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Friday, January 31, 2014

मेरे काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के परास्नातक हेतु प्रोजेक्ट (परियोजना) सलाहकार एवं दिशा निर्देशक गुरुदेव, प्रोफेसर सुबोध कान्त बोस् (जिनके नाम का अर्थ भी विवेक कुमार होता है हिंदी में) जिनको मै हर शाम घुमाने ले जाता था, एक दिन रास्ते में रूककर बोले कि "विवेक तुम वादा करो कि तुम विदेश को अपना ठिकाना कभी न बनाना और अमेरिका कभी न जाना" मै उनसे वहीं वादा किया कि मै विदेश रहने नहीं जाउंगा और अमेरिका कभी नहीं जाउंगा। मुझे २००७ जब मै केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय और समुद्र विज्ञान केंद्र, अलाहाबाद से पहली पीएचडी कि डिग्री ले ली जीसवे वह सैद्धांतिक रूप से एक वायुमंडलीय और समुद्र विज्ञान का शैक्षिक केंद्र बन गया अलाहाबाद विश्व विद्यालय का तो उसके बाद भारतीय विज्ञान संसथान में में मेरे जाते ही विश्व के किशी भी शहर में जाने के लिए और रहने के लिए वीसा दें का प्रस्ताव मिला किशी अंतररास्ट्रीय विरादरी से सम्बन्ध रखने वालों के द्वारा पर मई भारत से विरट रहने से मना कर उनके ठुकरा दिया।-----------------आधुनिक भारत के वैसे बहुत से नेता है लेकिन मोहनदास करमचंद गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के कर्णधार हैं, इसमे ठाकुर रविंद्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद (नरेन्द्रनाथ दत्त) के विचार ने क्रन्तिकारी भूमिका निभाई है। आप आतंरिक और वाह्य दोनों नीतियों पर सम्यक दृस्टि डालते हैं तो इसमे से किशी को भी कमतर आंक नहीं सकते हैं।-----और इसी सुभाष जी ने जय हिन्द का नारा दिया था और यह जय हिन्द सम्यक रूप में है क्या? ------------------- जय हिन्द (जम्बूद्वीप जो ईरान से लेकर सिंगापूर और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक का भूभाग है), जय भारत(भरखण्ड जिसे अखंड भारत कहते हैं और वर्त्तमान भारत के लोग इससे सबसे ज्यादा परिचित है), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण। (मेरे मित्रों मैं भारत में रहता हूँ जिसमे हनुमान:अम्बावाडेकर और उनके स्वामी मतलब पिता जी मतलब रामजी (श्रीराम) दलित, श्रीकृष्ण तथा कूर्म अवतारी विष्णु पिछड़ा और रामजी के पुत्रों को शिक्षा देने वाले तथा देखभाल करने वाले वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति है।----------और मै इन सभी का पुजारी ऊंची जाती का हूँ यह मेरा जन्म दोस है क्योंकि अधिकतर महापुरुष दलित और पिछड़ी जाती से हैं जैसा कि मई अभी तक यहाँ प्रस्तुत किया हूँ और अब २०१४ कि लोकसभा तैयारी में सभी दलों से सुनने में आ रहा है। आने वाला समय किसका है यह बात जरूर हो रही पर अभी एक दसक पूर्व जो लोग अशोक के शिस्य होकर भी अशोक चक्र तोड़े उनको दंड देने कि हिम्मत किशी में नहीं है मेरे शिवा यह अलग बात है कि योजनाकार को अशोक चक्र तोड़ने से बहुत पहले योजना बनाते समय ही चेतावनी जारी कि जा चुकी थी २००१ में और ऐतिहासिक चेतावनी भी दी जा चुकी है एक कि जान गयी तो क्या हुआ। और मई उसी समय का इंतज़ार कर रहा हूँ जिससे मुझपर किशी तरह का आरोप न लगे ज्यादती का और मानवाधिकार हनन का।-------जो मुसल्लम ईमान(Complete Honest) है मतलब मुसलमान है और ब्राह्मण है मतलब ब्रह्म को जनता है मतलब जो सबसे बड़ा त्यागी पुरु है मानवता का वह कभी मरता है क्या? और उसके लिए संख्याबल कुछ माने रखता है क्या? ---------SATYAMEV JAYATE|

(Adaraneey Gurujan, let I want to take one more chance for a new post: Friends, read carefully without any BIAS)

मेरे काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के परास्नातक हेतु प्रोजेक्ट (परियोजना) सलाहकार एवं दिशा निर्देशक गुरुदेव, प्रोफेसर सुबोध कान्त बोस् (जिनके नाम का अर्थ भी विवेक कुमार होता है हिंदी में) जिनको मै हर शाम घुमाने ले जाता था, एक दिन रास्ते में रूककर बोले कि "विवेक तुम वादा करो कि तुम विदेश को अपना ठिकाना कभी न बनाना और अमेरिका कभी न जाना" मै उनसे वहीं वादा किया कि मै विदेश रहने नहीं जाउंगा और अमेरिका कभी नहीं जाउंगा। मुझे २००७  जब मै केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय और समुद्र विज्ञान केंद्र, अलाहाबाद  से पहली पीएचडी कि डिग्री ले ली जीसवे वह सैद्धांतिक रूप से एक वायुमंडलीय और समुद्र विज्ञान का शैक्षिक केंद्र बन गया अलाहाबाद विश्व विद्यालय का  तो उसके बाद भारतीय विज्ञान संसथान में में मेरे जाते ही विश्व के किशी भी शहर में जाने के लिए और रहने के लिए वीसा दें का प्रस्ताव मिला किशी अंतररास्ट्रीय विरादरी से सम्बन्ध रखने वालों के द्वारा पर मई भारत से विरट रहने से मना कर उनके  ठुकरा दिया।--------------------------आधुनिक भारत के वैसे बहुत से नेता है लेकिन मोहनदास करमचंद गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के कर्णधार हैं, इसमे ठाकुर रविंद्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद (नरेन्द्रनाथ दत्त) के विचार ने क्रन्तिकारी भूमिका निभाई है।  आप आतंरिक और वाह्य दोनों नीतियों पर सम्यक दृस्टि डालते हैं तो इसमे से किशी को भी कमतर आंक नहीं सकते हैं। अगर किशी को लगता है की नेताजी शुभाष चन्द्र कम प्रासंगिक थे मोहन दास करम चन्द गांधी से तो उसे यह भी लगा होगा कि वल्लभभाई पटेल भी कम प्रासंगिक थे जवाहरलाल नेहरू से। यह विवेचना का विषय नहीं क्योंकि हनुमान और लक्षमण होना समर्पण है इसमे लोकप्रियता का पैनामा काम नहीं करता।   सुभाष जी ने जय हिन्द का नारा दिया था और यह जय हिन्द सम्यक रूप में है क्या?   
जय हिन्द (जम्बूद्वीप जो ईरान से लेकर सिंगापूर और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक का भूभाग है), जय भारत(भरखण्ड जिसे अखंड भारत कहते हैं और वर्त्तमान भारत के लोग इससे सबसे ज्यादा परिचित है), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण। (मेरे मित्रों मैं भारत में रहता हूँ जिसमे हनुमान:अम्बावाडेकर और उनके स्वामी मतलब पिता जी मतलब रामजी (श्रीराम) दलित, श्रीकृष्ण तथा  कूर्म अवतारी विष्णु पिछड़ा और रामजी के पुत्रों को शिक्षा देने वाले तथा देखभाल करने वाले वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति है।----------और मै इन सभी का पुजारी ऊंची जाती का हूँ यह मेरा जन्म दोस है क्योंकि अधिकतर महापुरुष दलित और पिछड़ी जाती से हैं जैसा कि मई अभी तक यहाँ प्रस्तुत किया हूँ और अब २०१४ कि लोकसभा तैयारी में सभी दलों से सुनने में आ रहा है। आने वाला समय किसका है यह बात जरूर हो रही पर अभी एक दसक पूर्व जो लोग अशोक के शिस्य होकर भी अशोक चक्र तोड़े उनको दंड देने कि हिम्मत किशी में नहीं है मेरे शिवा यह अलग बात है कि योजनाकार को अशोक चक्र तोड़ने से बहुत पहले योजना बनाते समय ही चेतावनी जारी कि जा चुकी थी २००१ में और ऐतिहासिक चेतावनी भी दी जा चुकी है एक कि जान गयी तो क्या हुआ। और मई उसी समय का इंतज़ार कर रहा हूँ जिससे मुझपर किशी तरह का आरोप न लगे ज्यादती का और मानवाधिकार हनन का।-------जो मुसल्लम ईमान(Quite Honest) है मतलब मुसलमान है और ब्राह्मण है मतलब ब्रह्म को जनता है मतलब जो सबसे बड़ा त्यागी पुरु है मानवता का वह कभी मरता है क्या? और उसके लिए संख्याबल कुछ माने रखता है क्या? ---SATYAMEV JAYATE|
Note: द्विज:= पृथ्वीलोक का दूसरा देवता=विप्र= विपुल प्रदाता =जो समाज से कम लेकर ज्यादा दे=ब्रह्मा=ब्रह्मा जानती सह ब्रह्मणः (जो ब्रह्म के बारे में जाने वह ब्राह्मण)। 
त्याग: समाज हेतु अपने से सम्बंधित निजी जीवन कि वस्तु तक का भी अर्पण त्याग है और किशी वास्तु कि प्राप्त और यस कि प्राप्ति हो सके उसका उद्देश्य नहीं होता। --------बलिदान: समाज हेतु अपने तथा अपने सम्बन्धियों का हित दांव पर लगा देना जिससे अपनी किशी वास्तु को पुनः प्राप्त किया जा सके और न प्राप्त किया जा सका तब भी प्राण त्याग कर यस कि प्राप्ति हो सके।-----------तपस्या: अपने पास कुछ है या नहीं है पर इससे अधिक कुछ प्राप्ति का सतत प्रयास ही तपस्या है।---------इस प्रकार त्याग, बलिदान और तपस्या क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य को एक सामान्य मानव से ऊपर का इंसान बनाते हैं अन्यथा मानव तो बहुत से स्वरूपों में इस संसार में पाये जाते है। ---------------आदरणीय जगजीवनराम, काशीराम और नारायणन एक प्रश्न है आप लोगों से कि यदि अशोकचक्र/समतामूलकचक्र/धर्मचक्र/समयचक्र अगर टूटता है तो क्या महामहिम राजेंद्र और भारतरत्न भीमराव रामजी अम्बेडकर कि देखरेख में बना संविधान काम कर सकता है सुचारु रूप से ? अतः क्या अशोकचक्र तोड़ने वाले या तोड़ने कि रचाने वाले को दंड नहीं देना चाहिए या देना है तो उसकी जाती और धर्म से डरना चाहिए कि कही कोई आरोप न लग जाय ज्यादती/नसलवाद/धर्मवाद/जातिवाद का। 

अशोकचक्र/धर्मचक्र/समयचक्र/समतामूलकचक्र के नियंता महादेव शिवशंकर भले हैं जो स्थितिओं पर नियंत्रण कर लेते हैं पर अशोक चक्र के टूटने पर उसके रक्षक अत्रि पुत्र दुर्वाशा को सबसे ज्यादा कस्ट होता है और वे स्वयं कश्यप गोत्रिओं को भी नहीं छोड़ते वे स्वयं श्रीराम और श्रीकृष्ण स्वयं क्यों न हों? तो आप समझा सकते हैं कि दुर्वाशा और महादेव को किश उच्चतम युक्ति से नियंत्रित किया गया| जानकारी के लिए दुर्वाशा ऋषि के दो ही निवाश स्थान थे पहला तामस और मझुई नदी के संगम का उनका आश्रम जो आर्यमगढ़/आजमगढ़ में है और दूसरा स्वयं तीन नदियों गंगा, जमुना सरस्वती का संगम प्रयाग(प्राक+यज्ञ= जान विश्व का प्राचीनतम यज्ञ हुआ ब्रह्मा जी द्वारा अपने सात मानसपुत्र, सप्तर्षि को प्रकट करने का जिसे प्राकट्य यज्ञ भी कहते हैं )/अल्लाहबाद जो भारद्वाज ऋषि का भी आश्रम है।-------------------------अगर यह दुनिया न रहती तो कौन सा संविधान और कौन सा सामाजिक स्वरुप। अतः अशोकचक्र न टूटे तथा पुनः अशोकचक्र/समयचक्र रक्षक दुर्वाशा को अपना क्रोध न दिखाना पड़े जैसा कि २००१ में और दुर्वाशा के द्वारा और अधिक विनाश न हो इसके लिए अशोकचक्र/समयचक्र नियंता महादेव शिव शंकर को कस्ट सह कर उनको सभालने का प्रयत्न न करना पड़े। इस अशोक चक्र/समयचक्र को न रावण तोड़ पाया था और न कंस। किशी को पथ भ्रमित कर उसके स्वयं के अंदर दुर्गुण उत्पन्न कर देना जिससे कि उसके स्वयं के दुर्गुण उस व्यक्ति कि आत्मह्त्या कर दें यह भी अशोकचक्र तोड़े जाने की परिधि में आता है और न्यू मिलेनियम कि अंधी दौड़ में ईसाईयत बहुसंख्यक विकशित देश अपनी भविस्य कि रूप रेखा जिसमे वे सबसे उन्नत हो को तैयार करने में सम्पूर्ण विश्व समाज में ईसायत को बढ़ावा दे रहे थे पर वे भूलते जा रहे थे कि संसार में हिन्दू व् अन्य; तथा मुस्लिम व् अन्य ; और ईसाई व् अन्य से सम्बंधित गुण और आचरण की एक निश्चित सीमा होनी चाहिए जिससे संतुलन बना रहे अन्यथा इस संसार का विनाश् निश्चित ही है। ----मेरा इस संसार से आग्रह है विशेष कर भारतीय समाज से कि ऐसा व्यक्ति जो अशोकचक्र तोड़ने का दंभ रखता है उसकी सुरक्षा और संरक्षण विदेशियों के इसारे पर भारतीय समाज को नस्ट करने के लिए संविधान कि दुहाई दे कर दलित और पिछड़ा और अन्य धार्मिक आधार पर न हो वरन जो अशोकचक्र कि मर्यादा को भंग करे उसे सामने ला दंड अवश्य दिया जाय।------------------अनुशासन अगर अधिकतम विष्णु अवतार देने वाले कश्यप ऋषि कि सीमा के अंदर ही स्थापित हो जाय जिनके पुत्रों में पूर्ण प्रेम और पूर्ण सत्य श्रीराम (गाय, गंगा, गौरी और गायत्री के प्रति आचरण जैसे लम्ब को छोड़कर जिनके समानांतर इस्लाम कार्य करता है)  और श्रीकृष्ण (गाय, गंगा, गौरी और गायत्री के प्रति आचरण जैसे लम्ब को छोड़कर जिनके सामानांतर ईसाइयत काम करता है) और भगवान् वामन जैसे है, तो अनुशासन स्थापित करने की जिम्मेदारी कि बात दुर्वाशा और भगवान् महादेव शिव शंकर के पास क्यों जायेगी?----------मित्रों माता सीता ने स्वयं माँ गौरा पारवती (जो जनक जी की कुल देवी थीं)  से जिनके पति महादेव स्वयं हैं से अपने पति के रूप में सभी उच्च शक्ति के लोगों कि प्रतिभा से सम्पन वर में शिव जैसा करुणानिधि और दुर्वाशा जैसा तेजस्वी वर भी मांगा था पर दुर्वाशा जैसा क्रोध और महादेव का विनाशक गुण न हो उनमे, वे धीर और वीर तथा मधुर स्वाभाव के हों तो माँ गौरी ने भगवान् श्रीराम में ही सभी गुण पाया जो स्वयं भगवान् शिव में भी नहीं था और पारवती जी ने भगवान् राम को उनका पति होने का आशीर्वाद दिया था। अतः भगवान् श्रीराम ही "सत्यम शिवम् और सुंदरम" के पूर्ण रूप हैं और वे ही ईस्वर हैं इसमे कोई संदेह नहीं।----------वह चमकीला शुभ्र द्वितीया का चन्द्रमा जो शंकर जी को सबसे प्रिय है और महादेव को जिसके नाते सोमनाथ कहा जता है वह काली माँ का सबसे प्रिय पुत्र है,  नंदी,गणेश और कार्तिकेय की भी तुलना में तो वे देवकाली (सरस्वती, लक्षमी और पारवती कि सम्मिलित शक्ति)  भगवान् श्रीराम की कुल देवी है।  अतः नसलवाद कि शिक्षा हमें आपस में वैरी बनती है लेकिन यह संसार सब सुन्दर संसार के रूप में देखना पसंद करते है तो सुंदरता ज्यादा ही पायी जायेगी इस सृस्टि में अतः नस्ल का अनुपात प्रकृति को ही तय करने दीजिये।             


Wednesday, January 29, 2014

अतः अब बहुत मुस्किल है कि रास्ट्रवादी सवयम सेवी संस्थाए वे चाहे जिस जाती धर्म और सम्प्रदाय कि हो किशी भी व्यक्ति को रास्त्र कि सीमा में बांधने में सफल हों सिवाय उनके जिनके अंदर स्वयंनिहित रास्ट्रवाद हो या ऐसे परिवार से हों। वर्त्तमान समय में कहा जात है कि भारत में लोगों में रास्ट्रवाद ख़त्म हो चुका है तो मेरा मानना है कि इसमे हर धर्म, जाती और सम्प्रदाय के स्वयं सेवकों का दोष नहीं है वरन अब रास्ट्रवाद सवयम विश्व एक रास्ट्रवाद और विश्व एक ग्रामवाद में परिवर्तित हो गया है और इसके पीछे विज्ञान और जाती-सम्प्रदाय आधारित सामाजिक न्याय व्यवस्था है जिससे अनारक्षित और आरक्षित वर्ग के वे लोग जो देहली (threshold ) शक्ति अर्जित कर विश्व एक रास्ट्रवाद कि तरफ अग्रसारित हो रहे हैं और दूसरों को ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।


मित्रों मेरी 3 बात जरूर याद रखना यह कि १) इस्लाम सामानांतर रामाश्रयी विचार के और ईसाइयत सामानांतर कृष्णाश्रयी विचार के और यही दुनिया के तीनों धर्मों का मूल सनातन धर्म है को शिद्ध करता है। २) वर्त्तमान समय में कहा जात है कि भारत में लोगों में रास्ट्रवाद ख़त्म हो चुका है तो मेरा मानना है कि इसमे हर धर्म, जाती और सम्प्रदाय के स्वयं सेवकों का दोष नहीं है वरन अब रास्ट्रवाद सवयम विश्व एक रास्ट्रवाद और विश्व एक ग्रामवाद में परिवर्तित हो गया है और इसके पीछे विज्ञान और जाती-सम्प्रदाय आधारित सामाजिक न्याय व्यवस्था है जिससे अनारक्षित और आरक्षित वर्ग के वे लोग जो देहली (threshold ) शक्ति अर्जित कर विश्व एक रास्ट्रवाद कि तरफ अग्रसारित हो रहे हैं और दूसरों को ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अतः अब बहुत मुस्किल है कि रास्ट्रवादी सवयम सेवी संस्थाए वे चाहे जिस जाती धर्म और सम्प्रदाय कि हो किशी भी व्यक्ति को रास्त्र कि सीमा में बांधने में सफल हों सिवाय उनके जिनके अंदर स्वयंनिहित रास्ट्रवाद हो या ऐसे परिवार से हों। 3) यह कोई नयी बात नहीं, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य की एक-दूसरे में शादी हो सकती है क्योंकि यह तो शास्त्र सम्मत है पर इतना जरूर है कि ब्राह्मण-ब्राह्मण, क्षत्रिय-क्षत्रिय और वैस्य-वैस्य कि आतंरिक शादी प्रथम स्थान रखता है शादियों में। पर इन तीनों के साथ उसकी शादी शास्त्र सम्मत नहीं है जो सामाजिक, धार्मिक और कानूनी/नीतिगत रूप में अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करता है। क्योंकि फिरोज गांधीं अपने को महात्मा गांधी कि संतान सार्वजनिक रूप से स्वीकार किये थे इस कारन से इंदिरा के साथ उनकी शादी होने के बाद वे एक दूसरे के हिन्दू धर्म पति-पत्नी हुए। अगर ऐसा नहीं है तो कोई दुनिया का कोई पंडित शादी विवाह के कर्मकांड से और कोई सरकार क़ानून से किशी को पति-पत्नी बना सकता है पर धर्म पति-पत्नी का दर्जा नहीं दे सकता।


हनुमान (अम्बावाडेकर) एक ब्राह्मण के पुत्र शिवशक्ति(दशवें रुद्रावतार) मतलब शैव शक्ति और विष्णु के परमभक्त जिनके बारे में भगवान् श्री राम (विष्णु अवतार) ने कहा था कि "तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई॥ इस प्रकार हनुमान (अम्बावाडेकर) दूसरे मानव अवतारी परमब्रह्म है इस संसार में जिनकी शादी भी इनके गुरु सूर्य कि पुत्री सुवर्चला से हुई थी गुरु कि गुरु दक्षिणा स्वरुप और इनका एक पुत्र भी था मकरध्वज और हनुमान को आजीवन ब्रह्माचारि कहा गया है इस लिए इसको सार्थक करने के लिए औरों के बारे में कहा जाता है कि "जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी" |


रावण का वध कर सीता सहित घर वापसी के बाद भगवान् श्रीराम का कथन---- "गुरु वशिस्ठ कुल पूज्य हमारे जाकी कृपा दनुज दल मारे" ----श्रीरामचरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसीदास----। मित्रों गुरु ने उठाया, गुरु ने गिराया, और पुनः गुरु ने आसमान पर पहुंचाया मुझे| अतः गुरु लोगों के सिवा मई किशी को श्रेय नहीं दे सकता अपनी किशी अवस्था के लिए क्योंकि किशी में शक्ति नहीं जो मुझको हिला दे अगर मई ठान लिया। अतः में मेर गुरुजनों ने समाज हित के लिए मुझे जिस अवस्था में पहुंचाया उसे स्वीकार कर उनका अभिवादन करता हूँ। ----वैसे भी गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वरह। गुरुर शाक्षात पर ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमह।


अनाचारी और चरित्रिक रूप से दुराचारी केवल शिवांश, राजा केदार ही नहीं ब्रह्मांश, रावण और सूर्यांश बाली भी हो तो उसके वध में समाज और उस व्यक्ति मतलब दोनों का भी हित समाहित है। -------अनुज वधू, भगनी, सूत नारी. सुन शठ ए कन्‍या समचारी। इंनहि कुदृस्टी बिलोकति जाही, ताहि बढे कछु पाप न होई। यहीं तक सीमित नहीं है क्योंकि यह केवल बाली के बारे में है बाकी तो रावण का भी वध हुआ न जो कि रावण के लिए परायी नारी थीं। ---रामचरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसी दास।


Tuesday, January 28, 2014

श्रीरघुवीर परायण जेहिं नर उपज विनीत (विनय युक्त =विनम्रता और शिस्टाचारयुक्त व्यक्ति (RESPECTFUL= COURTEOUS =Gentleman =सज्जन पुरुष)=और ऐसे रघुवीर का परायण मतलब रघुवीर में अभीस्त श्रध्धा वाला वही हो सकता है जी जिसके अन्दर विनीत (विनम्रता-विनययुक्त) की उपज हो )| -----श्रीराम चरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसी दास। Gentleness, Courteousness ( भद्रता) makes Gautam Rishi the top Rishi in Seven Brahmarshi (Saptarshi).


अगर काशी के 25-26 साल के आजीवन ब्रह्मचर्य ब्राह्मण युवक को जिसने अभी दुनिया को न ठीक से देखा हो और न जिया हो को प्रयागराज/तीर्थराज में ठीक 1 साल 19 दिन का अबोध बालक बनाकर महादेव शिव शंकर के चरण में इस लिए दाल दिया जाय कि वे भी दुनिया में अशोकचक्र टूटने सम्बन्धी अनाचार देखकर दुर्वाशा ऋषि कि तरह आक्रोशित हो नटराज नृत्य न करने लगे जिससे दुनिया का विनाश हो जाय वरन इसके स्थान पर दुर्वाशा को नियंत्रित करने का काम करें तो क्या यह आजीवन ब्रह्मचर्य काशीराम का तीर्थराज /प्रयागराज कृष्ण बनाने का कृत्य नहीं हुआ। क्या यह प्रयाग को गौरवान्वित नहीं करता है? मेरा यही सवाल है और यही उत्तर है क्योंकि महादेव कि सबसे बड़ी साधना यही है और उनको विनाशकारी नटराज नृत्य करने से बचाने कि भी यही साधना है कि किशी ब्रह्मचारी ब्राह्मण के बालक को उनके चरणों में समर्पित कर दिया जाय और इससे वे उस ब्राह्मण को रौदने के बजाय एक क्षत्रिय कि तरह अपने ह्रदय से लगा शांत हो जाते हैं।


बहुत से लोग कैसे किशी को पांच हजार साल से सताया हुआ बोलते है जबकि अधिकतम आयु सौ वर ही के लगभग है इस समय। दुनिया में बहुत से लोगों कि नज़रों में पुनर्जन्म नहीं होता पर मै जो कि इस समय सनातन ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया हूँ ने अपने सम्बन्ध में सतयुग में किश जाती विशेष में जन्म लिया और कौन सा कृत्या किया यह महादेव कि नगरी में मदनमोहन/श्रीकृष्ण मालवीय जी के बनाये विद्याश्रम में अपने दो श्रॆस्थतम गुरु जिसमे एक महामहिम और पदेन गुरु थे, समन्वयक महोदय और निदेशक महोदय को लिखा था (dated 2-4 February, 2012)| शारांश इतना है कि उसके पीछे एक ही शिवांश राजा केदार अपनी शक्तियों के दुरुपयोग करने और चारित्रिक रूप से दुराचारी हो जाने के कारन उनके अनाचार को समाप्त करने के लिए उनके शरीर के के दो भाग के पीछे मै ही था ( I was at that time Shooryavanshiy Gwala of cow) और इस प्रकार केदारनाथ धाम और पशुपतिनाथ धाम जैसे दो धाम बने क्योंकि अंततः वे थे तो शिवांश ही। मै पत्र का अंत किया था कि रामेश्वरम मतलब राम ही ईस्वर है दूसरा कोई नहीं और यही इसका उपसंहार था क्योंकि राम ही शिव, राम ही विष्णु और राम ही ब्रह्मा है।


चरित्र हीनता के दल-दल में जीने से श्रेस्ठ है आतंकवाद के साये में जीना: अगर यह टिप्पणी कि जा रही है मेरे द्वारा तो वह शारीरिक, व्यक्तिगत, सामूहिक, संस्थागत, रास्ट्रीय और वैश्विक समाज में मानवमूल्यों के ह्रास रूपी चरित्र हीनता से है जिसका कि मुकाबला ही दृण शक्ति के बल पर भी नहीं किया जा सकता है प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर लेकिन आतंकवाद को दृण शक्ति के बल पर हटाया जा सकता है।


परीक्षित उदहारण हैं कि श्रीकृष्ण पूर्ण प्रेम से पूर्ण प्रेम और पूर्ण सत्य तब बने थे जब वे अपने जीवन के सम्पूर्ण कर्मों को पूर्ण सत्य कि प्राप्ति सिध्ध करते हुए ब्रह्मास्त्र से अर्जुन के पौत्र परीक्षित के प्राण कि रक्षा कर हस्तिनापुर के एक मात्र उत्तराधिकारी को जीवित किया था और श्रीराम कि तरह पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम कि हो उनकी बराबरी किये थे जो उनके लिए हर्ष का विषय था परन्तु यदि पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम श्रीराम को श्रीकृष्ण का स्थान दे सामाजिक रूप से केवल पूर्ण प्रेम सिध्ध किया जाय और उस कृष्ण का सुदर्शन चक्र भी अशोक चक्र का स्थान लिया रहा हो बहुत वर्षों तक जबकि वे वास्तविक रूप में वे पूर्ण प्रेम और पूर्ण सत्य दोनों हैं तो उस श्रीराम की पूर्ण सत्य कि ऊर्जा विश्व कल्याण हेतु कहाँ लगी थी यह विचारणीय है। मतलब जब काशीराम को तीरथराज कृष्ण (या प्रयागराज कृष्ण) बना दिया जाय तब भी पूंछ जाय कि "तुम कौन हो ख्याल" --तो हम क्या जबाब देंगे-----।

  परीक्षित उदहारण हैं कि श्रीकृष्ण पूर्ण प्रेम से पूर्ण प्रेम और पूर्ण सत्य तब बने थे जब वे अपने जीवन के सम्पूर्ण कर्मों को पूर्ण सत्य कि प्राप्ति सिध्ध करते हुए ब्रह्मास्त्र से अर्जुन के पौत्र परीक्षित के प्राण कि रक्षा कर हस्तिनापुर के एक मात्र उत्तराधिकारी को जीवित किया था और श्रीराम कि तरह पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम कि हो उनकी बराबरी किये थे जो उनके लिए हर्ष का विषय था परन्तु यदि पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम श्रीराम को श्रीकृष्ण का स्थान दे सामाजिक रूप से केवल पूर्ण प्रेम सिध्ध किया जाय और उस कृष्ण का सुदर्शन चक्र भी अशोक चक्र का स्थान लिया रहा हो बहुत वर्षों तक जबकि वे वास्तविक रूप में वे पूर्ण प्रेम और पूर्ण सत्य दोनों हैं तो उस श्रीराम की पूर्ण सत्य कि ऊर्जा विश्व कल्याण हेतु कहाँ लगी थी यह विचारणीय है। मतलब जब काशीराम को तीरथराज कृष्ण (या प्रयागराज कृष्ण) बना दिया जाय तब भी पूंछ जाय कि "तुम कौन हो ख्याल" --तो हम  क्या जबाब देंगे-----।   

Monday, January 27, 2014

समरसता स्थापित करना और उसमे सहयोग करना ब्राह्मण का प्रथम कर्त्तव्य है अतः बहुत कुछ गूढ सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं किये जा सकते पर इतना जरूर है कि श्रीस्ती के जिस अंता होने कि सम्भावना हिन्दू और मुस्लिम समाज 2000 सन के आस पास लगा उसे बचने में जुट गया था उसकी सम्भावना ईसाई धर्म गुरुओं को विगक दो-तीन वर्ष पूर्व लगी जब सब कुछ ठीक हो चुका था और वे बहुत जोर सोर से इसका प्रह्कर भी किये जबकि हिन्दू और मुस्लिम समाज कहीं भी प्रचार नहीं किया केवल उसे बचने में जुटा था।


गर्ग ऋषि= कश्यपऋषि के पुत्र वरुण और वरुण के पुत्र बाल्मीकि और बाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज और भरद्वाज के शिस्य परम्परा के पुत्र गर्ग, तथा शांडिल्य ऋषि = कश्यप और वशिस्थ की युगल शक्ति से कश्मीर में उत्पन्न संतति शांडिल्य इस प्रकार ये सप्तर्षियों के व्युत्पन्न हुए है। अतः गर्ग, गौतम और शांडिल्य कि श्रेष्ठता की श्रेणी को द्वितीय श्रेणी मानते हुए गौतम ऋषि को सर्व्श्रेस्थ ऋषि माना जाता है।


विश्वामित्र (कौशिक) को विश्वरथ कहा जाता था क्योंकि वे पूरे विश्व में अपना रथ लेकर जिधर निकल जाते थे वह सबको पराजित अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर लेते थे। पर वे किशी स्थान पर बहुत समय तक स्थिर नहीं रहते थे। इस प्रकार उनका शासन बहुत समय तक स्थाई नहीं रहता था। परन्तु विश्वामित्र और मेनका कि संतान, शकुंतला और हस्तिनापुर के राजा, दुस्यन्त के पुत्र तथा कण्व ऋषि(कश्यप ऋषि के वंसज) के शिष्य, भरत ने अखंड भारत कि नीव डाली और इस भू भाग को आर्यावर्त घोसित किया जो सिध्ध करता है कि महापुरुषों और ऋषियन मनीषियों का अपने पथ से भटकना भी आम जन के लिए हितकारी ही होता है।


बात ऋषियों कि आती है तो कम से कम सात ऋषि(सप्तर्षि) इस दुनिया में अवश्य होंगे चौबीस हों न हों।

दुनिया में कम से कम एक ब्राह्मण, कम से कम एक क्षत्रिय और कम से कम एक वैस्य रहेगा तभी तक दुनिया चलेगी और वह तीनों एक तिहाई शक्ति सम्पन्न होंगे ब्रह्माण्ड कि सम्पूर्ण शक्ति के और वे क्रमश: ब्रह्मा, शिव और विष्णु होंगे। किशी भी प्रकृति व्यवस्था से जन्मे धर्म से आधारित वह हो सकते हैं।

   

अशोक चक्र=धर्मचक्र=समतामूलक चक्र=समयचक्र= मानव के चौबीस मानक तंत्रिका तंत्र= गायत्रीमंत्र को सिध्ध करने वाले चौबीस ऋषियों को निरूपित करने वाला चक्र टूटने के साथ जब इस दुनिया कि लाइफ लाइन ख़त्म हो रही थी उसी समय अशोक चक्र कि रक्षा करने वाले दुर्वाशा ऋषि को इसे तोड़ने के प्रति जिम्मेदार लोगों को दंड देने से रोककर इस इस स्थान पर समय के नियंता महादेव के आदेश पर सुदर्शन चक्र लगा समय कि गति रोक दी गयी थी और तब तक सुदर्शन चक्र लगा रहा जब तक कि व्यवस्था परिवर्तन हो नहीं गया और अशोकचक्र को पूर्व स्थिति में नहीं लाया गया॥ हर धर्म जिम्मेदारी सहित अब सही रूप से विश्व का सञ्चालन कर रहे हैं।

अशोक चक्र=धर्मचक्र=समतामूलक चक्र=समयचक्र= मानव के चौबीस मानक तंत्रिका तंत्र= गायत्रीमंत्र को सिध्ध करने वाले चौबीस ऋषियों को निरूपित करने वाला चक्र  टूटने के साथ जब इस दुनिया कि लाइफ लाइन ख़त्म हो रही थी उसी समय अशोक चक्र कि रक्षा करने वाले दुर्वाशा ऋषि को इसे तोड़ने के प्रति जिम्मेदार लोगों को दंड देने से रोककर इस इस स्थान पर समय के नियंता महादेव के आदेश पर सुदर्शन चक्र लगा समय कि गति रोक दी गयी थी और तब तक सुदर्शन चक्र लगा रहा जब तक कि व्यवस्था परिवर्तन हो नहीं गया और अशोकचक्र को  पूर्व स्थिति में नहीं लाया गया॥  हर धर्म जिम्मेदारी सहित अब सही रूप से विश्व का सञ्चालन कर रहे हैं।  

कुछ लोग जो अभी एक दसक पूर्व संसार से ब्राह्मणों को मिटा रहे थे मई उनसे कहना चाहूंगा कि आप सरल और विनम्र ब्राह्मणों को मिटाने कि कोशिस भर कर सकते हैं पर जो क्षत्रिय और वैस्य अपनी सर्वमान्य योग्यता के साथ ब्राह्मण धर्म या ब्राह्मण जाती में प्रवेश किये हैं उनको किस तरह मिटायेंगे आप और यह कश्यप गोत्र है जो प्रमाण है कि प्रथमतः ऐसे लोग कश्यप गोत्र ब्राह्मण में सीधे प्रवेश करते हैं।


Sunday, January 26, 2014

हिन्दू धर्म में आने वाले का स्वागत है और बाहर जाने पर आमादा लोगों कि विदाई है: कश्यप गोत्र दुनिया के सभी प्रकार के धर्म, जाती और सम्प्रदाय के लोगों को पुनः सनातन हिन्दू धर्म में शरण देता है यह सर्व विदित है। अतः हिन्दू धर्म में आने वाले का स्वागत है और बाहर जाने पर आमादा लोगों कि विदाई है और उसी तरह ब्राह्मण जाती/कर्म/धर्म में आने वाले का स्वागत है और जाने वाले कि विदाई है उसी तरह जिस तरह क्षत्रिय और वैस्य जाती/कर्म/धर्म में आने और जाने वाले स्वतंत्र है। -------फिर भी महादेव शिव शंकर के कथन (रामचरितमानस प्रसंग) को याद रखना चाहिए कि "धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई" मतलब ब्राह्मण वह धन्य है जो अपने धर्म से विरत न होता हो और "धन्य सो भूप नीति जो करई " मतलब शासक (राजा) वह धन्य है को सर्वमान्य नीतियों के अनुसार शासन करता हो।

कश्यप गोत्र दुनिया के सभी प्रकार के धर्म, जाती और सम्प्रदाय के लोगों को पुनः सनातन हिन्दू धर्म में शरण देता है यह सर्व विदित है। अतः हिन्दू धर्म में आने वाले का स्वागत है और बाहर जाने पर आमादा लोगों कि विदाई है और उसी तरह ब्राह्मण जाती/कर्म/धर्म में आने वाले का स्वागत है और जाने वाले कि विदाई है उसी तरह जिस तरह क्षत्रिय और वैस्य जाती/कर्म/धर्म में आने और जाने वाले स्वतंत्र है। -------फिर भी महादेव शिव शंकर के कथन (रामचरितमानस प्रसंग) को याद रखना चाहिए कि "धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई" मतलब ब्राह्मण वह धन्य है जो अपने धर्म से विरत न होता हो और "धन्य सो भूप नीति जो करई " मतलब शासक (राजा) वह धन्य है को सर्वमान्य नीतियों के अनुसार शासन करता हो।

Happy Republic Day to you friends, तिरंगा=त्रिदेव=त्रिमूर्ति(Brahma+Vishnu+Mahesh) फहराते हुए कभी मत कहियेगा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य नहीं रहा कोई अब ( If not by birth, caste and religion any one is Brahmin, Kshatriy and Vaisya then at least by his profession he will be Brahmin, Kshatriya and Vaisya)| Actually it is not TIRANGA but CHAURANGA, and because blue colored Ashok Chakra is in limited area (like fourth hidden Lion of Ashok Symbol) therefore it only called TIRANGA.


Saturday, January 25, 2014

In any ones Body there are 24 standard TANTRA and In Hindu Religion after Saptarshi and 8th Rishi Agastya/Kumbhaj i.e. Astak Rishi there were 24 Standard Rishi who are approved by Gayatri Mantra in which Vishvamitra is first and Yagyavalk is 24th Rishi and there are 24 hours in the Day thus 24 spokes(lines) exists in the Ashok Chakra which is life line of life on the earth.


तिरंगा=त्रिदेव=त्रिमूर्ति(Brahma+Vishnu+Mahesh) फहराते हुए कभी मत कहियेगा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य नहीं रहा कोई अब ( If not by birth, caste and religion any one is Brahmin, Kshatriy and Vaisya then at least by his profession he will be Brahmin, Kshatriya and Vaisya)| Actually it is not TIRANGA but CHAURANGA, and because blue colored Ashok Chakra is in limited area (like fourth hidden Lion of Ashok Symbol) therefore it only called TIRANGA.


Question from one of the my friend in Facebook circle: yahi to mera sawal ha ki... koi sanyas le lia.. moh maya tyag dia fir kyu usko PADVIO se lagav .. ye padvi accept kyu karte ? Reply from my side: Mai keval saptarshiyon (Gautam, Vashistha,Mareech/ Kashyapa, Angarisha/Bharadwaj, Bhrigu/Jamadagni, Atri/Durvash, Kaushik/Vishvamitra is order of the Saptarish) ke gotra ki shresthataa ki baat karataa hoon kyonki mai Sanatan Brahman parivaar se hoon jisame doosare gotra me shadiyaa hotee hain| Aur ye saton saath hee sanatan gotra hain saptarshiyon ke naam par tathaa mere yahaan riste me ye saton gotra paaye jaate hai atah mai inakee shreni se paricht hoon aur ham sab Gautam aur Vashistha vaale riste ko jyadaa mahatva dete hain khud. iskamatlab yah nahee ki kishi ko kam karke aankate hain par jo prakritik hai use ham log nahee mitaa sakte aur n kishi me samarthya hai mitaane ki|

Question from one of the my friend in Facebook circle: yahi to mera sawal ha ki... koi sanyas le lia.. moh maya tyag dia fir kyu usko PADVIO se lagav .. ye padvi accept kyu karte ?

Reply from my side:
Mai keval saptarshiyon (Gautam, Vashistha,Mareech/ Kashyapa, Angarisha/Bharadwaj, Bhrigu/Jamadagni, Atri/Durvash, Kaushik/Vishvamitra is order of the Saptarish) ke gotra ki shresthataa ki baat karataa hoon kyonki mai Sanatan Brahman parivaar se hoon jisame doosare gotra me shadiyaa hotee hain| Aur ye saton saath hee sanatan gotra hain saptarshiyon ke naam par tathaa mere yahaan riste me ye saton gotra paaye jaate hai atah mai inakee shreni se paricht hoon aur ham sab Gautam aur Vashistha vaale riste ko jyadaa mahatva dete hain khud. iskamatlab yah nahee ki kishi ko kam karke aankate hain par jo prakritik hai use ham log nahee mitaa sakte aur n kishi me samarthya hai mitaane ki|

Friday, January 24, 2014

Gautam, Vashistha,Mareech/ Kashyapa, Angarisha/Bharadwaj, Bhrigu/Jamadagni, Atri/Durvash, Kaushik/Vishvamitra is order of the Saptarish.


सर्वप्रथम महादेव शिवशंकर के पुत्र कार्तिकेय ने मलय प्रदेश(वर्त्तमान केरला और तमिलनाडु) को अपना क्षेत्र चुना कुम्भज ऋषि/अगस्त्य ऋषि की तरह और उसके बाद भृगु वंशीय परशुराम ने केरल, कर्णाटक का कुछ भाग, महारास्त्र, गुजराज और आंध्र के कुछ भाग को अपना क्षेत्र चुना और केरला रहने लगे, उसके बाद सूर्यवंशीय भगवान् राम ने कर्नाटका के सूर्यवंशियों बाली और सुग्रीव के साथ सम्बन्ध स्थापित किये और रामेश्वरम में शिवा लिंग स्थापित कर तमिल नाडु को उत्तर भारत से जोड़ शैव और वैस्नव एकता कि स्थापना किये। यह है हमारा उत्तर और दक्षिण सम्बन्ध।


दुर्वाशा कालों के काल महाकाल जो भगवान् श्रीराम और श्रीकृष्ण को भी पृथ्वी लोक से विष्णुलोक में भेजने के कारक थे और दुर्वाशा महा मंगलेश्वर भी हैं जिनका आशीर्वाद और अभिशाप दोनों कल्याणकारी होता है। --


शाक्यवंशीय गोत्रीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम के अनुयायी को इतना जरूर जानना चाहिए कि कैलाश पर्वत वासी शिव के सानिध्य में निवास करने वाले गौतमऋषि को अन्य छः सप्तर्षि सबसे ज्यादा सम्मान क्यों करते थे? और क्या दया और न्याय के पर्याय और न्याय दर्शन वाले गौतम ऋषि कि भी ऊंचाई से आगे चले गए सिद्धार्थ गौतम?


अगर अशोक चक्र=समय चक्र=समतामूलक चक्र=धर्म चक्र टूट गया तो वह दुर्वाशा ऋषि कि जिम्मेदारी है पर मित्र अशोक चक्र के स्थान पर सुदर्शन चक्र लगा था जो समय कि गति को रोक कर व्यवस्था परिवर्तन तक सब कुछ नजर अंदाज कर गया।


गाय, गंगा, गौरी और गायत्री के साथ ब्राह्मण, ऋषि-मुनि, दीन -दुखी और संत जन का संरक्षण भी कश्यप गोत्रियों का प्रमुख काम है और इसी लिए परशुराम ने ब्राह्मणों को संरक्षण देने कि सरत पर अत्याचारी क्षत्रियों हुई जमीन कश्यप ऋषि को थी और उनको पूरा विश्वाश था कि कश्य गोत्रीय ब्राह्मणों को संरक्षण जरूर देंगे। ब्राह्मण को संरक्षण देने का यह मतलब नहीं है कि अन्य का विनाश करना। -------जानकारी के लिए दोनों कश्यप गोत्रीय विष्णु अवतार- चंद्रवंशीय:यदुवंशीय:वृष्णि वंशीय श्रीकृष्ण को चक्र और रघुवंशीय श्रीराम को शिव धनुष भेंट करने वाले परशुराम इन दोनों के लोक कल्याण कि भावना से परिचित हो ऐसा किये थे।


जिसमे तीन फलक हों और वह है बेल पत्र मित्रों और हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाला यह भी जानते हैं कि बेल पत्र महादेव शिव शंकर पर अर्पित होता है तो त्रिफला पाण्डेय कि श्रेणी वही है जो महादेव को समर्पित है: अतः जो महादेव को समर्पित और कश्यप गोत्रीय भी हो मतलब अधिकतम विष्णु अवतार को जन्म देने वाला भी हो उसपर ब्राह्मणवाद का आरोप कहाँ तक लगा सकते हैं आप। यह जरूर है कि जो कश्यप गोत्र दुनिया के सभी प्रकार के लोगों को सनातन हिन्दू धर्म में सरन देता है वह ब्राह्मणों को विशेष आदर और महत्व देता है पर ब्राह्मण को रावण बनाने में कदापि न समर्थन करता है और न मदद देता है बल्कि समाज कि मुख्यधारा में समाजहित में कार्य के लिए प्रेरित करता है जिसमे कि किशी अन्य को भी कोई कस्ट न पहुंचे।


देवकाली (लक्ष्मी, गौरा पार्वती और सरस्वती की सम्मिलित स्वरुप) जिसकी कुल देवी हों उसके साथ गोरे और काले की राजनीती कर विजय नहीं पा सकते है आप और यह मेरे जैसे कश्यप गोत्रीय के लिए ही सही नहीं वरन किशी भी सूर्यवंशीय: रघुवंशीय कश्यप गोत्रीय कि भी कुल देवी होती हैं। और यह बात अलग है कि विश्व में गोरे लोगों कि सर्वाधिक संख्या है जैसा कि उत्तर भारत मे और यह भी कि कुर्म अवतारी होने का यह मतलब नहीं होता है कि आप काले ही हों।


The Churning of Ocean i.e. SAMUDRA MANTHAN of "preparation for New Millennium" has been ended and most richest cultural and religious centre(where all three most important religion i.e. Hindu and his associate; Muslim and his associate; and Christian and his associate are present) of the world and India i.e. Prayag:Allahabad(and his associate Kashi:Varanasi) has controlled all type of tsunami, Cyclone and also other side effects it may be cultural, social, political, economical and religious. The people who affected by its side effect has benefited by other processes. The positive yield as resultant is now that the whole world became as a village and Indian people spread all around the world and IN THIS PROCESS THE CASTE BASED RESERVATION HAS PLAYED THE MOST IMPORTANT ROLE so that the General category and other all category awakening forward people became so much able that in mass they crosses the threshold to be Internationally recognize.


Tuesday, January 21, 2014

-जगजीवन राम (विष्णु) और जगजीवन कृष्ण(विष्णु) के रहते हुए जय भीम (कृष्ण कि बुआ के पुत्र और मित्र) कहने कि क्या जरूरत? *******जय हिन्द(ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी=जम्बू द्वीप), जय भारत(भरतखंड=अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीकृ


लक्ष्मी जी (महामाया) के साथ गणेश जी (गजाधर) जिस तरह से अति शोभित होते हैं उसी प्रकार से श्रीराम जी और श्रीकृष्ण जी (विष्णु भगवान्) के साथ हनुमान जी (अम्बावाडेकर जी) अति शोभित होते है। अतः भारतीय जगजीवन में कभी भी कोई कृत्य ऐसा नहीं होता जिसे भारतीय संस्कृति के साथ नजदीकी और उससे दूरी के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता और उसी क्रम में पवन पुत्र हनुमान (अम्बावाडेकर) कि मुस्टिका प्रहार कि तरह पवन अंश भीम कि शक्ति का पैमाना भी उनकी गदा के प्रहार से एक साथ मारे जा सकने वाले गजराज कि संख्या से दिया जाता है और यह महाभारत कालीन भारतीय संस्कृति के तहत आता है। मेरे जैसे लोग भारतीय समाज को अशोक के चारों शेरो कि तरह देखते हैं जिसमे एक शेर हमेशा छुपा हुआ दिखाई देता है जो कि हमेशा संक्रमण कि अवस्था में रहता है और क भी इन तीनों में अपनी शक्ति को समर्पित कर इन तीनों का शक्ति वर्धन करता रहता है।


Wednesday, January 1, 2014

(जिसे आप इस्लाम और रामाश्रयी तथा ईसाइयत और कृष्णाश्रयी जैसी सामानांतर रेखाओं के बीच लम्ब कह सकते हैं) इस्लाम रामाश्रयी विचार के समानांतर और ईसाइयत कृष्णाश्रयी विचार के सामानांतर चलता है पर अंतर केवल इतना है कि इनमे सनातन हिन्दू धर्म में गाय, गंगा, गौरी और गायत्री के प्रति श्रध्धा और विश्वास इससे वे अलग मत रखते हैं(जिसे आप इस्लाम और रामाश्रयी तथा ईसाइयत और कृष्णाश्रयी जैसी सामानांतर रेखाओं के बीच लम्ब कह सकते हैं)। --------अगर इन बातों को ध्यान में रखा जाय और जिस जलवायु में इस्लाम और ईसाइयत का जन्म हुआ उस जलवायु को ध्यान में रखा जाय तो हैम पाते हैं कि सनातन हिन्दू धर्म जिसे ऋषि-मुनियों द्वारा निर्देशित प्राकृतिक धर्म की भी संज्ञा दी जाती है वह सभी धर्मों का मूल हो जाता है।