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Friday, October 31, 2014

देवकाली/आदिशक्ति दुर्गा यदि स्वयं श्रीराम की कुलदेवी हैं और श्रीराम और उनके कुल की रक्षा करती हैं तो उस देवकाली/आदिशक्ति दुर्गा के लिए उसी श्रीराम के अनन्य उपासकों और भक्तों का बलिदान हो गया तो यह बहुत बड़े गर्व की बात है।

देवकाली/आदिशक्ति दुर्गा यदि स्वयं श्रीराम की कुलदेवी हैं और श्रीराम और उनके कुल की रक्षा करती हैं तो उस देवकाली/आदिशक्ति दुर्गा के लिए उसी श्रीराम के अनन्य उपासकों और भक्तों का बलिदान हो गया तो यह बहुत बड़े गर्व की बात है।
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Thursday, October 30, 2014

नेहरू-गांधी-पटेल(इंदिरा) अमर रहें और विश्वास जोशी-अटल-आडवाणी(आद्यवाणी) जिंदाबाद। --हुआ यही की पूरी दुनिया हिन्दुमय हो गयी बिना किशी का धर्म परिवर्तन कराये स्वयं अपने धर्म की सीमा में ही रहकर और मै भी साबित रहा(पत्नी श्रीमती वन्दना पाण्डेय के दो पुत्रों विष्णुकांत और कृष्ण कान्त साथ) अपने स्वयं के जन्मदाता पिता की श्रद्धेय प्रदीप(सूर्यकांत:रामजानकी: लक्ष्मीनारायण:सत्यनारायण) कुमार पाण्डेय की शक्ति के पुंज के रूप। --------------बलिदान रामपुर-223225(आज़मगढ़:आर्यमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण परमपिता श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेम चंद पाण्डेय (शिव) और बिशुनपुर-223103(जौनपुर:जमदग्निपुर) के मेरे मामा परमगुरु परमपिता परमेश्वर सनातन गौतम गोत्रीय वयासी मिश्रा श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्रा(विष्णु), प्रिंसिपल नेशनल इण्टर कालेज पट्टिनरेन्द्रपुर जौनपुर ने अपने भतीजे और और भांजे का बलिदान किया था और तीसरा मेरा बलिदान करने में स्वयं प्रयागराज विश्व विद्यालय के परमपिता ब्रह्मा लोग थे जिसमे मेरे सगोत्रीय(सनातन कश्यप गोत्रीय पाण्डेय) बड़े भाई और गुरु तथा आङ्गिरास/भारद्वाज सिरोमनि और परमपिता ब्रह्मा तथा महाभारतकालीन श्रीकृष्ण अवतार जोशी जी और श्रीवास्तव जी जिन्होंने मेरे मामा और मेरे ताउजी को मेरा बलिदान करने को प्रेरित किया अप्रत्यक्ष रूप से स्थिति की गंभीरता को न जानते हुए पर मै तो सब जान गया था अपने नामित विवेक की शक्ति से और मेरे बार-२ ऐसा कहने की बावजूद जब लोग इन दोनों महान व्यक्तित्व से मेरा बलिदान दिलवा ही दिए तो आप समझ सकते की मै स्वयं त्याग किया क्योंकि मै तो सब जानता क्या होने वाला है और यह त्याग बलिदान से भी ऊपर होता है क्योंकि बलिदान करने वाले को तो लोग जान जाते हैं पर उस समय प्रयागराज में मुझे कोई जनता भी नहीं था की मेरा स्मरण भी कर सके ?-----------हुआ यही की पूरी दुनिया हिन्दुमय हो गयी बिना किशी का धर्म परिवर्तन कराये स्वयं अपने धर्म की सीमा में ही रहकर और मै भी साबित रहा(पत्नी श्रीमती वन्दना पाण्डेय के दो पुत्रों विष्णुकांत और कृष्ण कान्त साथ) अपने स्वयं के जन्मदाता पिता की श्रद्धेय प्रदीप(सूर्यकांत:रामजानकी:लक्ष्मीनारायण:सत्यनारायण) कुमार पाण्डेय की शक्ति के पुंज के रूप। मेरा यह कथन इस बात से प्रमाणित होता है की "जिसका मुझे अधिकार नहीं था, उसका भी बलिदान दिया" यह गीत मुझे सैकड़ों बार 2001 से लेकर 2005 तक इस प्रयागराज विश्व विद्यालय स्थित नेहरू विज्ञान केंद्र के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र पर सुनाया गया था दो और गीत के साथ जिसको यहाँ देना प्रासंगिक नहीं है। आदमी अपना बलिदान कर सकता है पुत्र बलिदान कर सकता है पर अपने भतीजे और और भांजे का बलिदान कैसे कर सकता है और अगर उन्होंने ने किया और मै स्वीकार किया तो मै उन दोनों का भी पुत्र हुआ की नहीं। ---------मेरे पास विकल्प था इसका पर उससे इतना बड़ा परिवर्तन न होता केवल मेरी कुछ मुस्किल ही आसान होती और मई कुछ ज्यादा चर्चित होता इससे ज्यादा कुछ नहीं और इसी लिए मै इस सब के रचनाकार मेरे ताऊ जी और मामा जे के गुरु श्रेष्ठ जोशी जी को सादर नमन करता हूँ जो मेरे ननिहाल और गाँव दोनों जगह के गुरुश्रेष्ठ आज भी हैं। *******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण। पुनरावृत्ति: ----------------- संदेश:--------- वह महत्त्व और विश्वास जो मेरे दोनों गाँव बिशुनपुर-223103 (जौनपुर :जमदग्निपुर ) और रामपुर-223225 (आजमगढ़:आरयमगढ़)को नेहरू-गांधी-पटेल(इंदिरा) में था वही महत्त्व और विश्वास जोशी-अटल-आडवाणी(आद्यवाणी) पर था जो सही साबित हुआ। विचारकों में विवेकानंद, टैगोर और नेहरू-गांधी के साथ-साथ सुभाष का समान महत्त्व था। पर इनके आदर्श केवल राम-कृष्ण-हनुमान:अम्बवादेकर:अम्बेडकर ही थे और आज भी हैं और जिनकी आस्था त्रिदेव(परमब्रह्म=ब्रह्मा-विष्णु-महेश) और आदि देवी महादुर्गा(महा लक्ष्मी+महा सरस्वती+महा गौरी:पारवती) में ही थी और आज भी है।--------मै इस सामाजिक विषय के साथ आशान्वित हूँ की भारतीय जनमानस ऐसे ही नेतृत्व को जन्म दे जिनका की त्रिदेव(परमब्रह्म=ब्रह्मा-विष्णु-महेश) भी प्रशंसा करें तो विश्व समाज उनका अपने आप प्रसंसा करेगा । ----------मै रामपुर-223225 (आजमगढ़:आरयमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण देवव्रत-रामप्रसाद-बचनराम-प्रदीप का वंसज तो अपने ननिहाल बिशुनपुर-223103 के सनातन गौतम गोत्रीय वयासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के रामानंद((+देवव्रत(वंसज शंकर+अमरनाथ-+परमात्मा)+महेश(जिनके वंसज केदारनाथ))-श्रीनिवास-रामानुज-उत्तमा-रामप्रशाद-रमानाथ(+पारसनाथ)-श्रीकांत(+श्रीधर+श्रीप्रकाश) के उस द्वार पर जीवन के अधिकांश अंश जीने का अवसर पाकर धन्य हुआ जिस दरवाजे से गुजरने पर सिंह की भी दहाड़ मधुर हो जाती थी। उस समय यह थी मेरे नाना श्रद्धेय श्री रमानाथ मिश्र के सभ्यता और संस्कृति का असर जिनके सामने ब्रह्मा को ज्ञान, शिव को शक्ति और विष्णु को धन का गर्व/घमंड/मद न रह जाय और एक विनम्र और सुसंस्कृत व्यवहार से सज्जनता से पेश आएं।



नेहरू-गांधी-पटेल(इंदिरा) अमर रहें और विश्वास जोशी-अटल-आडवाणी(आद्यवाणी) जिंदाबाद। --हुआ यही की पूरी दुनिया हिन्दुमय हो गयी बिना किशी का धर्म परिवर्तन कराये स्वयं अपने धर्म की सीमा में ही रहकर और मै भी साबित रहा(पत्नी श्रीमती वन्दना पाण्डेय के दो पुत्रों विष्णुकांत और कृष्ण कान्त साथ) अपने स्वयं के जन्मदाता पिता की श्रद्धेय प्रदीप(सूर्यकांत:रामजानकी: लक्ष्मीनारायण:सत्यनारायण) कुमार पाण्डेय की शक्ति के पुंज के रूप। --------------बलिदान रामपुर-223225(आज़मगढ़:आर्यमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण परमपिता श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेम चंद पाण्डेय (शिव) और बिशुनपुर-223103(जौनपुर:जमदग्निपुर) के मेरे मामा परमगुरु परमपिता परमेश्वर सनातन गौतम गोत्रीय वयासी मिश्रा श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्रा(विष्णु), प्रिंसिपल नेशनल इण्टर कालेज पट्टिनरेन्द्रपुर जौनपुर ने अपने भतीजे और और भांजे का बलिदान किया था और तीसरा मेरा बलिदान करने में स्वयं प्रयागराज विश्व विद्यालय के परमपिता ब्रह्मा लोग थे जिसमे मेरे सगोत्रीय(सनातन कश्यप गोत्रीय पाण्डेय) बड़े भाई और गुरु तथा आङ्गिरास/भारद्वाज सिरोमनि और परमपिता ब्रह्मा तथा महाभारतकालीन श्रीकृष्ण अवतार जोशी जी और श्रीवास्तव जी जिन्होंने मेरे मामा और मेरे ताउजी को मेरा बलिदान करने को प्रेरित किया अप्रत्यक्ष रूप से स्थिति की गंभीरता को न जानते हुए पर मै तो सब जान गया था अपने नामित विवेक की शक्ति से और मेरे बार-२ ऐसा कहने की बावजूद जब लोग इन दोनों महान व्यक्तित्व से मेरा बलिदान दिलवा ही दिए तो आप समझ सकते की मै स्वयं त्याग किया क्योंकि मै तो सब जानता क्या होने वाला है और यह त्याग बलिदान से भी ऊपर होता है क्योंकि बलिदान करने वाले को तो लोग जान जाते हैं पर उस समय प्रयागराज में मुझे कोई जनता भी नहीं था की मेरा स्मरण भी कर सके ?-----------हुआ यही की पूरी दुनिया हिन्दुमय हो गयी बिना किशी का धर्म परिवर्तन कराये स्वयं अपने धर्म की सीमा में ही रहकर और मै भी साबित रहा(पत्नी श्रीमती वन्दना पाण्डेय के दो पुत्रों विष्णुकांत और कृष्ण कान्त साथ) अपने स्वयं के जन्मदाता पिता की श्रद्धेय प्रदीप(सूर्यकांत:रामजानकी:लक्ष्मीनारायण:सत्यनारायण) कुमार पाण्डेय की शक्ति के पुंज के रूप। मेरा यह कथन इस बात से प्रमाणित होता है की "जिसका मुझे अधिकार नहीं था, उसका भी बलिदान दिया" यह गीत मुझे सैकड़ों बार 2001 से लेकर 2005 तक इस प्रयागराज विश्व विद्यालय स्थित नेहरू विज्ञान केंद्र के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र पर सुनाया गया था दो और गीत के साथ जिसको यहाँ देना प्रासंगिक नहीं है। आदमी अपना बलिदान कर सकता है पुत्र बलिदान कर सकता है पर अपने भतीजे और और भांजे का बलिदान कैसे कर सकता है और अगर उन्होंने ने किया और मै स्वीकार किया तो मै उन दोनों का भी पुत्र हुआ की नहीं। ---------मेरे पास विकल्प था इसका पर उससे इतना बड़ा परिवर्तन न होता केवल मेरी कुछ मुस्किल ही आसान होती और मई कुछ ज्यादा चर्चित होता इससे ज्यादा कुछ नहीं और इसी लिए मै इस सब के रचनाकार मेरे ताऊ जी और मामा जे के गुरु श्रेष्ठ जोशी जी को सादर नमन करता हूँ जो मेरे ननिहाल और गाँव दोनों जगह के गुरुश्रेष्ठ आज भी हैं। *******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।
पुनरावृत्ति: -----------------
संदेश:--------- वह महत्त्व और विश्वास जो मेरे दोनों गाँव बिशुनपुर-223103 (जौनपुर :जमदग्निपुर ) और रामपुर-223225 (आजमगढ़:आरयमगढ़)को नेहरू-गांधी-पटेल(इंदिरा) में था वही महत्त्व और विश्वास जोशी-अटल-आडवाणी(आद्यवाणी) पर था जो सही साबित हुआ। विचारकों में विवेकानंद, टैगोर और नेहरू-गांधी के साथ-साथ सुभाष का समान महत्त्व था। पर इनके आदर्श केवल राम-कृष्ण-हनुमान:अम्बवादेकर:अम्बेडकर ही थे और आज भी हैं और जिनकी आस्था त्रिदेव(परमब्रह्म=ब्रह्मा-विष्णु-महेश) और आदि देवी महादुर्गा(महा लक्ष्मी+महा सरस्वती+महा गौरी:पारवती) में ही थी और आज भी है।--------मै इस सामाजिक विषय के साथ आशान्वित हूँ की भारतीय जनमानस ऐसे ही नेतृत्व को जन्म दे जिनका की त्रिदेव(परमब्रह्म=ब्रह्मा-विष्णु-महेश) भी प्रशंसा करें तो विश्व समाज उनका अपने आप प्रसंसा करेगा । ----------मै रामपुर-223225 (आजमगढ़:आरयमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण देवव्रत-रामप्रसाद-बचनराम-प्रदीप का वंसज तो अपने ननिहाल बिशुनपुर-223103 के सनातन गौतम गोत्रीय वयासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के रामानंद((+देवव्रत(वंसज शंकर+अमरनाथ-+परमात्मा)+महेश(जिनके वंसज केदारनाथ))-श्रीनिवास-रामानुज-उत्तमा-रामप्रशाद-रमानाथ(+पारसनाथ)-श्रीकांत(+श्रीधर+श्रीप्रकाश) के उस द्वार पर जीवन के अधिकांश अंश जीने का अवसर पाकर धन्य हुआ जिस दरवाजे से गुजरने पर सिंह की भी दहाड़ मधुर हो जाती थी। उस समय यह थी मेरे नाना श्रद्धेय श्री रमानाथ मिश्र के सभ्यता और संस्कृति का असर जिनके सामने ब्रह्मा को ज्ञान, शिव को शक्ति और विष्णु को धन का गर्व/घमंड/मद न रह जाय और एक विनम्र और सुसंस्कृत व्यवहार से सज्जनता से पेश आएं।

फैज़ाबाद-अम्बेडकर नगर-सुल्तानपुर-प्रतापगढ़ पुरातम अवध(कोसल) राज्य के प्रमुख जनपद (क्षेत्र) है जिनमे प्रतापगढ़ पर स्थानीय तौर पर प्रयागराज से जुड़ा होने की वजह से इस पर प्रयागराज की संस्कृति का विशेष प्रभाव है। आजमगढ़(आर्यमगढ़) और जौनपुर(जमदग्निपुर) दो ऐसे जनपद हैं जो काशी और अवध(कोसल) के लिए बफर जनपद सदा से रहे हैं जिसमे आजमगढ़ पर गोरखपुर(तराई) और काशी की संस्कृति का असर है इससे जुड़ा होने से और जौनपुर पर प्रयागराज और काशी की संस्कृति का असर है प्रयागराज से जुड़ा होने के कारन। भारतीय संस्कृति के मुख्य श्रोत प्रयाग(काशी)-अयोध्या(मथुरा-वृन्दावन) संस्कृति के वर्तमान में तीन प्रमुख स्थानीय सांस्कृतिक अंग हैं प्रयाग, काशी, और गोरखपुर(तराई संस्कृति जहां की प्राकृतिक-भौगोलिक स्थिति एक ब्राह्मण परिवार के भी खान-पान में परिवर्तन ला देती है पर विचार पर खान-पान यह भारी नहीं पड़ता है)।-----यहां यह बता देना अति आवश्यक है की जहां अवध(कोस्सल) पर शूर्यवंश/इक्शाकुवंस/रघुवंश/कश्यप गोत्रियों का शासन था वही आजमगढ़ जैसे कशी और अवध(कोसल) का बफर क्षेत्र है पर शक्तिशाली गौतम क्षत्रियों का शासन था जिसे(विक्रमादित्य/विक्रमजीत को) चंगेजखां तक नहीं हिला सका था और इसे छोड़ते हुए बिहार और बंगाल की तरफ आगे बढ़ गया था। लेकिन एक भारतीय ही सही एक इस्लाम के अनुयायी परिवार से हुए एक विवाह सम्बन्ध में आज़म और अज़मत एक तोहफे में मिले थे तो मित्र विवाह से यही होता है की हम बदल जाते हैं और अगर नहीं बदलते हैं तो फिर सब एक हो जाओ मेरी भी यही एक पुकार है?---------आप सर्त हार चुके है और आप के जीवन की अंतिम लौ है जो तेजी से जल और बुझ रही है पर हिंदी पंचांग के अनुसार आज मेरे जीवन के 39 वर्ष पूरे होने का अंतिम दिन है तो यह है की चरित्रवान ही सबसे बलवान होता है जिसके प्रमाण हनुमान:अम्बावडेकर:अम्बेडकर ही नहीं श्रीराम और श्रीकृष्ण भी थे और यह दुनिया की निगाह है की वह श्रीकृष्ण को चरित्रहीन समझ लेती है और यह वही दुनिया है जो सीता को भी सही नहीं मानी और भगवान श्रीराम को भी मूर्ख बना दी।

फैज़ाबाद-अम्बेडकर नगर-सुल्तानपुर-प्रतापगढ़ पुरातम अवध(कोसल) राज्य के प्रमुख जनपद (क्षेत्र) है जिनमे प्रतापगढ़ पर स्थानीय तौर पर प्रयागराज से जुड़ा होने की वजह से इस पर प्रयागराज की संस्कृति का विशेष प्रभाव है। आजमगढ़(आर्यमगढ़) और जौनपुर(जमदग्निपुर) दो ऐसे जनपद हैं जो काशी और अवध(कोसल) के लिए बफर जनपद सदा से रहे हैं जिसमे आजमगढ़ पर गोरखपुर(तराई) और काशी की संस्कृति का असर है इससे जुड़ा होने से और जौनपुर पर प्रयागराज और काशी की संस्कृति का असर है प्रयागराज से जुड़ा होने के कारन। भारतीय संस्कृति के मुख्य श्रोत प्रयाग(काशी)-अयोध्या(मथुरा-वृन्दावन) संस्कृति के वर्तमान में तीन प्रमुख स्थानीय सांस्कृतिक अंग हैं प्रयाग, काशी, और गोरखपुर(तराई संस्कृति जहां की प्राकृतिक-भौगोलिक स्थिति एक ब्राह्मण परिवार के भी खान-पान में परिवर्तन ला देती है पर विचार पर खान-पान यह भारी नहीं पड़ता है)।-----यहां यह बता देना अति आवश्यक है की जहां अवध(कोस्सल) पर शूर्यवंश/इक्शाकुवंस/रघुवंश/कश्यप गोत्रियों का शासन था वही आजमगढ़ जैसे कशी और अवध(कोसल) का बफर क्षेत्र है पर शक्तिशाली गौतम क्षत्रियों का शासन था जिसे(विक्रमादित्य/विक्रमजीत को) चंगेजखां तक नहीं हिला सका था और इसे छोड़ते हुए बिहार और बंगाल की तरफ आगे बढ़ गया था। लेकिन एक भारतीय ही सही एक इस्लाम के अनुयायी परिवार से हुए एक विवाह सम्बन्ध में आज़म और अज़मत एक तोहफे में मिले थे तो मित्र विवाह से यही होता है की हम बदल जाते हैं और अगर नहीं बदलते हैं तो फिर सब एक हो जाओ मेरी भी यही एक पुकार है?---------आप सर्त हार चुके है और आप के जीवन की अंतिम लौ है जो तेजी से जल और बुझ रही है पर हिंदी पंचांग के अनुसार आज मेरे जीवन के 39 वर्ष पूरे होने का अंतिम दिन है तो यह है की चरित्रवान ही सबसे बलवान होता है जिसके प्रमाण हनुमान:अम्बावडेकर:अम्बेडकर ही नहीं श्रीराम और श्रीकृष्ण भी थे और यह दुनिया की निगाह है की वह श्रीकृष्ण को चरित्रहीन समझ लेती है और यह वही दुनिया है जो सीता को भी सही नहीं मानी और भगवान श्रीराम को भी मूर्ख बना दी।

आप सर्त हार चुके है और आप के जीवन की अंतिम लौ है जो तेजी से जल और बुझ रही है पर हिंदी पंचांग के अनुसार आज मेरे जीवन के 39 वर्ष पूरे होने का अंतिम दिन है तो यह है की चरित्रवान ही सबसे बलवान होता है जिसके प्रमाण हनुमान:अम्बावडेकर:अम्बेडकर ही नहीं श्रीराम और श्रीकृष्ण भी थे और यह दुनिया की निगाह है की वह श्रीकृष्ण को चरित्रहीन समझ लेती है और यह वही दुनिया है जो सीता को भी सही नहीं मानी और भगवान श्रीराम को भी मूर्ख बना दी। ---------स्वेक्षाचीरियों और व्यभिचारियों को सजा देने के बदले मुझे सजा दिए थे आप 2000। क्या आप इतने योग्य हो गए थे? उत्तर है नहीं? फिर कुछ मेरे बहुत सिमित सामाजिक ज्ञान को देखिये जिसमे कुछ क्रिमिनल कार्य लग रहा है की नहीं जिसमे एक भी पताका भी नहीं फूटा बम की बात ही दूर और न कोई सामने आया था? सब अंदर ही अंदर हो रहा था आप जिस विश्वविद्यालय में थे वह बहुत ही शांत दिखाई देता था और जब मै मानवता के कारन सामने आ गया तो बहुत कुछ हो गया?जिन लोगों ने राजाराम छात्रावास में इन सब कार्यों(व्यभिचारियों और सुरा-सुंदरियों के शौक़ीन तैयार करना उच्चतम शिक्षा केंद्र से जो भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े केंद्र पर है) को बढ़ावा देने हेतु और TV6 जैसे अश्लील चैनेल को पहुंचाया और मस्तराम और अन्य काम वासना को प्रेरित करने वाले कथाकारों को कहानियों सभी छात्रावासों में पहुंचाया इसके बदले प्रतिभा पलायन हेतु उनको आप ने दंड क्यों नहीं दिया नहीं दिया जिन लोगों के कार्यों का नतीजा था अप्रैल, 2000 की शर्मनाक घटना। वे भारतीय विदेशी एजेंट जो भारतीय बौद्धिक शक्ति को लगातार बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं क्या उनको आप का धृतराष्ट्र जैसा समर्थन था ? और इस कार्य में तथाकथित सामाजिक न्याय के ठीकेदार राजनेता और स्वयं सेवी संस्थाएं भी जिम्मेदार हैं जिनको विवेक पाण्डेय बहुत धनी लगते हैं पर जब स्वार्थ की बात आती है तो बहुत ही बड़े शूद्र और दरिद्र नजर आते हैं। कैसा पैमाना है आप का जो फेल हो बार-बार? अपने मेरा एक बार भी किशी टाकीज में प्रवेश का प्रमाण दिला दे सिगरा की बात ही दूर है जिसमे अश्लील शो चलता था। जब विमान अपहरण होता है और एक MCA का मुस्लिम छात्र खुले आम उसका समर्थन करता है तो उसको चुप कराने मुझे बुलाया जाता है(मै भी तब शायद उसकी भासा नहीं समझा पर चुप करा दिया था लेकिन अब समझा की यह तो मुस्लिमों का ही नहीं वर्ण पूरे हिन्दुस्तान का ईसाई कारन हो रहा हिन्दू रहते ही जबकि हिन्दू और उसके अनुसांगिक धर्म; तथा मुसिम और ईसाई का संतुलन ठीक होना चाहिए न की एक बेतहासा बढे या घटे। जब मुस्लिम श्रीराम के सामानांतर और ईसाई श्रीकृष्ण के सामानांतर तो कोई श्रीराम और श्रीकृष्ण में से कोई भी समूल नस्ट होगा तो यह दुनिया उसी दिन नस्ट हो जाएगी )। ----चरित्रवान और योग्य समाज के सम्मुख या तो चरित्रहीन की आवाज धीमी होती है या बहुत ही सुलझे हुए व्यक्तित्व की जिसकी यह एक शैली बन जाती है।



आप सर्त हार चुके है और आप के जीवन की अंतिम लौ है जो तेजी से जल और बुझ रही है पर हिंदी पंचांग के अनुसार आज मेरे जीवन के 39 वर्ष पूरे होने का अंतिम दिन है तो यह है की चरित्रवान ही सबसे बलवान होता है जिसके प्रमाण हनुमान:अम्बावडेकर:अम्बेडकर ही नहीं श्रीराम और श्रीकृष्ण भी थे और यह दुनिया की निगाह है की वह श्रीकृष्ण को चरित्रहीन समझ लेती है और यह वही दुनिया है जो सीता को भी सही नहीं मानी और भगवान श्रीराम को भी मूर्ख बना दी। ---------स्वेक्षाचीरियों और व्यभिचारियों को सजा देने के बदले मुझे सजा दिए थे आप 2000। क्या आप इतने योग्य हो गए थे? उत्तर है नहीं? फिर कुछ मेरे बहुत सिमित सामाजिक ज्ञान को देखिये जिसमे कुछ क्रिमिनल कार्य लग रहा है की नहीं जिसमे एक भी पताका भी नहीं फूटा बम की बात ही दूर और न कोई सामने आया था? सब अंदर ही अंदर हो रहा था आप जिस विश्वविद्यालय में थे वह बहुत ही शांत दिखाई देता था और जब मै मानवता के कारन सामने आ गया तो बहुत कुछ हो गया?जिन लोगों ने राजाराम छात्रावास में इन सब कार्यों(व्यभिचारियों और सुरा-सुंदरियों के शौक़ीन तैयार करना उच्चतम शिक्षा केंद्र से जो भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े केंद्र पर है) को बढ़ावा देने हेतु और TV6 जैसे अश्लील चैनेल को पहुंचाया और मस्तराम और अन्य काम वासना को प्रेरित करने वाले कथाकारों को कहानियों सभी छात्रावासों में पहुंचाया इसके बदले प्रतिभा पलायन हेतु उनको आप ने दंड क्यों नहीं दिया नहीं दिया जिन लोगों के कार्यों का नतीजा था अप्रैल, 2000 की शर्मनाक घटना। वे भारतीय विदेशी एजेंट जो भारतीय बौद्धिक शक्ति को लगातार बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं क्या उनको आप का धृतराष्ट्र जैसा समर्थन था ? और इस कार्य में तथाकथित सामाजिक न्याय के ठीकेदार राजनेता और स्वयं सेवी संस्थाएं भी जिम्मेदार हैं जिनको विवेक पाण्डेय बहुत धनी लगते हैं पर जब स्वार्थ की बात आती है तो बहुत ही बड़े शूद्र और दरिद्र नजर आते हैं। कैसा पैमाना है आप का जो फेल हो बार-बार? अपने मेरा एक बार भी किशी टाकीज में प्रवेश का प्रमाण दिला दे सिगरा की बात ही दूर है जिसमे अश्लील शो चलता था। जब विमान अपहरण होता है और एक MCA का मुस्लिम छात्र खुले आम उसका समर्थन करता है तो उसको चुप कराने मुझे बुलाया जाता है(मै भी तब शायद उसकी भासा नहीं समझा पर चुप करा दिया था लेकिन अब समझा की यह तो मुस्लिमों का ही नहीं वर्ण पूरे हिन्दुस्तान का ईसाई कारन हो रहा हिन्दू रहते ही जबकि हिन्दू और उसके अनुसांगिक धर्म; तथा मुसिम और ईसाई का संतुलन ठीक होना चाहिए न की एक बेतहासा बढे या घटे। जब मुस्लिम श्रीराम के सामानांतर और ईसाई श्रीकृष्ण के सामानांतर तो कोई श्रीराम और श्रीकृष्ण में से कोई भी समूल नस्ट होगा तो यह दुनिया उसी दिन नस्ट हो जाएगी )। ----चरित्रवान और योग्य समाज के सम्मुख या तो चरित्रहीन की आवाज धीमी होती है या बहुत ही सुलझे हुए व्यक्तित्व की जिसकी यह एक शैली बन जाती है।

Tuesday, October 28, 2014

संदेश:--------- वह महत्त्व और विश्वास जो मेरे दोनों गाँव बिशुनपुर-223103 (जौनपुर :जमदग्निपुर ) और रामपुर-223225 (आजमगढ़:आरयमगढ़)को नेहरू-गांधी-पटेल(इंदिरा) में था वही महत्त्व और विश्वास जोशी-अटल-आडवाणी(आद्यवाणी) पर था जो सही साबित हुआ। विचारकों में विवेकानंद, टैगोर और नेहरू-गांधी के साथ-साथ सुभाष का समान महत्त्व था। पर इनके आदर्श केवल राम-कृष्ण-हनुमान:अम्बवादेकर:अम्बेडकर ही थे और आज भी हैं और जिनकी आस्था त्रिदेव(परमब्रह्म=ब्रह्मा-विष्णु-महेश) और आदि देवी महादुर्गा(महा लक्ष्मी+महा सरस्वती+महा गौरी:पारवती) में ही थी और आज भी है।--------मै इस सामाजिक विषय के साथ आशान्वित हूँ की भारतीय जनमानस ऐसे ही नेतृत्व को जन्म दे जिनका की त्रिदेव(परमब्रह्म=ब्रह्मा-विष्णु-महेश) भी प्रशंसा करें तो विश्व समाज उनका अपने आप प्रसंसा करेगा । ----------मै रामपुर-223225 (आजमगढ़:आरयमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण देवव्रत-रामप्रसाद-बचनराम-प्रदीप का वंसज तो अपने ननिहाल बिशुनपुर-223103 के सनातन गौतम गोत्रीय वयासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के रामानंद((+देवव्रत(वंसज शंकर+अमरनाथ+परमात्मा)+महेश(जिनके वंसज केदारनाथ))-श्रीनिवास-रामानुज-उत्तमा-रामप्रशाद-रमानाथ(+पारसनाथ)-श्रीकांत(+श्रीधर+श्रीप्रकाश) के उस द्वार पर जीवन के अधिकांश अंश जीने का अवसर पाकर धन्य हुआ जिस दरवाजे से गुजरने पर सिंह की भी दहाड़ मधुर हो जाती थी। उस समय यह थी मेरे नाना श्रद्धेय श्री रमानाथ मिश्र के सभ्यता और संस्कृति का असर जिनके सामने ब्रह्मा को ज्ञान, शिव को शक्ति और विष्णु को धन का गर्व/घमंड/मद न रह जाय और एक विनम्र और सुसंस्कृत व्यवहार से सज्जनता से पेश आएं।

संदेश:--------- वह महत्त्व और विश्वास जो मेरे दोनों गाँव बिशुनपुर-223103 (जौनपुर :जमदग्निपुर ) और रामपुर-223225 (आजमगढ़:आरयमगढ़)को नेहरू-गांधी-पटेल(इंदिरा) में था वही महत्त्व और विश्वास जोशी-अटल-आडवाणी(आद्यवाणी) पर था जो सही साबित हुआ। विचारकों में विवेकानंद, टैगोर और नेहरू-गांधी के साथ-साथ सुभाष का समान महत्त्व था। पर इनके आदर्श केवल राम-कृष्ण-हनुमान:अम्बवादेकर:अम्बेडकर  ही थे और आज भी हैं और जिनकी आस्था त्रिदेव(परमब्रह्म=ब्रह्मा-विष्णु-महेश) और आदि देवी महादुर्गा(महा लक्ष्मी+महा सरस्वती+महा गौरी:पारवती) में ही थी और आज भी है।--------मै इस सामाजिक विषय के साथ आशान्वित हूँ की भारतीय जनमानस ऐसे ही नेतृत्व को जन्म दे जिनका की त्रिदेव(परमब्रह्म=ब्रह्मा-विष्णु-महेश) भी प्रशंसा करें तो विश्व समाज उनका अपने आप प्रसंसा करेगा । ----------मै रामपुर-223225 (आजमगढ़:आरयमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण देवव्रत-रामप्रसाद-बचनराम-प्रदीप का वंसज तो अपने ननिहाल बिशुनपुर-223103 के सनातन गौतम गोत्रीय वयासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के रामानंद((+देवव्रत(वंसज शंकर+अमरनाथ+परमात्मा)+महेश(जिनके वंसज केदारनाथ))-श्रीनिवास-रामानुज-उत्तमा-रामप्रशाद-रमानाथ(+पारसनाथ)-श्रीकांत(+श्रीधर+श्रीप्रकाश) के उस द्वार पर जीवन के अधिकांश अंश जीने का अवसर पाकर धन्य हुआ जिस दरवाजे से गुजरने पर सिंह की भी दहाड़ मधुर हो जाती थी। उस समय यह थी मेरे नाना श्रद्धेय श्री रमानाथ मिश्र के सभ्यता और संस्कृति का असर जिनके सामने ब्रह्मा को ज्ञान, शिव को शक्ति और विष्णु को धन का गर्व/घमंड/मद न रह जाय और एक विनम्र और सुसंस्कृत व्यवहार से सज्जनता से पेश आएं।
https://archive.today/4HDpi
http://en.wikipedia.org/wiki/Prem_Chand_Pandey
http://en.wikipedia.org/wiki/User:Vivek_Kumar_Pandey
https://profiles.google.com/vkpandey75/about?hl=en
http://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur
http://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur

Monday, October 27, 2014

Swami Vivekanand was died in the age of 39 and I am also originally and most probably at the age of 39(11-11-2014) and he has also connection with the IISc Bangalore and I join there at the age of 100 of the IISc Bangalore.

Swami Vivekanand was died in the age of 39 and I am also originally and most probably at the age of 39(11-11-2014) and he has also connection with the IISc Bangalore and I join there at the age of 100 of the IISc Bangalore.

आज के 7 वर्ष पूर्व मुझे भारतीय विज्ञान संस्थान में कुलसचिव के रोजगार पत्रांकानुसार वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र में परियोजना पराशोधक-अनुसंधानसहयोगी के रूप में कार्य करने हेतु सेवा का अवसर मिला(27-10-2007 से जबकि यह 25-10-2007 से ही अनुदेशित था पर व्यवहारिक त्रुटि बताकर 25 को ही नहीं मिला था अवसर) था और यह 27-10-2009 तक मतलब पूर्ण रूप से 2 वर्ष वहा रहा जो एक न्यूनतम शोध अवधि होती है। उसके बाद आज से 5 वर्ष पूर्व 29-10-2009 को प्रयागराज विश्वविद्यालय के कुलसचिव के पत्रांकानुसार यहाँ एक शिक्षक के रूप में सेवा करने का अवसर मिला और आज (28-10-2014) उसी सेवाअवधि के सुचारू रूप से कार्य के 5 वर्ष पूरे हो रहे हैं इसके लिए वाह्य सहयोग हेतु आप सभी शुभचिंतकों को धन्यवाद। और इन 7 वर्षों में मैंने भारतीय जनमानस सहित विश्व जनमानस जाग्रति का कार्य भी अपने सोसल वेब पेज से किया है ऑरकुट (2005 -2010), ब्लॉग (2007 -आज तक) और फेसबुक (2008-आज तक) पर एक शिक्षित समाज जिसको धर्म और दर्शन को जानने और समझने के लिए प्रारंभिक आधार एक जगह नहीं मिलता है उसके लिए मेरा ब्लॉग " Vivekanand and Modern Tradition" एक बहुत बड़ी संजीविनी है जिसे वैसे मई लिखता और मिटता रहता हूँ पर अगस्त, 2013 से अब तक का अब नहीं मिटाऊंगा विश्व जनमानस और मानवहित को देखते हुए। और आज से मै विशेष रूप से इस विकिरित ऊर्जा को पुनः अपने व्यवहार और कार्य में संचित करूंगा जो विश्वजनमानस हित में स्वयं को गलाकर उत्सर्जित की गयी है।

आज के 7 वर्ष पूर्व मुझे भारतीय विज्ञान संस्थान में कुलसचिव के रोजगार पत्रांकानुसार वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र में परियोजना पराशोधक-अनुसंधानसहयोगी के रूप में कार्य करने हेतु सेवा का अवसर मिला(27-10-2007 से जबकि यह 25-10-2007 से ही अनुदेशित था पर व्यवहारिक त्रुटि बताकर 25 को ही नहीं मिला था अवसर) था और यह 27-10-2009 तक मतलब पूर्ण रूप से 2 वर्ष वहा रहा जो एक न्यूनतम शोध अवधि होती है। उसके बाद आज से 5 वर्ष पूर्व 29-10-2009 को प्रयागराज विश्वविद्यालय के कुलसचिव के पत्रांकानुसार यहाँ एक शिक्षक के रूप में सेवा करने का अवसर मिला और आज (28-10-2014) उसी सेवाअवधि के सुचारू रूप से कार्य के 5 वर्ष पूरे हो रहे हैं इसके लिए वाह्य सहयोग हेतु आप सभी शुभचिंतकों को धन्यवाद। और इन 7 वर्षों में मैंने भारतीय जनमानस सहित विश्व जनमानस जाग्रति का कार्य भी अपने सोसल वेब पेज से किया है ऑरकुट (2005 -2010), ब्लॉग (2007 -आज तक) और फेसबुक (2008-आज तक) पर एक शिक्षित समाज जिसको धर्म और दर्शन को जानने और समझने के लिए प्रारंभिक आधार एक जगह नहीं मिलता है उसके लिए मेरा ब्लॉग " Vivekanand and Modern Tradition" एक बहुत बड़ी संजीविनी है जिसे वैसे मई लिखता और मिटता रहता हूँ पर अगस्त, 2013 से अब तक का अब नहीं मिटाऊंगा विश्व जनमानस और मानवहित को देखते हुए। और आज से मै विशेष रूप से इस विकिरित ऊर्जा को पुनः अपने व्यवहार और कार्य में संचित करूंगा जो विश्वजनमानस हित में स्वयं को गलाकर उत्सर्जित की गयी है। Swami Vivekanand was died in the age of 39 and I am also originally and most probably at the age of 39(11-11-2014) and he has also connection with the IISc Bangalore and I join there at the age of 100 of the IISc Bangalore.

आज के 7 वर्ष पूर्व मुझे भारतीय विज्ञान संस्थान में कुलसचिव के रोजगार पत्रांकानुसार वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र में परियोजना पराशोधक-अनुसंधानसहयोगी के रूप में कार्य करने हेतु सेवा का अवसर मिला(27-10-2007 से जबकि यह 25-10-2007 से ही अनुदेशित था पर व्यवहारिक त्रुटि बताकर 25 को ही नहीं मिला था अवसर) था और यह 27-10-2009 तक मतलब पूर्ण रूप से 2 वर्ष वहा रहा जो एक न्यूनतम शोध अवधि होती है। उसके बाद आज से 5 वर्ष पूर्व 29-10-2009 को प्रयागराज विश्वविद्यालय के कुलसचिव के पत्रांकानुसार यहाँ एक शिक्षक के रूप में सेवा करने का अवसर मिला और आज (28-10-2014) उसी सेवाअवधि के सुचारू रूप से कार्य के 5 वर्ष पूरे हो रहे हैं इसके लिए वाह्य सहयोग हेतु आप सभी शुभचिंतकों को धन्यवाद। और इन 7 वर्षों में मैंने भारतीय जनमानस सहित विश्व जनमानस जाग्रति का कार्य भी अपने सोसल वेब पेज से किया है ऑरकुट (2005 -2010), ब्लॉग (2007 -आज तक) और फेसबुक (2008-आज तक) पर एक शिक्षित समाज जिसको धर्म और दर्शन को जानने और समझने के लिए प्रारंभिक आधार एक जगह नहीं मिलता है उसके लिए मेरा ब्लॉग " Vivekanand and Modern Tradition" एक बहुत बड़ी संजीविनी है जिसे वैसे मई लिखता और मिटता रहता हूँ पर अगस्त, 2013 से अब तक का अब नहीं मिटाऊंगा विश्व जनमानस और मानवहित को देखते हुए। और आज से मै विशेष रूप से इस विकिरित ऊर्जा को पुनः अपने व्यवहार और कार्य में संचित करूंगा जो विश्वजनमानस हित में स्वयं को गलाकर उत्सर्जित की गयी है। Swami Vivekanand was died in the age of 39 and I am also originally and most probably at the age of 39(11-11-2014) and he has also connection with the IISc Bangalore and I join there at the age of 100 of the IISc Bangalore.

जिस कार्य को आप किये नहीं उसका श्रेय क्यों ले रहे हैं और आगे भी लेना चाह रहे हैं उसका श्रेय उचित व्यक्तित्व तक जाने दीजिये सभ्यता से जबकि सहभागिता में ही समयपूर्व आप अपनी वर्तमान क्षमता से ज्यादा कुछ पा गए हैं : जो नियति है उसे आप क्यों बदलने का झूंठा दम्भ भर रहे हैं| ब्रह्मा एक तिहाई शक्ति के ही स्वामी हैं अतः बात उनको माननी पड़ेगी विष्णु और शिव के प्रतीकात्मक शक्ति की: Date of Birth (Actual): 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी: Afeter 8 days of Dipavli in India according Hindi Panchang) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha (1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi) Name: Vivek(Trinetra:Trilochan:Trayambak nounified word of the verb Vivek:Judge): Synonyms: Subodh: Sidhdharth: Rahul Rashi Name:Giridhari (Means Lord Krishna-Gowardhan Dhari Krishna, Lord Kurmavari Vishnu-Madirachal(Meru)Dhari Vishnu and Hanuman-Daulagiri Dhari Hanuman) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू) द्वारा दी गयी जन्म तिथि)

जिस कार्य को आप किये नहीं उसका श्रेय क्यों ले रहे हैं और आगे भी लेना चाह रहे हैं उसका श्रेय उचित व्यक्तित्व तक जाने दीजिये सभ्यता से जबकि सहभागिता में ही समयपूर्व आप अपनी वर्तमान क्षमता से ज्यादा कुछ पा गए हैं : जो नियति है उसे आप क्यों बदलने का झूंठा दम्भ भर रहे हैं| ब्रह्मा एक तिहाई शक्ति के ही स्वामी हैं अतः बात उनको माननी पड़ेगी विष्णु और शिव के प्रतीकात्मक शक्ति की: 
Date of Birth (Actual): 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी: Afeter 8 days of Dipavli in India according Hindi Panchang) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस
Nakshatra: Dhanistha (1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi)
Name: Vivek(Trinetra:Trilochan:Trayambak nounified word of the verb Vivek:Judge):
Synonyms: Subodh: Sidhdharth: Rahul
Rashi Name:Giridhari (Means Lord Krishna-Gowardhan Dhari Krishna, Lord Kurmavari Vishnu-Madirachal(Meru)Dhari Vishnu and Hanuman-Daulagiri Dhari Hanuman)
Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू) द्वारा दी गयी जन्म तिथि)

भारतीय अशोकचक्र अभी तक कार्यरत है और आप का अशोक चक्र तो 2007 के द्वितीय छमाही और 2008 के प्रथम छमाही के बीच में ही टूट गया था तथाकथित विश्व महाशक्ति के एजेंटों जिसे उजागर नहीं किया था अब तक तो अब क्यों परेशान हैं ? आप को कुछ मिलना नहीं है और 2001 जैसी घटना के लिए आप तथाकथित विश्व शक्ति के एजेंट पुनः स्वयं तथाकथित विश्व शक्ति के जी का जंजाल बना(आप के हर गति विधि की निगरानी पुनः हो रही है: किशी और को दोस मत दीजियेगा गर्दिश में आ जाने पर) रहे हैं और यह पुनः संसार को 14 वर्ष पीछे ले जाएगा अगर ऐसा आप करते रहे भविस्य में।



भारतीय अशोकचक्र अभी तक कार्यरत है और आप का अशोक चक्र तो 2007 के द्वितीय छमाही और 2008 के प्रथम छमाही के बीच में ही टूट गया था तथाकथित विश्व महाशक्ति के एजेंटों जिसे उजागर नहीं किया था अब तक तो अब क्यों परेशान हैं ? आप को कुछ मिलना नहीं है और 2001 जैसी घटना के लिए आप तथाकथित विश्व शक्ति के एजेंट पुनः स्वयं तथाकथित विश्व शक्ति के जी का जंजाल बना(आप के हर गति विधि की निगरानी पुनः हो रही है: किशी और को दोस मत दीजियेगा गर्दिश में आ जाने पर) रहे हैं और यह पुनः संसार को 14 वर्ष पीछे ले जाएगा अगर ऐसा आप करते रहे भविस्य में।

भगवान भोलेनाथ महादेव शिव शंकर का एक विशेस गुण वे दुनिया के सबसे बड़े नेहरू(जीव निर्जीव सबसे प्रेम करने वाले) और सबसे बड़े शक्ति के श्रोत हैं फिर भी व्यभिचार और ज्यादती शब्द का कोई नाता नहीं है उनके इतिहास में।

भगवान भोलेनाथ महादेव शिव शंकर का एक विशेस गुण वे दुनिया के सबसे बड़े नेहरू(जीव निर्जीव सबसे प्रेम करने वाले) और सबसे बड़े शक्ति के श्रोत हैं फिर भी व्यभिचार और ज्यादती शब्द का कोई नाता नहीं है उनके इतिहास में।   

प्रेम चंद/चंद प्रेम का संज्ञाकरण चन्द्रमा का प्रेमी मतलव शिव:सोमनाथ/राकेशधर:शशिधर/चन्द्रधर/सारंग(चन्द्रमा)धर:शशांकशेखर:चन्द्र शेखर ही होता है जो त्रिलोचन:त्रिनेत्र;त्रयम्बक महादेव भी कहे गए हैं और जो विवेक(विवेक: तीसरा नेत्र:त्रिलोचन:त्रिनेत्र:त्रियम्बक: सुबोध:सिद्धार्थ:राहुल शब्द का संज्ञाकरण)) का संज्ञाकरण है। यह विवेक(तीसरा नेत्र) ही है की व्यभिचार के अलावा सभी तरह के व्यसन(नशा-पाती-जहर तक) का पान करने वाले शिव कभी मद/कामदेव के वशीभूत नही हुए वरन कामदेव का ही नाश कर दिए थे उसकी ज्यादती पर इस तीसरे नेत्र को खोलकर।भगवान भोलेनाथ महादेव शिव शंकर का एक विशेस गुण वे दुनिया के सबसे बड़े नेहरू(जीव निर्जीव सबसे प्रेम करने वाले) और सबसे बड़े शक्ति के श्रोत हैं फिर भी व्यभिचार और ज्यादती शब्द का कोई नाता नहीं है उनके इतिहास में।

प्रेम चंद/चंद प्रेम का संज्ञाकरण चन्द्रमा का प्रेमी मतलव शिव:सोमनाथ/राकेशधर:शशिधर/चन्द्रधर/सारंग(चन्द्रमा)धर:शशांकशेखर:चन्द्र शेखर ही होता है जो त्रिलोचन:त्रिनेत्र;त्रयम्बक महादेव भी कहे गए हैं और जो विवेक(विवेक: तीसरा नेत्र:त्रिलोचन:त्रिनेत्र:त्रियम्बक: सुबोध:सिद्धार्थ:राहुल शब्द का संज्ञाकरण)) का संज्ञाकरण है। यह विवेक(तीसरा नेत्र) ही है की व्यभिचार के अलावा सभी तरह के व्यसन(नशा-पाती-जहर तक) का पान करने वाले शिव कभी मद/कामदेव के वशीभूत नही हुए वरन कामदेव का ही नाश कर दिए थे उसकी ज्यादती पर इस तीसरे नेत्र को खोलकर।भगवान भोलेनाथ महादेव शिव शंकर का एक विशेस गुण वे दुनिया के सबसे बड़े नेहरू(जीव निर्जीव सबसे प्रेम करने वाले) और सबसे बड़े शक्ति के श्रोत हैं फिर भी व्यभिचार और ज्यादती शब्द का कोई नाता नहीं है उनके इतिहास में।   

Sunday, October 26, 2014

यदि मेरा कोई विकल्प इस दुनिया में होता तो वर्तमान प्रयाग विश्वविद्यालय के सर्वोच्च आङ्गिरास/भारद्वाज ऋषि मेरे उस विकल्प को इस प्रयाग विश्वविद्यालय में अवश्य लाते क्योंकि मै यहाँ शिक्षा लेने में असहमति अप्रत्यक्ष रूप से जाता चुका था, कारन प्रयाग मेरे लिए घर-परिवार की तरह ही है उस पर मै यहाँ पर मानव हित में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण का नाती भी ठहरा एक कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण होते हुए तो यह प्रयाग और प्रयाग विश्व विद्यालय मेरे लिए गुरुकुल नहीं यह कुल भी हो गया था। अतः मै स्वतंत्र रूप से यहाँ कुछ भी नहीं कर सकता था जिसे वाह्य दुनिया देख सके न तो समाज सेवा और न तो शोध कार्य में विशेष रूप से।--------हुआ भी वही मुझे अपने बड़े भाई के दिशा निर्देशन में शोध कार्य पड़ा और कुछ लोगों को कुछ शंका भी था मेरे सामाजिक जीवन की शिक्षा, पुरुषार्थ और शोध कार्य कौसल में जो एक शोधक अपने गुरु और समाज से अर्जित करता है एक बड़े समय(2 -5 -7) काल में जिसका समाधान भी दो वर्ष भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु में जा कर करना पड़ा।----और भी मेरा विकल्प होता तो उस सर्वोच्च आङ्गिरास/भारद्वाज ऋषि की गद्दी के उत्तराधिकारी वर्तमान भारद्वाज/आङ्गिरास ऋषि आज भी मुझे निष्काषित कर देते जैसा की वे प्रयास किये भी और कर भी रहे हैं पर वह जो मदिराचल(मेरु), धौलागिरी और गोवर्धन धारी मतलब गिरिधारी जन्म से ही था यहाँ आकर त्रिलोचन:त्रिनेत्र:त्रियम्बक:शिव(विवेक: सुबोध:सिद्धार्थ:राहुल शब्द का संज्ञाकरण) स्वरुप में आने को विवस भी हो गया है उस महान और सर्वोच्च आङ्गिरास/भारद्वाज ऋषि के कार्य संपादित करा तो उसे वे कैसे हटा सकते हैं।

यदि मेरा कोई विकल्प इस दुनिया में होता तो वर्तमान प्रयाग विश्वविद्यालय के सर्वोच्च आङ्गिरास/भारद्वाज ऋषि मेरे उस विकल्प को इस प्रयाग विश्वविद्यालय में अवश्य लाते क्योंकि मै यहाँ शिक्षा लेने में असहमति अप्रत्यक्ष रूप से जाता चुका था,  कारन प्रयाग मेरे लिए घर-परिवार की तरह ही है उस पर मै यहाँ पर मानव हित में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण का नाती भी ठहरा  एक कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण होते हुए तो यह प्रयाग और प्रयाग विश्व विद्यालय मेरे लिए गुरुकुल नहीं यह कुल भी हो गया था। अतः मै स्वतंत्र रूप से यहाँ कुछ भी नहीं कर सकता था जिसे वाह्य दुनिया देख सके न तो समाज सेवा और न तो शोध कार्य में विशेष रूप से।--------हुआ भी वही मुझे अपने बड़े भाई के दिशा निर्देशन में शोध कार्य पड़ा और कुछ लोगों को कुछ शंका भी था मेरे सामाजिक जीवन की शिक्षा, पुरुषार्थ और शोध कार्य कौसल में जो एक शोधक अपने गुरु और समाज से अर्जित करता है एक बड़े समय(2 -5 -7)  काल में जिसका समाधान भी दो वर्ष  भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु में जा कर करना पड़ा।----और भी मेरा विकल्प होता तो उस सर्वोच्च आङ्गिरास/भारद्वाज ऋषि की गद्दी के उत्तराधिकारी वर्तमान भारद्वाज/आङ्गिरास ऋषि आज भी मुझे निष्काषित कर देते जैसा की वे प्रयास किये भी और कर भी रहे हैं पर वह जो मदिराचल(मेरु), धौलागिरी और गोवर्धन धारी मतलब गिरिधारी जन्म से ही था यहाँ आकर त्रिलोचन:त्रिनेत्र:त्रियम्बक:शिव(विवेक: सुबोध:सिद्धार्थ:राहुल शब्द का संज्ञाकरण) स्वरुप में आने को विवस भी हो गया है उस महान और सर्वोच्च आङ्गिरास/भारद्वाज ऋषि के कार्य  संपादित करा तो उसे वे कैसे हटा सकते हैं। 

पर हाँ यदि NASA और ISRO में अंतर है मौलिक समानता यह होते हुए की दोनों वैज्ञानिक संस्थाएं है और MIT और IIT में अंतर है मौलिक समानता यह होते हुए की दोनों शोध और शैक्षणिक संस्थान हैं तो एक सनातन ब्राह्मण, ब्राह्मण, सनातन हिन्दू, हिन्दू और इसके अन्य अनुसांगिक भाग में अंतर अवश्य रहेगा यह होते हुए की यह सब मौलिक रूप से समान है पर मानव समाज के समाज के संरक्षण और संवर्धन में उपयोगिता और विशिष्टता के अनुसार इनके कर्म में भी अंतर रहेगा जिनके ये व्युत्पन्न होंगे और जिसका जितना महत्त्व होगा और यह भी एक विज्ञान है इसे वाह्य रूप से इसे चाहे केवल सामाजिक विज्ञान ही आप क्यों न बोलते हों और इसे रूढ़िवाद नाम देते हों व्यंगात्मक रूप से आप को इसका व्यक्तिगत अनुभव न होने की वजह से पर सबको इसका अनुभव हो ही यह जरूरी नहीं पर इस संसार को चलाने वाले इससे परिचित रहते है और आप को यथा स्थिति का अनुभव नहीं होने देते हैं विविध आयामी सांसारिक जीवन की असंख्य विविधताओं में आप के जीवन यापन में व्यस्तता होने से और यही है इस मायावी (महालक्ष्मी की माया:महामाया) संसार की सञ्चालन विधि।



पर हाँ यदि NASA और ISRO में अंतर है मौलिक समानता यह होते हुए की दोनों वैज्ञानिक संस्थाएं है और MIT और IIT में अंतर है मौलिक समानता यह होते हुए की दोनों शोध और शैक्षणिक संस्थान हैं तो एक सनातन ब्राह्मण, ब्राह्मण, सनातन हिन्दू, हिन्दू और इसके अन्य अनुसांगिक भाग में अंतर अवश्य रहेगा यह होते हुए की यह सब मौलिक रूप से समान है पर मानव समाज के समाज के संरक्षण और संवर्धन में उपयोगिता और विशिष्टता के अनुसार इनके कर्म में भी अंतर रहेगा जिनके ये व्युत्पन्न होंगे और जिसका जितना महत्त्व होगा और यह भी एक विज्ञान है इसे वाह्य रूप से इसे चाहे केवल सामाजिक विज्ञान ही आप क्यों न बोलते हों और इसे रूढ़िवाद नाम देते हों व्यंगात्मक रूप से आप को इसका व्यक्तिगत अनुभव न होने की वजह से पर सबको इसका अनुभव हो ही यह जरूरी नहीं पर इस संसार को चलाने वाले इससे परिचित रहते है और आप को यथा स्थिति का अनुभव नहीं होने देते हैं विविध आयामी सांसारिक जीवन की असंख्य विविधताओं में आप के जीवन यापन में व्यस्तता होने से और यही है इस मायावी (महालक्ष्मी की माया:महामाया) संसार की सञ्चालन विधि।

कश्यप(ब्रह्मर्षि:सनातन ब्राह्मण) ऋषि के पुत्र वरुणदेव के पुत्र वाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज/आंगिरास पुत्र(ब्रह्मर्षि:सनातन ब्राह्मण) के शिष्य कुल का कुनबा जो एक गोत्र विशेष कहलाता है और श्रेष्ठ होता है ब्राह्मणो में और अन्य सनातन हिन्दुओं में, अगर इस गोत्र वाले ईसाई-दलितों को अपने समतुल्य या अपने से श्रेष्ठ और पूज्य बना सकते हैं तो क्या सभी सनातन ब्राह्मण((ऋषियों में गणेश (प्रयाग सर्वादावासी ऋषि भारद्वाज /आंगिरास), नियंत्रक और वरिष्ठ (कश्यप), शुध्धतम और मानवता में उच्चतम(गौतम), गुरु श्रेष्ठ (वशिष्ठ), ब्राह्मणत्वगुण में श्रेष्ठ((भृगु (दधीचि)/जमदग्नि:परसुराम के पिता)), सबसे तेजस्वी ((कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/अत्रि व् अन्य सोमात्रेय, दत्तात्रेय)), श्रेष्ठ योद्धा(कौशिक:विश्वामित्र:विश्वरथ)) मिलकर अगर अपने से पूज्य नहीं तो कम से कम सनातन धर्म की मुख्य साखा से अलग हुए सभी धर्म के लोगों और हिन्दू दलितों को मौलिक रूप से अपने समतुल्य नहीं बना सकते है कम से कम ? पर हाँ यदि NASA और ISRO में अंतर है मौलिक समानता यह होते हुए की दोनों वैज्ञानिक संस्थाएं है और MIT और IIT में अंतर है मौलिक समानता यह होते हुए की दोनों शोध और शैक्षणिक संस्थान हैं तो एक सनातन ब्राह्मण, ब्राह्मण, सनातन हिन्दू, हिन्दू और इसके अन्य अनुसांगिक भाग में अंतर अवश्य रहेगा यह होते हुए की यह सब मौलिक रूप से समान है पर मानव समाज के समाज के संरक्षण और संवर्धन में उपयोगिता और विशिष्टता के अनुसार इनके कर्म में भी अंतर रहेगा जिनके ये व्युत्पन्न होंगे और जिसका जितना महत्त्व होगा और यह भी एक विज्ञान है इसे वाह्य रूप से इसे चाहे केवल सामाजिक विज्ञान ही आप क्यों न बोलते हों और इसे रूढ़िवाद नाम देते हों व्यंगात्मक रूप से आप को इसका व्यक्तिगत अनुभव न होने की वजह से पर सबको इसका अनुभव हो ही यह जरूरी नहीं पर इस संसार को चलाने वाले इससे परिचित रहते है और आप को यथा स्थिति का अनुभव नहीं होने देते हैं विविध आयामी सांसारिक जीवन की असंख्य विविधताओं में आप के जीवन यापन में व्यस्तता होने से और यही है इस मायावी (महालक्ष्मी की माया:महामाया) संसार की सञ्चालन विधि।



कश्यप(ब्रह्मर्षि:सनातन ब्राह्मण) ऋषि के पुत्र वरुणदेव के पुत्र वाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज/आंगिरास पुत्र(ब्रह्मर्षि:सनातन ब्राह्मण) के शिष्य कुल का कुनबा जो एक गोत्र विशेष कहलाता है और श्रेष्ठ होता है ब्राह्मणो में और अन्य सनातन हिन्दुओं में, अगर इस गोत्र वाले ईसाई-दलितों को अपने समतुल्य या अपने से श्रेष्ठ और पूज्य बना सकते हैं तो क्या सभी सनातन ब्राह्मण((ऋषियों में गणेश (प्रयाग सर्वादावासी ऋषि भारद्वाज /आंगिरास), नियंत्रक और वरिष्ठ (कश्यप), शुध्धतम और मानवता में उच्चतम(गौतम), गुरु श्रेष्ठ (वशिष्ठ), ब्राह्मणत्वगुण में श्रेष्ठ((भृगु (दधीचि)/जमदग्नि:परसुराम के पिता)), सबसे तेजस्वी ((कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/अत्रि व् अन्य सोमात्रेय, दत्तात्रेय)), श्रेष्ठ योद्धा(कौशिक:विश्वामित्र:विश्वरथ)) मिलकर अगर अपने से पूज्य नहीं तो कम से कम सनातन धर्म की मुख्य साखा से अलग हुए सभी धर्म के लोगों और हिन्दू दलितों को मौलिक रूप से अपने समतुल्य नहीं बना सकते है कम से कम ? पर हाँ यदि NASA और ISRO में अंतर है मौलिक समानता यह होते हुए की दोनों वैज्ञानिक संस्थाएं है और MIT और IIT में अंतर है मौलिक समानता यह होते हुए की दोनों शोध और शैक्षणिक संस्थान हैं तो एक सनातन ब्राह्मण, ब्राह्मण, सनातन हिन्दू, हिन्दू और इसके अन्य अनुसांगिक भाग में अंतर अवश्य रहेगा यह होते हुए की यह सब मौलिक रूप से समान है पर मानव समाज के समाज के संरक्षण और संवर्धन में उपयोगिता और विशिष्टता के अनुसार इनके कर्म में भी अंतर रहेगा जिनके ये व्युत्पन्न होंगे और जिसका जितना महत्त्व होगा और यह भी एक विज्ञान है इसे वाह्य रूप से इसे चाहे केवल सामाजिक विज्ञान ही आप क्यों न बोलते हों और इसे रूढ़िवाद नाम देते हों व्यंगात्मक रूप से आप को इसका व्यक्तिगत अनुभव न होने की वजह से पर सबको इसका अनुभव हो ही यह जरूरी नहीं पर इस संसार को चलाने वाले इससे परिचित रहते है और आप को यथा स्थिति का अनुभव नहीं होने देते हैं विविध आयामी सांसारिक जीवन की असंख्य विविधताओं में आप के जीवन यापन में व्यस्तता होने से और यही है इस मायावी (महालक्ष्मी की माया:महामाया) संसार की सञ्चालन विधि।

Saturday, October 25, 2014

ऋषियों में गणेश(प्रयाग सर्वादावासी ऋषि भारद्वाज /आंगिरास), नियंत्रक और वरिष्ठ (कश्यप), शुध्धतम और मानवता में उच्चतम(गौतम), गुरु श्रेष्ठ (वशिष्ठ), ब्राह्मणत्वगुण में श्रेष्ठ((भृगु (दधीचि)/जमदग्नि:परसुराम के पिता)), सबसे तेजस्वी ((कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/अत्रि व् अन्य सोमात्रेय, दत्तात्रेय)), श्रेष्ठ योद्धा(कौशिक:विश्वामित्र:विश्वरथ)।

ऋषियों में गणेश(प्रयाग सर्वादावासी ऋषि भारद्वाज /आंगिरास), नियंत्रक और वरिष्ठ (कश्यप), शुध्धतम और मानवता में उच्चतम(गौतम), गुरु श्रेष्ठ (वशिष्ठ), ब्राह्मणत्वगुण में श्रेष्ठ((भृगु (दधीचि)/जमदग्नि:परसुराम के पिता)), सबसे तेजस्वी ((कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/अत्रि व् अन्य सोमात्रेय, दत्तात्रेय)), श्रेष्ठ योद्धा(कौशिक:विश्वामित्र:विश्वरथ)।   

जिस तनाव को मेरे जैसा सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण/सनातन हिन्दू (कशयप ऋषि: ब्रह्मा के सबसे ज्येष्ठ पौत्र और ब्रह्मा के ज्येष्ठ मानस पुत्र मारीच के एकल पुत्र) नहीं सह सकता था तो क्या उसे वह सह सकता था जो स्वयं की सनातन ब्राह्मण या सनातन हिन्दू की सीमा से परे चला गया हो परिस्थिति वस उत्पन्न तनाव न झेल पाने से। और यह शक्ति है उनमे तभी तो सभी की वापसी का प्रथम द्वार है कश्यप गोत्र जिसकी वरिष्ठता सब पर है जिसमे उच्चतम गोत्र गौतम और वशिष्ठ समेत सभी अन्य 6/7 (एक तो स्वयं कश्यप ही हैं), 7/8(एक तो स्वयं कश्यप ही हैं), 23 /24(अशोक चक्र: धर्म चक्र:समय चक्र:काल चक्र के 24 मानक ऋषि गोत्र) (एक तो स्वयं कश्यप ही हैं), 105/105 (वर्तमान मानक) और अब उससे ज्यादा वर्तमान गोत्र वाले हों। फिर भी अगर आप केवल सनातन धर्मी हैं या किशी एक मानव धर्मी हो जिसकी उत्पत्ति सनातन हिन्दू धर्म से हो तब भी आप श्रेष्ठ हैं और आप अपने को आर्य कहने के अधिकारी हैं।

जिस तनाव को मेरे जैसा सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण/सनातन हिन्दू (कशयप ऋषि: ब्रह्मा के सबसे ज्येष्ठ पौत्र और ब्रह्मा के ज्येष्ठ मानस पुत्र मारीच के एकल पुत्र) नहीं सह सकता था तो क्या उसे वह सह सकता था जो स्वयं की सनातन ब्राह्मण या सनातन हिन्दू की सीमा से परे चला गया हो परिस्थिति वस उत्पन्न तनाव न झेल पाने से। और यह शक्ति है उनमे तभी तो सभी की वापसी का प्रथम द्वार है कश्यप गोत्र जिसकी वरिष्ठता सब पर है जिसमे उच्चतम गोत्र गौतम और वशिष्ठ समेत सभी अन्य 6/7 (एक तो स्वयं कश्यप ही हैं), 7/8(एक तो स्वयं कश्यप ही हैं), 23 /24(अशोक चक्र: धर्म चक्र:समय चक्र:काल चक्र के 24 मानक ऋषि गोत्र) (एक तो स्वयं कश्यप ही हैं), 105/105 (वर्तमान मानक) और अब उससे ज्यादा वर्तमान गोत्र वाले हों। फिर भी अगर आप केवल सनातन धर्मी हैं या किशी एक मानव धर्मी हो जिसकी उत्पत्ति सनातन हिन्दू धर्म से हो तब भी आप श्रेष्ठ हैं और आप अपने को आर्य कहने के अधिकारी हैं।

Friday, October 24, 2014

शिव: सोमनाथ: चंद प्रेम: प्रेम चंद: चन्द्रमा के स्वामी और चन्द्रमा से प्रेम करने वाला ही प्रथम सबसे बड़े नेहरू (सजीव-निर्जीव सबसे नेह:प्रेम करने वाला) और राम(कृष्ण) चन्द्र दूसरे सबसे बड़े नेहरू इससे ज्यादा मै क्या कहूँ आप स्वयं देख लें इस लिस्ट में: https://archive.today/7ocui

1) शिव: सोमनाथ: चंद प्रेम: प्रेम चंद: चन्द्रमा के स्वामी और चन्द्रमा से प्रेम करने वाला ही प्रथम सबसे बड़े नेहरू (सजीव-निर्जीव सबसे नेह:प्रेम करने वाला) और राम(कृष्ण) चन्द्र दूसरे सबसे बड़े नेहरू इससे ज्यादा मै क्या कहूँ आप स्वयं देख लें इस लिस्ट में: https://archive.today/7ocui
2) शिव: सोमनाथ: चंद प्रेम: प्रेम चंद: चन्द्रमा के स्वामी और चन्द्रमा से प्रेम करने वाला ही प्रथम सबसे बड़े नेहरू (सजीव-निर्जीव सबसे नेह:प्रेम करने वाला) और राम(कृष्ण) चन्द्र दूसरे सबसे बड़े नेहरू इससे ज्यादा मै क्या कहूँ आप स्वयं देख लें इस लिस्ट में: https://archive.today/aKXW

Tuesday, October 21, 2014

आनंद का अनुभव विना विवेक के कैसे होगा? Saravati have three children: Vivek(Son), Gyan(Son), Vidya (Daughter)

आनंद का अनुभव विना विवेक के कैसे होगा? Saravati have three children: Vivek(Son), Gyan(Son), Vidya (Daughter)

मेरी दृस्टि में उस सहस्स्राब्दी हेतु युगपरिवर्तन और सृजनात्मक घडी में तीन कृष्ण (अटल बिहारी(कृष्ण का राशि नाम), लालकृष्ण, मुरली मनोहर) में से अटल विहारी स्वयं राम की भूमिका और स्वरुप में, मुरली मनोहर स्वयं कृष्ण की भूमिका और स्वरुप में तो लालकृष्ण स्वयं हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर की भूमिका और स्वरुप में थे एक राजनयिक के रूप में। इस प्रकार जोशी धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से ब्रह्मा और राजनैतिक रूप से महाभारत कालीन परमब्रह्म श्रीकृष्ण की भूमिका में थे उस सहस्राब्दी हेतु हुए परिवर्तन के युग में। और अब श्रीकृष्ण (दामोदर) के पुत्र राजा प्रद्दुम्न किस भूमिका में हैं कुछ और लोग बताएं।

मेरी दृस्टि में उस सहस्स्राब्दी हेतु युगपरिवर्तन और सृजनात्मक घडी में तीन कृष्ण (अटल बिहारी(कृष्ण का राशि नाम), लालकृष्ण, मुरली मनोहर) में से अटल विहारी स्वयं राम की भूमिका और स्वरुप में,  मुरली मनोहर स्वयं कृष्ण की भूमिका और स्वरुप में तो लालकृष्ण स्वयं हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर की भूमिका और स्वरुप में थे एक राजनयिक के रूप में। इस प्रकार जोशी धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से ब्रह्मा और राजनैतिक रूप से महाभारत कालीन परमब्रह्म श्रीकृष्ण की भूमिका में थे उस सहस्राब्दी हेतु हुए परिवर्तन के युग में। और अब श्रीकृष्ण (दामोदर) के पुत्र राजा प्रद्दुम्न किस भूमिका में हैं कुछ और लोग बताएं।      

कौन सा काल्की अवतार जन्म लेगा? वह जो प्रोफेसर श्रीवास्तव गुरुदेव में अपने नाना का स्वरुप, अपने गुरु प्रोफेसर पाण्डेय जी में अपने बड़े भाई का स्वरुप, सहयोगी गुरु प्रोफेसर दास में मामा का (केवल वाह्य) स्वरुप और सहयोगी मित्र डॉ द्विवेदी में अपने मामा के पुत्र का स्वरुप(भाई का स्वरुप) देखा हो और विशेष सहयोगी में मिश्रा जी में मामा और जुडवा भाई में भाई( सावर्ण:कश्यप पौत्र) का स्वरुप इस अपने विज्ञान केंद्र को अपना घर कह दिया हो और ऐसा ही नहीं जहां भी गया सब किशी न किशी परिचित/सम्बन्धी/पडोशी के स्वरुप मिले । जो अपने मामा में विष्णु शक्ति और ताऊ जी में शिव शक्ति तथा जोशी में ब्रह्मा की शक्ति देखी हो उस समय अंतराल के लिए और जिसके लिए दुनिया की सर्वोच्च विश्व शक्ति की इजाजत के बिना ही किशी को संयुक्त रास्त्र संघ का महा सचिव बना भी एक हंसी खेल था वह इस्वर आप सबको देख रहा था और यह पा रहा था की आप सभी अपने कर्म को भोगते हैं पर आप के गलत कार्यों का दुःख जीवन के हर क्षेत्र और व्यवसाय से आने वाले इस दुनिया को चलाने का जिम्मा लेने वाले हर संत और सज्जन उठाते हैं।--------पर प्रश्न यह है की जब 50 % से ज्यादा लोग गलत करेंगे तो क्या ये सज्जन और संत भी इस दुनिया को चला पाने में समर्थ होंगे? और होंगे तो कब तक और किस प्रकार? और सबके दुःख को ये संत और सज्जन उठाते ही क्यों हैं? जब हम केवल अपने ही स्वार्थ के बारे सोचते हैं और अपने स्वार्थ को पूरे करने में जो विष तैयार होता है उसका वमन केवल सज्जन और संत क्यों करें? ----------मेरे भाई श्रीराम/कृष्ण/बुध्ध ने ऐसा क्या कुछ नहीं किया है इस संसार में की जिनके आचरण और कर्म का अनुसरण कर हम विष्णु को काल्की अवतार लेकर सांसारिक दुःख झेलने से मुक्ति न दें सके?*******जग में प्यारे हैं दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम(गौतम ऋषि के भी ईस्टदेव राम ही थे जिनके गोत्र कुल में बुद्ध मतलब सिद्धार्थ गौतम जन्म लिए थे)।

कौन सा काल्की अवतार जन्म लेगा?  वह जो प्रोफेसर श्रीवास्तव गुरुदेव में अपने नाना का स्वरुप, अपने गुरु प्रोफेसर पाण्डेय जी  में अपने बड़े भाई का स्वरुप, सहयोगी गुरु प्रोफेसर दास में मामा का (केवल वाह्य) स्वरुप और सहयोगी मित्र डॉ द्विवेदी में अपने मामा के पुत्र का स्वरुप(भाई का स्वरुप) देखा हो और विशेष सहयोगी में मिश्रा जी में मामा और जुडवा भाई में भाई( सावर्ण:कश्यप पौत्र) का स्वरुप इस अपने विज्ञान केंद्र को अपना घर कह दिया हो और ऐसा ही नहीं जहां भी गया सब किशी न किशी परिचित/सम्बन्धी/पडोशी के स्वरुप मिले । जो अपने मामा में विष्णु शक्ति और ताऊ जी में शिव शक्ति तथा जोशी में ब्रह्मा की शक्ति देखी हो उस समय अंतराल के लिए और जिसके लिए दुनिया की सर्वोच्च विश्व शक्ति की इजाजत के बिना ही किशी को संयुक्त रास्त्र संघ का महा सचिव बना भी एक हंसी खेल था वह इस्वर आप सबको देख रहा था और यह पा रहा था की आप सभी अपने कर्म को भोगते हैं पर आप के गलत कार्यों का दुःख जीवन के हर क्षेत्र और व्यवसाय से आने वाले इस दुनिया को चलाने का जिम्मा लेने वाले हर संत और सज्जन उठाते हैं।--------पर प्रश्न यह है की जब 50 % से ज्यादा लोग गलत करेंगे तो क्या ये सज्जन और संत भी इस दुनिया को चला  पाने में समर्थ होंगे? और होंगे तो कब तक और किस प्रकार? और सबके दुःख को ये संत और सज्जन उठाते ही क्यों हैं? जब हम केवल अपने ही स्वार्थ के बारे सोचते हैं और अपने स्वार्थ को पूरे करने में जो विष तैयार होता है उसका वमन केवल सज्जन और संत क्यों करें? ----------मेरे भाई श्रीराम/कृष्ण/बुध्ध ने ऐसा क्या कुछ नहीं किया है इस संसार में की जिनके आचरण और कर्म का अनुसरण कर हम विष्णु को काल्की अवतार लेकर सांसारिक दुःख झेलने से मुक्ति न दें सके?*******जग में प्यारे हैं दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम(गौतम ऋषि के भी ईस्टदेव राम ही थे जिनके गोत्र कुल में बुद्ध मतलब सिद्धार्थ गौतम जन्म लिए थे)। 

श्रीरामनवमी, श्रीकृष्णजन्मास्टमी और विजय दशमी भारतवर्ष के श्रेष्ठतम पर्व हैं पर विजय दशमी पूर्णाहुति दीपावली के आने पर श्रीराम के राज्य-अभिषेक(राज्याभिषेक) से होती है। अतः मै भी पूर्णाहुति कर दूँ आप लोगों के सामने प्रयागराज/अल्लाहबाद की सांस्कृतिक शक्ति का तो उचित ही होगा:---------श्रीराम/रघुवंश/इक्शाकुवंश/सूर्यवंश/कश्यप गोत्रीय के समानांतर चलने वाले इस्लाम से और श्रीकृष्ण/वृष्णि वंश/यदुवंश/चन्द्रवंश/कश्यप गोत्रीय के सामानांतर वाले ईसाइयत से यदि सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण; और गौतम गोत्रीय क्षत्रिय सिद्धार्थ द्वारा चलाये गए पंथ बौद्ध और उसके अनुयायी तथाकथित दलित से यदि सनातन गौतम(न्याय दर्शन के प्रणेता पर मत्स्य न्याय के समर्थक नहीं) गोत्रिय वयासी मिश्रा ब्राह्मण अगर डरने लगें तो उस समाज और संविधान को कार्यान्वित करने की शक्ति कौन रख सकेगा और अगर कार्यान्वित होता हुआ माना जा रहा है तो वह भगवान भरोसे ही कहा जाएगा और ऐसे में इस पर पुनर्विचार करने की जरूरत आ गयी है। अगर अगर ऐसा चल भी रहा है तो वह सनातन संस्कृति के रक्षकों की सहन-शीलता पर चल रहा है जिनकी(सप्तर्षियों:सातों ब्रह्मर्षियों) संतति यह वर्त्तमान विश्व/देश/समाज है।----------एक सीधा सा उत्तर है अगर संप्रभुता का अधिकार मांगना है या देना है तो अधिकार के साथ-साथ संस्कृति और संस्कार की रक्षा का भी अधिकार भी लो और दो अन्यथा आप के अस्तित्व पर स्वयं एक ख़तरा मड़रा रहा है।---------मेरे जैंसा सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण(मै स्वयं गौतम गोत्रीय ब्राह्मण का वह नाती=ग्रैंडसन भी हूँ जिस जिनका कोई विकल्प नहीं ब्राह्मणत्व में वर्तमान दुनिया में प्रयागराज/कैलाश-पर्वत/गोरखपुर/जौनपुर:जमदग्निपुर ((जमदग्नि/भृगु(दधीचि) का क्षेत्र जो दुनिया में मेधा और संस्कृति सर्वोच्च स्थान रखता है))) सत्य के मार्ग से झुकने वाला नहीं और अगर झुका हुआ पाया गया तो वव गुरुजन के उस आश्वासन और आदेश पर रहा है की यह अमुक प्रसंग श्रिस्टी और समाज के हित में है जो की एक समर्पण और त्याग था/है जिसमे बलिदान और तप (तपस्या) अपने आप में समाहित है।-------जाती/धर्म वाद मत करो पर जाती और धर्म मिटाने पर उतारू क्यों हो और मेरा प्रश्न है की क्या दुनिया के पास ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य और मिलीजुली संस्कृति के लोगों का विकल्प मिल गया है जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश के गुणों पर आधारित है ? और अगर मिल गया है तो सनातन संस्कृति से अगल पंथ समुदाय बनाने वालों की सस्कृति इस भारतीय संस्कृति से ऊंची क्यों नहीं हुई आज तक? -----------मैंने अपने जीवन में सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण की सीमा में रहकर हर जाती, धर्म और संस्कृति के अनुरूप व्यवहार किया है सम्यक जीवन के कार्यों और जिम्मेदारियों को संपादित करने में पर विश्व में एक बहुत ही अपमानित और द्वेषसित किये जाने वाली इस जाती/धर्म को कभी नहीं छोड़ा (ब्राह्मण जाती/धर्म एक ऐसा धर्म है जिसमे पूर्ण ब्राह्मण बन कर आप विशेस कर उत्तर भारत या भारत में आसानी से जी सकते है अन्यथा बाहर आहार-विहार पर आप को बहुत ही कठिन नियम और ध्यान रखने पड़ते है, यही एक कारन है की क्षत्रिय और वैश्य समाज भारत से बाहर सदियों से जाते रहे पर ब्राह्मण केवल कुछ ही जाते थे और अब ज्यादा जाने लगे है जिससे भारतीय संस्कृति के अनुपालन में एक रिक्तता हो रही भारत में उनका उत्तराधिकारी सांस्कृतिक रूप से यथा संभव न मिलाने पर इस संप्रभुता हेतु अधिकार की अंधी दौड़ में पर इसका विस्तार हो रहा बाहर के देश में संतोष विषय है उनके लिए पर भारत के लिए नही)।एक ऐसे केंद्र पर हूँ जहां हर जाती/धर्म के कर्मचारी,शोधकर्ता और शिक्षक एक ही पात्र में रखा दाना चबाते और चटनी भी एक स्थान पर रखी रहती है जिसका सेवन करते हैं कई बार जिससे यह भी जूठा ही हो जाता है बावजूद इसके की यह ब्राह्मण बहुतायत का केंद्र है और श्रेष्ठ ब्राह्मण यहां रहते है यह मेरा दावा है अगर मुझे आप एक ब्राह्मण जाती /धर्म का मानते है।******* इस सन्देश कें साथ आप सभी को दीपावली की शुभ कामना।

श्रीरामनवमी, श्रीकृष्णजन्मास्टमी और विजय दशमी भारतवर्ष के श्रेष्ठतम पर्व हैं पर विजय दशमी पूर्णाहुति दीपावली के आने पर श्रीराम के राज्य-अभिषेक(राज्याभिषेक) से होती है। अतः मै भी पूर्णाहुति कर दूँ आप लोगों के सामने प्रयागराज/अल्लाहबाद की सांस्कृतिक शक्ति का तो उचित ही होगा:---------श्रीराम/रघुवंश/इक्शाकुवंश/सूर्यवंश/कश्यप गोत्रीय के समानांतर चलने वाले इस्लाम से और श्रीकृष्ण/वृष्णि वंश/यदुवंश/चन्द्रवंश/कश्यप गोत्रीय के सामानांतर वाले ईसाइयत से यदि सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण; और गौतम गोत्रीय क्षत्रिय सिद्धार्थ द्वारा चलाये गए पंथ बौद्ध और उसके अनुयायी तथाकथित दलित से यदि सनातन गौतम(न्याय दर्शन के प्रणेता पर मत्स्य  न्याय के समर्थक नहीं) गोत्रिय वयासी मिश्रा ब्राह्मण अगर डरने लगें तो उस समाज और संविधान को कार्यान्वित करने की शक्ति कौन रख सकेगा और अगर कार्यान्वित होता हुआ माना जा रहा है तो वह भगवान भरोसे ही कहा जाएगा और ऐसे में इस पर पुनर्विचार करने की जरूरत आ गयी है। अगर अगर ऐसा चल भी रहा है तो वह सनातन संस्कृति के रक्षकों की सहन-शीलता पर चल रहा है जिनकी(सप्तर्षियों:सातों ब्रह्मर्षियों) संतति यह वर्त्तमान विश्व/देश/समाज है।----------एक सीधा सा उत्तर है अगर संप्रभुता का अधिकार मांगना है या देना है तो अधिकार के साथ-साथ संस्कृति और संस्कार की रक्षा का भी अधिकार भी लो और दो अन्यथा आप के अस्तित्व पर स्वयं एक ख़तरा मड़रा रहा है।---------मेरे जैंसा सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण(मै स्वयं गौतम गोत्रीय ब्राह्मण का वह नाती=ग्रैंडसन भी हूँ जिस जिनका कोई विकल्प नहीं ब्राह्मणत्व में वर्तमान दुनिया में प्रयागराज/कैलाश-पर्वत/गोरखपुर/जौनपुर:जमदग्निपुर ((जमदग्नि/भृगु(दधीचि) का क्षेत्र जो दुनिया में मेधा और संस्कृति सर्वोच्च स्थान रखता है))) सत्य के मार्ग से झुकने वाला नहीं और अगर झुका हुआ पाया गया तो वव गुरुजन के उस आश्वासन और आदेश पर रहा है की यह अमुक प्रसंग श्रिस्टी और समाज के हित में है जो की एक समर्पण और त्याग था/है जिसमे बलिदान और तप (तपस्या) अपने आप में समाहित है।-------जाती/धर्म वाद मत करो पर जाती और धर्म मिटाने पर उतारू क्यों हो और मेरा प्रश्न है की क्या दुनिया के पास ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य और मिलीजुली संस्कृति के लोगों का विकल्प मिल गया है जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश के गुणों पर आधारित है ? और अगर मिल गया है तो सनातन संस्कृति से अगल पंथ समुदाय बनाने वालों की सस्कृति इस भारतीय संस्कृति से ऊंची क्यों नहीं हुई आज तक? -----------मैंने अपने जीवन में सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण की सीमा में रहकर हर जाती, धर्म और संस्कृति के अनुरूप व्यवहार किया है सम्यक जीवन के कार्यों और जिम्मेदारियों को संपादित करने में पर विश्व में एक बहुत ही अपमानित और द्वेषसित किये जाने वाली इस जाती/धर्म को कभी नहीं छोड़ा (ब्राह्मण जाती/धर्म एक ऐसा धर्म है जिसमे पूर्ण ब्राह्मण बन कर आप विशेस कर उत्तर भारत या भारत में आसानी से जी सकते है अन्यथा बाहर आहार-विहार पर आप को बहुत ही कठिन नियम और ध्यान रखने पड़ते है, यही एक कारन है की क्षत्रिय और वैश्य समाज भारत से बाहर सदियों से जाते रहे पर ब्राह्मण केवल कुछ ही जाते थे और अब ज्यादा जाने लगे है जिससे भारतीय संस्कृति के अनुपालन में एक रिक्तता हो रही भारत में उनका उत्तराधिकारी सांस्कृतिक रूप से यथा संभव न मिलाने पर इस संप्रभुता हेतु अधिकार की अंधी दौड़ में पर इसका विस्तार हो रहा बाहर के देश में संतोष विषय है उनके लिए पर भारत के लिए नही)।एक ऐसे केंद्र पर हूँ जहां हर जाती/धर्म के कर्मचारी,शोधकर्ता और शिक्षक एक ही पात्र में रखा दाना चबाते और चटनी भी एक स्थान पर रखी रहती है जिसका सेवन करते हैं कई बार जिससे यह भी जूठा ही हो जाता है बावजूद इसके की यह ब्राह्मण बहुतायत का केंद्र है और श्रेष्ठ ब्राह्मण यहां रहते है यह मेरा दावा है अगर मुझे आप एक ब्राह्मण जाती /धर्म का मानते है।******* इस सन्देश कें साथ आप सभी को दीपावली की शुभ कामना।

Monday, October 20, 2014

Allahabad University "Proud Past Alumni" list of 42 members:Allahabad University Alumni Association(Registration No. 407/2000 under Society Act 1860):Famous alumni include

Allahabad University "Proud Past Alumni" list of 42 members https://archive.today/aKXW
Allahabad University "Proud Past Alumni" list of 42 members
https://archive.today/7ocui 

Allahabad University Alumni Association(Registration No. 407/2000 under Society Act 1860):Famous alumni include:
Our Proud Past
Prof. Prem Chand Pandey (Dr, P.C. Pandey, SAC/ISRO,NCAOR/MoES, CORAL/IIT Kgp): Founder Director of National centre for Antarctic and Ocean Research (NCAOR), Goa, 1st student of University of Allahabad who got Bhatnagar award and Uttar Pradesh Vigyan Gaurav award along with many other award of science, he got Gold medal award of NASA, USA for his short span of time good work there as ISRO, Govt. of India
employ on training. His help for new scientific centres in UoA indirectly is very important and was at exact turning period of university's future vision in modern era. KBCAOS/MNCOSS, IIDS is one of the on surface example known by all related with UoA.
Ram Chandra Sinha, Former IAS Officer, Former Secretary to the Chief Minister of Bihar, Chairman of the Patna Improvement Trust, Divisional Commissionor (Bhaglpur), Commissioner (Agriculture, Education), Sub Divisional Officer, District Magistrate, founder of the Sudha Co-Operative, now Senior Advocate.
Harivansh Rai Bachchan, Poet
Krishna Prakash Bahadur, Author
H.N. Bahuguna, former Deputy Prime Minister of India
Prof. Harish Chandra, Mathematician
Acharya Narendra Dev
Mohammad Hidayatullah, Former Chief Justice, Supreme Court of India
Ranganath Mishra, former Chief Justice of India
Gulzari Lal Nanda, former Prime Minister of India
Motilal Nehru
Govind Ballabh Pant
Prof. Govind Jee. Prof. University of Illinois, Former head-
International society for Photobiology.
Gopal Swarup Pathak, former Vice President of India
Dr V.K.Rai, Plant physiology
Dr. Shankar Dayal Sharma, Former President of India
Chandra Shekhar, Former Prime Minister of India
Satyendra Narayan Sinha, Former Chief Minister of Bihar
Prof. Ram Chandra Shukla, Painter.
Surya Bahadur Thapa
Prof. Vijai K Tripathi
Kamal Narain Singh, former Chief Justice of India
Nikhil Kumar, former IPS, Member of Parliament India
Prof. Daulat Singh Kothari, Physicist
Prof. Kundan Singh Singwi, Physicist
Prof. Govind Swarup, Physicist
Udit Raj, Social Activist
Pankaj Mishra, Author
Krishna Kumar Sharma, Quit India Movement Leader and Activist,
Prominent Poet and Literary Figure
Vishwanath Pratap Singh,10th Prime Minister of India
Murli Manohar Joshi,B.J.P leader and former Minister for Human
resource&development
Dharmendra Singh Yadav , Member of Parliament India
Radhey Shyam Sharma, IPS, Former Director Vigilance UP
Maharishi Mahesh Yogi
Dhananjaya Kumar, Yogacharya, Poet
Mahadevi Varma (poet and writer)
Mukhtar Zaman, freedom fighter, leading journalist
Dr Umesh C Yadav, Research scientist, Univ of Texas, USA
Indu Kant Shukla, Litterateur,Poet,Writer.
Prafulla Kumar Rai, MP for Gorakhpur (Uttar Pradesh)
D.P. Chandel, equity researcher (New york, USA)
Dr. Vivek Kumar Pandey PDF at Centre for Atmospheric & Oceanic Sciences, IISc Bangalore, 1st doctorate from K.Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies(KBCAOS,IIDS), University of Allahabad(UoA), Allahabad and (1st batch JRF of National Centre for Antarctic and Ocean Research (NCAOR), Goa,Master of Science Department of Physics(Nuclear)-2000, BHU, Varanasi, B.Sc. from Purvanchal University, Jaunpur (U.P.)

प्रद्दुम्न श्रीकृष्ण के एक मात्र भौतिक पुत्र और चारुमति उनकी एक मात्र भौतिक पुत्री थीं जिनकी धात्री(माँ) रुक्मणी ही थीं। और अनिरुद्ध प्रद्दुम्न के एक मात्र भौतिक पुत्र हैं जो इस प्रकार श्रीकृष्ण के एक मात्र पौत्र थे। जिसके बाद अनिरुद्ध और उनकी मित्र मंडली की उद्दंडता से कुपित हो ऋषि समुदाय के नायक कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) द्वारा उनके स्वयं के कुल यदुवंश का श्रीकृष्ण समेत नाश हुआ पर गोकुल-मथुरा-वृन्दावन के कृष्ण भक्तों की कृपा से यदुवंश आज भी तथावत जीवित है।

प्रद्दुम्न श्रीकृष्ण के एक मात्र भौतिक पुत्र और चारुमति उनकी एक मात्र भौतिक पुत्री थीं जिनकी धात्री(माँ) रुक्मणी ही थीं। और अनिरुद्ध प्रद्दुम्न के एक मात्र भौतिक पुत्र हैं जो इस प्रकार श्रीकृष्ण के एक मात्र पौत्र थे। जिसके बाद अनिरुद्ध और उनकी मित्र मंडली की उद्दंडता से कुपित हो ऋषि समुदाय के नायक कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) द्वारा उनके स्वयं के कुल यदुवंश का श्रीकृष्ण समेत नाश हुआ पर गोकुल-मथुरा-वृन्दावन के कृष्ण भक्तों की कृपा से यदुवंश आज भी तथावत जीवित है।

कोसलपुरी/अवधपुरी: भगवान श्रीराम के समय में इसका विस्तार हिन्दुकुश /लव-कुश क्षेत्र तक था और भरत के पुत्रों और स्वयं मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पुत्र लव-कुश के पग चिन्ह यहां के शासक के रूप में रहे है मतलब अखंड भारत न की केवल वर्तमान भारत इस चक्रवर्ती साम्राज्य में शामिल था जिसकी राजधानी अयोध्या ही थी। कोसल-अवध (कोसलपुरी और अवधपुरी) दोनों प्रसंग है और इसे विभेद का विषय कहीं नहीं बनाया गया है:१) कोसल:कोसलेश:कोसलपुरी -----प्रविश नगर कीजै सब काजा, ह्रदय राखी कोसलपुर राजा । कोसलेश दशरथ के जाये, हम पित बचन मानि वन आये।२) अवध:अवधेश:अवधपुरी-------अवध पुरी मम पुरी सुहावनि, उत्तर दिस सरयू वह पावनि। -----अवधेश के बालक चारि सदा तुलसी मन मंदिर में विहरें।

कोसलपुरी/अवधपुरी: भगवान श्रीराम के समय में इसका विस्तार हिन्दुकुश /लव-कुश क्षेत्र तक था और भरत के पुत्रों और स्वयं मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पुत्र लव-कुश के पग चिन्ह यहां के शासक के रूप में रहे है मतलब अखंड भारत न की केवल वर्तमान भारत इस चक्रवर्ती साम्राज्य में शामिल था जिसकी राजधानी अयोध्या ही थी। कोसल-अवध (कोसलपुरी और अवधपुरी) दोनों प्रसंग है और इसे विभेद का विषय कहीं नहीं बनाया गया है:१) कोसल:कोसलेश:कोसलपुरी -----प्रविश नगर कीजै सब काजा, ह्रदय राखी कोसलपुर राजा । कोसलेश दशरथ के जाये, हम पित बचन मानि वन आये।२) अवध:अवधेश:अवधपुरी-------अवध पुरी मम पुरी सुहावनि, उत्तर दिस सरयू वह पावनि। -----अवधेश के बालक चारि सदा तुलसी मन मंदिर में विहरें।

Saturday, October 18, 2014

Not Parambrahma(Brahma+Vishnu+Mahesh) Lord Shri Krishna but Lord Shri Krishna as incarnation of Lord Vishnu(Lord of Shiv) only, when he was in self defense but when he was in direct battle with Kansh in Mathura then he was in form of Vishnu-Shankar (i.e. Vishnu+Shakteshwar) Krishna and finally at the time of Shri-Mad-Bhagvat Geeta preaching to Arjun (Dhananjaya) Lord Shri Krishna known as Parambrahma Lord Shri Krishna because the whole knowledge of Brahma was in modified form of his preaching. Thus at the time of killing Kansh he was not TRIDEV(Brahma+Vishnu+Mahesh) but in form of Vishnu-Shankar(Vishnu+Shakteshwar) only. Thus not Tridev but Vishnu-Shankar(Vishnu+Shakteshwar) Lord Shri Krishna i.e. only 2/3 TRIDEV killed Kansh. This fulfills the statement of Parashuram given to Kansh that TRIDEV as whole will not kill you.

Not Parambrahma(Brahma+Vishnu+Mahesh) Lord Shri Krishna but Lord Shri Krishna as incarnation of Lord Vishnu(Lord of Shiv) only, when he was in self defense but when he was in direct battle with Kansh in Mathura then he was in form of Vishnu-Shankar (i.e. Vishnu+Shakteshwar) Krishna and finally at the time of Shri-Mad-Bhagvat Geeta preaching to Arjun (Dhananjaya) Lord Shri Krishna known as Parambrahma Lord Shri Krishna because the whole knowledge of Brahma was in modified form of his preaching.  Thus at the time of killing Kansh he was not TRIDEV(Brahma+Vishnu+Mahesh) but in form of Vishnu-Shankar(Vishnu+Shakteshwar) only. Thus not Tridev but Vishnu-Shankar(Vishnu+Shakteshwar) Lord Shri Krishna i.e. only 2/3 TRIDEV killed Kansh. This fulfills the statement of Parashuram given to Kansh that TRIDEV as whole will not kill you.

प्रयागराज:प्राक-यज्ञ/अल्लाहाबाद में ब्रह्मा द्वारा सप्तर्षि के प्राकट्य हेतु किये गए वर्तमान पृथ्वीलोक के सबसे प्राचीन (प्राक) यज्ञ, प्रकृष्टा यज्ञ में विष्णु(हरि) और महेश(शंकर:महादेव) भी सम्मिलित हुए थे अतएव त्रिदेव द्वारा यह यज्ञ पूर्णाहुति को प्राप्त किया जिसके आयोजक ब्रह्मा जी के होने के कारन सप्तर्षि(सातो ब्रह्मर्षि) ब्रह्मा के मानस पुत्र कहे गए और सम्पूर्ण मानव संतति (पुत्र:नर-नारी) ब्रह्मा के पुत्र हुए पर यज्ञ में सहभागिता होने से ये हरि-शंकर(हरिशंकर) की भी संतति(पुत्र) कहे जाते हैं| गणेश:विनायक:गजाधर:गणपति और कार्तिकेय:स्कन्द: मुरुगन अगल से महादेव और सती(पार्वती) के स्वयं के भौतिक पुत्र हैं और दक्ष अगल से ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र है, सच्चिदानंदघन/अखिलानन्दघन कहे जाने वाले विष्णु और लक्ष्मी के स्वयं के कोई भौतिक पुत्र नहीं हुए अतएव ये सम्पूर्ण मानवता के पालनहार कहे गए और ये प्रजापालक पिता की संज्ञा से विभूषित किये जाते है।


प्रयागराज:प्राक-यज्ञ/अल्लाहाबाद में ब्रह्मा द्वारा सप्तर्षि के प्राकट्य हेतु किये गए वर्तमान पृथ्वीलोक के सबसे प्राचीन (प्राक) यज्ञ, प्रकृष्टा यज्ञ में विष्णु(हरि) और महेश(शंकर:महादेव) भी सम्मिलित हुए थे अतएव त्रिदेव द्वारा यह यज्ञ पूर्णाहुति को प्राप्त किया जिसके आयोजक ब्रह्मा जी के होने के कारन सप्तर्षि(सातो ब्रह्मर्षि) ब्रह्मा के मानस पुत्र कहे गए और सम्पूर्ण मानव संतति (पुत्र:नर-नारी) ब्रह्मा के पुत्र हुए पर यज्ञ में सहभागिता होने से ये हरि-शंकर(हरिशंकर) की भी संतति(पुत्र) कहे जाते हैं|  गणेश:विनायक:गजाधर:गणपति और कार्तिकेय:स्कन्द: मुरुगन अगल से महादेव और सती(पार्वती) के स्वयं के भौतिक पुत्र हैं और दक्ष अगल से ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र है, सच्चिदानंदघन/अखिलानन्दघन कहे जाने वाले विष्णु और लक्ष्मी के स्वयं के कोई भौतिक पुत्र नहीं हुए अतएव ये सम्पूर्ण मानवता के पालनहार कहे गए और ये प्रजापालक पिता की संज्ञा से विभूषित किये जाते है।

Friday, October 17, 2014

कस्यप गोत्रियों के सबसे विशिष्ठ अंग रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय जैसे मर्यादित और विस्तृत चक्रवर्ती साम्राज्य का नाम अवधपुरी या कोसलपुरी था इसकी समीक्षा करना मेरा काम नहीं पर यह जरूर की भगवान श्रीराम के समय में इसका विस्तार हिन्दुकुश /लव-कुश क्षेत्र तक था और भरत के पुत्रों और स्वयं मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पुत्र लव-कुश के पग चिन्ह यहां के शासक के रूप में रहे है मतलब अखंड भारत न की केवल वर्तमान भारत इस चक्रवर्ती साम्राज्य में शामिल था जिसकी राजधानी अयोध्या ही थी।कोसल-अवध (कोसलपुरी और अवधपुरी) दोनों प्रसंग है और इसे विभेद का विषय कहीं नहीं बनाया गया है:१) कोसल:कोसलेश:कोसलपुरी -----प्रविश नगर कीजै सब काजा, ह्रदय राखी कोसलपुर राजा । कोसलेश दशरथ के जाये, हम पित बचन मानि वन आये।२) अवध:अवधेश:अवधपुरी-------अवध पुरी मम पुरी सुहावनि, उत्तर दिस सरयू वह पावनि। -----अवधेश के बालक चारि सदा तुलसी मन मंदिर में विहरें |-------मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

कस्यप गोत्रियों के सबसे विशिष्ठ अंग रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय जैसे मर्यादित और विस्तृत चक्रवर्ती साम्राज्य का नाम अवधपुरी या कोसलपुरी था इसकी समीक्षा करना मेरा काम नहीं पर यह जरूर की भगवान श्रीराम के समय में इसका विस्तार हिन्दुकुश /लव-कुश क्षेत्र तक था और भरत के पुत्रों और स्वयं मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पुत्र लव-कुश के पग चिन्ह यहां के शासक के रूप में रहे है मतलब अखंड भारत न की केवल वर्तमान भारत इस चक्रवर्ती साम्राज्य में शामिल था जिसकी राजधानी अयोध्या ही थी।
कोसल-अवध (कोसलपुरी और अवधपुरी) दोनों प्रसंग है और इसे विभेद का विषय कहीं नहीं बनाया गया है:१) कोसल:कोसलेश:कोसलपुरी -----प्रविश नगर कीजै सब काजा, ह्रदय राखी कोसलपुर राजा ।  कोसलेश दशरथ के जाये, हम पित बचन मानि वन आये।२) अवध:अवधेश:अवधपुरी-------अवध पुरी  मम पुरी सुहावनि, उत्तर दिस सरयू वह पावनि। -----अवधेश के बालक चारि सदा तुलसी मन मंदिर में विहरें।  
मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

Rishi Bharadwaaj/Angiras ((Student of Valmiki(Son of Varun and Grand Son of Rishi Kashyap) and Guru (Teacher ) of Rishi Garg)) was first person who given clean Chit to Dasharath (Incarnation of Rishi Kashyap) Nandan Lord Sri Ram in Prayagraj/Allahabad after Ravan Vadh and also send his pupil(Garga Gotriy Brahmana) to take part in Ashwamedh Yagya and his Bhojs(Dinner/Meals concern wit the ritual in Sanatan Hindu Dharam). ---------Also Ravan's Killing by Shri Ram was arrangement here at Bharadwaaj/Angiras Ashram by all Rishis and Brahma at Prayagraj/Allahabad when Shri Ram came here 1st time during his exile way from Ayodhya and where ever he went from here up to Lanka for kill Ravan was pre decided and was under control from here.

Rishi Bharadwaaj/Angiras ((Student of Valmiki(Son of Varun and Grand Son of Rishi Kashyap) and Guru (Teacher ) of Rishi Garg)) was first person who given clean Chit to Dasharath (Incarnation of Rishi Kashyap) Nandan Lord Sri Ram in Prayagraj/Allahabad after Ravan Vadh and also send his pupil(Garga Gotriy Brahmana) to take part in Ashwamedh Yagya and his Bhojs(Dinner/Meals concern wit the ritual in Sanatan Hindu Dharam). ---------Also Ravan's Killing by Shri Ram was arrangement here at Bharadwaaj/Angiras Ashram by all Rishis and Brahma at Prayagraj/Allahabad when Shri Ram came here 1st time during his exile way from Ayodhya and where ever he went from here up to Lanka for kill Ravan was pre decided and was under control from here.

संत ह्रदय नवनीत समाना। कह कबिहिन पर कहई न जाना।। निज परिताप द्रवहिं नवनीते। पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ संत का ह्रदय नवनीत(मक्खन) के समान कोमल होता है इस बात को कवि लोग कहते हैं पर वे कहना ही नहीं जानते हैं मतलब ठीक-ठीक नहीं वर्णन कर पाते हैं। क्योंकि नवनीत तो स्वयं को बाहर से ताप दिए जाने से द्रवित होता है पर संत तो वे पावन लोग हैं जो परमार्थ जीवन धारण करते हैं और समाज में दूसरों के दुःख को दूर कर सुख प्रदान करने के प्रयास में दुःख के भागीदार होते हैं।

संत ह्रदय नवनीत समाना। कह कबिहिन पर कहई न जाना।। निज परिताप द्रवहिं नवनीते। पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ संत का ह्रदय नवनीत(मक्खन) के समान कोमल होता है इस बात को कवि लोग कहते हैं पर वे कहना ही नहीं जानते हैं मतलब ठीक-ठीक नहीं वर्णन कर पाते हैं। क्योंकि नवनीत तो स्वयं को बाहर से ताप दिए जाने से द्रवित होता है पर संत तो वे पावन लोग हैं जो परमार्थ जीवन धारण करते हैं और समाज में दूसरों के दुःख को दूर कर सुख प्रदान करने के प्रयास में दुःख के भागीदार होते हैं।

प्रगतिशील सच्चाई का अनुसरण ही आर्यों की निशानी है और यही किशी पुरुष या स्त्री को श्रेष्ठ बनाता है। अतः इसी से किशी के आर्य होने का निर्धारण होता है न कि किशी की नश्ल और रंग से।-----सकारात्मकता ही पृथ्वी पर मानवता को नियंत्रित करती है। अतः सदैव सकारात्मक करे और सकारात्मक बनें और दूसरों को भी सकारात्मक बनायें और सकारात्मक करने के लिए प्रेरित करें। इसी में मानवता का कल्याण निहित है।

प्रगतिशील सच्चाई का अनुसरण ही आर्यों की निशानी है और यही किशी पुरुष या स्त्री को श्रेष्ठ बनाता है। अतः इसी से किशी के आर्य होने का निर्धारण होता है न कि किशी की नश्ल और रंग से।-----सकारात्मकता ही पृथ्वी पर मानवता को नियंत्रित करती है। अतः सदैव सकारात्मक करे और सकारात्मक बनें और दूसरों को भी सकारात्मक बनायें और सकारात्मक करने के लिए प्रेरित करें। इसी में मानवता का कल्याण निहित है।

“को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥“----यहाँ अपना आश्रम बना कर रहने वाले भारद्वाज ऋषि भी इसका सम्पूर्ण वर्ण नहीं कर सके। ----- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इलाहाबाद नगर का नाम 'प्रयाग' है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ। उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण 'इलहवास' किया अर्थात जहाँ पर अल्लाह का वास है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम 'इलावास' पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण 'इलाहाबाद' कर दिया।-----------------इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियांँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता व पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुत: गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि। ----------तीर्थ द्विविध होते हैं, एक कामनाओं को पूर्ण करने वाले और दूसरे मोक्ष देने वाले। जिस तीर्थ में कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष की प्राप्ति दोनों ही एक साथ हो, वह एक मात्र तीर्थ प्रयाग है। यही वह तीर्थ है जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है इसीलिए प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:" ।


“को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥“----यहाँ अपना आश्रम बना कर रहने वाले भारद्वाज ऋषि भी इसका सम्पूर्ण वर्ण नहीं कर सके। ----- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इलाहाबाद नगर का नाम 'प्रयाग' है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ। उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण 'इलहवास' किया अर्थात जहाँ पर अल्लाह का वास है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम 'इलावास' पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण 'इलाहाबाद' कर दिया।-----------------इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियांँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुत: गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि। ----------तीर्थ द्विविध होते हैं, एक कामनाओं को पूर्ण करने वाले और दूसरे मोक्ष देने वाले। जिस तीर्थ में कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष की प्राप्ति दोनों ही एक साथ हो, वह एक मात्र तीर्थ प्रयाग है। यही वह तीर्थ है जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है इसीलिए प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:" Rishi Bharadwaaj ((Student of Valmiki(Son of Varun and Grand Son of Rishi Kashyap) and Guru (Teacher ) of Rishi Garg)) was first person who given clean Chit to Dasharath (Incarnation of Rishi Kashyap) Nandan Lord Sri Ram in Prayagraj/Allahabad after Ravan Vadh and also send his pupil(Garga Gotriy Brahmana) to take part in Ashwamedh Yagya and it Bhoj. ---------Also Ravan's Killing by Shri Ram was arrangement here at Bharadwaaj Ashram by all Rishis and Brahma at Prayagraj/Allahabad when Shri Ram came here 1st time during his exile way from Ayodhya and where ever he went from here up to Lanka for kill Ravan was pre decided and was under control from here.