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Wednesday, December 31, 2014

With a great hope of peaceful, powerful and progressive India and World; I wish you a very Happy New Year.

With a great hope of peaceful, powerful and progressive India and World; I wish you a very Happy New Year.

सम्मान पूर्ण जीवन में अतिसह दुःख भी सहज लगता है पर अकारण अपमान पूर्ण जीवन में स्वर्ग का सुख भी कस्टकारी होता है और यदि यह दुःख मतलब अकारण अपमानजनक जीवन जिस सर्वजन के लिए जिया जाय अगर वही अकारण आप को अपमानित करें तो आप को कैसी अनुभूति होगी और आप का धैर्य कब तक बना रहेगा ? इस सम्बन्ध में पूंछता हूँ की क्या आप का धैर्य 14 वर्ष का जीवन आसानी से जीने की इजाजत देगा? मुझे नहीं लगता की दुनिया का कोई पद और कोई जीव-निर्जीव प्यारी वस्तु आप को सहारा दे पाएगी ऐसी स्थिति में जीने के लिए अपितु दुनिया के लिए अपने से जुड़े हर वस्तु के त्याग की भावना और सृजनात्मक विचार ही आप को ऐसे जीवन जीने की शक्ति दे सकते हैं और आम व्यक्ति के रूप में अपना भी निजी जीवन जीने की प्रेरणा दे सकते है।

सम्मान पूर्ण जीवन में अतिसह दुःख भी सहज लगता है पर अकारण अपमान पूर्ण जीवन में स्वर्ग का सुख भी कस्टकारी होता है और यदि यह दुःख मतलब अकारण अपमानजनक जीवन जिस सर्वजन के लिए जिया जाय अगर वही अकारण आप को अपमानित करें तो आप को कैसी अनुभूति होगी और आप का धैर्य कब तक बना रहेगा ? इस सम्बन्ध में पूंछता हूँ की क्या आप का धैर्य 14 वर्ष का जीवन आसानी से जीने की इजाजत देगा? मुझे नहीं लगता की दुनिया का कोई पद और कोई जीव-निर्जीव प्यारी वस्तु आप को सहारा दे पाएगी ऐसी स्थिति में जीने के लिए अपितु दुनिया के लिए अपने से जुड़े हर वस्तु के त्याग की भावना और सृजनात्मक विचार ही आप को ऐसे जीवन जीने की शक्ति दे सकते हैं और आम व्यक्ति के रूप में अपना भी निजी जीवन जीने की प्रेरणा दे सकते है। 

Tuesday, December 30, 2014

तलवार और तिकड़म मतलब बाहुबल, धनबल और कुमार्गी बुद्धि(कुबुद्धि) से सत्य नहीं बदलता है: मार्च, 2000 से लेकर दिसंबर, 2014 तक के सामूहिक सहयोग और अप्रैल, 2014 से लेकर दिसम्बर, 2014 तक का एकल प्रयास श्रद्धा और विशवास के साथ केदारेश्वर:आदिशंकर:आद्यशंकर को समर्पित है (शिव के तीन मूल स्वरुप केदारेश्वर, महामृत्युंजय और विश्वेश्वर/विश्वनाथ में भी केदारेश्वर ही आदिशिव:आदिशंकर है जो सर्वप्रथम इस सृस्टि में काशी में प्रकट हुए थे और यही शिव-शंकर द्वितीय स्थान हिमालय:हिमगिरि के कैलाश पर्वत को धारण किये थे जिससे एक प्रकार से ये भी गिरिधर हुए धौलागिरी धारी, हनुमान; गोवर्धन धारी, श्रीकृष्ण; धरणीधर/शेषनाग; और मेरु पर्वत/मदिराचल धारी, कुर्मावतारी विष्णु की तरह )। जो अवसर मिलने पर भी इसमें शामिल न हो सका मतलब प्रथम न हो सका वह वरिष्ठ पद पर जाने पर भी वरिष्ठ पद पर भी द्वितीय रहेगा इसमे मै कुछ नहीं कर सकता और न इसमे मेरा कोई दोस और विद्वेष या पक्षपात नहीं है वल्कि यह नियति है(वह न्याति जिसने ऐसा किया और जो मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय को यह आभास दिलाया था की मै सतयुग में एक सूर्यवंशीय ग्वाला था जो राजा केदार को केदारनाथ और पशुपतिनाथ बनाने का कारक हुआ था और जिसके मूल में राजा केदार में शिवभक्ति और शिवशक्ति थी जिसकी मदांधता और दुरुपयोग शामिल था और जो शिवभक्त को मुक्ति दे सकता है वह शिवांश ही हो सकता है तो जाहिर सी बात है की वह सूर्यवंशीय ग्वाला भी शिवांश ही रहा होगा और वह मै ही था ऐसा नियति ने ऐसा इंगित किया है और इस युग में शिव के कार्य में आया यह मेरा गौरव है) :

तलवार और तिकड़म मतलब बाहुबल, धनबल और कुमार्गी बुद्धि(कुबुद्धि) से सत्य नहीं बदलता है: मार्च, 2000 से लेकर दिसंबर, 2014 तक के सामूहिक सहयोग और अप्रैल, 2014 से लेकर दिसम्बर, 2014 तक का एकल प्रयास श्रद्धा और विशवास के साथ केदारेश्वर:आदिशंकर:आद्यशंकर को समर्पित है (शिव के तीन मूल स्वरुप केदारेश्वर, महामृत्युंजय और विश्वेश्वर/विश्वनाथ में भी केदारेश्वर ही आदिशिव:आदिशंकर है जो सर्वप्रथम इस सृस्टि में काशी में प्रकट हुए थे और यही शिव-शंकर द्वितीय स्थान हिमालय:हिमगिरि के कैलाश पर्वत को धारण किये थे जिससे एक प्रकार से ये भी गिरिधर हुए धौलागिरी धारी, हनुमान; गोवर्धन धारी, श्रीकृष्ण; धरणीधर/शेषनाग; और मेरु पर्वत/मदिराचल धारी, कुर्मावतारी विष्णु की तरह )। जो अवसर मिलने पर भी इसमें शामिल न हो सका मतलब प्रथम न हो सका वह वरिष्ठ पद पर जाने पर भी वरिष्ठ पद पर भी द्वितीय रहेगा इसमे मै कुछ नहीं कर सकता और न इसमे मेरा कोई दोस और विद्वेष या पक्षपात नहीं है वल्कि यह नियति है(वह न्याति जिसने ऐसा किया और जो मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय को यह आभास दिलाया था की मै सतयुग में एक सूर्यवंशीय ग्वाला था जो राजा केदार को केदारनाथ और पशुपतिनाथ बनाने का कारक हुआ था और जिसके मूल में राजा केदार में शिवभक्ति और शिवशक्ति थी जिसकी मदांधता और दुरुपयोग शामिल था और जो शिवभक्त को मुक्ति दे सकता है वह शिवांश ही हो सकता है तो जाहिर सी बात है की वह सूर्यवंशीय ग्वाला भी शिवांश ही रहा होगा और वह मै ही था ऐसा नियति ने ऐसा इंगित किया है और इस युग में शिव के कार्य में आया यह मेरा गौरव है) :
http://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies
https://archive.today/H6mc5
https://profiles.google.com/vkpandey75/about?hl=en
https://archive.today/4HDpi


Sunday, December 28, 2014

अतः अगर मेरे अभी अल्प समय पूर्व (इसके एक क्रम पूर्व) पोस्ट/स्क्रैप/लिखित तर्क सत्य है तो मै सत्य हूँ और इस सरस्वती के उद्गम से निकली हर बात सत्य है और जो मेरे ब्लॉग "Vivekanand and Moderm Tradition" में लिपि बद्ध है हर बात सत्य है। अब मुझे कुछ और नहीं कहना।



अतः अगर मेरे अभी अल्प समय पूर्व (इसके एक क्रम पूर्व) पोस्ट/स्क्रैप/लिखित तर्क सत्य है तो मै सत्य हूँ और इस सरस्वती के उद्गम से निकली हर बात सत्य है और जो मेरे ब्लॉग "Vivekanand and Moderm Tradition" में लिपि बद्ध है हर बात सत्य है। अब मुझे कुछ और नहीं कहना।

मुस्लिम स्वयं ईसाइयत का बड़ा भाई कैसे नहीं हुआ जब बड़े भाई (मुस्लिम मूल के बड़े भाई) को अपनी सुरक्षा में लगा दिया है। -पातालपुर के नरेश/नरेंद्र, सुवर्चला/हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर पुत्र, मकरध्वज; और रावण के विश्व-व्यापी माफिया भाई, अहिरावण 2008 के प्रथम छमाही के समीप में सप्रमाण अशोकचक्र तोडकर 2008/2009 में मेरा सामना करने के लिए हुसैन(मुस्लिम मूल) नामधारी रुपी नैया की सवारी कर लिए है तब से आज तक, देखते है यह नाव कब तक समुद्र में तैरती रहेगी विना हार और गलती स्वीकारे।-------मुस्लिम स्वयं ईसाइयत का बड़ा भाई कैसे नहीं हुआ जब बड़े भाई (मुस्लिम मूल के बड़े भाई) को अपनी सुरक्षा में लगा दिया है।



मुस्लिम स्वयं ईसाइयत का बड़ा भाई कैसे नहीं हुआ जब बड़े भाई (मुस्लिम मूल के बड़े भाई) को अपनी सुरक्षा में लगा दिया है। -पातालपुर के नरेश/नरेंद्र, सुवर्चला/हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर पुत्र, मकरध्वज; और रावण के विश्व-व्यापी माफिया भाई, अहिरावण 2008 के प्रथम छमाही के समीप में सप्रमाण अशोकचक्र तोडकर 2008/2009 में मेरा सामना करने के लिए हुसैन(मुस्लिम मूल) नामधारी रुपी नैया की सवारी कर लिए है तब से आज तक, देखते है यह नाव कब तक समुद्र में तैरती रहेगी विना हार और गलती स्वीकारे।-------मुस्लिम स्वयं ईसाइयत का बड़ा भाई कैसे नहीं हुआ जब बड़े भाई (मुस्लिम मूल के बड़े भाई) को अपनी सुरक्षा में लगा दिया है। 

पातालपुर के नरेश/नरेंद्र, सुवर्चला/हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर पुत्र मकरध्वज और रावण के विश्व-व्यापी माफिया भाई, अहिरावण 2008 के प्रथम छमाही के समीप में सप्रमाण अशोकचक्र तोडकर 2008/2009 में मेरा सामना करने के लिए हुसैन(मुस्लिम मूल) नामधारी रुपी नैया की सवारी कर लिए है तब से आज तक देखते है यह नाव कब तक समुद्र में तैरती रहेगी विना हार और गलती स्वीकारे।

पातालपुर के नरेश/नरेंद्र, सुवर्चला/हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर पुत्र मकरध्वज और रावण के विश्व-व्यापी माफिया भाई, अहिरावण 2008 के प्रथम छमाही के समीप में सप्रमाण अशोकचक्र तोडकर 2008/2009  में मेरा सामना करने के लिए हुसैन(मुस्लिम मूल) नामधारी रुपी नैया की सवारी कर लिए है तब से आज तक देखते है यह नाव कब तक समुद्र में तैरती रहेगी विना हार और गलती स्वीकारे। 

Friday, December 26, 2014

अगस्त, 2008 में भारतीय विज्ञानं संस्थान में पूर्व के सम्बन्ध में कहा था की डॉन(भगवा) भाई अशोकचक्र टूट गया क्योंकि प्रयागराज/अल्लाहआबाद के अहमद बंधू रियल स्टेट के धंधे में पड़ गए हैं और धनपशुओं की होड़ में आकर वे अपने वास्तविक कार्य से कुछ हद तक विरत हो गए है और इसप्रकार वे अशोक चक्र को टूटने से नहीं बचा पा रहे हैं इसलिए मुझे एक स्थायित्व देकर प्रयागराज/अल्लाहआबाद बुला लीजिये देखिये की अशोक चक्र पर कोई हाँथ नहीं लगा सकेगा।



अगस्त, 2008 में भारतीय विज्ञानं संस्थान में पूर्व के सम्बन्ध में कहा था की डॉन(भगवा) भाई अशोकचक्र टूट गया क्योंकि प्रयागराज/अल्लाहआबाद के अहमद बंधू रियल स्टेट के धंधे में पड़ गए हैं और धनपशुओं की होड़ में आकर वे अपने वास्तविक कार्य से कुछ हद तक विरत हो गए है और इसप्रकार वे अशोक चक्र को टूटने से नहीं बचा पा रहे हैं इसलिए मुझे एक स्थायित्व देकर प्रयागराज/अल्लाहआबाद बुला लीजिये देखिये की अशोक चक्र पर कोई हाँथ नहीं लगा सकेगा।

आह्वान किया था डॉन(भगवा) और बबलू(तिरंगा:तिरंगा के तीनों रंगों को मिलाने पर यह भगवा में स्वयं समाहित हो जाता है) भाई से की ख़त्म कर दो ऐसे सभी तकनिकी और विज्ञान संस्थानों को जहा ऐसी देवियाँ और देवता जन्म ले रहे है जो देश और संसद का क्रय-विक्रय कर रहे हैं और जो संस्थान वास्तविक राम-कृष्ण और सीता-राधा को शेष नहीं बचने दे रहे हों जिनमे मानवीय मूल्य और भारतीय संस्कार जीवित हों।---------फरवरी , 2008 में भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु में जब आप को बिलगेट्स में एक सिंधिया क्षत्रिय-वैश्य नजर आ रहा था और उसकी थैली हिला देने से भारतीय संसद का क्रय-विक्रय हो रहा था और हम आप को नजर नहीं आ रहे थे तो यदि ऐसे ही राम-कृष्ण और सीता और राधा जन्म ले रहे थे ऐसे विज्ञान और तकनीकी संस्थान से तो इसी लिए मई ऑरकुट पर लिखा था की मै अपने गाँव रामपुर जाकर दो बैल खरीदूंगा और हल जोतूंगा(जैसा की मुझे बैलों से हल जोतना आता भी है) उनसे लेकिन यह तकनिकी और विज्ञान हमें नहीं चाहिए और--------------- आह्वान किया था डॉन और बबलू भाई से की ख़त्म कर दो ऐसे सभी तकनिकी और विज्ञान संस्थानों को जहा ऐसी देवियाँ और देवता जन्म ले रहे है जो देश और संसद का क्रय-विक्रय कर रहे हैं और जो संस्थान वास्तविक राम-कृष्ण और सीता-राधा को शेष नहीं बचने दे रहे हों जिनमे मानवीय मूल्य और भारतीय संस्कार जीवित हों।


http://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur
http://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur
http://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

https://archive.today/H6mc5#selection-319.16-319.23



आह्वान किया था डॉन(भगवा) और बबलू(तिरंगा:तिरंगा के तीनों रंगों को मिलाने पर यह भगवा में स्वयं समाहित हो जाता है) भाई से की ख़त्म कर दो ऐसे सभी तकनिकी और विज्ञान संस्थानों को जहा ऐसी देवियाँ और देवता जन्म ले रहे है जो देश और संसद का क्रय-विक्रय कर रहे हैं और जो संस्थान वास्तविक राम-कृष्ण और सीता-राधा को शेष नहीं बचने दे रहे हों जिनमे मानवीय मूल्य और भारतीय संस्कार जीवित हों।---------फरवरी , 2008 में भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु में जब आप को बिलगेट्स में एक सिंधिया क्षत्रिय-वैश्य नजर आ रहा था और उसकी थैली हिला देने से भारतीय संसद का क्रय-विक्रय हो रहा था और हम आप को नजर नहीं आ रहे थे तो यदि ऐसे ही राम-कृष्ण और सीता और राधा जन्म ले रहे थे ऐसे विज्ञान और तकनीकी संस्थान से तो इसी लिए मई ऑरकुट पर लिखा था की मै अपने गाँव रामपुर जाकर दो बैल खरीदूंगा और हल जोतूंगा(जैसा की मुझे बैलों से हल जोतना आता भी है) उनसे लेकिन यह तकनिकी और विज्ञान हमें नहीं चाहिए और--------------- आह्वान किया था डॉन और बबलू भाई से की ख़त्म कर दो ऐसे सभी तकनिकी और विज्ञान संस्थानों को जहा ऐसी देवियाँ और देवता जन्म ले रहे है जो देश और संसद का क्रय-विक्रय कर रहे हैं और जो संस्थान वास्तविक राम-कृष्ण और सीता-राधा को शेष नहीं बचने दे रहे हों जिनमे मानवीय मूल्य और भारतीय संस्कार जीवित हों।

Wednesday, December 24, 2014

यह तो केवल आँशु का प्रभाव था की दुनिया थर्रा गयी।--------एक पूर्ण मुसलमान (मुसल्लम+ईमान= पूर्ण +ईमान= सम्पूर्ण ईमानदार ) के रूप में आप किशी को बर्दास्त भी न कर सके और एक दलित और ईसाई (यद्द्यपि यह आभासी स्वरुप ही था) के रूप में में आप उसे देखना नहीं चाहते थे तो कम से कम इतनी कृपा कीजिये की एक सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ही रहने दीजिये उसे क्योंकि वह यही था तभी तो एक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य, मुस्लमान और दलित और ईसाई की अवस्था में होते हुए भी सब कुछ हो जाने के बाद भी एक सनातन ब्राह्मण/हिन्दू बना रहा। और यदि वह सनातन कश्यप गोत्रीय उच्चतम आचरण न करता तो उसके विशेष वंसज सूर्यवंशीय, चन्द्र वंशीय, सवर्ण गोत्रीय, नाग-वंशीय, किन्नर वंशीय और गणेश, कार्तिकेय और त्रिदेवों के अलावा अन्य सभी देव तथा उसी कश्यप के पुत्र वरुण के पुत्र वाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज गोत्रीय सहित भारद्वाज के शिष्य गर्ग गोत्रीय भी किसका अनुसरण करते भविष्य में इस विश्व समुदाय में अपने गौरव और मर्यादा की रक्षा हेतु।--- यह तो केवल आँशु का प्रभाव था की दुनिया थर्रा गयी।

यह तो केवल आँशु का प्रभाव था की दुनिया थर्रा गयी।--------एक पूर्ण मुसलमान (मुसल्लम+ईमान= पूर्ण +ईमान= सम्पूर्ण ईमानदार ) के रूप में आप किशी को बर्दास्त भी न कर सके और एक दलित और ईसाई (यद्द्यपि यह आभासी स्वरुप ही था) के रूप में में आप उसे देखना नहीं चाहते थे तो कम से कम इतनी कृपा कीजिये की एक सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ही रहने दीजिये उसे क्योंकि वह यही था तभी तो एक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य, मुस्लमान और दलित और ईसाई की अवस्था में होते हुए भी सब कुछ हो जाने के बाद भी एक सनातन ब्राह्मण/हिन्दू बना रहा। और यदि वह सनातन कश्यप गोत्रीय उच्चतम आचरण न करता तो उसके विशेष वंसज सूर्यवंशीय, चन्द्र वंशीय, सवर्ण गोत्रीय, नाग-वंशीय, किन्नर वंशीय और गणेश, कार्तिकेय और त्रिदेवों के अलावा अन्य सभी देव तथा उसी कश्यप के पुत्र वरुण के पुत्र वाल्मीकि के शिष्य भारद्वाज गोत्रीय सहित भारद्वाज के शिष्य गर्ग गोत्रीय भी किसका अनुसरण करते भविष्य में इस विश्व समुदाय में अपने गौरव और मर्यादा की रक्षा हेतु।--- यह तो केवल आँशु का प्रभाव था की दुनिया थर्रा गयी।

Tuesday, December 23, 2014

जिनके दिमाग में एन्टी-सवर्ण या एन्टी-ब्राह्मण का भूत सवार रहता है उनको मै बता देना चाहता हूँ कि जितने भी युग हुए हैं उनमे लडकिया ब्रह्मा के पुत्र राजा दक्ष कि ही पुत्री रही हैं चाहे वह राजा दक्षप्रजापति रहे हों या या अन्य कोई राजा दक्ष। तो मेरे मित्र ब्रह्मा के ये पुत्र राजा दक्ष कि पुत्रिया ब्राह्मण ही रही है और आप को यह भी पता होगा कि बिना स्त्री के या पत्नी के या प्रकृति के कोई श्रीस्ती नहीं चलती है तो कम से कम सबकी माँ इन्ही ब्राह्मण लड़कियों कि पुत्री होंगी। राजा दक्षा प्रजापति की विख्यात पुत्रियों कि जोड़ी सती (पारवती):महादेव शिव और अदिति:कश्यप है। और दक्ष कि अन्य सभी पुत्रियों से भी कश्यप ऋषि कि शादी हुई और उनकी जो पुत्रिया हुई उनसे अन्य ऋषियों कि शादी हुई। और इस प्रकार ऋषि परम्परा से मानव सभ्यता कि जब सुरु आत हो गयी तो इन्ही ऋषि संतानों से सृस्टि का विकाश हुआ।अतः आप अपने अभियान को किशी के एंटी नहीं वरन अपने संवर्धन के लिए चलाइये और आप सायद संवर्धन का मतलब समझते होंगे जैसा कि इसमे सामाजिक सौहार्द्र सहित अपना विकाश निहित है।

जिनके दिमाग में एन्टी-सवर्ण या एन्टी-ब्राह्मण का भूत सवार रहता है उनको मै बता देना चाहता हूँ कि जितने भी युग हुए हैं उनमे लडकिया ब्रह्मा के पुत्र राजा दक्ष कि ही पुत्री रही हैं चाहे वह राजा दक्षप्रजापति रहे हों या या अन्य कोई राजा दक्ष। तो मेरे मित्र ब्रह्मा के ये पुत्र राजा दक्ष कि पुत्रिया ब्राह्मण ही रही है और आप को यह भी पता होगा कि बिना स्त्री के या पत्नी के या प्रकृति के कोई श्रीस्ती नहीं चलती है तो कम से कम सबकी माँ इन्ही ब्राह्मण लड़कियों कि पुत्री होंगी। राजा दक्षा प्रजापति की विख्यात पुत्रियों कि जोड़ी सती (पारवती):महादेव शिव और अदिति:कश्यप है। और दक्ष कि अन्य सभी पुत्रियों से भी कश्यप ऋषि कि शादी हुई और उनकी जो पुत्रिया हुई उनसे अन्य ऋषियों कि शादी हुई। और इस प्रकार ऋषि परम्परा से मानव सभ्यता कि जब सुरु आत हो गयी तो इन्ही ऋषि संतानों से सृस्टि का विकाश हुआ।अतः आप अपने अभियान को किशी के एंटी नहीं वरन अपने संवर्धन के लिए चलाइये और आप सायद संवर्धन का मतलब समझते होंगे जैसा कि इसमे सामाजिक सौहार्द्र सहित अपना विकाश निहित है।

Wednesday, December 17, 2014

अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है। ---------जब कोई सनातन ब्राह्मण बने रहने की कीमत चुका दिया हो(त्याग की भी सीमा भी छोटी पड़ गयी हो जिसमे किशी द्वारा जिसकी मृत्यु तो संभव ही नहीं थी कम से कम 2057 (19657-2057=100) तक तो ऐसे में किशी व्यक्ति विशेष और सम्पूर्ण मानव समाज को शूद्रता से बचाये रखने हेतु स्वयं शूद्रवत और अमानवीय कार्य के बदले दिए जाने वाले सामाजिक अपमान और तिरस्कार का घूँट भी विना किशी दोष के पीने हेतु तैयार होकर और नव निर्माण के साथ सृस्टि के सृजनात्मक कार्य को परिणति तक पहुंचाकर और श्रेष्ठतम समाज में स्थान बनाकर) और एक सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण के चरित्र और कर्त्तव्य निर्वहन किया हो प्रयागराज में रहते हुए भी और प्रयागराज के अलग किशी भी दशा और दिशा में तो वह किशी की दया का पात्र नहीं जो अपने को किशी विश्व महाशक्ति के डर वस एक ब्राह्मण होने पर गर्व महसूस न कर सके जिस युग में सनातन ब्राह्मण तो क्या एक ब्राह्मण का चरित्र निर्वहन ही दुर्लभ हो। वरन उसकी जो स्वयं की सामर्थ्य है वह तो विश्व महा शक्ति को ऋणातक बनाते हुए (विश्व महा शक्ति की शक्ति को समाप्त कर और मानवमूल्य के अनुपालन में पुनः उसका सृजन कर ) देने के वाद शेष बची है। अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है।



अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है। ---------जब कोई सनातन ब्राह्मण बने रहने की कीमत चुका दिया हो(त्याग की भी सीमा भी छोटी पड़ गयी हो जिसमे किशी द्वारा जिसकी मृत्यु तो संभव ही नहीं थी कम से कम 2057 (19657-2057=100) तक तो ऐसे में किशी व्यक्ति विशेष और सम्पूर्ण मानव समाज को शूद्रता से बचाये रखने हेतु स्वयं शूद्रवत और अमानवीय कार्य के बदले दिए जाने वाले सामाजिक अपमान और तिरस्कार का घूँट भी विना किशी दोष के पीने हेतु तैयार होकर और नव निर्माण के साथ सृस्टि के सृजनात्मक कार्य को परिणति तक पहुंचाकर और श्रेष्ठतम समाज में स्थान बनाकर) और एक सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण के चरित्र और कर्त्तव्य निर्वहन किया हो प्रयागराज में रहते हुए भी और प्रयागराज के अलग किशी भी दशा और दिशा में तो वह किशी की दया का पात्र नहीं जो अपने को किशी विश्व महाशक्ति के डर वस एक ब्राह्मण होने पर गर्व महसूस न कर सके जिस युग में सनातन ब्राह्मण तो क्या एक ब्राह्मण का चरित्र निर्वहन ही दुर्लभ हो। वरन उसकी जो स्वयं की सामर्थ्य है वह तो विश्व महा शक्ति को ऋणातक बनाते हुए (विश्व महा शक्ति की शक्ति को समाप्त कर और मानवमूल्य के अनुपालन में पुनः उसका सृजन कर ) देने के वाद शेष बची है। अब आप को मानना पडेगा की माता-पिता, गुरु और बड़े भाई और भौजाई पर हाँथ आजमाना कितना भारी पड़ता है।

Thursday, December 11, 2014

A (AA:Comes from All Direction) + Nand (Sponteneous spiritual and devotional Joy) = Anand: - Act/Ability of availing Happiness(Spiritual and Devotional) sponteneously from all the possible direction


  • A (AA:Comes from All Direction) + Nand (Sponteneous spiritual and devotional Joy) = Anand: - Act/Ability Availing Happiness sponteneously from all the possible direction.

Wednesday, December 10, 2014

इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है:- दशरथ नंदन राम (श्रीराम) और जनक नंदिनी रामा(सीता) एक दूसरे के पूरक और प्रेरक हैं| अतः आप राम और रामा को अलग नहीं कर सकते हैं और इस प्रकार रामा=श्री=लक्ष्मी और राम को एक साथ हम श्रीराम के रूप में पाते हैं और रामाराम ही श्रीराम हो जाता है। इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है मतलब कुलदेवी महाकाली(महालक्ष्मी+महा सरस्वती+महागौरी:पारवती) वाले मेरे गाँव के प्रेरक और श्रद्धेय श्रीराम (रामाराम) ही है ।



इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है:- दशरथ नंदन राम (श्रीराम) और जनक नंदिनी रामा(सीता) एक दूसरे के पूरक और प्रेरक हैं| अतः आप राम और रामा को अलग नहीं कर सकते हैं और इस प्रकार रामा=श्री=लक्ष्मी और राम को एक साथ हम श्रीराम के रूप में पाते हैं और रामाराम ही श्रीराम हो जाता है। इससे यह ज्ञात होता है की मेरा गाँव रामापुर मतलब सीतापुर अपने में रामपुर भी समाहित किये हुए है मतलब कुलदेवी महाकाली(महालक्ष्मी+महा सरस्वती+महागौरी:पारवती) वाले मेरे गाँव के प्रेरक और श्रद्धेय श्रीराम (रामाराम) ही है ।


Tuesday, December 9, 2014

अगर किशी के आंका कोई कार्य देते हैं तो उनको पता होता है की अमुक कार्य मेरा कार्यवाहक या स्वयं सेवक कर लेगा परन्तु तीन-तीन आंका कार्यभार देते है और स्वयं उनको ही नहीं पता होता है की क्या इसका परिणाम होने वाला है अगर ज़रा सी भी सावधानी हटी और अनुशासन और संयम भांग हुआ परन्तु जिसको यह कार्य संपादित करना है वह स्वयं सेवक यह समझ रहा हो और इस कार्य की जिम्म्देदारी लेने से मना कर रहा हो तो समझ जाना चाहिए की यह स्वयं सेवक अपने तीनों आकाओं की सम्मिलित शक्ति है जो किशी एक से ज्यादा दूर की समझ और क्षमता रखता है यह अलग बात है की गुरु आज्ञा की मर्यादा उसे बाँध रखी थी और वह अपने अनुजों के हांथों की कठ पुतली बना रहा जिन अनुजों को ए बी सी डी भी इस आंतरिक और वाह्य परिवर्तन की न पता रही हो वरन वे तो केवल विषय और शोध क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा और पद प्राप्ति की होड़ में ही लगे रहे हों। मुझ काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से आये स्वयं सेवक के लिए शायद प्रयागराज विश्वविद्यालय प्रांतीय विश्वविद्यालय था उस समय और आज भी प्रांतीय से केंद्रीय होने की देलही क्षमता प्राप्त करने की कोशिस भर कर रहा है जो संवैधानिक रूप से इसमे से एक आंका (ब्रह्मा: परमगुरु परमेश्वर) के अथक प्रयास से विगत एक दसक से केंद्रीय हो तो गया है।--------मै पुनः कहता हूँ की मेरी मेधा शक्ति का आंकलन अपने निम्न तरीके के कुटिल चाल से न किया जाय तो इस विश्व विद्यालय और स्वयं प्रयागराज के लिए अच्छा होगा। जिस प्रयागराज विश्वविद्यालय ने प्रोफेसर राजेन्द्र गोविन्द हर्षे के कार्यकाल में विश्वविद्यालय द्वारा ही आयोजित 2008 के पूरा छात्र सम्मिलन में दो-दो निमंत्रण पत्र भेजा था एक भारतीय विज्ञानं संस्थान बेंगलुरु के पोस्ट डॉक्टरेट छात्रावास पर और दूसरा वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र के पते पर और दो बार फ़ोन भी किया गया था (948009010 और 08023600189) आने के सम्बन्ध में यात्रा विवरण और स्वयं आने के सम्बन्ध में जिसमे मैंने कहा था की क्या मेरे ताउजी प्रोफेसुर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय(परमपिता परमेश्वर) आ रहे हैं तो ऐसे में हाँ सुनाने के बाद मैंने कहा था की तब मुझे आने की जरूरत ही नहीं वे मेरे एक आंका ही समर्थ है उसको सफल बनाने में (वे दोनों निमंत्रण पत्र आज भी मेरे पास हैं)। ------कहने का मतलब यह है की अगर मेरा कार्यभार कोई ले सकता तो मै सब कुछ करने में समर्थ हूँ पर न तो ले सका और न तो ले पायेगा तो गलत आंकलन न किया जाय मेधा शक्ति का पिछला इतिहास और सार्वत्रिक प्रदर्शन भी देखा जाय क्योंकि विश्वविद्यालय सार्वभौमिक कला कौसल का जनक है। एक सनातन ब्राह्मण होते हुए जो प्रतिरोध मैंने सहे प्रति स्पर्धा के रूप में वह किशी भी शिक्षण क्षेत्र में मिल सकता है पर इसे मै सार्वजनिक तो नहीं कर सकता पर सृस्टि के संरचनात्मक परिवर्तन हेतु सामूहिक कार्य हेतु नामित केंद्र में जो हुआ इस प्रांतीय विश्वविद्यालय से केंद्रीय विश्व विद्यालय बनने के दौरान इस प्रयागराज विश्वविद्यालय में अगर उसे सार्वजनिक करूंगा तो गुरुकुल की मर्यादा भंग होगी और आप कह उठेंगे की वास्तव में प्रयागराज विश्वविद्यालय में सनातन ब्राह्मण की कमी हो गयी थी जो ऐसे शुभ लक्षण और प्राप्त सुअवसर को नहीं पहचान सके। वैसे भी ऐसा हजारों वर्षों में ही कभी-कभी ही शायद होता है इसी लिए इस धार्मिक कार्य को अपने प्रशासनिक कार्य शैली से दबाने का प्रयास मात्र करते रह गए और सब चीज पैर के नीचे से निकलती चली गयी और वह धार्मिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन बन सामने आ गया। अतः मुझे धन सम्पदा और कल-बल-छल से नीचा दिखने की कोशिस न की जाय पुनः अन्यथा इसका दुष्परिणाम ही पुनः सामने आएगा: तीसरे आंका तो स्वयं मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री मामा, श्रीधर(विष्णु) मिश्रा जी ही है जिनके सानिध्य में मै सब कुछ शिखा था और अब उसका प्रयोग शेष है।

अगर किशी के आंका कोई कार्य देते हैं तो उनको पता होता है की अमुक कार्य मेरा कार्यवाहक या स्वयं सेवक कर लेगा परन्तु तीन-तीन आंका कार्यभार देते है और स्वयं उनको ही नहीं पता होता है की क्या इसका परिणाम होने वाला है अगर ज़रा सी भी सावधानी हटी और अनुशासन और संयम भांग हुआ परन्तु जिसको यह कार्य संपादित करना है वह स्वयं सेवक यह समझ रहा हो और इस कार्य की जिम्म्देदारी लेने से मना कर रहा हो तो समझ जाना चाहिए की यह स्वयं सेवक अपने तीनों आकाओं की सम्मिलित शक्ति है जो किशी एक से ज्यादा दूर की समझ और क्षमता रखता है यह अलग बात है की गुरु आज्ञा की मर्यादा उसे बाँध रखी थी और वह अपने अनुजों के हांथों की कठ पुतली बना रहा जिन अनुजों को ए बी सी डी भी इस आंतरिक और वाह्य परिवर्तन की न पता रही हो वरन वे तो केवल विषय और शोध क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा और पद प्राप्ति की होड़ में ही लगे रहे हों। मुझ काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से आये स्वयं सेवक के लिए शायद प्रयागराज विश्वविद्यालय प्रांतीय विश्वविद्यालय था उस समय और आज भी प्रांतीय से केंद्रीय होने की देलही क्षमता प्राप्त करने की कोशिस भर कर रहा है जो संवैधानिक रूप से इसमे से एक आंका (ब्रह्मा: परमगुरु परमेश्वर) के अथक प्रयास से विगत एक दसक से केंद्रीय हो तो गया है।--------मै पुनः कहता हूँ की मेरी मेधा शक्ति का आंकलन अपने निम्न तरीके के कुटिल चाल से न किया जाय तो इस विश्व विद्यालय और स्वयं प्रयागराज के लिए अच्छा होगा। जिस प्रयागराज विश्वविद्यालय ने प्रोफेसर राजेन्द्र गोविन्द हर्षे के कार्यकाल में विश्वविद्यालय द्वारा ही आयोजित 2008 के पूरा छात्र सम्मिलन में दो-दो निमंत्रण पत्र भेजा था एक भारतीय विज्ञानं संस्थान बेंगलुरु के पोस्ट डॉक्टरेट छात्रावास पर और दूसरा वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र के पते पर और दो बार फ़ोन भी किया गया था (948009010 और 08023600189) आने के सम्बन्ध में यात्रा विवरण और स्वयं आने के सम्बन्ध में जिसमे मैंने कहा था की क्या मेरे ताउजी प्रोफेसुर प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय(परमपिता परमेश्वर) आ रहे हैं तो ऐसे में हाँ सुनाने के बाद मैंने कहा था की तब मुझे आने की जरूरत ही नहीं वे मेरे एक आंका ही समर्थ है उसको सफल बनाने में (वे दोनों निमंत्रण पत्र आज भी मेरे पास हैं)। ------कहने का मतलब यह है की अगर मेरा कार्यभार कोई ले सकता तो मै सब कुछ करने में समर्थ हूँ पर न तो ले सका और न तो ले पायेगा तो गलत आंकलन न किया जाय मेधा शक्ति का पिछला इतिहास और सार्वत्रिक प्रदर्शन भी देखा जाय क्योंकि विश्वविद्यालय सार्वभौमिक कला कौसल का जनक है। एक सनातन ब्राह्मण होते हुए जो प्रतिरोध मैंने सहे प्रति स्पर्धा के रूप में वह किशी भी शिक्षण क्षेत्र में मिल सकता है पर इसे मै सार्वजनिक तो नहीं कर सकता पर सृस्टि के संरचनात्मक परिवर्तन हेतु सामूहिक कार्य हेतु नामित केंद्र में जो हुआ इस प्रांतीय विश्वविद्यालय से केंद्रीय विश्व विद्यालय बनने के दौरान इस प्रयागराज विश्वविद्यालय में अगर उसे सार्वजनिक करूंगा तो गुरुकुल की मर्यादा भंग होगी और आप कह उठेंगे की वास्तव में प्रयागराज विश्वविद्यालय में सनातन ब्राह्मण की कमी हो गयी थी जो ऐसे शुभ लक्षण और प्राप्त सुअवसर को नहीं पहचान सके। वैसे भी ऐसा हजारों वर्षों में ही कभी-कभी ही शायद होता है इसी लिए इस धार्मिक कार्य को अपने प्रशासनिक कार्य शैली से दबाने का प्रयास मात्र करते रह गए और सब चीज पैर के नीचे से निकलती चली गयी और वह धार्मिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन बन सामने आ गया। अतः मुझे धन सम्पदा और कल-बल-छल से नीचा दिखने की कोशिस न की जाय पुनः अन्यथा इसका दुष्परिणाम ही पुनः सामने आएगा: तीसरे आंका तो स्वयं मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री मामा, श्रीधर(विष्णु) मिश्रा जी ही है जिनके सानिध्य में मै सब कुछ शिखा था और अब उसका प्रयोग शेष है। Transfer of power in any institution does not mean transfer of Ordinance/law of the Institution: https://archive.today/aKXW
                     https://archive.today/7ocui

Friday, December 5, 2014

विवेक: क्रिया:अन्तःकरण की वह शक्ति जिसमें मनुष्य यह समझता हैं कि कौन सा काम अच्छा है या बुरा,अथवा करने योग्य है या नहीं; अच्छी बुद्धि या समझ।; क्रिया: सदविचार की योग्यता।; संज्ञा: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ) तो ज्ञानेन्द्र या कहें तो ज्ञान का राजा कौन हुआ? मेरे विचार से निश्चित रूप से ज्ञानेन्द्र निहित अर्थ में विवेक: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ) ही हुआ उसी तरह से जिस तरह से नरेंद्र का तात्पर्य नर का इंद्र या नर का राजा या नर श्रेष्ठ या श्रेष्ठ मानव होता है । विष्णु के सहस्रनाम(1000 नाम) हैं पर मूल नाम विष्णु ही उनके आप मानव के रूप में जन्म लिए सबसे बड़े भक्त ध्रुव के लिए सर्व श्रेष्ठ होता है, उसी तरह से ज्ञानेन्द्र, सत्यज्ञान, सुबोध, सिद्धार्थ और अन्य अनेको समानार्थक नाम का एक ही मुख्य केंद्रीय शब्द विवेक हुआ: विवेक, विद्या और ज्ञान का गहरा सम्बन्ध है देवी सरस्वती और ब्रह्मदेव से विशेषरूप जो इनको शिव:पारवती(सती) और विष्णु:लक्ष्मी से भी जोड़ता है क्योंकि ये सब विवेकवान और ज्ञानवान हैं और ये देवियाँ और देव त्रयम्बक:विवेक युक्त होए हैं जिसके शुभ और अशुभ दोनों से घिरे शिव को स्वयं त्रयम्बक:त्रिलोचन नाम ही दे दिया गया है जो इनका एक मात्र रक्षा कवच है। और इन त्रिदेवों तक ही नहीं सामान्य देवी-देवताओं और आम मानव का भी रक्षा कवच है उसका अपने अंदर निहित विवेक शक्ति।; धार्मिक व् सामाजिक संज्ञाकरण: त्रिनेत्र, त्रयम्बक, त्रिलोचन, राहुल, सिद्धार्थ, सुबोध।; अतः मेरे जिस गुरु ने मुझसे बचन लिया था नवंबर, 1999 में पंडित मदनमोहन(~श्रीकृष्ण) मालवीय जी के शैक्षिक प्रांगण(गुरुकुल) काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के विरला मंदिर में की कि तुम बचन दो कि जीवन में कभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका नहीं जाना वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुबोध(~विवेक) कांत(~कुमार) बोस ही थे अपने में ही विवेक कुमार थे और मै वही उनका पैर छूते हुए स्वीकारोक्ति दी थी अपने पूर्ण संज्ञान में उनके दिए हुए बचन को पालन करने का और वह दुनिया बदल जाने पर भी प्रतिबद्ध रहेगा।

विवेक:
क्रिया:अन्तःकरण की वह शक्ति जिसमें मनुष्य यह समझता हैं कि कौन सा काम अच्छा है या बुरा,अथवा करने योग्य है या नहीं; अच्छी बुद्धि या समझ।;
क्रिया: सदविचार की योग्यता।;
संज्ञा: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ)
तो ज्ञानेन्द्र या कहें तो ज्ञान का राजा कौन हुआ? मेरे विचार से निश्चित रूप से ज्ञानेन्द्र निहित अर्थ में विवेक: सत्यज्ञान(सुबोध:सिद्धार्थ) ही हुआ उसी तरह से जिस तरह से नरेंद्र का तात्पर्य नर का इंद्र या नर का राजा या नर श्रेष्ठ या श्रेष्ठ मानव होता है । विष्णु के सहस्रनाम(1000 नाम) हैं पर मूल नाम विष्णु ही उनके आप मानव के रूप में जन्म लिए सबसे बड़े भक्त ध्रुव के लिए सर्व श्रेष्ठ होता है, उसी तरह से ज्ञानेन्द्र, सत्यज्ञान, सुबोध, सिद्धार्थ और अन्य अनेको समानार्थक नाम का एक ही मुख्य केंद्रीय शब्द विवेक हुआ: विवेक, विद्या और ज्ञान का गहरा सम्बन्ध है देवी सरस्वती और ब्रह्मदेव से विशेषरूप जो इनको शिव:पारवती(सती) और विष्णु:लक्ष्मी से भी जोड़ता है क्योंकि ये सब विवेकवान और ज्ञानवान हैं और ये देवियाँ और देव त्रयम्बक:विवेक युक्त होए हैं जिसके शुभ और अशुभ दोनों से घिरे शिव को स्वयं त्रयम्बक:त्रिलोचन नाम ही दे दिया गया है जो इनका एक मात्र रक्षा कवच है। और इन त्रिदेवों तक ही नहीं सामान्य देवी-देवताओं और आम मानव का भी रक्षा कवच है उसका अपने अंदर निहित विवेक शक्ति।;
धार्मिक व् सामाजिक संज्ञाकरण: त्रिनेत्र, त्रयम्बक, त्रिलोचन, राहुल, सिद्धार्थ, सुबोध।;
अतः मेरे जिस गुरु ने मुझसे बचन लिया था नवंबर, 1999 में पंडित मदनमोहन(~श्रीकृष्ण) मालवीय जी के शैक्षिक प्रांगण(गुरुकुल) काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के विरला मंदिर में की कि तुम बचन दो कि जीवन में कभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका नहीं जाना वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुबोध(~विवेक) कांत(~कुमार) बोस ही थे अपने में ही विवेक कुमार थे और मै वही उनका पैर छूते हुए स्वीकारोक्ति दी थी अपने पूर्ण संज्ञान में उनके दिए हुए बचन को पालन करने का और वह दुनिया बदल जाने पर भी प्रतिबद्ध रहेगा।

Wednesday, December 3, 2014

I introduced by word Hi! 5 through e-mails many times from different English mail IDs. for last few months of this year. PANDEY? Pandey:Composition of five chief elements i.e. composition of Fire. Air, Water, Soil, Space i.e. have combined characteristics of all five chief elements of the nature. In the Indian continents: Pandey is A Representative of five chief element of the human community: Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Muslims//Shri-Ramaism & Christian//Shri-Krishnaism too i.e. whole Sanatan Hindus.>>>>>> My Grand Father Bachan Ram Pandey was closed friend of George Fernandes for reference: Article of my village Ramapur on wikipedia.

I introduced by word Hi! 5 through e-mails many times from different English mail IDs. for last few months of this year. PANDEY? Pandey:Composition of five chief elements i.e. composition of Fire. Air, Water, Soil, Space i.e. have combined characteristics of all five chief elements of the nature. In the Indian continents: Pandey is A Representative of five chief element of the human community: Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Muslims//Shri-Ramaism & Christian//Shri-Krishnaism too i.e. whole Sanatan Hindus.
>>>>>> My Grand Father Bachan Ram Pandey was closed friend of George Fernandes for reference: http://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur