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Tuesday, December 31, 2013

जहाँ योगयोगेस्वर श्रीकृष्ण की बाल लीला और उनका गीता के उपदेश का एक-एक श्लोक शोध के परिणाम कि तरह है और वह स्वयं पुनः शोध करने योग्य है वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का राम वाण योग और उनका जीवन के हर प्रसंग और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार शोध का विषय है और शोध हो भी रही हैं।


जहां योग योगेश्वर श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में उद्धृत स्लोकों के माध्यम से (अर्जुन को दिए उपदेश से ) और अपनी बाल लीलाओं से समाज को शिक्षा दी वही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अपने जीवन दर्शन से ही समाज में हर अवस्था में जीवन जीने वाले के लिए शिक्षा दी है।


Friday, December 27, 2013

(#1) (अंत:करण 4 ) मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार; (#2) (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण; (#3) (तन्मात्रायें 5) गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द; (#4) (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद, हस्त, उपस्थ (nursing), पायु (मलद्वार|गुदा), वाक् (बोलने कि प्रक्रिया); (#5) ( महाभूत 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश| 24 तत्वों से आत्मा-शरीर-समाज प्रभावित होता है और आत्मा-शरीर-समाज से इस्वर प्रभावित होता है| अतः इन सभी २४ तत्वों में संतुलन अति आवश्यक है शरीर, समाज, आत्मा और इस्वर को शांति और संतुलन में रखने के लिए|--Shrimadbhagvat Geeta By Maharshi Ved Vyas|

(#1) (अंत:करण 4 ) मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार; (#2) (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण; (#3) (तन्मात्रायें 5) गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द; (#4) (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद, हस्त, उपस्थ (nursing), पायु (मलद्वार|गुदा), वाक् (बोलने कि प्रक्रिया); (#5) ( महाभूत 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश| 24 तत्वों से आत्मा-शरीर-समाज प्रभावित होता है और आत्मा-शरीर-समाज से इस्वर प्रभावित होता है| अतः इन सभी २४ तत्वों में संतुलन अति आवश्यक है शरीर, समाज, आत्मा और इस्वर को शांति और संतुलन में रखने के लिए|--Shrimadbhagvat Geeta By Maharshi Ved Vyas|

Tuesday, December 24, 2013

भगवान् शिव माता पार्वती से: धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)| -----श्रीराम चरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसी दास।


"गगन उड़ै राज पवन प्रसंगा, नीचही मिलहि कीच जल संगा"। ( जो लोग चन्दन कि तरह दृण विश्वासी होते है वे अपना स्वभाव नहीं छोड़ते हैं पर जो लोग विचलित होने वाली प्रकृति के होते हैं वे उस कण कि तरह होते हैं जो वायु के संग(अच्छी संगती) में आने पर आकाश पर चढ़ते हैं (उन्नति को प्राप्त होते है) और जल (अधोगामी प्रवृत्ति वाले) की संगती करने पर कीचड कि तरह अमर्यादित श्रेणी को प्राप्त होते हैं। -----श्रीराम चरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसी दास।


Wednesday, December 18, 2013

श्रीकृष्ण वह थे जिन्होंने श्रीराम के रूप में जीवन के अपूर्ण वादों के लिए रासलीला की जिसमे कामदेव कि चुनौती को स्वीकार कर काम को पराजित किया, सत्य कि स्थापना की और अपने जीवन को भी ज़रा (पूर्व में बालि) नामक बहेलिये के हांथों त्याग दिए सत्य को स्थापित करने के लिए। इस प्रकार पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम को प्राप्त हुए श्रीराम कि तरह। अतः मित्रों समाज को ऐसे श्रीराम और श्रीकृष्ण कि आवश्यकता है न कि रासलीला को चरित्रहीनता के रूप में परिभाषित कर असत्य, अनैतिक और अमानवीय कृत्य करने वालों की।*******जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण कहो या राम।


शैव और वैस्नव दोनों को जो मान्य है वह है भगवान् शिव का भगवान् श्रीराम (विष्णु अवतार) को संदर्भित कर कहा गया कथन: भगवान् शिव माता पार्वती से: धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)| ---- धन्य सो भूप निति जो करई(वह राजा धन्य है जो नीतियों के अनुसार शासन करता है)|"धन्य सो देश जह सुरसरि बहई(वह देश धन्य है जिसमे गंगा नदी बहती है) । ~--------धन्य नारी पतिव्रत अनुसरहीं|| धन्य सो भूप निति जो करई| धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई (वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से विरत कभी न होता हो या अपना धर्म छोड़ कोई दूसरा धर्म न अपनाता हो)॥ सो धन धन्य प्रथम गति जाकी (वह धन धन्य है जो समाज के उपकार में लगाया जाय )। धन्य पुण्य रत मति सोई पाकी (वह बुद्धि धन्य है जो पुन्य के कार्य सामाजिक नवनिर्माण में लगाई जाय) ॥धन्य घरी सोई जब सतसंगा (वह समय धन्य है जो सत्संग करने में प्रयुक्त हुआ हो) । धन्य जन्म द्विज भगती अभंगा (जिस ब्राह्मण की भगति अटूट हो भगवान् राम के प्रति उसका जन्म धन्य है) ॥ सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (हे उमा-पार्वती वह कुल धन्य है जिसमे पूरे जगत के पूज्य और पवित्रता में भी सर्वश्रेष्ठ (सु-पुनीत) का जन्म हो इसका मतलब श्री राम का रघुकुल= इक्शाकुवंश= शूर्यवंश धन्य है)। श्रीरघुवीर परायण जेहिं नर उपज विनीत (विनय युक्त =विनम्रता और शिस्टाचारयुक्त व्यक्ति (RESPECTFUL= COURTEOUS =Gentleman =सज्जन पुरुष)=और ऐसे रघुवीर का परायण मतलब रघुवीर में अभीस्त श्रध्धा वाला वही हो सकता है जी जिसके अन्दर विनीत (विनम्रता-विनययुक्त) की उपज हो )


Friday, December 13, 2013

जानकारी के लिए दशरथ (कश्यप) के कुलगुरु वशिस्ठ तो वहीं वशुदेव (कश्यप) के कुलगुरु शांडिल्यगोत्रीय {शांडिल्य=कश्यप और वशिस्ठ के समवेत रूप} और नन्द के कुलगुरु गर्गगोत्रीय(कश्यप के पुत्र वरुण और वरुण के पुत्र बाल्मीकि तथा बाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज और भारद्वाज के शिष्य परम्परा कि संतान गर्ग) थे


जो कश्यप गोत्र दुनिया के सभी प्रकार के लोगों को सनातन हिन्दू धर्म में शरण देता है और जिसमे सर्वाधिक विष्णु अवतार हुए श्रीराम और श्रीकृष्ण समेत और सभी प्रकार के योग्य से योग्य देवता और विकराल दैत्य जन्म लिए अदिति और दिति के पुत्र के रूप में उसमे दुनिया के किशी भी प्रकार के व्यक्ति को सत्य के रास्ते पर लाने के लिए एक समान दंड का भी प्रावधान है वह चाहे छोटे समाज से आता हो या बड़े उसमे कोई विभेद नहीं। अतः कोई अपने को छोटे या बड़े समाज का बताकर अनावश्यक भेद-भाव का बखेड़ा खड़ा कर सामाजिक न्याय कि आड़ में बच नहीं सकता सत्य से उसे आज नहीं तो कल दंड स्वीकार करना ही होगा।


Thursday, December 5, 2013

रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को जो लोग जानते है वह यह भी जानते हैं कि रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ स्वयं संघ परिवार कहलाता है। मेरे विचार से अब जब अंतररास्ट्रीय सीमाएं एक दूसरे के लिए खोल दी गयी है भौगोलीकरण के कारन तो अंतररास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कि विशेष जरूरत है रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ-साथ इस विश्व व्यवस्था नियंत्रित करने के लिए और इस प्रकार एक अंतररास्ट्रीय संघ परिवार बनेगा जिसमे विभिन्न जाती, धर्म, संस्कृति और देश के लोग होंगे। इस प्रकार वसुधैव कुटुम्बकम कि भावना से पूरा विश्व ओत-प्रोत होगा न कि केवल भारत ही।*******वन्दे माँ (भारत माँ -पृथ्वी माँ) तरम।


पूरी दुनिया में शैव विचार धारा के लोग स्वतन्त्रता से भ्रमण कर सकते हैं खान-पान को ध्यान में रखते हुए पर वैष्णविस्ट विचार के लोगों को भारत या विशेष कर उत्तर भारत में भी व्यवस्थित रूप से रहने का अधिकार न दिया गया तो यह विश्व सुरक्षित रह पायेगा क्या? शैव विचार धारा से निवेदन वैष्णविस्टों पर तरह-तरह के आरोप लगाकर उनके जीवन दर्शन में विघ्न न उत्पन्न करें अन्यथा वे भी इसी अग्नि में जलेंगे और उनको वैष्णविस्टों से ज्यादा हानि होगी अगर भौगोलिकता का ज़रा भी ध्यान होगा उनको। वैसे मै कई बार कह चुका हूँ कि तिरंगा=त्रिदेव=त्रिमूर्ति (ब्राह्मण धर्म, क्षत्रिय धर्म और वैस्य धर्म) में से प्रत्येक इस दुनिया के एक तिहाई सत्ता के स्वामी हैं उनकी कोई भी जाती हो या जलवायु या भौगोलिकता पर आधारित धर्म हो इसमे संख्याबल का कोई असर नहीं पड़ता।


Tuesday, December 3, 2013

परिवारवाद, जातिवाद और धर्मवाद/सम्प्रदायवाद के झूंठे आरोप के कारण हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश और अपयश को ध्यान में रखकर मन में उपजे डर से सत्य का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए और विशेष कर उस देश में जिसका अभिस्थ दिशानिर्देश "सत्यमेव जयते" हो। वैसे सत्य को किशी संख्याबल की जरूरत नहीं है और न उसे साक्ष्य चाहिए फिर भी मानवता सत्य के कारन ही टिकी है तो सत्य के लिए साक्ष्य बनने में क्या जा रहा है। जय तिरंगा(=त्रिदेव=त्रिमूर्ति), जय हिन्द(जम्बू द्वीप:ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्डे), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।


विशेष सन्देश: इस्लामियत रामाश्रयी के सामानांतर और ईसाइयत कृष्णाश्रयी के सामानांतर चलती है/चलता है जबकि ये गाय, गायत्री और गंगा पर श्रध्धा और विश्वास में अलग मत रखते हैं और यह अंतर केवल उनके उत्त्पत्ति स्थान के जलवायु और रहन-सहन से है। अतः मेरा भारतीय समाज से विनम्र निवेदन है कि हमें किशी धर्म से द्वेष और भय नहीं रखे वरन उच्च सभ्यता, संस्कृति और संस्कार को इस विश्व में बनाये रखने कि प्रतिस्पर्धा रखें अन्य धर्मों के साथ। और मै स्वामी जी की तरह ही पुनः दुहराता हूँ कि सनातन हिन्दू संस्कृति ही सभी धर्मों कि जड़ है।


पाँचों भूतों: पृथ्वी (स्थान=स्पेस=आधार), जल, आकाश (आकृति), अग्नी, वायु के स्वामी केदारेश्वर( शिव शंकर) ही हैं पर उनको मिलाने वाले हैं विष्णु तथा उसमे प्राण का संचार करने वाले हैं ब्रह्मा। अतः हम शिव का कोई आकार न मानकर एक लिंग के रूप में पूजते है।-----उसी प्रकार रूप-रंग, ध्वनि-शब्द-वाणी, स्पर्श, रस और गंध जैसी पांच वस्तुए जो किशी स्त्री या पुरुष में निहित है उससे मानवीय शरीर ही नहीं पूरा मानव समाज प्रभावित होता है और जो समाज या पुरुष/स्त्री इन सबसे प्रभावित होते हुए भी ( प्रभावित तो हर कोई होता इससे कोई इंकार नहीं कर सकता क्योंकि यह अकाट्य सत्य और परम विज्ञानं है इसे मै ही नहीं श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय के सुरु में ही दिया गया है-जिसे उस समय के लिए परमब्रह्म बने श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेशित किया है ) जो संतुलन नहीं खोता वह व्यक्ति और समाज श्रेष्ठ कहलाता है। ---------अतः मै यह कहना चाहूंगा की यह पांच वस्तुए नए रूप में विज्ञान की नयी नयी खोज के साथ आकर मानव तथा मानव समाज को प्रभावित करती है और विशेष रूप से कम्पुटर युग ने भारतीय समाज को भी प्रभावित किया इसमे कोई संदेह नहीं पर इसके दुस्परिनाम से भारतीय समाज बहुत ही अल्प समय तक प्रभावित रहा मतलब केवल १०-१४ (दस-चौदह) साल तक। हम भारतीय समाज की इसी विशेषता को बनाये रखने के लिए विश्व के इन तीन प्रमुख अधरों "ब्रह्मा, विष्णु, और महेश=शिव शंकर" की वंदना करे और विश्व शांति में योगदान करें: Vishesh: मेरा विरोध करने वाले धनपशु और बाहुबली व्यक्ति, देश और समाज २००१ में दंड पा चुके हैं और सायद अब अपने पिता-माता और गुरु के भी बाप बनने की हिम्मत करोड़ों वर्ष तक नहीं करेंगे वे लोग।


PRAYER तो LORD BRAHMA: ॐ, ॐ, ॐ, ॐ, ॐ,ॐ,ॐ। ॐ नमः ब्रह्मदेवाय।


PRAYER TO LORD SHIVA--------"गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं, गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्| भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं, भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्||"=(हे शिव आप) जो कैलाशपति हैं, गणों के स्वामी, नीलकंठ हैं, (धर्म स्वरूप वृष) बैल की सवारी करते हैं, अनगिनत गुण वाले हैं, संसार के आदि कारण हैं, प्रकाश पुञ सदृश्य हैं, भस्मअलंकृत हैं, जो भवानिपति हैं, उन पञ्चमुख (प्रभु) को मैं भजता हूँ।


---PRAYER TO LORD VISHNU: ----"शान्ताकारं भुजग-शयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगन-सदृशम् मेघ-वर्णं शुभाङ्गम्| लक्ष्मी-कान्तं कमल-नयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||"=जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।.-