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Thursday, December 31, 2015

जोशी जी(ब्रह्मा) का एक वैधानिक संरचनात्मक प्रयोग, श्रीधर(विष्णु) का उसका पोषण और प्रेमचंद(शिव) का उसका संरक्षण और इस प्रकार विश्व मानवता और इस प्रकार भारतीय मानवता के लिए विषामृत "Vivekanand and Modern Tradition" जिसमे दोनों समकक्ष पर आयुषवत छोटे भाइयों पुरुषोत्तम और अविनाश का दायित्व कुछ कम नहीं था इस विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव और आनंद से। आधार तो 1997-98 से तैयार हुआ पर 2001 से 2015 का चौदह वर्ष तक का कार्यकाल रहा जो पूर्णतः पूर्ण और निर्णायक रहा की मानवता और सत्य का सम्मिश्रण समाज में न होने पर मानवता की आड़ में अतिदयालुता का आधिक्य हो जाने पर सामाजिक चरित्रहीनता और भोगविलासिता जन्म लेती है पर सत्य उतना भी चरमपर न पहुंचना चाहिए की आम समाज ही आतंकित हो जाय| एक सहिष्णु समाज के लिए कम से कम "सत्यम शिवम सुंदरम (जो सत्य भी हो, शिव भी हो व् सुन्दर भी हो, वह इस्वर है) " का पालन आवश्यक है जिसमे "सत्यमेव जयते" मतलब "सत्य की पूर्ण पूर्णता" पर व्यवहारिक रूप से कुछ समय उपरांत पंहुचा जा सकता है और "सत्यम शिवम सुंदरम (जो सत्य भी हो, शिव भी हो व् सुन्दर भी हो, वह इस्वर है) " के भी रूप में भी मतलब व्याहारिक रूप में भी सत्य और शिवता का पालन समाज में न हुआ तो फिर समाज से सत्य और मानवता(करुणा) का लोप हो सकता है। मुझे आशा है की "Vivekanand and Modern Tradition", का यह अंतिम अंक समाज के हित में एक निर्णायक भूमिका निभाएगा की इस विशेष सत्य के साथ की जब सामाजिक मानवता और संस्कृति, साहित्य या विज्ञान या कला या किशी भी विषय सम्बन्धी ज्ञान या ज्ञान केंद्र का नवनिर्माण और संवर्धन और संरक्षण और पोषण का विशेष दौर होता है तो उसमे जिम्मेदारी निभाने वाले पक्ष के लिए सत्य का मतलब केवल प्रत्यक्ष सत्य या कहें जो केवल वाह्य रूप में दिखाई दे रहा हो वह सत्य या दो दूनी चार वाला सत्य ही सत्य नहीं होता है मतलब उसमे तार्किक सत्य को सत्य नहीं मानते हैं या क्योंकि चातुर्यपूर्ण भूमिका निभाने वाला वहाँ टिक नहीं सकता है तो जो लगा था उसके लिए प्रत्यक्ष सत्य को ही सत्य मान लिया जाना गलत होगा बल्कि वहाँ व्यवहारिक एवं समपारिस्थितिक अनुभवगत सत्य के आधार पर सत्य का आंकलन ही " "सत्यम शिवम सुंदरम" होगा जो "सत्यमेव जयते" तक समाज को ले जाएगा।

जोशी जी(ब्रह्मा) का एक वैधानिक संरचनात्मक प्रयोग, श्रीधर(विष्णु) का उसका पोषण और प्रेमचंद(शिव) का उसका संरक्षण और इस प्रकार विश्व मानवता और इस प्रकार भारतीय मानवता के लिए विषामृत "Vivekanand and Modern Tradition" जिसमे दोनों समकक्ष पर आयुषवत छोटे भाइयों पुरुषोत्तम और अविनाश का दायित्व कुछ कम नहीं था इस विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव और आनंद से। आधार तो 1997-98 से तैयार हुआ पर 2001 से 2015 का चौदह वर्ष तक का कार्यकाल रहा जो पूर्णतः पूर्ण और निर्णायक रहा की मानवता और सत्य का सम्मिश्रण समाज में न होने पर मानवता की आड़ में अतिदयालुता का आधिक्य हो जाने पर सामाजिक चरित्रहीनता और भोगविलासिता जन्म लेती है पर सत्य उतना भी चरमपर न पहुंचना चाहिए की आम समाज ही आतंकित हो जाय| एक सहिष्णु समाज के लिए कम से कम "सत्यम शिवम सुंदरम (जो सत्य भी हो, शिव भी हो व् सुन्दर भी हो, वह इस्वर है) " का पालन आवश्यक है जिसमे "सत्यमेव जयते" मतलब "सत्य की पूर्ण पूर्णता" पर व्यवहारिक रूप से कुछ समय उपरांत पंहुचा जा सकता है और  "सत्यम शिवम सुंदरम (जो सत्य भी हो, शिव भी हो व् सुन्दर भी हो, वह इस्वर है) " के भी रूप में भी मतलब व्याहारिक रूप में भी सत्य और शिवता का पालन समाज में न हुआ तो फिर समाज से सत्य और मानवता(करुणा) का लोप हो सकता है। मुझे आशा है की "Vivekanand and Modern Tradition", का यह अंतिम अंक समाज के हित में एक निर्णायक भूमिका निभाएगा की इस विशेष सत्य के साथ की जब सामाजिक मानवता और संस्कृति, साहित्य या विज्ञान या कला या किशी भी विषय सम्बन्धी ज्ञान या  ज्ञान केंद्र का नवनिर्माण और संवर्धन और संरक्षण और पोषण का विशेष दौर होता है तो उसमे जिम्मेदारी निभाने वाले पक्ष के लिए सत्य का मतलब केवल प्रत्यक्ष सत्य या कहें जो केवल वाह्य रूप में दिखाई दे रहा हो वह सत्य या दो दूनी चार वाला सत्य ही सत्य नहीं होता है मतलब उसमे तार्किक सत्य को सत्य नहीं मानते हैं या क्योंकि चातुर्यपूर्ण भूमिका निभाने वाला वहाँ टिक नहीं सकता है तो जो लगा था उसके लिए प्रत्यक्ष सत्य को ही सत्य मान लिया जाना गलत होगा बल्कि वहाँ व्यवहारिक एवं समपारिस्थितिक अनुभवगत सत्य के आधार पर सत्य का आंकलन ही "  "सत्यम शिवम सुंदरम" होगा जो "सत्यमेव जयते" तक समाज को ले जाएगा।  

मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है| 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

इस्लामियत और ईसाइयत के आदम:प्रथम आदमी और सनातन हिन्दू धर्म के मनु:प्रथम मानव जब कश्यप ऋषि ही थे मतलब दशरथ और वशुदेव ही थे तो मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किये हुए 5 प्रमुख तथ्य पूर्णतः सत्य हैं (इस्लाम राम के सामानांतर जरूर चलता पर राम का दुश्मन नहीं और ईसाइयत कृष्ण के सामानांतर जरूर चलता है पर वह कृष्ण का दुश्मन नहीं क्योंकि दोनों नहीं चाहते हैं की रामकृष्ण का अंत हो बल्कि वे इन्हे अपना आधार मानते हैं)
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है|
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

Wednesday, December 30, 2015

अपना स्थान और हित सुरक्षित करके और अधिक अधिकार के लिए मैदान में उतारना स्वार्थपूर्ण रणनीति मात्र है पर जब अपना ही स्थान और हित सुरक्षित नहीं हो और आप मानवता हित में अपना स्थान और हित सब कुछ दाँव पर लगा रन में उतरे हों तो यह त्याग, बलिदान और तपस्या तीनों की श्रेणी में एक साथ आता है। >>>>>>>>>>>>>>>प्रयागराज प्रवास सितम्बर, 2000 से ही है और केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय पर मार्च, 2001 में ही आया था जानकारी हेतु (जहाँ मुझे मेरे एक ही परिवार के चार लोगों के दर्शन हुए वे किशी भी जाति समूह से रहे हों तो कुछ विचार ऐसा था की अगर इन परिवार वालों में ही मैं शामिल हुआ तो फिर जीवन में कुछ नया क्या होगा?) पर 4 सितम्बर, 2001, 11 सितम्बर, 2001, 7 फरवरी, 2003, 16 मई, 2006 और 11 मार्च, 2007, 11 सितम्बर, 2007, 18 सितम्बर, 2007 और अक्टूबर 29 रात किन्तु वास्तविक रूप में 30 का प्रथम प्रहार, 2009 यहाँ मेरे लिए उल्लेखनीय तिथियाँ हैं जिसमे 7 फरवरी, 2003, 16 मई, 2006 और अक्टूबर 29 रात किन्तु वास्तविक रूप में 30 का प्रथम प्रहर, 2009 मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से परिक्षा की घड़ी थी जिसके लिए एकल निर्णय मुझे लेना था और मैंने लिया था व्यक्तिगत रिस्क लेकर जिसमे 7 फरवरी, 2003, 16 मई, 2006 शैक्षिक समाज के बड़े समूह के लिए और इस प्रकार आम मानव समाज की आने वाली पीढ़ी हित के लिए मेरा समर्पण था जबकि मेरे स्वयं के लिए विकल्प और भी थे अगर मई जोखिम न भी उठाता और अक्टूबर 29 रात किन्तु वास्तविक रूप में 30 का प्रथम प्रहार, 2009 जो कालचक्र/समयचक्र का अकाट्य और अक्षुण्य मील का स्थापित पत्थर है जो अब ब्रह्मलीक हो चुका है। यह स्वयं मेरे लिए यह घटना चक्र भी नियती की तरह नाटकीय था मेरी उस यात्रा का जिसका टिकट मै एक दिन पूर्व निरस्त करने जा रहा था मेरे विज्ञान परियोजना के निदेशक, भारतीय विज्ञान संस्थान के वायुमंडलीय एवम महासागरीय विज्ञानं केंद्र के प्रोफेसर देवाशीष सेनगुप्ता गुरु जी के निर्देशानुसार, पर सुबह वे ही यसवंतपुर के रेलवे स्टेशन जाने वाली गली में ही मिल गए और कहे की जब टिकट कटा ही लिए हो तो चले जाओ पदभार ग्रहण करने लेकिन अगर पदभार ग्रहण न होने की स्थिति आएगी तो क्या करोगे? तो उद्यम और जोखिम उठाने पर ही यह कालचक्र/समयचक्र का अकाट्य और अक्षुण्य मील का पत्थर है स्थापित हो सका है जो ब्रह्मलीक हो चुका है तो उसे कोई नहीं मिटा सकता है अनवरत निरर्थक प्रयास कर लेने पर भी।

अपना स्थान और हित सुरक्षित करके और अधिक अधिकार के लिए मैदान में उतारना स्वार्थपूर्ण रणनीति मात्र है पर जब अपना ही स्थान और हित सुरक्षित नहीं हो और आप मानवता हित में अपना स्थान और हित सब कुछ दाँव पर लगा रन में उतरे हों तो यह त्याग, बलिदान और तपस्या तीनों की श्रेणी में एक साथ आता है। >>>>>>>>>>>>>>>प्रयागराज प्रवास सितम्बर, 2000 से ही है और केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय पर मार्च, 2001 में ही आया था जानकारी हेतु (जहाँ मुझे मेरे एक ही परिवार के चार लोगों के दर्शन हुए वे किशी भी जाति समूह से रहे हों तो कुछ विचार ऐसा था की अगर इन परिवार वालों में ही मैं शामिल हुआ तो फिर जीवन में कुछ नया क्या होगा?) पर 4 सितम्बर, 2001, 11 सितम्बर, 2001, 7 फरवरी, 2003, 16 मई, 2006 और 11 मार्च, 2007, 11 सितम्बर, 2007, 18 सितम्बर, 2007 और अक्टूबर 29 रात किन्तु वास्तविक रूप में 30 का प्रथम प्रहार, 2009 यहाँ मेरे लिए उल्लेखनीय तिथियाँ हैं जिसमे 7 फरवरी, 2003, 16 मई, 2006 और अक्टूबर 29 रात किन्तु वास्तविक रूप में 30 का प्रथम प्रहर, 2009 मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से परिक्षा की घड़ी थी जिसके लिए एकल निर्णय मुझे लेना था और मैंने लिया था व्यक्तिगत रिस्क लेकर जिसमे 7 फरवरी, 2003, 16 मई, 2006 शैक्षिक समाज के बड़े समूह के लिए और इस प्रकार आम मानव समाज की आने वाली पीढ़ी हित के लिए मेरा समर्पण था जबकि मेरे स्वयं के लिए विकल्प और भी थे अगर मई जोखिम न भी उठाता और अक्टूबर 29 रात किन्तु वास्तविक रूप में 30 का प्रथम प्रहार, 2009 जो कालचक्र/समयचक्र का अकाट्य और अक्षुण्य मील का स्थापित पत्थर है जो अब ब्रह्मलीक हो चुका है। यह स्वयं मेरे लिए यह घटना चक्र भी नियती की तरह नाटकीय था मेरी उस यात्रा का जिसका टिकट मै एक दिन पूर्व निरस्त करने जा रहा था मेरे विज्ञान परियोजना के निदेशक, भारतीय विज्ञान संस्थान के वायुमंडलीय एवम महासागरीय विज्ञानं केंद्र के प्रोफेसर देवाशीष सेनगुप्ता गुरु जी के निर्देशानुसार, पर सुबह वे ही यसवंतपुर के रेलवे स्टेशन जाने वाली गली में ही मिल गए और कहे की जब टिकट कटा ही लिए हो तो चले जाओ पदभार ग्रहण करने लेकिन अगर पदभार ग्रहण न होने की स्थिति आएगी तो क्या करोगे? तो उद्यम और जोखिम उठाने पर ही यह कालचक्र/समयचक्र का अकाट्य और अक्षुण्य मील का पत्थर है स्थापित हो सका है जो ब्रह्मलीक हो चुका है तो उसे कोई नहीं मिटा सकता है अनवरत निरर्थक प्रयास कर लेने पर भी।

Tuesday, December 29, 2015

गौतम गोत्रीय विष्णु भाई को अपना विकल्प मै स्वयं चुना हूँ और वे दो अवस्था को प्राप्त कर चुके है केवल तीसरा ही शेष है पर ब्रह्मा का ही विकल्प इस प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज के लिए शेष है प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज को यह मेरा यह सन्देश है कि भारद्वाज/आंगिरस गोत्रियों के निर्देशानुसार यह प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज के किशी एक सप्तर्षि गोत्रीय के ही पास ही रहेगा पर विकट स्थिति में इनका भी भारद्वाज/आंगिरस गोत्रीय विकल्प मेरी निगाह में है। तीनो अवस्था की जरूरत जब पड़ेगी तो मैं गौतम गोत्रीय विष्णु भाई का पूर्ण सहयोग व् समर्थन करूंगा।

गौतम गोत्रीय विष्णु भाई को अपना विकल्प मै स्वयं चुना हूँ और वे दो अवस्था को प्राप्त कर चुके है केवल तीसरा ही शेष है पर ब्रह्मा का ही विकल्प इस प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज के लिए शेष है  प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज को यह मेरा यह सन्देश है कि भारद्वाज/आंगिरस गोत्रियों के निर्देशानुसार यह प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज के किशी एक सप्तर्षि गोत्रीय के ही पास ही रहेगा पर विकट स्थिति में इनका भी भारद्वाज/आंगिरस गोत्रीय विकल्प मेरी निगाह में है।  तीनो अवस्था की जरूरत जब पड़ेगी तो मैं गौतम गोत्रीय विष्णु भाई का पूर्ण सहयोग व् समर्थन करूंगा। 

पका पकाया खाने की आदत पड़ गयी थी प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वालों को और पका पकाया खाने की आदत और आवश्यता से अधिक अति आत्मविश्वास जो अपने को ही खा ले जाय वह हमेशा के लिए न पड़ जाय तो मै उसी लिए उत्प्रेरित करता हूँ प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वालों को और प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वालों से ही पूंछता हूँ की जिसको मेरा विकल्प समझते है और जिसे बनाना था वह 7 फरवरी, 2003 को ही क्यों नहीं बन गया मेरी विशेष जरूरत इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय केंद्र पर बने रहने की क्यों आ गयी थी? अगर मुझे पहचान गए हों तो समझ जाइए की मेघनाद मुझमे आत्मसात होते हैं पर मै मेघनाद में आत्मसात होने नहीं जाता पर हाँ एक आज्ञाकारी पुत्र का दायित्व निभाने वाले का सहयोग मानवता के आधार पर जरूर कर देता हूँ।

पका पकाया खाने की आदत पड़ गयी थी प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वालों को और पका पकाया खाने की आदत और आवश्यता से अधिक अति आत्मविश्वास जो अपने को ही खा ले जाय वह हमेशा के लिए न पड़ जाय तो मै उसी लिए उत्प्रेरित करता हूँ प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वालों को और प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वालों से ही पूंछता हूँ की जिसको मेरा विकल्प समझते है और जिसे बनाना था वह 7 फरवरी, 2003 को ही क्यों नहीं बन गया मेरी विशेष जरूरत इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय केंद्र पर बने रहने की क्यों आ गयी थी? अगर मुझे पहचान गए हों तो समझ जाइए की मेघनाद मुझमे आत्मसात होते हैं पर मै मेघनाद में आत्मसात होने नहीं जाता पर हाँ एक आज्ञाकारी पुत्र का दायित्व निभाने वाले का सहयोग मानवता के आधार पर जरूर कर देता हूँ।

Monday, December 28, 2015

मेरे जीवन के किशी भी काल खंड में भूतकाल में हुई चूक के अलावा कोई भी हानि होने की बात तो दूर कोई हानि करने का प्रयास भी श्री रामअवध कुल मतलब श्रीश्यामाचरण व् श्रीरामनयन परिवार से इस श्रीरामप्रसाद/बेचनराम/प्रदीप कुलीन विवेक पर नहीं हुआ है और अनावश्यक आशंका और मतान्तर को जन्म दे जो राजनीति मेरे विरुद्ध कुछ लोग किये हैं उनको पश्चाताप करना पडेगा क्योंकि इससे श्रीरामअवध कुल की प्रतिष्ठा और जीवन दोनों पर आंच आया है और स्वयं मेरे ऊपर ऐसी राजनीती से आंच सीधे-शीधे आयी है। कम से कम घर से लेकर प्रयागराज और विश्व के कोने-कोने तक इस पारिवारिक चूक का गलत लाभ मेरे विरोधी पक्ष वाले न लें पुनः इस हेतु इसे सार्वजनिक करता हूँ की वर्तमान समय में श्रीरामअवध परिवार हमारा अपना परिवार है इसमें किशी को कोई संका नहीं होनी चाहिए।

मेरे जीवन के किशी भी काल खंड में भूतकाल में हुई चूक के अलावा कोई भी हानि होने की बात तो दूर कोई हानि करने का प्रयास भी श्री रामअवध कुल मतलब श्रीश्यामाचरण व् श्रीरामनयन परिवार से इस श्रीरामप्रसाद/बेचनराम/प्रदीप कुलीन विवेक पर नहीं हुआ है और अनावश्यक आशंका और मतान्तर को जन्म दे जो राजनीति मेरे विरुद्ध कुछ लोग किये हैं उनको पश्चाताप करना पडेगा क्योंकि इससे श्रीरामअवध कुल की प्रतिष्ठा और जीवन दोनों पर आंच आया है और स्वयं मेरे ऊपर ऐसी राजनीती से आंच सीधे-शीधे आयी है। कम से कम घर से लेकर प्रयागराज और विश्व के कोने-कोने तक इस पारिवारिक चूक का गलत लाभ मेरे विरोधी पक्ष वाले न लें पुनः इस हेतु इसे सार्वजनिक करता हूँ की वर्तमान समय में श्रीरामअवध परिवार हमारा अपना परिवार है इसमें किशी को कोई संका नहीं होनी चाहिए।
http://research.omicsgroup.org/index.php/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies
https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur

कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं मिटाये(प्रयागराज-कैलाश पर्वत-गोरक्षपुर:गोरखपुर-जौनपुर:जमदग्निपुर के बिशुनपुर के निवासी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण रामानंद/रामप्रसाद कुल की) की कि मै स्वयं प्रयागराज-कश्मीर-बस्ती जनपद-आज़मगढ़: आर्यमगढ़ के रामापुर के निवाशी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण सारंगधर:शिव/--/देवव्रत:गंगापुत्र-भीष्म/--/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप:रामजानकी:सत्यनारायण:आदित्यनाथ:सूर्यकांत:सूर्यनाथ:विक्रमादित्य कुलीन विवेक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक अगले जन्म में उसी प्रयागराज-कैलाश पर्वत-गोरक्षपुर:गोरखपुर-जौनपुर:जमदग्निपुर के बिशुनपुर के निवासी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण रामानंद/रामप्रसाद कुल में जन्म लेने की अभीष्ट इक्षा रखता हूँ।

कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं मिटाये(प्रयागराज-कैलाश पर्वत-गोरक्षपुर:गोरखपुर-जौनपुर:जमदग्निपुर के बिशुनपुर के निवासी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण रामानंद/रामप्रसाद कुल की) की कि मै स्वयं प्रयागराज-कश्मीर-बस्ती जनपद-आज़मगढ़: आर्यमगढ़ के रामापुर के निवाशी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण सारंगधर:शिव/--/देवव्रत:गंगापुत्र-भीष्म/--/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप:रामजानकी:सत्यनारायण:आदित्यनाथ:सूर्यकांत:सूर्यनाथ:विक्रमादित्य कुलीन विवेक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक अगले जन्म में उसी प्रयागराज-कैलाश पर्वत-गोरक्षपुर:गोरखपुर-जौनपुर:जमदग्निपुर के बिशुनपुर के निवासी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण रामानंद/रामप्रसाद कुल में जन्म लेने की अभीष्ट इक्षा रखता हूँ।
https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur
http://research.omicsgroup.org/index.php/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

Sunday, December 27, 2015

रामनाथ(राम के स्वामी/नाथ मतलब राम के इस्वर शिव मतलब रामेश्वर मतलब महादेव शिव) और रमानाथ(विष्णु=श्रीधर= श्रीकांत=लक्ष्मीनारायण=श्रीप्रकाश= लक्ष्मीकांत=सच्चिदानंद मतलब शिवस्वामी मतलब शिवनाथ मतलब शिव के इस्वर मतलब शिवेश्वर); तथा रामपुर और रामा(सीता=जानकी= सीता का वह नाम जो राम के नाम से या राम के नाम के माध्यम से जाना जाता हो )पुर=रामापुर में जिसको समरूपता तो पता है पर भेद नहीं पता उससे भारतीयों को नियंत्रित करने का कार्यक्रम 14 वर्ष से ज्यादा चलना था क्या? तो उनकी जो सामर्थ्य थी उतना उनसे चल चुका और उस नियंत्रण को 14 वर्ष में ही समाप्त हो जाना था तो समाप्त हो गया बिना स्वतन्त्रता संग्राम हुए। जब रामनाथ(शिव) स्वयं रमानाथ(विष्णु) को समर्पित हो गए हों तो फिर उनको कौन अलग कर सकता है और जब चन्द्रवंश स्वयं अपने मूल ऊर्जा स्रोत सूर्यवंश में पुनः समाहित कर लिया गया तो भारतीयों को नियंत्रित करने का कार्यक्रम चलाने वालों के लिए अपनी राजनीति और नियंत्रण जारी रखने के लिए दूसरा ध्रुव कहाँ से मिलता। और इस सबके साथ एक-एक कर शिव, राम और कृष्ण सब एक हो शिवरामकृष्ण मतलब श्रीरामकृष्ण हो गए तो फिर भारतीयों को नियंत्रित करने का कार्यक्रम चलाने वालों के लिए और भी बड़ा घनचक्कर सामने खड़ा हो गया उनको अपना अस्त्र-सस्त्र सहित समर्पित करने हेतु बाध्य कर देने का।

रामनाथ(राम के स्वामी/नाथ मतलब राम के इस्वर शिव मतलब रामेश्वर मतलब महादेव शिव) और रमानाथ(विष्णु=श्रीधर= श्रीकांत=लक्ष्मीनारायण=श्रीप्रकाश= लक्ष्मीकांत=सच्चिदानंद मतलब शिवस्वामी मतलब  शिवनाथ मतलब शिव के इस्वर मतलब शिवेश्वर); तथा रामपुर और रामा(सीता=जानकी= सीता का वह नाम जो राम के नाम से या राम के नाम के माध्यम से जाना जाता हो )पुर=रामापुर में जिसको समरूपता तो पता है पर भेद नहीं पता उससे भारतीयों को नियंत्रित करने का कार्यक्रम 14 वर्ष से ज्यादा चलना था क्या? तो उनकी जो सामर्थ्य थी उतना उनसे चल चुका और उस नियंत्रण को  14 वर्ष में ही समाप्त हो जाना था तो समाप्त हो गया बिना स्वतन्त्रता संग्राम हुए। जब रामनाथ(शिव) स्वयं रमानाथ(विष्णु) को समर्पित हो गए हों तो फिर उनको कौन अलग कर सकता है और जब चन्द्रवंश स्वयं अपने मूल ऊर्जा स्रोत सूर्यवंश में पुनः समाहित कर लिया गया तो भारतीयों को नियंत्रित करने का कार्यक्रम चलाने वालों के लिए अपनी राजनीति और नियंत्रण जारी रखने के लिए दूसरा ध्रुव कहाँ से मिलता। और इस सबके साथ एक-एक कर शिव, राम और कृष्ण सब एक हो शिवरामकृष्ण मतलब श्रीरामकृष्ण हो गए तो फिर भारतीयों को नियंत्रित करने का कार्यक्रम चलाने वालों के लिए और भी बड़ा घनचक्कर सामने खड़ा हो गया उनको अपना अस्त्र-सस्त्र सहित समर्पित करने हेतु बाध्य कर देने का। 

नोट: As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY word used for me, उस सम्बन्ध में: बड़े भाई को और गुरुदेव श्रद्धेय सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी(ब्रह्मा) जी को सम्मान था मेरे द्वारा उनके शिष्य, मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) और परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण श्रद्धेय डॉ प्रेमचंद(शिव), के माध्यम से, की ईसाइयत को उसके चरमोत्कर्ष पर पहुंचने का मौक़ा मिला| वास्तविकता यह की दलित ईसाई समाज में इतनी अवकात और धैर्य कहाँ था की वे ईसाइयत के चरमोत्कर्ष को पचा पाते तो अब ईसाइयत (हिन्दू मान्यता के अनुसार ईसाइयत क्या है की हम सांस्कृतिक रूप से हम अपने को उनसे उच्च पाते है और यहाँ भी वही हुआ की हम त्याग, बलिदान और तप में उनसे उच्च सिद्ध हुए) का वास्तविक चेहरा उजागर हो गया है और वह चरमोत्कर्ष यह की मेरा विकल्प उनके पास न कभी था और न अभी तक हुआ और न आगे होगा और उनको सनातन हिन्दू सस्कृति की श्रेष्ठता पर अब कभी प्रश्नचिन्ह नहीं उठाना चाहिए और यह स्वीकार कर लेना चाहिए की सप्तर्षि के नियमों और प्राकृतिक सूत्रों में बद्ध सनातन हिन्दू धर्म ही सबका बाप है| उस पर प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज में ही मेरे समर्पण को न पहचान या उसको अनदेखा कर केदारेश्वर (+ महामृत्युंजय+विश्वेश्वर/विश्वनाथ) को प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज में ही उनके ही उचित स्थान और अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगे( जिसका विकल्प तो संभव ही नहीं था पर पूरा एंडी-छोटी का जोर लगाया गया पूरे 14 वर्ष और अब उन पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वादी और काशीवादी होने का आरोप लगा प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज में उनके साथ अभी तक पक्षपात जारी रहा हो इसी प्रयाग में) तो फिर स्वयं विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव को अपना निर्णय स्वयं सुनाना ही था। इसके साथ ही साथ यह भी कहना चाहूँगा की ऐसे कार्यों से यही विदित होता है की प्रयागराज वाशी और स्वयं प्रयागराज विश्विद्यालय के लोग प्रयागराज विश्विद्यालय अपना राज्य स्तर पुनः प्राप्त कर ले इस हेतु अपना प्रयत्न प्रारम्भ कर चुके हैं?

नोट: As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY word used for me, उस सम्बन्ध में: बड़े भाई को और गुरुदेव श्रद्धेय सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी(ब्रह्मा) जी को सम्मान था मेरे द्वारा उनके शिष्य, मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) और परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण श्रद्धेय डॉ प्रेमचंद(शिव), के माध्यम से, की ईसाइयत को उसके चरमोत्कर्ष पर पहुंचने का मौक़ा मिला| वास्तविकता यह की दलित ईसाई समाज में इतनी अवकात और धैर्य कहाँ था की वे ईसाइयत के चरमोत्कर्ष को पचा पाते तो अब ईसाइयत (हिन्दू मान्यता के अनुसार ईसाइयत क्या है की हम सांस्कृतिक रूप से हम अपने को उनसे उच्च पाते है और यहाँ भी वही हुआ की हम त्याग, बलिदान और तप में उनसे उच्च सिद्ध हुए) का वास्तविक चेहरा उजागर हो गया है और वह चरमोत्कर्ष यह की मेरा विकल्प उनके पास न कभी था और न अभी तक हुआ और न आगे होगा और उनको सनातन हिन्दू सस्कृति की श्रेष्ठता पर अब कभी प्रश्नचिन्ह नहीं उठाना चाहिए और यह स्वीकार कर लेना चाहिए की सप्तर्षि के नियमों और प्राकृतिक सूत्रों में बद्ध सनातन हिन्दू धर्म ही सबका बाप है|    उस पर प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज में ही मेरे समर्पण को न पहचान या उसको अनदेखा कर केदारेश्वर (+ महामृत्युंजय+विश्वेश्वर/विश्वनाथ) को प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज में ही उनके ही उचित स्थान और अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगे( जिसका विकल्प तो संभव ही नहीं था पर पूरा एंडी-छोटी का जोर लगाया गया पूरे 14 वर्ष और अब उन पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वादी और काशीवादी होने का आरोप लगा प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज में उनके साथ अभी तक पक्षपात जारी रहा हो इसी प्रयाग में) तो फिर स्वयं विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव को अपना निर्णय स्वयं सुनाना ही था। इसके साथ ही साथ यह भी कहना चाहूँगा की ऐसे कार्यों से यही विदित होता है की प्रयागराज वाशी और स्वयं प्रयागराज विश्विद्यालय के लोग प्रयागराज विश्विद्यालय अपना राज्य स्तर पुनः प्राप्त कर ले इस हेतु अपना प्रयत्न प्रारम्भ कर चुके हैं?  

मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है| 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है|
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।
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Friday, December 25, 2015

श्रीरामकृष्ण=शिवरामकृष्ण जो यथार्थ में महाशिव है और इस महाशिव को ही श्रीराम मतलब रामजानकी कहते है पर सांसारिकता की समझ में श्रीरामकृष्ण या शिवरामकृष्ण ही पूर्ण समझे जाते हैं तो वह अवस्था प्राप्त हो चुकी है हमें। >>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन स्वयं महाशिव मतलब आदिदेव, शिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन और इस अर्धनारीश्वर की नारी, शिवा/सती/पारवती/गिरिजा/गौरी/उमा/अपर्णा/त्रिलोचनी/त्रयंबकी/त्रिनेत्री के तीसरे नेत्र हैं और इस प्रकार उनकी भी सुरक्षा की आतंरिक शक्ति होने के से उनके भी संरक्षक होने के नाते महाशिव भी हैं और आदिदेवी सरस्वती के प्रथम और जेष्ठ मानस पुत्र भी हैं यह उधेड़बुन कभी पूर्ण से पूर्ण व्यक्तित्व नहीं समझ सका तो फिर सामान्य मानव को समझाने की जरूरत ही क्या है? इसे समझने के लिए ही तो स्वयं विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव को श्रीरामकृष्ण मतलब शिवरामकृष्ण मतलब पूर्ण महाशिव पड़ा। लेकिन मानवमात्र के सामने प्रश्नचिन्ह तो लग ही जाता है की महादेवी कौन महासरस्वती या महागौरी? मतलब महासरस्वती की नातिन, महागौरी ((ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज, दक्ष की पुत्री थीं सती जिनसे प्रथम विवाह केदारेश्वर((+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर/विश्वनाथ) मतलब आदिशिव से हुआ था)) जिनकी आतंरिक शक्ति विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव है, वे महादेवी या आदिदेवी महासरस्वती जिनके प्रथम और ज्येष्ठ मानसपुत्र विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव स्वयं है, वे ही स्वयं में महादेवी? जब महासरस्वती और महागौरी में कौन महादेवी है इसे ही दुनिया यही नहीं समझ सकी तो फिर विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव को क्या समझती? उस पर यदि वही विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव ग्रह नक्षत्र से गिरिधारी((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) भी रहा हो तो फिर हो चुका समझना सभी का। अतः बोल दिया था की जो चौदह वर्ष पूर्व हुआ वह मेरे पिता प्रदीप((श्रीरामजानकी/सत्यनारायण/विक्रमादित्य(=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो)/सूर्यनाथ/सूर्यकान्त//आदित्यनाथ)) का पुरुषार्थ था और उस समय से लेकर आज तक इस चौदह वर्ष दौरान जो कुछ हुआ और इसके साथ ही साथ आज से 7 वर्ष पूर्व जो कुछ विशेष हुआ है वह भी मेरी शक्ति और पुरुषार्थ से हुआ है और आगे भी 2057 तक मुझसे ही होता रहेगा।<<<<श्रीरामकृष्ण= शिवरामकृष्ण जो यथार्थ में महाशिव है और इस महाशिव को ही श्रीराम मतलब रामजानकी कहते है पर सांसारिकता की समझ में श्रीरामकृष्ण या शिवरामकृष्ण ही पूर्ण समझे जाते हैं तो वह अवस्था प्राप्त हो चुकी है हमें। वास्तविक जन्म तिथि : 11-11-1975, 9.15 सुबह (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी), ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि अर्ध कुम्भ और अर्ध मकर।

श्रीरामकृष्ण=शिवरामकृष्ण जो यथार्थ में महाशिव है और इस महाशिव को ही श्रीराम मतलब रामजानकी कहते है पर सांसारिकता की समझ में श्रीरामकृष्ण या शिवरामकृष्ण ही पूर्ण समझे जाते हैं तो वह अवस्था प्राप्त हो चुकी है हमें। >>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन स्वयं महाशिव मतलब आदिदेव, शिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन और इस अर्धनारीश्वर की नारी, शिवा/सती/पारवती/गिरिजा/गौरी/उमा/अपर्णा/त्रिलोचनी/त्रयंबकी/त्रिनेत्री  के तीसरे नेत्र  हैं और इस प्रकार उनकी भी सुरक्षा की आतंरिक शक्ति होने के से उनके भी संरक्षक होने के नाते महाशिव भी हैं और आदिदेवी सरस्वती के प्रथम और जेष्ठ मानस पुत्र भी हैं यह उधेड़बुन कभी पूर्ण से पूर्ण व्यक्तित्व नहीं समझ सका तो फिर सामान्य मानव को समझाने की जरूरत ही क्या है? इसे समझने के लिए ही तो स्वयं विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव को श्रीरामकृष्ण मतलब शिवरामकृष्ण मतलब पूर्ण महाशिव पड़ा। लेकिन मानवमात्र के सामने प्रश्नचिन्ह तो लग ही जाता है की महादेवी कौन महासरस्वती या महागौरी? मतलब महासरस्वती की नातिन, महागौरी ((ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज, दक्ष की पुत्री थीं सती जिनसे प्रथम विवाह केदारेश्वर((+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर/विश्वनाथ) मतलब आदिशिव से हुआ था)) जिनकी आतंरिक शक्ति विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव है, वे महादेवी या आदिदेवी महासरस्वती जिनके प्रथम और ज्येष्ठ मानसपुत्र  विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव स्वयं है, वे ही स्वयं में महादेवी?  जब महासरस्वती और महागौरी में कौन महादेवी है इसे ही दुनिया यही नहीं समझ सकी तो फिर विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव को क्या समझती? उस पर यदि वही विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव ग्रह नक्षत्र  से गिरिधारी((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) भी रहा हो तो फिर हो चुका समझना सभी का। अतः बोल दिया था की जो चौदह वर्ष पूर्व हुआ वह मेरे पिता प्रदीप((श्रीरामजानकी/सत्यनारायण/विक्रमादित्य(=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो)/सूर्यनाथ/सूर्यकान्त//आदित्यनाथ))  का पुरुषार्थ था और उस समय से लेकर आज तक इस चौदह वर्ष  दौरान जो कुछ हुआ और इसके साथ ही साथ आज से 7 वर्ष पूर्व जो कुछ विशेष हुआ है वह भी मेरी शक्ति और पुरुषार्थ से हुआ है और आगे भी 2057 तक मुझसे ही होता रहेगा।<<<<श्रीरामकृष्ण= शिवरामकृष्ण जो यथार्थ में महाशिव है और इस महाशिव को ही श्रीराम मतलब रामजानकी कहते है पर सांसारिकता की समझ में श्रीरामकृष्ण या शिवरामकृष्ण ही पूर्ण समझे जाते हैं तो वह अवस्था प्राप्त हो चुकी है हमें। वास्तविक जन्म तिथि : 11-11-1975, 9.15 सुबह (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी), ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि अर्ध कुम्भ और अर्ध मकर।
केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवम महासागरीय अध्ययन केंद्र
Ramapur
Bishunpur, Jaunpur

To continue the World humanity successfully a continuous drainage of human resources from India is on/continue from beginning of the human culture which reached to its peak point at this time, so that India's own share of human resource has remained only for that limit which is necessary for its own survival and therefore remains at that extent only which can say a necessary limit to continue or to maintain the world humanity, centered from the India (i.e. from Prayag-Kashi i.e from the confluence of the three major thoughts to govern the world humanity i.e. from the confluence of the 1st-Hindu (Idea and thoughts based climate, profession and birth in the particular specific family-valued cultured family, Brahmin, Kshatriy and Vaisya Jaati / Dharm / Sampraday / Religion), 2nd-Idea and thoughts based on the survival in the particular climate of the particular region of the earth where their origin considered- Islamic and 3rd-Idea and thoughts based on the survival in the particular climate of the particular region of the earth where their origin considered- under grounded Christianity Religion / Dharm / Sampraday and their parallel and counter parts. I hope that now this human resource drainage should be either stop from India or this World system should become a whole World in a single village system.

To continue the World humanity successfully a continuous drainage of human resources from India is on/continue from beginning of the human culture which reached to its peak point at this time, so that India's own share of human resource has remained only  for that limit  which is necessary for its own survival and therefore remains at that extent only which can say a necessary limit to continue or to maintain the world humanity, centered from the India (i.e. from Prayag-Kashi i.e from the confluence of the three major thoughts to govern the world humanity i.e. from  the confluence of the 1st-Hindu (Idea and thoughts based climate, profession and birth in the particular specific family-valued cultured family, Brahmin, Kshatriy and Vaisya Jaati / Dharm / Sampraday / Religion), 2nd-Idea and thoughts based on the survival in the particular climate of the particular region of the earth where their origin considered- Islamic and 3rd-Idea and thoughts based on the survival in the particular climate of the particular region of the earth where their origin considered- under grounded Christianity Religion / Dharm / Sampraday and their parallel and counter parts. I hope that now this human resource drainage should be either stop from India or this World system should become a whole World in a single village system.

Tuesday, December 22, 2015

मै काशीराम जी को विशेष धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने गालियाँ खाई और गालियाँ दी मतलब फाल्गुन माह जैसी गालियों की होली खेली पर सनातन हिन्दू धर्म का दामन नहीं छोड़ा और उसमे विशेषरूप जगजीवन राम और उनके परिवार को जिन्होंने अपने मुख से कभी गाली भी नहीं निकाली थी सम्पूर्ण जीवन भर और उस अम्बेडकर जी को भी जिन्होंने एक कदम उठाया जरूर वह कदम गौतम गोत्रियों के द्वारा चलाये पंथ में ही गिरा परन्तु विपरीत नहीं हो सका। यह उनका मतभेद जरूर था पर इसे मनभेद में उन्होंने कभी नहीं बदला। अतः मैं ऐसे उन दृणः हिन्दू लोगों के चेहरों, विचारों और अंतर्मन को सादर, सहर्ष और सम्मान सहित अभिवादन करता हूँ।

मै काशीराम जी को विशेष धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने गालियाँ खाई और गालियाँ दी मतलब फाल्गुन माह जैसी गालियों की होली खेली पर सनातन हिन्दू धर्म का दामन नहीं छोड़ा और उसमे विशेषरूप  जगजीवन राम और उनके परिवार को जिन्होंने अपने मुख से कभी गाली भी नहीं निकाली थी सम्पूर्ण जीवन भर और उस अम्बेडकर जी को भी जिन्होंने एक कदम उठाया जरूर वह कदम गौतम गोत्रियों के द्वारा चलाये पंथ में ही गिरा परन्तु विपरीत नहीं हो सका। यह उनका मतभेद जरूर था पर इसे मनभेद में उन्होंने कभी नहीं बदला। अतः मैं ऐसे उन दृणः हिन्दू लोगों के चेहरों, विचारों और अंतर्मन को सादर, सहर्ष और सम्मान सहित अभिवादन करता हूँ। 

किशी भी एक क्षेत्र का विषय विशेसज्ञ हो सकने की क्षमता रखने वाले को अगर 1992 -1993 से साम्यवाद=मार्क्सवाद=सांख्यवाद =अंकवाद=पदनाम बढ़ा दो घटा दो वाद=विषय वार अंक घटा दो बढ़ा दो वाद तथा तथाकथित सामजिक न्याय(दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र और क्रिश्चियनिटी अस्त्र=अल्पसंख्यक अस्त्र) द्वारा "social and educational interface"="सोसल एण्ड एजुकेसनल इंटरफ़ेस"="सामाजिक और शैक्षिक अंतःपरत", बना दिया गया था। तो समझिए की यह कितना कष्टकारी और चुनौती भरा दायित्व था और जो 50% दलित और 50% पिछड़ा के बीच 4 वर्ष अकेला ब्राह्मण रहते हुए भी सम्मान पूर्वक श्रेष्ठतम छात्र जीवन जिया हो 4-5 इस्लाम अनुयायी और 3 क्षत्रिय और लगभग 3 वैश्य के बीच तो वह निश्चित समझ सकता था की चुनौती वैश्विक और सम्पूर्ण मानवता में ईसाइयत विचारों के चरमउत्कर्ष से भरी हुयी थी जिसका जबाब यही था की मेरे साथ सम्पूर्ण सृस्टि का विनाश पर उसे श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(शिव) की उदारता-मानवता और उनके द्वारा निर्देशित मेरे समर्पण ने बचा लिया। समर्पण इस लिए क्योंकि मै एक पूर्ण ब्रह्मचर्य 25-26 वर्ष का ब्राह्मण था और परिणाम मुझे ज्ञात था और लड़ाई जारी रहती तब बलिदान कहा जाता पर मानवता के कल्याण हेतु(जिस तरह अभी मुझे विजय मिली है तब भी विजय ही मिलती सत्य का पीछा करने पर भी पर मानवता के पूर्ण संहार से या उसके पूर्व ही केवल कुछ हद तक संहार होने के वाद) सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, श्रीधर(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा:पार्वती:सती का भोग्य=आहार=अर्पनेय) पाण्डेय ब्राह्मण, प्रेमचंद(शिव) के कहने पर मैंने समर्पण किया क्योंकि सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, श्रीधर(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा:पार्वती:सती का भोग्य=आहार=अर्पनेय) पाण्डेय ब्राह्मण, प्रेमचंद(शिव) क्रमसः मेरे परगुरु परम पिता परमेश्वर और परमपिता परमेश्वर थे अतः मेरा समर्पण उनका समर्पण था और इस प्रकार गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा), ब्रह्मा की श्रिष्टि सुरक्षित और संरक्षित रही और प्रत्यक्ष जन के लिए संवर्धन और संकलन जारी रहते हुए ब्रह्मा के लक्ष्य की पूर्ती भी हुई और इस ब्रह्मा का वरदान मतलब "सृस्टि सञ्चालन और उस निमित्त निर्धारित कार्य" होते और चलते रहे । तो इस प्रकार गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) के लक्ष्य की पूर्ण पूर्ती यदि श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(शिव) व् उनके समर्थको व् भक्तो द्वारा हुई इसका मतलब यह नहीं हुआ की मानवता के किशी अंश के विपरीत या विरोध में किशी कार्य की संस्तुति मेरे द्वारा की गयी।

किशी भी एक क्षेत्र का विषय विशेसज्ञ हो सकने की क्षमता रखने वाले को अगर 1992 -1993 से साम्यवाद=मार्क्सवाद=सांख्यवाद =अंकवाद=पदनाम बढ़ा दो घटा दो वाद=विषय वार अंक घटा दो बढ़ा दो वाद तथा तथाकथित सामजिक न्याय(दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र और क्रिश्चियनिटी अस्त्र=अल्पसंख्यक अस्त्र) द्वारा "social and educational interface"="सोसल एण्ड एजुकेसनल इंटरफ़ेस"="सामाजिक और शैक्षिक अंतःपरत", बना दिया गया था। तो समझिए की यह कितना कष्टकारी और चुनौती भरा दायित्व था और जो 50% दलित और 50% पिछड़ा के बीच 4 वर्ष अकेला ब्राह्मण रहते हुए भी सम्मान पूर्वक श्रेष्ठतम छात्र जीवन जिया हो 4-5 इस्लाम अनुयायी और 3 क्षत्रिय और लगभग 3 वैश्य के बीच तो वह निश्चित समझ सकता था की चुनौती वैश्विक और सम्पूर्ण मानवता में ईसाइयत विचारों के चरमउत्कर्ष से भरी हुयी थी जिसका जबाब यही था की मेरे साथ सम्पूर्ण सृस्टि का विनाश पर उसे श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(शिव) की उदारता-मानवता और उनके द्वारा निर्देशित मेरे समर्पण ने बचा लिया। समर्पण इस लिए क्योंकि मै एक पूर्ण ब्रह्मचर्य 25-26 वर्ष का ब्राह्मण था और परिणाम मुझे ज्ञात था और लड़ाई जारी रहती तब बलिदान कहा जाता पर मानवता के कल्याण हेतु(जिस तरह अभी मुझे विजय मिली है तब भी विजय ही मिलती सत्य का पीछा करने पर भी पर मानवता के पूर्ण संहार से या उसके पूर्व ही केवल कुछ हद तक संहार होने के वाद) सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, श्रीधर(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा:पार्वती:सती का भोग्य=आहार=अर्पनेय) पाण्डेय ब्राह्मण, प्रेमचंद(शिव) के कहने पर मैंने समर्पण किया क्योंकि सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, श्रीधर(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा:पार्वती:सती का भोग्य=आहार=अर्पनेय) पाण्डेय ब्राह्मण, प्रेमचंद(शिव) क्रमसः मेरे परगुरु परम पिता परमेश्वर और परमपिता परमेश्वर थे अतः मेरा समर्पण उनका समर्पण था और इस प्रकार गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा), ब्रह्मा की श्रिष्टि सुरक्षित और संरक्षित रही और प्रत्यक्ष जन के लिए संवर्धन और संकलन जारी रहते हुए ब्रह्मा के लक्ष्य की पूर्ती भी हुई और इस ब्रह्मा का वरदान मतलब "सृस्टि सञ्चालन और उस निमित्त निर्धारित कार्य" होते और चलते रहे । तो इस प्रकार गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) के लक्ष्य की पूर्ण पूर्ती यदि श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(शिव) व् उनके समर्थको व् भक्तो द्वारा हुई इसका मतलब यह नहीं हुआ की मानवता के किशी अंश के विपरीत या विरोध में किशी कार्य की संस्तुति मेरे द्वारा की गयी। 

गुरु जी मै किशी को भूल गया ऐसा कैसे हो सकता है: अगर गुरूदेव जोशी को ब्रह्मा कहा तो श्रीधर(विष्णु) क्या आप के परिवार का ही वर्णन नहीं और प्रेमचंद(शिव) भी आप लोगों के परिवार का वर्णन नहीं स्वयं मुझे भी इसी दोनों विभागों में ला दिया गया था जबकि मेरा आप तीनों परिवारों पर पूर्ण अधिकार है। दुनिया का कौन सा जाति और धर्म समूह है जो इन तीनों में आकर समाहित नहीं हो जाता है। कहने के लिए हम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, मुस्लिम और ईसाई व् पूरक जाति/धर्म इस दुनिया में भले हों। बचपन से सुने जाने वाले प्रयागराज विश्विद्यालय से गुरुदेव श्रृंखला रज्जु भैया, बालकृष्ण अग्रवाल, राजेंद्र अग्रवाल, गौर जी व् अन्य अन्य पूरक लोगों के नाम को भूल गया ऐसा कैसे हो सकता है? यही नहीं दूसरी विचारधारा से सम्बंधित सुने जाने वाले नाम भी नहीं भूला हूँ पर यहां वे नाम इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि उनसे मिला ही नहीं कभी यहाँ आकर और यहाँ का होकर। राष्ट्रीय स्तर पर किशी नाम लिए बगैर यहाँ प्रयागराज( जहाँ से मानवता का सञ्चालन निर्धारित किया जाता है या मानवता नियंत्रित होती है) से जो नाम थे इसके साथ उसमे सर्वविदित त्रिपाठी जी , अव्यक्तराम जी, विश्वनाथ जी, राकेशधर जी और प्रभुनाथ जी जैसे संगठन के लिए कार्यरत और राजनैतिक नाम श्रृंखला के साथ-साथ समाज के विपरीत दिशा में ही चलने के लिए मसहूर पर समाज के हित में सिद्ध होने वाले अनगिनत नाम शामिल है प्रयागराज से किस-किस का नाम लेता इसीलिए गुरूजी, गुरूदेव जोशी (ब्रह्मा) में न ही सही बैठते हों आप तो क्या? श्रीधर(विष्णु) क्या आप के परिवार का ही वर्णन नहीं और प्रेमचंद(शिव) भी आप लोगों के परिवार का वर्णन नहीं स्वयं मुझे भी इसी दोनों विभागों में ला दिया गया था जबकि मेरा आप तीनों परिवारों पर पूर्ण अधिकार है।

गुरु जी मै किशी को भूल गया ऐसा कैसे हो सकता है: अगर गुरूदेव जोशी को ब्रह्मा कहा तो श्रीधर(विष्णु) क्या आप के परिवार का ही वर्णन नहीं और प्रेमचंद(शिव) भी आप लोगों के परिवार का वर्णन नहीं स्वयं मुझे भी इसी दोनों विभागों में ला दिया गया था जबकि मेरा आप तीनों परिवारों पर पूर्ण अधिकार है। दुनिया का कौन सा जाति और धर्म समूह है जो इन तीनों में आकर समाहित नहीं हो जाता है। कहने के लिए हम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, मुस्लिम और ईसाई व् पूरक जाति/धर्म इस दुनिया में भले हों। बचपन से सुने जाने वाले प्रयागराज विश्विद्यालय से गुरुदेव श्रृंखला रज्जु भैया, बालकृष्ण अग्रवाल, राजेंद्र अग्रवाल, गौर जी व् अन्य अन्य पूरक लोगों के नाम को भूल गया ऐसा कैसे हो सकता है? यही नहीं दूसरी विचारधारा से सम्बंधित सुने जाने वाले नाम भी नहीं भूला हूँ पर यहां वे नाम इसलिए नहीं ले सकता क्योंकि उनसे मिला ही नहीं कभी यहाँ आकर और यहाँ का होकर। राष्ट्रीय स्तर पर किशी नाम लिए बगैर यहाँ प्रयागराज( जहाँ से मानवता का सञ्चालन निर्धारित किया जाता है या मानवता नियंत्रित होती है) से जो नाम थे इसके साथ उसमे सर्वविदित त्रिपाठी जी , अव्यक्तराम जी, विश्वनाथ जी, राकेशधर जी और प्रभुनाथ  जी जैसे संगठन के लिए कार्यरत और राजनैतिक नाम श्रृंखला के साथ-साथ समाज के विपरीत दिशा में ही चलने के लिए मसहूर पर समाज के हित में सिद्ध होने वाले अनगिनत नाम शामिल है प्रयागराज से किस-किस का नाम लेता इसीलिए गुरूजी, गुरूदेव जोशी (ब्रह्मा) में न ही सही बैठते हों आप तो क्या? श्रीधर(विष्णु) क्या आप के परिवार का ही वर्णन नहीं और प्रेमचंद(शिव) भी आप लोगों के परिवार का वर्णन नहीं स्वयं मुझे भी इसी दोनों विभागों में ला दिया गया था जबकि मेरा आप तीनों परिवारों पर पूर्ण अधिकार है।

Friday, December 18, 2015

ब्राह्मण=ब्रह्म/परमब्रह्म जानाति सह ब्रह्मणः मतलब जो ब्रह्म=परमब्रह्म को जाने और समझे वह ब्राह्मण; विप्र=विपुल प्रदाता मतलब जो समाज से थोड़ा संचय के बदले उससे कहीं ज्यादा प्रदान करे मतलब उससे कहीं ज्यादा दे वह विप्र है; द्विज: स्वर्गलोक के देवताओं के स्थान पर पृथ्वी लोक मतलब महि=पृथ्वी पर दूसरी श्रेणी के देवता मतलब द्वि जन=द्विज; महिसुर=महि + सुर= पृथ्वी के देवता मतलब द्विज मतलब विप्र मतलब ब्राह्मण। मित्रों लक्ष्मण ने कहा था की "सुर, महिसुर, हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई।।" मतलब हमारे रघुवंश/इक्षाकुवंश/----/सूर्यवंश/----/कश्यप गोत्र में " देवतुल्य आचरण करने वाले देवता , पृथ्वी के देवता मतलब ब्राह्मण, हरिजन मतलब इस्वर में आस्था रखने वाले इस्वर के भक्त और गाय मतलब गौ माता पर हम बल प्रयोग नहीं करते हैं"। तो देवताओं के गुरु, गुरु बृहस्पति/सनातन आंगिरस गोत्रीय मतलब तत्कालीन पूर्ण ब्रह्मा सदृश जोशी गुरु को वैश्विक परिदृश्य और वैश्विक आचरण में सर्वोच्च मानते हुए ऐसे गुरु के परम उद्देश्य की पूर्ण पूर्ती के लिए स्वयं को हर दृस्टि से समर्पित कर देना मेरे तथाकथित खानदानी पागल खानदान मतलब मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा=पारवती=सती=उमा=अपर्णा =गिरिजा=गौरी का भोज्य-आहार या उन पर अर्पित होने वाला उनका भोग=बेलपत्र= विल्वापत्र ) पाण्डेय ब्राह्मण खानदान के लिए उचित किस प्रकार नहीं था ? लेकिन उनके व्यक्तिगत जीवन के भक्त को अपनी सीमा में स्वयं रहना चाहिए क्योंकि यह समर्पण स्वयं सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, श्रीधर(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, डॉ. प्रेमचंद(शिव) की तरफ से किया गया है और इस प्रकार गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) के पूर्ण कार्य पूर्ती हेतु हर प्रकार का समर्पण विष्णु और शिव भक्तों के समूह की तरफ से हुआ है, तो इसका श्रेय उनके व्यक्तिगत भक्त को नहीं लेना चाहिए और न इसका प्रयास करना चाहिए बल्कि उन्होंने गुरुदेव जोशी के लिए व्यक्तिगत जीवन में जो किया है केवल वे उस कार्य के बदले जो श्रेय हो उसे वे ले सकते हैं ।

ब्राह्मण=ब्रह्म/परमब्रह्म जानाति सह ब्रह्मणः मतलब जो ब्रह्म=परमब्रह्म को जाने और समझे वह ब्राह्मण; विप्र=विपुल प्रदाता मतलब जो समाज से थोड़ा संचय के बदले उससे कहीं ज्यादा प्रदान करे मतलब उससे कहीं ज्यादा दे वह विप्र है; द्विज: स्वर्गलोक के देवताओं के स्थान पर पृथ्वी लोक मतलब महि=पृथ्वी पर दूसरी श्रेणी के देवता मतलब द्वि जन=द्विज; महिसुर=महि + सुर= पृथ्वी के देवता मतलब द्विज मतलब विप्र मतलब ब्राह्मण। मित्रों लक्ष्मण ने कहा था की "सुर, महिसुर, हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई।।" मतलब हमारे रघुवंश/इक्षाकुवंश/----/सूर्यवंश/----/कश्यप गोत्र में " देवतुल्य आचरण करने वाले देवता , पृथ्वी के देवता मतलब ब्राह्मण, हरिजन मतलब इस्वर में आस्था रखने वाले इस्वर के भक्त और गाय मतलब गौ माता पर हम बल प्रयोग नहीं करते हैं"। तो देवताओं के गुरु, गुरु बृहस्पति/सनातन आंगिरस गोत्रीय मतलब तत्कालीन पूर्ण ब्रह्मा सदृश जोशी गुरु को वैश्विक परिदृश्य और वैश्विक आचरण में सर्वोच्च मानते हुए ऐसे गुरु के परम उद्देश्य की पूर्ण पूर्ती के लिए स्वयं को हर दृस्टि से समर्पित कर देना मेरे तथाकथित खानदानी पागल खानदान मतलब मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा=पारवती=सती=उमा=अपर्णा =गिरिजा=गौरी का भोज्य-आहार या उन पर अर्पित होने वाला उनका भोग=बेलपत्र= विल्वापत्र ) पाण्डेय ब्राह्मण खानदान के लिए उचित किस प्रकार नहीं था ? लेकिन उनके व्यक्तिगत जीवन के भक्त को अपनी सीमा में स्वयं रहना चाहिए क्योंकि यह समर्पण स्वयं सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, श्रीधर(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, डॉ. प्रेमचंद(शिव) की तरफ से किया गया है और इस प्रकार गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) के पूर्ण कार्य पूर्ती हेतु हर प्रकार का समर्पण विष्णु और शिव भक्तों के समूह की तरफ से हुआ है, तो इसका श्रेय उनके व्यक्तिगत भक्त को नहीं लेना चाहिए और न इसका प्रयास करना चाहिए बल्कि उन्होंने गुरुदेव जोशी के लिए व्यक्तिगत जीवन में जो किया है केवल वे उस कार्य के बदले जो श्रेय हो उसे वे ले सकते हैं ।

कश्यप के पास विहंगम पुरुषार्थ मौजूद होने के कारन नियंत्रण दायित्व जरूर है सप्तर्षि जनित मानवता का पर इसके बावजूद कश्यप की अभीष्ट आस्था और श्रद्धा-भक्ति अपने जिन दो छोटे भाइयों के प्रति रहती है वह हैं गौतम और वशिष्ठ और विशेस रूप से वे इन दोनों की मान-प्रतिष्ठा को अपनी तथा अपने अन्य भाइयों की मान और प्रतिष्ठा से ऊपर महत्त्व देते है।

कश्यप के पास विहंगम पुरुषार्थ मौजूद होने के कारन नियंत्रण दायित्व जरूर है सप्तर्षि जनित मानवता का पर इसके बावजूद कश्यप की अभीष्ट आस्था और श्रद्धा-भक्ति अपने जिन दो छोटे भाइयों के प्रति रहती है वह हैं गौतम और वशिष्ठ और विशेस रूप से वे इन दोनों की मान-प्रतिष्ठा को अपनी तथा अपने अन्य भाइयों की मान और प्रतिष्ठा से ऊपर महत्त्व देते है।

एक मुस्लिम/इस्लाम अनुयायी भाई ने कहा की यहाँ(प्रयागराज) में केवल चार और सात प्वायंट ही हैं पाँचवा और आठवाँ प्वायंट नहीं है पर मेरे भाई शायद आप को ज्ञात नहीं की पांचवा प्वायंट यहां अदृश्य है पर उसका भी अस्तित्व है, और सात मतलब सप्तर्षि का आठवाँ(अष्टक) मलय/तमिल-केरल क्षेत्र में जन्म लिया था सभी सातों के सम्मिलन के उदभव के रूप में तो पाँच और आठ भी अस्तित्व में हैं।

एक मुस्लिम/इस्लाम अनुयायी भाई ने कहा की यहाँ(प्रयागराज) में केवल चार और सात प्वायंट ही हैं पाँचवा और आठवाँ प्वायंट नहीं है पर मेरे भाई शायद आप को ज्ञात नहीं की पांचवा प्वायंट यहां अदृश्य है पर उसका भी अस्तित्व है, और सात मतलब सप्तर्षि का आठवाँ(अष्टक) मलय/तमिल-केरल क्षेत्र में जन्म लिया था सभी सातों के सम्मिलन के उदभव के रूप में तो पाँच और आठ भी अस्तित्व में हैं।

Thursday, December 17, 2015

इससे ज्ञात होता है क कश्यप ऋषि का प्रयागराज/इलाहाबाद की संस्कृति से सम्बन्ध भारद्वाज और कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) से भी आदिकालीन का सम्बन्ध(सप्तर्षि काल के बाद से ही देखने पर भी) है।>>>कश्यप ऋषि के वंसज इक्षाकु के वंसज रघु और इला में से इला के नाम से इलाहाबाद=इला आवास=इला आबाद तो कश्यप की शिष्य परम्परा में आने वाले भारद्वाज ऋषि (कश्यप और अदिति के पुत्र, आदित्य के पुत्र, वरुण के पुत्र, वाल्मीकि के शिष्य, भारद्वाज जिनके शिष्य स्वयं गर्ग ऋषि थे) से किस प्रकार कोई कम नाता कश्यप ऋषी से है इस प्रयागराज का। भगवान विष्णु जो मोहिनी रूप धारण करने में प्रवीण थे और जिनका स्थान प्रयागराज ही है उन्हीं की तर्ज पर चन्द्रवंश के प्रथम उदीय राजतन्त्र और राजा इला को भी लिंग परिवर्तन का विज्ञान ज्ञात था और वे इसका प्रयोग करते है और जब इला और रघु दोनो इक्षाकु वंशीय तो दोनों सूर्यवंशीय ही हुए क्योंकि इक्षाकु सूर्यवंशीय ही हुए और इस प्रकार यदि प्रथम चन्द्र वंशीय राजा इला सूर्यवंश वंसज इक्षाकु के ही पुत्र तो चन्द्र वंश का प्रामाणिक उद्भव सूर्यवंश ही होगा। पर जहाँ इला ने लिंग परिवर्तन विज्ञान का अपने जीवन में प्रयोग किया वही दूसरी और रघु भी इक्षाकुवंशीय होने के बाद भी लिंगपरिवर्तन विज्ञान का कभी प्रयोग नहीं किया।>>>इससे ज्ञात होता है क कश्यप ऋषि का प्रयागराज/इलाहाबाद की संस्कृति से सम्बन्ध भारद्वाज और कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) से भी आदिकालीन का सम्बन्ध(सप्तर्षि काल के बाद से ही देखने पर भी) है।

इससे ज्ञात होता है क कश्यप ऋषि का प्रयागराज/इलाहाबाद की संस्कृति से सम्बन्ध भारद्वाज और कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) से भी आदिकालीन का सम्बन्ध(सप्तर्षि काल के बाद से ही देखने पर भी) है>>>कश्यप ऋषि के वंसज इक्षाकु के वंसज रघु और इला में से इला के नाम से इलाहाबाद=इला आवास=इला आबाद तो कश्यप की शिष्य परम्परा में आने वाले भारद्वाज ऋषि (कश्यप और अदिति के पुत्र, आदित्य के पुत्र, वरुण के पुत्र, वाल्मीकि के शिष्य, भारद्वाज जिनके शिष्य स्वयं गर्ग ऋषि थे) से किस प्रकार कोई कम नाता कश्यप ऋषी से है इस प्रयागराज का। भगवान विष्णु जो मोहिनी रूप धारण करने में प्रवीण थे और जिनका स्थान प्रयागराज ही है उन्हीं की तर्ज पर चन्द्रवंश के प्रथम उदीय राजतन्त्र और राजा इला को भी लिंग परिवर्तन का विज्ञान ज्ञात था और वे इसका प्रयोग करते है और जब इला और रघु दोनो इक्षाकु वंशीय तो दोनों सूर्यवंशीय ही हुए क्योंकि इक्षाकु सूर्यवंशीय ही हुए और इस प्रकार यदि प्रथम चन्द्र वंशीय राजा इला सूर्यवंश वंसज इक्षाकु के ही पुत्र तो चन्द्र वंश का प्रामाणिक उद्भव सूर्यवंश ही होगा। पर जहाँ इला ने लिंग परिवर्तन विज्ञान का अपने जीवन में प्रयोग किया वही दूसरी और रघु भी इक्षाकुवंशीय होने के बाद भी लिंगपरिवर्तन विज्ञान का कभी प्रयोग नहीं किया।>>>इससे ज्ञात होता है क कश्यप ऋषि का प्रयागराज/इलाहाबाद की संस्कृति से सम्बन्ध भारद्वाज और कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) से भी आदिकालीन का सम्बन्ध(सप्तर्षि काल के बाद से ही देखने पर भी) है।

मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है| 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है|
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।
http://vandemataramvivekananddrvkprssbhupuau.blogspot.in/

मेरे और उनमे ये अंतर यही की मै लोगों को अपना जाति धर्म पालन करते हुए या छोड़कर अपने कर्तव्य को श्रेष्ठतम बनाते हुए मन, कर्म, वाणी और आहार विहार से मानवता के गुणवत्ता परक श्रेणीगत संजीवनी कला ब्राह्मण(उनको सनातन ब्राह्मण तो कोई नही बना सकता), क्षत्रिय और वैश्य बनाने के प्रति प्रेरित कर रहा और एक वे लोग हैं जो एक ब्राह्मण का भी धर्म भ्रस्ट कर नीचे गिराने में लगे हैं। उनका यह कार्य मानवता हित किस प्रकार है?

मेरे और उनमे ये अंतर यही की मै लोगों को अपना जाति धर्म पालन करते हुए या छोड़कर अपने कर्तव्य को श्रेष्ठतम बनाते हुए मन, कर्म, वाणी और आहार विहार से मानवता के गुणवत्ता परक श्रेणीगत संजीवनी कला ब्राह्मण(उनको सनातन ब्राह्मण तो कोई नही बना सकता), क्षत्रिय और वैश्य बनाने के प्रति प्रेरित कर रहा और एक वे लोग हैं जो एक ब्राह्मण का भी धर्म भ्रस्ट कर नीचे गिराने में लगे हैं। उनका यह कार्य मानवता हित किस प्रकार है?

यह है इस इलाहाबाद का सारगर्भित लघु इतिहास और महात्म।>>>>>इलाहाबाद=इला आवास=इला(इला=चन्द्रवंश का प्रथम सत्तात्मक प्रामाणिक शासन इतिहास का अंश जिसको इक्षानुसार लिंग परिवर्तन का विज्ञान प्रयोग में आता था =चन्द्रवंश + रघुवंश कभी भी लिंग परिवर्तन कला का प्रयोग नहीं किया ज्ञान होने पर भी) /इक्शाकुवंश/... /सूर्यवंश/आदित्य/कश्यप ऋषि) आबाद=अल्लाह आबाद=अल्लाह आवास=संगम=त्रिवेणी=प्रयागराज =प्रयाग=प्राक यज्ञ=प्राचीनतम यज्ञ स्थल=त्रिदेव द्वारा किये सप्तर्षि:सात ब्रह्मर्षि प्राकट्य यज्ञ स्थल= ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा कश्यप/मारीच, गौतम, व्यास(पारासर)/शांडिल्य/वशिष्ठ, भारद्वाज/धन्वन्तरि/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय/अत्रि, कौशिक(विश्वामित्र:विश्वरथ) जैसे सात ब्रह्मर्षि मतलब सप्तर्षि के प्राकट्य हेतु किये गए यज्ञ का स्थल जिनसे विश्व मानवता का विकाश हुआ ऋषि संस्कृति प्रयागराज-काशी से होते हुए मानव संस्कृति पंजाब-सिंध((प्रथम ऋषि (कश्यप और अदिति) मतलब मनु श्रद्धा:सतरूपा द्वारा नदी घाटी सभ्यता के द्वारा मानव संस्कृति का प्रारम्भ) और उसका वर्तमान स्वरुप।>>>>यह है इस इलाहाबाद का सारगर्भित लघु इतिहास और महात्म।

यह है इस इलाहाबाद का सारगर्भित लघु इतिहास और महात्म।>>>>>इलाहाबाद=इला आवास=इला(इला=चन्द्रवंश का प्रथम सत्तात्मक प्रामाणिक शासन इतिहास का अंश जिसको इक्षानुसार लिंग परिवर्तन का विज्ञान प्रयोग में आता था =चन्द्रवंश + रघुवंश कभी भी लिंग परिवर्तन कला का प्रयोग नहीं किया ज्ञान होने पर भी) /इक्शाकुवंश/... /सूर्यवंश/आदित्य/कश्यप ऋषि)  आबाद=अल्लाह आबाद=अल्लाह आवास=संगम=त्रिवेणी=प्रयागराज =प्रयाग=प्राक यज्ञ=प्राचीनतम यज्ञ स्थल=त्रिदेव द्वारा किये सप्तर्षि:सात ब्रह्मर्षि प्राकट्य यज्ञ स्थल= ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा कश्यप/मारीच, गौतम, व्यास(पारासर)/शांडिल्य/वशिष्ठ, भारद्वाज/धन्वन्तरि/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय/अत्रि, कौशिक(विश्वामित्र:विश्वरथ) जैसे सात ब्रह्मर्षि मतलब सप्तर्षि के प्राकट्य हेतु किये गए यज्ञ का स्थल जिनसे विश्व मानवता का विकाश हुआ ऋषि संस्कृति प्रयागराज-काशी से होते हुए मानव संस्कृति पंजाब-सिंध((प्रथम ऋषि (कश्यप और अदिति) मतलब मनु श्रद्धा:सतरूपा द्वारा नदी घाटी सभ्यता के द्वारा मानव संस्कृति का प्रारम्भ) और उसका वर्तमान स्वरुप।>>>>यह है इस इलाहाबाद का सारगर्भित लघु इतिहास और महात्म।

Wednesday, December 16, 2015

मेरा सन्देश प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वाशियों और समस्त मानवता के लिए>>>>>>पाँवपूजन विधि से हुए शास्त्रीय विवाह की हिन्दू संस्कृति में दामाद जिसे लोग बनाते वह अपने से उच्च मान ही लिया जाता है पर उमाशंकर जी(जनकजी +ज्ञानेन्द्र जी), मै प्रामाणिक रूप से आप से ऊपर का ही खिलाड़ी हूँ यह मेरी चुनौती थी और वह सिद्ध भी कर चुका हूँ तो आप भी नीचे क्रम की बल्लेवाजी छोड़कर अपनी इक्षाशक्ति के बल पर आप भी ऊपर के क्रम की बल्लेबाजी में आजाईये जिसका खुलासा मैं कर दिया हूँ तो हो जाय सामना इस दुनिआ के सामने।

मेरा सन्देश प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वाशियों और समस्त मानवता के लिए>>>>>>पाँवपूजन विधि से हुए शास्त्रीय विवाह की हिन्दू संस्कृति में दामाद जिसे लोग बनाते वह अपने से उच्च मान ही लिया जाता है पर उमाशंकर जी(जनकजी +ज्ञानेन्द्र जी), मै प्रामाणिक रूप से आप से ऊपर का ही खिलाड़ी हूँ यह मेरी चुनौती थी और वह सिद्ध भी कर चुका हूँ तो आप भी नीचे क्रम की बल्लेवाजी छोड़कर अपनी इक्षाशक्ति के बल पर आप भी ऊपर के क्रम की बल्लेबाजी में आजाईये जिसका खुलासा मैं कर दिया हूँ तो हो जाय सामना इस दुनिआ के सामने।

यही एक मात्र और प्रामाणिक अंतर है मानवता के केंद्र इस काशी-प्रयागराज से किशी भी दिशा में दूर किशी स्थान में। >>>>>>>>>>>लेकिन यह भी इसके साथ बताऊंगा की विश्व की मानवता के केंद्र इस काशी-प्रयागराज से किशी भी दिशा में दूर जाने पर मानवता के मूल सिद्धांतों और प्रयोगों में भिन्नता मतलब मानवता के प्रति हर व्यक्ति की कथनी और करनी में अंतर आ जाता है जिसके फल स्वरुप पूर्ण सत्य तथ्य तक केवल त्यागशील व्यक्ति समूह की ही पहुँच हो सकती है, व्यक्ति विशेष वहाँ तैरना सुरु कर देता है मानवीय व्यवहार के धरातल पर स्थिर न रह कर। इस प्रकार ईस्वरीय शक्ति की परिकल्पना और अधिक प्रभावी हो जाती है आष्ठावान लोगों में या जो लोग अमानवीयता के शिकार होते है उनमे। यही एक मात्र और प्रामाणिक अंतर है मानवता के केंद्र इस काशी-प्रयागराज से किशी भी दिशा में दूर किशी स्थान में।

यही एक मात्र और प्रामाणिक अंतर है मानवता के केंद्र इस काशी-प्रयागराज से किशी भी दिशा में दूर किशी स्थान में। >>>>>>>>>>>लेकिन यह भी इसके साथ बताऊंगा की विश्व की मानवता के केंद्र इस काशी-प्रयागराज से किशी भी दिशा में दूर जाने पर मानवता के मूल सिद्धांतों और प्रयोगों में भिन्नता मतलब मानवता के प्रति हर व्यक्ति की कथनी और करनी में अंतर आ जाता है जिसके फल स्वरुप पूर्ण सत्य तथ्य तक केवल त्यागशील व्यक्ति समूह की ही पहुँच हो सकती है, व्यक्ति विशेष वहाँ तैरना सुरु कर देता है मानवीय व्यवहार के धरातल पर स्थिर न रह कर।   इस प्रकार ईस्वरीय शक्ति की परिकल्पना और अधिक प्रभावी हो जाती है आष्ठावान लोगों में या जो लोग अमानवीयता के शिकार होते है उनमे।  यही एक मात्र और प्रामाणिक अंतर है मानवता के केंद्र इस काशी-प्रयागराज से किशी भी दिशा में दूर किशी स्थान में। 

कैसे न कहूँ की विदेश में मुझसे प्रेम और मेरी चाहत नहीं थी: जनवरी, 2008 में ही मुझे यह प्रस्ताव मिलता है भारतीय विज्ञान संस्थान में की अगर आप पासपोर्ट धारी हैं तो रात भर सोच लीजिये की भारत में रहना है या भारत के बाहर किशी भी देश में रहने की इक्षा है, अगर भारत के बाहर किशी भी देश में रहने की इक्षा है तो वीसा और अन्य रोजी-रोजगार की व्यवस्था सब हम लोगों पर छोड़ दीजिये। हाँ सुबह मैंने निर्णय करके बता दिया की हमें इसी भारत में ही जीना है और इसी भारत में ही मारना है।

कैसे न कहूँ की विदेश में मुझसे प्रेम और मेरी चाहत नहीं थी: जनवरी, 2008 में ही मुझे यह प्रस्ताव मिलता है भारतीय विज्ञान संस्थान में की अगर आप पासपोर्ट धारी हैं तो रात भर सोच लीजिये की भारत में  रहना है या भारत के बाहर किशी भी देश में रहने की इक्षा है, अगर भारत के बाहर किशी भी देश में रहने की इक्षा है तो वीसा और अन्य रोजी-रोजगार की व्यवस्था सब हम लोगों पर छोड़ दीजिये। हाँ सुबह मैंने निर्णय करके बता दिया की हमें इसी भारत में ही जीना है और इसी भारत में ही मारना है।   

कैसे न कहूँ की श्रीराम ही श्रीकृष्ण और श्रीकृष्ण ही श्रीराम हैं: अक्टूबर, 2007 में मै भारतीय विज्ञान संस्थान गया था 2007 नवंबर में जब मेरी शादी के प्रबल आसार हो गए थे मामा जी की अगुआई में और अवध क्षेत्र के अपने होने वाले ससुर जी से 15-20 मिनट बात भी कर चुका था तो इस घटना की परोक्ष माध्यम से सूचना भारतीय विज्ञानं संस्थान पहुंचते ही विवाह तय होने से पूर्व ही उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम भारत का वहाँ उपस्थित देवी समूह मुझसे मिलता है और यह अनुरोध होता है की जो कोई भी आप को अच्छा लगे यहाँ उससे आप की सगाई और विवाह हम लोग करवा देंगे। तो तथाकथित नारीवादी और उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम का भेद और श्रीराम और श्रीकृष्ण का भेद करने वाले अब समझ सकते हैं श्रीराम के आदर्शो का अक्षरसह पालन का सदैव प्रयत्न करने वाले को श्रीकृष्ण बना देने की कितनी बड़ी चाहत थी उन देवी लोगों में जिसको मैंने यह कहते हुए मना कर दिया की सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा, श्रीधर(विष्णु) जो मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर हैं उनकी इक्षानुसार या सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण मेरे ताऊ जी, डॉ प्रेमचंद(शिव) जो मेरे परमपिता परमेश्वर हैं उनकी इक्षानुसार मेरा विवाह होगा, न कि अब मेरी इक्षानुसार मेरा विवाह होगा। लेकिन बता दें की मै श्रीराम और श्रीकृष्ण पहले ही हो चुका था जो एक पूर्ण ब्राह्मण, एक पूर्ण क्षत्रिय और एक पूर्ण वैश्य एक साथ थे मतलब ब्रह्मा, महेश और विष्णु तीनों का गुण एक साथ रखते हैं और इस प्रकार उनको एक दूसरे से आतंरिक रूप से अलग नहीं कर सकते हैं आप। वैसे सशरीर परमब्रह्म उन दोनों(श्रीराम और श्रीकृष्ण) को ऐसे नहीं कहते हैं क्योंकि परमब्रह्म के एक तिहाई अंश पूर्ण क्षत्रिय मतलब शक्ति के एक मात्र स्रोत, शिव, जो स्वयं क्षत्रिय मात्र नहीं वरन परमब्रह्म के एक तिहाई अंश थे, एक पूर्ण ब्राह्मण मतलब ज्ञान के एक मात्र स्रोत, ब्रह्मा, जो स्वयं एक ब्राह्मण मात्र नहीं वरन परमब्रह्म के एक तिहाई अंश थे, एक पूर्ण वैश्य मतलब सब प्रकार के वैभव के एक मात्र स्रोत, विष्णु, जो स्वयं एक वैश्य मात्र नहीं वरन परमब्रह्म के एक तिहाई अंश थे; यह तीनों उन दोनों के व्यक्तित्व और पुरुषार्थ में शामिल था।

कैसे न कहूँ की श्रीराम ही श्रीकृष्ण और श्रीकृष्ण ही श्रीराम हैं: अक्टूबर, 2007 में मै भारतीय विज्ञान संस्थान गया था  2007 नवंबर में जब मेरी शादी के प्रबल आसार हो गए थे मामा जी की अगुआई में और अवध क्षेत्र के अपने होने वाले ससुर जी से 15-20 मिनट बात भी कर चुका था तो इस घटना की परोक्ष माध्यम से सूचना भारतीय विज्ञानं संस्थान पहुंचते ही विवाह तय होने से पूर्व ही उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम भारत का वहाँ उपस्थित देवी समूह मुझसे मिलता है और यह अनुरोध होता है की जो कोई भी आप को अच्छा लगे यहाँ उससे आप की सगाई और विवाह हम लोग करवा देंगे। तो तथाकथित नारीवादी और उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम का भेद और श्रीराम और श्रीकृष्ण का भेद करने वाले अब समझ सकते हैं श्रीराम के आदर्शो का अक्षरसह पालन का सदैव प्रयत्न करने वाले को श्रीकृष्ण बना देने की कितनी बड़ी चाहत थी उन देवी लोगों में जिसको मैंने यह कहते हुए मना कर दिया की सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा, श्रीधर(विष्णु) जो मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर हैं उनकी इक्षानुसार या सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण मेरे ताऊ जी, डॉ प्रेमचंद(शिव) जो मेरे परमपिता परमेश्वर हैं उनकी इक्षानुसार मेरा विवाह होगा, न कि अब मेरी इक्षानुसार मेरा विवाह होगा। लेकिन बता दें की मै श्रीराम और श्रीकृष्ण पहले ही हो चुका था जो एक पूर्ण ब्राह्मण, एक पूर्ण क्षत्रिय और एक पूर्ण वैश्य एक साथ थे मतलब ब्रह्मा, महेश और विष्णु तीनों का गुण एक साथ रखते हैं और इस प्रकार उनको एक दूसरे से आतंरिक रूप से अलग नहीं कर सकते हैं आप। वैसे सशरीर परमब्रह्म उन दोनों(श्रीराम और श्रीकृष्ण) को ऐसे नहीं कहते हैं क्योंकि परमब्रह्म के एक तिहाई अंश पूर्ण क्षत्रिय मतलब शक्ति के एक मात्र स्रोत,  शिव, जो स्वयं क्षत्रिय मात्र नहीं वरन परमब्रह्म के एक तिहाई अंश थे, एक पूर्ण ब्राह्मण मतलब ज्ञान के एक मात्र स्रोत, ब्रह्मा, जो स्वयं एक ब्राह्मण मात्र नहीं वरन परमब्रह्म के एक तिहाई अंश थे, एक पूर्ण वैश्य मतलब सब प्रकार के वैभव के एक मात्र स्रोत, विष्णु, जो स्वयं एक वैश्य मात्र नहीं वरन परमब्रह्म के एक तिहाई अंश थे; यह तीनों उन दोनों के व्यक्तित्व और पुरुषार्थ में शामिल था। 

आप किशी भी जाती/धर्म से हों और मांसाहारी भी हो पर मेरे सन्निकट मित्र हैं तो आप के साथ शाकाहारी भोजन यदि दिया गया हो तो सफाई के साथ रहने पर एक थाली में वह भोजन आप के साथ खा सकता हूँ और मौलिक रूप से मानवता के हर सिद्धांत के पालन के साथ समानता का व्यवहार आप के साथ कर सकता हूँ, पर आप यह कहिये की मै अपने को सनातन ब्राह्मण न कहूँ और न सनातन ब्राह्मण अपने को महसूस करूँ जिसके लिए परम त्याग(ब्राह्मण का अभीष्ट गुण), परम बलिदान(क्षत्रिय का अभीष्ट गुण) और परम तप (वैश्य का अभीष्ट गुण) किया हूँ मानवता की समृद्धि और संवर्धन और संरक्षण में, तो यह कभी भी संभव नहीं हो सकता।

आप किशी भी जाती/धर्म से हों और मांसाहारी भी हो पर मेरे सन्निकट मित्र हैं तो आप के साथ शाकाहारी भोजन यदि दिया गया हो तो सफाई के साथ रहने पर एक थाली में वह भोजन आप के साथ खा सकता हूँ और मौलिक रूप से मानवता के हर सिद्धांत के पालन के साथ समानता का व्यवहार आप के साथ कर सकता हूँ, पर आप यह कहिये की मै अपने को सनातन ब्राह्मण न कहूँ और न सनातन ब्राह्मण अपने को महसूस करूँ जिसके लिए परम त्याग(ब्राह्मण का अभीष्ट गुण), परम बलिदान(क्षत्रिय का अभीष्ट गुण) और परम तप (वैश्य का अभीष्ट गुण) किया हूँ मानवता की समृद्धि और संवर्धन और संरक्षण में, तो यह कभी भी संभव नहीं हो सकता।

Tuesday, December 15, 2015

मुझे पता है की मैं प्रयागराज में हूँ पर काशी:जमदग्निपुर(जौनपुर) से ही चलकर आया हूँ और ब्रह्मा और विष्णु का भी परमपद विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचल होकर ही प्राप्त कर चुका हूँ और इस प्रकार श्रीराम और श्रीकृष्ण पद प्राप्ति के साथ श्रीरामकृष्ण हो चुका हूँ। लक्ष्य पूर्ती के बाद पुनः केवल काशी:जमदग्निपुर(जौनपुर) ही हो जाना ही इस प्रयागराज अर्थात ब्रह्मा और विष्णु के साथ न्याय होगा अन्यथा लक्ष्य लंबा खींचना हो तो ब्रह्मा और विष्णु लगातार भटकते रहें मैं उनका भी परमपद हांसिल किये रहूँगा। सत्यागत अर्थ में श्रीरामकृष्ण ही शिवरामकृष्ण हैं अर्थात वे ही सत्यागत महाशिव की पूर्णाति पूर्णता है। सत्य तो यह है की सांसारिक भाव सागर को पार लगाने में श्रीरामजानकी=श्रीराम ही महाशिव हैं पर भ्रान्ति दूर करने हेतु श्रीरामकृष्ण का परमपद प्राप्ति ही शिवरामकृष्ण परमपद प्राप्ति है अर्थात पूर्णातिपूर्ण महाशिव पद प्राप्ति है।

मुझे पता है की मैं प्रयागराज में हूँ पर काशी:जमदग्निपुर(जौनपुर) से ही चलकर आया हूँ और ब्रह्मा और विष्णु का भी परमपद विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचल होकर ही प्राप्त कर चुका हूँ और इस प्रकार श्रीराम और श्रीकृष्ण पद प्राप्ति के साथ श्रीरामकृष्ण हो चुका हूँ। लक्ष्य पूर्ती के बाद पुनः केवल काशी:जमदग्निपुर(जौनपुर) ही हो जाना ही इस प्रयागराज अर्थात ब्रह्मा और विष्णु के साथ न्याय होगा अन्यथा लक्ष्य लंबा खींचना हो तो ब्रह्मा और विष्णु लगातार भटकते रहें मैं उनका भी परमपद हांसिल किये रहूँगा। सत्यागत अर्थ में श्रीरामकृष्ण ही शिवरामकृष्ण हैं अर्थात वे ही सत्यागत महाशिव की पूर्णाति पूर्णता है। सत्य तो यह है की सांसारिक भाव सागर को पार लगाने में श्रीरामजानकी=श्रीराम ही महाशिव हैं पर भ्रान्ति दूर करने हेतु श्रीरामकृष्ण का परमपद प्राप्ति ही शिवरामकृष्ण परमपद प्राप्ति है अर्थात पूर्णातिपूर्ण महाशिव पद प्राप्ति है।   

सत्यमेव जयते को समाज पचा सके इस लिए 14 वर्ष दे दिया और आशा थी की लोग सत्यम शिवम सुंदरम परिकल्पना में सुख, शांति और समृद्धि पूर्वक जी लें और अपनी सहन शक्ति बढ़ा लें तथा सुमार्गगामी हो जाय पर उलटे मुझपर और मेरी शक्ति पर ही पलटवार? मेरी पहचान और स्थान ही मिटा देने का प्रयास करना कहाँ का न्याय है?

सत्यमेव जयते को समाज पचा सके इस लिए 14 वर्ष दे दिया और आशा थी की लोग सत्यम शिवम सुंदरम परिकल्पना में सुख, शांति और समृद्धि पूर्वक जी लें और अपनी सहन शक्ति बढ़ा लें तथा सुमार्गगामी हो जाय पर उलटे मुझपर और मेरी शक्ति पर ही पलटवार? मेरी पहचान और स्थान ही मिटा देने का प्रयास करना कहाँ का न्याय है?

बहुत से लोग मेरे ताउजी, प्रेमचंद(शिव) को जानते थे पर मेरे पिता जी प्रदीप((श्रीरामजानकी/सत्यनारायण/विक्रमादित्य(=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो)/सूर्यनाथ/सूर्यकान्त//आदित्यनाथ)) को नही जानते थे और कहते थी की ताऊ जी को तो जनता हूँ पर आप के पिता जी क्या करते हैं, तो उसका जबाब मै विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन दे दिया और सबसे सरलतम जबाब है की वे सनातन वशिष्ठ गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण के नाती और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण के पुत्र थे और एक पूर्ण व्यसनहीन शाकाहारी पूर्ण स्नातक स्वाभिमानी व्यक्तित्व थे और पूर्वजों के नियमों के पालक थे जिन्होंने कहा था की तुम पढ़ो या न पढ़ो मेरी खानदानी जमीन नहीं बिकेगी। यह तो जमीन के प्रति उनका प्रेम था तो जमीर और पारिवारिक मर्यादा की मूल घर की साक्षात सरस्वती, लक्ष्मी और पारवती के प्रति उनका क्या लगाव और त्याग हो सकता था उसे दलित ईसाई के हाँथ मात खाने वाले क्या समझेंगे।

बहुत से लोग मेरे ताउजी, प्रेमचंद(शिव) को जानते थे पर मेरे पिता जी प्रदीप((श्रीरामजानकी/सत्यनारायण/विक्रमादित्य(=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो)/सूर्यनाथ/सूर्यकान्त//आदित्यनाथ)) को नही जानते थे और कहते थी की ताऊ जी को तो जनता हूँ पर आप के पिता जी क्या करते हैं, तो उसका जबाब मै विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन दे दिया और सबसे सरलतम जबाब है की वे सनातन वशिष्ठ गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण के नाती और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण के पुत्र थे और एक पूर्ण व्यसनहीन शाकाहारी पूर्ण स्नातक स्वाभिमानी व्यक्तित्व थे और पूर्वजों के नियमों के पालक थे जिन्होंने कहा था की तुम पढ़ो या न पढ़ो मेरी खानदानी जमीन नहीं बिकेगी। यह तो जमीन के प्रति उनका प्रेम था तो जमीर और पारिवारिक मर्यादा की मूल घर की साक्षात सरस्वती, लक्ष्मी और पारवती के प्रति उनका क्या लगाव और त्याग हो सकता था उसे दलित ईसाई के हाँथ मात खाने वाले क्या समझेंगे।

मेरे विरोध और मेरे विरोध में दिए गए हर तर्क का उत्तर है मानवता के हर सिद्धांत को पालन करते हुए इस दुनिया, हिन्द(युरेशिआ=यूरोप+एशिया या कम से कम ईरान से लेकर सिंगापुर और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी), हिन्दुस्थान, भारतवर्ष(अखंड भारत), भारत, प्रयागराज और प्रयागराज विश्विद्यालय में आज तक और आगे भी मेरी उपस्थिति और यहाँ से केंद्रित होते हुए 14 वर्ष तक की अवधि के प्रत्यक्ष और परोक्ष संपादित किये हुए कार्य जो अपनी पूर्णता को प्राप्त हुए और आगे भी प्राप्त होते रहेंगे और जिसको कम से कम केवल अन्तर्यामी और दूरदर्शी व्यक्तित्व से लेकर दृस्टिगत कार्य सिद्धांत वाले व्यक्ति अवश्य जानते हैं।

मेरे विरोध और मेरे विरोध में दिए गए हर तर्क का उत्तर है मानवता के हर सिद्धांत को पालन करते हुए इस दुनिया, हिन्द(युरेशिआ=यूरोप+एशिया या कम से कम ईरान से लेकर सिंगापुर और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी), हिन्दुस्थान, भारतवर्ष(अखंड भारत), भारत, प्रयागराज और प्रयागराज विश्विद्यालय में आज तक और आगे भी मेरी उपस्थिति और यहाँ से केंद्रित होते हुए 14 वर्ष तक की अवधि के प्रत्यक्ष और परोक्ष संपादित किये हुए कार्य जो अपनी पूर्णता को प्राप्त हुए और आगे भी प्राप्त होते रहेंगे और जिसको कम से कम केवल अन्तर्यामी और दूरदर्शी व्यक्तित्व से लेकर दृस्टिगत कार्य सिद्धांत वाले व्यक्ति अवश्य जानते हैं।

यहां उल्लेख करना चाहूँगा की विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव ने अपनी चौदह वर्ष की यात्रा में इस भौतिक संसार में मार्ग में भेजे गए सभी भव बाधाओं को अपनी लक्ष्य पूर्ती के साथ पार करने में दोनों सशरीर परमब्रह्म अवस्था श्रीकृष्ण और श्रीराम को प्राप्त कर लिया है और इसीलिए मेरे द्वारा लिखा था की विवेकानंद(विवेक+आनंद) इन चौदह वर्षों में अपने गुरु श्रीरामकृष्ण हो गए। और इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंश अपने मूल वंश सूर्यवंश मतलब आदित्य मतलब कश्यप और उनकी दूसरी पत्नी अदिति पुत्र में ही समाहित मान लिए जाय या अलग समझे जाय यह कश्यप ऋषी और समाज संचालन करने वालों पर निर्भर करता है। पुत्र एक में रहें या अलग रहें उनमे शान्ति, शौहार्द्र और समृद्धि सम्पन्नता रहे पिता का यही दायित्व होता है तो वह पूरा हो गया।>>>>>>>"सत्यम शिवम सुंदरम" गुरुकुल जमदग्निपुर(जौनपुर) का भी छात्र रह चुका सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा पर भेंट चढने वाला/अर्पित होने वाला/आहार बनने वाला) पाण्डेय सारंगधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/महादेव/केदारेश्वर/आदिशंकर/-----------/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/---/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप (सूर्यस्वामी/सूर्यकांत/सत्यनारायण/लक्ष्मीकांत/लक्ष्मी नारायण/आदित्यनाथ/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश/विक्रमादित्य=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो/रामजानकी) का विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव की आतंरिक सुरक्षा शक्ति तो महाशिव भी इसे आप कह सकते है वह "सत्यमेव जयते" का भी छात्र था जो 11-11-1975, मंगलवार सुबह 9.15 बजे (कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गोपी/गिरिधर अस्टमी; वर्त्तमान ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस), धनिष्ठा नक्षत्र, अर्ध मकर व् अर्ध कुंभ राशी में जन्म लिया तदनुसार गिरिधर राशी नाम नक्षत्र के आधार पर प्राप्त किया है ((गिरिधर के संभावित पर्याय से सम्बंधित नाम: गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी (हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) जिसमे सबसे प्रचलित नाम है सशरीर परमब्रह्म की अवस्था को प्राप्त करने वाले श्रीकृष्ण का और सब उनके सम्पूरक हो जाते है सशरीर परमब्रह्म अवस्था प्राप्ति की अवस्था में आये विभिन्न जीवन कलाओं में।मै सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा/सती/पारवती/उमा/गिरिजा/अपर्णा/गौरी पर अर्पित होने वाला या भेंट चढने वाला या उनका आहार) पाण्डेय ब्राह्मण सारंगधर/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/-----/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप(=स्वतः निहित ऊर्जा और प्रकाश का एकमात्र स्रोत = सूर्य की भी ऊर्जा का स्रोत=सूर्यकान्त=सूर्यस्वामी=आदित्यनाथ= रामजानकी=लक्ष्मीनारायण =सत्यनारायण=लक्ष्मीकांत=श्रीकांत =श्रीधर=श्रीप्रकाश= सच्चिदानंद=चतुर्भुज=कमलेश्वर=चक्रधर=पद्मधर=विष्णु) का पुत्र होने का दायित्व निर्वहन के साथ सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, अपने ताउजी और परमपिता परमेश्वर डॉ प्रेमचंद(शिव=सोमनाथ=सारंगधर=चंद्रशेखर=शशांक=शशिधर=राकेशधर =शम्भू=महादेव=विश्वनाथ= केदारेश्वर=आदिशंकर) पाण्डेय तथा सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, अपने मामा और परमगुरु परमपिता परमेश्वर, रामानंद/रामप्रशाद/रमानाथ कुल केश्री श्रीधर(विष्णु) मिश्र दोनों के पुत्र के रूप में बिना उत्तराधिकार जो मानवीय आदर्श और जो पुत्रवत कर्तव्य होते हैं मानवता में योगदान और उनके गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) के श्रेष्ठ वचन की रक्षा और इस प्रकार मानवता की रक्षा हेतु उसका पूर्णतः पालन किया हूँ मन, कर्म, वाणी, आहार-विहार का पालन करते हुए और मान, सम्मान, स्वाभिमान तथा अपनी तीन पीढ़ी की ऊर्जा और आकांछाओं का त्याग और समन करते हुए। मै विश्वास दिलाना चाहता हूँ की मेरा कोई भी कार्य मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की ही तर्ज पर सप्तर्षि((कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) +दत्तात्रेय,सोमात्रेय/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र)) के आदर्शों के प्रतिकूल कभी भी नहीं होगा हो सकता है की तात्कालिक रूप में कुछ लोगों को मेरा कुछ कार्य योग योगेश्वर श्रीकृष्ण जैसा लगे और तात्कालिक चोट उनको अनुभव हो पर संभावना यही रहेगी की पूर्णतः सप्तर्षि नियमों के अनुसार ही मेरा आचरण रहेगा।>>>>यहां उल्लेख करना चाहूँगा की विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव ने अपनी चौदह वर्ष की यात्रा में इस भौतिक संसार में मार्ग में भेजे गए सभी भव बाधाओं को अपनी लक्ष्य पूर्ती के साथ पार करने में दोनों सशरीर परमब्रह्म अवस्था श्रीकृष्ण और श्रीराम को प्राप्त कर लिया है और इसीलिए मेरे द्वारा लिखा था की विवेकानंद(विवेक+आनंद) इन चौदह वर्षों में अपने गुरु श्रीरामकृष्ण हो गए। और इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंश अपने मूल वंश सूर्यवंश मतलब आदित्य मतलब कश्यप और उनकी दूसरी पत्नी अदिति पुत्र में ही समाहित मान लिए जाय या अलग समझे जाय यह कश्यप ऋषी और समाज संचालन करने वालों पर निर्भर करता है। पुत्र एक में रहें या अलग रहें उनमे शान्ति, शौहार्द्र और समृद्धि सम्पन्नता रहे पिता का यही दायित्व होता है तो वह पूरा हो गया।>>>>>>>"सत्यम शिवम सुंदरम" गुरुकुल जमदग्निपुर(जौनपुर) का भी छात्र रह चुका विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव की आतंरिक सुरक्षा शक्ति तो महाशिव भी इसे आप कह सकते है >>>>>>>>वह "सत्यमेव जयते" का भी छात्र था|

यहां उल्लेख करना चाहूँगा की विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव ने अपनी चौदह वर्ष की यात्रा में इस भौतिक संसार में मार्ग में भेजे गए सभी भव बाधाओं को अपनी लक्ष्य पूर्ती के साथ पार करने में दोनों सशरीर परमब्रह्म अवस्था श्रीकृष्ण और श्रीराम को प्राप्त कर लिया है और इसीलिए मेरे द्वारा लिखा था की विवेकानंद(विवेक+आनंद) इन चौदह वर्षों में अपने गुरु श्रीरामकृष्ण हो गए। और इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंश अपने मूल वंश सूर्यवंश मतलब आदित्य मतलब कश्यप और उनकी दूसरी पत्नी अदिति पुत्र में ही समाहित मान लिए जाय या अलग समझे जाय यह कश्यप ऋषी और समाज संचालन करने वालों पर निर्भर करता है। पुत्र एक में रहें या अलग रहें उनमे शान्ति, शौहार्द्र और समृद्धि सम्पन्नता रहे पिता का यही दायित्व होता है तो वह पूरा हो गया।>>>>>>>"सत्यम शिवम सुंदरम" गुरुकुल जमदग्निपुर(जौनपुर) का भी छात्र रह चुका सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा पर भेंट चढने वाला/अर्पित होने वाला/आहार बनने वाला) पाण्डेय सारंगधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/महादेव/केदारेश्वर/आदिशंकर/-----------/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/---/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप (सूर्यस्वामी/सूर्यकांत/सत्यनारायण/लक्ष्मीकांत/लक्ष्मी नारायण/आदित्यनाथ/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश/विक्रमादित्य=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो/रामजानकी) का विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव की आतंरिक सुरक्षा शक्ति तो महाशिव भी इसे आप कह सकते है वह "सत्यमेव जयते" का भी छात्र था जो 11-11-1975, मंगलवार सुबह 9.15 बजे (कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गोपी/गिरिधर अस्टमी; वर्त्तमान ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस), धनिष्ठा नक्षत्र, अर्ध मकर व् अर्ध कुंभ राशी में जन्म लिया तदनुसार गिरिधर राशी नाम नक्षत्र के आधार पर प्राप्त किया है ((गिरिधर के संभावित पर्याय से सम्बंधित नाम: गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी (हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) जिसमे सबसे प्रचलित नाम है सशरीर परमब्रह्म की अवस्था को प्राप्त करने वाले श्रीकृष्ण का और सब उनके सम्पूरक हो जाते है सशरीर परमब्रह्म अवस्था प्राप्ति की अवस्था में आये विभिन्न जीवन कलाओं में।मै सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा/सती/पारवती/उमा/गिरिजा/अपर्णा/गौरी पर अर्पित होने वाला या भेंट चढने वाला या उनका आहार) पाण्डेय ब्राह्मण सारंगधर/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/-----/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप(=स्वतः निहित ऊर्जा और प्रकाश का एकमात्र स्रोत = सूर्य की भी ऊर्जा का स्रोत=सूर्यकान्त=सूर्यस्वामी=आदित्यनाथ= रामजानकी=लक्ष्मीनारायण =सत्यनारायण=लक्ष्मीकांत=श्रीकांत =श्रीधर=श्रीप्रकाश= सच्चिदानंद=चतुर्भुज=कमलेश्वर=चक्रधर=पद्मधर=विष्णु) का पुत्र होने का दायित्व निर्वहन के साथ सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, अपने ताउजी और परमपिता परमेश्वर डॉ प्रेमचंद(शिव=सोमनाथ=सारंगधर=चंद्रशेखर=शशांक=शशिधर=राकेशधर =शम्भू=महादेव=विश्वनाथ= केदारेश्वर=आदिशंकर) पाण्डेय तथा सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, अपने मामा और परमगुरु परमपिता परमेश्वर, रामानंद/रामप्रशाद/रमानाथ कुल केश्री श्रीधर(विष्णु) मिश्र दोनों के पुत्र के रूप में बिना उत्तराधिकार जो मानवीय आदर्श और जो पुत्रवत कर्तव्य होते हैं मानवता में योगदान और उनके गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) के श्रेष्ठ वचन की रक्षा और इस प्रकार मानवता की रक्षा हेतु उसका पूर्णतः पालन किया हूँ मन, कर्म, वाणी, आहार-विहार का पालन करते हुए और मान, सम्मान, स्वाभिमान तथा अपनी तीन पीढ़ी की ऊर्जा और आकांछाओं का त्याग और समन करते हुए। मै विश्वास दिलाना चाहता हूँ की मेरा कोई भी कार्य मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की ही तर्ज पर सप्तर्षि((कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) +दत्तात्रेय,सोमात्रेय/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र)) के आदर्शों के प्रतिकूल कभी भी नहीं होगा हो सकता है की तात्कालिक रूप में कुछ लोगों को मेरा कुछ कार्य योग योगेश्वर श्रीकृष्ण जैसा लगे और तात्कालिक चोट उनको अनुभव हो पर संभावना यही रहेगी की पूर्णतः सप्तर्षि नियमों के अनुसार ही मेरा आचरण रहेगा।>>>>यहां उल्लेख करना चाहूँगा की विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव ने अपनी चौदह वर्ष की यात्रा में इस भौतिक संसार में मार्ग में भेजे गए सभी भव बाधाओं को अपनी लक्ष्य पूर्ती के साथ पार करने में दोनों सशरीर परमब्रह्म अवस्था श्रीकृष्ण और श्रीराम को प्राप्त कर लिया है और इसीलिए मेरे द्वारा लिखा था की विवेकानंद(विवेक+आनंद) इन चौदह वर्षों में अपने गुरु श्रीरामकृष्ण हो गए। और इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंश अपने मूल वंश सूर्यवंश मतलब आदित्य मतलब कश्यप और उनकी दूसरी पत्नी अदिति पुत्र में ही समाहित मान लिए जाय या अलग समझे जाय यह कश्यप ऋषी और समाज संचालन करने वालों पर निर्भर करता है। पुत्र एक में रहें या अलग रहें उनमे शान्ति, शौहार्द्र और समृद्धि सम्पन्नता रहे पिता का यही दायित्व होता है तो वह पूरा हो गया।>>>>>>>"सत्यम शिवम सुंदरम" गुरुकुल जमदग्निपुर(जौनपुर) का भी छात्र रह चुका विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव की आतंरिक सुरक्षा शक्ति तो महाशिव भी इसे आप कह सकते है >>>>>>>>वह "सत्यमेव जयते" का भी छात्र था|

मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है| 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है|
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

पाण्डेय: Hi Five:मै किशी भाई का हक़ मारने वालों में से नहीं हूँ राजा बाली की तरह तो जिस बड़े भाई(केवल व्यक्तिगत न की धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से) ने मुझे छोटा भाई मान ही लिया था/है मै उस बड़े भाई का हक़ लेने की सोच भी नहीं सकता इसके लिए ईसाइयत को अपना दम्भ दिखाने की जरूरत थी कम से कम मेरी सहमति तो ले ली गयी होती और उसके लिए दलित ईसाई समाज ने जो उछल कूद मचा रखी है उसका ही परिणाम है की मेरे परिवार के लिए विशेष रूप से 1957 से 2008 मतलब पूरे 50 वर्ष तक अन्न/भोेजन और जीवन निर्वहन के स्रोत रहे मेरे परिवार के सबसे प्रिय दलित को पक्षा घात हुआ और वे सेवा देने लायक नहीं रह सके क्योंकि दलित ईसाई में दलित शब्द शायद प्रभावी है और इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा। मुझसे मेरी औकात पूँछी जा रही थी तो चौदह वर्ष पूर्व जो हुआ वह मेरे पिता प्रदीप (सूर्यस्वामी/श्रीरामजानकी/सत्यनारायण/सूर्यनाथ/सूर्यकान्त/आदित्यनाथ/सत्यनारायण/विक्रमादित्य=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो/रामजानकी) का पुरुषार्थ था और जो 7 वर्ष पूर्व हुआ और विगत 14 वर्षों से संवर्द्धन, संरक्षण, समृद्धि और संकलन का कार्य हुआ वह मुझ विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव का पुरुषार्थ है और आज उसपर भी पुनः प्रश्नचिन्ह उठाया जा रहा और दलित ईसाई समाज द्वारा ध्रिस्टता पूर्वक अजेय=अजय होने का दम भरा जा रहा है, तो वह किस पुरुषार्थ के बल पर? तो क्यों न मुझ (धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से उच्च) विवेक का सामना और संधि सीधे उस बड़े भाई(केवल व्यक्तिगत न की धार्मिक और सांस्कृतिक रूप) से जिसने मुझे छोटा भाई मान ही लिया था और मैंने बड़ा भाई मतलब सीधे सीधे मूल ईसाइयत से न की किशी दलित ईसाई समाज से? तो क्यों न अब दलित ईसाई समाज अपनी अवकात स्वयं समझ ले ?

पाण्डेय: Hi Five:मै किशी भाई का हक़ मारने वालों में से नहीं हूँ राजा बाली की तरह तो जिस बड़े भाई(केवल व्यक्तिगत न की धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से) ने मुझे छोटा भाई मान ही लिया था/है मै उस बड़े भाई का हक़ लेने की सोच भी नहीं सकता इसके लिए ईसाइयत को अपना दम्भ दिखाने की जरूरत थी कम से कम मेरी सहमति तो ले ली गयी होती और उसके लिए दलित ईसाई समाज ने जो उछल कूद मचा रखी है उसका ही परिणाम है की मेरे परिवार के लिए विशेष रूप से 1957 से 2008 मतलब पूरे 50 वर्ष तक अन्न/भोेजन और जीवन निर्वहन के स्रोत रहे मेरे परिवार के सबसे प्रिय दलित को पक्षा घात हुआ और वे सेवा देने लायक नहीं रह सके क्योंकि दलित ईसाई में दलित शब्द शायद प्रभावी है और इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा। मुझसे मेरी औकात पूँछी जा रही थी तो चौदह वर्ष पूर्व जो हुआ वह मेरे पिता प्रदीप (सूर्यस्वामी/श्रीरामजानकी/सत्यनारायण/सूर्यनाथ/सूर्यकान्त/आदित्यनाथ/सत्यनारायण/विक्रमादित्य=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो/रामजानकी) का पुरुषार्थ था और जो 7 वर्ष पूर्व हुआ और विगत 14 वर्षों से संवर्द्धन, संरक्षण, समृद्धि और संकलन का कार्य हुआ वह मुझ विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव का पुरुषार्थ है और आज उसपर भी पुनः प्रश्नचिन्ह उठाया जा रहा और दलित ईसाई समाज द्वारा ध्रिस्टता पूर्वक अजेय=अजय होने का दम भरा जा रहा है, तो वह किस पुरुषार्थ के बल पर? तो क्यों न मुझ (धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से उच्च) विवेक का सामना और संधि सीधे उस बड़े भाई(केवल व्यक्तिगत न की धार्मिक और सांस्कृतिक रूप) से जिसने मुझे छोटा भाई मान ही लिया था और मैंने बड़ा भाई मतलब सीधे सीधे मूल ईसाइयत से न की किशी दलित ईसाई समाज से? तो क्यों न अब दलित ईसाई समाज अपनी अवकात स्वयं समझ ले ?

Monday, December 14, 2015

सात सूर्य के घोड़ों पर सवारी श्रीरामजानकी/सत्यनारायण/विक्रमादित्य(=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो)/सूर्यनाथ/सूर्यकान्त/प्रदीप/आदित्यनाथ का था तो सात फन वाले धरणीधर, शेषनाग (+वायुमार्ग में गरुड़) भी थे जिनकी सवारी सच्चिदानंद/अखिलानन्द/श्रीधर/श्रीकांत/श्रीप्रकाश/लक्ष्मीकान्त/लक्ष्मीनारायण/विष्णु करते हैं और यदि इस दुनिया का केंद्र प्रयाग से लेकर काशी तक है तो जाहिर सी बात है की शेषनाग पर सवारी करने वाले त्रिदेवों में मध्य सच्चिदानंद/अखिलानन्द/श्रीधर/श्रीकांत/श्रीप्रकाश/लक्ष्मीकान्त/लक्ष्मीनारायण/विष्णु की भी इसी प्रयागराज और काशी के बीच में ही रहते थे/हैं और तब मध्य त्रिदेवी लक्ष्मी का निवाश भी प्रयाग और काशी के बीच में ही। त्रिदेवियों में आद्या, सरस्वती का मूल निवाश प्रयाग तो त्रिदेवों में कनिष्ठतम ब्रह्मा का भी निवाश प्रयाग और त्रिदेवों में आद्या, केदारेश्वर(+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर=विश्वनाथ)/महादेव शिवशंकर का निवाश काशी तो त्रिदेवियों में कनिष्ठतम देवी सती/उमा/अपर्णा का भी निवाश काशी मतलब प्रयाग और काशी में ही।

सात सूर्य के घोड़ों पर सवारी श्रीरामजानकी/सत्यनारायण/विक्रमादित्य(=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो)/सूर्यनाथ/सूर्यकान्त/प्रदीप/आदित्यनाथ  का था तो सात फन वाले धरणीधर, शेषनाग (+वायुमार्ग में गरुड़) भी थे जिनकी सवारी सच्चिदानंद/अखिलानन्द/श्रीधर/श्रीकांत/श्रीप्रकाश/लक्ष्मीकान्त/लक्ष्मीनारायण/विष्णु करते हैं और यदि इस दुनिया का केंद्र प्रयाग से लेकर काशी तक है तो जाहिर सी  बात है की शेषनाग पर सवारी करने वाले त्रिदेवों में मध्य सच्चिदानंद/अखिलानन्द/श्रीधर/श्रीकांत/श्रीप्रकाश/लक्ष्मीकान्त/लक्ष्मीनारायण/विष्णु की भी इसी प्रयागराज और काशी के बीच में ही रहते थे/हैं और तब मध्य त्रिदेवी लक्ष्मी का निवाश भी प्रयाग और काशी के बीच में ही। त्रिदेवियों में आद्या, सरस्वती का मूल निवाश प्रयाग तो त्रिदेवों में कनिष्ठतम  ब्रह्मा का भी निवाश प्रयाग और त्रिदेवों में आद्या, केदारेश्वर(+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर=विश्वनाथ)/महादेव शिवशंकर का निवाश काशी तो त्रिदेवियों में कनिष्ठतम  देवी सती/उमा/अपर्णा का भी निवाश काशी मतलब प्रयाग और काशी में ही।   

मेरे विरोध और मेरे विरोध में दिए गए हर तर्क का उत्तर है मानवता के हर सिद्धांत को पालन करते हुए इस दुनिया, हिन्द(युरेशिआ=यूरोप+एशिया या कम से कम ईरान से लेकर सिंगापुर और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी), हिन्दुस्थान, भारतवर्ष(अखंड भारत), भारत, प्रयागराज और प्रयागराज विश्विद्यालय में आज तक और आगे भी मेरी उपस्थिति और यहाँ से केंद्रित होते हुए 14 वर्ष तक की अवधि के प्रत्यक्ष और परोक्ष संपादित किये हुए कार्य जो अपनी पूर्णता को प्राप्त हुए और आगे भी प्राप्त होते रहेंगे और जिसको कम से कम केवल अन्तर्यामी और दूरदर्शी व्यक्तित्व से लेकर दृस्टिगत कार्य सिद्धांत वाले व्यक्ति अवश्य जानते हैं।

मेरे विरोध और मेरे विरोध में दिए गए हर तर्क का उत्तर है मानवता के हर सिद्धांत को पालन करते हुए इस दुनिया, हिन्द(युरेशिआ=यूरोप+एशिया या कम से कम ईरान से लेकर सिंगापुर और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी), हिन्दुस्थान, भारतवर्ष(अखंड भारत), भारत, प्रयागराज और प्रयागराज विश्विद्यालय में आज तक और आगे भी मेरी उपस्थिति और यहाँ से केंद्रित होते हुए 14 वर्ष तक की अवधि के प्रत्यक्ष और परोक्ष संपादित किये हुए कार्य जो अपनी पूर्णता को प्राप्त हुए और आगे भी प्राप्त होते रहेंगे और जिसको कम से कम केवल अन्तर्यामी और दूरदर्शी व्यक्तित्व से लेकर दृस्टिगत कार्य सिद्धांत वाले व्यक्ति अवश्य जानते हैं।

तात्कालिक रूप से धनबल, बाहुबल, अनीति और संख्याबल से निजात आतंकवाद के बम से या भौतिक, मानसिक और नैतिक चरित्रहीनता को बढ़ावा दे किया जा सकता है या अपने को कुछ लाभ पहुंचाया जा सकता है पर यह कोई स्थायी निदान नहीं है इसका वरन "सत्यमेव जयते" की नीति जिसमे उतने पर ही अपना अधिकार समझा जाता है जितने का आप ने जिया हो या किया हो वही स्वयं भारत और भारतीय तथा इस संसार को शांति, सुख और समृद्धि प्रदान कर सकता है और संसार को दीर्घकाल तक सुरक्षित और संरक्षित रख सकता है।>>>>>>>>>कोई भौतिक, मानसिक और नैतिक चरित्रहीनता को बढ़ावा देगा और इस प्रकार दादागिरी सब पर जारी रखेगा तो उसका निराकरण कोई आतंकवाद के बम से देगा और फिर नहीं देगा तो वह फिर सनातन हिन्दू समाज की तरह क्षरित होगा तो इसका मतलब यह नहीं होता की कोई आतंकवाद के बम से दुनिया में अपनी दादागिरी जारी रखे तो उसका जबाब कोई भौतिक, मानसिक और नैतिक चरित्रहीनता को बढ़ावा दे अपना संख्याबल बढ़ाते हुए दे या जब कोई कोई भौतिक, मानसिक और नैतिक चरित्रहीनता को बढ़ावा देगा और इस प्रकार दादागिरी सब पर जारी रखे तो उसका निराकरण कोई आतंकवाद रूपी बम से दे, अपितु मानवता संरक्षण की और भी नीतिया हैं सनातन हिन्दू संस्कृति में जिससे की हिन्दू समाज और इस प्रकार वैश्विक समाज को क्षरण से बचाया जा सकता है और वह है "सत्यमेव जयते" की नीति जिसमे उतने पर ही अपना अधिकार समझिए जितने का आप ने जिया हो या किया हो उससे अधिक का सोचना ही अनीति को जन्म देता है और वही विनाश का कारन बनता जा रहा है।>>>>>>>>तात्कालिक रूप से धनबल, बाहुबल, अनीति और संख्याबल से निजात आतंकवाद के बम से या भौतिक, मानसिक और नैतिक चरित्रहीनता को बढ़ावा दे किया जा सकता है या अपने को कुछ लाभ पहुंचाया जा सकता है पर यह कोई स्थायी निदान नहीं है इसका वरन "सत्यमेव जयते" की नीति जिसमे उतने पर ही अपना अधिकार समझा जाता है जितने का आप ने जिया हो या किया हो वही स्वयं भारत और भारतीय तथा इस संसार को शांति, सुख और समृद्धि प्रदान कर सकता है और संसार को दीर्घकाल तक सुरक्षित और संरक्षित रख सकता है।

तात्कालिक रूप से धनबल, बाहुबल, अनीति और संख्याबल से निजात आतंकवाद के बम से या भौतिक, मानसिक और नैतिक चरित्रहीनता को बढ़ावा दे किया जा सकता है या अपने को कुछ लाभ पहुंचाया जा सकता है पर यह कोई स्थायी निदान नहीं है इसका वरन "सत्यमेव जयते" की नीति जिसमे उतने पर ही अपना अधिकार समझा जाता है जितने का आप ने जिया हो या किया हो वही स्वयं भारत और भारतीय तथा इस संसार को शांति, सुख और समृद्धि प्रदान कर सकता है और संसार को दीर्घकाल तक सुरक्षित और संरक्षित रख सकता है।>>>>>>>>>कोई भौतिक, मानसिक और नैतिक चरित्रहीनता को बढ़ावा देगा और इस प्रकार दादागिरी सब पर जारी रखेगा तो उसका निराकरण कोई आतंकवाद के बम से देगा और फिर नहीं देगा तो वह फिर सनातन हिन्दू समाज की तरह क्षरित होगा तो इसका मतलब यह नहीं होता की कोई आतंकवाद के बम से दुनिया में अपनी दादागिरी जारी रखे तो उसका जबाब कोई भौतिक, मानसिक और नैतिक चरित्रहीनता को बढ़ावा दे अपना संख्याबल बढ़ाते हुए दे या जब कोई कोई भौतिक, मानसिक और नैतिक चरित्रहीनता को बढ़ावा देगा और इस प्रकार दादागिरी सब पर जारी रखे तो उसका निराकरण कोई आतंकवाद रूपी बम से दे, अपितु मानवता संरक्षण की और भी नीतिया हैं सनातन हिन्दू संस्कृति में जिससे की हिन्दू समाज और इस प्रकार वैश्विक समाज को क्षरण से बचाया जा सकता है और वह है "सत्यमेव जयते" की नीति जिसमे उतने पर ही अपना अधिकार समझिए जितने का आप ने जिया हो या किया हो उससे अधिक का सोचना ही अनीति को जन्म देता है और वही विनाश का कारन बनता जा रहा है।>>>>>>>>तात्कालिक रूप से धनबल, बाहुबल, अनीति और संख्याबल से निजात आतंकवाद के बम से या भौतिक, मानसिक और नैतिक चरित्रहीनता को बढ़ावा दे किया जा सकता है या अपने को कुछ लाभ पहुंचाया जा सकता है पर यह कोई स्थायी निदान नहीं है इसका वरन "सत्यमेव जयते" की नीति जिसमे उतने पर ही अपना अधिकार समझा जाता है जितने का आप ने जिया हो या किया हो वही स्वयं भारत और भारतीय तथा इस संसार को शांति, सुख और समृद्धि प्रदान कर सकता है और संसार को दीर्घकाल तक सुरक्षित और संरक्षित रख सकता है।

Sunday, December 13, 2015

कौन उत्तम है, कौन निरुत्तम है और कौन निकृष्ट है इसका निर्धारण विवेक द्वारा ही हो सकता है तो प्रथम टीका विवेक द्वारा ही और वह मुझ विवेक अनुसार यह है की कि यह उत्कर्ष ही नहीं चरमोत्कर्ष, पर हाँ यह चरित्रहीनता का चरमोत्कर्ष है किशी समाज विशेष की कुत्सित मांशिकता से जन्म पाया हुआ।

कौन उत्तम है, कौन निरुत्तम है और कौन निकृष्ट है इसका निर्धारण विवेक द्वारा ही हो सकता है तो प्रथम टीका विवेक द्वारा ही और वह मुझ विवेक अनुसार यह है की कि यह उत्कर्ष ही नहीं चरमोत्कर्ष, पर हाँ यह चरित्रहीनता का चरमोत्कर्ष है किशी समाज विशेष की कुत्सित मांशिकता से जन्म पाया हुआ।    

दलित ईसाई समाज की सूचना के लिए: यह कहावत तो सत्य है की "इस हमाम में सभी नंगे हैं: कोयले के धंधे में सभी नंगे", कोयले के धंधे में जाकर भी नंगा नहीं हुआ और आप लोगों के लाख चाहने के बावजूद नंगा नहीं किया जा सका तो ऐसे अनगिनत हो सकते हैं जिसपर आपकी छाया और छाप का कोई असर नहीं होता है और वे ही स्वजन तथा स्वयं को भी, आतंकबाद के बम को चलाने वालों को भी और चरित्रहीनता के बम को चलाने वालों को भी, जिसमे एक गुट विशेष में आप भी शामिल है एक विशेषण विशेष के साथ और वह विशेषण आप के लिए विशेष रूप से लागू होता है को भी नियंत्रीय करते है और इस प्रकार इस विश्वमानवता को संस्कारित और सुसंस्कृतवान बनाते है। मेरी आप से कोई निजी दूरी नहीं वरन आप अपनी भलाई के लिए इतना जरूर याद रखियेगा की मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण पर अपनी संस्कृति और संस्कार को थोपने का प्रयास मत कीजियेगा। क्योंकि आप मेरे लिए संदिग्ध थे और आत्मनियंत्रण के परीक्षण में खरे नहीं उतरे इस प्रकार तथाकथित विश्वमहाशक्ति के स्वभू स्वामी बन सकते हैं पर सत्य विश्वमहाशक्ति को जन्म देना और उसका स्वामी बन पाना तभी संभव है जब की आप सनातन हिन्दू संस्कृति में अपना समर्पण कर देंगे अन्यथा निष्प्राण विश्वमहाशक्ति की लाश मतलब तथाकथित विश्वमहाशक्ति को लेकर/बनकर ढोते/बने रहिये विश्वमहाशक्ति तो इस भारत/भारतवर्ष /अखंड भारत/हिन्दुस्थान/ हिन्द में ही रहेगा/रहेगी।

दलित ईसाई समाज की सूचना के लिए: यह कहावत तो सत्य है की "इस हमाम में सभी नंगे हैं: कोयले के धंधे में सभी नंगे", कोयले के धंधे में जाकर भी नंगा नहीं हुआ और आप लोगों के लाख चाहने के बावजूद नंगा नहीं किया जा सका तो ऐसे अनगिनत हो सकते हैं जिसपर आपकी छाया और छाप का कोई असर नहीं होता है और वे ही स्वजन तथा स्वयं को भी, आतंकबाद के बम को चलाने वालों को भी और चरित्रहीनता के बम को चलाने वालों को भी, जिसमे एक गुट विशेष में आप भी शामिल है एक विशेषण विशेष के साथ और वह विशेषण आप के लिए विशेष रूप से लागू होता है को भी नियंत्रीय करते है और इस प्रकार इस विश्वमानवता को संस्कारित और सुसंस्कृतवान बनाते है। मेरी आप से कोई निजी दूरी नहीं वरन आप अपनी भलाई के लिए इतना जरूर याद रखियेगा की  मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण पर अपनी संस्कृति और संस्कार को थोपने का प्रयास मत कीजियेगा। क्योंकि आप मेरे लिए संदिग्ध थे और आत्मनियंत्रण के परीक्षण में खरे नहीं उतरे इस प्रकार तथाकथित विश्वमहाशक्ति  के स्वभू स्वामी बन सकते हैं पर सत्य  विश्वमहाशक्ति को जन्म देना और उसका स्वामी बन पाना तभी संभव है जब की आप सनातन  हिन्दू संस्कृति में अपना समर्पण कर देंगे अन्यथा निष्प्राण विश्वमहाशक्ति की लाश मतलब तथाकथित विश्वमहाशक्ति को लेकर/बनकर ढोते/बने रहिये विश्वमहाशक्ति तो इस भारत/भारतवर्ष /अखंड भारत/हिन्दुस्थान/ हिन्द में ही रहेगा/रहेगी।

Friday, December 11, 2015

आतंकवाद के बम की तुलना में चरित्रहीनता का बम कितना शक्तिशाली था कि एक-एक करके जिनका मै समर्थन कर रह गया था वही मेरे विरोध में खड़े कर दिए गए और उनको अभी तक ज़रा भी भान/ज्ञान ही नहीं है? लेकिन ये चरित्र हीनता के बम और आतंकवाद के बम से मेरा निवेदन है की यह संसार केवल आग और पानी को एक दूसरे से संतुलित करने से नहीं चल रहा है वरन वह मृदा तत्व जिसको धरणीधर, शेषनाग थामें हुए हैं, पवनदेव स्वांस दे रहे हैं और अंतरिक्ष/निलय देव इसका आकार दे रहे है वे भी इसमें सहभागी हैं और उनकी भी इससे कुछ अपेक्षा है और इस प्रकार यह पञ्च तत्व इसको ऊर्जावान और उर्वरा बनाते है और हम सनातन हिन्दू संस्कृति से सरोबोर भारतीय समाज को उर्वरा और ऊर्जावान रहने की जरूरत है न की आग और पानी को केवल एक दूसरे से संतुलित करने वाले अनवरत युद्ध की रस्सा कशी में हमें जीना है। क्योंकि जिस दिन हमारी उर्वराशक्ति और ऊर्जा समाप्त हुई उस दिन न हम रहेंगे, न चरित्रहीनता का बम बचेगा और न आतंकवाद का बम बचेगा और सम्पूर्ण मानवता विलुप्त हो जाएगी तो हम क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर सबमे संतुलन चाहने वालों की संतान हैं न की जल और पावक के बीच के ही संतुलन को स्थापित करने में ही मानवता का सम्पूर्ण समय और ऊर्जा नष्ट करने वालों की।

आतंकवाद के बम की तुलना में चरित्रहीनता का बम कितना शक्तिशाली था कि एक-एक करके जिनका मै समर्थन कर रह गया था वही मेरे विरोध में खड़े कर दिए गए और उनको अभी तक ज़रा भी भान/ज्ञान ही नहीं है? लेकिन ये चरित्र हीनता के बम और आतंकवाद के बम से मेरा निवेदन है की यह संसार केवल आग और पानी को एक दूसरे से संतुलित करने से नहीं चल रहा है वरन वह मृदा तत्व जिसको धरणीधर, शेषनाग थामें हुए हैं, पवनदेव स्वांस दे रहे हैं और अंतरिक्ष/निलय देव इसका आकार दे रहे है वे भी इसमें सहभागी हैं और उनकी भी इससे कुछ अपेक्षा है और इस प्रकार यह पञ्च तत्व इसको ऊर्जावान और उर्वरा बनाते है और हम सनातन हिन्दू संस्कृति से सरोबोर भारतीय समाज को उर्वरा और ऊर्जावान रहने की जरूरत है न की आग और पानी को केवल एक दूसरे से संतुलित करने वाले अनवरत युद्ध की रस्सा कशी में हमें जीना है। क्योंकि जिस दिन हमारी उर्वराशक्ति और ऊर्जा समाप्त हुई उस दिन न हम रहेंगे, न चरित्रहीनता का बम बचेगा और न आतंकवाद का बम बचेगा और सम्पूर्ण मानवता विलुप्त हो जाएगी तो हम क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर सबमे संतुलन चाहने वालों की संतान हैं न की जल और पावक के बीच के ही संतुलन को स्थापित करने में ही मानवता का सम्पूर्ण समय और ऊर्जा नष्ट करने वालों की।

जिन लोगों के डर वश किशी सवर्ण/ब्राह्मण/हिन्दू को अपनी कन्याओं का विवाह धार्मिक, सामाजिक और प्रकार संवैधानिक नियमों के विरुद्ध करना पड़ता है या पड़ रहा है और देश-विदेश के रास्ते आने-जाने में वे भी सबसे आगे मतलब वे देश रूपी बॉक्स में ही जीवन नहीं जी रहे हैं बल्कि उनको बाहर से प्रोत्साहित भी किया जा रहा है, तो उनको सार्वजनिक राजस्व से आये धन सम्पदा के आधार पर सृजित सेवापद, शिक्षाप्रवेश और तरह-तरह की निःशुल्क सुविधा को जारी रखे जाने का औचित्य किस आधार पर? और यह कौन से "सत्यमेव जयते" की नीति पर जारी है?

जिन लोगों के डर वश किशी सवर्ण/ब्राह्मण/हिन्दू को अपनी कन्याओं का विवाह धार्मिक, सामाजिक और प्रकार संवैधानिक नियमों के विरुद्ध करना पड़ता है या पड़ रहा है और देश-विदेश के रास्ते आने-जाने में वे भी सबसे आगे मतलब वे देश रूपी बॉक्स में ही जीवन नहीं जी रहे हैं बल्कि उनको बाहर से प्रोत्साहित भी किया जा रहा है, तो उनको सार्वजनिक राजस्व से आये धन सम्पदा के आधार पर सृजित सेवापद, शिक्षाप्रवेश और तरह-तरह की निःशुल्क सुविधा को जारी रखे जाने का औचित्य किस आधार पर? और यह कौन से "सत्यमेव जयते" की नीति पर जारी है?

85 वर्ष से अधिक की आयु को जीने वाले राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ और विश्वहिन्दु परिषद के मुझसे निकटतम सम्बंधित सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, पारसनाथ(शाब्दिक अर्थ शिव) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, अभयचंद (निडर चन्द्र=पूर्णचंद्र:पूर्णिमा के दिन वाला चन्द्रमा)) के इस दुनिया से जाने के बाद एक युग का अंत हुआ। काशीराम, नारायणन, जार्ज फर्नांडीज, अटल जी, कलाम गुरुदेव और अब जोशी जी और उनके भक्त तक के नाम का प्रयोग जिनके सामने काम नहीं आया मेरे सम्बन्ध में। जिसमे जिसकी सहन सीलता और पुरुषार्थ की जो अवकात थी उसी के अनुरूप अपना प्रदर्शन किया। दलित ईसाई समाज हरण और चीर हरण में प्रवीण है जो ये लोग जन्म-जन्मान्तर से किये थे वही पुनः किये तो अब दुनिया के लोग 9 और 11 की जिम्मेदारी उन्ही रावण और दुशासन समर्थको को लोगों को ले लेनी चाहिए क्योंकि उसे ही शिध्ध करने हेतु वैश्विक महासंग्राम हुआ था और अब 14 वर्ष बाद पूर्णतः वह सिद्ध हो चुका है। उनको सृजन, समन्वय और समृद्धि के लिए चिंता नहीं वरन उनकी तो सोने की लंका भी कुबेर और विष्वकर्मा को दिए गये भय और आतंक से ही बनती चली आ रही है उनको सृजन, समन्वय और समृद्धि नही चाहिए वे तो "विद्या विवादाय(विद्या को विवाद में प्रयोग करते हैं), धनम मदाय(लक्ष्मी का दुरुपयोग) और शक्ति परेषाम् परिपीडनाय(उनकी शक्ति दूसरों को पीड़ा पहुंचाने हेतु) " और वे बार बार समाज को पतन के रास्ते पर ले जाते रहे हैं और उनकी मायावी स्वरुप को अंधे लोग समर्थन किये जा रहे हैं आज तह और उनका वही एक सूत्रीय त्रियाचरित्र वशीकरण कार्य जारी है जो वास्तविकता में उनका हरण और चीर हरण हैं जो त्रियाचरित्र के समझ में बाद में आता है। >>>प्रयागराज का कुर्मावतारी समाज जो बहुत बड़ा राम और कृष्ण भक्त बनाता है वह भी उसी सीत युद्ध में किस प्रकार के स्वार्थ हेतु शामिल था यह वही जाने पर उनको भी पता होना जाना चाहिए की की उनके घर में भी गोरे भी रहते है और हमारे घर में कृष्णकाय भी तो अंध कृष्णकाय भक्ति और अंध समर्थन कम से कम अब बंद कर दें क्योंकि आप का अंध समर्थन दलित ईसाई समाज के लिए एक बहुत बड़ी शक्ति प्रदान किया है और जो आप को ही बे नकाब किया है जिसको मुझे यहां शब्दों के माध्यम से बताना पड़ा है।

85 वर्ष से अधिक की आयु को जीने वाले राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ और विश्वहिन्दु परिषद के मुझसे निकटतम सम्बंधित सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, पारसनाथ(शाब्दिक अर्थ शिव) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, अभयचंद (निडर चन्द्र=पूर्णचंद्र:पूर्णिमा के दिन वाला चन्द्रमा)) के इस दुनिया से जाने के बाद एक युग का अंत हुआ। काशीराम, नारायणन, जार्ज फर्नांडीज, अटल जी, कलाम गुरुदेव और अब जोशी जी और उनके भक्त तक के नाम का प्रयोग जिनके सामने काम नहीं आया मेरे सम्बन्ध में। जिसमे जिसकी सहन सीलता और पुरुषार्थ की जो अवकात थी उसी के अनुरूप अपना प्रदर्शन किया। दलित ईसाई समाज हरण और चीर हरण में प्रवीण है जो ये लोग जन्म-जन्मान्तर से किये थे वही पुनः किये तो अब दुनिया के लोग 9 और 11 की जिम्मेदारी उन्ही रावण और दुशासन समर्थको को लोगों को ले लेनी चाहिए क्योंकि उसे ही शिध्ध करने हेतु वैश्विक महासंग्राम हुआ था और अब 14 वर्ष बाद पूर्णतः वह सिद्ध हो चुका है। उनको सृजन, समन्वय और समृद्धि के लिए चिंता नहीं वरन उनकी तो सोने की लंका भी कुबेर और विष्वकर्मा को दिए गये  भय और आतंक से ही बनती चली आ रही है उनको सृजन, समन्वय और समृद्धि नही चाहिए वे तो "विद्या विवादाय(विद्या को विवाद में प्रयोग करते हैं), धनम मदाय(लक्ष्मी का दुरुपयोग) और शक्ति परेषाम् परिपीडनाय(उनकी शक्ति दूसरों को पीड़ा पहुंचाने हेतु) " और वे बार बार समाज को पतन के रास्ते पर ले जाते रहे हैं और उनकी मायावी स्वरुप को अंधे लोग समर्थन किये जा रहे हैं आज तह और उनका वही एक सूत्रीय त्रियाचरित्र वशीकरण कार्य जारी है जो वास्तविकता में उनका हरण और चीर हरण हैं जो त्रियाचरित्र के समझ में बाद में आता है। >>>प्रयागराज का कुर्मावतारी समाज जो बहुत बड़ा राम और कृष्ण भक्त बनाता है वह भी उसी सीत युद्ध में किस प्रकार के स्वार्थ हेतु शामिल था यह वही जाने पर उनको भी पता होना जाना चाहिए की की उनके घर में भी गोरे भी रहते है और हमारे घर में कृष्णकाय भी तो अंध कृष्णकाय भक्ति और अंध समर्थन कम से कम अब बंद कर दें क्योंकि आप का अंध समर्थन दलित ईसाई समाज के लिए एक बहुत बड़ी शक्ति प्रदान किया है और जो आप को ही बे नकाब किया है जिसको मुझे यहां शब्दों के माध्यम से बताना पड़ा है।
https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur
http://research.omicsgroup.org/index.php/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

Wednesday, December 9, 2015

जहाँ तक किशी दौर में प्रयागराज विश्विद्यालय में एक विशेष दिन के लिए किशी आगंतुक संगणक प्रशिक्षक को एक रूपये का सिक्का देकर पढने की बात है तो उस समय उस दिन मेरे पास केवल एक रूपया ही पास था पर्श रूम पर छूट गया था नहीं तो और दिया होता। अभी तक मैंने जिस किशी भी गुरु से शिक्षा लिया हूँ उनसे उऋण नहीं हुआ हूँ क्योंकि वे सब भारत और भारतीयों में अपनी आस्था और ईमानदारी रखते है (इसका मतलब यह नहीं की वे विदेशियों से मानवता का व्यवहार नहीं करते हैं और उनको ठगते हैं) तो वह प्रशिक्षक जिसकी आस्था उस विदेश में है जो समय, काल और पारिस्थितिक रूप से मेरे विरोध में कार्यरत था और वह पैसा कमाऊं है उसकी शिक्षा का ऋण उसी समय देना उचित था। वैसे मै अपने राजस्व ब्राह्मण(वह ब्राह्मण जो रज=लक्ष्मी के बिना चलता ही नहीं है)/श्रीवास्तव/कायस्थ गुरुदेव के विशेष दबाव में उस प्रशिक्षक की कक्षा में बैठा था बहुत देर बाद और उनसे कुछ शिखा भी नही था। तो उस एक रूपये के सिक्के को देने के बदले मैं उनसे प्रशिक्षण की कक्षा में प्रशिक्षण लिया था और पैसा होता उस दिन मेरी जेब में तो और दिया होता।

जहाँ तक किशी दौर में प्रयागराज विश्विद्यालय में  एक विशेष दिन के लिए किशी आगंतुक संगणक प्रशिक्षक को एक रूपये का सिक्का देकर पढने की बात है तो उस समय उस दिन मेरे पास केवल एक रूपया ही पास था पर्श रूम पर छूट गया था नहीं तो और दिया होता। अभी तक मैंने जिस किशी भी गुरु से शिक्षा लिया हूँ उनसे उऋण नहीं हुआ हूँ क्योंकि वे सब भारत और भारतीयों में अपनी आस्था और ईमानदारी रखते है (इसका मतलब यह नहीं की वे विदेशियों से मानवता का व्यवहार नहीं करते हैं और उनको ठगते हैं) तो वह प्रशिक्षक जिसकी आस्था उस विदेश में है जो समय,  काल और पारिस्थितिक रूप से मेरे विरोध में कार्यरत था और वह पैसा कमाऊं है उसकी शिक्षा का ऋण उसी समय देना उचित था। वैसे मै अपने राजस्व ब्राह्मण(वह ब्राह्मण जो रज=लक्ष्मी के बिना चलता ही नहीं है)/श्रीवास्तव/कायस्थ गुरुदेव के विशेष दबाव में उस प्रशिक्षक की कक्षा में बैठा था बहुत देर बाद और उनसे कुछ शिखा भी नही था। तो उस एक रूपये के सिक्के को देने के बदले मैं उनसे प्रशिक्षण की कक्षा में प्रशिक्षण लिया था और पैसा होता उस दिन मेरी जेब में तो और दिया होता।    

किशी तीसरे और चौथे व्यक्ति की गलती से मैं अपना कोई गुरुकुल छोड़ दूँ तो यह मेरी सबसे बड़ी मूर्खता साबित होती और मैं गुरुकुल के किशी पाढ़यक्रम में शामिल हो आत्मविभोर ही हुआ हूँ और उन गुरुओं से कक्षा में बैठकर मुझे पुनः शिक्षा लेने का शौभाग्य प्राप्त हुआ पर नए गुरुजन में से मुस्किल से एक दो को ही पढ़ सका जो मेरे समकक्ष उम्र के थे और उनमे मेरी रूचि भी उतनी नहीं थी जितनी की अपने समकालीन गुरुजन में।

किशी तीसरे और चौथे व्यक्ति की गलती से मैं अपना कोई गुरुकुल छोड़ दूँ तो यह मेरी सबसे बड़ी मूर्खता साबित होती और मैं गुरुकुल के किशी पाढ़यक्रम में शामिल हो आत्मविभोर ही हुआ हूँ और उन गुरुओं से कक्षा में बैठकर मुझे पुनः शिक्षा लेने का शौभाग्य प्राप्त हुआ पर नए गुरुजन में से मुस्किल से एक दो को ही पढ़ सका जो मेरे समकक्ष उम्र के थे और उनमे मेरी रूचि भी उतनी नहीं थी जितनी की अपने समकालीन गुरुजन में।

Tuesday, December 8, 2015

प्रयागराज से काशी जाते समय जी टी रोड पर सीतामढी(सीता समाहित स्थल न की सीता प्रकटीकरण स्थल ) की दिशा में जाने वाले रास्ते और गोपीगंज के बीच 30 जनवरी, 2012 में जो मेरी परीक्षा के लिए जो प्रयोग मेरे सार्वजनिक वाहन में 5 मिनट के लिए किया गया और पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के लिए 150 किलोमीटर से पत्र आने में जो दो सप्ताह का समय लगा जिसके कारन शेष 4-5 दिन में ही कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) समय सीमा के अंदर मिलना मुस्किल था हांलाकी उसमे भी लापरवाही हुई और कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) पुनश्चर्या पाठ्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद मिला तो सब कुछ को देखते हुए जो आचरण उस दौरान हुआ वह न्याय संगत था लौकिक और पारलौकिक रूप से। >>>>>>>>>>>>>>मौखिक रूप से बिना किशी प्रपत्र पर लेखा पढ़ी के एक कक्ष में कई लोगों के साथ आवास उपलब्ध हुआ पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के लिए तो वहां से मौखिक सूचना के बाद कहीं जाना मान्य कैसे नहीं था? कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) एक सप्ताह के अंदर देने को कहा गया था और विभागाध्यक्ष द्वारा निर्मोचन(रिलीविंग) मान्य नहीं है यह कहा गया था, तो फिर कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) लेने हेतु जाने की मौखिक सूचना आवास पर देकर जब सप्ताहांत वापस आया और तब भी कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) नहीं मिला तो फिर जाने का प्रश्न ही नहीं? और जानकारी के लिए कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) पुनश्चर्या पाठ्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद मिला। तो फिर ऐसा प्रश्न क्यों?>>>>>>>>प्रयागराज से काशी जाते समय जी टी रोड पर सीतामढी(सीता समाहित स्थल न की सीता प्रकटीकरण स्थल ) की दिशा में जाने वाले रास्ते और गोपीगंज के बीच 30 जनवरी, 2012 में जो मेरी परीक्षा के लिए जो प्रयोग मेरे सार्वजनिक वाहन में 5 मिनट के लिए किया गया और पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के लिए 150 किलोमीटर से पत्र आने में जो दो सप्ताह का समय लगा जिसके कारन शेष 4-5 दिन में ही कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) समय सीमा के अंदर मिलना मुस्किल था हांलाकी उसमे भी लापरवाही हुई और कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) पुनश्चर्या पाठ्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद मिला तो सब कुछ को देखते हुए जो आचरण उस दौरान हुआ वह न्याय संगत था लौकिक और पारलौकिक रूप से।

प्रयागराज से काशी जाते समय जी टी रोड पर सीतामढी(सीता समाहित स्थल न की सीता प्रकटीकरण स्थल ) की दिशा में जाने वाले रास्ते और गोपीगंज के बीच 30 जनवरी, 2012 में जो मेरी परीक्षा के लिए जो प्रयोग मेरे सार्वजनिक वाहन में 5 मिनट के लिए किया गया और पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के लिए 150 किलोमीटर से पत्र आने में जो दो सप्ताह का समय लगा जिसके कारन शेष 4-5 दिन में ही कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) समय सीमा के अंदर मिलना मुस्किल था हांलाकी उसमे भी लापरवाही हुई और कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) पुनश्चर्या पाठ्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद मिला तो सब कुछ को देखते हुए जो आचरण उस दौरान हुआ वह न्याय संगत था लौकिक और पारलौकिक रूप से। >>>>>>>>>>>>>>मौखिक रूप से बिना किशी प्रपत्र पर लेखा पढ़ी के एक कक्ष में कई लोगों के साथ आवास उपलब्ध हुआ पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के लिए तो वहां से मौखिक सूचना के बाद कहीं जाना मान्य कैसे नहीं था? कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) एक सप्ताह के अंदर देने को कहा गया था और विभागाध्यक्ष द्वारा निर्मोचन(रिलीविंग) मान्य नहीं है यह कहा गया था, तो फिर कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) लेने हेतु जाने की मौखिक सूचना आवास पर देकर जब सप्ताहांत वापस आया और तब भी कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) नहीं मिला तो फिर जाने का प्रश्न ही नहीं? और जानकारी के लिए कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) पुनश्चर्या पाठ्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद मिला। तो फिर ऐसा प्रश्न क्यों?>>>>>>>>प्रयागराज से काशी जाते समय  जी टी रोड पर सीतामढी(सीता समाहित स्थल न की सीता प्रकटीकरण स्थल ) की दिशा में जाने वाले रास्ते और गोपीगंज के बीच 30 जनवरी, 2012 में जो मेरी परीक्षा के लिए जो प्रयोग मेरे सार्वजनिक वाहन में 5 मिनट के लिए किया गया और पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के लिए 150 किलोमीटर से पत्र आने में जो दो सप्ताह का समय लगा जिसके कारन शेष 4-5 दिन में ही कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) समय सीमा के अंदर मिलना मुस्किल था हांलाकी उसमे भी लापरवाही हुई और कुलसचिव द्वारा ही निर्मोचन(रिलीविंग) पुनश्चर्या पाठ्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद मिला तो सब कुछ को देखते हुए जो आचरण उस दौरान हुआ वह न्याय संगत था लौकिक और पारलौकिक रूप से।

पहले दोआब:प्रयागराज-काशी तब पंजाब:सिंध यह तो मै बहुत पहले से कह रहा हूँ कोई जब सुने तब न। कश्यप=मनु ऋषि और उनकी पत्नी अदिति=श्रद्धा प्रथम ऋषि दंपत्ति हैं जो ऋषी सभ्यता से मानव सभ्यता का शुभारम्भ किये थे जिनसे कश्यप गोत्र परम्परा आरम्भ हुई जिसके बाद अन्य ऋषी दम्पति द्वारा मानव परम्परा का आरम्भ हुआ और उनके गोत्र से वंसज प्रथा सुरु हुई और इस प्रकार प्रयागराज-काशी के ऋषि परम्परा से कश्यप ऋषि के कश्मीर क्षेत्र के मैदानी और नदी घाटी क्षेत्र, सिंध-पंजाब से मानव परम्परा का प्रादुर्भाव हुआ पर मानवता का मूल बिंदु प्रयागराज-काशी ही है क्योंकि ऋषि परम्परा से ही मानव परम्परा का प्रादुर्भाव हुआ। पहले दोआब:प्रयागराज-काशी तब पंजाब:सिंध यह तो मै बहुत पहले से कह रहा हूँ कोई जब सुने तब न। तो यह विचार का विषय है की जिस मनु=कश्यप और श्रद्धा=अदिति दंपत्ति के प्रयास से हम मानवता की प्रथम श्रेणी से हम आज की इस अवस्था में पहुंचे है उन्ही को हम अपने द्वारा उठाये गए गलत नियमों और कर्मों के दंड से बचने हेतु गाली दें?

पहले दोआब:प्रयागराज-काशी तब पंजाब:सिंध यह तो मै बहुत पहले से कह रहा हूँ कोई जब सुने तब न। कश्यप=मनु ऋषि और उनकी पत्नी अदिति=श्रद्धा प्रथम ऋषि दंपत्ति हैं जो ऋषी सभ्यता से मानव सभ्यता का शुभारम्भ किये थे जिनसे कश्यप गोत्र परम्परा आरम्भ हुई जिसके बाद अन्य ऋषी दम्पति द्वारा मानव परम्परा का आरम्भ हुआ और उनके गोत्र से वंसज प्रथा सुरु हुई और इस प्रकार प्रयागराज-काशी के ऋषि परम्परा से कश्यप ऋषि के कश्मीर क्षेत्र के मैदानी और नदी घाटी क्षेत्र, सिंध-पंजाब से मानव परम्परा का प्रादुर्भाव हुआ पर मानवता का मूल बिंदु प्रयागराज-काशी ही है क्योंकि ऋषि परम्परा से ही मानव परम्परा का प्रादुर्भाव हुआ। पहले दोआब:प्रयागराज-काशी तब पंजाब:सिंध यह तो मै बहुत पहले से कह रहा हूँ कोई जब सुने तब न। तो यह विचार का विषय है की जिस मनु=कश्यप और श्रद्धा=अदिति दंपत्ति के प्रयास से हम मानवता की प्रथम श्रेणी से हम आज की इस अवस्था में पहुंचे है उन्ही को हम अपने द्वारा उठाये गए गलत नियमों और कर्मों के दंड से बचने हेतु गाली दें?

आप विनम्रता को किस प्रकार परिभाषित करते है? जो आप के सामने नत मस्तक हो सब कुछ सुन ले ? तो ऐसे बहुत से चरित्रहीन और स्वार्थी आप को मिल जाएंगे पर सच्चे विनम्र लोग नहीं मिलेंगे। कारन यह की चरित्रहीन और स्वार्थी चाहेगा की मेरे चरित्रहीनता के धंधे में आगे से बाधा न आये कुछ सुनने में क्या जा रहा और स्वार्थी समझेगा की मुझे इनसे कार्य लेना है तो जी हुजूरी में हाँ करने में क्या जा रहा ? पर सच्चे चरित्रवान और सच्चे व्यक्ति सही बात का समर्थन करेंगे और गलत तथ्यों पर अपने विचार प्रस्तुत करेंगे और आप सहमत न हों तो वे अगर आप का विरोध नहीं करेंगे तो उस विषय पर आप से दूरी अवश्य बना लेंगे।

आप विनम्रता को किस प्रकार परिभाषित करते है? जो आप के सामने नत मस्तक हो सब कुछ सुन ले ? तो ऐसे बहुत से चरित्रहीन और स्वार्थी आप को मिल जाएंगे पर सच्चे विनम्र लोग नहीं मिलेंगे। कारन यह की चरित्रहीन और स्वार्थी चाहेगा की मेरे चरित्रहीनता के धंधे में आगे से बाधा न आये कुछ सुनने में क्या जा रहा और स्वार्थी समझेगा की मुझे इनसे कार्य लेना है तो जी हुजूरी में हाँ करने में क्या जा रहा ? पर सच्चे चरित्रवान और सच्चे व्यक्ति सही बात का समर्थन करेंगे और गलत तथ्यों पर अपने विचार प्रस्तुत करेंगे और आप सहमत न हों तो वे अगर आप का विरोध नहीं करेंगे तो उस विषय पर आप से दूरी अवश्य बना लेंगे।

नारीवादी होना गलत नहीं पर नारीवादी होने की आंड में सम्पूर्ण विश्व को चरित्रहीनता के गोरख धंधे में धकेलना नितांत गलत है और यह बहुत ही जोर शोर से जारी वर्तमान युग में।

नारीवादी होना गलत नहीं पर नारीवादी होने की आंड में सम्पूर्ण विश्व को चरित्रहीनता के गोरख धंधे में धकेलना नितांत गलत है और यह बहुत ही जोर शोर से जारी वर्तमान युग में।

वर्तमान मन्वन्तर में सबसे ज्येष्ठ व् वरिष्ठ कश्यप ऋषी 13 शादियों की कथा बड़ी रोचक है: ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज दक्ष की प्रथम पुत्री सती के अपनी इक्षानुसार महादेव शिव से विवाह उपरांत दक्ष जी की शेष 13 कन्याओं का विवाह न हो पाने से दुखी दक्ष जी ने यह कहानी ब्रह्मा जी से सुनाई और फिर ब्रह्मा जी ने कश्यप ऋषि के पिता मारीच से संपर्क किया और उनको इस बात के लिए मना लिया की मारीच ऋषि के एक मात्र पुत्र कश्यप ऋषि से काशीराज दक्ष प्रजापति की सभी 13 वे कन्यायें जो सती/पारवती से छोटी थी उनका विवाह होगा और इस प्रकार कश्यप ऋषि को पिता की आज्ञा पालन में 13 विवाह करना पड़ा न की यह कोई अय्यासी भरा कदम था। तो पिता के आज्ञाकारी पुत्र होने के दायित्व ने उनको 13 विवाह करने को उसी तरह बाध्य किया जैसे गुरु सूर्यदेव/ भाष्कर की गुरुदक्षिणा को पूर्ण करने के दायित्व ने हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर को गुरु सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला से विवाह करने को बाध्य किया जिससे पातालपुरी के राजा मकरध्वज का जन्म हुआ जो रावण के भाई अहिरावण(जो विश्व का सबसे बड़ा माफिया था) की राजसत्ता पर अधिकार पाये थे थे भगवान श्रीराम द्वारा राजतिलक करते हुए हनुमान द्वारा राम-रावण युद्ध के दौरान रात्रि शयन कक्ष से अपहृत श्रीराम और लक्ष्मण को छुड़ाने के दौरान उसका बध करने के उपरान्त। तो एक ने पिता आज्ञापालन में 13 विवाह और दूसरे ने गुरु आज्ञापालन में अखंड ब्रह्मचर्य ब्रत से ब्रह्मचर्य मात्र व्रत धारी तक होना स्वीकार किया। और इस प्रकार अनाचार के उदहारण इनको नहीं मानते हैं।

वर्तमान मन्वन्तर में सबसे ज्येष्ठ व् वरिष्ठ कश्यप ऋषी 13 शादियों की कथा बड़ी रोचक है: ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज दक्ष की प्रथम पुत्री सती के अपनी इक्षानुसार महादेव शिव से विवाह उपरांत दक्ष जी की शेष 13 कन्याओं का विवाह न हो पाने से दुखी दक्ष जी ने यह कहानी ब्रह्मा जी से सुनाई और फिर ब्रह्मा जी ने कश्यप ऋषि के पिता मारीच से संपर्क किया और उनको इस बात के लिए मना लिया की मारीच ऋषि के एक मात्र पुत्र कश्यप ऋषि से काशीराज दक्ष प्रजापति की सभी 13 वे कन्यायें जो सती/पारवती से छोटी थी उनका विवाह होगा और इस प्रकार कश्यप ऋषि को पिता की आज्ञा पालन में 13 विवाह करना पड़ा न की यह कोई अय्यासी भरा कदम था। तो पिता के आज्ञाकारी पुत्र होने के दायित्व ने उनको 13 विवाह करने को उसी तरह बाध्य किया जैसे गुरु सूर्यदेव/ भाष्कर की गुरुदक्षिणा को पूर्ण करने के दायित्व ने हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर को गुरु सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला से विवाह करने को बाध्य किया जिससे पातालपुरी के राजा मकरध्वज का जन्म हुआ जो रावण के भाई अहिरावण(जो विश्व का सबसे बड़ा माफिया था) की राजसत्ता पर अधिकार पाये थे थे भगवान श्रीराम द्वारा राजतिलक करते हुए हनुमान द्वारा राम-रावण युद्ध के दौरान रात्रि शयन कक्ष से अपहृत श्रीराम और लक्ष्मण को छुड़ाने के दौरान उसका बध करने के उपरान्त। तो एक ने पिता आज्ञापालन में 13 विवाह और दूसरे ने गुरु आज्ञापालन में अखंड ब्रह्मचर्य ब्रत से ब्रह्मचर्य मात्र व्रत धारी तक होना स्वीकार किया। और इस प्रकार अनाचार के उदहारण इनको नहीं मानते हैं।

शादी न करना, ब्रह्मचर्य होना, अखंड ब्रह्मचर्य होना, और विवाह पूर्व तक अखंड ब्रह्मचर्य होना सबमें अंतर है। कोई अविवाहित हैं इसका मतलब अखंड ब्रह्मचर्य या ब्रह्मचर्य हैं ही यह कोई निश्चित करण तथ्य या मापन नही है ब्रह्मचर्य होने का। अविवाहित जो है उसका ब्रह्मचर्य जीवन में कई बार भंग भी हो जाता है जिसका भान/ज्ञान उसको स्वयं रखता है। तो उसको वैसे मार्ग से स्वयं अपनी सुरक्षा हेतु बचना चाहिए जो केवल विवाह पूर्व तक अखंड ब्रह्मचर्य तथा उसके बाद "जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी" तर्ज पर होता है हनुमान/आंबेडकर/अम्बवादेकर जी की तरह।

शादी न करना, ब्रह्मचर्य होना, अखंड ब्रह्मचर्य होना, और विवाह पूर्व तक अखंड ब्रह्मचर्य होना सबमें अंतर है। कोई अविवाहित हैं इसका मतलब अखंड ब्रह्मचर्य या ब्रह्मचर्य हैं ही यह कोई निश्चित करण तथ्य या मापन नही है ब्रह्मचर्य होने का। अविवाहित जो है उसका ब्रह्मचर्य जीवन में कई बार भंग भी हो जाता है जिसका भान/ज्ञान उसको स्वयं रखता है। तो उसको वैसे मार्ग से स्वयं अपनी सुरक्षा हेतु बचना चाहिए जो केवल विवाह पूर्व तक अखंड ब्रह्मचर्य तथा उसके बाद "जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी" तर्ज पर होता है हनुमान/आंबेडकर/अम्बवादेकर जी की तरह।

मेरा स्थान ग्रहण करने के लिए कम से कम विवाह पूर्व तक अखंड ब्रह्मचर्य रहना पडेगा पर जिन लोगों को इस श्रेणी में लाया जा रहा है उनको ऐसा होने के लिए दूसरा जन्म लेना पड़ेगा और अब इससे ज्यादा उनकी महिमा का मल्हार मुझसे मत करवाइये केवल अंध प्रतियोगिता से उनको महिमा मंडित करना हो तो करते रहिये।

मेरा स्थान ग्रहण करने के लिए कम से कम विवाह पूर्व तक अखंड ब्रह्मचर्य रहना पडेगा पर जिन लोगों को इस श्रेणी में लाया जा रहा है उनको ऐसा होने के लिए दूसरा जन्म लेना पड़ेगा और अब इससे ज्यादा उनकी महिमा का मल्हार मुझसे मत करवाइये केवल अंध प्रतियोगिता से उनको महिमा मंडित करना हो तो करते रहिये। 

इस प्रकार सभी जाति/धर्म के इस्वर/देव जन से यही इक्षा रखा था की की गुरुजन सेवा और मानवता हित ही मेरा धर्म हो और मेरा जब भी जन्म हो भारत भूमि पर ही हो चाहे किशी भी दलित से लेकर ब्राह्मण जाति या हिन्दू से लेकर मुस्लिम, ईसाई या इनकी संगत किशी भी धर्म वाले के घर में हो और श्रेष्ठतम तब रहेगा जब सनातन ब्राह्मण/हिन्दू के घर में हो। >>>>>>>वे दिन मुझे याद हैं जिन दिनों मै बिशुनपुर-जौनपुर-223103 और रामापुर-आज़मगढ़-223225 के आस-पास और शिक्षण लिए क्षेत्रों के हर जाती और धर्म के लोगों को परोक्ष प्रणाम कर ऊर्जा लिया करता था विशेषकर बिशुनपुर-जौनपुर-223103 और रामापुर-आज़मगढ़-223225 के गाँव से संबंधित लोगों को। और रही उससे आगे की तो काशी-प्रयाग से लेकर बैंगलोर तक के शिक्षण संस्थान से संबंधित लोगों और केन्द्रों/विभागों का अभिवादन जिसमे से दो बार (दो अलग-अलग दिन) भारतीय विज्ञान संस्थान के हर केंद्र/विभाग और पुरुष छात्रावास का शास्तान्ग प्रणाम और अभिवादन मैंने किया था जिसमे से वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र के सभी गुरुजन और उनके कक्ष तथा अभियांत्रिक उपकरण कक्ष का अभिवादन और शाष्टांग प्रणाम विशेष रूप से शामिल है। पञ्च गायत्री मंदिर यशवंतपुर में पूजा-अर्चना और दान दक्षिणा कर माननीय लोकनायक जयप्रकाश नारायण पार्क से प्रारम्भ करते हुए यशवंतपुर के समष्त जाती/धर्म के देवालय और भाजपा, कांग्रेस और अन्य सभी पार्टियों को अभिवादन करते हुए यशवंतपुर के पंचगायत्री मंदिर के सामने से ही मलेश्वरम् की दिशा में थोड़ी तिरछे जाने वाले मार्ग पर आने वाले विशाल शिवलिंगकार गोलगुम्बद वाले के महादेव मंदिर को शाष्टांग प्रणाम करते हुए पुनः यशवंतपुर पञ्च गायत्री मंदिर पर प्रणाम और अभिवादन की प्रक्रिया का समापन समापन अपने लिए नहीं वरन इस विश्व जनमानस का कलुष धोने के लिए ही किया था। इस प्रकार सभी जाति/धर्म के इस्वर/देव जन से यही इक्षा रखा था की की गुरुजन सेवा और मानवता हित ही मेरा धर्म हो और मेरा जब भी जन्म हो भारत भूमि पर ही हो चाहे किशी भी दलित से लेकर ब्राह्मण जाति या हिन्दू से लेकर मुस्लिम, ईसाई या इनकी संगत किशी भी धर्म वाले के घर में हो और श्रेष्ठतम तब रहेगा जब सनातन ब्राह्मण/हिन्दू के घर में हो।

इस प्रकार सभी जाति/धर्म के इस्वर/देव जन से यही इक्षा रखा था की की गुरुजन सेवा और मानवता हित ही मेरा धर्म हो और मेरा जब भी जन्म हो भारत भूमि पर ही हो चाहे किशी भी दलित से लेकर ब्राह्मण जाति या हिन्दू से लेकर मुस्लिम, ईसाई या इनकी संगत किशी भी धर्म वाले के घर में हो और श्रेष्ठतम तब रहेगा जब सनातन ब्राह्मण/हिन्दू के घर में हो। >>>>>>>वे दिन मुझे याद हैं जिन दिनों मै बिशुनपुर-जौनपुर-223103 और रामापुर-आज़मगढ़-223225 के आस-पास और शिक्षण लिए क्षेत्रों के हर जाती और धर्म के लोगों को परोक्ष प्रणाम कर ऊर्जा लिया करता था विशेषकर बिशुनपुर-जौनपुर-223103 और रामापुर-आज़मगढ़-223225 के गाँव से संबंधित लोगों को। और रही उससे आगे की तो काशी-प्रयाग से लेकर बैंगलोर तक के शिक्षण संस्थान से संबंधित लोगों और केन्द्रों/विभागों का अभिवादन जिसमे से दो बार (दो अलग-अलग दिन) भारतीय विज्ञान संस्थान के हर केंद्र/विभाग और पुरुष छात्रावास का शास्तान्ग प्रणाम और अभिवादन मैंने किया था जिसमे से वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र के सभी गुरुजन और उनके कक्ष तथा अभियांत्रिक उपकरण कक्ष का अभिवादन और शाष्टांग प्रणाम विशेष रूप से शामिल है। पञ्च गायत्री मंदिर यशवंतपुर में पूजा-अर्चना और दान दक्षिणा कर माननीय लोकनायक जयप्रकाश नारायण पार्क से प्रारम्भ करते हुए यशवंतपुर के समष्त जाती/धर्म के देवालय और भाजपा, कांग्रेस और अन्य सभी पार्टियों को अभिवादन करते हुए यशवंतपुर के पंचगायत्री मंदिर के सामने से ही मलेश्वरम् की दिशा में थोड़ी तिरछे जाने वाले मार्ग पर आने वाले विशाल शिवलिंगकार गोलगुम्बद वाले के महादेव मंदिर को शाष्टांग प्रणाम करते हुए पुनः यशवंतपुर पञ्च गायत्री मंदिर पर प्रणाम और अभिवादन की प्रक्रिया का समापन समापन अपने लिए नहीं वरन इस विश्व जनमानस का कलुष धोने के लिए ही किया था। इस प्रकार सभी जाति/धर्म के इस्वर/देव जन से यही इक्षा रखा था की की गुरुजन सेवा और मानवता हित ही मेरा धर्म हो और मेरा जब भी जन्म हो भारत भूमि पर ही हो चाहे किशी भी दलित से लेकर ब्राह्मण जाति या हिन्दू से लेकर मुस्लिम, ईसाई या इनकी संगत किशी भी धर्म वाले के घर में हो और श्रेष्ठतम तब रहेगा जब सनातन ब्राह्मण/हिन्दू के घर में हो।

सनातन ब्राह्मण, ब्राह्मण, भूमिहार ब्राह्मण/ ब्रह्मक्षत्रिय और कायस्थ/राजस्व ब्राह्मण जाती/धर्म के छात्र जो मेरी आदि से लेकर अंत तक की कक्षाओं(में एक वर्ष के अनुत्तीर्ण छात्र जो साथ आ गए थे को छोड़कर) के सहपाठी और सह शोधक थे जौनपुर- से लेकर आजमगढ़-वाराणसी-प्रयागराज तक से लेकर बैंगलोर तक वे सभी मुझसे कम उम्र के ही थे(11-11-1975 के बाद के और स्वयं जिनके जोड़ में मुझे एक दसक पहले लगाया गया था वे क्षत्रिय भाई और ब्राह्मण भाई भी मुझसे कम उम्र के ही थे)। यह पूर्ण सत्य तथ्य है जिसमे से कोई ऐसा नहीं था जिसकी परिश्थिति मुझसे ज्यादा कठिन और सुगम रही हों?

सनातन ब्राह्मण, ब्राह्मण, भूमिहार ब्राह्मण/ ब्रह्मक्षत्रिय और कायस्थ/राजस्व ब्राह्मण जाती/धर्म के छात्र जो मेरी आदि से लेकर अंत तक की कक्षाओं(में एक वर्ष के अनुत्तीर्ण छात्र जो साथ आ गए थे को छोड़कर) के सहपाठी और सह शोधक थे जौनपुर- से लेकर  आजमगढ़-वाराणसी-प्रयागराज तक से लेकर बैंगलोर तक वे सभी मुझसे कम उम्र के ही थे(11-11-1975 के बाद के और स्वयं जिनके जोड़ में मुझे एक दसक पहले लगाया गया था वे क्षत्रिय भाई और ब्राह्मण भाई भी मुझसे कम उम्र के ही थे)। यह पूर्ण सत्य तथ्य है जिसमे से कोई ऐसा नहीं था जिसकी परिश्थिति मुझसे ज्यादा कठिन और सुगम रही हों? 

इस स्वप्न को छोड़ दीजिये की जिस किशी हिन्दू समाज के व्यक्ति या व्यक्ति समूह ने वैश्विक दबाव में कार्य करने वाले भारतीय दलित ईसाई समाज के दबाव में आकर किशी दलित/ईसाई समाज के युवक से स्वयं तथा अपने निकट सहयोगियों द्वारा पाँव पूजते और पाँव पुजवाते हुए सनातन हिन्दू शास्त्रीय विधि को धता बताते हुए भरे हिन्दू समाज के सामने अपने अपनी कन्या का दान कर विवाह किया है( जो कि सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से अपने विवाह पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य या इनसे व्युत्पन्न जाती व्यस्था का स्वयं को स्वीकार ही नहीं किया था जिसका प्रमाण है विवाह बाद के संवैधानिक अभिलेखों में उसका नाम जो कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य या इनसे व्युत्पन्न जाती व्यस्थाकी श्रेणी में नहीं बल्कि दलित/ईसाई श्रेणी में हैं) तो फिर सम्पूर्ण भारतवर्ष आप की ही श्रेणी में आ जाय और आप के दलित ईसाई समाज का दास हो जाय। वह हिन्दुस्तानी जो इनका तथा इनके दलित ईसाई समाज का दास बनना चाहे इनकी दादागिरी में बन जाए पर जो मेरी श्रेणी में आना चाहे सहर्ष और सानन्द आ सकता है उस पर इन दलित ईसाई समाज और उनके अभिकर्ताओं/एजेंटों का असर नहीं होगा। हिंदुस्तान में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उनकी व्युत्पन्न जातियां रहेगीं और सामाजिक समभाव और सामजिक सौहार्द्र से रहेंगी पर जिसका जो दायित्व है उसका निर्वहन वह नहीं करेगा तो उससे वह कराये जाने का प्रयास किया जाएगा और तब भी नहीं किया तो स्थान और दिशा परिवर्तन भी मान्य होगा।

इस स्वप्न को छोड़ दीजिये की जिस किशी हिन्दू समाज के व्यक्ति या व्यक्ति समूह ने वैश्विक दबाव में कार्य करने वाले भारतीय दलित ईसाई समाज के दबाव में आकर किशी दलित/ईसाई समाज के युवक से स्वयं तथा अपने निकट सहयोगियों द्वारा पाँव पूजते और पाँव पुजवाते हुए सनातन हिन्दू शास्त्रीय विधि को धता बताते हुए भरे हिन्दू समाज के सामने अपने अपनी कन्या का दान कर विवाह किया है( जो कि सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से अपने विवाह पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य या इनसे व्युत्पन्न जाती व्यस्था का स्वयं को स्वीकार ही नहीं किया था जिसका प्रमाण है विवाह बाद के संवैधानिक अभिलेखों में उसका नाम जो कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य या इनसे व्युत्पन्न जाती व्यस्थाकी श्रेणी में नहीं बल्कि दलित/ईसाई श्रेणी में हैं) तो फिर सम्पूर्ण भारतवर्ष आप की ही श्रेणी में आ जाय और आप के दलित ईसाई समाज का दास हो जाय। वह हिन्दुस्तानी जो इनका तथा इनके दलित ईसाई समाज का दास बनना चाहे इनकी दादागिरी में बन जाए पर जो मेरी श्रेणी में आना चाहे सहर्ष और सानन्द आ सकता है उस पर इन दलित ईसाई समाज और उनके अभिकर्ताओं/एजेंटों का असर नहीं होगा। हिंदुस्तान में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उनकी व्युत्पन्न जातियां रहेगीं और सामाजिक समभाव और सामजिक सौहार्द्र से रहेंगी पर जिसका जो दायित्व है उसका निर्वहन वह नहीं करेगा तो उससे वह कराये जाने का प्रयास किया जाएगा और तब भी नहीं किया तो स्थान और दिशा परिवर्तन भी मान्य होगा।

Monday, December 7, 2015

सोमवंश/दुर्वाशा(कृष्णात्रेय)/अत्रि (+दत्तात्रेय/अत्रि+सोमात्रेय/अत्रि) और चन्द्रवंश/आदित्य/कश्यप में अंतर है जबकि दोनों चन्द्रमा के अंश से निकले है पर सोमवंश, अत्रि/सोमात्रेय गोत्रीय होगा और चन्द्रवंश(यदुवंश/वृष्णिवंश), कश्यप गोत्रीय होगा।

सोमवंश/दुर्वाशा(कृष्णात्रेय)/अत्रि (+दत्तात्रेय/अत्रि+सोमात्रेय/अत्रि)  और चन्द्रवंश/आदित्य/कश्यप में अंतर है जबकि दोनों चन्द्रमा के अंश से निकले है पर सोमवंश, अत्रि/सोमात्रेय गोत्रीय होगा और चन्द्रवंश(यदुवंश/वृष्णिवंश), कश्यप गोत्रीय होगा। 

दादा गिरी का जबाब आतंकवाद के रूप में देना कुछ "जैसे को तैसे" जैसा प्रतीत होता है तो अब समय आ गया है की शायद इस तथ्य पर गंभीरता से विचार करना होगा विश्व जनमानस को?

दादा गिरी का जबाब आतंकवाद के रूप में देना कुछ "जैसे को तैसे" जैसा प्रतीत होता है तो अब समय आ गया है की शायद इस तथ्य पर गंभीरता से विचार करना होगा विश्व जनमानस को?

सामाजिक और धार्मिक नियमों को धता बताते हुए होगा जिसे चरित्रहीनों की अवस्था में जिसे लाकर अपना घर बसाये जा रहे हो तो क्या आप के घर और ह्रदय रूपी मंदिर में ज्वालामुखी का उदगार नहीं होगा? बड़वानल और ज्वालामुखी उदगार अवश्य होगा और उस महाकुंड का बड़वानल और ज्वालामुखी की लपटे आप के जीवन को निगल जायेंगी और जला-जलाकर आप के जीवन को ख़ाक कर देंगी।

सामाजिक और धार्मिक नियमों को धता बताते हुए होगा जिसे चरित्रहीनों की अवस्था में जिसे लाकर अपना घर बसाये जा रहे हो तो क्या आप के घर और ह्रदय रूपी मंदिर में ज्वालामुखी का उदगार नहीं होगा? बड़वानल और ज्वालामुखी उदगार अवश्य होगा और उस महाकुंड का बड़वानल और ज्वालामुखी की लपटे आप के जीवन को निगल जायेंगी और जला-जलाकर आप के जीवन को ख़ाक कर देंगी।

मै सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण भी कक्षा और कक्षा से बाहर तथा जिम्मेदारी पूर्ण जीवन में सामाजिक पारखी था शून्य कक्षा में बिशुनपुर, जौनपुर-223103(सनातन गौतम गोत्रिय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण गाँव बिशुनपुर में ननिहाल ) ननिहाल से कक्षा 1 से कक्षा 4 में रामापुर, आजमगढ़-223225 और फिर पुनः कक्षा 5 में बिशुनपुर, जौनपुर और पुनः उच्च कक्षाओं और पुनः काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से लेकर प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज=अल्लाह आबाद=इला आवास=इला आबाद=संगम=त्रिवेणी से भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलूरू तक के गुरुकुल सहपाठी और इसके साथ गहन अध्ध्यन में अपने घर से लेकर सगे सम्बन्धियों तक की कि किशी की भी परिश्थिति मुझसे ज्यादा कठिन और मुझसे ज्यादा सुगम नहीं थी और न है तो न आप मुझे किस प्रकार दरिद्र कह गए? आप अपनी सम्पूर्ण चमत्कारिक दुनिआ का औसत निकाल लीजिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही सब प्रकार से सज्जन और सरल पाये जाएंगे और इस प्रकार इस दुनिआ की कोई युक्ति नहीं जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और उनकी व्युत्पत्ति जातियों को दुर्जन सिद्ध कर सके और इस प्रकार हम उन सभी का समर्थन करते हैं। और इससे ज्यादा तन्यता और कठोरता किस जाति धर्म में होगी जिसमे अपनी जाती/धर्म में विवाह सर्वोच्च माना गया है और दुनिया के किशी भी जाति/धर्म के व्यक्ति के विवाह पूर्ण हिन्दू रीती-रिवाज तथा देवी-देवताओं को मानते हुए अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय और उनकी व्युत्पत्ति जाति के रूप में सामाजिक, संवैधानिक, धार्मिक रूप से स्वीकार कर लेने पर हिन्दू सनातन शास्त्रीय विधि से विवाह कर धर्म पति पत्नी का दर्जा प्रदान करता है और इससे इतर हिन्दू रीती-रिवाज तथा देवी-देवताओं को मानते हुए अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय और उनकी व्युत्पत्ति जाति के रूप में सामाजिक, संवैधानिक, धार्मिक रूप से स्वीकार न करने पर यह हिन्दू सनातन शास्त्रीय विधि से विवाह मान्य नहीं करता है। बाकी लोग वास्तविक या छलिया आर्यसमाजी और कानूनी विवाह कर सकते है और कर भी रहे हैं तो उनको कौन रोक सकता है लेकिन यह धर्म पति-पत्नी शब्द नही केवल पति-पत्नी शब्द ही उनके लिए दिया जा सकता है।और यह विवाह में भी तथाकथित सामाजिक न्याय पर तो ज़रा रोक लगाइये अन्यथा महाकुंड के महासागर में डूब जाइए या डूब जाने का प्रबंध कर लीजिये। >>>>>>>>>मै ब्राह्मण, क्षत्रिय और उनकी व्युत्पत्ति जातिय व्यवस्था को ठीक मानता हूँ और यह जनता हूँ की खिचड़ी(चालाक) सभी बनेंगे तो विशुद्ध ब्राह्मण, विशुद्ध क्षत्रिय और विशुद्ध वैश्य के रूप में पहचाने जाने वाले महामूर्ख को कौन जानेगा? और जब ये विशुद्ध महामूर्ख जो सामाजिक व्यवस्था के आधार हैं वही नहीं रहेंगे जिस दिन तो यह समाज कहाँ रहेगा मतलब विशुद्ध ब्राह्मण, विशुद्ध क्षत्रिय और विशुद्ध वैश्य के समाप्त हने के साथ यह वैश्विक समाज महाविनाश को प्राप्त होगा जिसको मै पूर्णतः शिध्ध कर चुका हूँ।

मै सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण भी कक्षा और कक्षा से बाहर तथा जिम्मेदारी पूर्ण जीवन में सामाजिक पारखी था शून्य कक्षा में बिशुनपुर, जौनपुर-223103(सनातन गौतम गोत्रिय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण गाँव बिशुनपुर में ननिहाल )  ननिहाल  से कक्षा 1 से कक्षा 4 में रामापुर, आजमगढ़-223225 और फिर पुनः कक्षा 5 में  बिशुनपुर, जौनपुर और पुनः उच्च कक्षाओं और पुनः काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से लेकर प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज=अल्लाह आबाद=इला आवास=इला आबाद=संगम=त्रिवेणी से भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलूरू तक के गुरुकुल सहपाठी और इसके साथ गहन अध्ध्यन में अपने घर से लेकर सगे सम्बन्धियों तक की कि किशी की भी परिश्थिति मुझसे ज्यादा कठिन और मुझसे ज्यादा सुगम नहीं थी और न है तो न आप मुझे किस प्रकार दरिद्र कह गए? आप अपनी सम्पूर्ण चमत्कारिक दुनिआ का औसत निकाल लीजिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही सब प्रकार से सज्जन और सरल पाये जाएंगे और इस प्रकार इस दुनिआ की कोई युक्ति नहीं जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और उनकी व्युत्पत्ति जातियों को दुर्जन सिद्ध कर सके और इस प्रकार हम उन सभी का समर्थन करते हैं। और इससे ज्यादा तन्यता और कठोरता किस जाति धर्म में होगी जिसमे अपनी जाती/धर्म में विवाह सर्वोच्च माना गया है और दुनिया के किशी भी जाति/धर्म के व्यक्ति के विवाह पूर्ण हिन्दू रीती-रिवाज  तथा देवी-देवताओं को मानते हुए अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय और उनकी व्युत्पत्ति जाति के रूप में सामाजिक, संवैधानिक, धार्मिक रूप से स्वीकार कर लेने पर हिन्दू सनातन शास्त्रीय विधि से विवाह कर धर्म पति पत्नी का दर्जा प्रदान करता है और इससे इतर हिन्दू रीती-रिवाज  तथा देवी-देवताओं को मानते हुए अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय और उनकी व्युत्पत्ति जाति के रूप में सामाजिक, संवैधानिक, धार्मिक रूप से स्वीकार न करने पर यह हिन्दू सनातन शास्त्रीय विधि से विवाह मान्य नहीं करता है।  बाकी लोग वास्तविक या छलिया आर्यसमाजी और कानूनी विवाह कर सकते है और कर भी रहे हैं तो उनको कौन रोक सकता है लेकिन यह धर्म पति-पत्नी  शब्द नही केवल पति-पत्नी शब्द ही उनके लिए दिया जा सकता है।और यह विवाह में भी तथाकथित सामाजिक न्याय पर तो ज़रा रोक लगाइये अन्यथा महाकुंड के महासागर में डूब जाइए या डूब जाने का प्रबंध कर लीजिये। >>>>>>>>>मै ब्राह्मण, क्षत्रिय और उनकी व्युत्पत्ति जातिय व्यवस्था को ठीक मानता हूँ और यह जनता हूँ की खिचड़ी(चालाक) सभी बनेंगे तो विशुद्ध ब्राह्मण, विशुद्ध क्षत्रिय और विशुद्ध वैश्य के रूप में पहचाने जाने वाले महामूर्ख को कौन जानेगा? और जब ये विशुद्ध महामूर्ख  जो सामाजिक व्यवस्था के आधार हैं वही नहीं रहेंगे जिस दिन तो यह समाज कहाँ रहेगा मतलब विशुद्ध ब्राह्मण, विशुद्ध क्षत्रिय और विशुद्ध वैश्य के समाप्त हने के साथ यह वैश्विक समाज महाविनाश को प्राप्त होगा जिसको मै पूर्णतः शिध्ध कर चुका हूँ।

सात ब्रह्मर्षियों/सप्तर्षियों में सबसे बड़े कश्यप ऋषि जिनके पुत्रों में सभी विष्वकर्मा सहित सभी पञ्च देवता/आदित्य और उनके स्वामी इंद्र, सूर्यबल(सूर्यवंश:रघुवंश/सशरीर परमब्रह्म मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम/ अदिति-कश्यप=कौशल्या-दशरथ)), चन्द्रबल(चन्द्रवंश:यदुवंश:वृष्णिवंश:/सशरीर परमब्रह्म वाशुदेव श्रीकृष्ण/अदिति-कश्यप=देवकी=वसुदेव) और सावर्ण ऋषि (केवल ब्राह्मण गोत्र ), नर, नागवंश, किन्नर वंश, अरुण(सूर्यदेव सारथी), गरुण(विष्णु वाहन), गन्धर्व और दानव को जन्म दिए अपनी 13 पत्नियों से तो क्या वे अपने पुत्रों से अधिक पुरुषार्थ वाले नहीं हो सकते तो क्या कोई सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण पुरुष का पुरुषार्थ सुर्यवँशियों, चंद्रवंशियों, सावर्ण गोत्रियों और स्वयं इंद्र से ज्यादा नहीं हो सकता है जो किशी सनातन कश्यप गोत्रीय के पुरुषार्थ को देख उसको क्षत्रिय और वैश्य या अन्य-अन्य उपाधि दी जा रही है। पिता सामान्यतः हमेशा पुत्र को बढ़ाता है तो इसका मतलब यह नहीं की कोई सनातन कश्यप गोत्रीय विष्वकर्मा सहित सभी पञ्च देवता/आदित्य और उनके स्वामी इंद्र, सूर्यबल(सूर्यवंश), चन्द्रबल(चन्द्रवंश) और सावर्ण ऋषि (केवल ब्राह्मण गोत्र ), नर, नागवंश, किन्नर वंश, अरुण(सूर्यदेव सारथी), गरुण(विष्णु वाहन), गन्धर्व और दानव वंश को नियंत्रित न कर सके। आप लोग अपना भ्रम दूर कर लीजियेगा और समझ लीजियेगा की विश्वमहाशक्ति भारत/भारतवर्ष/अखंड भारत/हिन्द भूमि/हिन्दुस्थान/हिन्दुस्तान है की कोई और। और यह विवाह में भी तथाकथित सामाजिक न्याय पर तो ज़रा रोक लगाइये अन्यथा महाकुंड के महासागर में डूब जाइए या डूब जाने का प्रबंध कर लीजिये।

सात ब्रह्मर्षियों/सप्तर्षियों में सबसे बड़े कश्यप ऋषि जिनके पुत्रों में सभी  विष्वकर्मा सहित सभी पञ्च देवता/आदित्य और उनके स्वामी इंद्र, सूर्यबल(सूर्यवंश:रघुवंश/सशरीर परमब्रह्म मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम/ अदिति-कश्यप=कौशल्या-दशरथ)), चन्द्रबल(चन्द्रवंश:यदुवंश:वृष्णिवंश:/सशरीर परमब्रह्म वाशुदेव श्रीकृष्ण/अदिति-कश्यप=देवकी=वसुदेव) और सावर्ण ऋषि (केवल ब्राह्मण गोत्र ), नर, नागवंश, किन्नर वंश, अरुण(सूर्यदेव सारथी), गरुण(विष्णु वाहन), गन्धर्व और दानव को जन्म दिए अपनी 13 पत्नियों से तो क्या वे अपने पुत्रों से अधिक पुरुषार्थ वाले नहीं हो सकते तो क्या कोई सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण पुरुष का पुरुषार्थ सुर्यवँशियों, चंद्रवंशियों, सावर्ण गोत्रियों और स्वयं इंद्र से ज्यादा नहीं हो सकता है जो किशी सनातन कश्यप गोत्रीय के पुरुषार्थ को देख उसको क्षत्रिय और वैश्य या अन्य-अन्य उपाधि दी जा रही है। पिता सामान्यतः हमेशा पुत्र को बढ़ाता है तो इसका मतलब यह नहीं की कोई सनातन कश्यप गोत्रीय विष्वकर्मा सहित सभी पञ्च देवता/आदित्य और उनके स्वामी इंद्र, सूर्यबल(सूर्यवंश), चन्द्रबल(चन्द्रवंश) और सावर्ण ऋषि (केवल ब्राह्मण गोत्र ), नर, नागवंश, किन्नर वंश, अरुण(सूर्यदेव सारथी), गरुण(विष्णु वाहन), गन्धर्व और दानव वंश को नियंत्रित न कर सके। आप लोग अपना भ्रम दूर कर लीजियेगा और समझ  लीजियेगा की विश्वमहाशक्ति भारत/भारतवर्ष/अखंड भारत/हिन्द भूमि/हिन्दुस्थान/हिन्दुस्तान है की कोई और। और यह विवाह में भी तथाकथित सामाजिक न्याय पर तो ज़रा रोक लगाइये अन्यथा महाकुंड के महासागर में डूब जाइए या डूब जाने का प्रबंध कर लीजिये। 

Sunday, December 6, 2015

तथाकथित विश्वमहाशक्ति और उनके अभिकर्ता दलित ईसाईयों के निर्देशनुसार अपना सब कुछ लूटा देने वाले लोग सत्यमेव जयते के प्रति पूर्ण समर्पित और अभीष्ट अनुसरण कर्ता होने का दम भरते है और तदनुसार भारत के दो राज्य के मेडिकल एसोसिएशन में अपना नामांकन करवाते हैं; और एक जगह दैनिक वेतन लेते हैं और दूसरी जगह नियमित छात्र भी बने रहते है तो ऐसे देश भक्तों के भी दिशा निर्देशानुसार भी मुझे चलना होगा? जिस दुनिया ने स्वयं श्रीराम के साथ न्याय न किया हो तो श्रीराम से अपने लिए न्याय की अपेक्षा कैसे करता है जब उनको श्रीकृष्ण बना दिया हो अपने कृत्य से? कुछ विशेष दलित, कुर्मावतारी, कायस्थ/राजस्व ब्राह्मण, भूमिहार/ब्रह्मक्षत्रिय, वैश्य जन जिसे आप अभिमन्यु समझ कर उसके लिए दलित ईसाईयों और तथाकथित विश्वमहाशक्ति के अभिकर्ता के रूप में चक्रव्यूह रचे थे वह तो कम से कम श्रीकृष्ण निकल गया तो अब आगे आप की योजना क्या है प्रारंभिक दौर से वर्तमान दौर तक काशीराम, नारायणन, जार्ज फर्नांडीज, अटल जी, कलाम गुरु और अब गुरुदेव जोशी और उनके भक्तों को व्यूह में लगाने के बाद। आप यह समझ लें की वर्तमान परिवेश में उसने कहीं भी श्रीराम के मर्यादित दायित्वों/कर्मों से परे हो कभी कोई आचरण नहीं किया है पर जो कार्य दूसरे पहिये पर भी निर्भर करता है और उस दूसरे पहिये को आप सबने ने अपने प्रभाव में लिया तभी श्रीराम को श्रीकृष्ण बनना पड़ा और इस प्रकार श्रीराम स्वयं श्रीकृष्ण में समाहित हो श्रीरामकृष्ण हो गए।

तथाकथित विश्वमहाशक्ति और उनके अभिकर्ता दलित ईसाईयों के निर्देशनुसार अपना सब कुछ लूटा देने वाले लोग सत्यमेव जयते के प्रति पूर्ण समर्पित और अभीष्ट अनुसरण कर्ता होने का दम भरते है और तदनुसार भारत के दो राज्य के मेडिकल एसोसिएशन में अपना नामांकन करवाते हैं; और एक जगह दैनिक वेतन लेते हैं और दूसरी जगह नियमित छात्र भी बने रहते है तो ऐसे देश भक्तों के भी दिशा निर्देशानुसार भी मुझे चलना होगा? जिस दुनिया ने स्वयं श्रीराम के साथ न्याय न किया हो तो श्रीराम से अपने लिए न्याय की अपेक्षा कैसे करता है जब उनको श्रीकृष्ण बना दिया हो अपने कृत्य से? कुछ विशेष दलित, कुर्मावतारी, कायस्थ/राजस्व ब्राह्मण, भूमिहार/ब्रह्मक्षत्रिय, वैश्य जन जिसे आप अभिमन्यु समझ कर उसके लिए दलित ईसाईयों और तथाकथित विश्वमहाशक्ति के अभिकर्ता के रूप में चक्रव्यूह रचे थे वह तो कम से कम श्रीकृष्ण निकल गया तो अब आगे आप की योजना क्या है प्रारंभिक दौर से वर्तमान दौर तक काशीराम, नारायणन, जार्ज फर्नांडीज, अटल जी, कलाम गुरु और अब गुरुदेव जोशी और उनके भक्तों को व्यूह में लगाने के बाद। आप यह समझ लें की वर्तमान परिवेश में उसने कहीं भी श्रीराम के मर्यादित दायित्वों/कर्मों से परे हो कभी कोई आचरण नहीं किया है पर जो कार्य दूसरे पहिये पर भी निर्भर करता है और उस दूसरे पहिये को आप सबने ने अपने प्रभाव में लिया तभी श्रीराम को श्रीकृष्ण बनना पड़ा और इस प्रकार श्रीराम स्वयं श्रीकृष्ण में समाहित हो श्रीरामकृष्ण हो गए।

Saturday, December 5, 2015

कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार: राम =रा + म>>>>>"रा" शब्द जिह्वा पर आते ही सब पाप से शुद्धि उसी तरह कर देता है जैसे की विष्णु शब्द जिह्वा पर आते ही सब पाप से शुद्धि मिल जाती हैं, "म" शब्द सब पाप उसी तरह जला देता है जैसे की शिव/विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शंकर शब्द जिह्वा पर आते ही सब पाप जल जाते हैं। तो राम शब्द महामंत्र है जो भव मुक्ति मतलब सांसारिकता से सने हुए कलुष से मुक्ति का मंत्र है।

कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार: राम =रा + म>>>>>"रा" शब्द जिह्वा पर आते ही सब पाप से शुद्धि उसी तरह कर देता है जैसे की विष्णु शब्द जिह्वा पर आते ही सब पाप से शुद्धि मिल जाती हैं, "म" शब्द सब पाप उसी तरह जला देता है जैसे की शिव/विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शंकर शब्द जिह्वा पर आते ही सब पाप जल जाते हैं। तो राम शब्द महामंत्र है जो भव मुक्ति मतलब सांसारिकता से सने हुए कलुष से मुक्ति का मंत्र है।

जिसे दुनिया श्रीराम समझ रही है वे श्रीराम ही है पर अब वे एक दसक बाद श्रीकृष्ण के रूप में श्रीकृष्ण में ही समाहित हो श्रीरामकृष्ण हो गए हैं क्योंकि हम उनको भारत और भारतीयों में ही लीन देखना चाहते हैं तो इस प्रकार वे श्रीकृष्ण में ही मिलकर एक हो गए हैं और श्रीरामकृष्ण हो गए है।

जिसे दुनिया श्रीराम समझ रही है वे श्रीराम ही है पर अब वे एक दसक बाद श्रीकृष्ण के रूप में श्रीकृष्ण में ही समाहित हो श्रीरामकृष्ण हो गए हैं क्योंकि हम उनको भारत और भारतीयों में ही लीन देखना चाहते हैं तो इस प्रकार वे श्रीकृष्ण में ही मिलकर एक हो गए हैं और श्रीरामकृष्ण हो गए है।

अब तो अस्पष्ट हो गया है न की जिन सत्य तथ्य को दुनिया एक दसक बाद भी ठीक से समझ नहीं सकती वह सत्य तात्कालिक रूप से बताने वाले को ही लोग झूंठा समझेंगे न। >>>>कौन था जिसने और जिसके कारन मुझे मेरी उचित वरिष्ठता के निर्धारण हेतु न्यायालय को उसका दायित्व सौपना पड़ा। इस हेतु जिसने धृष्टता और दुस्साहस किया उसे समझ लेना चाहिए की वह जिस जमीन पर स्वाभिमान और गर्व से सीना ताने खड़ा है उस जमीन को भी मैंने ही तैयार करने में पूर्णता दिया है। मुझे ऐसे स्थान पर स्थायित्व मिला तो यही श्रेष्कर था और यह पद प्रतिस्पर्धा करने की लालच नहीं अपितु जब बात असत्य को थोपने, भय दिखाने और आतंक दिखाने की आ गयी तो न्यायालय को उसका दायित्व सौपना पड़ा अन्यथा समयानुसार ईस्वरीय वरिष्ठता अपने आप में ही अकाट्य और पूर्ण है कम से कम उसमे तो कोई चाह कर भी छेड़-छाड़ नही कर सकता है। >>>>>>>>अज्ञानता और आपा खोने से नहीं जानबूझकर तात्कालिक दिनों की वरिष्ठता (प्रारंभिक दौर की वरिष्ठता न की उससे बाद के दौर की: कल के लिए कौन राजा की दौड़ में शामिल हुआ और कौन जोगी की दौड़ में शामिल हुआ वह उसका अपना कार्य और इक्षा शक्ति जाने) का असत्य थोपे जाने का विरोध करना मेरा दायित्व था तो वह मैंने किया और यह न्यायालय की सत्यता की परिक्षा और दायित्व है की कितने अधिकतम समय में और कब तक किशी निष्कर्ष पर पहुंचता है। मुझे इन्तजार रहता है की सत्य से परे जाकर मुझे चुनौती मिलती रहे और आतंक, भय और असत्य के ठीकेदार भी प्रत्यक्ष व् परोक्ष अपना कार्य जारी रख सकते हैं मै विनम्रता पूर्वक उनका हिंसाब लेता रहूँगा इसी तरह।

अब तो अस्पष्ट हो गया है न की जिन सत्य तथ्य को दुनिया एक दसक बाद भी ठीक से समझ नहीं सकती वह सत्य तात्कालिक रूप से बताने वाले को ही लोग झूंठा समझेंगे न। >>>>कौन था जिसने और जिसके कारन मुझे मेरी उचित वरिष्ठता के निर्धारण हेतु न्यायालय को उसका दायित्व सौपना पड़ा। इस हेतु जिसने धृष्टता और दुस्साहस किया उसे समझ लेना चाहिए की वह जिस जमीन पर स्वाभिमान और गर्व से सीना ताने खड़ा है उस जमीन को भी मैंने ही तैयार करने में पूर्णता दिया है। मुझे ऐसे स्थान पर स्थायित्व मिला तो यही श्रेष्कर था और यह पद प्रतिस्पर्धा करने की लालच नहीं अपितु जब बात असत्य को थोपने, भय दिखाने और आतंक दिखाने की आ गयी तो न्यायालय को उसका दायित्व सौपना पड़ा अन्यथा समयानुसार ईस्वरीय वरिष्ठता अपने आप में ही अकाट्य और पूर्ण है कम से कम उसमे तो कोई चाह कर भी छेड़-छाड़ नही कर सकता है। >>>>>>>>अज्ञानता और आपा खोने से नहीं जानबूझकर तात्कालिक दिनों की वरिष्ठता (प्रारंभिक दौर की वरिष्ठता न की उससे बाद के दौर की: कल के लिए कौन राजा की दौड़ में शामिल हुआ और कौन जोगी की दौड़ में शामिल हुआ वह उसका अपना कार्य और इक्षा शक्ति जाने) का असत्य थोपे जाने का विरोध करना मेरा दायित्व था तो वह मैंने किया और यह न्यायालय की सत्यता की परिक्षा और दायित्व है की कितने अधिकतम समय में और कब तक किशी निष्कर्ष पर पहुंचता है। मुझे इन्तजार रहता है की सत्य से परे जाकर मुझे चुनौती मिलती रहे और आतंक, भय और असत्य के ठीकेदार भी प्रत्यक्ष व् परोक्ष अपना कार्य जारी रख सकते हैं मै विनम्रता पूर्वक उनका हिंसाब लेता रहूँगा इसी तरह।