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Sunday, October 27, 2013

श्रीराम और श्रीकृष्ण मिलकर श्रीराम ही बनायेंगे वे श्री राम-कृष्ण भले कहे जाय और यह बताता है की श्रीराम को अपना आदर्श श्री कृष्ण स्वयं क्यों मानते थे और उनके जीवन के शेष कर्मों को वे पूरा क्यों किये।>>>>>कृष्णमयी यमुना और राममयी गंगा मिलकर पुनः रामकृष्णमयी गंगा बनाती हैं यह है सरस्वती का प्रभाव और यही से तीन जन्म और कर्म के आधार पर धर्म (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) तथा जलवायु के आधार पर धर्म( हिन्दू और सम्मिलित , मुस्लिम और सम्मिलित और इसाई और सम्मिलित) धर्म बनते है जो पूरी दुनिया को चलाते हैं जिसमे मुस्लिम राममयी के सामानांतर और इसाई कृष्णमयी के सामानांतर चलते है। केवल अन्तर है सनातन हिन्दू धर्म में और अन्य धर्म में की वे गाय, गंगा और गायत्री के प्रति कैसा आचरण और आस्था रखते हैं। यह है प्रयाग का प्रभाव और सनातन हिन्दू धर्म का प्रवाह जो सबको सामान ऊर्जा देता है। अतः मई विशेष निवेदन करूंगा की जब जमुना और गंगा मिलकर गंगा ही बनाती हैं तो श्रीराम और श्रीकृष्ण मिलकर श्रीराम ही बनायेंगे वे श्री राम-कृष्ण भले कहे जाय और यह बताता है की श्रीराम को अपना आदर्श श्री कृष्ण स्वयं क्यों मानते थे और उनके जीवन के शेष कर्मों को वे पूरा क्यों किये। आप किशी आतंकवादी घटना का अपने श्रेष्ठ चरित्र से सामना कीजिये और देखिये जिस दिन आप दूसरों के प्रभाव में अपने चरित्र का स्वयं हनन नहीं करेंगे कोई आतंकवाद आप के सामने नहीं टिक सकता है।


When a person goes away from his native he seeks energy for life from every thing of his native i.e. living and non living, enemy and friend; and Physical Handicapped, MAD or in COMA, pet and independent animal and land.


धर्म की राजनीती करने वालों और आध्यात्मिक नेताओं के लिए भी कुछ गूढ़ रहस्य छोड़ देने चाहिए राजनेताओं को क्योंकि इस संसार को चलाने के लिए राजनेताओं की तरह वे भी एक से दूसरे धर्म के धार्मिक राजनीतज्ञों और आध्यात्मिक व्यक्तियों के संपर्क में रहते हैं तथा सामाजिक और भौगोलिक परिवेश को वे भी देखते रहते हैं।


मै फिर कहता हूँ सभी देवी और देवताओं से की कि चरित्रहीनता के दल-दल में आत्म ह्त्या करने से अच्छा है की आतंक के अस्त्र का सामना करें या सामना करते हुए मरें हम।


दुनिया अंदाज लगाए की विश्व की सर्वोच्च शक्ति भारत है या कोई और? मकरध्वज के पिता थे हनुमान और वे प्रयाग में थे। पिता बड़ा होता है या पुत्र? इशारों को अगर समझो तो राज रहने दो का जबाब यही था की अभी भी वक्त है सुधर जाओ और कभी कश्यप ऋषि के अनुरोध को नजर अंदाज नहीं करना नहीं तो स्थिति दुर्वाशा या महाविनाशक और महाशिव भगवान् भोले नटराज शिव संभालेंगे। जिसे दुनिया केवल 9 और 11 समझी वह तो 9-9 और 11-11 था और प्रयाग में दुनिया की धुरी संभाल रहा था।


सतयुग में ऋषियों की गाय का शूर्यवंशीय ग्वाला जो शिवांश राजा केदार का वध किया था तंग आकर जब वे बाद में जालन्धर की तरह शिव शक्ति में मद माते होकर दुराचार में लिप्त हो गए थे तो वह भी हनुमान की तरह शिवांश और माताओं बहनों और समाज की इज्जत-आबरू का रक्षक रहा होगा। मित्रों प्रभु (विष्णु: श्री राम या श्री कृष्ण कोई भी हो सकता है) प्रताप जेही कालहिं खाई ऐसा है हनुमान(=महावीर=बजरंगबली=अम्बवादेकर=अम्बेडकर=पीर बाबा=मंगलवारीय बाबा) के चरित्र का चित्रण जो अन्याय और अत्याचार तभी तक बर्दास्त करते हैं जब तक की श्री राम और श्री कृष्ण उनको विरोध करने से रोक रहे हों। पर आज बहुत से हनुमान, महावीर, बजरंगबली, अम्बवादेकर, अम्बेडकर, पीर बाबा और मंगलवारीय बाबा है जो सीता, पारवती, लक्ष्मी, सरस्वती और रुकमनी को ही चरित्र हीनता के दल दल में धकेले जा रहे हैं अपने तुछ्यस्वार्थ के लिए आम नारियों और स्त्रियों की बात तो दूर है।>>>>> मै फिर कहता हूँ सभी देवी और देवताओं से की कि चरित्रहीनता के दल-दल में आत्म ह्त्या करने से अच्छा है की आतंक के अस्त्र का सामना करें या सामना करते हुए मरें हम।


Friday, October 25, 2013

गोत्रों के श्रेस्ठता कि श्रेणी गौतम, वशिस्ठ, कश्यप, अंगारिसा/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/दुर्वासा और विश्वामित्र/कौशिक है।


और जिनके दिमाग में एन्टी-सवर्ण या एन्टी-ब्राह्मण का भूत सवार रहता है उनको मै बता देना चाहता हूँ कि जितने भी युग हुए हैं उनमे लडकिया ब्रह्मा के पुत्र राजा दक्ष कि ही पुत्री रही हैं चाहे वह राजा दक्षप्रजापति रहे हों या या अन्य कोई राजा दक्ष। तो मेरे मित्र ब्रह्मा के ये पुत्र राजा दक्ष कि पुत्रिया ब्राह्मण ही रही है और आप को यह भी पता होगा कि बिना स्त्री के या पत्नी के या प्रकृति के कोई श्रीस्ती नहीं चलती है तो कम से कम सबकी माँ इन्ही ब्राह्मण लड़कियों कि पुत्री होंगी। राजा दक्षा प्रजापति की विख्यात पुत्रियों कि जोड़ी सती (पारवती:महादेव शिव) और अदिति (कश्यप) जग जाहित्र है। और दक्ष कि अन्य सभी पुत्रियों से भी कश्यप ऋषि कि शादी हुई और उनकी जो पुत्रिया हुई उनसे अन्य ऋषियों कि शादी हुई। और इस प्रकार ऋषि परम्परा से मानव सभ्यता कि जब सुरु आत हो गयी तो इन्ही ऋषि संतानों से सृस्टि का विकाश हुआ।अतः आप अपने अभियान को किशी के एंटी नहीं वरन अपने संवर्धन के लिए चलाइये और आप सायद संवर्धन का मतलब समझते होंगे जैसा कि इसमे सामाजिक सौहार्द्र सहित अपना विकाश निहित है।


अयोध्या में भगवान् श्रीराम के राजदरवार में लव और कुश का पिता का और सीता को पति का अधिकार माँगने पहुचे बाल्मीकि स्वयं सबसे पहले ऋषि वशिस्ठ को प्रणाम करते हैं जो बताता है कि कश्यप गोत्रियों के लिए वशिस्ठ गोत्रीय कितने श्रद्धेय हैं? तब आप समझा सकते हैं कि गौतम इनके लिए कितने श्रध्धा और विश्व के पात्र हैं। और इसी लिए गोत्रों के श्रेस्ठता कि श्रेणी गौतम, वशिस्ठ, कश्यप, अंगारिसा/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/दुर्वासा और विश्वामित्र/कौशिक है।


वरुण के पिता कश्यप; बाल्मीकि और भृगु के पिता वरुण; भारद्वाज के गुरु बाल्मीकि; और गर्ग के गुरु भारद्वाज तो मित्रों श्रेस्ठ कौन भरद्वाज और गर्ग या कश्यप। यह गोपनीय जानकारी मैंने सार्वजनिक इस लिए की कि गर्ग और भारद्वाज स्वयं उस कश्यप को कम करके आंक रहे थे जो सभी सामजिक रूप से अलग-थलग और बहिस्कृत को पुनः सनातन हिन्दू धर्म में शरण देने के कारन मिश्रित गोत्र कि संज्ञा पा गया है। यह सामाजिक ढांचा ऐसे ही चलता है कि किशी का पतन होता है तो अच्छे कर्म से उसका उन्नयन भी होता है कश्यम गोत्र कि प्रथम सीढ़ी से अन्य गोत्र में।


देवताओं के गुरु (ब्रहस्पति देव) के गुरु भाई शुक्राचार्य (जिनके शिष्य दैत्य थे) के पास भी ज्ञान और विज्ञान कम नहीं परन्तु दैत्य हर युध्ध में पराजित हुए| अतः ज्ञान और विज्ञान का समाज में किस प्रकार प्रयोग हो रहा है यह निर्धारित कर ज्ञान और विज्ञान का सदुपयों सुनिश्चित किया जाय तो यह ज्ञान और विज्ञान के विकाश को और अधिक महत्व प्रदान करेगा तुलनात्मक रूप से कि ज्ञान और विज्ञान के विकाश की होड़ में हम मानवता ही खो दें| ऐसा करने से व्यक्ति विशेष के जीवन और सम्पूर्ण समाज के जीवन में और अधिक आनंद का संचार होगा|


एक तो मानव बनकर जीना कठिन है उससे भी कठिन है सम्मान सहित जीना उससे भी कठिन है एक सज्जन व्यक्ति बनकर जीना और सबसे कठिन है ब्राह्मण बनकर जीना| अतः जो ब्राह्मण बनकर न जी सका ब्रह्मण कुल में जन्म होते होते हुए भी तो निश्चित रूप से यह उस व्यक्ति की किशी दुर्बलता का परिचायक है उसे हम महान नहीं कह सकते और न तो वह व्यक्ति समाज लिए अनुकरणीय होगा। श्रेष्ठ वह व्यक्ति है जो इस सामाजिक उथल पुथल के बावजूद ब्राह्मण बनकर एक सम्मान जनक स्थिति में जीन की जिद्दोजहद बनैय हुए है और इसके लिए कोई बड़ा से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार है। ब्राह्मण कुल में जन्मे व्यक्ति के अलावा भी जो व्यक्ति ब्रह्मण जैसे चरित्र का निर्वहन कर रहे हैं वह भी तपस्या (वैश्य), बलिदान (क्षत्रिय) की श्रेणी से ऊपर उठाकर त्याग की श्रेणी में आ चुके हैं और उनके इस त्याग की परिक्षा उनके जीवन में अवस्य होगी है और उन्हें भी एक दिन मानवता की रक्षा या स्थापना हेतु ब्रह्मास्त्र बनाना पडेगा जो विश्व का सर्वोत्तम अस्त्र है" ।-


मेरे विचार से भारतीय जलवायु के अनुसार माता-पिता तथा भारत सरकार ऐसी परिस्थिति पैदा करें की स्नातकोत्तर होने के कुछ समय आगे और पीछे ही जो लोग शादी-शुदा जीवन यापन करना चाहते है उनकी शादी कर दी जाय इससे समाज पर बहुत अच्छा असर पडेगा। एक आम भारतीय नागरिक को भोले शिव और पारवती तथा श्री राम और सीता का अनुशरण करना चाहिए और वैसे भी सावन के पांच सोमवार और तेरस और शिव रात्रि को विशेष स्थान दिया जाता है भारत में शिव और पारवती जैसा प्रेम और दांपत्य जीवन पाने के लिए। यहाँ तक की योग्य और पुरुषार्थी वर पाने के लिए भी शिव भक्ति स्त्रियाँ करती है। कृष्ण की राह जहां-जहां सरल है वही लोग अनुसरण करते हैं और जहां कांटे दार राह है वहां से दूर जाते हैं जिसमे बचपन से जीवन में संकट और माता-पिता की दयनीय दशा भी सामिल है और माता-पिता के कस्ट दूर करने के लिए अभीस्त नन्द, यशोदा और राधा तथा अन्य गोपिकाओं के प्रेम का त्याग (पर आतंरिक रूप से नहीं त्यागा था किशी को भी) । पर दूर होने से आप बच नहीं सकते सच्चाई से। अतः भारतीय जलवायु और परिवेश में रहने वाले आम आदमी का जीवन तभी आदर्श होगा जब वह जीवन में भोले शिव और पारवती का तथा श्री राम और सीता को अपना आदर्श मानकर वैवाहिक अवस्था तक ब्रह्मचर्य का पालन करे न की इससे पूर्व ब्रह्मचर्य भंग कर दांपत्य जीवन में प्रवेश करे।


Thursday, October 24, 2013

कान्हां कही कही ग्वाल नचावत, हसत सबै मुस्कात। गोर नन्द जशोदा गोरी, तुम कट श्यामल गात। ---------इसी श्री कृष्ण जन्मास्टमी को उसी नक्षत्र और उसी राशि में जन्म लिए मेरे सुपुत्र कृष्णकान्त भी घनश्याम या श्यामल गात हैं| जाहिर सी बात है की मेरा कथन गवाल बालों के कथन से एकदम मिलता है।


श्री कृष्ण की 16108 रानियों में से 8 पटरानियाँ जन्म से ही केवक और केवल श्री कृष्ण को अपना पति मान ली थीं और शेष 16100 को बाद में नारद ने श्री कृष्ण से संबध्ध कराया। द्वारिका बसने के बाद बलराम कि तो शादी हो गयी पर राधा और गोपियों के प्रकरण के कारन श्री कृष्ण कि शादी नहीं हो रही थी तो भगवान् श्री कृष्ण को उपाय सुझाने के लिए कहा तो नारद ने सबसे कृष्ण के पास सन्देश भेजवाया और इस प्रकार कृष्ण 16108 नारियों के स्वामी बन गए। ध्यान देने योग्य बार यह है कि रुक्मणि के पुत्र प्रद्दुम्न को भी लोग कहते हैं कि श्री कृष्ण के भौतिक सम्बन्ध के पुत्र नहीं है जबकी कृष्ण के कई हजार पुत्र हुए है जो प्रमाण है कि विज्ञान उस समय भी कितना आगे था और इस प्रकार उनको अखंड ब्रह्मचर्य होने कि पदवी दी जाती है और यही है उनका वास्तविक इंद्रिय नियंत्रण जो रास लीला के बाद भी ब्रह्मचर्य रहे। अतः आम आदमी को रास लीला वाला कृष्ण बनाने से पहले कृष्ण जैसा दिव्या शक्तिवाला और इन्द्रियजित होना चाहिए।


कोई कितना भी बड़ा द्रविण (मतलब पुरुषार्थी और धन तथा संसाधन सम्पन्न) क्यों न हो यदि चरित्रहीन हो गया तो आर्य कहाँ रह गया वरन वह तो चरित्रहीन हो कर मृतप्राय हो गया और इसे सिध्ध करने कि जरूरत नहीं है अपितु इसे भगवान् श्रीराम ने ही सिध्ध कर दिया है रावण का दमन करके। एक आर्य का चरित्रवान और प्रगतिशील सच्चाई को पोषक होना अनिवार्य गुण है। आप प्रगतिशील सच्चाई को "सत्यम शिवम् सुंदरम" भी कह सकते हैं।


इक्शाकू वंश/रघुवंश/शूर्यवंश/कश्यप गोत्रीय के अनुसार चरित्रहीनता के दल-दल में आत्महत्या करने से अच्छा है आतंकवाद के अस्त्र से मर जाना।


परिवार का व्यक्तिगत संस्कार, समाज की सभ्यता और रास्ट्र की संस्कृति अमूल्य है और दस-बीस क्या सौ वर्षों में भी केवल थोड़ा सा ही परिवर्तन होता है। और यह सनातन हिन्दुओं की शक्ति का संबल है जिसने हजारों आक्रान्ताओं को झेला है, सहृदय सामना किया है, आज भी अनंत आकाश की तरह लोगों को हर्षाने वाला है और पति पावनी गंगा की तरह पवित्र है।


क्या संस्कार, सभ्यता और संस्कृति का मूल्य का क्रय-विक्रय कोई सर्वोच्च विश्व शक्ति कर सकती है? हमारी हिन्दू संस्कृति ही है जो हिन्द शब्द आज भी भारत सँजोए रखे है और जय भारत से पहले जय हिन्द कहता है जबकी हिन्द की सरहद इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी तक होती है और इसमे जो रास्त्र बने उनमे से कोई आज जय हिन्द का उद्घोस नहीं करता है। यह है हम जो यह कहते हैं की हारा तो चला जाता है पर हरा मतलब जबरदस्ती छीना गया कभी भी नहीं जाता मतलब कभी भी वापस आ सकता है। तो मित्रों बोलो क्या हम इसके लिए तैयार है? अगर भौगोलिक तौर पर नहीं तो कम से कम अपनी संस्कृति को इस जय हिन्द (जम्बू द्वीप: इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी है: यह जम्बू द्वीप का सम्पूर्ण भाग ही अखंड हिन्द है) की सीमा के छोर तक पहुंचा दो।>>>परिवार व्यक्तिगत संस्कार, समाज की सभ्यता और रास्ट्र की संस्कृति अमूल्य है और दस-बीस क्या सौ वर्षों में भी केवल थोड़ा सा ही परिवर्तन होता है। और यह सनातन हिन्दुओं की शक्ति का संबल है जिसने हजारों आक्रान्ताओं को झेला है, सहृदय सामना किया है, आज भी अनंत आकाश की तरह लोगों को हर्षाने वाला है और पति पावनी गंगा की तरह पवित्र है।


Tuesday, October 22, 2013

सनातन हिन्दू धर्म और अन्य धर्म में केवल आधारभूत अंतर है और वह यह है की आप सनातन धर्म, गाय और गायत्री मंत्र में आस्था और विश्वास रखते हैं की नहीं? लेकिन यह बहुत शूक्ष्म अंतर नहीं है अपितु इसमे समर्पण, भक्ति, ज्ञान, व्रत और त्याग के साथ-साथ बलिदान और तप भी आवश्यकता निहित है। गायत्री मंत्र परम तेजस्वी ऊर्जा के परम श्रोत परमब्रह्म परमेश्वर से अपने जीवन और जीवन के लिए संघर्ष के लिए अपने अन्दर निहित शक्तियों के लिए आभार व्याक्त करना है और प्रार्थना करना है जो परमब्रह्म इस ब्रह्माण्ड के पुरुष और प्रकृति दोनों को बनाया भी है और चलाता भी है। उससे अपने जीवन के लिए शक्ति मांगना भी है। गाय के साथ किसका किश प्रकार का आचरण रहा है और गाय जी जीवन की शक्ति दाता है इसी पर आधारित हो सनातन काल से गोत्र की कल्पना है जो आज भी चल रही है और जिसमे गौतम गोत्र सर्वोच्च है आज के सन्दर्भ में भी। और पतित पावनी-सुचित-पवित्रता में गंगा का उदहारण सम्पूर्ण मनवा के चरित्र के बारे में आज भी दिया जाता है। अतः जहां हिन्द (जम्बू द्वीप=इरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्या कुमारी तक की भूमि हिन्द है न की केवल वर्तमान भारत या अखंड भारत ही) शब्द आज भी जीवित है उसी देश में गाय, गंगा, गायत्री और सनातन संस्कृति में श्रध्धा और विश्वाश भारत वंशियों को गौरव प्रदान करता है न की केवल सनातन हिन्दू धर्म के पालकों को ही।


There is only basic difference between Eternal (Sanatan) Hindu Religion and other religion that whether you have faith in Eternal (Sanatan) Religion, Gaaya (Cow), Gangaa (Ganges) and Gayatriy Mantra? But this is not a too little difference.>>>>Gayatri Mantra is prayer of highest luminous and highest energy source Parambrahm GOD who created the universe and also govern this Universe. And let this great Parambrahm God give us some of his energy to survive of life in this world. Behavior with cow and cow itself is the fact of origin of Gotra System in Hindu culture which of base of life too in ancient days. Purest and holy Ganges is the example for all in purification of Character.


Friday, October 18, 2013

सूर्य या अग्नि को शाक्षी मानकर पाँच बार गायत्री मंत्र का गंगा जल या अन्य जल के साथ आचमन करते हुए पाठ करने से सनातन हिन्दू धर्म, गाय, गंगा और गायत्री में श्रध्धा रखने वाले किशी धर्म या जाती के व्यक्ति का हिन्दू धर्म में प्रवेश हो जाता है।


अब सायद यह भी लोग जान गए होंगे की कैसे बाल्मीकि आदि कवी {प्रयाग की पवन भूमि के टोन्स नदी का किनारा और बाल्मीकि का स्नान प्रसंग(बहेलिये का मैथुन करते हुए पक्षी पर तीर चलाना और उसके विरोध में बाल्मीकि की संस्कृत में प्रथम कविता )}और रामायण आदि महाकाव्य है। और यह भी की सीता, लव और कुश के गुरुदेव और आश्रय दाता स्वयं भारद्वाज के गुरु महर्षि बाल्मीकी ही थे।


बाल्मीकि कश्यप ऋषि के पुत्र वरुण के पुत्र थे यह जान लेने के बाद किशी को संसय नहीं होगा की बाल्मीकी स्वयं गर्ग ऋषि के गुरु भारद्वाज के गुरु थे। इसीलिये जहाँ तुलसी दास भक्ति भाव से रामचरितमानस की रचना किये हैं वही महर्षि बाल्मीकी समभात्री भाव से रामायण की रचना किये हैं। और अयोध्या की भरी सभा में स्वयं यही बाल्मीकि श्रीराम के सीता की एक और अग्नि परिक्षा के निर्णय का विरोध भी किये थे और उनके निर्णय को वापस लेने के विनय को स्वीकार न करने के परिणाम स्वरुप सीता पृथ्वी की गोंद में समाहित हो गईं।


Thursday, October 17, 2013

भागवत=भ+ग+व+त: भागवत वह है जिससे भक्ति, ज्ञान, व्रत और त्याग का आचरण उत्पन्न हो। और जो भागवत है वही वैष्णव है।


उपनाम बाल्मीकी लिखते हैं: पुरानों के अनुसार कश्यप उनकी पत्नी अदिति के नौवे पुत्र "वरुण" के पुत्र थे बाल्मीकी और भृगु ऋषि। वन में बहुत वर्षों तक इस्वर की तपस्या में लीं हो जाने से उनके शरीर पर दीमक लग गए थे और दीमक के घर को बाल्मीकी कहते हैं अतः उसी के नाम पर इनका नाम बाल्मीकी पड़ा। वनवासी लोग उनके सम्मान में अपना उपनाम बाल्मीकी लिखते हैं और उनको अपना आदर्श मानते हैं।


That is why each TRIDEV have 1/3 power of total power of Parambrahma. It means Brahma, Vishnu and Mahesh have equal importance. Brahm Gyan, Shiv Shakti and Vishnu Bhakti have no alternative.


आपूर्ति (भरण- पोषण) और शिक्षण-प्रशिक्षण बंद कर हो जाने पर सुरक्षा का काम अधिक दिनों तक जारी रहेगा क्या?


आपूर्ति (भरण- पोषण) और सुरक्षा बंद हो जाने पर कोई शिक्षण-प्रशिक्षण और अनुसंधान अधिक दिनों तक जारी रह पायेगा क्या?


शिक्षण-प्रशिक्षण और सुरक्षा बंद हो जाने पर कोई उद्दयम (आपूर्ति, भरण-पोषण,व्यवसाय और उद्योग) अधिक दिनों तक जारी रह सकता है क्या?


Tuesday, October 15, 2013

सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (संसार के सबसे बड़े पूज्य उअर पवित्र श्री राम जन्म लिए हों)/श्री रघुवीर परायनहि (कराघुवीर का सबसे प्रिय) जेहिं नर उपज विनीत। धन्य सो देश जंह सुरसरी (गंगा) बहई। धन्य सो नारी(पत्नी) पतिब्रत अनुसरहीं। धन्य सो भूप (राजा) निति(न्याय) जो करइ। धन्य सो द्विज(ब्राह्मण) निज धर्म न टरई(अपना धर्म किशी कीमत पर न छोड़े)।। सो धन धन्य प्रथम गति (समाज के परोपकार और उद्धार के कार्य में लगाया जाय) जाकी। धन्य पुन्यरत(उत्थान और प्रगति के कार्य में) मति (ज्ञान) सोई पाकी॥ धन्य जन्म द्विज भागती अभंगा (इस्वर में अटूट भक्ति और आस्था)। धन्य घरी (समय) सोई जब सतसंगा।


ब्राह्मणों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने पर ही परशुराम ने कश्यप ऋषि को सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन कश्यप ऋषि को दे दिया जिसे उन्होंने क्षत्रिय राजाओं से जीता था। अतः कश्यप पुत्रों: श्री राम और श्री कृष्ण का उत्तर दायित्व है की ब्राह्मणों की यथा संभव रक्षा करें। रावन जैसे ब्राह्मण की बात नहीं हो रही है जिनका विनाश ही उचित है। परशुराम को पुनः ब्राह्मणों की रक्षा के लिए समाज में न उतरना पड़े मतलब ब्राह्मण अपने सुरक्षा में स्वयं न लग जायं अपने उत्तर दायित्व को छोड़कर।


अगर सप्तर्षि पुत्र हम तो ब्रह्मा, महेश और विष्णु:त्रिदेव पुत्र हम और तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य क्यों नहीं हम? विश्व भ्रमण करने वाले बताएं की वैष्णव ब्राह्मण तथा अन्य हिन्दू भारत और विशेषकर उत्तर भारत में ही अधिक नहीं पाए जायेंगे तो और कहाँ अधिक पाए जायेंगे जलवायु और खान-पान को ध्यान में रखते हुए?


कम से कम कश्यप गोत्रीय के लिए गौतम और वशिस्ठ गोत्रीय क्रमशः श्रध्धेय और आदरनीय सनातन थे, हैं और इस श्रीसती के अंत तक और उसके बाद भी रहेंगे। साथ ही अन्य गोत्रीय सम-सम्माननीय बने रहेंगे।


जो कश्यप गोत्र भूले विछुड़े और किशी भी समाज , जाती या धर्म से बहिस्कृत को पुनः सनातन हिन्दू धर्म में शरण देता है वह भी सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय नियमों का सबसे कड़ाई से पालन करवाता है। सूर्य या अग्नि को शाक्षी मानकर पाँच बार गायत्री मंत्र का गंगा जल या अन्य जल के साथ आचमन करते हुए पाठ करने से सनातन हिन्दू धर्म, गाय, गंगा और गायत्री में श्रध्धा रखने वाले किशी धर्म या जाती के व्यक्ति का हिन्दू धर्म में प्रवेश हो जाता है।


Monday, October 14, 2013

SURYA ya AGNI ke shakshy me 5 bar GAYATRI mantra ka Ganga jal ya jal ke achaman ke sath paath Sanatan Hindu Dharm, Gaaya, Ganga aur Gayatri me shradhdha rakhane vale kishi jati aur dharm ke vyakti ko Hindu dharm me pravesh de deta hai.


RAVAN: IF CHARACTER IS GONE EVERY THING IS GONE. If health is gone something is gone. If wealth is gone nothing is gone.>>>Happy Dashahara to you friends.


If constitution breaks Hindu classical rule then using benifites of gaps in constitution this damage automatically repaired. Social welfare: Because constitution is for the people and by the people.


Brahmin, Kshatriya and Vaishya intra(best way) and inter marriage are classically defined. Other case only after when both accept to be Brahmin,Kshatriya and Vaishya socially and constitutionally.


Vishv ka bhraman=daura karane vale batayen ki Vaishnav Brahman aur anya Vaishnav Hindu Bharat visheskar Uttar Bharat me he adhik nahi to aur kahan adhik paye jayenge?


Saptarshi putra ham to Brahma, Mahesh, Vishnu:TRIDEV putra ham to Brahman,Kshatriy, Vaishya kyo nahi ham?


Brahmano ke suraksha ki jimmedari par Kashyap rishi ko sampurn prithvi ka shasan Parashuram diye the. Atah Kashyap putron:SHRI RAM aur SHRI KRISHN ki jimmedari hai Brahmano ki raksha karana. Ravan jaise brahman ki baat nahee ho rahi jinaka vinash hi uchit hai. Parashuram ko punah samaj me Brahmano ki raksha me n aanaa pade.


Before reaching Sun and Mars first decide the social and environmental fate of the Earth.


If our friendship affected glory of our friend in his society for long duration in future then we should quit our friendship and join for new and this is a best friendship. Not only help in need but forever sacrifice to each and every thing related with ones life is original signature of friendship.


Dhanya so desh Surasari(=GANGA) jah bahai| Dhanya so Nari(=Patni) Patibrat anusarahi| Dhanya so Bhoop(=RAJA) niti(nyay) jo karai|Dhany so Dwij(=Brahman) nij dharm n tarai(apana dharm n chhode)/So dhan dhanya prathm gati (pratham gati=samaj paropkar v uddhar ke kary) jakee/Dhanya punya rat (punya rat=utthan v pragati ke karya) mati(=gyan) soi pakee// Dhanya janm Dwij (Brahmin) Bhagati Abhanga(Isvar me atoot bhakti)\Dhanya ghari(samay) soi jab satsanga(sajjanon ki sangati)/All the previous posts are the statement of Lord Shiva with goddess Parwati.*******So kul dhanya Uma sunu jagat pujya supuneet(Sansar ke sabase pujya pavan Shri Ram janm liye hon)/Shri Raghuveer parayanahi(ka sabase priya) jehi nar upaj vineet/


Tuesday, October 8, 2013

श्री राम नवमी, विजय दशमी और श्रीकृष्ण जन्मास्टमी केवल हिन्दूओं के ही नहीं वरन सम्पूर्ण भारतीय जनमानस के शीर्ष पर्व हैं।


जब आदर्श आत्मघाती हो जाए तो "सत्यम शिवम् सुन्दरम" न अपना कर "सत्यमेव जयते" ही अपनाया जाता है जैसा की न्यायालय में न्याय का आदर्श और सेना में वीरता का आदर्श वाक्य "सत्यमेव जयते" ही होता है लेकिन सुधारने का मौक़ा दिए विना दंड नहीं दिया जाता मतलब साफ है सभ्य समाज "सत्यम शिवम् सुन्दरम" के आदर्श को अपनाते हुए सामाजिक सामजस्य के लिए समझौता कर लेता है पर सम्पूर्ण हकीकत तो "सत्यमेव जयते" के आदर्श को अपनाने से आती है| अतः मेरे विचार से आप का पक्ष "सत्यमेव जयते" वाले ही अपनाएंगे तो आप के विचारों का हम सम्मान करते है"सत्यम शिवम् सुन्दरम" के आदर्श वाला होते हुए|


अपने अस्तित्व को बिना मिटाए हुए दूसरों के अस्तित्व को स्वीकार करना और सम्मान करना सामर्थ्शाली-पुरुसार्थी व्यक्तित्व का प्रथम लक्षण है और यही अहिंसा का सबसे प्रमुख उपदेश है| यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युथानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् | परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च: दुष्कृताम, धर्मं संस्थापनार्थाय सम्भावामी युगे युगे || अपने अस्तित्व को बिना मिटाए हुए दूसरों के अस्तित्व को स्वीकार करना और सम्मान करना सामर्थ्शाली-पुरुसार्थी व्यक्तित्व का प्रथम लक्षण है और यही अहिंसा का सबसे प्रमुख उपदेश है| ---------हम सत्यम शिवम् सुन्दरम के भी पुजारी हैं अतः तिरंगे में चार रंग ( अशोक चक्र नीला और केंद्र बिंदु पर अति सीमित स्थान पर है सफेद रंग के साथ) होने के बावजूद हम उसे तिरंगा ही कहते हैं|


This is very benificial to understant role of Sanatan Hindu Dharm in Baudh Dharm apart from Gautam Gotriy Kshatriya Kuvar Siddharth Gautam : There is nothing non-religious in Dr. Bheem RAO RAMJI Ambedakar, and his family names according Hindu Religion. Also Ambedakar Nagar District as a ex-part of Faizabad (Ayodhya) indicates that Ambedakar=Hanuman has got his place in his Lord's home Town in 1995. Bheem=Brother of Pandava (indirect son of Pavandev), Rao, Ramji=Maryada Purushottam Bhagvaan Ram, and Ambvaadekar=Ambedakar=Hanuman according my view and also Ramaa=Lakshami, Sarada=Saraswati and Savitaa=Wife of Sun or Glory of Sun. How Baudhisth and Shikhas and Jainism denie his relation with Sanatan Hindu Dharam in presence of embodied Shri Ram and Shri Krishna with Hanuman in this Universe and also I remind the fact that the Islam is parallel to Shriramism and Christianity is parallel to Shrikrishnaims. This is glori of the Sanatan Hindu Dharma.


विश्व के हर संविधान में लिखा है जब किशी मामले का निवारण संबिधान में वर्णित नियम से न हो तो न्यायाधीश को अपने "विवेक" से काम लेना चाहिए तो मेरे जैसा विवेक यह कहता है कि तथाकथित विश्व शक्ति कोई भी हो पर असली विश्व शक्ति यह हिंद भूमि का "अखंड भारत" है क्योंकि यह विश्व मानवता का निर्यातक देश है श्रीस्ति के प्रारंभ से ही| -


आदि शक्ति दुर्गा अपने में ही पारवती, लक्ष्मी और सरस्वती की सम्मिलित शक्ति हैं। अतः इनकी उपासना से इन तीनों शीर्ष देवियों की उपासना पूर्ण हो जाती है। ॐ ऐं हीं क्ली चामुण्डाय विच्चे। ॐ ऐं हीं दुम दुर्गाय नमः।


अगर रावण की लंका श्री राम के भक्त विभीषण के हाँथ में जाने पर भी संस्कार, धार्मिक गहनता और दर्शन में प्रयाग(काशी), अयोध्या और मथुरा की समानता नहीं पा सका तो अहिरावन का पाताललोक (वर्तमान विश्व का तथा कथित सर्व शक्तिशाली रास्त्र) हनुमान के पुत्र मकरद्ध्वज के हाँथ में जाकर भी कैसे संस्कार, धार्मिक गहनता और दर्शन में प्रयाग(काशी), अयोध्या और मथुरा की समानता पा सकता है।*******जय हिन्द, जय भारत, जय श्री राम, जय श्री कृष्ण।


शिव के आराध्य विष्णु और विष्णु के आराध्य शिव हैं। अतः विष्णु अवतारी श्री राम और श्री कृष्ण भी शिव के आराध्य और स्वयं शिव श्री राम और श्री कृष्ण के आराध्य। पर ब्रह्मा केवल विष्णु को आराध्य मानते हैं न की शिव को भी और यह भी सत्य है की ब्रह्मा किशी के आराध्य नहीं हैं।क्यों की ब्रह्मा पूजा की चाहत नहीं रखने वाले हैं वरन सम्मान चाहिए उनको और यही उनका सम्मान है की की यह सृस्ती अपनी ही रची है जो चल रही है अनवरत रूप से।


अर्थात : देवता बोले- देवी को नमस्कार है, महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार है। प्रकृति एवं भद्रा को प्रणाम है। हमलोग नियमपूर्वक जगदम्बा को नमस्कार करते हैं। रौद्रा को नमस्कार है। नित्या, गौरी एवं धात्री को बारम्बार नमस्कार है। ज्योत्स्नामयी, चन्द्ररूपिणी एवं सुखस्वरूपा देवी को सतत प्रणाम है। शरणागतों का कल्याण करने वाली वृद्धि एवं सिद्धिरूपा देवी को हम बारम्बार नमस्कार करते हैं। नैर्ऋती (राक्षसों की लक्ष्मी), राजाओं की लक्ष्मी तथा शर्वाणी (शिवपत्‍‌नी) स्वरूपा आप जगदम्बा को बार-बार नमस्कार है। दुर्गा, दुर्गपारा (दुर्गम संकट से पर उतारने वाली), सारा (सबकी सारभूता), सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा और धूम्रादेवी को सर्वदा नमस्कार है। अत्यन्त सौम्य तथा अत्यन्त रौद्ररूपा देवी को हम नमस्कार करते हैं, उन्हें हमारा बारम्बार प्रणाम है। जगत् की आधारभूता कृति देवी को बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में विष्णुमाया के नाम से कही जाती है, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में बुद्धिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में निद्रारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में क्षुधारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में छायारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में तृष्णारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में क्षान्ति (क्षमा) रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में जातिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में लज्जारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में शान्तिरूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में श्रद्धारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में कान्तिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में लक्ष्मीरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में वृत्तिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में स्मृतिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में दयारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में तुष्टिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में मातारूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में भ्रान्तिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। जो जीवों के इन्द्रियवर्ग की अधिष्ठात्री देवी एवं सब प्राणियों में सदा व्याप्त रहने वाली हैं उन व्याप्ति देवी को बारम्बार नमस्कार है। जो देवी चैतन्यरूप से इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है। पूर्वकाल में अपने अभीष्ट की प्राप्ति होने से देवताओं ने जिनकी स्तुति की तथा देवराज इन्द्र ने बहुत दिनों तक जिनका सेवन किया, वह कल्याण की साधनभूत ईश्वरी हमारा कल्याण और मङ्गल करे तथा सारी आपत्तियों का नाश कर डाले। उद्दण्ड दैत्यों से सताये हुए हम सभी देवता जिन परमेश्वरी को इस समय नमस्कार करते हैं तथा जो भक्ति से विनम्र पुरुषों द्वारा स्मरण की जाने पर तत्काल ही सम्पूर्ण विपत्तियों का नाश कर देती हैं, वे जगदम्बा हमार संकट दूर करें।


माता का महा मंत्र: नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:। नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम्॥1॥रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धा˜यै नमो नम:। ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नम:॥2॥कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नम:। नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नम:॥3॥दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै। ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नम:॥4॥अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नम:। नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नम:॥5॥या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥6॥या देवी सर्वभेतेषु चेतनेत्यभिधीयते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥7॥या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥8॥या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥9॥या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥10॥या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥11॥या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥12॥या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥13॥ या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥14॥या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥15॥या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥16॥या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥17॥यादेवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥18॥या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥19॥या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥20॥या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥21॥या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥22॥या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥23॥या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥24॥या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥25॥या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥26॥इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या। भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नम:॥ 27॥चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥28॥स्तुता सुरै: पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।करोतु सा न: शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापद:॥29॥या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै-रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति न: सर्वापदो भक्ति विनम्रमूर्तिभि:॥30॥


Aadi Shakti Durga=PARVATI+LAKSHMI+SARASWATI. Om ain heen Dum Durgay Namah=Om ain heen cli Chamunday vichche.


Shri Ram Navami-Vijay Dashmi-Shri Krishna Janmastami are top most Parv of India.


Friday, October 4, 2013

These are the few Important facts which we need to remember with our daily life in present global environment.


Indian Independence - A Twist in the Tale As history moves, a lot of insightfully delightful trivia of history gets buried under a simplified black and white version of the historical experience. The popularity of the simplified version is because it is uncomplicated and clearly distinguishes the ‘good’ from the ‘bad’ - and therefore, is very convenient for the MSM and the 0/1-binary thinkers. History, on the other hand, is primarily amoral, and has a tendency of punching holes in the contemporary zeitgeist... While we often say that India got its independence from the British on August 15, 1947, actually, the British never ever ruled the entire India as we know it now - at least not technically. There was one part which was the British India (Direct Rule), and there was the other part consisting of 562 Princely States, covering roughly 40% of the land-mass of what we now call India (Indirect Rule). About 100+ of these Princely States were quite large, e.g., Travancore, Hyderabad, Baroda, Mysore, Kashmir, etc., while many were small “jagirdaris”... While British India was governed by the British Parliament, there were separate political arrangements with the princes, and these came under something somebody called “Chancellor of Indian Princes”. In early 1947, when England decided to free India, the British Parliament passed the Indian Independence Act (in June 1947, which marked the foundation of two separate nations - India and Pakistan). However, this Act did not apply to the Princely States. The freedom to these states was given by a separate Cabinet Memorandum, which declared that the British Government will cease to have any political or defense arrangements (“Power of Paramountcy”) with the Princely States. The memorandum was clear that the Princely States were free to decide to either join India or Pakistan before August 1947 - or devise their own sovereign political system for self-governance. Most of the Princely States were small and decided to join either India or Pakistan before independence (in return for a promise that the government will maintain their Princely perquisites, which finally got abolished in 1970-71). There were, however, three exceptions: Hyderabad (which had a population of around 1.4cr, with a Muslim Nizam Fath Jang Nawab Mir Osman Ali Khan Asaf Jah VII and around 80% Hindu population). The Nizam of Hyderabad either wanted to remain sovereign (and become a part of the British Commonwealth), or join Pakistan (which would have made an interesting map of Pakistan;)... Anyway, the state was annexed by India. Kashmir (with a Hindu Maharaja and a Muslim majority in the population, and, to make thing more complicated, an adjoining border with Pakistan) There is confusion about whether the Maharaja of Kashmir, Hari Singh ever signed the letter of accession with India or not - he had not done that till India and Pakistan became independent in August 1947. Some records say that he wanted to be a part of India, but by then the situation had gone out of hand, and the Indian army landed to curb the infiltration... etc. etc... but that remains a murky, messy situation... Even till date! And then there was Junagadh which was a very interesting case: Colonel H.H. Shri Diwan Nawab Sir Muhammad Mahabat Khanji III Rasul Khanji the Nawab of Junagadh was a Muslim and Junagadh had a large Hindu population. Geographically, it was a peculiar piece of the jigsaw in what was to become the two nations of India and Pakistan. It was a state in erswhile Saurashtra, surrounded by the Hindu Kathiawad regions (which had acceded to India) on three sides, and facing the Arabian Sea on the fourth. The Nawab, however, decided to join Pakistan, which predictably did not go very well with the local populace, and they revolted. The neighbouring states also added to the pressure by imposing a blockade (‘chakka jam’) against any grains, vegetables, or material en route to Junagadh. As the revolt grew, the Nawab fled to Pakistan along with his family, taking almost all the state treasury with him and leaving his Deewan (Prime Minister) to manage the affairs. The Deewan of Junagadh did the best that he could have done to bring the situation to normalcy but it continued to worsen. The newly formed Pakistan was still dealing with its own issues and could therefore not extend help to a distant Junagadh... and finally the Deewan wrote to Jinnah stating that since Pakistan was not able to help Junagadh, and have the situation was worsening, he would be handing over Junagadh to the Indian Government - which he did around October 1947, through a letter to the Regional Commissioner of Saurashtra, Mr Buch. A few months later a plebiscite was held in which more than 190,000 voted to be a part of India, while only 91 favoured to be a part of Pakistan (Pakistan contested the results, and the Indian government upheld it... as one would have anticipated). But here is the somewhat poetic twist to the story: The Deewan of Junagadh was a person called Sir Shah Nawaz Bhutto. His son, Zulfikar Ali Bhutto, grew up to be the Prime Minister of Pakistan (was executed by Zia-hl-Haq in 1977)... and his granddaughter, Benazir Bhutto served as the Prime Minister of Pakistan twice in the late 80s and the 90s.


An estimated 14.5 million people crossed the border in the months immediately after partition. Hundreds of thousands were killed in resulting clashes. The ruler of the autonomous Jammu and Kashmir princely state had not decided which side to join by August 1947. Pakistan, still believes the state should have become part of Pakistan, because the majority of its population is Muslim. However, the Hindu Maharaja finally agreed to join India in October 1947. Some of the more prominent freedom movements were: The Mutiny of 1857 This mutiny was the turning point of the freedom movement though it was suppressed by the British. It was the first organized freedom struggle on such a large scale and paved the way for further struggles for freedom. The Civil Disobedience Movement of 1929 It was decided to celebrate Indian Independence Day on the 26th of January. On this day the freedom fighters, spearheaded by Mahatma Gandhi, hoisted India’s National Flag. It was decided to completely disregard the orders of the British Government. The Dandi March of 1930 Gandhi led a 241-kilometer march to Dandi at the age of 61 and proceeded to make salt in defiance of the law by non-violent means. The British had to arrest millions to enforce the law, causing panic in the administration. This march, in fact, was the first strategy of the Civil Disobedience Movement. The Quit India Movement of 1942 The year 1942 is now identified more with the movie 1942: A Love Story, than it is with the Quit India Movement! This movement called for a widespread, non-violent struggle for India’s freedom. Before long there were revolts all over the country, demanding that the British ‘quit India’. Do you know: National Anthem - Jana Gana Mana National Animal - The Tiger National Bird - The Peacock National Flower - The Lotus


Dr. Annie Besant, a Britisher who supported India’s freedom struggle wholeheartedly and founded the Home Rule league in India. Ashfaqualla Khan, a revolutionary who was given the death sentence and kissed the noose before it went around his neck. In early 1947 British Prime Minster Clement Atlee announced that Britain would leave India no later than June 1948. The decision came after years of dissatisfaction and non-violent resistance, termed ‘satyagraha’ by Mahatma Gandhi. Newly appointed viceroy, Lord Louis Mountbatten, oversaw the birth of the modern states of India and Pakistan. They came into being at midnight on August 15 1947, as astrologers could not decide on an auspicious date. Mountbatten attended one transfer of power ceremony in Karachi on the morning of the 14th, and another at 11 pm in Delhi. Pakistan’s Independence Day is August 14, India’s is August 15. The border was drawn by a London lawyer Sir Cyril Radcliffe. Appointed head of the Boundary Commission on June 3 1947, he submitted his partition map on August 13. The Radcliffe Award split Pakistan into two separate areas, East Pakistan (today’s Bangladesh,) and West Pakistan, with India in between. Millions found themselves on the ‘wrong side’ of the border after August 1947’s Indian Independence Act.


Rani Laxmi Bai, the Queen of Jhansi, led her people into a battle against the British in which she fought like a tiger, and was killed heroically. Mahatma Gandhi, the father of the nation, led the country to freedom with his non-violent ideals. He remains a symbol of peace to this day. Sardar Vallabhai Patel was responsible for uniting the princely states into one country.----- Bal Gangadhar Tilak is remembered for his court statement in which he proclaimed ‘Swaraj is my birthright, and I will have it!’ . Bhagat Singh who threw a bomb when the Legislature was in session, and was arrested and hung. Maulana Abul Kalam Azad who was elected President of the Congress when he was just 35.


India woke up to freedom on this day, way back in 1947, after a struggle which spanned centuries. The British handed the rule of the country to the Indian leaders at the stroke of midnight. India’s Independence is celebrated on this day by hoisting the tri-coloured flag in the state capitals, and holding cultural programmes. Though schools and colleges may not have a holiday on this day, no academic work is done. Students and teachers gather for a flag hoisting ceremony and they sing the National Anthem. The rest of the country, however, usually enjoys a holiday on this day. It is a time when we must sit back and remember the freedom strugglers, without whom we may never have got our freedom.


The Indian National Flag: The Glorious history of the Indian Flag goes back to the year 1906, when it kissed the pious and sacred soil of India. The message was in the air and it was loud and clear for the British ‘the souls of millions have finally risen up from their profound slumber and it is now the British Government’s turn to sleep on their plan of ruling India any further’. The oldest and the first version of the NationalFlag was christened the ‘Saptarishi Flag’ and was hoisted in Stuttgart at the International Socialist Congress. The year 1921 witnessed the emergence of the next National Flag which was later redesigned after the suggestion of Mahatma Gandhi and had a new look to flaunt. It now contained a white strip and the ‘charkha’. Unfortunately it graced the Indian freedom struggle with its presence for a very short duration of time as it was not considered pertinent enough by the All India Congress Committee session in 1931. The story didn’t end at this point as, on August 6, 1931, the Indian National Congress formally gave it’s nod of approval and the Flag came into existence which was first hoisted on August 31st. However, it was compelled to step down and was taken over by it’s younger sibling which happens to be our current National Flag. So, after a great deal of transformation, the final National Flag breathed it’s first on July 22, 1947 on the cradle of India and mouthed it’s first words of freedom on 15th August. The man who showed the world the colorful power of three was Lt .Shri Pingali Venkayya. He painted India with the vibrant colors of saffron, white and dark green on the canvas of courage, sacrifice, patriotism, and renunciation.


The Wonderful Qualities of Twenty Four Spokes in Ashok Chakra: 1. Love, 2. Courage, 3. Patience, 4. Peacefulness, 5. Magnanimity, 6. Goodness, 7. Faithfulness, 8. Gentleness, 9. Selflessness, 10. Self-Control, 11. Self Sacrifice, 12. Truthfulness, 13. Righteousness, 14. Justice, 15. Mercy, 16. Gracefulness, 17. Humility, 18. Empathy 19. Sympathy, 20.Spiritual, Knowledge, 21. Moral, Values, 22. Spiritual Wisdom, 23. The Fear of God 24. Faith or Belief or Hope


The Ashoka Chakra: The ‘Ashoka Chakra’ literarily means the ‘wheel of the law’. It is derived from the Sanskrit word ‘Dharma Chakra’, which means wheel and has 24 spokes. The most prominent Indian Mauryan emperor, Ashoka the Great, built the ‘Ashoka Chakra’ during the 3rd century B.C. The ‘Ashoka Chakra’ is inscribed widely among the Lion Capital of Sarnath and the Ashoka Pillar. The ‘Ashoka Chakra’ is placed in the center of the National Flag of the Republic of India. It was adopted on 22nd July, 1947. It is rendered in a navy blue colour on a white background. In order to add historical ‘depth’ and separate the National Flag from that of the Indian National Congress (INC) the Gandhian spinning wheel is replaced with the spokes of the ‘Ashoka Chakra’ in the center of the flag.-----The ‘Ashoka Chakra’ can also be seen on the base of the Lion Capital of Ashoka which has been adopted as the National Emblem of India. The ‘Chakra’ signifies that there is life in ‘Movement’ and death in stagnation. The wheel represents the cycle or the self repeating process with the changing of time in life. The horse on the Right hand symbolises accuracy and speed. The Bull on the Left hand stands for hard work.


Who designed the Indian flag? Who designed the Indian flag? The Indian national flag was designed in 1916 by Pingali Venkayya from Machilipatnam. The tricolour flag designed by him, with a charkha in the centre was adopted by the Congress committee in 1931 at Karachi. On July 22, 1947, during an ad hoc meeting of the Constituent Assembly, it was approved as the National Flag of India with suitable modifications, wherein the Ashok Chakra was adopted in place of the charkha.---******* The oldest and the first version of the National Flag was christened the ‘Saptarishi Flag’ and was hoisted in Stuttgart at the International Socialist Congress.******According to Hindu religion, the Puranas mention that only 24 Rishis wielded the whole power of the Gayatri Mantra. These 24 rishi in Himalaya are represented through the 24 letters of Gayatri Mantra and originated from Saptarshi. The all the 24 spokes of Dharmachakra are representation of all these 24 rishis of Himalayas in which Vishvamitra is first and Yajnavalkya is last who governs the religion(Dharma). Also Ashok Chakra is known as Samta Moolak Chakra and Samay Chakra in which all the 24 spokes represented 24 hours of the day and symbol of the movement of the time.-*****The Color Check in TIRANGA: The Flag’s saffron color symbolizes courage and sacrifice=(Duty of Shiva), green stands for faith and fecundity(intellectual productivity of a creative imagination)=(Duty of Vishnu), the white in the center depicts the inscribed mélange of unity, truth and peace=(Duty of Brahma). Lastly, blue represents the color of the sky and the ocean =(SAMARASTA).----The Flag struts its stuff with the historical gem called the ‘Ashoka Chakra’ (or ‘Wheel of Law’). The ‘Chakra’ connotes the incessant growth of the nation and the virtue of justice in life. It is also seen on the Sarnath Lion Capital of Ashoka


The oldest and the first version of the National Flag was christened the ‘Saptarishi Flag’ and was hoisted in Stuttgart at the International Socialist Congress.


Raghupati Raghav Rajaram, Pateet Pawan Seetaram/ Isvar Allah Tero Nam, Sabako Sanmati De Bhagvaan//... Galat Raasta Aasaan hotaa hai suru me par sahee Rasta hameshaa kathin hotaa hai lekin ant sahee Raste ka hee hameshaa bhala hotaa hai. Isvar Allah tero nam does not say that you do not follow your religion or caste or community.


Vaishnav Jan to Tene Kahiye Yeer Parayee Jaane Re: Defination of Vaishnav: Man, Karm, Vaani, Roop, Rang, Aahaar aur Vihar se Ahinshak.


Indus valley's:Sapt Sandhav:Sapt Sindhu:Seven River:Sindh#Panch Nad: Panjab:Five River region's central point is Kashmir where the great Manu(Rishi Kashyap) and Shradhdha(his wife Aditi) originated humanity under direction of Tridev:Brahma+Vishnu+Mahesh.--Panjaab:Panch Nad:Panch Aab: Jhelum, Chinav, Ravi, Vyas and Sataluj Rivers; and Sindh:Sapt Nad:Sapt Shaindhav: Jhelum, Chinav, Ravi, Vyas, Sataluj, Kabul and Sindh (Indus) Rivers (Saraswati River also term here too in addition with the Saraswati at Prayag (Allahabad)).---Rig veda describes Saraswati River as one of seven major rivers of Vedic times, the others being, Shatadru (Sutlej), Vipasa (Beas), Askini (Chenab), Parsoni or Airavati (Ravi), Vitasta (Jhelum) and Sindhu (Indus)| Saraswati~Kabul River.-- Most of these rivers origin is/was Himalaya(Kashmir's origin itself is Himalaya).


In actual Hind(KASHMIR TO KANYAKUMARI AND IRAN TO SINGAPUR) means the region under influence of Indus Valley or under influence of Arya Culture. But it is only Great India which pray this great land first before pray his country. Jai Hind, Jai Bharat, Jai Shri Ram, Jai Shri Krishna.


HE RAM! KYA YAHI SWAMI VIVEKANAND AUR MOHANDAS KARAMCHAND GANDHI KE SAPANO KA BHARAT HAI? Kya isee liye Azad Hind Fauz bani aur kya isee liye Chandra Shekhar, Bhagat Singh jaise log saheed huye?