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Wednesday, November 20, 2013

युग परिवर्तन में और किशी विशेष विकाश में व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक जीवन के बहुत सारे नियमों का उल्लंघन होता है या कहे इन नियमों को नजर अंदाज किया जाता है और इस प्रकार विकास और परिवर्तन के साथ-साथ नियमों के उल्लंघन से या कहे इन नियमों को नजर अंदाज से पाप का भी जन्म होता। अतः कहा जाता है कि विकाश के साथ-साथ पाप का भी प्रादुर्भाव होता है और इस पाप से मुक्ति में किशी एक व्यक्ति या किशी समूह विशेष के स्वक्षंद जीवन या जीवन के अधिकारों की आहुति इस यज्ञ में देनी होती ही है या जीवन शक्ति कमजोर होती है विशेष कर वह व्यक्ति या उस व्यक्ति से घिरे हुए व्यक्ति या व्यक्ति समूह का जो संकल्प लेता है उस विकाश या परिवर्तन को करने का। और यही कारन है कि युग परिवर्तन और किशी विशेष विकाश का यश भोग सभी लोगों को नहीं मिल पाता है वे कितने भी योग्य हों। अतः युग परिवर्तन और विशेष विकाश की क्षमता विषय विशेष की योग्यता से ही नहीं वरन सामजस्य, धैर्यशीलता, कार्यकुशलता के साथ-साथ विषय विशेष की योग्यता से नापी जाती है।


Tuesday, November 19, 2013

Religion is a set of principles, morals, ethics, and rules set up to lead one's life. Philosophy is a discipline which deals with life, metaphysics, knowledge, and the ultimate truth. Both religion and philosophy have their own similarities and differences. Here similarities and difference does not mean that one is part of another.-----------So, there are a few similarities and differences between religion and philosophy. One needs to look beyond the surface meaning of both religion and philosophy to understand what they actually imply and how it is useful for one's life.


Yet another difference between religion and philosophy is the concept of belief. While almost all the philosophies do not accept the concept of belief, religion tends to bring in the belief angle quite a few times. In philosophy, something is considered true only if it is completely proven true on a long term basis by means of various forms of reasoning. If it is not, then it will not be considered the ultimate truth. However, in case of religion, a lot of things are supernatural, superstitious, and incredulous in nature that only the concept of belief can make people stand by those things. This is the reason why a lot of philosophers were against organized religions. However, there were a few exceptions where philosophers were religious in nature and stated that religious practices actually have hidden meanings and can help people understand the ultimate truth in life. This is especially common with some of the philosophers from the east.


One of the major differences between religion and philosophy is the need for rituals. While almost all the religions in the world have certain set of rituals which are to be followed by the followers of the respective religions, philosophy does not have any sort of rituals, as it is only a way of thinking. So, while a person can be philosophical without having to do any sort of practices or rituals, it is almost impossible for him to be religious without doing any sort of rituals or practices stated in that particular religion. This is one big difference which makes people say that religion and philosophy are mutually exclusive and cannot co-exist.


One can always argue that both religion and philosophy are one and the same and we just call them by different names. But it is not entirely true.--One of the major similarities between religion and philosophy is that they both deal with human life, human mind, its existence in the universe, the meaning of life, the ultimate truth, and so on. Both tend to make existence in this universe a lot less complicated by addressing issues such as knowledge, truth, life, and existentialism. Thus, one can always argue that both religion and philosophy are one and the same and we just call them by different names. But it is not entirely true.


श्रीकृष्ण अपने परमब्रह्म स्वरुप में: ईश्वरः (एकोदेवो) सर्व भूतानाम, बीजं माम सर्व भूतानाम (अहंब्रह्मास्मि)। सब प्राणियों में एक ही ईस्वर विराजमान है और सब प्राणियों का अनादि बीज मुझे ही जान। http://vandemataramvivekananddrvkprssbhupuau.blogspot.com/


गंगापुत्र भीस्म, भारद्वाज ऋषि पुत्र द्रोणाचार्य और सूर्यपुत्र कर्ण परशुराम के श्रेष्ठ शिष्य थे। गंगापुत्र भीस्म, भारद्वाज ऋषि पुत्र द्रोणाचार्य और सूर्यपुत्र कर्ण महाभारत के वे योध्धा थे जो पूरे पांडव सेना को मात दे सकते थे अगर श्रीकृष्ण ने चाल न चली होती। महादेव शिष्य और विष्णु अवतारी परशुराम में सब पौरुष होते हुए भी अपने क्रोध पर नियंत्रण के लिए कश्यप ऋषि (गोत्रियों) को अपने द्वारा जीती हुई जमीन दे कर अज्ञातवाश में शांति हेतु स्वयं जाना पड़ा था।


ऐसे नहीं कहा गया है जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण कहो या राम और इसमे से दोनों पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम होने कि परिक्षा इसी संसार ने ली थी। -----और इन दोनों के परमभक्त महावीर हनुमान=पीर बाबा=मंगलवारीय बाबा=अम्बवादेकर से ही सुचारु रूप से संसार चलता रहे तो कृष्ण और राम को कास्ट क्यों दिया जाय पुनः धर्म कि रक्षा के लिए अवतरित होने के लिए? वैसे भी इसी महावीर हनुमान=पीर बाबा=मंगलवारीय बाबा =अम्बवाडेकर ने एक बार काशीनरेश के प्राण भगवान् श्रीराम के हांथों से बचाकर सिध्ध किया था राम से बड़ा राम का नाम (कृष्ण से बड़ा कृष्ण का नाम) वैसे हनुमान ने भगवान् श्रीराम की भी प्रतिज्ञा पूरी करवाई थी शाम तक काशी नरेश का सिर भगवान् श्रीराम के गुरु विश्वामित्र के चरणों में सर नतमस्तक करवाकर। कहा गया है कि हनुमान, परशुराम, दुर्वाशा ऋषि और अश्वत्थामा अजर और अमर है तथा किशी न किशी रूप में इस जनमानस में उपस्थित रहते हैं। अंत में एक सामाजिक सौहाद्र के कथन के साथ मै सभी धर्मों को एक करता हूँ: गाय, गंगा और गायत्री को छोड़कर इस्लाम श्रीराममार्ग के सामानांतर और ईसाइयत श्रीकृष्णमार्ग के समानांतर चलता है और गाय, गंगा और गायत्री पर मतभेद या समानता उनके उत्पत्ति स्थान के जलवायु, जनजीवन और भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर है।


यह प्रयाग, काशी और गोरखपुर के विद्वतजन से पक्ष रखने के बाद ही मै पुनः यहाँ रखा रहा हूँ। दुनिया चलाने के कम से कम चार आधार है: १) धार्मिक, २ ) दार्शनिक, ३) सामाजिक और ४) राजनैतिक| दो सर्वोच्च आधार हैं धर्म और दर्शन इसके बाद सामाजिकता और राजनैतिक आधार का महत्व है। दूसरी श्रेणी में ५ ) आर्थिक और ६) नैतिक आधार को सम्मिलित किया जाता है और इस प्रकार छः आधार बनाते हैं: धार्मिक, दार्शनिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा नैतिक|वास्तव में दर्शन और धर्म एक सिक्के के दो पहलू हैं जिनमे एक सैद्धांतिक पक्ष है और दूसरा क्रियात्मक पक्ष पर दोनों को एक दूसरे का हिस्सा या दोनों एक है यह भी नहीं कह सकते हैं आप। । वैसे भी चारों या छहों को एक साथ न सही इनमे से कोई एक तो बहुसंख्यक मानते ही हैं।


Monday, November 18, 2013

विवेकानंद ने व्यवहार में वेदान्त दर्शन को अपनाया है और सभी दर्शनों का मूल अंश उसमे पाया है: वेदांत दर्शन: महर्षि व्यास: वेदांत का अर्थ है वेदों का अंतिम सिद्धांत। महर्षि व्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। इस दर्शन को उत्तर मीमांसा भी कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म जगत का कर्ता-धर्ता व संहार कर्ता होने से जगत का निमित्त कारण है। उपादान अथवा अभिन्न कारण नहीं। ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। साथ ही जन्म मरण आदि क्लेशों से रहित और निराकार भी है। इस दर्शन के प्रथम सूत्र `अथातो ब्रह्म जिज्ञासा´ से ही स्पष्ट होता है कि जिसे जानने की इच्छा है, वह ब्रह्म से भिन्न है, अन्यथा स्वयं को ही जानने की इच्छा कैसे हो सकती है। और यह सर्वविदित है कि जीवात्मा हमेशा से ही अपने दुखों से मुक्ति का उपाय करती रही है। परंतु ब्रह्म का गुण इससे भिन्न है। आगे चलकर वेदान्त के अनेकानेक सम्प्रदाय (अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि ) बने।


भारतीय दर्शन : न्याय दर्शन: महर्षि गौतम: महर्षि गौतम रचित इस दर्शन में इसमें न्याय की परिभाषा के अनुसार न्याय करने की पद्धति तथा उसमें जय-पराजय के कारणों का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।इसमें पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन है। पदार्थों के तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान की निवृत्ति होती है। फिर अशुभ कर्मो में प्रवृत्त न होना, मोह से मुक्ति एवं दुखों से निवृत्ति होती है। इसमें परमात्मा कोसृष्टिकर्ता, निराकार, सर्वव्यापक और जीवात्मा को शरीर से अलग एवं प्रकृति को अचेतन तथा सृष्टि का उपादान कारण माना गया है और स्पष्ट रूप से त्रैतवाद का प्रतिपादन किया गया है। वैशेषिक दर्शन: महर्षि कणाद:महर्षि कणाद रचित इस दर्शन में धर्म के सच्चे स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसमें सांसारिक उन्नति तथा निश्श्रेय सिद्धि के साधन को धर्म माना गया है। अत: मानव के कल्याण हेतु धर्म का अनुष्ठान करना परमावश्यक होता है। इस दर्शन में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य विशेष और समवाय इन छ: पदाथों के साधम्र्य तथा वैधम्र्य के तत्वाधान से मोक्ष प्राप्ति मानी जाती है। साधम्र्य तथा वैधम्र्य ज्ञान की एक विशेष पद्धति है, जिसको जाने बिना भ्रांतियों का निराकरण करना संभव नहीं है। इसके अनुसार चार पैर होने से गाय-भैंस एक नहीं हो सकते। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म दोनों ही चेतन हैं। किंतु इस साधम्र्य से दोनों एक नहीं हो सकते। साथ ही यह दर्शन वेदों को, ईश्वरोक्त होने को परम प्रमाण मानता है। सांख्य दर्शन:महर्षि कपिल: इस दर्शन के रचयिता महर्षि कपिल हैं। इसमें सत्कार्यवाद के आधार पर इस सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति को माना गया है। इसका प्रमुख सिद्धांत है कि अभाव से भाव या असत से सत की उत्पत्ति कदापि संभव नहीं है। सत कारणों से ही सत कार्यो की उत्पत्ति हो सकती है। सांख्य दर्शन प्रकृति से सृष्टि रचना और संहार के क्रम को विशेष रूप से मानता है। साथ ही इसमें प्रकृति के परम सूक्ष्म कारण तथा उसके सहित ख्ब् कार्य पदाथों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। पुरुष ख्भ् वां तत्व माना गया है, जो प्रकृति का विकार नहीं है। इस प्रकार प्रकृति समस्त कार्य पदाथो का कारण तो है, परंतु प्रकृति का कारण कोई नहीं है, क्योंकि उसकी शाश्वत सत्ता है। पुरुष चेतन तत्व है, तो प्रकृति अचेतन। पुरुष प्रकृति का भोक्ता है, जबकि प्रकृति स्वयं भोक्ती नहीं है। योग दर्शन:महर्षि पतंजलि: इस दर्शन के रचयिता महर्षि पतंजलि हैं। इसमें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। इसके अलावा योग क्या है, जीव के बंधन का कारण क्या है? चित्त की वृत्तियां कौन सी हैं? इसके नियंत्रण के क्या उपाय हैं इत्यादि यौगिक क्रियाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार परमात्मा का ध्यान आंतरिक होता है। जब तक हमारी इंद्रियां बहिर्गामी हैं, तब तक ध्यान कदापि संभव नहीं है। इसके अनुसार परमात्मा के मुख्य नाम ओ३म् का जाप न करके अन्य नामों से परमात्मा की स्तुति और उपासना अपूर्ण ही है। मीमांसा दर्शन: महर्षि जैमिनि: इस दर्शन में वैदिक यज्ञों में मंत्रों का विनियोग तथा यज्ञों की प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है। इस दर्शन के रचयिता महर्षि जैमिनि हैं। यदि योग दर्शन अंत: करण शुçद्ध का उपाय बताता है, तो मीमांसा दर्शन मानव के पारिवारिक जीवन से राष्ट्रीय जीवन तक के कत्तüव्यों और अकत्तüव्यों का वर्णन करता है, जिससे समस्त राष्ट्र की उन्नति हो सके। जिस प्रकार संपूर्ण कर्मकांड मंत्रों के विनियोग पर आधारित हैं, उसी प्रकार मीमांसा दर्शन भी मंत्रों के विनियोग और उसके विधान का समर्थन करता है। धर्म के लिए महर्षि जैमिनि ने वेद को भी परम प्रमाण माना है। उनके अनुसार यज्ञों में मंत्रों के विनियोग, श्रुति, वाक्य, प्रकरण, स्थान एवं समाख्या को मौलिक आधार माना जाता है। वेदांत दर्शन: महर्षि व्यास: वेदांत का अर्थ है वेदों का अंतिम सिद्धांत। महर्षि व्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। इस दर्शन को उत्तर मीमांसा भी कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म जगत का कर्ता-धर्ता व संहार कर्ता होने से जगत का निमित्त कारण है। उपादान अथवा अभिन्न कारण नहीं। ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। साथ ही जन्म मरण आदि क्लेशों से रहित और निराकार भी है। इस दर्शन के प्रथम सूत्र `अथातो ब्रह्म जिज्ञासा´ से ही स्पष्ट होता है कि जिसे जानने की इच्छा है, वह ब्रह्म से भिन्न है, अन्यथा स्वयं को ही जानने की इच्छा कैसे हो सकती है। और यह सर्वविदित है कि जीवात्मा हमेशा से ही अपने दुखों से मुक्ति का उपाय करती रही है। परंतु ब्रह्म का गुण इससे भिन्न है। आगे चलकर वेदान्त के अनेकानेक सम्प्रदाय (अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि ) बने। ------------------------------------------------------------------------------------ अन्य हिन्दू दर्शन: चार्वाक दर्शन वेदविरोधी होने के कारण नास्तिक संप्रदायों में चार्वाक मत का भी नाम लिया जाता है। भौतिकवादी होने के कारण यह आदर न पा सका। इसका इतिहास और साहित्य भी उपलब्ध नहीं है। "बृहस्पति सूत्र" के नाम से एक चार्वाक ग्रंथ के उद्धरण अन्य दर्शन ग्रंथों में मिलते हैं। चार्वाक मत एक प्रकार का यथार्थवाद और भौतिकवाद है। इसके अनुसार केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। अनुमान और आगम संदिग्ध होते हैं। प्रत्यक्ष पर आश्रित भौतिक जगत् ही सत्य है। आत्मा, ईश्वर, स्वर्ग आदि सब कल्पित हैं। भूतों के संयोग से देह में चेतना उत्पन्न होती है। देह के साथ मरण में उसका अंत हो जाता है। आत्मा नित्य नहीं है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जीवनकाल में यथासंभव सुख की साधना करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए अवैदिक दर्शनों का विकास: उपनिषदों के अध्यात्मवाद तथा तपोवाद में ही वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध एक प्रकट क्रांति का रूप ग्रहण कर लिया। उपनिषद काल में एक ओर बौद्ध और जैन धर्मों की अवैदिक परंपराओं का आविर्भाव हुआ तथा दूसरी ओर वैदिक दर्शनों का उदय हुआ। ईसा के जन्म के पूर्व और बाद की एक दो शताब्दियों में अनेक दर्शनों की समानांतर धाराएँ भारतीय विचारभूमि पर प्रवाहित होने लगीं। बौद्ध और जैन दर्शनों की धाराएँ भी इनमें सम्मिलित हैं।(From Wikipedia and Other Sources)

भारतीय दर्शन :  न्याय दर्शन: महर्षि गौतम: महर्षि गौतम रचित इस दर्शन में इसमें न्याय की परिभाषा के अनुसार न्याय करने की पद्धति तथा उसमें जय-पराजय के कारणों का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।इसमें पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन है। पदार्थों के तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान की निवृत्ति होती है। फिर अशुभ कर्मो में प्रवृत्त न होना, मोह से मुक्ति एवं दुखों से निवृत्ति होती है। इसमें परमात्मा कोसृष्टिकर्ता, निराकार, सर्वव्यापक और जीवात्मा को शरीर से अलग एवं प्रकृति को अचेतन तथा सृष्टि का उपादान कारण माना गया है और स्पष्ट रूप से त्रैतवाद का प्रतिपादन किया गया है।   वैशेषिक दर्शन: महर्षि कणाद:महर्षि कणाद रचित इस दर्शन में धर्म के सच्चे स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसमें सांसारिक उन्नति तथा निश्श्रेय सिद्धि के साधन को धर्म माना गया है। अत: मानव के कल्याण हेतु धर्म का अनुष्ठान करना परमावश्यक होता है। इस दर्शन में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य विशेष और समवाय इन छ: पदाथों के साधम्र्य तथा वैधम्र्य के तत्वाधान से मोक्ष प्राप्ति मानी जाती है। साधम्र्य तथा वैधम्र्य ज्ञान की एक विशेष पद्धति है, जिसको जाने बिना भ्रांतियों का निराकरण करना संभव नहीं है। इसके अनुसार चार पैर होने से गाय-भैंस एक नहीं हो सकते। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म दोनों ही चेतन हैं। किंतु इस साधम्र्य से दोनों एक नहीं हो सकते। साथ ही यह दर्शन वेदों को, ईश्वरोक्त होने को परम प्रमाण मानता है।   सांख्य दर्शन:महर्षि कपिल: इस दर्शन के रचयिता महर्षि कपिल हैं। इसमें सत्कार्यवाद के आधार पर इस सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति को माना गया है। इसका प्रमुख सिद्धांत है कि अभाव से भाव या असत से सत की उत्पत्ति कदापि संभव नहीं है। सत कारणों से ही सत कार्यो की उत्पत्ति हो सकती है। सांख्य दर्शन प्रकृति से सृष्टि रचना और संहार के क्रम को विशेष रूप से मानता है। साथ ही इसमें प्रकृति के परम सूक्ष्म कारण तथा उसके सहित ख्ब् कार्य पदाथों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। पुरुष ख्भ् वां तत्व माना गया है, जो प्रकृति का विकार नहीं है। इस प्रकार प्रकृति समस्त कार्य पदाथो का कारण तो है, परंतु प्रकृति का कारण कोई नहीं है, क्योंकि उसकी शाश्वत सत्ता है। पुरुष चेतन तत्व है, तो प्रकृति अचेतन। पुरुष प्रकृति का भोक्ता है, जबकि प्रकृति स्वयं भोक्ती नहीं है।  योग दर्शन:महर्षि पतंजलि: इस दर्शन के रचयिता महर्षि पतंजलि हैं। इसमें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। इसके अलावा योग क्या है, जीव के बंधन का कारण क्या है? चित्त की वृत्तियां कौन सी हैं? इसके नियंत्रण के क्या उपाय हैं इत्यादि यौगिक क्रियाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार परमात्मा का ध्यान आंतरिक होता है। जब तक हमारी इंद्रियां बहिर्गामी हैं, तब तक ध्यान कदापि संभव नहीं है। इसके अनुसार परमात्मा के मुख्य नाम ओ३म् का जाप न करके अन्य नामों से परमात्मा की स्तुति और उपासना अपूर्ण ही है।  मीमांसा दर्शन: महर्षि जैमिनि: इस दर्शन में वैदिक यज्ञों में मंत्रों का विनियोग तथा यज्ञों की प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है। इस दर्शन के रचयिता महर्षि जैमिनि हैं। यदि योग दर्शन अंत: करण शुçद्ध का उपाय बताता है, तो मीमांसा दर्शन मानव के पारिवारिक जीवन से राष्ट्रीय जीवन तक के कत्तüव्यों और अकत्तüव्यों का वर्णन करता है, जिससे समस्त राष्ट्र की उन्नति हो सके। जिस प्रकार संपूर्ण कर्मकांड मंत्रों के विनियोग पर आधारित हैं, उसी प्रकार मीमांसा दर्शन भी मंत्रों के विनियोग और उसके विधान का समर्थन करता है। धर्म के लिए महर्षि जैमिनि ने वेद को भी परम प्रमाण माना है। उनके अनुसार यज्ञों में मंत्रों के विनियोग, श्रुति, वाक्य, प्रकरण, स्थान एवं समाख्या को मौलिक आधार माना जाता है।  वेदांत दर्शन: महर्षि व्यास: वेदांत का अर्थ है वेदों का अंतिम सिद्धांत। महर्षि व्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। इस दर्शन को उत्तर मीमांसा भी कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म जगत का कर्ता-धर्ता व संहार कर्ता होने से जगत का निमित्त कारण है। उपादान अथवा अभिन्न कारण नहीं। ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। साथ ही जन्म मरण आदि क्लेशों से रहित और निराकार भी है। इस दर्शन के प्रथम सूत्र `अथातो ब्रह्म जिज्ञासा´ से ही स्पष्ट होता है कि जिसे जानने की इच्छा है, वह ब्रह्म से भिन्न है, अन्यथा स्वयं को ही जानने की इच्छा कैसे हो सकती है। और यह सर्वविदित है कि जीवात्मा हमेशा से ही अपने दुखों से मुक्ति का उपाय करती रही है। परंतु ब्रह्म का गुण इससे भिन्न है। आगे चलकर वेदान्त के अनेकानेक सम्प्रदाय (अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि ) बने। ------------------------------------------------------------------------------------ अन्य हिन्दू दर्शन: चार्वाक दर्शन वेदविरोधी होने के कारण नास्तिक संप्रदायों में चार्वाक मत का भी नाम लिया जाता है। भौतिकवादी होने के कारण यह आदर न पा सका। इसका इतिहास और साहित्य भी उपलब्ध नहीं है। "बृहस्पति सूत्र" के नाम से एक चार्वाक ग्रंथ के उद्धरण अन्य दर्शन ग्रंथों में मिलते हैं। चार्वाक मत एक प्रकार का यथार्थवाद और भौतिकवाद है। इसके अनुसार केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। अनुमान और आगम संदिग्ध होते हैं। प्रत्यक्ष पर आश्रित भौतिक जगत् ही सत्य है। आत्मा, ईश्वर, स्वर्ग आदि सब कल्पित हैं। भूतों के संयोग से देह में चेतना उत्पन्न होती है। देह के साथ मरण में उसका अंत हो जाता है। आत्मा नित्य नहीं है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जीवनकाल में यथासंभव सुख की साधना करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए  अवैदिक दर्शनों का विकास: उपनिषदों के अध्यात्मवाद तथा तपोवाद में ही वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध एक प्रकट क्रांति का रूप ग्रहण कर लिया। उपनिषद काल में एक ओर बौद्ध और जैन धर्मों की अवैदिक परंपराओं का आविर्भाव हुआ तथा दूसरी ओर वैदिक दर्शनों का उदय हुआ। ईसा के जन्म के पूर्व और बाद की एक दो शताब्दियों में अनेक दर्शनों की समानांतर धाराएँ भारतीय विचारभूमि पर प्रवाहित होने लगीं। बौद्ध और जैन दर्शनों की धाराएँ भी इनमें सम्मिलित हैं।(From Wikipedia and Other Sources)

श्रीमद्भागवत गीता में हर एक योग का वृहद् और अलग-अलग वर्णन है पर सम्पूर्ण गीता समझने के लिए सबको एक में मिलाना पड़ता है । उसी तरह आप मुझे पहले यहाँ देखिये तब मेरा कोई एक पोस्ट पूर्ण समझिये: वैसे सुकरात को विषपान के लिए बाध्य किया था और ईसामसीह को शूली पर लटकाया गया था पर मैं दोनों के लिए तैयार हूँ यदि आप एक सज्जन व्यक्ति बन सके। http://vandemataramvivekananddrvkprssbhupuau.blogspot.com/


Friday, November 15, 2013

दुनिया चलाने के कम से कम चार आधार है: १) धार्मिक, २ ) दार्शनिक, ३) सामाजिक और ४) राजनैतिक| Topmost and 2nd topmost base is Religion and Philosophy then Societal factor and last is Politics. Secondary base is : economic(आर्थिक) and ethical (नैतिक) thus it becomes धार्मिक, दार्शनिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा नैतिक|


तर्क बड़ा या आस्था इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है हिंदुओं के प्रथम पूज्य देव गणेश का टूटा हुआ एक दाँत जिसे विष्णु-अवतरधारी परशुराम ने तोड़ा था और अपनी ही योग समाधि कि रक्षा के लिए गणेश को नियुक्त किये महादेव शिव ने परशुराम से कोई नाराजगी नहीं प्रकट की उनके इस कृत्य के लिए अपने पुत्रों और पारवती के कहने पर भी। उन्होंने कहा कि पिटा के आज्ञा पालन के बदले जो तर्क वितर्क गणेश ने किया था उस पर परशुराम कि अपने गुरु महादेव से मिलने कि आस्था बड़ी थी॥ अतः परशुराम दंड के भागीदार नहीं है।


कृष्ण का न्याय दर्शन: पृथ्वी पर पापा का बोझ कम करने के लिए अगर कुरुवंश में कौरवों का नाश किये तो गांधारी के अभिशाप (महादेव के आशीर्वाद से उत्पन्न हुए १०० पुत्रों के विनाश का सूत्रधार श्री कृष्ण को मना था गांधारी ने और अपनी बुआ कुंती के पुत्रों का पक्ष लेने का आरोप लगाया था) और दुर्वाशा समेत अन्य ऋषियों के साथ जो मजाक यदुवंश के नवयुवक शुरू किये थे जिसमे कि श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध (श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्दुम्न के पुत्र) भी युवाओं में सम्मिलित थे को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ने जो विनाश यज्ञ किया यदुवंश के नाश का उसमे प्रथम आहुति अपनी दी थी ज़रा नमक बहेलिए से अपनी ह्त्या करवा कर।


Wednesday, November 13, 2013

परमब्रह्म श्रीकृष्ण कि ब्रह्मवाणी श्रीमद्भागवत गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जो विश्व के समस्त धर्मावलम्बियों और पन्थानुयायियों को एक ही मार्ग पर ला सनातन संस्कृति से जोड़ता है।


ब्रह्मा अगर किशी से डरकर बेद गलत पढ़े और ऋषि वशिस्थ के वंसज महर्षि व्यास उन चारों वेदों और अट्ठारह पुराणों को किशी से डरकर गलत संकलित करें तो स्वामी विवेकानंद के वेदांत दर्शन और परमब्रह्म श्रीकृष्ण कि ब्रह्मवाणी श्रीमद्भागवत गीता के पढने वाले का हो चुका कल्याण। जो सत्य है वह चाहे खुद मुझे भी अप्रिय हो तो क्या सामने लाने से नहीं डरना चाहिए। अतः आप समझ सकते हैं कि कितने समर्थ थे परमब्रह्म श्रीकृष्ण कि ब्रह्मवाणी श्रीमद्भागवत गीता को संकलित करने वाले ऋषि वशिस्थ के वंसज महर्षि वेद व्यास।


Friday, November 8, 2013

श्रीकृष्ण जब अर्जुन का मोह भंग करने के लिए स्वयं परमब्रह्म श्रीकृष्ण बने थे महाभारत में तो उन्होंने कहा था कि रूप, रस, शब्द, स्पर्श, गंध देह रूपी शरीर और देह रुपी समाज दोनों प्रभावित होते हैं। अतः मन रुपी घोड़े पर नियंत्रण रखने से व्यक्ति का शरीर और समाज संतुलित रहता है। तो मित्र वही कृष्ण अगर रास लीला करते है तो निश्चित रूप से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किये होंगे अलौकिक रूप से: अलौकिक इस लिए कि कालिया नाग का विष उन पर असर नहीं करता, पूतना का विषैला दूध असर नहीं करता और अनेको राक्षशों का बचपन में ही वध किया उन्होंने| क्या हर कोई ऐसा कर पायेगा? अतः ऐसे ही (Moon Dynasty: चंद्रवंशी:यदुवंसीय:वृष्णिवंशीय) क्षत्रिय श्रीकृष्ण को (Solar Dynasty: सूर्यवंशीय:इक्षाकुवंशीय:रघुवंशीय) क्षत्रिय श्रीराम के बचे हुए कर्मों का पूरा करने वाला नहीं कहा गया है। वैसे भी स्वयं परमब्रह्म श्रीकृष्ण ने कहा था कि धनुष धारियों में श्रीराम हूँ, अदिति (कश्यप) के बारह पुत्रों (आदित्यों) में विष्णु हूँ, मुनियों में नारद हूँ, ऋषियों में भृगु ऋषि हूँ और वृक्षों में पीपल हूँ। और इसी पीपल के नीचे शाक्य वंशीय गौतम गोत्रीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ और वे विष्णु के अवतार कहे गए हैं कुछ सन्दर्भों में तो उनके द्वारा चलाये गए बौद्ध सम्प्रदायी लोग हिन्दू से कैसे अलग हुए। अगर शक्यवंशीय गौतम गोत्रीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम विष्णु के अवतार तो त्रिदेव कि परिकल्पना से वे दूर कैसे और वे ही नहीं किशी भी धर्म के लोग दूर नहीं हो सकते तो कम से कम हिन्द (जंबू द्वीप = ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी तक के ) वासी है।


व्यक्ति अपने जीवन में असंख्य मनो दशाओं में जीता है लेकिन हर मनो दशा के अनुसार तरह-तरह के धर्म तो नहीं हो सकते पर सनातन हिन्दू धर्म जिसे ऋषि महर्षियों द्वारा वैज्ञानिक दृस्टि से संसोधित किया जाता रहा है और जिसका कोई एक चलने वाला नहीं वरन परमब्रह्म या ब्रह्म या परमेस्वर जिन्होंने श्रीस्ती का निर्माण किया को ही चलाने वाला ही कहा जा सकता है, उससे अलग हो जो अन्य धर्म चलाये गए हैं विभिन्न जलवायु में नियम पूर्वक जीने के लिए तो इससे तीन ही विश्व व्यापक धर्म कि ही व्यवस्था दी जा सकी है और वह है: १) हिन्दू और सम्मिलित, २) मुस्लिम और सम्मिलित तथा 3) ईसाई और सम्मिलित। यहाँ सम्मिलित का अर्थ सर्वव्यापक है इसे बताने कि जरूरत नहीं है यहाँ पर। इन तीनों के अंदर पर पूरे विश्व को चलाया जा सकता है इसमे कोई दो राय नहीं पुच्छल तारों कि तरह बहुत सारे धर्म को चलाने कि जरूरत नहीं है।


Thursday, November 7, 2013

भीम वृष्णिवंशीय (यदुवंश कि विशेष श्रेणी) क्षत्रिय श्रीकृष्ण कि बुआ कुंती और कुरु वंशीय क्षत्रिय पांडु के पुत्र तथा पवन देव के अंश थे। स्त्री कि मान और सम्मान कि रक्षा के प्रति दृण प्रतिज्ञा थे जिसका परिणाम था कि द्रौपदी को अपमानित, कुदृस्ति डालने वाले तथा हाँथ लगाने वाले दुशासन और दुर्योधन तथा कीचक उनके शिकार हुए। अपने बड़े भाई के आज्ञाकारी और भाइयों कि रक्षा के प्रति समर्पित थे जिसका प्रत्यक्ष उदहारण है कि कर्ण को इंद्र द्वारा दिए गए ब्रह्मास्त्र से जब अर्जुन के प्राण न बचने कि उम्मीद आयी तो वे अपने पुत्र घटोत्कच्छ को आत्महत्या हेतु भेज दिया मतलब कर्ण कौरव सेना कि रक्षा और स्वयं अपने प्राण कि रक्षा के लिए ब्रह्मास्त्र जरूर चलाता और उससे घटोत्कच्छ का मरना निश्चित था।>>> सबसे बड़ी बात कि भीम अपने भाइयों सहित अल्पसंख्यक थे और उनकी सेना भी छोटी थी तथा एक बात और कि संख्या ही सर्वोपरि तो श्रीकृष्ण किस लिए थे और भगवाध्वज पर बैठे हनुमान किश लिए थे? अतः मेरा कहना है कि मानवता कि दृष्टि में सब बराबर है मौलिक रूप से पर विलक्षण प्रतिभा भी कुछ होती है क्या?>>>>> जिस कृष्ण ने पांडवों के लिए माँ उत्तरा के पेट में पल रहे एक मात्र बचे हुए वंसज परीक्षित के प्राणों कि रक्षा की अपने जीवन के सम्पूर्ण सद्कर्मों में सत्य कि प्राप्ति का उद्देश्य बताकर परमब्रह्म से तो ऐसे में जय श्री कृष्ण कहने के बाद किशी पांडव कि अलग से जय कहने कि आवश्यकता रह जाती है क्या?


Wednesday, November 6, 2013

भारत को विश्व गुरु बनाने का संकल्प भारत के बहुत से महात्मा ले चुके हैं उसमे मै उनका सहयोग करना चाह रहा हूँ अपने विचार के माध्यम से पर मेरे विचार से गुरु साधन सम्पन्ना ज्यादा नहीं होता है अपने शीस्यों से जैसा कि गुरु वशिस्ठ और चाणक्य अपने को राजदरबार से जोड़ कर भी भोग विलाशिता से दूर सामान्य जीवन व्यतीत करते थे। अतः इस प्रकार के भारतीय जन और भारत कि परिकल्पना है मेरी पर गम्भीर स्थिति में गुरु के लिए श्रीराम और चन्द्रगुप्त मौर्य गुरु के रक्षार्थ बाध्य हों गुरु भक्ति में।


कम से कम चार आधार है दुनिया चलाने के १) धार्मिक, २ ) दार्शनिक, ३)सामाजिक और ४) राजनैतिक और इस प्रकार मै चार में से किशी एक के आधार पर भी अपने कथन को सही सिध्ध कर सकता हूँ।>>> सर्व प्रथम "प्रत्यक्षं किम प्रमाणम" । आप किश आधार पर कह रहे हैं कि मै किशी को बेवकूफ बना रहा हूँ। क्या भारत या किशी अंतररास्ट्रीय न्यायलय तथा भारतीय गृह मंत्रालय या किशी आयोग ने यह अधिकार दिया है आप को जिसमे किशी वाद के द्वारा आप ने सिध्ध किया हो कि मै ऐसा कर रहा हूँ ? मई जो लिखता हूँ और जो कहता हूँ उसका भारतीय या किशी अंतररास्ट्रीय न्यायलय तथा भारतीय गृह मंत्रालय या किशी आयोग समक्ष प्रमाण दूंगा। एक मित्र/सहपाठी के नाते आप से गुजारिस है कि आप अनाप सनाप टिपण्णी बिना किशी आधार के न किया कीजिये अन्यथा आप को मुझे मित्र समूह से बाहर करना पडेगा।


It is evident that forbearance, tolerance along with Ahimsa and universal acceptance are the parts and parcels of the lives of the Indians.


भारत माँ कि पुकार बहुत से लोग सुन रहे पर सत्य कौन उगले: वे व्यक्ति धन्य हैं जो रास्त्र हेतु सब कुछ अर्पित देते हैं तथा हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश और अपयश का उनको तनिक भी भय नहीं होता है।>>> द्वारका में एक बार कृष्ण अस्वस्थ हो गए। वैद्य ने कहा- किसी की चरणरज चाहिए, तभी उपचार होगा। चरणरज लाने की जिम्मेदारी नारद को सौंपी गई। वे रुक्मणि, सत्यभामा, जामवंती सहित ऋषिमुनियों के पास पहुंचे। कृष्ण की तीनों पटरानिया रुक्मणी, सत्यभामा, जामवंती भक्ति में फेल हो गई किसी ने भी रज नहीं दी। डर था कृष्ण को अपनी चरणरज देकर नर्क कौन जाएं। थके हारे नारद कृष्ण के पास लौटे और आप बीती सुनाई।---------कृष्ण मुस्कुराए और कहा एक बार ब्रज जाकर देख लें, वहां किसी की रज मिल जाए। नारद ब्रज पहुंचे तो कृष्ण के अस्वस्थ होने की सूचना से सभी चिंतित हो गए। राधा और गोपियां बहुत दु:खी थीं। जब पता चला चरणरज से कृष्ण स्वस्थ हो सकते हैं तो सभी अपनी रज देने को उतावली हुईं। नारद ने पूछा- तुम्हें नर्क का डर नहीं है। जवाब मिला- यदि कृष्ण स्वस्थ हुए तो उनके साथ नर्क भी स्वर्ग बन जाएगा। नारद की खुशी और आश्चर्य का ठिकाना न रहा। राधा की चरणरज ली और कृष्ण स्वस्थ हो गए। नारद को भी पता चला भगवान का सुख बड़ा है। यदि भगवान स्वस्थ और सुखी हैं तो नर्क भी स्वर्ग बन जाता है।


भारतीयों कि शक्ति को कमजोर करने के लिए पोषित किया जा रहा है दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र को जिससे कि योग्य भारतीय मानवीय संशाधन विश्व बाजार में स्वतः उतरता रहे प्रतिक्रया स्वरुप। यहाँ मै यह नहीं कह सकता कि यह विश्व मानवता या भारतीयों के लिए अच्छा है घातक है पर इसीलिए मै जरूर कहता हूँ कि आम भारतीय जो अभिकर्ता(एजेंट) नहीं है किशी दूसरे देश का और केवल देश को ही सब कुछ समझता है उसकी शक्ति कम कर न आंकी जाय विश्व पटल पर।>>>


Tuesday, November 5, 2013

दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र और साम-दाम-दंड-भेद रुपी अस्त्र का समाज हित में प्रयोग किया जाय तभी तक ठीक है न कि सत्य को पराजित करने में और संस्कार तथा संस्कृति को नस्ट करने में: जिसे अपने संस्कार से जीता जा सकता था उसे ब्रह्मास्त्र से जीतने कि जरूरत ही क्या थी अन्यथा ब्रह्मास्त्र अपने पास रखते हुए भी मै पिछड़ा अस्त्र, दलित अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र और साम-दाम-दंड-भेद का मुह तोड़ जबाब देने से पीछे क्यों रहता? जिसे अब भी सरम न आयी हो मुझे नीचा दिखाने में मै उसे ब्रह्मास्त्र का दर्शन मै करा सकता हूँ व्यक्तिगत तौर पर(न कि सार्वजनिक तौर पर) और बता सकता हूँ कि यह सहिस्णुता और सहनशीलता ही थी कि मै हर वार का जबाब देने में सक्षम होते हुए भी सब कुछ होता देखते रहा और मुझे आशा, विश्वास और आस्था थी ईस्वर पर कि की यह ईस्वर ही है जो बतायेगा कि मै अपने जीवन में किशी भोग और पराई वस्तु कि कामना ही नहीं किया और न आज तक मंदिर में जाकर ईश्वर से अपने लिए कुछ माँगा है इसके शिवा कि विश्व में सबका कल्याण हो पर इतना जरूर है कि जिस नैतिक रूप से गिरे हुए विश्व और भारतीय समाज कि मुझे आशंका थी बारह वर्ष पूर्व वह आज प्रबल रूप धारण किये हुए है इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा। पर आज भी भारतीय संस्कृति और संस्कार कि जननी और जनक निःस्वार्थ भाव से संस्कारित और सुसंस्कृत संतान को जन्म दे रहे हैं और व्यवस्था को नियंत्रिय करने में अपना पूरा सहयोग दे रहे हैं। जय हिन्द(जम्बूद्वीप=ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी , जय भारत(अखंड भारत=भरतखंड), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


सहिष्णुता (जो हिंदुत्व कि प्रथम पहचान है) यदि पशुता और क्रूरता में बदल जाता है किशी भी कारन वस् तो परिणाम जो होता है उससे शायद यह विश्व परिचित हो गया है अच्छी तरह से।


क्या आप ने कभी विचार किया है की कि आप हिन्दू या सनातन हिन्दू बनकर जीते रहे या सनातन हिन्दू संस्कृति अजर और अमर रहे इस लिए कोई अपने को मुसलमान या ईसाई बनाकर जी रहा हो रहा है? बात बहुत छोटी से है पर घाव बहुत गम्भीर है न ?--------------|---------||धन्य सो द्विज(ब्राह्मण) निज धर्म न टरई(अपना धर्म किशी कीमत पर न छोड़े)।।--------|------||धन्य जन्म द्विज भगती अभंगा (जिस ब्राह्मण की भगति अटूट हो भगवान् राम के प्रति उसका जन्म धन्य है)||