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Friday, May 30, 2014

For an Indian it is better to say Jai Hind-Jai Bharat than to say Jai Bharat only.*******JAI HIND(JAMBOO DWEEP:EURESIA:EUROP+ASIA OR HIND= JAMBOO DWEEP MEANT BY AT LEAST IRAN TO SINGAPUR & KASHMIR TO KANYAKUMARI), JAI BHARAT(AKHAND BHARAT:BHARATAKHAND), JAI SHRI RAM/KRISHNA|

For an Indian it is better to say Jai Hind-Jai Bharat than to say Jai Bharat only.*******JAI HIND(JAMBOO DWEEP:EURESIA:EUROP+ASIA OR HIND= JAMBOO DWEEP MEANT BY AT LEAST IRAN TO SINGAPUR & KASHMIR TO KANYAKUMARI), JAI BHARAT(AKHAND BHARAT:BHARATAKHAND), JAI SHRI RAM/KRISHNA|

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।।नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।।सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।।धन्य देस सो जहँ सुरसरी बहइ । धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।।धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।।सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।। धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत।।127।। Note: धन्य सो भूप नीति जो करई(नीतियों और नियमों के अनुसार शासन करे) , धन्य सो विप्र(ब्राह्मण) निज धर्म न टरई(धर्म से कभी भी विरट न हो)। सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (जिस कुल में सम्पूर्ण जगत के पूज्य पवित्रता से श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का जन्म हुआ हो मतलब शूर्यवंश/इक्शाकुवंश/रघुवंश धन्य है ) । श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत(उस रघुबीर श्रीराम का प्रेमी ह्रदय वही है जिसमे विनीत का जन्म हो या जिसमे विनम्रता और विनयशीलता हो) ॥ ------------------------------------------------------------------------श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है।*******जय हिन्द(जम्बू द्वीप= यूरेसिअ=यूरोप +एशिया; या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्ड), जयश्रीराम/कृष्ण

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।।नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।।सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।।धन्य देस सो जहँ सुरसरी बहइ । धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।।धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।।सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।।
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत।।127।।

Note:
धन्य सो भूप नीति जो करई(नीतियों और नियमों के अनुसार शासन करे) , धन्य सो विप्र(ब्राह्मण) निज धर्म न टरई(धर्म से कभी भी विरट न हो)। सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (जिस कुल में सम्पूर्ण जगत के पूज्य पवित्रता से श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का जन्म हुआ हो मतलब शूर्यवंश/इक्शाकुवंश/रघुवंश धन्य है ) । श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत(उस रघुबीर श्रीराम का प्रेमी ह्रदय वही है जिसमे विनीत का जन्म हो या जिसमे विनम्रता और विनयशीलता हो) ॥ ------------------------------------------------------------------------श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है।*******जय हिन्द(जम्बू द्वीप= यूरेसिअ=यूरोप +एशिया; या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्ड), जयश्रीराम/कृष्ण

Monday, May 12, 2014

All the Engineers of the world need to note that Kashyapa(Brahma's Grand Son means Brahma's First and Senior most Son Marich's Son) was father of Lord Vishwakarma means the God of All Engineers and I belongs from Sanatan Kashyap Gotriy Brahmin Family of a Great Village, Ramapur, Azamgarh-223225, thus please keep your patience in telling me your ability and first contact with my Paramguru Parampita Param-Brahma Parameshwar i.e. my Mama, Sanatan Gautam Gotriy Brahmin, Shri Shridhar Mishra who has all characteristics the name I given and possible in a person of this materialistic world and he will teach you a lesson about my whole life journey till date at a limit.-----------------------People of the India is not aware but I know and also evidence that not myself but the Greatest Profesor Pandey was also seeking energy from a such personality(Shri Shridhar Mishra), the Kulkamal of RAMANAND Mishra of Bishunpur-Jaunpur from GORAKHAPUR origin and who's ancestors were from Shiva's Kailash Parvat's Origin.

All the Engineers of the world need to note that Kashyapa(Brahma's Grand Son means Brahma's First and Senior most Son Marich's Son) was father of Lord Vishwakarma means the God of All Engineers and I belongs from Sanatan Kashyap Gotriy Brahmin Family of a Great Village, Ramapur, Azamgarh-223225, thus please keep your patience in telling me your ability and first contact with my Paramguru Parampita Param-Brahma Parameshwar i.e. my Mama, Sanatan Gautam Gotriy Brahmin, Shri Shridhar Mishra who has all characteristics the name I given and possible in a person of this materialistic world and he will teach you a lesson about my whole life journey till date at a limit.-----------------------People of the India is not aware but I know and also evidence that not myself but the Greatest Profesor Pandey was also seeking energy from a such personality(Shri Shridhar Mishra), the Kulkamal of RAMANAND Mishra of Bishunpur-Jaunpur from GORAKHAPUR origin and who's ancestors were from Shiva's Kailash Parvat's Origin.

यह एक प्रतिरोध था की मुझे सेवापत्र 25-10-2007 से मिलने और स्वयं 25-10-2007 से पहले पहुंचने के बावजूद 27-10-2007 से पदभार ग्रहण किया जाने दिया गया कुलसचिव कार्यालय में कुछ औपचारिकताएं अभी शेष है यह कहकर। -----दूसरा अभियांत्रिकी विभाग से सम्बंधित उत्तर भारतीय छात्र भी अंदर से विरोध में थे और खुलकर सामने कभी-कभी आये भी सार्वजनिक स्थानों पर वार्तालाप के दौरान----------पर यह सब नकली अशोक के लिए सब कुछ किया जा रहा था जिसमे मुझे 27 से जोड़ने का एक निरर्थक प्रयाश निकला और मात्र 3 माह में मतलब जनवरी माह के प्रारम्भ में ही उन शक्तियों से सभी प्रयास निरर्थक निकले और मुझसे कोई पार पाने में समर्थ न रहा। ---------पर मित्रों नकली अशोक के शिष्य ही अशोक चक्र तोड़ते हैं यह बात सही निकली और PD हॉस्टल के कक्ष 16 में 2008 के प्रथम अर्ध्य चरण में मै स्वप्न देखता हूँ रात्रि में मध्याह्न के बाद की अशोक चक्र टूट गया और बहुत ही अंधकार पूरे पृथ्वी पर छा गया है और हाहाकार मचा हुआ है और ऐसे में मेरी नींद खुलती है और रात्रि में ही मै अल्लाहाबाद में कुछ समय के लिए घर से मेरे ही द्वारा अलाहाबाद में एक स्थान विशेस पर भेजे और उसी स्थान पर रहने वाले अपने घराने के चाचा परन्तु उम्र में काफी छोटे अशोक कुमार पाण्डेय को फोन लगाता हूँ, "सब कुसल मंगल है अल्लाहबाद में न और घर रामपुर/आज़मगढ़ में लोग कैसे है ज़रा बेसिक लाइन आप से कनेक्ट हो तो समाचार लेकर मुझे अवगत कराइये"। यह था मेरा सन्देश बंगलोर के BSNL मोबाइल no. +919480090105 से। ----------अतः बेकार की कवायद मेरे साथ क्यों जब अशोक के शिष्य ही अशोक चक्र तोड़ते हों तो और प्रमाण मेरे पास है की अशोक चक्र वास्तव में 2008 में टूट ही गया गया और उसे अशोक के शिष्य ने ही तोड़ा है यह भी प्रमाण है। यह गौतम गोत्रीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम(गौतम बुद्ध) के भक्त और शिष्य तथा विष्णुकांत(कौटिल्य:चाणक्य) के शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्या के वंसज भी जान लें की जब तक वे यह नहीं समझेंगे की इस्लाम सामानांतर चलता है रामाश्रयी के और ईसाइयत चलाती है कृष्णाश्रयी के और सबका आदि और अंत सनातन धर्म/संस्कृति ही है तो इसी तरह से अशोक चक्र टूटता रहेगा इसमे इस्लाम और ईसाइयत का कोई दोस नहीं और बेकार का बुद्धा बनाने/बनने से इसमे कोई सुधर नहीं होगा वरन ऐसा होता रहा और अशोकचक्र/समयचक्र/कालचक्र/धर्मचक्र/समतामूलक टूटता रहा तो इससे महादेव शिव शंकर अपने रूद्र रूप नटराज अवतार में आ पुनः पूरी पृथ्वी को जल मग्न बना देंगे।


केदारेश्वर ने मानवीय समय प्रारम्भ होने के पहले इस पृथ्वी पर सबसे पहले काशी में कीचड़ तैयार कर दिया विश्व व्यापक जलप्रवाह रोक कर जिस समय पुरी पृथ्वी ही जल मग्न थीं। तो जाहीर सी बात है कि पृथ्वी पर काशी/वाराणसी ही एक मात्र वह स्थान है जहाँ पर इस विश्व के प्रथम नागरिक शिव ने अपनी शक्ति(सती:पारवती) के साथ रहने योग्य इसे पृथ्वी का प्रथम स्थल बनाया प्रयागराज/अल्लाहाबाद में ऋषिकाल या मानवीय समय की प्रथम नीव कहें तो ब्रह्मा द्वारा अपने सातों मानस किये गए प्रकृष्टा या प्राकट्य यज्ञ से पूर्व। और भगवान बाबा विश्वनाथ महादेव शिव शंकर ने इस ऋषिकाल प्रारम्भ होने से पहले तक शक्ति(सती:पारवती) इसी काशी मे रहे और जैसे ही प्रयाग मे रिषि संस्कृति ने जन्म लेकर मानव समय का प्रारम्भ किया वे हिमालय पर्वत के पूर्वोत्तरी छोर कैलाश पर्वत पर अपना निवास बना लिये जो गौतम और वशिष्ठ समेत अन्य सप्तर्षियों का निवास स्थल बना प्रयाग मे रिषि सभ्यता से मानवीय सभ्यता प्रारम्भ होने पर और जिसमे कश्यप रिषि जो शिव के शाढ़ू भाइ (सती कि सभी अन्य बहनों का विवाह कश्यप से हीं हुआ था ब्रह्मा को पिता मारीच/सबसे जेष्ठ सप्तर्षि:ब्रह्मर्षि द्वारा दिये वादे को निभाने हेतु) भी हुये ने हिमालय का पश्चिमोत्तर शिरा अपने हाँथ लिया। यह है काशी, प्रयाग और कैलाश का इतिहास जिसमे महात्म/महत्वता प्रयाग का इसलिए अधिक है क्योंकि स्वयं विष्णु-ब्रह्मा-शिव का समागम है और जहां तक जल प्रलय की बात है स्वयं समुद्रदेव(सातों समुद्रों के स्वामी) विष्णु के ससुर मतलब लक्ष्मी जी के पिता और सती/पारवती जी ब्रह्मा की पुत्री(दक्ष प्रजापति जो ब्रह्मा और सरस्वती के पुत्र थे की पुत्री) और इस प्रकार त्रिदेवों का वाश होने की वजह से यह सर्वोपरि और तीर्थराज प्रयाग या त्रिवेणी कहलाता है।

केदारेश्वर ने मानवीय समय प्रारम्भ होने के पहले इस पृथ्वी पर सबसे पहले काशी में कीचड़ तैयार कर दिया विश्व व्यापक जलप्रवाह रोक कर जिस समय पुरी पृथ्वी ही जल मग्न थीं।  तो जाहीर सी बात है कि पृथ्वी पर काशी/वाराणसी  ही एक मात्र वह स्थान है जहाँ पर इस विश्व के प्रथम नागरिक शिव ने अपनी शक्ति(सती:पारवती) के साथ रहने योग्य इसे पृथ्वी का प्रथम स्थल बनाया प्रयागराज/अल्लाहाबाद में ऋषिकाल या मानवीय समय की प्रथम नीव कहें तो ब्रह्मा द्वारा अपने सातों मानस  किये गए प्रकृष्टा या प्राकट्य यज्ञ से पूर्व। और भगवान बाबा विश्वनाथ महादेव शिव शंकर ने इस ऋषिकाल प्रारम्भ होने से पहले तक शक्ति(सती:पारवती)  इसी काशी मे रहे और जैसे ही प्रयाग मे रिषि संस्कृति ने जन्म लेकर मानव समय का प्रारम्भ किया वे हिमालय पर्वत के पूर्वोत्तरी छोर कैलाश पर्वत पर अपना निवास बना लिये जो गौतम और वशिष्ठ समेत अन्य सप्तर्षियों का निवास स्थल बना प्रयाग मे रिषि सभ्यता से मानवीय सभ्यता प्रारम्भ होने पर और जिसमे कश्यप रिषि जो शिव के शाढ़ू भाइ (सती कि सभी अन्य बहनों का विवाह कश्यप से हीं हुआ था ब्रह्मा को पिता मारीच/सबसे जेष्ठ सप्तर्षि:ब्रह्मर्षि द्वारा दिये वादे को निभाने हेतु) भी हुये ने हिमालय का पश्चिमोत्तर शिरा अपने हाँथ लिया। यह है काशी, प्रयाग और कैलाश का इतिहास जिसमे महात्म/महत्वता प्रयाग का इसलिए अधिक है क्योंकि स्वयं विष्णु-ब्रह्मा-शिव का समागम है और जहां तक जल प्रलय की बात है स्वयं समुद्रदेव(सातों समुद्रों के स्वामी) विष्णु के ससुर मतलब लक्ष्मी जी के पिता और सती/पारवती जी ब्रह्मा की पुत्री(दक्ष प्रजापति जो ब्रह्मा और सरस्वती के पुत्र थे की पुत्री) और इस प्रकार त्रिदेवों का वाश होने की वजह से यह सर्वोपरि और तीर्थराज प्रयाग या त्रिवेणी कहलाता है।

Sunday, May 11, 2014

केदार का मतलब शाब्दिक और व्यापक: -----------केदार का शाब्दिक अर्थ कीचड होता है मतलब वह मिट्टी जिसमे जल हो पर पर्याप्त मात्र में जल न हो की ऊपर से प्रवाह हो पर पानी समाहित किये हो मतलब पानी को भी स्थिर पर देने वाला। भगवान् शिवशंकर का यह नाम‘क’से शुरू होता है|’क’ में मात्रा को ऊपर काया में खींच देने से‘के’बनता है|केदार वैसे ही जैसे परतदार,रोबदार,धारदार,पानीदार यानी ऐसा कोई मालिक जिनके पास ‘के’ है वो केदार है ये हिंदी वाला “के” है अंग्रेजी वाला के नहीं |ये ‘के’ आगे जा के कं बन जाता है|जो केदार है वो कंदार है खंदार है|ध्वनि के अर्थों में पर्वत की काया के ऊपर के खिचाव व प्रवाह में नदियां व प्रवाह, झरने, वनस्पतियाँ ,फसल प्राणिजगत की धडकनें आती हैं ये पर्वत का ‘के’ है|पेड़ पौधों को थामने वाली जमीन या क्यारी और जुते हुए खेत को ‘केदार’ कहते हैं | संस्कृत में कम पानी की मात्रा या दर को कहते हैं‘के जलम’‘कितना पानी|’दार’से बनता है ‘दारू ’और पुनि ‘दारुण’ बाढ़ में पूछते हैं कितना चढ़ा उतरा पानी! तो जल की धार से विदीर्ण कर के दारुण दुःख देनेवाला अर्थ ‘केदार’ का बताया गया है और विदीर्ण कर देने वाली जलधार को नाथ कर कंट्रोल करने वाले प्रभु ‘केदारनाथ’हैं|बाढ़ के कंट्रोल के अर्थ में तो केदार का दार यानी पर्वत से उतरता आता पानी\जुता हुआ खेत जुती हुई भूमि केदार कहलाती है,टीला भी‘केदार’कहलाता है|संगीत में तो राग और रागिनियों का एक संसार है भरा पूरा पर्वत है‘केदार’ के नाम से जैसे शुद्ध केदार,चांदनी केदार,मलुहा केदार,जलधार केदार,सावनी केदार,बसंती केदार,केदारबहार,नट केदार\केदार राग की मेलोडी में विशेष उष्मा का अनुभव होता है इसे राग दीपक की रागिनी भी कहा जाता है|तो तरंगों के संसार में भी ‘केदार’ और ये केदार संगीत का केदार बहुत ख़ास है क्योंकि इसमें आरोह में केवल ६ सुर लगते हैं और अवरोह में सातों सुर लग जाते हैं जो बाढ़ या वृद्धि का सूचक है तो इस तरह से इसमें ‘म प ध प म ‘ का ‘‘लहरिया रागांग’’होता है अर्थात इसकी आवृति होती है ये शब्द पानी की तेज चाल,वेगयुक्त लहरों को व्यक्त करते हैं|हम रागमाला की केदार राग रागिनियों की पेंटिंग्स में भी पानी के प्रतीक‘म’को‘मृग’और‘मरकट’के रूप में देख सकते हैं|इनमें कई में अनिवार्य तौर पर पानी की शांत स्ट्रीम को बने देखा जा सकता है जो केदार को राग बनाने के बाद कंट्रोल्ड प्रवाह से जोड़ती है|--

केदार का मतलब शाब्दिक और व्यापक: -----------केदार का शाब्दिक अर्थ कीचड होता है मतलब वह मिट्टी जिसमे जल हो पर पर्याप्त मात्र में जल न हो की ऊपर से प्रवाह हो पर पानी समाहित किये हो मतलब पानी को भी स्थिर पर देने वाला। भगवान् शिवशंकर का यह नाम‘क’से शुरू होता है|’क’ में मात्रा को ऊपर काया में खींच देने से‘के’बनता है|केदार वैसे ही जैसे परतदार,रोबदार,धारदार,पानीदार यानी ऐसा कोई मालिक जिनके पास ‘के’ है वो केदार है ये हिंदी वाला “के” है अंग्रेजी वाला के नहीं |ये ‘के’ आगे जा के कं बन जाता है|जो केदार है वो कंदार है खंदार है|ध्वनि के अर्थों में पर्वत की काया के ऊपर के खिचाव व प्रवाह में नदियां व प्रवाह, झरने, वनस्पतियाँ ,फसल प्राणिजगत की धडकनें आती हैं ये पर्वत का ‘के’ है|पेड़ पौधों को थामने वाली जमीन या क्यारी और जुते हुए खेत को ‘केदार’ कहते हैं | संस्कृत में कम पानी की मात्रा या दर को कहते हैं‘के जलम’‘कितना पानी|’दार’से बनता है ‘दारू ’और पुनि ‘दारुण’ बाढ़ में पूछते हैं कितना चढ़ा उतरा पानी! तो जल की धार से विदीर्ण कर के दारुण दुःख देनेवाला अर्थ ‘केदार’ का बताया गया है और विदीर्ण कर देने वाली जलधार को नाथ कर कंट्रोल करने वाले प्रभु ‘केदारनाथ’हैं|बाढ़ के कंट्रोल के अर्थ में तो केदार का दार यानी पर्वत से उतरता आता पानी\जुता हुआ खेत जुती हुई भूमि केदार कहलाती है,टीला भी‘केदार’कहलाता है|संगीत में तो राग और रागिनियों का एक संसार है भरा पूरा पर्वत है‘केदार’ के नाम से जैसे शुद्ध केदार,चांदनी केदार,मलुहा केदार,जलधार केदार,सावनी केदार,बसंती केदार,केदारबहार,नट केदार\केदार राग की मेलोडी में विशेष उष्मा का अनुभव होता है इसे राग दीपक की रागिनी भी कहा जाता है|तो तरंगों के संसार में भी ‘केदार’ और ये केदार संगीत का केदार बहुत ख़ास है क्योंकि इसमें आरोह में केवल ६ सुर लगते हैं और अवरोह में सातों सुर लग जाते हैं जो बाढ़ या वृद्धि का सूचक है तो इस तरह से इसमें ‘म प ध प म ‘ का ‘‘लहरिया रागांग’’होता है अर्थात इसकी आवृति होती है ये शब्द पानी की तेज चाल,वेगयुक्त लहरों को व्यक्त करते हैं|हम रागमाला की केदार राग रागिनियों की पेंटिंग्स में भी पानी के प्रतीक‘म’को‘मृग’और‘मरकट’के रूप में देख सकते हैं|इनमें कई में अनिवार्य तौर पर पानी की शांत स्ट्रीम को बने देखा जा सकता है जो केदार को राग बनाने के बाद कंट्रोल्ड प्रवाह से जोड़ती है|--

Some people had confusion that Kedareshwar name is derived from Kedarnath (the name came in existence when King Kedar of present Kedar Ghati started worship the Ling of Shiva in Sat-Yuga which Ling of Shiva later called as Kedarnath) but in previous post I made clear that the Kedareshwar is the one of the Power of Shiva Trishul Form as Vishveshwar and Mahamrityunjay who given base to Kashi/Varanasi before the begining of human time on the Earth where Shiva and Shakti(Sati:Parvati) stood for a long time before the human time came.----------Thus Kedareshwar's time period is not different than Shiva's her own existence.

Some people had confusion that Kedareshwar name is derived from Kedarnath (the name came in existence when King Kedar of present Kedar Ghati started worship the Ling of Shiva in Sat-Yuga which Ling of Shiva later called as Kedarnath) but in previous post I made clear that the Kedareshwar is the one of the Power of Shiva Trishul Form as Vishveshwar and Mahamrityunjay who given base to Kashi/Varanasi before the begining of human time on the Earth where Shiva and Shakti(Sati:Parvati) stood for a long time before the human time came.----------Thus Kedareshwar's time period is not different than Shiva's her own existence.
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KEDARESHWAR, VISHVESHWAR AND MAHAMRITYUNJAY ARE TRISHUL (3 point of power) FORM OF POWER OF LORD SHIVA WHO/WHICH GIVEN BASE TO GROUND OF KASHI (VARANASI). THUS THE KASHI IS CREATED GROUND BY SHIVA AND SHAKTI(SATI: PARVATI) ON WHICH BABA VISHVANATH MAHADEV STOOD WITH HIS WIFE SATI (PARWATI) FOR
LONG TIME AT BEGINING OF THE HUMAN TIME.