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Saturday, February 28, 2015

SATYAMEV JAYATE: For Achieving the truth we should draft the constitution but not for promoting the devils of the society. Real needy person should not miss used by the anti-national and anti-social elements but arrangement should be such that only these person should get entered in the process of getting support from the Union (from common people's fund of country/states).

SATYAMEV JAYATE: For Achieving the truth we should draft the constitution but not for promoting the devils of the society. Real needy person should not miss used by the anti-national and anti-social elements but arrangement should be such that only these person should get entered in the process of getting support from the Union (from common people's fund of country/states).

Friday, February 27, 2015

हिन्दू धर्म के अंदर और वाहर के वे लोग जो अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक तीनों रूपों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत धर्म/जाती का नहीं मानते है उनके परिमार्जन के लिए भी और सभ्यतापूर्वक घर वापसी हेतु भी से मेरी कम से कम एक बात को पूरे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत स्वरुप से निर्मित धर्म/जाती के हिन्दू समाज को माननी ही पड़ेगी अगर उनको सशक्त रहना है तो जो संवैधानिक, सामाजिक और धार्मिक तीनो रूपों में सत्य है की "छल का विवाह भी भला है पर अगर क़ानून उसको मान्यता दे देता है और आप पर निर्भर है की आप अपनी उस संतान से जैसा चाहें व्यक्तिगत सम्बन्ध रखें" परन्तु अगर आप के सामने आप की कन्या का विवाह गैर ब्राह्मण, गैर क्षत्रिय, गैर वैश्य या गैर इनके मिश्रित स्वरुप की जाती/धर्म से हिन्दू शास्त्रीय विधि से किया गया हो/ किया जा रहा हो पाँव पूजन विधि समेत जो अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक तीनों रूपों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत धर्म/जाती का नहीं मानते है तो वह डकैती थी/ है जिसे आप अपनी कायरता से मान्यता दे रहे हैं पर कानूनन और धार्मिक रूप से वह वैध नहीं था/है।-------Note: The best marriage is in the same caste and religion and people should try his best for that.


हिन्दू धर्म के अंदर और वाहर के वे लोग जो अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक  तीनों रूपों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत धर्म/जाती का नहीं मानते है उनके परिमार्जन के लिए भी और सभ्यतापूर्वक घर वापसी हेतु भी से मेरी कम से कम एक बात को पूरे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत स्वरुप से निर्मित धर्म/जाती के हिन्दू समाज को माननी ही पड़ेगी अगर उनको सशक्त रहना है तो जो संवैधानिक, सामाजिक और धार्मिक तीनो रूपों में सत्य है की "छल का विवाह भी भला है पर अगर क़ानून उसको मान्यता दे देता है  और आप पर निर्भर है की आप अपनी उस संतान से जैसा चाहें व्यक्तिगत सम्बन्ध रखें"  परन्तु अगर आप के सामने आप की कन्या का विवाह गैर ब्राह्मण, गैर क्षत्रिय, गैर वैश्य या गैर इनके मिश्रित स्वरुप की जाती/धर्म से हिन्दू शास्त्रीय विधि से किया गया हो/ किया जा रहा हो पाँव पूजन विधि समेत जो अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक  तीनों रूपों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य और इनके मिश्रत धर्म/जाती का नहीं मानते है तो वह डकैती थी/ है जिसे आप अपनी कायरता से मान्यता दे रहे हैं पर कानूनन और धार्मिक रूप से वह  वैध नहीं था/है।-------Note: The best marriage is in the same caste and religion and people should try his best for that.

''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:" ।Rishi Bharadwaaj ((Student of Valmiki(Son of Varun and Grand Son of Rishi Kashyap) and Guru (Teacher ) of Rishi Garg)) was first person who given clean Chit to Dasharath (Incarnation of Rishi Kashyap) Nandan Lord Sri Ram in Prayagraj/Allahabad after Ravan Vadh and also send his pupil(Garga Gotriy Brahmana) to take part in Ashwamedh Yagya and its Bhoj. ---------Also Ravan's Killing by Shri Ram was arrangement here at Bharadwaaj Ashram by all Rishis and Brahma at Prayagraj/Allahabad when Shri Ram came here 1st time during his exile way from Ayodhya and where ever he went from here up to Lanka for kill Ravan was pre decided and was under control from here. “को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥“----यहाँ अपना आश्रम बना कर रहने वाले भारद्वाज ऋषि भी इसका सम्पूर्ण वर्ण नहीं कर सके। ----- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इलाहाबाद नगर का नाम 'प्रयाग' है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। सप्तर्षि प्रकृष्टा यज्ञ से यही ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि मतलब सातों ब्रह्मर्षि प्रकट हुए थे। मतलब सप्तर्षि प्रकृष्ठा यज्ञ ही सप्तर्षि का आगमन समय है जिसके बाद मानव सभ्यता का प्रारम्भ हुआ इस ऋषि सभ्यता की देख रेख में। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ। उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण 'इलहवास' किया अर्थात जहाँ पर अल्लाह का वास है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम 'इलावास' पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण 'इलाहाबाद' कर दिया।-----------------इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियांँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता व पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुत: गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि। ----------तीर्थ द्विविध होते हैं, एक कामनाओं को पूर्ण करने वाले और दूसरे मोक्ष देने वाले। जिस तीर्थ में कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष की प्राप्ति दोनों ही एक साथ हो, वह एक मात्र तीर्थ प्रयाग है। यही वह तीर्थ है जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है इसीलिए प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:"

''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:" Rishi Bharadwaaj ((Student of Valmiki(Son of Varun and Grand Son of Rishi Kashyap) and Guru (Teacher ) of Rishi Garg)) was first person who given clean Chit to Dasharath (Incarnation of Rishi Kashyap) Nandan Lord Sri Ram in Prayagraj/Allahabad after Ravan Vadh and also send his pupil(Garga Gotriy Brahmana) to take part in Ashwamedh Yagya and its Bhoj. ---------Also Ravan's Killing by Shri Ram was arrangement here at Bharadwaaj Ashram by all Rishis and Brahma at Prayagraj/Allahabad when Shri Ram came here 1st time during his exile way from Ayodhya and where ever he went from here up to Lanka for kill Ravan was pre decided and was under control from here. “को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥“----यहाँ अपना आश्रम बना कर रहने वाले भारद्वाज ऋषि भी इसका सम्पूर्ण वर्ण नहीं कर सके। ----- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इलाहाबाद नगर का नाम 'प्रयाग' है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। सप्तर्षि प्रकृष्टा यज्ञ से यही ब्रह्मा के सातों मानस पुत्र सप्तर्षि मतलब सातों ब्रह्मर्षि प्रकट हुए थे। मतलब सप्तर्षि प्रकृष्ठा यज्ञ ही सप्तर्षि का आगमन समय है जिसके बाद मानव सभ्यता का प्रारम्भ हुआ इस ऋषि सभ्यता की देख रेख में। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ। उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण 'इलहवास' किया अर्थात जहाँ पर अल्लाह का वास है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम 'इलावास' पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण 'इलाहाबाद' कर दिया।-----------------इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियांँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुत: गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि। ----------तीर्थ द्विविध होते हैं, एक कामनाओं को पूर्ण करने वाले और दूसरे मोक्ष देने वाले। जिस तीर्थ में कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष की प्राप्ति दोनों ही एक साथ हो, वह एक मात्र तीर्थ प्रयाग है। यही वह तीर्थ है जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है इसीलिए प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-''को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ॥'' तथा कूर्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रक्षा ब्रह्मा तथा अन्य देवता एक साथ ही करते हैं।"तत्र ब्रह्मदयो देवा: रक्षां कुर्वन्ति संगत:"

Therefore Conclusion is:------- Actually I written too many facts about the society and human history but I believe in the following which is most Note Worthy : मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण



Therefore Conclusion is:------- Actually I written too many facts about the society and human history but I believe in the following which is most Note Worthy : मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण

जो गौतम (विष्णु/श्रीधर), कश्यप(शिव/प्रेमचंद), अंगारिसा(ब्रह्मा/जोशी) मिलकर विश्व हित के विशेष कार्यहेतु जिस पर विश्वाश किये हों तो वह तो सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म हो गया उससे भी वरिष्ठ कोई हुआ है इस ब्रह्माण्ड में?

जो गौतम (विष्णु/श्रीधर), कश्यप(शिव/प्रेमचंद), अंगारिसा(ब्रह्मा/जोशी) मिलकर विश्व हित के विशेष कार्यहेतु जिस पर विश्वाश किये हों तो वह तो सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म हो गया उससे भी वरिष्ठ कोई हुआ है इस ब्रह्माण्ड में?



The Person who got the position among 42 personalities (Proud Past Alumni list) of University of Allahabad before Seven Year Ago need not certificate of any others but he is respecting the elders in the Age and also following the civilization and perusing for the well defined rights which given even low in merit list and maximum joining time difference less than 10 days in the same university even without Doctorate Degree. The Suryanarayan/Bhanu and Chandra Narayan/Rakesh/ can not be able to do justice with me but Wikipedia article done the perfect justice.

The Person who got the position among 42 personalities (Proud Past Alumni list) of University of Allahabad before Seven Year Ago need not certificate of any others but he is respecting the elders in the Age and also following the civilization and perusing for the well defined rights which given even low in merit list and maximum joining time difference less than 10 days in the same university even without Doctorate Degree. The Suryanarayan/Bhanu and Chandra Narayan/Rakesh/ can not be able to do justice with me but Wikipedia article done the perfect justice.



Actually I written too many facts about the society and human history but I believe in the following which is most Note Worthy : मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण



Actually I written too many facts about the society and human history but I believe in the following which is most Note Worthy : मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण

There are two main Gotra Kashyap and Gautam (Gautam Gotra indirectly open the place means making one Baudhist which was originated by Gautam Gotriy Shakyavansheey:Vegiterian Dynasty Kshatriy Sidhddharth Gautam was one of the Kshatriy Clan of the Gautam Gotra which named after the Saptarshi Gautam) in Saptarshi who are first shelter for every person of the world to returning in the Sanatan Hindu Dharma and his associate Baudhism respectively and thus in the Hindu Dharm. If Kashyap Gotriya and Gautam Gotriya both involved in controlling the situation of the society then success was ultimately pre-decided by making their involvement in the matter by learned world society from all the Gotras. It need not say more how Kashyapa is related with Christianity/Islam/Shikha and many more Panth/Dharma.

There are two main Gotra Kashyap and Gautam (Gautam Gotra indirectly open the place means making one Baudhist which was originated by Gautam Gotriy Shakyavansheey:Vegiterian Dynasty Kshatriy Sidhddharth Gautam was one of the Kshatriy Clan of the Gautam Gotra which named after the Saptarshi Gautam) in Saptarshi who are first shelter for every person of the world to returning in the Sanatan Hindu Dharma and his associate Baudhism respectively and thus in the Hindu Dharm. If Kashyap Gotriya and Gautam Gotriya both involved in controlling the situation of the society then success was ultimately pre-decided by making their involvement in the matter by learned world society from all the Gotras. It need not say more how Kashyapa is related with Christianity/Islam/Shikha and many more Panth/Dharma.

Gautam Gotriya:
http://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur

Kashyap Gotriya:

Thursday, February 26, 2015

तथाकथित दलित/अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान, ईसाई/सेवाभावना और मुस्लिम/मुसल्लम-ईमान/इस्लाम से आप डर के मारे थर्राते हैं/थे और राम/कृष्ण से भाई चारा के बराबर सम्बन्ध भी बर्दास्त नहीं जो इस सभी का पात्र निभाते हुए अपने असली स्वरुप में ही विद्यमान रहे? ----------Note:--------अशोक चक्र टूटने पर उसके स्थान पर सुदर्शन चक्र लगाने की जरूरत पड़ती रहेगी यदि पार्वती का आँचल दैत्यों द्वारा अपवित्र किया जाता रहेगा और इस प्रकार राम/कृष्ण(विष्णु) को कष्ट झेलना पडेगा अशोकचक्र पुनर्निर्माण तक। >>>>>>>-------दैत्यों के किये-कराये का भुगतान मेघनाद पहले करें तब आबाद होंगे।

तथाकथित दलित/अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान, ईसाई/सेवाभावना और मुस्लिम/मुसल्लम-ईमान/इस्लाम से आप डर के मारे थर्राते हैं/थे और राम/कृष्ण से भाई चारा के बराबर सम्बन्ध भी बर्दास्त नहीं जो इस सभी का पात्र निभाते हुए अपने असली स्वरुप में ही विद्यमान रहे? ----------Note:--------अशोक चक्र टूटने पर उसके स्थान पर सुदर्शन चक्र लगाने की जरूरत पड़ती रहेगी यदि पार्वती का आँचल दैत्यों द्वारा अपवित्र किया जाता रहेगा और इस प्रकार राम/कृष्ण(विष्णु) को कष्ट झेलना पडेगा अशोकचक्र पुनर्निर्माण तक। >>>>>>>-------दैत्यों के किये-कराये का भुगतान मेघनाद पहले करें तब आबाद होंगे।


अशोक चक्र टूटने पर उसके स्थान पर सुदर्शन चक्र लगाने की जरूरत पड़ती रहेगी यदि पार्वती का आँचल दैत्यों द्वारा अपवित्र किया जाता रहेगा और इस प्रकार राम/कृष्ण(विष्णु) को कष्ट झेलना पडेगा अशोकचक्र पुनर्निर्माण तक।

अशोक चक्र टूटने पर उसके स्थान पर सुदर्शन चक्र लगाने की जरूरत पड़ती रहेगी यदि पार्वती का आँचल दैत्यों द्वारा अपवित्र किया जाता रहेगा और इस प्रकार राम/कृष्ण(विष्णु) को कष्ट झेलना पडेगा अशोकचक्र पुनर्निर्माण तक।  

जिद मै किशी वस्तु या व्यक्ति/व्यक्तित्व के लिए नहीं करता और न अपेक्षा ही करता हूँ की अमुक कार्य किशी समाज या व्यक्ति के लिए करने से मुझे कुछ पारितोषिक मिलेगा पर चुनौती जिसे मुझे नहीं देनी चाहिए वह मुझे क्यों दी जाती है? अगर सामने वाले का कार्य ही ऐसा है की चक्र व्यूह रचा जाय और अंत में हारें या जीते और इस प्रकार चर्चा में रहे और मेरे जैसा व्यक्ति कुछ परेशान होगा तो उस सामने वाले को गलत कार्य के लिए अपमान के झेलने के लिए भी तैयार रहना चाहिए और उस परेशानी को स्वयं झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए जिसे मुझे दिया गया है और यह समाज भी जाने की गुल देश हिट के लिए या विदेश हित के लिए खिलाये जाते हैं मेरा विरोधकर।


 जिद मै किशी वस्तु या व्यक्ति/व्यक्तित्व  के लिए नहीं करता और न अपेक्षा ही करता हूँ की अमुक कार्य किशी समाज या व्यक्ति के लिए करने से मुझे कुछ पारितोषिक मिलेगा पर चुनौती जिसे मुझे नहीं देनी चाहिए वह मुझे क्यों दी जाती है? अगर सामने वाले का कार्य ही ऐसा है की चक्र व्यूह रचा जाय और अंत में हारें या जीते और इस प्रकार चर्चा में रहे और मेरे जैसा व्यक्ति कुछ परेशान होगा तो उस सामने वाले को गलत कार्य के लिए अपमान के झेलने के लिए भी तैयार रहना चाहिए और उस परेशानी को स्वयं झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए जिसे मुझे दिया गया है और यह समाज भी जाने की गुल देश हिट के लिए या विदेश हित के लिए खिलाये जाते हैं मेरा विरोधकर।  

कम से कम कक्षा 5 से लेकर कक्षा 8 तक लगभग 80 की संख्या में अकेला ब्राह्मण छात्र था जो सम्मान सहित जीता था और मैंने 40 तथाकथित पिछड़े, 40 तथाकथित दलित/और कुछ मुस्लिम/अल्पसंख्यक जो मुझसे संख्या में ज्यादा थे पर कभी न कोई आरोप लगाया और न कभी किशी पर अपनी बुद्धि का नाजायज प्रयोग किया उनमे सर्वश्रेष्ठ मेधावी होते हुए भी।



कम से कम कक्षा 5 से लेकर कक्षा 8 तक लगभग 80 की संख्या में अकेला ब्राह्मण छात्र था जो सम्मान सहित जीता था और मैंने 40 तथाकथित पिछड़े, 40 तथाकथित दलित/और कुछ मुस्लिम/अल्पसंख्यक जो मुझसे संख्या में ज्यादा थे पर कभी न कोई आरोप लगाया और न कभी किशी पर अपनी बुद्धि का नाजायज प्रयोग किया उनमे सर्वश्रेष्ठ मेधावी होते हुए भी।

जो स्वयं पच्चीसवाँ ऋषि(२४ ऋषियों के अशोक चक्र की असीमित ऊर्जा का श्रोत) हो चुका और उसका रक्षक हो उससे यदि पूंछा गया की अशोक चक्र कब टूटेगा और कहाँ टूटा तो उसका उत्तर है यह:------------------------जो शास्त्रीय विधि से विवाह किया तो वह फिर सरकारी (संघ) से शक्ति लेने वाले समूह की सूची में संघ से शक्ति लेने वाले जाती/धर्म समूह के विशेष उपनाम को अपने जीवन साथी के नाम के आगे जोड़ उसी सूची में शामिल वह अगर करवाया तो यह संविधान के नियमों का उल्लंघन ही हुआ की नही? अगर हिन्दू शास्त्रीय विवाह विधि से हुए विवाह मान्य हैं संविधान के अंतर्गतऔर यदि संविधान अपने धर्मनिरपेक्ष कहता है और इस प्रकार संविधान सभी धर्मों के नियमों इस प्रकार सभी जातियों के हित की रक्षा करता है। अतः जिस दिन इस सूची में नाम पड़ा विशेष उपनाम लगवाकर उसी दिन अशोकचक्र टूट गया जिसका प्रमाण 2008 में सामने आया।



जो स्वयं पच्चीसवाँ ऋषि(२४ ऋषियों के अशोक चक्र की असीमित ऊर्जा का श्रोत) हो चुका और उसका रक्षक हो उससे यदि पूंछा गया की अशोक चक्र कब टूटेगा और कहाँ टूटा तो उसका उत्तर है यह:------------------------जो शास्त्रीय विधि से विवाह किया तो वह फिर सरकारी (संघ) से शक्ति लेने वाले समूह की सूची में संघ से शक्ति लेने वाले जाती/धर्म समूह के विशेष उपनाम को अपने जीवन साथी के नाम के आगे जोड़ उसी सूची में शामिल वह अगर करवाया तो यह संविधान के नियमों का उल्लंघन ही हुआ की नही? अगर हिन्दू शास्त्रीय विवाह विधि से हुए विवाह मान्य हैं संविधान के अंतर्गतऔर यदि संविधान अपने धर्मनिरपेक्ष कहता है और इस प्रकार संविधान सभी धर्मों के नियमों इस प्रकार सभी जातियों के हित की रक्षा करता है। अतः जिस दिन इस सूची में नाम पड़ा विशेष उपनाम लगवाकर उसी दिन अशोकचक्र टूट गया जिसका प्रमाण 2008 में सामने आया।

Actually I written too many facts about the society and human history but I believe in the following which is most Note Worthy : मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण



Actually I written too many facts about the society and human history but I believe in the following which is most Note Worthy : मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण

Wednesday, February 25, 2015

जो शास्त्रीय विधि से विवाह किया तो वह फिर सरकारी (संघ) से शक्ति लेने वाले समूह की सूची में संघ से शक्ति लेने वाले जाती/धर्म समूह के विशेष उपनाम को अपने जीवन साथी के नाम के आगे जोड़ उसी सूची में शामिल वह अगर करवाया तो यह संविधान के नियमों का उल्लंघन ही हुआ की नही? अगर हिन्दू शास्त्रीय विवाह विधि से हुए विवाह मान्य हैं संविधान के अंतर्गतऔर यदि संविधान अपने धर्मनिरपेक्ष कहता है और इस प्रकार संविधान सभी धर्मों के नियमों इस प्रकार सभी जातियों के हित की रक्षा करता है। अतः जिस दिन इस सूची में नाम पड़ा विशेष उपनाम लगवाकर उसी दिन अशोकचक्र टूट गया जिसका प्रमाण 2008 में सामने आया।

जो शास्त्रीय विधि से विवाह किया तो वह फिर सरकारी (संघ) से शक्ति लेने वाले समूह की सूची में संघ से शक्ति लेने वाले जाती/धर्म समूह के विशेष उपनाम को अपने जीवन साथी के नाम के आगे जोड़ उसी सूची में शामिल वह अगर करवाया तो यह संविधान के नियमों का उल्लंघन ही हुआ की नही?  अगर हिन्दू शास्त्रीय विवाह विधि से हुए विवाह मान्य हैं संविधान के अंतर्गतऔर यदि संविधान अपने धर्मनिरपेक्ष कहता है और इस प्रकार संविधान सभी धर्मों के नियमों इस प्रकार सभी जातियों के हित की रक्षा करता है। अतः जिस दिन इस सूची में नाम पड़ा विशेष उपनाम लगवाकर उसी दिन अशोकचक्र टूट गया जिसका प्रमाण 2008 में सामने आया।   

SATYAMEV JAYATE: For Achieving the truth we should draft the constitution not promoting the devils of the society. कम से कम इतना तो याद होना चाहिए की पूर्व प्रधानमंत्री प्रियदर्शिनी इंदिरा(ब्राह्मण/हिन्दू) का हिन्दू शास्त्रीय विधि से विवाह तब तक नही हुआ फिरोज (पारसी)से नहीं हुआ जब तक कि वे स्वयं को महात्मा गांधी के पुत्र(वैश्य) के स्वीकार नहीं किये और इसके बाद हुए हिन्दू शास्त्रीय विधि से विवाह के कारन श्रीमती इंदिरागांधी और फिरोज गांधी हिन्दू धर्म के अनुसार धर्म-पति/पत्नी का दर्जा प्राप्त किये थे। अतः किशी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की लड़की का ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य या इनसे मिश्रित किशी जाती से या व्यक्ति के स्वयं द्वारा सामाजिक, धार्मिक और संवैधानिक रूप से इनमे से कोई एक जाती/धर्म स्वीकार करने पर ही हिन्दू शास्त्रीय विधि से शादी हो सकती है तभी हिन्दू शास्त्रीयविधि की शादी मान्य होती है। इससे अलावा कुछ भी नियमतः धर्म पति/पत्नी और हिन्दू शास्त्रीयविधि विवाह अंतर्गत नहीं आता है। अगर संविधान या पुरोहिती करने वाला ब्राह्मण समाज जानबूझकर आर्थिक लाभ हेतु और झूंठा सामाजिक सौहाद्र बनाने हेतु इसकी सीमा से अलग हटकर किशी विवाह को मान्यता देता है या इसको बढ़ावा देने का कार्य करता है तो अशोक चक्र/धर्मचक्र/समयचक्र को 2008 में सप्रमाण टूटना ही था जो 2005/2006 में ही टूट गया था जिसपर पर्दा कुछ लोग दाल रहे थे। अशोकचक्र के टूटने पर भारतीय संविधान का पालन करता कौन बचेगा? जाहिर सी बात है की निरीह जनता ही संविधान का पालन की इस विस्वास पर की कि इस्वर सब कुछ(संवैधानिक नियम का पालन) चला रहा है। हाँ सत्य है इस्वर की सहनशीलता पर ही विश्व समाज सुरक्षित है न की केवल यह भारतीय समाज और संविधान और उसमे निहित तथाकथित सामाजिक न्याय जो अन्याय की तरफ अग्रसर है और इस अशोकचक्र तोड़ने का जिम्मेदार भी वही सामाजिक न्याय था जिसमे की समूह से शक्ति लेकर समूह के ही एक वर्ग विशेष पर वार किया जाता है प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से। अगर यह आगे भी जारी रहा तो उसका परिणाम सम्पूर्ण विनाश ही होगा उसके लिए तथा कथित सामाजिक न्यायवादी शक्तियां ही जिम्मेदार होंगी जो शासक भी हैं और याचक भी हैं जिनका सामाजिक न्याय का फार्मूला जो संख्याबल पर आधारित है मेरे पास तक आते आते नस्ट हो गया जबकि संख्याबल मेरे घर से लेकर मेरे हर सम्बन्ध और मेरे वर्तमान निवास तक प्रयोग किया गया। अगर संविधान का पालन जरूरी है और वह संविधान धर्मनिरपेक्ष है तो सनातन हिन्दू शास्त्रीयविवाह नियम का पालन भी जरूरी है इसी संविधान की सीमा के भीतर। अगर इसका पालन नहीं तो वह संतान ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य या इनसे मिश्रित किशी जाती/धर्म का नहीं अपितु शादी/विवाह के साथ उस समाज का कहा जाय जिसमे वह शादी करे और उसका सामाजिक रूप से इनसे कोई सम्बन्ध नहीं मतलब वह सामाजिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनकी मिश्रित जाती/धर्म का नहीं माना जाय।



SATYAMEV JAYATE: For Achieving the truth we should draft the constitution not promoting the devils of the society.
कम से कम इतना तो याद होना चाहिए की पूर्व प्रधानमंत्री प्रियदर्शिनी इंदिरा(ब्राह्मण/हिन्दू) का हिन्दू शास्त्रीय विधि से विवाह तब तक नही हुआ फिरोज (पारसी)से नहीं हुआ जब तक कि वे स्वयं को महात्मा गांधी के पुत्र(वैश्य) के स्वीकार नहीं किये और इसके बाद हुए हिन्दू शास्त्रीय विधि से विवाह के कारन श्रीमती इंदिरागांधी और फिरोज गांधी हिन्दू धर्म के अनुसार धर्म-पति/पत्नी का दर्जा प्राप्त किये थे। अतः किशी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की लड़की का ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य या इनसे मिश्रित किशी जाती से या व्यक्ति के स्वयं द्वारा सामाजिक, धार्मिक और संवैधानिक रूप से इनमे से कोई एक जाती/धर्म स्वीकार करने पर ही हिन्दू शास्त्रीय विधि से शादी हो सकती है तभी हिन्दू शास्त्रीयविधि की शादी मान्य होती है। इससे अलावा कुछ भी नियमतः धर्म पति/पत्नी और हिन्दू शास्त्रीयविधि विवाह अंतर्गत नहीं आता है। अगर संविधान या पुरोहिती करने वाला ब्राह्मण समाज जानबूझकर आर्थिक लाभ हेतु और झूंठा सामाजिक सौहाद्र बनाने हेतु इसकी सीमा से अलग हटकर किशी विवाह को मान्यता देता है या इसको बढ़ावा देने का कार्य करता है तो अशोक चक्र/धर्मचक्र/समयचक्र को 2008 में सप्रमाण टूटना ही था जो 2005/2006 में ही टूट गया था जिसपर पर्दा कुछ लोग दाल रहे थे। अशोकचक्र के टूटने पर भारतीय संविधान का पालन करता कौन बचेगा? जाहिर सी बात है की निरीह जनता ही संविधान का पालन की इस विस्वास पर की कि इस्वर सब कुछ(संवैधानिक नियम का पालन) चला रहा है। हाँ सत्य है इस्वर की सहनशीलता पर ही विश्व समाज सुरक्षित है न की केवल यह भारतीय समाज और संविधान और उसमे निहित तथाकथित सामाजिक न्याय जो अन्याय की तरफ अग्रसर है और इस अशोकचक्र तोड़ने का जिम्मेदार भी वही सामाजिक न्याय था जिसमे की समूह से शक्ति लेकर समूह के ही एक वर्ग विशेष पर वार किया जाता है प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से। अगर यह आगे भी जारी रहा तो उसका परिणाम सम्पूर्ण विनाश ही होगा उसके लिए तथा कथित सामाजिक न्यायवादी शक्तियां ही जिम्मेदार होंगी जो शासक भी हैं और याचक भी हैं जिनका सामाजिक न्याय का फार्मूला जो संख्याबल पर आधारित है मेरे पास तक आते आते नस्ट हो गया जबकि संख्याबल मेरे घर से लेकर मेरे हर सम्बन्ध और मेरे वर्तमान निवास तक प्रयोग किया गया। अगर संविधान का पालन जरूरी है और वह संविधान धर्मनिरपेक्ष है तो सनातन हिन्दू शास्त्रीयविवाह नियम का पालन भी जरूरी है इसी संविधान की सीमा के भीतर। अगर इसका पालन नहीं तो वह संतान ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य या इनसे मिश्रित किशी जाती/धर्म का नहीं अपितु शादी/विवाह के साथ उस समाज का कहा जाय जिसमे वह शादी करे और उसका सामाजिक रूप से इनसे कोई सम्बन्ध नहीं मतलब वह सामाजिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनकी मिश्रित जाती/धर्म का नहीं माना जाय।

SATYAMEV JAYATE: For Achieving the truth we should draft the constitution not promoting the devils of the society.



SATYAMEV JAYATE: For Achieving the truth we should draft the constitution not promoting the devils of the society.

If Kashyap is the tree of Amla, Peepal and Vilva(Bel) then Gautam is the Banyan/Bargad Tree and Vashishth is the plant of Tulsi. Pandey Vivek Kumar Hindu religious Learned people know what are the way to correlate it with Brahma, Vishnu and Mahesh.

If Kashyap is the tree of Amla, Peepal and Vilva(Bel) then Gautam is the Banyan/Bargad Tree and Vashishth is the plant of Tulsi. Pandey Vivek Kumar Hindu religious Learned people know what are the way to correlate it with Brahma, Vishnu and Mahesh.

Sanatan Brahmin's (Eternal Brahmin's) one and only one alternative is Eternal(Sanatan) Brahmin none other than this.



Sanatan Brahmin's (Eternal Brahmin's) one and only one alternative is Eternal(Sanatan) Brahmin none other than this.

भारतीय विज्ञान संस्थान से बड़े विद्वान है कही भारत में जिनका सम्मान और सत्य में मैंने सत्य का पक्ष लिया था। विद्वान यदि सत्य को साक्षात न पहचाने अपने स्वार्थ और रोजी-रोटी के लिए तो उसका सम्मान किस लिए?

भारतीय विज्ञान संस्थान से बड़े विद्वान है कही भारत में जिनका सम्मान और सत्य में मैंने सत्य का पक्ष लिया था। विद्वान यदि सत्य को साक्षात न पहचाने अपने स्वार्थ और रोजी-रोटी के लिए तो उसका सम्मान किस लिए?

18 सितम्बर, 2007 में केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ध्यन केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय से प्रथम शोध पूरक की अर्हता प्राप्त करने के उपरान्त मई ऑरकुट पर लिखा था की काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कार्यालय के मऊ वाले राय साहब मै तो युद्ध जीत गया पर आप लोग युद्ध हार गए इसमे मेरी कोई गलती नहीं वरन आप के लोग हर कार्य में ठीकेदारी और व्यापर करने लगे जिनको ब्राह्मण/ब्राह्मण और ब्राह्मण/तथाकथित ईसाई/दलित के बीच सम्बन्ध में अंतर नहीं दिखाई दिया अपनी ठीकेदारी और व्यापार में लिप्तता के कारन और इस प्रकार काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जहां एक स्थान पर विजयी हुआ वही दूसरे मुकाबले में आप के लोगों के कारन हार गया। (In classical Marriage Brahmin, Kashtriy and Vashya only can get marriage with each other. Other should first have to accept any of these three or mixture of these three socially, religious way and constitutionally before marriage)|-------आज 8 साल बाद मै पुनः इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इमरती मुझे बहुत प्रिय है। अतः मेरा अभी तक अनावश्यक विरोध करके इमरती सदा के लिए समाप्त न कर दिया जाय। आप लोगों को ब्राह्मण मुख्य समाज में शामिल होना हो तो सभी गैर मुख्य ब्राह्मण उपनाम ख़त्म कर दीजिये अपने लोगों में।



18 सितम्बर, 2007 में केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ध्यन केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय से प्रथम शोध पूरक की अर्हता प्राप्त करने के उपरान्त मई ऑरकुट पर लिखा था की काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कार्यालय के मऊ वाले राय साहब मै तो युद्ध जीत गया पर आप लोग युद्ध हार गए इसमे मेरी कोई गलती नहीं वरन आप के लोग हर कार्य में ठीकेदारी और व्यापर करने लगे जिनको ब्राह्मण/ब्राह्मण और ब्राह्मण/तथाकथित ईसाई/दलित के बीच सम्बन्ध में अंतर नहीं दिखाई दिया अपनी ठीकेदारी और व्यापार में लिप्तता के कारन और इस प्रकार काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जहां एक स्थान पर विजयी हुआ वही दूसरे मुकाबले में आप के लोगों के कारन हार गया। (In classical Marriage Brahmin, Kashtriy and Vashya only can get marriage with each other. Other should first have to accept any of these three or mixture of these three socially, religious way and constitutionally before marriage)|-------आज 8 साल बाद मै पुनः इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इमरती मुझे बहुत प्रिय है। अतः मेरा अभी तक अनावश्यक विरोध करके इमरती सदा के लिए समाप्त न कर दिया जाय। आप लोगों को ब्राह्मण मुख्य समाज में शामिल होना हो तो सभी गैर मुख्य ब्राह्मण उपनाम ख़त्म कर दीजिये अपने लोगों में।

ब्राह्मण जब परिपक्व होता है तो शर्मा(शुद्ध ज्ञान वाला मतलब सुज्ञानी) उपनाम रखता है और इसका प्रमाण है की जब किशी ब्राह्मण का विवाह होता है तो कम से कम उस समय के लिए उसके नाम के आगे शर्मा उपनाम लगा ही दिया जाता है और शर्मा के साथ ही उसके नाम का उच्चारण किया जाता है। पर कुछ अज्ञानी इस समाज में मौजूद हैं ब्राह्मण समाज में जिसकी एक पीढ़ी तो शर्मा लिखी जीवन में पर पुत्र पाण्डेय, तिवारी, दुबे, राय(भूमिहार ब्राह्मण), चौबे और शुक्ला लिख रहे हैं।



ब्राह्मण जब परिपक्व होता है तो शर्मा(शुद्ध ज्ञान वाला मतलब सुज्ञानी) उपनाम रखता है और इसका प्रमाण है की जब किशी ब्राह्मण का विवाह होता है तो कम से कम उस समय के लिए उसके नाम के आगे शर्मा उपनाम लगा ही दिया जाता है और शर्मा के साथ ही उसके नाम का उच्चारण किया जाता है। पर कुछ अज्ञानी इस समाज में मौजूद हैं ब्राह्मण समाज में जिसकी एक पीढ़ी तो शर्मा लिखी जीवन में पर पुत्र पाण्डेय, तिवारी, दुबे, राय(भूमिहार ब्राह्मण), चौबे और शुक्ला लिख रहे हैं।

Tuesday, February 24, 2015

सनातन हिन्दू धर्म की जो संतान सप्तर्षि गोत्र ब्राह्मण (गौतम, वशिष्ठ(/व्यास/परासर), कश्यप, भारद्वाज/अंगारिशा, भृगु(जमदग्नि/परशुराम), अत्रि (कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ) है उसे पाँचों (कर्माधारित ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य तथा जलवायु आधारित इस्लाम/मुसलमान/मुसल्लम-ईमान/मोहम्मडन और ईसाइयत/क्रिस्चियन बनने के लिए धर्म परिवर्तन की क्या जरूरत? वह तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब कुछ बन सकता है। अन्य सबको पुनः ब्राह्मण बनने के लिए यतन करना पडेगा फिर भी सनातन ब्राह्मण नहीं कहे जा सकते जैसा की हिन्दू धर्म छोड़े हुए व्यक्ति को पुनः हिन्दू धर्म में आने पर सनातन हिन्दू नही कह सकते है जैसा की सदा ही हिन्दू बने रहने वाले अपने को सनातन हिन्दू कह सकते हैं जबकि सम्पूर्ण मानव जाती सनातन हिन्दू की ही संतान हैं।



सनातन हिन्दू धर्म की जो संतान सप्तर्षि गोत्र ब्राह्मण (गौतम, वशिष्ठ(/व्यास/परासर), कश्यप, भारद्वाज/अंगारिशा, भृगु(जमदग्नि/परशुराम), अत्रि (कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ) है उसे पाँचों (कर्माधारित ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य तथा जलवायु आधारित इस्लाम/मुसलमान/मुसल्लम-ईमान/मोहम्मडन और ईसाइयत/क्रिस्चियन बनने के लिए धर्म परिवर्तन की क्या जरूरत? वह तो ब्राह्मण धर्म की सीमा में ही रहकर सब कुछ बन सकता है। अन्य सबको पुनः ब्राह्मण बनने के लिए यतन करना पडेगा फिर भी सनातन ब्राह्मण नहीं कहे जा सकते जैसा की हिन्दू धर्म छोड़े हुए व्यक्ति को पुनः हिन्दू धर्म में आने पर सनातन हिन्दू नही कह सकते है जैसा की सदा ही हिन्दू बने रहने वाले अपने को सनातन हिन्दू कह सकते हैं जबकि सम्पूर्ण मानव जाती सनातन हिन्दू की ही संतान हैं।

Sunday, February 22, 2015

जो ब्राह्मण होते हुए ही पाँचों बन ही नही सकता उससे क्यों तुलना की जा रही है जब बता दिया की मै सनातन ब्राह्मण हूँ उसमे भी सप्तर्षि सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल/विल्वपत्र जो आदिशक्ति का आहार और भोलेनाथ शिव को समर्पित होने वाला हो) पाण्डेय (जिसका पाँचों से सीधा सम्बन्ध है)। अगर आप सात सप्तर्षि सनातन गोत्रीय ब्राह्मण हैं तब भी आप पाँचों एक साथ हैं क्योंकि कर्म आधारीत तीन धर्म ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य तथा जलवायु आधारित दो मुख्य धर्म इस्लाम/मुसलमान/मुसल्लम-ईमान और ईसाइयत/क्रिश्चियनिटी इन मुख्य पांच धर्म सहित जितने धर्म सम्प्रदाय हुए इसी सात सनातन सप्तर्षि गोत्र से ही हुए जिनका की प्रारंभिक कोई शाखा नहीं निकली थी। और उसमे भी पाण्डेय हूँ मै जिसे सम्बोधित करते हुए हाय फाइव! लिखा हुआ कई मेल आता है अंगरेजी मेल आईडी से। -----मै 1999 के अंत और 2000 के प्रारंभिक दिनों में रामकृष्ण छात्रावास, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कहा था की अगर इस दुनिया में कोई ब्राह्मण नहीं रहा तो मै दुनिया का सर्वोच्च ब्राह्मण हूँ जो इस दुनिया की एक तिहाई शक्ति का स्वामी है, इस बात के आ जाने पर की अब ब्राह्मण कहाँ रह गए। पर मै अब तक शायद इसे साबित कर दिया परसच तो यह है कि मै जिन शक्तियों से शक्ति अर्जित किया वह सर्वोच्च ब्राह्मण हैं मतलब मेरे गौतम गोत्रीय मामा लोग जिनकी विनम्रता और मानवता ने मुझे भी जीत लिया है। -----अतः इस महा समुद्र मंथन के बाद भी गौतम, वशिष्ठ(/व्यास/परासर), कश्यप, भारद्वाज/अंगारिशा, भृगु(जमदग्नि/परशुराम), अत्रि (कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ। अगर इस महा समुद्रमंथन के बाद मै गोत्रों में अपने को तीसरे(कश्यप गौतम और गुरु वशिष्ठ से पीछे ही रह गए) पर पुनः पाता हूँ और पाण्डेय होने के नाते भी अपने गोत्र में भी अन्य ब्राह्मणो से भी अपने पीछे ही पाता हूँ तो अन्य लोग ब्राह्मणों से ऊपर कैसे हो गए? जिसे अपनी शक्ति का अंदाज न हो वह वाह्य संसार से अलग कर दिया जाय और संवैधानिक संस्थाओं से तथा अपने ही समान वाह्य संसार से अलग किये गए ब्राह्मण से भी परोक्ष और प्रत्यक्ष शक्ति लेना छोड़ दे केवल एक पीढ़ी तक और तब अपने समकक्ष ब्राह्मणों की शक्ति को पहचाने। ---------मै तो उस कश्यप गोत्र से हूँ जिसमे जन्मे श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणो और भक्तो की रक्षा के लिए जरासन्धि से जीत जाने की सामर्थ्य होते हुए भी रणछोर नाम स्वीकार कर लेना श्रेष्कर समझा और द्वारिका चले गए मथुरा छोड़कर तो मै ब्राह्मणों का अमानवीय कार्यहेतु पक्ष न लेते हुए भी अगर ब्राह्मणो का सम्बर्धन और संरक्षण चाहता हूँ तो कोई गलत नहीं है। सार्वजनिक पद पर सबके साथ समान व्यवहार करते हुए और यह जानते हुए भी की सभी इन्ही सप्तर्षि सनातन गोत्रों की ही संतान है जिसने से एक सनातन सप्तर्षि गोत्र कश्यप की मै भी संतान हूँ। Pandey Vivek Kumar जिन भक्तों और ब्राह्मणो की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण रणछोर कहलाये उन्ही ब्राह्मणों और भक्तों ने स्वयं और अपने आह्वान पर अन्या लोगों को यदुवंशी बनाया था जब यदुवंश का नाश हुआ था दुर्वाशा की संत और ऋषि मंडली के श्राप से। तो उपकार कही वेकार नहीं जाता है।



जो ब्राह्मण होते हुए ही पाँचों बन ही नही सकता उससे क्यों तुलना की जा रही है जब बता दिया की मै सनातन ब्राह्मण हूँ उसमे भी सप्तर्षि सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल/विल्वपत्र जो आदिशक्ति का आहार और भोलेनाथ शिव को समर्पित होने वाला हो) पाण्डेय (जिसका पाँचों से सीधा सम्बन्ध है)। अगर आप सात सप्तर्षि सनातन गोत्रीय ब्राह्मण हैं तब भी आप पाँचों एक साथ हैं क्योंकि कर्म आधारीत तीन धर्म ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य तथा जलवायु आधारित दो मुख्य धर्म इस्लाम/मुसलमान/मुसल्लम-ईमान और ईसाइयत/क्रिश्चियनिटी इन मुख्य पांच धर्म सहित जितने धर्म सम्प्रदाय हुए इसी सात सनातन सप्तर्षि गोत्र से ही हुए जिनका की प्रारंभिक कोई शाखा नहीं निकली थी। और उसमे भी पाण्डेय हूँ मै जिसे सम्बोधित करते हुए हाय फाइव! लिखा हुआ कई मेल आता है अंगरेजी मेल आईडी से। -----मै 1999 के अंत और 2000 के प्रारंभिक दिनों में रामकृष्ण छात्रावास, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कहा था की अगर इस दुनिया में कोई ब्राह्मण नहीं रहा तो मै दुनिया का सर्वोच्च ब्राह्मण हूँ जो इस दुनिया की एक तिहाई शक्ति का स्वामी है, इस बात के आ जाने पर की अब ब्राह्मण कहाँ रह गए। पर मै अब तक शायद इसे साबित कर दिया परसच तो यह है कि मै जिन शक्तियों से शक्ति अर्जित किया वह सर्वोच्च ब्राह्मण हैं मतलब मेरे गौतम गोत्रीय मामा लोग जिनकी विनम्रता और मानवता ने मुझे भी जीत लिया है। -----अतः इस महा समुद्र मंथन के बाद भी गौतम, वशिष्ठ(/व्यास/परासर), कश्यप, भारद्वाज/अंगारिशा, भृगु(जमदग्नि/परशुराम), अत्रि (कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ। अगर इस महा समुद्रमंथन के बाद मै गोत्रों में अपने को तीसरे(कश्यप गौतम और गुरु वशिष्ठ से पीछे ही रह गए) पर पुनः पाता हूँ और पाण्डेय होने के नाते भी अपने गोत्र में भी अन्य ब्राह्मणो से भी अपने पीछे ही पाता हूँ तो अन्य लोग ब्राह्मणों से ऊपर कैसे हो गए? जिसे अपनी शक्ति का अंदाज न हो वह वाह्य संसार से अलग कर दिया जाय और संवैधानिक संस्थाओं से तथा अपने ही समान वाह्य संसार से अलग किये गए ब्राह्मण से भी परोक्ष और प्रत्यक्ष शक्ति लेना छोड़ दे केवल एक पीढ़ी तक और तब अपने समकक्ष ब्राह्मणों की शक्ति को पहचाने। ---------मै तो उस कश्यप गोत्र से हूँ जिसमे जन्मे श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणो और भक्तो की रक्षा के लिए जरासन्धि से जीत जाने की सामर्थ्य होते हुए भी रणछोर नाम स्वीकार कर लेना श्रेष्कर समझा और द्वारिका चले गए मथुरा छोड़कर तो मै ब्राह्मणों का अमानवीय कार्यहेतु पक्ष न लेते हुए भी अगर ब्राह्मणो का सम्बर्धन और संरक्षण चाहता हूँ तो कोई गलत नहीं है। सार्वजनिक पद पर सबके साथ समान व्यवहार करते हुए और यह जानते हुए भी की सभी इन्ही सप्तर्षि सनातन गोत्रों की ही संतान है जिसने से एक सनातन सप्तर्षि गोत्र कश्यप की मै भी संतान हूँ। Pandey Vivek Kumar जिन भक्तों और ब्राह्मणो की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण रणछोर कहलाये उन्ही ब्राह्मणों और भक्तों ने स्वयं और अपने आह्वान पर अन्या लोगों को यदुवंशी बनाया था जब यदुवंश का नाश हुआ था दुर्वाशा की संत और ऋषि मंडली के श्राप से। तो उपकार कही वेकार  नहीं जाता है।