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Wednesday, December 31, 2014

With a great hope of peaceful, powerful and progressive India and World; I wish you a very Happy New Year.

With a great hope of peaceful, powerful and progressive India and World; I wish you a very Happy New Year.

सम्मान पूर्ण जीवन में अतिसह दुःख भी सहज लगता है पर अकारण अपमान पूर्ण जीवन में स्वर्ग का सुख भी कस्टकारी होता है और यदि यह दुःख मतलब अकारण अपमानजनक जीवन जिस सर्वजन के लिए जिया जाय अगर वही अकारण आप को अपमानित करें तो आप को कैसी अनुभूति होगी और आप का धैर्य कब तक बना रहेगा ? इस सम्बन्ध में पूंछता हूँ की क्या आप का धैर्य 14 वर्ष का जीवन आसानी से जीने की इजाजत देगा? मुझे नहीं लगता की दुनिया का कोई पद और कोई जीव-निर्जीव प्यारी वस्तु आप को सहारा दे पाएगी ऐसी स्थिति में जीने के लिए अपितु दुनिया के लिए अपने से जुड़े हर वस्तु के त्याग की भावना और सृजनात्मक विचार ही आप को ऐसे जीवन जीने की शक्ति दे सकते हैं और आम व्यक्ति के रूप में अपना भी निजी जीवन जीने की प्रेरणा दे सकते है।

सम्मान पूर्ण जीवन में अतिसह दुःख भी सहज लगता है पर अकारण अपमान पूर्ण जीवन में स्वर्ग का सुख भी कस्टकारी होता है और यदि यह दुःख मतलब अकारण अपमानजनक जीवन जिस सर्वजन के लिए जिया जाय अगर वही अकारण आप को अपमानित करें तो आप को कैसी अनुभूति होगी और आप का धैर्य कब तक बना रहेगा ? इस सम्बन्ध में पूंछता हूँ की क्या आप का धैर्य 14 वर्ष का जीवन आसानी से जीने की इजाजत देगा? मुझे नहीं लगता की दुनिया का कोई पद और कोई जीव-निर्जीव प्यारी वस्तु आप को सहारा दे पाएगी ऐसी स्थिति में जीने के लिए अपितु दुनिया के लिए अपने से जुड़े हर वस्तु के त्याग की भावना और सृजनात्मक विचार ही आप को ऐसे जीवन जीने की शक्ति दे सकते हैं और आम व्यक्ति के रूप में अपना भी निजी जीवन जीने की प्रेरणा दे सकते है। 

Tuesday, December 30, 2014

तलवार और तिकड़म मतलब बाहुबल, धनबल और कुमार्गी बुद्धि(कुबुद्धि) से सत्य नहीं बदलता है: मार्च, 2000 से लेकर दिसंबर, 2014 तक के सामूहिक सहयोग और अप्रैल, 2014 से लेकर दिसम्बर, 2014 तक का एकल प्रयास श्रद्धा और विशवास के साथ केदारेश्वर:आदिशंकर:आद्यशंकर को समर्पित है (शिव के तीन मूल स्वरुप केदारेश्वर, महामृत्युंजय और विश्वेश्वर/विश्वनाथ में भी केदारेश्वर ही आदिशिव:आदिशंकर है जो सर्वप्रथम इस सृस्टि में काशी में प्रकट हुए थे और यही शिव-शंकर द्वितीय स्थान हिमालय:हिमगिरि के कैलाश पर्वत को धारण किये थे जिससे एक प्रकार से ये भी गिरिधर हुए धौलागिरी धारी, हनुमान; गोवर्धन धारी, श्रीकृष्ण; धरणीधर/शेषनाग; और मेरु पर्वत/मदिराचल धारी, कुर्मावतारी विष्णु की तरह )। जो अवसर मिलने पर भी इसमें शामिल न हो सका मतलब प्रथम न हो सका वह वरिष्ठ पद पर जाने पर भी वरिष्ठ पद पर भी द्वितीय रहेगा इसमे मै कुछ नहीं कर सकता और न इसमे मेरा कोई दोस और विद्वेष या पक्षपात नहीं है वल्कि यह नियति है(वह न्याति जिसने ऐसा किया और जो मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय को यह आभास दिलाया था की मै सतयुग में एक सूर्यवंशीय ग्वाला था जो राजा केदार को केदारनाथ और पशुपतिनाथ बनाने का कारक हुआ था और जिसके मूल में राजा केदार में शिवभक्ति और शिवशक्ति थी जिसकी मदांधता और दुरुपयोग शामिल था और जो शिवभक्त को मुक्ति दे सकता है वह शिवांश ही हो सकता है तो जाहिर सी बात है की वह सूर्यवंशीय ग्वाला भी शिवांश ही रहा होगा और वह मै ही था ऐसा नियति ने ऐसा इंगित किया है और इस युग में शिव के कार्य में आया यह मेरा गौरव है) :

तलवार और तिकड़म मतलब बाहुबल, धनबल और कुमार्गी बुद्धि(कुबुद्धि) से सत्य नहीं बदलता है: मार्च, 2000 से लेकर दिसंबर, 2014 तक के सामूहिक सहयोग और अप्रैल, 2014 से लेकर दिसम्बर, 2014 तक का एकल प्रयास श्रद्धा और विशवास के साथ केदारेश्वर:आदिशंकर:आद्यशंकर को समर्पित है (शिव के तीन मूल स्वरुप केदारेश्वर, महामृत्युंजय और विश्वेश्वर/विश्वनाथ में भी केदारेश्वर ही आदिशिव:आदिशंकर है जो सर्वप्रथम इस सृस्टि में काशी में प्रकट हुए थे और यही शिव-शंकर द्वितीय स्थान हिमालय:हिमगिरि के कैलाश पर्वत को धारण किये थे जिससे एक प्रकार से ये भी गिरिधर हुए धौलागिरी धारी, हनुमान; गोवर्धन धारी, श्रीकृष्ण; धरणीधर/शेषनाग; और मेरु पर्वत/मदिराचल धारी, कुर्मावतारी विष्णु की तरह )। जो अवसर मिलने पर भी इसमें शामिल न हो सका मतलब प्रथम न हो सका वह वरिष्ठ पद पर जाने पर भी वरिष्ठ पद पर भी द्वितीय रहेगा इसमे मै कुछ नहीं कर सकता और न इसमे मेरा कोई दोस और विद्वेष या पक्षपात नहीं है वल्कि यह नियति है(वह न्याति जिसने ऐसा किया और जो मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय को यह आभास दिलाया था की मै सतयुग में एक सूर्यवंशीय ग्वाला था जो राजा केदार को केदारनाथ और पशुपतिनाथ बनाने का कारक हुआ था और जिसके मूल में राजा केदार में शिवभक्ति और शिवशक्ति थी जिसकी मदांधता और दुरुपयोग शामिल था और जो शिवभक्त को मुक्ति दे सकता है वह शिवांश ही हो सकता है तो जाहिर सी बात है की वह सूर्यवंशीय ग्वाला भी शिवांश ही रहा होगा और वह मै ही था ऐसा नियति ने ऐसा इंगित किया है और इस युग में शिव के कार्य में आया यह मेरा गौरव है) :
http://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies
https://archive.today/H6mc5
https://profiles.google.com/vkpandey75/about?hl=en
https://archive.today/4HDpi


Sunday, December 28, 2014

अतः अगर मेरे अभी अल्प समय पूर्व (इसके एक क्रम पूर्व) पोस्ट/स्क्रैप/लिखित तर्क सत्य है तो मै सत्य हूँ और इस सरस्वती के उद्गम से निकली हर बात सत्य है और जो मेरे ब्लॉग "Vivekanand and Moderm Tradition" में लिपि बद्ध है हर बात सत्य है। अब मुझे कुछ और नहीं कहना।



अतः अगर मेरे अभी अल्प समय पूर्व (इसके एक क्रम पूर्व) पोस्ट/स्क्रैप/लिखित तर्क सत्य है तो मै सत्य हूँ और इस सरस्वती के उद्गम से निकली हर बात सत्य है और जो मेरे ब्लॉग "Vivekanand and Moderm Tradition" में लिपि बद्ध है हर बात सत्य है। अब मुझे कुछ और नहीं कहना।

मुस्लिम स्वयं ईसाइयत का बड़ा भाई कैसे नहीं हुआ जब बड़े भाई (मुस्लिम मूल के बड़े भाई) को अपनी सुरक्षा में लगा दिया है। -पातालपुर के नरेश/नरेंद्र, सुवर्चला/हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर पुत्र, मकरध्वज; और रावण के विश्व-व्यापी माफिया भाई, अहिरावण 2008 के प्रथम छमाही के समीप में सप्रमाण अशोकचक्र तोडकर 2008/2009 में मेरा सामना करने के लिए हुसैन(मुस्लिम मूल) नामधारी रुपी नैया की सवारी कर लिए है तब से आज तक, देखते है यह नाव कब तक समुद्र में तैरती रहेगी विना हार और गलती स्वीकारे।-------मुस्लिम स्वयं ईसाइयत का बड़ा भाई कैसे नहीं हुआ जब बड़े भाई (मुस्लिम मूल के बड़े भाई) को अपनी सुरक्षा में लगा दिया है।



मुस्लिम स्वयं ईसाइयत का बड़ा भाई कैसे नहीं हुआ जब बड़े भाई (मुस्लिम मूल के बड़े भाई) को अपनी सुरक्षा में लगा दिया है। -पातालपुर के नरेश/नरेंद्र, सुवर्चला/हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर पुत्र, मकरध्वज; और रावण के विश्व-व्यापी माफिया भाई, अहिरावण 2008 के प्रथम छमाही के समीप में सप्रमाण अशोकचक्र तोडकर 2008/2009 में मेरा सामना करने के लिए हुसैन(मुस्लिम मूल) नामधारी रुपी नैया की सवारी कर लिए है तब से आज तक, देखते है यह नाव कब तक समुद्र में तैरती रहेगी विना हार और गलती स्वीकारे।-------मुस्लिम स्वयं ईसाइयत का बड़ा भाई कैसे नहीं हुआ जब बड़े भाई (मुस्लिम मूल के बड़े भाई) को अपनी सुरक्षा में लगा दिया है। 

पातालपुर के नरेश/नरेंद्र, सुवर्चला/हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर पुत्र मकरध्वज और रावण के विश्व-व्यापी माफिया भाई, अहिरावण 2008 के प्रथम छमाही के समीप में सप्रमाण अशोकचक्र तोडकर 2008/2009 में मेरा सामना करने के लिए हुसैन(मुस्लिम मूल) नामधारी रुपी नैया की सवारी कर लिए है तब से आज तक देखते है यह नाव कब तक समुद्र में तैरती रहेगी विना हार और गलती स्वीकारे।

पातालपुर के नरेश/नरेंद्र, सुवर्चला/हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर पुत्र मकरध्वज और रावण के विश्व-व्यापी माफिया भाई, अहिरावण 2008 के प्रथम छमाही के समीप में सप्रमाण अशोकचक्र तोडकर 2008/2009  में मेरा सामना करने के लिए हुसैन(मुस्लिम मूल) नामधारी रुपी नैया की सवारी कर लिए है तब से आज तक देखते है यह नाव कब तक समुद्र में तैरती रहेगी विना हार और गलती स्वीकारे। 

Friday, December 26, 2014

अगस्त, 2008 में भारतीय विज्ञानं संस्थान में पूर्व के सम्बन्ध में कहा था की डॉन(भगवा) भाई अशोकचक्र टूट गया क्योंकि प्रयागराज/अल्लाहआबाद के अहमद बंधू रियल स्टेट के धंधे में पड़ गए हैं और धनपशुओं की होड़ में आकर वे अपने वास्तविक कार्य से कुछ हद तक विरत हो गए है और इसप्रकार वे अशोक चक्र को टूटने से नहीं बचा पा रहे हैं इसलिए मुझे एक स्थायित्व देकर प्रयागराज/अल्लाहआबाद बुला लीजिये देखिये की अशोक चक्र पर कोई हाँथ नहीं लगा सकेगा।



अगस्त, 2008 में भारतीय विज्ञानं संस्थान में पूर्व के सम्बन्ध में कहा था की डॉन(भगवा) भाई अशोकचक्र टूट गया क्योंकि प्रयागराज/अल्लाहआबाद के अहमद बंधू रियल स्टेट के धंधे में पड़ गए हैं और धनपशुओं की होड़ में आकर वे अपने वास्तविक कार्य से कुछ हद तक विरत हो गए है और इसप्रकार वे अशोक चक्र को टूटने से नहीं बचा पा रहे हैं इसलिए मुझे एक स्थायित्व देकर प्रयागराज/अल्लाहआबाद बुला लीजिये देखिये की अशोक चक्र पर कोई हाँथ नहीं लगा सकेगा।

आह्वान किया था डॉन(भगवा) और बबलू(तिरंगा:तिरंगा के तीनों रंगों को मिलाने पर यह भगवा में स्वयं समाहित हो जाता है) भाई से की ख़त्म कर दो ऐसे सभी तकनिकी और विज्ञान संस्थानों को जहा ऐसी देवियाँ और देवता जन्म ले रहे है जो देश और संसद का क्रय-विक्रय कर रहे हैं और जो संस्थान वास्तविक राम-कृष्ण और सीता-राधा को शेष नहीं बचने दे रहे हों जिनमे मानवीय मूल्य और भारतीय संस्कार जीवित हों।---------फरवरी , 2008 में भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु में जब आप को बिलगेट्स में एक सिंधिया क्षत्रिय-वैश्य नजर आ रहा था और उसकी थैली हिला देने से भारतीय संसद का क्रय-विक्रय हो रहा था और हम आप को नजर नहीं आ रहे थे तो यदि ऐसे ही राम-कृष्ण और सीता और राधा जन्म ले रहे थे ऐसे विज्ञान और तकनीकी संस्थान से तो इसी लिए मई ऑरकुट पर लिखा था की मै अपने गाँव रामपुर जाकर दो बैल खरीदूंगा और हल जोतूंगा(जैसा की मुझे बैलों से हल जोतना आता भी है) उनसे लेकिन यह तकनिकी और विज्ञान हमें नहीं चाहिए और--------------- आह्वान किया था डॉन और बबलू भाई से की ख़त्म कर दो ऐसे सभी तकनिकी और विज्ञान संस्थानों को जहा ऐसी देवियाँ और देवता जन्म ले रहे है जो देश और संसद का क्रय-विक्रय कर रहे हैं और जो संस्थान वास्तविक राम-कृष्ण और सीता-राधा को शेष नहीं बचने दे रहे हों जिनमे मानवीय मूल्य और भारतीय संस्कार जीवित हों।


http://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur
http://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur
http://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

https://archive.today/H6mc5#selection-319.16-319.23



आह्वान किया था डॉन(भगवा) और बबलू(तिरंगा:तिरंगा के तीनों रंगों को मिलाने पर यह भगवा में स्वयं समाहित हो जाता है) भाई से की ख़त्म कर दो ऐसे सभी तकनिकी और विज्ञान संस्थानों को जहा ऐसी देवियाँ और देवता जन्म ले रहे है जो देश और संसद का क्रय-विक्रय कर रहे हैं और जो संस्थान वास्तविक राम-कृष्ण और सीता-राधा को शेष नहीं बचने दे रहे हों जिनमे मानवीय मूल्य और भारतीय संस्कार जीवित हों।---------फरवरी , 2008 में भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु में जब आप को बिलगेट्स में एक सिंधिया क्षत्रिय-वैश्य नजर आ रहा था और उसकी थैली हिला देने से भारतीय संसद का क्रय-विक्रय हो रहा था और हम आप को नजर नहीं आ रहे थे तो यदि ऐसे ही राम-कृष्ण और सीता और राधा जन्म ले रहे थे ऐसे विज्ञान और तकनीकी संस्थान से तो इसी लिए मई ऑरकुट पर लिखा था की मै अपने गाँव रामपुर जाकर दो बैल खरीदूंगा और हल जोतूंगा(जैसा की मुझे बैलों से हल जोतना आता भी है) उनसे लेकिन यह तकनिकी और विज्ञान हमें नहीं चाहिए और--------------- आह्वान किया था डॉन और बबलू भाई से की ख़त्म कर दो ऐसे सभी तकनिकी और विज्ञान संस्थानों को जहा ऐसी देवियाँ और देवता जन्म ले रहे है जो देश और संसद का क्रय-विक्रय कर रहे हैं और जो संस्थान वास्तविक राम-कृष्ण और सीता-राधा को शेष नहीं बचने दे रहे हों जिनमे मानवीय मूल्य और भारतीय संस्कार जीवित हों।

Wednesday, December 24, 2014

यह तो केवल आँशु का प्रभाव था की दुनिया थर्रा गयी।--------एक पूर्ण मुसलमान (मुसल्लम+ईमान= पूर्ण +ईमान= सम्पूर्ण ईमानदार ) के रूप में आप किशी को बर्दास्त भी न कर सके और एक दलित और ईसाई (यद्द्यपि यह आभासी स्वरुप ही था) के रूप में में आप उसे देखना नहीं चाहते थे तो कम से कम इतनी कृपा कीजिये की एक सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ही रहने दीजिये उसे क्योंकि वह यही था तभी तो एक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य, मुस्लमान और दलित और ईसाई की अवस्था में होते हुए भी सब कुछ हो जाने के बाद भी एक सनातन ब्राह्मण/हिन्दू बना रहा। और यदि वह सनातन कश्यप गोत्रीय उच्चतम आचरण न करता तो उसके विशेष वंसज सूर्यवंशीय, चन्द्र वंशीय, सवर्ण गोत्रीय, नाग-वंशीय, किन्नर वंशीय और गणेश, कार्तिकेय और त्रिदेवों के अलावा अन्य सभी देव तथा उसी कश्यप के पुत्र वरुण के पुत्र वाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज गोत्रीय सहित भारद्वाज के शिष्य गर्ग गोत्रीय भी किसका अनुसरण करते भविष्य में इस विश्व समुदाय में अपने गौरव और मर्यादा की रक्षा हेतु।--- यह तो केवल आँशु का प्रभाव था की दुनिया थर्रा गयी।

यह तो केवल आँशु का प्रभाव था की दुनिया थर्रा गयी।--------एक पूर्ण मुसलमान (मुसल्लम+ईमान= पूर्ण +ईमान= सम्पूर्ण ईमानदार ) के रूप में आप किशी को बर्दास्त भी न कर सके और एक दलित और ईसाई (यद्द्यपि यह आभासी स्वरुप ही था) के रूप में में आप उसे देखना नहीं चाहते थे तो कम से कम इतनी कृपा कीजिये की एक सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ही रहने दीजिये उसे क्योंकि वह यही था तभी तो एक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य, मुस्लमान और दलित और ईसाई की अवस्था में होते हुए भी सब कुछ हो जाने के बाद भी एक सनातन ब्राह्मण/हिन्दू बना रहा। और यदि वह सनातन कश्यप गोत्रीय उच्चतम आचरण न करता तो उसके विशेष वंसज सूर्यवंशीय, चन्द्र वंशीय, सवर्ण गोत्रीय, नाग-वंशीय, किन्नर वंशीय और गणेश, कार्तिकेय और त्रिदेवों के अलावा अन्य सभी देव तथा उसी कश्यप के पुत्र वरुण के पुत्र वाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज गोत्रीय सहित भारद्वाज के शिष्य गर्ग गोत्रीय भी किसका अनुसरण करते भविष्य में इस विश्व समुदाय में अपने गौरव और मर्यादा की रक्षा हेतु।--- यह तो केवल आँशु का प्रभाव था की दुनिया थर्रा गयी।

Tuesday, December 23, 2014

जिनके दिमाग में एन्टी-सवर्ण या एन्टी-ब्राह्मण का भूत सवार रहता है उनको मै बता देना चाहता हूँ कि जितने भी युग हुए हैं उनमे लडकिया ब्रह्मा के पुत्र राजा दक्ष कि ही पुत्री रही हैं चाहे वह राजा दक्षप्रजापति रहे हों या या अन्य कोई राजा दक्ष। तो मेरे मित्र ब्रह्मा के ये पुत्र राजा दक्ष कि पुत्रिया ब्राह्मण ही रही है और आप को यह भी पता होगा कि बिना स्त्री के या पत्नी के या प्रकृति के कोई श्रीस्ती नहीं चलती है तो कम से कम सबकी माँ इन्ही ब्राह्मण लड़कियों कि पुत्री होंगी। राजा दक्षा प्रजापति की विख्यात पुत्रियों कि जोड़ी सती (पारवती):महादेव शिव और अदिति:कश्यप है। और दक्ष कि अन्य सभी पुत्रियों से भी कश्यप ऋषि कि शादी हुई और उनकी जो पुत्रिया हुई उनसे अन्य ऋषियों कि शादी हुई। और इस प्रकार ऋषि परम्परा से मानव सभ्यता कि जब सुरु आत हो गयी तो इन्ही ऋषि संतानों से सृस्टि का विकाश हुआ।अतः आप अपने अभियान को किशी के एंटी नहीं वरन अपने संवर्धन के लिए चलाइये और आप सायद संवर्धन का मतलब समझते होंगे जैसा कि इसमे सामाजिक सौहार्द्र सहित अपना विकाश निहित है।

जिनके दिमाग में एन्टी-सवर्ण या एन्टी-ब्राह्मण का भूत सवार रहता है उनको मै बता देना चाहता हूँ कि जितने भी युग हुए हैं उनमे लडकिया ब्रह्मा के पुत्र राजा दक्ष कि ही पुत्री रही हैं चाहे वह राजा दक्षप्रजापति रहे हों या या अन्य कोई राजा दक्ष। तो मेरे मित्र ब्रह्मा के ये पुत्र राजा दक्ष कि पुत्रिया ब्राह्मण ही रही है और आप को यह भी पता होगा कि बिना स्त्री के या पत्नी के या प्रकृति के कोई श्रीस्ती नहीं चलती है तो कम से कम सबकी माँ इन्ही ब्राह्मण लड़कियों कि पुत्री होंगी। राजा दक्षा प्रजापति की विख्यात पुत्रियों कि जोड़ी सती (पारवती):महादेव शिव और अदिति:कश्यप है। और दक्ष कि अन्य सभी पुत्रियों से भी कश्यप ऋषि कि शादी हुई और उनकी जो पुत्रिया हुई उनसे अन्य ऋषियों कि शादी हुई। और इस प्रकार ऋषि परम्परा से मानव सभ्यता कि जब सुरु आत हो गयी तो इन्ही ऋषि संतानों से सृस्टि का विकाश हुआ।अतः आप अपने अभियान को किशी के एंटी नहीं वरन अपने संवर्धन के लिए चलाइये और आप सायद संवर्धन का मतलब समझते होंगे जैसा कि इसमे सामाजिक सौहार्द्र सहित अपना विकाश निहित है।

Wednesday, December 17, 2014

अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है। ---------जब कोई सनातन ब्राह्मण बने रहने की कीमत चुका दिया हो(त्याग की भी सीमा भी छोटी पड़ गयी हो जिसमे किशी द्वारा जिसकी मृत्यु तो संभव ही नहीं थी कम से कम 2057 (19657-2057=100) तक तो ऐसे में किशी व्यक्ति विशेष और सम्पूर्ण मानव समाज को शूद्रता से बचाये रखने हेतु स्वयं शूद्रवत और अमानवीय कार्य के बदले दिए जाने वाले सामाजिक अपमान और तिरस्कार का घूँट भी विना किशी दोष के पीने हेतु तैयार होकर और नव निर्माण के साथ सृस्टि के सृजनात्मक कार्य को परिणति तक पहुंचाकर और श्रेष्ठतम समाज में स्थान बनाकर) और एक सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण के चरित्र और कर्त्तव्य निर्वहन किया हो प्रयागराज में रहते हुए भी और प्रयागराज के अलग किशी भी दशा और दिशा में तो वह किशी की दया का पात्र नहीं जो अपने को किशी विश्व महाशक्ति के डर वस एक ब्राह्मण होने पर गर्व महसूस न कर सके जिस युग में सनातन ब्राह्मण तो क्या एक ब्राह्मण का चरित्र निर्वहन ही दुर्लभ हो। वरन उसकी जो स्वयं की सामर्थ्य है वह तो विश्व महा शक्ति को ऋणातक बनाते हुए (विश्व महा शक्ति की शक्ति को समाप्त कर और मानवमूल्य के अनुपालन में पुनः उसका सृजन कर ) देने के वाद शेष बची है। अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है।



अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है। ---------जब कोई सनातन ब्राह्मण बने रहने की कीमत चुका दिया हो(त्याग की भी सीमा भी छोटी पड़ गयी हो जिसमे किशी द्वारा जिसकी मृत्यु तो संभव ही नहीं थी कम से कम 2057 (19657-2057=100) तक तो ऐसे में किशी व्यक्ति विशेष और सम्पूर्ण मानव समाज को शूद्रता से बचाये रखने हेतु स्वयं शूद्रवत और अमानवीय कार्य के बदले दिए जाने वाले सामाजिक अपमान और तिरस्कार का घूँट भी विना किशी दोष के पीने हेतु तैयार होकर और नव निर्माण के साथ सृस्टि के सृजनात्मक कार्य को परिणति तक पहुंचाकर और श्रेष्ठतम समाज में स्थान बनाकर) और एक सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण के चरित्र और कर्त्तव्य निर्वहन किया हो प्रयागराज में रहते हुए भी और प्रयागराज के अलग किशी भी दशा और दिशा में तो वह किशी की दया का पात्र नहीं जो अपने को किशी विश्व महाशक्ति के डर वस एक ब्राह्मण होने पर गर्व महसूस न कर सके जिस युग में सनातन ब्राह्मण तो क्या एक ब्राह्मण का चरित्र निर्वहन ही दुर्लभ हो। वरन उसकी जो स्वयं की सामर्थ्य है वह तो विश्व महा शक्ति को ऋणातक बनाते हुए (विश्व महा शक्ति की शक्ति को समाप्त कर और मानवमूल्य के अनुपालन में पुनः उसका सृजन कर ) देने के वाद शेष बची है। अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है।

Thursday, December 11, 2014

A (AA:Comes from All Direction) + Nand (Sponteneous spiritual and devotional Joy) = Anand: - Act/Ability of availing Happiness(Spiritual and Devotional) sponteneously from all the possible direction


  • A (AA:Comes from All Direction) + Nand (Sponteneous spiritual and devotional Joy) = Anand: - Act/Ability Availing Happiness sponteneously from all the possible direction.

Wednesday, December 10, 2014

इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है:- दशरथ नंदन राम (श्रीराम) और जनक नंदिनी रामा(सीता) एक दूसरे के पूरक और प्रेरक हैं| अतः आप राम और रामा को अलग नहीं कर सकते हैं और इस प्रकार रामा=श्री=लक्ष्मी और राम को एक साथ हम श्रीराम के रूप में पाते हैं और रामाराम ही श्रीराम हो जाता है। इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है मतलब कुलदेवी महाकाली(महालक्ष्मी+महा सरस्वती+महागौरी:पारवती) वाले मेरे गाँव के प्रेरक और श्रद्धेय श्रीराम (रामाराम) ही है ।



इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है:- दशरथ नंदन राम (श्रीराम) और जनक नंदिनी रामा(सीता) एक दूसरे के पूरक और प्रेरक हैं| अतः आप राम और रामा को अलग नहीं कर सकते हैं और इस प्रकार रामा=श्री=लक्ष्मी और राम को एक साथ हम श्रीराम के रूप में पाते हैं और रामाराम ही श्रीराम हो जाता है। इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है मतलब कुलदेवी महाकाली(महालक्ष्मी+महा सरस्वती+महागौरी:पारवती) वाले मेरे गाँव के प्रेरक और श्रद्धेय श्रीराम (रामाराम) ही है ।


Tuesday, December 9, 2014

अगर किशी के आंका कोई कार्य देते हैं तो उनको पता होता है की अमुक कार्य मेरा कार्यवाहक या स्वयं सेवक कर लेगा परन्तु तीन-तीन आंका कार्यभार देते है और स्वयं उनको ही नहीं पता होता है की क्या इसका परिणाम होने वाला है अगर ज़रा सी भी सावधानी हटी और अनुशासन और संयम भांग हुआ परन्तु जिसको यह कार्य संपादित करना है वह स्वयं सेवक यह समझ रहा हो और इस कार्य की जिम्म्देदारी लेने से मना कर रहा हो तो समझ जाना चाहिए की यह स्वयं सेवक अपने तीनों आकाओं की सम्मिलित शक्ति है जो किशी एक से ज्यादा दूर की समझ और क्षमता रखता है यह अलग बात है की गुरु आज्ञा की मर्यादा उसे बाँध रखी थी और वह अपने अनुजों के हांथों की कठ पुतली बना रहा जिन अनुजों को ए बी सी डी भी इस आंतरिक और वाह्य परिवर्तन की न पता रही हो वरन वे तो केवल विषय और शोध क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा और पद प्राप्ति की होड़ में ही लगे रहे हों। मुझ काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से आये स्वयं सेवक के लिए शायद प्रयागराज विश्वविद्यालय प्रांतीय विश्वविद्यालय था उस समय और आज भी प्रांतीय से केंद्रीय होने की देलही क्षमता प्राप्त करने की कोशिस भर कर रहा है जो संवैधानिक रूप से इसमे से एक आंका (ब्रह्मा: परमगुरु परमेश्वर) के अथक प्रयास से विगत एक दसक से केंद्रीय हो तो गया है।--------मै पुनः कहता हूँ की मेरी मेधा शक्ति का आंकलन अपने निम्न तरीके के कुटिल चाल से न किया जाय तो इस विश्व विद्यालय और स्वयं प्रयागराज के लिए अच्छा होगा। जिस प्रयागराज विश्वविद्यालय ने प्रोफेसर राजेन्द्र गोविन्द हर्षे के कार्यकाल में विश्वविद्यालय द्वारा ही आयोजित 2008 के पूरा छात्र सम्मिलन में दो-दो निमंत्रण पत्र भेजा था एक भारतीय विज्ञानं संस्थान बेंगलुरु के पोस्ट डॉक्टरेट छात्रावास पर और दूसरा वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र के पते पर और दो बार फ़ोन भी किया गया था (948009010 और 08023600189) आने के सम्बन्ध में यात्रा विवरण और स्वयं आने के सम्बन्ध में जिसमे मैंने कहा था की क्या मेरे ताउजी प्रोफेसुर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय(परमपिता परमेश्वर) आ रहे हैं तो ऐसे में हाँ सुनाने के बाद मैंने कहा था की तब मुझे आने की जरूरत ही नहीं वे मेरे एक आंका ही समर्थ है उसको सफल बनाने में (वे दोनों निमंत्रण पत्र आज भी मेरे पास हैं)। ------कहने का मतलब यह है की अगर मेरा कार्यभार कोई ले सकता तो मै सब कुछ करने में समर्थ हूँ पर न तो ले सका और न तो ले पायेगा तो गलत आंकलन न किया जाय मेधा शक्ति का पिछला इतिहास और सार्वत्रिक प्रदर्शन भी देखा जाय क्योंकि विश्वविद्यालय सार्वभौमिक कला कौसल का जनक है। एक सनातन ब्राह्मण होते हुए जो प्रतिरोध मैंने सहे प्रति स्पर्धा के रूप में वह किशी भी शिक्षण क्षेत्र में मिल सकता है पर इसे मै सार्वजनिक तो नहीं कर सकता पर सृस्टि के संरचनात्मक परिवर्तन हेतु सामूहिक कार्य हेतु नामित केंद्र में जो हुआ इस प्रांतीय विश्वविद्यालय से केंद्रीय विश्व विद्यालय बनने के दौरान इस प्रयागराज विश्वविद्यालय में अगर उसे सार्वजनिक करूंगा तो गुरुकुल की मर्यादा भंग होगी और आप कह उठेंगे की वास्तव में प्रयागराज विश्वविद्यालय में सनातन ब्राह्मण की कमी हो गयी थी जो ऐसे शुभ लक्षण और प्राप्त सुअवसर को नहीं पहचान सके। वैसे भी ऐसा हजारों वर्षों में ही कभी-कभी ही शायद होता है इसी लिए इस धार्मिक कार्य को अपने प्रशासनिक कार्य शैली से दबाने का प्रयास मात्र करते रह गए और सब चीज पैर के नीचे से निकलती चली गयी और वह धार्मिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन बन सामने आ गया। अतः मुझे धन सम्पदा और कल-बल-छल से नीचा दिखने की कोशिस न की जाय पुनः अन्यथा इसका दुष्परिणाम ही पुनः सामने आएगा: तीसरे आंका तो स्वयं मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री मामा, श्रीधर(विष्णु) मिश्रा जी ही है जिनके सानिध्य में मै सब कुछ शिखा था और अब उसका प्रयोग शेष है।

अगर किशी के आंका कोई कार्य देते हैं तो उनको पता होता है की अमुक कार्य मेरा कार्यवाहक या स्वयं सेवक कर लेगा परन्तु तीन-तीन आंका कार्यभार देते है और स्वयं उनको ही नहीं पता होता है की क्या इसका परिणाम होने वाला है अगर ज़रा सी भी सावधानी हटी और अनुशासन और संयम भांग हुआ परन्तु जिसको यह कार्य संपादित करना है वह स्वयं सेवक यह समझ रहा हो और इस कार्य की जिम्म्देदारी लेने से मना कर रहा हो तो समझ जाना चाहिए की यह स्वयं सेवक अपने तीनों आकाओं की सम्मिलित शक्ति है जो किशी एक से ज्यादा दूर की समझ और क्षमता रखता है यह अलग बात है की गुरु आज्ञा की मर्यादा उसे बाँध रखी थी और वह अपने अनुजों के हांथों की कठ पुतली बना रहा जिन अनुजों को ए बी सी डी भी इस आंतरिक और वाह्य परिवर्तन की न पता रही हो वरन वे तो केवल विषय और शोध क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा और पद प्राप्ति की होड़ में ही लगे रहे हों। मुझ काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से आये स्वयं सेवक के लिए शायद प्रयागराज विश्वविद्यालय प्रांतीय विश्वविद्यालय था उस समय और आज भी प्रांतीय से केंद्रीय होने की देलही क्षमता प्राप्त करने की कोशिस भर कर रहा है जो संवैधानिक रूप से इसमे से एक आंका (ब्रह्मा: परमगुरु परमेश्वर) के अथक प्रयास से विगत एक दसक से केंद्रीय हो तो गया है।--------मै पुनः कहता हूँ की मेरी मेधा शक्ति का आंकलन अपने निम्न तरीके के कुटिल चाल से न किया जाय तो इस विश्व विद्यालय और स्वयं प्रयागराज के लिए अच्छा होगा। जिस प्रयागराज विश्वविद्यालय ने प्रोफेसर राजेन्द्र गोविन्द हर्षे के कार्यकाल में विश्वविद्यालय द्वारा ही आयोजित 2008 के पूरा छात्र सम्मिलन में दो-दो निमंत्रण पत्र भेजा था एक भारतीय विज्ञानं संस्थान बेंगलुरु के पोस्ट डॉक्टरेट छात्रावास पर और दूसरा वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र के पते पर और दो बार फ़ोन भी किया गया था (948009010 और 08023600189) आने के सम्बन्ध में यात्रा विवरण और स्वयं आने के सम्बन्ध में जिसमे मैंने कहा था की क्या मेरे ताउजी प्रोफेसुर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय(परमपिता परमेश्वर) आ रहे हैं तो ऐसे में हाँ सुनाने के बाद मैंने कहा था की तब मुझे आने की जरूरत ही नहीं वे मेरे एक आंका ही समर्थ है उसको सफल बनाने में (वे दोनों निमंत्रण पत्र आज भी मेरे पास हैं)। ------कहने का मतलब यह है की अगर मेरा कार्यभार कोई ले सकता तो मै सब कुछ करने में समर्थ हूँ पर न तो ले सका और न तो ले पायेगा तो गलत आंकलन न किया जाय मेधा शक्ति का पिछला इतिहास और सार्वत्रिक प्रदर्शन भी देखा जाय क्योंकि विश्वविद्यालय सार्वभौमिक कला कौसल का जनक है। एक सनातन ब्राह्मण होते हुए जो प्रतिरोध मैंने सहे प्रति स्पर्धा के रूप में वह किशी भी शिक्षण क्षेत्र में मिल सकता है पर इसे मै सार्वजनिक तो नहीं कर सकता पर सृस्टि के संरचनात्मक परिवर्तन हेतु सामूहिक कार्य हेतु नामित केंद्र में जो हुआ इस प्रांतीय विश्वविद्यालय से केंद्रीय विश्व विद्यालय बनने के दौरान इस प्रयागराज विश्वविद्यालय में अगर उसे सार्वजनिक करूंगा तो गुरुकुल की मर्यादा भंग होगी और आप कह उठेंगे की वास्तव में प्रयागराज विश्वविद्यालय में सनातन ब्राह्मण की कमी हो गयी थी जो ऐसे शुभ लक्षण और प्राप्त सुअवसर को नहीं पहचान सके। वैसे भी ऐसा हजारों वर्षों में ही कभी-कभी ही शायद होता है इसी लिए इस धार्मिक कार्य को अपने प्रशासनिक कार्य शैली से दबाने का प्रयास मात्र करते रह गए और सब चीज पैर के नीचे से निकलती चली गयी और वह धार्मिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन बन सामने आ गया। अतः मुझे धन सम्पदा और कल-बल-छल से नीचा दिखने की कोशिस न की जाय पुनः अन्यथा इसका दुष्परिणाम ही पुनः सामने आएगा: तीसरे आंका तो स्वयं मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री मामा, श्रीधर(विष्णु) मिश्रा जी ही है जिनके सानिध्य में मै सब कुछ शिखा था और अब उसका प्रयोग शेष है। Transfer of power in any institution does not mean transfer of Ordinance/law of the Institution: https://archive.today/aKXW
                     https://archive.today/7ocui

Friday, December 5, 2014

विवेक: क्रिया:अन्तःकरण की वह शक्ति जिसमें मनुष्य यह समझता हैं कि कौन सा काम अच्छा है या बुरा,अथवा करने योग्य है या नहीं; अच्छी बुद्धि या समझ।; क्रिया: सदविचार की योग्यता।; संज्ञा: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ) तो ज्ञानेन्द्र या कहें तो ज्ञान का राजा कौन हुआ? मेरे विचार से निश्चित रूप से ज्ञानेन्द्र निहित अर्थ में विवेक: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ) ही हुआ उसी तरह से जिस तरह से नरेंद्र का तात्पर्य नर का इंद्र या नर का राजा या नर श्रेष्ठ या श्रेष्ठ मानव होता है । विष्णु के सहस्रनाम(1000 नाम) हैं पर मूल नाम विष्णु ही उनके आप मानव के रूप में जन्म लिए सबसे बड़े भक्त ध्रुव के लिए सर्व श्रेष्ठ होता है, उसी तरह से ज्ञानेन्द्र, सत्यज्ञान, सुबोध, सिद्धार्थ और अन्य अनेको समानार्थक नाम का एक ही मुख्य केंद्रीय शब्द विवेक हुआ: विवेक, विद्या और ज्ञान का गहरा सम्बन्ध है देवी सरस्वती और ब्रह्मदेव से विशेषरूप जो इनको शिव:पारवती(सती) और विष्णु:लक्ष्मी से भी जोड़ता है क्योंकि ये सब विवेकवान और ज्ञानवान हैं और ये देवियाँ और देव त्रयम्बक:विवेक युक्त होए हैं जिसके शुभ और अशुभ दोनों से घिरे शिव को स्वयं त्रयम्बक:त्रिलोचन नाम ही दे दिया गया है जो इनका एक मात्र रक्षा कवच है। और इन त्रिदेवों तक ही नहीं सामान्य देवी-देवताओं और आम मानव का भी रक्षा कवच है उसका अपने अंदर निहित विवेक शक्ति।; धार्मिक व् सामाजिक संज्ञाकरण: त्रिनेत्र, त्रयम्बक, त्रिलोचन, राहुल, सिद्धार्थ, सुबोध।; अतः मेरे जिस गुरु ने मुझसे बचन लिया था नवंबर, 1999 में पंडित मदनमोहन(~श्रीकृष्ण) मालवीय जी के शैक्षिक प्रांगण(गुरुकुल) काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के विरला मंदिर में की कि तुम बचन दो कि जीवन में कभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका नहीं जाना वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुबोध(~विवेक) कांत(~कुमार) बोस ही थे अपने में ही विवेक कुमार थे और मै वही उनका पैर छूते हुए स्वीकारोक्ति दी थी अपने पूर्ण संज्ञान में उनके दिए हुए बचन को पालन करने का और वह दुनिया बदल जाने पर भी प्रतिबद्ध रहेगा।

विवेक:
क्रिया:अन्तःकरण की वह शक्ति जिसमें मनुष्य यह समझता हैं कि कौन सा काम अच्छा है या बुरा,अथवा करने योग्य है या नहीं; अच्छी बुद्धि या समझ।;
क्रिया: सदविचार की योग्यता।;
संज्ञा: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ)
तो ज्ञानेन्द्र या कहें तो ज्ञान का राजा कौन हुआ? मेरे विचार से निश्चित रूप से ज्ञानेन्द्र निहित अर्थ में विवेक: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ) ही हुआ उसी तरह से जिस तरह से नरेंद्र का तात्पर्य नर का इंद्र या नर का राजा या नर श्रेष्ठ या श्रेष्ठ मानव होता है । विष्णु के सहस्रनाम(1000 नाम) हैं पर मूल नाम विष्णु ही उनके आप मानव के रूप में जन्म लिए सबसे बड़े भक्त ध्रुव के लिए सर्व श्रेष्ठ होता है, उसी तरह से ज्ञानेन्द्र, सत्यज्ञान, सुबोध, सिद्धार्थ और अन्य अनेको समानार्थक नाम का एक ही मुख्य केंद्रीय शब्द विवेक हुआ: विवेक, विद्या और ज्ञान का गहरा सम्बन्ध है देवी सरस्वती और ब्रह्मदेव से विशेषरूप जो इनको शिव:पारवती(सती) और विष्णु:लक्ष्मी से भी जोड़ता है क्योंकि ये सब विवेकवान और ज्ञानवान हैं और ये देवियाँ और देव त्रयम्बक:विवेक युक्त होए हैं जिसके शुभ और अशुभ दोनों से घिरे शिव को स्वयं त्रयम्बक:त्रिलोचन नाम ही दे दिया गया है जो इनका एक मात्र रक्षा कवच है। और इन त्रिदेवों तक ही नहीं सामान्य देवी-देवताओं और आम मानव का भी रक्षा कवच है उसका अपने अंदर निहित विवेक शक्ति।;
धार्मिक व् सामाजिक संज्ञाकरण: त्रिनेत्र, त्रयम्बक, त्रिलोचन, राहुल, सिद्धार्थ, सुबोध।;
अतः मेरे जिस गुरु ने मुझसे बचन लिया था नवंबर, 1999 में पंडित मदनमोहन(~श्रीकृष्ण) मालवीय जी के शैक्षिक प्रांगण(गुरुकुल) काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के विरला मंदिर में की कि तुम बचन दो कि जीवन में कभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका नहीं जाना वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुबोध(~विवेक) कांत(~कुमार) बोस ही थे अपने में ही विवेक कुमार थे और मै वही उनका पैर छूते हुए स्वीकारोक्ति दी थी अपने पूर्ण संज्ञान में उनके दिए हुए बचन को पालन करने का और वह दुनिया बदल जाने पर भी प्रतिबद्ध रहेगा।

Wednesday, December 3, 2014

I introduced by word Hi! 5 through e-mails many times from different English mail IDs. for last few months of this year. PANDEY? Pandey:Composition of five chief elements i.e. composition of Fire. Air, Water, Soil, Space i.e. have combined characteristics of all five chief elements of the nature. In the Indian continents: Pandey is A Representative of five chief element of the human community: Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Muslims//Shri-Ramaism & Christian//Shri-Krishnaism too i.e. whole Sanatan Hindus.>>>>>> My Grand Father Bachan Ram Pandey was closed friend of George Fernandes for reference: Article of my village Ramapur on wikipedia.

I introduced by word Hi! 5 through e-mails many times from different English mail IDs. for last few months of this year. PANDEY? Pandey:Composition of five chief elements i.e. composition of Fire. Air, Water, Soil, Space i.e. have combined characteristics of all five chief elements of the nature. In the Indian continents: Pandey is A Representative of five chief element of the human community: Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Muslims//Shri-Ramaism & Christian//Shri-Krishnaism too i.e. whole Sanatan Hindus.
>>>>>> My Grand Father Bachan Ram Pandey was closed friend of George Fernandes for reference: http://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur

Friday, November 28, 2014

विजय विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहे हमारा-------यह मेरे नर्सरी(शून्य कक्षा) से स्नातक तक के गुरु श्रद्धेय स्वर्गीय श्री भानु प्रताप मिश्रा को समर्पित है। I once again say that foreign(NRI) Ashok Chakra was broken may times since 2001, taken fake certificate from India in 2005-2006 and finally broken during the first six month of year 2008 with proof, but Indian Ashok Chakra is still safe and healthy. Thus you can imagine who is the real Super power (The Indian or the so called present World Super Power).

विजय विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहे हमारा-------यह मेरे नर्सरी(शून्य कक्षा) से स्नातक तक के गुरु श्रद्धेय स्वर्गीय श्री भानु प्रताप मिश्रा को समर्पित है।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा।
सदा शक्ति सरसाने वाला
प्रेम-सुधा बरसाने वाला
वीरों को हरसाने वाला
मातृभूमि का तन-मन सारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 1।
लाल रंग बजरंगबली का
हरा अहल इस्लाम अली का
श्वेत सभी धर्मों का टीका
एक हुआ रंग न्यारा-न्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 2।
है चरखे का चित्र सँवारा
मानो चक्र सुदर्शन प्यारा
हरे रंग का संकट सारा
है यह सच्चा भाव हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 3।
स्वतन्त्रता के भीषण रण में
लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में
काँपे शत्रु देखकर मन में
मिट जाये भय संकट सारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 4।
इस झण्डे के नीचे निर्भय
लें स्वराज्य हम अविचल निश्चय
बोलो भारत माता की जय
स्वतन्त्रता हो ध्येय हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 5।
आओ प्यारे वीरो आओ
देश-धर्म पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 6।
शान न इसकी जाने पाये
चाहें जान भले ही जाये
विश्व विजय कर के दिखलायें
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 7।
I once again say that foreign(NRI) Ashok Chakra was broken may times since 2001, taken fake certificate from India in 2005-2006 and finally broken during the first six month of year 2008 with proof, but Indian Ashok Chakra is still safe and healthy. Thus you can imagine who is the real Super power (The Indian or the so called present World Super Power).

I once again say that foreign(NRI) Ashok Chakra was broken may times since 2001, taken fake certificate from India in 2005-2006 and finally broken during the first six month of year 2008 with proof, but Indian Ashok Chakra is still safe and healthy. Thus you can imagine who is the real Super power (The Indian or the so called present World Super Power). We take guaranty of India Only Ashok Chakra.

I once again say that foreign(NRI) Ashok Chakra was broken may times since 2001,  taken fake certificate from India in 2005-2006 and finally broken during the first six month of year 2008 with proof, but Indian Ashok Chakra is still safe and healthy. Thus you can imagine who is the real Super power (The Indian or the so called present World Super Power). We take guaranty of India Only Ashok Chakra.

Thursday, November 27, 2014

ब्रह्मलोक स्वयं प्रयागराज है पर क्या बिडम्बना है कि यहाँ पर भी आदिशंकर:केदारेश्वर की आदि नगरी काशी(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) के ही ब्राह्मण की जरूरत पड़ती है विश्वपरिवर्तन हेतु किये जाने वाले विश्वपरिवर्तन के समुद्रमंथन रुपी महायज्ञ में ? क्या कैलाश पर महादेव शिव की छाया में निवास करने वाले गौतम, वशिष्ठ और दधीचि की तरह इस आदिशंकर:केदारेश्वर के काशी के ब्राह्मण आज तक भी विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। यह बताता है की जरूरत है प्रयागराज(प्रयागराज विश्वविद्यालय) के और अधिक सम्बर्धन और संरक्षण की।

ब्रह्मलोक स्वयं प्रयागराज है पर क्या बिडम्बना है कि यहाँ पर भी आदिशंकर:केदारेश्वर की आदि नगरी काशी(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) के ही ब्राह्मण की जरूरत पड़ती है विश्वपरिवर्तन हेतु किये जाने वाले विश्वपरिवर्तन के समुद्रमंथन रुपी महायज्ञ में ?  क्या कैलाश पर महादेव शिव की छाया में निवास करने वाले गौतम, वशिष्ठ और दधीचि की तरह इस आदिशंकर:केदारेश्वर के काशी के ब्राह्मण आज तक भी विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। यह बताता है की जरूरत है प्रयागराज(प्रयागराज विश्वविद्यालय) के और अधिक सम्बर्धन और संरक्षण की।  

अगर भगवान श्रीकृष्ण अपने को रणछोर जैसे नाम पुकारवा सकते हैं संतों, महात्माओं, भक्तों और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए और मथुरा-वृंदावन-गोकुल छोड़ द्वारिका जा सकते हैं तो मै क्या कुछ नहीं छोड़ सकता था 2001-2003 से अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर ((मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा)), परमपिता परमेस्वर((ताऊ जी प्रोफेसर प्रेमचंद पाण्डेय(शिव))) और परमगुरु परमेश्वर प्रोफेसर जोशी-श्रीवास्तव:(ब्रह्मा) हेतु मतलब सबको एक साथ में मिलाने पर परमब्रह्म हेतु।



अगर भगवान श्रीकृष्ण अपने को रणछोर जैसे नाम पुकारवा सकते हैं संतों, महात्माओं, भक्तों और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए और मथुरा-वृंदावन-गोकुल छोड़ द्वारिका जा सकते हैं तो मै क्या कुछ नहीं छोड़ सकता था 2001-2003 से अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर ((मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा)), परमपिता परमेस्वर((ताऊ जी प्रोफेसर प्रेमचंद पाण्डेय(शिव))) और परमगुरु परमेश्वर प्रोफेसर जोशी-श्रीवास्तव:(ब्रह्मा) हेतु मतलब सबको एक साथ में मिलाने पर परमब्रह्म हेतु।

रणछोर-------- तो इस प्रकार यदि कृष्ण इनके प्राण की रक्षा करते हैं और अपमानित नाम से पुकारे जाते है शक्तिशाली होने के बावजूद तो दुर्वाशा द्वारा यदुवंश के नाश होने जाने पर ये संत, महात्मा, भक्त और ब्राह्मण यदुवंशी बन गए श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित हो तो यह गर्व की बात है उनके लिए। रणछोर:---------यह नाम भगवान श्रीकृष्ण ने पाया था जो एक ढंग से शर्मिंदगी भरा है पर यह संत, महात्मा, भक्तों और ब्राह्मणों की जरासन्धि(कंश के ससुर) से रक्षा के लिए इन सभी लोगों की विनती पर मथुरा से द्वारिका चले जाने पर पाया था। वचन था की कृष्ण केवल हरा सकते थे जरासन्धि को पर मार नहीं सकते थे अतः बार बार हराने के बाद भी वह कृष्ण को मथुरा आकर लल करता था और पुनः हार जाता था युद्ध में। लेकिन इस बार उसने संतों, महात्माओं, भक्तों और ब्राह्मणों को बंधक बना लिया और कहा की कृष्ण से कहो की मथुरा छोड़ दें नहीं तो सबको साथ मृत्यु के घात उतार दूंगा। ---------तो इस प्रकार यदि कृष्ण इनके प्राण की रक्षा करते हैं और अपमानित नाम से पुकारे जाते है शक्तिशाली होने के बावजूद तो दुर्वाशा द्वारा यदुवंश के नाश होने जाने पर ये संत, महात्मा, भक्त और ब्राह्मण यदुवंशी बन गए श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित हो तो यह गर्व की बात है उनके लिए।

रणछोर-------- तो इस प्रकार यदि कृष्ण इनके प्राण की रक्षा करते हैं और अपमानित नाम से पुकारे जाते है शक्तिशाली होने के बावजूद तो दुर्वाशा द्वारा यदुवंश के नाश होने जाने पर ये संत, महात्मा, भक्त और ब्राह्मण यदुवंशी बन गए श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित हो तो यह गर्व की बात है उनके लिए।  रणछोर:---------यह नाम भगवान श्रीकृष्ण ने पाया था जो एक ढंग से शर्मिंदगी भरा है पर यह संत, महात्मा, भक्तों और ब्राह्मणों की जरासन्धि(कंश के ससुर) से रक्षा के लिए इन सभी लोगों की विनती पर मथुरा से द्वारिका चले जाने पर पाया था। वचन था की कृष्ण केवल हरा सकते थे जरासन्धि को पर मार नहीं सकते थे अतः बार बार हराने के बाद भी वह कृष्ण को मथुरा आकर लल करता था और पुनः हार जाता था युद्ध में। लेकिन इस बार उसने संतों, महात्माओं, भक्तों और ब्राह्मणों को बंधक बना लिया और कहा की कृष्ण से कहो की मथुरा छोड़ दें नहीं तो सबको साथ मृत्यु के घात उतार दूंगा। ---------तो इस प्रकार यदि कृष्ण इनके प्राण की रक्षा करते हैं और अपमानित नाम से पुकारे जाते है शक्तिशाली होने के बावजूद तो दुर्वाशा द्वारा यदुवंश के नाश होने जाने पर ये संत, महात्मा, भक्त और ब्राह्मण यदुवंशी बन गए श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित हो तो यह गर्व की बात है उनके लिए।    

प्रश्न यह क्या यह पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति वाले स्वयं हनुमान और श्रीराम-कृष्ण को भी जमीं डोज करने युक्ति सोच लिए थे? ---------------जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी कहावत हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/महावीर/केशरिनन्दन/मारुतिनंदन:पवनपुत्र को आजीवन ब्रह्मचारी शिध्ध करने के लिए कहा गया है और सत्य भी है: हनुमान जी अपने गुरु सूर्यदेव की गुरु दक्षिणा पूर्ण करने के लिए सूर्यदेव के आग्रह पर उनकी पुत्री सुवर्चला से विवाह किये थे और उनको पाताल लोक में छोड़ दिए थे जो रावण के भाई अहिरावण (तत्कालीन विश्व का सबसे बड़ा माफिया) का क्षेत्र था। भगवान श्रीराम का रावण से युद्ध के समय जब रात में सोते हुए श्रीराम और लक्षमण को अहिरावण उनको उठा ले गया तो भगवान श्रीराम और लक्षमण को सुबह युद्ध हेतु आगाह और जगाने हेतु जाने पर हनुमान को अपने पुत्र मकरध्वज से भेट होती है जो अहिरावण की कोठारी तक पहुँचने और श्रीराम और लक्षमण को उसके चंगुल से छुड़ाने की विधि बताता है पांच दीपक एक साथ बुझाने पर। वैसे सनातन हिन्दू धर्म और अन्य दीपक पूजने वालों के लिए भी मुंख से दीपक बुझाना धर्म के प्रतिकूल है तो श्रीराम और लक्षमण तो ऐसा नहीं कर सकते थे और हनुमान भी नहीं पर हनुमान पवनवेग वहा से गुजरे ही थे तो उनके तेज गति से हटी हवा से दीपक बुझ गया और इस प्रकार मकरध्वज को यह माता सुवर्चला द्वारा बताया गया था की जो ऐसा करेगा वह तुम्हारे पिता हनुमान ही होंगे। इस प्रकार हनुमान मकरध्वज के अनुसार अहिरावण को मरने में सफल होते हैं और मकरध्वज का स्वयं श्रीराम, लक्षमण और हनुमान द्वारा राज्यभिषेक कर पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति का राजा बना दिया जाता है। प्रश्न यह क्या यह पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति वाले स्वयं हनुमान और श्रीराम-कृष्ण को भी जमीं डोज करने युक्ति सोच लिए थे?

प्रश्न यह क्या यह पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति वाले स्वयं हनुमान और श्रीराम-कृष्ण को भी जमीं डोज करने  युक्ति सोच लिए थे? ---------------जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी कहावत हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/महावीर/केशरिनन्दन/मारुतिनंदन:पवनपुत्र को आजीवन ब्रह्मचारी शिध्ध करने के लिए कहा गया है और सत्य भी है: हनुमान जी अपने गुरु सूर्यदेव की गुरु दक्षिणा पूर्ण करने के लिए  सूर्यदेव के आग्रह पर उनकी पुत्री सुवर्चला से विवाह किये थे और उनको पाताल लोक में छोड़ दिए थे जो रावण के भाई अहिरावण (तत्कालीन विश्व का सबसे बड़ा माफिया) का क्षेत्र था। भगवान श्रीराम का रावण से  युद्ध के समय जब रात में सोते हुए श्रीराम और लक्षमण को अहिरावण उनको उठा ले गया तो भगवान श्रीराम और लक्षमण को सुबह युद्ध हेतु आगाह और जगाने हेतु जाने पर हनुमान को अपने पुत्र मकरध्वज से भेट होती है जो अहिरावण की कोठारी तक पहुँचने और श्रीराम और लक्षमण को उसके चंगुल से छुड़ाने की विधि बताता है पांच दीपक एक साथ बुझाने पर। वैसे सनातन हिन्दू धर्म और अन्य दीपक पूजने वालों के लिए भी मुंख से दीपक बुझाना धर्म के प्रतिकूल है तो श्रीराम और लक्षमण  तो ऐसा नहीं  कर सकते थे और हनुमान भी नहीं पर हनुमान पवनवेग वहा से गुजरे ही थे तो उनके तेज गति से हटी हवा से दीपक बुझ गया और इस प्रकार मकरध्वज को यह माता सुवर्चला द्वारा बताया गया था की जो ऐसा करेगा वह तुम्हारे पिता हनुमान ही होंगे। इस प्रकार हनुमान मकरध्वज के अनुसार अहिरावण को मरने में सफल होते हैं और मकरध्वज का स्वयं श्रीराम, लक्षमण और हनुमान द्वारा राज्यभिषेक कर पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति  का राजा बना दिया जाता है।  प्रश्न यह क्या यह पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति वाले स्वयं हनुमान और श्रीराम-कृष्ण को भी जमीं डोज करने  युक्ति सोच लिए थे?      

भगवान शिव काशी सर्व प्रथम प्रकट हुए केदारेश्वर:आदिशंकर के रूप में भगवान विष्णु अयोध्या और मथुरा में जन्म लिए श्रीराम और श्रीकृष्ण के रूप में और भगवान ब्रह्मा का ब्रह्मलोक प्रयागराज है तब भी वही बेवकूफी भरा इतिहास और किम्बदन्ती की कुलीन जातिया जिनको आर्य सामान्यतयः कहते है वे बाहर से आये है? यह कुंठा है उन लोगों का जो सबकुछ के बावजूद भारतीयों के अपने को सांस्कृतिक रूप से सर्वोच्च कहे जाने से परेशान रहते है, और मतिभ्रम और अज्ञान लोगों का भी द्वेष है ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य से जो भारतीय संताने संस्कारित रूप ही जन्म लेते ही अपनी श्रेणी रहते हुए ही आर्य का गुण रखते है।

भगवान शिव काशी सर्व प्रथम प्रकट हुए केदारेश्वर:आदिशंकर के रूप में भगवान विष्णु अयोध्या और मथुरा में जन्म लिए श्रीराम और श्रीकृष्ण  के रूप में और भगवान ब्रह्मा का ब्रह्मलोक प्रयागराज है तब भी वही बेवकूफी भरा इतिहास और किम्बदन्ती की कुलीन जातिया जिनको आर्य सामान्यतयः कहते है वे बाहर से आये है? यह कुंठा है उन लोगों का जो सबकुछ के बावजूद भारतीयों के अपने को सांस्कृतिक रूप से सर्वोच्च कहे जाने से परेशान रहते है,  और मतिभ्रम और अज्ञान लोगों का भी द्वेष है ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य से जो भारतीय संताने संस्कारित रूप  ही जन्म लेते ही अपनी श्रेणी रहते हुए ही आर्य का गुण  रखते है।  

इतना पुत्र/संतान मोह था तो कम से कम एक सार्वजनिक शादी तो कर लिए होते संस्कारित व्यक्ति की तरह नौटंकी ब्रह्मचर्य और अविवाहित रहने की क्यों किये। अगर आप की संतान आप के घर रहता तो आप अपने कुल का संस्कार दे सकते थे अगर न जन्म लेता तब मजबूर होकर मलिन बस्ती का संतान गोंद लेते या अवैध रूप से कही पलवाते। अगर अवैध रूप से मलिन बस्ती में पलवाएंगे तो संस्कार कहाँ से उच्च रहता? रही बात मुझे चेतावनी देने की तो कोई जन्म ही नहीं लिया है और न लेगा शालीनता पूर्वक हर एक का जबाब दे दिया और दूंगा भी और इसी प्रकार अपना लक्ष्य भी पूर्ण करूंगा।*******जय हिन्द, जय भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।

इतना पुत्र/संतान मोह था तो कम से कम एक सार्वजनिक शादी तो कर लिए होते संस्कारित व्यक्ति की तरह नौटंकी ब्रह्मचर्य और अविवाहित रहने की क्यों किये। अगर आप की संतान आप के घर रहता तो आप अपने कुल का संस्कार दे सकते थे अगर न जन्म लेता तब मजबूर होकर मलिन बस्ती का संतान गोंद लेते या अवैध रूप से कही पलवाते। अगर अवैध रूप से मलिन बस्ती में पलवाएंगे तो संस्कार कहाँ से उच्च रहता? रही बात मुझे चेतावनी देने की तो कोई जन्म ही नहीं लिया है और न लेगा शालीनता पूर्वक हर एक का जबाब दे दिया और दूंगा भी और इसी प्रकार अपना लक्ष्य भी पूर्ण करूंगा।*******जय हिन्द, जय भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।   

जिसके भविष्य को मेरे नेशनल इंटर कालेज पट्टिनरेन्द्रपुर, जौनपुर के गणितशास्त्र के श्रद्धेय गुरु श्री अमरजीत वर्मा (माँ कुलीन) ने निर्धारित कर दिया हो उसके भविष्य को दिशा-भ्रमित कर दिए जाने पर भी प्रोफेसर सिम्हाद्री (नरसिंघ) या प्रोफेसर अवधराम या प्रोफेसर सूर्यनारायण ठाकुर या प्रोफेसर अलख-निरंजन मंत्री कैसे बदल सकते थे?

जिसके भविष्य को मेरे नेशनल  इंटर कालेज पट्टिनरेन्द्रपुर, जौनपुर के गणितशास्त्र के श्रद्धेय गुरु श्री अमरजीत वर्मा (माँ कुलीन) ने निर्धारित कर दिया हो उसके भविष्य को दिशा-भ्रमित कर दिए जाने पर भी प्रोफेसर सिम्हाद्री (नरसिंघ) या प्रोफेसर अवधराम या प्रोफेसर सूर्यनारायण ठाकुर या प्रोफेसर अलख-निरंजन मंत्री कैसे बदल सकते थे? 

कार्य सिद्धि यन्त्र : -ॐ नमः शिवाय| सर्वदुःख निवारण यंत्र-मंत्र:-ॐ ह्रीं हंसः

कार्य सिद्धि यन्त्र : -ॐ नमः शिवाय 
सर्वदुःख निवारण यंत्र-मंत्र:-ॐ ह्रीं हंसः

भाग्योदय हेतु श्रीमहा-लक्ष्मी-साधना

भाग्योदय हेतु श्रीमहा-लक्ष्मी-साधना
भाग्योदय हेतु श्रीमहा-लक्ष्मी की तीन मास की सरल, व्यय रहित साधना है। यह साधना कभी भी ब्राह्म मुहूर्त्त पर प्रारम्भ की जा सकती है। ‘दीपावली’ जैसे महा्पर्व पर यदि यह प्रारम्भ की जाए, तो अति उत्तम।
‘साधना’ हेतु सर्व-प्रथम स्नान आदि के बाद यथा-शक्ति (कम-से-कम १०८ बार) “ॐ ह्रीं सूर्याय नमः” मन्त्र का जप करें।
फिर ‘पूहा-स्थान’ में कुल-देवताओं का पूजन कर भगवती श्रीमहा-लक्ष्मी के चित्र या मूर्त्ति का पूजन करे। पूजन में ‘कुंकुम’ महत्त्वपूर्ण है, इसे अवश्य चढ़ाए।
पूजन के पश्चात् माँ की कृपा-प्राप्ति हेतु मन-ही-मन ‘संकल्प करे। फिर विश्व-विख्यात “श्री-सूक्त” का १५ बार पाठ करे। इस प्रकार ‘तीन मास’ उपासना करे। बाद में, नित्य एक बार पाठ करे। विशेष पर्वो पर भगवती का सहस्त्र-नामावली से सांय-काल ‘कुंकुमार्चन’ करे। अनुष्ठान काल में ही अद्भुत परिणाम दिखाई देते हैं। अनुष्ठान पूरा होने पर “भाग्योदय” होता है।
।।श्री सूक्त।।
ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।
तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।
अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि।।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।
उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे।।
क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।।
गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्।।
मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।
कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे।
निच-देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले।।
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।
तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम्।।


यः शुचिः प्रयतो भूत्वा, जुहुयादाज्यमन्वहम्।
श्रियः पंच-दशर्चं च, श्री-कामः सततं जपेत्।।

सुख-शान्ति-दायक महा-लक्ष्मी महा-मन्त्र प्रयोग

सुख-शान्ति-दायक महा-लक्ष्मी महा-मन्त्र प्रयोग
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीपञ्च-दश-ऋचस्य श्री-सूक्तस्य श्रीआनन्द-कर्दम-चिक्लीतेन्दिरा-सुता ऋषयः, अनुष्टुप्-वृहति-प्रस्तार-पंक्ति-छन्दांसि, श्रीमहालक्ष्मी देवताः, श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे राज-वश्यार्थे सर्व-स्त्री-पुरुष-वश्यार्थे महा-मन्त्र-जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः-
श्रीआनन्द-कर्दम-चिक्लीतेन्दिरा-सुता ऋषिभ्यो नमः शिरसि। अनुष्टुप्-वृहति-प्रस्तार-पंक्ति-छन्दोभ्यो नमः मुखे। श्रीमहालक्ष्मी देवताय नमः हृदि। श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे राज-वश्यार्थे सर्व-स्त्री-पुरुष-वश्यार्थे महा-मन्त्र-जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कर-न्यासः-
ॐ हिरण्मय्यै अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ चन्द्रायै तर्जनीभ्यां स्वाहा। ॐ रजत-स्त्रजायै मध्यमाभ्यां वषट्। ॐ हिरण्य-स्त्रजायै अनामिकाभ्यां हुं। ॐ हिरण्य-स्त्रक्षायै कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ॐ हिरण्य-वर्णायै कर-तल-करपृष्ठाभ्यां फट्।
अंग-न्यासः-
ॐ हिरण्मय्यै नमः हृदयाय नमः। ॐ चन्द्रायै नमः शिरसे स्वाहा। ॐ रजत-स्त्रजायै नमः शिखायै वषट्। ॐ हिरण्य-स्त्रजायै नमः कवचाय हुं। ॐ हिरण्य-स्त्रक्षायै नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्। ॐ हिरण्य-वर्णायै नमः अस्त्राय फट्।
ध्यानः-
ॐ अरुण-कमल-संस्था, तद्रजः पुञ्ज-वर्णा,
कर-कमल-धृतेष्टा, भीति-युग्माम्बुजा च।
मणि-मुकुट-विचित्रालंकृता कल्प-जालैर्भवतु-
भुवन-माता सततं श्रीः श्रियै नः।।
मानस-पूजनः-
ॐ लं पृथ्वी तत्त्वात्वकं गन्धं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ हं आकाश तत्त्वात्वकं पुष्पं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ यं वायु तत्त्वात्वकं धूपं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये घ्रापयामि नमः।
ॐ रं अग्नि तत्त्वात्वकं दीपं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये दर्शयामि नमः।
ॐ वं जल तत्त्वात्वकं नैवेद्यं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये निवेदयामि नमः।
ॐ सं सर्व-तत्त्वात्वकं ताम्बूलं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
।।महा-मन्त्र।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।१
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।२
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।३
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।४
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि।।५
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।६
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्ति वृद्धिं ददातु मे।।७
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।।८
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्।।९
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।१०
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।।११
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे।
निच-देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले।।१२
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।१३
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।१४
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम्।।१५
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा, जुहुयादाज्यमन्वहम्।
श्रियः पंच-दशर्चं च, श्री-कामः सततं जपेत्।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
।।स्तुति-पाठ।।
।।ॐ नमो नमः।।
पद्मानने पद्मिनि पद्म-हस्ते पद्म-प्रिये पद्म-दलायताक्षि।
विश्वे-प्रिये विष्णु-मनोनुकूले, त्वत्-पाद-पद्मं मयि सन्निधत्स्व।।
पद्मानने पद्म-उरु, पद्माक्षी पद्म-सम्भवे।
त्वन्मा भजस्व पद्माक्षि, येन सौख्यं लभाम्यहम्।।
अश्व-दायि च गो-दायि, धनदायै महा-धने।
धनं मे जुषतां देवि, सर्व-कामांश्च देहि मे।।
पुत्र-पौत्र-धन-धान्यं, हस्त्यश्वादि-गवे रथम्।
प्रजानां भवति मातः, अयुष्मन्तं करोतु माम्।।
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।
धनमिन्द्रा वृहस्पतिर्वरुणो धनमश्नुते।।
वैनतेय सोमं पिब, सोमं पिबतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो, मह्मं ददातु सोमिनि।।
न क्रोधो न च मात्सर्यं, न लोभो नाशुभा मतीः।
भवन्ती कृत-पुण्यानां, भक्तानां श्री-सूक्तं जपेत्।।
विधिः-
उक्त महा-मन्त्र के तीन पाठ नित्य करे। ‘पाठ’ के बाद कमल के श्वेत फूल, तिल, मधु, घी, शक्कर, बेल-गूदा मिलाकर बेल की लकड़ी से नित्य १०८ बार हवन करे। ऐसा ६८ दिन करे। इससे मन-वाञ्छित धन प्राप्त होता है।
हवन-मन्त्रः- “ॐ श्रीं ह्रीं महा-लक्ष्म्यै सर्वाभीष्ट सिद्धिदायै स्वाहा।”

श्री अर्जुन-कृत श्रीदुर्गा-स्तवन

श्री अर्जुन-कृत श्रीदुर्गा-स्तवन’
विनियोग – ॐ अस्य श्रीभगवती दुर्गा स्तोत्र मन्त्रस्य श्रीकृष्णार्जुन स्वरूपी नर नारायणो ऋषिः, अनुष्टुप् छन्द, श्रीदुर्गा देवता, ह्रीं बीजं, ऐं शक्ति, श्रीं कीलकं, मम अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास-
श्रीकृष्णार्जुन स्वरूपी नर नारायणो ऋषिभ्यो नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीदुर्गा देवतायै नमः हृदि, ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये, ऐं शक्त्यै नमः पादयो, श्रीं कीलकाय नमः नाभौ, मम अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कर न्यास – ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्याम नमः, ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा, ॐ ह्रूं मध्यमाभ्याम वषट्, ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां हुं, ॐ ह्रौं कनिष्ठाभ्यां वौष्ट्, ॐ ह्रः करतल करपृष्ठाभ्यां फट्।
अंग-न्यास -ॐ ह्रां हृदयाय नमः, ॐ ह्रीं शिरसें स्वाहा, ॐ ह्रूं शिखायै वषट्, ॐ ह्रैं कवचायं हुं, ॐ ह्रौं नैत्र-त्रयाय वौष्ट्, ॐ ह्रः अस्त्राय फट्।
ध्यान -
सिंहस्था शशि-शेखरा मरकत-प्रख्या चतुर्भिर्भुजैः,
शँख चक्र-धनुः-शरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता।
आमुक्तांगद-हार-कंकण-रणत्-कांची-क्वणन् नूपुरा,
दुर्गा दुर्गति-हारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्-कुण्डला।।
मानस पूजन – ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः लं पृथिव्यात्मकं गन्धं समर्पयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः हं आकाशात्मकं पुष्पं समर्पयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः यं वाय्वात्मकं धूपं घ्रापयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः रं वहृ्यात्मकं दीपं दर्शयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः सं सर्वात्मकं ताम्बूलं समर्पयामि।
श्रीअर्जुन उवाच -
नमस्ते सिद्ध-सेनानि, आर्ये मन्दर-वासिनी,
कुमारी कालि कापालि, कपिले कृष्ण-पिंगले।।1।।
भद्र-कालि! नमस्तुभ्यं, महाकालि नमोऽस्तुते।
चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं, तारिणि वर-वर्णिनि।।2।।
कात्यायनि महा-भागे, करालि विजये जये,
शिखि पिच्छ-ध्वज-धरे, नानाभरण-भूषिते।।3।।
अटूट-शूल-प्रहरणे, खड्ग-खेटक-धारिणे,
गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे, नन्द-गोप-कुलोद्भवे।।4।।
महिषासृक्-प्रिये नित्यं, कौशिकि पीत-वासिनि,
अट्टहासे कोक-मुखे, नमस्तेऽस्तु रण-प्रिये।।5।।
उमे शाकम्भरि श्वेते, कृष्णे कैटभ-नाशिनि,
हिरण्याक्षि विरूपाक्षि, सुधू्राप्ति नमोऽस्तु ते।।6।।
वेद-श्रुति-महा-पुण्ये, ब्रह्मण्ये जात-वेदसि,
जम्बू-कटक-चैत्येषु, नित्यं सन्निहितालये।।7।।
त्वं ब्रह्म-विद्यानां, महा-निद्रा च देहिनाम्।
स्कन्ध-मातर्भगवति, दुर्गे कान्तार-वासिनि।।8।।
स्वाहाकारः स्वधा चैव, कला काष्ठा सरस्वती।
सावित्री वेद-माता च, तथा वेदान्त उच्यते।।9।।
स्तुतासि त्वं महा-देवि विशुद्धेनान्तरात्मा।
जयो भवतु मे नित्यं, त्वत्-प्रसादाद् रणाजिरे।।10।।
कान्तार-भय-दुर्गेषु, भक्तानां चालयेषु च।
नित्यं वससि पाताले, युद्धे जयसि दानवान्।।11।।
त्वं जम्भिनी मोहिनी च, माया ह्रीः श्रीस्तथैव च।
सन्ध्या प्रभावती चैव, सावित्री जननी तथा।।12।।
तुष्टिः पुष्टिर्धृतिदीप्तिश्चन्द्रादित्य-विवर्धनी।
भूतिर्भूति-मतां संख्ये, वीक्ष्यसे सिद्ध-चारणैः।।13।।
।। फल-श्रुति ।।
यः इदं पठते स्तोत्रं, कल्यं उत्थाय मानवः।
यक्ष-रक्षः-पिशाचेभ्यो, न भयं विद्यते सदा।।1।।
न चापि रिपवस्तेभ्यः, सर्पाद्या ये च दंष्ट्रिणः।
न भयं विद्यते तस्य, सदा राज-कुलादपि।।2।।
विवादे जयमाप्नोति, बद्धो मुच्येत बन्धनात्।
दुर्गं तरति चावश्यं, तथा चोरैर्विमुच्यते।।3।।
संग्रामे विजयेन्नित्यं, लक्ष्मीं प्राप्न्नोति केवलाम्।
आरोग्य-बल-सम्पन्नो, जीवेद् वर्ष-शतं तथा।।4।।

श्रीरामरक्षास्तोत्र

॥ श्रीरामरक्षास्तोत्र ॥
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमंत्रस्य । बुध-कौशिक ऋषिः । अनुष्टुप् छंदः । श्रीसीतारामचंद्रो देवता । सीता शक्तिः । श्रीमद् हनुमान कीलकम् ।श्रीरामचंद्र-प्रीत्यर्थे श्रीराम-रक्षा-स्तोत्र-मन्त्र-जपे विनियोगः ॥
ऋष्यादि-न्यासः-
बुध-कौशिक ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप् छंदसे नमः मुखे । श्रीसीता-रामचंद्रो देवतायै नमः हृदि । सीता शक्तये नमः नाभौ । श्रीमद् हनुमान कीलकाय नमः पादयो ।श्रीरामचंद्र-प्रीत्यर्थे श्रीराम-रक्षा-स्तोत्र-मन्त्र-जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ॥
॥ अथ ध्यानम् ॥
ध्यायेदाजानु-बाहुं धृत-शर-धनुषं बद्ध-पद्मासनस्थम् ।
पीतं वासो वसानं नव-कमल-दल-स्पर्धि-नेत्रं प्रसन्नम् ।
वामांकारूढ-सीता-मुख-कमल-मिलल्लोचनं नीरदाभम् ।
नानालंकार-दीप्तं दधतमुरु-जटामंडनं रामचंद्रम्॥
॥इति ध्यानम्॥


॥मूल-पाठ॥
चरितं रघुनाथस्य शत-कोटि प्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां, महापातकनाशनम् ॥ १॥
ध्यात्वा नीलोत्पल-श्यामं, रामं राजीव-लोचनम् ।
जानकी-लक्ष्मणोपेतं, जटा-मुकुट-मण्डितम् ॥ २॥
सासि-तूण-धनुर्बाण-पाणिं नक्तं चरान्तकम् ।
स्व-लीलया जगत्-त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ ३॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः, पापघ्नीं सर्व-कामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु, भालं दशरथात्मजः ॥ ४॥
कौसल्येयो दृशौ पातु, विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मख-त्राता, मुखं सौमित्रि-वत्सलः ॥ ५॥
जिह्वां विद्या-निधिः पातु, कण्ठं भरत-वंदितः ।
स्कंधौ दिव्यायुधः पातु, भुजौ भग्नेश-कार्मुकः ॥ ६॥
करौ सीता-पतिः पातु, हृदयं जामदग्न्य-जित् ।
मध्यं पातु खर-ध्वंसी, नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥ ७॥
सुग्रीवेशः कटी पातु, सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
ऊरू रघूत्तमः पातु, रक्षः-कुल-विनाश-कृत् ॥ ८॥
जानुनी सेतुकृत्पातु, जंघे दशमुखान्तकः ।
पादौ बिभीषण-श्रीदः, पातु रामोऽखिलं वपुः ॥ ९॥
एतां राम-बलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स चिरायुः सुखी पुत्री, विजयी विनयी भवेत् ॥ १०॥
पाताल-भूतल-व्योम-चारिणश्छद्म-चारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तासे, रक्षितं राम-नामभिः ॥ ११॥
रामेति राम-भद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापैः भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ १२॥
जगज्जैत्रैक-मन्त्रेण राम-नाम्नाऽभिरक्षितम् ।
यः कंठे धारयेत्-तस्य करस्थाः सर्व-सिद्धयः ॥ १३॥
वज्र-पंजर-नामेदं, यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र, लभते जय-मंगलम् ॥ १४॥
आदिष्ट-वान् यथा स्वप्ने राम-रक्षामिमां हरः ।
तथा लिखित-वान् प्रातः, प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥ १५॥
आरामः कल्प-वृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रि-लोकानां, रामः श्रीमान् स नः प्रभुः ॥ १६॥
तरुणौ रूप-संपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुंडरीक-विशालाक्षौ चीर-कृष्णाजिनाम्बरौ ॥ १७॥
फल-मूलाशिनौ दान्तौ, तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ राम-लक्ष्मणौ ॥ १८॥
शरण्यौ सर्व-सत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्व-धनुष्मताम् ।
रक्षः कुल-निहंतारौ, त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥ १९॥
आत्त-सज्ज-धनुषाविशु-स्पृशावक्षयाशुग-निषंग-संगिनौ ।
रक्षणाय मम राम-लक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥ २०॥
सन्नद्धः कवची खड्गी चाप-बाण-धरो युवा ।
गच्छन्मनोरथोऽस्माकं, रामः पातु सलक्ष्मणः ॥ २१॥
रामो दाशरथिः शूरो, लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णा, कौसल्येयो रघुत्तमः ॥ २२॥
वेदान्त-वेद्यो यज्ञेशः, पुराण-पुरुषोत्तमः ।
जानकी-वल्लभः श्रीमानप्रमेय-पराक्रमः ॥ २३॥
इत्येतानि जपन्नित्यं, मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं, संप्राप्नोति न संशयः ॥ २४॥
रामं दुर्वा-दल-श्यामं, पद्माक्षं पीत-वाससम् ।
स्तुवंति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः ॥ २५॥
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम् ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेंद्रं सत्य-सन्धं दशरथ-तनयं श्यामलं शांत-मूर्तम् ।
वंदे लोकाभिरामं रघु-कुल-तिलकं राघवं रावणारिम् ॥ २६॥
रामाय राम-भद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥ २७॥
श्रीराम राम रघुनंदन राम राम । श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रण-कर्कश राम राम । श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥ २८॥
श्रीरामचंद्र-चरणौ मनसा स्मरामि । श्रीरामचंद्र-चरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचंद्र-चरणौ शिरसा नमामि । श्रीरामचंद्र-चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ २९॥
माता रामो मत्पिता रामचंद्रः । स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्रः ।
सर्वस्वं मे रामचंद्रो दयालुः । नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥ ३०॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य, वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वंदे रघु-नंदनम् ॥ ३१॥
लोकाभिरामं रण-रंग-धीरम्, राजीव-नेत्रं रघु-वंश-नाथम् ।
कारुण्य-रूपं करुणाकरं तम्, श्रीरामचंद्रम् शरणं प्रपद्ये ॥ ३२॥
मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगम्, जितेन्द्रियं बुद्धि-मतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यम्, श्रीराम-दूतं शरणं प्रपद्ये ॥ ३३॥
कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविता-शाखां वंदे वाल्मीकि-कोकिलम् ॥ ३४॥
आपदां अपहर्तारं, दातारं सर्वसंपदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ ३५॥
भर्जनं भव-बीजानां अर्जनं सुख-सम्पदाम् ।
तर्जनं यम-दूतानां राम रामेति गर्जनम् ॥ ३६॥
रामो राज-मणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचर-चमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं पर-तरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् ।
रामे चित्त-लयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥ ३७॥
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ ३८॥
इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ॥
॥ श्रीसीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥

Wednesday, November 26, 2014

कम से कम मै कह सकता हूँ की 1957 से लेकर आज तक (मतलब चौथी पीढ़ी तक) हमारे परिवार ने किशी दलित/पिछड़ा/अल्पसंख्यक या तथा कथित दलित/पिछड़ा/अल्पसंख्यक को नहीं सताया है: इस्वर को भी अपना कार्य करने का मौक़ा चाहिए। कौन जानता है की एक जन्म पूर्व वह किसके घर जन्म लिया था और अगला जन्म किसके घर लेगा। -------- एक किसान परिवार के रूप में: मल-मूत्र से सने कचरे को खोदकर सिर रखकर खेत तक पहुँचना, घर-परिवार के स्वयं पानी निकास की नाली को साफ करना, वाह्य-मल निकास भरे खेतों में रोपाई-निराई-गुड़ाई-मेढ बढ़ाई चाहे धान, गेंहू , मक्का, तिलहन-दलहन, आलू या अन्य सब्जिया व् अन्न हो, नजदीक और मीलों दूर से धन-गेहू की खेतों से धुवाई व् मड़ाई, गर्मी के महीनों में परिक्षा गाँव में छप्पर की उठवायी यह लोगों का विशवास की मई मना नहीं कर सकता किशी के निवेदन को, गाय-भैस की चरवाई छुट्टियों में ही नहीं अन्य महीनों में भी शाम को (पर परीक्षा के दिन नजदीक न हो तब) और रविवार को छुट्टी होने पर, गाय-भैस का दुहना और गर्मी और वरसात के मौसम में बैलों वाले हल से जुताई भी करना, पशुओं का नित-दिन चारा तैयार करवाना वर्ष इसके साथ भारतीय सैन्य सेवा दल की परेड में नियमित शामिल होना और नित्य प्रतिदिन की शिक्षा में स्नातक तक श्रेष्ट प्रदर्शन(कालेज में प्रथम द्वितीय स्थान पाना और सब कक्षाओं के औसत के हिसाब से प्रथम रहना वह तब जब की पूरी शिक्षा के दौरान मैदान में बैठकी लगाना हर तरह और क्षेत्र के विद्यालय के हर कक्षा के विद्यार्थियों के बीच में और उनको अच्छे कार्य के प्रति प्रेरित करना जीवन की त्रुटियों से नाता छोड़कर)। माध्यमिक शिक्षा तक 8 + 8 की दूरी सायकिल से तय कर और स्नातक तक 15+15 किलोमीटर की दूरी सायकिल से तय कर शिक्षा ली है। -------जौनपुर के जिस क्षेत्र में रहा हूँ वहा से पता कर लीजिये की क्या मई ऐसा करता था और करता था तो किशी दलित या पिछड़े की अल्प संख्यक की चिंता मै ही क्यूँ करून जब वे स्वयं आर्थिक रूप से मुझसे आगे रहे हैं और हैं भी और मई क्यों न उनके गलत कार्यों को भी अन्य कारणों के साथ विशेष रूप से उनके पिछड़े होने को जिम्मेदार ठहराऊं? क्यों न बताऊँ की सीमा आप लोगों ने तोड़ी है और भरपाई वे श्रीकृष्ण भक्त कर रहे है जो दुर्वाशा के श्राप के बाद यदुवंशियों के नाश होने के बाद स्वयं यदुवंशी बन गए थे।

कम से कम मै  कह सकता हूँ की 1957 से लेकर आज तक (मतलब चौथी पीढ़ी तक) हमारे परिवार ने किशी  दलित/पिछड़ा/अल्पसंख्यक या तथा कथित दलित/पिछड़ा/अल्पसंख्यक को नहीं  सताया है: इस्वर को भी अपना कार्य करने का मौक़ा चाहिए।  कौन जानता है की एक जन्म पूर्व वह किसके घर जन्म लिया था और अगला जन्म किसके घर लेगा।  -------- एक किसान परिवार के रूप में:  मल-मूत्र से सने कचरे को खोदकर सिर रखकर खेत तक पहुँचना, घर-परिवार के स्वयं पानी निकास की नाली को साफ करना, वाह्य-मल निकास भरे खेतों में रोपाई-निराई-गुड़ाई-मेढ बढ़ाई  चाहे धान, गेंहू , मक्का, तिलहन-दलहन, आलू या अन्य सब्जिया व् अन्न हो, नजदीक और मीलों दूर से धन-गेहू की खेतों से धुवाई व् मड़ाई, गर्मी के महीनों में परिक्षा गाँव में छप्पर की उठवायी यह लोगों का विशवास की मई मना नहीं कर सकता किशी के निवेदन को, गाय-भैस की चरवाई छुट्टियों में ही नहीं अन्य महीनों में भी शाम को (पर परीक्षा के दिन नजदीक न हो तब) और रविवार को छुट्टी होने पर,  गाय-भैस का दुहना और गर्मी और वरसात के मौसम में बैलों वाले हल से जुताई भी करना, पशुओं का नित-दिन चारा तैयार करवाना  वर्ष इसके साथ भारतीय सैन्य सेवा दल की परेड में नियमित शामिल होना और नित्य प्रतिदिन की शिक्षा में स्नातक तक श्रेष्ट प्रदर्शन(कालेज में प्रथम  द्वितीय स्थान पाना और सब कक्षाओं के औसत के हिसाब से प्रथम रहना वह तब जब की पूरी शिक्षा के दौरान मैदान में बैठकी लगाना हर तरह और क्षेत्र के विद्यालय के हर कक्षा के विद्यार्थियों के बीच में और उनको अच्छे कार्य के प्रति प्रेरित करना जीवन की त्रुटियों से नाता छोड़कर)। माध्यमिक शिक्षा तक 8 + 8 की दूरी सायकिल से तय कर और स्नातक तक 15+15 किलोमीटर की दूरी सायकिल से तय कर शिक्षा ली है। -------जौनपुर के जिस क्षेत्र में रहा हूँ वहा से पता कर लीजिये की क्या मई ऐसा करता था और करता था तो किशी दलित या पिछड़े की  अल्प संख्यक की चिंता मै ही क्यूँ करून जब वे स्वयं आर्थिक रूप से मुझसे आगे रहे हैं और हैं भी और मई क्यों न उनके गलत कार्यों को भी अन्य कारणों के साथ विशेष रूप से उनके पिछड़े होने को जिम्मेदार ठहराऊं? क्यों न बताऊँ की सीमा आप लोगों ने तोड़ी है और भरपाई वे श्रीकृष्ण भक्त कर रहे है जो दुर्वाशा के श्राप के बाद यदुवंशियों के नाश होने के बाद स्वयं यदुवंशी बन गए थे।  

गोपा:गोवर्धन:गिरिधर अस्टमी(दीपावली के आठवे दिन: कार्तिक शुक्लपक्ष अस्टमी) को जन्म लेने वाले मुझ विवेक:त्रयम्बक:त्रिनेत्र:त्रिलोचन:सुबोध:सिद्धार्थ:राहुल (जो सब प्रकार के शुभ-अशुभ से घिरे रहने वाले शिव की एक मात्र रक्षा शक्ति है) के राशिनाम गिरिधर/गिरिधारी का व्यापक अर्थ:--- गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/राम, मदिराचल:मेरुपर्वत धारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग:फणीश (लक्षमण:बलराम), और धौलागिरी:हिमालय धारी हनुमान))

गोपा:गोवर्धन:गिरिधर अस्टमी(दीपावली के आठवे दिन: कार्तिक शुक्लपक्ष अस्टमी) को जन्म लेने वाले मुझ विवेक:त्रयम्बक:त्रिनेत्र:त्रिलोचन:सुबोध:सिद्धार्थ:राहुल (जो सब प्रकार के शुभ-अशुभ से घिरे रहने वाले शिव की एक मात्र रक्षा शक्ति है) के राशिनाम गिरिधर/गिरिधारी का व्यापक अर्थ:--- गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/राम, मदिराचल:मेरुपर्वत धारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग:फणीश (लक्षमण:बलराम), और धौलागिरी:हिमालय धारी हनुमान)) 

संसार/ब्रह्माण्ड के सार का सब कुछ ज्ञान विश्व महाशक्ति/मकरध्वज/पातालपुरी के राजा ही कर लेते, जान-समझ लेते और इस विश्व को नियंत्रित कर लेते तो उनके गुरु और पिता स्वयं हनुमान/रुद्रावतार /शंकर-सुमन/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवन-पुत्र/महावीर/बजरंग-बलि/मारुती-नंदन/केशरी-नंदन/ प्रयागराज(भारतवर्ष की शान) के नगर कोतवाल को और स्वयं उनके मूल स्वरुप शिव(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+ विश्वेश्वर: विश्वनाथ) को कष्ट क्यों करना पड़ता 14 वर्ष।

संसार/ब्रह्माण्ड के सार का सब कुछ ज्ञान विश्व महाशक्ति/मकरध्वज/पातालपुरी के राजा ही कर लेते, जान-समझ लेते और इस विश्व को नियंत्रित कर लेते तो उनके गुरु और पिता स्वयं हनुमान/रुद्रावतार /शंकर-सुमन/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवन-पुत्र/महावीर/बजरंग-बलि/मारुती-नंदन/केशरी-नंदन/ प्रयागराज(भारतवर्ष की शान) के नगर कोतवाल को और स्वयं उनके मूल स्वरुप शिव(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+ विश्वेश्वर: विश्वनाथ) को कष्ट क्यों करना पड़ता 14 वर्ष। 

यही है सत्यमेव जयते: सामाजिक सम्मान प्राप्त और संवैधानिक पद पर बैठे हर जिम्मेदार भारतीय ही नही अपितु/वरन एक सामान्य नागरिक को भी जीवन और देश के सबसे विकट छड़ में यह बताना पड़ता है की वह किस समाज/देश हित में अमुक कार्य को परिणति तक पहुंचाया और किस प्रमुख कारण वस यह किया: यही है सत्यमेव जयते।

यही है सत्यमेव जयते: सामाजिक सम्मान प्राप्त और संवैधानिक पद पर बैठे हर जिम्मेदार भारतीय ही नही अपितु/वरन एक सामान्य नागरिक को भी जीवन और देश के सबसे विकट छड़ में यह बताना पड़ता है की वह किस समाज/देश हित में अमुक कार्य को परिणति तक पहुंचाया और किस प्रमुख कारण वस यह किया: यही है सत्यमेव जयते।

Tuesday, November 25, 2014

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सम्मान पर जिन लोगों के एजेंट/अभिकर्तांओं ने को बट्टा लगाने का जाल बुनना सुरु किया था उनका उददेश्य पूर्ण होने से पूर्व उनकी शान पर सदा-सदा के लिए बट्टा लगा दिया गया 2001 में तो इसमे कोई गलत ही क्या है?(एक हिन्दू/मुस्लिम-दलित भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती से शादी इसलिए नहीं करता की वह धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य की सीमा के अंदर आ जाएगा और वह सबसे अधिक सरकारी सहायता प्राप्त समूह से हटाया जा सकेगा अपने को विवाह पूर्व सामाजिक/संवैधानिक/धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य मान लेगा तो। अगर किशी दलित ने भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती शादी किया तो निश्चित रूप से वह ईसाई-दलित है जो यह नौटंकी कर सकता है)।पंडित मदनमोहन(श्रीकृष्ण) मालवीय जी के गुरुकुल का कोई गिरिधर स्वयं में ही श्रीकृष्ण की ही सीमा में ही कैसे रह गया जब धर्म/जाती/कुल ही समान नहीं रहा वह तो शिव हो गया न सामाजिक कल्याण की ऐसी ऐसी परिस्थिति में।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सम्मान पर जिन लोगों के एजेंट/अभिकर्तांओं ने को बट्टा लगाने का जाल बुनना सुरु किया था उनका उददेश्य पूर्ण होने से पूर्व उनकी शान पर सदा-सदा के  लिए बट्टा लगा दिया गया 2001 में तो इसमे कोई गलत ही क्या है?(एक हिन्दू/मुस्लिम-दलित भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती से शादी इसलिए नहीं करता  की वह धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य की सीमा के अंदर आ जाएगा और वह सबसे अधिक सरकारी सहायता प्राप्त  समूह से हटाया जा सकेगा अपने को विवाह पूर्व सामाजिक/संवैधानिक/धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य मान लेगा तो। अगर किशी दलित ने भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती शादी किया तो निश्चित रूप से वह ईसाई-दलित है जो यह नौटंकी कर सकता है)।पंडित मदनमोहन(श्रीकृष्ण) मालवीय जी के गुरुकुल का कोई गिरिधर स्वयं में ही श्रीकृष्ण की ही सीमा में ही कैसे रह गया जब धर्म/जाती/कुल ही समान नहीं रहा वह तो शिव हो गया न सामाजिक कल्याण की ऐसी ऐसी परिस्थिति में।

ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए। ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -------------------------------मनु(कश्यप ऋषि का वह अवतार जो एक आम मानव के जैसे चरित्र का हो और जिसके उपरांत अन्य सभी 6 ऋषियों का भी मानवीय करन हुआ एक गोत्र के माध्यम से और इस प्रकार कुल 7 प्रारम्भिक गोत्र हुए: मनु स्मृति में क्या-क्या जुड़ा समयानुसार जिसमें हमें विकृति नजर आती हो पर मनुस्मृति ही गलत हो ऐसा हम नहीं कह सकते है क्योंकि मई स्वयं मानता हूँ की इस प्रयागराज में चाहे जिस भी जाती(ऊँच और नीच) या पंथ के लोग मेरे विरोधियों के वशीभूत हो अपने अल्प और तुछ्य स्वार्थ हेतु मुझे इस संसार का सबसे शूद्रतम, घृणित और अधःतम व्यक्ति ही शिध्ध करने का प्रयास ही नहीं किये वरन खानदानी और व्यक्तिगत रूप से भी पागल भी घोषित किये थे मेरे शब्दों में वे दुनिया के सबसे सबसे शूद्रतम व्यक्ति हैं और हकीकत यह है की उनकी आँखों पर पट्टी बंधी थे उर वे स्वयं पागल थे जिन्होंने ब्राह्मण की लड़की को ईसाई-दलित (वह व्यक्ति या परिवार जो सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से अपने को शादी पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य न मना लिया हो और इसका प्रमाण है की वह परिवार शादी बाद अपने सरकारी दस्तावेज में अपने पत्नी/पुत्रवधु विशेष के ही नाम के आगे ही विशेष रूप से उस सरकारी सहायता पावक वर्ग विशेष के सूचक नाम को जोड़वाता है और किशी अन्य पारिवारिक सदस्य के नाम के आगे वह वर्ग विशेस का सूचक नाम नहीं होता है सरकारी दस्तावेज में:---ऐसे व्यक्ति को लोग जातिवादी/धर्मवादी नहीं कहते हैं-------) का पाँव धोवाकर उनके घर भेजवा दिया (कोई और नहीं मिला था क्या आपको और आप की आप की कन्या को) जो भारतीय शास्त्रीय शादियों के नियम के विपरीत है और जिसमे पाँव धोने का प्रश्न ही नहीं आता है और यह एक प्रकार की नौटंकी है और इस शास्त्रीय नियम के अनुसार किशी ब्रह्मण कन्या के कन्या दान में ब्राह्मण माता-पिता का किशी वर का पाँव धोने की निम्नतम सीमा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही है। अतः समाज में शूद्र व्यक्तियों की कमी नहीं हर जाती और धर्म में से पर इसका मतलब यहाँ आर्य नहीं और यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कोई नहीं रह गया यह हो ही नहीं सकता। ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -----ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए।

ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए।  ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -------------------------------मनु(कश्यप ऋषि का वह अवतार जो एक आम मानव के जैसे चरित्र का हो और जिसके उपरांत अन्य सभी 6 ऋषियों का भी मानवीय करन हुआ एक गोत्र के माध्यम से और इस प्रकार कुल 7 प्रारम्भिक गोत्र हुए: मनु स्मृति में क्या-क्या जुड़ा समयानुसार जिसमें हमें विकृति नजर आती हो पर मनुस्मृति ही गलत हो ऐसा हम नहीं कह सकते है क्योंकि मई स्वयं मानता हूँ की इस प्रयागराज में चाहे जिस भी जाती(ऊँच और नीच) या पंथ के लोग मेरे विरोधियों के वशीभूत हो अपने अल्प और तुछ्य स्वार्थ हेतु मुझे इस संसार का सबसे शूद्रतम, घृणित और अधःतम व्यक्ति ही शिध्ध करने का प्रयास ही नहीं किये वरन खानदानी और व्यक्तिगत रूप से भी पागल भी घोषित किये थे मेरे शब्दों में वे दुनिया के सबसे सबसे शूद्रतम व्यक्ति हैं और हकीकत यह है की उनकी आँखों पर पट्टी बंधी थे उर वे स्वयं पागल थे जिन्होंने ब्राह्मण की लड़की को ईसाई-दलित (वह व्यक्ति या परिवार जो सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से अपने को शादी पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य न मना लिया हो और इसका प्रमाण है की वह परिवार शादी बाद अपने सरकारी दस्तावेज में अपने पत्नी/पुत्रवधु विशेष के ही नाम के आगे ही विशेष रूप से उस सरकारी सहायता पावक वर्ग विशेष के सूचक नाम को जोड़वाता है और किशी अन्य पारिवारिक सदस्य के नाम के आगे वह वर्ग विशेस का सूचक नाम नहीं होता है सरकारी दस्तावेज में:---ऐसे व्यक्ति को लोग जातिवादी/धर्मवादी नहीं कहते हैं-------)  का पाँव धोवाकर उनके  घर भेजवा दिया (कोई और नहीं मिला था क्या आपको और आप की आप की कन्या को) जो भारतीय शास्त्रीय शादियों के नियम के विपरीत है और जिसमे पाँव धोने का प्रश्न ही नहीं आता है और यह एक प्रकार की नौटंकी है और इस शास्त्रीय नियम के अनुसार किशी ब्रह्मण कन्या के कन्या दान में ब्राह्मण माता-पिता का किशी वर का पाँव धोने की निम्नतम सीमा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही है। अतः समाज में शूद्र व्यक्तियों की कमी नहीं हर जाती और धर्म में से पर इसका मतलब यहाँ आर्य नहीं और यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कोई नहीं रह गया यह हो ही नहीं सकता। ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -----ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए।  ------Ek Hindu/Muslim-Dalit Bharateey Hindu Shastriy Vidhi/Riti se Shadi isee liye nahee kartaa ki vah dharmik roop se ek Brahman/Kshtriy/Vaisy ki semaa ke andar aa jaayegaa aur vah sarkari sahayataa rukane ke naate apane ko vivah poorv Brahman/Kshatriy/Vaisya manegaa nahee| 

आजमगढ़(महानतम व्यक्तियों का समूह स्थल:श्रेष्ठतम:आर्यमगढ़) का एक और एक ही गुरु हो सकता है और वह है मुझ रामपुर-223225:आज़मगढ़ के वे दान में मिले पाँचों गाँवों के बाबा सारंगधर/राकेशधर/शशिधर/चन्द्रधर/चंद्रशेखर/सोमनाथ बस्ती जनपद) और माता जी(जौनपुर) की संतानों का मातृ पक्ष, जौनपुर(जमदग्निपुर: नामित जमदग्नि/पुत्र भृगु/पिता-परशुराम/ कुल दधीचि/त्याग और ब्राह्मणत्व के प्रतीक)। मतलब आप समझ गए होंगे की महानतम व्यक्ति भी इस त्याग और ब्राह्मणत्व गुणवाले जमदग्नि ऋषि (जो गौ माता नंदिनी/कामधेनु की पुत्री की रक्षा में अपना प्राण त्यागे थे) की जमीन जौनपुर (जमदग्निपुर) के आगे नतमस्तक होते हैं।

आजमगढ़(महानतम व्यक्तियों का समूह स्थल:श्रेष्ठतम:आर्यमगढ़)  का एक और एक ही गुरु हो सकता है और वह है मुझ रामपुर-223225:आज़मगढ़ के वे दान में मिले पाँचों गाँवों के बाबा सारंगधर/राकेशधर/शशिधर/चन्द्रधर/चंद्रशेखर/सोमनाथ बस्ती जनपद) और माता जी(जौनपुर) की संतानों का मातृ पक्ष, जौनपुर(जमदग्निपुर: नामित जमदग्नि/पुत्र भृगु/पिता-परशुराम/ कुल दधीचि/त्याग और ब्राह्मणत्व के प्रतीक)। मतलब आप समझ गए होंगे की महानतम व्यक्ति भी इस त्याग और ब्राह्मणत्व गुणवाले जमदग्नि ऋषि (जो गौ माता नंदिनी/कामधेनु की पुत्री की रक्षा में अपना प्राण त्यागे थे) की जमीन जौनपुर (जमदग्निपुर) के आगे नतमस्तक होते हैं।  

शिव(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर:विश्वनाथ) अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में चरित्रहीन और विवाहपूर्ण कौमर्यभंगी और परनारिगामी नहीं हो सकते। यही है सती (पारवती) और शिव का प्रेम।



शिव(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर:विश्वनाथ) अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में चरित्रहीन और विवाहपूर्ण कौमर्यभंगी और परनारिगामी नहीं हो सकते। यही है सती (पारवती) और शिव का प्रेम।

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। -

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। -

मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।



मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। ----------------------------------------------------------------मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। ----------------------------------------------------------------मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।