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Friday, November 28, 2014

विजय विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहे हमारा-------यह मेरे नर्सरी(शून्य कक्षा) से स्नातक तक के गुरु श्रद्धेय स्वर्गीय श्री भानु प्रताप मिश्रा को समर्पित है। I once again say that foreign(NRI) Ashok Chakra was broken may times since 2001, taken fake certificate from India in 2005-2006 and finally broken during the first six month of year 2008 with proof, but Indian Ashok Chakra is still safe and healthy. Thus you can imagine who is the real Super power (The Indian or the so called present World Super Power).

विजय विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहे हमारा-------यह मेरे नर्सरी(शून्य कक्षा) से स्नातक तक के गुरु श्रद्धेय स्वर्गीय श्री भानु प्रताप मिश्रा को समर्पित है।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा।
सदा शक्ति सरसाने वाला
प्रेम-सुधा बरसाने वाला
वीरों को हरसाने वाला
मातृभूमि का तन-मन सारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 1।
लाल रंग बजरंगबली का
हरा अहल इस्लाम अली का
श्वेत सभी धर्मों का टीका
एक हुआ रंग न्यारा-न्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 2।
है चरखे का चित्र सँवारा
मानो चक्र सुदर्शन प्यारा
हरे रंग का संकट सारा
है यह सच्चा भाव हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 3।
स्वतन्त्रता के भीषण रण में
लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में
काँपे शत्रु देखकर मन में
मिट जाये भय संकट सारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 4।
इस झण्डे के नीचे निर्भय
लें स्वराज्य हम अविचल निश्चय
बोलो भारत माता की जय
स्वतन्त्रता हो ध्येय हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 5।
आओ प्यारे वीरो आओ
देश-धर्म पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 6।
शान न इसकी जाने पाये
चाहें जान भले ही जाये
विश्व विजय कर के दिखलायें
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा। 7।
I once again say that foreign(NRI) Ashok Chakra was broken may times since 2001, taken fake certificate from India in 2005-2006 and finally broken during the first six month of year 2008 with proof, but Indian Ashok Chakra is still safe and healthy. Thus you can imagine who is the real Super power (The Indian or the so called present World Super Power).

I once again say that foreign(NRI) Ashok Chakra was broken may times since 2001, taken fake certificate from India in 2005-2006 and finally broken during the first six month of year 2008 with proof, but Indian Ashok Chakra is still safe and healthy. Thus you can imagine who is the real Super power (The Indian or the so called present World Super Power). We take guaranty of India Only Ashok Chakra.

I once again say that foreign(NRI) Ashok Chakra was broken may times since 2001,  taken fake certificate from India in 2005-2006 and finally broken during the first six month of year 2008 with proof, but Indian Ashok Chakra is still safe and healthy. Thus you can imagine who is the real Super power (The Indian or the so called present World Super Power). We take guaranty of India Only Ashok Chakra.

Thursday, November 27, 2014

ब्रह्मलोक स्वयं प्रयागराज है पर क्या बिडम्बना है कि यहाँ पर भी आदिशंकर:केदारेश्वर की आदि नगरी काशी(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) के ही ब्राह्मण की जरूरत पड़ती है विश्वपरिवर्तन हेतु किये जाने वाले विश्वपरिवर्तन के समुद्रमंथन रुपी महायज्ञ में ? क्या कैलाश पर महादेव शिव की छाया में निवास करने वाले गौतम, वशिष्ठ और दधीचि की तरह इस आदिशंकर:केदारेश्वर के काशी के ब्राह्मण आज तक भी विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। यह बताता है की जरूरत है प्रयागराज(प्रयागराज विश्वविद्यालय) के और अधिक सम्बर्धन और संरक्षण की।

ब्रह्मलोक स्वयं प्रयागराज है पर क्या बिडम्बना है कि यहाँ पर भी आदिशंकर:केदारेश्वर की आदि नगरी काशी(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) के ही ब्राह्मण की जरूरत पड़ती है विश्वपरिवर्तन हेतु किये जाने वाले विश्वपरिवर्तन के समुद्रमंथन रुपी महायज्ञ में ?  क्या कैलाश पर महादेव शिव की छाया में निवास करने वाले गौतम, वशिष्ठ और दधीचि की तरह इस आदिशंकर:केदारेश्वर के काशी के ब्राह्मण आज तक भी विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। यह बताता है की जरूरत है प्रयागराज(प्रयागराज विश्वविद्यालय) के और अधिक सम्बर्धन और संरक्षण की।  

अगर भगवान श्रीकृष्ण अपने को रणछोर जैसे नाम पुकारवा सकते हैं संतों, महात्माओं, भक्तों और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए और मथुरा-वृंदावन-गोकुल छोड़ द्वारिका जा सकते हैं तो मै क्या कुछ नहीं छोड़ सकता था 2001-2003 से अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर ((मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा)), परमपिता परमेस्वर((ताऊ जी प्रोफेसर प्रेमचंद पाण्डेय(शिव))) और परमगुरु परमेश्वर प्रोफेसर जोशी-श्रीवास्तव:(ब्रह्मा) हेतु मतलब सबको एक साथ में मिलाने पर परमब्रह्म हेतु।



अगर भगवान श्रीकृष्ण अपने को रणछोर जैसे नाम पुकारवा सकते हैं संतों, महात्माओं, भक्तों और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए और मथुरा-वृंदावन-गोकुल छोड़ द्वारिका जा सकते हैं तो मै क्या कुछ नहीं छोड़ सकता था 2001-2003 से अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर ((मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा)), परमपिता परमेस्वर((ताऊ जी प्रोफेसर प्रेमचंद पाण्डेय(शिव))) और परमगुरु परमेश्वर प्रोफेसर जोशी-श्रीवास्तव:(ब्रह्मा) हेतु मतलब सबको एक साथ में मिलाने पर परमब्रह्म हेतु।

रणछोर-------- तो इस प्रकार यदि कृष्ण इनके प्राण की रक्षा करते हैं और अपमानित नाम से पुकारे जाते है शक्तिशाली होने के बावजूद तो दुर्वाशा द्वारा यदुवंश के नाश होने जाने पर ये संत, महात्मा, भक्त और ब्राह्मण यदुवंशी बन गए श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित हो तो यह गर्व की बात है उनके लिए। रणछोर:---------यह नाम भगवान श्रीकृष्ण ने पाया था जो एक ढंग से शर्मिंदगी भरा है पर यह संत, महात्मा, भक्तों और ब्राह्मणों की जरासन्धि(कंश के ससुर) से रक्षा के लिए इन सभी लोगों की विनती पर मथुरा से द्वारिका चले जाने पर पाया था। वचन था की कृष्ण केवल हरा सकते थे जरासन्धि को पर मार नहीं सकते थे अतः बार बार हराने के बाद भी वह कृष्ण को मथुरा आकर लल करता था और पुनः हार जाता था युद्ध में। लेकिन इस बार उसने संतों, महात्माओं, भक्तों और ब्राह्मणों को बंधक बना लिया और कहा की कृष्ण से कहो की मथुरा छोड़ दें नहीं तो सबको साथ मृत्यु के घात उतार दूंगा। ---------तो इस प्रकार यदि कृष्ण इनके प्राण की रक्षा करते हैं और अपमानित नाम से पुकारे जाते है शक्तिशाली होने के बावजूद तो दुर्वाशा द्वारा यदुवंश के नाश होने जाने पर ये संत, महात्मा, भक्त और ब्राह्मण यदुवंशी बन गए श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित हो तो यह गर्व की बात है उनके लिए।

रणछोर-------- तो इस प्रकार यदि कृष्ण इनके प्राण की रक्षा करते हैं और अपमानित नाम से पुकारे जाते है शक्तिशाली होने के बावजूद तो दुर्वाशा द्वारा यदुवंश के नाश होने जाने पर ये संत, महात्मा, भक्त और ब्राह्मण यदुवंशी बन गए श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित हो तो यह गर्व की बात है उनके लिए।  रणछोर:---------यह नाम भगवान श्रीकृष्ण ने पाया था जो एक ढंग से शर्मिंदगी भरा है पर यह संत, महात्मा, भक्तों और ब्राह्मणों की जरासन्धि(कंश के ससुर) से रक्षा के लिए इन सभी लोगों की विनती पर मथुरा से द्वारिका चले जाने पर पाया था। वचन था की कृष्ण केवल हरा सकते थे जरासन्धि को पर मार नहीं सकते थे अतः बार बार हराने के बाद भी वह कृष्ण को मथुरा आकर लल करता था और पुनः हार जाता था युद्ध में। लेकिन इस बार उसने संतों, महात्माओं, भक्तों और ब्राह्मणों को बंधक बना लिया और कहा की कृष्ण से कहो की मथुरा छोड़ दें नहीं तो सबको साथ मृत्यु के घात उतार दूंगा। ---------तो इस प्रकार यदि कृष्ण इनके प्राण की रक्षा करते हैं और अपमानित नाम से पुकारे जाते है शक्तिशाली होने के बावजूद तो दुर्वाशा द्वारा यदुवंश के नाश होने जाने पर ये संत, महात्मा, भक्त और ब्राह्मण यदुवंशी बन गए श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित हो तो यह गर्व की बात है उनके लिए।    

प्रश्न यह क्या यह पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति वाले स्वयं हनुमान और श्रीराम-कृष्ण को भी जमीं डोज करने युक्ति सोच लिए थे? ---------------जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी कहावत हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/महावीर/केशरिनन्दन/मारुतिनंदन:पवनपुत्र को आजीवन ब्रह्मचारी शिध्ध करने के लिए कहा गया है और सत्य भी है: हनुमान जी अपने गुरु सूर्यदेव की गुरु दक्षिणा पूर्ण करने के लिए सूर्यदेव के आग्रह पर उनकी पुत्री सुवर्चला से विवाह किये थे और उनको पाताल लोक में छोड़ दिए थे जो रावण के भाई अहिरावण (तत्कालीन विश्व का सबसे बड़ा माफिया) का क्षेत्र था। भगवान श्रीराम का रावण से युद्ध के समय जब रात में सोते हुए श्रीराम और लक्षमण को अहिरावण उनको उठा ले गया तो भगवान श्रीराम और लक्षमण को सुबह युद्ध हेतु आगाह और जगाने हेतु जाने पर हनुमान को अपने पुत्र मकरध्वज से भेट होती है जो अहिरावण की कोठारी तक पहुँचने और श्रीराम और लक्षमण को उसके चंगुल से छुड़ाने की विधि बताता है पांच दीपक एक साथ बुझाने पर। वैसे सनातन हिन्दू धर्म और अन्य दीपक पूजने वालों के लिए भी मुंख से दीपक बुझाना धर्म के प्रतिकूल है तो श्रीराम और लक्षमण तो ऐसा नहीं कर सकते थे और हनुमान भी नहीं पर हनुमान पवनवेग वहा से गुजरे ही थे तो उनके तेज गति से हटी हवा से दीपक बुझ गया और इस प्रकार मकरध्वज को यह माता सुवर्चला द्वारा बताया गया था की जो ऐसा करेगा वह तुम्हारे पिता हनुमान ही होंगे। इस प्रकार हनुमान मकरध्वज के अनुसार अहिरावण को मरने में सफल होते हैं और मकरध्वज का स्वयं श्रीराम, लक्षमण और हनुमान द्वारा राज्यभिषेक कर पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति का राजा बना दिया जाता है। प्रश्न यह क्या यह पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति वाले स्वयं हनुमान और श्रीराम-कृष्ण को भी जमीं डोज करने युक्ति सोच लिए थे?

प्रश्न यह क्या यह पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति वाले स्वयं हनुमान और श्रीराम-कृष्ण को भी जमीं डोज करने  युक्ति सोच लिए थे? ---------------जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी कहावत हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/महावीर/केशरिनन्दन/मारुतिनंदन:पवनपुत्र को आजीवन ब्रह्मचारी शिध्ध करने के लिए कहा गया है और सत्य भी है: हनुमान जी अपने गुरु सूर्यदेव की गुरु दक्षिणा पूर्ण करने के लिए  सूर्यदेव के आग्रह पर उनकी पुत्री सुवर्चला से विवाह किये थे और उनको पाताल लोक में छोड़ दिए थे जो रावण के भाई अहिरावण (तत्कालीन विश्व का सबसे बड़ा माफिया) का क्षेत्र था। भगवान श्रीराम का रावण से  युद्ध के समय जब रात में सोते हुए श्रीराम और लक्षमण को अहिरावण उनको उठा ले गया तो भगवान श्रीराम और लक्षमण को सुबह युद्ध हेतु आगाह और जगाने हेतु जाने पर हनुमान को अपने पुत्र मकरध्वज से भेट होती है जो अहिरावण की कोठारी तक पहुँचने और श्रीराम और लक्षमण को उसके चंगुल से छुड़ाने की विधि बताता है पांच दीपक एक साथ बुझाने पर। वैसे सनातन हिन्दू धर्म और अन्य दीपक पूजने वालों के लिए भी मुंख से दीपक बुझाना धर्म के प्रतिकूल है तो श्रीराम और लक्षमण  तो ऐसा नहीं  कर सकते थे और हनुमान भी नहीं पर हनुमान पवनवेग वहा से गुजरे ही थे तो उनके तेज गति से हटी हवा से दीपक बुझ गया और इस प्रकार मकरध्वज को यह माता सुवर्चला द्वारा बताया गया था की जो ऐसा करेगा वह तुम्हारे पिता हनुमान ही होंगे। इस प्रकार हनुमान मकरध्वज के अनुसार अहिरावण को मरने में सफल होते हैं और मकरध्वज का स्वयं श्रीराम, लक्षमण और हनुमान द्वारा राज्यभिषेक कर पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति  का राजा बना दिया जाता है।  प्रश्न यह क्या यह पातालपुरी/वर्तमान तथाकथित विश्व महाशक्ति वाले स्वयं हनुमान और श्रीराम-कृष्ण को भी जमीं डोज करने  युक्ति सोच लिए थे?      

भगवान शिव काशी सर्व प्रथम प्रकट हुए केदारेश्वर:आदिशंकर के रूप में भगवान विष्णु अयोध्या और मथुरा में जन्म लिए श्रीराम और श्रीकृष्ण के रूप में और भगवान ब्रह्मा का ब्रह्मलोक प्रयागराज है तब भी वही बेवकूफी भरा इतिहास और किम्बदन्ती की कुलीन जातिया जिनको आर्य सामान्यतयः कहते है वे बाहर से आये है? यह कुंठा है उन लोगों का जो सबकुछ के बावजूद भारतीयों के अपने को सांस्कृतिक रूप से सर्वोच्च कहे जाने से परेशान रहते है, और मतिभ्रम और अज्ञान लोगों का भी द्वेष है ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य से जो भारतीय संताने संस्कारित रूप ही जन्म लेते ही अपनी श्रेणी रहते हुए ही आर्य का गुण रखते है।

भगवान शिव काशी सर्व प्रथम प्रकट हुए केदारेश्वर:आदिशंकर के रूप में भगवान विष्णु अयोध्या और मथुरा में जन्म लिए श्रीराम और श्रीकृष्ण  के रूप में और भगवान ब्रह्मा का ब्रह्मलोक प्रयागराज है तब भी वही बेवकूफी भरा इतिहास और किम्बदन्ती की कुलीन जातिया जिनको आर्य सामान्यतयः कहते है वे बाहर से आये है? यह कुंठा है उन लोगों का जो सबकुछ के बावजूद भारतीयों के अपने को सांस्कृतिक रूप से सर्वोच्च कहे जाने से परेशान रहते है,  और मतिभ्रम और अज्ञान लोगों का भी द्वेष है ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य से जो भारतीय संताने संस्कारित रूप  ही जन्म लेते ही अपनी श्रेणी रहते हुए ही आर्य का गुण  रखते है।  

इतना पुत्र/संतान मोह था तो कम से कम एक सार्वजनिक शादी तो कर लिए होते संस्कारित व्यक्ति की तरह नौटंकी ब्रह्मचर्य और अविवाहित रहने की क्यों किये। अगर आप की संतान आप के घर रहता तो आप अपने कुल का संस्कार दे सकते थे अगर न जन्म लेता तब मजबूर होकर मलिन बस्ती का संतान गोंद लेते या अवैध रूप से कही पलवाते। अगर अवैध रूप से मलिन बस्ती में पलवाएंगे तो संस्कार कहाँ से उच्च रहता? रही बात मुझे चेतावनी देने की तो कोई जन्म ही नहीं लिया है और न लेगा शालीनता पूर्वक हर एक का जबाब दे दिया और दूंगा भी और इसी प्रकार अपना लक्ष्य भी पूर्ण करूंगा।*******जय हिन्द, जय भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।

इतना पुत्र/संतान मोह था तो कम से कम एक सार्वजनिक शादी तो कर लिए होते संस्कारित व्यक्ति की तरह नौटंकी ब्रह्मचर्य और अविवाहित रहने की क्यों किये। अगर आप की संतान आप के घर रहता तो आप अपने कुल का संस्कार दे सकते थे अगर न जन्म लेता तब मजबूर होकर मलिन बस्ती का संतान गोंद लेते या अवैध रूप से कही पलवाते। अगर अवैध रूप से मलिन बस्ती में पलवाएंगे तो संस्कार कहाँ से उच्च रहता? रही बात मुझे चेतावनी देने की तो कोई जन्म ही नहीं लिया है और न लेगा शालीनता पूर्वक हर एक का जबाब दे दिया और दूंगा भी और इसी प्रकार अपना लक्ष्य भी पूर्ण करूंगा।*******जय हिन्द, जय भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।   

जिसके भविष्य को मेरे नेशनल इंटर कालेज पट्टिनरेन्द्रपुर, जौनपुर के गणितशास्त्र के श्रद्धेय गुरु श्री अमरजीत वर्मा (माँ कुलीन) ने निर्धारित कर दिया हो उसके भविष्य को दिशा-भ्रमित कर दिए जाने पर भी प्रोफेसर सिम्हाद्री (नरसिंघ) या प्रोफेसर अवधराम या प्रोफेसर सूर्यनारायण ठाकुर या प्रोफेसर अलख-निरंजन मंत्री कैसे बदल सकते थे?

जिसके भविष्य को मेरे नेशनल  इंटर कालेज पट्टिनरेन्द्रपुर, जौनपुर के गणितशास्त्र के श्रद्धेय गुरु श्री अमरजीत वर्मा (माँ कुलीन) ने निर्धारित कर दिया हो उसके भविष्य को दिशा-भ्रमित कर दिए जाने पर भी प्रोफेसर सिम्हाद्री (नरसिंघ) या प्रोफेसर अवधराम या प्रोफेसर सूर्यनारायण ठाकुर या प्रोफेसर अलख-निरंजन मंत्री कैसे बदल सकते थे? 

कार्य सिद्धि यन्त्र : -ॐ नमः शिवाय| सर्वदुःख निवारण यंत्र-मंत्र:-ॐ ह्रीं हंसः

कार्य सिद्धि यन्त्र : -ॐ नमः शिवाय 
सर्वदुःख निवारण यंत्र-मंत्र:-ॐ ह्रीं हंसः

भाग्योदय हेतु श्रीमहा-लक्ष्मी-साधना

भाग्योदय हेतु श्रीमहा-लक्ष्मी-साधना
भाग्योदय हेतु श्रीमहा-लक्ष्मी की तीन मास की सरल, व्यय रहित साधना है। यह साधना कभी भी ब्राह्म मुहूर्त्त पर प्रारम्भ की जा सकती है। ‘दीपावली’ जैसे महा्पर्व पर यदि यह प्रारम्भ की जाए, तो अति उत्तम।
‘साधना’ हेतु सर्व-प्रथम स्नान आदि के बाद यथा-शक्ति (कम-से-कम १०८ बार) “ॐ ह्रीं सूर्याय नमः” मन्त्र का जप करें।
फिर ‘पूहा-स्थान’ में कुल-देवताओं का पूजन कर भगवती श्रीमहा-लक्ष्मी के चित्र या मूर्त्ति का पूजन करे। पूजन में ‘कुंकुम’ महत्त्वपूर्ण है, इसे अवश्य चढ़ाए।
पूजन के पश्चात् माँ की कृपा-प्राप्ति हेतु मन-ही-मन ‘संकल्प करे। फिर विश्व-विख्यात “श्री-सूक्त” का १५ बार पाठ करे। इस प्रकार ‘तीन मास’ उपासना करे। बाद में, नित्य एक बार पाठ करे। विशेष पर्वो पर भगवती का सहस्त्र-नामावली से सांय-काल ‘कुंकुमार्चन’ करे। अनुष्ठान काल में ही अद्भुत परिणाम दिखाई देते हैं। अनुष्ठान पूरा होने पर “भाग्योदय” होता है।
।।श्री सूक्त।।
ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।
तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।
अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि।।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।
उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे।।
क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।।
गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्।।
मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।
कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे।
निच-देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले।।
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।
तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम्।।


यः शुचिः प्रयतो भूत्वा, जुहुयादाज्यमन्वहम्।
श्रियः पंच-दशर्चं च, श्री-कामः सततं जपेत्।।

सुख-शान्ति-दायक महा-लक्ष्मी महा-मन्त्र प्रयोग

सुख-शान्ति-दायक महा-लक्ष्मी महा-मन्त्र प्रयोग
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीपञ्च-दश-ऋचस्य श्री-सूक्तस्य श्रीआनन्द-कर्दम-चिक्लीतेन्दिरा-सुता ऋषयः, अनुष्टुप्-वृहति-प्रस्तार-पंक्ति-छन्दांसि, श्रीमहालक्ष्मी देवताः, श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे राज-वश्यार्थे सर्व-स्त्री-पुरुष-वश्यार्थे महा-मन्त्र-जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः-
श्रीआनन्द-कर्दम-चिक्लीतेन्दिरा-सुता ऋषिभ्यो नमः शिरसि। अनुष्टुप्-वृहति-प्रस्तार-पंक्ति-छन्दोभ्यो नमः मुखे। श्रीमहालक्ष्मी देवताय नमः हृदि। श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे राज-वश्यार्थे सर्व-स्त्री-पुरुष-वश्यार्थे महा-मन्त्र-जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कर-न्यासः-
ॐ हिरण्मय्यै अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ चन्द्रायै तर्जनीभ्यां स्वाहा। ॐ रजत-स्त्रजायै मध्यमाभ्यां वषट्। ॐ हिरण्य-स्त्रजायै अनामिकाभ्यां हुं। ॐ हिरण्य-स्त्रक्षायै कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ॐ हिरण्य-वर्णायै कर-तल-करपृष्ठाभ्यां फट्।
अंग-न्यासः-
ॐ हिरण्मय्यै नमः हृदयाय नमः। ॐ चन्द्रायै नमः शिरसे स्वाहा। ॐ रजत-स्त्रजायै नमः शिखायै वषट्। ॐ हिरण्य-स्त्रजायै नमः कवचाय हुं। ॐ हिरण्य-स्त्रक्षायै नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्। ॐ हिरण्य-वर्णायै नमः अस्त्राय फट्।
ध्यानः-
ॐ अरुण-कमल-संस्था, तद्रजः पुञ्ज-वर्णा,
कर-कमल-धृतेष्टा, भीति-युग्माम्बुजा च।
मणि-मुकुट-विचित्रालंकृता कल्प-जालैर्भवतु-
भुवन-माता सततं श्रीः श्रियै नः।।
मानस-पूजनः-
ॐ लं पृथ्वी तत्त्वात्वकं गन्धं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ हं आकाश तत्त्वात्वकं पुष्पं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ यं वायु तत्त्वात्वकं धूपं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये घ्रापयामि नमः।
ॐ रं अग्नि तत्त्वात्वकं दीपं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये दर्शयामि नमः।
ॐ वं जल तत्त्वात्वकं नैवेद्यं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये निवेदयामि नमः।
ॐ सं सर्व-तत्त्वात्वकं ताम्बूलं श्रीमहा-लक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।
।।महा-मन्त्र।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।१
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।२
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।३
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।४
दारिद्रय-दुःख-भय हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे, स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि।।५
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।६
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्ति वृद्धिं ददातु मे।।७
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।।८
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्।।९
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।१०
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।।११
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे।
निच-देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले।।१२
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।१३
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।१४
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम्।।१५
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा, जुहुयादाज्यमन्वहम्।
श्रियः पंच-दशर्चं च, श्री-कामः सततं जपेत्।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये मह्य प्रसीद-प्रसीद महा-लक्ष्मि, ते नमः।
।।स्तुति-पाठ।।
।।ॐ नमो नमः।।
पद्मानने पद्मिनि पद्म-हस्ते पद्म-प्रिये पद्म-दलायताक्षि।
विश्वे-प्रिये विष्णु-मनोनुकूले, त्वत्-पाद-पद्मं मयि सन्निधत्स्व।।
पद्मानने पद्म-उरु, पद्माक्षी पद्म-सम्भवे।
त्वन्मा भजस्व पद्माक्षि, येन सौख्यं लभाम्यहम्।।
अश्व-दायि च गो-दायि, धनदायै महा-धने।
धनं मे जुषतां देवि, सर्व-कामांश्च देहि मे।।
पुत्र-पौत्र-धन-धान्यं, हस्त्यश्वादि-गवे रथम्।
प्रजानां भवति मातः, अयुष्मन्तं करोतु माम्।।
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।
धनमिन्द्रा वृहस्पतिर्वरुणो धनमश्नुते।।
वैनतेय सोमं पिब, सोमं पिबतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो, मह्मं ददातु सोमिनि।।
न क्रोधो न च मात्सर्यं, न लोभो नाशुभा मतीः।
भवन्ती कृत-पुण्यानां, भक्तानां श्री-सूक्तं जपेत्।।
विधिः-
उक्त महा-मन्त्र के तीन पाठ नित्य करे। ‘पाठ’ के बाद कमल के श्वेत फूल, तिल, मधु, घी, शक्कर, बेल-गूदा मिलाकर बेल की लकड़ी से नित्य १०८ बार हवन करे। ऐसा ६८ दिन करे। इससे मन-वाञ्छित धन प्राप्त होता है।
हवन-मन्त्रः- “ॐ श्रीं ह्रीं महा-लक्ष्म्यै सर्वाभीष्ट सिद्धिदायै स्वाहा।”

श्री अर्जुन-कृत श्रीदुर्गा-स्तवन

श्री अर्जुन-कृत श्रीदुर्गा-स्तवन’
विनियोग – ॐ अस्य श्रीभगवती दुर्गा स्तोत्र मन्त्रस्य श्रीकृष्णार्जुन स्वरूपी नर नारायणो ऋषिः, अनुष्टुप् छन्द, श्रीदुर्गा देवता, ह्रीं बीजं, ऐं शक्ति, श्रीं कीलकं, मम अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास-
श्रीकृष्णार्जुन स्वरूपी नर नारायणो ऋषिभ्यो नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीदुर्गा देवतायै नमः हृदि, ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये, ऐं शक्त्यै नमः पादयो, श्रीं कीलकाय नमः नाभौ, मम अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कर न्यास – ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्याम नमः, ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा, ॐ ह्रूं मध्यमाभ्याम वषट्, ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां हुं, ॐ ह्रौं कनिष्ठाभ्यां वौष्ट्, ॐ ह्रः करतल करपृष्ठाभ्यां फट्।
अंग-न्यास -ॐ ह्रां हृदयाय नमः, ॐ ह्रीं शिरसें स्वाहा, ॐ ह्रूं शिखायै वषट्, ॐ ह्रैं कवचायं हुं, ॐ ह्रौं नैत्र-त्रयाय वौष्ट्, ॐ ह्रः अस्त्राय फट्।
ध्यान -
सिंहस्था शशि-शेखरा मरकत-प्रख्या चतुर्भिर्भुजैः,
शँख चक्र-धनुः-शरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता।
आमुक्तांगद-हार-कंकण-रणत्-कांची-क्वणन् नूपुरा,
दुर्गा दुर्गति-हारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्-कुण्डला।।
मानस पूजन – ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः लं पृथिव्यात्मकं गन्धं समर्पयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः हं आकाशात्मकं पुष्पं समर्पयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः यं वाय्वात्मकं धूपं घ्रापयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः रं वहृ्यात्मकं दीपं दर्शयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः सं सर्वात्मकं ताम्बूलं समर्पयामि।
श्रीअर्जुन उवाच -
नमस्ते सिद्ध-सेनानि, आर्ये मन्दर-वासिनी,
कुमारी कालि कापालि, कपिले कृष्ण-पिंगले।।1।।
भद्र-कालि! नमस्तुभ्यं, महाकालि नमोऽस्तुते।
चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं, तारिणि वर-वर्णिनि।।2।।
कात्यायनि महा-भागे, करालि विजये जये,
शिखि पिच्छ-ध्वज-धरे, नानाभरण-भूषिते।।3।।
अटूट-शूल-प्रहरणे, खड्ग-खेटक-धारिणे,
गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे, नन्द-गोप-कुलोद्भवे।।4।।
महिषासृक्-प्रिये नित्यं, कौशिकि पीत-वासिनि,
अट्टहासे कोक-मुखे, नमस्तेऽस्तु रण-प्रिये।।5।।
उमे शाकम्भरि श्वेते, कृष्णे कैटभ-नाशिनि,
हिरण्याक्षि विरूपाक्षि, सुधू्राप्ति नमोऽस्तु ते।।6।।
वेद-श्रुति-महा-पुण्ये, ब्रह्मण्ये जात-वेदसि,
जम्बू-कटक-चैत्येषु, नित्यं सन्निहितालये।।7।।
त्वं ब्रह्म-विद्यानां, महा-निद्रा च देहिनाम्।
स्कन्ध-मातर्भगवति, दुर्गे कान्तार-वासिनि।।8।।
स्वाहाकारः स्वधा चैव, कला काष्ठा सरस्वती।
सावित्री वेद-माता च, तथा वेदान्त उच्यते।।9।।
स्तुतासि त्वं महा-देवि विशुद्धेनान्तरात्मा।
जयो भवतु मे नित्यं, त्वत्-प्रसादाद् रणाजिरे।।10।।
कान्तार-भय-दुर्गेषु, भक्तानां चालयेषु च।
नित्यं वससि पाताले, युद्धे जयसि दानवान्।।11।।
त्वं जम्भिनी मोहिनी च, माया ह्रीः श्रीस्तथैव च।
सन्ध्या प्रभावती चैव, सावित्री जननी तथा।।12।।
तुष्टिः पुष्टिर्धृतिदीप्तिश्चन्द्रादित्य-विवर्धनी।
भूतिर्भूति-मतां संख्ये, वीक्ष्यसे सिद्ध-चारणैः।।13।।
।। फल-श्रुति ।।
यः इदं पठते स्तोत्रं, कल्यं उत्थाय मानवः।
यक्ष-रक्षः-पिशाचेभ्यो, न भयं विद्यते सदा।।1।।
न चापि रिपवस्तेभ्यः, सर्पाद्या ये च दंष्ट्रिणः।
न भयं विद्यते तस्य, सदा राज-कुलादपि।।2।।
विवादे जयमाप्नोति, बद्धो मुच्येत बन्धनात्।
दुर्गं तरति चावश्यं, तथा चोरैर्विमुच्यते।।3।।
संग्रामे विजयेन्नित्यं, लक्ष्मीं प्राप्न्नोति केवलाम्।
आरोग्य-बल-सम्पन्नो, जीवेद् वर्ष-शतं तथा।।4।।

श्रीरामरक्षास्तोत्र

॥ श्रीरामरक्षास्तोत्र ॥
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमंत्रस्य । बुध-कौशिक ऋषिः । अनुष्टुप् छंदः । श्रीसीतारामचंद्रो देवता । सीता शक्तिः । श्रीमद् हनुमान कीलकम् ।श्रीरामचंद्र-प्रीत्यर्थे श्रीराम-रक्षा-स्तोत्र-मन्त्र-जपे विनियोगः ॥
ऋष्यादि-न्यासः-
बुध-कौशिक ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप् छंदसे नमः मुखे । श्रीसीता-रामचंद्रो देवतायै नमः हृदि । सीता शक्तये नमः नाभौ । श्रीमद् हनुमान कीलकाय नमः पादयो ।श्रीरामचंद्र-प्रीत्यर्थे श्रीराम-रक्षा-स्तोत्र-मन्त्र-जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ॥
॥ अथ ध्यानम् ॥
ध्यायेदाजानु-बाहुं धृत-शर-धनुषं बद्ध-पद्मासनस्थम् ।
पीतं वासो वसानं नव-कमल-दल-स्पर्धि-नेत्रं प्रसन्नम् ।
वामांकारूढ-सीता-मुख-कमल-मिलल्लोचनं नीरदाभम् ।
नानालंकार-दीप्तं दधतमुरु-जटामंडनं रामचंद्रम्॥
॥इति ध्यानम्॥


॥मूल-पाठ॥
चरितं रघुनाथस्य शत-कोटि प्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां, महापातकनाशनम् ॥ १॥
ध्यात्वा नीलोत्पल-श्यामं, रामं राजीव-लोचनम् ।
जानकी-लक्ष्मणोपेतं, जटा-मुकुट-मण्डितम् ॥ २॥
सासि-तूण-धनुर्बाण-पाणिं नक्तं चरान्तकम् ।
स्व-लीलया जगत्-त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ ३॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः, पापघ्नीं सर्व-कामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु, भालं दशरथात्मजः ॥ ४॥
कौसल्येयो दृशौ पातु, विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मख-त्राता, मुखं सौमित्रि-वत्सलः ॥ ५॥
जिह्वां विद्या-निधिः पातु, कण्ठं भरत-वंदितः ।
स्कंधौ दिव्यायुधः पातु, भुजौ भग्नेश-कार्मुकः ॥ ६॥
करौ सीता-पतिः पातु, हृदयं जामदग्न्य-जित् ।
मध्यं पातु खर-ध्वंसी, नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥ ७॥
सुग्रीवेशः कटी पातु, सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
ऊरू रघूत्तमः पातु, रक्षः-कुल-विनाश-कृत् ॥ ८॥
जानुनी सेतुकृत्पातु, जंघे दशमुखान्तकः ।
पादौ बिभीषण-श्रीदः, पातु रामोऽखिलं वपुः ॥ ९॥
एतां राम-बलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स चिरायुः सुखी पुत्री, विजयी विनयी भवेत् ॥ १०॥
पाताल-भूतल-व्योम-चारिणश्छद्म-चारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तासे, रक्षितं राम-नामभिः ॥ ११॥
रामेति राम-भद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापैः भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ १२॥
जगज्जैत्रैक-मन्त्रेण राम-नाम्नाऽभिरक्षितम् ।
यः कंठे धारयेत्-तस्य करस्थाः सर्व-सिद्धयः ॥ १३॥
वज्र-पंजर-नामेदं, यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र, लभते जय-मंगलम् ॥ १४॥
आदिष्ट-वान् यथा स्वप्ने राम-रक्षामिमां हरः ।
तथा लिखित-वान् प्रातः, प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥ १५॥
आरामः कल्प-वृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रि-लोकानां, रामः श्रीमान् स नः प्रभुः ॥ १६॥
तरुणौ रूप-संपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुंडरीक-विशालाक्षौ चीर-कृष्णाजिनाम्बरौ ॥ १७॥
फल-मूलाशिनौ दान्तौ, तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ राम-लक्ष्मणौ ॥ १८॥
शरण्यौ सर्व-सत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्व-धनुष्मताम् ।
रक्षः कुल-निहंतारौ, त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥ १९॥
आत्त-सज्ज-धनुषाविशु-स्पृशावक्षयाशुग-निषंग-संगिनौ ।
रक्षणाय मम राम-लक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥ २०॥
सन्नद्धः कवची खड्गी चाप-बाण-धरो युवा ।
गच्छन्मनोरथोऽस्माकं, रामः पातु सलक्ष्मणः ॥ २१॥
रामो दाशरथिः शूरो, लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णा, कौसल्येयो रघुत्तमः ॥ २२॥
वेदान्त-वेद्यो यज्ञेशः, पुराण-पुरुषोत्तमः ।
जानकी-वल्लभः श्रीमानप्रमेय-पराक्रमः ॥ २३॥
इत्येतानि जपन्नित्यं, मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं, संप्राप्नोति न संशयः ॥ २४॥
रामं दुर्वा-दल-श्यामं, पद्माक्षं पीत-वाससम् ।
स्तुवंति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः ॥ २५॥
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम् ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेंद्रं सत्य-सन्धं दशरथ-तनयं श्यामलं शांत-मूर्तम् ।
वंदे लोकाभिरामं रघु-कुल-तिलकं राघवं रावणारिम् ॥ २६॥
रामाय राम-भद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥ २७॥
श्रीराम राम रघुनंदन राम राम । श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रण-कर्कश राम राम । श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥ २८॥
श्रीरामचंद्र-चरणौ मनसा स्मरामि । श्रीरामचंद्र-चरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचंद्र-चरणौ शिरसा नमामि । श्रीरामचंद्र-चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥ २९॥
माता रामो मत्पिता रामचंद्रः । स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्रः ।
सर्वस्वं मे रामचंद्रो दयालुः । नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥ ३०॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य, वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वंदे रघु-नंदनम् ॥ ३१॥
लोकाभिरामं रण-रंग-धीरम्, राजीव-नेत्रं रघु-वंश-नाथम् ।
कारुण्य-रूपं करुणाकरं तम्, श्रीरामचंद्रम् शरणं प्रपद्ये ॥ ३२॥
मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगम्, जितेन्द्रियं बुद्धि-मतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यम्, श्रीराम-दूतं शरणं प्रपद्ये ॥ ३३॥
कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविता-शाखां वंदे वाल्मीकि-कोकिलम् ॥ ३४॥
आपदां अपहर्तारं, दातारं सर्वसंपदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ ३५॥
भर्जनं भव-बीजानां अर्जनं सुख-सम्पदाम् ।
तर्जनं यम-दूतानां राम रामेति गर्जनम् ॥ ३६॥
रामो राज-मणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचर-चमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं पर-तरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् ।
रामे चित्त-लयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥ ३७॥
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ ३८॥
इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ॥
॥ श्रीसीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥

Wednesday, November 26, 2014

कम से कम मै कह सकता हूँ की 1957 से लेकर आज तक (मतलब चौथी पीढ़ी तक) हमारे परिवार ने किशी दलित/पिछड़ा/अल्पसंख्यक या तथा कथित दलित/पिछड़ा/अल्पसंख्यक को नहीं सताया है: इस्वर को भी अपना कार्य करने का मौक़ा चाहिए। कौन जानता है की एक जन्म पूर्व वह किसके घर जन्म लिया था और अगला जन्म किसके घर लेगा। -------- एक किसान परिवार के रूप में: मल-मूत्र से सने कचरे को खोदकर सिर रखकर खेत तक पहुँचना, घर-परिवार के स्वयं पानी निकास की नाली को साफ करना, वाह्य-मल निकास भरे खेतों में रोपाई-निराई-गुड़ाई-मेढ बढ़ाई चाहे धान, गेंहू , मक्का, तिलहन-दलहन, आलू या अन्य सब्जिया व् अन्न हो, नजदीक और मीलों दूर से धन-गेहू की खेतों से धुवाई व् मड़ाई, गर्मी के महीनों में परिक्षा गाँव में छप्पर की उठवायी यह लोगों का विशवास की मई मना नहीं कर सकता किशी के निवेदन को, गाय-भैस की चरवाई छुट्टियों में ही नहीं अन्य महीनों में भी शाम को (पर परीक्षा के दिन नजदीक न हो तब) और रविवार को छुट्टी होने पर, गाय-भैस का दुहना और गर्मी और वरसात के मौसम में बैलों वाले हल से जुताई भी करना, पशुओं का नित-दिन चारा तैयार करवाना वर्ष इसके साथ भारतीय सैन्य सेवा दल की परेड में नियमित शामिल होना और नित्य प्रतिदिन की शिक्षा में स्नातक तक श्रेष्ट प्रदर्शन(कालेज में प्रथम द्वितीय स्थान पाना और सब कक्षाओं के औसत के हिसाब से प्रथम रहना वह तब जब की पूरी शिक्षा के दौरान मैदान में बैठकी लगाना हर तरह और क्षेत्र के विद्यालय के हर कक्षा के विद्यार्थियों के बीच में और उनको अच्छे कार्य के प्रति प्रेरित करना जीवन की त्रुटियों से नाता छोड़कर)। माध्यमिक शिक्षा तक 8 + 8 की दूरी सायकिल से तय कर और स्नातक तक 15+15 किलोमीटर की दूरी सायकिल से तय कर शिक्षा ली है। -------जौनपुर के जिस क्षेत्र में रहा हूँ वहा से पता कर लीजिये की क्या मई ऐसा करता था और करता था तो किशी दलित या पिछड़े की अल्प संख्यक की चिंता मै ही क्यूँ करून जब वे स्वयं आर्थिक रूप से मुझसे आगे रहे हैं और हैं भी और मई क्यों न उनके गलत कार्यों को भी अन्य कारणों के साथ विशेष रूप से उनके पिछड़े होने को जिम्मेदार ठहराऊं? क्यों न बताऊँ की सीमा आप लोगों ने तोड़ी है और भरपाई वे श्रीकृष्ण भक्त कर रहे है जो दुर्वाशा के श्राप के बाद यदुवंशियों के नाश होने के बाद स्वयं यदुवंशी बन गए थे।

कम से कम मै  कह सकता हूँ की 1957 से लेकर आज तक (मतलब चौथी पीढ़ी तक) हमारे परिवार ने किशी  दलित/पिछड़ा/अल्पसंख्यक या तथा कथित दलित/पिछड़ा/अल्पसंख्यक को नहीं  सताया है: इस्वर को भी अपना कार्य करने का मौक़ा चाहिए।  कौन जानता है की एक जन्म पूर्व वह किसके घर जन्म लिया था और अगला जन्म किसके घर लेगा।  -------- एक किसान परिवार के रूप में:  मल-मूत्र से सने कचरे को खोदकर सिर रखकर खेत तक पहुँचना, घर-परिवार के स्वयं पानी निकास की नाली को साफ करना, वाह्य-मल निकास भरे खेतों में रोपाई-निराई-गुड़ाई-मेढ बढ़ाई  चाहे धान, गेंहू , मक्का, तिलहन-दलहन, आलू या अन्य सब्जिया व् अन्न हो, नजदीक और मीलों दूर से धन-गेहू की खेतों से धुवाई व् मड़ाई, गर्मी के महीनों में परिक्षा गाँव में छप्पर की उठवायी यह लोगों का विशवास की मई मना नहीं कर सकता किशी के निवेदन को, गाय-भैस की चरवाई छुट्टियों में ही नहीं अन्य महीनों में भी शाम को (पर परीक्षा के दिन नजदीक न हो तब) और रविवार को छुट्टी होने पर,  गाय-भैस का दुहना और गर्मी और वरसात के मौसम में बैलों वाले हल से जुताई भी करना, पशुओं का नित-दिन चारा तैयार करवाना  वर्ष इसके साथ भारतीय सैन्य सेवा दल की परेड में नियमित शामिल होना और नित्य प्रतिदिन की शिक्षा में स्नातक तक श्रेष्ट प्रदर्शन(कालेज में प्रथम  द्वितीय स्थान पाना और सब कक्षाओं के औसत के हिसाब से प्रथम रहना वह तब जब की पूरी शिक्षा के दौरान मैदान में बैठकी लगाना हर तरह और क्षेत्र के विद्यालय के हर कक्षा के विद्यार्थियों के बीच में और उनको अच्छे कार्य के प्रति प्रेरित करना जीवन की त्रुटियों से नाता छोड़कर)। माध्यमिक शिक्षा तक 8 + 8 की दूरी सायकिल से तय कर और स्नातक तक 15+15 किलोमीटर की दूरी सायकिल से तय कर शिक्षा ली है। -------जौनपुर के जिस क्षेत्र में रहा हूँ वहा से पता कर लीजिये की क्या मई ऐसा करता था और करता था तो किशी दलित या पिछड़े की  अल्प संख्यक की चिंता मै ही क्यूँ करून जब वे स्वयं आर्थिक रूप से मुझसे आगे रहे हैं और हैं भी और मई क्यों न उनके गलत कार्यों को भी अन्य कारणों के साथ विशेष रूप से उनके पिछड़े होने को जिम्मेदार ठहराऊं? क्यों न बताऊँ की सीमा आप लोगों ने तोड़ी है और भरपाई वे श्रीकृष्ण भक्त कर रहे है जो दुर्वाशा के श्राप के बाद यदुवंशियों के नाश होने के बाद स्वयं यदुवंशी बन गए थे।  

गोपा:गोवर्धन:गिरिधर अस्टमी(दीपावली के आठवे दिन: कार्तिक शुक्लपक्ष अस्टमी) को जन्म लेने वाले मुझ विवेक:त्रयम्बक:त्रिनेत्र:त्रिलोचन:सुबोध:सिद्धार्थ:राहुल (जो सब प्रकार के शुभ-अशुभ से घिरे रहने वाले शिव की एक मात्र रक्षा शक्ति है) के राशिनाम गिरिधर/गिरिधारी का व्यापक अर्थ:--- गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/राम, मदिराचल:मेरुपर्वत धारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग:फणीश (लक्षमण:बलराम), और धौलागिरी:हिमालय धारी हनुमान))

गोपा:गोवर्धन:गिरिधर अस्टमी(दीपावली के आठवे दिन: कार्तिक शुक्लपक्ष अस्टमी) को जन्म लेने वाले मुझ विवेक:त्रयम्बक:त्रिनेत्र:त्रिलोचन:सुबोध:सिद्धार्थ:राहुल (जो सब प्रकार के शुभ-अशुभ से घिरे रहने वाले शिव की एक मात्र रक्षा शक्ति है) के राशिनाम गिरिधर/गिरिधारी का व्यापक अर्थ:--- गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/राम, मदिराचल:मेरुपर्वत धारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग:फणीश (लक्षमण:बलराम), और धौलागिरी:हिमालय धारी हनुमान)) 

संसार/ब्रह्माण्ड के सार का सब कुछ ज्ञान विश्व महाशक्ति/मकरध्वज/पातालपुरी के राजा ही कर लेते, जान-समझ लेते और इस विश्व को नियंत्रित कर लेते तो उनके गुरु और पिता स्वयं हनुमान/रुद्रावतार /शंकर-सुमन/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवन-पुत्र/महावीर/बजरंग-बलि/मारुती-नंदन/केशरी-नंदन/ प्रयागराज(भारतवर्ष की शान) के नगर कोतवाल को और स्वयं उनके मूल स्वरुप शिव(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+ विश्वेश्वर: विश्वनाथ) को कष्ट क्यों करना पड़ता 14 वर्ष।

संसार/ब्रह्माण्ड के सार का सब कुछ ज्ञान विश्व महाशक्ति/मकरध्वज/पातालपुरी के राजा ही कर लेते, जान-समझ लेते और इस विश्व को नियंत्रित कर लेते तो उनके गुरु और पिता स्वयं हनुमान/रुद्रावतार /शंकर-सुमन/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवन-पुत्र/महावीर/बजरंग-बलि/मारुती-नंदन/केशरी-नंदन/ प्रयागराज(भारतवर्ष की शान) के नगर कोतवाल को और स्वयं उनके मूल स्वरुप शिव(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+ विश्वेश्वर: विश्वनाथ) को कष्ट क्यों करना पड़ता 14 वर्ष। 

यही है सत्यमेव जयते: सामाजिक सम्मान प्राप्त और संवैधानिक पद पर बैठे हर जिम्मेदार भारतीय ही नही अपितु/वरन एक सामान्य नागरिक को भी जीवन और देश के सबसे विकट छड़ में यह बताना पड़ता है की वह किस समाज/देश हित में अमुक कार्य को परिणति तक पहुंचाया और किस प्रमुख कारण वस यह किया: यही है सत्यमेव जयते।

यही है सत्यमेव जयते: सामाजिक सम्मान प्राप्त और संवैधानिक पद पर बैठे हर जिम्मेदार भारतीय ही नही अपितु/वरन एक सामान्य नागरिक को भी जीवन और देश के सबसे विकट छड़ में यह बताना पड़ता है की वह किस समाज/देश हित में अमुक कार्य को परिणति तक पहुंचाया और किस प्रमुख कारण वस यह किया: यही है सत्यमेव जयते।

Tuesday, November 25, 2014

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सम्मान पर जिन लोगों के एजेंट/अभिकर्तांओं ने को बट्टा लगाने का जाल बुनना सुरु किया था उनका उददेश्य पूर्ण होने से पूर्व उनकी शान पर सदा-सदा के लिए बट्टा लगा दिया गया 2001 में तो इसमे कोई गलत ही क्या है?(एक हिन्दू/मुस्लिम-दलित भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती से शादी इसलिए नहीं करता की वह धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य की सीमा के अंदर आ जाएगा और वह सबसे अधिक सरकारी सहायता प्राप्त समूह से हटाया जा सकेगा अपने को विवाह पूर्व सामाजिक/संवैधानिक/धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य मान लेगा तो। अगर किशी दलित ने भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती शादी किया तो निश्चित रूप से वह ईसाई-दलित है जो यह नौटंकी कर सकता है)।पंडित मदनमोहन(श्रीकृष्ण) मालवीय जी के गुरुकुल का कोई गिरिधर स्वयं में ही श्रीकृष्ण की ही सीमा में ही कैसे रह गया जब धर्म/जाती/कुल ही समान नहीं रहा वह तो शिव हो गया न सामाजिक कल्याण की ऐसी ऐसी परिस्थिति में।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सम्मान पर जिन लोगों के एजेंट/अभिकर्तांओं ने को बट्टा लगाने का जाल बुनना सुरु किया था उनका उददेश्य पूर्ण होने से पूर्व उनकी शान पर सदा-सदा के  लिए बट्टा लगा दिया गया 2001 में तो इसमे कोई गलत ही क्या है?(एक हिन्दू/मुस्लिम-दलित भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती से शादी इसलिए नहीं करता  की वह धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य की सीमा के अंदर आ जाएगा और वह सबसे अधिक सरकारी सहायता प्राप्त  समूह से हटाया जा सकेगा अपने को विवाह पूर्व सामाजिक/संवैधानिक/धार्मिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य मान लेगा तो। अगर किशी दलित ने भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय रीती शादी किया तो निश्चित रूप से वह ईसाई-दलित है जो यह नौटंकी कर सकता है)।पंडित मदनमोहन(श्रीकृष्ण) मालवीय जी के गुरुकुल का कोई गिरिधर स्वयं में ही श्रीकृष्ण की ही सीमा में ही कैसे रह गया जब धर्म/जाती/कुल ही समान नहीं रहा वह तो शिव हो गया न सामाजिक कल्याण की ऐसी ऐसी परिस्थिति में।

ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए। ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -------------------------------मनु(कश्यप ऋषि का वह अवतार जो एक आम मानव के जैसे चरित्र का हो और जिसके उपरांत अन्य सभी 6 ऋषियों का भी मानवीय करन हुआ एक गोत्र के माध्यम से और इस प्रकार कुल 7 प्रारम्भिक गोत्र हुए: मनु स्मृति में क्या-क्या जुड़ा समयानुसार जिसमें हमें विकृति नजर आती हो पर मनुस्मृति ही गलत हो ऐसा हम नहीं कह सकते है क्योंकि मई स्वयं मानता हूँ की इस प्रयागराज में चाहे जिस भी जाती(ऊँच और नीच) या पंथ के लोग मेरे विरोधियों के वशीभूत हो अपने अल्प और तुछ्य स्वार्थ हेतु मुझे इस संसार का सबसे शूद्रतम, घृणित और अधःतम व्यक्ति ही शिध्ध करने का प्रयास ही नहीं किये वरन खानदानी और व्यक्तिगत रूप से भी पागल भी घोषित किये थे मेरे शब्दों में वे दुनिया के सबसे सबसे शूद्रतम व्यक्ति हैं और हकीकत यह है की उनकी आँखों पर पट्टी बंधी थे उर वे स्वयं पागल थे जिन्होंने ब्राह्मण की लड़की को ईसाई-दलित (वह व्यक्ति या परिवार जो सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से अपने को शादी पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य न मना लिया हो और इसका प्रमाण है की वह परिवार शादी बाद अपने सरकारी दस्तावेज में अपने पत्नी/पुत्रवधु विशेष के ही नाम के आगे ही विशेष रूप से उस सरकारी सहायता पावक वर्ग विशेष के सूचक नाम को जोड़वाता है और किशी अन्य पारिवारिक सदस्य के नाम के आगे वह वर्ग विशेस का सूचक नाम नहीं होता है सरकारी दस्तावेज में:---ऐसे व्यक्ति को लोग जातिवादी/धर्मवादी नहीं कहते हैं-------) का पाँव धोवाकर उनके घर भेजवा दिया (कोई और नहीं मिला था क्या आपको और आप की आप की कन्या को) जो भारतीय शास्त्रीय शादियों के नियम के विपरीत है और जिसमे पाँव धोने का प्रश्न ही नहीं आता है और यह एक प्रकार की नौटंकी है और इस शास्त्रीय नियम के अनुसार किशी ब्रह्मण कन्या के कन्या दान में ब्राह्मण माता-पिता का किशी वर का पाँव धोने की निम्नतम सीमा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही है। अतः समाज में शूद्र व्यक्तियों की कमी नहीं हर जाती और धर्म में से पर इसका मतलब यहाँ आर्य नहीं और यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कोई नहीं रह गया यह हो ही नहीं सकता। ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -----ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए।

ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए।  ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -------------------------------मनु(कश्यप ऋषि का वह अवतार जो एक आम मानव के जैसे चरित्र का हो और जिसके उपरांत अन्य सभी 6 ऋषियों का भी मानवीय करन हुआ एक गोत्र के माध्यम से और इस प्रकार कुल 7 प्रारम्भिक गोत्र हुए: मनु स्मृति में क्या-क्या जुड़ा समयानुसार जिसमें हमें विकृति नजर आती हो पर मनुस्मृति ही गलत हो ऐसा हम नहीं कह सकते है क्योंकि मई स्वयं मानता हूँ की इस प्रयागराज में चाहे जिस भी जाती(ऊँच और नीच) या पंथ के लोग मेरे विरोधियों के वशीभूत हो अपने अल्प और तुछ्य स्वार्थ हेतु मुझे इस संसार का सबसे शूद्रतम, घृणित और अधःतम व्यक्ति ही शिध्ध करने का प्रयास ही नहीं किये वरन खानदानी और व्यक्तिगत रूप से भी पागल भी घोषित किये थे मेरे शब्दों में वे दुनिया के सबसे सबसे शूद्रतम व्यक्ति हैं और हकीकत यह है की उनकी आँखों पर पट्टी बंधी थे उर वे स्वयं पागल थे जिन्होंने ब्राह्मण की लड़की को ईसाई-दलित (वह व्यक्ति या परिवार जो सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से अपने को शादी पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य न मना लिया हो और इसका प्रमाण है की वह परिवार शादी बाद अपने सरकारी दस्तावेज में अपने पत्नी/पुत्रवधु विशेष के ही नाम के आगे ही विशेष रूप से उस सरकारी सहायता पावक वर्ग विशेष के सूचक नाम को जोड़वाता है और किशी अन्य पारिवारिक सदस्य के नाम के आगे वह वर्ग विशेस का सूचक नाम नहीं होता है सरकारी दस्तावेज में:---ऐसे व्यक्ति को लोग जातिवादी/धर्मवादी नहीं कहते हैं-------)  का पाँव धोवाकर उनके  घर भेजवा दिया (कोई और नहीं मिला था क्या आपको और आप की आप की कन्या को) जो भारतीय शास्त्रीय शादियों के नियम के विपरीत है और जिसमे पाँव धोने का प्रश्न ही नहीं आता है और यह एक प्रकार की नौटंकी है और इस शास्त्रीय नियम के अनुसार किशी ब्रह्मण कन्या के कन्या दान में ब्राह्मण माता-पिता का किशी वर का पाँव धोने की निम्नतम सीमा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही है। अतः समाज में शूद्र व्यक्तियों की कमी नहीं हर जाती और धर्म में से पर इसका मतलब यहाँ आर्य नहीं और यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य कोई नहीं रह गया यह हो ही नहीं सकता। ------------------क्योंकि मेरे जैसे ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों की कमी हो गयी है तथाकथित विश्वशक्तियों के महत्तम हित के लिए उनके अभिकर्ताओं/एजेंटो के माध्यम से बनाये गए जाल और चक्रव्यूह में फंसा लिए जाने की वजह से और तथाकथित सामाजिक न्याय के क़ानून और उसके ठीकेदारों की वजह से वर्तमान कुछ दसक से तो उसी का परिणाम है यह सामाजिक नैतिक पतन और गिरता हुआ मानवीय मूल्य और अराजकता। ---------मैंने समाज के हर वर्ग(निम्नतम से लेकर उच्चतम: कोई तथाकथित दलित/पिछड़ा सहपाठी भी मेरे जैसा शारीरिक श्रम नहीं किया है शिक्षा के दौरान और वर्तमान में कोई मुझसे कम वाह्य सामाजिक आडम्बर जैसा जीवन न कोई जीता है न आर्थिक दृस्टि से भी पीछे है: और तो और मेरे गाँव रामपुर-223225 का सबसे समृध्द व्यक्ति भी इस समय तथाकथित दलित है) को चुनौती दी है अपने कार्यों से बचपन से लेकर उच्च शिक्षा तक हर क्षेत्र में किशी भी कार्य में एक उच्च नैतिक और चारित्रिक मूल्य को संजोते हुए एक समान परिस्थिति में। -----ब्राह्मण बने रहने में और ब्राह्मण का उत्तर दायित्व निभाने में जितना आनंद है उसे हर जाती और धर्म से आज के समय में बना हुआ भारतीय शिक्षकवर्ग खुद समझ रहा होगा अपने कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में वर्तमान समय में आने वाली परेशानियानो को ध्यान से समझते हुए।  ------Ek Hindu/Muslim-Dalit Bharateey Hindu Shastriy Vidhi/Riti se Shadi isee liye nahee kartaa ki vah dharmik roop se ek Brahman/Kshtriy/Vaisy ki semaa ke andar aa jaayegaa aur vah sarkari sahayataa rukane ke naate apane ko vivah poorv Brahman/Kshatriy/Vaisya manegaa nahee| 

आजमगढ़(महानतम व्यक्तियों का समूह स्थल:श्रेष्ठतम:आर्यमगढ़) का एक और एक ही गुरु हो सकता है और वह है मुझ रामपुर-223225:आज़मगढ़ के वे दान में मिले पाँचों गाँवों के बाबा सारंगधर/राकेशधर/शशिधर/चन्द्रधर/चंद्रशेखर/सोमनाथ बस्ती जनपद) और माता जी(जौनपुर) की संतानों का मातृ पक्ष, जौनपुर(जमदग्निपुर: नामित जमदग्नि/पुत्र भृगु/पिता-परशुराम/ कुल दधीचि/त्याग और ब्राह्मणत्व के प्रतीक)। मतलब आप समझ गए होंगे की महानतम व्यक्ति भी इस त्याग और ब्राह्मणत्व गुणवाले जमदग्नि ऋषि (जो गौ माता नंदिनी/कामधेनु की पुत्री की रक्षा में अपना प्राण त्यागे थे) की जमीन जौनपुर (जमदग्निपुर) के आगे नतमस्तक होते हैं।

आजमगढ़(महानतम व्यक्तियों का समूह स्थल:श्रेष्ठतम:आर्यमगढ़)  का एक और एक ही गुरु हो सकता है और वह है मुझ रामपुर-223225:आज़मगढ़ के वे दान में मिले पाँचों गाँवों के बाबा सारंगधर/राकेशधर/शशिधर/चन्द्रधर/चंद्रशेखर/सोमनाथ बस्ती जनपद) और माता जी(जौनपुर) की संतानों का मातृ पक्ष, जौनपुर(जमदग्निपुर: नामित जमदग्नि/पुत्र भृगु/पिता-परशुराम/ कुल दधीचि/त्याग और ब्राह्मणत्व के प्रतीक)। मतलब आप समझ गए होंगे की महानतम व्यक्ति भी इस त्याग और ब्राह्मणत्व गुणवाले जमदग्नि ऋषि (जो गौ माता नंदिनी/कामधेनु की पुत्री की रक्षा में अपना प्राण त्यागे थे) की जमीन जौनपुर (जमदग्निपुर) के आगे नतमस्तक होते हैं।  

शिव(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर:विश्वनाथ) अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में चरित्रहीन और विवाहपूर्ण कौमर्यभंगी और परनारिगामी नहीं हो सकते। यही है सती (पारवती) और शिव का प्रेम।



शिव(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर:विश्वनाथ) अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में चरित्रहीन और विवाहपूर्ण कौमर्यभंगी और परनारिगामी नहीं हो सकते। यही है सती (पारवती) और शिव का प्रेम।

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। -

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। -

मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।



मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। ----------------------------------------------------------------मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।

पुनः कहता हूँ की सप्तर्षि प्रारम्भ में सात ब्रह्मर्षि थे। अतः ब्राह्मण बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है और न कोई ऐसा दिन संसार का होगा जिसमे की कम से कम एक ब्राह्मण नही होगा, एक क्षत्रिय नही होगा और एक वैश्य नहीं होगा और वे क्रमसः ब्रह्मा, महेश और विष्णु ही होंगे जो स्वयं परमब्रह्म परमपिता परमेश्वर मतलब ब्रह्म में विलीन में होंगे और जब कोई ब्रह्मा और विष्णु नहीं होगा तो सब शिव होगा। अतः यही शिव परमब्रह्म के नाभिक हैं और अगर शिव ही नहीं होगा तो केवल ब्रह्म ही होगा पर वह दृस्तिगोचर नहीं है और जो असीमित ऊर्जा का श्रोत जिससे समस्त ब्रह्माण्ड की रचना की जा सकती है। अतः ब्रह्मा, विष्णु अगर नहीं होंगे तो परमब्रह्म के नाभिक शिव ही द्रव्य होंगे जिनमे वे दोनों भी समाहित होंगे जिनको आप साकार अविनाशी कह सकते हैं अन्यथा अविनाशी तो केवल ब्रह्म है जिसमे सब सचर-अचर समाहित हो जाते है और जिससे ये निर्गत भी होते हैं श्रिष्टि नव निर्माण में। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का श्रोत सूर्य अविनाशी है तो इसी परमब्रह्म(सूर्यकांत/प्रदीप/सत्यनारायण/लक्ष्मी नारायण/रामजानकी)) की कृपा से और चन्द्र अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य की कृपा से और मानव जीवन अविनाशी है तो इसी अविनाशी सूर्य(आदित्य) की कृपा से। ----------------------------------------------------------------मुझे सीमा के अंदर रहने की सलाह देने वाले स्वयं अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहे थे और किये भी और दूसरों को प्रेरित भी किये ऐसा करने के लिए जबकि मै सनातन संस्कृति के शास्त्रीय नियमों के अंदर ही नहीं वरन जातीय/ब्राह्मण धर्म की सीमा से बाहर जीवन में न जाने का प्रयास किया न तो कभी गया और न शादी पूर्व स्वयं अपना और अन्य किशी का कौमार्य भंग किया और न ऐसा करने का घृणित प्रयास भी किया और न तो ऐसा करने को किशी को प्रोत्साहित भी किया। क्या ब्राह्मण विहीन विश्व समाज की परिकल्पना की जा सकती है जबकि ज्ञात है की प्रयागराज में सप्तर्षि प्रकृष्टा/प्राकट्य हेतु प्राक-यज्ञ के ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि जन्म से ही ब्रह्मर्षि थे? मै तो पूर्ण ब्राह्मण कुमार था पर क्या मेरे पुत्र विष्णुकांत और कृष्णकांत पूर्ण ब्राह्मण कुमार कहे जा सकते हैं जो की प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक वेतन भोगी सहायक आचार्य के पुत्र हैं? उत्तर है नही और वे न ही वे इस प्रकार वे एक कंप्यूटर रखकर किशी एक परियोजना के माध्यम से प्राप्त धन से प्रयागराज विश्वविद्यालय के शिक्षा केंद्र की स्थापना हेतु अपना थोड़ा सा भी समय देंगे और इसे अपने जीवन का लक्ष्य मान अपना जीवन अर्पित करेंगे। पर एक पूर्ण ब्राह्मण कुमार होने के नाते मैंने ऐसा किया और जब वह केंद्र प्रयागराज विश्वविद्यालय का केंद्र 2003 में बन गया नियमतः तो उसमे शोध छात्र के रूप में अपना नामांकन भी करवाया श्रेष्ठतम विभूतियों के दिशा निर्देश पर और प्रथम शोधछात्र का की अर्हता 18 सितम्बर २००७ को लिया और इसे और पूर्ण बना दिया और जिसकी छाया में अन्य कई लोग आगे बढे। पर इससे पूर्व अगर और भी परियोजना से जुड़े शोधछात्र पूर्ण ब्राह्मण कुमार थे तो भौतिकी विभाग में ही अपना नामांकन क्यों करवा लिये और वे क्यों नहीं इन केन्द्रों के प्रयागराज विश्वविद्यालय के पूर्ण केंद्र होने का इंतजार कर इन केन्द्रों में नामांकन करवाये।---मेरा मानना है की जो एक ब्राह्मण बनकर जी लिया हो और उसे ब्राह्मण धर्म की सीमा पार करने की छूट हो तो वह दुनिया के हर धर्म और जाती अनुरूप व्यवहार और कर्तव्य का निर्वहन कर सकता है। पर मै तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब धर्म और जाती के अनुरूप कर्त्तव्य और व्यवहार कर सका यह एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) मिश्रा, परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय और परमगुरु जोशी-श्रीवास्तव(ब्रह्मा) की कृपा पात्रता थी जिसमे से मै परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय प्रोफेसर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय के अनुमोदन से यहां आया था और उन्होंने मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की पूर्ण सफलता हेतु नामित किया था जो ठीक 14 वर्ष बाद 11 सितम्बर, 2014 को संवैधानिक और यम-नियम की दृस्टि से सार्वजनिक रूप से पूर्णता को प्राप्त किया मतलब अपने जन्म 11 सितम्बर, 2000 से 11 सितम्बर, 2014 तक में यह स्वाभाविक पूर्णता प्राप्त हुई न की बलपूर्वक कुछ किया गया है इसको पूर्ण होने में। मेरा कार्य और उद्देश्य पूर्ण हुआ और यह मेरे गुरुजन को समर्पित है एक गुरुदक्षिणा के रूप में और अब उनका दायित्व है की वे इसका क्या भविष्य चाहते हैं।

Monday, November 24, 2014

रावण से तो जानकी को मुक्त करा लिया गया था उस रावण को मुक्ति देने के बाद पर आप तो अपनी मृत्यु के बाद भी जानकी को नहीं लौटा सकते हैं क्योकि आप के शिष्य आप को इस लायक भी नहीं छोड़े थे क्योकि आप का दिया हुआ ज्ञान केवल ज्ञान तक ही सीमित रह गया वह शिक्षा बन ही नहीं पाया और आप उसी दिन रावण बनने योग्य भी नहीं रह गए जिस दिन से आप का शिष्य ही भारतीय सामाजिक मर्यादा की सीमा पार कर गया अपने नीच संस्कार को प्रसारित-प्रचारित कर और उसका अपने सहपाठी पर प्रयोग कर। केवल आप लोग ही नहीं वरन यह संसार ही मेरी सहनशीलता और मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, परमपिता परमेश्वर और सामाजिक परमगुरु की कृपा पर ही यथावत है जिनके आदेशों के अनुपालन में मै प्रयागराज में स्थिर रहा तो आप मेरे ऊपर अनुग्रह और अपनी कृपा लुटाने भ्रामक प्रचार मत कीजिये। मै उस दिन से केवल नाटक कर रहा हूँ जिस दिन(5-7 फरवरी, 2003) से मुझे यहाँ रोका गया है माननीयों के आदेशानुसार उनके उद्देश्य पूर्ती हेतु और जिसकी पूर्ण पूर्ती सितम्बर, 2014 में हो भी गयी है(मुझे सब कुछ समूल ज्ञात हो गया था ईस्वरीय कृपा से), रही बात यह संसार चल रहा है गुरुजन की कृपा से और उनके संज्ञान में तो मै उसका एक सजग प्रहरी की भाँती रखवाली करूंगा इसका मतलब यह नहीं की मै कागजातों पर ही विशवास रखता हूँ पर यह ब्रह्मजाल इस दुनिया को चलाने में सहयोग करने हेतु स्वीकार किया हूँ और उस सामाजिक नियम का पालन कर रहा हूँ जिसे एक सभ्य समाज की पहचान कहा जाता है अन्यथा मेरा वरिष्ठ और श्रेष्ठ जन्म ही नहीं लिया इस संसार में और ऐसा कोई कागज़ तो मेरे पास कोई पहुंचा सकने का साहस ही नहीं कर सकता था अगर कृष्णाचार्य या अन्य की भूमिका और सीमा में ही मै होता अभी तक। आदर्श श्री रामचरित का निर्वहन है मेरा क्रिया-कलाप और मै स्वयं हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर और राजेन्द्र के संविधान का स्वागत और पालन कर रहा हूँ। अगर मै ऐसे संविधान और यम-नियम का पालन नहीं करूंगा तो कौन करेगा और किससे सीख लेगा और कैसे लगेगा की यह दुनिया यम-नियम/संविधान से ही चलायमान है? वर्तमान नव सृजित और महाविनाश से बचा ली गयी इस मानवता में यह स्थिति विशेष किशी के भी सामने आ जाय तो वह क्या करे इस अनुपालन में मै स्वयं एक पात्र की भूमिका में हूँ और उसका पालन कर रहा हूँ अन्यथा सत्यमेव जयते की प्राप्ति शीघ्र कैसे होती है उस कला को मई बहुत ही अच्छी तरह से जानता हूँ और ऐसे होने से मेर 14 वर्ष की सहनशीलता और त्याग का कोई प्रतिफल स्वयं किशी को नही जाएगा। मुझे प्रयागराज से बाहर मेरी इक्षा के विरुद्ध कोई भेजने वाला जन्म ही नहीं लिया है तो यह बात ही क्यों उठती है? कारन यह की मै उस समय समुद्र मंथन या गणेश की भूमिका में था जिसमे शक्ति संचयन और शक्ति प्रयोग वैश्विक समाज के संरचनात्मक एवं नवनिर्माण के कार्य में लगी थी और इसे पता होना चाहिए लोगों को। --------विवेक के बिना ज्ञानेश्वर ब्रह्मा भी गधे के समान होते है।

रावण से तो जानकी को मुक्त करा लिया गया था उस रावण को मुक्ति देने के बाद पर आप तो अपनी मृत्यु के बाद भी जानकी को नहीं लौटा सकते हैं क्योकि आप के शिष्य आप को इस लायक भी नहीं छोड़े थे क्योकि आप का दिया हुआ ज्ञान केवल ज्ञान तक ही सीमित रह गया वह शिक्षा बन ही नहीं पाया और आप उसी दिन रावण बनने योग्य भी नहीं रह गए जिस दिन से आप का शिष्य ही भारतीय सामाजिक मर्यादा की सीमा पार कर गया अपने नीच संस्कार को प्रसारित-प्रचारित कर और उसका अपने सहपाठी पर प्रयोग कर। केवल आप लोग ही नहीं वरन यह संसार ही मेरी सहनशीलता और मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, परमपिता परमेश्वर और सामाजिक परमगुरु की कृपा पर ही यथावत है जिनके आदेशों के अनुपालन में मै प्रयागराज में स्थिर रहा तो आप मेरे ऊपर अनुग्रह और अपनी कृपा लुटाने भ्रामक प्रचार मत कीजिये। मै उस दिन से केवल नाटक कर रहा हूँ जिस दिन(5-7 फरवरी, 2003) से मुझे यहाँ रोका गया है माननीयों के आदेशानुसार उनके उद्देश्य पूर्ती हेतु और जिसकी पूर्ण पूर्ती सितम्बर, 2014 में हो भी गयी है(मुझे सब कुछ समूल ज्ञात हो गया था ईस्वरीय कृपा से), रही बात यह संसार चल रहा है गुरुजन की कृपा से और उनके संज्ञान में तो मै उसका एक सजग प्रहरी की भाँती रखवाली करूंगा इसका मतलब यह नहीं की मै कागजातों पर ही विशवास रखता हूँ पर यह ब्रह्मजाल इस दुनिया को चलाने में सहयोग करने हेतु स्वीकार किया हूँ और उस सामाजिक नियम का पालन कर रहा हूँ जिसे एक सभ्य समाज की पहचान कहा जाता है अन्यथा मेरा वरिष्ठ और श्रेष्ठ जन्म ही नहीं लिया इस संसार में और ऐसा कोई कागज़ तो मेरे पास कोई पहुंचा सकने का साहस ही नहीं कर सकता था अगर कृष्णाचार्य या अन्य की भूमिका और सीमा में ही मै होता अभी तक। आदर्श श्री रामचरित का निर्वहन है मेरा क्रिया-कलाप और मै स्वयं हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर और राजेन्द्र के संविधान का स्वागत और पालन कर रहा हूँ। अगर मै ऐसे संविधान और यम-नियम का पालन नहीं करूंगा तो कौन करेगा और किससे सीख लेगा और कैसे लगेगा की यह दुनिया यम-नियम/संविधान से ही चलायमान है? वर्तमान नव सृजित और महाविनाश से बचा ली गयी इस मानवता में यह स्थिति विशेष किशी के भी सामने आ जाय तो वह क्या करे इस अनुपालन में मै स्वयं एक पात्र की भूमिका में हूँ और उसका पालन कर रहा हूँ अन्यथा सत्यमेव जयते की प्राप्ति शीघ्र कैसे होती है उस कला को मई बहुत ही अच्छी तरह से जानता हूँ और ऐसे होने से मेर 14 वर्ष की सहनशीलता और त्याग का कोई प्रतिफल स्वयं किशी को नही जाएगा। मुझे प्रयागराज से  बाहर मेरी इक्षा के विरुद्ध कोई भेजने वाला जन्म ही नहीं लिया है तो यह बात ही क्यों उठती है? कारन यह की मै उस समय समुद्र मंथन या गणेश की भूमिका में था जिसमे शक्ति संचयन और शक्ति प्रयोग वैश्विक समाज के संरचनात्मक एवं नवनिर्माण के कार्य में लगी थी और इसे पता होना चाहिए लोगों को। --------विवेक के बिना ज्ञानेश्वर ब्रह्मा भी गधे के समान होते है।   

Thursday, November 20, 2014

हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/बनर्जी/शंकर-सुमन/रूद्र(शिवा)अवतार/पवनसुत/मारुतिनंदन/बजरंग-बलि/महावीर/केशरीनन्दन और मेघनाद/रावण-सुपुत्र के बीच सम्बन्ध गोस्वामी श्री तुलसीदास के इन्ही चौपाइयों से स्पस्ट है जो हनुमान का रावण को उत्तर और सीख है: जनेऊ मै तुम्हारी प्रभुताई, सहसबाहु सन परी लड़ाई। समर बाली सन करि जस पावा, सुनी कपि बचन बिहँसि बिहरावा। खायो फल प्रभु लागि भूखा, कपि सुभाव ते तोरेउ रूखा। सब के देख परम प्रिय स्वामी, मारइ मोहि कुमारग गामी।। जिन्ह मोहि मारा ते मई मारे, तेहि पर बांधें तनय तुम्हारे। मोहि ना कछु बड़ ही कै लाजा, कीन्ह चहु निज प्रभु कर काजा।। विनती करउ जोरि कर रावण, सुनहु मान तजि मोर सिखावन। देखउ तुम्ह निज कुलहि बिचारी, भ्रम तजि भजौ भगत भय हारी।। जाके डर अति काल डेराई, जो सुर असुर चराचर खाई। तासो बयरु कबहु नहीं कीजै, मोरे कहे जानकी दीजै।। "I am aware of your glory: you had an encounter with Sahasrabahu and won distinction in your contest with Baali" Ravana heard the words of Hanuman but laughed them away. "I eat the fruit because I felt hungry and broke the boughs as a monkey is wont to do. One's body, my master, is supremely dear to all; yet those wicked fellows would insist on belabouring me, so that I had no course left but to return their blows. Still your son (Meghanad) put me in bonds; but I am not at all ashamed of being bound, keen as I am to serve the cause of my lord. I implore you with joined palms, Ravana: give up your haughtiness and heed my advice. Think of your lineage and view things in that perspective; in any case disillusion yourself and adore Him who dispels the fear of His devotees. Never antagonize Him who is a source of terror even to Death, that devours all created beings, both animate and inanimate, gods as well as demons. And return Janaka's Daughter at my request.

हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/बनर्जी/शंकर-सुमन/रूद्र(शिवा)अवतार/पवनसुत/मारुतिनंदन/बजरंग-बलि/महावीर/केशरीनन्दन और मेघनाद/रावण-सुपुत्र के बीच सम्बन्ध गोस्वामी श्री तुलसीदास के इन्ही चौपाइयों से स्पस्ट है जो हनुमान का रावण को उत्तर और सीख है:
जनेऊ मै तुम्हारी प्रभुताई, सहसबाहु सन परी लड़ाई।
समर बाली सन करि जस पावा, सुनी कपि बचन बिहँसि बिहरावा।
खायो फल प्रभु लागि भूखा, कपि सुभाव ते तोरेउ रूखा।
सब के देख परम प्रिय स्वामी, मारइ मोहि कुमारग गामी।।
जिन्ह मोहि मारा ते मई मारे, तेहि पर बांधें तनय तुम्हारे।
मोहि ना कछु बड़ ही कै लाजा, कीन्ह चहु निज प्रभु कर काजा।।
विनती करउ जोरि कर रावण, सुनहु मान तजि मोर सिखावन।
देखउ तुम्ह निज कुलहि बिचारी, भ्रम तजि भजौ भगत भय हारी।।
जाके डर अति काल डेराई, जो सुर असुर चराचर खाई।
तासो बयरु कबहु नहीं कीजै, मोरे कहे जानकी दीजै।।

"I am aware of your glory: you had an encounter with Sahasrabahu and won
distinction in your contest with Baali" Ravana heard the words of Hanuman but laughed them away. "I eat the fruit because I felt hungry and broke the boughs as a monkey is wont to do. One's body, my master, is supremely dear to all; yet those wicked fellows would insist on belabouring me, so that I had no course left but to return their blows. Still your son (Meghanad) put me in bonds; but I am not at all ashamed of being bound, keen as I am to serve the cause of my lord. I implore you with joined palms, Ravana: give up your haughtiness and heed my advice. Think of your lineage and view things in that perspective; in any case disillusion yourself and adore Him who dispels the fear of His devotees. Never antagonize Him who is a source of terror even to Death, that devours all created beings, both animate and inanimate, gods as well as demons. And return Janaka's Daughter at my request.

Wednesday, November 19, 2014

I am waiting for the day when the present Honorable India Prime Minister will say "Jai Hind" with the words "Bharat Maan ki Jai"="Jai Bharat". ---------This will be great day for the Indian forces and their associated wings on behalf of the Prime Minister.-----------This is the alumnus of The Ram-Krishna Hostel, Banaras Hindu University (काशी हिन्दू विश्व विद्यालय) and thus itself of The Banaras Hindu University (काशी हिन्दू विश्व विद्यालय), Alumnus of Gandhi Smarak Post-Graduate College, Samaodhpur (Under Veer Bahadur Singh Purvanchal University, Jaunpur) and Alumnus of National Inter College Pattinarendrapur, Jaunpur and also Associate alumnus of Indian Institute of Science and Proud Past Alumni and Assistant Professor of the University of Allahabad; and an Ex-NCC Cadet of Army wing having Position in written in 96 UPBN/Jaunpur/Varanasi: --- Ram-Krishna was the Paramguru Parampita Parameshwar of Swami Vivekanand (Narendra Nath Datta) and Know as Ram-Krishna Paramhans.



I am waiting for the day when the present Honorable India Prime Minister will say "Jai Hind" with the words "Bharat Maan ki Jai"="Jai Bharat". ---------This will be great day for the Indian forces and their associated wings on behalf of the Prime Minister.-----------This is the alumnus of The Ram-Krishna Hostel, Banaras Hindu University (काशी हिन्दू विश्व विद्यालय) and thus itself of The Banaras Hindu University (काशी हिन्दू विश्व विद्यालय), Alumnus of Gandhi Smarak Post-Graduate College, Samaodhpur (Under Veer Bahadur Singh Purvanchal University, Jaunpur) and Alumnus of National Inter College Pattinarendrapur, Jaunpur and also Associate alumnus of Indian Institute of Science and Proud Past Alumni and Assistant Professor of the University of Allahabad; and an Ex-NCC Cadet of Army wing having Position in written in 96 UPBN/Jaunpur/Varanasi: --- Ram-Krishna was the Paramguru Parampita Parameshwar of Swami Vivekanand (Narendra Nath Datta) and Know as Ram-Krishna Paramhans.

मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

Tuesday, November 18, 2014

जिसने 11 सितम्बर, 2001 को केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय में कदम रखा था वह धर्म ही था जिसने इस श्रिस्टी को अपनी सहनशीलता, चातुर्य और पुरुषार्थ से एक बहुत बड़े महा विनाश से बचा लिया और चौदह वर्ष में जो भी थोड़ी छति हुई थी छोटे महाविनाश से उसकी भरपाई कर इस श्रिस्टी का नवसृजन कर दिया पर इस चेतावनी के साथ की सज्जन व्यक्तियों के जीवन संसार को पुनः बाहुबलियों और धनपशुओं के इसारे पर नस्ट किया गया और उनको इस संसार का शूद्रतम और अधतम व्यक्ति शिध्ध करने के लिए कपोल कल्पित अनर्गल प्रचार किया गया किशी शूद्र कर्म वाले व्यक्ति को महिमा मंडित करने के उद्देश्य से किशी निजी स्वार्थ में तो इस तरह की घटनाएं होंगी और इसके बाद इससे बड़ा महा विनाश होगा और इसे वह धर्म भी नहीं बचाएगा बल्कि उसे धर्म की रक्षा ही सिद्ध करेगा।

 जिसने 11 सितम्बर, 2001 को केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय में कदम रखा था वह धर्म ही था जिसने इस श्रिस्टी को अपनी सहनशीलता, चातुर्य और पुरुषार्थ से एक बहुत बड़े महा विनाश से बचा लिया और चौदह वर्ष में जो भी थोड़ी छति हुई थी छोटे महाविनाश से उसकी भरपाई कर इस श्रिस्टी का नवसृजन कर दिया पर इस चेतावनी के साथ की सज्जन व्यक्तियों के जीवन संसार को पुनः बाहुबलियों और धनपशुओं के इसारे पर नस्ट किया गया और उनको इस संसार का शूद्रतम और अधतम व्यक्ति शिध्ध करने के लिए कपोल कल्पित अनर्गल प्रचार किया गया किशी शूद्र कर्म वाले व्यक्ति को महिमा मंडित  करने के उद्देश्य से किशी निजी स्वार्थ में तो इस तरह की घटनाएं होंगी और इसके बाद इससे बड़ा महा विनाश होगा और इसे वह धर्म भी नहीं बचाएगा बल्कि उसे धर्म की रक्षा ही सिद्ध करेगा। 

Monday, November 17, 2014

शिव मंत्र: कर्पूरगौरं करुणावतारम् |संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् || सदा वसन्तं हृदयारविन्दे |भवं भवानि सहितं नमामि || I salute the merciful Bhava (i.e. Shiva), and his consort Sati, Adorned with the necklace of the serpent. Word to Word Meaning: Karpur Gauram: The one who is as pur/white as a campho(karpur) Karuna avatar : The personification of compassion Sansara Saram : The one who is the essence of the world Bhujagendra haram: The one with the serpent king as his garland Sada vasantam : Always residing Hridaya arvinde: In the lotus of the heart Bhavam Bhavani: Oh Lord and Goddess (Sati: wife of Shiva) Sahitam Namami: I bow to you both

शिव मंत्र:  कर्पूरगौरं करुणावतारम् |संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ||
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे |भवं भवानि सहितं नमामि ||
I salute the merciful Bhava (i.e. Shiva), and his consort Sati, Adorned with the necklace of the serpent.
Word to Word Meaning:
Karpur Gauram: The one who is as pur/white as a campho(karpur)
Karuna avatar : The personification of compassion
Sansara Saram : The one who is the essence of the world
Bhujagendra haram: The one with the serpent king as his garland
Sada vasantam : Always residing
Hridaya arvinde: In the lotus of the heart
Bhavam Bhavani: Oh Lord and Goddess (Sati: wife of Shiva)
Sahitam Namami: I bow to you both

Lord Kedareswar:Aadi Shankar:Shiva is Lord of Five Prime Elements: Panch Mahabhoot(Water, Fire, Land, Space:Atmosphere and air) of the Universe; Mahamrityunjay is sensation of life in these elements and Vishveshwar :Wishvanath is Governing body. These three power's: Kedareswar: AAdi Shankar, Mahamrityunjay and Vishweshwar:Wishvanath of the Lord Shiva is called the TRISHUL POWER of Lord Shiva with and with these Trishul power Lord Shiva first come at the Kashi/ Varanasi/ Banaras and thus he called the Aadi Dev i.e. the Mahadev Bholenath Shiv Shankar. After Kashi he migrated to Kailash for peaceful place.

Lord Kedareswar:Aadi Shankar:Shiva is Lord of Five Prime Elements: Panch Mahabhoot(Water, Fire, Land, Space:Atmosphere and air) of the Universe; Mahamrityunjay is sensation of life in these elements and Vishveshwar :Wishvanath is Governing body. These three power's: Kedareswar: AAdi Shankar, Mahamrityunjay and Vishweshwar:Wishvanath of the Lord Shiva is called the TRISHUL POWER of Lord Shiva with and with these Trishul power Lord Shiva first come at the Kashi/ Varanasi/ Banaras and thus he called the Aadi Dev i.e. the Mahadev Bholenath Shiv Shankar. After Kashi he migrated to Kailash for peaceful place.


मंगला चरण विष्णु मंत्र : मंगलम्‌‌ भगवान विष्‍‍णुः, मंगलम्‌‌ गरुड़ध्‍वज:(गरुण ध्वज वाले विष्णु)| मंगलम्‌‌ पण्‍डरीकाक्षः((पुण्डरीक(कमलवत) +अक्ष(आँख)), ‍ मंगलाय त्नोहरि|। -----------------------मंगला चरण विष्णु मंत्र --------------- मंगलम्‌‌ भगवान विष्‍‍णुः, मंगलम्‌‌ गरुड़ध्‍वज:(गरुण ध्वज वाले विष्णु)| मंगलम्‌‌ पण्‍डरीकाक्षः((पुण्डरीक(कमलवत) +अक्ष(आँख)), ‍ मंगलाय त्नोहरि|। Meaning Auspicious is Lord Vishnu, auspicious is the bearer of the Garuda flag (Lord Vishnu), auspicious is the Lotus-Eyed (Lord Vishnu), all auspiciousness is Hari (Lord Vishnu). Word by Word Translation Mangalam = Auspicious Bhagwan = Lord Vishnu = Vishnu Mangalam = Auspicious Garuda = Lord Vishnu's Vahan (Vehicle) / the Mythical Eagle Dhwaja = Flag Mangalam = Auspicious Pundareekaksham = Eyes like Lotus Mangalaya = Auspicious Tano = Form Hari = Lord Vishnu

मंगला चरण विष्णु मंत्र :  मंगलम्‌‌ भगवान विष्‍‍णुः,  मंगलम्‌‌ गरुड़ध्‍वज:(गरुण ध्वज वाले विष्णु)|
मंगलम्‌‌ पण्‍डरीकाक्षः((पुण्डरीक(कमलवत) +अक्ष(आँख)), ‍ मंगलाय त्नोहरि|। 


-----------------------मंगला चरण विष्णु मंत्र ---------------
  मंगलम्‌‌ भगवान विष्‍‍णुः,  मंगलम्‌‌ गरुड़ध्‍वज:(गरुण ध्वज वाले विष्णु)|
मंगलम्‌‌ पण्‍डरीकाक्षः((पुण्डरीक(कमलवत) +अक्ष(आँख)), ‍ मंगलाय त्नोहरि|।

Meaning

Auspicious is Lord Vishnu, auspicious is the bearer of the Garuda flag (Lord Vishnu), auspicious is the Lotus-Eyed (Lord Vishnu), all auspiciousness is Hari (Lord Vishnu).

Word by Word Translation

Mangalam = Auspicious
Bhagwan = Lord
Vishnu = Vishnu

Mangalam = Auspicious
Garuda = Lord Vishnu's Vahan (Vehicle) / the Mythical Eagle
Dhwaja = Flag

Mangalam = Auspicious
Pundareekaksham = Eyes like Lotus

Mangalaya = Auspicious
Tano = Form

Hari = Lord Vishnu

शिव मंत्र: 
कर्पूरगौरं करुणावतारम् |
संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ||
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे |
भवं भवानि सहितं नमामि ||
I salute the merciful Bhava (i.e. Shiva), and his consort Sati, Adorned with the necklace of the serpent.
Word to Word Meaning:
Karpur Gauram: The one who is as pur/white as a campho(karpur)
Karuna avatar : The personification of compassion
Sansara Saram : The one who is the essence of the world
Bhujagendra haram: The one with the serpent king as his garland
Sada vasantam : Always residing
Hridaya arvinde: In the lotus of the heart
Bhavam Bhavani: Oh Lord and Goddess (Sati: wife of Shiva)
Sahitam Namami: I bow to you both



Sunday, November 16, 2014

आर्य तो हम बहुत बार बन चुके हैं उससे ऊपर एक वैश्य(तपश्या), क्षत्रिय(बलिदान) और ब्राह्मण(त्याग) बनकर दिखलाओ या इन तीनों में से किशी एक पर स्थिर रहो।----------------सनातन हिन्दू धर्म के अनुसार विशेष भारतीय शादियाँ( शास्त्रीय:धर्म पति/पत्नी और गैर शास्त्रीय/केवल पति पत्नी कहलाने योग्य शादिया) १) शास्त्रीय शादिया सनातन हिन्दू शास्त्र के अनुसार वे शादिया जिनसे धर्म पति/पत्नी कहे जाने का अधिकार मिलता है। २) किशी भी रीती की वे शादिया केवल पति/पत्नी कहलाने योग्य बनाती हैं। शास्त्रीय शादिया हिन्दू सनातन संस्कृति में वे ही शादिया मान्य है जो ब्राह्मण-ब्राह्मण, क्षत्रिय-क्षत्रिय और वैस्य-वैश्य में श्रेश्ठतम कहलाती हैं और उससे आगे की सीमा में केवल उन जोड़ों में मान्य हैं जिनमे दोनों पक्ष शादी पूर्व सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से अपने को कम से कम एक ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैस्य मान लिए हों इन तीनों में से। -------इससे इतर कोई भी विवाह शास्त्रीय विवाह योग्य मान्य नहीं है और अगर कोई कर भी लेता है तो वह शास्त्रीय शादी नहीं बल्कि वह केवल शादी मात्र ही कहलाएगी और वे धर्म पति/पत्नी न होकर केवल पति/पत्नी हो कहला सकते हैं जिसे वाह्य आडम्बर की जरूरत नहीं होनी चाहिए और इसे दुनिया के किशी न्यायालय या धार्मिक/सार्वजनिक स्थान में भी जाकर कर आप कर सकते हैं जिसमे वे भी शादिया आती है जिसमे ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैस्य की लड़की अपने धर्म से बाहर के लडके से शादी बाद अपने धर्म से बाहर मान ली जाती है।-----------आर्य तो हम बहुत बार बन चुके हैं उससे ऊपर एक वैश्य(तपश्या), क्षत्रिय(बलिदान) और ब्राह्मण(त्याग) बनकर दिखलाओ या इन तीनों में से किशी एक पर स्थिर रहो।------जो समाज विशेष भारतीय उच्च समाज पर अपने सबसे कमजोर और भाउक अनुसांगिक श्रेणी को बहला फुसलाकर बलात्कार और ज्यादती का आरोप लगाता और ऐसे अनगिनत अनाचार के विरोधी होने का ठीकेदार था आज जब प्रामाणिक रूप से उसके स्वयं के वंसज उच्च समाज के उसी सबसे कमजोर और भाउक अनुसांगिक श्रेणी को बहला-फुसलाकर और दिवा स्वप्न दिखा कर जन्म-जन्मान्तर बलात्कार पर उत्तर आया तो वह विशेष भारतीय समाज अब किस मुख से अनाचार का विरोध करने का ठीकेदार बनने का प्रयास कर रहा है या किस मुख से हर प्रकार की सुरक्षा और संरक्षण का अधिकार मांग रहा है जब स्वयं भक्षण पर उतर आया हो उसका शहरीय/विदेशी/रोजगार-प्राप्त किया हुआ कुनबा ?

आर्य तो हम बहुत बार बन चुके हैं उससे ऊपर एक वैश्य(तपश्या), क्षत्रिय(बलिदान) और ब्राह्मण(त्याग) बनकर दिखलाओ या इन तीनों में से किशी एक पर स्थिर रहो।----------------सनातन हिन्दू धर्म के अनुसार विशेष भारतीय शादियाँ( शास्त्रीय:धर्म पति/पत्नी और गैर शास्त्रीय/केवल पति पत्नी कहलाने योग्य शादिया)
१) शास्त्रीय शादिया सनातन हिन्दू शास्त्र के अनुसार वे शादिया जिनसे धर्म पति/पत्नी कहे जाने का अधिकार मिलता है।
२) किशी भी रीती की वे शादिया केवल पति/पत्नी कहलाने योग्य बनाती हैं।

शास्त्रीय शादिया हिन्दू सनातन संस्कृति में वे ही शादिया मान्य है जो ब्राह्मण-ब्राह्मण, क्षत्रिय-क्षत्रिय और वैस्य-वैश्य में श्रेश्ठतम कहलाती हैं और उससे आगे की सीमा में केवल उन जोड़ों में मान्य हैं जिनमे दोनों पक्ष शादी पूर्व सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से अपने को कम से कम एक ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैस्य मान लिए हों इन तीनों में से। -------इससे इतर कोई भी विवाह शास्त्रीय विवाह योग्य मान्य नहीं है और अगर कोई कर भी लेता है तो वह शास्त्रीय शादी नहीं बल्कि वह केवल शादी मात्र ही कहलाएगी और वे धर्म पति/पत्नी न होकर केवल पति/पत्नी हो कहला सकते हैं जिसे वाह्य आडम्बर की जरूरत नहीं होनी चाहिए और इसे दुनिया के किशी न्यायालय या धार्मिक/सार्वजनिक स्थान में भी जाकर कर आप कर सकते हैं जिसमे वे भी शादिया आती है जिसमे ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैस्य की लड़की अपने धर्म से बाहर के लडके से शादी बाद अपने धर्म से बाहर मान ली जाती है।-----------आर्य तो हम बहुत बार बन चुके हैं उससे ऊपर एक वैश्य(तपश्या), क्षत्रिय(बलिदान) और ब्राह्मण(त्याग) बनकर दिखलाओ या इन तीनों में से किशी एक पर स्थिर रहो।------जो समाज विशेष भारतीय उच्च समाज पर अपने सबसे कमजोर और भाउक अनुसांगिक श्रेणी को बहला फुसलाकर बलात्कार और ज्यादती का आरोप लगाता और ऐसे अनगिनत अनाचार के विरोधी होने का ठीकेदार था आज जब प्रामाणिक रूप से उसके स्वयं के वंसज उच्च समाज के उसी सबसे कमजोर और भाउक अनुसांगिक श्रेणी को बहला-फुसलाकर और दिवा स्वप्न दिखा कर जन्म-जन्मान्तर बलात्कार पर उत्तर आया तो वह विशेष भारतीय समाज अब किस मुख से अनाचार का विरोध करने का ठीकेदार बनने का प्रयास कर रहा है या किस मुख से हर प्रकार की सुरक्षा और संरक्षण का अधिकार मांग रहा है जब स्वयं भक्षण पर उतर आया हो उसका शहरीय/विदेशी/रोजगार-प्राप्त किया हुआ कुनबा ?

Saturday, November 15, 2014

उत्तर प्रदेश के विवेक और अविनाश और बिहार के पुरुषोत्तम(पुरुष+उत्तम पुरुस जो उत्तम हो) और आनंद ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की धर्म ध्वजा बन पूरे विश्व समाज के सभी धर्मों के लोगों को उनके अपने धर्म का जीवन जीते हुए भी सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ दिया और यही है 14 वर्ष के इतिहास का सार जो इस विवेक:त्रयम्बक:त्रिदेव:त्रिनेत्र:सिद्धार्थ:सुबोध की तरफ से भारतीय ही नहीं विश्व की सबसे पुरानी नगरी और सबसे पुरानी धार्मिक संस्कृति की नगरी को कहानी का अक्ष:आँख:केंद्र होना है जिसनें पुनरीकाक्ष(पुण्डरीक=कमल नयन:अक्ष:आँख अर्थात विष्णु) के साथ त्रयम्बक(शिव) और उनके असंख्य रूपों को इस संसार को दिखा दिया पर यह ब्रह्मा(जोशी-श्रीवास्तव) की एक छोटी सी गलती ने जिन्होंने केदारेश्वर(आदिशंकर:आदिशिव) बनेर्जी(हनुमान) को मेघनाथ से जोड़ने का प्रयास भर किया था इस धर्म भीरु प्रयागराज/अल्लाहाबाद/त्रिवेणी की धारा पर जहां रावण, मेघनाथ और कुम्भकर्ण के पुतले जलाये जाते हों । केवल साहा अंतरिक्ष विज्ञान केंद्र नाम ही मेघनाद साहा को सम्मानित करने का एक मात्र प्रयास हो सकता है साहा नाभिकीय भौतिकी संस्थान की तरह अन्यथा जग जाहिर है की मेघनाद साहा पीठ को कोई वैज्ञानिक नहीं मिल रहा है : यह मेरा पूर्ण विष्वास है की कोई भी प्रयागवासी या देश वाशी प्रयागराज में इस केवल साहा नाम से नामित साहा अंतरिक्ष विज्ञान केंद्र का विरोध नहीं करेगा। त्रिदेव (सर्वमान्य ब्रह्मा=जोशी+श्रीवास्तव गुरुदेव जी, सर्वमान्य विष्णु=मेरे परमपिता परमगुरु परमेश्वर स्वयं मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्रा और सर्वमान्य शिव: परमपिता परमेश्वर प्रोफेसर प्रेम चंद पाण्डेय) जिन विभूतियों के द्वारा दिए गए कार्य के लिए मैंने दुनिया के इतिहास में ज्ञापित हर व्यक्तित्व और देवत्व का आचरण किया जिसके सामानांतर विश्व परिवर्तन का लक्ष्य तो पूरा हो गया पर प्रयागराज विश्वविद्यालय का एक मात्र लक्ष्य ही पूर्ण होने से शेष रह गया है| यह लक्ष्य(मेघनाद साहा अंतरिक्ष विज्ञान केंद्र) पूरा करना मेरी कुलदेवी महाकाली (महा लक्ष्मी+महा सरस्वती+महा गौरी:पारवती) के आदेशों के विरुद्ध है अतः अब उसे जोशी-श्रीवास्तव गुरुदेव जी अपने शिष्य विवेक गुप्ता के माध्यम से पूरा करवाएं जिनकी प्रोग्रामिंग मेरे अलावा केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र के सर्वररूम में वर्तमान के मेरिटोरियस लोग और अन्य लोग अपनी मेरिट और शोध ग्राफ यहां और विश्वस्तर पर बढ़ाने के लिए देखा करते थे पर मै केदारेश्वर(शिव/विश्वेश्वर/महामृत्युंजय)) बनर्जी(हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर) को समर्पित था और ऐसे में मै आज तक अपने जीवन में ऐसी प्रोग्रामिंग न देखी है न समर्थन किया है ऐसी कृत्य का एक किशी कार्यहेतु नामित एक स्वयं सेवक के लिए।--------अब मुझे पता चला है की जब मुझे भारतीय विज्ञान संस्थान में 2008 के शुरुआती दिनों में विश्व में किशी भी देश में जाने का प्रस्ताव दिया गया था रातो-रात उस देश का वीसा दिलवाने की बात कहकर तो मेरी आस्था को अपूर्ण दिखा कर केदारेश्वर बनर्जी केंद्र का हाल वही होता तो मेघनाथ साहा केंद्र का है और यह भी सदा के लिए शिक्षक विहीन केंद्र रहा जाता। वैसे मै अपने परास्नातक श्रेणी के गुरु स्वर्गीय प्रोफेसर सुबोधकांत(विवेक कुमार) बोस, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को बचन दिया हूँ की मई आजीवन संयुक्त राज्य अमेरिका नहीं जाऊंगा किशी भी स्थिति में और उसका पालन मै किया हूँ और अवश्य करूंगा।किशी भी धर्मावलम्बी का अपमान मत कीजिये और न सनातन हिन्दू धर्म का परित्याग कीजिये इसको छोटा मान क्योंकि सभी उसके ही बीज से निकले हैं।

उत्तर प्रदेश के विवेक और अविनाश और बिहार के पुरुषोत्तम(पुरुष+उत्तम पुरुस जो उत्तम हो) और आनंद ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की धर्म ध्वजा बन पूरे विश्व समाज के सभी धर्मों के लोगों को उनके अपने धर्म का जीवन जीते हुए भी सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ दिया और यही है 14 वर्ष के इतिहास का सार जो इस विवेक:त्रयम्बक:त्रिदेव:त्रिनेत्र:सिद्धार्थ:सुबोध की तरफ से भारतीय ही नहीं विश्व की सबसे पुरानी नगरी और सबसे पुरानी धार्मिक संस्कृति की नगरी को कहानी का अक्ष:आँख:केंद्र होना है जिसनें पुनरीकाक्ष(पुण्डरीक=कमल नयन:अक्ष:आँख अर्थात विष्णु) के साथ त्रयम्बक(शिव) और उनके असंख्य रूपों को इस संसार को दिखा दिया पर यह ब्रह्मा(जोशी-श्रीवास्तव) की एक छोटी सी गलती ने जिन्होंने केदारेश्वर(आदिशंकर:आदिशिव) बनेर्जी(हनुमान) को मेघनाथ से जोड़ने का प्रयास भर किया था इस धर्म भीरु प्रयागराज/अल्लाहाबाद/त्रिवेणी की धारा पर जहां रावण, मेघनाथ और कुम्भकर्ण के पुतले जलाये जाते हों । केवल साहा अंतरिक्ष विज्ञान केंद्र नाम ही मेघनाद साहा को सम्मानित करने का एक मात्र प्रयास हो सकता है साहा नाभिकीय भौतिकी संस्थान की तरह अन्यथा जग जाहिर है की मेघनाद साहा पीठ को कोई वैज्ञानिक नहीं मिल रहा है : यह मेरा पूर्ण विष्वास है की कोई भी प्रयागवासी या देश वाशी प्रयागराज में इस केवल साहा नाम से नामित साहा अंतरिक्ष विज्ञान केंद्र का विरोध नहीं करेगा।  त्रिदेव (सर्वमान्य ब्रह्मा=जोशी+श्रीवास्तव गुरुदेव जी, सर्वमान्य विष्णु=मेरे परमपिता परमगुरु परमेश्वर स्वयं मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्रा और सर्वमान्य शिव: परमपिता परमेश्वर प्रोफेसर प्रेम चंद पाण्डेय) जिन विभूतियों के द्वारा दिए गए कार्य के लिए मैंने दुनिया के इतिहास में ज्ञापित हर व्यक्तित्व और देवत्व का आचरण किया जिसके सामानांतर विश्व परिवर्तन का लक्ष्य तो पूरा हो गया पर प्रयागराज विश्वविद्यालय का एक मात्र लक्ष्य ही  पूर्ण होने से शेष रह गया है| यह लक्ष्य(मेघनाद साहा अंतरिक्ष विज्ञान केंद्र) पूरा करना मेरी कुलदेवी महाकाली (महा लक्ष्मी+महा सरस्वती+महा गौरी:पारवती) के आदेशों के विरुद्ध है अतः अब उसे जोशी-श्रीवास्तव गुरुदेव जी अपने शिष्य विवेक गुप्ता के माध्यम से पूरा करवाएं जिनकी प्रोग्रामिंग मेरे अलावा केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र के सर्वररूम में वर्तमान के मेरिटोरियस लोग और अन्य लोग अपनी मेरिट और शोध ग्राफ यहां और विश्वस्तर पर बढ़ाने के लिए देखा करते थे पर मै केदारेश्वर(शिव/विश्वेश्वर/महामृत्युंजय)) बनर्जी(हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर) को समर्पित था और ऐसे में मै आज तक अपने जीवन में ऐसी प्रोग्रामिंग न देखी है न समर्थन किया है ऐसी कृत्य का एक किशी कार्यहेतु नामित एक स्वयं सेवक के लिए।--------अब मुझे पता चला है की जब मुझे भारतीय विज्ञान संस्थान में 2008 के शुरुआती दिनों में विश्व में किशी भी देश में जाने का प्रस्ताव दिया गया था रातो-रात उस देश का वीसा दिलवाने की बात कहकर तो मेरी आस्था को अपूर्ण दिखा कर केदारेश्वर बनर्जी केंद्र का हाल वही होता तो मेघनाथ साहा केंद्र का है और यह भी सदा के लिए शिक्षक विहीन केंद्र रहा जाता। वैसे मै अपने परास्नातक श्रेणी के गुरु स्वर्गीय प्रोफेसर सुबोधकांत(विवेक कुमार) बोस, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को बचन दिया हूँ की मई आजीवन संयुक्त राज्य अमेरिका नहीं जाऊंगा किशी भी स्थिति में और उसका पालन मै किया हूँ और अवश्य करूंगा।किशी भी धर्मावलम्बी का अपमान मत कीजिये और न सनातन हिन्दू धर्म का परित्याग कीजिये इसको छोटा मान क्योंकि सभी उसके ही बीज से निकले हैं।

It was 11 September, 2000 when I came Prayagraj/Allahabad ((Shri Tripathi Ji's(origin from Pratapgarh name is being hidden for security purpose: Administrative and defense job holder family) room in Salaory, Allahabad)) for search of Govt. service taking education from Banaras Hindu University having Master degree in Physics(Nuclear); and it was 11 September, 2001 when I joined the Kedareswar(K.) Banerjee Centre, University of Allahabad as a Research Assistant (Not as JRF) and thus as an temporary time bound service, after two year which converted to SRF (any how treating previous as JRF)(I got permanent Job in this Centre/University on 29th October, 2009 but real time is early minutes of 30th October, 2009). Therefore, I can say that I am working for Govt. of India continuously since 11 September, 2001 and have better stability with respect to the person having job in private sector in any part of the world.

It was 11 September, 2000 when I came Prayagraj/Allahabad ((Shri Tripathi Ji's(origin from Pratapgarh name is being hidden for security purpose: Administrative and defense job holder family) room in Salaory, Allahabad)) for search of Govt. service taking education from Banaras Hindu University having Master degree in Physics(Nuclear); and it was 11 September, 2001 when I joined the Kedareswar(K.) Banerjee Centre, University of Allahabad as a Research Assistant (Not as JRF) and thus as an temporary time bound service, after two year which converted to SRF (any how treating previous as JRF)(I got permanent Job in this Centre/University on 29th October, 2009 but real time is early minutes of 30th October, 2009).  Therefore, I can say that I am working for Govt. of India continuously since 11 September, 2001 and have better stability with respect to the person having job in private sector in any part of the world. 

Friday, November 14, 2014

Anand (Happiness) is inherent in man and is not due to external causes means there is no attachment with external causes but Harsh(Happiness:Materialistic World related but not spiritual) causes due to the external causes and there is involvement of the attachment: Thus Anand comes under the spiritual as well as the materialistic world both but Harsh has only scope in the Materialistic World.

Anand (Happiness) is inherent in man and is not due to external causes means there is no attachment with external causes but Harsh(Happiness:Materialistic World related but not spiritual) causes due to the external causes and there is involvement of the attachment: Thus Anand comes under the spiritual as well as the materialistic world both but Harsh has only scope in the Materialistic World. 

 Ananda means happiness or bliss. Literally, 'aa' means from all sides and 'nanda' means happiness or joy. Thus literally speaking, 'ananda' means joy from all sides.  In spiritual context, ananda is an eternal aspect of Brahm which we experience when we are united with Him. When there is no distinction between the knower and the knowing, the object and the subject, one becomes
immersed in immense bliss. The scriptures describe Brahm as ananda itself
(anandobrahma). In the material world ananda is pure joy attained
through the fulfillment of desires or some material gains. In the spiritual world it is the pure and unqualified bliss attained through union with the Highest Self.
 
 How to experience ananda or happiness? Happiness, ananda, arises from peace, equanimity, Ananda, the State of Bliss or Happiness, stability, detachment, renunciation, absence of desires, contentment, devotion, love, and liberation. Life is full of suffering. Yet for those who are caught in the phenomenal world, it is possible to experience happiness by the above means.
Ananda is a state of freedom. From freedom comes supreme bliss. Hence the best means to experience ananda or happiness is liberation, mukti.

When the need or desire for happiness is Brahm absent, Know about Brahm, the Highest and Supreme God of happiness, happiness becomes an integral part of your consciousness. This is the secret of happiness or bliss
the yogis understand. Therefore they cultivate detachment and strive for their liberation. 

Introduction to Hinduism
Know the richness, diversity, history and traditions of Hinduism, the oldest living religion of the world Hindu scriptures describe God as a combination of sat
(truth), chit (consciousness) and ananda (pure bliss). In their ordinary consciousness human beings are incapable of experiencing pure ananda because of the interference of the mind and the senses and the attachment of the ego with the sense objects. The Bhagavadgita tells us from the activity of the senses arises attachment and from attachment comes anger and from anger comes delusion and from delusion suffering, which is opposite of ananda. The purpose of religious and spiritual activity is to turn the mind away from the sensory objects and inwards so that both the mind and the ego can be dissolved in an endless state of ananda or bliss.
 

 Happiness in different traditions Hinduism, Jainism and Buddhism recognize suffering as an inseparable aspect of human life. However, each religion attempts to address it in its own way by suggesting distinct solutions. Whatever
may the means they prescribe, the goal of all these religions is always the same, release from the cycle of births and deaths, disease, attachment and suffering.
Buddhsim does not describe the state of liberation as pure bliss. But Jainism and Hinduism do. According to them, the natural state of soul is pure bliss, which become veiled by the activity of the senses and the development of a physical personality. When the soul regains its pure state of joy it overcomes its limitations and becomes one with itself or with the highest Brahman.