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Monday, March 31, 2014

कर्ण अपने छोटे भाई अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव और युधिस्ठिर से श्रेष्ठ रहे होंगे पर वे स्वयं अपने गुरु भृगु(जमदग्नि/जमदग्निपुर/जौनपुर ) वंशीय परशुराम और तो और समयचक्र और धर्मचक्र के रक्षक अत्रि और अनुसूइया पुत्र दुर्वाशा(आर्यमगढ़/आज़मगढ़) से श्रेष्ठ कैसे हो सकते थे जो स्वयं कर्ण के जन्म के कारक थे ?

कर्ण अपने छोटे भाई अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव और युधिस्ठिर से श्रेष्ठ रहे होंगे पर वे स्वयं अपने गुरु भृगु(जमदग्नि/जमदग्निपुर/जौनपुर ) वंशीय परशुराम और तो और समयचक्र और धर्मचक्र के रक्षक अत्रि और अनुसूइया पुत्र दुर्वाशा(आर्यमगढ़/आज़मगढ़) से श्रेष्ठ कैसे हो सकते थे जो स्वयं कर्ण के जन्म के कारक थे ?

मै किसको श्रेष्ठ कहूँ उस मुस्लिम(मुसल्लम ईमान=सम्पूर्ण ईमानदार) समाज को जो भगवान् श्रीराम के सामानांतर चलता है और जो हिन्दू समाज का भरपूर सहयोग किया बदनाम होकर भी इस नए सहस्राब्दी के प्रथम दशक में जब विश्व मानवता अपने ही कार्यों से पतन कि अग्रसर थी; या उस ईसाई (दया, प्रेम और सेवा का सागर) समाज को समाज को जो भगवान् श्रीकृष्ण के समानांतर चलता है पर अपने को चिड़ीमार प्रक्रिया में लिप्त कर व्यसनलीन हो गया था एक लड़की पाकर? सर्वविदित है कि भगवान शिव के आराध्य और आराधक भगवान् श्री राम(विष्णु) अग्रज है भगवान् श्रीकृष्ण (विष्णु) के तो उसी तरह मुस्लिम समाज अग्रज है ईसाई समाज के और इस प्रकार ये दोनों सनातन धर्म रूपी नदी के दो किनारे है और सनातन धर्म के महासागर में ही एक होते हैं। प्रयागराज(त्रिवेणी) में बैठकर मुझे कहते हुए अति गर्व महशूस होता है कि वह सनातन धर्म का महासागर अल्लाहबाद/प्रयागराज(प्राक-यज्ञ या सप्तर्षियों के प्रकट होने के लिए किये गए प्रकृष्टा यज्ञ का स्थान प्रयागराज) ही है। यही है वह स्थान है जहां शिव और राम कि गंगा, सूर्य और कृष्ण कि यमुना और भगवान् ब्रह्मा कि सरस्वती तीनों एक होती है और इसे त्रिवेणी नाम भी देती है। चूंकि सरस्वती अदृश्य है अतः इसे और इससे सटे क्षेत्र को दोआब भी कहते है। और इसी प्रयागराज में ब्रह्मा और सरस्वती, शिव और पारवती तथा विष्णु और लक्ष्मी अदृश्य रूप से माघ के पूरे माह में विद्यमान रहते हैं ब्रह्मलोक, कैलाश और क्षीरसागर(विष्णु भगवान् के ससुर स्वयं सातों समुद्र हैं) को छोड़कर।


जितनी जिम्मेदारी किशी ब्राह्मण कि है इस श्रिष्टि को सुचारुरूप से संचालित करने की उससे कुछ कम जिम्मेदारी नहीं होती है कश्यप और अदिति के पुत्रों में सूर्यवंशीय/इक्षाकुवंशीय/रघुवंशीय & चद्रवंशीय/यदुवंशीय/वृष्णि वंशीय कश्यप गोत्रिओ की इस श्रिष्टि को सुचारुरूप से संचालित करने की। जय हिन्द(जम्बू द्वीप: यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भरतखंड+अखंड भारत), जय श्रीराम/सूर्यवंशीय/इक्षाकुवंशीय/रघुवंशीय, जय श्रीक़ृष्ण/चंद्रवंशीय/यदुवंशीय/वृष्णिवंशीय।


मै डॉ विवेक कुमार पाण्डेय 2008 में अपने ऑरकुट अकाउंट पर भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में कहा था कि मै उत्तर प्रदेश में सक्रीय राजनीति में भाग लेने वाले वाले अपने तीन भाइयों राहुल, वरुण और अखिलेश के लिए एक राष्ट्रीय और अंतररास्ट्रीय स्वयं सेवक के लिए कार्य कर सकता हूँ किशी भी क्षेत्र में सेवा देते हुए भी और सोनिआ और मेनका को मै माँ तुल्य मानता हूँ उनके नेक कार्यों और देश सेवा के लिए। और जब अब परिभाषित है कि हिन्द=जम्बू द्वीप=यूरेशिया=यूरोप + एशिया=या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, तो जय हिन्द शब्द हमें स्वयं वैश्विक व्यवस्था का केंद्र बना देता है। और जय भारत हमें और अधिक सुसंस्कृतिक होने के लिए प्रेरित करता है और यूरोप कि संस्कृति को भी भारतीय बनाने कि प्रेरणा देता है। और जय श्रीराम/कृष्ण हमें पूर्ण मानव बनने के लिए प्रेरित करते हैं जिसका अभिप्राय है कि दुस्ट दलन(demolition of evils) हो पर प्रेम और सत्य से पीछे न हटें। श्रेष्ठ चरित्र ही भगवान् परशुराम का दिया हुआ शिव धनुष श्रीराम को धारण और संचालन कि शक्ति देता था; और संदीपनी गुरु के गुरुकुल से लिया हुआ श्रेष्ठ चरित्र ही भगवान् श्रीकृष्ण को भगवान् परशुराम का दिया हुआ चक्र चलाने और धारण करने कि क्षमता देता था। अतः श्रेष्ठ चरित्र का संवाहक बनो क्योंकि चरित्रहीन, संस्कृति और संस्कार विहीन व्यक्ति को यदि पूरे विश्व का ही स्वामी क्यों न बना दिया जाय वह चिर स्थायी नहीं रहता है वरन उसका क्षरण हो जाता है।--------------प्रभाकरण को उसके कार्य का फल मिलना सर्वथा उचित था और जो हुआ ठीक ही हुआ। ----मै तो बैंगलोर में चुनौती दिया था साउथ वालों से कि मेरी ह्त्या करके देखो क्या हश्र होता है?


रामेश्वरम से शिव ईस्वर हैं का अभिप्राय निकलने वाला राम और रामेश्वरम से राम ईस्वर हैं का अभिप्राय निकालने वाला शिव ही हो सकता है। यह पारस्परिक निर्भरता जिसने देखी हो उसमे (से मै भी एक हूँ और शिव(प्रेम) जो सर्वोच्च हैं को अपने से उम्र में छोटे विष्णु:राम(श्रीधर) को और विष्णु:राम(श्रीधर) को शिव(प्रेम) को नमन करते देखा हूँ। शायद यह वह समय था जब मानवता को उसके सम्पूर्ण विनाश से बचाने के लिए शिव(प्रेम) को अपने से छोटे (बाद में जन्म लिए) विष्णु:राम(श्रीधर) को नमन करना जरूरी हो गया था दैत्यों का संहार करने के लिए और ऊर्जा संग्रहीत करने हेतु और सहयोग लेने हेतु। दुनिया कि नजर में कुछ न दिखाई दिया हो पर मै प्रत्यक्ष देखा रहा था। स्वयं रामापुर आजमगढ़ उस बिशुनपुर-जौनपुर(गोरखपुर के गौतम गोत्रीय निवाजी बाबा के बसाये 300बीघा का गाँव जिसे एक क्षत्रिय जमींदार ने दान दिया था योग के चमत्कार से प्रभावित हो) के सामने झुक रहा था जो स्वयं बिशुनपुर के लिए पूज्य और गौरवशाली है। यह बताता है कि आज़मगढ़/आर्यमगढ़ का गुरु दुनिया में कोई है तो वह जौनपुर/जमदग्निपुर ही है। मेरे गाँव रामापुर के सनातन कश्यप गोत्रीय बाबा सारंगधर अगर बस्ती जिले के थे तो माता जी भी जौनपुर से ही थी जिनको मुस्लिम जमीदार ने पांच गाँव दान दिया था योग के चमत्कार से प्रभावित हो, जिसमे कि एक मेरा गाँव रामापुर, आजमगढ़ 500 बीघे का है। -------------अतः मित्रों विष्णु परमगुरु है त्रिदेवों में देवताओं के गुरु श्रेष्ठ बृहस्पतिकि तरह। त्रिदेव देव श्रेष्ठ है जो शिद्ध करता है कि विष्णु सर्वश्रेष्ठ जगत गुरु हैं।

रामेश्वरम से शिव ईस्वर हैं का अभिप्राय निकलने वाला राम और रामेश्वरम से राम ईस्वर हैं का अभिप्राय निकालने वाला शिव ही हो सकता है। यह पारस्परिक निर्भरता जिसने देखी हो उसमे (से मै भी एक हूँ और शिव(प्रेम) जो सर्वोच्च हैं को अपने से उम्र में छोटे विष्णु:राम(श्रीधर) को और विष्णु:राम(श्रीधर) को शिव(प्रेम) को नमन करते देखा हूँ।  शायद यह वह समय था जब मानवता को उसके सम्पूर्ण विनाश से बचाने के लिए शिव(प्रेम) को अपने से छोटे (बाद में जन्म लिए) विष्णु:राम(श्रीधर) को नमन  करना जरूरी हो गया था दैत्यों का संहार करने के लिए और ऊर्जा संग्रहीत करने हेतु और सहयोग लेने हेतु। दुनिया कि नजर में कुछ न दिखाई दिया हो पर मै प्रत्यक्ष देखा रहा था। स्वयं रामापुर आजमगढ़ उस बिशुनपुर-जौनपुर(गोरखपुर के गौतम गोत्रीय निवाजी बाबा के बसाये 300बीघा का गाँव जिसे एक क्षत्रिय जमींदार ने दान दिया था योग के चमत्कार से प्रभावित हो) के सामने झुक रहा था जो स्वयं बिशुनपुर के लिए पूज्य और गौरवशाली है। यह बताता है कि आज़मगढ़/आर्यमगढ़ का गुरु दुनिया में कोई है तो वह जौनपुर/जमदग्निपुर ही है।   मेरे गाँव रामापुर के सनातन कश्यप गोत्रीय बाबा सारंगधर अगर बस्ती जिले के थे तो माता जी भी जौनपुर से ही थी जिनको मुस्लिम जमीदार ने पांच गाँव दान दिया था योग के चमत्कार से प्रभावित हो, जिसमे कि एक मेरा गाँव रामापुर, आजमगढ़ 500 बीघे का है। -------------अतः मित्रों विष्णु परमगुरु है त्रिदेवों में देवताओं के गुरु श्रेष्ठ बृहस्पतिकि तरह। त्रिदेव देव श्रेष्ठ है जो शिद्ध करता है कि विष्णु सर्वश्रेष्ठ जगत गुरु हैं।

Thursday, March 27, 2014

भगवान् श्री कृष्ण के बारे में भ्रांतियां और उसका तोड़: RASH-LEEL act, which he had done was before Kansh Vadh and also he had gone for education to Sandipati Rishi Ashram after RASH-LEELA and Kansh Vadh(Most important to note): 1 ) राधा कृष्ण से बड़ी थीं यह सच है, 2 ) कृष्ण ने अपने माता और पिता को कंश से मुक्ति दिलाने के लिए बाबा नन्द राय और यशोदा से विदा ली यह सच है, 3) न राधा ने श्री कृष्ण को छोड़ा मन से और न कृष्ण ने राधा को मन और सदा के लिए भौतिक रूप से छोड़ने के विचार से मथुरा गए कंश के प्रस्ताव को स्वीकार कर वरन वे तो जानते थे कि कंश को अवशय मार सकते थे और आने पर राधा, नन्द राय और यशोदा उनको मिलेंगी ही, 4 ) राधा के पिता वृषभान ने कंश के हांथों कृष्ण को मरा हुआ पहले ही मान लिया जब वे कंश का प्रस्ताव स्वीकार कर मथुरा गए और इस प्रकार यशोदा के ही निकट के समकुलीन यदुवंशीय क्षत्रिय रायन से राधा कि शादी की गयी और इस प्रकार राधा ने शास्त्रीय नियम नहीं तोड़ा (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कि सीमा के भीतर ही शादी कि थी), 5 ) कृष्ण भगवान् कंश वध के बाद वसुदेव के कुलगुरु शांडिल्य गोत्रीय संदीपनी ऋषि के गुरुकुल में शिक्षा लिए अतः उनका भी वशिस्ठ के कुल से छुटकारा नहीं मिला क्योंकि कश्मीर में जन्म लिए शांडिल्य ऋषि कश्यप और वशिष्ठ के संयोगी संतान थे(कुछ लोग तो यहाँ तक मानते हैं कि कश्यप ऋषि की बहन कि शादी वशिस्ठ ऋषि से हुई थी और उन्ही के संतान थे शांडिल्य) और तो और स्वयं गर्ग के वंसज (कश्यप के पुत्र वरुण के पुत्र बाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज के शिष्य परम्परा के पुत्र) भी बाबा नन्द राय के कुलगुरु थे पर संयोग शांडिल्य गोत्रीय संदीपनी से था शिक्षा लेना , 6) यह सत्य है कि कृष्ण के बारे में आम जन में दुषप्रचार के कारन संकुलीन समस्तरीय विवाह प्रस्ताव नहीं आ रहे थे और नारद जी ने ही एक पंडित की भूमिका निभा पहला प्रस्ताव रुक्मणि का लाया और इस प्रकार सत्यभामा सहित लगभग 16000 विवाह कि बातें प्रकाश में आती है पर रुक्मणि ही एक मात्र धर्म पत्नी हैं उनकी यह कटु सत्य है जिनसे प्रद्युम्न जैसे सुन्दर पुत्र (कामदेव के अवतार) का जन्म हुआ और अनिरुद्ध उनके पौत्र हुए(16000 proposal came for the Krishna created 16000 indirect wife of Krishna because all these Gopika's accepted him as her mental Husband although they were have their own husband in physical sense from their father-in-law house), 7) शादी बाद भी राधा का प्रेम कृष्ण से ऐसा था कि स्वयं को नरक में जाने को तैयार भी हो वे कृष्ण की नाटकीय वीमारी को ठीक करने के लिए अपने पैर कि चरण रज दे देती हैं जो कि नरक में जाने के डर से स्वयं रुक्मणि और अन्य रानिया ऐसा नहीं करती हैं(भारतीय समाज में पत्नी का अपने पति के शरीर पर चरण रज लगाने के लिए देना नरक में जाने का डर और शर्म पैदा करता है: यहाँ कृष्ण तो केवल परीक्षा ले रहे थे और उनको चरण रज से कुछ लेना देना नहीं था, 8) यही कारन है कि स्वयं लक्ष्मी यदि राधा थीं तो रुक्मणी उनकी छाया और इसी लिए राधा और श्याम(कृष्ण) को पूजते हैं तो रुक्मणि का पूजन अपने आप हो जाता है, 9) अगर जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी सत्य न होता और कृष्ण कि केवल एक भौतिक पत्नी रुक्मणि न होती तो: न कृष्ण ब्रह्मचारी होते और न सुदर्शन चक्र वे उठा सकते थे जो कि स्वयं भगवान् विष्णु का चक्र ही थी जिसे भगवान् परशुराम ने उनको भविष्य में काम आने कि बात कहकर संदीपनी आश्रम में ही दे दिया था और भगवान् श्री कृष्ण चक्रधरी गुरुकुल से निकलते ही हो गए थे, 10 ) हनुमान(अम्बावाडेकर) भगवान् विष्णु का भक्त होने के नाते भगवान् श्रीकृष्ण के भी भक्त थे पर साथ जरूरत पड़ने पर केवल महाभारत युध्ध में दिए थे अर्जुन के रथ पर भगवा ध्वज (धर्म कि पताका) आम जन के लिए अदृश्य रहते हुए और यहाँ तक कि अर्जुन को भी नहीं पता था, 11 ) अंत में जो लोग यह कहते हैं कि विष्णु की कूर्म अवतारी जाती के लोग केवल काले होने चाहिए, कृष्ण या राम होने के लिए काला या सांवला होना चाहिए, और स्वामिभक्त/भक्त केवल दीन-हीन व्यक्ति ही समाज में होना चाहिए तो उनकी ये वे वजह बाते और नसलवाद धोखा है भारतीय और विश्व समाज के लिए क्योंकि हनुमान(अम्बावाडेकर: माँ:आंबे:भारतमाँ:पृथ्वी माँ कि रक्षा का निभाने वाला व्यक्ति या स्थान या गाँव) और कूर्म अवतारी व्यक्ति वह है जो दुनिया के हर संघर्ष को समाज हित में सहते हुए समाज को रत्न और धर्म से सुसज्जित करे भगवान् विष्णु कि तरह, हर व्यक्ति के गृह-नक्षत्र, परिवार के संस्कार, संस्कृति, और परिवार का आनुवंशिक गुण सब मिलाकर जो श्री राम और श्री कृष्ण जैसा का आचरण करे वही श्री राम और श्री कृष्ण है न कि इसके लिए गोरा या काला कोई अनिवार्यता है और सब मिलाकर यह दुनिया सुन्दर, सुखद-समृद्ध और शांतिमय यही गोरा और काला का सम्मिश्रण भारत को और विश्व को चाहिए: अतः घर में आये हर नए मेहमान का ह्रदय से स्वागत कीजिये वह गोरा हो, काला हो, लड़का हो या लड़की हो सब ईस्वरीय संतुलन का ही परिणाम है। १२) भगवान् श्री कृष्ण भी भगवान् श्रीराम कि तरह पूर्ण प्रेम से पूर्ण सत्य हो गए थे जब वे अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र कुमार उत्तर(परीक्षित) के प्राणों कि रक्षा अश्वत्थामा के द्वारा चलाये गए ब्रह्मास्त्र से किये थे ब्रह्मा को यह बता कि यदि मेरे जीवन के सम्पूर्ण कर्मों का अभीष्ट उद्देश्य सत्य कि प्राप्ति और श्रिष्टि का कल्याण रहा हो तो आप इस ब्रह्मास्त्र को वापस बुला लीजिये और कुरु वंश का बचा हुआ एक मात्र चिराग अर्जुन के पौत्र कुमार उत्तर(परीक्षित/अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र ) का जीवन सुरक्षित कर दीजिये: मित्रों धनुष-बाण और मछली पर अचूक निशाना यह उत्तर प्रदेश कुमार उत्तर और उनके परपिता अर्जुन और भगवान् श्री कृष्ण के पूर्ण सत्य होने का प्रमाण उसी तरह है जैसे उत्तराखंड उनकी माँ उत्तरा का प्रतीक; १३) अंत में भारतीय और विश्व समाज से निवेदन है कि अगर किशी को शिव के ही रूप में देखना चाहते हैं तो पार्वती मर भी जाय पर उन पर किशी भस्मासुर कि छाया भी न पड़े; अगर राम के रूप में देखना चाहते है तो सीता जल भी जाय पर रावण उनके अंतर मन में प्रवेश भी न कर सके राम के मृत्यु कि खबर पा कर भी, और अगर किशी को कृष्ण के रूप में देखना चाहते हैं तो कम से कम राधा की सामान कुल में एक शात्रीय शादी ही होने दीजिये न कि वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कि सीमा भी पर कर जाय। और अगर ऐसा नहीं हुआ तो अशोकचक्र टूटेगा ही टूटेगा तब समता नहीं क्रूरता का शासन होगा इसके प्रतिशोध में और ब्रह्मा के पुत्र राजा दक्षप्रजापति का सिर शिवा जी के गण द्वारा काटा ही जायेगा यह अलग बात है कि ब्रह्मा का पुत्र होने के नाते उनको दूसरा सीर मिलेगा महादेव द्वारा ही; 14) मानव तो सभी ऋषियों से जन्म लिए पर कस्यप ऋषि से देवता(कस्यप/अदिति){देवों में इंद्र, विश्वकर्मा(विश्व का सबसे बड़ा अभियंता), चन्द्र, सूर्य, वरुण व् अन्य सभी -------} और दैत्य(कशयप/दिति), नागवंशीय, किन्नर वंशीय व् अन्य अन्य सभी तो मित्रों सूर्यवंशीय और चन्द्रवंशीय को अभियंता और वैद्य और बहुत बड़े शोधकर्ता होने से ज्यादा जरूरी है इस सम्पूर्ण समाज को नियंत्रित करना जिसमे कि आम मानव और ये अभियंता, वैद्य, और शोधकर्ता/वैज्ञानिक सुचारु रूप से अपना काम करा सके। -----------जय हिन्द(जम्बूद्वीप:यूरेशिया=यूरोप+एशिया=या कम से कम ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भरतखंड=अखंड भारत), जय श्री राम/कृष्ण।

भगवान् श्री कृष्ण के बारे में भ्रांतियां  और उसका तोड़: RASH-LEEL act, which he had done was before Kansh Vadh and also he had gone for education to Sandipati Rishi Ashram after RASH-LEELA and Kansh Vadh(Most important to note): 11 )  राधा कृष्ण से बड़ी थीं यह सच है, 2 ) कृष्ण ने अपने माता और पिता को कंश से मुक्ति दिलाने के लिए बाबा नन्द राय और यशोदा से विदा ली यह सच है, 3) न राधा ने श्री कृष्ण को छोड़ा मन से और न कृष्ण ने राधा को मन और सदा के लिए भौतिक रूप से छोड़ने के विचार से मथुरा गए कंश के प्रस्ताव को स्वीकार कर वरन वे तो जानते थे कि कंश को अवशय मार सकते थे और आने पर राधा, नन्द राय और यशोदा उनको मिलेंगी ही, 4 ) राधा के पिता वृषभान ने कंश के हांथों कृष्ण को मरा हुआ पहले ही मान लिया जब वे कंश का प्रस्ताव स्वीकार कर मथुरा गए और इस प्रकार यशोदा के ही निकट के समकुलीन यदुवंशीय क्षत्रिय रायन से राधा कि शादी की गयी और इस प्रकार राधा ने शास्त्रीय नियम नहीं तोड़ा (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कि सीमा के भीतर ही शादी कि थी), 5 ) कृष्ण भगवान् कंश वध के बाद वसुदेव  के कुलगुरु शांडिल्य गोत्रीय संदीपनी ऋषि के गुरुकुल में शिक्षा लिए अतः उनका भी वशिस्ठ के कुल से छुटकारा नहीं मिला क्योंकि  कश्मीर में जन्म लिए शांडिल्य ऋषि कश्यप और वशिष्ठ के संयोगी संतान थे(कुछ लोग तो यहाँ तक मानते हैं कि कश्यप ऋषि की बहन कि शादी वशिस्ठ ऋषि से हुई थी और उन्ही के संतान थे शांडिल्य) और तो और स्वयं गर्ग के वंसज (कश्यप के पुत्र वरुण के पुत्र बाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज के शिष्य  परम्परा के पुत्र) भी बाबा नन्द राय के कुलगुरु थे पर संयोग शांडिल्य गोत्रीय संदीपनी से था शिक्षा लेना , 6)  यह सत्य है कि कृष्ण के बारे में आम जन में दुषप्रचार के कारन संकुलीन समस्तरीय विवाह प्रस्ताव नहीं आ रहे थे और नारद जी ने ही एक पंडित की भूमिका निभा पहला प्रस्ताव रुक्मणि का लाया और इस प्रकार सत्यभामा सहित लगभग 16000 विवाह कि बातें प्रकाश में आती है पर रुक्मणि ही एक मात्र धर्म पत्नी हैं उनकी यह कटु सत्य है जिनसे प्रद्युम्न जैसे सुन्दर पुत्र (कामदेव के अवतार) का जन्म हुआ और अनिरुद्ध उनके पौत्र हुए(16000 proposal came for the Krishna created 16000 indirect wife of Krishna because all these Gopika's accepted him as her mental Husband although they were have their own husband in physical sense from their father-in-law house), 7) शादी बाद भी राधा का प्रेम कृष्ण से ऐसा था कि स्वयं को नरक में जाने को तैयार भी हो वे कृष्ण की नाटकीय वीमारी को ठीक करने के लिए अपने पैर कि चरण रज दे देती हैं जो कि नरक में जाने के डर से स्वयं रुक्मणि और अन्य रानिया ऐसा नहीं करती हैं(भारतीय समाज में पत्नी का अपने पति के शरीर पर चरण रज लगाने के लिए देना नरक में जाने का डर और शर्म पैदा करता है: यहाँ कृष्ण तो केवल परीक्षा ले रहे थे और उनको चरण रज से कुछ लेना देना नहीं था, 8) यही कारन है कि स्वयं लक्ष्मी यदि राधा थीं तो रुक्मणी उनकी छाया और इसी लिए राधा और श्याम(कृष्ण) को पूजते हैं तो रुक्मणि का पूजन अपने आप हो जाता है, 9) अगर जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी सत्य न होता और कृष्ण कि केवल एक भौतिक पत्नी रुक्मणि न होती तो: न कृष्ण ब्रह्मचारी होते और न सुदर्शन चक्र वे उठा सकते थे जो कि स्वयं भगवान् विष्णु का चक्र ही थी जिसे भगवान् परशुराम ने उनको भविष्य में काम आने कि बात कहकर संदीपनी आश्रम में ही दे दिया था और भगवान् श्री कृष्ण चक्रधरी गुरुकुल से निकलते ही हो गए थे, 10 ) हनुमान(अम्बावाडेकर) भगवान् विष्णु का भक्त होने के नाते भगवान् श्रीकृष्ण के भी भक्त थे पर साथ जरूरत पड़ने पर केवल महाभारत युध्ध में दिए थे अर्जुन के रथ पर भगवा ध्वज (धर्म कि पताका) आम जन के लिए अदृश्य रहते हुए और यहाँ तक कि अर्जुन को भी नहीं पता था, 11 ) अंत में जो लोग यह कहते हैं कि विष्णु की कूर्म अवतारी जाती के लोग केवल काले होने चाहिए, कृष्ण या राम होने के लिए काला या सांवला होना चाहिए, और स्वामिभक्त/भक्त केवल दीन-हीन व्यक्ति ही समाज में होना चाहिए तो उनकी ये वे वजह बाते और नसलवाद धोखा है भारतीय और विश्व समाज के लिए क्योंकि हनुमान(अम्बावाडेकर: माँ:आंबे:भारतमाँ:पृथ्वी माँ कि रक्षा का निभाने वाला व्यक्ति या स्थान या गाँव) और  कूर्म अवतारी व्यक्ति वह है जो दुनिया के हर संघर्ष को समाज हित में सहते हुए समाज को रत्न और धर्म से सुसज्जित करे भगवान् विष्णु कि तरह, हर व्यक्ति के गृह-नक्षत्र, परिवार के संस्कार, संस्कृति, और परिवार का आनुवंशिक गुण सब मिलाकर जो श्री राम और श्री कृष्ण जैसा का आचरण करे वही श्री राम और श्री कृष्ण है न कि इसके लिए गोरा या काला कोई अनिवार्यता है और सब मिलाकर यह दुनिया सुन्दर, सुखद-समृद्ध  और शांतिमय यही गोरा और काला का सम्मिश्रण भारत को और विश्व को चाहिए: अतः घर में आये हर नए मेहमान का ह्रदय से स्वागत कीजिये वह गोरा हो, काला हो, लड़का हो या लड़की हो सब ईस्वरीय संतुलन का ही परिणाम है। १२) भगवान् श्री कृष्ण भी भगवान् श्रीराम कि तरह पूर्ण प्रेम से पूर्ण सत्य हो गए थे जब वे अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र कुमार उत्तर(परीक्षित) के प्राणों कि रक्षा अश्वत्थामा के द्वारा चलाये गए ब्रह्मास्त्र से किये थे ब्रह्मा को यह बता कि यदि मेरे जीवन के सम्पूर्ण कर्मों का अभीष्ट उद्देश्य सत्य कि प्राप्ति और श्रिष्टि का कल्याण रहा हो तो आप इस ब्रह्मास्त्र को वापस बुला लीजिये और कुरु वंश का बचा हुआ एक मात्र चिराग अर्जुन के पौत्र कुमार उत्तर(परीक्षित/अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र ) का जीवन सुरक्षित कर दीजिये: मित्रों धनुष-बाण और मछली पर अचूक निशाना यह उत्तर प्रदेश कुमार उत्तर और उनके परपिता अर्जुन और भगवान् श्री कृष्ण के पूर्ण सत्य होने का प्रमाण उसी तरह है जैसे उत्तराखंड उनकी माँ उत्तरा का प्रतीक; १३) अंत में भारतीय और विश्व समाज से निवेदन है कि अगर किशी को शिव के ही रूप में देखना चाहते हैं तो पार्वती मर भी जाय पर उन पर किशी भस्मासुर कि छाया भी न पड़े; अगर राम के रूप में देखना चाहते है तो सीता जल भी जाय पर रावण उनके अंतर मन में प्रवेश भी न कर सके राम के मृत्यु कि खबर पा कर भी, और अगर किशी को कृष्ण के रूप में देखना चाहते हैं तो कम से कम राधा की सामान कुल में एक शात्रीय शादी ही होने दीजिये न कि वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कि सीमा भी पर कर जाय। और अगर ऐसा नहीं हुआ तो अशोकचक्र टूटेगा ही टूटेगा तब समता नहीं क्रूरता का शासन होगा इसके प्रतिशोध में और ब्रह्मा के पुत्र राजा दक्षप्रजापति का सिर शिवा जी के गण द्वारा काटा ही जायेगा यह अलग बात है कि ब्रह्मा का पुत्र होने के नाते उनको दूसरा सीर मिलेगा महादेव द्वारा ही; 14) मानव तो सभी ऋषियों से जन्म लिए पर कस्यप ऋषि से देवता(कस्यप/अदिति){देवों में इंद्र, विश्वकर्मा(विश्व का सबसे बड़ा अभियंता), चन्द्र, सूर्य, वरुण व् अन्य सभी -------} और दैत्य(कशयप/दिति), नागवंशीय, किन्नर वंशीय व् अन्य अन्य सभी तो मित्रों सूर्यवंशीय और चन्द्रवंशीय को अभियंता और वैद्य और बहुत बड़े शोधकर्ता होने से ज्यादा जरूरी है इस सम्पूर्ण समाज को नियंत्रित करना जिसमे कि आम मानव और ये अभियंता, वैद्य, और शोधकर्ता/वैज्ञानिक सुचारु रूप से अपना काम करा सके। -----------जय हिन्द(जम्बूद्वीप:यूरेशिया=यूरोप+एशिया=याकम से कम ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भरतखंड=अखंड भारत), जय श्री राम/कृष्ण।

Wednesday, March 26, 2014

अंत में इतना कि बेटा और शिष्य स्वयं समर्थ हो विश्व विजय कर सकता पर अपने घर और गुरुकुल में रहने वाले पिता और गुरुकुल पर विजय पा ही नहीं सकता पर एक और केवल एक सरत पर पा सकता है वह स्वयं पिता और गुरु कि इक्षा के अनुरूप श्रेष्ठं कर्म करके और इसमे पिता और गुरु से पुत्र और शिष्य को कोई संघर्ष करना पड़ता है। अतः हनुमान(अम्बावाडेकर) पुत्र मकरध्वज(हनुमान के गुरु सूर्य कि पुत्री सुवर्चला का संयोग जो गुरु दक्षिणा कि पूर्ण करने हेतु हुआ था और जिसके संयोग से मकरध्वज का जन्म हुआ: अतः हनुमान एक पुत्र और एक नारी होते हुए एक ब्रह्मचारी हुए:इसीलिये कहा जाता है कि जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी ) जो रावण के भाई और विश्व के सबसे बड़े माफिया- अहिरावण के पातालपुरी पर शाशन कर रहे हैं और सूर्य तथा मंगल गृह पर जा रहे हैं अपने पुरुषार्थ को असीमित समझ अति उत्साह और उमंग वस् ; तो उनसे मेरा केवल इतना कहना है कि प्रयागराज में विश्रामावस्था में पड़े हुए आप के पिता (हनुमान: अम्बावाडेकर) को तो आप पराजित ही नहीं कर सकते तो उन महावीर हनुमान (अम्बावाडेकर) के पिता (केशरी)/ और स्वामी(श्रीराम) से कैसे दृस्टि (नजर) मिलाने कि हिम्मत कर रहे थे आप और आप के नागरिक।--------जय हिन्द(जम्बू द्वीप=यूरेशिया=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भरतखंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/श्री कृष्ण|

अंत में इतना कि बेटा और शिष्य स्वयं समर्थ हो विश्व विजय कर सकता पर अपने घर और गुरुकुल में रहने वाले पिता और गुरुकुल पर विजय पा ही नहीं सकता पर एक और केवल एक सरत पर पा सकता है वह स्वयं पिता और गुरु कि इक्षा के अनुरूप श्रेष्ठं कर्म करके और इसमे पिता और गुरु से पुत्र और शिष्य को कोई संघर्ष करना पड़ता है। अतः हनुमान(अम्बावाडेकर) पुत्र मकरध्वज(हनुमान के गुरु सूर्य कि पुत्री सुवर्चला का संयोग जो गुरु दक्षिणा कि पूर्ण करने हेतु हुआ था और जिसके संयोग से मकरध्वज का जन्म हुआ: अतः हनुमान एक पुत्र और एक नारी होते हुए एक ब्रह्मचारी हुए:इसीलिये कहा जाता है कि जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी ) जो रावण के भाई और विश्व के सबसे बड़े माफिया- अहिरावण के पातालपुरी पर शाशन कर रहे हैं और सूर्य तथा मंगल गृह पर जा रहे हैं अपने पुरुषार्थ को असीमित समझ अति उत्साह और उमंग वस् ; तो उनसे मेरा केवल इतना कहना है कि प्रयागराज में विश्रामावस्था में पड़े हुए आप के पिता (हनुमान: अम्बावाडेकर) को तो आप पराजित ही नहीं कर सकते तो उन महावीर हनुमान (अम्बावाडेकर) के पिता (केशरी)/ और स्वामी(श्रीराम) से कैसे दृस्टि (नजर) मिलाने कि हिम्मत कर रहे थे आप और आप के नागरिक।--------जय हिन्द(जम्बू द्वीप=यूरेशिया=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भरतखंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/श्री कृष्ण|

Name list of 42th Proud Past Alumni honored with including name in Allahabad University Alumni Association(AUAA) (Regd.) Registered Under Society Act 1860 (Registration No. 407/2000), Alumni Chapter- NCR Ghaziabad (Greater Noida): 2007-2008.(National News Paper comments included about Alumni-Ghaziabad and also participation/involvement of Prof. Rajedra Govind Harshe, VC University of Allahabad) Allahabad University Alumni Association:Famous alumni include: Our Proud Past Prof. Prem Chand Pandey (Dr, P.C. Pandey, SAC/ISRO,NCAOR/MoES, CORAL/IIT Kgp): Founder Director of National centre for Antarctic and Ocean Research (NCAOR), Goa, 1st student of University of Allahabad who got Bhatnagar award and Uttar Pradesh Vigyan Gaurav award along with many other award of science, he got Gold medal award of NASA, USA for his short span of time good work there as ISRO, Govt. of India employ on training. His help for new scientific centres in UoA indirectly is very important and was at exact turning period of university's future vision in modern era. KBCAOS/MNCOSS, IIDS is one of the on surface example known by all related with UoA. Ram Chandra Sinha, Former IAS Officer, Former Secretary to the Chief Minister of Bihar, Chairman of the Patna Improvement Trust, Divisional Commissionor (Bhaglpur), Commissioner (Agriculture, Education), Sub Divisional Officer, District Magistrate, founder of the Sudha Co-Operative, now Senior Advocate. Harivansh Rai Bachchan, Poet Krishna Prakash Bahadur, Author H.N. Bahuguna, former Deputy Prime Minister of India Prof. Harish Chandra, Mathematician Acharya Narendra Dev Mohammad Hidayatullah, Former Chief Justice, Supreme Court of India Ranganath Mishra, former Chief Justice of India Gulzari Lal Nanda, former Prime Minister of India Motilal Nehru Govind Ballabh Pant Prof. Govind Jee. Prof. University of Illinois, Former head- International society for Photobiology. Gopal Swarup Pathak, former Vice President of India Dr V.K.Rai, Plant physiology Dr. Shankar Dayal Sharma, Former President of India Chandra Shekhar, Former Prime Minister of India Satyendra Narayan Sinha, Former Chief Minister of Bihar Prof. Ram Chandra Shukla, Painter. Surya Bahadur Thapa Prof. Vijai K Tripathi Kamal Narain Singh, former Chief Justice of India Nikhil Kumar, former IPS, Member of Parliament India Prof. Daulat Singh Kothari, Physicist Prof. Kundan Singh Singwi, Physicist Prof. Govind Swarup, Physicist Udit Raj, Social Activist Pankaj Mishra, Author Krishna Kumar Sharma, Quit India Movement Leader and Activist, Prominent Poet and Literary Figure Vishwanath Pratap Singh,10th Prime Minister of India Murli Manohar Joshi,B.J.P leader and former Minister for Human resource&development Dharmendra Singh Yadav , Member of Parliament India Radhey Shyam Sharma, IPS, Former Director Vigilance UP Maharishi Mahesh Yogi Dhananjaya Kumar, Yogacharya, Poet Mahadevi Varma (poet and writer) Mukhtar Zaman, freedom fighter, leading journalist Dr Umesh C Yadav, Research scientist, Univ of Texas, USA Indu Kant Shukla, Litterateur,Poet,Writer. Prafulla Kumar Rai, MP for Gorakhpur (Uttar Pradesh) D.P. Chandel, equity researcher (New york, USA) Dr. Vivek Kumar Pandey PDF at Centre for Atmospheric & Oceanic Sciences, IISc Bangalore, 1st doctorate from K.Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies(KBCAOS,IIDS), University of Allahabad(UoA), Allahabad and (1st batch JRF of National Centre for Antarctic and Ocean Research (NCAOR), Goa,Master of Science Department of Physics(Nuclear)-2000, BHU, Varanasi, B.Sc. from Purvanchal University, Jaunpur (U.P.) Contact: ALLAHABAD UNIVERSITY ALUMNI ASSOCIATION IIND FLOOR, III-B-1, NEHRU NAGAR GHAZIABAD- 201001 Phone: 0120 – 2792976 Article: A silent crusader who is making efforts to restore AU's past glory Article from: The Hindustan Times Article date: August 26, 2005 NEW DELHI, India, Aug 26 -- SIX YEARS back, when the demand of giving Central Status to Allahabad University was gathering momentum, one man had already launched a silent crusade to restore the past glory of 'Oxford of the East' to make the whole world know about the 'powerful' men, which the university has produced till date. It was an extraordinary effort of Naveen Chandra, a bank employee, that led to the formation of Allahabad University Alumni Association in Ghaziabad. The Association boasts of 500 members, including Mumbai Commissioner of Police AN Roy, SBI Chairman AK Purwar, Ex-Delhi Police Chief Ajay Raj Sharma and former Defence Secretary Dr Yogendra Narain, who at some Article: Alumni relive those golden' glorious days Article from: The Hindustan Times Article date: February 18, 2008 Smriti Malaviya Hindustan Times NEW DELHI, India, Feb. 18 -- THE ALUMNI Convention at Allahabad University (AU) was more of an emotional and happy reunion of former students, than an event glorifying the past achievements of the varsity. The event gave an opportunity to former students and inmates of AU hostels to share their wonderful moments, which they spent at the university, with the new generation. Talking with HT Allahabad Live, two former inmates of Sir Sunder Lal Hostel who have come from Ghaziabad and Noida, admitted that the time spent at the university was the 'golden' period of their life. DK Singh 'Dadda' 'The time I spent at SSL Hostel was Article: AU alumni meet in Ghaziabad in October Article from: The Hindustan Times Article date: August 2, 2006 NEW DELHI, India, Aug 2 -- ALLAHABAD UNIVERSITY (AU) vice-chancellor Prof RG Harshe will participate in a conference to be hosted by the AU Alumni Association (AUAA) Ghaziabad and Noida chapter, at Ghaziabad in October. An AUAA delegation met PROF HARSHE recently at his residence and invited him to the conference. AUAA founding secretary Naveen Chandra and PN Tandon also informed Prof Harshe about the activities carried out by the association in Ghaziabad and adjoining areas. According to Chandra, AUAA had been successful in marking it presence through social and cultural activities in Ghaziabad and the entire National Capital Region. The activities included hosting cricket------------------------



Name list of 42th Proud Past Alumni honored with including name in Allahabad University Alumni Association(AUAA) (Regd.) Registered Under Society Act 1860 (Registration No. 407/2000), Alumni Chapter- NCR Ghaziabad (Greater Noida): 2007-2008.(National News Paper comments included about Alumni-Ghaziabad and also participation/involvement of Prof. Rajedra Govind Harshe, VC University of Allahabad)

Allahabad University Alumni Association:Famous alumni include:
Our Proud Past
Prof. Prem Chand Pandey (Dr, P.C. Pandey, SAC/ISRO,NCAOR/MoES, CORAL/IIT Kgp): Founder Director of National centre for Antarctic and Ocean Research (NCAOR), Goa, 1st student of University of Allahabad who got Bhatnagar award and Uttar Pradesh Vigyan Gaurav award along with many other award of science, he got Gold medal award of NASA, USA for his short span of time good work there as ISRO, Govt. of India
employ on training. His help for new scientific centres in UoA indirectly is very important and was at exact turning period of university's future vision in modern era. KBCAOS/MNCOSS, IIDS is one of the on surface example known by all related with UoA.
Ram Chandra Sinha, Former IAS Officer, Former Secretary to the Chief Minister of Bihar, Chairman of the Patna Improvement Trust, Divisional Commissionor (Bhaglpur), Commissioner (Agriculture, Education), Sub Divisional Officer, District Magistrate, founder of the Sudha Co-Operative, now Senior Advocate.
Harivansh Rai Bachchan, Poet
Krishna Prakash Bahadur, Author
H.N. Bahuguna, former Deputy Prime Minister of India
Prof. Harish Chandra, Mathematician
Acharya Narendra Dev
Mohammad Hidayatullah, Former Chief Justice, Supreme Court of India
Ranganath Mishra, former Chief Justice of India
Gulzari Lal Nanda, former Prime Minister of India
Motilal Nehru
Govind Ballabh Pant
Prof. Govind Jee. Prof. University of Illinois, Former head-
International society for Photobiology.
Gopal Swarup Pathak, former Vice President of India
Dr V.K.Rai, Plant physiology
Dr. Shankar Dayal Sharma, Former President of India
Chandra Shekhar, Former Prime Minister of India
Satyendra Narayan Sinha, Former Chief Minister of Bihar
Prof. Ram Chandra Shukla, Painter.
Surya Bahadur Thapa
Prof. Vijai K Tripathi
Kamal Narain Singh, former Chief Justice of India
Nikhil Kumar, former IPS, Member of Parliament India
Prof. Daulat Singh Kothari, Physicist
Prof. Kundan Singh Singwi, Physicist
Prof. Govind Swarup, Physicist
Udit Raj, Social Activist
Pankaj Mishra, Author
Krishna Kumar Sharma, Quit India Movement Leader and Activist,
Prominent Poet and Literary Figure
Vishwanath Pratap Singh,10th Prime Minister of India
Murli Manohar Joshi,B.J.P leader and former Minister for Human
resource&development
Dharmendra Singh Yadav , Member of Parliament India
Radhey Shyam Sharma, IPS, Former Director Vigilance UP
Maharishi Mahesh Yogi
Dhananjaya Kumar, Yogacharya, Poet
Mahadevi Varma (poet and writer)
Mukhtar Zaman, freedom fighter, leading journalist
Dr Umesh C Yadav, Research scientist, Univ of Texas, USA
Indu Kant Shukla, Litterateur,Poet,Writer.
Prafulla Kumar Rai, MP for Gorakhpur (Uttar Pradesh)
D.P. Chandel, equity researcher (New york, USA)
Dr. Vivek Kumar Pandey PDF at Centre for Atmospheric & Oceanic Sciences, IISc Bangalore, 1st doctorate from K.Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies(KBCAOS,IIDS), University of Allahabad(UoA), Allahabad and (1st batch JRF of National Centre for Antarctic and Ocean Research (NCAOR), Goa,Master of Science Department of Physics(Nuclear)-2000, BHU, Varanasi, B.Sc. from Purvanchal University, Jaunpur (U.P.)

Contact: ALLAHABAD UNIVERSITY ALUMNI ASSOCIATION
IIND FLOOR, III-B-1, NEHRU NAGAR
GHAZIABAD- 201001
Phone: 0120 – 2792976

Article: A silent crusader who is making efforts to restore AU's past glory
Article from:
The Hindustan Times
Article date:
August 26, 2005

NEW DELHI, India, Aug 26 -- SIX YEARS back, when the demand of giving Central Status to Allahabad University was gathering momentum, one man had already launched a silent crusade to restore the past glory of 'Oxford of the East' to make the whole world know about the 'powerful' men, which the university has produced till date.
It was an extraordinary effort of Naveen Chandra, a bank employee, that led to the formation of Allahabad University Alumni Association in Ghaziabad. The Association boasts of 500 members, including Mumbai Commissioner of Police AN Roy, SBI Chairman AK Purwar, Ex-Delhi Police Chief Ajay Raj Sharma and former Defence Secretary Dr Yogendra Narain, who at some
Article: Alumni relive those golden' glorious days
Article from:
The Hindustan Times
Article date:
February 18, 2008

Smriti Malaviya
Hindustan Times
NEW DELHI, India, Feb. 18 -- THE ALUMNI Convention at Allahabad University (AU) was more of an emotional and happy reunion of former students, than an event glorifying the past achievements of the varsity. The event gave an opportunity to former students and inmates of AU hostels to share their wonderful moments, which they spent at the university, with the new generation.
Talking with HT Allahabad Live, two former inmates of Sir Sunder Lal Hostel who have come from Ghaziabad and Noida, admitted that the time spent at the university was the 'golden' period of their life.
DK Singh 'Dadda'
'The time I spent at SSL Hostel was

Article: AU alumni meet in Ghaziabad in October
Article from:
The Hindustan Times
Article date:
August 2, 2006

NEW DELHI, India, Aug 2 -- ALLAHABAD UNIVERSITY (AU) vice-chancellor Prof RG Harshe will participate in a conference to be hosted by the AU Alumni Association (AUAA) Ghaziabad and Noida chapter, at Ghaziabad in October.
An AUAA delegation met PROF HARSHE recently at his residence and invited him to the conference. AUAA founding secretary Naveen Chandra and PN Tandon also informed Prof Harshe about the activities carried out by the association in Ghaziabad and adjoining areas.
According to Chandra, AUAA had been successful in marking it presence through social and cultural activities in Ghaziabad and the entire National Capital Region. The activities included hosting cricket------------------------
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श्रीराम/श्रीकृष्ण(विष्णु) और शिव में एक और केवल एक अंतर यह है कि विष्णु, समुद्र (महासागर:क्षीरसागर)) कि पुत्री लक्ष्मी के पति या लक्ष्मी पति ने कभी दैत्यों को वरदान नहीं दिया या उनका वरदान दिया हुआ कभी दैत्य नहीं हुआ पर शिव(केदारेश्वर) तो ऐसे अवढरदानी थे जो कि अपने ही आशीर्वाद से भस्मासुर पैदा कर स्वयं अपने और माँ पारवती के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिए। और विष्णु अपना मोहिनी रूप धारण न किये होते जो पारवती जी से भी ज्यादा सुन्दर रूप था और ब्रह्मा समय कि गति शून्य न किये होते तो शिव का अस्तित्व भी अपना वरदान पूर्ण करने में समाप्त हो गया होता। यहीं तक सीमित नहीं है वरन सृस्टि का निर्माण करने वाले ब्रह्मा जी उनसे भी बढ़कर हैं जो ऐसे वरदान दे देते थे दैत्यों को कि वे उसका उपयोग कर सृति के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देते थे। अतः कहा जाता है कि जहां शिव(केदारेश्वर) और ब्रह्मा उपस्थित हों वह दैत्यवंश का भी आश्रय स्थल अपने आप हो जाता है और फिर श्रीराम/श्रीकृष्ण (विष्णु) ही मानव और दानव में शक्ति संतुलन स्थापित कर श्रीस्ती की रक्षा करते हैं। ----NOTABLE: तीनों शक्तियों:तिरंगा(त्रिदेव) का एक शक्ति में मिल जाना भी इस संसार में से आकर्षण ही ख़त्म कर देगा। अतः तिरंगा(त्रिदेव) का जनक भगवा(सूर्य कि प्रथम किरण कि अरुणिमा) तो पिता है ही पर सबको एक में मिला एकेश्वरवाद होते हुए भी त्रिदेव(तिरंगा) सांसारिक रूप से ज्यादा उपयुक्त और प्रभावकारी दर्शन है परमपिता परमगुरु परमेश्वर का।

श्रीराम/श्रीकृष्ण(विष्णु) और शिव में एक और केवल एक अंतर यह है कि विष्णु, समुद्र (महासागर:क्षीरसागर)) कि पुत्री लक्ष्मी के पति या लक्ष्मी पति ने कभी दैत्यों को वरदान नहीं दिया या उनका वरदान दिया हुआ कभी दैत्य नहीं हुआ पर शिव(केदारेश्वर) तो ऐसे अवढरदानी थे जो कि अपने ही आशीर्वाद से भस्मासुर पैदा कर स्वयं अपने और माँ पारवती के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिए। और विष्णु अपना मोहिनी रूप धारण न किये होते जो पारवती जी से भी ज्यादा सुन्दर रूप था और ब्रह्मा समय कि गति शून्य न किये होते तो शिव का अस्तित्व भी अपना वरदान पूर्ण करने में समाप्त हो गया होता। यहीं तक सीमित नहीं है वरन सृस्टि का निर्माण करने वाले ब्रह्मा जी उनसे भी बढ़कर हैं जो ऐसे वरदान दे देते थे दैत्यों को कि वे उसका उपयोग कर सृति के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देते थे। अतः कहा जाता है कि जहां शिव(केदारेश्वर) और ब्रह्मा उपस्थित हों वह दैत्यवंश का भी आश्रय स्थल अपने आप हो जाता है और फिर श्रीराम/श्रीकृष्ण (विष्णु) ही मानव और दानव में शक्ति संतुलन स्थापित कर श्रीस्ती की रक्षा करते हैं। ----NOTABLE: तीनों शक्तियों:तिरंगा(त्रिदेव) का एक शक्ति में मिल जाना भी इस संसार में से आकर्षण ही ख़त्म कर देगा। अतः तिरंगा(त्रिदेव) का जनक भगवा(सूर्य कि प्रथम किरण कि अरुणिमा) तो पिता है ही पर सबको एक में मिला एकेश्वरवाद होते हुए भी त्रिदेव(तिरंगा) सांसारिक रूप से ज्यादा उपयुक्त और प्रभावकारी दर्शन है परमपिता परमगुरु परमेश्वर का।

Spokes of Ashok Chakra according Hindu religion: 1. Love 2. Courage 3. Patience 4. Peacefulness 5. Magnanimity 6. Goodness 7. Faithfulness 8. Gentleness 9. Selflessness 10. Self-Control 11. Self Sacrifice 12. Truthfulness 13. Righteousness 14. Justice 15. Mercy 16. Gracefulness 17. Humility 18. Empathy 19. Sympathy 20.Spiritual Knowledge 21. Moral Values 22. Spiritual Wisdom 23. The Fear of God 24. The Faith or Trust or belief| Although 1st position is of Rishi Vishwamitra (Kaushit: Vishvarath: Shri Ram & Lakshaman's Weapon Guru) and also first factor is love; and 24rth is Yagnavalk and 24rth Factor is Faith and trust but also rest of the 22 Rishis and 22 factors are important. >>>In case Ashok Chakra broken then Vishvamitra(Kaushit:Vishwarath) not affected but comes in the range of Saptarshi because he is one of the Saptarshi from initial history of the Rishis camein existence at PRAYAGRAJ by Prakrishthaa Yagya called PRAK-YAGYA(Prayag). Thus at least existence of Seven Rishis remains in the Universe and only Brahma himself can take him back to Brahm-Lok.


Tuesday, March 25, 2014

Bhagvaan Bhole Naath Shiva Shankar ki Rameshvaram ki Pari Bhaasa : "Ramah yashya Ishwarah Sah" (Ram jisake Ishwar hon)= Bhagvaan Shri Raam ki Rameshwaram ki Paribhashaa: "Ramasya Ishwarah yah Sah" (Ram ka jo Ishwar hon)=RAMESHWARAM>RAM/KRISHNA(VISHNU) KE ISHWAR SHIV (KEDARESHWAR) AUR SHIV(Kedareshwar) KE ISHWAR RAM/ KRISHNA(Vishnu) yah dono Rameshwaram ka abhistha Abhipray hai. Atah jis Satyug ke Shuryavanshiy Gwaale(vartmaan me Sanatan Brahman Parivaar aur Brahman Karm Karane Vaala) ke 4, February, 2012 ko apane Param Shradhdhey Guru aur Mahamahim Guru aur anya Gurjan ko likhe patra me Mahaadev Baba Bhhole Shivshankar(Vishvanaath:Kedareshwar) ki Nagari Kashi me sthit Kashi Hindu Vishvavidyaalay [Pandit Mahamana Madanmohan(Shrikrishna) Malaviy ke Gurukul] ke prangan RAMESHVARAM ka Abhipraay "RAM Hee ISVAR HAIN" bataayaa thaa aur vartmaan me Uttarakhand me sthit Kedar Ghati ke Shivansh Rajaa Kedar(Parantu kalantar me Shiv Shakti kaa durupayog kartaa samaaj virodhi karyon me ke galat kaaryon kaa anta karanaa avashyak ho jaane par) kaa vadh kar Kedarnaath(Dhan) aur Pashupatinaath (Sir) banaa dene ki baat sweekar karane vaalaa nishchit roop se swayan Shiva(Kedareshwar) ki chhaayaa rahaa hogaa| Aisaa is liye ki Shivansh yaa shiva bhakt kaa vadh karane vaalaa usase badaa Shiva yaa Shiva Bhakt hogaa jaisaa ki bhagvaan Shri Raam ne apane ko Raavan se badaa Shiva Bhakt Shidhdh karate huye Raavan se hee Shiva kaa baaloo kaa shiv ling banaa Rameshvaram(Shiva) ki sthaapanaa kar Ravan kaa badh kiyaa thaa| Aur Brahma Hatyaa ki maaphee ke liye bhee usee Shiva Ling kee pooja ki Lakshaman aur maan Seetaa samat aur isake baad Pushpak vimaan se Pragaay me punah Bharadwaaj Rishi kaa ashirvaad lete huye Ayodhyaa laute. Vaise "Sunu Siy Saty Asheesh Hamaaree Poojanhi Man Kamanaa Tumhaari" kahane vaali Maan Gauraa Parvati Bhee nahee samajha paayee thee hi Shiva hee Ram(Vishnu) hain aur Raam(Vishnu) hee Shiva hai| Atah Shiva jee hee nahee ek aam manav bhee Rameshwaram kaa arth Raam hee Ishwar hai hee samajhataa hai aur samajhane me koi gaat bhee nahee hai| Par haan Shri Ram Sangharak nahee parantu Shiva kaa sanghaar karnaa bhee sabhee ke liye kalyaan kaaree hai kyonki adharm me jeenaa bhee marane ke samaan hai chahe vah Adharm kartaa ho yaa bhukt bhogee aur is prakar dodno ko bure karyon aur bure dinon se mukti milatee hai |-------- SHIVA swayam VISHNU kaa dhyaam karate hain aur VISHNU swayam SHIVA kaa dhyaan karate hain yahee hai Anyonyaashrita| YAh bhee Brahma ke Ekeshwarvaad kaa ek swaroop hai|>>>>SHAIV aur VAISHNAV ab bhee n milen hon to meraa Kashyap Gotriy honaa Sarthak nahee|


जिसका कुलगुरु उसी विज्ञान केंद्र का विभागाध्यक्ष, कुल(गोत्र: कश्यप) का बड़ा भाई गुरु और गुरुकुल (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) का बड़ा भाई सहयोगी गुरु तो उसके लिए वह विज्ञान केंद्र घर हुआ कि नहीं इसलिए वह इस विज्ञान केंद्र को अपना घर कभी कहा तो उसमे गलत ही क्या था? यह वह विज्ञान केंद्र जिस पर प्रथम आगमन पर कोई कुलपति यह बोले कि मै इस केंद्र पर आकर धन्य हुआ। ----------फिर भी मई चुनौती देता हूँ कि दुनिया का कोई कानून मुझ पर परिवारवाद का आरोप सिध्ध कर के दिखाए। और अगर कोई कानून ऐसा दिखा दिया तो वही कानून ब्रह्मा का लिखा कानून होगा या एकेश्वरवाद का क़ानून होगा।----------------वशुधैवकुटुम्बकम।

और अगर कोई कानून ऐसा दिखा दिया तो वही कानून ब्रह्मा का लिखा कानून होगा या एकेश्वरवाद का क़ानून होगा।--------------वशुधैवकुटुम्बकम।

Monday, March 24, 2014

रामेश्वरम में केदारेश्वरम और केदारेश्वरम में रामेश्वरम यह कितना सुखद संजोग स्थापित हुआ है भगवान् राम और भगवान् शिव का इस प्रयागराज में ? यह भी न समझें प्रयागराजवाशी तो क्या समझेंगे? ----------""राम नवमी-विजय दशमी-श्रीकृष्ण जन्मास्टमी"" तिथि शायद ही किशी व्यक्ति को सनातन हिन्दू धर्म में एक मानव के रूप में जीवन जीने कि प्रेरणा न देती हो किशी भी कस्टप्रद से कस्टप्रद से मुस्किल परिस्थिति में भी।

रामेश्वरम में केदारेश्वरम और केदारेश्वरम में रामेश्वरम यह कितना सुखद संजोग स्थापित हुआ है भगवान् राम और भगवान् शिव का इस प्रयागराज में ? यह भी न समझें प्रयागराजवाशी तो क्या समझेंगे? ----------""राम नवमी-विजय दशमी-श्रीकृष्ण जन्मास्टमी"" तिथि  शायद ही किशी व्यक्ति को सनातन हिन्दू धर्म में एक मानव के रूप में जीवन जीने कि प्रेरणा न देती हो किशी भी कस्टप्रद से कस्टप्रद  से मुस्किल परिस्थिति में भी।  शिव द्रोही मम भक्त कहावा, सो नर मोहि सपनेहु नहीं पाव(जो शिव का शत्रु हो वह मुझ नारायण विष्णु (श्रीराम) का स्वप्न में भी दर्शन नहीं पा सकता है)। -----------भगवान् श्री राम का ही कथन; और धन्य सो विप्र, निज धर्म न तरई| धन्य सो भूप, नीति जो करइ|| (विप्र=विपुल प्रदाता==जो समाज से थोड़ा लेकर उससे ज्यादा प्रदान करे=द्विज = द्वि+ जन= वह जन:व्यक्ति जो दूसरा देवता हो स्वर्ग के अलावा = ब्राह्मण: वह धन्य है जो अपने धर्म से कभी भी हटे)। धन्य सो भूप नीति जो करइ (राजा:शासक वह धन्य है जो नीतियों के अनुकूल:अनुसार शासन करे)॥ -------भगवान् शिव का कथन >>>>>श्री राम चरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसी दास।

शिव द्रोही मम भक्त कहावा, सो नर मोहि सपनेहु नहीं पाव(जो शिव का शत्रु हो वह मुझ नारायण विष्णु (श्रीराम) का स्वप्न में भी दर्शन नहीं पा सकता है)। -----------भगवान् श्री राम का कथन; और धन्य सो विप्र, निज धर्म न तरई| धन्य सो भूप, नीति जो करइ|| (विप्र=विपुल प्रदाता==जो समाज से थोड़ा लेकर उससे ज्यादा प्रदान करे=द्विज = द्वि+ जन= वह जन:व्यक्ति जो दूसरा देवता हो स्वर्ग के अलावा = ब्राह्मण: वह धन्य है जो अपने धर्म से कभी भी हटे)। धन्य सो भूप नीति जो करइ (राजा:शासक वह धन्य है जो नीतियों के अनुकूल:अनुसार शासन करे)॥ -------भगवान् शिव का कथन >>>>>श्री राम चरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसी दास।

शिव द्रोही मम भक्त कहावा, सो नर मोहि सपनेहु नहीं पाव(जो शिव का शत्रु हो वह मुझ नारायण विष्णु (श्रीराम) का स्वप्न में भी दर्शन नहीं पा सकता है)। -----------भगवान् श्री राम का कथन; और धन्य सो विप्र, निज धर्म न तरई| धन्य सो भूप, नीति जो करइ|| (विप्र=विपुल प्रदाता==जो समाज से थोड़ा लेकर उससे ज्यादा प्रदान करे=द्विज = द्वि+ जन= वह जन:व्यक्ति जो दूसरा देवता हो स्वर्ग के अलावा = ब्राह्मण: वह धन्य है जो अपने धर्म से कभी भी हटे)। धन्य सो भूप नीति जो करइ (राजा:शासक वह धन्य है जो नीतियों के अनुकूल:अनुसार शासन करे)॥ -------भगवान् शिव का कथन >>>>>श्री राम चरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसी दास।

केदारेश्वर मतलब पूर्ण शिव जिसमे ईस्वर सब्द पूर्व में ही लगा है पर केदारनाथ मतलब पूर्ण शिव हो यह जरूरी नहीं|अतः केदारनाथ एक पीठ(अंश) या स्थान विशेष के रूप में समझा जा सकता है, यह शिवांश ही होगा|केदारेश्वर (शिव) ही प्रकृति के पांच भूतों (जल, थल/पृथ्वी, आकाश/स्पेस, वायु/पवन, और अग्नि) के स्वामी हैं।


Prayaagraaj to sabhee saton saptarshiyon kaa baraabar kaa hak hai aur usame meraa Aryamgarh: Azamgarh< Bastee < Kashmir < Prayaagraj < Brahma Lok kaa Marg to ek Bhaugolik Akshaansh aur Deshantar kaa Bhram hai| --------Prashn to ek vyavaharik jeevan kaa hai matlab "Satyam Shivam Shundaram" kaa anyatathaa Satyamev Jayate yahee ki Prayaagraaj aur Prayaagraj:Allahabad University 2000-2003 ke samay me apanaa astitv kho diyaa thaa jise apanaa gaurav jin logon ne jisake netritv me dilayaa use hee Prayaagraaj ki jantaa bhulaa dee par----------Mujhe Bhulaa ke dikhaaye ye Prayaagraaj-------Agar Prayaash saphal huaa to Sabako Brahm Lok punah Pahunchaa doongaa|-------Jai Hind (Euresia=Europe+Asia: Jamboo Dweep:Kam se kam Iraan se Singapur aur Kashmir se Kanyakumari), Jai Bharat(Bharatkhand:Akhand Bharat), Jai Shri Ram/Krishn|

Prayaagraaj to sabhee saton saptarshiyon kaa baraabar kaa hak hai aur usame meraa Aryamgarh: Azamgarh<Basti<Kashmir<Prayaagraj<Brahma Lok kaa Marg to ek Bhaugolik Akshaansh aur Deshantar kaa Bhram hai| --------Prashn to ek vyavaharik jeevan kaa hai matlab "Satyam Shivam Shundaram" kaa anyatathaa Satyamev Jayate yahee ki Prayaagraaj aur Prayaagraj:Allahabad University 2000-2003 ke samay me apanaa astitv kho diyaa thaa jise apanaa gaurav jin logon ne jisake netritv me dilayaa use hee Prayaagraaj ki jantaa bhulaa dee par----------Mujhe Bhulaa ke dikhaaye ye Prayaagraaj-------Agar Prayaash saphal huaa to Sabako Brahm Lok punah Pahunchaa doongaa|-------Jai Hind (Euresia=Europe+Asia: Jamboo Dweep:Kam se kam Iraan se Singapur aur Kashmir se Kanyakumari), Jai Bharat(Bharatkhand:Akhand Bharat), Jai Shri Ram/Krishn|

Prayaagraj aur Prayaagraj: Allahabad me kishi vishesh prayojan se jab mai aayaa to us prayojan kaa vishesh virodh kar rahe logon dwaaraa mujh par vishsv kaa ek shoodratam vyakti kaa kathit aarop lagaa bhramak prachar kiyaa (yadi uname sachchhayee hotee to usame se kuchh gun ab bhee mujhame hone chaiye) 2001 se 2003 me to usee ke karan mai yahaan par mai Research me Enrollment kaa Bharaa Bharaayaa Form Phaad Diyaa thaa par mujhe bataayaa gayaa ki jis Guru ne aap ko Research ke liye Shishya banane kaa avsar denaa chahaa hai vah aap ke kul kaa hee nahee apitu aap ke gotra kaa bhee hai aur sahayogee Guru bhee aap ke Girikul kaa badaa bhaai hai aur swayam jise niyantran kaa kaaryabhaar diyaa gyaa hai ve mere Kulguru hain| Atah mai Prayaagraj aur Prayaagraj:Allahabad University kaa ehshaan mand nahee varan mere Kul(Gotra:Kashyap), Gurukul(Kaashi Hindu Vishvavidyalan) ke jeshth Bhrataa aur Kulguru Srivastava Jee kaa sahyogee aur ehshaan mand hoon aur ve agar Dashrath aur Guru Vashishth ki tarah yadi kahen to mai apane athak prayaash se payaa koi Rajashinghaasan kyaa yah bhautik Shareer tyaag saktaa hoon yah moorkhataa vaalaa jeshth aur kanishth ke pad ke bhram ki kyaa avkaat?


Atyalp samay me videsh se Criminal Law me PHD kiye Guru ka hi Nyay abhi nanga hua hai aur Guru Garima swayam giree par jab nyaag paribhashit aur akatyaniyamon par akatya aur sarvatra sanchalit ho to aise me nyaay me deree kyaa anyaah ko kuchh samay ke liye hee sabhee badhaavaa nahee detaa hai par lagta hai Prayag: ALLAHABAD UNIVERSITY ke Law Guru usi disha me ek kadam aur badhane vaale hai magar gyat rahe ki ab mai bhi Guru Pad par hoon vahi. Pahale vaale to tathakathit dalit aur Mahamahim ke parivaar ki Chhayaa liye par yahaan har tarah se barabari hai. Atah unase vinamra nivedan hai prathamtah ki ve aisaa kuchh n karen dabaav me to uchit hogaa. Anyathaa doosaree baar Prayaagraj me apamaan Prayaagraj aur Prayaag:Allahabad University ke liye bhee bhaaree padegaa jahaan se ki mujhe Sarvochch Samman aur Guru kaa pad bhee mil chukaa hai ek Hyderabadi Professor aur Guru dwaaraa Hyderabadiyon dwaaraa kiye gaye paap ke Prayashchit ko Kuchh kam karane ke liye|


Monday, March 17, 2014

Milakar ladane chale the Soory se ve Agyan| Sare Sipahi Mom ke se Ghul ke aa gaye||----Agar ab Bhee sanatan hindu sanskrit se janme Shoorya Vansheey/Ikshaaku Vanshiy/Raghu Vanshi////Islam aur Chandra Vansheey/Yadu Vansheey/Vrishni Vansheey///Isaiyat gale nahee mile hon is Holi me to meraa Vashishth/Vedavyaash ke aangan me janm lenaa saphal nahee huaa| Haan yah jaroor hai ki Gaay, Gangaa, Gaayatri aur Gauri ek lamb hai jo Islaam aur Isaiyat ko hamase thodi dooree par banaaye rakhataa hai aur yah bhee ki mai Kashyap Gotriy jaroor hoon aur Gautam Gotriyon kaa naatee hoon par Vashishth gotriy bhee mere pitaa ke MAMA/NANA hee the jinakaa anna bhee bachpan me mai kuchh varsh tak khayaa hoon keval janm hee nahee liyaa hoon|----Ab bhee kuchh samajh nahee aayaa ho to Shrimad Bhagavat Geetaa(Vyash dwaara Parambrahm bane huye ShriKrishn kaa arjun ko upadesh kaa sangrah) aur Shri Ramcharit Manas/RamayanTulasi das aur Balmiki Rachit Raam kaa jeevan Charitra) ke saath-2 Vivekananad, Guru Ravindranath Taigore ko bhee padh lijiyegaa aur Netaji Shubhash ke JAI HIND kaa vistaar kahaan tak samajhate the isase arichit ho jaaiyegaa|-------Jai Hind(Jamboo Dweep=Euresia=Europe+Asia= but if not so much then Iraan to Singapur and Kashmir se Kanyakumari), Jai Bharat(Bharatkhand=Ahand Bharat), Jai Shri Ram/Krishn|


30-9-2010, 5.11 AM i.e. the day of decision in favorof Ram Mandir: VISHNKANT:SHRIRAM AUR 28-8 -2013, 8.12 PM i.e. the rarerest of rare Shri Krishna Janmashtami having all Lagn of the real Lord Krishna Janmastami: KRISHNAKANT:SHRIKRISHNA DONO MUJH 11-11-1975,9.15 AM i.e. the Emergency period in India: KE PUTRARATN KE ROOP ME PRAYAGRAJ ME AA CHUKE HAIN> HAPPY AND COLORFUL HOLI.

30-9-2010, 5.11 AM i.e. the day of decision in favorof Ram Mandir: VISHNKANT:SHRIRAM AUR 28-8 -2013, 8.12 PM i.e. the rarerest of rare Shri Krishna Janmashtami having all Lagn of the real Lord Krishna Janmastami:  KRISHNAKANT:SHRIKRISHNA DONO MUJH 11-11-1975,9.15 AM i.e. the Emergency period in India: KE PUTRARATN KE ROOP ME PRAYAGRAJ ME AA CHUKE HAIN> HAPPY AND COLORFUL HOLI.

Shoorya aur Chandra Vansh ke Shrot Kashyap swayam apane pita Marich ki aagyaanusar Sati (PARVATI) ke alavaa Brahma ke Putra Daksh ki sabhi putriyon (DATI, ADITI SAHIT SAB) se shaadi kiyaa thaa yah koi bhog vilasita nahi pita Marich ka Lord Brahma ko diye vachan ka palan thaa. Aur jis tarah Hanuman ne Guru Shoory ki putri Suwarchalaa se shaadi kar Gurudakshina chukayaa tha{IN DONON KA PUTRA MAKARDHWAJ JO AHIRAVAN (INTER-NATIONAL MAFIA) KE PATALPURI:TATHA KATHITSUPER POWER NOW KA RAJA BANAYA Hanuman ne US DHARM VIRODHI MAYAJAL ko todkar aur AHIRAVN KO MAR KAR jise todana Ram aur Lakshman ke liye amaryaadit thaa: Jalate huye Saton deepakon ko munh se phook kar bujhaanaa thaa jo Hindu Dharm kee maryada ke virudhdh hai: hamare yahaan phhonk kar deepak bujhanaa dharm virudhdh manaa jaataa hai}. Atah praan jaay par Vachan jai tab se hai

Shoorya  aur Chandra Vansh ke Shrot Kashyap swayam apane pita Marich ki
aagyaanusar Sati (PARVATI) ke alavaa Brahma ke Putra Daksh ki sabhi putriyon (DATI, ADITI SAHIT SAB) se shaadi kiyaa thaa yah koi bhog vilasita nahi pita Marich ka Lord Brahma ko diye vachan ka palan thaa. Aur jis tarah Hanuman ne Guru Shoory ki putri Suwarchalaa se shaadi kar Gurudakshina chukayaa tha{IN DONON KA PUTRA MAKARDHWAJ JO AHIRAVAN (INTER-NATIONAL MAFIA) KE PATALPURI:TATHA KATHITSUPER POWER NOW KA RAJA BANAYA Hanuman ne US DHARM VIRODHI MAYAJAL ko todkar aur AHIRAVN KO MAR KAR jise todana Ram aur Lakshman ke liye amaryaadit thaa: Jalate huye Saton deepakon ko munh se phook kar bujhaanaa thaa jo Hindu Dharm kee maryada ke virudhdh hai: hamare yahaan phhonk kar deepak bujhanaa dharm virudhdh manaa jaataa hai }.  Atah praan jaay par  Vachan jai tab se hai
Hanumaan jee pavan putra the aur pavan veg se chalkar hee saaton deepak ek saath bujhaa diyaa aur Makardhwaj apane pitaa Hanumaan(Ambavaadekar) ko pahachaan liyaa maataa kee baaton ke anusaar ki tumhaare pitaa Pavan putra hain aur ve Pavan veg se chalate hain aur vahee in sabhee saton deepakon ko ek saath bujhaa sakte hain apane chalane ke jhoonkon ke bal par n ki sheedhe taur par ise munh se bujhakar jo ki Sanata Hindu Dharm me manaa hai aur isee liye Bhagvaan Shri RAM aur Lakshaman  Ahiravan ke changul se mukti nahee paa rahe ise munh se n bujhaane ke karan.

प्रदीप (सूर्य कि ऊर्जा और प्रकाश का श्रोत/सूर्य का स्वामी/सात सूर्य के घोड़ों वाले रथ पर सवार भगवान् राम जानकी/सत्यनारायण/सूर्यकांत): only self source of Light /Energy mean Lord/Father of Lord Sun i.e.सूर्यकांत, सूर्यनाथ, रवींद्रनाथ। पुष्पा (वह जो पुष्प पर आशीन हो यह सवयम माँ गायत्री(सविता), लक्ष्मी और सरस्वती हैं): All the Goddes who seated on Flowers। दोनों मेरे माता और पिता हैं। I PRAY THEM FOR THEIR BLESSING.


KALAM GURUSHRESHTHA, Vihari Bagvan Shri Krishn ka Rashi Nam tha aur ir prakar 3 Krishn (ATAL VIHARI-MURALI MANOHAR-LAL KRISHN) TRIMURTI B J P ke mool stambha rahe aur yahi nahi Maan Durgaa, Indira ki vadhu Maan Sonia ke sanrakshan me aaj bhi Krishn (MANMOHAN) ka hee Shasan chal raha hai. Mai Rashi Nam Giridhari:KRISHN AUR HANUMAN abhi tak inake liye Hanuman aur Krishn ka kary kiya. Aage ki Yatra Ramapur aur Ram ko charitarth karane ki hai aur Guru Vashishth ko charitarth karane ki hai kyoki Vashishtg Gotriyon(Pita ke Nanihal me ke Ghar mai (aur meri Bahan) janm liyaa thaa jeevan apane Gautam Gotry Nanihal me bhale gujaaraa tha ek Kashyap Gotriy parivar se hokar. Like ·


I pay my sincer regards to ex- Minister of Defence, George F, one of the best friend of my Grand Father in Trade Union at Mumbai whose person were caring me at IISc Bangalore.


Mai vishesh aabhar vyakt karta hoon us Kshatriy: JAMADAGNIPUR :JAUNPUR aur Muslim:ARYAMGARH :AZAMGARH Jamindar ke prati jinhone kramsah mere Nanihal: KAILAS-GORAKHPUR ke Gautam Wyashi Mishra ko 300 Beegha vaala Bishunpur-223103 aur Gharwalo:KASHMIR-BASTI ke Kashyap Gotriy Triphala Pandey Baba Sarangadhar(Shiva) ko 5 Gaanv jisame mera Gaanv Ramapur-223225 ko 500 Beegha vaale ka Bhoodan diya.

QAZIM Guru ki Ikshaa poorti me apane Gurujan, Parivar aur Mitron ke sahyog ka PRAYAGRAJ ne jo avsar diya usake prati mai Kausambi aur Prayagraj ke logon ka aabhar vyakt karta hoon.


Dawn bhai aur Bablu bhai ko mera apratyaksha sahyog ke liye Dhanyavaad aur Shubha Holi.


Aaj holi ki Poorva Shandhya par dono Film Super Star Khan Bhiyon(SATYMEV JAYATE AUR PREM: DABANG) ko meri Shubhakamna jinhone e-mail aur message dwara mujhe Bharatiy Sanskriti ko Aage le jaane ke liye protsahit kiyaa IISc Bangalore me.


SHIMAHADRI AUR ALAKHA NIRANJAN GURU JI AAP SANDEH ME HI MUJHE SECOND (59% )BANAYE PAR HAKIKAT ME JO APRAADH V APARADHI ISE BADHATE THE UNAKO AAP DAND KYO NAHI DE SAKE? AAP KA GOPANIY ANAITIK DAND SARVAJANIK HUA MERE PERFORMANCE AUR EXAMINER KEE SABAASI SE. KYAA TERAH ME AATHAVAAN HI STHAAN HI KE LIYE HI SABAASI DIYE THE Examiner, Prof. A K Srivastava, Senior Scientist the then Nuclear Science Centre Delhi ne? Par Guru ji Guru ka Dand bhi Ashirvad hota hai yah mujhe yahan laaya athah aap Kashi kyo Chhod diye VRS le aur Hind ke poorvi chhor Singapur chale gaye?


Thursday, March 13, 2014

Mera kary aaj poorn ho rahaa is kathan se ki Bhagva:Sun's 1st Ray i.e. the Param Brahm is the father of TIRANGA(TRIDEV) aur mere pratham guru ki Gurudakshia Poori hui TIRANGE KE neeche sampurn Jagat ko jhukakar. Ve kahate the ki Vijayi Vishv TIRANGA PYARA ko satya karna. Ve bhi Shiv(Parashnath) aur Kali (KAILASHI) ke Dwitiya ke Chaand hi the jo Chaand jaise acharan ke bhi the par nam tha Bhanu Pratap Mishra jo kushagra aur medhavi the. Ve Prayag ke 1st Vishva Hindu Parishad Sammelan ke Koshadhyaksh aur Emergence me Naini Jail me RSS ki 1st Shakha lagvaane vale mere chhote nana(at least 1 alive ex-chief minister, governer, speaker and Cabinet minister know him till date but Allahabad RSS-BJP-VHP-BD person may forget him) ke chhote putra aur mere Panchave mama the. GURUR BRAHMA GURUR VISHNU GURUR DEVO MAHESHWARAH; GURUR SAKSHAT PAR BRAHM TASHMAY SHRI GURUVAI NAMAH. AUR YAHI MERE NANA MUJH 5TH(1985) KE CHHATRA KO Dharmik, Vivekanand, Taigor aur naitik shiksh ki oja bhari pushtak dete padhane ke liye ALLAHAPUR Allahabad RRS ke Vidyalay ki Pushtkaalay se lekar. Yahi Parashnaath Nana mere Nana matlab apane bade bhai se jeevan ke ant tak baad vivaad se kyaa baat karane se darate rahate the ki koi gatal n ho jaay kishi bartaa me aur ve mere Nana Pandit Ramaanaath (Vishnu) Mishra apane jeevan me jahaan bhee shikshaa kashaa me pratham rahe aur yahaan tak ki Prayaag ke Gurukul me ve sabhee gurukulon me sabase jayadaa ank paaye the aur isa prakar praayg unakee shikshaa bhoomi thee aur ve Sanskrit Vyakarn aur Dharm Shaastra ke gyataa poorn rrop se the par karm kand par vyavhaari seemaa tak hee vishvaash karate the| Aur vahi sab is sthaan par mujhe laya. Jai Hind(Jambodweep=Euresia=Europe+Asia)-Jai Bharat(Akhand Bharat=Bharatkhand)-Jai Shri Ram/Krishn.


I first time disclose the secrete that why even today Indian Culture (originated Pragayraj(Kashi) with Ayodhya and Mathura-Vrindavan and Haridwaar) is Greatest but removed from blog on second day and also Facebook admin him self deleted from there. Message in brief is the cultural-family-moral-tradional values makes us slow but makes us creative, stable and humerous.


MESSAGE: SHIKSHAN AUR RESEARCH SANSTHAON ME TV6 AUR ASLIL SAHITYA V VEDIO NKAARA GENERATION KO AUR USE NIYANTRIT KARNE ME ATAKVAD KO BADHAVA MILTA HAH. YAH SANSHKRITI PAR VAAR VISHESH AUR BHARTIY YUVA KO PASCHIM KA DASH BANANA HAI. Agar Yuva ise n samjhe to Bharat desh hi rahega aur Bharat maan Shad isaki sanskriti sang vilupt ho jayega aur Bharat desh keval Kal-Purjon ka desh hoga anyadesh jaisa aur Pashchim ki sah par Gautam ke Nyay Darshan ki Galat vyakhyaa isi liye karaayi ja rahi ki tum Bhikhari mujhase jyaada samman kyu le rahe ho? Aur agyaan unka sath de rahe par Bharat Maan nahi to yah Sansaar Astitv me rah payegaa kyaa? MAULIK AUR SAMAJIK BARABARI KA MATLAB YAH NAHI KI SAB Gotra GAUTAM KE BARABAR HO GAYE Jabaki shaadiyan ek-doosare gotra me sadaa se hain. Notable: ISLAM//SHRI RAM AUR CHRISCHIANITY//SHRI KRISHN THUS SANATAN GOTRIY HINDU DO NOT WORRY BOTH WILL CARE YOU. ISLAM AND CHRISTIANITY WILL ONLY JUDGE YOU ON THE BASE OF SANATAN HINDU DHARM. THANK YOU ALL AND HAPPY HOLI.


Wednesday, March 12, 2014

GREATEST GURU IN SAPTARSHI IS VASHISHTH; GREATEST SAPATARSHI IS GAUTAM, GREATEST GURU IN TRINITY(FANDAMENTAL DEVAS) IS VISHNU(SHRIDHAR); GREATEST GURU IN DEVAAS IS BRAHSPATI, GREATEST GURU IN DAITYAS IS SHUKRACHARYA, GREATEST ADMINISTRATOR KASHYAPA, GREATEST RELIGION PRESERVER DURVASHA/ATRI, GREATEST SACRIFICER BHRIGU/JAMADAGNI, GREATEST WEAPON GURU VISHVAMITRA(KAUSIK:VISHVRATH), GREATEST SCIEN...TIST BHARADWAAJ(GURU OF GARGAS)/ANGARISHA| In 1995 after becoming part of the Faizabad Dristrict as becoming the Ambavaadekar(HANUMAAN) Nagar the second Param Brahm Hanumaan(Ambavaadekar) gain the position of his Lard/Father "RAMJI" and thus losses the IDENTITY of Dalit but now you can only say him a Tathaakathit Dalit if not want to accept truth.


Jin logon ne ek VC par itana dabav banaya ki usaka Heart Attack ho gaya aur jisake pichhe mera selection rukvana tha par aise hi log ko mai hatyara aur shoodra manta hoo jo VC banvane ki kitat uski jindagi se lete hai. Mujhe disturbe karna IISc me aur yahan aane se rokane ke liye Indra jaal bunna apani karni chhupane ke liye. Maharastra ki mitti thi ki usne VC ko sahi kiya.


NYAY DARSHAN DENE VALE GAUTAM RISHI Mahadev Shiv Shankar ke shaniddh me Kailash Parvat par hi rahte the aur vahi Kashyap Rishi jo Shiv ji ke Shadhu Bhai bhi bane the ve Kashmir ko apane nivas yogya banaya. Gautam Rishi ke Nyaay Darsh ka utana hi galat arth lagaa durupyog ho jisse Gautam Gotriy sahit any Gotriy aur swayam Shiv ka astitva bana rahe. Aur vidit ho jab Shiv astitva par sankat aata hai to Brahma aur Vishnu ran kshera me aa jaate hai aur Srishti par sankat aata hi hai.


Aditya was son of Kashyap Rishi and his second wife Aditi. Aditya have two son Soorya and Chandra; and with second wife SAAVARNAA he have son RISHI SAAVARN. Because the Actual meaning of Aditya of the nature is himself Soorya therefore Chandra Vansh is also a part of SHooryavansh as the name depicted and the Rishi Sarvan as Brahmarshi also a part of the Additya thus the nature of the SAAVARN Gotriya Brahmin is similar to Shooryavansheey. And thus I conclude SAAVARN Gotra not come under Saptarshi but definitely he is abranch of KAshyapa Gotriya and comes under Kashyap Gotriy. In addition Bharadwaaj(Son of Angaarisha and Father of Dronacharay) come under institution of Balmiki(Guru of LAV and KUS means son of Lord Ram and Sita) and Balmiki is son of Varun who was son of Kashyapa this prove that Bharadwaaj is under Shishya Paramparaa of Kashyap Gotra. Thus as being member of Sanatan Kashyap Gotra I can leave any thing for SAAVARN GOTRA AND BHARADWAAJ GOTRA by proper request but not by force because life of Father, Grand Father and Gurus ended with shaping his Son, Grand Son and Shishya(Pupil).-------I want to end the matter that the SAVAARN and BHARADWAAJ was not able to handle the situation as observation predicted (for the major target now achieved by world humanity from Cultural centre of the World i.e. Prayag) therefore I came Prayag and it it seems that they are able enough to handle all things if target is achieve then getting a proper information by my Gurus I can leave Prayag.-----------Once again remember that Jai Hind=Jamboodweep=Euresia=Europe+Asia=if not then at leat=Iraan to Singapur and Kashmir to Kanyakumari; Jai Bharat=Bharatkhand=Akhand Bharat; Jai Shri Ram/Krishn.-------Message of Prayag(Kashi)


Tuesday, March 11, 2014

यहाँ तो सत्यम शिवम् सुंदरम भी कटु है पर आप तो झूंठ बोले वह भी कड़वा ही था कि मै सोमरस का सेवन करता हूँ इस लिए आँखे लाल है, और चरित्र हीन है और इसके कक्ष में पेशेवर लड़किया जाती हैं, परी का स्वप्न देखता है और घर का दरिद्र है, यह तो पागल खानदान का है और इस प्रकार शूद्रता की कोई निम्न सीमा भी नहीं रखी जितना की ज्ञात था और वह कुछ नहीं सिर्फ परी और परी के राजकुमार की वास्तविक शूद्रता को छिपाने के लिए। आप का उत्तर इतना ही है कि आज भी मई परमब्रह्म के स्थान प्रयाग में हूँ और कल भी यहीं रहूँगा और आप लोग अपना भला मनु(~ कश्यप ऋषि ~ वशुदेव) को गाली देकर करते रहिये मुझे यहाँ से हिला नहीं पाएंगे।-------------अम्बावाडेकर(हनुमान) पुत्र मकरध्वज के पाताललोक का स्वामी बनने के बाद भी कुछ नहीं कर सके आप लोग क्योंकि हनुमान(अम्बावाडेकर) केवल द्वितीय परमब्रह्म की सीमा तक पहुँच हैं। -------- परी और राजकुमार--were in the role of Shikhandi only in the whole play|

 यहाँ तो  सत्यम शिवम् सुंदरम भी कटु  है पर आप तो झूंठ बोले वह भी कड़वा ही था  कि मै सोमरस का सेवन करता हूँ इस लिए आँखे लाल है, और चरित्र हीन है और इसके कक्ष में पेशेवर लड़किया  जाती हैं, परी का स्वप्न देखता है और घर का दरिद्र है, यह तो पागल खानदान का है और इस प्रकार  शूद्रता की कोई निम्न सीमा भी नहीं रखी जितना की  ज्ञात था और वह कुछ नहीं सिर्फ परी और परी के राजकुमार की वास्तविक शूद्रता को छिपाने के लिए। आप का उत्तर इतना ही है कि आज भी मई परमब्रह्म के स्थान प्रयाग  में हूँ और कल भी यहीं रहूँगा और आप लोग अपना भला  मनु(~ कश्यप ऋषि ~ दसरथ ~ वशुदेव)  को गाली देकर करते रहिये मुझे यहाँ से हिला नहीं पाएंगे।-------------अम्बावाडेकर(हनुमान) पुत्र मकरध्वज के पाताललोक का स्वामी बनने के  बाद भी कुछ नहीं कर सके आप लोग क्योंकि हनुमान(अम्बावाडेकर) केवल द्वितीय परमब्रह्म की सीमा तक पहुँच हैं। -------- परी और राजकुमार--were in the role of Shikhandi only in the whole play|

गुरु अपने शिष्य और पुत्र कि गलती जल्दी मानता नहीं पर अशोक के शिष्यों ने ही अशोक चक्र पर आघात जारी रखा २००१ (२००१) से और २००७(2007) में अंतिम आघात हुया और २००८(2008) अशोक चक्र सार्वजनिक रूप से टूट गया और जिस घटना का प्रमाण जीवित हो उसका प्रमाण क्यों मांग रहे हैं। अरे २००१ (2001) से २००५-२००६(2005-2006) तक बहुत मांगे थे। जिन लोगों ने विष्णु के कूर्म अवतार को केवल और केवल काला बता दुनिया में आधे का अधिकार माँगा था उनको मेरा जबाब है कि जिसने १९९३ से लेकर २०१२ के समुद्र मंथन में स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश कि भूमिका निभाई हो और काला न हुआ हो उसी से आप कह रहे थे कि विष्णु का कूर्म अवतार केवल और केवल काला ही होगा और काले लोगों को आधे का अधिकार है। आप का नसलवाद नहीं था? क्या आप सावन के अंधे की भूमिका में नहीं थे? दुनिया सुन्दर चाहिए और कुर्मा अवतारी केवल काले लोग ही ही हों और दुनिया में काले लोगों का आधा अधिकार हो यह कहाँ का न्याय दर्शन है गौतम ऋषि के अनुयायी? ज़रा जितने काले लोग हैं और जिम्मेदार हैं सर्व समाज के प्रति उनसे पूँछिये कि क्या यह सही है जबकि चन्द्रमा स्वयं सूर्य के प्रति वफादार होता है ऐसी स्थिति के बावजूद। चन्द्रमा शीतलता और अंधकार है पर वह भी सूर्य कि अवस्था पर निर्भर है और सृस्टि के संचालन में दोनों भागीदार हैं पर सूर्य कि गरिमा अधिक है चाहे उससे लोग कम प्रेम अवश्य करें तो क्या?


जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं है पशु निरा और मृतक सामान है। -----------रास्त्र कवी मैथली शरण गुप्त। ----------जिसने कुल, समूहकुल, मित्रकुल, गुरुकुल और रस्ट्रकुल को कलंकित किया हो क्या वही वीर कहलाता है? ----------बचपन में ईस्वर वन्दना होती थी प्राथमिक विद्यालयों में----जिसमे यह शब्द आता है कि जिस देश-जाती में जन्म लिया बलिदान उसी पर हो जावें पर मई यह भी बता दूं कि इसमा मतलब यह नहीं होता है कि अगर आप की जाती और देश गलत रस्ते पर जा रहा हो तो भी उसका साथ दें पर बलिदान का मतलब उसे सही रास्ते पर लाने से है चाहे आप की जाती और देश वाले स्वयं आप का अंत क्यों न कर दें| पर अगर सही रास्ते पर है तो उनका साथ देना ही इसका अभिप्राय है और तभी तक आप देश और जाती का साथ दें जब तक जी अन्य किशी जाती और देश का हित उससे प्रभवित न हो।


Monday, March 10, 2014

भारतीय शास्त्रीय रीती-रिवाज से होने वाले विवाह पद्धति में वर पक्ष को विष्णु (वैस्य: वह गृहस्थ जो अपनी पत्नी का भरण पोषण कर सके) बन्ना पड़ता है कम से कम अन्यथा कन्या दान सम्भव ही नहीं। अतः न ब्रह्मा, न शिवा किन्तु विष्णु बने विना आप दांपत्य जीवन पा ही नहीं सकते भारतीय शास्त्रीय रीती-रिवाज से हुए शादी (विवाह) में तो मित्रों आप अपने को जो भी घोषित करें शाशन द्वारा सहायता और अधिकार प्राप्त करने के लिए किन्तु अगर आप और आप के घर वाले भारतीय-शास्त्रीय शादी(विवाह) के तहत अपना परिवार संवर्धन करते हैं तो कम से कम आप एक वैश्य हैं ही अपने को एक क्षत्रिय और ब्राह्मण न तो भी सही। इसी लिए मैंने कहा था कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कि लड़कियों के लिए केवल और केवल तीन घर ही है अन्या के साथ जाने के लिए उस परिवार या वर को भी सामाजिक तौर पर ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैस्य होना पडेगा और न हुआ तो पंडित जी उसे शालिग्राम कि मूर्ती का जल छिड़क कर मंत्रोचार द्वारा कम से कम विष्णु का पद शादी होने तक तो दे ही देते है और यह आप कि गैरत है कि उसे आप अपने निजी स्वार्थ के लिए माने या न माने और उसी स्वार्थ के लिए अपने साथ अपनी इस नवयुवती भार्या के नाम के आगे भी नाम ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य विरोधी किशी गैर उपजाति या धर्म के सरनाम के साथ लगा दें राजपत्रित अभिलेखों में। क्या शादी होने तक ही बराबरी शिद्ध करनी थी इसके बाद सरकार से सर्वाधिक और विशेष सहायता प्राप्त समूह से प्रेम प्रगाढ़ करना और शेर कि खाल निकाल कर फेक देना ही वीरता हुई?


An Promation of One's Puranas Message: हमारे प्राचीन हमारे महादेश का नाम ....."जम्बूदीप" था....?????जम्बू द्वीप (meaning by Eurasia=Europe + Asia) महादेश तो भारतवर्ष एक देश विवेश है। क्या आप जानते हैं कि....... ....... हमारे प्राचीन देश का नाम “भारतवर्ष” कैसे पड़ा....????? साथ ही क्या आप जानते हैं कि....... हमारे प्राचीन हमारे महादेश का नाम ....."जम्बूदीप" था....????? परन्तु..... क्या आप सच में जानते हैं जानते हैं कि..... हमारे महादेश को ""जम्बूदीप"" क्यों कहा जाता है ... और, इसका मतलब क्या होता है .....????? दरअसल..... हमारे लिए यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि ...... भारतवर्ष का नाम भारतवर्ष कैसे पड़ा.........????

हमारे प्राचीन हमारे महादेश का नाम ....."जम्बूदीप" था....?????जम्बू द्वीप महादेश तो भारतवर्ष एक देश विवेश है। क्या आप जानते हैं कि....... ....... हमारे प्राचीन देश का नाम “भारतवर्ष” कैसे पड़ा....????? साथ ही क्या आप जानते हैं कि....... हमारे प्राचीन हमारे महादेश का नाम ....."जम्बूदीप" था....????? परन्तु..... क्या आप सच में जानते हैं जानते हैं कि..... हमारे महादेश को ""जम्बूदीप"" क्यों कहा जाता है ... और, इसका मतलब क्या होता है .....????? दरअसल..... हमारे लिए यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि ...... भारतवर्ष का नाम भारतवर्ष कैसे पड़ा.........????

क्योंकि.... एक सामान्य जनधारणा है कि ........महाभारत एक कुरूवंश में राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के प्रतापी पुत्र ......... भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारतवर्ष" पड़ा...... परन्तु इसका साक्ष्य उपलब्ध नहीं है...!--------यह है जरूर है कि अखंड भारत को आर्यावर्त एक बार पुनः बनाने श्रेय भरत को है और आर्यावर्त के रूप में यह संगठित हुआ पुनः।
---------हमारे पुराण इससे अलग कुछ अलग बात...... पूरे साक्ष्य के साथ प्रस्तुत करता है......। आश्चर्यजनक रूप से......... इस ओर कभी हमारा ध्यान नही गया..........जबकि पुराणों में इतिहास ढूंढ़कर........ अपने इतिहास के साथ और अपने आगत के साथ न्याय करना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक था....। परन्तु , क्या आपने कभी इस बात को सोचा है कि...... जब आज के वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि........ प्राचीन काल में साथ भूभागों में अर्थात .......महाद्वीपों में भूमण्डल को बांटा गया था....।

लेकिन ये सात महाद्वीप किसने और क्यों तथा कब बनाए गये.... इस पर कभी, किसी ने कुछ भी नहीं कहा ....। अथवा .....दूसरे शब्दों में कह सकता हूँ कि...... जान बूझकर .... इस से सम्बंधित अनुसंधान की दिशा मोड़ दी गयी......। परन्तु ... हमारा ""जम्बूदीप नाम "" खुद में ही सारी कहानी कह जाता है ..... जिसका अर्थ होता है ..... समग्र द्वीप .
इसीलिए.... हमारे प्राचीनतम धर्म ग्रंथों तथा... विभिन्न अवतारों में.... सिर्फ "जम्बूद्वीप" का ही उल्लेख है.... क्योंकि.... उस समय सिर्फ एक ही द्वीप था...
साथ ही हमारा वायु पुराण ........ इस से सम्बंधित पूरी बात एवं उसका साक्ष्य हमारे सामने पेश करता है.....। वायु पुराण के अनुसार........ त्रेता युग के प्रारंभ में ....... स्वयम्भुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने........ इस भरत खंड को बसाया था.....।
चूँकि महाराज प्रियव्रत को अपना कोई पुत्र नही था......... इसलिए , उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद ले लिया था....... जिसका लड़का नाभि था.....!
नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम........ ऋषभ था..... और, इसी ऋषभ के पुत्र भरत थे ...... तथा .. इन्ही भरत के नाम पर इस देश का नाम...... "भारतवर्ष" पड़ा....। उस समय के राजा प्रियव्रत ने ....... अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को......... संपूर्ण पृथ्वी के सातों महाद्वीपों के अलग-अलग राजा नियुक्त किया था....। राजा का अर्थ उस समय........ धर्म, और न्यायशील राज्य के संस्थापक से लिया जाता था.......। इस तरह ......राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप का शासक .....अग्नीन्ध्र को बनाया था। इसके बाद ....... राजा भरत ने जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया..... और, वही " भारतवर्ष" कहलाया.........। ध्यान रखें कि..... भारतवर्ष का अर्थ है....... राजा भरत का क्षेत्र...... और इन्ही राजा भरत के पुत्र का नाम ......सुमति था....। ---------------------इस विषय में हमारा वायु पुराण कहता है....—

सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)

मैं अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए..... रोजमर्रा के कामों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहूँगा कि.....|हम अपने घरों में अब भी कोई याज्ञिक कार्य कराते हैं ....... तो, उसमें सबसे पहले पंडित जी.... संकल्प करवाते हैं...। हालाँकि..... हम सभी उस संकल्प मंत्र को बहुत हल्के में लेते हैं... और, उसे पंडित जी की एक धार्मिक अनुष्ठान की एक क्रिया मात्र ...... मानकर छोड़ देते हैं......। परन्तु.... यदि आप संकल्प के उस मंत्र को ध्यान से सुनेंगे तो.....उस संकल्प मंत्र में हमें वायु पुराण की इस साक्षी के समर्थन में बहुत कुछ मिल जाता है......। संकल्प मंत्र में यह स्पष्ट उल्लेख आता है कि........ -जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते….। संकल्प के ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं..... क्योंकि, इनमें जम्बूद्वीप आज के यूरेशिया के लिए प्रयुक्त किया गया है.....। इस जम्बू द्वीप में....... भारत खण्ड अर्थात भरत का क्षेत्र अर्थात..... ‘भारतवर्ष’ स्थित है......जो कि आर्याव्रत कहलाता है....। इस संकल्प के छोटे से मंत्र के द्वारा....... हम अपने गौरवमयी अतीत के गौरवमयी इतिहास का व्याख्यान कर डालते हैं......।
परन्तु ....अब एक बड़ा प्रश्न आता है कि ...... जब सच्चाई ऐसी है तो..... फिर शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र भरत से.... इस देश का नाम क्यों जोड़ा जाता है....?
इस सम्बन्ध में ज्यादा कुछ कहने के स्थान पर सिर्फ इतना ही कहना उचित होगा कि ...... शकुंतला, दुष्यंत के पुत्र भरत से ......इस देश के नाम की उत्पत्ति का प्रकरण जोडऩा ....... शायद नामों के समानता का परिणाम हो सकता है.... अथवा , हम हिन्दुओं में अपने धार्मिक ग्रंथों के प्रति उदासीनता के कारण ऐसा हो गया होगा... । परन्तु..... जब हमारे पास ... वायु पुराण और मन्त्रों के रूप में लाखों साल पुराने साक्ष्य मौजूद है .........और, आज का आधुनिक विज्ञान भी यह मान रहा है कि..... धरती पर मनुष्य का आगमन करोड़ों साल पूर्व हो चुका था, तो हम पांच हजार साल पुरानी किसी कहानी पर क्यों विश्वास करें....????? सिर्फ इतना ही नहीं...... हमारे संकल्प मंत्र में.... पंडित जी हमें सृष्टि सम्वत के विषय में भी बताते हैं कि........ अभी एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरहवां वर्ष चल रहा है......। फिर यह बात तो खुद में ही हास्यास्पद है कि.... एक तरफ तो हम बात ........एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरह पुरानी करते हैं ......... परन्तु, अपना इतिहास पश्चिम के लेखकों की कलम से केवल पांच हजार साल पुराना पढ़ते और मानते हैं....! आप खुद ही सोचें कि....यह आत्मप्रवंचना के अतिरिक्त और क्या है........????? इसीलिए ...... जब इतिहास के लिए हमारे पास एक से एक बढ़कर साक्षी हो और प्रमाण ..... पूर्ण तर्क के साथ उपलब्ध हों ..........तो फिर , उन साक्षियों, प्रमाणों और तर्कों के आधार पर अपना अतीत अपने आप खंगालना हमारी जिम्मेदारी बनती है.........। हमारे देश के बारे में .........वायु पुराण का ये श्लोक उल्लेखित है.....—-हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्।तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:.....।। यहाँ हमारा वायु पुराण साफ साफ कह रहा है कि ......... हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है.....।
इसीलिए हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि......हमने शकुंतला और दुष्यंत पुत्र भरत के साथ अपने देश के नाम की उत्पत्ति को जोड़कर अपने इतिहास को पश्चिमी इतिहासकारों की दृष्टि से पांच हजार साल के अंतराल में समेटने का प्रयास किया है....। ऐसा इसीलिए होता है कि..... आज भी हम गुलामी भरी मानसिकता से आजादी नहीं पा सके हैं ..... और, यदि किसी पश्चिमी इतिहास कार को हम अपने बोलने में या लिखने में उद्घ्रत कर दें तो यह हमारे लिये शान की बात समझी जाती है........... परन्तु, यदि हम अपने विषय में अपने ही किसी लेखक कवि या प्राचीन ग्रंथ का संदर्भ दें..... तो, रूढि़वादिता का प्रमाण माना जाता है । और.....यह सोच सिरे से ही गलत है....। इसे आप ठीक से ऐसे समझें कि.... राजस्थान के इतिहास के लिए सबसे प्रमाणित ग्रंथ कर्नल टाड का इतिहास माना जाता है.....। परन्तु.... आश्चर्य जनक रूप से .......हमने यह नही सोचा कि..... एक विदेशी व्यक्ति इतने पुराने समय में भारत में ......आकर साल, डेढ़ साल रहे और यहां का इतिहास तैयार कर दे, यह कैसे संभव है.....? विशेषत: तब....... जबकि उसके आने के समय यहां यातायात के अधिक साधन नही थे.... और , वह राजस्थानी भाषा से भी परिचित नही था....। फिर उसने ऐसी परिस्थिति में .......सिर्फ इतना काम किया कि ........जो विभिन्न रजवाड़ों के संबंध में इतिहास संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं ....उन सबको संहिताबद्घ कर दिया...। इसके बाद राजकीय संरक्षण में करनल टाड की पुस्तक को प्रमाणिक माना जाने लगा.......और, यह धारणा बलवती हो गयीं कि.... राजस्थान के इतिहास पर कर्नल टाड का एकाधिकार है...।
और.... ऐसी ही धारणाएं हमें अन्य क्षेत्रों में भी परेशान करती हैं....... इसीलिए.... अपने देश के इतिहास के बारे में व्याप्त भ्रांतियों का निवारण करना हमारा ध्येय होना चाहिए....।

क्योंकि..... इतिहास मरे गिरे लोगों का लेखाजोखा नही है...... जैसा कि इसके विषय में माना जाता है........ बल्कि, इतिहास अतीत के गौरवमयी पृष्ठों और हमारे न्यायशील और धर्मशील राजाओं के कृत्यों का वर्णन करता है.....।
इसीलिए हिन्दुओं जागो..... और , अपने गौरवशाली इतिहास को पहचानो.....!
हम गौरवशाली हिन्दू सनातन धर्म का हिस्सा हैं.... और, हमें गर्व होना चाहिए कि .... हम हिन्दू हैं...!
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भगवान् भोलेनाथ महादेव शिव शंकर पांच विभूतियों, एक सेवक (नन्दी) , दो पुत्र(कार्तिएक:मुरुगन, और गणेश), एक पुत्री (अशोक सुंदरी) और एक सर्व जन्म संगिनी पतिव्रता नारी युक्त परिवार वाले हैं। जटाओं में गंगा, गले में नागों का राजा वासुकि, हाथ में त्रिशूल और डमरू (ओंकार जो विश्व का प्रथम शब्द है इसी से निकला) तथा सिर पर द्वितीया का चन्द्रमा (द्वितीय का यह चन्द्रमा काली माँ:"पारवती जी का एक स्वरुप" का सबसे प्रिय पुत्र है जैसे कि शंकर और पारवती के लिए गणेश), इसके साथ-२ तीसरा नेत्र ये पांच विभूतिया है। इन पांच विभूतियों में शिव जी का तीसरा नेत्र उनका हर तरह के कामों से रक्षा करता है जिससे कि शिव जी तरह-तरह के व्यसन में डूबे रहने के बावजूद एक पत्नीव्रता और शास्वत नियमों के पालनकर्ता बने रहते हैं और यह तीसरा नेत्र कुछ और नहीं वरन स्वयं विवेक है जो केवल शिव जी का ही नहीं वरन प्रत्येक मनुष्य का दुनिया के हर प्रकार के काम से रक्षा करता है पर अंतर केवल इस बात का है कि शिव जी का विवेक मूर्धन्य स्थान रखता है पर अन्य सभी मनुष्यों का विवेक थोड़ा कमजोर होता है। अतः एक निश्चित सीमा तक प्रतिरोध के बाद काम शक्ति उस विवेक पर विजय पा जाता है और व्यक्ति काम वश हो जाता है। अतः अगर शिव जी की तरह व्यशन में व्यस्त रहना है तो उनकी तरह ध्यान योग में भी व्यस्त रहने कि क्षमता विकशित कीजिये जिससे कि आप का तीसरा नेत्र विवेक इतना मजबूत हो जाय कि वह भी आप का सभी कामों से रक्षा कर सके और आप भी एक पत्नीव्रता का कड़ाई से पालन कर सकें।


Saturday, March 8, 2014

There should be no PAVPOOJAN tradition in marriage which is out side the Brahmin, Kshatriy and Vaishy limit. The fact which is out of our religion then why we follow the rule in our religion. Therefore leave it on court to see and do not give name religious or Shashtriy Marriage. It is only court which defend it but not the religion. At least other party from any religion and caste, first accept himself Brahmin, Kshatriya or Vaishya by Law, rule and regulation of religion, societal, moral way.

There should be no PAVPOOJAN tradition in marriage which is out side the Brahmin, Kshatriy and Vaishy limit. The fact which is out of our religion then why we follow the rule in our religion. Therefore leave it on court to see and do not give name religious or Shashtriy Marriage. It is only court which defend it but not the religion. At least other party from any religion and caste, first accept himself Brahmin, Kshatriya or Vaishya by Law, rule and regulation of religion, societalmoral way.

Thursday, March 6, 2014

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कि कन्यायों के लिए केवल तीन घर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य तथा सर्वश्रेस्थ केवल समान श्रेणी के घर ही के बाच बना वैवाहिक सम्बन्ध धार्मिक शाश्त्रीय पारिवारिक सम्बन्ध हैं इसके बाहर कोई कदम सम्भव नहीं और है तो दूसरा परिवार भी सामाजिक, धार्मिक, नैतिक और कानूनी रूप से अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैस्य स्वीकार करे। मतलब अंतरजातीय विवाह मान्य है पर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कि सीमा के अंदर ही रहकर और बेहतर होगा कि श्रेणी समान हो और अंतरजातीय सम्बन्ध हो ही न; और सांस्कृतिक और सामजिक धरोहर को बने रहने दिया जाय।

There should be no PAVPOOJAN tradition in marriage which is out side the Brahmin, Kshatriy and Vaishy limit. The fact which is out of our religion then why we follow the rule in our religion. Therefore leave it on court to see and do not give name religious or Shashtriy Marriage. It is only court which defend it but not the religion.

Tuesday, March 4, 2014

केदारेश्वर मतलब शिव जिसमे ईस्वर सब्द पूर्व में ही लगा है पर केदारनाथ मतलब पूर्ण शिव हो यह जरूरी नहीं अतः इसे एक पीठ(अंश) या स्थान विशेष के रूप में समझा जा सकता है सकता यह शिवांश ही होगा और ये केदारेश्वर (शिव) ही प्रकृति के पांच भूतों (जल, थल/पृथ्वी, आकाश/स्पेस, वायु/पवन, और अग्नि) के स्वामी हैं।

http://en.wikipedia.org/wiki/Kedareswar_Temple

जिसको हिन्दू धर्म में आस्था हो वह गंगा/पवित्र जल आचमन के साथ पांच बार गायत्री मंत्र का ह्रदय से पाठ कर सनातन हिन्दू धर्म में आ सकता है पर पर इसकी प्राथमिक सदाशयता होगी अन्य धर्म कि ही तरह और उसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य बनने के लिए अपने त्याग, बलिदान, और तपश्या जैसे गुण के साथ अपने को सामाजिक, संवैधानिक और नैतिक स्तर पर शिद्ध करना पडेगा। फिर भी सनातन हिन्दू धर्म की प्राथमिक शाखा कश्यप गोत्र में प्रवेश और आर्य समाज उसे पूर्ण हिन्दू होने का गौरव तो देता ही है।


इस दुनिया को तो 1; 3; 4; 7; 8; 24 (Minimum one Param Brahm or Brahm can do so) पुरुष और उनकी प्रकृति ही चला लेगी। क्यों कास्ट सह के जी रहे हो? आबादी बढ़ा बोझ बनते जा रहे हो प्राकृतिक संशाधनों पर जो सीमित हैं। जीवन सफल बनाओ यदि ईस्वर से इसे मांगे थे।


Monday, March 3, 2014

अगर मनु(कश्यप ऋषि) से नाराजगी है और आप कश्यप गोत्र में नहीं चाहते है(जो सब धर्मों और जातिओं और धर्म न मानाने वालों का हिन्दू धर्म में पुनः प्रवेश का स्थान है)तो कम से कम आर्य समाज में अपने को स्थापित कीजिये और तपश्या, बलिदान और त्याग का गुण विकशित करने पर और सामाजिक तथा नीतिगत/संवैधानिक रूप से यह स्वीकार करने पर ही आप क्रमशः वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण बन सकते हैं।------ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कि कन्यायों के लिए केवल तीन घर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य तथा सर्वश्रेस्थ केवल समान श्रेणी के घर ही के बाच बना वैवाहिक सम्बन्ध धार्मिक शाश्त्रीय पारिवारिक सम्बन्ध हैं इसके बाहर ई कदम सम्भव नहीं और है तो दूसरा परिवार भी सामाजिक, धार्मिक, नैतिक और कानूनी रूप से अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैस्य स्वीकार करे। मतलब अंतरजातीय विवाह मान्य है पर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कि सीमा के अंदर ही रहकर और बेहतर होगा कि श्रेणी समान हो और अंतरजातीय सम्बन्ध हो ही न; और सांस्कृतिक और सामजिक धरोहर को बने रहने दिया जाय।

अगर मनु(कश्यप ऋषि) से नाराजगी है और आप कश्यप गोत्र में नहीं  चाहते है(जो सब धर्मों और जातिओं और धर्म न मानाने वालों का हिन्दू धर्म में पुनः प्रवेश का स्थान है)तो कम से कम आर्य समाज में अपने को स्थापित कीजिये और तपश्या, बलिदान और त्याग का गुण विकशित करने पर और सामाजिक तथा नीतिगत/संवैधानिक रूप से यह स्वीकार करने पर ही आप क्रमशः वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण बन सकते हैं।------ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कि कन्यायों के लिए केवल तीन घर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य तथा सर्वश्रेस्थ केवल समान श्रेणी के घर ही के बाच बना वैवाहिक सम्बन्ध धार्मिक शाश्त्रीय पारिवारिक सम्बन्ध हैं इसके बाहर कोई कदम सम्भव नहीं और है तो दूसरा परिवार भी सामाजिक, धार्मिक, नैतिक और कानूनी रूप से अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैस्य स्वीकार करे। मतलब अंतरजातीय विवाह मान्य है पर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कि सीमा के अंदर ही रहकर और बेहतर होगा कि श्रेणी समान हो और अंतरजातीय सम्बन्ध हो ही न; और सांस्कृतिक और सामजिक धरोहर को बने रहने दिया जाय।

धर्मांतरण करके सत्य से पीछा कोई छुड़ा नहीं सकता क्योंकि सनातन हिन्दू धर्म छोड़ोगे तो यह सर्वविदित सत्य सुन लीजिये कि: इस्लाम को भी श्रीराममयी के और ईसाइयत को भी श्रीकृष्णमयी के सामानांतर चलना है अगर यद् संसार मिलकर चलाना है तो और इस प्रकार सबका मिलन बिंदु सनातन हिन्दू धर्म ही होना है। यह अलग बात है कि इन समांतर रेखाओं के बीच एक और केवल एक विशेष आस्था का लम्ब है गाय, गंगा, गायत्री और गौरी के प्रति अपने-अपने दृष्टिकोणसे सम्बंधित।*******जय हिन्द(जम्बू द्वीप:ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भरतखंड:अखंड भारत), जय श्रीराम, जय श्रीक़ृष्ण|


Sunday, March 2, 2014

जो हिन्दू स्वयं अपने को पहचान रहा है और एक आम मानव से ऊपर त्याग, बलिदान और तपश्या का गुण रखता है वह किशी दूसरे धर्म में क्यों जाएगापर हाँ विकत परिस्थितिया ऐसा करा सकती है पर ब्राह्मण के लिए भगवान् शिव ने कहा है कि "धन्य सो विप्र निज धर्म न टरई : ब्राह्मण वह धन्य है जो अपने धर्म से विराट न हो" तो कम से कम ब्राह्मण को कभी अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए चाहे उसको मृत्युदंड क्यों न दे दिया जाय मतलब उसे अपने धर्म केलिए प्राण तक त्यागने हो तो वह त्याग दे और मरकर पुनः अपने धर्म में ही जन्म ले।


जैसे गौतम बुध्ध स्वयं गौतम गोत्रीय क्षत्रिय-सिद्धार्थ गौतम थी उसी तरह गोकुल के नन्द बाबा का पूरा नाम नन्द राय था (बिहार में कुछ यदुवंशीय अपने नाम के आगे सरनाम राय इसी लिए लिखते हैं) और वे एक रियासतदार थे मथुरा राज्य के और उनके कुल गुरु गर्ग ऋषि के वंसज थे तथा वशुदेव के कुल गुरु शांडिल्य ऋषि (कश्यप और वशिस्थ का समागम जो कश्मीर में जन्म लिए थे और इनमे वशिस्ठ जी का अंश है अतः ये कश्यप के लिए गुरु कि गम्भीरता रखते हैं उसी तरह से जैसे वशिस्थ) के वंसज थे। अतः वशुदेव ने कंश वध के बाद बलराम और श्रीकृष्ण को शांडिल्य गोत्रीय गुरु संदीपन के पास भेजा।


निः सन्देश गौतम ऋषि श्रेस्ठ थे पर अपने न्याय दर्शन के कारन अपनी पत्नी को पर पुरुष के साथ देखने के दंड स्वरुप छोड़ देने के कारन स्वयं सीता ने उन्हें अपना गुर मानाने से मना कर दिया था और उसे क्रूरता माना था जबकि गौतम ऋषि दया और प्रेम कि प्रतिमूर्ति थे इसमे कोई संदेह नहीं। -------पर अन्य ऋषि जिनके वंसज गुरु के रूप में अद्वितीय सेवा दिए: गुरु के रूप में कश्यप के वंसज: १) कण्व ऋषि जो हस्तिनापुर के चंद्रवंशीय राजा दुस्यन्त और विश्वामित्र और मेनका कि संतान शकुंतला के पुत्र भरत को शिक्षा दी थी। २) बाल्मीकि (कश्यप ऋषि के पुत्र वरुण के पुत्र) जिन्होंने स्वयं भारद्वाज ऋषि और सूर्यवंशीय/इक्षाकुवंशीय/रघुवंशीय राजा श्रीराम के पुत्र लव तथा कुश को शिक्षा दी थी (अतः हिंदुकुश से नाता किशी रघुवंशीय का नहीं छूट सकता है)----------------गुरु के रूप में प्रथम स्थान रखने वाले वशिस्थ ऋषि के वंसज: १) वशिस्ठ जी स्वयं जो सूर्यवंशीय/इक्षाकुवंशीय/रघुवंशीय के कुल गुरु थे, २) इनके वंसज परासर/वेद व्यास जो चन्द्र वंशीय राजाओं के गुर थे।-------------भारद्वाज कुल गुरु के रूप में: स्वयं भारद्वाज गर्ग (विद्वता और सात्विकता कि चरम पराकास्ठा) ऋषि के गुरु २) इनके पुत्र गुरु द्रोणाचार्य जिन्होंने चंद्रवंशीय राजा हस्तिनापुर के हित को सर्वोपरि मान रास्त्र धर्म को सबसे बड़ा धर्म शिद्ध किया।-----------भृगु ऋषि (जमदग्नि ऋषि/ दधीचि ऋषि जो त्याग के सर्वोपरि मिशाल हैं जो ब्राह्मण होने का सबसे प्रमुख लक्षण है) इनके पौत्र भगवान् परशुराम ने केबल और केवल ब्रह्मणो को शिक्षा दिया जिनमे प्रमुख हैं गुरु द्रोणाचार्य,सूर्य-कुंती पुत्र (कथा ब्राह्मण होने कि बहुत विस्तृत है), तथा गंगापुत्र भीष्मपिताहं जिन्होंने अपने युध्ध कौशल से भगवान् श्रीकृष्ण को चक्र उठाने पर मजबूर कर दिया। -----------अत्रि (दुर्वाषा/दत्ता/सोमा) अपने विशेष तेज और अपनी पत्नी सती अनुसूइया के पतिब्रता शक्ति से उत्पन त्रिदेवों कि शक्ति से भी ज्यादा तेज वाले दुर्वाशा ऋषि के कारन प्रशिद्ध है जो आजमगढ़ के दुर्वाषा नमक स्थान पर मझुई और तामस नदी के संगम पर अपनी कुटिया बना शीस्यों को तेजस्विनाधुमस्तु (तेजस्वी बनो) का पाठ पढ़ाते थे। ------------सातवें और अंतिम विश्वामित्र/कौशिक/विश्वरथ अस्त्र शास्त्र की शिक्षा के गुरु थे जो सूर्यवंशीय राजकुमार श्रीराम और लक्षमण को शिक्षा दिए थे। ------सातों सप्तार्षियों के प्रसाद से उत्पना कुम्भज/अगस्त्य ऋषि जो ज्ञान और विज्ञान कि खान थे ही और वे वनवास के समय भगवान् श्रीराम को पूर्ण मानव होने का गुण शिखाया और इन्ही के बाण(ब्रह्मास्त्र) से (जो भगवान् राम के पूर्वजों का ही बाण था जो रावण पर चलने वाला था रावण कि उद्दंडता के कारन और जिसे ब्रह्मा जी ने किशी प्रकार अगस्त्य ऋषि कि दित्या था रघु को शांत करा कर अपने बरदान को पूरा करने के लिए) रावण के प्राण का अंत हुआ और भगवान् श्रीराम पूर्णता कि प्राप्ति का पहला चरण पूरा किये और दूसरा सीता का बनवास था और अंतिम था पुनः सीता का इस भूलोक से सदा के लिए त्याग जिसमे उन्होंने सीता हरण से ज्यादा विह्वलता दिखा दी और इस बार यह भरे समाज के सामने था अतः वे इस प्रकार पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम हो पूर्ण मानव बन गए और पूर्ण मानव ही ईस्वर कि पदवी पाता है अहि समाज में इस प्रकार भगवान् श्रीराम ही ईस्वर है इसमे किशी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। (भगवान् श्री कृष्ण भी पूर्ण प्रेम से पूर्ण सत्य तब बने जब वे ब्रह्मास्त्र से कुरुवंश/पांडव वंश के एक मात्र बचे हुए चिराग, परीक्षित के प्राण कि रक्षा किये अपने जीवन के सम्पूर्ण कर्मों का उद्देश्य सत्य कि पूर्ण प्राप्ति शिद्ध करके अतः सूर्यवंशीय/इक्षाकुवंशीय/रघुवंशीय श्रीराम कि जय में चन्द्र वंशीय/यदुवंशीय/वृष्णि वंशीय श्री कृष्ण की भी जय हो जाती है) ------------पर ऐसा नहीं कि अन्य ऋषि किशी के गुर नहीं थे वरन जो ऋषि है वह पहले एक गुरु होने का गुण रखता ही है यह हो सकता है कि वह किशी एक अमुक विद्या का ही गुर हो।

निः सन्देश गौतम ऋषि श्रेस्ठ थे पर अपने न्याय दर्शन के कारन अपनी पत्नी को पर पुरुष के साथ देखने के दंड स्वरुप छोड़ देने के कारन स्वयं सीता ने उन्हें अपना गुर मानाने से मना कर दिया था और उसे क्रूरता माना था जबकि गौतम ऋषि दया और प्रेम कि प्रतिमूर्ति थे इसमे कोई संदेह नहीं। -------पर अन्य ऋषि जिनके वंसज गुरु के रूप में अद्वितीय सेवा दिए: गुरु के रूप में कश्यप के वंसज: १) कण्व ऋषि जो हस्तिनापुर के चंद्रवंशीय राजा दुस्यन्त और विश्वामित्र और मेनका कि संतान शकुंतला के पुत्र भरत को शिक्षा दी थी। २) बाल्मीकि (कश्यप ऋषि के पुत्र वरुण के पुत्र) जिन्होंने स्वयं भारद्वाज ऋषि और सूर्यवंशीय/इक्षाकुवंशीय/रघुवंशीय राजा श्रीराम के पुत्र लव तथा कुश को शिक्षा दी थी (अतः हिंदुकुश से नाता किशी रघुवंशीय का नहीं छूट सकता है)----------------गुरु के रूप में प्रथम स्थान रखने वाले वशिस्थ ऋषि के वंसज: १) वशिस्ठ जी स्वयं जो सूर्यवंशीय/इक्षाकुवंशीय/रघुवंशीय के कुल गुरु थे, २) इनके वंसज परासर/वेद व्यास जो चन्द्र वंशीय राजाओं के गुर थे।-------------भारद्वाज कुल गुरु के रूप में: स्वयं भारद्वाज गर्ग (विद्वता और सात्विकता कि चरम पराकास्ठा) ऋषि के गुरु २) इनके पुत्र गुरु द्रोणाचार्य जिन्होंने चंद्रवंशीय राजा हस्तिनापुर के हित को सर्वोपरि मान रास्त्र धर्म को सबसे बड़ा धर्म शिद्ध किया।-----------भृगु ऋषि (जमदग्नि ऋषि/ दधीचि ऋषि जो त्याग के सर्वोपरि मिशाल हैं जो ब्राह्मण होने का सबसे प्रमुख लक्षण है) इनके पौत्र भगवान् परशुराम ने केबल और केवल ब्रह्मणो को शिक्षा दिया जिनमे प्रमुख हैं गुरु द्रोणाचार्य,सूर्य-कुंती पुत्र (कथा ब्राह्मण होने कि बहुत विस्तृत है), तथा गंगापुत्र भीष्मपिताहं जिन्होंने अपने युध्ध कौशल से भगवान् श्रीकृष्ण को चक्र उठाने पर मजबूर कर दिया। -----------अत्रि (दुर्वाषा/दत्ता/सोमा) अपने विशेष तेज और अपनी पत्नी सती अनुसूइया के पतिब्रता शक्ति से उत्पन त्रिदेवों कि शक्ति से भी ज्यादा तेज वाले दुर्वाशा ऋषि के कारन प्रशिद्ध है जो आजमगढ़ के दुर्वाषा नमक स्थान पर मझुई और तामस नदी के संगम पर अपनी कुटिया बना शीस्यों को तेजस्विनाधुमस्तु (तेजस्वी बनो) का पाठ पढ़ाते थे। ------------सातवें और अंतिम विश्वामित्र/कौशिक/विश्वरथ अस्त्र शास्त्र की शिक्षा के गुरु थे जो सूर्यवंशीय राजकुमार श्रीराम और लक्षमण को शिक्षा दिए थे। ------सातों सप्तार्षियों के प्रसाद से उत्पना कुम्भज/अगस्त्य ऋषि जो ज्ञान और विज्ञान कि खान थे ही और वे वनवास के समय भगवान् श्रीराम को पूर्ण मानव होने का गुण शिखाया और इन्ही के बाण(ब्रह्मास्त्र) से (जो भगवान् राम के पूर्वजों का ही बाण था जो रावण पर चलने वाला था रावण कि उद्दंडता के कारन और जिसे ब्रह्मा जी ने किशी प्रकार अगस्त्य ऋषि कि दित्या था रघु को शांत करा कर अपने बरदान को पूरा करने के लिए) रावण के प्राण का अंत हुआ और भगवान् श्रीराम पूर्णता कि प्राप्ति का पहला चरण पूरा किये और दूसरा सीता का बनवास था और अंतिम था पुनः सीता का इस भूलोक से सदा के लिए त्याग जिसमे उन्होंने सीता हरण से ज्यादा विह्वलता दिखा दी और इस बार यह भरे समाज के सामने था अतः वे इस प्रकार पूर्ण सत्य और पूर्ण प्रेम हो पूर्ण मानव बन गए और पूर्ण मानव ही ईस्वर कि पदवी पाता है अहि समाज में इस प्रकार भगवान् श्रीराम ही ईस्वर है इसमे किशी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। (भगवान् श्री कृष्ण भी पूर्ण प्रेम से पूर्ण सत्य तब बने जब वे ब्रह्मास्त्र से कुरुवंश/पांडव वंश के एक मात्र बचे हुए चिराग, परीक्षित के प्राण कि रक्षा किये अपने जीवन के सम्पूर्ण कर्मों का उद्देश्य सत्य कि पूर्ण प्राप्ति शिद्ध करके अतः सूर्यवंशीय/इक्षाकुवंशीय/रघुवंशीय श्रीराम कि जय में चन्द्र वंशीय/यदुवंशीय/वृष्णि वंशीय श्री कृष्ण की भी जय हो जाती है) |----------------जिस तरह गौतम ऋषि न्याय दर्शन के तहत अहिल्या का परित्याग करने के बावजूद दया और प्रेम के सागर कहे गए हैं उसी प्रकार भगवान् श्री राम भी सीता को त्यागने के बावजूद प्रेम और करुणा के सागर हैं।  -----------पर ऐसा नहीं कि अन्य ऋषि किशी के गुर नहीं थे वरन जो ऋषि है वह पहले एक गुरु होने का गुण रखता ही है यह हो सकता है कि वह किशी एक अमुक विद्या का ही गुर हो।

कश्यप के पुत्र वरुण, वरुण के पुत्र बाल्मीकि, बाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज, और भारद्वाज के शिष्य गर्ग, और कश्यप से उच्च वशिष्ठ और गौतम तो गौतम, वशिस्ठ और कश्यप से श्रेस्ठ गर्ग कैसे हो गए यह अलग बात है कि गर्ग शिद्ध्ाता और ज्ञान में श्रेष्ठ है। अतः वे गौतम, वशिस्ठ और कश्यप के शिवा अन्य सभी १०० (सौ) गोत्रों से उच्च हैं पर बाकी अन्य सप्तर्षियों से श्रेस्ठ है यह विचारणीय है क्योंकि गर्ग द्वितीय चरण में आते है जो सप्तर्षियों के बाद का है।

कश्यप के पुत्र वरुण, वरुण के पुत्र बाल्मीकि, बाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज, और भारद्वाज के शिष्य गर्ग,  और कश्यप से उच्च वशिष्ठ और गौतम तो गौतम, वशिस्ठ और कश्यप से श्रेस्ठ गर्ग कैसे हो गए यह अलग बात है कि गर्ग शिद्ध्ाता और ज्ञान में श्रेष्ठ है।  अतः वे गौतम, वशिस्ठ और कश्यप के शिवा अन्य सभी १०० (सौ) गोत्रों से उच्च हैं पर बाकी अन्य सप्तर्षियों से श्रेस्ठ है यह विचारणीय है क्योंकि गर्ग द्वितीय चरण में आते है जो सप्तर्षियों के बाद का है।

30-1-2012 को प्रयाग/अल्लाहाबाद से काशी/वाराणसी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) को जाने वाली बस में इस दुनिया को चलाने वाले लोगों द्वारा गोपीगंज नमक स्थान आने से कुछ समय पहले से लेकर उसको पार कर जाने तक लगभग पांच मिनट के लिए जिस तरह का माहौल बस वालों के माध्यम से पैदा किया गया वह बी एच यू तक मेरा पीछा किया अप्रत्यक्ष रूप से और वही 4 FEB, 2012 परमादरणीय गुरु जी और भारत के महामहिम जो भौतिकी विभाग के पदेन गुरु है (जैसा कि ज्ञात हुआ था ) और निदेशक तथा समन्वयक महोदय को पत्र के माध्यम से यह स्वीकारोक्ति देनी पडी कि सतयुग में राजा केदार जो शिवांश थे और शिवशक्तियों का समाजविरोधी कार्यों में प्रयोग कर रहे थे उनके दुर्गुणों का अनत करने के लिए उनके सर को काट कर उनको केदारनाथ और पशुपतिनाथ में विभाजित करने वाला सूर्यवंशी ग्वाला जो इसका कारक था वह मै ही था और इस संसार में राम ही ईस्वर है मतलब रामेश्वरम है इस परम सत्य को भी इसी पत्र के माध्यम से स्वीकार किया था। छठे दिन जिस बस से मै काशी/वाराणसी से प्रयाग/अल्लाहाबाद लौट रहा था उस बस में बैठे अनजान नवयुवकों द्वारा उस बस को पुष्पक विमान बोला जा रहा था।


30-1-2012 को प्रयाग/अल्लाहाबाद से काशी/वाराणसी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) को जाने वाली बस में इस दुनिया को चलाने वाले लोगों द्वारा गोपीगंज नमक स्थान आने से कुछ समय पहले से लेकर उसको पार कर जाने तक लगभग पांच मिनट के लिए जिस तरह का माहौल बस वालों के माध्यम से पैदा किया गया वह बी एच यू तक मेरा पीछा किया अप्रत्यक्ष रूप से और वही 4 FEB, 2012 परमादरणीय गुरु जी और भारत के महामहिम जो भौतिकी विभाग के पदेन गुरु है (जैसा कि ज्ञात हुआ था ) और निदेशक तथा समन्वयक महोदय को पत्र के माध्यम से यह स्वीकारोक्ति देनी पडी कि सतयुग में राजा केदार जो शिवांश थे और शिवशक्तियों का समाजविरोधी कार्यों में प्रयोग कर रहे थे उनके दुर्गुणों का अनत करने के लिए उनके सर को काट कर उनको  केदारनाथ और पशुपतिनाथ में विभाजित करने वाला सूर्यवंशी ग्वाला जो इसका कारक था वह मै  ही था और इस संसार में राम ही ईस्वर है मतलब रामेश्वरम है इस परम सत्य को भी इसी पत्र के माध्यम से स्वीकार किया था। छठे दिन जिस बस से मै काशी/वाराणसी से प्रयाग/अल्लाहाबाद लौट रहा था उस बस में बैठे अनजान नवयुवकों द्वारा उस बस को पुष्पक विमान बोला जा रहा था।      

Saturday, March 1, 2014

I will never take side of majority if he behaves like Duryodhana for my-selfishness like Karna. Thereby I made Krishna alive in myself by effort in living alone(who taken side of Dharma he may be minority). Date of Birth (Actual): 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी), ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस (At present in memory of first education minister, Maulana Abul Kalam Azad); Nakshatra: Dhanistha (1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi); Rashi Name:Giridhari (Means Lord Krishna and Hanuman both) Date of Birth Official: 1-08-1976 [तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि) (Thus a tatha kathit DALIT GURU MADE ME KARTIKEY TO AGASTYA (if we consider Pronunciation of August in Hindi) FOR WHOME IT IS SAID THAT BRAHMA GIVEN BRAHMASTRA OF RAGHU TO AGASTYA RISHI WHICH GIVEN TO SHRIRAM AND THIS ARROW WAS SHOOTED RAVANAA WHO ONCE SCAPED FROM KING RAGHU) and Agastya Rishi (eighth Rishi after Saptarshi) Known as Kumbhaj who sinked all water of ocean in a small pots called Kumbh] (Belong with Yadvas, Muslim and tathakathit dalit dominant area and were few Brahmana from class 0-1-2-3-4 and from class 5th to 8th I was only one Brahmin with 3 or 4 same category students in 50% Yadvas and 50% tatha kathit dalit students)| After that dominant Brahmins but more powerful Kshatriya students and Again Brahmana Dominant student classes| and again and again Brahmina dominant| I never say that the human who taken education with me and teaches me is Dalit or OBC, yes the may have some name by caste)| I know all categories person's good and bad as belongs from Sanatan Brahmin Family. ------Therefore I do not have any fear because at all places I never said Aam to Imali and--------I will never take side of majority if he behaves like Duryodhana for my-selfishness like Karna. And also I never live with such person like Duryodhana and if live then surely I make him polite and Judges of the fundamental fact of life; and I not make myself force to carry the RASHTRADHARM of such state which is governed by Duryodhana, which RASHTRADHARM told superior by Guru Dronachary, Bheeshmapitamah and other Great personality of the modern and ancient days., Thereby I made Krishna alive in myself by effort in living alone(who taken side of Dharma he may be minority).

I will never take side of majority if he behaves like Duryodhana for my-selfishness like Karna. Thereby I made Krishna alive in myself by  effort in living alone(who taken side of Dharma he may be minority). Date of Birth (Actual): 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी), ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस (At present in memory of first education minister, Maulana Abul Kalam Azad); Nakshatra: Dhanistha (1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi); Rashi Name:Giridhari (Means Lord Krishna and Hanuman both) Date of Birth Official: 1-08-1976 [तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि) (Thus a tatha kathit DALIT GURU MADE ME KARTIKEY TO AGASTYA (if we consider Pronunciation of August in Hindi) FOR WHOM IT IS SAID THAT BRAHMA GIVEN BRAHMASTRA OF RAGHU TO AGASTYA RISHI WHICH GIVEN TO SHRIRAM AND THIS ARROW WAS SHOOTED RAVANAA WHO ONCE SCAPED FROM KING RAGHU) and Agastya Rishi (eighth Rishi after Saptarshi) Known as Kumbhaj who sinked all water of ocean in a small pots called Kumbh] (Belong with Yadvas, Muslim and tathakathit dalit dominant area and were few Brahmana from class 0-1-2-3-4 and from class 5th to 8th I was only  one Brahmin with 3 or 4 same category students in 50% Yadvas and 50%  tatha kathit dalit students)| After that dominant Brahmins but more powerful Kshatriya students and Again Brahmana Dominant student classes| and again and again Brahmina dominant| I never say that the human who taken education with me and teaches me is Dalit or OBC, yes the may have some name by caste)| I know all categories person's good and bad as belongs from Sanatan Brahmin Family. ------Therefore I do not have any fear because at all places I never said Aam to Imali and--------I will never take side of majority if he behaves like Duryodhana for my-selfishness like Karna. And also I never live with such person like Duryodhana and if live then surely I make him polite and Judges of the fundamental fact of life; and I not make myself force to carry the RASHTRADHARM of such state which is governed by Duryodhana, which RASHTRADHARM told superior by Guru Dronachary, Bheeshmapitamah and other Great personality of the modern and ancient days., Thereby I made Krishna alive in myself by effort in living alone(who taken side of Dharma he may be minority).

कौन से ऋषि का श्राप था कि सदा-सदा लक्ष्मी के साथ रहने वाले भगवान् विष्णु से लक्ष्मी जी दूर हो गयी वह भी बिना किशी मन्वतर के? यह तब हुआ जब समुद्र मंथन का समय आया देवता और दैत्यों के शक्ति संतुलन को स्थापित करने के लिए जिसमे विष्णु कूर्मावतार लिए थे और मंदिराचल(मंडला:मेरु) पर्वत जिसको माथा जा रहा था साँपों के राजा वासुकि से उसका वजन और घर्षण सहन कर रहे थे (इसी कूर्म अवतार विष्णु का गुण प्रत्येक कुरमावतारी कहे जाने वाले में होना चाहिए। इस प्रकार विष्णु लक्ष्मी विहीन हो गए थे समाज कल्याण में पूरे समुद्र मंथन के दौरान और समुद्र मंथन में एक रत्न के रूप में बाहर आई । पारवती जी भी शिव से दूर हुई इस दौरान पर किशी पराये पुरुष का दामन नहीं थामा और जब शिव जी विष पीने लगे थे उनका हाँथ पकड़ ली और वह गले के नीचे नहीं जा सका। इस दौरान सरस्वती जी भी ब्रह्मा से दूर रही। पारवती जी शिव से नाराज हो या अन्य कारणों से कई बार अलग हुई हैं पर किशी पराये पुरुष के पास नहीं गयी हैं वल्कि दूसरा जैम ले उन्ही को अपना वर प्राप्त की हैं।


कौन से ऋषि का श्राप था कि सदा-सदा  लक्ष्मी के साथ रहने वाले भगवान् विष्णु से लक्ष्मी जी दूर हो गयी वह भी बिना किशी मन्वतर के? यह तब हुआ जब समुद्र मंथन का समय आया देवता और दैत्यों के शक्ति संतुलन को स्थापित करने के लिए जिसमे विष्णु कूर्मावतार लिए थे और मंदिराचल(मंडला:मेरु) पर्वत जिसको माथा जा  रहा था साँपों के राजा वासुकि से उसका वजन और घर्षण सहन कर रहे थे (इसी कूर्म अवतार विष्णु का गुण प्रत्येक कुरमावतारी कहे जाने वाले में होना चाहिए। इस प्रकार विष्णु लक्ष्मी विहीन हो गए थे समाज कल्याण में पूरे समुद्र मंथन के दौरान और समुद्र मंथन में एक रत्न के रूप में बाहर आई । पारवती जी भी शिव से दूर हुई इस दौरान पर किशी पराये पुरुष का दामन नहीं थामा और जब शिव जी विष पीने लगे थे उनका हाँथ पकड़ ली और वह गले के नीचे नहीं जा सका। इस दौरान सरस्वती जी भी ब्रह्मा से दूर रही। पारवती जी शिव से नाराज हो या अन्य कारणों से कई बार अलग हुई हैं पर किशी पराये पुरुष के पास नहीं गयी हैं वल्कि दूसरा जैम ले उन्ही को अपना वर प्राप्त की हैं।   

पशुपतिनाथ और केदारनाथ सतयुग के समय के हैं(सतयुग में ये दोनों स्थान बहुत पास थे वर्त्तमान कि तुलना में किशी भू वैज्ञानिक से पता कीजिये) और इसी पशुपतिनाथ पर जब एक ग्वाला कि गाय आने के बाद घर दूध देना बंद कर दी तो वह इसका पता लगाते लगाते कई दिन उस गाय को इसी पशुपतिनाथ के पास अपना दूध गिराता हुआ पाया और तब जाना कि यह घर पर दूध क्यों नहीं देती है और वह समझ गया कि यह निश्चित रूप से शिव भगवान् का स्वरुप है और तब से गाय के पञ्च द्रव्य से शिव अभिषेक कि प्रथा चली। अतः यह केदारनाथ और पशुपतिनाथ का इतिहास सतयुग का है न कि इतना कम पुराना जितना लोग वर्त्तमान में अनुमान लगाते हैं।

पशुपतिनाथ और केदारनाथ सतयुग के समय के हैं(सतयुग में ये दोनों स्थान बहुत पास थे वर्त्तमान कि तुलना में किशी भू वैज्ञानिक से पता कीजिये) और इसी पशुपतिनाथ पर जब एक ग्वाला कि गाय आने के बाद घर दूध देना बंद कर दी तो वह इसका पता लगाते लगाते कई दिन उस गाय को इसी पशुपतिनाथ के पास अपना दूध गिराता हुआ पाया और तब जाना कि यह घर पर दूध क्यों नहीं देती है और वह समझ गया कि यह निश्चित रूप से शिव भगवान् का स्वरुप है और तब से गाय के पञ्च द्रव्य से शिव अभिषेक कि प्रथा चली। अतः यह केदारनाथ और पशुपतिनाथ का इतिहास सतयुग का है न कि इतना कम पुराना जितना लोग वर्त्तमान में अनुमान लगाते हैं।  
  • JAADA JANKAAREE KE LIYE GORAKHPUR VAALON SE SAMPARK KAREN. GORAKHPUR=GO RAKSHA PUR.
  • Pandey Vivek Kumar YAA GAUTAM GOTRIY MISHRA YAA GAUTAM GOTRIY SHUKLA JEE LOGON SE.
  • Pandey Vivek Kumar Garg, Gautam Shandily these only three Gotra are in Shukla(special Garg but in saptarshi stage Gautam only exists) and Gautam, Shandilya, Vashisth are main gotra in Mishra with other gotras. Gorakgpur is the Centre of Gautam Gotriya Brahmna mainly routed from Mount Kailash of Shiva.

The real reason for having 24 spokes on the Chakra is: According to Hindu religion, Puranas mentioned that only 24 Rishis wielded the whole power of the Gayatri Mantra. These 24 rishi in Himalayas are represented through the 24 letters of Gayatri Mantra. The all the 24 spokes of Dharmachakra are representation of all these 24 rishi of Himalayas in which Vishvamitra is first and Yajnavalkya is last who governs the religion (Dharma). Ashok Chakra is symbol of Dharmchakra/Samata Moolak Chakra and also known as Samay Chakra in which all the 24 spokes represented 24 hours of the day and symbol of the movement of the time. 24 Spokes of Ashok Chakra according Hindu religion: 1. Love 2. Courage 3. Patience 4. Peacefulness 5. Magnanimity 6. Goodness 7. Faithfulness 8. Gentleness 9. Selflessness 10. Self-Control 11. Self Sacrifice 12. Truthfulness 13. Righteousness 14. Justice 15. Mercy 16. Gracefulness 17. Humility 18. Empathy 19. Sympathy 20.Spiritual Knowledge 21. Moral Values 22. Spiritual Wisdom 23. The Fear of God 24. The Faith or Trust or belief.----------------matter is true and taken form these references and books of this web page http://www.rkmathbangalore.org/rkm/Books/Library%20Book.pdf ----------National Perspective of the region and its people: Bharata to India: Chrysee the Golden, Volume 1 Chrysee the Golden, 2012, By M. K. Agarwal, ISBN 978-1-4759-07650, Page 156]. 24 virtues of the spokes of the Ashok Chakra Printed book from United States of America.