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Wednesday, April 30, 2014

माता पारवती (गौरा पारवती), जनक जी की कुल देवी जब माता सीता को आशीर्वाद देने को होता है तो पूंछती है की तुमको कैसा पति चाहिए जो सीता जी कहती हैं की इस संसार में जितनी श्रेष्ठ विभूतिया जन्म ली हैं उन सभी से श्रेष्ठ और पुरषार्थी वर मुझे चाहिए पर उनमे इन सभी का कोई अवगुण नहीं चाहिए। ----------मित्रों याद रखिये की यदि बहुत से गुण यदि एक साथ आ जाते हैं तो सभी गुण विद्यमान रहने हुए जब सबकी मिश्रित शक्ति बनती है तो उनके पास आ जाने से कोई एक गुण अपने में पूर्ण अस्तित्व में होते हुए भी वह किशी व्यक्ति विशेष में एक साथ होने पर उतना प्रभावी नहीं रहता है जितना की अकेला।------- तो पार्वती से सोचने लगती हैं की सबसे शक्तिशाली स्वयं मेरे पति शिव है लेकिन वे विध्ध्वंसक भी हैं (रुद्रावतारी है नटराज रूप में) , सबसे तेजस्वी तो सर्वश्रेष्ठ सती अनुशूइया और अत्रि पुत्र दुर्वाशा हैं जिनमे त्रिदेवों का तेज विद्यमान है जिनमे क्रोध भरा है, सबसे बड़े वीर योद्धा तो परशुराम हैं पर उनको शांति नहीं है, सबसे ज्ञानी ब्रह्मा हैं पर उनमे घमंड है और सबसे धैर्यवान विष्णु हैं पर वे स्थिर रहते हैं क्षीर सागर में चलायमान नहीं हैं, सबसे बड़े दूर संवेदी(सूचना तंत्र) नारद है पर उनमे धैर्य नहीं बात को कुछ देर तक छिपाने का, और सबसे धनी कुबेर है पर ज्ञान से उनका दूर दूर तक नाता नहीं है----------इस प्रकार पार्वती मैया सभी विभूतियों का वर्णन कर डालती हैं सीता मैया से पर कोई ऐसा नहीं मिलता की जिसमे सब अच्छाई हो पर इनमे से किशी एक का कोई अवगुण न हो तो वे भगवान श्रीराम को पाती हैं जिनको मैया सीता फूलों की वाटिका में धनुषयज्ञ के एक दिन पूर्व देखी थी और उन्ही को प्राप्त करना चाहती थी धनुष यज्ञ के माध्यम से और उनको अपना पति मान बैठी थी और उनकी चाहत में ही वे अपनी कुल देवी गौरा पार्वती माँ की पूजा-अर्चना करने गयी थी जिनको स्वयं गौरा पार्वती माँ ने वरदान में वर रूप में दे ही दिया सबकी व्याख्या करने के बाद।*******जय हिन्द(जम्बू द्वीप=यूरेसिअ=यूरोप+एशिया; या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्ड), जयश्रीराम/कृष्ण।

माता पारवती (गौरा पारवती), जनक जी की कुल देवी जब माता सीता को आशीर्वाद देने को होता है तो पूंछती है की तुमको कैसा पति चाहिए जो सीता जी कहती हैं की इस संसार में जितनी श्रेष्ठ विभूतिया जन्म ली हैं उन सभी से श्रेष्ठ और पुरषार्थी वर मुझे चाहिए पर उनमे इन सभी का कोई अवगुण नहीं चाहिए। ----------मित्रों याद रखिये की यदि बहुत से गुण यदि एक साथ आ जाते हैं तो सभी गुण विद्यमान रहने हुए जब सबकी मिश्रित शक्ति बनती है तो उनके पास आ जाने से कोई एक गुण अपने में पूर्ण अस्तित्व में होते हुए भी वह किशी व्यक्ति विशेष में एक साथ होने पर उतना प्रभावी नहीं रहता है जितना की अकेला।------- तो पार्वती से सोचने लगती हैं की सबसे शक्तिशाली स्वयं मेरे पति शिव है लेकिन वे विध्ध्वंसक भी हैं (रुद्रावतारी है नटराज रूप में) , सबसे तेजस्वी तो सर्वश्रेष्ठ सती अनुशूइया और अत्रि पुत्र दुर्वाशा हैं जिनमे त्रिदेवों का तेज विद्यमान है जिनमे क्रोध भरा है, सबसे बड़े वीर योद्धा तो परशुराम हैं पर उनको शांति नहीं है, सबसे ज्ञानी ब्रह्मा हैं पर उनमे घमंड है और सबसे धैर्यवान विष्णु हैं पर वे स्थिर रहते हैं क्षीर सागर में चलायमान नहीं हैं, सबसे बड़े दूर संवेदी(सूचना तंत्र) नारद है पर उनमे धैर्य नहीं बात को कुछ देर तक छिपाने का, और सबसे धनी कुबेर है पर ज्ञान से उनका दूर दूर तक नाता नहीं है----------इस प्रकार पार्वती मैया सभी विभूतियों का वर्णन कर डालती हैं सीता मैया से पर कोई ऐसा नहीं मिलता की जिसमे सब अच्छाई हो पर इनमे से किशी एक का कोई अवगुण न हो तो वे भगवान श्रीराम को पाती हैं जिनको मैया सीता फूलों की वाटिका में धनुषयज्ञ के एक दिन पूर्व देखी थी और उन्ही को प्राप्त करना चाहती थी धनुष यज्ञ के माध्यम से और उनको अपना पति मान बैठी थी और उनकी चाहत में ही वे अपनी कुल देवी गौरा पार्वती माँ की पूजा-अर्चना करने गयी थी जिनको स्वयं गौरा पार्वती माँ ने वरदान में वर रूप में दे ही दिया सबकी व्याख्या करने के बाद।*******जय हिन्द(जम्बू द्वीप=यूरेसिअ=यूरोप+एशिया; या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्ड), जयश्रीराम/कृष्ण।

Monday, April 28, 2014

उस शक्ति की परिकल्पना कीजिये जो मेरी कुलदेवी, देव काली जो सम्मिलित शक्ति हैं महा सरस्वती, महा लक्ष्मी और महा पारवती की सलाह के विपरीत जाकर भी मुझे अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के साथ पूर्व से ज्यादा तेजस्वी और अक्षिणु बना रखा है मेरे त्याग, समर्पण, सहनशीलता और पुरुषार्थ को ध्यान में रखते हुए । ---------वह थे आजमगढ़(अर्यमागढ़) से मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय परमपिता(ब्रह्मा), और जौनपुर(जमदग्निपुर) से सनातन गौतम गोत्रीय परमगुरु(विष्णु)-परमपिता(ब्रह्मा)-परमेश्वर(शिवा:महादेव) अभिप्राय यह कि जो सम्मिलित शक्ति हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयं में ही: नाम बताने की जरूरत नहीं है यहां इन्हे मुझे जानने वाले जानते ही हैं।---------मित्रों मेरा नामांकन केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ययन केंद्र, नेहरू विज्ञान केंद्र, अलाहाबाद/प्रयागराज विश्वविद्यालय में क्यों जरूरी था ? उसे अल्लाहाबाद/प्रयागराज के हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई धर्म के जानकारों के अलावा आप मेरे अल्लाहाबाद/प्रयागराज विश्वविद्यालय के परिक्षेत्र में आने वाले कुलगुरु जो प्रतापगढ़ (अवध क्षेत्र का एक जनपद) से भी आप पूंछ सकते हैं। और यह केंद्र, केवल एक वैज्ञानिक शिक्षा के केंद्र का अलाहाबाद/प्रयागराज विश्व विद्यालय में आविर्भाव मात्र था/है या सम्पूर्ण विश्व समाज यहां हुयी प्रत्येक घटना से कुछ ज्ञान-विज्ञान-विवेक भी अर्जित किया यह भी एक प्रश्न उनसे पूंछ सकते है मतलब प्राकृतिक पर्यावरण के साथ सामाजिक पर्यावरण सम्बन्धी ज्ञान में कुछ शोधक परिणाम आये या नहीं?---------------My Kuldevi is Dev-Kaali like wise same Kuldevi of a Raghuvansheey of Ayodhya, who is a collective power of Mahaa Saraswati, Mahaa Lakshmi and Mahaa Parvati. In 2nd February, 2003 she comes in my dream and said that if you get enrolled in Kedareshwar (K.) Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS), Institute of Interdisciplinary Studies (IIDS), Nehru Science Centre, University of Allahabad, Allahabad, then I will leave you and I will be unable to protect you from your enemies who will ruin you. -------- Therefore you stay only in project and watch there and let not enrolled in the first batch but you can get enrollment in another batch of D. Phil if you want. The rest person should lead in the first batch enrollment. -------After this I(a Kashyapa Gotriya) have taken my fully filled form office of KBCAOS which was forwarded by my Guide (Kashyap Gotriya), and then keep it in so many parts.---------My Pramapita and Paramguru Parampita Parameshwar were informed, who advised me to take part in this Great opportunity for the leading foundation of such Centre of University of Allahabad whose first name start with Lord Siva’s name i.e. the Kedareshwar (K.) Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS). Thus I and my Junior (Sawarn Gotriy: Sawarna was son of Kahshyapa’s son Aditya means Sawarna are brothers of Surya and Chandra Vanshiya and other gods who were sons of the Kashyapa and Aditi) taken enrollment in first batch of D. Phil in KBCAOS and also awarded with the first D. Phil degree respectively from the KBCAOS. -----------What was need behind my enrollment in first batch and why my Kul-Devi, Dev Kaali warned me for taking enrollment in D. Phil in the first batch of the KBCAOS but why she wants me to stay in project in the centre only without taking any enrollment ? What is the importance of this kedareshwar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies in the University of Allahabad and world wide? This can be explained by religious persons of Hindu, Muslim and Christianity of the Allahabad/Prayagraj. Web Page: https://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

उस शक्ति की परिकल्पना कीजिये जो मेरी कुलदेवी, देव काली जो सम्मिलित शक्ति हैं महा सरस्वती, महा लक्ष्मी और महा पारवती की सलाह के विपरीत जाकर भी मुझे अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के साथ पूर्व से ज्यादा तेजस्वी और अक्षिणु बना रखा है मेरे त्याग, समर्पण, सहनशीलता और पुरुषार्थ को ध्यान में रखते हुए । ---------वह थे आजमगढ़(अर्यमागढ़) से मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय परमपिता(ब्रह्मा), और जौनपुर(जमदग्निपुर) से सनातन गौतम गोत्रीय परमगुरु(विष्णु)-परमपिता(ब्रह्मा)-परमेश्वर(शिवा:महादेव) अभिप्राय यह कि जो सम्मिलित शक्ति हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयं में ही: नाम बताने की जरूरत नहीं है यहां इन्हे मुझे जानने वाले जानते ही हैं।---------मित्रों मेरा नामांकन केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ययन केंद्र, नेहरू विज्ञान केंद्र, अलाहाबाद/प्रयागराज विश्वविद्यालय में क्यों जरूरी था ? उसे अल्लाहाबाद/प्रयागराज के हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई धर्म के जानकारों के अलावा आप मेरे अल्लाहाबाद/प्रयागराज विश्वविद्यालय के परिक्षेत्र में आने वाले कुलगुरु जो प्रतापगढ़ (अवध क्षेत्र का एक जनपद) से भी आप पूंछ सकते हैं। और यह केंद्र, केवल एक वैज्ञानिक शिक्षा के केंद्र का अलाहाबाद/प्रयागराज विश्व विद्यालय में आविर्भाव मात्र था/है या सम्पूर्ण विश्व समाज यहां हुयी प्रत्येक घटना से कुछ ज्ञान-विज्ञान-विवेक भी अर्जित किया यह भी एक प्रश्न उनसे पूंछ सकते है मतलब प्राकृतिक पर्यावरण के साथ सामाजिक पर्यावरण सम्बन्धी ज्ञान में कुछ शोधक परिणाम आये या नहीं?---------------My Kuldevi is Dev-Kaali like wise same Kuldevi of a Raghuvansheey of Ayodhya, who is a collective power of Mahaa Saraswati, Mahaa Lakshmi and Mahaa Parvati. In 2nd February, 2003 she comes in my dream and said that if you get enrolled in Kedareshwar (K.) Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS), Institute of Interdisciplinary Studies (IIDS), Nehru Science Centre, University of Allahabad, Allahabad, then I will leave you and I will be unable to protect you from your enemies who will ruin you. -------- Therefore you stay only in project and watch there and let not enrolled in the first batch but you can get enrollment in another batch of D. Phil if you want. The rest person should lead in the first batch enrollment. -------After this I(a Kashyapa Gotriya) have taken my fully filled form office of KBCAOS which was forwarded by my Guide (Kashyap Gotriya), and then keep it in so many parts.---------My Pramapita and Paramguru Parampita Parameshwar were informed, who advised me to take part in this Great opportunity for the leading foundation of such Centre of University of Allahabad whose first name start with Lord Siva’s name i.e. the Kedareshwar (K.) Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS). Thus I and my Junior (Sawarn Gotriy: Sawarna was son of Kahshyapa’s son Aditya means Sawarna are brothers of Surya and Chandra Vanshiya and other gods who were sons of the Kashyapa and Aditi) taken enrollment in first batch of D. Phil in KBCAOS and also awarded with the first D. Phil degree respectively from the KBCAOS. -----------What was need behind my enrollment in first batch and why my Kul-Devi, Dev Kaali warned me for taking enrollment in D. Phil in the first batch of the KBCAOS but why she wants me to stay in project in the centre only without taking any enrollment ? What is the importance of this kedareshwar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies in the University of Allahabad and world wide? This can be explained by religious persons of Hindu, Muslim and Christianity of the Allahabad/Prayagraj.
Web Page:

https://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

My Kuldevi is Dev-Kaali like wise same Kuldevi of a Raghuvansheey of Ayodhya, who is a collective power of Mahaa Saraswati, Mahaa Lakshmi and Mahaa Parvati. In 2nd February, 2003 she comes in my dream and said that if you get enrolled in Kedareshwar (K.) Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS), Institute of Interdisciplinary Studies (IIDS), Nehru Science Centre, University of Allahabad, Allahabad, then I will leave you and I will be unable to protect you from your enemies who will ruin you. -------- Therefore you stay only in project and watch there and let not enrolled in the first batch but you can get enrollment in another batch of D. Phil if you want. The rest person should lead in the first batch enrollment. -------After this I(a Kashyapa Gotriya) have taken my fully filled form office of KBCAOS which was forwarded by my Guide (Kashyap Gotriya), and then keep it in so many parts.---------My Pramapita and Paramguru Parampita Parameshwar were informed, who advised me to take part in this Great opportunity for the leading foundation of such Centre of University of Allahabad whose first name start with Lord Siva’s name i.e. the Kedareshwar (K.) Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS). Thus I and my Junior (Sawarn Gotriy: Sawarna was son of Kahshyapa’s son Aditya means Sawarna are brothers of Surya and Chandra Vanshiya and other gods who were sons of the Kashyapa and Aditi) taken enrollment in first batch of D. Phil in KBCAOS and also awarded with the first D. Phil degree respectively from the KBCAOS. -----------What was need behind my enrollment in first batch and why my Kul-Devi, Dev Kaali warned me for taking enrollment in D. Phil in the first batch of the KBCAOS but why she wants me to stay in project in the centre only without taking any enrollment ? What is the importance of this kedareshwar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies in the University of Allahabad and world wide? This can be explained by religious persons of Hindu, Muslim and Christianity of the Allahabad/Prayagraj. Web Page: https://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

My Kuldevi is Dev-Kaali like wise same Kuldevi of a Raghuvansheey of Ayodhya, who is a collective power of Mahaa Saraswati, Mahaa Lakshmi and Mahaa Parvati. In 2nd February, 2003 she comes in my dream and said that if you get enrolled in Kedareshwar (K.) Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS), Institute of Interdisciplinary Studies (IIDS), Nehru Science Centre, University of Allahabad, Allahabad, then I will leave you and I will be unable to protect you from your enemies who will ruin you. -------- Therefore you stay only in project and watch there and let not enrolled in the first batch but you can get enrollment in another batch of D. Phil if you want. The rest person should lead in the first batch enrollment. -------After this I(a Kashyapa Gotriya) have taken my fully filled form office of KBCAOS which was forwarded by my Guide (Kashyap Gotriya), and then keep it in so many parts.---------My Pramapita and Paramguru Parampita Parameshwar were informed, who advised me to take part in this Great opportunity for the leading foundation of such Centre of University of Allahabad whose first name start with Lord Siva’s name i.e. the Kedareshwar (K.) Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS). Thus I and my Junior (Sawarn Gotriy: Sawarna was son of Kahshyapa’s son Aditya means Sawarna are brothers of Surya and Chandra Vanshiya and other gods who were sons of the Kashyapa and Aditi) taken enrollment in first batch of D. Phil in KBCAOS and also awarded with the first D. Phil degree respectively from the KBCAOS. -----------What was need behind my enrollment in first batch and why my Kul-Devi, Dev Kaali warned me for taking enrollment in D. Phil in the first batch of the KBCAOS but why she wants me to stay in project in the centre only without taking any enrollment ? What is the importance of this kedareshwar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies in the University of Allahabad and world wide? This can be explained by religious persons of Hindu, Muslim and Christianity of the Allahabad/Prayagraj.
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https://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

Wednesday, April 23, 2014

दुनिया का सबसे बड़ा गूढ़ रहस्य: एक भी कश्यप गोत्रीय/शूर्यवंशीय/इक्शाकुवंशीय/रघुवंशीय क्षत्रिय राजा का नाम बताइये जिसका पशुराम ने वध किया हो क्रूर क्षत्रिय राजाओं का सफाया करते समय। उत्तर है: कोई नहीं। कारन यह की कश्यप गोत्रीय/शूर्यवंशीय/इक्शाकुवंशीय/रघुवंशीय क्षत्रिय राजा जो ब्राह्मणों और संतों के साथ अन्याय करे और स्त्रियों की अज्ञानता का लाभ उठा या उन पर बलात नीच व्यवहार करे उसको स्वयं कश्यप गोत्रीय/शूर्यवंशीय/इक्शाकुवंशीय/रघुवंशीय क्षत्रिय शूद्र और राक्षस की संज्ञा दे बल पूर्वक अपने से बाहर कर देते है, तो ऐसे में परशुराम को हाँथ लगाने का मौक़ा कहाँ मिलता और इसका प्रमुख उदहारण हैं राजा दसरथ जो परशुराम के समकालीन क्षत्रिय राजा थे और जिनका विनाश परशुराम स्वयं नहीं कर सकते थे। और हर क्षत्रिय अपने को शूर्यवंशीय की संज्ञा इस लिए दे देता है की इन्ही से शिख ले हर गोत्र और वंश के क्षत्रिय सदाचार पूर्वक और ब्राह्मणों तथा संतों का पूर्ण सामान देते हुए पुनः राज पद प्राप्त किये थे उनका गोत्र कश्यप और वंश शूर्यवंश भले न हो।----और कश्यप गोत्रीय/शूर्यवंशीय/इक्शाकुवंशीय/रघुवंशीय क्षत्रिय तथा भूमिहार सम्बन्ध का प्रमुख उदहारण है काशिराज के सम्बन्धी जनक की पुत्री मिथिलेश कुमारी सीता माँ का शूर्यवंशीय क्षत्रिय भगवान श्रीराम के साथ विवाह। राजा जनक का अपने राज्य में स्थित बिहार के सीतामढी नमक स्थान में जमीन में सित (=हल) चलाने से जन्म ली संतान का प्रयागराज के सीतामढी में आकर उसी जमीन में समाहित हो जाना बताता है की सह दुनिया ऐसी है जिसमे एक पिता जिसको एक पुत्री की लालसा मतलब संतान प्रेम चाहिए थी की पूर्ती हेतु जन्म ली संतान सीता को उसी का अपना प्रेम इस क्रूर संसार ने छीन लिया और जब तक जीती रही उसे एक श्रेष्ठ पुत्री, श्रेष्ठ बहु, श्रेष्ठ पत्नी, एक श्रेष्ठ माँ और एक श्रेष्ठ रानी माँ बने रहने से सम्बंधित पूर्ण सत्य की कसौटी पर बार बार कसा जान उन्हें जीने नहीं दिया इस संसार में। ----------अतः जब एक भूमिहार समाज की लड़की के साथ ऐसा बार-बार हुआ है और बिहार की सीतामढी में जन्म लिए सीता ने अपने को प्रयागराज की सीतामढी में भूमिगत कर लिया तो वही भूमिहार समाज किशी कश्यप गोत्रीय के सत्य-प्रेम और विवेक की परिक्षा क्यों ले रहा बार बार। -------भगवान श्रीराम सर्वश्रेष्ठ थे विष्णु अवतार में इसी लिए ही तो बस्ती जनपद से आरयमगढ़(आज़मगढ़) आ एक मुस्लिम जमींदार से जमीन पाये मेरे कुल के एक बाबा शिवनामधारी शारंगधर(चन्द्रधर=शिव) ब्राह्मण ने अपने गाँव का नाम रामपुर रखा नही तो परशुरामपर नहीं रखा होता। --बेज्जती भल है पर कलंक भला नहीं होता क्योंकि कलंक और बिज्जती में यही अंतर है मूल रूप से की कलंक जन्म जन्मान्तर के लिए होता है पर रावण द्वारा बेज्जती जो की गयी वह रावण वध के साथ इसलिए ख़त्म हो गयी क्योंकि वह दुस्साहस किया था भूमिहार समाज की पुत्री और शूर्यवंशीय पुत्रवधु/वधु का अपहरण कर, उसमे भगवान श्रीराम का कोई दोस नहीं पर भगवान परशुराम पर अकारण कलंक लग जाता है इस बात से की वे जबतक केरला में कश्यप ऋषि से मिले नहीं और उत्तराँचल की पहाड़ियों पर गए नहीं खोज-खोज कर क्षत्रिय समाज को परशान करते रहे जबकि वही जमीन कश्यप के माध्यम से पुनः क्षत्रिय राजाओं को पुनः मिल गयी जब वे उसे कश्यप ऋषि को सौप कर शांति हेतु उत्तराँचल की पहाड़ियों पर चले गए।*******जय हिन्द/भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।


गौतम गोत्रीय क्षत्रिय विक्रमाजीत/विक्रमादित्य जिनके पूर्वजों को बिहार, बंगाल स्वयं आजमगढ़ के पड़ोसी क्षेत्रों तक अपनी शक्ति से अर्जित कर लेने वाले चंगेज खां की सेना भी सिकस्त न दे सकी, उनको एक विवाह सम्बन्ध ने अपने पुत्र का नाम आज़म(महान) और अज़मत रखने को मजबूर कर दिया, जिसमे से आज़म के नाम पर आज़मगढ़ शहर ने आजमगढ़ जनपद की शक्ति प्राप्त की । अतः एक पीढ़ी पहले जाने पर सबसे दयालु किन्तु सबसे शसक्त गौतम (गौतम गोत्रीय क्षत्रिय) गोत्रीय सत्ता की पहचान हमें मिलाती है जो अपनी शक्ति और शौर्य के कारन भारत में सबसे अंत में विदेशी शासन और धर्म को स्वीकार किया और जिसके तुरंत बाद अंगरेजी सत्ता का पदार्पण भी हुआ पर यहां की शक्ति पर उसका भी कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा अंत तक अपने इस नए धर्म के प्रति कट्टरता के करन भी।-----------अतः यह कहना की अपने से गैर धर्म और जाती में विवाह सम्बन्ध स्थापित करने से कुछ नहीं होता है यह असत्य है और यह विक्रमाजीत/विक्रमादित्य के पुत्र आज़म, आज़मगढ़(अर्यमागढ़) उदाहरण अपने में सबसे उपयुक्त है।


अ, ब, स और द बचपन में मैंने भी बहुत पढ़ा था और एक धर्म रक्षक परिवार में जन्म लेने के कारन मै प्रयाग (काशी), अयोध्या, मथुरा-वृन्दाबन, हरिद्वार और विश्व गुरु जमदग्निपुर(जौनपुर) को इन अ, ब, स और द से ऊपर ही मानता था और हूँ भी जबकि विश्वाश है और था भी की इन विश्व स्तरीय धार्मिक और संस्कृतिं महत्व के स्थान को स्पर्श किये बिना भी पूरी दुनिया को नियंत्रित किया जा सकता है अगर अ, ब, स और द मिलकर पुनः काम करें और प्रयाग (काशी), अयोध्या, मथुरा-वृन्दाबन, हरिद्वार और विश्व गुरु जमदग्निपुर(जौनपुर)के लोग केवल दूर से इनको आशीर्वाद और अपना मार्गदर्शन और समुचित साथ देते रहें। और यह है पूर्वांचल से अ(आज़मगढ़), ब (बलिया), अवध से स (सुल्तानपुर) और द (दिल्ली:भारतीय राजधानी क्षेत्र दिलीपपुर/इंद्रप्रस्थ)।


अगर प्रयागराज में डेरा जमाये हनुमान(अम्बवादेकर) मंगलेश्वर तो दुर्वाशा आश्रम, आर्यमगढ़(आजमगढ़) में डेरा जमाये दुर्वाशा महामंगलेश्वर जिनका दूसरा स्थान प्रयागराज ही है और भारद्वाज(कश्यप ऋषि के पुत्र वरुणदेव के बाल्मीकि जिनका आश्रम टोंस नदी तट पर वर्तमान कौशाम्बी-प्रयाग राज था के शिष्य) सदा के लिए प्रयागराज में डेरा जमाये के सुरक्षा कवच है वे। इतना ही नहीं स्वयं में कोई एक त्रिदेव( ब्रह्मा+विष्णु+महेश) तो नहीं परन्तु त्रिदेव की शक्ति लिए लिए दुर्वाशा स्वयं में ब्रह्मा के लिए ब्रह्मास्त्र शक्ति और विष्णु और शिव से पहले सम्पूर्ण विश्व में सनातन धर्म के पहले सुरक्षा कवच हैं जो विष्णु की तरह केवल लक्ष्य विशेस पर अचूक वार करने वाले है न की नटराज/रूद्र की तरह समूल नाश करने वाले हैं इस श्रिष्टि का।-------अतः इस सम्पूर्ण समाज में शिव/रामेश्वर/केदारेश्वर/नटराज/रूद्र से पहले दुर्वाशा और विष्णु (राम-कृष्ण) पर विश्वाश व्यक्त किया जाना चाहिए धर्म रक्षा और सामाजिक संतुलन स्थापित करने के लिए ।


इस श्रीस्टी के इतिहाश मुझे एक भी राम, एक भी कृष्ण, एक भी गणेश, एक भी ब्रह्मा, एक भी विष्णु और एक भी महेश का नाम दीजिये जो स्वयं दुस्ट दलन भी किया हो, स्वयं कुर्मावतारी विष्णु; स्वयं विषपानकर्ता शिव; स्वयं श्रीति के सजीव से निर्जीव वस्तुओं में प्राण फूंकने वाले, ब्रह्मास्त्र धारी और श्रिष्टि के रक्षक करता(केवल दोषी व्यक्ति पर ब्रह्मास्त्र चलाकर महादेव को रूद्र/नटराज बन सम्पूर्ण श्रिष्टि को ही विनाश बचाने वाले) ब्रह्मा की भूमिका इस संसार में निभाया हो? और क्या उसकी कागजी मेरिट भी देखने योग्य लोग इस संसार में बिना उसकी कृपा के जीवित हैं ? --------मेरी कागजी मेरिट देखने वाले लोगों को पहले तो यह पता होना चाहिए कि इसमे से किशी की मेरिट ऐसी नहीं रह गयी थी जो समाज हिट में लगे थे। उनकी मेरिट उस कमजोर से कमजोर व्यक्ति की कागजी मेरिट के समान थी जो इस संसार में जीवित था चाहे वह रावण वध में लगे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हों, कंश वध में लगे श्री कृष्ण हों और समुद्रमंथन में लगे हुए ब्रह्मा, विष्णु, महेश हो क्योंकि उनकी पत्नियां उनको छोड़ चुकी थी और वे श्री-शक्ति और सरस्वती-ज्ञान विहीन हो गए थे। ---------मै बता दूँ की मुझे केदारेश्वर बनर्जी केंद्र पर जाने और वहां रहने के लिए ही कहा गया था न की यहां अलाहाबाद/प्रयाग विश्वविद्यालय में शोध में नामांकन कराने के लिए कहा गया था और वह भी की प्रथम बार के नामांकन में ही मतलब मेरे ऊपर था की मै यहां नामांकन लूँ या न लू। अतः मै इस केदारेश्वर बनर्जी केंद्र व् अन्य नए केंद्र स्थापित करने की वीणा उठाये हुए उच्च मेरिट वालों, उनके गोत्रों और उनके शिष्यों को पुरुषार्थ आजमाइश के लिए ही केदारेश्वर बनर्जी केंद्र में प्रथम सत्र में ही नामांकन के लिए ही मौक़ा देने के लिए ही मै भरा भराया नामांकन फार्म फाड़ के फ़ेंक दिया जब उसी रात मुझे अपने अस्तित्व पर संकट के बादल नजर आये थे( जैसे की 2001 में इस सम्पूर्ण श्रिस्टी पर संकट के बादल नजर आये थे मुझे स्वाभाविक रूप से जैसा की उस समय के लोगों की गति शूद्रागति हो गयी थी यहां तक की प्रयाग वाशियों की भी) और इस नामांकन न लेने की प्रक्रिया से मेरे वादे पर कोई प्रभाव भी नहीं पड़ रहा था मतलब मै कार्यरत रहता वैज्ञानिक परियोजना में केदारेश्वर बनर्जी केंद्र पर और जब चाहता नामांकन ले लेता भविष्य में क्योंकि शोध कार्य के लिए महज दो वष ही चाहिए थे अतः वह भी 2007 तक पूरा हो सकता था 7-02-2003 के बाद भी नामांकन लेता तब भी। मेरा सविनय निवेदन है उन लोगों से जो मेरी कागजी मेरिट देख रहे हैं की वे ऐसा केवल समाज हित के लिए ही करें न की मुझे नीचा दिखाने की मानशिकता पाल कर। क्योंकि मेरी कागजी मेरिट आभासी है और मेरी असली मेरिट मेरी इस सम्पूर्ण विश्व में समता स्थापित करने में लगी हुई है 1991-1993 से ही और जब भी मेरी कागजी मेरिट ऊपर होती है सभी सहपाठियों की औसत कागजी मेरिट से तो मेरी अगली कागजी मेरिट काम कर दी जा रही है विष्णु और ब्रह्मा के भक्तों द्वारा जिनका काम है इस संसार को चलान और समता स्थापित करना और मई उसको केवल रेखांकित कर रहा हूँ समाज में एक वैज्ञानिक युग बीतने के बाद ही। ---------बाप कश्यप से बड़े पुत्र आदित्य और आदित्य से बड़े उनके पुत्र मुख्यतः सावर्ण, सूर्य और चन्द्र नहीं हो सकते है जिनका पूरी दुनिया पर आधिपत्या रहता है। बाप और बाबा सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण की ही छाया में नामांकन क्यों जरूरी हो गया था पुर्शार्थी, उच्च गोत्रीय और उच्च मेरिट वाले लोगों के लिए और यही बाप सप्तर्षि मतलब सातों ब्रह्मर्षि मतलब ब्राह्मण की उनके पुत्रों पर वरीयता देने का प्रमाण है केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र और इसमे मै किशी अन्य गोत्र का अपमान नहीं कर रहा केवल कश्यप गोत्र के भीतर ही बात कर रहा हूँ एक सनातन कश्यप गोत्रीय बराह्मण परिवार से होकर जिसका ननिहाल विष्णुपुर(बिशुनपुर)-जमदग्निपुर(जौनपुर) और गाँव रामपुर-अर्यमागढ़(आजमगढ़) है। यह केंद्र एक संघर्ष था पुराणी पीढ़ी और वर्त्तमान पीढ़ी के बीच जिसमे पुराणी पीढ़ी के साथ मै, मेरा पूरा परिवार और गुरुकुल था जिसमे पुराणी पीढ़ी के विजय का प्रतीक है यह नेहरू वियान केंद्र प्रांगण में स्थित केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र, अलाहाबाद/प्रयागराज विश्व विद्यालय।*******जय हिन्द/भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।

इस श्रीस्टी के इतिहाश मुझे एक भी राम, एक भी कृष्ण, एक भी गणेश, एक भी ब्रह्मा, एक भी विष्णु और एक भी महेश का नाम दीजिये जो स्वयं दुस्ट दलन भी किया हो,  स्वयं कुर्मावतारी विष्णु; स्वयं विषपानकर्ता शिव;  स्वयं श्रीति के सजीव से निर्जीव वस्तुओं में प्राण फूंकने वाले, ब्रह्मास्त्र धारी और श्रिष्टि के रक्षक करता(केवल दोषी व्यक्ति पर ब्रह्मास्त्र चलाकर महादेव को रूद्र/नटराज बन सम्पूर्ण श्रिष्टि को ही विनाश बचाने वाले) ब्रह्मा की भूमिका इस संसार में निभाया हो? और क्या उसकी कागजी मेरिट भी देखने योग्य लोग इस संसार में बिना उसकी कृपा के जीवित हैं ? --------मेरी कागजी मेरिट देखने वाले लोगों को पहले तो यह पता होना चाहिए कि इसमे से किशी की मेरिट ऐसी नहीं रह गयी थी जो समाज हिट में लगे थे।  उनकी मेरिट उस कमजोर से कमजोर व्यक्ति की कागजी मेरिट के समान थी जो इस संसार में जीवित था चाहे वह रावण वध में लगे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हों, कंश वध में लगे श्री कृष्ण हों और समुद्रमंथन में लगे हुए ब्रह्मा, विष्णु, महेश हो क्योंकि उनकी पत्नियां उनको छोड़ चुकी थी और वे श्री-शक्ति और सरस्वती-ज्ञान विहीन हो गए थे। ---------मै बता दूँ की मुझे केदारेश्वर बनर्जी केंद्र पर जाने और वहां रहने के लिए ही कहा गया था न की यहां अलाहाबाद/प्रयाग विश्वविद्यालय में शोध में नामांकन कराने के लिए कहा गया था और वह भी की प्रथम बार के नामांकन में ही मतलब मेरे ऊपर था की मै यहां नामांकन  लूँ या न लू। अतः मै इस केदारेश्वर बनर्जी केंद्र व् अन्य नए केंद्र स्थापित करने की वीणा उठाये हुए उच्च मेरिट वालों, उनके गोत्रों और उनके शिष्यों को पुरुषार्थ आजमाइश के लिए ही केदारेश्वर बनर्जी केंद्र में प्रथम सत्र में ही नामांकन के लिए ही मौक़ा देने के लिए ही मै भरा भराया नामांकन फार्म फाड़ के फ़ेंक दिया जब उसी रात मुझे अपने अस्तित्व पर संकट के बादल नजर आये थे( जैसे की 2001 में इस सम्पूर्ण श्रिस्टी पर संकट के बादल नजर आये थे मुझे स्वाभाविक रूप से जैसा की उस समय के लोगों की गति शूद्रागति हो गयी थी यहां तक की प्रयाग वाशियों की भी) और इस नामांकन न लेने की प्रक्रिया से मेरे वादे पर कोई प्रभाव भी नहीं पड़ रहा था मतलब मै कार्यरत रहता वैज्ञानिक परियोजना में केदारेश्वर बनर्जी केंद्र पर और जब चाहता नामांकन ले लेता भविष्य में क्योंकि शोध कार्य के लिए महज दो वष ही चाहिए थे अतः वह भी 2007 तक पूरा हो सकता था 7-02-2003 के बाद भी नामांकन लेता तब भी। मेरा सविनय निवेदन है उन लोगों से जो मेरी कागजी मेरिट देख रहे हैं की वे ऐसा केवल समाज हित के लिए ही करें न की मुझे नीचा दिखाने की मानशिकता पाल कर।  क्योंकि मेरी कागजी मेरिट आभासी है और मेरी असली मेरिट मेरी इस सम्पूर्ण विश्व में समता स्थापित करने में लगी हुई है 1991-1993 से ही और जब भी मेरी कागजी मेरिट ऊपर होती है सभी सहपाठियों की औसत कागजी मेरिट से तो मेरी अगली कागजी मेरिट काम कर दी जा रही है विष्णु और ब्रह्मा के भक्तों  द्वारा जिनका काम है इस संसार को चलान और समता स्थापित करना और मई उसको केवल रेखांकित कर  रहा हूँ समाज में एक वैज्ञानिक युग बीतने के बाद ही।  ---------बाप कश्यप से बड़े पुत्र आदित्य और आदित्य से बड़े उनके पुत्र मुख्यतः सावर्ण, सूर्य और चन्द्र नहीं हो सकते है जिनका पूरी दुनिया पर आधिपत्या रहता है।  बाप और बाबा सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण की ही छाया  में नामांकन क्यों जरूरी  हो गया था पुर्शार्थी, उच्च गोत्रीय और उच्च मेरिट वाले लोगों के लिए और यही बाप सप्तर्षि मतलब सातों ब्रह्मर्षि मतलब ब्राह्मण की उनके पुत्रों पर वरीयता देने का प्रमाण है केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र और इसमे मै किशी अन्य गोत्र का अपमान नहीं कर रहा केवल कश्यप गोत्र के भीतर ही बात कर रहा हूँ एक सनातन कश्यप गोत्रीय बराह्मण परिवार से होकर जिसका ननिहाल विष्णुपुर(बिशुनपुर)-जमदग्निपुर(जौनपुर) और गाँव रामपुर-अर्यमागढ़(आजमगढ़) है।  यह केंद्र एक संघर्ष था पुराणी पीढ़ी और वर्त्तमान पीढ़ी के बीच जिसमे पुराणी पीढ़ी के साथ मै, मेरा पूरा परिवार और गुरुकुल था जिसमे पुराणी पीढ़ी के विजय का प्रतीक है यह नेहरू वियान केंद्र प्रांगण में स्थित केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र, अलाहाबाद/प्रयागराज विश्व विद्यालय।*******जय हिन्द/भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।  

Tuesday, April 22, 2014

श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है।

श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन  ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है।

My Mother, Smt. Pushpa Pandey (the then Mishra) is Grand Daughter of Late Shradhdhey Shri Ram Prashad Mishra, Bishunpur, Jaunpur (Jagadamnipur)-223103 and my Father, Shri Pradeep Kumar Pandey is Grand Son of Late Shradhdhey Shri Ram Prashad Pandey, Ramapur, Azamgarh (Aryamgarh)-223225| प्रिय मित्रों मैंने संत जन से यह कहते हुए सुना है की " राम से बड़ा राम का नाम और मैंने श्रीराम को दुनिया में हर जगह पाया है, "सीय राममय सब जानी, करहुँ प्रणाम जोरि जुग पाणी"| अगर राम मंदिर और राम की नगरी, अयोध्या स्थित उनके मंदिर में आप के जाने का योग किशी कारन वास नहीं बन रहा तो आप जहां हैं वही से अंतर्मन से राम-राम पुकारिए देखिये भगवते वाशुदेवाय (कृष्ण/विष्णु-कृष्ण/विष्णु) अपने आप हो जाएगा और बड़े से बड़े कस्ट में आप को असीम आनंद की अनुभूति होगी।यह दुनिया की सबसे बड़ी धन सम्पदा है। और रामेश्वर/केदारेश्वर/शिव का ही मत है की राम -राम सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हो और उनको योग निद्रा से तभी जगाया जाय जब उनको नटराज/रूद्र रूप धारण कर सबके कल्याण के लिए सबके विनाश का एक मात्र रास्ता ही शेष बचा हो।


जिस तरह सुवरचाला (और हनुमान=अम्बावडेकर) के पुत्र सुवर्चल मतलब मकर ध्वज(पाताल लोक के राजा जो रावण के भाई और तत्कालीन विश्व के सबसे बड़े माफिआ अहिरावण को हनुमान द्वारा मार दिए जाने के बाद सत्तासीन किये गए भगवान श्रीराम-लक्षमण-हनुमान द्वारा; और जो पाताल लोग वर्तमान में विश्व का तथाकथित सबसे शक्तिशाली देश है) उसी तरह से उत्तमा के पुत्र उत्तम| रही बात उत्तमा के पुत्र की तो वह दत्तक पुत्र भी हो सकता है और इस प्रकार मेरे नाना श्रद्धेय श्री रमानाथ मिश्रा (और पारसनाथ मिश्रा) ही उत्तमा के पुत्र उत्तम थे जैसा की उत्तमा मेरे नाना को अपना वारिस समझती थीं और मेरे नाना उनके प्रति उत्तरदायित्व का पालन भी किये। -------------यह दुनिया की सबसे गूढ़ कड़ी है बिशुनपुर-जौनपुर, उत्तर प्रदेश-223103 में रामानंद मिश्रा के कुल की जिसे लोग समझते ही रह गए।*******जय हिन्द/भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।


Monday, April 21, 2014

जमदग्निपुर(जौनपुर) जिस भृगु ऋषि के पुत्र जमदग्नि के सम्मान में नाम प्राप्त किया है उस भृगु ऋषि के स्वयं के पौत्र स्वयं भगवान परशुराम का त्याग(की वे केवल क्रूर क्षत्रिय राजाओं न की समस्त क्षत्रिय को सज्जन ब्राह्यणों और गायों के प्रति समुचित सम्मान न देने के कारन और गौ रक्षा में सहस्रबाहु द्वारा पिता के वध का प्रतिशोध लेने के लिए उनकी ह्त्या किये थे) और स्वयं इसी कुल के महर्षि दधीचि का सृस्टि का दैत्यों से रक्षा के लिए किये गए त्याग का ही परिणाम सप्तर्षयों में भृगु ऋषि को ब्राह्मणोचित गुण, त्याग में सर्वश्रेष्ठ सप्तर्षि मान वशुदेव (कश्यप) ऋषि पुत्र योग योगेश्वर श्रीकृष्ण को स्वयं को सप्तर्षियों में भृगु ऋषि की ही संज्ञा को उपयुक्त माना। अतः जमदग्निपुर/जौनपुर के प्रत्येक नागरिक को मानवता की रक्षा के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए दृण प्रतिज्ञ रहना चाहिए चाहे वे किशी भी गोत्र/जाती/सम्प्रदाय/धर्म से हों तभी जमदग्निपुर/जौनपुर विश्व में हमेशा प्रथम स्थान रखेगा गुरुओं में जिस भृगु ऋषि के के वंसज परशुराम के ज्ञान से सिंचित केरल और उत्तराखंड आज भी विश्व में ज्ञान और विज्ञान में श्रेष्ठ है।


Dear Dr. Bharatendu Singh Ji, I, Dr. Vivek Kumar Pandey himself was 25th Rishi who gives power to all 24 or 8 or 7 Rishis i.e. the Centre of Ashok Chakra (DHARMA CHAKRA=SAMAY CHAKRA =SAMATA MOOLAK CHAKRA) then what was need to get certificate from BHU's Gurujan. Ashok Chakra may be broken by any power but this 25th Rishi i.e. the it's Centre again give birth to this Ashok Chakra/Dharm Chakra/ Samay Chakra/Samata Moolak Chakra.


Saturday, April 19, 2014

केदारेश्वर(शिव) ही सभी पाँच भूतों के स्वामी हैं और वे पांच भूत हैं: जल, थल(पृथ्वी), वायु(पवन), आकाश(स्पेस), अग्नि(प्रमुख श्रोत जिसका सूर्य है); इनको एक करने वाले विष्णु है और इसमे प्राण फूंकने वाले ब्रह्मा है और तब जाके यह सजीव श्रिष्टि अपने वर्तमान स्वरुप को प्राप्त करती है।---------गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वरः, गुरुर्षाक्षात् पर ब्रह्मा तस्मै श्री गुरवे नमः। और यह गुरु कोई और नहीं स्वयं बिशुनपुर-जौनपुर(जमदग्निपुर) के रामानंद के कुल के स्वयं श्रीधर(त्रिदेवों के भी गुरु परमपिता परमब्रह्म परमेश्वर विष्णु) हों तो इस संसार को कौन विखंडित कर सकता है और उनके लिए मै नामतः डॉक्टर विवेक कुमार पाण्डेय पर राशिनाम गिरिधारी (श्रीकृष्ण और हनुमान) स्वयं एक उपयुक्त पात्र की तरह भूमिका क्यों न निभाता?


इन सबके अतिरिक्त इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है की इसके प्रथम नाम के कारन उस शिव को समाहित किये है अपने में जो सभी पाँच भूतों के स्वामी हैं (और वे पांच भूत हैं: जल, थल(पृथ्वी), वायु(पवन), आकाश(स्पेस), अग्नि(प्रमुख श्रोत जिसका सूर्य है))। अतः यह धर्म दर्शन में विश्वाश रखने वालों के लिए सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय रिकार्ड है की पृथ्वी विज्ञान से सम्बंधित कोई विज्ञान केंद्र और उसमे भी वायुमंडलीय और समुद्रीय विज्ञान केंद्र (केदारेश्वर (#के) बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ययन केंद्र) का नाम स्वयं केदारेश्वर(शिव) के नाम के साथ आता है या उनके नाम पर है। --------------भारतीय धर्म दर्शन में विशवास रखने वाले जानते हैं की केदारेश्वर(शिव) ही सभी पाँच भूतों के स्वामी हैं और वे पांच भूत हैं: जल, थल(पृथ्वी), वायु(पवन), आकाश(स्पेस), अग्नि(प्रमुख श्रोत जिसका सूर्य है); इनको एक करने वाले विष्णु है और इसमे प्राण फूंकने वाले ब्रह्मा है और तब जाके यह सजीव श्रिष्टि अपने वर्तमान स्वरुप को प्राप्त करती है। अतः मेरा विज्ञान केंद्र जो प्रयागराज विश्व विद्यालय में नेहरू विज्ञान केंद्र में स्थित केदारेश्वर (#के) बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ययन केंद्र जिसकी स्थापना 2000-2001 में हुई है और जिसमे की मै स्वयं में ही एक शिक्षक और शोध छात्र हूँ प्रथम कर्णधार के रूप में वह स्वयं में ही एक अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र का गौरव प्राप्त कर लिया उसी दिन से जिस दिन से वह प्रथम शोध छात्र को इस विषय में शोध की डिग्री देने का प्रथम केंद्र बना 2007 में और पूर्णता को तब प्राप्त कर लिया जब उसमे प्रथम कर्णधारी शिक्षकगण का आगमन हुआ 2009 में एक अंतर्राष्ट्रीय दर्जा प्राप्त विश्व विद्यालय के विज्ञान केंद्र के रूप में। इन सबके अतिरिक्त इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है की इसके प्रथम नाम के कारन उस शिव को समाहित किये है अपने में जो सभी पाँच भूतों के स्वामी हैं (और वे पांच भूत हैं: जल, थल(पृथ्वी), वायु(पवन), आकाश(स्पेस), अग्नि(प्रमुख श्रोत जिसका सूर्य है))। अतः यह धर्म दर्शन में विश्वाश रखने वालों के लिए सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय रिकार्ड है की पृथ्वी विज्ञान से सम्बंधित कोई विज्ञान केंद्र और उसमे भी वायुमंडलीय और समुद्रीय विज्ञान केंद्र (केदारेश्वर (#के) बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ययन केंद्र) का नाम स्वयं केदारेश्वर(शिव) के नाम के साथ आता है या उनके नाम पर है।

इन सबके अतिरिक्त इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है की इसके प्रथम नाम के कारन उस शिव को समाहित किये है अपने में जो सभी पाँच भूतों के स्वामी हैं (और वे पांच भूत हैं: जल, थल(पृथ्वी), वायु(पवन), आकाश(स्पेस), अग्नि(प्रमुख श्रोत जिसका सूर्य है))। अतः यह धर्म दर्शन में विश्वाश रखने वालों के लिए सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय रिकार्ड है की पृथ्वी विज्ञान से सम्बंधित कोई विज्ञान केंद्र और उसमे भी वायुमंडलीय और समुद्रीय विज्ञान केंद्र (केदारेश्वर (#के) बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ययन केंद्र) का नाम स्वयं केदारेश्वर(शिव) के नाम के साथ आता है या उनके नाम पर है। --------------भारतीय धर्म दर्शन में विशवास रखने वाले जानते हैं की केदारेश्वर(शिव) ही सभी पाँच भूतों के स्वामी हैं और वे पांच भूत हैं: जल, थल(पृथ्वी), वायु(पवन), आकाश(स्पेस), अग्नि(प्रमुख श्रोत जिसका सूर्य है); इनको एक करने वाले विष्णु है और इसमे प्राण फूंकने वाले ब्रह्मा है और तब जाके यह सजीव श्रिष्टि अपने वर्तमान स्वरुप को प्राप्त करती है। अतः मेरा विज्ञान केंद्र जो प्रयागराज विश्व विद्यालय में नेहरू विज्ञान केंद्र में स्थित केदारेश्वर (#के) बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ययन केंद्र जिसकी स्थापना 2000-2001 में हुई है और जिसमे की मै स्वयं में ही एक शिक्षक और शोध छात्र हूँ प्रथम कर्णधार के रूप में वह स्वयं में ही एक अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र का गौरव प्राप्त कर लिया उसी दिन से जिस दिन से वह प्रथम शोध छात्र को इस विषय में शोध की डिग्री देने का प्रथम केंद्र बना 2007 में और पूर्णता को तब प्राप्त कर लिया जब उसमे प्रथम कर्णधारी शिक्षकगण का आगमन हुआ 2009 में एक अंतर्राष्ट्रीय दर्जा प्राप्त विश्व विद्यालय के विज्ञान केंद्र के रूप में। इन सबके अतिरिक्त इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है की इसके प्रथम नाम के कारन उस शिव को समाहित किये है अपने में जो सभी पाँच भूतों के स्वामी हैं (और वे पांच भूत हैं: जल, थल(पृथ्वी), वायु(पवन), आकाश(स्पेस), अग्नि(प्रमुख श्रोत जिसका सूर्य है))। अतः यह धर्म दर्शन में विश्वाश रखने वालों के लिए सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय रिकार्ड है की पृथ्वी विज्ञान से सम्बंधित कोई विज्ञान केंद्र और उसमे भी वायुमंडलीय और समुद्रीय विज्ञान केंद्र (केदारेश्वर (#के) बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ययन केंद्र) का नाम स्वयं केदारेश्वर(शिव) के नाम के साथ आता है या उनके नाम पर है।

Wednesday, April 16, 2014

Being as an International RSS Cadet I have Great Pleasure to say that Lord Shiva is the 1st and Lord Shri Ram/ Krishna is the 2nd Greatest NEHRU (one who do NEH: PREM: LOVE with every living and non-living). I hope that this disclosed fact (which was hidden for a large number of people till date) will give a best humanity to the World. I hope also that this is the best SHRADDHANJALI to my Nani Brahma Devi (SARASWATI Maan) who was one of the best Priest of Lord Shiva since her Child life to her death.. ----(Forget that Nehru means Canal or Ponds or River or Ocean)|----------------And also my Nana, Shradhdhey Shri Ramanath (VISHNU) Mishra was died on 3rd March 2011 on Thursday at the occasion of Shivaratri (the day of Marriage of Lord Shiva and Parwati Maa)

Being as an International RSS Cadet I have Great Pleasure to say that Lord Shiva is the 1st and Lord Shri Ram/ Krishna is the 2nd Greatest NEHRU (one who do NEH: PREM: LOVE with every living and non-living). I hope that this disclosed fact (which was hidden for a large number of people till date) will give a best humanity to the World. I hope also that this is the best SHRADDHANJALI to my Nani Brahma Devi (SARASWATI Maan) who was one of the best Priest of Lord Shiva since her Child life to her death.<late : at the Age of 90 year she died-on Tuesday, 15 April 2014; the occasion of Hanuman (Rudra:Shiva Avtar) Jayanti>. ----(Forget that Nehru means Canal or Ponds or River or Ocean)|----------------And also my Nana, Shradhdhey Shri Ramanath (VISHNU) Mishra was died on 3rd March 2011 on Thursday at the occasion of Shivaratri (the day of Marriage of Lord Shiva and Parwati Maa)

Saturday, April 12, 2014

यह सत्य है की हम सब उसी परमपिता ब्रह्मा की संतान है। अतः वशुधैव कुटुम्बम:- सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामय। सर्वे भद्राणि पश्यन्ति मां कश्चिद्दुः भागभवेति। ---------पर सज्जन, सत्कर्म और सदगुण को समुचित महत्व देते हुए सामाजिक समरसता और समता मूलक समाज को बनाये की स्थापना और उसे बनाये रखने की क्रियाशीलता कभी अलोक-तांत्रिक नहीं कही जा सकती जो किशी के जीवन के मौलिक अधिकार का हनन नहीं करता है। जैसे किशी राजनैतिक दाल के शीर्सस्थ राजनेता को उस राजनैतिक दल के एक कार्य कर्ता के समान मौलिक अधिकार देना उचित हो सकता है पर उस शीर्सस्थ के निर्णय के समान उस आम कार्यकर्ता की बात को एक प्रभावी निर्णय समझ लेना कदापि उस राजनैतिक दाल के सुनहरे भविष्य के लिए स्वस्थ कदम नहीं है। अतः उस आम राजनैतिक कार्यकर्ता की बात को एक हिस्सा समझ निर्णय लेने में ध्यान देना जरूरी है पर अगर एक प्रभावी नेता की तरह उसकी बात पर पूर्ण ध्यान न देना कोई अलोकतांत्रिक कदम नहीं है। -----------इस विषय पर हमें गौर करना चाहिए लोकतंत्र की गलत परिभाषा गढ़ने से बचने के लिए नहीं तो यह लोकतंत्र एक भेंड़ तंत्र बनाकर पूरे समाज को एक चारागाह बना जंगली जीवन जीने को मजबूर कर देगा।


Friday, April 11, 2014

गायत्री मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् गायत्री देवी, वह जो पंचमुख़ी है, हमारी पांच इंद्रियों और प्राणों की देवी मानी जाती है. गायत्री मंत्र (वेद ग्रंथ की माता) को हिन्दू धर्म में सबसे उत्तम मंत्र माना जाता है. यह मंत्र हमें ज्ञान प्रदान करता है. इस मंत्र का मतलब है - हे प्रभु, क्रिपा करके हमारी बुद्धि को उजाला प्रदान कीजिये और हमें धर्म का सही रास्ता दिखाईये. यह मंत्र सूर्य देवता (सवितुर=Lord/Husband of Savita) के लिये प्रार्थना रूप से भी माना जाता है. हे प्रभु! आप हमारे जीवन के दाता हैं आप हमारे दुख़ और दर्द का निवारण करने वाले हैं आप हमें सुख़ और शांति प्रदान करने वाले हैं हे संसार के विधाता हमें शक्ति दो कि हम आपकी उज्जवल शक्ति प्राप्त कर सकें क्रिपा करके हमारी बुद्धि को सही रास्ता दिखायें मंत्र के प्रत्येक शब्द की व्याख्या गायत्री मंत्र के पहले नौं शब्द प्रभु के गुणों की व्याख्या करते हैं ॐ = प्रणव भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाला भुवः = दुख़ों का नाश करने वाला स्वः = सुख़ प्रदाण करने वाला तत = वह, सवितुर = सूर्य की भांति उज्जवल वरेण्यं = सबसे उत्तम भर्गो = कर्मों का उद्धार करने वाला देवस्य = प्रभु धीमहि = आत्म चिंतन के योग्य (ध्यान) धियो = बुद्धि, यो = जो, नः = हमारी, प्रचोदयात् = हमें शक्ति दें (प्रार्थना) इस प्रकार से कहा जा सकता है कि गायत्री मंत्र में तीन पहलूओं क वर्णं है - स्त्रोत, ध्यान और प्रार्थना.


उस सरस्वती की वन्दना जिसके सभी सप्तर्षि( सातों ब्रह्मर्षि: गौतम ,वशिस्थ, कश्यप/मारीच, भारद्वाज/अंगारिसा, जमदग्नि/भृगु, दुर्वाशा/अत्रि, विश्वामित्र=कौशिक का क्रम गाय:गौ माता के प्रति श्रद्धा और विशवास और गाय के समान आचरण की गुणवत्ता के अनुसार स्थान क्रम) पुत्र हैं और जिनकी वन्दना मात्र से इन सभी सप्तर्षियों के पिता ब्रह्मा की भी वन्दना पूर्ण मान ली जाती है| यह सत्य है कश्यप के लिए गौतम श्रद्धेय और वशिष्ठ पूज्य अन्य सभी चार सप्तर्षि सम दर्शनीय पर सप्तर्षियों में कश्यप ब्रह्मा के प्रथम प्रकट्य पुत्र है प्रयागराज में हुए पृथ्वी के सबसे प्राचीन यज्ञ (प्राक-यज्ञ=प्रयाग: सप्तर्षियों की प्राप्ति के लिए ब्रह्मा दारा किये गए सप्तर्षि प्रकृष्टा यज्ञ) के:----- या कुंदेंदु तुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता | या वीणावर दण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना || या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता | सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा || या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता| नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः || शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमां आद्यां जगद्व्यापिनीं वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यान्धाकारापाहां| हस्ते स्फाटिक मालीकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदां|| हिंदी अनुवाद: जो कुंद फूल, चंद्रमा और वर्फ के हार के समान श्वेत हैं, जो शुभ्र वस्त्र धारण करती हैं| जिनके हाथ, श्रेष्ठ वीणा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमल पर आसन ग्रहण करती हैं|| ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदिदेव, जिनकी सदैव स्तुति करते हैं| हे माँ भगवती सरस्वती, आप मेरी सारी (मानसिक) जड़ता को हरें|| *******जय हिन्द(जम्बूद्वीप=यूरेसिआ=यूरोप+एशिया=या कम से कम ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्या कुमारी), जय भारत(भरतखंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/श्रीकृष्ण।


यह सत्य है कश्यप के लिए गौतम श्रद्धेय और वशिष्ठ पूज्य अन्य सभी चार सप्तर्षि सम दर्शनीय पर सप्तर्षियों में कश्यप ब्रह्मा के प्रथम प्रकट्य पुत्र (ब्रह्मा के सबसे जेष्ठ पुत्र )है प्रयागराज में हुए पृथ्वी के सबसे प्राचीन यज्ञ (प्राक-यज्ञ=प्रयाग: सप्तर्षियों की प्राप्ति के लिए ब्रह्मा दारा किये गए सप्तर्षि प्रकृष्टा यज्ञ) के। जय हिन्द(जम्बूद्वीप=यूरेसिआ=यूरोप+एशिया=या कम से कम ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्या कुमारी), जय भारत(भरतखंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/श्रीकृष्ण।


सा विद्या या विमुक्तये | That is knowledge which liberates(विद्या वह है जो हमें में अज्ञानता के बंधन से मुक्त करे या हमें आत्मनिर्भर बना स्वराज दे)। तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये। आयासायापरं कर्म विद्यऽन्या शिल्पनैपुणम्॥१-१९-४१॥ —श्रीविष्णुपुराणे प्रथमस्कन्धे एकोनविंशोऽध्यायः। That is action, which does not promote attachment; That is knowledge which liberates (one from bondage). All other action is mere (pointless) effort/ hardship or all other knowledge is merely another skill/craftsmanship|

सा विद्या या विमुक्तये | That is knowledge which liberates(विद्या वह है जो हमें में अज्ञानता के बंधन से मुक्त करे या हमें आत्मनिर्भर बना स्वराज दे)।  तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये। आयासायापरं कर्म विद्यऽन्या शिल्पनैपुणम्॥१-१९-४१॥ —श्रीविष्णुपुराणे प्रथमस्कन्धे एकोनविंशोऽध्यायः।  That is action, which does not promote attachment; That is knowledge which liberates (one from bondage). All other action is mere (pointless) effort/ hardship or all other knowledge is merely another skill/craftsmanship|

इस दुनिया में बिना कुछ दिए भीख भी नहीं मिलाती और माँगने पर मौत भी नहीं मिलाती है वरन भींख के बदले दुआ आप स्वयं दो या न दो पर भीख जो देता है दुआ उसको आप से अपने आप मिल ही जाती है; और आप अपने दुर्दिन से खिन्न हो मौत भी ईस्वर से मांगते हैं तो वह तभी मिलाती है जब आप के पूर्व और इस जन्म के पाप कट जाते है आप की दीन-हीन दशा और कास्ट सहने से(बिना पूर्व जन्म के पाप काटे सुदामा को भी अपने मित्र भगवान श्रीकृष्ण के यहां जाने को सुशीला भी प्रेरित न कर सकी यह जानते हुए भी की श्रीकृष्ण और सुदामा में बहुत ही गहरी दोस्ती है): तो इन 42 महानुभाव में कुछ दम और सामजिक और वैज्ञानिक योगदान नजर आया ही होगा जो इनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय का गौरवशाली पुराछात्रों में स्थान दिया था सम्बंधित लोगों ने: Allahabad University Alumni Association (AUAA), Registered Under Society Act 1860 (Reg. no. 407/2000), Alumni Chapter- NCR Ghaziabad (Greater Noida): 2007-2008. Famous alumni include: Our Proud Past Prof. Prem Chand Pandey (Dr, P.C. Pandey, SAC/ISRO,NCAOR/MoES, CORAL/IIT Kgp): Founder Director of National centre for Antarctic and Ocean Research (NCAOR), Goa, 1st student of University of Allahabad who got Bhatnagar award and Uttar Pradesh Vigyan Gaurav award along with many other award of science, he got Gold medal award of NASA, USA for his short span of time good work there as ISRO, Govt. of India employ on training. His help for new scientific centres in UoA indirectly is very important and was at exact turning period of university's future vision in modern era. KBCAOS/MNCOSS, IIDS is one of the on surface example known by all related with UoA. Ram Chandra Sinha, Former IAS Officer, Former Secretary to the Chief Minister of Bihar, Chairman of the Patna Improvement Trust, Divisional Commissionor (Bhaglpur), Commissioner (Agriculture, Education), Sub Divisional Officer, District Magistrate, founder of the Sudha Co-Operative, now Senior Advocate. Harivansh Rai Bachchan, Poet Krishna Prakash Bahadur, Author H.N. Bahuguna, former Deputy Prime Minister of India Prof. Harish Chandra, Mathematician Acharya Narendra Dev Mohammad Hidayatullah, Former Chief Justice, Supreme Court of India Ranganath Mishra, former Chief Justice of India Gulzari Lal Nanda, former Prime Minister of India Motilal Nehru Govind Ballabh Pant Prof. Govind Jee. Prof. University of Illinois, Former head- International society for Photobiology. Gopal Swarup Pathak, former Vice President of India Dr V.K.Rai, Plant physiology Dr. Shankar Dayal Sharma, Former President of India Chandra Shekhar, Former Prime Minister of India Satyendra Narayan Sinha, Former Chief Minister of Bihar Prof. Ram Chandra Shukla, Painter. Surya Bahadur Thapa Prof. Vijai K Tripathi Kamal Narain Singh, former Chief Justice of India Nikhil Kumar, former IPS, Member of Parliament India Prof. Daulat Singh Kothari, Physicist Prof. Kundan Singh Singwi, Physicist Prof. Govind Swarup, Physicist Udit Raj, Social Activist Pankaj Mishra, Author Krishna Kumar Sharma, Quit India Movement Leader and Activist, Prominent Poet and Literary Figure Vishwanath Pratap Singh,10th Prime Minister of India Murli Manohar Joshi,B.J.P leader and former Minister for Human resource&development Dharmendra Singh Yadav , Member of Parliament India Radhey Shyam Sharma, IPS, Former Director Vigilance UP Maharishi Mahesh Yogi Dhananjaya Kumar, Yogacharya, Poet Mahadevi Varma (poet and writer) Mukhtar Zaman, freedom fighter, leading journalist Dr Umesh C Yadav, Research scientist, Univ of Texas, USA Indu Kant Shukla, Litterateur,Poet,Writer. Prafulla Kumar Rai, MP for Gorakhpur (Uttar Pradesh) D.P. Chandel, equity researcher (New york, USA) Dr. Vivek Kumar Pandey PDF at Centre for Atmospheric & Oceanic Sciences, IISc Bangalore, 1st doctorate from K.Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies(KBCAOS,IIDS), University of Allahabad(UoA), Allahabad and (1st batch JRF of National Centre for Antarctic and Ocean Research (NCAOR), Goa,Master of Science Department of Physics(Nuclear)-2000, BHU, Varanasi, B.Sc. from Purvanchal University, Jaunpur (U.P.) Contact: ALLAHABAD UNIVERSITY ALUMNI ASSOCIATION IIND FLOOR, III-B-1, NEHRU NAGAR GHAZIABAD- 201001 Phone: 0120 – 2792976 References from NEWS Papers: Article: A silent crusader who is making efforts to restore AU's past glory Article from: The Hindustan Times Article date: August 26, 2005 NEW DELHI, India, Aug 26 -- SIX YEARS back, when the demand of giving Central Status to Allahabad University was gathering momentum, one man had alreadylaunched a silent crusade to restore the past glory of 'Oxford of the East' to make the whole world know about the 'powerful' men, which the university has produced till date. It was an extraordinary effort of Naveen Chandra, a bank employee, that led to the formation of Allahabad University Alumni Association in Ghaziabad. The Association boasts of 500 members, including Mumbai Commissioner of Police AN Roy, SBI Chairman AK Purwar, Ex-Delhi Police Chief Ajay Raj Sharma and former Defence Secretary Dr Yogendra Narain, who at some Article: Alumni relive those golden' glorious days Article from: The Hindustan Times Article date: February 18, 2008 Smriti Malaviya Hindustan Times NEW DELHI, India, Feb. 18 -- THE ALUMNI Convention at Allahabad University (AU) was more of an emotional and happy reunion of former students, than an event glorifying the past achievements of the varsity. The event gave an opportunity to former students and inmates of AU hostels to share their wonderful moments, which they spent at the university, with the new generation. Talking with HT Allahabad Live, two former inmates of Sir Sunder Lal Hostel who have come from Ghaziabad and Noida, admitted that the time spent at the university was the 'golden' period of their life. DK Singh 'Dadda' 'The time I spent at SSL Hostel was Article: AU alumni meet in Ghaziabad in October Article from: The Hindustan Times Article date: August 2, 2006 NEW DELHI, India, Aug 2 -- ALLAHABAD UNIVERSITY (AU) vice-chancellor Prof RG Harshe will participate in a conference to be hosted by the AU Alumni Association (AUAA) Ghaziabad and Noida chapter, at Ghaziabad in October. An AUAA delegation met Prof Harshe recently at his residence and invited him to the conference. AUAA founding secretary Naveen Chandra and PN Tandon also informed Prof Harshe about the activities carried out by the association in Ghaziabad and adjoining areas. According to Chandra, AUAA had been successful in marking it presence through social and cultural activities in Ghaziabad and the entire National Capital Region. The activities included hosting cricket


Tuesday, April 8, 2014

अवध वह संस्कृति, संस्कार, स्वाभाव, सभ्यता, देह(शरीर), स्थान, राज्य और देश है जिसका वध हो ही नहीं सकता है और ऐसी पूर्णता केवल और केवल अवधेश "मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम" ही दे सकते हैं और मुझे आशा है कि शीघ्र ही पूरा विश्व अवधेशमय होगा। अतः मै भी उसी श्रेणी में एक क्रम पुनः बढ़ा चुका हूँ कि बस्ती (अवध का एक जनपद)) मूल निवाशी मेरे बाबा शारंगधर(शारंग मतलब चन्द्रमा तो शारंगधर का अभिप्राय शिव भगवान् है और शिव ही अपने आराध्य या ईस्वर "मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम" को ध्यान में रखते हुए किशी मुस्लिम जमींदार द्वारा दान में पायी हुई जमीन का नाम रामापुर अति सम्भावित रूप से रखेगा) थे ही और मेरा स्वयं का भी पारिवारिक रिस्ता सुल्तानपुर(अवध का एक जनपद) में ही हुआ है। मेरा आशय केवल इतना नहीं कि सब लोग अवध से ही सम्बन्ध बना लीजिये पर स्वयं अपने और अपने परिजन के सामूहिक कर्मों से अपनी सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, स्वाभाव, देह(शरीर), स्थान, राज्य और देश को अवध बनाते हुए पूरे विश्व को अवध बनाये।जय हिन्द(जम्बूद्वीप=यूरेसिआ=यूरोप+एशिया=या कम से कम ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्या कुमारी), जय भारत(भरतखंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/श्रीकृष्ण।


Monday, April 7, 2014

=====राम वन्दना===== आपदामपहर्तारं दातारां सर्वसम्पदाम्। लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो-भूयो नामाम्यहम्॥१॥ रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय मानसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥२॥ नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम। पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम॥३॥ (गोस्वामी तुलसीदासकृत रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, श्लोक ३) 1. Aapadaam Aphartaaram Daataaram Sarv Sampadaam Lok Abhiraamam Shri Raamam Bhooyo-Bhooyo Namaamyaham Who removes all dangers, who is the giver of all wealth By looking at whom, the world feel pleased, to that Sree Ram, I bow again and again 2. Raamaay Raambhadraay Raamchandraay Maanase Raghunaathaay Naathaay Seethayaah Pataye Namah I bow down to him whom I know as Ram, Rambhadra, Ramchandra, Raghunaath, Naath( My over Lord) and husband of mother Seeta. 3. Neelaambuj Shyaamal Komalaangam Sita Samaro Pitvaam Bhaagam Paanau Mahaasaayak Chaaru chaapam Namaami Raamam Raghuvansh Naatham Whose body has the colour of a blue lotus and grey, whose body parts are soft On whose left side resides Sita. Who has a transcendental arrow and a beautiful bow in His hands. I pray to that Sri Ram who is the Lord of Raghu dynasty.


=====रामावतार===== भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥१॥ लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी। भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥२॥ कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता। माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥३॥ करुना सुखसागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता। सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥४॥ ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै। मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥५॥ उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै। कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥६॥ माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥७॥ सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा। यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥८॥ English transliteration 1. Bhaye pragat kripaala deen Dayaala Kaushalya hitkaari Harshit mahtaari muni man haari adbhut roop bichari 2. Lochan abhiraama tanu ghanshyaama nij aayudh bhuj chaari Bhushan banmaala nayan bisaala sobha sindhu kharaari 3. Kah dui kar jori astuti tori kehi bidhi karaun ananta Maya gun gyanaateet amaana bed puraan bhananta 4. Karuna sukh saagar sab gun aagar jehi gaavahin shruti santa So mam hit laagi jan anuraagi bhayau pragat shrikanta 5. Brahmaand nikaaya nirmit maaya rom-rom prati bed kahai Mam ur so baasi yah uphaasi sunat dheer mati thir na rahai 6. Upja jab Gyaana Prabhu musukaana charit bahut bidhi keenh chahai Kahi katha suhaaee Maathu bujhai jahi prakaar sut prem lahai 7. Maata puni boli so mati doli tajhun taat yah roopa Keejai sisu leela ati priy seela yah sukh param anoopa 8. Suni bachan sujaana rodan thaana hoi baalak sur bhoopa Yah charit je Gaavahin Hari pad paavahin te na parahin bhav koopa


सशङखचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्। सहारवक्ष:स्थलकौस्तिभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्।। शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्


विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्‌ मूलपाठः[सम्पाद्यताम्] ॐ सकलसौभाग्यदायकं श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्‌ ॥>>शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥१॥यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम्‌। विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये॥२॥व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम्‌। पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम्॥३॥व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे। नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः॥४॥अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने। सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे॥५॥यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात्। विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे॥६॥ ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे।श्रीवैशम्पायन उवाच --- श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः। युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत॥७॥ युधिष्ठिर उवाच --- किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्। स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्॥८॥ को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः। किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्॥९॥ भीष्म उवाच --- जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्। स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः॥१०॥ तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम्। ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च॥११॥ अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम्। लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत्॥१२॥ ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम्। लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम्॥१३॥ एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः। यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा॥१४॥ परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः। परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम्॥१५॥ पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम्। दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता॥१६॥ यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे। यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये॥१७॥ तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते। विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम्॥१८॥ यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः। ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये॥१९॥ ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः। छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः॥२०॥ अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः। त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियोज्यते॥२१॥ विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम्‌। अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमं॥२२॥ पूर्वन्यासः[सम्पाद्यताम्] श्रीवेदव्यास उवाच --- ॐ अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य॥श्री वेदव्यासो भगवान ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः। श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता। अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम्‌। देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः। उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः। शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम्। शार्ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम्। रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम्‌। त्रिसामा सामगः सामेति कवचम्। आनन्दं परब्रह्मेति योनिः। ऋतुः सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः॥ श्रीविश्वरूप इति ध्यानम्‌। श्रीमहाविष्णुप्रीत्यर्थं सहस्रनामजपे विनियोगः॥ अथ न्यासः[सम्पाद्यताम्] ॐ शिरसि वेदव्यासऋषये नमः।मुखे अनुष्टुप्छन्दसे नमः। हृदि श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः। गुह्ये अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजाय नमः। पादयोर्देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तये नमः। सर्वाङ्गे शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकाय नमः। करसंपूटे मम श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः॥ इति ऋषयादिन्यासः॥ अथ करन्यासः[सम्पाद्यताम्] ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः। अमृतांशूद्भवो भानुरिति तर्जनीभ्यां नमः। ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति मध्यमाभ्यां नमः। सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इत्यनामिकाभ्यां नमः। निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति कनिष्ठिकाभ्यां नमः। रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। इति करन्यासः॥ अथ षडङ्गन्यासः[सम्पाद्यताम्] ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इति हृदयाय नमः। अमृतांशूद्भवो भानुरिति शिरसे स्वाहा। ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति शिखायै वषट्। सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इति कवचाय हुम्। निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति नेत्रत्रयाय वौषट्। रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इत्यस्त्राय फट्। इति षडङ्गन्यासः॥ श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे विष्णोर्दिव्यसहस्रनामजपमहं करिष्ये इति सङ्कल्पः। अथ ध्यानम्[सम्पाद्यताम्] क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकतेर्मौक्तिकानां मालाकॢप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः। शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूष वर्षैः आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदा शङ्खपाणिर्मुकुन्दः॥१॥ भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे कर्णावाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः। अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवन वपुषं विष्णुमीशं नमामि॥२॥ ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥३॥ मेघश्यामं पीतकौशेयवासं श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम्। पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम्॥४॥ नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते। अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे॥५॥ सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् | सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥६॥ छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलंकृतम् | चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये॥७॥ स्तोत्रम्‌[सम्पाद्यताम्] ॥ हरिः ॐ ॥ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः। भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥ पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः। अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च॥२॥ योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः। नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः॥३॥ सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः। संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः॥४॥ स्वयंभूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः। अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः॥५॥ अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः। विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः॥६॥ अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः। प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम्॥७॥ ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः। हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः॥८॥ ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः। अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्॥९॥ सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः। अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः॥१०॥ अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः। वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः॥११॥ वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः। अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः॥१२॥ रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः। अमृतः शाश्वत स्थाणुर्वरारोहो महातपाः॥१३॥ सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः। वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः॥१४॥ लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः। चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः॥१५॥ भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः। अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः॥१६॥ उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः। अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः॥१७॥ वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः। अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः॥१८॥ महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः। अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक्॥१९॥ महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः। अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः॥२०॥ मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः। हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः॥२१॥ अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः। अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा॥२२॥ गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः। निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः॥२३॥ अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः। सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्॥२४॥ आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः संप्रमर्दनः। अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः॥२५॥ सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः। सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः॥२६॥ असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः। सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः॥२७॥ वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः। वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः॥२८॥ सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः। नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः॥२९॥ ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः। ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः॥३०॥ अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः। औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः॥३१॥ भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः। कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः॥३२॥ युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः। अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित्॥३३॥ इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः। क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः॥३४॥ अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः। अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः॥३५॥ स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः। वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः॥३६॥ अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः। अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः॥३७॥ पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत्। महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः॥३८॥ अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः। सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः॥३९॥ विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः। महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः॥४०॥ उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः। करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः॥४१॥ व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः। परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः॥४२॥ रामो विरामो विरजो (or विरतो) मार्गो नेयो नयोऽनयः। वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः॥४३॥ वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः। हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः॥४४॥ ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः। उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः॥४५॥ विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्। अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः॥४६॥ अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः। नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः॥४७॥ यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः। सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम्॥४८॥ सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत्। मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः॥४९॥ स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्। वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः॥५०॥ धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्। अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः॥५१॥ गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः। आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः॥५२॥ उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः। शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः॥५३॥ सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः। विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्त्वतांपतिः॥५४॥ जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः। अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः॥५५॥ अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः। आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः॥५६॥ महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः। त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत्॥५७॥ महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी। गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः॥५८॥ वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणोऽच्युतः। वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः॥५९॥ भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः। आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः॥६०॥ सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः। दिवःस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः॥६१॥ त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक्। संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्॥६२॥ शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः। गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः॥६३॥ अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः। श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः॥६४॥ श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः। श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः॥६५॥ स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः। विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः॥६६॥ उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः। भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः॥६७॥ अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः। अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः॥६८॥ कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः। त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः॥६९॥ कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः। अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनंजयः॥७०॥ ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः। ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः॥७१॥ महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः। महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः॥७२॥ स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः। पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः॥७३॥ मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः। वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः॥७४॥ सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः। शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः॥७५॥ भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः। दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः॥७६॥ विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान्। अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः॥७७॥ एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम्। लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः॥७८॥ सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः॥७९॥ अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक्। सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः॥८०॥ तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः। प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः॥८१॥ चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः। चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात्॥८२॥ समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः। दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा॥८३॥ शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः। इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः॥८४॥ उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः। अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी॥८५॥ सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः। महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः॥८६॥ कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः। अमृतांशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः॥८७॥ सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः। न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः॥८८॥ सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः। अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः॥८९॥ अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान्। अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः॥९०॥ भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः। आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः॥९१॥ धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः। अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः॥९२॥ सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः। अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः॥९३॥ विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः। रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः॥९४॥ अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः। अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः॥९५॥ सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः। स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः॥९६॥ अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः। शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः॥९७॥ अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः। विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः॥९८॥ उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः। वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः॥९९॥ अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः। चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः॥१००॥ अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः। जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः॥१०१॥ आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः। ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः॥१०२॥ प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः। तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः॥१०३॥ भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः। यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः॥१०४॥ यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुक् यज्ञसाधनः। यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च॥१०५॥ आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः। देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः॥१०६॥ शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः। रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः॥१०७॥ सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति। वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी। श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु॥१०८॥ श्री वासुदेवोऽभिरक्षतु ॐ नम इति। उत्तरन्यासः[सम्पाद्यताम्] भीष्म उवाच --- इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः। नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम्॥१॥ य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत्। नाशुभं प्राप्नुयात्किंचित्सोऽमुत्रेह च मानवः॥२॥ वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत्। वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात्॥३॥ धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात्। कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाम्॥४॥ भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः। सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत्॥५॥ यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च। अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥६॥ न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति। भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः॥७॥ रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात्। भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः॥८॥ दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम्। स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः॥९॥ वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः। सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम्॥१०॥ न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्। जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते॥११॥ इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः। युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः॥१२॥ न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः। भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे॥१३॥ द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः। वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः॥१४॥ ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम्। जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम्॥१५॥ इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः। वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च॥१६॥ सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते। आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः॥१७॥ ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः। जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम्॥१८॥ योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्याः शिल्पादि कर्म च। वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात्॥१९॥ एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः। त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः॥२०॥ इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम्। पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च॥२१॥ विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम्। भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम्॥२२॥ न ते यान्ति पराभवम ॐ नम इति। अर्जुन उवाच --- पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम। भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन॥२३॥ श्रीभगवानुवाच --- यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव। सोऽहमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः॥२४॥ स्तुत एव न संशय ॐ नम इति। व्यास उवाच --- वासनाद्वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम्। सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते॥२५॥ श्री वासुदेव नमोऽस्तुत ॐ नम इति। पार्वत्युवाच --- केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम। पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो॥२६॥ ईश्वर उवाच --- श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने॥२७॥ श्रीरामनाम वरानन ॐ नम इति। ब्रह्मोवाच --- नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे। सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटि युगधारिणे नमः॥२८॥ सहस्रकोटि युगधारिणे ॐ नम इति। सञ्जय उवाच --- यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥२९॥ श्रीभगवानुवाच --- अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥३०॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥३१॥ आर्ताः विषण्णाः शिथिलाश्च भीताः घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः। संकीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्तु॥३२॥ कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात्। करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि॥३३॥ इति श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ ॥ॐ तत्सदिति ॥ उपसंहारश्लोकाः[सम्पाद्यताम्] ॐ आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्। लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥ आर्तानामार्तिहन्तारं भीतानां भीतिनाशनम्। द्विषतां कालदण्डं तं रामचन्द्रं नमाम्यहम्॥ नमः कोदण्डहस्ताय सन्धीकृतशराय च। खण्डिताखिलदैत्याय रामायापन्निवारिणे॥ रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥ अग्रतः पृष्ठतश्चैव पार्श्वतश्च महाबलौ। आकर्णपूर्णधन्वानौ रक्षेतां रामलक्ष्मणौ॥ सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा। गच्छन्ममाग्रतो नित्यं रामः पातु सलक्ष्मणः॥ अच्युतानन्तगोविन्द नामोच्चारणभेषजात्। नश्यन्ति सकला रोगास्सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ सत्यं सत्यं पुनस्सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते। वेदाच्छास्त्रं परं नास्ति न देवं केशवात्परम् ॥ शरीरे जर्झरीभूते व्याधिग्रस्ते कलेवरे। औषधं जाह्नवीतोयं वैद्यो नारायणो हरिः॥ आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः। इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणो हरिः ॥ यदक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं तु यद्भवेत्। तत्सर्व क्षम्यतां देव नारायण नमोऽस्तु ते ॥ विसर्गबिन्दुमात्राणि पदपादाक्षराणि च। न्यूनानि चातिरिक्तानि क्षमस्व पुरुषोत्तम ॥ पर्यायोपसंहारश्लोकाः[सम्पाद्यताम्] नमः कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने। नमस्ते केशवानन्त वासुदेव नमोऽस्तुते॥ नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च। जगद्धिताय कृष्णाय गोविंदाय नमो नमः॥ आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्। सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति॥ एष निष्कंटकः पन्था यत्र संपूज्यते हरिः। कुपथं तं विजानीयाद् गोविन्दरहितागमम्॥ सर्ववेदेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम्। तत्फलं समवाप्नोति स्तुत्वा देवं जनार्दनम्॥ यो नरः पठते नित्यं त्रिकालं केशवालये। द्विकालमेककालं वा क्रूरं सर्वं व्यपोहति॥ दह्यन्ते रिपवस्तस्य सौम्याः सर्वे सदा ग्रहाः। विलीयन्ते च पापानि स्तवे ह्यस्मिन् प्रकीर्तिते॥ येने ध्यातः श्रुतो येन येनायं पठ्यते स्तवः। दत्तानि सर्वदानानि सुराः सर्वे समर्चिताः॥ इह लोके परे वापि न भयं विद्यते क्वचित्। नाम्नां सहस्रं योऽधीते द्वादश्यां मम सन्निधौ॥ शनैर्दहन्ति पापानि कल्पकोटिशतानि च। अश्वत्थसन्निधौ पार्थ ध्यात्वा मनसि केशवम्॥ पठेन्नामसहस्रं तु गवां कोटिफलं लभेत्। शिवालये पठेनित्यं तुलसीवनसंस्थितः॥ नरो मुक्तिमवाप्नोति चक्रपाणेर्वचो यथा। ब्रह्महत्यादिकं घोरं सर्वपापं विनश्यति॥ विलयं यान्ति पापानि चान्यपापस्य का कथा। सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥ ॥हरिः ॐ तत्सत्॥


Shri Ram Navami-Vijay Dashmi-Shri Krishna Janmastami are top most Parv of India| मेरे मित्रजन और गुरुजन मै आप सभी को सूचित चाहता हूँ कि मै भगवान् श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों को सांसारिक परमब्रह्म मानता हूँ पर 30 सितम्बर 2010 कि सुबह 5-11 पर जन्म लिए अपने पुत्र नाम विष्णुकांत इसी लिए रखा कि विष्णु को निरूपित करते हुए यह त्रिदेवों को भी निरूपित कान्त शब्द कि वजह से और वह अपने में ही श्रीराम/श्रीकृष्ण हो जाएगा। राममंदिर के पक्षा में फैसला उसी दिन में दोपहर के बाद आया था उसके जन्म लेने के बाद पर श्रीराम नाम इस लिए नहीं रखा क्योंकि मेरे डॉटर राम जी चाचा जिनका ननिहाल भी रामनगर-जौनपुर में हैं मेरे घर में पहले से जन्म ले चुके थे उसी घर में जहां अब भी मेरा घर है रामपुर-आजमगढ़ गाँव मे। इस लिए जन्मास्टमी (28-08-2013) को जब द्वितीय का जन्म हुआ तो मै कृष्णकांत नाम रखा |


मेरे मित्रजन और गुरुजन मै आप सभी को सूचित चाहता हूँ कि मै भगवान् श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों को सांसारिक परमब्रह्म मानता हूँ पर 30 सितम्बर 2010 कि सुबह 5-11 पर जन्म लिए अपने पुत्र नाम विष्णुकांत इसी लिए रखा कि विष्णु को निरूपित करते हुए यह त्रिदेवों को भी निरूपित कान्त शब्द कि वजह से और वह अपने में ही श्रीराम/श्रीकृष्ण हो जाएगा। राममंदिर के पक्षा में फैसला उसी दिन में दोपहर के बाद आया था उसके जन्म लेने के बाद पर श्रीराम नाम इस लिए नहीं रखा क्योंकि मेरे डॉटर राम जी चाचा जिनका ननिहाल भी रामनगर-जौनपुर में हैं मेरे घर में पहले से जन्म ले चुके थे उसी घर में जहां अब भी मेरा घर है रामपुर-आजमगढ़ गाँव मे। इस लिए जन्मास्टमी (28-08-2013) को जब द्वितीय का जन्म हुआ तो मै कृष्णकांत नाम रखा |


प्रथम गुरु बचपन से लेकर स्नातक तक, भानु प्रताप मिश्र मामा जो तिरंगा/त्रिमूर्ति/त्रिदेव से महत्तम प्रेम करते थे और विजयी विश्व तिरंगा प्यारा को समाज में सत्य कर दिखलाने कि दिए थे वे दिल्ली/दिलीपपुर/इंद्रपस्थ के सत्य को समाज के सामने लाकर रघुवंश/इक्षाकुवांश/सूर्यवंश और पाण्डुवंश(कुरुवंश)/चन्द्रवंश को एक साथ एक मंच पर लाने से इस विश्व में पूर्ण गुरु का गौरव प्राप्त किये। यह बता है कि सूर्यवंश में दिल्ली(दिलीपपुर) से ही कुश के उत्तराधिकारी हिन्दू कुश तक शासन करते थे। श्रद्धेय श्री गुरुजन प्राथमिक पाठशाला से( शून्य कक्षा) राजेंद्र यादव(बिशुनपुर-जौनपुर) ; कक्षा 1-4 तक रामपुर-आज़मगढ़) धनराज हरिजन; कक्षा 2 ) रमेश चन्द्र मिश्रा; कक्षा 3 ) मौर्या गुरु जी जिनको चुनकी वाले पंडित जी हम कहते थे; कक्षा 4 ) उदय राज यादव (उत्तर प्रदेश सरकार में कई बार कैबिनेट मिनिस्टर रहे माननीय लक्ष्मी शंकर यादव के सगे रिस्तेदार; और लक्ष्मी शंकर के मेरे नाना के परिवार का गहरा सम्बन्ध था अतः वे मुझसे कहते थे मजाक में कि मै आप का मौसा हूँ; और मेरे नाना का लक्ष्मी शंकर से ऐसा सम्बन्ध था भी); कक्षा 5:बिशुनपुर-जौनपुर) पंडित राजकिशोर दुबे-जगदीश मिश्रा-राम मिलन केवट-ठाकुर प्रसाद यादव-शिव कुमार यादव( माननीय लक्ष्मी शंकर यादव के सगे भाई )व् एक बहन जी बहन जी (पर जो गाँव के पद में नानी लगती हैं: माननीय लक्ष्मी शंकर यादव के चचेरे भाई कि धर्म पत्नी)।--------------- इसके बाद (जूनियर हाई लेकर हाई स्कूल,इंटरमीडिएट, स्नातक,परास्नातक, शोध, पराशोध) पर आप सभी यह आरोप लगा देंगे कि गुरुकुल हैं तो कुछ रहा। किनकी यहाँ पहुंचकर में इस्लाम को रामाश्रयी के और ईसाइयत को कृष्णाश्रयी के सामानांतर बता चुका हूँ वस् गाय, गंगा, गौरी और गायत्री के प्रति आस्था और विश्वाश में भिन्नता के साथ । कारन यह है कि इस्लाम और ईसाइयत जिस जलवायु में जन्म लिए वहाँ कि परिश्थिति में इनके प्रति श्रध्धा और विश्वाश बनाये रखना आम जीवन में सम्भव नहीं था। जय हिन्द(जम्बूद्वीप=यूरेसिआ=यूरोप+एशिया=या कम से कम ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्या कुमारी), जय भारत(भरतखंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/श्रीकृष्ण।

प्रथम गुरु बचपन से लेकर स्नातक तक, भानु प्रताप मिश्र मामा जो तिरंगा/त्रिमूर्ति/त्रिदेव से महत्तम प्रेम करते थे और विजयी विश्व तिरंगा प्यारा को समाज में सत्य कर दिखलाने कि दिए थे वे दिल्ली/दिलीपपुर/इंद्रपस्थ के सत्य को समाज के सामने लाकर रघुवंश/इक्षाकुवांश/सूर्यवंश और पाण्डुवंश(कुरुवंश)/चन्द्रवंश को एक साथ एक मंच पर लाने से इस विश्व में पूर्ण गुरु का गौरव प्राप्त किये। यह बता है कि सूर्यवंश में दिल्ली(दिलीपपुर) से ही कुश के उत्तराधिकारी हिन्दू कुश तक शासन करते थे।
श्रद्धेय श्री गुरुजन प्राथमिक पाठशाला से( शून्य कक्षा) राजेंद्र यादव(बिशुनपुर-जौनपुर) ; कक्षा 1-4 तक रामपुर-आज़मगढ़) धनराज हरिजन; कक्षा 2 ) रमेश चन्द्र मिश्रा; कक्षा 3 ) मौर्या गुरु जी जिनको चुनकी वाले पंडित जी हम कहते थे; कक्षा 4 ) उदय राज यादव (उत्तर प्रदेश सरकार में कई बार कैबिनेट मिनिस्टर रहे माननीय लक्ष्मी शंकर यादव के सगे रिस्तेदार; और लक्ष्मी शंकर के मेरे नाना के परिवार का गहरा सम्बन्ध था अतः वे मुझसे कहते थे मजाक में कि मै आप का मौसा हूँ; और मेरे नाना का लक्ष्मी शंकर से ऐसा सम्बन्ध था भी); कक्षा 5:बिशुनपुर-जौनपुर) पंडित राजकिशोर दुबे-जगदीश मिश्रा-राम मिलन केवट-ठाकुर प्रसाद यादव-शिव कुमार यादव( माननीय लक्ष्मी शंकर यादव के सगे भाई )व् एक बहन जी बहन जी (पर जो गाँव के पद में नानी लगती हैं: माननीय लक्ष्मी शंकर यादव के चचेरे भाई कि धर्म पत्नी)।---------------

इसके बाद (जूनियर हाई लेकर हाई स्कूल,इंटरमीडिएट, स्नातक,परास्नातक, शोध, पराशोध) पर आप सभी यह आरोप लगा देंगे कि गुरुकुल हैं तो कुछ रहा। किनकी यहाँ पहुंचकर में इस्लाम को रामाश्रयी के और ईसाइयत को कृष्णाश्रयी के सामानांतर बता चुका हूँ वस् गाय, गंगा, गौरी और गायत्री के प्रति आस्था और विश्वाश में भिन्नता के साथ । कारन यह है कि इस्लाम और ईसाइयत जिस जलवायु में जन्म लिए वहाँ कि परिश्थिति में इनके प्रति श्रध्धा और विश्वाश बनाये रखना आम जीवन में सम्भव नहीं था। जय हिन्द(जम्बूद्वीप=यूरेसिआ=यूरोप+एशिया=या कम से कम ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्या कुमारी), जय भारत(भरतखंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/श्रीकृष्ण।

१) कुमार वह है जो कुमति को मारे या नाश करे; २) कुमार वह है जो काम और कामदेव को मात दे या कामदेव से भी सुन्दर हो; ३) वह जो किशी सत्ता या कुल का उत्तराधिकारी हो। इसमे कुमार कि पहली परिभाषा कुमार को विवेक का समानार्थक बना देती है इस प्रकार विवेक कुमार अपने में ही विवेक वर्ग(स्क्वायर) हो गया।


शिव (केदारेश्वर) के शिखर पर सुशोभित द्वितीया का चन्द्रमा क्या त्रिनेत्र:विवेक के बड़ा शिवांश और शिवपयोगी और समाज हितकारी है? जानकारी के लिए द्वितीया का चन्द्रमा है जबकि त्रिनेत्र:विवेक आतंरिक शक्ति है शिव का जो हर प्रकार के आहारी विहारी( भ्रमण स्थल) शिव को काम के वशीभूत नहीं होने देता है और इस प्रकार उनको जाग्रत अवस्था में रखता है।


फिर प्रश्न यह कि भगवान् परशुराम ने कश्यप ऋषि के व्यक्तित्व में क्या पाया जब केरल में भेंट हुई जिससे कि वे अपनी सम्पूर्ण जीती हुई जमीन का स्वामित्व उनको दे वे उत्तराँचल कि पहाड़ियों पर चले गए। निश्चित रूप से उनको कश्यप ऋषि में अपने गुरु शिव के दर्शन हुए होंगे क्योंकि कश्यप ऋषि और शिव साढू भाई थे मतलब सती(पारवती) कि बहन थी कश्यपऋषि कि सभी पत्नियां(ब्रह्मा के पुत्र दक्षप्रजापति कि शेष पुत्रिया) या कहिये कि स्वयं सटी(पारवती) के जीजा थे कश्यप ऋषि|


Saturday, April 5, 2014

ब्रह्मा, विष्णु और महेश ये अजन्मा हैं अतः इन्हे माधव(जो जन्म और मृत्यु से परे हो) कहते हैं यह जरूर है कि के परम ब्रह्मा परमेश्वर के अंश जरूर हैं। सामान्यतः विष्णु के लिए ही लोग प्रयोग क्यों न करें पर यह तीनों के लिए सम्बोधन हो सकता है। और ये तीन ऐसे हैं जिनको पाने के लिए सरस्वती, लक्ष्मी और पारवती स्वयं तप करती हैं न कि ये किशी को पाने का प्रयाश करते हैं। अतः जिसमे ब्रह्मा, विष्णु और महेश का महत्तम गुण विद्यमान है उसके लिए सरस्वती, लक्ष्मी और पारवती जैसी प्रतिव्रता और सती स्वयं ही प्रथम प्रयास करती हैं (इसमे कोई संदेह हो ही नहीं सकता: जोड़ी बनने जाने पर परस्पर एक दूसरे से अकाट्य प्रेम भले हो) और यही स्थिति श्रीराम और सीता तथा श्रीकृष्ण राधा/रुक्मणि के बीच भी होती है।


अगर यही लोक तंत्र था हमें पागलखानदान, संसार का क्षुद्रतम और दरिद्र और दरिंदा शिद्ध करने का निरर्थक प्रयाश कर रहा था तो वह यह भी सुन ले कि मै इसी लोक तंत्र के नियम को तोड़कर इस प्रयाग विश्व विद्यालय में आना चाहता तो आ जाता कोई रोक नहीं सकता था। कारन कि यह सत्यमेव जयते नहीं असत्यमेव जयते कि तरफ अग्रसारित था।

हम प्रयागराज/अल्लाहाबाद विश्वविद्यालय के नेहरू विज्ञान केंद्र के केदारेश्वर बनेर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्धयन केंद्र में शिक्षक है और लोग पूंछते हैं नेहरू मतलब क्या होता है: मै कहता हूँ कि जो बच्चन का मतलब जानता है और नेह का मतलब जनता है वह नेहरू का मतलब जान जाएगा। पर मै नेहरू जी को सार्वत्रिक और विश्व व्यापक श्रीकृष्ण कह चुका हूँ और मोहनदास (कृष्ण) करमचंद गांधी को आधुनिक युग का राम और वल्लभ(कृष्ण) भाई पटेल को हनुमान तो आप समझ गये होंगे कि नेह का जो ईस्वर है वह 1st भगवान् शिव, और 2nd श्रीराम/कृष्ण हैं। अब आप सभी कि समझ में नेहरू और बच्चन का मतलब पता हो गया होगा। नेहरू मतलब जो नेह करने वाला हो(प्रेमी ह्रदय ह्रदय वाला हो, नहर और नदी और समुद्र नहीं ) और बच्चन का मतलब बच्चा मतलब पुत्र को प्रेम से बच्चन कहते हैं।


मित्रों एक समय ऐसा था इस प्रयाग विश्व विद्यालय में जब इस पर दक्षिण का ऐसा (पूरा) कब्जा था और भाजपा सरकार 2004 में जा चुकी थी: मै स्वयं विष पान करने वाला, स्वम कुरमावतारी विष्णु, स्वयं सुमेरु(मंदिराचल), स्वयं वासुकि(सर्पराज जो शिव के गले में रहता है और जिसे पकड़कर मंथन हो रहा था) और यह युक्ति जिसकी थी वह मेरे बड़े पिता "प्रेम=सार्वत्रिक शिव" पर समुद्र मंथन के अमृत, रत्न और कल्प तरु (अल्लाहाबाद विश्व विद्यालय के नए केन्द्रों के लिए मांगे गए पद) आने से पूर्व जोशी जी(योग योगेश्वर श्रीकृष्ण) के प्रयाग विश्वविद्यालय के सब भक्त अपने आप समुद्र मंथन बंद कर दिए। और हाँथ पर हाँथ धरे रहे उस स्थिति में मनमोहन(श्रीकृष्ण) के दो महारथियों के रथ को रोककर प्रयाग विश्व विद्यालय में कल्पतरु भेजने को जो बाध्य करने का साहस किया (D.Phil मिले न मिले निष्कासन हो न हो अब अंतिम अस्त्र ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर ही लिये जाय) जो किया था वह प्रदीप और पुष्पा का ही पुत्र था जिसने अपने ताऊ जी के जोशी जी को किये दिए वादे पूरा करने के लिए इनको बाध्य कर दिया।मई जो लिखा रहा हूँ वह अमृत है और उसका प्रभाव जिस नयी पीढ़ी पर हो रहा है समाज में वह रत्न है। ---------उसके स्वयं के नाना (श्रद्धेय रमानाथ मिश्रा) एक कांग्रेसी थे और नानी ब्रह्मादेवी(सरस्वती) के मायके के मेरे पर मामा का सम्पूर्ण परिवार कांग्रेसी है जिसका गवाह यह सम्पूर्ण प्रतापगढ़ (अवध का वह छोर जो प्रयागराज से लगा है); प्रयागराज; और इंद्रपस्थ(दिलीपपुर=दिल्ली) है।------जिसने इंदिरा(नाम का अर्थ है लक्ष्मी लेकिन बाद में बन गयी दुर्गा) के आदेश का नैनी जेल में अवहेलना कि वे मेरे छोटे नाना पारशनाथ(शिवा) और नानी कैलाशी(पारवती) का पूरा परिवार जनसंघ/भाजपा था। और ये मेरे छोटे नाना जी तर्क-वितरक में मेरे स्वयं के नाना मतलब रमानाथ(विष्णु) से पीछे हो जाते थी और कभी सामने नहीं आते थे किशी वैचारिक मतभेद के बावजूद। --शायद राज यह मेरे प्रयागराज विश्वविद्यालय के कुलगुरु जो चितगुप्त वंशीय है और प्रतापगढ़ में मूल निवाशी है उनको भी न पता पता रहा हो जो "है तुम्हारे हवाले वतन साथियों" कह कर हमें दूर से आशीर्वाद दे रहे थे इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ध्यन केंद्र को छोड़कर।

मित्रों एक समय ऐसा था इस प्रयाग विश्व विद्यालय में जब इस पर दक्षिण का ऐसा (पूरा) कब्जा था और भाजपा सरकार 2004 में जा चुकी थी: मै स्वयं विष पान करने वाला, स्वम कुरमावतारी विष्णु, स्वयं सुमेरु(मंदिराचल), स्वयं वासुकि(सर्पराज जो शिव के गले में रहता है और जिसे पकड़कर मंथन हो रहा था) और यह युक्ति जिसकी थी वह मेरे बड़े पिता "प्रेम=सार्वत्रिक शिव" पर समुद्र मंथन के अमृत, रत्न और कल्प तरु (अल्लाहाबाद विश्व विद्यालय के नए केन्द्रों के लिए मांगे गए पद) आने से पूर्व जोशी जी(योग योगेश्वर श्रीकृष्ण) के प्रयाग विश्वविद्यालय के सब भक्त अपने आप समुद्र मंथन बंद कर दिए। और हाँथ पर हाँथ धरे रहे उस स्थिति में मनमोहन(श्रीकृष्ण) के दो महारथियों के रथ को रोककर प्रयाग विश्व विद्यालय में कल्पतरु भेजने को जो बाध्य करने का साहस किया (D.Phil मिले न मिले निष्कासन हो न हो अब अंतिम अस्त्र ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर ही लिये जाय) जो किया था वह प्रदीप और पुष्पा का ही पुत्र था जिसने अपने ताऊ जी के जोशी जी को किये दिए वादे पूरा करने के लिए इनको बाध्य कर दिया।मई जो लिखा रहा हूँ वह अमृत है और उसका प्रभाव जिस नयी पीढ़ी पर हो रहा है समाज में वह रत्न है। ---------उसके स्वयं के नाना (श्रद्धेय रमानाथ मिश्रा) एक कांग्रेसी थे और नानी ब्रह्मादेवी(सरस्वती) के मायके के मेरे पर मामा का सम्पूर्ण परिवार कांग्रेसी है जिसका गवाह यह सम्पूर्ण प्रतापगढ़ (अवध का वह छोर जो प्रयागराज से लगा है); प्रयागराज; और इंद्रपस्थ(दिलीपपुर=दिल्ली) है।------जिसने इंदिरा(नाम का अर्थ है लक्ष्मी लेकिन बाद में बन गयी दुर्गा) के आदेश का नैनी जेल में अवहेलना कि वे मेरे छोटे नाना पारशनाथ(शिवा) और नानी कैलाशी(पारवती) का पूरा परिवार जनसंघ/भाजपा था। और ये मेरे छोटे नाना जी तर्क-वितरक में मेरे स्वयं के नाना मतलब रमानाथ (विष्णु) से पीछे हो जाते थी और कभी सामने नहीं आते थे किशी वैचारिक मतभेद के बावजूद।----------------शायद राज यह मेरे प्रयागराज विश्वविद्यालय के कुलगुरु जो चितगुप्त वंशीय है और प्रतापगढ़ में मूल निवाशी है उनको भी न पता पता रहा हो जो "है तुम्हारे हवाले वतन साथियों" कह कर हमें दूर से आशीर्वाद दे रहे थे इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ध्यन केंद्र को छोड़कर।

Friday, April 4, 2014

मुझे पता नहीं मेरे लिखने से क्या होगा पर मई किशी प्रतिशोध को के लिए नहीं वरन सबको ऐसे कार्यों से रोकना चाहता हूँ अन्यथा 21 वर्ष पहले कि बात यहाँ नहीं उठाता जबकि लोग ऐसे स्थान पर पहुँच गए हैं कि वहाँ ऐसी किशी पीछे का कोई महत्व नहीं रहा। पर यह जरूर है कि अगर आप शिक्षा क्षेत्र में आना चाहते हैं और जहां अंक माने रखते हैं वहा आप अपने से कम क्षमता वाले से पीछे रहे यह आप का मनोबल कम करता है। शायाद आज कुछ लोग इस अंकवाद को मार्क्सवाद का ही एक रूप मानते हैं और उसे प्रयोग में लाते हैं किशी का मनोबल बढ़ाने और घटाने के लिए जबकि उसकी वास्तविक क्षमता कुछ और ही होती है।----------------विवेक कुमार पाण्डेय, बलवंत सिंह, तेज प्रताप सिंह, सुभास यादव, ॐ प्रकाश यादव, संतोष दुबे, राजेश कुमार मिश्रा, सत्यदेव त्रिपाठी, अश्वनी सिंह(मौर्या), प्रदीप कुमार सिंह, और तीन महिला सहपाठी जो सम्भावित रूप (परोक्ष सूत्र) से गढ़वाल/उत्तराखंड/अविभाजित उत्तर प्रदेश में हुए परिक्षा कापी के मूल्यांकन में उत्तीर्ण हुए 80 छात्रों में सन 1993 कि इंटरमीडिएट कि परिक्षा में। इसमे से कम से कम 10 प्रथम श्रेणी कि योग्यता रखते थे चाहे स्वयं धर्मराज का ही शासन हो पर किशी राज्य के विभाजन को लेकर राजनैतिक वैमनस्यता यह कि केवल दो ही प्रथम श्रेणी कि सीमा भी छू सके। जबकि जो अनुत्तीर्ण हुए उनकी गिनती मै कर ही नहीं रहा हूँ । सायद यह उत्तराखंड को अलग राज्य बनाये जाने कि मांग का समय था और उत्तर प्रदेश में माननीय कल्याण सिंह के नेतृत्व में चल रही केयर टेकर कि सरकार थी (जिसमे माननीय राजनाथ सिंह जी शिक्षा मंत्री थे) राममंदिर के आंदोलन के कारन बर्खास्त भाजपा। ---------यह इस लिए संदेह उत्पन करता है क्योंकि जो बार-बार कक्षा में होने वाले मूल्यान्कन और प्रवेश परिक्षा में और हाई स्कूल कि परिक्षा में अच्छा किये हों और उसी कॉलेज में स्नातक में कम से कम 7 ने 70% के लगभग अंक पाया था जिस कालेज में रिकॉर्ड है कोई सर हिला ले। वे जेनेरल मूल्यांकन में ही आगे और पीछे हो और द्वितीय हो सकते हैं। यह सामूहिक मामला है इसीलिये मै इसे यहाँ उठा रहा हूँ किसी एक दो कि बात नहीं है। ---------मेरा निवेदन है भारतीय और विश्व समाज से कि कभी इस तरह का व्यवहार शिक्षा जैसे क्षेत्र में कभी नहीं करना चाहिए अगर यह राजनैतिक विद्वेष में किया गया जेनेरल मूल्यांकन रहा हो क्योंकि यह सामाजिक दुर्भावना उत्पन्न करता है पूरे उस समाज के लिए जहां के केवल 2-12 लोग इस तरह का कार्य किये होते हैं।---मुझे पता नहीं मेरे लिखने से क्या होगा पर मई किशी प्रतिशोध को के लिए नहीं वरन सबको ऐसे कार्यों से रोकना चाहता हूँ अन्यथा 21 वर्ष पहले कि बात यहाँ नहीं उठाता जबकि लोग ऐसे स्थान पर पहुँच गए हैं कि वहाँ ऐसी किशी पीछे का कोई महत्व नहीं रहा। पर यह जरूर है कि अगर आप शिक्षा क्षेत्र में आना चाहते हैं और जहां अंक माने रखते हैं वहा आप अपने से कम क्षमता वाले से पीछे रहे यह आप का मनोबल कम करता है। शायाद आज कुछ लोग इस अंकवाद को मार्क्सवाद का ही एक रूप मानते हैं और उसे प्रयोग में लाते हैं किशी का मनोबल बढ़ाने और घटाने के लिए जबकि उसकी वास्तविक क्षमता कुछ और ही होती है।

मेरे मन में ज़रा भी इस तरह का कलुष होता या प्रतिकार होता उत्तराखंड के प्रति तो  के सर मौर जोशी गुरुदेव का सहयोग  न करता यह तो केवल निवेदन है विश्व से न कि स्थानीय विशेस से। और भी कि मुझे पता है कि भृगु ऋषि द्वारा घर से निकले जेन पर केरला के बाद भगवान् परशुराम ने उत्तरांचल/उत्तराखंड कि पहाड़ियों पर शरण ली थी मन कि शांति के लिए दक्षिण का  सभी जीता हुआ क्षेत्र(केरल, कोंकण, महारास्त्र, विदर्भ, गुजरात और अन्य दक्षिण के भाग) कश्यप ऋषि को देकर। हांलाकि वे महाभारतकाल में पुनः  शश्त्र विद्या कि शिक्षा पुनः देने लगे केवल ब्राह्मणों को।  उस देव भूमि के बारे में मैं  गलत सोच भी नहीं सकता।   

Message from Institutions: गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय समोधपुर(सरस्वती कि महिमा इतनी महान है कि वह वेदों के भी वर्णन से परे है>सरस्वती कि महिमा अकथनीय है), जौनपुर >तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय("सत्यम शिवम् सुंदरम"), जौनपुर<वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्व विद्यालय(तेजस्वी बनो) , जौनपुर; काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (विद्या अमृत के समान है); अल्लाहाबाद विश्वविद्यालय(जितनी शाखाएं उतने वृक्ष (वट वृक्ष कि तरह विकाश करो: वट वृक्ष वह वृक्ष है जिसके तना, जड़ और पत्तियों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवाश है)); और भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु ( स्वयं को दीपक कि तरह जला कर इस संसार को प्रकाश और ज्ञान से भर दो)|


Thursday, April 3, 2014

जिन गुरुकुल समूह ने मुझे शक्ति दिया कक्षा वार : 0) प्राथमिक बेसिक विद्यालय बिशुनपुर, जौनपुर-223103 ; 1-4) प्राथमिक विद्यालय रामापुर, आजमगढ़-223103; 5 ) प्राथमिक बेसिक विद्यालय बिशुनपुर, जौनपुर-223103; 6-8) जूनियर हाईस्कूल आर्यनगर, बिशुनपुर, जौनपुर-223103, 10 -12) नेशनल इंटर कालेज पट्टीनरेंद्रपुर, जौनपुर; स्नातक) गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय समोधपुर, जौनपुर; तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर (केवल अर्धवार्षिक अवधि); परास्नातक) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणासी-5; शोध) अल्लाहाबाद विश्वविद्यालय, अल्लाहाबाद(डरिये नहीं इसे ही प्रयागराज कहते हैं); पराशोधक छात्र) भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु-12। मै इन गुरुकुल समूह को सादर नमन करता हूँ और मुझको शक्ति देने के लिए सभी का ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ गुरुकुल के वर्त्तमान और भूतपूर्व शिक्षक और छ्त्रगण का जिन्होंने मुझे अपनी बात समाज में रखने कि शक्ति दिया। और इस प्रकार सम्पूर्ण मानव जाती को सन्देश है कि आप अपने कुल, गुरुकुल, रास्ट्रकुल का सम्मान करें और इस प्रकार ऐसे विश्वकुल का निर्माण करें जो विश्व एक गाँव होते हुए भी अपनी संस्कृति, संस्कार और सदाचार को सर्वोपरि रखे। ----------बुल-बुल के तड़पने से शैयाद पिघलता है। आहों में असर हो तो औलाद पिघलता है।।---------------------- तो मेरे प्यारे भाइयों इस प्रयागराज(प्राक-यज्ञ=सप्तर्षियों के प्रकृष्टा यज्ञ के स्थान) में अवस्थित अपनी सरस्वती माता और परमपिता ब्रह्मा को भी याद कर लिया कीजिये कभी-कभी जिन ब्रह्मा के सब पुत्र हैं क्योंकि सप्तर्षि उनके ही मानस पुत्र हैं (यह सब जानते हैं) पर उस ब्रह्मा के पुत्र दक्षा प्रजापति (काशी वाले) की ही पुत्रिया सभी मानवजाति में स्त्रीजाती का श्रोत हैं। अतः यदि आप को तनिक भी ज्ञान है तो स्त्री कि राजनीती न कीजियेगा क्योंकि उनकी वही जाती होती है जिस घर पर वे जन्म ली हैं या जिस घर में स्वयं अपनी इक्षा से जाती है। सती(पारवती) के अलावा दक्षप्रजापति कि अन्य सभी लड़कियों से कश्यप ऋषि (मनु/दशरथ/वसुदेव/अन्य-अन्य उनके अवतार) कि शादी सबसे प्रथम बार हुयी थी (पिता मारीच का ब्रह्मा को दिए बचन को निभाने के कारन) अतएव कश्यप ऋषि पर कोई असर ही नहीं पड़ता है किशी का किशी जाती और धर्म में जाने पर कारन यह है कि कोई हिन्दू धर्म में पुनः आयेगा तो इसी कश्यप के रास्ते आने पर ही अन्य गोत्र को स्वीकार होगा। यही कारन है कि इस दुनिया को सुधरने का प्रथम दायित्व भी कश्यप पर है और उनका साथ स्वयं दुर्वाशा और महादेव शिवशंकर इसमे देते हैं। इस प्रकार पूरी मानवता कश्यप के अच्छे और बुरे कार्यों से प्रभावित होती है और यही कारन है कि मै यह सब बताने के बाद अपनी लेखनी को विराम देता हूँ।--वंदे माँ तरम:ॐ ऐ ही क्ली चामुण्डाय विच्चे: ॐ ऐ ही दम दुर्गाय नमः। ॐ ब्रह्म देवाय नमः(पितृ शक्ति को प्रणाम)। ॐ सूर्यदेवाय नमः।


आड्वाणी=आदिवानी=आद्यवाणी तो केवल और केवल प्रणव मतलब ॐ ही है जो भगवान् भोले शिव शंकर के डमरू से पहली बार कैलाश पर्वत पर निकला था। अतः शिव शक्ति वह स्वयं में ही है।


SEVEN STANDARD GOTRA FROM SAPTARSHI THEN EIGHTH(AGASTYA=KUMBHAJ) and THEN 24 Standard GOTRA as denoted by ASHOK CHAKRA 24 SPOKES and it present in the world 105-150 Gotras derived from all Seven Fundamental Gotra of Saptarshi: --------------1st Rank is of SHUKLA in North Indian Brahmins: Have only Three Gotra: 1) Gautam(Comes inder Saptarshi), 2) Garg(Comes under Sanatan Kashyapa's son, Varun's son Balmik's Pupil Bharadwaj's Pupil Category whose most probable generation place is itself Prayag as Bharadwaj Ashram is situated here on bank of Ganga River and als Balkimis Ashram was in Kaushambi/Prayag on the bank of Taons but not that Tons river in Azamgarh wich adjoined with Majhui river at Ashram of Durvash) , 3) Shandilya (Derived from Vashishth and Kashyapa originated at Kashmir)|----------------Thus for Sanatan Kashyap Gotriy only Gautam is great but Garg and Shandilya are closed and be loved only. -------------2nd Rank is of Mishra Brahmin who have Gautam, Vashishtha, Garg and Shandilya Gotra |-----------3rd rank is of Tiwari/Tripathi im Brahmins have only one Gotra Shandilya. ----------Rest of all have all the Gotras and after three need not define that Pandey Got Fifth Position in Brahmins after Dube/Dwivedi but in some case order is disorder but now days it is only limited for Brahmin relationship and have no any rank in outer surface of the society in Brahmins. But fact is that although Pandey is not in 1st, 2nd and 3rd position also but Saptarshi Gotra order in present Manavatar=Manvantar is Gautam, Vashishth, Kashyapa, Bharadwaj/Angarisa, Jamadagni/Bhrigu, Atri/Durvash, Vishwamitra(Kaushik) in which my Gotra comes on 3rd position for giving birth to so many Vishnu Avatar like Vaman, Shri Ram and Shri Krishna and Others; and Devas like Indra(accompanied with Varun, Agni, Pavan, Akash, Darani), Vishvakarma, Suryadev and Chandradev; Nagaas, Kinnaraj; and Demons also(All Devas are from Kashyapa and his second wife Aditi and others are from 1st wife Diti and other wives)


मित्रों उत्तर भारत में भारतीय संस्कृति का स्थित है जिसमे मुख्य केंद्र प्रयागराज(काशी) है और उसके बाद अयोध्या और मथुरा-वृंदावन हैं जो कि उत्तर प्रदेश में ही स्थित हैं और तीसरा है हरिद्वार जो उत्तराखंड में जरूर है पर अविभाजित उत्तर प्रदेश में ही था। मेरा एक सन्देश था कि संस्कृति हमारे अंदर स्थितिज ऊर्जा का संचय कर के हमें स्थाई और संरचनात्मक बनाती है और अपनी शक्तियों का सकारात्मक प्रयोग करने का गुर सिखाती है और इस प्रकार व्यक्ति सामान ऊर्जा वाले व्यक्ति से थोड़ा माध्यम गति से पर गम्भीरता से कार्य करता है जिसमे वह अपने विचलित नहीं होता है। लेकिन आज का समाज जो चमक दमक वाले और छद्म संस्कृति को ज्यादा महत्व देता जा रहा है उसी का परिणाम है कि लोग संस्कृति, संस्कार और अपनी मूल सभ्यता से दूर हटते जा रहे है इस प्रकार चरित्रवान समाज का अभाव होता जा रहा है। --------------- मेरा केवल इतना कहना था कि जिस भारतीय संस्कृति या प्रयागराज(काशी), अयोध्या, मथुरा-वृदावन और हरिद्वार से उपजी संस्कृति के कारन लोग देश-विदेशों में सबसे अलग स्थान पाते है जाते ही उसी संस्कृति के पालक (माता-पिता, गुरु, रास्त्र और भारतीय समाज के प्रति पूर्ण समर्पित) लोगों को पद-दलित समझते हों जब तो क्या इन स्थानों के निवाशी अपने स्वयं कि स्थितिज ऊर्जा (संस्कृति) को त्याग दुनिाया और देश के अन्य लोगों कि तरह उसे गतिज ऊर्जा में बदल स्वहित में क्यों न लग जाय? क्योंकि जिस संस्कृति और समाज कि रक्षा में वे अपने को लगाए हुए है उसका सीधा असर उन्ही पर नहीं हो रहा वरन पूरे विश्व को हो रहा है और पूरा विश्व भारतीय संस्कृति से शीख लेता है। -----------मित्रों उसी दिन मुझे शाम होने से पूर्व सजा मिल गयी ईस्वर द्वारा जो सिद्ध करता है कि ईस्वर स्वयं भारतीय संस्कृति के सन्दर्भ में इस खुलासे कुपित थे। पर मै इसे इस लिए लिख रहा हूँ क्योंकि मुझे मिला त्वरित ईस्वरीय दंड (पर अस्थायी ) भारतीय व्यक्ति विशेष कर भारतीय संस्कृति के ध्रुव क्षेत्र में रहने वालों से यही निवेदन है कि वे इस संस्कृति के जहां तक हो सके वाहक बने और जो कुछ त्याग जीवन में हो सके उसे करने के लिए जिससे आने वाला भविष्य आने वाली पीढ़ी के लिए भी उज्जवल हो।

मित्रों उत्तर भारत में भारतीय संस्कृति का स्थित है  जिसमे मुख्य केंद्र प्रयागराज(काशी) है और उसके बाद अयोध्या और मथुरा-वृंदावन हैं जो कि उत्तर प्रदेश में ही स्थित हैं और तीसरा है हरिद्वार जो उत्तराखंड में जरूर है पर अविभाजित उत्तर प्रदेश में ही था। मेरा एक सन्देश था कि संस्कृति हमारे अंदर स्थितिज ऊर्जा का संचय कर के हमें स्थाई और संरचनात्मक बनाती है और अपनी शक्तियों का सकारात्मक प्रयोग करने का गुर सिखाती है और इस प्रकार व्यक्ति सामान ऊर्जा वाले व्यक्ति से थोड़ा माध्यम गति से पर गम्भीरता से कार्य करता है जिसमे वह अपने  विचलित नहीं होता है। लेकिन आज का समाज जो चमक दमक वाले और छद्म संस्कृति को ज्यादा महत्व देता जा रहा है उसी का परिणाम है कि लोग संस्कृति, संस्कार और अपनी मूल सभ्यता से दूर हटते जा रहे है इस प्रकार चरित्रवान समाज का अभाव होता जा रहा है। --------------- मेरा केवल इतना कहना था कि जिस भारतीय संस्कृति या प्रयागराज(काशी), अयोध्या, मथुरा-वृदावन और हरिद्वार से उपजी संस्कृति के कारन लोग देश-विदेशों में सबसे अलग स्थान पाते है जाते ही उसी संस्कृति के पालक (माता-पिता, गुरु, रास्त्र और भारतीय समाज के प्रति पूर्ण समर्पित)  लोगों को पद-दलित समझते हों जब तो क्या इन स्थानों के निवाशी अपने स्वयं कि स्थितिज ऊर्जा (संस्कृति) को त्याग दुनिाया और देश के अन्य लोगों कि तरह उसे गतिज ऊर्जा में बदल स्वहित में क्यों न लग जाय? क्योंकि जिस संस्कृति और समाज कि रक्षा में वे अपने को लगाए हुए है उसका सीधा असर उन्ही पर नहीं हो रहा वरन पूरे विश्व को हो रहा है और पूरा विश्व भारतीय संस्कृति से शीख लेता है। -----------मित्रों उसी दिन मुझे शाम होने से पूर्व सजा मिल गयी ईस्वर द्वारा जो सिद्ध करता है कि ईस्वर स्वयं भारतीय संस्कृति के सन्दर्भ में इस खुलासे कुपित थे। पर मै इसे इस लिए लिख रहा हूँ क्योंकि मुझे मिला त्वरित ईस्वरीय दंड (पर अस्थायी ) भारतीय व्यक्ति विशेष कर भारतीय संस्कृति के ध्रुव क्षेत्र में रहने वालों से यही निवेदन है कि वे इस संस्कृति के जहां तक हो सके वाहक बने और जो कुछ त्याग जीवन में हो सके उसे करने के लिए  जिससे आने वाला भविष्य आने वाली पीढ़ी के लिए भी उज्जवल हो।   

Wednesday, April 2, 2014

ऐसे ही मै नहीं कहा था कि अटल बिहारी(भगवान् श्री कृष्ण का राशिनाम) वाजपायी स्वयं "राम रत्न" हैं और स्वयं मुरली मनोहर(भगवान् श्रीकृष्ण) जोशी स्वयं "कृष्ण रत्न" हैं और लाल कृष्ण(भगवान् श्री कृष्ण) आडवाणी स्वयं "भारत रत्न हनुमान(अम्बावाडेकर)" हैं, जार्ज फर्नान्डीज "भ्राता लक्षमण" है और गुरु कलाम स्वयं वशिष्ठ है । और अगर त्रिदेव में देखते हैं तो जोशी स्वयं "ब्रह्मा", अटल स्वयं "विष्णु" और अडवाणी स्वयं "शिव" है।


Shiva Linga is not denoted to Shiv only but Shiv himself associated with Brahma and Vishnu

पाँचों भूतों: पृथ्वी (स्थान=स्पेस=आधार), जल, आकाश (आकृति), अग्नी, वायु के स्वामी केदारेश्वर( शिव शंकर) ही हैं पर उनको मिलाने वाले हैं विष्णु तथा उसमे प्राण का संचार करने वाले हैं ब्रह्मा। अतः हम शिव का कोई आकार न मानकर एक लिंग के रूप में पूजते है(Thus the Shiva Linga is not only denoted to Shiv but Shiva associated with Brahma and Vishnu)।------उसी प्रकार रूप-रंग, ध्वनि-शब्द-वाणी, स्पर्श, रस और गंध जैसी पांच वस्तुए जो किशी स्त्री या पुरुष में निहित है उससे मानवीय शरीर ही नहीं पूरा मानव समाज प्रभावित होता है और जो समाज या पुरुष/स्त्री इन सबसे प्रभावित होते हुए भी ( प्रभावित तो हर कोई होता इससे कोई इंकार नहीं कर सकता क्योंकि यह अकाट्य सत्य और परम विज्ञानं है इसे मै ही नहीं श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय के सुरु में ही दिया गया है-जिसे उस समय के लिए परमब्रह्म बने श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेशित किया है ) जो संतुलन नहीं खोता वह व्यक्ति और समाज श्रेष्ठ कहलाता है।

I hope Joshi the Greatest’s(Murali Manohar=Yog-Yogeshwar Lord Shri Krishna’s) mission at Allahabad is over now. ------------Not only Shoodratam and Sinnest but I may become Gulam of the enemy of Lord Shri Krishna, if he finds me able for any work in the Universe.------------------------------------------ Munna Jaiswal, Mishra Homeo hall (during 2001-2002), Colonelganj, Allahabad residence situated my room is witness that for fulfilling the wish and vision of Joshi the Great how much I was abused (I hope that was the limitless definition of some one as Paapeest and Shoodratam person of the world: Actually people agains Joshi wants that I leave the place Allahabad and because they had no power to harm me directly then the used this weapon). I changed this room and went to Shri Tripathi Ji (Station officer in police Department)’s house behind Priti Hospital and remained there till 2003, even there criticism were on| I taken decision to give answer of all persons first (which was not possible from the shadow of Guru’s and friends because it needed to meet some persons) and then I wanted to get first batch enrollment in Kedareshwar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies , University of Allahabad (because my inner consciousness tolled me that in such circumstances I should not continue in Prayag) but it does not means that I forget my aim that is the vision of my family members and Gurus specially Joshi Ji. In such situation I rejected to enroll in Kedareshwar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies although my Guru Ji(Sanatan Kashyap Gotriy) signed before after I putted signature on it. Then my family member and Gurushresth Paramguru Parampita Parameshwar (Sanatan Gautam Gotriya) who is still Andha Bhakt of Joshi Ji given me advise to continue the most important mission of Prayagraj which made me a Scholar of Allahabad University(Also tolled that this mission is mission of Saptarshi in leadership of Kashyapa may be Senior or Junior)| After enrollment I sifted to Upadhyay Ji’s House at Minto Road at Rajapur and within few months stay I went to my elder Mama ji’s house at 61H/2 Om Gayatri Nagar, Allahabad. The first degree from Kedareshwar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies awarded to me (Sanatan Kashyap Gotriy) and my brother ( Junior naturally and also officially: SAWARNA/KASHYAPA Gotriy) on 17th September, 2007. Thus fundamentally it became centre of University of Allahabad on this date (17th September, 2007) but on 29th October, 2009 it became full phased faculty centre of the University of Allahabad with joining of three person which was followed by two others in next and next months in 2009.-------------This was not only process of the creating a centre or department of Atmospheric and Ocean Science in Allahabad University but Kedareshwar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS), University of Allahabad is a symbol of Victory of Gurus and Parents over their children because in this process Allahabad /Prayagraj was on the one side and their children who was spread all over world in Atmospheric and Ocean Science were on the other side i.e. against the vision of the Joshi ji (Who only know that the whole world community is child of Brahma i.e. the Brahma created Saptarshi’s who first come in existence at Prayag=Praak+Yagya= Prakrishthaa Yagya Place)|-------I hope Joshi the Greatest’s(Murali Manohar=Yog-Yogeshwar Lord Shri Krishna’s) mission at Allahabad is over now. ------------Not only Shoodratam and Sinnest but I may become Gulam of the enemy of Lord Shri Krishna, if he find me able for any work in the Universe.


Tuesday, April 1, 2014

यह दुनिया किशी विषय विशेष की 50 लोगों कि कक्षा में प्रथम और द्वितीय देखती है पर जिसने सैन्य शिक्षा की परीक्षा में वाराणसी/काशी/विश्वनाथ महादेव मंडल ; आर्यमगढ़/आजमगढ़/दुर्वाशा मंडल और मिर्जापुर/विंध्यवासिनी मंडल में प्रथम स्थान पाया उसे पद दलित समझ लिया गया गया स्थानीय/रास्ट्रीय/अंतररास्ट्रीय पटल पर। कोई मुझे यह बताये कि विना सैन्य शक्ति के कोई रास्त्र और उसका संविधान तथा उसका समाज सुरक्षित और सुसंगठित रह कर शान्ति और समृध्धि को प्राप्त कर सकता है क्या? क्या ऐसे में कोई शैक्षिक और सांस्कृतिक विकाश हो सकता है क्या? (मेरे दलित कि परिभाषा: दलित केवल वह है जिसे अपने पारिश्रमिक का किशी भी रूप में ससम्मान भुगतान न मिले। बाकी दलित शब्द को राजनीती में भुनाने कि परिभाषा लोग जो चाहे दें उनका मै प्रतिकार नहीं कर रहा हूँ। आज बहुत कम संख्या में ऐसे लोग है पर है जरूर और हर वर्ग से है न कि जाती विशेष से जिसे पारिश्रमिक का किशी अपने भी रूप में ससम्मान भुगतान न मिलता हो। अतः इस सब्द के भुनाने वाले लोग शर्म करें। इस दुनिया में कोई ऐसा समय नहीं आया रामराज्य छोड़कर जब कोई दलित न रहा हो यह सत्य है कि जाती और धर्म तब भी जीवित था)।