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Monday, July 21, 2014

I have suggestion from my closed friends to stop my posts and I accepted even not to post it on my social blog "VIVEKANAND AND MODERN TRADITION". I hope up to a quite extent my work has been done i.e. Only SHRI RAM: RAMJANKI: SITARAM is Satyanarayan: Parambrahm/Brahm: Paramguru: Parameshwar:ALLAH:GOD:ISWAR who may known with other name Shri Krishna :RADHAKRISHN too who have control on all seven Sun or who ride on chariot of Seven Sun have no rope or only who called Suryakant:Pradeep or only who have control on Seven Rishis from Prayagraj /Allahabad, the Source of world humanity. (I avoided till date to disclose the power of Super Power: Makaradhwaj's Kingdom (Vishv-ashakti) and his agent's power also in India in comparison with power of their father Hanuman /Ambedkar /Ambavaadekar /Kesharinanadan/Anjaney /Pavansut /Marutinandan /Shankarsuman/Mahaveer /Bajarang even I have every updated news from time to time and even agent of Super Power even tried to prove me the SHOODRATAM person of this world (2001-2007) for make some one Slumdog Millionaire for achieving their selfish goal against me although in which they failed and I succeeded to achieve my goal(2007) but when they crosses the extreme of humanity and crosses the natural law(2014) I have given a little statement by which any able person can guess their original power and in connection with this I hope this will not affect the image of Super Power(Vishva-Shakti) because I have given such statement publicly after a long delay of the each and every events happening and a best settlement has been done by the Antar-Rashtrya Swayamsevak Sangh(ARSS)[International Self Servant Association] to successful government of the modern world and countries in individual|*******Jai Hind(Jamboo Dweep :Euresia:Europ+Asia: at least Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari), Jai Bharat (Akhand Bharat :Bharatkhand: Bharatvarsh), Jai Shri Ram/Krishna.>>>>>मेरा जमदग्निऋषि के सम्मान में बने जौनपुर/जमदग्निपुर जिले में सनातन वशिष्ठ गोत्रियों के यहां जन्म लिया हूँ और जौनपुर के सनातन गौतम गोत्रियों के यहां शिक्षा ही नहीं वरन जीवन का सर्वाधिक समय गुजारा हूँ तथा पैतृक रूप से सनातन कश्यप गोत्रीय और ऋषि दुर्वाशा की भूमि आर्यमगढ़/आजमगढ़ का हूँ तो, जो जौनपुर शिक्षा-संस्कृति-संस्कार और व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास न की छद्म पांडित्य के लिए पूरे विश्व में सर्वोच्च स्थान रखता है मै उसी श्रेष्ठ संस्कार वाले स्थान पर एक श्रेष्ठ छात्र जीवन जिया हूँ और बहुत से अनुभवों से गुजरा हूँ। अतः सामने वाला मेरे ऊपर चाल चलने से कहाँ तक सफल होगा यह अनुमान रहता है और यही मुझे स्थिर जीवन देता है क्योंकि मै भी समाज के अधिकतम हित के लिए ही अपनी ऊर्जा और पुरुषार्थ का सदुपयोग करता हूँ अगर उसके प्रयोग का एक मार्ग बंद होता है तो कौसल नरेश दशरथ(जो देशों दिशाओं में रथ ले जा सके वह यह की उस समय लोग फ्रैक्टल: बहु विमाओं को प्रयोग में शायद नहीं लाते थे) की तरह दूसरा मार्ग खोल देता हूँ और देखता हूँ की पहला कब तक अवरुद्ध किया जा सकता है। ----जो स्वयं पुरुषार्थी और उद्यमी हो और उसकी नियति ही स्वक्ष हो तो उसे कौन जीत सकता है।


I have suggestion from my closed friends to stop my posts and I accepted even not to post it on my social blog "VIVEKANAND AND MODERN TRADITION". I hope up to a quite extent my work has been done i.e. Only SHRI RAM: RAMJANKI: SITARAM is Satyanarayan: Parambrahm/Brahm: Paramguru: Parameshwar:ALLAH:GOD:ISWAR who may known with other name Shri Krishna :RADHAKRISHN too who have control on all seven Sun or who ride on chariot of Seven Sun have no rope or only who called Suryakant:Pradeep or only who have control on Seven Rishis from Prayagraj /Allahabad, the Source of world humanity. (I avoided till date to disclose the power of Super Power: Makaradhwaj's Kingdom (Vishv-ashakti) and his agent's power also in India in comparison with power of their father Hanuman /Ambedkar /Ambavaadekar /Kesharinanadan/Anjaney /Pavansut /Marutinandan /Shankarsuman/Mahaveer /Bajarang even I have every updated news from time to time and even agent of Super Power even tried to prove me the SHOODRATAM person of this world (2001-2007) for make some one Slumdog Millionaire for achieving their selfish goal against me although in which they failed and I succeeded to achieve my goal(2007) but when they crosses the extreme of humanity and crosses the natural law(2014) I have given a little statement by which any able person can guess their original power and in connection with this I hope this will not affect the image of Super Power(Vishva-Shakti) because I have given such statement publicly after a long delay of the each and every events happening and a best settlement has been done by the Antar-Rashtrya Swayamsevak Sangh(ARSS)[International Self Servant Association] to successful government of the modern world and countries in individual|  मेरा जमदग्निऋषि के सम्मान में बने जौनपुर/जमदग्निपुर जिले में सनातन वशिष्ठ गोत्रियों के यहां जन्म लिया हूँ और जौनपुर के सनातन गौतम गोत्रियों के यहां शिक्षा ही नहीं वरन जीवन का सर्वाधिक समय गुजारा हूँ तथा पैतृक रूप से सनातन कश्यप गोत्रीय और ऋषि दुर्वाशा(कृष्णात्रे(त्रेय कृष्ण))की भूमि आर्यमगढ़/आजमगढ़ का हूँ तो, जो जौनपुर शिक्षा-संस्कृति-संस्कार और व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास न की छद्म पांडित्य के लिए पूरे विश्व में सर्वोच्च स्थान रखता है मै उसी श्रेष्ठ संस्कार वाले स्थान पर एक श्रेष्ठ छात्र जीवन जिया हूँ और बहुत से अनुभवों से गुजरा हूँ। अतः सामने वाला मेरे ऊपर चाल चलने से कहाँ तक सफल होगा यह अनुमान रहता है और यही मुझे स्थिर जीवन देता है क्योंकि मै भी समाज के अधिकतम हित के लिए ही अपनी ऊर्जा और पुरुषार्थ का सदुपयोग करता हूँ अगर उसके प्रयोग का एक मार्ग बंद होता है तो कौसल नरेश दशरथ(जो देशों दिशाओं में रथ ले जा सके वह यह की उस समय लोग फ्रैक्टल: बहु विमाओं को प्रयोग में शायद नहीं लाते थे) की तरह दूसरा मार्ग खोल देता हूँ और देखता हूँ की पहला कब तक अवरुद्ध किया जा सकता है। ----जो स्वयं पुरुषार्थी और उद्यमी हो और उसकी नियति ही स्वक्ष हो तो उसे कौन जीत सकता है|-----------------------------------------------------Valmiki’s Ramayan indicate that Shri Rama was 25 years old when he left Ayodhya for his 14 years of exile (1975---2000-----2014)|उपमन्यु (बाजपाई) गोत्र वशिष्ठ गोत्र प्रवर में में शामिल हैं| अतः यह पारासर की तरह वशिष्ठ के वंसज में आते हैं। और बाजपाई ब्राह्मण का गोत्र उपमन्यु होता है। अतः यह वशिष्ठ या वशिष्ठ से वंसज हुए पारासर गोत्रियों की तरह। गौतम की तरह वशिष्ठ भी कैलाश पर महादेव शिव की छाया में रहते थे अतः ये भी शिव के गौत्तम जैसे श्रेष्ठ भक्तों में शामिल हैं |>>>>>>>>>> मुझे पागल खानदान का जिस तत्कालीन शक्तिशाली राजनेताओं (के नाम का नाजायज लाभ लेने वाले लोगों जबकि उनमे से दो मेरे मेरे प्रिय थे जिनकी वर्तमान अवस्था पर मुझे स्वयं वेहद कस्ट है और इन दो में से एक (बाजपाई) मेरे सर्व प्रिय और जिन्हे मै आज भी राम-रत्न कहता हूँ इस वर्तमानयुग का अगर कोई है तो जार्ज फर्नांडीज मुंबई ट्रेड यूनियन में मेरे बाबा के मित्र थे) की शक्ति के बल पर कहा गया उनमे से दो आज मानसिक अवसाद के खुद शिकार है जो केंद्र की सत्ता के उस समय प्रमुख थे और एक के संश्थापक नेता मानशिक विक्षिप्तता की अवस्था में ही मर गए जिनकी सत्ता उत्तर प्रदेश(अल्लाहाबाद) में थी तत्कालीन। तो यह मेरिट भी उनके छद्म अनुयायियों की मेरिट में जोड़ दी जानी चाहिए जो मुझे खानदानी पागल या तो कहे थे या कहवाए थे। बाकी अन्य अपनी अज्ञानता के शिकार हैं उनकी भी दवा हो जाएगी अभी अर्श से फ़र्श का सफर करने दीजिये।-----शायद उस अम्बेडकर जो तथा कथित दलित थे को सवर्णों ने सताया होगा पर इस अम्बेडकर जो स्वयं सवर्ण थे का क्या जिसको तथाकथित दलितों के इसारे पर और तथा कथित दलित हिट के लिए सवर्णों ने सताया?*******Jai Hind(Jamboo Dweep :Euresia:Europ+Asia: at least Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari), Jai Bharat (Akhand Bharat :Bharatkhand: Bharatvarsh), Jai Shri Ram/Krishna.







 


Saturday, July 19, 2014

मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।

मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।

इस प्रकार अशोक चक्र का प्रथम गुण प्रेम और चौबीसवाँ गुण आस्था इसके बाच में आने वाले अन्य वाइस (22) गुण को पिरोकर इस श्रिस्टी का सञ्चालन करते हैं जिसे आप धर्म चक्र, कालचक्र, समयचक्र, समतामूलक चक्र नामों से जानते हैं।----------------------------------------बीती हुई रत मई स्वप्न देखता हूँ जिसमे एक भव्य गुरु द्वारे में जाता हूँ जो बहुत दूरी तक फैला हुआ है और अंदर जाने के लिए बनी हुई पकडंडी सड़क के दोड़न किनारे पानी बह रहा है और गुरु द्वारे में प्रवेश करते ही ही गुरुग्रंथ और एक चमचमाती तलवार रखी है जिसे मै मथ्था टेककर प्रणाम करता हूँ और आगे कुछ और देखने बहुत सकेत सीढ़ी जिसमे से जाने में मुझे कुछ दिक्कत हो रही है के माध्यम से जमीन के एक ताल आदर जाता हूँ और वहा भगवान श्रीराम, माता सीता, भाई लक्षमण और हनुमान की बड़ी मूर्ति सज्जा के साथ रखी है जिसे मई प्रणाम करते हुए आगे बढ़ता हूँ जमीन के तीसरे तले में जहा पुनः निकली हुई धुप है और इस प्रकार वाह्य स्वरुप में विस्तृत तालाब है जिसमे लोग नहा रहे हैं और मै भी डुबकी लगाता हूँ और कपडे पहनकर कुछ दुकानों पर घूमता हूँ जो दर्शकों के जलपान के लिए बनी हुई हैं और एक दूकान पर चीनी के साथ दही खाता हुई और पानी पीता हूँ और मुझे वह व्यक्ति और पानी पिलाता है जिसका बहुत बड़ा विजनेश कई स्थाप पर चलता है और वह मुझे शरीर पर केवल आधी धोती पहने और आधी कमर में लपेटे नजर आ रहा था और जब उसके विस्तृत विजिनेस के बारे में सूना तो चकित रह गया की यह क्यों स्वयं गुरुद्वारे के दर्शनार्थियों को दही खिला रहा है इतना बढ़ा व्यक्ति होते हुए तो वह स्वयं कहता है की यही तो मेरी आस्था मुझे इतना बड़ा विजिनेस खड़ा करने की शक्ति दिया। इस प्रकार के अनुभव के बाद मुझे स्वप्न का और अंश याद नहीं। लेकिन इतना जरूर समझ में आ रहा की प्रेम के बाद आस्था ही दूसरी शक्ति है जो इस संसार को चला रही वह आस्था किशी पर हो तो ठीक है पर अगर वह इस्वर पर है तो इसका कोई मोल नहीं। इस प्रकार अशोक चक्र का प्रथम गुण प्रेम और चौबीसवाँ गुण आस्था इसके बाच में आने वाले अन्य वाइस (22) गुण को पिरोकर इस श्रिस्टी का सञ्चालन करते हैं जिसे आप धर्म चक्र, कालचक्र, समयचक्र, समतामूलक चक्र नामों से जानते हैं।

इस प्रकार अशोक चक्र का प्रथम गुण प्रेम और चौबीसवाँ गुण आस्था इसके बाच में आने वाले अन्य वाइस (22) गुण को पिरोकर इस श्रिस्टी का सञ्चालन करते हैं जिसे आप धर्म चक्र, कालचक्र, समयचक्र, समतामूलक चक्र नामों से जानते हैं।----------------------------------------बीती हुई रत मई स्वप्न देखता हूँ जिसमे एक भव्य गुरु द्वारे में जाता हूँ जो बहुत दूरी तक फैला हुआ है और अंदर जाने के लिए बनी हुई पकडंडी सड़क के दोड़न किनारे पानी बह रहा है और गुरु द्वारे में प्रवेश करते ही ही गुरुग्रंथ और एक चमचमाती तलवार रखी है जिसे मै मथ्था टेककर प्रणाम करता हूँ और आगे कुछ और देखने बहुत सकेत सीढ़ी जिसमे से जाने में मुझे कुछ दिक्कत हो रही है के माध्यम से जमीन के एक ताल आदर जाता हूँ और वहा भगवान श्रीराम, माता सीता, भाई लक्षमण और हनुमान की बड़ी मूर्ति सज्जा के साथ रखी है जिसे मई प्रणाम करते हुए आगे बढ़ता हूँ जमीन के तीसरे तले में जहा पुनः निकली हुई धुप है और इस प्रकार वाह्य स्वरुप में विस्तृत तालाब है जिसमे लोग नहा रहे हैं और मै भी डुबकी लगाता हूँ और कपडे पहनकर कुछ दुकानों पर घूमता हूँ जो दर्शकों के जलपान के लिए बनी हुई हैं और एक दूकान पर चीनी के साथ दही खाता हुई और पानी पीता हूँ और मुझे वह व्यक्ति और पानी पिलाता है जिसका बहुत बड़ा विजनेश कई स्थाप पर चलता है और वह मुझे शरीर पर केवल आधी धोती पहने और आधी कमर में लपेटे नजर आ रहा था और जब उसके विस्तृत विजिनेस के बारे में सूना तो चकित रह गया की यह क्यों स्वयं गुरुद्वारे के दर्शनार्थियों को दही खिला रहा है इतना बढ़ा व्यक्ति होते हुए तो वह स्वयं कहता है की यही तो मेरी आस्था मुझे इतना बड़ा विजिनेस खड़ा करने की शक्ति दिया। इस प्रकार के अनुभव के बाद मुझे स्वप्न का और अंश याद नहीं। लेकिन इतना जरूर समझ में आ रहा की प्रेम के बाद आस्था ही दूसरी शक्ति है जो इस संसार को चला रही वह आस्था किशी पर हो तो ठीक है पर अगर वह इस्वर पर है तो इसका कोई मोल नहीं। इस प्रकार अशोक चक्र का प्रथम गुण प्रेम और चौबीसवाँ गुण आस्था इसके बाच में आने वाले अन्य वाइस (22) गुण को पिरोकर इस श्रिस्टी का सञ्चालन करते हैं जिसे आप धर्म चक्र, कालचक्र, समयचक्र, समतामूलक चक्र नामों से जानते हैं।

Friday, July 18, 2014

Mandookopanishad---"Satyamev Jayate": Harischand was 33rd Ancestor of Shri Rama who was the 64th Ruler of Surya Vansh(SOALAR DYNASTY) therefore all are descendent of Kashyapa and Aditi i.e. they are sescendent of Aditya i.e. Sun(in similar way Moon Dynasty:Vrishni Vansh/Chandra Vansh/Shri Krishna, Nag Vansh and others in same category are also a descendent of Kashyapa and Aditi’s son’s): Name of ancestors and descendants of Shri Ram are given in serial no. but not in chronological order: 1. Manu 33. Hariscandra 65. Kusa 2. Iksvaku 34. Rohita 66. Atithi 3. Vikuksi-Sasada 35. Harita, Cancu 67. Nisadha 4. Kakutstha 36. Vijaya 68. Nala 5. Anenas 37. Ruruka 69. Nabhas 6. Prithu 38. Vrka 70. Pundarika 7. Vistarasva 39. Bahu (Asita) 71. Ksemadhanvan 8. Ardra 40. Sagara 72. Devanika 9. Yuvanasva (I) 41. Asamanjas 73. Ahinagu 10. Sravasta 42. Amsumant 74. Paripatra 11. Brihadasva 43. Dilipa (I) 75. Bala 12. Kuvalasva 44. Bhagiratha 76. Uktha 13. Drdhasva 45. Sruta 77. Vajranabha 14. Pramoda 46. Nabhaga 78. Sankhan 15. Haryasva (I) 47. Amabarisa 79. Vyusitasva 16. Nikumba 48. Sindhudvipa 80. Visvasaha (II) 17. Samhatasva 49. Ayutayus 81. Hiranyabha 18. Akrsasva 50. Rtuparna 82. Pusya 19. Prasenajit 51. Sarvakama 83. Dhruvasandhi 20. Yuvanasva (II) 52. Sudasa 84. Sudarsana 21. Mandhatr 53. Mitrasaha 85. Agnivarna 22. Purukutsa 54. Asmaka 86. Sighra 23. Trasadsyu 55. Mulaka 87. Maru 24. Sambhuta 56. Sataratha 88. Prasusruta 25. Anaranya 57. Aidavida 89. Susandhi 26. Trasadsva 58. Visvasaha (I) 90. Amarsa 27. Haryasva (II) 59. Dilipa (II) 91. Mahashwat 28. Vasumata 60. Dirghabahu 92. Visrutavant 29. Tridhanvan 61. Raghu 93. Brihadbala 30. Trayyaruna 62. Aja 94. Brihatksaya 31. Trishanku 63. Dasaratha 32. Satyavrata 64. Rama

Mandookopanishad---"Satyamev Jayate": Harischand was 33rd Ancestor of Shri Rama who was the 64th Ruler of Surya Vansh(SOALAR DYNASTY) therefore all are descendent of Kashyapa and Aditi i.e. they are sescendent of Aditya i.e. Sun(in similar way Moon Dynasty:Vrishni Vansh/Chandra Vansh/Shri Krishna, Nag Vansh and others in same category are also a descendent of Kashyapa and Aditi’s son’s): Name of ancestors and descendants of Shri Ram are given in serial no. but not in chronological order: 
1. Manu 33. Hariscandra 65. Kusa
2. Iksvaku 34. Rohita 66. Atithi
3. Vikuksi-Sasada 35. Harita, Cancu 67. Nisadha
4. Kakutstha 36. Vijaya 68. Nala
5. Anenas 37. Ruruka 69. Nabhas
6. Prithu 38. Vrka 70. Pundarika
7. Vistarasva 39. Bahu (Asita) 71. Ksemadhanvan
8. Ardra 40. Sagara 72. Devanika
9. Yuvanasva (I) 41. Asamanjas 73. Ahinagu
10. Sravasta 42. Amsumant 74. Paripatra
11. Brihadasva 43. Dilipa (I) 75. Bala
12. Kuvalasva 44. Bhagiratha 76. Uktha
13. Drdhasva 45. Sruta 77. Vajranabha
14. Pramoda 46. Nabhaga 78. Sankhan
15. Haryasva (I) 47. Amabarisa 79. Vyusitasva
16. Nikumba 48. Sindhudvipa 80. Visvasaha (II)
17. Samhatasva 49. Ayutayus 81. Hiranyabha
18. Akrsasva 50. Rtuparna 82. Pusya
19. Prasenajit 51. Sarvakama 83. Dhruvasandhi
20. Yuvanasva (II) 52. Sudasa 84. Sudarsana
21. Mandhatr 53. Mitrasaha 85. Agnivarna
22. Purukutsa 54. Asmaka 86. Sighra
23. Trasadsyu 55. Mulaka 87. Maru
24. Sambhuta 56. Sataratha 88. Prasusruta
25. Anaranya 57. Aidavida 89. Susandhi
26. Trasadsva 58. Visvasaha (I) 90. Amarsa
27. Haryasva (II) 59. Dilipa (II) 91. Mahashwat
28. Vasumata 60. Dirghabahu 92. Visrutavant
29. Tridhanvan 61. Raghu 93. Brihadbala
30. Trayyaruna 62. Aja 94. Brihatksaya
31. Trishanku 63. Dasaratha
32. Satyavrata 64. Rama

Both the God Shiv and Godess Shiva:Parvati:Durga are Trayambak and Trayambake respectively :Trilochan:Trinetra:Vivek(Three eyed one:Vivek). Thus when God is not safe without their third hidden eye: Vivek then how a person can survive without Vivek(Inner voice:inner justice) Mantra Namo devyaiee maha devyaiee shive sarvarth sadhike Sharanye tryambake gauri narayani namostute ll मंत्र नमो देव्यै महा देव्यै शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ll The mantra is primarily to gain the blessings of the goddess. It means “I bow before you Oh great goddess the bestower of everything auspicious, I seek refuge in you, and Oh Triambake (Three eyed one:Vivek) Gauri Narayani I salute you “ Sarva-mangala-mangalye Shive sarvartha-sadhike; sharanye Tryambake Gauri Narayani namo’stu te ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥ Thou art the all auspicious Shiva(Ahakti aspect), the bountiful; I porostrate myself at Thy feet. O Triyambake(three eyed one:Vivek), Gauri (the one with a fair complexion-Parvati) Narayani. Mahamritunjay Mantra Given by Rishi Markandeya to worship the Shiv whi have Trishul Power (Kedareshwar-Mahamritunjay-Vishveshawar:Vishvanath) मंत्र ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।। OM. We worship the Three-eyed Lord:Trayambak:Trilochan:Trinetra:Vivek(Three eyed one:Vivek) who is fragrant and who nourishes and nurtures all beings. As is the ripened cucumber (with the intervention of the gardener) is freed from its bondage (to the creeper), may he liberate us from death for the sake of immortality.

Both the God Shiv and Godess Shiva:Parvati:Durga are Trayambak and Trayambake respectively :Trilochan:Trinetra:Vivek(Three eyed one:Vivek). Thus when God is not safe without their third hidden eye: Vivek then how a person can survive without Vivek(Inner voice:inner justice)

Mantra
Namo devyaiee maha devyaiee shive sarvarth sadhike
Sharanye tryambake gauri narayani namostute ll
मंत्र
नमो देव्यै महा देव्यै शिवे सर्वार्थ साधिके
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ll
The mantra is primarily to gain the blessings of the goddess. It means “I bow before you Oh great goddess the bestower of everything auspicious, I seek refuge in you, and Oh Triambake (Three eyed one:Vivek) Gauri Narayani I salute you “

Sarva-mangala-mangalye Shive sarvartha-sadhike;
sharanye Tryambake Gauri Narayani namo’stu te

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥
Thou art the all auspicious Shiva(Ahakti aspect), the bountiful; I porostrate myself at Thy feet. O Triyambake(three eyed one:Vivek), Gauri (the one with a fair complexion-Parvati) Narayani.

Mahamritunjay Mantra Given by Rishi Markandeya to worship the Shiv whi have Trishul Power (Kedareshwar-Mahamritunjay-Vishveshawar:Vishvanath)

मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।

उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।

OM. We worship the Three-eyed Lord:Trayambak:Trilochan:Trinetra:Vivek(Three eyed one:Vivek) who is fragrant and who nourishes and nurtures all beings. As is the ripened cucumber (with the intervention of the gardener) is freed from its bondage (to the creeper), may he liberate us from death for the sake of immortality.

क्या दोनों(दुर्वाशा ऋषि और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर) लोग आतंकवादी घोषित कर दिए गए? -----------मेरा उत्तर है कदापि नहीं क्यंकि दोनों के कार्यों में वृहत जान मानस के हित की मंगला कामना जुडी है और उस मंगल परिणति को वे पहले ही सोच लेते है। अतः वे आतंकवादी घोषित नहीं किये जा सकते हैं।---------दुर्वाशा के सम्बन्ध में जब श्राप का जिक्र आता है तो कौसल साम्राज्य को जलाकर कर राख कर देने का प्रसंग कभी आता है और कभी यह कभी वह जलाकर रखा कर दूंगा और अनल(अग्नि) बाण जैसे वाक्य सामने आते हैं और यहां तक की उनको ही अग्नि का अवतार और महाकालेश्वर शिव का अवतार लोग कहते हैं और महामंगलेश्वर भी कहे जाते हैं श्राप और आशीर्वाद का विश्लेषण यदि किया जाय तो और हनुमान जी भी मंगलेश्वर ही हैं फिर भी लंका को ही जला दिए पूंछ में आग लगाने की प्रति क्रिया में तो क्या दोनों लोग आतंकवादी घोषित कर दिए गए? यह जरूर है की शिव और शिवा के पुत्र गणेश तभी तक नवनिर्माण-शुभकार्य करवा सकते हैं जब तक की उसे शिव शंकर सुमन रुद्रावतार हनुमान इस समाज को संभाल सकें अन्यथा हनुमान के एक दिरदेश पर कोई भी नवनिर्माण और शुभ कार्य गणेश संपादित नहीं करा सकते इस पर भी क्या हनुमान और दुर्वाशा आतंकवादी कहे जा सकते है? -----------मेरा उत्तर है कदापि नहीं क्यंकि दोड़न के कार्यों में वृहत जान मानस के हित की मंगला कामना जुडी है और उस मंगल परिणति को वे पहले ही सोच लेते है। अतः वे आतंकवादी घोषित नहीं किये जा सकते हैं।

क्या दोनों(दुर्वाशा ऋषि और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर) लोग आतंकवादी घोषित कर दिए गए? -----------मेरा उत्तर है कदापि नहीं क्यंकि दोनों के कार्यों में वृहत जान मानस के हित की मंगला कामना जुडी है और उस मंगल परिणति को वे पहले ही सोच लेते है। अतः वे आतंकवादी घोषित नहीं किये जा सकते हैं।---------दुर्वाशा के सम्बन्ध में जब श्राप का जिक्र आता है तो कौसल साम्राज्य को जलाकर कर राख कर देने का प्रसंग कभी आता है और कभी यह कभी वह जलाकर रखा कर दूंगा और अनल(अग्नि) बाण जैसे वाक्य सामने आते हैं और यहां तक की उनको ही अग्नि का अवतार और महाकालेश्वर शिव का अवतार लोग कहते हैं और महामंगलेश्वर भी कहे जाते हैं श्राप और आशीर्वाद का विश्लेषण यदि किया जाय तो और हनुमान जी भी मंगलेश्वर ही हैं फिर भी लंका को ही जला दिए पूंछ में आग लगाने की प्रति क्रिया में तो क्या दोनों लोग आतंकवादी घोषित कर दिए गए? यह जरूर है की शिव और शिवा के पुत्र गणेश तभी तक नवनिर्माण-शुभकार्य करवा सकते हैं जब तक की उसे शिव शंकर सुमन रुद्रावतार हनुमान इस समाज को संभाल सकें अन्यथा हनुमान के एक दिरदेश पर कोई भी नवनिर्माण और शुभ कार्य गणेश संपादित नहीं करा सकते इस पर भी क्या हनुमान और दुर्वाशा आतंकवादी कहे जा सकते है? -----------मेरा उत्तर है कदापि नहीं क्यंकि दोड़न के कार्यों में वृहत जान मानस के हित की मंगला कामना जुडी है और उस मंगल परिणति को वे पहले ही सोच लेते है। अतः वे आतंकवादी घोषित नहीं किये जा सकते हैं।

Thursday, July 17, 2014

जिस गौतम ऋषि को अपनी पत्नी की पवित्रा और दोष मुक्ति का ज्ञान भगवान श्री राम कराकर उनको मिलाये उसी सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय भगवान श्री राम को अपनी पत्नी माता सीता(माता लक्ष्मी) की पवित्रता और दोष मुक्ति का ज्ञान स्वयं कश्यप गोत्र के ही वरुण पुत्र गोत्रीय महर्षि वाल्मीकि तो न करा सके परन्तु प्रयागराज/तीर्थराजप्रयाग/अल्लाहाबाद स्थित सीतासमाहित स्थल सीतामढी में सीता के समाहित हो जाने के बाद भी बहुत दिन तक अयोध्या में शासन करते हुए भगवान श्रीराम को माता सीता की याद जब नहीं आयी तो उनको सती श्रेष्ठ सटी अनुसुईया और अत्रि के पुत्र दुर्वाशा/कृष्णात्रेय/अत्रि ऋषि के पुत्र दुर्वाशा(आर्यमगढ़:आजमगढ़ स्थित फूलपुर तहसील के सन्निकट स्थित दुर्वाशा आश्रम निवाशी दुर्वाशा) ने लक्ष्मण से भगवान श्रीराम से तत्काल मिलवाने की अपनी एक ही धमकी (अगर तुरंत नहीं मिलवाते हो तो पूरे विराट कौसल राज्य न की केवल अयोध्या को ही जलाकर समाप्त कर दूंगा) ने भगवान श्री राम को पुनः भाइयों समेत सरयू में समाहित करवाने का करक बन विष्णु लोग पहुंचकर माता सीता(लक्ष्मी) से पुनः मिलवा दिया। यह था दशरथ के चारों पुत्रों का अपनी प्रजा के प्रति प्रेम और ऋषि समाज का सम्मान की यह जानत हुए भी की स्वयं महाकालेश्वर शिव से वार्ता के दौरान अगर भगवान श्रीराम (बड़े भाई) के सामने गया तो मृत्यु निश्चित है उस पर भी ऋषि दुर्वाशा से मिलान करवाने को बाध्य हुए और इस प्रकार एक-एक कर हर भाई कौशल राज्य को दुर्वाशा ऋषि अपने टप से न जलाएं उसे बचाने के लिए सरयू में समाहित हुए। और यह भी की दुर्वाशा का श्राप और आशीर्वाद दोनों कल्याणकारी होता है अतः इस प्रकार विष्णु लोक जाकर भगवान श्रीराम अपने विष्णु स्वरुप में आ कर माता सीता जो लक्ष्मी स्वरुप में आ गयी थीं उनसे पुनः मिलते हैं और यह भी सुखद संयोग है जहां अयोध्या को वियोग वही सीता:लक्ष्मी से संयोग हुआ न दुर्वाशा का श्राप महा मंगल अतः दुर्वाशा महा मंगलेश्वर कहे गए हैं जहाँ हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवनसुत/केसरी नंदन/मारुतीनंदन/आंजनेय/महाबीर बजरंग/शंकरसुमन मंगलेश्वर ही केवल हैं।

जिस गौतम ऋषि को अपनी पत्नी की पवित्रा और दोष मुक्ति का ज्ञान भगवान श्री राम कराकर उनको मिलाये उसी सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय भगवान श्री राम को अपनी पत्नी माता सीता(माता लक्ष्मी) की पवित्रता और दोष मुक्ति का ज्ञान स्वयं कश्यप गोत्र के ही वरुण पुत्र  गोत्रीय महर्षि  वाल्मीकि तो न करा सके परन्तु प्रयागराज/तीर्थराजप्रयाग/अल्लाहाबाद स्थित सीतासमाहित स्थल  सीतामढी में सीता के समाहित हो जाने के बाद भी बहुत दिन तक अयोध्या में शासन करते हुए भगवान श्रीराम को माता सीता की याद जब नहीं आयी तो उनको सती श्रेष्ठ सटी अनुसुईया और अत्रि के पुत्र दुर्वाशा/कृष्णात्रेय/अत्रि ऋषि के पुत्र दुर्वाशा(आर्यमगढ़:आजमगढ़ स्थित फूलपुर तहसील के सन्निकट स्थित दुर्वाशा आश्रम निवाशी दुर्वाशा) ने लक्ष्मण से भगवान श्रीराम से तत्काल मिलवाने की अपनी एक ही धमकी (अगर तुरंत नहीं मिलवाते हो तो पूरे विराट कौसल राज्य न की केवल अयोध्या को ही जलाकर समाप्त कर दूंगा) ने भगवान श्री राम को पुनः भाइयों समेत सरयू में समाहित करवाने का करक बन विष्णु लोग पहुंचकर माता सीता(लक्ष्मी) से पुनः मिलवा दिया। यह था दशरथ के चारों पुत्रों का अपनी प्रजा के प्रति प्रेम और ऋषि समाज का सम्मान की यह जानत हुए भी की स्वयं महाकालेश्वर शिव से वार्ता के दौरान अगर भगवान श्रीराम (बड़े भाई) के सामने गया तो मृत्यु निश्चित है उस पर भी ऋषि दुर्वाशा से मिलान करवाने को बाध्य हुए और इस प्रकार एक-एक कर हर भाई कौशल राज्य को दुर्वाशा ऋषि अपने टप से न जलाएं उसे बचाने के लिए सरयू में समाहित हुए। और यह भी की दुर्वाशा का श्राप और आशीर्वाद दोनों कल्याणकारी होता है अतः इस प्रकार विष्णु लोक जाकर भगवान श्रीराम अपने विष्णु स्वरुप में आ कर माता सीता जो लक्ष्मी स्वरुप में आ गयी थीं उनसे पुनः मिलते हैं और यह भी सुखद संयोग है जहां अयोध्या को वियोग वही सीता:लक्ष्मी से संयोग हुआ न दुर्वाशा का श्राप महा मंगल अतः दुर्वाशा महा मंगलेश्वर कहे गए हैं जहाँ हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवनसुत/केसरी नंदन/मारुतीनंदन/आंजनेय/महाबीर बजरंग/शंकरसुमन मंगलेश्वर ही केवल हैं। 

If any one has doubt on my decision about family values and truth then he should remember the Saptarshi Gautam who given Nyay Darshan (PHILOSOPHY OF JUSTICE) and also known as greatest Rishi among Saptarshi whom I too discussed in my past post of blog and who applied his Darshan even in his wife Ahilya case and God SHRI RAM as in carnation of Vishnu not found Ahilya guilty and re-accompanied her with Gautam Rishi.

If any one has doubt on my decision about family values and truth then he should remember the Saptarshi Gautam who given Nyay Darshan (PHILOSOPHY OF JUSTICE) and also known as greatest Rishi among Saptarshi whom I too discussed in my past post of blog and who applied his Darshan even in his wife Ahilya case and God SHRI RAM as in carnation of Vishnu not found Ahilya guilty and re-accompanied her with Gautam Rishi.

Re: भारतीय दर्शन : न्याय दर्शन: महर्षि गौतम: महर्षि गौतम रचित इस दर्शन में इसमें न्याय की परिभाषा के अनुसार न्याय करने की पद्धति तथा उसमें जय-पराजय के कारणों का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।इसमें पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन है। पदार्थों के तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान की निवृत्ति होती है। फिर अशुभ कर्मो में प्रवृत्त न होना, मोह से मुक्ति एवं दुखों से निवृत्ति होती है। इसमें परमात्मा कोसृष्टिकर्ता, निराकार, सर्वव्यापक और जीवात्मा को शरीर से अलग एवं प्रकृति को अचेतन तथा सृष्टि का उपादान कारण माना गया है और स्पष्ट रूप से त्रैतवाद का प्रतिपादन किया गया है। वैशेषिक दर्शन: महर्षि कणाद:महर्षि कणाद रचित इस दर्शन में धर्म के सच्चे स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसमें सांसारिक उन्नति तथा निश्श्रेय सिद्धि के साधन को धर्म माना गया है। अत: मानव के कल्याण हेतु धर्म का अनुष्ठान करना परमावश्यक होता है। इस दर्शन में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य विशेष और समवाय इन छ: पदाथों के साधम्र्य तथा वैधम्र्य के तत्वाधान से मोक्ष प्राप्ति मानी जाती है। साधम्र्य तथा वैधम्र्य ज्ञान की एक विशेष पद्धति है, जिसको जाने बिना भ्रांतियों का निराकरण करना संभव नहीं है। इसके अनुसार चार पैर होने से गाय-भैंस एक नहीं हो सकते। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म दोनों ही चेतन हैं। किंतु इस साधम्र्य से दोनों एक नहीं हो सकते। साथ ही यह दर्शन वेदों को, ईश्वरोक्त होने को परम प्रमाण मानता है। सांख्य दर्शन:महर्षि कपिल: इस दर्शन के रचयिता महर्षि कपिल हैं। इसमें सत्कार्यवाद के आधार पर इस सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति को माना गया है। इसका प्रमुख सिद्धांत है कि अभाव से भाव या असत से सत की उत्पत्ति कदापि संभव नहीं है। सत कारणों से ही सत कार्यो की उत्पत्ति हो सकती है। सांख्य दर्शन प्रकृति से सृष्टि रचना और संहार के क्रम को विशेष रूप से मानता है। साथ ही इसमें प्रकृति के परम सूक्ष्म कारण तथा उसके सहित ख्ब् कार्य पदाथों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। पुरुष ख्भ् वां तत्व माना गया है, जो प्रकृति का विकार नहीं है। इस प्रकार प्रकृति समस्त कार्य पदाथो का कारण तो है, परंतु प्रकृति का कारण कोई नहीं है, क्योंकि उसकी शाश्वत सत्ता है। पुरुष चेतन तत्व है, तो प्रकृति अचेतन। पुरुष प्रकृति का भोक्ता है, जबकि प्रकृति स्वयं भोक्ती नहीं है। योग दर्शन:महर्षि पतंजलि: इस दर्शन के रचयिता महर्षि पतंजलि हैं। इसमें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। इसके अलावा योग क्या है, जीव के बंधन का कारण क्या है? चित्त की वृत्तियां कौन सी हैं? इसके नियंत्रण के क्या उपाय हैं इत्यादि यौगिक क्रियाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार परमात्मा का ध्यान आंतरिक होता है। जब तक हमारी इंद्रियां बहिर्गामी हैं, तब तक ध्यान कदापि संभव नहीं है। इसके अनुसार परमात्मा के मुख्य नाम ओ३म् का जाप न करके अन्य नामों से परमात्मा की स्तुति और उपासना अपूर्ण ही है। मीमांसा दर्शन: महर्षि जैमिनि: इस दर्शन में वैदिक यज्ञों में मंत्रों का विनियोग तथा यज्ञों की प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है। इस दर्शन के रचयिता महर्षि जैमिनि हैं। यदि योग दर्शन अंत: करण शुçद्ध का उपाय बताता है, तो मीमांसा दर्शन मानव के पारिवारिक जीवन से राष्ट्रीय जीवन तक के कत्तüव्यों और अकत्तüव्यों का वर्णन करता है, जिससे समस्त राष्ट्र की उन्नति हो सके। जिस प्रकार संपूर्ण कर्मकांड मंत्रों के विनियोग पर आधारित हैं, उसी प्रकार मीमांसा दर्शन भी मंत्रों के विनियोग और उसके विधान का समर्थन करता है। धर्म के लिए महर्षि जैमिनि ने वेद को भी परम प्रमाण माना है। उनके अनुसार यज्ञों में मंत्रों के विनियोग, श्रुति, वाक्य, प्रकरण, स्थान एवं समाख्या को मौलिक आधार माना जाता है। वेदांत दर्शन: महर्षि व्यास: वेदांत का अर्थ है वेदों का अंतिम सिद्धांत। महर्षि व्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। इस दर्शन को उत्तर मीमांसा भी कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म जगत का कर्ता-धर्ता व संहार कर्ता होने से जगत का निमित्त कारण है। उपादान अथवा अभिन्न कारण नहीं। ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। साथ ही जन्म मरण आदि क्लेशों से रहित और निराकार भी है। इस दर्शन के प्रथम सूत्र `अथातो ब्रह्म जिज्ञासा´ से ही स्पष्ट होता है कि जिसे जानने की इच्छा है, वह ब्रह्म से भिन्न है, अन्यथा स्वयं को ही जानने की इच्छा कैसे हो सकती है। और यह सर्वविदित है कि जीवात्मा हमेशा से ही अपने दुखों से मुक्ति का उपाय करती रही है। परंतु ब्रह्म का गुण इससे भिन्न है। आगे चलकर वेदान्त के अनेकानेक सम्प्रदाय (अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि ) बने। ------------------------------------------------------------------------------------ अन्य हिन्दू दर्शन: चार्वाक दर्शन वेदविरोधी होने के कारण नास्तिक संप्रदायों में चार्वाक मत का भी नाम लिया जाता है। भौतिकवादी होने के कारण यह आदर न पा सका। इसका इतिहास और साहित्य भी उपलब्ध नहीं है। "बृहस्पति सूत्र" के नाम से एक चार्वाक ग्रंथ के उद्धरण अन्य दर्शन ग्रंथों में मिलते हैं। चार्वाक मत एक प्रकार का यथार्थवाद और भौतिकवाद है। इसके अनुसार केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। अनुमान और आगम संदिग्ध होते हैं। प्रत्यक्ष पर आश्रित भौतिक जगत् ही सत्य है। आत्मा, ईश्वर, स्वर्ग आदि सब कल्पित हैं। भूतों के संयोग से देह में चेतना उत्पन्न होती है। देह के साथ मरण में उसका अंत हो जाता है। आत्मा नित्य नहीं है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जीवनकाल में यथासंभव सुख की साधना करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए अवैदिक दर्शनों का विकास: उपनिषदों के अध्यात्मवाद तथा तपोवाद में ही वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध एक प्रकट क्रांति का रूप ग्रहण कर लिया। उपनिषद काल में एक ओर बौद्ध और जैन धर्मों की अवैदिक परंपराओं का आविर्भाव हुआ तथा दूसरी ओर वैदिक दर्शनों का उदय हुआ। ईसा के जन्म के पूर्व और बाद की एक दो शताब्दियों में अनेक दर्शनों की समानांतर धाराएँ भारतीय विचारभूमि पर प्रवाहित होने लगीं। बौद्ध और जैन दर्शनों की धाराएँ भी इनमें सम्मिलित हैं।(From Wikipedia and Other Sources)

भारतीय दर्शन :  न्याय दर्शन: महर्षि गौतम: महर्षि गौतम रचित इस दर्शन में इसमें न्याय की परिभाषा के अनुसार न्याय करने की पद्धति तथा उसमें जय-पराजय के कारणों का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।इसमें पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन है। पदार्थों के तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान की निवृत्ति होती है। फिर अशुभ कर्मो में प्रवृत्त न होना, मोह से मुक्ति एवं दुखों से निवृत्ति होती है। इसमें परमात्मा कोसृष्टिकर्ता, निराकार, सर्वव्यापक और जीवात्मा को शरीर से अलग एवं प्रकृति को अचेतन तथा सृष्टि का उपादान कारण माना गया है और स्पष्ट रूप से त्रैतवाद का प्रतिपादन किया गया है।   वैशेषिक दर्शन: महर्षि कणाद:महर्षि कणाद रचित इस दर्शन में धर्म के सच्चे स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसमें सांसारिक उन्नति तथा निश्श्रेय सिद्धि के साधन को धर्म माना गया है। अत: मानव के कल्याण हेतु धर्म का अनुष्ठान करना परमावश्यक होता है। इस दर्शन में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य विशेष और समवाय इन छ: पदाथों के साधम्र्य तथा वैधम्र्य के तत्वाधान से मोक्ष प्राप्ति मानी जाती है। साधम्र्य तथा वैधम्र्य ज्ञान की एक विशेष पद्धति है, जिसको जाने बिना भ्रांतियों का निराकरण करना संभव नहीं है। इसके अनुसार चार पैर होने से गाय-भैंस एक नहीं हो सकते। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म दोनों ही चेतन हैं। किंतु इस साधम्र्य से दोनों एक नहीं हो सकते। साथ ही यह दर्शन वेदों को, ईश्वरोक्त होने को परम प्रमाण मानता है।   सांख्य दर्शन:महर्षि कपिल: इस दर्शन के रचयिता महर्षि कपिल हैं। इसमें सत्कार्यवाद के आधार पर इस सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति को माना गया है। इसका प्रमुख सिद्धांत है कि अभाव से भाव या असत से सत की उत्पत्ति कदापि संभव नहीं है। सत कारणों से ही सत कार्यो की उत्पत्ति हो सकती है। सांख्य दर्शन प्रकृति से सृष्टि रचना और संहार के क्रम को विशेष रूप से मानता है। साथ ही इसमें प्रकृति के परम सूक्ष्म कारण तथा उसके सहित ख्ब् कार्य पदाथों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। पुरुष ख्भ् वां तत्व माना गया है, जो प्रकृति का विकार नहीं है। इस प्रकार प्रकृति समस्त कार्य पदाथो का कारण तो है, परंतु प्रकृति का कारण कोई नहीं है, क्योंकि उसकी शाश्वत सत्ता है। पुरुष चेतन तत्व है, तो प्रकृति अचेतन। पुरुष प्रकृति का भोक्ता है, जबकि प्रकृति स्वयं भोक्ती नहीं है।  योग दर्शन:महर्षि पतंजलि: इस दर्शन के रचयिता महर्षि पतंजलि हैं। इसमें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। इसके अलावा योग क्या है, जीव के बंधन का कारण क्या है? चित्त की वृत्तियां कौन सी हैं? इसके नियंत्रण के क्या उपाय हैं इत्यादि यौगिक क्रियाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार परमात्मा का ध्यान आंतरिक होता है। जब तक हमारी इंद्रियां बहिर्गामी हैं, तब तक ध्यान कदापि संभव नहीं है। इसके अनुसार परमात्मा के मुख्य नाम ओ३म् का जाप न करके अन्य नामों से परमात्मा की स्तुति और उपासना अपूर्ण ही है।  मीमांसा दर्शन: महर्षि जैमिनि: इस दर्शन में वैदिक यज्ञों में मंत्रों का विनियोग तथा यज्ञों की प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है। इस दर्शन के रचयिता महर्षि जैमिनि हैं। यदि योग दर्शन अंत: करण शुçद्ध का उपाय बताता है, तो मीमांसा दर्शन मानव के पारिवारिक जीवन से राष्ट्रीय जीवन तक के कत्तüव्यों और अकत्तüव्यों का वर्णन करता है, जिससे समस्त राष्ट्र की उन्नति हो सके। जिस प्रकार संपूर्ण कर्मकांड मंत्रों के विनियोग पर आधारित हैं, उसी प्रकार मीमांसा दर्शन भी मंत्रों के विनियोग और उसके विधान का समर्थन करता है। धर्म के लिए महर्षि जैमिनि ने वेद को भी परम प्रमाण माना है। उनके अनुसार यज्ञों में मंत्रों के विनियोग, श्रुति, वाक्य, प्रकरण, स्थान एवं समाख्या को मौलिक आधार माना जाता है।  वेदांत दर्शन: महर्षि व्यास: वेदांत का अर्थ है वेदों का अंतिम सिद्धांत। महर्षि व्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। इस दर्शन को उत्तर मीमांसा भी कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म जगत का कर्ता-धर्ता व संहार कर्ता होने से जगत का निमित्त कारण है। उपादान अथवा अभिन्न कारण नहीं। ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। साथ ही जन्म मरण आदि क्लेशों से रहित और निराकार भी है। इस दर्शन के प्रथम सूत्र `अथातो ब्रह्म जिज्ञासा´ से ही स्पष्ट होता है कि जिसे जानने की इच्छा है, वह ब्रह्म से भिन्न है, अन्यथा स्वयं को ही जानने की इच्छा कैसे हो सकती है। और यह सर्वविदित है कि जीवात्मा हमेशा से ही अपने दुखों से मुक्ति का उपाय करती रही है। परंतु ब्रह्म का गुण इससे भिन्न है। आगे चलकर वेदान्त के अनेकानेक सम्प्रदाय (अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि ) बने। ------------------------------------------------------------------------------------ अन्य हिन्दू दर्शन: चार्वाक दर्शन वेदविरोधी होने के कारण नास्तिक संप्रदायों में चार्वाक मत का भी नाम लिया जाता है। भौतिकवादी होने के कारण यह आदर न पा सका। इसका इतिहास और साहित्य भी उपलब्ध नहीं है। "बृहस्पति सूत्र" के नाम से एक चार्वाक ग्रंथ के उद्धरण अन्य दर्शन ग्रंथों में मिलते हैं। चार्वाक मत एक प्रकार का यथार्थवाद और भौतिकवाद है। इसके अनुसार केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। अनुमान और आगम संदिग्ध होते हैं। प्रत्यक्ष पर आश्रित भौतिक जगत् ही सत्य है। आत्मा, ईश्वर, स्वर्ग आदि सब कल्पित हैं। भूतों के संयोग से देह में चेतना उत्पन्न होती है। देह के साथ मरण में उसका अंत हो जाता है। आत्मा नित्य नहीं है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जीवनकाल में यथासंभव सुख की साधना करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए  अवैदिक दर्शनों का विकास: उपनिषदों के अध्यात्मवाद तथा तपोवाद में ही वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध एक प्रकट क्रांति का रूप ग्रहण कर लिया। उपनिषद काल में एक ओर बौद्ध और जैन धर्मों की अवैदिक परंपराओं का आविर्भाव हुआ तथा दूसरी ओर वैदिक दर्शनों का उदय हुआ। ईसा के जन्म के पूर्व और बाद की एक दो शताब्दियों में अनेक दर्शनों की समानांतर धाराएँ भारतीय विचारभूमि पर प्रवाहित होने लगीं। बौद्ध और जैन दर्शनों की धाराएँ भी इनमें सम्मिलित हैं।(From Wikipedia and Other Sources)

यह है प्रयागराज/तीर्थराज प्रयाग/त्रिवेणी/अल्लाहआबाद में हुए प्राक-यज्ञ (सप्तर्षि हेतु प्रकृष्टा यज्ञ) से प्रकट हुए सप्तर्षियों की संतान हम संताने जिनका पूरे विश्व में साम्राज्य है।

मित्रों जो सनातन धर्म की सीमा के पार जाता है और पुनः धर्म में आता है वह वाह्य और अंदर आने जाने वाले का गोत्र, जो धर्म को नहीं मानता और जो धर्म के विरुद्ध कार्य करता है, जिसको किशी भी धर्म से बाहर  निकला जाता है सबका गोत्र कश्यप गोत्र ही होता है । जो श्रेष्ठ देवत्व (इंद्र, वरुण, विश्वकर्मा, चन्द्र, सूर्य, अग्नि, अनिल, धरणी, निलय) को प्राप्त होते हैं और जो राक्षस श्रेणी को प्राप्त होते हैं उनका भी गोत्र कश्यप गोत्र ही होता है। और ऐसे कश्यप गोत्र में विष्णु के अनगिनत अवतार इसी लिए हुए हैं क्योंकि ऐसे लोगों का उद्धार विष्णु ही कर सकते है और सामान्य मानव को इनके द्वारा प्रदत्त कस्ट से निवारण कर सकते है और एक उद्धारक के रूप में ये मानव स्वरुप में ही पूर्ण परमब्रह्म का पद प्राप्त किये हैं चाहे भगवान वामन(वर्तमान बलिया जनपद का दैत्यों का श्रेष्ठ राजा बाली प्रकरण) हो, सूर्यवंशीय भगवान श्रीराम हो, या वृष्णि/चन्द्रवंशीय भगवान श्रीकृष्ण हों या अन्य विष्णु मानवतार तक माने गए हैं। यह जिम्मेदारी कश्यप गोत्रियों की इसलिए है क्योंकि वे ही ब्रह्मा के प्रथम पुत्र मारीच के पुत्र थे और ब्रह्मा का एक श्रेष्ठ पौत्र ब्रह्मा के वरदान (इस सृस्टि को सुचारू रूप से संचालित करने का दायित्व) में इनकी प्रमुख और नियंत्रक की भूमिका है।  और यह सब जिम्मेदारियां (उन सबको ही आश्रय जो किशी भी दशा में जीवन जीना चाहते हैं इस दुनिया के सब कस्ट सह कर वे चाहे मनोदशा के तहत अपना उच्च और निम्न कर्म कर रहे हों ) ब्रह्मा का ज्येष्ठ पौत्र/पुत्र  होने की वजह से जो निभानी पड़ती है उसी के फल स्वरुप कश्यप ज्येष्ठ होने के बावजूद सनातन सप्तर्षयों में गौतम और वशिष्ठ के बाद स्थान पाते हैं। जबकि भगवान श्रीराम=रामजानकी जिनको को भगवान सत्यनारायण तक का पद प्राप्त हुआ और वे साया नारायण जिनका सातों सूर्य पर नियंत्रण हो या जिनका सातों ब्रह्मर्षिओं (सप्तर्षियों) पर नियंत्रण हो पर वे भी कशयप गोत्र को गौतम और वशिष्ठ से ऊपर नहीं ले जा सके अव इसी से आप गौतम और वशिष्ठ की शक्ति का अंदाजा लगा सकते है की चार वेद, 18 पुराणम श्रीमद्भागवत गीता, महाभारत और अन्य बहुत से महत्वपूर्ण ग्रन्थ सार्वजनिक तौर पर लिखकर सत्य को उजागर कर देने वाले जिनके वंसज/पौत्र महर्षि वेद व्यास पर कोई सामाजिक रूप से आंच नहीं आयी वे भगवान श्रीराम के गुरु वशिष्ठ भी गौतम के बाद दूसरा स्थान प्राप्त करते हैं। तो आप गौतम की महिमा समझ सकते है और यह है कैलाश पर्वत पर भगवान भोले नाथ के सबसे शानिध्य में रहने वाले की शक्ति जिनको कोई आज तक हिला नहीं सका मानवता के पैमाने पर। और प्रकार हम प्रयागराज से जो श्रेणी बनाते हैं मानवता के पाउमाने पर वह है: गौतम(मानवता में मूर्धन्य), वशिष्ठ(गुरु श्रेष्ठ)), कश्यप/मारीच(प्रशासन में श्रेष्ठ), भारद्वाज/बृहस्पति/अंगारिशा(ज्ञान-विज्ञानं में श्रेष्ठ), जमदग्नि/भृगु (त्याग में श्रेष्ठ:ब्राह्मणत्व में श्रेष्ठ), कृष्णात्रे/अत्रि(सत्यमेव जयते की पूर्णता के कारक : धर्मचक्र के रक्षक: समय चक्र के रक्षक: यहां तक की वह विष्णु या अन्य अवतार क्यों न हो) , कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ (गायत्री/सूर्य मंत्र के प्रणेता और भारत के अशोक चक्र या समय चक्र के प्रथम द्वार: युद्ध कौसल गुरु: अशोक चक्र पर होने वाले वार का  प्रथमतः यही सामना करते हैं)। इन सातों मतलब सप्तर्षिओं(गोत्रों) से मलय(केरल-तमिल) पर्वत पर कुम्भज(अगस्त्य) ऋषि के जन्म होने से अस्टक(आठ)  ऋषि(गोत्र) और एक-एक से तीन तीन करके 24 आदर्श ऋषि (गोत्र) से आज हम लगभग 150 गोत्र के रूप में इस विश्व समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। -------------यह है प्रयागराज/तीर्थराज प्रयाग/त्रिवेणी/अल्लाहआबाद में हुए प्राक-यज्ञ (सप्तर्षि हेतु प्रकृष्टा यज्ञ) से प्रकट हुए सप्तर्षियों की संतान हम संताने जिनका पूरे विश्व में साम्राज्य है।

Wednesday, July 16, 2014

मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 3 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। *******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------Pandey Vivek Kumar श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.

मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 3 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| 
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 
3) हिन्द भूमि(
जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो।
श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences|*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।

आइये हम हर जाती और सम्प्रदाय के भरतवंशी हम पुनः अपनी संस्कृति के प्रति सचेत हो और जातिवाद-सम्प्रदायवाद से ऊपर उठ हर एक की जाती और सम्प्रदाय का सम्मान करें और जहां तक हो सके अपनी जाती और सम्प्रदाय के नियमों का पालन करें क्योंकि इस विश्व समुदाय को हमारी जरूरत है उसे जाती और सम्प्रदाय के रूप में लेकिन मै आप को किशी जाती और धर्म को मानने के लिए बाध्य भी नहीं कर रहा केवल इतना निवेदन है की स्वयं सुसंस्कृति बने और जो में है उनको भी सुसंस्कृत बनाये और आप सामाजिक प्राणी हैं अतः जिसका आप से कोई मतलब नहीं वह भी आप को प्रभावित करेगा अतः आप यह भी नहीं कह सकते की मै कुछ भी करू मेरी मर्जी क्योंकि जब दूसरा उसकी प्रतिकिया में कुछ करेगा अपनी मर्जी से तो वह आप को भी कास्ट कारी होगा अतः विश्व समाज की मर्जी से भी कुछ करना पडेगा।

आइये हम हर जाती और सम्प्रदाय के भरतवंशी हम पुनः अपनी संस्कृति के प्रति सचेत हो और जातिवाद-सम्प्रदायवाद से ऊपर उठ हर एक की जाती और सम्प्रदाय का सम्मान करें और जहां तक हो सके अपनी जाती और सम्प्रदाय के नियमों का पालन करें क्योंकि इस विश्व समुदाय को हमारी जरूरत है उसे जाती और सम्प्रदाय के रूप में लेकिन मै आप को किशी जाती और धर्म को मानने के लिए बाध्य भी नहीं कर रहा केवल इतना निवेदन है की स्वयं सुसंस्कृति बने और जो  में है उनको भी सुसंस्कृत बनाये और आप सामाजिक प्राणी हैं अतः जिसका आप से कोई मतलब नहीं वह भी आप को प्रभावित करेगा अतः आप यह भी नहीं कह सकते की मै कुछ भी करू मेरी मर्जी क्योंकि जब दूसरा उसकी प्रतिकिया में कुछ करेगा अपनी मर्जी से तो वह आप को भी कास्ट कारी होगा अतः विश्व समाज की मर्जी से भी कुछ करना पडेगा।

Indian changed their religion but why their culture not changed completely till date?

Indian changed their religion but why their culture not changed completely till date?

पहाड़ से नीचे गिरना आशान है पर नीचे से ऊपर पहाड़ की उसी छोटी पर पुनः जाना बहुत ही कठिन होता है अगर अनुभव न हो तो किशी और से पूंछ लीजिये।


दल-दल में तिनका भी डूब जाता है तो चरित्रहीनता के दल-दल में कौन शक्तिशाली से शक्तिशाली मानव नहीं डूब जाएगा और किसकी शक्ति क्षीण नहीं हो जाएगी। इसलिए चरित्र का महत्व सबसे ज्यादा हो जाता है। और श्रेष्ठ चरित्रवान व्यक्ति ही ऐसे स्थान पर बहुत समय तक अपने को चन्दन की तरह सुरक्षित रख सकता है। "वृतम् यत्नेन संरक्षेत, वित्तमयाति जाति ते"। और यह संस्कार और चरित्र और संस्कृति अचानक पैसा या पद मिल जाने से परिवर्तिन नहीं हो जाती है। और इसे लिए समान सामूहिक संस्कार और सस्कृति देखी जाती है नए सम्बन्ध बनाते समय न की केवल व्यक्तिगत संस्कार और संस्कृति अगर वह सामाजिक प्राणी है के सम्बन्ध में।

दल-दल में तिनका भी डूब जाता है तो चरित्रहीनता के दल-दल में कौन शक्तिशाली से शक्तिशाली मानव नहीं डूब जाएगा और किसकी शक्ति क्षीण नहीं हो जाएगी। इसलिए चरित्र का महत्व सबसे ज्यादा हो जाता है। और श्रेष्ठ चरित्रवान व्यक्ति ही ऐसे स्थान पर बहुत समय तक अपने को चन्दन की तरह सुरक्षित रख सकता है। "वृतम् यत्नेन संरक्षेत, वित्तमयाति जाति ते"। और यह संस्कार और चरित्र और संस्कृति अचानक पैसा या पद मिल जाने से परिवर्तिन नहीं हो जाती है। और इसे लिए समान सामूहिक संस्कार और सस्कृति देखी जाती है नए सम्बन्ध बनाते समय न की केवल व्यक्तिगत संस्कार और संस्कृति अगर वह सामाजिक प्राणी है के सम्बन्ध में।

माता पारवती से शिव ने कहा है की मै विष्णु/नारायण के ध्यान में मग्न रहता हूँ और माता लक्ष्मी से विष्णु ने कहा है की मै शिव के ध्यान में मग्न रहता रहता हूँ और ब्रह्मा अपने कुमुद पुष्प- हंस पर आरूढ़ हो अपनी श्रिस्टी को चलाने के लिए इनको वेधने वाले तीर जो दानवों द्वारा चलाये जाते है उससे उबरने के लिए इन दोनों से सहायता लेने पहुंचे रहते हैं नारद की तरह। भगवान श्रीराम ने यहां तक कहा है की: शिव वैरी मम भक्त कहावा। सो नर मोहि सपनेहु नहीं पावा॥ लेकिन शिव इतने उदार की उन्होंने अपने भक्तों को खुली छूट दे दी है: they are not bound to follow the Vishnu(Shri Ram/Krishna) and not a single line suggestion given by the Avadhar-Dani/Ashutosh Shiva): That is why Vishnu takes incarnation to destroy them if they cross the limit of human values in large scale.

माता पारवती से शिव ने कहा है की मै विष्णु/नारायण के ध्यान में मग्न रहता हूँ और माता लक्ष्मी से विष्णु ने कहा है की मै शिव के ध्यान में मग्न रहता रहता हूँ और ब्रह्मा अपने कुमुद पुष्प- हंस पर आरूढ़ हो अपनी श्रिस्टी को चलाने के लिए इनको वेधने वाले तीर जो दानवों द्वारा चलाये जाते है उससे उबरने के लिए इन दोनों से सहायता लेने पहुंचे रहते हैं नारद की तरह। भगवान श्रीराम ने यहां तक कहा है की: शिव वैरी मम भक्त कहावा। सो नर मोहि सपनेहु नहीं पावा॥ लेकिन शिव इतने उदार की उन्होंने अपने भक्तों को खुली छूट दे दी है: they are not bound to follow the Vishnu(Shri Ram/Krishna) and not a single line suggestion given by the Avadhar-Dani/Ashutosh Shiva): That is why Vishnu takes incarnation to destroy them if they cross the limit of human values in large scale.

RAMNATH(Shiv) relation with RAMAANATH(RAMANATH:VISHNU) and RAM(Vishnu-Avtar)


अगर जो शिव का भी इस्वर हो ( मतलब राम) वह शिव के भक्त का भी इस्वर है तो यह तर्क शास्त्र शिध्ध करता है की राम स्वयं रावण के भी इस्वर थे जो शिव का महान भक्त था और यह तो जीवन के रंगमंच पर एक अभिनय था जिसमे की वह विष्णु का द्वारपाल जय(रावण) और विजय(कुम्भकर्ण) विष्णु अवतारी श्रीराम के साथ अपनी भूमिका निभा रहा था जिसे स्वयं ब्रह्मा-विष्णु-महेश ने दिया था।---------------------------नाम के साथ आस्था जुडी है हमारे लिए अतः मेरी आस्था पर चोट करने वाला वह भी केदारेश्वर/ रामेश्वर नाम पर चोट करने वाला रामपुर-आज़मगढ़-२२३२२५ के निवाशी का अगर विरोधी नहीं तो कम से कम प्रेमी भी नहीं होगा। यही तो है रामनाथ(शिव), राम और रमानाथ(विष्णु) के बीच सम्बन्ध का सच।रामः यस्य ईस्वरह सह: रामस्य ईस्वरह सह: का भेद: In word of Shiv the definition of Rameshwaram:रामः यस्य ईस्वरह सह: Whose GOD(Isvar) is Ram known as Rameshwar and In Ram's word the definition of Rameshwaram रामस्य ईस्वरह सह: Who is Ram's GOD(Isvar) |******जय हिन्द(यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरत-खंड=भारतवर्ष), जय श्रीराम/कृष्ण।



अगर जो शिव का भी इस्वर हो ( मतलब राम) वह शिव के भक्त का भी इस्वर है तो यह तर्क शास्त्र शिध्ध करता है की राम स्वयं रावण के भी इस्वर थे जो शिव का महान भक्त था और यह तो जीवन के रंगमंच पर एक अभिनय था जिसमे की वह विष्णु का द्वारपाल जय(रावण) और विजय(कुम्भकर्ण) विष्णु अवतारी श्रीराम के साथ अपनी भूमिका निभा रहा था जिसे स्वयं ब्रह्मा-विष्णु-महेश ने दिया था।---------------------------
नाम के साथ आस्था जुडी है हमारे लिए अतः मेरी आस्था पर चोट करने वाला वह भी केदारेश्वर/ रामेश्वर नाम पर चोट करने वाला रामपुर-आज़मगढ़-२२३२२५ के निवाशी का अगर विरोधी नहीं तो कम से कम प्रेमी भी नहीं होगा। यही तो है रामनाथ(शिव), राम और रमानाथ(विष्णु) के बीच सम्बन्ध का सच।रामः यस्य ईस्वरह सह: रामस्य ईस्वरह सह: का भेद: In word of Shiv the definition of Rameshwaram:रामः यस्य ईस्वरह सह: Whose GOD(Isvar) is Ram known as Rameshwar and In Ram's word the definition of Rameshwaram रामस्य ईस्वरह सह: Who is Ram's GOD(Isvar) |******जय हिन्द(यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरत-खंड=भारतवर्ष), जय श्रीराम/कृष्ण।

महादेव शिव-शंकर के रिश्ते में शाडु भाई कश्यप ऋषि ने महादेव शिव के परम शिष्य के परसुराम दिमांग का भूत शांत कर समाज से विलुप्त होने को मजबूर किया तो वही कश्यप(दशरथ) नन्दन ने रावण का भूत शांत कराया था पर इस बार लगता है की महाबीर हनुमान को पैसा, पावर, चतुराई ज्यादा दिखाने वालों का भूत सदा सदा के लिए शांत करना पडेगा। इसके शिवा कुछ बचा ही नहीं और समय आने पर वह होगा भी 2057 तक वह इन्तजार रहेगा।

महादेव शिव-शंकर के रिश्ते में शाडु भाई कश्यप ऋषि ने महादेव शिव के परम शिष्य के परसुराम दिमांग का भूत शांत कर समाज से विलुप्त होने को मजबूर किया तो वही कश्यप(दशरथ) नन्दन ने रावण का भूत शांत कराया था पर इस बार लगता है की महाबीर हनुमान को पैसा, पावर, चतुराई ज्यादा दिखाने वालों का भूत सदा सदा के लिए शांत करना पडेगा। इसके शिवा कुछ बचा ही नहीं और समय आने पर वह होगा भी 2057 तक वह इन्तजार रहेगा।

मेरा पूरा गाँव एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी) जागीरदार द्वारा दान में मिला है जानकार आप को मेरे में मुस्लिम और आंतकवादी नजर आने लगा पर बराक हुसैन में आप को क्या नजर आता है? ---------मित्र पातालपुरी के राजा मकरध्वज अपने पिता अम्बावडेकर/अम्बेडकर/हनुमान/केशरीनन्दन/पवनपुत्र/शंकरसुमन/महाबीर बजरंग से शक्ति में आगे नहीं जा सकते पर यह जरूर है की पिता को अपने पुत्र को आगे जाता देख प्रसन्नता जरूर होती है और ऐसे महावीर अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान सदा सदा के लिए प्रयाग में निवाश कर लिए हैं तो आप प्रयागराज(काशी)-अयोध्या(मथुत्र-वृंदावन) को आँखें दिखाना बंद करो और अपनी सभ्यता अपने पास रखो। मै किशी ब्राह्मण कन्या का मलिन बस्ती में चले जाने को न्यायिक ठहराने वालों का समर्थन कभी नहीं कर सकता चाहे यह दुनिआ ही पलट जाय।

मेरा पूरा गाँव एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी) जागीरदार द्वारा दान में मिला है जानकार आप को मेरे में मुस्लिम और आंतकवादी नजर आने लगा पर बराक हुसैन में आप को क्या नजर आता है? ---------मित्र पातालपुरी के राजा मकरध्वज अपने पिता अम्बावडेकर/अम्बेडकर/हनुमान/केशरीनन्दन/पवनपुत्र/शंकरसुमन/महाबीर बजरंग से शक्ति में आगे नहीं जा सकते पर यह जरूर है की पिता को अपने पुत्र को आगे जाता देख प्रसन्नता जरूर होती है और ऐसे महावीर अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान सदा सदा के लिए प्रयाग में निवाश कर लिए हैं तो आप प्रयागराज(काशी)-अयोध्या(मथुत्र-वृंदावन) को आँखें दिखाना बंद करो और अपनी सभ्यता अपने पास रखो। मै किशी ब्राह्मण कन्या का मलिन बस्ती में चले जाने को न्यायिक ठहराने वालों का समर्थन कभी नहीं कर सकता चाहे यह दुनिआ ही पलट जाय।

Tuesday, July 15, 2014

अगर जो शिव का भी इस्वर हो ( मतलब राम) वह शिव के भक्त का भी इस्वर है तो यह तर्क शास्त्र शिध्ध करता है की राम स्वयं रावण के भी इस्वर थे जो शिव का महान भक्त था और यह तो जीवन के रंगमंच पर एक अभिनय था जिसमे की वह विष्णु का द्वारपाल जय(रावण) और विजय(कुम्भकर्ण) विष्णु अवतारी श्रीराम के साथ अपनी भूमिका निभा रहा था जिसे स्वयं ब्रह्मा-विष्णु-महेश ने दिया था।******जय हिन्द(यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरत-खंड=भारतवर्ष), जय श्रीराम/कृष्ण।

अगर जो शिव का भी इस्वर हो ( मतलब राम) वह शिव के भक्त का भी इस्वर है तो यह तर्क शास्त्र शिध्ध करता है की राम स्वयं रावण के भी इस्वर थे जो शिव का महान भक्त था और यह तो जीवन के रंगमंच पर एक अभिनय था जिसमे की वह विष्णु का द्वारपाल जय(रावण) और विजय(कुम्भकर्ण) विष्णु अवतारी श्रीराम के साथ अपनी भूमिका निभा रहा था जिसे स्वयं ब्रह्मा-विष्णु-महेश ने दिया था।******जय हिन्द(यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरत-खंड=भारतवर्ष), जय श्रीराम/कृष्ण।

नाम के साथ आस्था जुडी है हमारे लिए अतः मेरी आस्था पर चोट करने वाला वह भी केदारेश्वर/ रामेश्वर नाम पर चोट करने वाला रामपुर-आज़मगढ़-२२३२२५ के निवाशी का अगर विरोधी नहीं तो कम से कम प्रेमी भी नहीं होगा। यही तो है रामनाथ(शिव), राम और रमानाथ(विष्णु) के बीच सम्बन्ध का सच। रामः यस्य ईस्वरह सह=रामस्य ईस्वरह सह का भेद।

नाम के साथ आस्था जुडी है हमारे लिए अतः मेरी आस्था पर चोट करने वाला वह भी केदारेश्वर/ रामेश्वर नाम पर चोट करने वाला रामपुर-आज़मगढ़-२२३२२५ के निवाशी का अगर विरोधी नहीं तो कम से कम प्रेमी भी नहीं होगा। यही तो है रामनाथ(शिव), राम और रमानाथ(विष्णु) के बीच सम्बन्ध का सच। रामः यस्य ईस्वरह सह=रामस्य ईस्वरह सह का भेद।

सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण का पुत्र हूँ तो ब्राह्मण जन्म से हूँ और शिक्षक-अनुसंधानकर्ता हूँ तो कर्मणा भी ब्राह्मण ही हूँ, गाँव में खेतीबारी भी है जिसमे खरीद और बेच होती है/थी थोड़ी ही सही जिसमे एक मजदूर से ज्यादा कार्य करता था जिस दिन काम रहता था और दैनिक काम भी एक मजदूर का करता था पशुओं के चारे और खेती की दैनिक जिम्मेदारी की देख रेख में। अतः वैश्य भी आप कह सकते हैं अतिरिक्त तौर पर तथा इसे साथ ही साथ मै भारतीय शैन्य सेवादल (थल सेना) का कैडेट भी था और इसकी तीन जोन(वाराणसी-आजमगढ़-मिर्जापुर) में परिक्षा में प्रथम स्थान था तो जाहिर सी बात है की मै एक योग्य क्षत्रिय भी हूँ अतिरिक्त तौर पर। जौनपुर के जिस क्षेत्र में मई रहा हूँ उसे विश्व के सबसे सभ्य क्षेत्र में कोई दलित का लड़का भी काट नहीं सकता एक मजदूर की तरह कार्य करने में जो समक्ष पद पर भी क्यों हो। क्योंकि इतना कार्य मेरे साथ का कोई दलित लड़का भी नहीं करता था जो स्नातक तक मेरे साथ पढ़ा हो मई उसके घर के माहौल की बात नहीं कर रहा। जरूरत तो नहीं थी पर बैल से हल चलाकर कम से कम १०० बार खेत की जुताई भी किया हूँ दोपहर तक । हाई स्कूल परिक्षा में अंक की वजह से राष्ट्रीय मेरिट छात्रवृति मिली थी उच्च शिक्षा में और स्नातक तक प्रथम और द्वितीय स्थान( न की श्रेणी) भी था कक्षा में । अब आप इसी इतने से मेरी मेरिट निकाल लीजियेगा। मेरा सामाजिक के प्रति जो व्यवहार रहा और शिक्षा और संस्कृति के प्रति लोगों को किस तरह प्रेरित किया हूँ उसे मेरे स्वयं के मामा लोगों से नहीं से नहीं मेरे गुरुजन और गाँव के तथा गाँव के बगल के किशी भी मामा चाहे जिस जाती और धर्म के हों से आप पूंछ सकते हैं। -------------मै किस तरह किशी जाती और धर्म पर रहम करून जो स्वयं गलती करके दुःख भोगते हैं क्योंकि मै तो अपने मानसिक अवसाद ग्रस्त पिता का स्वयं कक्षा १० से ही इलाज कराने जाता था जो परिस्थिति जन्य कारणों से अवसादग्रस्त थे। हालांकि सब कुछ के बाद मै एकल पैतृक संपत्ति पर सबसे बड़ा हकदार हूँ अपने गाँव का अतः गरीबी रेखा से ऊपर आता था। ---------------------मेरा एक ही रहम है की कुछ लोग आरक्षण श्रेणी में आते हैं पर मै सामान्य श्रेणी में संघर्ष किया हूँ। -------------मै भी इसी मानसिक अवसाद ग्रस्त पिता के एक बचन का पालन किया हूँ की तुम पढ़ो चाहे न पढ़ो पर पैतृक जमीन नहीं बेची जाएगी और मै उनके उच्च विचार सुनकर इतना गर्व महसूस किया की मै गाँव की कुल 500 बीघे जमीन में से मेरे कुल की जमीन के अलावा मेरे बाबा ने जो जमीन बनाई थी वह एक साधन होता मेरे १२ बाद अल्लाहाबाद/प्रयागराज में इंजीनियरिंग हेतु कोचिंग के लिए पर मै उसे हाँथ नहीं लगाया और मामाजी के सहारे ही उच्च शिक्षा और संरक्षण प्राप्त किया जिसमे ताऊ जी का भी ऊपरी सहयोग रहा।--------क्या कोई अपना लक्ष्य पाने हेतु यह बाबा की बनायी हुई जमीन न बेचता पर मेरी दृस्टि में बाबा की बनायी हुई जमीन भी पैतृक ही थी अतः मै उसे भी नहीं बेच सकता था। अतः मामा जी और और ताऊ जी के सहारे ही रहा और आज इस स्थान पर पहुंचा हूँ जिस स्थान पर मै देश को सेवा देना चाहता था( ४ महीन की स्वतः तैयारी हेतु जब अल्लाहाबाद आया था 1993 में तो जिस दिन पानी नहीं आता था बेली रोड, नया कटरा तो उस दिन रशूलाबाद घाट अल्लाहाबाद नहाने जाता था और गंगा माँ से यही मांगता था की मेरी सेवा सर्त यही हो माँ की मै गंगा किनारे बेस शहर में ही सेवारत रहूँ और वह पिता/कुल का बचन मानते हुय भी हो गया)।

सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण का पुत्र हूँ तो ब्राह्मण जन्म से हूँ और शिक्षक-अनुसंधानकर्ता हूँ तो कर्मणा भी ब्राह्मण ही हूँ, गाँव में खेतीबारी भी है जिसमे खरीद और बेच होती है/थी थोड़ी ही सही जिसमे एक मजदूर से ज्यादा कार्य करता था जिस दिन काम रहता था और दैनिक काम भी एक मजदूर का करता था पशुओं के चारे और खेती की दैनिक जिम्मेदारी की देख रेख में। अतः वैश्य भी आप कह सकते हैं अतिरिक्त तौर पर तथा इसे साथ ही साथ मै भारतीय शैन्य सेवादल (थल सेना) का कैडेट भी था और इसकी तीन जोन(वाराणसी-आजमगढ़-मिर्जापुर) में परिक्षा में प्रथम स्थान था तो जाहिर सी बात है की मै एक योग्य क्षत्रिय भी हूँ अतिरिक्त तौर पर। जौनपुर के जिस क्षेत्र में मई रहा हूँ उसे विश्व के सबसे सभ्य क्षेत्र में कोई दलित का लड़का भी काट नहीं सकता एक मजदूर की तरह कार्य करने में जो समक्ष पद पर भी क्यों हो। क्योंकि इतना कार्य मेरे साथ का कोई दलित लड़का भी नहीं करता था जो स्नातक तक मेरे साथ पढ़ा हो मई उसके घर के माहौल की बात नहीं कर रहा। जरूरत तो नहीं थी पर बैल से हल चलाकर कम से कम १०० बार खेत की जुताई भी किया हूँ दोपहर तक । हाई स्कूल परिक्षा में अंक की वजह से राष्ट्रीय मेरिट छात्रवृति मिली थी उच्च शिक्षा में और स्नातक तक प्रथम और द्वितीय स्थान( न की श्रेणी) भी था कक्षा में । अब आप इसी इतने से मेरी मेरिट निकाल लीजियेगा। मेरा सामाजिक के प्रति जो व्यवहार रहा और शिक्षा और संस्कृति के प्रति लोगों को किस तरह प्रेरित किया हूँ उसे मेरे स्वयं के मामा लोगों से नहीं से नहीं मेरे गुरुजन और गाँव के तथा गाँव के बगल के किशी भी मामा चाहे जिस जाती और धर्म के हों से आप पूंछ सकते हैं। -------------मै किस तरह किशी जाती और धर्म पर रहम करून जो स्वयं गलती करके दुःख भोगते हैं क्योंकि मै तो अपने मानसिक अवसाद ग्रस्त पिता का स्वयं कक्षा १० से ही इलाज कराने जाता था जो परिस्थिति जन्य कारणों से अवसादग्रस्त थे। हालांकि सब कुछ के बाद मै एकल पैतृक संपत्ति पर सबसे बड़ा हकदार हूँ अपने गाँव का अतः गरीबी रेखा से ऊपर आता था। ---------------------मेरा एक ही रहम है की कुछ लोग आरक्षण श्रेणी में आते हैं पर मै सामान्य श्रेणी में संघर्ष किया हूँ। -------------मै भी इसी मानसिक अवसाद ग्रस्त पिता के एक बचन का पालन किया हूँ की तुम पढ़ो चाहे न पढ़ो पर पैतृक जमीन नहीं बेची जाएगी और मै उनके उच्च विचार सुनकर इतना गर्व महसूस किया की मै गाँव की कुल 500 बीघे जमीन में से मेरे कुल की जमीन के अलावा मेरे बाबा ने जो जमीन बनाई थी वह एक साधन होता मेरे १२ बाद अल्लाहाबाद/प्रयागराज में इंजीनियरिंग हेतु कोचिंग के लिए पर मै उसे हाँथ नहीं लगाया और मामाजी के सहारे ही उच्च शिक्षा और संरक्षण प्राप्त किया जिसमे ताऊ जी का भी ऊपरी सहयोग रहा।--------क्या कोई अपना लक्ष्य पाने हेतु यह बाबा की बनायी हुई जमीन न बेचता पर मेरी दृस्टि में बाबा की बनायी हुई जमीन भी पैतृक ही थी अतः मै उसे भी नहीं बेच सकता था। अतः मामा जी और और ताऊ जी के सहारे ही रहा और आज इस स्थान पर पहुंचा हूँ जिस स्थान पर मै देश को सेवा देना चाहता था( ४ महीन की स्वतः तैयारी हेतु जब अल्लाहाबाद आया था 1993 में तो जिस दिन पानी नहीं आता था बेली रोड, नया कटरा तो उस दिन रशूलाबाद घाट अल्लाहाबाद नहाने जाता था और गंगा माँ से यही मांगता था की मेरी सेवा सर्त यही हो माँ की मै गंगा किनारे बेस शहर में ही सेवारत रहूँ और वह पिता/कुल का बचन मानते हुय भी हो गया)।

हुसैन नाम का सहयोग लेना पड़ा यही थी आप की शक्ति। Islam works Parallel to Shri-Ramaism and Christianity works Parallel to Shri-Krishnaism is well defined fact. >>>>Sri Ram is elder than Shri Krishna in similar way Islam is elder than Christianity.


The money and muscle power which tried to demolish me in past were himself demolished in same manner without any effort from my side but again their hands are not in control and raising against me without imagination of limit of their own capacity which may caused a repetitive case without any effort from my side.

The money and muscle power which tried to demolish me in past were himself demolished in same manner without any effort from my side but again their hands are not in control and raising against me without imagination of limit of their own capacity which may caused a repetitive case without any effort from my side.

The person who taken responsibility of societal benefit on the request of Brahma, Vishnu and Mahesh who were belonging from Prayagraj/Prayag/ Triveni/ Allahabad University on the risk of his own existence now for him the people of Prayagraj/Prayag/Allahabad who were against that particular societal benefit related holy work is deciding his merit. At that time the world's super power/Vishva Sakti/Merit Holder was with them now that world's super power/Vishva Sakti/Merit Holder gone in the slum even then they not get ride of the merit phobia.

The person who taken responsibility of societal benefit on the request of Brahma, Vishnu and Mahesh who were belonging from Prayagraj/Prayag/ Triveni/ Allahabad University on the risk of his own existence now for him the people of Prayagraj/Prayag/Allahabad who were against that particular societal benefit related holy work is deciding his merit. At that time the world's super power/Vishva Sakti/Merit Holder was with them now that world's super power/Vishva Sakti/Merit Holder gone in the slum even then they not get ride of the merit phobia.

Monday, July 14, 2014

ॐ नमः शिवाय |(शिव की त्रिशूल शक्ति: केदारेश्वर, महामृत्युंजय, विश्वेश्वर) मार्कण्डेय ऋषि का महामृत्युंजय शिव-महामंत्र ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।। ((We worship the Three-eyed Lord=TRI-LOCHAN=TRI-NETRA:VIVEK(Having with every human including Shiva: which is only protector of Shiva from every outer and inner physical attacks although NANDI, GANGA, Dwiteeya's Moon, Nagraj Vashuki and his son Kartikey:Murugan and Ganesh and one daughter Ashok Sundari were member of his family along with Shivaa:Parvati) who is fragrant and who nourishes and nurtures all beings. As is the ripened cucumber (with the intervention of the gardener) is freed from its bondage (to the creeper), may he liberate us from death for the sake of immortality))| >>>> Pandey Vivek Kumar Islam works Parallel to Shri-Ramaism and Christianity works Parallel to Shri-Krishnaism is well defined fact. >>>>Sri Ram is elder than Shri Krishna in similar way Islam is elder than Christianity.


ॐ नमः शिवाय |(शिव की त्रिशूल शक्ति: केदारेश्वर, महामृत्युंजय, विश्वेश्वर)
मार्कण्डेय ऋषि का महामृत्युंजय शिव-महामंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।

((We worship the Three-eyed Lord=TRI-LOCHAN=TRI-NETRA:VIVEK(Having with every human including Shiva: which is only protector of Shiva from every outer and inner physical attacks although NANDI, GANGA, Dwiteeya's Moon, Nagraj Vashuki and his son Kartikey:Murugan and Ganesh and one daughter Ashok Sundari were member of his family along with Shivaa:Parvati) who is fragrant and who nourishes and nurtures all beings. As is the ripened cucumber (with the intervention of the gardener) is freed from its bondage (to the creeper), may he liberate us from death for the sake of immortality))| >>>>

Pandey Vivek Kumar Islam works Parallel to Shri-Ramaism and Christianity works Parallel to Shri-Krishnaism is well defined fact. >>>>Sri Ram is elder than Shri Krishna in similar way Islam is elder than Christianity.

भारतीय संस्कृति की धुरी प्रयाग(काशी)-अयोध्या(मथुरा-वृन्दावन) जो भारतीय संस्कृति को विश्व की सर्वोच्च संस्कृति बनाये हुए है और जिसमे मै स्वयं को अति-शूक्ष्म रूप से ही सही सहयोग करने वाला जाने और अनजाने समझता हूँ और उसी संस्कृति के सनातन श्रेष्ठ बने रहने की मूल भूत कुंजी को सार्वजनिक मीडिआ पर साझा करने का दंड 2 घंटे के अंदर ही भुगत चुका हूँ और उसे मिटा भी दिया गया दूसरे दिन फेसबुक के नियंताओं द्वारा। तो मित्रों इतना जान लो की भारतीय संस्कृति के अनुसार सुसंस्कृत व्यक्ति में सामान्य गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा के अनुपात में थोड़ा अंतर होता है और वह यह है की सुसंस्कृत व्यक्ति की स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि उसकी गतिज ऊर्जा से ही आती है। अतः वह किशी भी बात पर प्रतिक्रिया तुरंत नहीं व्यक्त करता और न सामान्य से विक्षोभ आने से अपना आपा खोता है और न अपनी संस्कृति छोड़ दूसरे का अन्धानुकरण नहीं करता है बिना दूसरी संस्कृति का मूल्यांकन किये और इस लिए उसे थोड़ा धीमा या खिसका हुआ लोग समझ लेते हैं सामान्य तौर पर लेकिन ऐसे सुसंस्कृत व्यक्ति की बात में वजन होता है और उसे अपने लक्ष्य से आप सामान्यतया विचलित नहीं कर हैं और इसी लिए ज्यादा सुसंस्कृत व्यक्ति स्थायित्व में या किशी जिम्मेदारी के कार्यों में ज्यादा सफल होते हैं।-मानव जीवन में जितने भी तरह की परिस्थितियां आयी उसमे भगवान श्रीराम ने एक पूर्ण मानव/सर्वश्रेष्ठ सुसंस्कृत पुरुष की भूमिका निभायी है तो क्या आप भगवान श्रीराम की खिसका हुआ समझेंगे? क्या दुनिआ में सीता का कोई विकल्प था जो वे स्वीकार कर घर लौट आते? और अगर व्याकुल भी हुए सीता के लिए तो क्या वे सुसंस्कृत नहीं कहलायेंगे? क्या लक्ष्मी, पारवती और सरस्वती का भी विकल्प है इस दुनिआ में विष्णु, शिव और ब्रह्मा के लिए? आप इन सबका भी विकल्प खोजने लगते है सबका यही तो आप की भूल है और इन्ही सब कारणों से रावण और भस्मासुर का अंत करना पड़ता है। ----------मित्रों भगवान श्रीराम से बड़ा सुसंस्कृत व्यक्ति इस संसार में जन्म ही नहीं लिया और इसी लिए पूर्ण परमेश्वर हो गए जब की वे विष्णु के ही अवतार थे मतलब उनको पूर्ण ब्रह्म/परमब्रह्म श्रीराम मना जाता है। यहाँ तक भगावन श्रीकृष्ण जो उनके परमपद को प्राप्त कर परमब्रह्म हुए धर्मराज-युधिष्ठिर से उनकी भगवान श्रीराम के जीवन की युक्तियाँ ही आदर्श मणी जाती थी जबकि वे परिस्थति के अनुकूल भगवान श्रीराम के आचरण को प्रयोग में लाने के लिए युधिष्ठिर को समझाने का प्रयत्न करते थे।

भारतीय संस्कृति की धुरी प्रयाग(काशी)-अयोध्या(मथुरा-वृन्दावन) जो भारतीय संस्कृति को विश्व की सर्वोच्च संस्कृति बनाये हुए है और जिसमे मै  स्वयं को अति-शूक्ष्म रूप से ही सही सहयोग करने वाला जाने और अनजाने समझता हूँ और उसी संस्कृति के सनातन श्रेष्ठ बने रहने की मूल भूत कुंजी को सार्वजनिक मीडिआ पर साझा करने का दंड 2 घंटे के अंदर ही भुगत चुका हूँ और उसे मिटा भी दिया गया दूसरे दिन फेसबुक के नियंताओं द्वारा। तो मित्रों इतना जान लो की भारतीय संस्कृति के अनुसार सुसंस्कृत व्यक्ति में सामान्य गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा के अनुपात में थोड़ा अंतर होता है और वह यह है की सुसंस्कृत व्यक्ति की स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि उसकी गतिज ऊर्जा से ही आती है।  अतः वह किशी भी बात पर प्रतिक्रिया  तुरंत नहीं व्यक्त करता और न सामान्य से विक्षोभ आने से अपना आपा खोता है और न अपनी संस्कृति छोड़ दूसरे का अन्धानुकरण नहीं करता है बिना दूसरी संस्कृति का मूल्यांकन किये और इस लिए उसे थोड़ा धीमा या खिसका हुआ लोग समझ लेते हैं सामान्य तौर पर लेकिन ऐसे सुसंस्कृत व्यक्ति की बात में वजन होता है और उसे अपने लक्ष्य से आप सामान्यतया विचलित नहीं कर हैं और इसी लिए ज्यादा सुसंस्कृत व्यक्ति स्थायित्व में या किशी जिम्मेदारी के कार्यों में ज्यादा सफल होते हैं।-मानव जीवन में जितने भी तरह की परिस्थितियां आयी उसमे भगवान श्रीराम ने एक पूर्ण मानव/सर्वश्रेष्ठ सुसंस्कृत पुरुष की भूमिका निभायी है तो क्या आप भगवान श्रीराम की खिसका हुआ समझेंगे? क्या दुनिआ में सीता का कोई विकल्प था जो वे स्वीकार कर घर लौट आते? और अगर व्याकुल भी हुए सीता के लिए तो क्या वे सुसंस्कृत नहीं कहलायेंगे? क्या लक्ष्मी, पारवती और सरस्वती का भी विकल्प है इस दुनिआ में विष्णु, शिव और ब्रह्मा के लिए? आप इन सबका भी विकल्प खोजने लगते है सबका यही तो आप की भूल है और इन्ही सब कारणों से रावण और भस्मासुर का अंत करना पड़ता है। ----------मित्रों भगवान श्रीराम से बड़ा सुसंस्कृत व्यक्ति इस संसार में जन्म ही नहीं लिया और इसी लिए पूर्ण परमेश्वर हो गए जब की वे विष्णु के ही अवतार थे मतलब उनको पूर्ण ब्रह्म/परमब्रह्म श्रीराम मना जाता है। यहाँ तक भगावन श्रीकृष्ण जो उनके परमपद को प्राप्त कर परमब्रह्म हुए धर्मराज-युधिष्ठिर से उनकी भगवान श्रीराम के जीवन की युक्तियाँ ही आदर्श मणी जाती थी जबकि वे परिस्थति के अनुकूल भगवान श्रीराम के आचरण को प्रयोग में लाने के लिए युधिष्ठिर को समझाने का प्रयत्न करते थे।    

इस भौतिक संसार को मै भी सुन्दर देखना चाहता हूँ और इस सुन्दर में सत्य और शिव(कल्याणकारी) शब्द अपने में ही छुपा है और इसी सुन्दर संसार के लक्ष्य को लेकर मै स्वयं के संबंधों को बिगाड़ कर भी अपनी लेखनी का सफर जारी रखा हूँ((from 2006 (orkut) to till date (facebook/blogpost)) जो सम्बन्ध मेरे अपने निजी जीवन और स्वार्थ के लिए भी अति महत्वपूर्ण है इसके बाद भी। अतः आप से विनम्रां निवेदन है की मेरे लक्षय को जानने के लिए मेरे सभी पोस्ट को पढ़ें और उदाहरण स्वरुप मै कई बार लिख चुका हूँ की जय (रावण) और विजय(कुम्भकर्ण) जिनको भगवान राम ने मारा था वे विष्णु के द्वारपाल थे और विष्णु ही भगवान श्रीराम के रूप में थे तो मई रावण की मानहानि कर द्वारपाल बना उस ब्राह्मण समाज को छोट नहीं पहुंचा रहा जो रावण को अपने स्वाभिमान का प्रतीक मानते हैं परशुराम की तरह अगर राक्षस के रूप में नहीं तो कम से कम एक विद्वान और पुरुषार्थी के रूप के रूप में। --------सत्य सत्य होता है और वह कोई सत्ता चले न चले इसका ध्यान नहीं रखता है इसमे मै कुछ नहीं कर रहा और न सत्ताधारी के हस्तक्षेप से सत्य सदा के लिए बदलता है पर केवल कुछ समय के लिए पर्दा पद सकता है उस पर। अतः मै खाली समय में मनोरंजन के लिए कुछ पोस्ट लिखता रहता हूँ और मेरे इस मनोरंजन से यह संसार सुन्दर(सत्यम-शिवम-सुंदरम) बने तो हमें अति प्रसन्नता होगी। मै क्षमा प्रार्थी हूँ उन भाइयों/मित्रों का जिनको मई जाने-अनजाने कस्ट पहुंचता हूँ पर अगर वे ज्यादा आहात हों तो अपनी प्रतिक्रिया उस पोस्ट पर अंकित करने का कास्ट करें जिनका मई समाधान स्वयं पा सकूँ और उन्हें दे सकूँ।

इस भौतिक संसार को मै भी सुन्दर देखना चाहता हूँ और इस सुन्दर में सत्य और शिव(कल्याणकारी) शब्द अपने में ही छुपा है और इसी सुन्दर संसार के लक्ष्य को लेकर मै स्वयं के संबंधों को बिगाड़ कर भी अपनी लेखनी का सफर जारी रखा हूँ((from 2006 (orkut) to till date (facebook/blogpost)) जो सम्बन्ध मेरे अपने निजी जीवन और स्वार्थ के लिए भी अति महत्वपूर्ण है इसके बाद भी। अतः आप से विनम्रां निवेदन है की मेरे लक्षय को जानने के लिए मेरे सभी पोस्ट को पढ़ें और उदाहरण स्वरुप मै कई बार लिख चुका हूँ की जय (रावण) और विजय(कुम्भकर्ण) जिनको भगवान राम ने मारा था वे विष्णु के द्वारपाल थे और विष्णु ही भगवान श्रीराम के रूप में थे तो मई रावण की मानहानि कर द्वारपाल बना उस ब्राह्मण समाज को छोट नहीं पहुंचा रहा जो रावण को अपने स्वाभिमान का प्रतीक मानते हैं परशुराम की तरह अगर राक्षस के रूप में नहीं तो कम से कम एक विद्वान और पुरुषार्थी के रूप के रूप में। --------सत्य सत्य होता है और वह कोई सत्ता चले न चले इसका ध्यान नहीं रखता है इसमे मै कुछ नहीं कर रहा और न सत्ताधारी के हस्तक्षेप से सत्य सदा के लिए बदलता है पर केवल कुछ समय के लिए पर्दा पद सकता है उस पर। अतः मै खाली समय में मनोरंजन के लिए कुछ पोस्ट लिखता रहता हूँ और मेरे इस मनोरंजन से यह संसार सुन्दर(सत्यम-शिवम-सुंदरम) बने तो हमें अति प्रसन्नता होगी। मै क्षमा प्रार्थी हूँ उन भाइयों/मित्रों का जिनको मई जाने-अनजाने कस्ट पहुंचता हूँ पर अगर वे ज्यादा आहात हों तो अपनी प्रतिक्रिया उस पोस्ट पर अंकित करने का कास्ट करें जिनका मई समाधान स्वयं पा सकूँ और उन्हें दे सकूँ।

Sunday, July 13, 2014

अगर आप को मेरे ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" में जातिवाद को बढ़ावा देने की गंध आती है और अगर जाती/धर्म मानना जातिवाद को बढ़ावा देना है तो वह मै वह अपनी उम्र भर ( at least until 2057) करूंगा क्योंकि यह संसार भी तभी तक है जब तक की कम से कम एक पूर्ण वैश्य(विष्णु), एक पूर्ण क्षत्रिय(शिव) और एक पूर्ण ब्राह्मण(ब्रह्मा) जीवित है अन्यथा यह ब्रह्माण्ड ही एक परमब्रह्म/परमशक्ति/परमऊर्जा/ब्रह्म में विलीन हो जाएगा भौतिक रूप से देखने हेतु न कोई होगा न कोई भौतिक वस्तु बचेग| Lord Shiva was Guru of Lord Parashuram thus his follower can not deny the existence of TRINITY/TRIDEV/TRIMURTI/ in his fundamental form Brahma, Vishnu and Mahesh.


अगर आप को मेरे ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" में जातिवाद को बढ़ावा देने की गंध आती है और अगर जाती/धर्म मानना जातिवाद को बढ़ावा देना है तो वह मै वह अपनी उम्र भर ( at least until 2057) करूंगा क्योंकि यह संसार भी तभी तक है जब तक की कम से कम एक पूर्ण वैश्य(विष्णु), एक पूर्ण क्षत्रिय(शिव) और एक पूर्ण ब्राह्मण(ब्रह्मा) जीवित है अन्यथा यह ब्रह्माण्ड ही एक परमब्रह्म/परमशक्ति/परमऊर्जा/ब्रह्म में विलीन हो जाएगा भौतिक रूप से देखने हेतु न कोई होगा न कोई भौतिक वस्तु बचेग| Lord Shiva was Guru of Lord Parashuram thus his follower can not deny the existence of TRINITY/TRIDEV/TRIMURTI/ in his fundamental form Brahma, Vishnu and Mahesh.

Reference:RAM:Vishnu and Jai&Vijai:Ravan&Kumbhakarn:>>> The subsequent incarnations of Lord Vishnu as Lord Rama and Lord Krishna were progressively more and more powerful, and Jay and Vijay took less powerful births as Ravan and Kumbkaran during Lord Rama's incarnation, and Shishupal and Dantavakra during Lord Krishna's incarnation.>>>>>Given in Shrimad Bhagavat 7/1, Jay and Vijay were the gatekeepers to Lord Vishnu's abode. Once, the four Sanakaadiks came to Vaikunthlok and asked Jay and Vijay to let them pass. (Given in Bhagavat 3/12/4, Sanak, Sanand, Sanatan and Sanat-kumar were the first mental creations of Brahma and were highly elevated.) Because they resembled 5-6 year old little boys, the gatekeepers refused to let the Sanakaadiks enter. Thus the four sons cursed Jay and Vijay to fall to earth and take birth in a demon family. The Sanakaadiks then said that Jay and Vijay would only have to take 3 births, but they would be enemies of Lord Vishnu.>>>>Jay and Vijay first took birth as the demon brothers, Hiranyaksh (the younger brother) and Hiranyakashyap. Lord Vishnu incarnated on earth as Varah (the boar incarnation) to destroy Hiranyaksh. Because of this, Hiranyakashyap did not allow anyone in his kingdom to pray to Lord Vishnu. But Hiranyakashyap's own son, Prahlad, became a great devotee after experiencing a potmaker save the lives of some kittens by chanting God's name. Enraged by his impudence, Hiranyakashyap unsuccessfully tried killing his son several times. Finally, Lord Vishnu as Narsinh (half-man, half-lion incarnation) brought about the death of Hiranyakashyap. The death of Holika, Prahlad's aunt is celebrated as Holi. >>>>The subsequent incarnations of Lord Vishnu as Lord Rama and Lord Krishna were progressively more and more powerful, and Jay and Vijay took less powerful births as Ravan and Kumbkaran during Lord Rama's incarnation, and Shishupal and Dantavakra during Lord Krishna's incarnation.>>>>>Shishupal was Lord Krishna's cousin; he was to marry Rukmuni, but Lord Krishna carried her away on his chariot. Given in the Mahabharat (book 2, chapter 42) when Shishupal was born, he had four arms and three eyes, but a divine voice predicted he would become normal when placed in the hands of the person that would kill him. When Shishupal was placed on Lord Krishna's lap, the two arms fell off and the third eye went away. But then Lord Krishna promised Shishupal's mother that he would forgive Shishupal 100 times. After Indraprasth was established, Yudhisthir and the Pandavs arranged to have a Rajasuya sacrifice. Given in Bhagavat 10/74, when Sahadeva and all decided that Lord Krishna should have the honor of "first worship," Shishupal became enraged. After insulting Lord Krishna 100 times, Lord Krishna killed Shishupal by releasing his Sudarshan chakra (disc weapon).

Reference:RAM:Vishnu and Jai&Vijai:Ravan&Kumbhakarn:>>> The subsequent incarnations of Lord Vishnu as Lord Rama and Lord Krishna were progressively more and more powerful, and Jay and Vijay took less powerful births as Ravan and Kumbkaran during Lord Rama's incarnation, and Shishupal and Dantavakra during Lord Krishna's incarnation.>>>>>Given in Shrimad Bhagavat 7/1, Jay and Vijay were the gatekeepers to Lord Vishnu's abode. Once, the four Sanakaadiks came to Vaikunthlok and asked Jay and Vijay to let them pass. (Given in Bhagavat 3/12/4, Sanak, Sanand, Sanatan and Sanat-kumar were the first mental creations of Brahma and were highly elevated.) Because they resembled 5-6 year old little boys, the gatekeepers refused to let the Sanakaadiks enter. Thus the four sons cursed Jay and Vijay to fall to earth and take birth in a demon family. The Sanakaadiks then said that Jay and Vijay would only have to take 3 births, but they would be enemies of Lord Vishnu.>>>>Jay and Vijay first took birth as the demon brothers, Hiranyaksh (the younger brother) and Hiranyakashyap. Lord Vishnu incarnated on earth as Varah (the boar incarnation) to destroy Hiranyaksh. Because of this, Hiranyakashyap did not allow anyone in his kingdom to pray to Lord Vishnu. But Hiranyakashyap's own son, Prahlad, became a great devotee after experiencing a potmaker save the lives of some kittens by chanting God's name. Enraged by his impudence, Hiranyakashyap unsuccessfully tried killing his son several times. Finally, Lord Vishnu as Narsinh (half-man, half-lion incarnation) brought about the death of Hiranyakashyap. The death of Holika, Prahlad's aunt is celebrated as Holi. >>>>The subsequent incarnations of Lord Vishnu as Lord Rama and Lord Krishna were progressively more and more powerful, and Jay and Vijay took less powerful births as Ravan and Kumbkaran during Lord Rama's incarnation, and Shishupal and Dantavakra during Lord Krishna's incarnation.>>>>>Shishupal was Lord Krishna's cousin; he was to marry Rukmuni, but Lord Krishna carried her away on his chariot. Given in the Mahabharat (book 2, chapter 42) when Shishupal was born, he had four arms and three eyes, but a divine voice predicted he would become normal when placed in the hands of the person that would kill him. When Shishupal was placed on Lord Krishna's lap, the two arms fell off and the third eye went away. But then Lord Krishna promised Shishupal's mother that he would forgive Shishupal 100 times. After Indraprasth was established, Yudhisthir and the Pandavs arranged to have a Rajasuya sacrifice. Given in Bhagavat 10/74, when Sahadeva and all decided that Lord Krishna should have the honor of "first worship," Shishupal became enraged. After insulting Lord Krishna 100 times, Lord Krishna killed Shishupal by releasing his Sudarshan chakra (disc weapon).

Agar sankhya bal ki thekedari-rajniti hoti hai to isliye global yug me Vigyan bhi isase achhoot nahi kyoki unaka bhi astitva rahega tab n science ve karenge. Atah gutbaji main dekha rahaa vaise jaroori hai bhi kyoki 1 din me 2 room to 4 din me 8 room banenge research me nahi hai aur saphalta ke liye jeete hi kai bar mar chuka hota hai.

Agar sankhya bal ki thekedari-rajniti hoti hai to isliye global yug me Vigyan bhi isase achhoot nahi kyoki unaka bhi astitva rahega tab n science ve karenge. Atah gutbaji main dekha rahaa vaise jaroori hai bhi kyoki 1 din me 2 room to 4 din me 8 room banenge research me nahi hai aur saphalta ke liye jeete hi kai bar mar chuka hota hai.

Saturday, July 12, 2014

Request to change name Ashok-Leyland to Ashok-Connection or Ashok-Series or some thing other: हम हिन्दी भासी वृहत्तर लोगों को हकीकत से इस लिए मुझ नहीं मोड़ना चाहिए की कोई हमें संकुचित मानसिकता वाला कह देगा पर यह सत्य है की मई इस कड़वे घूँट का शाक्षी हूँ जिसके कारन एक शिक्षक होते हुए यह पहल कर रहा हूँ और अगर कोई नाम हमें गलत लग ही रही है तो उसे अच्छा नाम दे ही दिया जाय तो क्या यह सत्य नहीं। मित्रों यदि आप को हिन्द/भारतवर्ष से प्रेम है तो यह निश्चित है की अशोक नाम से आप को प्रेम होगा ही होगा और अगर ऐसा है तो यह भी निश्चित है की अशोक के नाम से जुड़े किशी शब्द की वजह से एक भी डिग्री अपभ्रंस होने से गाँव से लेकर शहर तक के एक नर्सरी के बच्चे से लेकर वयोवृद्ध और विद्वान तक मजाक में भी एक ऐसा उच्चारण करें की जिससे की अशोक या उनके प्रेमियों को गाली दी जा रही हो मालुम पड़े तो आप क्या मेरा साथ देंगे भारत सरकार से ऐसे नाम के परवर्तन करवाने के लिए निवेदन करने में जिससे हम इस नाम में पूर्ण गर्व महसूस कर सकें गाली के स्थान पर। अगर ऐसा है तो इस पोस्ट को आप अपनी अधिकतम संभव संख्या में अग्रसारित करें: India Government "Please change the name of Company Ashok-Leyland to its similar meaning name such as Ashok-Series or Ashok-Connection because from the Nursery Level to Highly Educated personal also takes it a joke and this becomes abuse to Ashok and thus abuse of myself".

Request to change name Ashok-Leyland to Ashok-Connection or Ashok-Series or some thing other: हम हिन्दी भासी वृहत्तर लोगों को हकीकत से इस लिए मुझ नहीं मोड़ना चाहिए की कोई हमें संकुचित मानसिकता वाला कह देगा पर यह सत्य है की मई इस कड़वे घूँट का शाक्षी हूँ जिसके कारन एक शिक्षक होते हुए यह पहल कर रहा हूँ और अगर कोई नाम हमें गलत लग ही रही है तो उसे अच्छा नाम दे ही दिया जाय तो क्या यह सत्य नहीं। मित्रों यदि आप को हिन्द/भारतवर्ष से प्रेम है तो यह निश्चित है की अशोक नाम से आप को प्रेम होगा ही होगा और अगर ऐसा है तो यह भी निश्चित है की अशोक के नाम से जुड़े किशी शब्द की वजह से एक भी डिग्री अपभ्रंस होने से गाँव से लेकर शहर तक के एक नर्सरी के बच्चे से लेकर वयोवृद्ध और विद्वान तक मजाक में भी एक ऐसा उच्चारण करें की जिससे की अशोक या उनके प्रेमियों को गाली दी जा रही हो मालुम पड़े तो आप क्या मेरा साथ देंगे भारत सरकार से ऐसे नाम के परवर्तन करवाने के लिए निवेदन करने में जिससे हम इस नाम में पूर्ण गर्व महसूस कर सकें गाली के स्थान पर। अगर ऐसा है तो इस पोस्ट को आप अपनी अधिकतम संभव संख्या में अग्रसारित करें: India Government "Please change the name of Company Ashok-Leyland to its similar meaning name such as Ashok-Series or Ashok-Connection because from the Nursery Level to Highly Educated personal also takes it a joke and this becomes abuse to Ashok and thus abuse of myself".