2013

शायद अब धीरे धीरे लोगों को यह समझा आ रहा है की इस्लाम श्रीराम के सामानांतर और इसाइयत श्रीकृष्ण के सामानांतर और इस प्रकार इस्लाम और इसाइयत सनातन हिन्दू धर्म के सामानांतर चलते हैं और एक दूसरे के परिपूरक और एक दूसरे के श्रोत भी हैं और यही समझ है मानवता को एक करने और मानवता को समझने की प्रथम सीढी। वैसे भी इस्लाम अनुयायी मुसलमान (मुसल्लम ईमान=पूर्ण रूपेण इमानदार=पूर्ण रूपेण सत्यानुयाई) और इसाइयत का दूसरा नाम ही पूर्ण प्रेम है तो "इस्लाम श्रीराम के सामानांतर और इसाइयत श्रीकृष्ण के सामानांतर" इस बात को समझने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। पर यहाँ यह भी बता दें की गाय, गंगा, गायत्री और रावण का उद्धार करने के बाद कश्यप गोत्रीय श्री कृष्ण के भी आदर्श कश्यप गोत्रीय श्रीराम के यहाँ भोज करने के लिए सबसे पहले तैयार होने वाले गर्ग, गौतम, शांडिल्य गोत्रीय ब्राह्मण और किशी भी ब्राह्मण का सम्मान और रक्षा हिन्दू का प्रथम कर्तव्य जो है, यह एक मात्र ऐसी शर्त है की इस्लाम और इसाइयत को श्रीराम और श्री कृष्ण के समानांतर बना देती है मतलब एक सामान्य हल्की सी दूरी लिए उसी रस्ते पर चलना जिस पर चलकर की पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम की प्राप्ती हो सके या कहें की परमब्रह्म=परमेश्वर=परमात्मा=अल्लाह=गाड(परमेश्वर) का साक्षात्कार हो सके। जय हिन्द (कश्मीर से कन्याकुमारी और इरान से सिंगापुर=जम्बूद्वीपे), जय भारत(भरतखंडे=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


नर से नारायण तभी बना जा सकता है जब अर्जुन की तरह हम नारायण में अपने को पूर्ण रूप से समर्पित कर दें या नारायण(इस्वर) में असीम श्रध्धा रखें मतलब अर्जुन से भारत बन जाय। नर और नारायण में उतना ही भेद है जितना की अर्जुन और श्री कृष्ण में: श्रीकृष्ण के लिए भी अपने ही पक्ष और विपक्ष में और अर्जुन के लिए भी अपने ही पक्ष और विपक्ष में फिर नारायण मतलब श्रीकृष्ण के लिए जीवित और मरे हुए में कोई अंतर नहीं क्योंकि सभी उसी में समाहित होते हैं और निकलते हैं परन्तु नर अर्जुन के लिए जीवित और मारे जाने वाले में अंतर है और वह यह अंतर है की नर मरे हुए को नहीं देख सकता विना नारायण की असीम कृपा के वह भी उतने ही क्षण के लिए जितने की अर्जुन देखे थे पर नारायण उसे दोनों स्थितियों (शारीरधारी और निराकार) में देख सकता है। अतः नर की नजर से कोई बाख भी जाय तो नारायण की नजर से कोई बाख नहीं पता है इस लोक में भी और उस लोक में भी। मानव शरीरधारी होते हुए भी नर से नारायण तभी बना जा सकता है जब अर्जुन की तरह हम नारायण में अपने को पूर्ण रूप से समर्पित कर दें या नारायण(इस्वर) में असीम श्रध्धा रखें मतलब अर्जुन से भारत बन जाय।


संत ह्रदय नवनीत समाना। कह कबिहिन पर कहई न जाना।। निज परिताप द्रवहिं नवनीते। पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ संत का ह्रदय नवनीत(मक्खन) के समान कोमल होता है इस बात को कवि लोग कहते हैं पर वे कहना ही नहीं जानते हैं मतलब ठीक-ठीक नहीं वर्णन कर पाते हैं। क्योंकि नवनीत तो स्वयं को बाहर से ताप दिए जाने से द्रवित होता है पर संत तो वे पावन लोग हैं जो परमार्थ जीवन धारण करते हैं और समाज में दूसरों के दुःख को दूर कर सुख प्रदान करने के प्रयास में दुःख के भागीदार होते हैं।

संत ह्रदय नवनीत समाना। कह कबिहिन पर कहई न जाना।। निज परिताप द्रवहिं नवनीते। पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ संत का ह्रदय नवनीत(मक्खन) के समान कोमल होता है इस बात को कवि लोग कहते हैं पर वे कहना ही नहीं जानते हैं मतलब ठीक-ठीक नहीं वर्णन कर पाते हैं। क्योंकि नवनीत तो स्वयं को बाहर से ताप दिए जाने से द्रवित होता है पर संत तो वे पावन लोग हैं जो परमार्थ जीवन धारण करते हैं और समाज में दूसरों के दुःख को दूर कर सुख प्रदान करने के प्रयास में दुःख के भागीदार होते हैं।

Monday, September 9, 2013

श्रीराम जो श्री कृष्ण के लिए भी आदर्श थे, को आदर्श मानकर चलने पर यदि परिस्थितिया यदि विपरीत दिशा में जाती हैं तो श्री कृष्ण को अपना आदर्श चुनने का रास्ता स्वयं खुला रहता है पर यदि आप श्री कृष्ण को ही आदर्श पहले से ही मानते हैं तो श्री कृष्ण से श्रीराम बनने के लिए ब्रह्मास्त्र से परीक्षित (कुमार उत्तर) की रक्षा अपने स्वयं के जीवन में किये गए सम्पूर्ण कर्मों का अभीस्ट लक्ष्य पूर्ण सत्य की प्राप्ती सिध्ध करते हुए करना पडेगा न की केवल पूर्ण प्रेम का प्रतीक बना कर ही। पूर्ण सत्य श्रीराम भी सीता माँ के धरती में समाहित होने के बाद सीता माँ से पूर्ण प्रेम की जो विह्वलता प्रकट किये थे राजधर्म को पूर्णता देने के पश्चात और इस प्रकार सीता का त्याग किये थे सीता को धरती से पुनः प्राप्त करने की सामर्थ्य रखते हुए भी, तो उसी से वे भी पूर्ण प्रेम और पूर्ण सत्य को प्राप्त कर भगवान् बने थे न कि केवल पूर्ण सत्य से ही। अतः प्रेम वह तरल है जो इस ब्रह्माण्ड को बांधकर रखता है चाहे यह गुरुत्वाकर्षण या नाभीकीय अल्प आयामी (सार्ट रेंज) बल ही क्यों न हो। सत्य इस प्रेम को पूर्णता तक पहुंचाता है जिससे परमब्रह्म(ब्रह्म) के साक्षात्कार होते है।


Saturday, September 7, 2013

Thursday, September 5, 2013

Swami Vivekanand used to cloths BHAGAVA, the DEVOTION IN SANATAN CULTURE| भग्गरागोति भगवा ' : जिसने राग भग्न किया कर लिया वह भगवान्‌. ' भग्ग्दोसोति भगवा ' : जिसने द्धेष भग्न किया हो वह भगवान्‌. ' भग्गमोहोति भगवा ,:जिसने मोह भंग कर लिया , भग्गमानोति भगवा: अभिमान नष्ट कर लिया , भग्ग किलेसोति भगवा: क्लेष भग्न कर लिया भगवान्‌|भवानं अंतकरोति भगवा:भव संस्कारों का अंत कर लिया , भग्गकण्ड्कोति भगवा:कंटक भग्न कर लिये वह भगवान्‌| भगवा भारत की प्रकृति और संस्कृति है , भगवा स्वभाव है, भगवा भाग्य संभावना है|Personality having character of BHAGAVA, as above is known as BHAGAVAN|


Gayatri Mantra is prayer of Savitra Dev (सवित्र देव) i.e. The God who generated every thing in the cosmos (Brahmand). His color is Bhagava=Lalima i.e. color of Bhagavan=GOD.------सवित्र देव का रंग कुछ और नहीं वरन लालिमा लिए होता है। अतः सनातन धर्म का प्रतीक लालिमा वाला या भगवा होता है जिससे असीमित ऊर्जा वाले भगवान् का तात्पर्य लिया जाता और जो ऊर्जा इस पूरे विश्व को नियंत्रित करती है। अतः भगवा से ही सभी रंगों का जन्म होता है और भगवा से ही इस ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ है अतः भगवा किशी धर्म के विरोध का प्रतीक न होकर सभी धर्मों को सनातन धर्म से बने होने का प्रतीक है जिसमे ऊर्जा या सकारात्मक ऊर्जा को विशेष महत्त्व दिया जाता है।


इससे ज्यादा क्या कहें की हमारे सभ्य, सुसंस्कृत और संस्कारित जीवन क्रम में गाय, गंगा और गायत्री का प्रत्येक अंश हमारे लिए में उपयोगी है। अतः सनातन हिन्दू धर्म के लिए ही नहीं वरन सनातन धर्म से उपजे अन्य धर्म के लिए भी गाय, गंगा और गायत्री पूज्यनीय हैं।


गायत्री महामन्त्र में समावेशित इस वैज्ञानिक अध्यात्म के सृष्टि विज्ञान एवं आत्म विज्ञान का सार रूप: गायत्री महामन्त्र के नौ शब्दों के रूप में नौ गुणों- १. तत्- जीवन विज्ञान, २. सवितुः- शक्ति संचय, ३. वरेण्यं- श्रेष्ठता। ४. भर्गो- निर्मलता, ५. देवस्य- दिव्य दृष्टि, ६. धीमहि- सद्गुण। ७. धियो- विवेक, ८. योनः- संयम, ९. प्रचोदयात्- सेवा की साधना करनी पड़ती है। और तब गायत्री महामन्त्र के चौबीस अक्षरों के रूप में चौबीस ग्रन्थियों- १. तत्- तापिनी, २. स- सफला, ३. वि- विश्वा, ४. तुर- तुष्टि, ५. व- वरदा, ६. रे- रेवती, ७. णि- सूक्ष्मा, ८. यं- ज्ञाना, ९. भर- भर्गा, १०. गो- गोमती, ११. दे- देविका, १२. व- वाराही, १३. स्य- सिंहनी, १४. धी- ध्याना, १५. म- मर्यादा, १६. हि- स्फुटा, १७. धि- मेधा, १८.यो- योगमाया, १९. यो- योगिनी, २०. नः- धारिणी, २१. प्र- प्रभवा, २२. चो- ऊष्मा, २३. द- दृश्या एवं २४ यात्- निरञ्जना का जागरण होता है। इससे गायत्री महामन्त्र के साधक में परमेश्वर की समर्थ अभिव्यक्ति १. सफलता, २. पराक्रम, ३. पालन, ४. कल्याण, ५. योग, ६. प्रेम, ७. धन, ८. तेज, ९. रक्षा, १०. बुद्धि, ११. दमन, १२. निष्ठा, १३. धारणा, १४. प्राण, १५. संयम, १६. तप, १७. दूरदर्शिता, १८. जागृति, १९. उत्पादन, २० सरसता, २१. आदर्श, २२. साहस, २३. विवेक एवं २४. सेवा के रूप में होती है।


गायत्री महामंत्र वेदों का एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है जिसकी महत्ता ॐ के लगभग बराबर मानी जाती है। यह यजुर्वेद के मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः और ऋग्वेद के छंद 3.62.10 के मेल से बना है। इस मंत्र में सवित्र देव की उपासना है इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र के उच्चारण और इसे समझने से ईश्वर की प्राप्ति होती है।----------------------गायत्री' एक छन्द भी है जो ऋग्वेद के सात प्रसिद्ध छंदों में एक है। इन सात छंदों के नाम हैं-गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, विराट, त्रिष्टुप् और जगती। गायत्री छन्द में आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण होते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों में त्रिष्टुप् को छोड़कर सबसे अधिक संख्या गायत्री छंदों की है। गायत्री के तीन पद होते हैं (त्रिपदा वै गायत्री)। अतएव जब छंद या वाक् के रूप में सृष्टि के प्रतीक की कल्पना की जाने लगी तब इस विश्व को त्रिपदा गायत्री का स्वरूप माना गया। जब गायत्री के रूप में जीवन की प्रतीकात्मक व्याख्या होने लगी तब गायत्री छंद की बढ़ती हुई महिता के अनुरूप विशेष मंत्र की रचना हुई हैं|


यह मंत्र चारों वेदों में आया है। इसके ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता सविता हैं। वैसे तो यह मंत्र विश्वामित्र के इस सूक्त के १८ मंत्रों मे केवल एक है, किंतु अर्थ की दृष्टि से इसकी महिमा का अनुभव आरंभ में ही ऋषियों ने कर लिया था, और संपूर्ण ऋग्वेद के १० सहस्र मंत्रों मे इस मंत्र के अर्थ की गंभीर व्यंजना सबसे अधिक की गई। इस मंत्र में २४ अक्षर हैं। उनमें आठ आठ अक्षरों के तीन चरण हैं। किंतु ब्राह्मण ग्रंथों में और कालांतर के समस्त साहित्य में इन अक्षरों से पहले तीन व्याहृतियाँ और उनसे पूर्व प्रणव या ओंकार को जोड़कर मंत्र का पूरा स्वरूप इस प्रकार स्थिर हुआ: (१) ॐ (२) भूर्भव: स्व: (३) तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्। मंत्र के इस रूप को मनु ने सप्रणवा, सव्याहृतिका गायत्री कहा है और जप में इसी का विधान किया है। गायत्री तत्व क्या है और क्यों इस मंत्र की इतनी महिमा है, इस प्रश्न का समाधान आवश्यक है। आर्ष मान्यता के अनुसार गायत्री एक ओर विराट् विश्व और दूसरी ओर मानव जीवन, एक ओर देवतत्व और दूसरी ओर भूततत्त्व, एक ओर मन और दूसरी ओर प्राण, एक ओर ज्ञान और दूसरी ओर कर्म के पारस्परिक संबंधों की पूरी व्याख्या कर देती है। इस मंत्र के देवता सविता हैं, सविता सूर्य की संज्ञा है, सूर्य के नाना रूप हैं, उनमें सविता वह रूप है जो समस्त देवों को प्रेरित करता है। जाग्रत् में सवितारूपी मन ही मानव की महती शक्ति है। जैसे सविता देव है वैसे मन भी देव है (देवं मन: ऋग्वेद, १,१६४,१८)। मन ही प्राण का प्रेरक है। मन और प्राण के इस संबंध की व्याख्या गायत्री मंत्र को इष्ट है। सविता मन प्राणों के रूप में सब कर्मों का अधिष्ठाता है, यह सत्य प्रत्यक्षसिद्ध है। इसे ही गायत्री के तीसरे चरण में कहा गया है। ब्राह्मण ग्रंथों की व्याख्या है-कर्माणि धिय:, अर्थातृ जिसे हम धी या बुद्धि तत्त्व कहते हैं वह केवल मन के द्वारा होनेवाले विचार या कल्पना सविता नहीं किंतु उन विचारों का कर्मरूप में मूर्त होना है। यही उसकी चरितार्थता है। किंतु मन की इस कर्मक्षमशक्ति के लिए मन का सशक्त या बलिष्ठ होना आवश्यक है। उस मन का जो तेज कर्म की प्रेरण के लिए आवश्यक है वही वरेण्य भर्ग है। मन की शक्तियों का तो पारवार नहीं है। उनमें से जितना अंश मनुष्य अपने लिए सक्षम बना पाता है, वहीं उसके लिए उस तेज का वरणीय अंश है। अतएव सविता के भर्ग की प्रार्थना में विशेष ध्वनि यह भी है कि सविता या मन का जो दिव्य अंश है वह पार्थिव या भूतों के धरातल पर अवतीर्ण होकर पार्थिव शरीर में प्रकाशित हो। इस गायत्री मंत्र में अन्य किसी प्रकार की कामना नहीं पाई जाती। यहाँ एक मात्र अभिलाषा यही है कि मानव को ईश्वर की ओर से मन के रूप में जो दिव्य शक्ति प्राप्त हुई है उसके द्वारा वह उसी सविता का ज्ञान करे और कर्मों के द्वारा उसे इस जीवन में सार्थक करे।


अ, उ, म इन तीनों मात्राओं से ॐ का स्वरूप बना है। अ अग्नि, उ वायु और म आदित्य का प्रतीक है। यह विश्व प्रजापति की वाक् है। वाक् का अनंत विस्तार है किंतु यदि उसका एक संक्षिप्त नमूना लेकर सारे विश्व का स्वरूप बताना चाहें तो अ, उ, म या ॐ कहने से उस त्रिक का परिचय प्राप्त होगा जिसका स्फुट प्रतीक त्रिपदा गायत्री है।गायत्री के पूर्व में जो तीन व्याहृतियाँ हैं, वे भी सहेतुक हैं। भू पृथ्वीलोक, ऋग्वेद, अग्नि, पार्थिव जगत् और जाग्रत् अवस्था का सूचक है। भुव: अंतरिक्षलोक, यजुर्वेद, वायु देवता, प्राणात्मक जगत् और स्वप्नावस्था का सूचक है। स्व: द्युलोक, सामवेद, आदित्यदेवता, मनोमय जगत् और सुषुप्ति अवस्था का सूचक है। इस त्रिक के अन्य अनेक प्रतीक ब्राह्मण, उपनिषद् और पुराणों में कहे गए हैं, किंतु यदि त्रिक के विस्तार में व्याप्त निखिल विश्व को वाक् के अक्षरों के संक्षिप्त संकेत में समझना चाहें तो उसके लिए ही यह ॐ संक्षिप्त संकेत गायत्री के आरंभ में रखा गया है।


गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी कहा गया है । वेदों से लेकर धर्मशास्त्रों तक समस्त दिव्य ज्ञान गायत्री के बीजाक्षरों का ही विस्तार है । माँ गायत्री का आँचल पकड़ने वाला साधक कभी निराश नहीं हुआ । इस मंत्र के चौबीस अक्षर चौबीस शक्तियों-सिद्धियों के प्रतीक हैं । गायत्री उपासना करने वाले की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं, ऐसा ऋषिगणों का अभिमत है । गायत्री वेदमाता हैं एवं मानव मात्र का पाप नाश करने की शक्ति उनमें है । इससे अधिक पवित्र करने वाला और कोई मंत्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है । भौतिक लालसाओं से पीड़ित व्यक्ति के लिए भी और आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु के लिए भी एकमात्र आश्रय गायत्री ही है । गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु,कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गए हैं, जो विधिपूर्वक उपासना करने वाले हर साधक को निश्चित ही प्राप्त होते हैं । भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर प्राणी को नित्य-नियमित गायत्री उपासना करनी चाहिए । विधिपूर्वक की गयी उपासना साधक के चारों ओर एक रक्षा कवच का निर्माण करती है व विभिन्न विपत्तियों, आसन्न विभीषिकाओं से उसकी रक्षा करती है । प्रस्तुत समय संधिकाल का है । आगामी वर्षों में पूरे विश्व में तेजी से परिवर्तन होगा । इस विशिष्ट समय में की गयी गायत्री उपासना के प्रतिफल भी विशिष्ट होंगे । प्रत्यक्ष कामधेनु की तरह इसका हर कोई पयपान कर सकता है । जाति, मत, लिंग भेद से परे गायत्री सार्वजनीन है । सबके लिए उसकी साधना करने व लाभ उठाने का मार्ग खुला हुआ है । विविध धर्म-सम्प्रदायों में गायत्री महामंत्र का भाव हिन्दू - ईश्वर प्राणाधार, दुःखनाशक तथा सुख स्वरूप है । हम प्रेरक देव के उत्तम तेज का ध्यान करें । जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर बढ़ाने के लिए पवित्र प्रेरणा दें । यहूदी - हे जेहोवा (परमेश्वर) अपने धर्म के मार्ग में मेरा पथ-प्रदर्शन कर, मेरे आगे अपने सीधे मार्ग को दिखा । शिंतो - हे परमेश्वर, हमारे नेत्र भले ही अभद्र वस्तु देखें परन्तु हमारे हृदय में अभद्र भाव उत्पन्न न हों । हमारे कान चाहे अपवित्र बातें सुनें, तो भी हमारे में अभद्र बातों का अनुभव न हो । पारसी - वह परमगुरु (अहुरमज्द-परमेश्वर) अपने ऋत तथा सत्य के भंडार के कारण, राजा के समान महान् है । ईश्वर के नाम पर किये गये परोपकारों से मनुष्य प्रभु प्रेम का पात्र बनता है । दाओ (ताओ) - दाओ (ब्रह्म) चिन्तन तथा पकड़ से परे है । केवल उसी के अनुसार आचरण ही उ8ाम धर्म है । जैन - अर्हन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार तथा सब साधुओं को नमस्कार । बौद्ध धर्म - मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ, मैं धर्म की शरण में जाता हूँ, मैं संघ की शरण में जाता हूँ । कनफ्यूशस - दूसरों के प्रति वैसा व्यवहार न करो, जैसा कि तुम उनसे अपने प्रति नहीं चाहते । ईसाई - हे पिता, हमें परीक्षा में न डाल, परन्तु बुराई से बचा क्योंकि राज्य, पराक्रम तथा महिमा सदा तेरी ही है । इस्लाम - हे अल्लाह, हम तेरी ही वन्दना करते तथा तुझी से सहायता चाहते हैं । हमें सीधा मार्ग दिखा, उन लोगों का मार्ग, जो तेरे कृपापात्र बने, न कि उनका, जो तेरे कोपभाजन बने तथा पथभ्रष्ट हुए । सिख - ओंकार (ईश्वर) एक है । उसका नाम सत्य है । वह सृष्टिकर्ता, समर्थ पुरुष, निर्भय, र्निवैर, जन्मरहित तथा स्वयंभू है । वह गुरु की कृपा से जाना जाता है । बहाई - हे मेरे ईश्वर, मैं साक्षी देता हूँ कि तुझे पहचानने तथा तेरी ही पूजा करने के लिए तूने मुझे उत्पन्न किया है । तेरे अतिरिक्त अन्य कोई परमात्मा नहीं है । तू ही है भयानक संकटों से तारनहार तथा स्व निर्भर ।


ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्| हिन्दी में भावार्थ: उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें । वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे| अलग-अलग अर्थ:(1) ॐ = ब्रम्हा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का संयुक्त रूप से बोध कराने वाला संकेत; 1.भूर्भुवः स्वः = तीनों देवों के अलग-अलग वास स्थान का संकेत है; 2. भूः =(श्री ब्रम्हा जी का); 3. भुवः =(श्री विष्णु जी का); 4. स्वः =(श्री महेश जी का); 5. तत्सवितुर्वरेण्यं = सूर्य द्वारा वरणीय अथवा सूर्य का भी उपास्य देव रूप उस; 6. भर्गो देवस्य = तेजस्वरूप देव का; 7. धीमहि = ध्यान करता हूँ; 8. धियो = बुद्धि; यो = जिससे; नः = हमारी; (जिससे हमारी बुद्धि) 9. प्रचोदयात् = शुद्ध रहे या सत्कर्म के प्रति उत्प्रेरित रहे। अलग-अलग अर्थ:(2) 1. ॐ = भारतीय धर्म; 2. भूः = आत्म विश्वास; 3. भुवः = कर्मयोग; 4. स्वः = स्थिरता; 5. तत् = जीवन विज्ञान; सवितु=शक्ति संचय; वरेण्यं=श्रेष्ठता; 6. भर्गो=निर्मलता; देवस्य=दिव्य दृष्टि; 7. धीमहि = सदगुण; 8. धियो=विवेक; योनः=संयम; 9. प्रचोदयात्=सेवा।


Gayatri Mantra has its origin in the Sanskrit phrase Gayantam Triyate iti, and refers to that mantra which rescues the chanter from all adverse situations that may lead to mortality. The Gayatri mantra is one of the oldest and most powerful of Sanskrit mantras. It is believed that by chanting the Gayatri mantra and firmly establishing it in the mind, if you carry on your life and do the work that is ordained for you, your life will be full of happiness. Aum Bhuh Bhuvah Svah Tat Savitur Varenyam Bhargo Devasya Dheemahi Dhiyo Yo nah Prachodayat ~ The Rig Veda (10:16:3)

The Gayatri Mantra
Gayatri Mantra has its origin in the Sanskrit phrase Gayantam Triyate iti, and refers to that mantra which rescues the chanter from all adverse situations that may lead to mortality. The Gayatri mantra is one of the oldest and most powerful of Sanskrit mantras. It is believed that by chanting the Gayatri mantra and firmly establishing it in the mind, if you carry on your life and do the work that is ordained for you, your life will be full of happiness.
Aum
Bhuh Bhuvah Svah
Tat Savitur Varenyam
Bhargo Devasya Dheemahi
Dhiyo Yo nah Prachodayat

~ The Rig Veda (10:16:3)
The Meaning
"O thou existence Absolute, Creator of the three dimensions, we contemplate upon thy divine light. May He stimulate our intellect and bestow upon us true knowledge."
Or simply,
"O Divine mother, our hearts are filled with darkness. Please make this darkness distant from us and promote illumination within us."
Let us take each word of the Gayatri Mantra and try to understand its inherent meaning.
The First Word Om (Aum)
It is also called Pranav because its sound emanates from the Prana (vital vibration), which feels the Universe. The scripture says "Aum Iti Ek Akshara Brahman" (Aum that one syllable is Brahman).
When you pronounce AUM:
A - emerges from the throat, originating in the region of the navel
U - rolls over the tongue
M - ends on the lips
A - waking, U - dreaming, M - sleeping
It is the sum and substance of all the words that can emanate from the human throat. It is the primordial fundamental sound symbolic of the Universal Absolute.
The "Vyahrities": Bhuh, Bhuvah & Svah
The above three words of the Gayatri, which literally means "past," "present," and "future," are called Vyahrities. Vyahriti is that which gives knowledge of entire cosmos or "ahriti". Thus, by uttering these three words, the chanter contemplates the Glory of God that illumines the three worlds or the regions of experience.
The Remaining Words
• Tat simply means "that" because it defies description through speech or language, the "Ultimate Reality."
• Savitur means "Divine Sun" (the ultimate light of wisdom) not to be confused with the ordinary sun.
• Varenium means "adore"
• Bhargo means "illumination"
• Devasya means "Divine Grace"
• Dheemahi means "we contemplate"
• Dhi means intellect
• Yo means "who"
• Nah means "ours"
• Prachodayat means "requesting / urging / praying"
The last five words constitute the prayer for final liberation through the awakening of our true intelligence.
Finally, it needs to be mentioned that there are a number of meanings of the three main words of this mantra given in the scriptures:
Various meanings of the words used in the Gayatri Mantra


Bhuh: Earth,Past,Morning,Tamas, Gross
Bhuvah: Atmosphere, Present,Noon, Rajas, Subtle
Svah: Beyond Atmosphere, Future,Evening,Sattwa,Causa

Tuesday, September 3, 2013

Indian constitution's aim is Satyamev Jayatey then how we can forget Shri Ram and his ancesstor Satya Harishchand.


Can we forget 24 Gayatri Mantra's Rishis of Ashok Chakra having 24 facts and Symbol of time? Only these 24 Gayatri Mantra Approved Rishis are in the Sanatan Dharma. 24 Rishis also generated by 7 fundamental Rishis. 1st Vishwamitra and 24rth Yagyawalk| 24 facts are: 1. Love,2. Courage, 3. Patience, 4. Peacefulness, 5. Magnanimity, 6. Goodness, 7. Faithfulness, 8. Gentleness, 9. Selflessness, 10. Self-Control, 11. Self Sacrifice, 12. Truthfulness, 13. Righteousness, 14. Justice, 15. Mercy, 16. Gracefulness, 17. Humility, 18. Empathy, 19. Sympathy, 20.Spiritual Knowledge, 21. Moral Values, 22. Spiritual Wisdom, 23. The Fear of God, 24. Faith or Belief or Hope.


विवेकानंद=विवेक+आनंद=सच्चिदानंद=अखिलानंद: जबकि विवेक का मतलब है अंतर्मन (अंतरात्मा) का विवेचनात्मक निष्कर्ष जिसे आप सत्यचित कहते हैं) और आनंद का अर्थ आप जानते ही हैं (आनंद वह प्रसन्नता जो अंतर्मन तक जाय और किशी भी विकार से ग्रषित न हो और जिसमे किशी भी प्रकार का मद न हो| (यह निः-संदेह आमोद प्रमोद की श्रेणी से अलग है परिभाषानुसार)


फेसबुक पर प्रयागराज, काशी, अयोध्या और मथुरा के क्षेत्रों में मानवता की गरिमा आज तक किस तरह बनी हुयी है? इस राज को उजागिर करने के ही दूसरे दिन ही मै दुर्घटना ग्रस्त हुआ इसमे गलती सामाने वाले की ही सही और अस्थायी तौर पर आयी पैर में और मुझे बात समझ में आ गयी अपनी दुर्घटना से और इसे स्वयं फेसबुक नियामक तंत्र ने फेसबुक से स्वयं तीसरे दिन हटा दिया (आप को बता दूं यहाँ पर की मै 2006 से आज तक सच्चाई और यम-नियम की बातें लिखता रहा ऑरकुट, ब्लॉग और फेसबुक पर पर कुछ नहीं हुआ सब सकारात्मक ही रहा। पर क्या बात हुई इस सम्बन्ध में सत्य के माध्यम से राज बताने में?)। तो मित्रों समाज, रास्त्र या विश्व समाज के व्यापक हित में जो राज हो उन्हें समाज में व्यक्त करना कटु सत्य से भी बढ़कर प्रायश्चित और दुःख का कारन बन जाता है।*******जय हिन्द, जय भारत,जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।