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Monday, June 30, 2014

भगवान वामन, राम, और कृष्ण समेत अनेकोनेक विष्णुअवतार कश्यप गोत्र को सनातन हिन्दू धर्म का प्रथम प्रवेश और निष्कासन द्वार बना देते है। जिसको सनातन कश्यप गोत्रीय हिन्दू धर्म में रहने योग्य नहीं बना सका उसको गौतम और वशिष्ठ समेत सम्यक गोत्र भी सनातन हिन्दू धर्म में रहने हेतु न रोक सकते हैं और न ही आश्रय दे सकते हैं अपनी श्रेष्ठता और शुद्धता को बनाये रखने के लिए। अतः पथ भ्रमित व्यक्तियों का सनातन हिन्दू धर्म में पुनः प्रथम प्रवेश भी इसी अनेकोनेक विष्णु अवतार को जन्म देने वाले कश्यप गोत्र के माध्यम से ही होता है।

भगवान वामन, राम, और कृष्ण समेत अनेकोनेक विष्णुअवतार कश्यप गोत्र को सनातन हिन्दू धर्म का प्रथम प्रवेश और निष्कासन द्वार बना देते है। जिसको सनातन कश्यप गोत्रीय हिन्दू धर्म में रहने योग्य नहीं बना सका उसको गौतम और वशिष्ठ समेत सम्यक गोत्र भी सनातन हिन्दू धर्म में रहने हेतु न रोक सकते हैं और न ही आश्रय दे सकते हैं अपनी श्रेष्ठता और शुद्धता को बनाये रखने के लिए। अतः पथ भ्रमित व्यक्तियों का सनातन हिन्दू धर्म में पुनः प्रथम प्रवेश भी इसी अनेकोनेक विष्णु अवतार को जन्म देने वाले कश्यप गोत्र के माध्यम से ही होता है। 

What are the 24 Spokes of Ashok Chakra (Blue colored on white background of Tiranga: because here only three is prominent color 4rth color blue covered limited area) according Hindu religion:-------The real reason for having 24 spokes on the Chakra is: According to Hindu religion, Puranas mentioned that only 24 Rishis wielded the whole power of the Gayatri Mantra. These 24 rishi in Himalayas are represented through the 24 letters of Gayatri Mantra. The all the 24 spokes of Dharmachakra are representation of all these 24 rishi of Himalayas in which Vishvamitra is first and Yajnavalkya is last who governs the religion (Dharma). Ashok Chakra is symbol of Dharmchakra and also known as Samay Chakra in which all the 24 spokes represented 24 hours of the day and symbol of the movement of the time[7][8][9] • 1. Love(1st Rishi Vishvamitra i.e. the Weapon Guru of Lord Shri Ram and Lakshaman) • 2. Courage • 3. Patience • 4. Peacefulness • 5. Magnanimity • 6. Goodness • 7. Faithfulness • 8. Gentleness • 9. Selflessness • 10. Self-Control • 11. Self Sacrifice • 12. Truthfulness • 13. Righteousness • 14. Justice • 15. Mercy • 16. Gracefulness • 17. Humility • 18. Empathy • 19. Sympathy • 20. Spiritual Knowledge • 21. Moral Values • 22. Spiritual Wisdom • 23. The Fear of God • 24. The Faith or Trust or belief(24rth and last Rishi Yagyavalkya|

What are the 24 Spokes of Ashok Chakra (Blue colored on white background of Tiranga: because here only three is prominent color 4rth color blue covered limited area) according Hindu religion:-------The real reason for having 24 spokes on the Chakra is: According to Hindu religion, Puranas mentioned that only 24 Rishis wielded the whole power of the Gayatri Mantra. These 24 rishi in Himalayas are represented through the 24 letters of Gayatri Mantra. The all the 24 spokes of Dharmachakra are representation of all these 24 rishi of Himalayas in which Vishvamitra is first and Yajnavalkya is last who governs the religion (Dharma). Ashok Chakra is symbol of Dharmchakra and also known as Samay Chakra in which all the 24 spokes represented 24 hours of the day and symbol of the movement of the time[7][8][9]
• 1. Love(1st Rishi Vishvamitra i.e. the Weapon Guru of Lord Shri Ram and Lakshaman)
• 2. Courage
• 3. Patience
• 4. Peacefulness
• 5. Magnanimity
• 6. Goodness
• 7. Faithfulness
• 8. Gentleness
• 9. Selflessness
• 10. Self-Control
• 11. Self Sacrifice
• 12. Truthfulness
• 13. Righteousness
• 14. Justice
• 15. Mercy
• 16. Gracefulness
• 17. Humility
• 18. Empathy
• 19. Sympathy
• 20. Spiritual Knowledge
• 21. Moral Values
• 22. Spiritual Wisdom
• 23. The Fear of God
• 24. The Faith or Trust or belief(24rth and last Rishi Yagyavalkya

(#1) (अंत:करण 4 ) मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार; (#2) (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण; (#3) (तन्मात्रायें 5) गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द; (#4) (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद, हस्त, उपस्थ (nursing), पायु (मलद्वार|गुदा), वाक् (बोलने कि प्रक्रिया); (#5) ( महाभूत 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश| 24 तत्वों से आत्मा-शरीर-समाज प्रभावित होता है और आत्मा-शरीर-समाज से इस्वर प्रभावित होता है| अतः इन सभी २४ तत्वों में संतुलन अति आवश्यक है शरीर, समाज, आत्मा और इस्वर को शांति और संतुलन में रखने के लिए| Shrimad Bhagvat Geeta By Maharshi Ved Vyas|*******Jai Hind (Jamboo Dweep:Euresia=Europe+Asia or at least Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari), Jai Bharat(Bharatkhand=Akhand Bharat), Jai Sriram/Krishna|

(#1) (अंत:करण 4 ) मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार; (#2) (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण; (#3) (तन्मात्रायें 5) गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द; (#4) (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद, हस्त, उपस्थ (nursing), पायु (मलद्वार|गुदा), वाक् (बोलने कि प्रक्रिया); (#5) ( महाभूत 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश| 24 तत्वों से आत्मा-शरीर-समाज प्रभावित होता है और आत्मा-शरीर-समाज से इस्वर प्रभावित होता है| अतः इन सभी २४ तत्वों में संतुलन अति आवश्यक है शरीर, समाज, आत्मा और इस्वर को शांति और संतुलन में रखने के लिए| Shrimad Bhagvat Geeta By Maharshi Ved Vyas|*******Jai Hind (Jamboo Dweep:Euresia=Europe+Asia or at least Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari), Jai Bharat(Bharatkhand=Akhand Bharat), Jai Sriram/Krishna|

Friday, June 27, 2014

एक तपश्वी+ क्षत्रिय +उस पर गृहस्थ(सीता संग थी बनवाश में) से तपस्वी+ क्षत्रिय न की राजा या राजकुमार बनकर आक्रमण किये थे उसके सीता हरण कर लेने पर उसी के राज्य में ललकार कर और उसमें भी विशाल दानवीय सेना के सामने एक छोटी भी बनर्जी सेना ही थी उनके साथ। -----------भरत भाई कपि(बनर्जी):हनुमान:अम्बवादेकर:अम्बेडकर से उऋण हम नाही।----------------रावण तो शूर्यवंशीय श्री राम के पूर्वज अज से भी हारा था और रघु से भी पर दशरथ नंदन श्रीराम से हार गया तो क्या विशेष बात थी जबकि अगत्य(कुम्भज) ऋषि वही अस्त्र(शूर्यवंश का अस्त्र जो रावण पर चला था और उसे वापस बुला लिया गया था ब्रह्मा के कहने पर और अगस्त्य ऋषि को दे दिया गया था उचित समय पर रावण की मृत्यु आने पर मारने के लिए ) और परशुराम द्वारा दिए गए शिव धनुष से ही मारा गया था वह।---------मित्रों अज और रघु उसे अयोध्या में ही उसे अस्त्र और मनोबल से ही पराजित किये थे रावण के वहां आकर ललकारने पर और उस पर स्वयं आक्रमण नहीं किये थे वहां जाकर पर इस बार तो भगवान श्रीराम जो उन्ही के वंसज थे एक तपश्वी+ क्षत्रिय +उस पर गृहस्थ(सीता संग थी बनवाश में) से तपस्वी+ क्षत्रिय न की राजा या राजकुमार बनकर आक्रमण किये थे उसके सीता हरण कर लेने पर उसी के राज्य में ललकार कर और उसमें भी विशाल दानवीय सेना के सामने एक छोटी भी बनर्जी सेना ही थी उनके साथ।-----और भी रावण से युद्ध करने के लिए देवताओं और ऋषियों ने उनके लिए इंद्र के रथ (रावण रथी वि-रथ रघुवीरा देख विभीषण भयहु अधीरा) की व्यवस्था की और भारद्वाज ऋषि से पुष्पक विमान भेजवाया वापस आने के लिए जबकि रावण का स्वयं का विमान था। एक तपश्वी+ क्षत्रिय +उस पर गृहस्थ(सीता संग थी बनवाश में) से तपस्वी+ क्षत्रिय न की राजा या राजकुमार बनकर आक्रमण किये थे उसके सीता हरण कर लेने पर उसी के राज्य में ललकार कर और उसमें भी विशाल दानवीय सेना के सामने एक छोटी भी बनर्जी सेना ही थी उनके साथ। -----------भरत भाई कपि(बनर्जी):हनुमान:अम्बवादेकर:अम्बेडकर से उऋण हम नाही।----------------रावण तो शूर्यवंशीय श्री राम के पूर्वज अज से भी हारा था और रघु से भी पर दशरथ नंदन श्रीराम से हार गया तो क्या विशेष बात थी जबकि अगत्य(कुम्भज) ऋषि वही अस्त्र(शूर्यवंश का अस्त्र जो रावण पर चला था और उसे वापस बुला लिया गया था ब्रह्मा के कहने पर और अगस्त्य ऋषि को दे दिया गया था उचित समय पर रावण की मृत्यु आने पर मारने के लिए ) और परशुराम द्वारा दिए गए शिव धनुष से ही मारा गया था वह।---------मित्रों अज और रघु उसे अयोध्या में ही उसे अस्त्र और मनोबल से ही पराजित किये थे रावण के वहां आकर ललकारने पर और उस पर स्वयं आक्रमण नहीं किये थे वहां जाकर पर इस बार तो भगवान श्रीराम जो उन्ही के वंसज थे एक तपश्वी+ क्षत्रिय +उस पर गृहस्थ(सीता संग थी बनवाश में) से तपस्वी+ क्षत्रिय न की राजा या राजकुमार बनकर आक्रमण किये थे उसके सीता हरण कर लेने पर उसी के राज्य में ललकार कर और उसमें भी विशाल दानवीय सेना के सामने एक छोटी भी बनर्जी सेना ही थी उनके साथ।-----और भी रावण से युद्ध करने के लिए देवताओं और ऋषियों ने उनके लिए इंद्र के रथ (रावण रथी वि-रथ रघुवीरा देख विभीषण भयहु अधीरा) की व्यवस्था की और भारद्वाज ऋषि से पुष्पक विमान भेजवाया वापस आने के लिए जबकि रावण का स्वयं का विमान था।

http://en.wikipedia.org/wiki/Kedareswar_Banerjee       http://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies 
http://www.wellknownpersons.com/person/lsp.Prem_Chand_Pandey.sq74698.htm
http://en.wikipedia.org/wiki/Prem_Chand_Pandey 
एक तपश्वी+ क्षत्रिय +उस पर गृहस्थ(सीता संग थी बनवाश में) से तपस्वी+ क्षत्रिय न की राजा या राजकुमार बनकर आक्रमण किये थे उसके सीता हरण कर लेने पर उसी के राज्य में ललकार कर और उसमें भी विशाल दानवीय सेना के सामने एक छोटी भी बनर्जी सेना ही थी उनके साथ। -----------भरत भाई कपि(बनर्जी):हनुमान:अम्बवादेकर:अम्बेडकर से उऋण हम नाही।----------------रावण तो शूर्यवंशीय श्री राम के पूर्वज अज से भी हारा था और रघु से भी पर दशरथ नंदन श्रीराम से हार गया तो क्या विशेष बात थी जबकि अगत्य(कुम्भज) ऋषि वही अस्त्र(शूर्यवंश का अस्त्र जो रावण पर चला था और उसे वापस बुला लिया गया था ब्रह्मा के कहने पर और अगस्त्य ऋषि को दे दिया गया था उचित समय पर रावण की मृत्यु आने पर मारने के लिए ) और परशुराम द्वारा दिए गए शिव धनुष से ही मारा गया था वह।---------मित्रों अज और रघु उसे अयोध्या में ही उसे अस्त्र और मनोबल से ही पराजित किये थे रावण के वहां आकर ललकारने पर और उस पर स्वयं आक्रमण नहीं किये थे वहां जाकर पर इस बार तो भगवान श्रीराम जो उन्ही के वंसज थे एक तपश्वी+ क्षत्रिय +उस पर गृहस्थ(सीता संग थी बनवाश में) से तपस्वी+ क्षत्रिय न की राजा या राजकुमार बनकर आक्रमण किये थे उसके सीता हरण कर लेने पर उसी के राज्य में ललकार कर और उसमें भी विशाल दानवीय सेना के सामने एक छोटी भी बनर्जी सेना ही थी उनके साथ।-----और भी रावण से युद्ध करने के लिए देवताओं और ऋषियों ने उनके लिए इंद्र के रथ (रावण रथी वि-रथ रघुवीरा देख विभीषण भयहु अधीरा) की व्यवस्था की और भारद्वाज ऋषि से पुष्पक विमान भेजवाया वापस आने के लिए जबकि  रावण का स्वयं का विमान था। 

Bihari, the Rashi Name of Krishna stated that in the period of transition from previous Millennium(Sahasrabdi) to present Millennium(Sahasrabdi) there were three Krishna in form of Ram, Krishna and Bajrang=Shiva Rudravatar were leading the Bharat/Hindusthan and they were the Atal Bihari Bajpai(Ram Ratna), Murali Manohar Joshi(Krishna Ratna) and Lal Krishna Adyavani/Advani(Bajarang Ratna=Shiva Rudravatar) because Bihari is Rashi name of Krishna.

Bihari, the Rashi Name of Krishna stated that in the period of transition from previous Millennium(Sahasrabdi) to present Millennium(Sahasrabdi) there were three Krishna in form of Ram, Krishna and Bajrang=Shiva Rudravatar were leading the Bharat/Hindusthan and they were the Atal Bihari Bajpai(Ram Ratna), Murali Manohar Joshi(Krishna Ratna) and Lal Krishna Adyavani/Advani(Bajarang Ratna=Shiva Rudravatar) because Bihari is Rashi name of Krishna.

Thursday, June 26, 2014

उस योग्यता की परिकल्पना कीजिये, "जिसके दिशा निर्देशन पर एक राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय को एक केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने हेतु विधान(अध्यादेश:आर्डिनेंस) तैयार किया जाता है और जिसने किशी संसदीय क्षेत्र और देश के लिए ज्ञान और विज्ञान में अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय परिदृश्य के लिए और भविष्य के लिए दूरदर्शी ठोस योजना तैयार की और उनमे से कुछ योजनाओं को अपना कार्यकाल कार्यकाल रहते हुए पूराकरते हुए एक मिसाल स्थापित किया उसका उसी संसदीय क्षेत्र के लोगों द्वारा कत्लकर दिया जाता है और उसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ धार्मिक नगरी अपने यहाँ आश्रय देती है", ऐसे में उसी संसदीय क्षेत्र के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विश्व विद्यालय में उसी महान पुरुस अरमानों का क़त्ल जिसके कारन नहीं हो पाता और न होगा भी ऐसे में क्या वह योग्यता उस महापुरुष पर निर्भर है या उस महापुरुष को अपना ईस्टदेव मानता है? मेरे विचार से निर्भर तो नहीं पर ईस्टदेव मानता है क्योंकि वह योग्यता आयी ही उसी ईस्टदेव को अपना ईस्टदेव मानते हुए। अतः राम/कृष्ण से बड़ा राम/कृष्ण का नाम। जग में प्यारे हैं दो नाम। चाहे कृष्ण कहो या राम। और वे हैं अटल(राम रत्न) और जोशी(कृष्ण रत्न) उनके साथ तीसरा नाम है आद्यवानी(आडवाणी/बजरंग रत्न/शिव रुद्रावतार) जिसमे तीनों के नाम अभिप्राय कृष्ण ही है विहारी=कृष्ण का राशिनाम, मुरलीमनोहर(कृष्ण) और तीसरे स्वयं लाल कृष्ण हैं ही। -------इनके साथ चौथे स्वयं कलाम जो अपने में ही राम-कृष्ण है। -------जिस दो गाँव का मई निवासी हूँ वहा इन नामों से पूर्व गांधी(रामरत्न) , नेहरू(कृष्ण रत्न), बजरंग/शिव रुद्रावतार (सुभाष और पटेल) के साथ साथ इंदिरा(अम्बे दुर्गावतार) और कलाम-राजेन्द्र प्रशाद(राम-कृष्ण)बच्चे बच्चे की जिह्वा पर रहता था मेरे बचपन में।

उस योग्यता की परिकल्पना कीजिये, "जिसके दिशा निर्देशन पर एक राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय को एक केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने हेतु विधान(अध्यादेश:आर्डिनेंस) तैयार किया जाता है और जिसने किशी संसदीय क्षेत्र और देश के लिए ज्ञान और विज्ञान में अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय परिदृश्य के लिए और भविष्य के लिए दूरदर्शी ठोस योजना तैयार की और उनमे से कुछ योजनाओं को अपना कार्यकाल कार्यकाल रहते हुए पूराकरते हुए एक मिसाल स्थापित किया उसका उसी संसदीय क्षेत्र के लोगों द्वारा कत्लकर दिया जाता है और उसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ धार्मिक नगरी अपने यहाँ आश्रय देती है", ऐसे में उसी संसदीय क्षेत्र के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विश्व विद्यालय में उसी महान पुरुस अरमानों का क़त्ल जिसके कारन नहीं हो पाता और न होगा भी ऐसे में क्या वह योग्यता उस महापुरुष पर निर्भर है या उस महापुरुष को अपना ईस्टदेव मानता है? मेरे विचार से निर्भर तो नहीं पर ईस्टदेव मानता है क्योंकि वह योग्यता आयी ही उसी ईस्टदेव को अपना ईस्टदेव मानते हुए। अतः राम/कृष्ण से बड़ा राम/कृष्ण का नाम। जग में प्यारे हैं दो नाम। चाहे कृष्ण कहो या राम। और वे हैं अटल(राम रत्न) और जोशी(कृष्ण रत्न) उनके साथ तीसरा नाम है आद्यवानी(आडवाणी/बजरंग रत्न /शिव रुद्रावतार) जिसमे तीनों के नाम अभिप्राय कृष्ण ही है विहारी=कृष्ण का राशिनाम, मुरलीमनोहर(कृष्ण) और तीसरे स्वयं लाल कृष्ण हैं ही। -------इनके साथ चौथे स्वयं कलाम जो अपने में ही राम-कृष्ण है। -------जिस दो गाँव का मई निवासी हूँ वहा इन नामों से पूर्व गांधी(रामरत्न) , नेहरू(कृष्ण रत्न), बजरंग/शिव रुद्रावतार (सुभाष और पटेल) के साथ साथ इंदिरा(अम्बे दुर्गावतार) और कलाम-राजेन्द्र प्रशाद(राम-कृष्ण)बच्चे बच्चे की जिह्वा पर रहता था मेरे बचपन में।

Wednesday, June 25, 2014

श्रीकृष्ण और श्रीराम ही एक मात्र सजीव परमब्रह्म/अल्लाह/गॉड हैं जिसमे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य शक्तिया पूर्ण रूप में समाहित थीं मतलब स्वयं में ब्रह्मा, विष्णु और महेश थे विष्णु के अवतार में अपने जीवन में कर्मों की पूर्णता पूर्ण सत्य-पूर्ण प्रेम प्राप्त करने के कारन। -----------------बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में 1998-2000 में मेरे कुछ मित्रों ने कहा था की अब ब्राह्मण कहाँ रह गए और यही शब्द 2006-2007 पुनः दोहराये गए और दोनों बार मै कहा था की वैसे गोत्र-कश्यप के हिंसाब से मेरा तीसरा स्थान है और उपजाति-पाण्डेय के हिंसाब से पांचवा स्थान है फिर भी अगर दुनिया में ब्राह्मण नहीं रह गए तो मै दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण हूँ जो पूरे विश्व की एक तिहाई शक्ति का स्वामी हूँ जैसा की त्रिदेव की एक तिहाई शक्ति संचित है ब्राह्मणों में। -------यही नहीं थमा 2007-2009 में भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में जहां इसाईकरण के प्रबल अस्तित्व का असर हो जाता है केरल, तमिलनाडु और आँध्रप्रदेश के कारन वहां हिन्दू मित्रों ने कहा था की ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का अस्तित्व कहाँ रहा पर शायद अब उनको 1996-2004 तक ब्राह्मण, 2004-2014 तक क्षत्रिय और अब 2014 से वैश्य भी उन सबको नजर नही आये होंगे पर मुझे तो नजर आ रहे हैं और इन सबसे दूसरे धर्म के लोग भी प्रभावित नहीं हुए होंगे विशेषकर इस्लाम और ईसाइयत के सच्चे अनुयायी भी।

श्रीकृष्ण और श्रीराम ही एक मात्र सजीव परमब्रह्म/अल्लाह/गॉड हैं जिसमे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य शक्तिया पूर्ण रूप में समाहित थीं मतलब स्वयं में ब्रह्मा, विष्णु और महेश थे विष्णु के अवतार में अपने जीवन में कर्मों की पूर्णता पूर्ण सत्य-पूर्ण प्रेम प्राप्त करने के कारन। -----------------बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में 1998-2000 में मेरे कुछ मित्रों ने कहा था की अब ब्राह्मण कहाँ रह गए और यही शब्द 2006-2007 पुनः दोहराये गए और दोनों बार मै कहा था की वैसे गोत्र-कश्यप के हिंसाब से मेरा तीसरा स्थान है और उपजाति-पाण्डेय के हिंसाब से पांचवा स्थान है फिर भी अगर दुनिया में ब्राह्मण नहीं रह गए तो मै दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण हूँ जो पूरे विश्व की एक तिहाई शक्ति का स्वामी हूँ जैसा की त्रिदेव की एक तिहाई शक्ति संचित है ब्राह्मणों में। -------यही नहीं थमा 2007-2009 में भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में जहां इसाईकरण के प्रबल अस्तित्व का असर हो जाता है केरल, तमिलनाडु और आँध्रप्रदेश के कारन वहां हिन्दू मित्रों ने कहा था की ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का अस्तित्व कहाँ रहा पर शायद अब उनको 1996-2004 तक ब्राह्मण, 2004-2014 तक क्षत्रिय और अब 2014 से वैश्य भी उन सबको नजर नही आये होंगे पर मुझे तो नजर आ रहे हैं और इन सबसे दूसरे धर्म के लोग भी प्रभावित नहीं हुए होंगे विशेषकर इस्लाम और ईसाइयत के सच्चे अनुयायी भी।

Tuesday, June 24, 2014

कश्यप की अवहेलना पर दुर्वाशा के हाँथ में कमान जाती है और दुर्वाशा का श्राप भी न काम किया तो महादेव शिव के नटराज रूप या तांडव नृत्य की बारी ही आती है हांलांकि इस महादेव पर भी दुर्वाशा के श्राप के कारन पारवती से विवाह के समय इनको विष्णुसदृश:वैश्य:गृहस्थ बनाना पड़ा था और तभी से भारतीय शास्त्रीय शादी में हर किशी को पहले विष्णु(वैश्य:गृहस्थ) स्वरुप में लाया जाता है ("मंगलम भगवान विष्णु मंगलम गरुनध्वजह। मंगलम पुण्डरीकाक्षाय मंगलम तनो हरी॥" के पाठ से हर किशी को उस क्षण के लिए कम से कम हरी:विष्णु:वैश्य:गृहस्थ स्वरुप में लाया जाता है और तो और ब्राह्मणो और अन्य सन्दर्भ में में तो शर्मा:पंडित:विद्वान: श्रेष्ठ आर्य भी बनाया जाता है मंत्रोचार द्वारा )। -------कहने तात्पर्य यह की जिस कश्यप गोत्रीय का पैतृक स्थान दुर्वाशा के प्रथम स्थान दुर्वाशा आश्रम(आजमगढ़) से 15 किलोमीटर परिधि के अंदर हो मतलब दुर्वाशा की कृपादृष्टि जिनपर हो अगर वे सत्य का पालन नहीं कर/करवा सकते हैं तो भगवान शिव को नटराज स्वरुप में सर्व विनाश का रास्ता अपनाना ही अंतिम रास्ता होगा और ऐसे में यदि शिव को नटराज स्वरुप में आने से रोक लिया गया एक आजीवन ब्रह्मचर्य ब्राह्मण पुत्र को उनके रस्ते में रूकावट के रूप में ला कर तो क्या यह उचित और श्रेष्ठ कार्य नहीं रहा?(आजीवन ब्रह्मचर्य ब्राह्मण के पुत्र को रस्ते में आने पर उनका रूकना और क्रोध त्यागना निश्चित होता है क्योंकि वे उसका वध नहीं कर सकते हैं उसको रस्ते में से हटाने के लिए )।

कश्यप की अवहेलना पर दुर्वाशा के हाँथ में कमान जाती है और दुर्वाशा का श्राप भी न काम किया तो महादेव शिव के नटराज रूप या तांडव नृत्य की बारी ही आती है हांलांकि इस महादेव पर भी दुर्वाशा के श्राप के कारन पारवती से विवाह के समय इनको विष्णुसदृश:वैश्य:गृहस्थ बनाना पड़ा था और तभी से भारतीय शास्त्रीय शादी में हर किशी को पहले विष्णु(वैश्य:गृहस्थ) स्वरुप में लाया जाता है ("मंगलम भगवान विष्णु मंगलम गरुनध्वजह। मंगलम पुण्डरीकाक्षाय मंगलम तनो हरी॥" के पाठ से हर किशी को उस क्षण के लिए कम से कम हरी:विष्णु:वैश्य:गृहस्थ स्वरुप में लाया जाता है और तो और ब्राह्मणो और अन्य सन्दर्भ में में तो शर्मा:पंडित:विद्वान: श्रेष्ठ आर्य भी बनाया जाता है मंत्रोचार द्वारा )। -------कहने तात्पर्य यह की जिस कश्यप गोत्रीय का पैतृक स्थान दुर्वाशा के प्रथम स्थान दुर्वाशा आश्रम(आजमगढ़) से 15 किलोमीटर परिधि के अंदर हो मतलब दुर्वाशा की कृपादृष्टि जिनपर हो अगर वे सत्य का पालन नहीं कर/करवा सकते हैं तो भगवान शिव को नटराज स्वरुप में सर्व विनाश का रास्ता अपनाना ही अंतिम रास्ता होगा और ऐसे में यदि शिव को नटराज स्वरुप में आने से रोक लिया गया एक आजीवन ब्रह्मचर्य ब्राह्मण पुत्र को उनके रस्ते में रूकावट के रूप में ला कर तो क्या यह उचित और श्रेष्ठ कार्य नहीं रहा?(आजीवन ब्रह्मचर्य ब्राह्मण के पुत्र को रस्ते में आने पर उनका रूकना और क्रोध त्यागना निश्चित होता है क्योंकि वे उसका वध नहीं कर सकते हैं उसको रस्ते में से हटाने के लिए )।

Monday, June 23, 2014

5 गाँव जो मेरे बस्ती जनपद से आये हुए मेरे कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय सनातन ब्राह्मण पूर्वज बाबा सारंगधर(चन्द्रधर:शिव) को एक इस्लाम धर्म के अनुयायी(मुस्लिम) जागीरदार से मिले थे उसमे से 500 बीघा का एक गाँव रामपुर, आज़मगढ़-223225 जिसका स्वयं का गाँव हो और जो अपने जिस ननिहाल विशुनपुर, जौनपुर-223103 गाँव में जीवन का लगभग 25 वर्ष बिताया हो वह भी गोरखपुर से आये गौतम गोत्रीय वेयसी मिश्रा सनातन ब्राह्मण निवाजी बाबा को क्षत्रिय जागीरदार से ३०० बीघा जमीन का टुकड़ा रहा हो जिसमे से दोनों क्रमसः भगवान राम और भगवान विष्णु को समर्पित कर रामपुर और बिशुनपुर नाम से नामकरण पाये हों ऐसे बन्दे पर कोई वाद आप नहीं सिद्ध कर सकते हैं जिसकी की कुलदेवी भी देवकाली (सरस्वती-लक्ष्मी-गौरपरवती की सम्मिलित शक्ति) हो(Also myself and my sister born in the House of "Sanatan Vashishth Gotriya" i.e. in the House of my father's Maternal Uncles and spend 3-4 year there in my childhood)। -------जिसके परबाबा भी रामप्रसाद हो और परनाना भी रामप्रसाद हो यह अलग की एक पाण्डेय और दूसरे मिश्रा थे। उस पर भी नाना का कुल भी निवाजी बाबा के बाद रामानंद मिश्रा का कुल कहा जाता है जिनके भाई महेश और देवी कुल का संयोग किये थे। रामानंद-रामानुज-श्रीनिवास ये तीन नाम जिस कुल से जुड़े थे और सनातन ब्राह्मण कुल में श्रेष्ठ ब्राह्मणों में गिनती रही हो। और अंत में केवल इतना की हर सनातन ब्राह्मण परिवार स्वयं में ही एक अंतर-राष्ट्रीय स्वयं सेवक होता है क्योंकि सभी सप्तर्षि प्रारम्भ में ब्रह्मर्षि(सतोगुण) ही थे और इनमे से ही एक विश्वामित्र(कौशिक) ने राजर्षि(सतोगुण के साथ तमोगुण का भी प्रादुर्भाव हुआ इनमे) प्रथा प्रारम्भ की और उसके बाद राजर्षि से महर्षि(सतोगुण, तमोगुण के साथ रजोगुण का भी प्रादुर्भाव हुआ इनमे) श्रेणी का पदार्पण हुआ। इस प्रकार जो गौत्तम, वशिष्ठ, कश्यप/मारीच, भारद्वाज/अंगरीशा, जमदग्नि/भृगु, दुर्वाशा/सोम/दत्त/अत्रि और कौशिक(विश्वामित्र) गोत्र का ब्राह्मण है वह सनातन ब्राह्मण श्रेणी में आता है और ऐसे लोग सनातन ब्राह्मण अपने को निर्विवाद रूप से कह सकते हैं और भी ब्राह्मण जो ब्राह्मण जन्म और कर्म से श्रिष्टि के अंत से विरत न रहे हो वे भी सनातन ब्राह्मण में आते है वे चाहे इन सातों के व्युत्पन्न क्यों न हो क्योंकि इनकी सहनशीलता इतनी जरूर रही की किशी भी परिस्थिति और किशी भी आतंरिक व् वाह्य आक्रांता के दबाव के बावजूद भी सामाजिक रूप से ब्राह्मण धर्म से विरत नहीं हुए और उसी प्रकार वे सनातन हिन्दू भी धन्य है जो भी इन सब परिस्थितियों के बावजूद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा अन्य श्रेणी से विरत नहीं हुए और आज भी सनातन हिन्दू सामाजिक रूप से कहलाते हैं और वे लोग भी धन्य है जो हिन्दू धर्म में वापस आये या अन्य धर्म में गए परन्तु भारतभूमि(भरतखण्ड-अखंड भारत) और हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप:यूरेसिआ: यूरोप+ एशिया या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) में अपनी आस्था आज तक बनाये हुए हैं विश्व-व्यापक परिवेश में रहते हुए भी। जय हिन्द, जय भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।

http://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur      http://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur

5 गाँव जो मेरे बस्ती जनपद से आये हुए मेरे कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय सनातन ब्राह्मण पूर्वज बाबा सारंगधर(चन्द्रधर:शिव) को एक इस्लाम धर्म के अनुयायी(मुस्लिम) जागीरदार से मिले थे उसमे से 500 बीघा का एक गाँव रामपुर, आज़मगढ़-223225 जिसका स्वयं का गाँव हो और जो अपने जिस ननिहाल विशुनपुर, जौनपुर -223103 गाँव में जीवन का लगभग 25 वर्ष बिताया हो वह भी गोरखपुर से आये गौतम गोत्रीय वेयसी मिश्रा सनातन ब्राह्मण निवाजी बाबा को क्षत्रिय जागीरदार से ३०० बीघा जमीन का टुकड़ा रहा हो जिसमे से दोनों क्रमसः भगवान राम और भगवान विष्णु को समर्पित कर रामपुर और बिशुनपुर नाम से नामकरण पाये हों ऐसे बन्दे पर कोई वाद आप नहीं सिद्ध कर सकते हैं जिसकी की कुलदेवी भी देवकाली (सरस्वती-लक्ष्मी-गौरपरवती की सम्मिलित शक्ति) हो(Also myself and my sister born in the House of "Sanatan Vashishth Gotriya" i.e. in the House of my father's Maternal Uncles and spend 3-4 year there in my childhood)। -------जिसके परबाबा भी रामप्रसाद हो और परनाना भी रामप्रसाद हो यह अलग की एक पाण्डेय और दूसरे मिश्रा थे। उस पर भी नाना का कुल भी निवाजी बाबा के बाद रामानंद मिश्रा का कुल कहा जाता है जिनके भाई महेश और देवी कुल का संयोग किये थे। रामानंद-रामानुज-श्रीनिवास ये तीन नाम जिस कुल से जुड़े थे और सनातन ब्राह्मण कुल में श्रेष्ठ ब्राह्मणों में गिनती रही हो। और अंत में केवल इतना की हर सनातन ब्राह्मण परिवार स्वयं में ही एक अंतर-राष्ट्रीय स्वयं सेवक होता है क्योंकि सभी सप्तर्षि प्रारम्भ में ब्रह्मर्षि(सतोगुण) ही थे और इनमे से ही एक विश्वामित्र(कौशिक) ने राजर्षि(सतोगुण के साथ तमोगुण का भी प्रादुर्भाव हुआ इनमे) प्रथा प्रारम्भ की और उसके बाद राजर्षि से महर्षि(सतोगुण, तमोगुण के साथ रजोगुण का भी प्रादुर्भाव हुआ इनमे) श्रेणी का पदार्पण हुआ। इस प्रकार जो गौत्तम, वशिष्ठ, कश्यप/मारीच, भारद्वाज/अंगरीशा, जमदग्नि/भृगु, दुर्वाशा/सोम/दत्त/अत्रि और कौशिक(विश्वामित्र) गोत्र का ब्राह्मण है वह सनातन ब्राह्मण श्रेणी में आता है और ऐसे लोग सनातन ब्राह्मण अपने को निर्विवाद रूप से कह सकते हैं और भी ब्राह्मण जो ब्राह्मण जन्म और कर्म से श्रिष्टि के अंत से विरत न रहे हो वे भी सनातन ब्राह्मण में आते है वे चाहे इन सातों के व्युत्पन्न क्यों न हो क्योंकि इनकी सहनशीलता इतनी जरूर रही की किशी भी परिस्थिति और किशी भी आतंरिक व् वाह्य आक्रांता के दबाव के बावजूद भी सामाजिक रूप से ब्राह्मण धर्म से विरत नहीं हुए और उसी प्रकार वे सनातन हिन्दू भी धन्य है जो भी इन सब परिस्थितियों के बावजूद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा अन्य श्रेणी से विरत नहीं हुए और आज भी सनातन हिन्दू सामाजिक रूप से कहलाते हैं और वे लोग भी धन्य है जो हिन्दू धर्म में वापस आये या अन्य धर्म में गए परन्तु भारतभूमि(भरतखण्ड-अखंड भारत) और हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप:यूरेसिआ: यूरोप+ एशिया या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) में अपनी आस्था आज तक बनाये हुए हैं विश्व-व्यापक परिवेश में रहते हुए भी।*******जय हिन्द, जय भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।

Saturday, June 21, 2014

मुझे मेरिट की उस दिन के बाद से कोई आवश्यकता समझ नहीं आयी जब मेरे प्रयागराज विश्वविद्यालय के कुलगुरु जो रजस्व ब्राह्मण श्रेणी(कायस्थ) में आते हैं ने मेरे 29-10-2009 (कार्यालयी समय यही था पर वास्तव में पद भार ग्रहण का समय तो दूसरे दिन का अतिप्रारम्भकाल हो गया था मेरे समयसूचक यन्त्र द्वारा) को इसी विश्वविद्यालय में केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय केंद्र में एक शिक्षक के रूप में पद भार ग्रहण करने के दूसरे दिन मतलब 30-10-2009 को जब मै आशीर्वाद लेने गया तो वे पूंछे की कौन-२ पदभार कल ग्रहण किया तो मै उनको बताया की मेरे अनुज के अलावा आप के सभी शिष्य पदभार ग्रहण किये है लेकिन मै अपने अनुज के बिना अधूरा हूँ तो उस पर उन्होंने कहा की तुम्हारे साथ वे अनुज पदभार ग्रहण नहीं किये( इसका मुझे कस्ट है) पर तुम अपने में पूर्ण हो तुमको किशी और अंश की आवश्यकता नहीं है।----आप लोगों को सूचित करना चाहूँगा वर्मान शिक्षा प्रणाली में जब से एक विशेष गुरु की आवश्यकता हो जाती है उसमे से बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय में मेरे उपाधिपूरक परियोजना के निर्देशक प्रोफेसर सुबोध(विवेक) कान्त(कुमार) बोस भी रजस्व ब्राह्मण श्रेणी(कायस्थ) में आते हैं और जहां तक श्रोतों से मुझे ज्ञात है वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु के प्रोफेसर देवाशीष सेनगुप्ता भी रजस्व ब्राह्मण श्रेणी(कायस्थ) में आते हैं तो यह कोई जातिवाद या जाती प्रदर्शन नहीं वरन सबका एकीकरण मै प्रस्तुत कर रहा हूँ सप्तर्षियों के सभी संतानों का। एक वेतन भोगी होने के नाते मै केवल "सत्यम शिवम सुंदरम" ही दे सकता हूँ अपनी लेखनी से पर एक सनातन ब्राह्मण होने के नाते मै उस सत्य को भी जनता हूँ जिसमे मै 2002 में अपनी आख्या भेज दी थी सम्बंधित महापुरुष को जो प्रयागराज/अल्लाहआबाद और प्रयागराज/अल्लाहआबाद विश्वविद्यालय को इस सहस्राब्दी के समय विष्व परिवर्तन में जो संक्रमण काल और संक्रमण दोष था के निवारण का केंद्र बना दिए थे और वे लोग ही जानते थे की प्रयागराज/अल्लाहआबाद पूरे विश्व का केंद्र है और इसका पूरक केंद्र काशी(वाराणसी)। मै ऐसे महापुरुषों को सत-सत नमन करता हूँ जिन्होंने मुझे इस कार्य में प्रयागराज में रहकर एक सक्रिय कारक की भूमिका दी और इस विवेक के विवेक को परखे जाने का अवसर प्रदान कर मुझे पूर्ण व्यक्ति का दर्जा दिया।*******गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वरः गुरुर साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवेनमः।-----अगर ऐसे गुरु प्रयागराज-काशी-अयोध्या-मथुरा(वृन्दावन) से नहीं होंगे तो और कहाँ से होंगे जिनका घर से लेकर बाहर तक का एक-एक गुण, एक-एक ज्ञान और आचरण अनुकरणीय है हमें प्रयागराज-काशी-अयोध्या-मथुरा(वृन्दावन) की श्रेष्ठ संस्कृति को बनाये रखने में और उससे विश्व व्यवस्था को नियंत्रित करने में सहयोग करने में। मेरी आख्या यही थी की वर्तमान समय प्रयागराज/अल्लाहआबाद में जो यहां का सामाजिक पर्यावरण है प्रयागराज/अल्लाहआबाद के लोग जो जिम्मेदारी मिलाने वाली है उसे निभाने में सक्षम नहीं है अतः मै यहाँ से दूर काशी(वाराणसी) जाना चाहता हूँ| मेरे प्रयागराज के स्वयं के गुरु तो मेरे ही कुल के मतलब सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण और पाण्डेय भी है और ऐसे में मै ज्यादा नहीं बताना चाहूँगा।



मुझे मेरिट की उस दिन के बाद से कोई आवश्यकता समझ नहीं आयी जब मेरे प्रयागराज विश्वविद्यालय के कुलगुरु जो रजस्व ब्राह्मण श्रेणी(कायस्थ) में आते हैं ने मेरे 29-10-2009 (कार्यालयी समय यही था पर वास्तव में पद भार ग्रहण का समय तो दूसरे दिन का अतिप्रारम्भकाल हो गया था मेरे समयसूचक यन्त्र द्वारा) को इसी विश्वविद्यालय में केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय केंद्र में एक शिक्षक के रूप में पद भार ग्रहण करने के दूसरे दिन मतलब 30-10-2009 को जब मै आशीर्वाद लेने गया तो वे पूंछे की कौन-२ पदभार कल ग्रहण किया तो मै उनको बताया की मेरे अनुज के अलावा आप के सभी शिष्य पदभार ग्रहण किये है लेकिन मै अपने अनुज के बिना अधूरा हूँ तो उस पर उन्होंने कहा की तुम्हारे साथ वे अनुज पदभार ग्रहण नहीं किये( इसका मुझे कस्ट है) पर तुम अपने में पूर्ण हो तुमको किशी और अंश की आवश्यकता नहीं है।----आप लोगों को सूचित करना चाहूँगा वर्मान शिक्षा प्रणाली में जब से एक विशेष गुरु की आवश्यकता हो जाती है उसमे से बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय में मेरे उपाधिपूरक परियोजना के निर्देशक प्रोफेसर सुबोध(विवेक) कान्त(कुमार) बोस भी रजस्व ब्राह्मण श्रेणी(कायस्थ) में आते हैं और जहां तक श्रोतों से मुझे ज्ञात है वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु के प्रोफेसर देवाशीष सेनगुप्ता भी रजस्व ब्राह्मण श्रेणी(कायस्थ) में आते हैं तो यह कोई जातिवाद या जाती प्रदर्शन नहीं वरन सबका एकीकरण मै प्रस्तुत कर रहा हूँ सप्तर्षियों के सभी संतानों का। एक वेतन भोगी होने के नाते मै केवल "सत्यम शिवम सुंदरम" ही दे सकता हूँ अपनी लेखनी से पर एक सनातन ब्राह्मण होने के नाते मै उस सत्य को भी जनता हूँ जिसमे मै 2002 में अपनी आख्या भेज दी थी सम्बंधित महापुरुष को जो प्रयागराज/अल्लाहआबाद और प्रयागराज/अल्लाहआबाद विश्वविद्यालय को इस सहस्राब्दी के समय विष्व परिवर्तन में जो संक्रमण काल और संक्रमण दोष था के निवारण का केंद्र बना दिए थे और वे लोग ही जानते थे की प्रयागराज/अल्लाहआबाद पूरे विश्व का केंद्र है और इसका पूरक केंद्र काशी(वाराणसी)। मै ऐसे महापुरुषों को सत-सत नमन करता हूँ जिन्होंने मुझे इस कार्य में प्रयागराज में रहकर एक सक्रिय कारक की भूमिका दी और इस विवेक के विवेक को परखे जाने का अवसर प्रदान कर मुझे पूर्ण व्यक्ति का दर्जा दिया।*******गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वरः गुरुर साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवेनमः।-----अगर ऐसे गुरु प्रयागराज-काशी-अयोध्या-मथुरा(वृन्दावन) से नहीं होंगे तो और कहाँ से होंगे जिनका घर से लेकर बाहर तक का एक-एक गुण, एक-एक ज्ञान और आचरण अनुकरणीय है हमें प्रयागराज-काशी-अयोध्या-मथुरा(वृन्दावन) की श्रेष्ठ संस्कृति को बनाये रखने में और उससे विश्व व्यवस्था को नियंत्रित करने में सहयोग करने में। मेरी आख्या यही थी की वर्तमान समय प्रयागराज/अल्लाहआबाद में जो यहां का सामाजिक पर्यावरण है प्रयागराज/अल्लाहआबाद के लोग जो जिम्मेदारी मिलाने वाली है उसे निभाने में सक्षम नहीं है अतः मै यहाँ से दूर काशी(वाराणसी) जाना चाहता हूँ| मेरे प्रयागराज के स्वयं के गुरु तो मेरे ही कुल के मतलब सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण और पाण्डेय भी है और ऐसे में मै ज्यादा नहीं बताना चाहूँगा।----------------------
Pandey Vivek Kumar It does not mean I am against Merit but Merit which make man perfect or near to perfect is more important after an Age. मेरे प्रयागराज के स्वयं के गुरु तो मेरे ही कुल के मतलब सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण और पाण्डेय भी है और ऐसे में मै ज्यादा नहीं बताना चाहूँगा।

Friday, June 20, 2014

जब सतयुग का सूर्यवंशीय ग्वाला शिवांश(शिवभक्ति से शिवांश) राजा केदार को उनके शिवशक्तियों के दुरुपयोग और उनके शिवशक्ति नियंत्रण न कर पाने की वजह से समाज में घृणित कर्मों में मदांध हो लिप्त हो जाने से समाज को मुक्ति दिलाने हेतु उनका सिर काटकर केदारनाथ और पशुपति नाथ को जन्म दे सकता है तो वह निश्चित रूप से राजा केदार से बड़ा शिवांश रहा ही होगा अन्यथा यह संभव ही नहीं था। ऐसे में वही यदि सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण के यहां जन्म लिया हो तो उसके लिए शिवांश होने के नाते भगवान श्रीराम/कृष्ण ही उसके इस्वर होंगे क्योंकि श्रीराम/कृष्ण और स्वयं शिव में व्यापक रूप में आने पर कोई विभेद नहीं रह जाता है और जो अंतर होता भी है तो वही दोनों ही समझ पाते हैं और वह श्रीराम/कृष्ण के लिए कितने ही कठिन कार्य क्यों नहीं कर सकता और वह उनके लिए इस प्रकार मानवता के हित में क्या नहीं कर सकता है? पर यह सब सनातन ब्राह्मणत्व की सीमा के अंदर ही रहकर अन्यथा सब पुण्य प्रायश्चित में बदलने की वजह से ब्राह्मणकुल से विमुख होना पड़ सकता है।जब सतयुग का सूर्यवंशीय ग्वाला शिवांश(शिवभक्ति से शिवांश) राजा केदार को उनके शिवशक्तियों के दुरुपयोग और उनके शिवशक्ति नियंत्रण न कर पाने की वजह से समाज में घृणित कर्मों में मदांध हो लिप्त हो जाने से समाज को मुक्ति दिलाने हेतु उनका सिर काटकर केदारनाथ और पशुपति नाथ को जन्म दे सकता है तो वह निश्चित रूप से राजा केदार से बड़ा शिवांश रहा ही होगा अन्यथा यह संभव ही नहीं था। ऐसे में वही यदि सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण के यहां जन्म लिया हो तो उसके लिए शिवांश होने के नाते भगवान श्रीराम/कृष्ण ही उसके इस्वर होंगे क्योंकि श्रीराम/कृष्ण और स्वयं शिव में व्यापक रूप में आने पर कोई विभेद नहीं रह जाता है और जो अंतर होता भी है तो वही दोनों ही समझ पाते हैं और वह श्रीराम/कृष्ण के लिए कितने ही कठिन कार्य क्यों नहीं कर सकता और वह उनके लिए इस प्रकार मानवता के हित में क्या नहीं कर सकता है? पर यह सब सनातन ब्राह्मणत्व की सीमा के अंदर ही रहकर अन्यथा सब पुण्य प्रायश्चित में बदलने की वजह से सनातन ब्राह्मणकुल से विमुख होना पड़ सकता है।

जब सतयुग का सूर्यवंशीय ग्वाला शिवांश(शिवभक्ति से शिवांश) राजा केदार को उनके शिवशक्तियों के दुरुपयोग और उनके शिवशक्ति नियंत्रण न कर पाने की वजह से समाज में घृणित कर्मों में मदांध हो लिप्त हो जाने से समाज को मुक्ति दिलाने हेतु उनका सिर काटकर केदारनाथ और पशुपति नाथ को जन्म दे सकता है तो वह निश्चित रूप से राजा केदार से बड़ा शिवांश रहा ही होगा अन्यथा यह संभव ही नहीं था। ऐसे में वही यदि सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण के यहां जन्म लिया हो तो उसके लिए शिवांश होने के नाते भगवान श्रीराम/कृष्ण ही उसके इस्वर होंगे क्योंकि श्रीराम/कृष्ण और स्वयं शिव में व्यापक रूप में आने पर कोई विभेद नहीं रह जाता है और जो अंतर होता भी है तो वही दोनों ही समझ पाते हैं और वह श्रीराम/कृष्ण के लिए कितने ही कठिन कार्य क्यों नहीं कर सकता और वह उनके लिए इस प्रकार मानवता के हित में क्या नहीं कर सकता है? पर यह सब सनातन ब्राह्मणत्व की सीमा के अंदर ही रहकर अन्यथा सब पुण्य प्रायश्चित में बदलने की वजह से सनातन ब्राह्मणकुल से विमुख होना पड़ सकता है।

Wednesday, June 18, 2014

ऐसे रति राजनीति करने वालों का साथ जो पार्वती जी को भी मलिन वस्ती में भेजने के बाद भी नहीं सर्माते है और अगर यह पारवती के साथ तो और देवियाँ तो अपने लक्ष्य से बहुत जल्दी विचलित हो जाती है तो उनका क्या करते होंगे? नहीं यह नहीं हो सकता है क्योंकि मेरे नाना श्रद्धेय श्री रमानाथ मिश्र (जो प्रयागराज के ही गुरुकुल में शिक्षा पायी थी और प्रथम श्रेणी ही नहीं प्रथम स्थान पाया था अपने गुरुकुल में) ने कहा था की जिस मित्रता, शिक्षा और धन से स्वाभिमान, मन, चरित्र और अपना धर्म आहत हो उस मित्रता, शिक्षा और धन को छोड़ देना ही श्रेष्कर।


Re: Referenced with Lord Shri Ram there are words of Lord Shiva-Mahadev to Devi Parwati, which is a direction of moral duties for the social person according him(quoted from Shri Ramcharit Manas by Goswami Tulasi Das): सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।।नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।।सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।।धन्य देस सो जहँ सुरसरी बहइ । धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।।धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।।सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।। धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत।।127।। Note: धन्य सो भूप नीति जो करई(नीतियों और नियमों के अनुसार शासन करे) , धन्य सो विप्र(ब्राह्मण) निज धर्म न टरई(धर्म से कभी भी विरट न हो)। सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (जिस कुल में सम्पूर्ण जगत के पूज्य पवित्रता से श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का जन्म हुआ हो मतलब शूर्यवंश/इक्शाकुवंश/रघुवंश धन्य है ) । श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत(उस रघुबीर श्रीराम का प्रेमी ह्रदय वही है जिसमे विनीत का जन्म हो या जिसमे विनम्रता और विनयशीलता हो) ॥ ------------------------------------------------------------------------श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है।*******जय हिन्द(जम्बू द्वीप= यूरेसिअ=यूरोप +एशिया; या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्ड), जयश्रीराम/कृष्ण। JAI HIND(JAMBOO DWEEP:EURESIA:EUROP+ASIA OR HIND= JAMBOO DWEEP MEANT BY AT LEAST IRAN TO SINGAPUR & KASHMIR TO KANYAKUMARI), JAI BHARAT(AKHAND BHARAT:BHARATAKHAND), JAI SHRI RAM/KRISHNA.---------For an Indian it is better to say Jai Hind-Jai Bharat than to say Jai Bharat only.

Re: Referenced with Lord Shri Ram there are words of Lord Shiva-Mahadev to Devi Parwati, which is a direction of moral duties for the social person according him(quoted from Shri Ramcharit Manas by Goswami Tulasi Das):
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।।नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।।सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।।धन्य देस सो जहँ सुरसरी बहइ । धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।।धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।।सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।।
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत।।127।।

Note: 
धन्य सो भूप नीति जो करई(नीतियों और नियमों के अनुसार शासन करे) , धन्य सो विप्र(ब्राह्मण) निज धर्म न टरई(धर्म से कभी भी विरट न हो)। सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (जिस कुल में सम्पूर्ण जगत के पूज्य पवित्रता से श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का जन्म हुआ हो मतलब शूर्यवंश/इक्शाकुवंश/रघुवंश धन्य है ) । श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत(उस रघुबीर श्रीराम का प्रेमी ह्रदय वही है जिसमे विनीत का जन्म हो या जिसमे विनम्रता और विनयशीलता हो) ॥ ------------------------------------------------------------------------श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है।*******जय हिन्द(जम्बू द्वीप= यूरेसिअ=यूरोप +एशिया; या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्ड), जयश्रीराम/कृष्ण। 
JAI HIND(JAMBOO DWEEP:EURESIA:EUROP+ASIA OR HIND= JAMBOO DWEEP MEANT BY AT LEAST IRAN TO SINGAPUR & KASHMIR TO KANYAKUMARI), JAI BHARAT(AKHAND BHARAT:BHARATAKHAND), JAI SHRI RAM/KRISHNA.---------For an Indian it is better to say Jai Hind-Jai Bharat than to say Jai Bharat only.-
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History of KURUVANSH/Chandra Vansh (Hastinapur-Meerut:Kuruvansh origin, and Indraprasth-Delhi: Panduvansh originated from Kuruvansh) and his relation with Parashar/Vyash Rishi: Parashar accredited for being the author of the first Purana: Vishnu Purana (before his Son Veda Vyasa wrote it in its present form). He was the grandson of Vashista, the son of Śakti Maharṣi, and the father of Veda Vyasa. According to the Vedas, Brahma created Vashista who with Arundhati had a son named [Shakti-muni] who sired Parashara. With (Satyavati), Parashara fathered [Vyasa]. Vyāsa sired Dhritrastr, Pandu and Vidura through his deceased brother's wives. Vyāsa also sired Śuka through his wife, Jābāli's daughter Pinjalā (Vatikā). Thus Parashara was the great-grandfather of both the warring parties of the Mahābhārata, the Kauravas and thePāndavas. Parashra is used as a gotra for the ancestors and their offsprings thereon. Parashara also blessed Satyavati with a Son and named him Vyasa. Leaving Satyavati in the care of Vyasa, Parashara proceeded to perform Tapas (intense meditation). Later Vysasa also turned into a Rishi and Satyavati returned to her father's house, and in due course, married Śantanu:Kuruvanshiya/Chandravanshiya (actual father of Dhritrastr, Pandu and Vidura:- ---But this marriage like marriage of Indira Gnadhi also not violated the classical rule of Hindu marriage because Santanu was socially, religiously and by royal rule: constitutional law was in the limit of Brahmin, Kshatriya and Vaisya: As by this rule the bridge should be or he has accepted himself Brahmin or Kshtariya or Vaisya before marriage by social, religious and constitutional law).---It is not a Chandravansh's initial history but it is history of a part of Chandravansh i.e. Kuruvansh-Panduvansh(originated from Kuruvansh) in Dwaapar Yug.


History of KURUVANSH/Chandra Vansh (Hastinapur-Meerut:Kuruvansh origin, and Indraprasth-Delhi: Panduvansh originated from Kuruvansh) and his relation with Parashar/Vyash Rishi: Parashar accredited for being the author of the first Purana: Vishnu Purana (before his Son Veda Vyasa wrote it in its present form). He was the grandson of Vashista, the son of Śakti Maharṣi, and the father of Veda Vyasa. According to the Vedas, Brahma created Vashista who with Arundhati had a son named [Shakti-muni] who sired Parashara. With (Satyavati), Parashara fathered [Vyasa]. Vyāsa sired Dhritrastr, Pandu and Vidura through his deceased brother's wives. Vyāsa also sired Śuka through his wife, Jābāli's daughter Pinjalā (Vatikā). Thus Parashara was the great-grandfather of both the warring parties of the Mahābhārata, the Kauravas and thePāndavas. Parashra is used as a gotra for the ancestors and their offsprings thereon. Parashara also blessed Satyavati with a Son and named him Vyasa. Leaving Satyavati in the care of Vyasa, Parashara proceeded to perform Tapas (intense meditation). Later Vysasa also turned into a Rishi and Satyavati returned to her father's house, and in due course, married Śantanu:Kuruvanshiya/Chandravanshiya (actual father of Dhritrastr, Pandu and Vidura:- ---But this marriage like marriage of Indira Gnadhi also not violated the classical rule of Hindu marriage because Santanu was socially, religiously and by royal rule: constitutional law was in the limit of Brahmin, Kshatriya and Vaisya: As by this rule the bridge should be or he has accepted himself Brahmin or Kshtariya or Vaisya before marriage by social, religious and constitutional law).
It is not a Chandravansh's initial history but it is history of a part of Chandravansh i.e. Kuruvansh-Panduvansh(originated from Kuruvansh) in Dwaapar Yug.

Monday, June 16, 2014

Nehru

Definition of Nehru: One who loves every living and non-living in this Universe(The person who do Neh:Prem:Love with every living and non-living). In the till date history of the world Lord Shiva is the 1st and Lord Shri Ram/Krishna is the 2nd greatest Nehru.

Saturday, June 14, 2014

Indian National Tree and Logo of University of Allahabad:University of Allahabad's Motto: Quot Rami Tot Arbores — Every Branch yield a tree;As Many Branches as Many Trees:Indian National Tree: Banayan Tree: On whose Leaves, Branches and Roots there is presence of Lord Brahma, Vishnu and Mahesh respectively i.e presence of TRINITY:TRIMURTI:TRIDEV University of Allahabad's Motto: Quot Rami Tot Arbores — Every Branch yield a tree:As Many Branches as Many Trees





Indian National Tree and Logo of University of Allahabad:-University of Allahabad's Motto: Quot Rami Tot Arbores — Every Branch yield a tree;As Many Branches as Many Trees:Indian National Tree: Banayan Tree: On whose Leaves, Branches and Roots there is presence of Lord Brahma, Vishnu and Mahesh respectively i.e presence of TRINITY:TRIMURTI:TRIDEV 
University of Allahabad's Motto: Quot Rami Tot Arbores — Every Branch yield a tree:As Many Branches as Many Trees

भगवान शिव शंकर जी के शिखर को सुभोभित करने वाला और उनके शिखर पर रहकर स्वयं सुशोभित होने वाला काली माँ का सबसे प्यारा पुत्र द्वितीया का गौरवर्णीय(चमकीला) चन्द्रमा ही भगवान शिवशंकर को चन्द्रधर, शशिधर, राकेशधर और सारंगधर जैसे नामों से अलंकृत करता है। और यही चन्द्रमा का प्रभाव उनको शनिवारीय से सोमवारीय भी बना देता है जिसके कारन शनिवार के साथ ही और सोमवार भगवान शिव साधना-वन्दना-उपासना-अर्चना-आराधना का विशेष दिन हो जाता है जैसे वृहस्पतिवार भगवान विष्णु की साधना-वन्दना-उपासना-अर्चना-आराधना के लिए विशेष दिन है। मंगलवार हर प्रकार के संकट को काटने वाले संकटमोचन हनुमान जी का एक विशेस दिन है शनिवार के साथ क्योंकि शनि सूर्य(रवि) के पुत्र है औरसत्य और न्याय को प्रकट करता है। अतः न्याय और सत्य मानव के लिए कभी कभी असह्य हो जाते हैं स्वाभाविक और व्यवहारिक मानव जीवन में होने वाली गलतियों के एक साथ प्रकट हो जाने से इस लिए उससे उबरने के लिए मतलब सूर्य(रवि) पुत्र शनि द्वारा निर्धारित पाप को काटने के लिए सूर्य(रवि) के शिष्य हनुमान की साधना-वन्दना-उपासना-अर्चना-आराधना हमें इस संकट से मुक्ति देती है और एक इस कस्ट से उबरने में हमें आत्मबल प्रदान करती है।


Panchvati: Collection Of Five Trees:- Though it is customary to call any place with a variety of flowering and evergreen trees a panchvati, the term actually refers to a group of five trees which possess certain medicinal properties. These trees, besides providing the needed thick shade, exude a variety of pheromonal secretions which are capable of cleaning environmental pollutions and mental pollutions of human beings, in addition to having high herbal and medicinal qualities. These trees represented the five elements of Earth, Water, Fire, Air and Ether. Panchavati in truth is an inexhaustible pharmacy on earth. The Panchvati are surrounded by five tree species - Peepul (ficus religiosa), Banyan, Bili, Ashoka and Amla( पीपल, वरगद, पाकड़-गूलर, अशोक, आंवला respectively) which represent the above five elements of nature. According to the Brahmapurana they have to be planted in a particular order as follows:– Banyan Tree in the East. Peepal Tree in the West. Amalaka Tree in the South. Bilwa Tree in the North. Ashoka Tree in the South – East.


Thursday, June 12, 2014

जिसको न पता हो जान ले की विश्व के प्रथम सबसे बड़े नेहरू(नेह=प्रेम करने वाला) स्वयं भगवान शिव थे और दूसरे सबसे बड़े नेहरू श्रीराम/कृष्ण थे और मेरा सौभाग्य है की में प्रयागराज/अल्लाहआबाद विश्वविद्यालय के नेहरू विज्ञान केंद्र प्रांगण के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ययन केंद्र में एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। -------मित्रों मै वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु में 2008 में कहा था की मै सत्य से या सब माताओं के सर से पर्दा या नकाब अभी ही उठवा दूँ, पर अभी इससे विश्व के सभी शूर्यों की आभा मलिन पद जाएगी अन्यथा मुझे तो सब पहले ही ज्ञात हो चुका था उसी समय जब मै प्रभावकारी ही नहीं था समाज में तो मित्र वर्तमान समय अंतराल एक उचित समय था और मै वह कर दिया मेरे ब्लॉग "Vivekanand and Modern tradition" को पढ़ लीजियेगा पूर्ण रूप से तब कोई एक निर्णय और समालोचना पर पहुँचिएगा। ---- तो पूरी दुनिया सनातन हिन्दू है लेकिन इस्लाम और ईसाइयत भी जरूरी है प्राकृतिक और सामाजिक शक्ति संतुलन की दृस्टि से। अतः ये श्रीराम और श्रीकृष्ण मतावलम्बियों के सामानांतर काम करते है जिससे सत्य नंगा न होकर "सत्यम शिवम सुंदरम" के रूप में रहे। समाज हित में पूर्ण सत्य आवश्यक हो जाने पर ये हिन्दू, इस्लाम और ईसाइयत एक हो जाते है और समाज को नस्ट होने से बचाते है जिससे की ब्रह्मा की वरदान स्वरूपा यह सृस्टि जिसका की केंद्र प्रयागराज है का अंत न हो जाय।

जिसको न पता हो जान ले की विश्व के प्रथम सबसे बड़े नेहरू(नेह=प्रेम करने वाला) स्वयं भगवान शिव थे और दूसरे सबसे बड़े नेहरू श्रीराम/कृष्ण थे और मेरा सौभाग्य है की में प्रयागराज/अल्लाहआबाद विश्वविद्यालय के नेहरू विज्ञान केंद्र प्रांगण के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय अध्ययन केंद्र में एक शिक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। -------मित्रों मै वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु में 2008 में कहा था की मै सत्य से या सब माताओं के सर से पर्दा या नकाब अभी ही उठवा दूँ, पर अभी इससे विश्व के सभी शूर्यों की आभा मलिन पद जाएगी अन्यथा मुझे तो सब पहले ही ज्ञात हो चुका था उसी समय जब मै प्रभावकारी ही नहीं था समाज में तो मित्र वर्तमान समय अंतराल एक उचित समय था और मै वह कर दिया मेरे ब्लॉग "Vivekanand and Modern tradition" को पढ़ लीजियेगा पूर्ण रूप से तब कोई एक निर्णय और समालोचना पर पहुँचिएगा। ---- तो पूरी दुनिया सनातन हिन्दू है लेकिन इस्लाम और ईसाइयत भी जरूरी है प्राकृतिक और सामाजिक शक्ति संतुलन की दृस्टि से। अतः ये श्रीराम और श्रीकृष्ण मतावलम्बियों के सामानांतर काम करते है जिससे सत्य नंगा न होकर "सत्यम शिवम सुंदरम" के रूप में रहे। समाज हित में पूर्ण सत्य आवश्यक हो जाने पर ये हिन्दू, इस्लाम और ईसाइयत एक हो जाते है और समाज को नस्ट होने से बचाते है जिससे की ब्रह्मा की वरदान स्वरूपा यह सृस्टि जिसका की केंद्र प्रयागराज है का अंत न हो जाय।

यह प्रयागराज नगरी है और रावणवध की रूप रेखा यही तय हुई थी भारद्वाज ऋषि की कुटिया में जिसमे भगवान श्रीराम का अगस्त्य(कुम्भज) ऋषि से मिलान और तत्पश्चात हनुमान और सुग्रीव मिलान तय हुआ था। अतः ऐसे में प्रयागराज के रक्षक हनुमान का प्रसंग न आये तो ठीक नहीं जिनके पुत्र मकरध्वज के देश को लोग तथा कथित विश्व का सर्शक्तिशाली देश कहते हो। पर क्या करें मकरध्वज के अभिकर्ता (एजेंट) हनुमान और श्रीराम/कृष्ण से ही टकरा जाते हैं तो 9-11 तो हो ही जाएगा न पर उनको नहीं पता की अभी 9-9 और 11-11 का तोड़ दुनिया में कोई है तो वह स्वयं प्रेम हैं। ---------------भरत भाई कपि से उऋण हम नाही: भीम राव रामजी अम्बेडकर (अम्बवादेकर =हनुमान) में कोई एक ऐसा शब्द बता दीजिये की वह धर्म सम्मत न हो और धर्मानुसार धर्मरक्षा में अति महत्त्व का न हो।


Myself recently approved fact in latest 20 years of life and I can prove it on any stage of the world and also among various type of societies: --------------श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है।*******जय हिन्द(जम्बू द्वीप= यूरेसिअ=यूरोप +एशिया; या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्ड), जयश्रीराम/कृष्ण। JAI HIND(JAMBOO DWEEP:EURESIA:EUROP+ASIA OR HIND= JAMBOO DWEEP MEANT BY AT LEAST IRAN TO SINGAPUR & KASHMIR TO KANYAKUMARI), JAI BHARAT(AKHAND BHARAT:BHARATAKHAND), JAI SHRI RAM/KRISHNA.---------For an Indian it is better to say Jai Hind-Jai Bharat than to say Jai Bharat only.


Wednesday, June 11, 2014

भारतीय उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश आफताब आलम और रंजना प्रकाश ने 2012 में निर्णय दिया की अगर अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक या अन्य श्रेणी के बीच विवाह सम्बन्ध किशी कारणवस स्थापित हो जाते हैं तो संतान की जाती और धर्म/श्रेणी वही होगा जिसकी परिस्थिति में बच्चा पलता है मतलब मातृपक्ष या पितृपक्ष। अतः मित्रों हम यह मान भी लें की आर्य(मेरे जैसे लोग) बाहर से भी आये तो जब आधुनिक भारतीय इतिहास कहता है की बाबर के भी केवल शाही परिवार मतलब केवल बाबर के परिवार की स्त्रियों को छोड़कर कोई भी बाहरी आक्रमणकारी या आगंतुक अपने साथ स्त्रियों का समूह नहीं लाया और पुरुस ही आये तो भी जब हम अपने मातृपक्ष मतलब भारत माँ की बेटिओं के यहां ही पले तो भी इस भारतीय उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश आफताब आलम और रंजना प्रकाश के 2012 में दिए निर्णय के अनुसार जब मेरी माताओं ने मुझे अपने पिता और माता मतलब भारत और भारतमाता के यहां पाला मतलब हम मातृपक्ष में पाला तब भी हम सभी भारतीय सनातन हिन्दू और सनातन हिंदुस्थानी हुए क्योंकि यह सनातन हिन्दुओं का देश है। अतः आधुनिक इतिहाश और संविधान भी हमें बाहरी नहीं कह सकता। पर मेरे विचार से पूरी श्रिष्टि मतलब पूरा विश्व सप्तर्षियों की संतान है जिनका जन्म प्रयाग में हुआ ब्रह्मा और सरस्वती के प्रकृष्टा या सप्तर्षि प्राकट्य यज्ञ से तो हमें मिली-जुली संस्कृति जन्म से मिली है इसमे नस्लवाद नहीं होना चाहिए पर सुन्दर संसार के लिए गोर ज्यादा हों तो सभी के लिए अच्छा रहेगा क्योंकि कालीमां के लिए भी उनका स्वयं का द्वितीय का चन्द्रमाँ जो शिव जी के शिखर की शोभा बढ़ाता है वह ही ज्यादा उनको प्रिय है। अतः आधे गोर और आधे काले इस संसार में हों जैसी बात नहीं होनी चाहिए इसका निर्णय स्वयं प्रकृति मतलब मातृ शक्ति पर छोड़ देना चाहिए।


Myself recently approved fact in latest 20 years of life and I can prove it on any stage of the world and also among various type of societies: --------------श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है।*******जय हिन्द(जम्बू द्वीप= यूरेसिअ=यूरोप +एशिया; या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्ड), जयश्रीराम/कृष्ण।


अशोक चक्र को तोड़ने वालों को सजा मिलेगी ही किन्तु वह प्राणदंड नहीं होगा उससे भी ज्यादा कस्टदायी चिरंजीवी दंड होगा और अगर सजा नहीं मिली तो सुशासन नहीं दुशासन का राज्य कायम होगा इस विश्व में। ------न तो कंधार को चन्द्रवंशीय भूल सकते हैं और न तो हिन्दुकुश को शूर्यवंशीय/इक्शाकुवंशीय/रघुवंशीय।-----अशोकचक्र जिस पर 2001 से कुदृस्ति पडी थी और कई बार आघात हुआ था 2002 -2007 तक और जो अन्तत 2008 टूटा गया था इसका ठोस प्रमाण उपलब्ध है एक मानव जीवन के रूप में तो सजा तो बनती है न? *******जय हिन्द/भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।


Tuesday, June 10, 2014

भीम भातृप्रेमी(धर्मराज युधिस्ठिर व् अन्य) और स्त्रीय जाती(द्रौपदी) के आन-बाण-शान के प्रति समर्पित पति और श्रीकृष्ण की बुआ के कुंती के पुत्र और वही हनुमान (अम्ब्वाडेकर=अम्बेडकर) भगवान विष्णु(श्रीराम/कृष्ण समेत सभी विष्णु अवतार) के अनन्य भक्त और पवनसुत तथा रूद्र(शिव) के अवतार(अंश)।----------इसमे से कौन सा चरित्र हमें धर्म, समाज और विशेष कर नारी की रक्षा और अधिकार और सम्मान की निःस्वार्थ रक्षा नहीं शिखाता है? दुनिया में सबसे बड़ा मातृ(अम्ब) भक्त और माँ:भारत माँ:पृथ्वीमाँ (अम्ब) से किया हुआ वादा पूर्ण करने वाला अम्बवादेकर:अम्बेडकर(हनुमान) स्वयं श्रीराम/कृष्ण भक्त है तो श्रीराम/कृष्ण और उसके वन्दे के विपरीत स्वयं अम्बवादेकर:अम्बेडकर(हनुमान) और उनके ही भक्त कैसे जा सकते हैं?

भीम भातृप्रेमी(धर्मराज युधिस्ठिर व् अन्य) और स्त्रीय जाती(द्रौपदी) के आन-बाण-शान के प्रति समर्पित पति और श्रीकृष्ण की बुआ के कुंती के पुत्र और वही हनुमान (अम्ब्वाडेकर=अम्बेडकर) भगवान विष्णु(श्रीराम/कृष्ण समेत सभी विष्णु अवतार) के अनन्य भक्त और पवनसुत तथा रूद्र(शिव) के अवतार(अंश)।----------इसमे से कौन सा चरित्र हमें धर्म, समाज और विशेष कर नारी की रक्षा और अधिकार और सम्मान की निःस्वार्थ रक्षा नहीं शिखाता है? दुनिया में सबसे बड़ा मातृ(अम्ब) भक्त और माँ:भारत माँ:पृथ्वीमाँ (अम्ब) से किया हुआ वादा पूर्ण करने वाला अम्बवादेकर:अम्बेडकर(हनुमान) स्वयं श्रीराम/कृष्ण भक्त है तो श्रीराम/कृष्ण और उसके वन्दे के विपरीत स्वयं अम्बवादेकर:अम्बेडकर(हनुमान) और उनके ही भक्त कैसे जा सकते हैं?

मित्रों लोग गुरुकुल और कुलगुरु को शिक्षा लेने बाद गुरु दक्षिणा देते हैं पर उस व्यक्तित्व से पूँछिये जो गुरुकुल और कुलगुरु(जिसकी इक्षा का समर्थन 115 में से केवल 5-10 ऋषियों और मनीषियों ने की थी और प्रयागराज विश्वविद्यालय को किसी कार्य विशेष हेतु उचित स्थान नहीं बताया था जिसका कारन हो सकता है की वे न जानते रहे हों की सातों सप्तर्षि=ब्रह्मर्षि का जन्म स्थान प्रयागराज ही है और स्वयं सरस्वती का उद्गम स्थल भी यही है तथा त्रिदेव=त्रिमूर्ति का वास भी यही ही है) की इक्षापूर्ति और गुरुकुल की श्रीवृद्धि हेतु गुरुकुल और गुरु के पास आने से पूर्ण यह ऋण चुक्ता किया हो और इसके लिए अपना जीवन दांव पर ही नहीं लगाया हो वरन उससे आगे जा उस अपमान और आरोप का घूँट भी पीया हो जो शूद्रतम अपराध वह अपने जीवन में भूल कर भी न की हो और स्वयं दूसरों को भी सच्चाई पर चलने की रह सिखाई हो। यही नहीं व्यक्ति विशेष के हित को ही हत्या समझाया गया हो अभिशाप हेतु।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप: यूरेसिआ: यूरोप+एशिया: कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भरतखण्ड:अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।

मित्रों लोग गुरुकुल और कुलगुरु को शिक्षा लेने बाद गुरु दक्षिणा देते हैं पर उस  व्यक्तित्व से पूँछिये जो गुरुकुल और कुलगुरु(जिसकी इक्षा का समर्थन 115 में से केवल 5-10 ऋषियों और मनीषियों ने की थी और प्रयागराज विश्वविद्यालय को किसी कार्य विशेष हेतु उचित स्थान नहीं बताया था जिसका कारन हो सकता है की वे न जानते रहे हों की सातों सप्तर्षि=ब्रह्मर्षि का जन्म स्थान प्रयागराज ही है और स्वयं सरस्वती का उद्गम स्थल भी यही है तथा त्रिदेव=त्रिमूर्ति का वास भी यही ही है) की इक्षापूर्ति और गुरुकुल की श्रीवृद्धि हेतु गुरुकुल और गुरु के पास आने से पूर्ण यह ऋण चुक्ता किया हो और इसके लिए अपना जीवन दांव पर ही नहीं लगाया हो वरन उससे आगे जा उस अपमान और आरोप का घूँट भी पीया हो जो शूद्रतम अपराध वह अपने जीवन में भूल कर भी न की हो और स्वयं दूसरों को भी सच्चाई पर चलने की रह सिखाई हो। यही नहीं व्यक्ति विशेष के हित को ही हत्या समझाया गया हो अभिशाप हेतु।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप: यूरेसिआ: यूरोप+एशिया: कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भरतखण्ड:अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।

शांडिल्य गोत्रीय संदीपनी शांडिल्य ऋषि वशुदेव के कुलगुरु(शांडिल्य गोत्रीय: जिसका ईस्टदेव पूर्ण चन्द्र हो और जो वर्तमान के पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के शारदा गाँव में जन्म लिया हुआ हो और वशिष्ठ ऋषि और कश्मीर को वसाने वाले कश्यम ऋषि के कुल की कन्या का संतान हो, और वैसे भी वशुदेव वृस्तिवंशीय/ यदुवंशीय/ चन्द्र वंशीय क्षत्रिय थे का कुलगुरु यदि वह हो जिसका ईस्टदेव स्वयं पूर्ण चन्द्र हो तो सोने पर सुहागा होता ही है) थे और वही संदीपनी ऋषि(जिनके मरे हुए पुत्र पुनरदत्त को बलराम और श्रीकृष्ण ने गुरु दक्षिणा स्वरुप पुनः यमराज से लेकर जीवित लौटाया था ) बाद में कंश वध के बाद बलराम, श्रीकृष्ण और सुदामा के गुरु हुए और संदीपनी आश्रम उनका गुरकुल बना जबकि अत्यधिक समयतक संपर्क में रहने के बाद भी नन्द बाबा के कुलगुरु जो गर्ग गोत्रीय थे को कृष्ण के गुरु होने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हो सका नन्द गाँव छोड़ देने के कारन।------------इस प्रकार वशिष्ठ ऋषि जो शूर्यवंश के गुरु वंसज चन्द्रवंश की कुलगुरु प्रथा में सहभागी हुए यह एक अप्रतिम सम्बन्ध और अप्रतिम कड़ी है शूर्यवंश और चन्द्रवंश के बीच की जिसका सिरमौर महर्षि व्यासः/परासर जी हुए जो महाभारत जैसे महाकाव्य, 4 वेद, 18 पुराण और परमब्रह्म श्रीकृष्ण के भाष्य श्रीमद्भागवत गीता को संकलित करमानव सभ्यता को अमूल्य उपहार दिए धर्म की रक्षा हेतु।

शांडिल्य गोत्रीय संदीपनी शांडिल्य ऋषि वशुदेव के कुलगुरु(शांडिल्य गोत्रीय: जिसका ईस्टदेव पूर्ण चन्द्र हो और जो वर्तमान के पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के शारदा गाँव में जन्म लिया हुआ हो और वशिष्ठ ऋषि और कश्मीर को वसाने वाले कश्यम ऋषि के कुल की कन्या का संतान हो, और वैसे भी वशुदेव वृस्तिवंशीय/ यदुवंशीय/ चन्द्र वंशीय क्षत्रिय थे का कुलगुरु यदि वह हो जिसका ईस्टदेव स्वयं पूर्ण चन्द्र हो तो सोने पर सुहागा होता ही है) थे और वही संदीपनी ऋषि(जिनके मरे हुए पुत्र पुनरदत्त को बलराम और श्रीकृष्ण ने गुरु दक्षिणा स्वरुप पुनः यमराज से लेकर जीवित लौटाया था ) बाद में कंश वध के बाद बलराम, श्रीकृष्ण और सुदामा के गुरु हुए और संदीपनी आश्रम उनका गुरकुल बना जबकि अत्यधिक समयतक संपर्क में रहने के बाद भी नन्द बाबा के कुलगुरु जो गर्ग गोत्रीय थे को कृष्ण के गुरु होने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हो सका नन्द गाँव छोड़ देने के कारन।------------इस प्रकार वशिष्ठ ऋषि जो शूर्यवंश के गुरु वंसज चन्द्रवंश की कुलगुरु प्रथा में सहभागी हुए यह एक अप्रतिम सम्बन्ध और अप्रतिम कड़ी है शूर्यवंश और चन्द्रवंश के बीच की जिसका सिरमौर महर्षि व्यासः/परासर जी हुए जो महाभारत जैसे महाकाव्य, 4 वेद, 18 पुराण और परमब्रह्म श्रीकृष्ण के भाष्य श्रीमद्भागवत गीता को संकलित करमानव सभ्यता को अमूल्य उपहार दिए धर्म की रक्षा हेतु।

Monday, June 9, 2014

4 वेद और 18 पुराण जो केवल ब्रह्मा की वाणी के रूप में स्थान्तरित होते रहे है और श्रीमद्भागवतगीता जो कृष्ण के भाष्य के रूप में तैर रहे थे उनका संकलन द्वापरयुग में वशिष्ठ के कुल में जन्म लिए हुए व्यासः/परासर ने किया | उसे अक्षरों और वाक्यांशों में मूर्तरूप दिया और जिस वेदांत दर्शन की बात की जाती है और जिसे स्वामी विवेकानंद ने स्वामी रमा-कृष्ण परमहंश से प्रेरित हो सम्पूर्ण विश्व के दर्शन को वेदांत दर्शन की परिधि में ला दिया उसका सम्पूर्ण श्रेय वशिष्ठ/पराशर कुल में जन्म लिए महर्षि वेद व्यासः को ही है। -----------स्वामी विवेकानंद ने वेदान्त दर्शन अपनाया था जिसमे विश्व के सब दर्शन समाहित हो जाते हैं और वे इसके लिए श्रीमद्भागवत को अपना मूल आधार बनाये थे, जिसमे वशिस्ठ गोत्रीय महर्षि वेद व्याश ने परमब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण और नरश्रेस्ठ के रूप में अर्जुन के बीच हुए वार्तालाप को संग्रहीत किया है। अतः स्वामी जी से ज्यादा या कहें तो वेद व्याश जी और गोस्वामी तुलसी दाश से ज्यादा मै कुछ नहीं कह सकता क्योंकि मै केवल जन्म वशिस्थ गोत्रियों के यहाँ लिया हूँ (पर संतान सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मणों का हूँ और निवाश सनातन गौतम गोत्रियों के यहाँ किया हूँ)। अतः आप श्रीमद्भागवत गीता या श्री राम चरित मानस को या किशी एक को अपना सकते हैं समयानुसार।


एक बार पुनः कश्यप कुल की कन्या का वशिष्ठ से विवाह होता है और शाण्डिय का कश्मीर में जन्म होता है। अतः शांडिल्य कश्यप और वशिष्ठ युग्म की उत्पत्ति हुए और सप्तर्षि के व्युत्पन हुए। जो मामा को बड़ा मानता है उसके लिए शांडिल्य कश्यप से छोटे और जो भांजे को बड़ा मानता है उसके लिए शांडिल्य कश्यप से बड़े( कश्यप ऋषि ही दशरथ और वशुदेव के रूप में अवतार लिए थे विष्णु के आह्वान पर उनका पिता बनने के लिए अतः कुछ लोग भ्रान्ति फैलाते हैं की दशरथ के बहन का विवाह वशिष्ठ से हुआ था)। ------गर्ग स्वयं भारद्वाज की शिष्य परम्परा के पुत्र हुए थे और भारद्वाज स्वयं बाल्मीकि के शिष्य और यही बाल्मीकि कश्यप के पुत्र वरुणदेव के पुत्र थे जो वन गमन किये थे किंचित कारणों से अतः गर्ग ऋषि भी कश्यप से सम्बंधित है और कश्यप कुल की शिष्य परम्परा में आते हैं। ---------अतः गर्ग, गौतम और शांडिल्य की श्रेणी होते हुए भी गौतम सप्तर्षि में आते हैं न की गर्ग और शांडिल्य की तरह व्युत्पन है और इस प्रकार कश्यप से श्रेष्ठ और पूज्य क्रमशः गौतम और वशिष्ठ ही हुए और इस प्रकार अन्य चार सप्तर्षियों या सनातन गोत्रियों के लिए तथा व्युत्पन गोत्रियों के लिए भी गौतम और वशिष्ठ श्रेष्ठ हुए लेकिन उनके लिए गर्ग, गौतम और शांडिल्य का क्रम विशेष माने रखता है शूर्यवंश/इक्शाकुवंश/रघुवंश/रामकुल में रावण जैसे ब्राह्मणकुल का नाश काने के उपरांत उनके अश्वमेध यज्ञ में शामिल होने और खान-पान करने के कारन।


Saturday, June 7, 2014

All Seven Saptarshi who are responsible for the present humanity and who were themself creation of Lord Brahma at Prayagraj/Allahabad were Brahmarshi (of Sato Character) at initial stage and First Rajarshi came in picture when Brahmarshi Vishvamitra(Kausik) could not be able to control his Kshatriya Power (of Tamo Character) and acted as Kshatriya and in this sequence an other state came i.e. of Maharshi (have Rajasva character). Thus you can Judge that a Sanatan Brahmin or Brahmin is the supreme power or senior citizen among other Sanatan Hindu or Hindu and others caste and religion. It does not means Lord Shri Ram/Krishna is not Parambrahma Paramguru Parampita Parameshwar. There was not a single human taken birth was greatest than them in till date history of the humanity and also I added that Lord Shri Ram/Krishna=Allah=GOD and every Kshatriy should follow him he may be from any Dynasty(Vansh). One more secret: A perfect Kshatriya(Lord Shiva) even in anger he can not do murder of a perfect Brahmin and not a perfect Vaishya(Vishnu) can take a gross of food when a perfect Brahmin is sitting without food in front of him.

All Seven Saptarshi who are responsible for the present humanity and who were themself creation of Lord Brahma at Prayagraj/Allahabad were Brahmarshi (of Sato Character) at initial stage and First Rajarshi came in picture when Brahmarshi Vishvamitra(Kausik) could not be able to control his Kshatriya Power (of Tamo Character) and acted as Kshatriya and in this sequence an other state came i.e. of Maharshi (have Rajasva character). Thus you can Judge that a Sanatan Brahmin or Brahmin is the supreme power or senior citizen among other Sanatan Hindu or Hindu and others caste and religion. It does not means Lord Shri Ram/Krishna is not Parambrahma Paramguru Parampita Parameshwar. There was not a single human taken birth was greatest than them in till date history of the humanity and also I added that Lord Shri Ram/Krishna=Allah=GOD and every Kshatriy should follow him he may be from any Dynasty(Vansh). One more secret: A perfect Kshatriya(Lord Shiva) even in anger he can not do murder of a perfect Brahmin and not a perfect Vaishya(Vishnu) can take a gross of food when a perfect Brahmin is sitting without food in front of him.

Friday, June 6, 2014

One more secret: A perfect Kshatriya(Lord Shiva) even in anger he can not do murder of a perfect Brahmin and not a perfect Vaishya(Vishnu) can take a gross of food when a perfect Brahmin is sitting without food in front of him.


There was not a single human taken birth was greatest than them in till date history of the humanity and also I added that Lord Shri Ram/Krishna=Allah=GOD and every Kshatriy should follow him he may be from any Dynasty(Vansh)|

There was not a single human taken birth was greatest than them in till date history of the humanity and also I added that Lord Shri Ram/Krishna=Allah=GOD and every Kshatriy should follow him he may be from any Dynasty(Vansh)|

मित्रों मै पुनः कह रहा हूँ की मै जिस सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण परिवार से सम्बन्ध रखता हूँ उस कुल की कुलदेवी स्वयं देवकाली (जो शूर्यवंश/इक्शाकुवंस/रघुकुल की भी कुलदेवी है और और वे लक्ष्मी-सरस्वती-गौरापार्वती की सम्मिलित शक्ति जो वर्ण में काली जरूर है पर शिव जी के शिखर पर सुशोभित द्वितीया का गौर वर्ण चन्द्रमा इनका ही सबसे प्यारा पुत्र है। अतः उनसे नस्लवाद की आशा ही आप नहीं कर सकते हैं) हैं। ----अतः मुझे नस्लवादी सिद्ध करने वालों आप अपने मुखार्विन्दु को इस देवकाली के आईने में देखकर कोई शब्द निकालते तो ठीक था। --------१) मै जरूर भारतीय विज्ञान संस्थान में जरूर कहा था की अगर मई नहीं रहा इस संसार में तो स्वयं शशिधर मामा बिशुनपुर और ठाकुर प्रशाद बाबा रामपुर भी जी नहीं सकेंगे या स्वयं प्राण त्याग देंगे ईस्वर प्रदत्त दिल के दौरे से और आज भी कहता हूँ की इसे सकारात्मक रूप से लिया जाना चाहिए।-------२) यह भी कहा था की राहुल, वरुण और अखिलेश भाई के लिए मै अन्तर-राष्ट्रीय स्वयं सेवक का कार्य करूंगा यह कोई आश्चर्य का प्रश्न नहीं खड़ा करता है। --------३) यह भी कहा था की मै जन्म से ही स्वयं सेवक हूँ और मेरा सामना केवाल इस संसार में राहुल या वरुण ही कर सकते हैं दूसरा कोई नहीं। वह भी वायुमंडलीय और समुद्रीय विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु के अंदर प्रवेश करने पर केवल अखिलेश मेरे समक्ष हो सकते है। -------४ )जिस घर की चौखट पार करता रहा उस चौखट के शिखर पर श्री गणेशाय नमः , सरस्वत्यैः नमः और लक्षमैह: नमः लिखा था अतः कोई रजस्व ब्राह्मण मतलब कायस्थ मुझसे ज्ञान-विज्ञान में आगे नहीं हो ही नहीं सकता समान स्तर पर तो ब्रह्म क्षत्रिय (भूमिहार ब्राह्मण) की बात ही क्या वैसे भी 4 और 2 का औसत 3 होता है न की 4 ? It means Brahmin is the super power or Senior Citizen of this human community as Swami Ram-Krishna already told (who was Lord and Greatest Guru of Swami Vivekanand=Narendranath Datta)?

मित्रों मै पुनः कह रहा हूँ की मै जिस सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण परिवार से सम्बन्ध रखता हूँ उस कुल की कुलदेवी स्वयं देवकाली (जो शूर्यवंश/इक्शाकुवंस/रघुकुल की भी कुलदेवी है और और वे लक्ष्मी-सरस्वती-गौरापार्वती की सम्मिलित शक्ति जो वर्ण में काली जरूर है पर शिव जी के शिखर पर सुशोभित द्वितीया का गौर वर्ण चन्द्रमा इनका ही सबसे प्यारा पुत्र है। अतः उनसे नस्लवाद की आशा ही आप नहीं कर सकते हैं) हैं। 
----अतः मुझे नस्लवादी सिद्ध करने वालों आप अपने मुखार्विन्दु को इस देवकाली के आईने में देखकर कोई शब्द निकालते तो ठीक था। --------१) मै जरूर भारतीय विज्ञान संस्थान में जरूर कहा था की अगर मई नहीं रहा इस संसार में तो स्वयं शशिधर मामा बिशुनपुर और ठाकुर प्रशाद बाबा रामपुर भी जी नहीं सकेंगे या स्वयं प्राण त्याग देंगे ईस्वर प्रदत्त दिल के दौरे से और आज भी कहता हूँ की इसे सकारात्मक रूप से लिया जाना चाहिए।-------२) यह भी कहा था की राहुल, वरुण और अखिलेश भाई के लिए मै अन्तर-राष्ट्रीय स्वयं सेवक का कार्य करूंगा यह कोई आश्चर्य का प्रश्न नहीं खड़ा करता है। --------३) यह भी कहा था की मै जन्म से ही स्वयं सेवक हूँ और मेरा सामना केवाल इस संसार में राहुल या वरुण ही कर सकते हैं दूसरा कोई नहीं। वह भी वायुमंडलीय और समुद्रीय विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु के अंदर प्रवेश करने पर केवल अखिलेश मेरे समक्ष हो सकते है। -------४ )जिस घर की चौखट पार करता रहा उस चौखट के शिखर पर श्री गणेशाय नमः , सरस्वत्यैः नमः और लक्षमैह: नमः लिखा था अतः कोई रजस्व ब्राह्मण मतलब कायस्थ मुझसे ज्ञान-विज्ञान में आगे नहीं हो ही नहीं सकता समान स्तर पर तो ब्रह्म क्षत्रिय (भूमिहार ब्राह्मण) की बात ही क्या वैसे भी 4 और 2 का औसत 3 होता है न की 4 ? It means Brahmin is the super power or Senior Citizen of this human community as Swami Ram-Krishna already told (who was Lord and Greatest Guru of Swami Vivekanand=Narendranath Datta)?


यह है महामाया (लक्ष्मी) की माया जिससे कोई बच नहीं पाया है पर इससे आप केवल ज्ञान से ही नहीं पार पा सकते है इसके लिए विवेक होना ही चाहिए और इसी लिए कहा गया है की विवेक विहीन व्यक्ति ज्ञान-विज्ञान रहते हुए भी शूद्र, राक्षस और पशु गति को प्राप्त होता है। मै तो स्वयं रामपुर-आजमगढ़-२२३२२५ और बिशुनपुर-जौनपुर-२२३१०३ गाँव से सम्बन्ध रखता हूँ। अतः रावण कुल का विशेष ज्ञान नहीं पर जहां तक मुझे रावण का वध कैसे हुआ यह पता है(भगवान शिव के सबसे महान भक्त रावण से ही रामेश्वरम की स्थापना करवा भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करवा शिव आराधना कर रावण से भी महान भक्त शिध्ध कर)। ऐसे में रावण कुल से हमें कोई परहेज नहीं जब वह कुल और राज्य भगवान श्रीराम ने रावण के भाई और अपने प्रिय भक्त विभीषण को सौप दिया था। -----------मेघनाथ जो अपने पिता का आज्ञाकारी पुत्र था को इतिहास के श्रेष्ठतम पुत्र में महत्वपूर्ण स्थान देना कोई विवाद का विषय नहीं होना चाहिए जिसने स्वयं और स्वयं के पुत्र अक्षय के जीवन का त्याग किया पिता की जिद्द को पूरा करने जबकि वह जनता था की वह राम के विजय अभियान में वीरगति को प्राप्त होगा ही। उसे इंद्रजीत और इन्द्रियजित दोनों कहते थे और उसकी पत्नी सुलोचना जिसका एक नाम प्रमिला भी था भी लक्षमण की पत्नी उर्मिला की ही तरह सती और प्रतिब्रता थी ही और कहा जाता है की वह सीता-मांडवी-उर्मिला-श्रुतिकीर्ति जो क्रमसः भगवान श्रीराम-भरत-लक्षमण-शत्रुघ्न की धर्म पत्नी थीं की किशी रिश्ते में बहन लगती थी यह राज काशिराज जो एक भूमिहार ब्राह्मण स्वयं थे और जिनके रिश्ते में जनक भाई थे के परिजन स्वयं अच्छी तरह से जानते होंगे। --------पर इसके साथ यह भी सत्य है की कश्यप गोत्रीय माया नामक राक्षस जो कभी वर्तमान मेरठ का राजा था उसकी पौत्री थी रावण की धर्म पत्नी महान प्रतिब्रता मंदोदरी जिसके सुसंस्कार का प्रभाव था मेघनाद पर और सबसे बड़ा रहस्य यह की प्रयागराज के भारद्वाज ऋषि (जो त्रिदेव की शक्ति से संपन्न दुर्वाशा ऋषि के सानिध्य और रक्षा में दुर्वाशा के द्वितीय प्रवास प्रयाग में रहते है(दुर्वाशा का प्रथम स्थान आर्यमगढ़:आजमगढ़ है)) के कुल की कन्याओं का विवाह भी रावण के पूर्वजों से हुआ था जिनका स्वयं का पुष्पक विमान हर्ष के साथ विजय दशमी(रावणवध) के बाद भगवान श्रीराम को लेने गया था। --------यह है महामाया (लक्ष्मी) की माया जिससे कोई बच नहीं पाया है पर इससे आप केवल ज्ञान से ही नहीं पार पा सकते है इसके लिए विवेक होना ही चाहिए और इसी लिए कहा गया है की विवेक विहीन व्यक्ति ज्ञान-विज्ञान रहते हुए भी शूद्र, राक्षस और पशु गति को प्राप्त होता है।

यह है महामाया (लक्ष्मी) की माया जिससे कोई बच नहीं पाया है पर इससे आप केवल ज्ञान से ही नहीं पार पा सकते है इसके लिए विवेक होना ही चाहिए और इसी लिए कहा गया है की विवेक विहीन व्यक्ति ज्ञान-विज्ञान रहते हुए भी शूद्र, राक्षस और पशु गति को प्राप्त होता है। 

मै तो स्वयं रामपुर-आजमगढ़-२२३२२५ और बिशुनपुर-जौनपुर-२२३१०३ गाँव से सम्बन्ध रखता हूँ। अतः रावण कुल का विशेष ज्ञान नहीं पर जहां तक मुझे रावण का वध कैसे हुआ यह पता है(भगवान शिव के सबसे महान भक्त रावण से ही रामेश्वरम की स्थापना करवा भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करवा शिव आराधना कर रावण से भी महान भक्त शिध्ध कर)। ऐसे में रावण कुल से हमें कोई परहेज नहीं जब वह कुल और राज्य भगवान श्रीराम ने रावण के भाई और अपने प्रिय भक्त विभीषण को सौप दिया था। -----------मेघनाथ जो अपने पिता का आज्ञाकारी पुत्र था को इतिहास के श्रेष्ठतम पुत्र में महत्वपूर्ण स्थान देना कोई विवाद का विषय नहीं होना चाहिए जिसने स्वयं और स्वयं के पुत्र अक्षय के जीवन का त्याग किया पिता की जिद्द को पूरा करने जबकि वह जनता था की वह राम के विजय अभियान में वीरगति को प्राप्त होगा ही। उसे इंद्रजीत और इन्द्रियजित दोनों कहते थे और उसकी पत्नी सुलोचना जिसका एक नाम प्रमिला भी था भी लक्षमण की पत्नी उर्मिला की ही तरह सती और प्रतिब्रता थी ही और कहा जाता है की वह सीता-मांडवी-उर्मिला-श्रुतिकीर्ति जो क्रमसः भगवान श्रीराम-भरत-लक्षमण-शत्रुघ्न की धर्म पत्नी थीं की किशी रिश्ते में बहन लगती थी यह राज काशिराज जो एक भूमिहार ब्राह्मण स्वयं थे और जिनके रिश्ते में जनक भाई थे के परिजन स्वयं अच्छी तरह से जानते होंगे। --------पर इसके साथ यह भी सत्य है की कश्यप गोत्रीय माया नामक राक्षस जो कभी वर्तमान मेरठ का राजा था उसकी पौत्री थी रावण की धर्म पत्नी महान प्रतिब्रता मंदोदरी जिसके सुसंस्कार का प्रभाव था मेघनाद पर और सबसे बड़ा रहस्य यह की प्रयागराज के भारद्वाज ऋषि (जो त्रिदेव की शक्ति से संपन्न दुर्वाशा ऋषि के सानिध्य और रक्षा में दुर्वाशा के द्वितीय प्रवास प्रयाग में रहते है(दुर्वाशा का प्रथम स्थान आर्यमगढ़:आजमगढ़ है)) के कुल की कन्याओं का विवाह भी रावण के पूर्वजों से हुआ था जिनका स्वयं का पुष्पक विमान हर्ष के साथ विजय दशमी(रावणवध) के बाद भगवान श्रीराम को लेने गया था। --------यह है महामाया (लक्ष्मी) की माया जिससे कोई बच नहीं पाया है पर इससे आप केवल ज्ञान से ही नहीं पार पा सकते है इसके लिए विवेक होना ही चाहिए और इसी लिए कहा गया है की विवेक विहीन व्यक्ति ज्ञान-विज्ञान रहते हुए भी शूद्र, राक्षस और पशु गति को प्राप्त होता है।


Thursday, June 5, 2014

"Truth alone triumphs" (Satyameva Jayate) as said Mandookopanishad. तत्कर्म यन्न बन्धाय(That is action, which does not promote attachment ) सा विद्या या विमुक्तये।(That is knowledge which liberates [one from bondage]) तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये। आयासायापरं कर्म विद्यऽन्या शिल्पनैपुणम्॥१-१९-४१॥ —श्रीविष्णुपुराणे प्रथमस्कन्धे एकोनविंशोऽध्यायः tatkarma yanna bandhāaya sā vidyā yā vimuktaye| āyāsāyāparaṁ karma vidya’nyā śilpanaipuṇam||1-19-41|| —śrīviṣṇupurāṇe prathamaskandhe ekonaviṁśo’dhyāyaḥ That is action, which does not promote attachment; That is knowledge which liberates [one from bondage]. All other action is mere [pointless] effort/hardship; all other knowledge is merely another skill/craftsmanship

"Truth alone triumphs" (Satyameva Jayate) as said Mandookopanishad. 
तत्कर्म यन्न बन्धाय(That is action, which does not promote attachment ) सा विद्या या विमुक्तये।(That is knowledge which liberates [one from bondage])
तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।
आयासायापरं कर्म विद्यऽन्या शिल्पनैपुणम्॥१-१९-४१॥
—श्रीविष्णुपुराणे प्रथमस्कन्धे एकोनविंशोऽध्यायः
tatkarma yanna bandhāaya sā vidyā yā vimuktaye|
āyāsāyāparaṁ karma vidya’nyā śilpanaipuṇam||1-19-41||
—śrīviṣṇupurāṇe prathamaskandhe ekonaviṁśo’dhyāyaḥ
That is action, which does not promote attachment; That is knowledge which liberates [one from bondage]. All other action is mere [pointless] effort/hardship; all other knowledge is merely another skill/craftsmanship

Monday, June 2, 2014

एक ऐसा गोत्र जिसमे धर्म का मानने वाला, धर्म को न मानने वाला, धर्म को विरोध करने वाला और एक आम मानव के रूप में धर्म के सबसे बड़े रक्षक शामिल हों और सभी धर्म और जाती के लोगों को पुनः अपने माध्यम से हिन्दू धर्म में पुनः समाहित करते हुए गौतम, वशिष्ठ गोत्र के बाद तीसरा स्थान प्राप्त करने वाला है और सभी सनातन सातों गोत्रों (गौतम, वशिष्ठ, कश्यप, भारद्वाज/अंगरीशा, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/दुर्वाशा/सोम/दत्त, कौशिक/विश्वामित्र) की शक्ति धर्म रक्षा हेतु जिसमे समाहित है तो क्या वह असत्य को कभी सत्य स्वीकार सकता है? और क्या वह स्वीकार करता है अपनी कायरता वस तो वह अधार्मिक नहीं कहलायेगा?, क्या उसपर वर्तमान दलित अस्त्र, सामाजिक न्याय के नाम पर होने वाला अन्याय अस्त्र और अल्पसंख्यक अस्त्र का असर कभी हो सकता है दीर्घकालिक रूप से? और क्या अगर वह असमर्थ रहा धर्म रक्षा में तो इसके बाद उस त्रिदेव की शक्ति से संपन्न परम धर्म रक्षक ऋषि(मानव सभ्यता से श्रेष्ठ ऋषि सभ्यता की श्रेणी होती है होती है। अतः मानव सभ्यता तक तो कश्यप ही समर्थ है धर्म रक्षा में) दुर्वाशा और स्वयं महादेव नटराज-रूद्र का क्रमसः श्राप और तांडव देखने को नहीं मिलता दृश्य और अदृश्य रूप से धर्म की रक्षा हेतु?

एक ऐसा गोत्र जिसमे धर्म का मानने वाला, धर्म को न मानने वाला, धर्म को विरोध करने वाला और एक आम मानव के रूप में धर्म के सबसे बड़े रक्षक शामिल हों और सभी धर्म और जाती के लोगों को पुनः अपने माध्यम से हिन्दू धर्म में पुनः समाहित करते हुए गौतम, वशिष्ठ गोत्र के बाद तीसरा स्थान प्राप्त करने वाला है और सभी सनातन सातों गोत्रों (गौतम, वशिष्ठ, कश्यप, भारद्वाज/अंगरीशा, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/दुर्वाशा/सोम/दत्त, कौशिक/विश्वामित्र) की शक्ति धर्म रक्षा हेतु जिसमे समाहित है तो क्या वह असत्य को कभी सत्य स्वीकार सकता है? और क्या वह स्वीकार करता है अपनी कायरता वस तो वह अधार्मिक नहीं कहलायेगा?, क्या उसपर वर्तमान दलित अस्त्र, सामाजिक न्याय के नाम पर होने वाला अन्याय अस्त्र और अल्पसंख्यक अस्त्र का असर कभी हो सकता है दीर्घकालिक रूप से? और क्या अगर वह असमर्थ रहा धर्म रक्षा में तो इसके बाद उस त्रिदेव की शक्ति से संपन्न परम धर्म रक्षक ऋषि(मानव सभ्यता से श्रेष्ठ ऋषि सभ्यता की श्रेणी होती है होती है। अतः मानव सभ्यता तक तो कश्यप ही समर्थ है धर्म रक्षा में) दुर्वाशा और स्वयं महादेव नटराज-रूद्र का क्रमसः श्राप और तांडव देखने को नहीं मिलता दृश्य और अदृश्य रूप से धर्म की रक्षा हेतु?