Google+ Followers

Monday, March 30, 2015

Banerjee means Bandhopadhyay means Upadhyay=Jha(look into the matter by gathering knowledge) =Teacher(= source of intelligence) of Bandhoghat region of the Howrah, West Bengal. Thus there is no fundamental difference in the Banerjee and Jha.------------The Kedareshwar is the Aadishankar (1st existing form of the Mahadev on the earth at Kashi) thus he is the senior most of all possible his own form (of Shiv/Mahadev) in this world.



Banerjee means Bandhopadhyay means Upadhyay=Jha(look into the matter by gathering knowledge) =Teacher(= source of intelligence) of Bandhoghat region of the Howrah, West Bengal. Thus there is no fundamental difference in the Banerjee and Jha.------------The Kedareshwar is the Aadishankar (1st existing form of the Mahadev on the earth at Kashi) thus he is the senior most of all possible his own form (of Shiv/Mahadev) in this world.

RAMA is the name of Sita followed by RAM means Ram's one i.e. here Sita known by name of RAM and SITAPATI is the name of Ram followed by SIta means Sita's one. If there had happened any unwanted event in the world with RAMA/Jagad-Amba/Jagat-Janani and its people then Lav/Hindu-Kush will do struggle first. That had happened before 14 year ago.

RAMA is the name of Sita followed by RAM means Ram's one i.e. here Sita known by name of RAM and SITAPATI is the name of Ram followed by SIta means Sita's one. If there had happened any unwanted event in the world with RAMA/Jagad-Amba/Jagat-Janani and its people then Lav/Hindu-Kush will do struggle first. That had happened before 14 year ago.


https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur

सुवैचारिक और चरित्रवान व्यक्तियों के संघ में आने से शक्ति संवर्धन होता है न की शुक्राचार्य और उनसे प्रभावित राक्षशीमत वालों के संघ में शक्ति संवर्धन होता है; वरन यह संघ तो नाशवान होगा प्रवृत्ति में और पूरे संघ परिवार को मुंह की खानी पद सकती है हर मोर्चे पर केवल अपने-अपने अधिकार की लड़ाई में जिस शक्तिपुंज को संघ प्रत्येक स्वयंसेवक की सेवाशक्ति से प्राप्त किये रहता है।--------यह किशी वर्तमान संस्था विशेष पर टिप्पणी नहीं अपितु संथागत आम विचार और व्यवहार प्रस्तुत करता है।



सुवैचारिक और चरित्रवान व्यक्तियों के संघ में आने से शक्ति संवर्धन होता है न की शुक्राचार्य और उनसे प्रभावित राक्षशीमत वालों के संघ में शक्ति संवर्धन होता है; वरन यह संघ तो नाशवान होगा प्रवृत्ति में और पूरे संघ परिवार को मुंह की खानी पद सकती है हर मोर्चे पर केवल अपने-अपने अधिकार की लड़ाई में जिस शक्तिपुंज को संघ प्रत्येक स्वयंसेवक की सेवाशक्ति से प्राप्त किये रहता है।--------यह किशी वर्तमान संस्था विशेष पर टिप्पणी नहीं अपितु संथागत आम विचार और व्यवहार प्रस्तुत करता है।

जिनके बेटे/बेटियां हिन्दू/भारतीय संस्कृति के अनुसार मर्यादित आचरण यदि नहीं कर रहे/रहीं तो यदि उन माता-पिता को भारतीय उच्च राजनैतिक पदों पर नहीं होना चाहिए या उनका राजनैतिक पद छोटा हो जाना चाहिए तो मेरे अनुसार यही समय है की यह नियम तो राजनयिक/ प्रशानिक अधिकारी/शिक्षाधिकारी/व् अन्य सार्वजनिक राशि से जनित सेवा के पदों व् ग्राम जैसी छोटी पंचायती व्यवस्था तक के लिए भी सख्ती प्रयोग जाना चाहिए। जो अपने परिवार को नियंत्रित नहीं कर सकता वह आम जनता को क्या नियंत्रीय करेगा अगर आप का यही उच्च वैचारिक आधार है तो मै उसका समर्थक बन सकता हूँ अगर पूर्ण पालन हो सर्वत्र इसका?

जिनके बेटे/बेटियां हिन्दू/भारतीय संस्कृति के अनुसार मर्यादित आचरण यदि नहीं कर रहे/रहीं तो यदि उन माता-पिता को भारतीय उच्च राजनैतिक पदों पर नहीं होना चाहिए या उनका राजनैतिक पद छोटा हो जाना चाहिए तो मेरे अनुसार यही समय है की यह नियम तो राजनयिक/ प्रशानिक अधिकारी/शिक्षाधिकारी/व् अन्य सार्वजनिक राशि से जनित सेवा के पदों व् ग्राम जैसी छोटी पंचायती व्यवस्था तक के लिए भी सख्ती प्रयोग जाना चाहिए। जो अपने परिवार को नियंत्रित नहीं कर सकता वह आम जनता को क्या नियंत्रीय करेगा अगर आप का यही उच्च वैचारिक आधार है तो मै उसका समर्थक बन सकता हूँ अगर पूर्ण पालन हो सर्वत्र इसका 

कुछ लोगों का भ्रम मै दूर कर देता हूँ की ग्वाला केवल चंद्रवंशी ही नहीं सूर्यवंशी भी हुए हैं: भगवान श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप जब कामधेनु को बिना प्रणाम किये अज्ञानतावश जब अपना रथ कामधेनु के सामने से लेकर गुजर गए तो इससे कामधेनु ने जो अपमान महसूस किया उसके परिणाम स्वरुप राजा दिलीप का को पुत्र/संतान की प्राप्ति नहीं हो रही थी तो ऐसे में राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ आदेशानुसार कामधेनु की तपस्या बहुत दिनों तक किये तो काम धेनु न उनको अपनी पुत्री नंदिनी की रक्षा और पालन-पोषण की जिम्मेदारी दी थी। इस प्रकार राजा दिलीप बहुत दिनों तक एक ग्वाले के रूप में जीवन वितायें और अंत में स्वयं कामधेनु ने सिंह का रूप धारण कर नंदिनी को खाना चाहा परिक्षा स्वरुप तो राजा दिलीप उसके बदले अपने को उस सिंघरूपी गौमाता कामधेनु के सामने रखदिया और इस प्रकार उनका ग्वालों का जीवन पूर्ण हुआ और सन्तानोत्त्पत्ति का आशीर्वाद गौमाता कामधेनु से मिला। इस प्रकार गौतम ऋषि के बाद जब मानव जन्म में गौ सेवा की बात आती है तो राजा दिलीप और स्वयं द्वारिकाधीस श्रीकृष्ण की बात आती है जिसमे श्रीकृष्ण वृष्णि/यदु/चन्द्र वंशीय और राजा दिलीप सूर्यवंशीय थे। तो कोई अपने को गवाल कहता है तो उसका चन्द्रवंशीय होना अनिवार्य नहीं वह सूर्यवंशीय या अन्य वंश का भी हो सकता है। वैसे भी प्राचीनकाल में तो गोचारण और हल चलना ही आम आदमी के जीवन का जीविका स्रोत रहा है।



कुछ लोगों का भ्रम मै दूर कर देता हूँ की ग्वाला केवल चंद्रवंशी ही नहीं सूर्यवंशी भी हुए हैं: भगवान श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप जब कामधेनु को बिना प्रणाम किये अज्ञानतावश जब अपना रथ कामधेनु के सामने से लेकर गुजर गए तो इससे कामधेनु ने जो अपमान महसूस किया उसके परिणाम स्वरुप राजा दिलीप का को पुत्र/संतान की प्राप्ति नहीं हो रही थी तो ऐसे में राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ आदेशानुसार कामधेनु की तपस्या बहुत दिनों तक किये तो काम धेनु न उनको अपनी पुत्री नंदिनी की रक्षा और पालन-पोषण की जिम्मेदारी दी थी। इस प्रकार राजा दिलीप बहुत दिनों तक एक ग्वाले के रूप में जीवन वितायें और अंत में स्वयं कामधेनु ने सिंह का रूप धारण कर नंदिनी को खाना चाहा परिक्षा स्वरुप तो राजा दिलीप उसके बदले अपने को उस सिंघरूपी गौमाता कामधेनु के सामने रखदिया और इस प्रकार उनका ग्वालों का जीवन पूर्ण हुआ और सन्तानोत्त्पत्ति का आशीर्वाद गौमाता कामधेनु से मिला। इस प्रकार गौतम ऋषि के बाद जब मानव जन्म में गौ सेवा की बात आती है तो राजा दिलीप और स्वयं द्वारिकाधीस श्रीकृष्ण की बात आती है जिसमे श्रीकृष्ण वृष्णि/यदु/चन्द्र वंशीय और राजा दिलीप सूर्यवंशीय थे। तो कोई अपने को गवाल कहता है तो उसका चन्द्रवंशीय होना अनिवार्य नहीं वह सूर्यवंशीय या अन्य वंश का भी हो सकता है। वैसे भी प्राचीनकाल में तो गोचारण और हल चलना ही आम आदमी के जीवन का जीविका स्रोत रहा है।

Sunday, March 29, 2015

प्रमदाचरण(ही शुद्ध है जबकि प्रमदा चरण अम्भ्रंश है) का शाब्दिक अर्थ है सुन्दर आचरण वाला तो मित्रों अभी तक इस मानवीय संसार में सबसे सुन्दर आचरण किसका रहा है? उत्तर आता है की श्रीराम का और उसके बाद श्रीकृष्ण का। प्रमदाचरण बनर्जी और केदारेश्वर(आदिशंकर/शिव)[केदारेश्वर/महामृत्युंजय/विश्वेश्वर(विश्वनाथ)] बनर्जी से मेरा क्या सम्बन्ध है इस प्रश्न के उत्तर में जैसा की क्रमसः ऐसे नामित छात्रावास का अधीक्षक और शिक्षक हूँ। दूसरा यह की मै बचपन से दो ही मिनट सही बनर्जी[बुद्धिमतां-वरिष्ठं((सेवक(राम भक्त)+ब्राह्मण(जनेऊ छाजे)+क्षत्रिय(अहिरावण की भुजा ऊपरी)+वैश्य (भक्तों के लिए दाता))] /हनुमान/शंकरसुमन/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवनपुत्र/केशरीनन्दन/अंजनिपुत्र; भगवान श्रीराम; सरस्वती माँ; और गायत्री माँ की पूजा और नाम जाप नहाने के बाद जरूर करता था यह भी एक सम्बन्ध हो सकता है।Banerjee means Bandhopadhyay means Upadhyay=Jha= Teacher(= source of intelligence) of Bandhoghat region of the Bengal]


प्रमदाचरण(ही शुद्ध है जबकि प्रमदा चरण अम्भ्रंश है) का शाब्दिक अर्थ है सुन्दर आचरण वाला तो मित्रों अभी तक इस मानवीय संसार में सबसे सुन्दर आचरण किसका रहा है? उत्तर आता है की श्रीराम का और उसके बाद श्रीकृष्ण का। प्रमदाचरण बनर्जी और केदारेश्वर(आदिशंकर/शिव)[केदारेश्वर/महामृत्युंजय/विश्वेश्वर(विश्वनाथ)] बनर्जी से मेरा क्या सम्बन्ध है इस प्रश्न के उत्तर में जैसा की क्रमसः ऐसे नामित छात्रावास का अधीक्षक और शिक्षक हूँ। दूसरा यह की मै बचपन से दो ही मिनट सही बनर्जी[बुद्धिमतां-वरिष्ठं((सेवक(राम भक्त)+ब्राह्मण(जनेऊ छाजे)+क्षत्रिय(अहिरावण की भुजा ऊपरी)+वैश्य (भक्तों के लिए दाता))] /हनुमान/शंकरसुमन/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/पवनपुत्र/केशरीनन्दन/अंजनिपुत्र; भगवान श्रीराम; सरस्वती माँ; और गायत्री माँ की पूजा और नाम जाप नहाने के बाद जरूर करता था यह भी एक सम्बन्ध हो सकता है।Banerjee means Bandhopadhyay means Upadhyay=Jha= Teacher(= source of intelligence) of Bandhoghat region of the Bengal]

मुझे जानने वालों में कौतुहल आज भी है की मेरा नाम विवेक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक/माँ सरस्वती का ज्येष्ठ पुत्र(शिव और शिवा दोनों का रक्षा कवच) जो सदा माडर्न(आधुनिक) है उसके बावजूद मै अपने बड़े पुत्र का नाम विष्णुकान्त/वेंकटेश(राशिनाम) और छोटे पुत्र का नाम कृष्णकांत/वाशुदेव(राशिनाम) क्यों रखा वह भी केवल अपने मन से जबकि आप परिवार वालों की सहमति के बिना कुछ नहीं करते हैं: तो मै पुनः दोहराता हूँ की सुबह 5. 11 पर 30-09-2010 को शुक्लपक्ष में कमलानेहरु मार्ग (चंद्रशेखर आजाद पार्क के सामने) नाजरेथ हॉस्पिटल, इलाहाबाद/प्रयागराज में जन्मे पुत्र का नाम मै मै रामजी (सशरीर परमब्रह्म) रखना चाहता था क्योंकि दोपहर को उसके जन्म के बाद एक तो श्रीराम मंदिर का स्पस्ट परन्तु लोकानुसार बाधित पक्ष रामलला अपना अधिकार पाये दूसरा की मै जिस विश्वव्यापक परिवर्तन के समुद्रमंथन में लगा था उसमे प्रेमचंद(विश्व), विष्णु(श्रीधर) और ब्रह्मा (जोशी) शक्ति मुझमे समाहित थी जिससे दृस्तिगोचर शक्ति विष्णु(श्रीधर) की ही मेरे साथ थी इसी से उनके नाम से जाने जाने वाले परमब्रह्म के पर्याय का नाम ध्यान में रखते हुए उसका नाम विष्णुकांत(विष्णु का स्वामी/प्रेमी =परमब्रह्म जिससे की ब्रह्मा विष्णु और महेश की उत्पत्ति स्वयं होती है) रखा। दूसरे पुत्र का जन्म ही हजारों वर्ष केवल एक बार श्रीकृष्ण जन्म तिथि और गृह नक्षत्र एक साथ प्रकट होने वाले श्रीकृष्ण जन्मास्टमी पर्व पर शाम 8 . 12 बजे, 28--08-2013 को कृष्णपक्ष में, बाघम्बरी हाऊसिंग क्षेत्र, अल्लाह्पुर के साकेत हॉस्पिटल, इलाहाबाद/प्रयागराज में जन्मे पुत्र का नाम कृष्णकांत रखा जो मेरे गिरिधारी राशिनाम का पूरक है। तो इस प्रकार विष्णुकांत मेरी जिम्मेदारियों के प्रतीक है इस प्रकार जिन शक्तियों का मै प्रतिनिधि था वे विश्वव्यापी संतुलित शक्तियों उसमे संरक्षित है और कृष्णकांत मेरे प्रतीक हैं लेकिन मै विवेक(गिरिधारी) तो श्रीराम में रमा हूँ बचपन से तो देखना है कृष्णकांत) कैसे होते हैं?

मुझे जानने वालों में कौतुहल आज भी है की मेरा नाम विवेक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक/माँ सरस्वती का ज्येष्ठ पुत्र(शिव और शिवा दोनों का रक्षा कवच) जो सदा माडर्न(आधुनिक) है उसके बावजूद मै अपने बड़े पुत्र का नाम विष्णुकान्त/वेंकटेश(राशिनाम) और छोटे पुत्र का नाम कृष्णकांत/वाशुदेव(राशिनाम) क्यों रखा वह भी केवल अपने मन से जबकि आप परिवार वालों की सहमति के बिना कुछ नहीं करते हैं: तो मै पुनः दोहराता हूँ की सुबह 5. 11 पर 30-09-2010 को शुक्लपक्ष में कमलानेहरु मार्ग (चंद्रशेखर आजाद पार्क के सामने) नाजरेथ हॉस्पिटल, इलाहाबाद/प्रयागराज में जन्मे पुत्र का नाम मै मै रामजी (सशरीर परमब्रह्म) रखना चाहता था क्योंकि दोपहर को उसके जन्म के बाद एक तो श्रीराम मंदिर का स्पस्ट परन्तु लोकानुसार बाधित पक्ष रामलला अपना अधिकार पाये दूसरा की मै जिस विश्वव्यापक परिवर्तन के समुद्रमंथन में लगा था उसमे प्रेमचंद(विश्व), विष्णु(श्रीधर) और ब्रह्मा (जोशी) शक्ति मुझमे समाहित थी जिससे दृस्तिगोचर शक्ति विष्णु(श्रीधर) की ही मेरे साथ थी इसी से उनके नाम से जाने जाने वाले परमब्रह्म के पर्याय का नाम ध्यान में रखते हुए उसका नाम विष्णुकांत(विष्णु का स्वामी/प्रेमी =परमब्रह्म जिससे की ब्रह्मा विष्णु और महेश की उत्पत्ति स्वयं होती है) रखा। दूसरे पुत्र का जन्म ही हजारों वर्ष केवल एक बार श्रीकृष्ण जन्म तिथि और गृह नक्षत्र एक साथ प्रकट होने वाले श्रीकृष्ण जन्मास्टमी पर्व पर शाम 8 . 12 बजे, 28--08-2013 को कृष्णपक्ष में, बाघम्बरी हाऊसिंग क्षेत्र, अल्लाह्पुर के साकेत हॉस्पिटल, इलाहाबाद/प्रयागराज में जन्मे पुत्र का नाम कृष्णकांत रखा जो मेरे गिरिधारी राशिनाम का पूरक है। तो इस प्रकार विष्णुकांत मेरी जिम्मेदारियों के प्रतीक है इस प्रकार जिन शक्तियों का मै प्रतिनिधि था वे विश्वव्यापी संतुलित शक्तियों उसमे संरक्षित है और कृष्णकांत मेरे प्रतीक हैं लेकिन मै विवेक(गिरिधारी) तो श्रीराम में रमा हूँ बचपन से तो देखना है कृष्णकांत) कैसे होते हैं?

Saturday, March 28, 2015

अल्लाह-आबाद/प्रयागराज वालों को केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र चाहिए था वह उनको सादर समर्पित

अल्लाह-आबाद/प्रयागराज वालों को केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र चाहिए था वह उनको सादर समर्पित

Friday, March 27, 2015

राम, कृष्ण और शिव पर वाद विवाद न हो इस समय केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की चिंता शिवरामकृष्ण(एक ही विभूति हैं न की अलग-अलग) कही और से बैठे हुए कर रहें हैं। अतः मई अब इस जिम्मेदारी से मुक्त हो रहा हूँ उनके आदेशानुसार (मेरे जेष्ठ है)।

राम, कृष्ण और शिव पर वाद विवाद न हो इस समय केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र की चिंता शिवरामकृष्ण(एक ही विभूति हैं न की अलग-अलग) कही और से बैठे हुए कर रहें हैं। अतः मई अब इस जिम्मेदारी से मुक्त हो रहा हूँ उनके आदेशानुसार (मेरे जेष्ठ है)। 

अब यह भी जान लीजिये की इसी लिए भारतीय विज्ञान संस्थान में 2008 में ऑरकुट पर कहा था की बड़े भाई अखिलेश जो पर्यावरण के छात्र रहे हैं केवल वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान के भीतर ही आकर मेरा सामना कर सकते हैं और बड़े भाई राहुल केवल वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान बाहर लेकिन मई दोनों लोगों से दोनों स्थान पर सामना कर सकता हूँ। --------इसीलिये अगर वे चाहे तो मै उन दोनों का सहयोग करने को भी तैयार हूँ एक शिक्षक ही बनकर।



अब यह भी जान लीजिये की इसी लिए भारतीय विज्ञान संस्थान में 2008 में ऑरकुट पर कहा था की बड़े भाई अखिलेश जो पर्यावरण के छात्र रहे हैं केवल वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान के भीतर ही आकर मेरा सामना कर सकते हैं और बड़े भाई राहुल केवल वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान बाहर लेकिन मई दोनों लोगों से दोनों स्थान पर सामना कर सकता हूँ। --------इसीलिये अगर वे चाहे तो मै उन दोनों का सहयोग करने को भी तैयार हूँ एक शिक्षक ही बनकर। अहमद और असरफ भाई तो शशिधर(शिव) मामा से मिलकर ही आनंदित हो जाएंगे मेरी उनको क्या जरूरत।  

मैनचेस्टर और धन्वन्तरि समाज की बात आ ही गयी तो मेरा विवाह मेनचेस्टर से सम्बंधित धन्वन्तरी परिवार-सुल्तानपुर(अवध क्षेत्र) की कन्या से ही हुआ है। 2002 के समय की यह बात है जब लोगों को कोई वायुमंडलीय और समुद्रीय विभाग या केंद्र नहीं वरन केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र चाहिए था प्रयागराज में तो दूसरा यह प्रसंग की कि श्री हृदयनारायण (कृष्ण)-बिशुनपुर/गोकुला(यमुना)-सुल्तानपुर(अवध क्षेत्र) [पड़ोस के मामा/मामी)] के पुत्र और मेरे बड़े और गुरुकुल के भी बड़े भाई जिनका प्रेम विवाह भी मैनचेस्टर वाली भाभी जी से हुआ है जो उनकी सहपाठी थीं जो वर्मान में एसोसिएट प्रोफेसर है तथा बड़े भाई डॉक्टर है यादव सम्राट द्वारा स्थापित धन्वन्तरी संस्थान में और यह भी जान लीजिये की ये हमारे बड़े भाई सुदामा हैं और थे मिलिंद और मकरंद यादव वन्धु के: तो बताऊँ क्या कहे थे संयोग से खुटहन, शाहगंज, जौनपुर में 2002 में मिलने पर की अपनी औकात को देखकर कोई कदम उठाया करो और इसके शिवा वे मेरे उस समय पीले पड़े शरीर और अपमान का घूँट और जिम्म्देदारी को महसूस करने से उतपनन हुए सामान्य बालक के मन के कस्ट के बारें में कुछ नहीं पूंछे और चल दिए।-----तो क्या यादव सम्राट परिवार मेरे साथ जो कुछ हो रहा था उससे अछूता था और आज बता दूँ की मेरा औकात दुनिया में किशी से भी कम नही है क्यंकि जो चुनौती मिली उसे पूरा किया और जो आप लोग चक्रव्यूह रच रहे उसमे मुझे राम से कृष्ण ही बनने के अपमान को ही झेलना है इस लोक लीला में ही क्योंकि वास्तव में यह आप का जाल तो धुल की रस्सी है जो बच्चों द्वारा खेल के मैदान में किशी सायकिल वाले को डराने के लिए बनायी जाती है जिसपे चढ़ाते ही रस्सी/बाँध टूट जाता है बहुत ही सहज रूप से। आप रामानंद/रामप्रसाद कुल से क्यों पार पाना चाहते हैं?



मैनचेस्टर और धन्वन्तरि समाज की बात आ ही गयी तो मेरा विवाह मेनचेस्टर से सम्बंधित धन्वन्तरी परिवार-सुल्तानपुर(अवध क्षेत्र) की कन्या से ही हुआ है। 2002 के समय की यह बात है जब लोगों को कोई वायुमंडलीय और समुद्रीय विभाग या केंद्र नहीं वरन केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र चाहिए था प्रयागराज में तो दूसरा यह प्रसंग की कि श्री हृदयनारायण (कृष्ण)-बिशुनपुर/गोकुला(यमुना)-सुल्तानपुर(अवध क्षेत्र) [पड़ोस के मामा/मामी)] के पुत्र और मेरे बड़े और गुरुकुल के भी बड़े भाई जिनका प्रेम विवाह भी मैनचेस्टर वाली भाभी जी से हुआ है जो उनकी सहपाठी थीं जो वर्मान में एसोसिएट प्रोफेसर है तथा बड़े भाई डॉक्टर है यादव सम्राट द्वारा स्थापित धन्वन्तरी संस्थान में और यह भी जान लीजिये की ये हमारे बड़े भाई सुदामा हैं और थे मिलिंद और मकरंद यादव वन्धु के: तो बताऊँ क्या कहे थे संयोग से खुटहन, शाहगंज, जौनपुर में 2002 में मिलने पर की अपनी औकात को देखकर कोई कदम उठाया करो और इसके शिवा वे मेरे उस समय पीले पड़े शरीर और अपमान का घूँट और जिम्म्देदारी को महसूस करने से उतपनन हुए सामान्य बालक के मन के कस्ट के बारें में कुछ नहीं पूंछे और चल दिए।-----तो क्या यादव सम्राट परिवार मेरे साथ जो कुछ हो रहा था उससे अछूता था और आज बता दूँ की मेरा औकात दुनिया में किशी से भी कम नही है क्यंकि जो चुनौती मिली उसे पूरा किया और जो आप लोग चक्रव्यूह रच रहे उसमे मुझे राम से कृष्ण ही बनने के अपमान को ही झेलना है इस लोक लीला में ही क्योंकि वास्तव में यह आप का जाल तो धुल की रस्सी है जो बच्चों द्वारा खेल के मैदान में किशी सायकिल वाले को डराने के लिए बनायी जाती है जिसपे चढ़ाते ही रस्सी/बाँध टूट जाता है बहुत ही सहज रूप से। आप रामानंद/रामप्रसाद कुल से क्यों पार पाना चाहते हैं?

पूरे विश्व के उन लोगों को जिनको कि सत्य से साक्षात्कार करना था उनको भी और उनको भी जिनको मानवता के अबाध सञ्चालन की कोई परिभाषित व्यवस्था चाहिए सबको "श्रीरामनवमी" की हार्दिक शुभकामना। आप सभी से अनुरोध है की आप पुनः निकट भविष्य में महादेव को केवल शिव स्वरुप में देखना चाहेंगे और तदनुरूप उनके रौद्ररूप नटराज या अन्यानेक रूपं जिसे आप देख और कल्पना नहीं कर सकते है में पुनः न आने हेतु अच्छा कर्म करेंगे और उनके सामजिक स्वरूप भगवान श्रीराम/कृष्ण के चरित्र को ही समाज हेतु स्वीकार करेंगे जो शिव भी हैं, विष्णु भी हैं, और ब्रह्मा भी है मतलब जीते जागते सशरीर परमब्रह्म है।

पूरे विश्व के उन लोगों को जिनको कि सत्य से साक्षात्कार करना था उनको भी और उनको भी जिनको मानवता के अबाध सञ्चालन की कोई परिभाषित व्यवस्था चाहिए सबको "श्रीरामनवमी" की हार्दिक शुभकामना। आप सभी से अनुरोध है की आप पुनः निकट भविष्य में महादेव को केवल शिव स्वरुप में देखना चाहेंगे और तदनुरूप उनके रौद्ररूप नटराज या अन्यानेक रूपं जिसे आप देख और कल्पना नहीं कर सकते है में पुनः न आने हेतु अच्छा कर्म करेंगे और उनके सामजिक स्वरूप भगवान श्रीराम/कृष्ण के चरित्र को ही समाज हेतु स्वीकार करेंगे जो शिव भी हैं, विष्णु भी हैं, और ब्रह्मा भी है मतलब जीते जागते सशरीर परमब्रह्म है।  

अब राख/भस्म बटोरिये और अपने शरीर पर रमा कर मरघट पर चले जाइए। यही मई छुपा रहा था की आप लोग किश उच्चकोटि का जीवन दिए है विश्वमहाशक्ति को। केवल मेरी इक्षा इतनी सी थी की उसको इतने उच्चकोटि का जीवन न मिले जिसका की मुझे आंकलन हो चुका था पूर्वनुमान और अनुभूतियों द्वारा (मुझे पता है की काल्पनिक वातावरण चुज्जे को पकड़ने का कैसे बनाते हैं मायावी लोग)।

अब राख/भस्म बटोरिये और अपने शरीर पर रमा कर मरघट पर चले जाइए। यही मई छुपा रहा था की आप लोग किश उच्चकोटि का जीवन दिए है विश्वमहाशक्ति को। केवल मेरी इक्षा इतनी सी थी की उसको इतने उच्चकोटि का जीवन न मिले जिसका की मुझे आंकलन हो चुका था पूर्वनुमान और अनुभूतियों द्वारा (मुझे पता है की काल्पनिक वातावरण चुज्जे को पकड़ने का कैसे बनाते हैं मायावी लोग)।  

कम से कम "सेवा करो और तत्पर रहो" तथा "एकता और अनुशासन" से तो मै था ही न तो क्या इस सत्य के लिए भी संख्याबल चाहिए। आप हमें अनुशासन सिखाएंगे जो स्वअनुशासित इन दोनों में जाने से पहले बाल्यकाल से ही था अगर आप के स्वयंसेवकों की गुणवत्ता(मेरिट) और महत्ता बहुत अधिक बढ़ गयी हो और आप मुझे अपने समूह का स्वयंसेवक न भी समझें तो क्या ? आप पागल कैसे समझ लिए? क्या मानवता के हित की रक्षा और वर्तमान मानव व्यवस्था में सहयोग हेतु सत्य छिपाना पागलपण है? और आप क्या पागलपन किये जा रहे है जाती और रंगभेद में वह नजर नहीं आ रहा है क्या आप को? आप इस हद तक गिर गए की अपनी जाती और धर्म के श्रेष्ठ व्यक्तियों द्वारा मान्य व्यक्ति पर आप आज भी छोट किये जा रहे हैं जाती और रंग भेद के कारन जिसका की आप मेरे ऊपर आरोप लगाते थे प्रारंभिक दिनों में।

कम से कम "सेवा करो और तत्पर रहो" तथा "एकता और अनुशासन" से तो मै था ही न तो क्या इस सत्य के लिए भी संख्याबल चाहिए। आप हमें अनुशासन सिखाएंगे जो स्वअनुशासित इन दोनों में जाने से पहले बाल्यकाल से ही था अगर आप के स्वयंसेवकों की गुणवत्ता(मेरिट) और महत्ता बहुत अधिक बढ़ गयी हो और आप मुझे अपने समूह का स्वयंसेवक न भी समझें तो क्या ? आप पागल कैसे समझ लिए? क्या मानवता के हित की रक्षा और वर्तमान मानव व्यवस्था में सहयोग हेतु सत्य छिपाना पागलपण है?  और आप क्या पागलपन किये जा रहे है जाती और रंगभेद में वह नजर नहीं आ रहा है क्या आप को? आप इस हद तक गिर गए की अपनी जाती और धर्म के श्रेष्ठ व्यक्तियों द्वारा मान्य व्यक्ति पर आप आज भी छोट किये जा रहे हैं जाती और रंग भेद के कारन जिसका की आप मेरे ऊपर आरोप लगाते थे प्रारंभिक दिनों में।    

एकबार आतंकवाद फैलाकर लोगों को नियंत्रित करो और फिर सेक्स बम छोडो आतंकवादियों को नियंत्रित करने के लिए और फिर उससे निबटने के लिए आतंकवाद को बढ़ावा दो तो यह फार्मूला अब नहीं चलने वाला है क्योकि इससे अगर फिर कोई निर्दोष शिकार होगा त्रुटि वस जैशा की त्रुटि इसमे होनी ही है तो इस विश्वसमाज और इस हेतु किशी विवेक(गिरिधर) को पुनः वही कस्ट झेलना होगा जो मई झेला हूँ। अतः अब परदे की आंड में यह सब चलने वाला नहीं। अब यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नीति बदलनी चाहिए।

एकबार आतंकवाद फैलाकर लोगों को नियंत्रित करो और फिर सेक्स बम छोडो आतंकवादियों को नियंत्रित करने के लिए और फिर उससे निबटने के लिए आतंकवाद को बढ़ावा दो तो यह फार्मूला अब नहीं चलने वाला है क्योकि इससे अगर फिर कोई निर्दोष शिकार होगा त्रुटि वस जैशा की त्रुटि इसमे होनी ही है तो इस विश्वसमाज और इस हेतु किशी विवेक(गिरिधर) को पुनः वही कस्ट झेलना होगा जो मई झेला हूँ। अतः अब परदे की आंड में यह सब चलने वाला नहीं। अब यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नीति बदलनी चाहिए।


मैंने भारतीय विज्ञान संस्थान में ही कहा था की मै हर माता और बहन के चहरे से नकाब उठवा दूँ पर शायद इस पृथ्वी के सभी सूर्यनारायण की ज्योति धीमी पड़ जाय और स्वयं सूर्यनारायण/चन्द्रदेव/ज्ञानेन्द्र/ब्रह्मदेव/उमाशंकर यह जान लें की यह तो एक झांकी है अभी हर धर्म और हर जाती की माँ/बहनों के सर से पर्दा उठेगा । किसको उच्चतम क्षत्रिय और भूमिहार ब्राह्मण समझूँ जिन्होंने के प्रारंभिक 2008 में ही भारतीय विज्ञान संस्थान में ही मुझे अपराजेय घोषित किया और मेरे कार्य को 18 सितम्बर, 2007 को ही पूर्ण माना था और पूरे विश्व को मेरे लिए आवास घोसित किया था या प्रयागराज/प्रयागराज विश्वविद्यालय के उन क्षत्रिय और भूमिहार ब्राह्मण को जो हार डर हार खाए जा रहे पर सत्य को छुपाना चाह रहे हैं और अब भी मुझे पागल सिद्ध करना चाहते हैं जबकि ये लोग किशी पूर्व प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री और तथाकथित दलित विशेष पार्टी के संस्थापक को को स्वयं पागल बना चुके हैं उनकी आँख पर पर्दा दाल करके विशेस धन्वन्तरी से जुड़े माफिया और दलित अस्त्र से समाहित लोगों के बल पर। तो मै उन महान आत्माओं, विभूतिनरायणों, विश्वसुंदरियों और उनके गुरुओं को डॉन भाई(भगवा) और बबलूभाई(तिरंगा) के सम्मान की रक्षा हेतु उजागर कर ही देता हूँ जो विश्वमहाशक्ति से पर्दा उठाने को ही लोग तुले है जैसे की सूर्यनारायण, चन्द्रदेव, ब्रह्मदेव, ज्ञानेन्द्र, उमाशंकर और हमारे प्रयागराज के कुर्मावतारी अहमद भाई जिनसे मिलने मै 31 मार्च को स्वयं करेली जा रहा हूँ। तो दुनिया के हूर की परी और उनके स्वामी और गुरुदेव तथा बन्धुबान्धव हाजिर हैं[ मैनचेस्टर के रामज्ञान मामा के पैसे की बोलती बंद हो गयी पर प्रयागराज के दम्भी लोगों की बोलती बंद होनी शेष है जो होना था 29-10-2009 को ही हो गया पर ये अब लॉस/राख पर राजनीती कर रहे हैं गौरीशंकर/गिरिजाशंकर के राख की भस्म इनको चाहिए] (जय श्रीराम/कृष्ण):



मैंने भारतीय विज्ञान संस्थान में ही कहा था की मै हर माता और बहन के चहरे से नकाब उठवा दूँ पर शायद इस पृथ्वी के सभी सूर्यनारायण की ज्योति धीमी पड़ जाय और स्वयं सूर्यनारायण/चन्द्रदेव/ज्ञानेन्द्र/ब्रह्मदेव/उमाशंकर यह जान लें की यह तो एक झांकी है अभी हर धर्म और हर जाती की माँ/बहनों के सर से पर्दा उठेगा ।
किसको उच्चतम क्षत्रिय और भूमिहार ब्राह्मण समझूँ जिन्होंने के प्रारंभिक 2008 में ही भारतीय विज्ञान संस्थान में ही मुझे अपराजेय घोषित किया और मेरे कार्य को 18 सितम्बर, 2007 को ही पूर्ण माना था और पूरे विश्व को मेरे लिए आवास घोसित किया था या प्रयागराज/प्रयागराज विश्वविद्यालय के उन क्षत्रिय और भूमिहार ब्राह्मण को जो हार डर हार खाए जा रहे पर सत्य को छुपाना चाह रहे हैं और अब भी मुझे पागल सिद्ध करना चाहते हैं जबकि ये लोग किशी पूर्व प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री और तथाकथित दलित विशेष पार्टी के संस्थापक को को स्वयं पागल बना चुके हैं उनकी आँख पर पर्दा दाल करके विशेस धन्वन्तरी से जुड़े माफिया और दलित अस्त्र से समाहित लोगों के बल पर। तो मै उन महान आत्माओं, विभूतिनरायणों, विश्वसुंदरियों और उनके गुरुओं को डॉन भाई(भगवा) और बबलूभाई(तिरंगा) के सम्मान की रक्षा हेतु उजागर कर ही देता हूँ जो विश्वमहाशक्ति से पर्दा उठाने को ही लोग तुले है जैसे की सूर्यनारायण, चन्द्रदेव, ब्रह्मदेव, ज्ञानेन्द्र, उमाशंकर और हमारे प्रयागराज के कुर्मावतारी अहमद भाई जिनसे मिलने मै 31 मार्च को स्वयं करेली जा रहा हूँ। तो दुनिया के हूर की परी और उनके स्वामी और गुरुदेव तथा बन्धुबान्धव हाजिर हैं[ मैनचेस्टर के रामज्ञान मामा के पैसे की बोलती बंद हो गयी पर प्रयागराज के दम्भी लोगों की बोलती बंद होनी शेष है जो होना था 29-10-2009 को ही हो गया पर ये अब लॉस/राख पर राजनीती कर रहे हैं गौरीशंकर/गिरिजाशंकर के राख की भस्म इनको चाहिए] (जय श्रीराम/कृष्ण):

Thursday, March 26, 2015

राम अवध और राम प्रशाद दोनों अलग हो सकते हैं क्या? और अलग हुए तो कैसे? और हुए तो जिसने किया वही गुनाहगार फिर मुझ गिरधारी [[Date of Birth (Actual): 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha (1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi) Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु/मरुधर, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान))]] को सजा क्यों दी गयी ? मतलब समाज ही गुनहगार और फिर भी सजा मुझको 14 वर्ष पूर्व दी गयी?तो फिर समाज यह सजा भुगते न मै सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण विवेक(गिरधारी) क्यों भुगतूं । वह समाज भुगते जिसने रामअवध और रामप्रसाद में भेद करने का पाप किया।-----------मै तो आप लोगों को केवल बता रहा था यह सजा मै मानव समाज के कल्याण हेतु भुगत चुका हूँ इन चौदह वर्षों में लेकिन इसीलिये चेतावनी दे रहा हूँ की आने वाले कम से कम 1000 वर्ष में पुनः कोई विवेक(गिरिधर/मरुधर) इस बलि का बकरा न बने जो मै बना हूँ। आप सभी पाप मुक्त हैं। जय श्रीराम/कृष्ण।

 राम अवध और राम प्रशाद दोनों अलग हो सकते हैं क्या?  और अलग हुए तो कैसे?  और हुए तो जिसने किया वही गुनाहगार फिर मुझ गिरधारी [[Date of Birth (Actual): 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस  Nakshatra: Dhanistha (1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi)  Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु/मरुधर, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान))]] को सजा क्यों दी गयी ?  मतलब समाज ही गुनहगार और फिर भी सजा मुझको 14 वर्ष पूर्व दी गयी?तो फिर समाज यह सजा भुगते न मै सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण विवेक(गिरधारी) क्यों भुगतूं । वह समाज भुगते जिसने रामअवध और रामप्रसाद में भेद करने का पाप किया।-----------मै तो आप लोगों को केवल बता रहा था यह सजा मै मानव समाज के कल्याण हेतु भुगत चुका हूँ इन चौदह वर्षों में लेकिन इसीलिये चेतावनी दे रहा हूँ की आने वाले कम से कम 1000 वर्ष में पुनः कोई विवेक(गिरिधर/मरुधर) इस बलि का बकरा न बने जो मै  बना हूँ। आप सभी पाप मुक्त हैं। जय श्रीराम/कृष्ण। 

आप का समाजवाद/बहुजनसमाजवाद, मानववाद और स्वयंसेवकवाद उस पर लागु होता है जो जीवन में गलती कर चुके होते है पर जिसका जीवन कोरा कागज़ ही रहा या जिसका जीवन और कार्य स्वयं अनुकरणीय हो तो यह आपका स्वयंसेवक का नियम, समाजवाद/बहुजनसमाजवाद और मानववाद उसकी ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए नहीं लगता है। मै यह भी नहीं कह रहा की की जिसका जीवन और कार्य स्वयं अनुकरणीय हो वह आप के कार्य में शुभ कार्य में शामिल भी न हो पर उस पर आप लागू नहीं कर सकते अपना नियम विना उसकी पूर्ण सहमति लिए यह जता कर की वह आप का क्या कर लेगा वरन वह नहीं करेगा कोई और वह उसके बदले करेगा जो 14 वर्ष पहले हुआ आप कितने भी शक्तिशाली होंगे।---------------------जो डॉक्टर लोग सुवानी जर्जिआ में स्वयं के लिए मकान में विश्वमहाशक्ति और उनके स्वामी को मकरध्वज के यहां संरक्षण दिए हैं और वही से धन्वन्तरीयों (डॉक्टर लोगों) की सहायता से मेरा विरोध अपने माफियाओं द्वारा आज तक करवा रहे थे चाहे वे मेरे कितने करीब के सम्बन्धी या विज्ञान केंद्र के भी डॉक्टर या उनके परिवार वाले भी रहे हों तो अगर उन धन्वन्तरीयों (डॉक्टर लोगों) की चिकित्सा पर मेरी सामाजिक चिकित्सा भारी पडी रहेगी जब तक तभी तक शांति रहेगी। -----आप यह भी जान लीजिये की आप के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रणेता डॉ केशव राव बलिराव हेडगेवार जब से कार्य कर रहे है उसके एक-दो सौ वर्ष पूर्व से ही नहीं मानव सभ्यता से ही नहीं ऋषि सभ्यता से ही जो लोग स्वयं सेवक रहे हों उन सनातन ब्राह्मण परिवार की अस्मिता पर कभी भी आंच नहीं आनी चाहिए। उस सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण श्री रामानंद/रामप्रशाद मिश्रा, बिशुनपुर-223103 के कुल और सनातन कश्यप गोत्रीय देवव्रत/रामप्रसाद पाण्डेय, रामापुर-223225 के कुल के नाती/पौत्र पर आपने अपना तथाकथित मानववाद/समाजवाद/बहुजनसमाजवाद लागू कर दिया विना अन्तः करण तक विचार किये। आप का समाजवाद/बहुजनसमाजवाद, मानववाद और स्वयंसेवकवाद उस पर लागु होता है जो जीवन में गलती कर चुके होते है पर जिसका जीवन कोरा कागज़ ही रहा या जिसका जीवन और कार्य स्वयं अनुकरणीय हो तो यह आपका स्वयंसेवक का नियम, समाजवाद/बहुजनसमाजवाद और मानववाद उसकी ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए नहीं लगता है। मै यह भी नहीं कह रहा की की जिसका जीवन और कार्य स्वयं अनुकरणीय हो वह आप के कार्य में शुभ कार्य में शामिल भी न हो पर उस पर आप लागू नहीं कर सकते अपना नियम विना उसकी पूर्ण सहमति लिए यह जता कर की वह आप का क्या कर लेगा वरन वह नहीं करेगा कोई और वह उसके बदले करेगा जो 14 वर्ष पहले हुआ आप कितने भी शक्तिशाली होंगे।-----------श्री रामप्रशाद मिश्रा के बड़े पुत्र श्री रामनाथ मिश्रा जो स्वयं में केवल एक संस्कृत शिक्षक रहे हैं और छोटे पुत्र आप के आपातकाल के समय के नैनी, प्रयागराज/अल्लाह-आबाद जेल के प्रथम स्वयंसेवक श्रीपारसनाथ मिश्रा जिन्होंने श्रीमती इंदिरा के निर्देश के बावजूद पहली स्वयंसेवक शाखा लगवाई थी जेल के द्रिस्टीकोण से वे उनसे बड़े स्वयंसेवक वे खुद थे जिनका पारिवारिक जीवन, कार्य, प्रेरणा, नैतिक आचरण उस पूरे क्षेत्र में उनको केवल एक नाम पंडित जी आज तक देता है जिनको उन्होंने पढ़ाया हो या न पढ़ाया हो। मेरे लिए दोनों प्रेरणा के श्रोत रहे है अतः मै दोनों लोगों के जीवन को जी लिया पर एक सामान्य जन के लिए यह असहनीय होगा और वह अपना संयम छोड़ जीवन लीला से विदा ले लेगा। --------------------श्री रामप्रशाद पाण्डेय के पुत्र श्री बेचनराम पाण्डेय जो हिन्दुस्तानमिल में तकनीकी सहायक और मिल मालिक के करीबी थे ने तो आप के स्वयंसेवक संघ के आजीवन प्रचारक डॉक्टर अभयचंद पाण्डेय(बैद्य) के पिता की जीवन रक्षा में अल्प काल में ही अपना जीवन गवां बैठे थे क्या यह सब मानवता की सेवा में नहीं आता है ।----------संख्याबल के जीवन को आधुनिक से आधुनिक बनाने के लिए वैज्ञानिक विकास और संख्याबल की गणित साथ नहीं चलते हैं की किशी से वैज्ञानिक विकास भी करवाईये और उसके घर वालों के साथ संख्याबल आधारित बलात्कार जारी रखिये।----Those who want peace and development need to follow the peace and development.

आप का समाजवाद/बहुजनसमाजवाद, मानववाद और स्वयंसेवकवाद उस पर लागु होता है जो जीवन में गलती कर चुके होते है पर जिसका जीवन कोरा कागज़ ही रहा या जिसका जीवन और कार्य स्वयं अनुकरणीय हो तो यह आपका स्वयंसेवक का नियम, समाजवाद/बहुजनसमाजवाद और मानववाद उसकी ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए नहीं लगता है। मै यह भी नहीं कह रहा की की जिसका जीवन और कार्य स्वयं अनुकरणीय हो वह आप के कार्य में शुभ कार्य में शामिल भी न हो पर उस पर आप लागू नहीं कर सकते अपना नियम विना उसकी पूर्ण सहमति लिए यह जता कर की वह आप का क्या कर लेगा वरन वह नहीं करेगा कोई और वह उसके बदले करेगा जो 14 वर्ष पहले हुआ आप कितने भी शक्तिशाली होंगे।---------------------जो डॉक्टर लोग सुवानी जर्जिआ में स्वयं के लिए मकान में विश्वमहाशक्ति और उनके स्वामी को मकरध्वज के यहां संरक्षण दिए हैं और वही से धन्वन्तरीयों (डॉक्टर लोगों) की सहायता से मेरा विरोध अपने माफियाओं द्वारा आज तक करवा रहे थे चाहे वे मेरे कितने करीब के सम्बन्धी या विज्ञान केंद्र के भी डॉक्टर या उनके परिवार वाले भी रहे हों तो अगर उन धन्वन्तरीयों (डॉक्टर लोगों) की चिकित्सा पर मेरी सामाजिक चिकित्सा भारी पडी रहेगी जब तक तभी तक शांति रहेगी। -----आप यह भी जान लीजिये की आप के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रणेता डॉ केशव राव बलिराव हेडगेवार जब से कार्य कर रहे है उसके एक-दो सौ वर्ष पूर्व से ही नहीं मानव सभ्यता से ही नहीं ऋषि सभ्यता से ही जो लोग स्वयं सेवक रहे हों उन सनातन ब्राह्मण परिवार की अस्मिता पर कभी भी आंच नहीं आनी चाहिए। उस सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण श्री रामानंद/रामप्रशाद मिश्रा, बिशुनपुर-223103 के कुल और सनातन कश्यप गोत्रीय देवव्रत/रामप्रसाद पाण्डेय, रामापुर-223225 के कुल के नाती/पौत्र पर आपने अपना तथाकथित मानववाद/समाजवाद/बहुजनसमाजवाद लागू कर दिया विना अन्तः करण तक विचार किये। आप का समाजवाद/बहुजनसमाजवाद, मानववाद और स्वयंसेवकवाद उस पर लागु होता है जो जीवन में गलती कर चुके होते है पर जिसका जीवन कोरा कागज़ ही रहा या जिसका जीवन और कार्य स्वयं अनुकरणीय हो तो यह आपका स्वयंसेवक का नियम, समाजवाद/बहुजनसमाजवाद और मानववाद उसकी ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए नहीं लगता है। मै यह भी नहीं कह रहा की की जिसका जीवन और कार्य स्वयं अनुकरणीय हो वह आप के कार्य में शुभ कार्य में शामिल भी न हो पर उस पर आप लागू नहीं कर सकते अपना नियम विना उसकी पूर्ण सहमति लिए यह जता कर की वह आप का क्या कर लेगा वरन वह नहीं करेगा कोई और वह उसके बदले करेगा जो 14 वर्ष पहले हुआ आप कितने भी शक्तिशाली होंगे।-----------श्री रामप्रशाद मिश्रा के बड़े पुत्र श्री रामनाथ मिश्रा जो स्वयं में केवल एक संस्कृत शिक्षक रहे हैं और छोटे पुत्र आप के आपातकाल के समय के नैनी, प्रयागराज/अल्लाह-आबाद जेल के प्रथम स्वयंसेवक श्रीपारसनाथ मिश्रा  जिन्होंने श्रीमती इंदिरा के निर्देश के बावजूद पहली स्वयंसेवक शाखा लगवाई थी जेल के द्रिस्टीकोण से वे उनसे बड़े स्वयंसेवक वे खुद थे जिनका पारिवारिक जीवन, कार्य, प्रेरणा, नैतिक आचरण  उस पूरे क्षेत्र में उनको केवल एक नाम पंडित जी आज तक देता है जिनको उन्होंने पढ़ाया हो या न पढ़ाया हो। मेरे लिए दोनों प्रेरणा के श्रोत रहे है अतः मै दोनों लोगों के जीवन को जी लिया पर एक सामान्य जन के लिए यह असहनीय होगा और वह अपना संयम छोड़ जीवन लीला से विदा ले लेगा। --------------------श्री रामप्रशाद पाण्डेय के पुत्र श्री बेचनराम पाण्डेय जो हिन्दुस्तानमिल में तकनीकी सहायक और मिल मालिक के करीबी थे ने तो आप के स्वयंसेवक संघ के आजीवन प्रचारक डॉक्टर अभयचंद पाण्डेय(बैद्य) के पिता की जीवन रक्षा में अल्प काल में ही अपना जीवन गवां बैठे थे क्या यह सब मानवता की सेवा में नहीं आता है ।----------संख्याबल के जीवन को आधुनिक से आधुनिक बनाने के लिए वैज्ञानिक विकास और संख्याबल की गणित साथ नहीं चलते हैं की किशी से वैज्ञानिक विकास भी करवाईये और उसके घर वालों के साथ संख्याबल आधारित बलात्कार जारी रखिये।----Those who want peace and development need to follow the peace and development. 

अगर आप को किशी विषय/वस्तु/प्राणी से प्रेम होगा आपको तभी उसे देखकर और पाकर आप को हर्ष होगा और अगर आप को उस विषय/वस्तु/प्राणी से प्रेम नहीं है उससे देखकर और पाकर तो आप को हर्ष नहीं वरन दुःख/विषाद ही होगा। अतः आनंद, हर्ष से भी ऊपर है जिसमे आप का किशी विषय/वस्तु/प्राणी से डेटैचमेंट(सीधा सम्बन्ध न होते हुए भी) उससे आप को निष्काम प्रेम उत्पन्न होता है और आप इसके फल स्वरुप आनंदित होते हैं।

अगर आप को किशी विषय/वस्तु/प्राणी से प्रेम होगा आपको तभी उसे देखकर और पाकर आप को हर्ष होगा और अगर आप को उस विषय/वस्तु/प्राणी से प्रेम नहीं है उससे देखकर और पाकर तो आप को हर्ष नहीं वरन दुःख/विषाद ही होगा। अतः आनंद, हर्ष से भी ऊपर है जिसमे आप का किशी विषय/वस्तु/प्राणी से डेटैचमेंट(सीधा सम्बन्ध न होते हुए भी) उससे आप को निष्काम प्रेम उत्पन्न होता है और आप इसके फल स्वरुप आनंदित होते हैं।   

गौतम गोत्रीय बड़े भैया विष्णु को भी मै बनारस से ही पहचानता था और उनसे कभी बात नहीं किया हूँ प्रत्यक्ष की उनसे मेरा सम्बन्ध उसी समय से सार्वजनिक न किया जा सके और जिसे आप पहचनवाना चाह रहे थे उस बड़े भाई भी मै पहचान रहा था पर तब बात यह की श्रीरामकोकिल पाण्डेय पुत्र मेरे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सहपाठी और उम्र में छोटेभाई रामबाबू राय(भूमिहार ब्राह्मण), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर और श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय पुत्र विवेक कुमार पाण्डेय, प्रयागराज विश्वविद्यालय में अंतर क्या रहा(यहां यह जान लेना अनिवार्य है की बैंगलोर से लेकर कोलकता तक जब भी मै संपर्क साधा उस भाई ने बिना हिचक और बिना डरे हुए मेरे समर्थन किया मानसिक रूप से यहाँ तक की मेरे एक मौसियेरे भाई का विदेश नौकरी पर जाने के बॉन्ड पर हस्ताक्षर के लिए तैयार थे जबकि दूसरे सगे रिस्तेदार स्वयं भी तैयार नहीं हुए) और यह तब जबकि श्रीश्याममूर्ति पाण्डेय पुत्र मेरे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ही सहपाठी और उम्र में छोटे भाई विनयशंकर(शंकर भगवान का सबसे विनम्रतम स्वरुप) पाण्डेय(सनातन भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण) के अलावा मेरे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के बहुत से लोग तथाकथित विश्व महाशक्ति के डर से डरे हुए मेरा फ़ोन उठाते थे और कभी तो उठाते भी नहीं थे और मै भी बहुत कम लोगों से इस 14 वर्ष के दौरान संपर्क में रहा क्योंकि मै भी नहीं चाहता था की कही मेरे कारन तथाकथित विश्व महाशक्ति के माफिया लोग उनका नुकशान न कर दे मुझसे जुड़ा हुआ जानकार। अंत में केवल इतना बताना चाहूँगा की इस पूरे 14 वर्ष के दौरान जो दो लोग अंतर्मन से मेरे साथ रहे वे ही मेरे अनन्य मित्र है क्योंकि इनको कम से कम इतना विशवास रहा की मै अपने कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होऊंगा। मै सनतान ब्राह्मण से लेकर किशी भी वर्ग के ब्राह्मण भाइयों में उम्र से सबसे ज्येष्ठ था मै जिसका पूरा पता लगा लिया हूँ तो यहां यह बताना चाहता हूँ की मै बाली (न कि बलि) नहीं हूँ की भाई का हक मारूं पर इतना है की मै मानवता की रक्षा हेतु अपनी शक्ति और सहन शक्ति में वृद्धि करता चला गया तो अधिकार की इक्षा से तो नहीं पर मानवता हित सबसे प्रेम जताता हूँ तो भाई और उसके परिवार से भी मेरा वैसा ही स्नेह है मुझे किशी का अधिकार और उत्तराधिकार नहीं चाहिए मुझे जो भी मिला है सर्वश्रेष्ठ है। अतः मेरे दो घोषित अनन्य और निर्भीक मित्र पाण्डेय शब्द की सीमा में ही मिले।-------------अपने उन मित्रों को बताना चाहूँगा की कम से कम अब तो तथाकथित विश्वमहाशक्ति के पिजड़े से आजाद हो जाओ जिसके चक्रव्यूह को मैं तोड़ दिया हूँ सार्वजनिक रूप से। ---------कम से कम मै यही पूरी दुनिआ को बताना चाह रहा था की: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, मुस्लिम, ईसाई व् अन्य-अन्य सब सात ब्रह्मर्षियों/सपतरषियों की ही संतान हैं तो जो सनातन ब्राह्मण है आज तक वह बाप होगा ही होगा। अतः हम हिंदुस्थानी पूरी दुनिया के बाप हैं।

गौतम गोत्रीय बड़े भैया विष्णु को भी मै बनारस से ही पहचानता था और उनसे कभी बात नहीं किया हूँ प्रत्यक्ष की उनसे मेरा सम्बन्ध उसी समय से सार्वजनिक न किया जा सके और जिसे आप पहचनवाना चाह रहे थे उस बड़े भाई भी मै पहचान रहा था पर तब बात यह की श्रीरामकोकिल पाण्डेय पुत्र मेरे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सहपाठी और उम्र में छोटेभाई रामबाबू राय(भूमिहार ब्राह्मण), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर और श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय पुत्र विवेक कुमार पाण्डेय, प्रयागराज विश्वविद्यालय में अंतर क्या रहा(यहां यह जान लेना अनिवार्य है की बैंगलोर से लेकर कोलकता तक जब भी मै संपर्क साधा उस भाई ने बिना हिचक और बिना डरे हुए मेरे समर्थन किया मानसिक रूप से यहाँ तक की मेरे एक मौसियेरे भाई का विदेश नौकरी पर जाने के बॉन्ड पर हस्ताक्षर के लिए तैयार थे जबकि दूसरे सगे रिस्तेदार स्वयं भी तैयार नहीं हुए) और यह तब जबकि श्रीश्याममूर्ति पाण्डेय पुत्र मेरे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ही सहपाठी और उम्र में छोटे भाई विनयशंकर(शंकर भगवान का सबसे विनम्रतम स्वरुप) पाण्डेय(सनातन भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण) के अलावा मेरे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के बहुत से लोग तथाकथित विश्व महाशक्ति के डर से डरे हुए मेरा फ़ोन उठाते थे और कभी तो उठाते भी नहीं थे और मै भी बहुत कम लोगों से इस 14 वर्ष के दौरान संपर्क में रहा क्योंकि मै भी नहीं चाहता था की कही मेरे कारन तथाकथित विश्व महाशक्ति के माफिया लोग उनका नुकशान न कर दे मुझसे जुड़ा हुआ जानकार। अंत में केवल इतना बताना चाहूँगा की इस पूरे 14 वर्ष के दौरान जो दो लोग अंतर्मन से मेरे साथ रहे वे ही मेरे अनन्य मित्र है क्योंकि इनको कम से कम इतना विशवास रहा की मै अपने कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होऊंगा। मै सनतान ब्राह्मण से लेकर किशी भी वर्ग के ब्राह्मण भाइयों में उम्र से सबसे ज्येष्ठ था मै जिसका पूरा पता लगा लिया हूँ तो यहां यह बताना चाहता हूँ की मै बाली (न कि बलि) नहीं हूँ की भाई का हक मारूं पर इतना है की मै मानवता की रक्षा हेतु अपनी शक्ति और सहन शक्ति में वृद्धि करता चला गया तो अधिकार की इक्षा से तो नहीं पर मानवता हित सबसे प्रेम जताता हूँ तो भाई और उसके परिवार से भी मेरा वैसा ही स्नेह है मुझे किशी का अधिकार और उत्तराधिकार नहीं चाहिए मुझे जो भी मिला है सर्वश्रेष्ठ है। अतः मेरे दो घोषित अनन्य और निर्भीक मित्र पाण्डेय शब्द की सीमा में ही मिले।-------------अपने उन मित्रों को बताना चाहूँगा की कम से कम अब तो तथाकथित विश्वमहाशक्ति के पिजड़े से आजाद हो जाओ जिसके चक्रव्यूह को मैं तोड़ दिया हूँ सार्वजनिक रूप से। ---------कम से कम मै यही पूरी दुनिआ को बताना चाह रहा था की: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, मुस्लिम, ईसाई व् अन्य-अन्य सब सात ब्रह्मर्षियों/सपतरषियों की ही संतान हैं तो जो सनातन ब्राह्मण है आज तक वह बाप होगा ही होगा। अतः हम हिंदुस्थानी पूरी दुनिया के बाप हैं।

Friday, March 20, 2015

It is reality that Prayagraj/Allahabad(Allaha-Aabaad) is the place of Lord Vishnu(having Lotus+Sudarshan Chakra+Shankh+Gadaa in hand and sleeping on the Sheshnag in the presence of Goddess Lakshmi in the Ksheersagar means Ksheersagar's that part was/is Prayagraj) and Lord Brahma(Seated on the Hansh which need not any fixed place but due to Goddess Saraswati and origin of Saptarshi/Sapt-Brahmarshi here in Prayagraj he is also recognized by palce Prayagraj) while Kashi is the place of Lord Shiva/Kedareshwar/ Mahamrityunjay/Vishveshwar (Vishwanath)(seated on the Bullock/OX)| The actual place of Ocean Churing(Samudramanthan) is the Prayagraj at that time as Demon's leading King Bali was from Balia District of the present Uttar Pradesh and also place of Bhrigu bhoomi is known as Balia| Bhrigu's one of the son/grandson/grand-grandson was Demon's Guru, Shukracharya| On another side one of his main son Jamadagni's bhoomi is Jamadagnipur/Jaunpur which is the greatest place in the world in-form of the Education, Culture and Religious matter and whose son Parashuram(one of the Vishnu Incarnation) cultivated the whole India with his knowledge but obeyed his father's word not to come in Jamadagnipur/Jaunpur at any cost.

It is reality that Prayagraj/Allahabad(Allaha-Aabaad) is the place of Lord Vishnu(having Lotus+Sudarshan Chakra+Shankh+Gadaa in hand and sleeping on the Sheshnag in the presence of Goddess Lakshmi in the Ksheersagar means Ksheersagar's that part was/is Prayagraj) and Lord Brahma(Seated on the Hansh which need not any fixed place but due to Goddess Saraswati and origin of Saptarshi/Sapt-Brahmarshi here in Prayagraj he is also recognized by palce Prayagraj) while Kashi is the place of Lord Shiva/Kedareshwar/ Mahamrityunjay/Vishveshwar (Vishwanath)(seated on the Bullock/OX)| The actual place of Ocean Churing(Samudramanthan) is the Prayagraj at that time as Demon's leading King Bali was from Balia District of the present Uttar Pradesh and also place of Bhrigu bhoomi is known as Balia| Bhrigu's one of the son/grandson/grand-grandson was Demon's Guru, Shukracharya| On another side one of his main son Jamadagni's bhoomi is Jamadagnipur/Jaunpur which is the greatest place in the world in-form of the Education, Culture and Religious matter and whose son Parashuram(one of the Vishnu Incarnation)  cultivated the whole India with his knowledge but obeyed his father's word not to come in Jamadagnipur/Jaunpur at any cost.

Thursday, March 19, 2015

व्यवहारिक न की केवल दार्शनिक विचारों से प्रेरित वक्तव्य है यह की "नियमित जीवन से अच्छा कोई जीवन नहीं और गरीबी सम्पन्नता की तुलनात्मक अवस्था होती है पर दरिद्रता से बड़ा कोई जीवन शून्य नहीं होता है"। इसीलिये जिसके पास कुछ न हो केवल ज्ञान हो तो भी वह दरिद्र नहीं केवल गरीब कहा जा सकता है और इसीलिये श्रीकृष्ण ने सुदामा को गरीब बताया, न की दरिद्र, जैसा की जन सामान्य उनको दरिद्र कहते हैं। श्रीकृष्ण ने कहा जो स्वयं ज्ञान बाँटता हो और भिक्षा लेता हो वह दरिद्र नहीं हो सकता अपितु वह तो केवल गरीब ही कहा जा सकता है। सुदामा मुझे भजता/मेरे नाम का जाप करता है पर अपने पुराने जन्म के पापों से लदा है। अतः उसको मेरी वास्तविक याद तब आएगी जब उसके पूर्व जन्म के सब पाप उसके ज्ञान वितरण से कट जाएंगे।



व्यवहारिक न की केवल दार्शनिक विचारों से प्रेरित वक्तव्य है यह की "नियमित जीवन से अच्छा कोई जीवन नहीं और गरीबी सम्पन्नता की तुलनात्मक अवस्था होती है पर दरिद्रता से बड़ा कोई जीवन शून्य नहीं होता है"। इसीलिये जिसके पास कुछ न हो केवल ज्ञान हो तो भी वह दरिद्र नहीं केवल गरीब कहा जा सकता है और इसीलिये श्रीकृष्ण ने सुदामा को गरीब बताया, न की दरिद्र, जैसा की जन सामान्य उनको दरिद्र कहते हैं। श्रीकृष्ण ने कहा जो स्वयं ज्ञान बाँटता हो और भिक्षा लेता हो वह दरिद्र नहीं हो सकता अपितु वह तो केवल गरीब ही कहा जा सकता है। सुदामा मुझे भजता/मेरे नाम का जाप करता है पर अपने पुराने जन्म के पापों से लदा है। अतः उसको मेरी वास्तविक याद तब आएगी जब उसके पूर्व जन्म के सब पाप उसके ज्ञान वितरण से कट जाएंगे।

Wednesday, March 18, 2015

धर्मनिरपेक्षिता का मतलब क्या हिन्दुओं और विशेष कर ब्राह्मणो(जो सनातन संस्कृति के रक्षक की प्रथम दीवार हैं) का दमन है ही रह गया था क्या उस समय? और इसी लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और यहां तक की इससे जन्मे अन्य पंथ तक की रक्षा में मुझे आना पड़ा इस विश्व समाज पर मंडराने वाले खतरे को कम करने के लिए|-------------जिसको भी आपत्ति हो मेरे ब्लॉग पर वह स्वाभिक प्रतिक्रिया विश्व के हर न्याययालय में दाखिल कर सकता है मै सहर्ष अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकता हूँ बिना किशी की न्यायिक सहायता लिए। मै तो यही सब लिखते-लिखते डॉन(भगवा) भाई की कृपा से प्रयागराज विश्वविद्यालय में शिक्षक बन गया तो अब डॉन (भगवा) भाई की रक्षा में बाहर जाना पड़े तो भी मै सहर्ष तैयार हूँ। रही बात मेरे सन्देश की तो दुनिआ का जो न्यायलय या न्यायमूर्ति एक हिन्दू ब्राह्मण की पुत्री का विवाह सामाजिक, धार्मिक और संवैधािन रूप से एक गैर ब्राह्मण, गैर क्षत्रिय, गैर वैश्य या गैर इनके मिश्रण से हिन्दू शास्त्रीय नियम(विधि-विधान से सगे सम्बन्धियों समेत वर-वधु के पाँवपूजा सहित मतलब अपने तो अपने परन्तु अपने परिचितों और सगे सम्बन्धियों से भी ऐसा करवाता है) से करवाता है और उसको मान्यता देता है और पुनः उस वर-वधु को गैर ब्राह्मण, गैर क्षत्रिय, गैर वैश्य या गैर इनके मिश्रण को मिलाने वाले संवैधानिक सहायता प्राप्त सूची में शामिल करता है उस देश में जहा जाती आधारित शासकीय सहायता जारी है तो यह कौन सा न्यायालय, कौन सा संविधान और कौन से न्यायमूर्ति जो इस विवाह को मान्यता देते है जो धार्मिक रूप से मान्य ही नहीं है। धर्मनिरपेक्षिता का मतलब क्या हिन्दुओं और विशेष कर ब्राह्मणो(जो सनातन संस्कृति के रक्षक की प्रथम दीवार हैं) का दमन है ही रह गया था क्या उस समय? और इसी लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और यहां तक की इससे जन्मे अन्य पंथ तक की रक्षा में मुझे आना पड़ा इस विश्व समाज पर मंडराने वाले खतरे को कम करने के लिए। अब मुझे कुछ नहीं कहना रह गया है किशी विशेष सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए इसलिए मैंने पूर्णाहुति की बात लिखी है जिसका यह मतलब नहीं की मै कुछ लिखूंगा ही नहीं। हाँ सामान्य जन जीवन से प्रभावित हो कुछ लिख भी सकता हूँ।

धर्मनिरपेक्षिता का मतलब क्या हिन्दुओं और विशेष कर ब्राह्मणो(जो सनातन संस्कृति के रक्षक की प्रथम दीवार हैं) का दमन है ही रह गया था क्या उस समय? और इसी लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और यहां तक की इससे जन्मे अन्य पंथ तक की रक्षा में मुझे आना पड़ा इस विश्व समाज पर मंडराने वाले खतरे को कम करने के लिए|-------------जिसको भी आपत्ति हो मेरे ब्लॉग पर वह स्वाभिक प्रतिक्रिया विश्व के हर न्याययालय में दाखिल कर सकता है मै सहर्ष अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकता हूँ बिना किशी की न्यायिक सहायता लिए। मै तो यही सब लिखते-लिखते डॉन(भगवा) भाई की कृपा से प्रयागराज विश्वविद्यालय में शिक्षक बन गया तो अब डॉन (भगवा) भाई की रक्षा में बाहर जाना पड़े तो भी मै सहर्ष तैयार हूँ। रही बात मेरे सन्देश की तो दुनिआ का जो न्यायलय या न्यायमूर्ति एक हिन्दू ब्राह्मण की पुत्री का विवाह सामाजिक, धार्मिक और संवैधािन रूप से एक गैर ब्राह्मण, गैर क्षत्रिय, गैर वैश्य या गैर इनके मिश्रण से हिन्दू शास्त्रीय नियम(विधि-विधान से सगे सम्बन्धियों समेत वर-वधु के पाँवपूजा सहित मतलब अपने तो अपने परन्तु अपने परिचितों और सगे सम्बन्धियों से भी ऐसा करवाता है) से करवाता है और उसको मान्यता देता है और पुनः उस वर-वधु को गैर ब्राह्मण, गैर क्षत्रिय, गैर वैश्य या गैर इनके मिश्रण को मिलाने वाले संवैधानिक सहायता प्राप्त सूची में शामिल करता है उस देश में जहा जाती आधारित शासकीय सहायता जारी है तो यह कौन सा न्यायालय, कौन सा संविधान और कौन से न्यायमूर्ति जो इस विवाह को मान्यता देते है जो धार्मिक रूप से मान्य ही नहीं है। धर्मनिरपेक्षिता का मतलब क्या हिन्दुओं और विशेष कर ब्राह्मणो(जो सनातन संस्कृति के रक्षक की प्रथम दीवार हैं) का दमन है ही रह गया था क्या उस समय? और इसी लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और यहां तक की इससे जन्मे अन्य पंथ तक की रक्षा में मुझे आना पड़ा इस विश्व समाज पर मंडराने वाले खतरे को कम करने के लिए। अब मुझे कुछ नहीं कहना रह गया है किशी विशेष सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए इसलिए मैंने पूर्णाहुति की बात लिखी है जिसका यह मतलब नहीं की मै कुछ लिखूंगा ही नहीं। हाँ सामान्य जन जीवन से प्रभावित हो कुछ लिख भी सकता हूँ।

कम से कम कोई यज्ञ कैसे सफल होता है और उसका सञ्चालन कैसे किया जाय इसका अधिकार तो पाण्डेय के पास रहता ही है। अतः 1997 से सुरु किया हुआ यज्ञ(समुद्रमंथन) आज (18-03-2015) अपनी पूर्णाहुति को प्राप्त हुआ विश्व समाज के विश्वव्यापक परिवर्तन के साथ जिसमे की न्यूनतम हानि और अधिकतम मानवीय सम्पन्नता प्राप्त हुई संभावित भीषण विनाश के स्थान पर। इसे विषामृत को "Vivekanand and Modern Tradition" के रूप में मै प्रस्तुत किया हूँ जिसमे सप्ताह दिवस(समय) को को ध्यान में रखते हुए इसका आसय निकला जाय प्रयागराज(विश्व के केंद्र बिंदु) को निर्देशांक(स्थान) मानते हुए। उसके अनुरूप सार्वजनिक मानदंड पर उसे रखते हुए स्थानीय अभिप्राय लिया जाय जाती/धर्म/सम्प्रदाय के निरपेक्ष भाव में किन्तु उन तथ्यों को सम्मिलित किये हुए लिखे गए इस ब्लॉग से। --------------------मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

कम से कम कोई यज्ञ कैसे सफल होता है और उसका सञ्चालन कैसे किया जाय इसका अधिकार तो पाण्डेय के पास रहता ही है। अतः 1997 से सुरु किया हुआ यज्ञ(समुद्रमंथन) आज (18-03-2015) अपनी पूर्णाहुति को प्राप्त हुआ विश्व समाज के विश्वव्यापक परिवर्तन के साथ जिसमे की न्यूनतम हानि और अधिकतम मानवीय सम्पन्नता प्राप्त हुई संभावित भीषण विनाश के स्थान पर। इसे विषामृत को "Vivekanand and Modern Tradition" के रूप में मै प्रस्तुत किया हूँ जिसमे सप्ताह दिवस(समय) को को ध्यान में रखते हुए इसका आसय निकला जाय प्रयागराज(विश्व के केंद्र बिंदु) को निर्देशांक(स्थान) मानते हुए। उसके अनुरूप सार्वजनिक मानदंड पर उसे रखते हुए स्थानीय अभिप्राय लिया जाय जाती/धर्म/सम्प्रदाय के निरपेक्ष भाव में किन्तु उन तथ्यों को सम्मिलित किये हुए लिखे गए इस ब्लॉग से। --------------------मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

सप्तर्षि/सप्तब्रह्मर्षि आंगिरस के वंसज भारद्वाज ऋषि सभी जाती संप्रदाय के अपने शिष्यों को प्रयागराज में गर्ग गोत्रीय ब्राह्मण का दर्जा दे दिए हैं तो उसमे से कुछ तो सामाजिक परिवर्तन प्रक्रिया के तहत बाहर जाएंगे ही। Notable:--- जिसको ब्राह्मण शब्द की गरिमा और गौरव न मालूम हो और ज़रा सा त्याग इसके लिए न कर सके तो वह इसे/इस समुदाय को छोड़ ही दे तो श्रेष्कर ही होगा। ब्राह्मण का शाकाहारी होना श्रेष्कर है पर यदि हम शाकाहारी होकर वह काम करें जिससे की मानवता की ही ह्त्या हो तो उससे अच्छा वह मांसाहारी ही है जो जानवरों के मांस तक ही सिमित है पर मानवता का सृजन करता है। फिर भी मै एक ब्राह्मण के लिए मांसाहार को श्रेष्कर नहीं मानता। कश्यप तो पूरे विश्व के जाती, सम्प्रदाय और सभी संभावित विश्व समुदाय को सनातन हिन्दू धर्म में पुनः मिलाते है और कश्यप गोत्रीय बनाते है सबको पर उनको सीधे ब्राह्मण का दर्जा नहीं देते हैं और गलती पर कठोर से कठोर दंड देते है जिससे सनातन धर्म में आने वाले और रहने वाले का सुधर हो और इस सुधार के कार्य में हानि और लाभ नहीं देखते है। गौतम गोत्रीय क्षत्रिय शिद्धार्थ गौतम भी सबको मिलाते है सनातन धर्म में बौद्ध मत के आधार पर लेकिन किशी को ज्यादा से ज्यादा क्षत्रिय समान बनाते है न की ब्राह्मण।

सप्तर्षि/सप्तब्रह्मर्षि आंगिरस के वंसज भारद्वाज ऋषि सभी जाती संप्रदाय के अपने शिष्यों को प्रयागराज में गर्ग गोत्रीय ब्राह्मण का दर्जा दे दिए हैं तो उसमे से कुछ तो सामाजिक परिवर्तन प्रक्रिया के तहत बाहर जाएंगे ही। Notable:--- जिसको ब्राह्मण शब्द की गरिमा और गौरव न मालूम हो और ज़रा सा त्याग इसके लिए न कर सके तो वह इसे/इस समुदाय को छोड़ ही दे तो श्रेष्कर ही होगा। ब्राह्मण का शाकाहारी होना श्रेष्कर है पर यदि हम शाकाहारी होकर वह काम करें जिससे की मानवता की ही ह्त्या हो तो उससे अच्छा वह मांसाहारी ही है जो जानवरों के मांस तक ही सिमित है पर मानवता का सृजन करता है। फिर भी मै  एक ब्राह्मण के लिए मांसाहार को श्रेष्कर नहीं मानता। कश्यप तो पूरे विश्व के जाती, सम्प्रदाय और सभी संभावित विश्व समुदाय को सनातन हिन्दू धर्म में पुनः मिलाते है और कश्यप गोत्रीय बनाते है सबको पर उनको सीधे ब्राह्मण का दर्जा नहीं देते हैं और गलती पर कठोर से कठोर दंड देते है जिससे सनातन धर्म में आने वाले और रहने वाले का सुधर हो और इस सुधार के कार्य में हानि और लाभ नहीं देखते है।  गौतम गोत्रीय क्षत्रिय शिद्धार्थ गौतम भी सबको मिलाते है  सनातन धर्म में बौद्ध मत के आधार पर लेकिन किशी को ज्यादा से ज्यादा क्षत्रिय समान बनाते है न की ब्राह्मण। 

Tuesday, March 17, 2015

मानव समाज को साक्षात्कार: गिरने लगोगे तो सागर के नीछे भी जाने का भी रास्ता मिल जाएगा पर अगर ऊपर जाते हो तो पृथ्वी(प्रकृति) स्वयं आप को अपनी तरफ खींचती है और इस प्रकार ऊपर जाने से रोकती है।यही नियम मानव समाज के हर व्यक्ति के नैतिक उत्थान और पतन पर लागू होता है।

मानव समाज को साक्षात्कार: गिरने लगोगे तो सागर के नीछे भी जाने का भी रास्ता मिल जाएगा पर अगर ऊपर जाते हो तो पृथ्वी(प्रकृति) स्वयं आप को अपनी तरफ खींचती है और इस प्रकार ऊपर जाने से रोकती है।यही नियम मानव समाज के हर व्यक्ति के नैतिक उत्थान और पतन पर लागू होता है। 

जिनके कर्तव्यों से आसुरी शक्तियों को बल मिला हो, मिल रहा हो और उनके कार्यों से लगता हो की भविष्य में भी मिलेगा तो ऐसे में अति निकट संबंधों के निर्वहन की बाधा से उबरने हेतु यदि विरोध में न आ जाया जा सके तो ऐसी स्थिति में मित्रता के बदले तटस्थता अपना लेना ही एक मात्र मानवता है जिससे आप की शक्तियों का दुरुपयोग आसुरी शक्तियों को अपने हित प्रयोग करने वाले नहीं कर सकें। Focus on: आदौ माता गुरोः पत्नी ब्राह्मणी राजपलिका । धेनुर्धात्री तथा प्रूथ्वी सप्तैता मातरः स्मृतः ॥ One who gave you birth, teacher's wife, wife of a Brahmin, wife of a king, cow, nurse, and the earth are known as the seven [distinguished] mothers. Here, the word 'mother' connotes respect we have for somebody.

जिनके कर्तव्यों से आसुरी शक्तियों को बल मिला हो, मिल रहा हो और उनके कार्यों से लगता हो की भविष्य में भी मिलेगा तो ऐसे में अति निकट संबंधों के निर्वहन की बाधा से उबरने हेतु यदि विरोध में न आ जाया जा सके तो ऐसी स्थिति में मित्रता के बदले तटस्थता अपना लेना ही एक मात्र मानवता है जिससे आप की शक्तियों का दुरुपयोग आसुरी शक्तियों को अपने हित प्रयोग करने वाले नहीं कर सकें। Focus on:
आदौ माता गुरोः पत्नी ब्राह्मणी राजपलिका ।
धेनुर्धात्री तथा प्रूथ्वी सप्तैता मातरः स्मृतः ॥
One who gave you birth, teacher's wife, wife of a Brahmin, wife of a king, cow, nurse, and the earth are known as the seven [distinguished] mothers. Here, the word 'mother' connotes respect we have for somebody.

This is well known Fact in this world that Moon seeks it energy(Kant/Kanti) of glory from the Sun although it is very close to the life of a man. And This Sun seeks its Energy (Kant/Kanti) from the Parambrahm/Brahm i.e. from Surykant/Pradeep(spontaneous source of light)/Satyanarayan/Isnarayan/Lakshmi-Narayan/Ramjanaki .

This is well known Fact in this world that Moon seeks it energy(Kant/Kanti) of glory from the Sun although it is very close to the life of a man. And This Sun seeks its Energy (Kant/Kanti) from the Parambrahm/Brahm i.e. from Surykant/Pradeep(spontaneous source of light)/Satyanarayan/Isnarayan/Lakshmi-Narayan/Ramjanaki .

Monday, March 16, 2015

रत्नाकरधौतपदां हिमालयकिरीटिनीम् । ब्रह्मराजर्षिररत्नाढ्यां वन्दे भारतमातरम् ॥ To her whose feet are washed by the ocean, who wears the Himalayas as her crown, and is adorned with the gems of rishis and kings, to Mother India, do I bow down in respect.

रत्नाकरधौतपदां हिमालयकिरीटिनीम् ।
ब्रह्मराजर्षिररत्नाढ्यां वन्दे भारतमातरम् ॥
To her whose feet are washed by the ocean, who wears the Himalayas as her crown, and is adorned with the gems of rishis and kings, to Mother India, do I bow down in respect.

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ Meaning: 1: Om, May All become Happy, 2: May All be Free from Illness. 3: May All See what is Auspicious, 4: May no one Suffer. 5: Om Peace, Peace, Peace.



ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
Meaning:
1: Om, May All become Happy,
2: May All be Free from Illness.
3: May All See what is Auspicious,
4: May no one Suffer.
5: Om Peace, Peace, Peace.

न तु अहं कामये राज्यं न स्वर्गं न अपुनर्भवम् । कामये दुःखतप्तानां प्राणिनाम् आर्तिनाशनम् ॥ King Rantideva in the Shrimad Bhagvatam pleads with God in the following words: "I do not desire kingdom, nor the heaven or even liberation (mokSha). I have only one desire and that is to remove the misery of all living beings who are suffering." This shloka also appears in the Dronaparvan of Mahabharata.

न तु अहं कामये राज्यं न स्वर्गं न अपुनर्भवम् ।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनाम् आर्तिनाशनम् ॥
King Rantideva in the Shrimad Bhagvatam pleads with God in the following words: "I do not desire kingdom, nor the heaven or even liberation (mokSha). I have only one desire and that is to remove the misery of all living beings who are suffering." This shloka also appears in the Dronaparvan of Mahabharata.

मै कितना भी प्रयास करूँ सनातन ब्राह्मण से ऊपर क्या बनूंगा और चारों वेदों और अट्ठारह पुराण और अन्य सनातन ग्रन्थ और पांडुलिपियों से ज्यादा शोध कर क्या समाज को दिया जा सकेगा और संकलित क्या सकेगा केवल उसी ज्ञान को प्रयोगशाला के माध्यम से जीवित रहे जाने के शिवा पर इतना प्रयास जरूर करता रहूँगा की सनातन ब्राह्मण अब बना रहूँ पुनः 5 हजार वर्ष पूर्व का सूर्यवंशी ग्वाला(शिवशक्ति में दम्भित, मद्यप और दिग्भ्रमित शिवांश राजा केदार को केदारनाथ और पशुपतिनाथ बनाने वाला। जिनका प्रयागराज में पुनर्मिलन हो गया है केदारेश्वर के रूप में) पुनः न बनाना पड़े। और इसी हेतु भारतीय व् विश्व समाज की मनोचिकित्षा हेतु और सामाजिक पर्यावरण विज्ञान को सामाजिक पर्यावरण की रक्षा हेतु मै ऑरकुट(प्रयाग+बंगलुरु+प्रयाग) और फेसबुक(प्रयाग) तथा "Vivekanand and Modern Tradition"(बेंगलुरु+प्रयाग) को लिखता मिटाता रहा हूँ पर अब यह"Vivekanand and Modern Tardition" नहीं मिटाया जाएगा मेरे द्वारा।



मै कितना भी प्रयास करूँ सनातन ब्राह्मण से ऊपर क्या बनूंगा और चारों वेदों और अट्ठारह पुराण और अन्य सनातन ग्रन्थ और पांडुलिपियों से ज्यादा शोध कर क्या समाज को दिया जा सकेगा और संकलित क्या सकेगा केवल उसी ज्ञान को प्रयोगशाला के माध्यम से जीवित रहे जाने के शिवा पर इतना प्रयास जरूर करता रहूँगा की सनातन ब्राह्मण अब बना रहूँ पुनः 5 हजार वर्ष पूर्व का सूर्यवंशी ग्वाला(शिवशक्ति में दम्भित, मद्यप और दिग्भ्रमित शिवांश राजा केदार को केदारनाथ और पशुपतिनाथ बनाने वाला। जिनका प्रयागराज में पुनर्मिलन हो गया है केदारेश्वर के रूप में) पुनः न बनाना पड़े। और इसी हेतु भारतीय व् विश्व समाज की मनोचिकित्षा हेतु और सामाजिक पर्यावरण विज्ञान को सामाजिक पर्यावरण की रक्षा हेतु मै ऑरकुट(प्रयाग+बंगलुरु+प्रयाग) और फेसबुक(प्रयाग) तथा "Vivekanand and Modern Tradition"(बेंगलुरु+प्रयाग) को लिखता मिटाता रहा हूँ पर अब यह"Vivekanand and Modern Tardition" नहीं मिटाया जाएगा मेरे द्वारा।

दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते । यादृशं भक्षयेदन्नं जायते तादृशी प्रजा ॥ The lamp 'consumes' darkness and generates soot. The type of food you eat has a corresponding influence on the offspring.



दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते ।
यादृशं भक्षयेदन्नं जायते तादृशी प्रजा ॥
The lamp 'consumes' darkness and generates soot. The type of food you eat has a corresponding influence on the offspring.

कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीनां रूपं पतिव्रतम् । विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ॥ The cuckoo's beauty is in its voice, woman's beauty is in her dedication to family/husband ('pativrata'). Knowledge is embellishment for an ugly person and forgiving is the badge of honor for sages (tapasvin).



कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीनां रूपं पतिव्रतम् ।
विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ॥
The cuckoo's beauty is in its voice, woman's beauty is in her dedication to family/husband ('pativrata'). Knowledge is embellishment for an ugly person and forgiving is the badge of honor for sages (tapasvin).

किम् अपि अस्ति स्वभावेन सुन्दरं वा अपि असुन्दरम् । यग् एव रोचते यस्मै भवेत् तत् तस्य सुन्दरम् ॥ Is whatever that exists in this world beautiful or ugly by its very nature? Of course not! Something only becomes beautiful because someone fancies it. For example a ugly looking child is yet loved very much by his/her mother.

किम् अपि अस्ति स्वभावेन सुन्दरं वा अपि असुन्दरम् ।
यग् एव रोचते यस्मै भवेत् तत् तस्य सुन्दरम् ॥
Is whatever that exists in this world beautiful or ugly by its very nature? Of course not! Something only becomes beautiful because someone fancies it. For example a ugly looking child is yet loved very much by his/her mother.

बुद्धिः प्रभावः तेजश्च सत्वमुत्थानमेवच । व्यवसायश्रच यस्यास्ति तस्य वृत्तिभयं कुतः ॥ Vidura observes in the Mahabharata that one who has the brain, chivalry, poise, power, enthusiasm and willingness to work; need not worry about how to earn a living.

बुद्धिः प्रभावः तेजश्च सत्वमुत्थानमेवच ।
व्यवसायश्रच यस्यास्ति तस्य वृत्तिभयं कुतः ॥
Vidura observes in the Mahabharata that one who has the brain, chivalry, poise, power, enthusiasm and willingness to work; need not worry about how to earn a living.

अकालो नास्ति धर्मस्य जीविते चञ्चले सति । गृहीतः इव केशेषु मृत्युना धर्मम् आचरेत् ॥ Since this life is full of uncertainty and unpredictability, no time is unworthy for living as mandated by dharma. Live therefore according to dharma thinking as if death has you by the hair. Since death can come anytime always do good things. It should not happen that due to early death your wish to live the life of dharma remains mere wish. One must not wait for any favorable time ('muhUrta') at which to start a virtuous life.

अकालो नास्ति धर्मस्य जीविते चञ्चले सति ।
गृहीतः इव केशेषु मृत्युना धर्मम् आचरेत् ॥
Since this life is full of uncertainty and unpredictability, no time is unworthy for living as mandated by dharma. Live therefore according to dharma thinking as if death has you by the hair. Since death can come anytime always do good things. It should not happen that due to early death your wish to live the life of dharma remains mere wish. One must not wait for any favorable time ('muhUrta') at which to start a virtuous life.

गुणैरुत्तमतांयाति नोच्चैरासनसस्थितः । प्रासादशिखरस्थोपि काकः किं गरुडायते ॥ Worth of a person is not determined by one’s location (status) but by his/her qualities. For instance, will a crow become an eagle by mere;y sitting on the top of palace?

गुणैरुत्तमतांयाति नोच्चैरासनसस्थितः ।
प्रासादशिखरस्थोपि काकः किं गरुडायते ॥
Worth of a person is not determined by one’s location (status) but by his/her qualities. For instance, will a crow become an eagle by mere;y sitting on the top of palace?

दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् । सत्यपूता वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥ In this verse Chanakya explains what device is to be used to secure or purify different things. Secure your step, he says, by watching carefully before you step further. Strain your drink water with a cloth, your speech with truth (satya) and behavior by disciplining the mind.

दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।
सत्यपूता वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥
In this verse Chanakya explains what device is to be used to secure or purify different things. Secure your step, he says, by watching carefully before you step further. Strain your drink water with a cloth, your speech with truth (satya) and behavior by disciplining the mind.

आदौ माता गुरोः पत्नी ब्राह्मणी राजपलिका । धेनुर्धात्री तथा प्रूथ्वी सप्तैता मातरः स्मृतः ॥ One who gave you birth, teacher's wife, wife of a Brahmin, wife of a king, cow, nurse, and the earth are known as the seven [distinguished] mothers. Here, the word 'mother' connotes respect we have for somebody

आदौ माता गुरोः पत्नी ब्राह्मणी राजपलिका ।
धेनुर्धात्री तथा प्रूथ्वी सप्तैता मातरः स्मृतः ॥
One who gave you birth, teacher's wife, wife of a Brahmin, wife of a king, cow, nurse, and the earth are known as the seven [distinguished] mothers. Here, the word 'mother' connotes respect we have for somebody

ग्रहणां चरितं सवप्नो अनिमित्तानि उपयाचितम् । फलन्ति काकतालियं तेभ्यः प्राज्ञाः न बिभ्यति ॥ Results or effects may often be attributed to such causative factors as planetary motions, (bad/good) dreams or omens, bad signs, prayers to deity. But really speaking these are just like the coincidence of a crow perching on the branch of a tree which then breaks and falls to the ground (kakataliya nyaya) (The branch does not fall down due to the weight of the crow.



ग्रहणां चरितं सवप्नो अनिमित्तानि उपयाचितम् ।
फलन्ति काकतालियं तेभ्यः प्राज्ञाः न बिभ्यति ॥
Results or effects may often be attributed to such causative factors as planetary motions, (bad/good) dreams or omens, bad signs, prayers to deity. But really speaking these are just like the coincidence of a crow perching on the branch of a tree which then breaks and falls to the ground (kakataliya nyaya) (The branch does not fall down due to the weight of the crow.

गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणम् वा बहुश्रुतं । आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयान् ॥ A terrorist must be killed without any (second) thought, even if he happens to be your teacher, a child, an old person, a Brahmin or erudite scholar.

गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणम् वा बहुश्रुतं ।
आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयान् ॥
A terrorist must be killed without any (second) thought, even if he happens to be your teacher, a child, an old person, a Brahmin or erudite scholar.

ये कोचिद् दुःखिता लोके सर्वे ते स्वसुखेच्छया ये कोचिद् सुखिता लोके सर्वे ते अन्यसुखेच्छया ॥ Those who are unhappy in this world are so because of desire for their own happiness. Those who are happy in this world are so because of desire to render others happy.



ये कोचिद् दुःखिता लोके सर्वे ते स्वसुखेच्छया
ये कोचिद् सुखिता लोके सर्वे ते अन्यसुखेच्छया ॥
Those who are unhappy in this world are so because of desire for their own happiness. Those who are happy in this world are so because of desire to render others happy.

षड् गुणाः पुरुषेणह त्यक्तव्या न कदाचन । सत्यं दानम् अनालस्यम् अनसूया क्षमा धृतिः ॥ One should never abandon the following six qualities: truth (sticking to truth), generosity, activeness, freedom from envy, tolerance, and forbearance.

षड् गुणाः पुरुषेणह त्यक्तव्या न कदाचन ।
सत्यं दानम् अनालस्यम् अनसूया क्षमा धृतिः ॥
One should never abandon the following six qualities: truth (sticking to truth), generosity, activeness, freedom from envy, tolerance, and forbearance.

पात्रे त्यागी गुणो रागी संविभागी च बन्धुषु । शास्त्रे बोद्धा रणो योद्धा स वै पुरुष उच्यते ॥ A true 'man' (PuruSha) is one who donates to a deserving person, appreciates good qualities in others, shares joys and sorrows with friends, accumulates knowledge of science, and is excellent warrior on the battlefield.

पात्रे त्यागी गुणो रागी संविभागी च बन्धुषु ।
शास्त्रे बोद्धा रणो योद्धा स वै पुरुष उच्यते ॥
A true 'man' (PuruSha) is one who donates to a deserving person, appreciates good qualities in others, shares joys and sorrows with friends, accumulates knowledge of science, and is excellent warrior on the battlefield.

शुचित्वं त्यागिता शौर्य सामान्यं सुखदुःखयोः । दाक्षिण्यञ्चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः ॥ The qualities of a true friend are: purity, generosity, chivalry, equally poised in happiness and distress, politeness, affection, and truthfulness. The purport of this subhAShita is not that we have to make people of such qualities our friends, but that we need to make such qualities our own, for then only will we naturally attract virtuous people to become our friends

शुचित्वं त्यागिता शौर्य सामान्यं सुखदुःखयोः ।
दाक्षिण्यञ्चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः ॥
The qualities of a true friend are: purity, generosity, chivalry, equally poised in happiness and distress, politeness, affection, and truthfulness. The purport of this subhAShita is not that we have to make people of such qualities our friends, but that we need to make such qualities our own, for then only will we naturally attract virtuous people to become our friends

आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः । क्षिप्रम् अकियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ॥ Whatever you have to pay back to others or whichever task has to be done by you, please do it in the expected time and without delay. If you do not do it in assigned time then the relevance of that work vanishes (i.e. it will have no impact (impact is here equated with rasa essence).

आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः ।
क्षिप्रम् अकियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ॥
Whatever you have to pay back to others or whichever task has to be done by you, please do it in the expected time and without delay. If you do not do it in assigned time then the relevance of that work vanishes (i.e. it will have no impact (impact is here equated with rasa essence).

लक्ष्मीः चन्द्राद् अपेयाद् वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् । अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञाम् अहं पितुः ॥ These are the words uttered by Shri Rama when he is about to go into exile for fourteen years ('vanavAsa'). "It may happen that brightness leaves the Moon or that ice leaves its abode in the Himalaya or that the sea exceeds its limits.... But it is never possible that I will break the promise I made to my father."



लक्ष्मीः चन्द्राद् अपेयाद् वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् ।
अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञाम् अहं पितुः ॥
These are the words uttered by Shri Rama when he is about to go into exile for fourteen years ('vanavAsa'). "It may happen that brightness leaves the Moon or that ice leaves its abode in the Himalaya or that the sea exceeds its limits.... But it is never possible that I will break the promise I made to my father."

Sunday, March 15, 2015

सूर्यवंशीय भगवान श्रीराम(दशरथ=कश्यप का मानवातार) के पूर्वज राजा सगर ने वरुणदेव(कश्यप ऋषि से पुत्र) की तपस्या कर सागर की उत्पत्ति की जिससे स्वरुप है सभी महासागर तो क्या उन सभी महासागरों के एक छोटे से भाग पर उसी सूर्यवंश के सबसे श्रेष्ठ वंसज भगवान श्रीराम के नाम लिखे पत्थर से पाटकर रामसेतु नहीं बनाया जा सकता है? याद रहे एक शूक्ष्मतम से शूक्ष्मतम अदृश्य कण में परमब्रह्म/ब्रह्म की ऊर्जा निहित जिस ऊर्जा से की न की केवल यह ब्रह्माण्ड जिसमे हम रहते है वरन सभी ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति हुई है तो कोई यह जरूरी नहीं की जो दीखता है वह ही सत्य हो और हम कहें की यह संभव नहीं तो सीधा सा उदहारण है की विशाकलाय जंगल जल जाते है तो वह जब ऊर्जा/उस्मा के रूप में आते हैं तो दिखाई देते हैं क्या दृश्य वास्तु के रूप में? अतः विभूतियों की ऊर्जा उनके शरीर और मानवीय स्वरुप से ही न आंकी जाय की सभी मानव है तो कोई विशेष कैसे बना और यह सेतु कैसे बना जैसे प्रश्न हों।

सूर्यवंशीय भगवान श्रीराम(दशरथ=कश्यप का मानवातार) के पूर्वज राजा सगर ने वरुणदेव(कश्यप ऋषि से पुत्र) की तपस्या कर सागर की उत्पत्ति की जिससे स्वरुप है सभी महासागर तो क्या उन सभी महासागरों के एक छोटे से भाग पर उसी सूर्यवंश के सबसे श्रेष्ठ वंसज भगवान श्रीराम के नाम लिखे पत्थर से पाटकर रामसेतु नहीं बनाया जा सकता है? याद रहे एक शूक्ष्मतम से शूक्ष्मतम अदृश्य कण में परमब्रह्म/ब्रह्म की ऊर्जा निहित जिस ऊर्जा से की न की केवल यह ब्रह्माण्ड जिसमे हम रहते है वरन सभी ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति हुई है तो कोई यह जरूरी नहीं की जो दीखता है वह ही सत्य हो और हम कहें की यह संभव नहीं तो सीधा सा उदहारण है की विशाकलाय जंगल जल जाते है तो वह जब ऊर्जा/उस्मा के रूप में आते हैं तो दिखाई देते हैं क्या दृश्य वास्तु के रूप में? अतः विभूतियों की ऊर्जा उनके शरीर और मानवीय स्वरुप से ही न आंकी जाय की सभी मानव है तो कोई विशेष कैसे बना और यह सेतु कैसे बना जैसे प्रश्न हों।

Saturday, March 14, 2015

है हिम्मत? हिम्मत तो बहुत थी पर जोशी जी के बरगद की शान चली जाती और मई बचपन से जिस मर्यादा का पालन किया था वह चूर-चूर हो जाता और गुरु की शान के साथ-साथ मई अपनी निगाह में गिर जाता यदि गुरु और पिता/पितासम के आदेश का पालन न किया होता और मुझे केवल कृष्ण समरूप समझ लिया जाता जो जिसे सत्य समझते थे कर देते थे चाहे वह सामाजिक मान्यता न रखता हो और इस प्रकार उनका किया एक नियम बन जाता था। हिम्मत ही तो थी की सम्पूर्ण भारत परन्तु विशष रूप से दक्षिण भारत के लिए विज्ञान और तकनीकी शिक्षा की सर्वोच्च अंतर्राष्ट्रीय संस्था जहां दक्षिण के तमिल और तेलगू भाषियों का बोल बाला था के लोगों को मुझे २ वर्ष भी सम्भालना मुस्किल हो गया भारत के अन्य भाग की बात ही छोड़ दीजिये जिसे वे नियम कहते थे मै उसमे ही छेद निकाल दिया करता था और बता दिया की अम्बेडकर/अम्बवादेकर मतलब हनुमान होता है और हनुमान चरित्रहीन नहीं होते है और इस प्रकार जो अम्बेडकर का नाम ले अधिकार मांगे उससे हनुमान जैसा चरित्र निर्वहन करवाइये अन्यथा उसको हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर को मिलाने वाले अधिकार से वंचित कराइये। जब मेरे श्रीधर(विष्णु) मामा के पास सूचना अप्रत्यक्ष रूप से गयी तो बोले की मै आता हूँ और देखता हूँ की आप ऐसा क्या और क्यों कर रहे हैं मै उनसे कहा की आप मत आइये केवल शशिधर(शिव-नामधारी जो गाँव में भीम नाम से भी जाने जाते हैं) मामा को भेज दीजिये ये सव ठंढे पद जाएंगे जब देखेंगे की श्यामवर्ण वाले भी उत्तर में ब्राह्मण की तरह ही उच्च आचरण करते है। हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर धर्म ध्वजाधारी थे और स्त्रियों के सम्मान के रक्षक थे न की पहले अल्प समय के लिए रक्षक बन कर जीवन भर के लिए भक्षक का काम करने वाले/ न की अशोकचक्र/धर्मचक्र/समयचक्र तोड़ने वाले थे। हाँ उनका विवाह उनके गुरु शूर्य की पुत्री सुवर्चला से गुरुदक्षिणा की पूर्ती हेतु हुआ था और मकरध्वज(/तथाकथित विश्वमहाशक्ति के उत्तराधिकारी जिस पर पहले विस्व के सबसे बड़े माफिया अहिरावण का राज था जो रावण का भाई था) उनके पुत्र थे पर मकर ध्वज रामजानकी के पुत्र लव-कुश/हिन्दू-कुश से ऊपर हो गए क्या?

है हिम्मत? हिम्मत तो बहुत थी पर जोशी जी के बरगद की शान चली जाती और मई बचपन से जिस मर्यादा का पालन किया था वह चूर-चूर हो जाता और गुरु की शान के साथ-साथ मई अपनी निगाह में गिर जाता यदि गुरु और पिता/पितासम के आदेश का पालन न किया होता और मुझे केवल कृष्ण समरूप समझ लिया जाता जो जिसे सत्य समझते थे कर देते थे चाहे वह सामाजिक मान्यता न रखता हो और इस प्रकार उनका किया एक नियम बन जाता था। हिम्मत ही तो थी की सम्पूर्ण भारत परन्तु विशष रूप से दक्षिण भारत के लिए विज्ञान और तकनीकी शिक्षा की सर्वोच्च अंतर्राष्ट्रीय संस्था जहां दक्षिण के तमिल और तेलगू भाषियों का बोल बाला था के लोगों को मुझे २ वर्ष भी सम्भालना मुस्किल हो गया भारत के अन्य भाग की बात ही छोड़ दीजिये जिसे वे नियम कहते थे मै उसमे ही छेद निकाल दिया करता था और बता दिया की अम्बेडकर/अम्बवादेकर मतलब हनुमान होता है और हनुमान चरित्रहीन नहीं होते है और इस प्रकार जो अम्बेडकर का नाम ले अधिकार मांगे उससे हनुमान जैसा चरित्र निर्वहन करवाइये अन्यथा उसको हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर को मिलाने वाले अधिकार से वंचित कराइये। जब मेरे श्रीधर(विष्णु) मामा के पास सूचना अप्रत्यक्ष रूप से गयी तो बोले की मै आता हूँ और देखता हूँ की आप ऐसा क्या और क्यों कर रहे हैं मै उनसे कहा की आप मत आइये केवल शशिधर(शिव-नामधारी जो गाँव में भीम  नाम से भी जाने जाते हैं) मामा को भेज दीजिये ये सव ठंढे पद जाएंगे जब देखेंगे की श्यामवर्ण वाले भी उत्तर में ब्राह्मण की तरह ही उच्च आचरण करते है। हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर धर्म ध्वजाधारी थे और स्त्रियों के सम्मान के रक्षक थे न की पहले अल्प समय के लिए रक्षक बन कर जीवन भर के लिए भक्षक का काम करने वाले/ न की अशोकचक्र/धर्मचक्र/समयचक्र तोड़ने वाले थे। हाँ उनका विवाह उनके गुरु शूर्य की पुत्री सुवर्चला से गुरुदक्षिणा की पूर्ती हेतु हुआ था और मकरध्वज(/तथाकथित विश्वमहाशक्ति के उत्तराधिकारी जिस पर पहले विस्व के सबसे बड़े माफिया अहिरावण का राज था जो रावण का भाई था) उनके पुत्र थे पर मकर ध्वज रामजानकी के पुत्र लव-कुश/हिन्दू-कुश से ऊपर हो गए क्या?

मानव जीवन की पहली पीढ़ी की शिक्षा में:---- डॉन(भगवा) भाई ही बबलू(तिरंगा) भाई के जन्मदाता है| तिरंगा के तीनो रंग भगवा रंग में ही समाहित है। इस प्रकार डॉन भाई तिरंगा भाई के बाप हुए और इस प्रकार बाप बड़ा या पुत्र में मै बाप बड़ा वाले पक्ष से हूँ और सायद इसलिए भी की कि आप का "सत्यमेव जयते" आज भी अपने स्थान पर टिका है जहां की तिरंगे की शान अशोकचक्र एक बार टूट चुका है। "सत्यमेव जयते" वाक्य की महिमा इसलिए मलिन नहीं हुई क्योंकि डॉन(भगवा) भाई इसे अपने दामन से लगाए हुए थे पर तिरंगा(बबलू) के तीनो रंग अपनी ही शान और केंद्रीय भाग अशोकचक्र की रक्षा में नाकाम रहे क्योंकि वे तो अपने बाप डॉन भाई से अपने-अपने अधिकार के लिए लड़ने में ही व्यस्त थे। अतः डॉन भाई की वजह से तिरंगा तो सुरक्षित रहा पर उसका केंद्रीय भाग अशोकचक्र टूट गया जिस पर अभी तक सुदर्शन चक्र चल रहा था। --------इसे लिए कहता हूँ की बाप की आज्ञा का पालन कीजिये और उनसे लड़ाई मत कीजिये नहीं तो आप अवश्य कमजोर ही होंगे और अपमानित ही महसूस करेंगे जीवन में उनपर आप कभी विजय नहीं पाएंगे। और इसी लिए दुनिआ वालों से विनम्र निवेदन है की अपने बाप भारत(हिन्दुस्तान)/सप्तर्षिओं/सात ब्रह्मर्षियों के देश/मानवता के जन्मदाता से दुश्मनी मत कीजिये नहीं तो पूरा विश्व ही कमजोर होगा।

मानव जीवन की पहली पीढ़ी की शिक्षा में:---- डॉन(भगवा) भाई ही बबलू(तिरंगा) भाई के जन्मदाता है| तिरंगा के तीनो रंग भगवा रंग में ही समाहित है। इस प्रकार डॉन भाई तिरंगा भाई के बाप हुए और इस प्रकार बाप बड़ा या पुत्र में मै बाप बड़ा वाले पक्ष से हूँ और सायद इसलिए  भी की कि आप का "सत्यमेव जयते" आज भी अपने स्थान पर टिका है जहां की तिरंगे की शान अशोकचक्र एक बार टूट चुका है। "सत्यमेव जयते" वाक्य की महिमा इसलिए मलिन नहीं हुई क्योंकि डॉन(भगवा) भाई इसे अपने  दामन से लगाए हुए थे पर तिरंगा(बबलू) के तीनो रंग अपनी ही शान और केंद्रीय भाग अशोकचक्र की रक्षा में नाकाम रहे क्योंकि वे तो अपने बाप डॉन भाई से अपने-अपने अधिकार के लिए लड़ने में ही व्यस्त थे। अतः डॉन भाई की वजह से तिरंगा तो सुरक्षित रहा पर उसका केंद्रीय भाग अशोकचक्र टूट गया जिस पर अभी तक सुदर्शन चक्र चल रहा था। --------इसे लिए कहता हूँ की बाप की आज्ञा का पालन कीजिये और उनसे लड़ाई मत कीजिये नहीं तो आप अवश्य कमजोर ही होंगे और अपमानित ही महसूस करेंगे जीवन में उनपर आप कभी विजय नहीं पाएंगे। और इसी लिए दुनिआ वालों से विनम्र निवेदन है की अपने बाप भारत(हिन्दुस्तान)/सप्तर्षिओं/सात ब्रह्मर्षियों के देश/मानवता के जन्मदाता से दुश्मनी मत कीजिये नहीं तो पूरा विश्व ही कमजोर होगा।        

Friday, March 13, 2015

मेरे खानदान की सबसे बड़ी जगदीशपुर वाली माहार दादी ने 1990 में कहा था की भगवान किशी को पुत्र दें तो विवेक जैसा दें वह तब जबकि मै केवल गर्मी की छुट्टी में गाँव रामापुर-आज़मगढ़-223103 जाता था मामा के घर(बिशुनपुर-जौनपुर-223103) से। तो मै तो तीन पिता और तीन माता (मेरे स्वयं के पिता, श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय (मानव जीवन और स्वयं सूर्य की ऊर्जा का श्रोत/सूर्यकांत/रामजानकी/लक्ष्मीनारायण/सत्यनारायण)/पुष्पा; ताऊ जी(बड़े पिता) प्रोफेसर प्रेमचंद पाण्डेय (शिव)/सविता/गायत्री और मामा, प्रधानाचार्य श्री श्रीधर मिश्रा-भौतिकी(विष्णु)/गायत्री)) की संतान का दायित्व निभा दिया विश्व व्यापक सामाजिक दायित्व की दृस्टि से न की उत्तराधिकार और दैनिक जीवन की दृस्टि से उनकी आज्ञा पालन में 2001 से प्रयागराज स्थित प्रयागराज विश्वविद्यालय में अपने को स्थिर करके । अब मेरा अपना दायित्व शेष रह गया है एक शिक्षक का, एक पिता/पति का और एक जागरूक विश्व, देश और स्थानीय नागरिक का।

मेरे खानदान की सबसे बड़ी जगदीशपुर वाली माहार दादी ने 1990 में कहा था की भगवान किशी को पुत्र दें तो विवेक जैसा दें वह तब जबकि मै  केवल गर्मी की छुट्टी में गाँव रामापुर-आज़मगढ़-223103 जाता था मामा के घर(बिशुनपुर-जौनपुर-223103) से। तो मै  तो तीन  पिता और तीन माता (मेरे स्वयं के पिता, श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय (मानव जीवन और स्वयं सूर्य की ऊर्जा का श्रोत/सूर्यकांत/रामजानकी/लक्ष्मीनारायण/सत्यनारायण)/पुष्पा; ताऊ जी(बड़े पिता) प्रोफेसर प्रेमचंद पाण्डेय (शिव)/सविता/गायत्री और मामा, प्रधानाचार्य श्री श्रीधर मिश्रा-भौतिकी(विष्णु)/गायत्री)) की संतान का दायित्व निभा दिया विश्व व्यापक सामाजिक दायित्व की दृस्टि से न की उत्तराधिकार और दैनिक जीवन की दृस्टि से उनकी आज्ञा पालन में 2001 से प्रयागराज स्थित प्रयागराज विश्वविद्यालय में अपने को स्थिर करके । अब मेरा अपना दायित्व शेष रह गया है एक शिक्षक का, एक पिता/पति का और एक जागरूक विश्व, देश और स्थानीय नागरिक का।     

डॉन(भगवा) और बबलू(तिरंगा) भाई को राम/कृष्ण -राम/कृष्ण। इति श्री रामायण/श्रीमदभगवतगीता कथा। Vivekanand and Modern Tradition|

डॉन(भगवा) और बबलू(तिरंगा) भाई को राम/कृष्ण -राम/कृष्ण। इति श्री रामायण/श्रीमदभगवतगीता कथा।  Vivekanand and Modern Tradition|

मै स्वयं नहीं जानता किस लिए पर मऊ वाले राय साहब जो भौतकी विभाग कार्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में थे मुझको(विवेक) और मेरे सहपाठी ज्ञान भाई को सबसे ज्यादा प्रेम करते थे जो की उनकी भाव भंगिमा बताती थी जबकि पवन राय हम लोगों के ही साथ रहे हो तब भी भाषा और भाव से हम दोनों लोगों से ही उनका यह अगाध प्रेम परि लक्षित होता था । और इसीलिये अशोक चक्र टूटने पर मैंने उनसे प्रेम वस दुःख प्रकट किया था।

मै  स्वयं नहीं जानता किस लिए पर मऊ वाले राय साहब जो भौतकी विभाग कार्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में थे मुझको(विवेक) और मेरे सहपाठी ज्ञान भाई को सबसे ज्यादा प्रेम करते थे जो की उनकी भाव भंगिमा बताती थी जबकि पवन राय हम लोगों के ही साथ रहे हो तब भी भाषा और भाव से हम  दोनों लोगों से ही उनका यह अगाध प्रेम परि लक्षित होता था । और इसीलिये अशोक चक्र टूटने पर मैंने उनसे प्रेम वस दुःख प्रकट किया था।   

जगत जननी=भूमिसुता=सीता=रामा और माँदुर्गा दोनों एक हैं और दोनों जगदम्बा हैं जिसमे सीता सांसारिक और माँ दुर्गा परलौकिक हैं और ये दोनों ही लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती:गौरी का सम्मिलित स्वरुप है। और मेरे गाँव रामापुर में इसीलिये देवकाली(महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी) को कुल देवी के रूप में पूजते है।---------अत एव बता दूँ की भूमिहार समाज/रामा और शूर्यवंशीय(कश्यपगोत्रीय) समाज/राम दोनों मेरे लिए एक समान प्रिय है।

जगत जननी=भूमिसुता=सीता=रामा और माँदुर्गा दोनों एक हैं और दोनों जगदम्बा हैं जिसमे सीता सांसारिक और माँ  दुर्गा परलौकिक हैं और ये दोनों ही लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती:गौरी का सम्मिलित स्वरुप है। और मेरे गाँव रामापुर  में इसीलिये देवकाली(महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी) को कुल देवी के रूप में पूजते है।---------अत एव बता दूँ की भूमिहार समाज/रामा और शूर्यवंशीय(कश्यपगोत्रीय) समाज/राम दोनों मेरे लिए एक समान प्रिय है।   

शेर के सामने एक-एक कर जंगली कुत्ते आते रहने से कुत्तों को तो शेर नहीं मानते है क्योंकि क्या पता इस कुत्ते के मर जाने से अगला कोई एक कुत्ता फिर मरने और जलालत झेलने को तैयार हो जाए। वाह रे संख्याबल/अंकवाद/मार्क्सवाद विचाराधरावाले ज़रा आप पता कीजिये की मेरे विरोध जितने कुत्ते तैयार किये जा रहे हैं उनके लिए कितने मूलयवान स्तरीय संशाधन प्रयोग किये जा रहे हैं उनकी कीमत पर आप के मार्क्सवाद का ध्यान नहीं जा रहा है उस पर मार्क्सवाद नहीं अपना रहे है की आप की हार 11 -09 -2001 , 11-09 -2007 और पुनः अंतिम हार आप की 29-10-2009 तो अब तो बाप से लड़ाई छोड़ दी जाय। यही हाल है मेरे विरोधियों का बनारस विश्वविद्यालय से लेकर प्रयागराज विश्वविद्यालय, भारतीय विज्ञान संस्थान और पुनः प्रयागराज विश्वविद्यालय। लेकिन अब "Vivekanand and Modern Tradition" मिटने वाला नहीं है किशी तथाकथित विश्वमहाशक्ति के दबाव में क्योंकि विश्वमहाशक्ति के महाशक्तियों का जबाब भी इसमे निहित है।

शेर के सामने एक-एक कर जंगली कुत्ते आते रहने से कुत्तों को तो शेर नहीं  मानते है क्योंकि क्या पता इस कुत्ते के मर जाने से अगला कोई एक कुत्ता फिर मरने और जलालत झेलने को तैयार हो जाए। वाह रे  संख्याबल/अंकवाद/मार्क्सवाद विचाराधरावाले ज़रा आप पता कीजिये की मेरे विरोध जितने कुत्ते तैयार किये जा  रहे हैं उनके लिए कितने मूलयवान  स्तरीय संशाधन प्रयोग किये जा रहे हैं उनकी कीमत पर आप के मार्क्सवाद का ध्यान नहीं जा रहा है उस पर मार्क्सवाद नहीं अपना रहे है की आप की हार 11 -09 -2001  , 11-09 -2007 और पुनः अंतिम हार आप की 29-10-2009 तो अब तो बाप से लड़ाई छोड़ दी जाय।  यही हाल है मेरे विरोधियों का बनारस  विश्वविद्यालय से लेकर प्रयागराज विश्वविद्यालय, भारतीय विज्ञान संस्थान और पुनः प्रयागराज विश्वविद्यालय। लेकिन अब "Vivekanand and Modern Tradition" मिटने वाला नहीं है किशी तथाकथित विश्वमहाशक्ति के दबाव में क्योंकि विश्वमहाशक्ति के महाशक्तियों का जबाब भी इसमे निहित है। 

हर व्यक्ति मानवाधिकार की मूल भावना के तहत मौलिक अधिकार की दृस्टि से बराबर है पर प्राकृतिक रूप से सबकी आभा का असर अलग अलग होता है उसे संस्कृति और परिस्थिति जो मिलती है उससे प्रभावित होने के साथ उसका थोड़ा परिमार्जन होता है। यह था आतंरिक स्वरुप मेरा: ------2001 -2005 के दौरान जब मै केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय और महासागरीय विज्ञान केंद्र के प्रारंभिक विकाश की अवस्था के अन्तर्चित्त भाव से संकल्पित था और वाह्य शोध कार्य के साथ लगा हुआ था पहले दौर के शोधक छात्र के रूप में तो उसकी अनुभूति: जबकि वाह्य ज्ञान के अनुरूप अवस्था में उसे सशरीर बाहर आकर देखने पर वास्तविक रूप से कुछ नहीं होता रहता था और मौसम सामान्य रहता था लेकिन अंदर की बात वर्णन करून तो कि कब कौन लोग केदारेश्वर बनेर्जी केंद्र पर आते थे तो मुझे लगता था वर्षात हो रही है, कब कौन लोग केदारेश्वर बनेर्जी केंद्र पर आते थेलगता था विजली चमक रही है, कब कौन लोग केदारेश्वर बनेर्जी केंद्र पर आते थे लगता था तूफान आ गया है और बहुत तेज वर्षात और आंधी चल रही है, कब कौन लोग केदारेश्वर बनेर्जी केंद्र पर आते थे और किसके आने से लगता था की अग्नि की वर्षा हो रही लू से और कब लगता था की मै शेषनाग हूँ पृथ्वी के ऊपर होने वाले पाप के बोझ से पृथ्वी भारी होती जा रही है और मेरा गर्दन टूट रहा है पृथ्वी के बोझ से और कब कौन लोग केदारेश्वर बनेर्जी केंद्र पर आते थे तो मुझे लगता था मुझ शेषनाग को पर पेट्रोल छिड़क कर जलाया जा रहा है, कब लगता था मै स्वयं उड़ रहा हूँ। -------यह था आतंरिक स्वरुप मेरा। हर व्यक्ति मानवाधिकार की मूल भावना के तहत मौलिक अधिकार की दृस्टि से बराबर है पर प्राकृतिक रूप से सबकी आभा का असर अलग अलग होता है उसे संस्कृति और परिस्थिति जो मिलती है उससे प्रभावित होने के साथ उसका थोड़ा परिमार्जन होता है।

हर व्यक्ति मानवाधिकार की मूल भावना के तहत मौलिक अधिकार की दृस्टि से बराबर है पर प्राकृतिक रूप से सबकी आभा का असर अलग अलग होता है उसे संस्कृति और परिस्थिति जो मिलती है उससे प्रभावित होने के साथ उसका थोड़ा परिमार्जन होता है। 
यह था आतंरिक स्वरुप मेरा: ------2001 -2005 के दौरान जब मै केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय और महासागरीय विज्ञान केंद्र के प्रारंभिक विकाश की अवस्था के अन्तर्चित्त भाव से संकल्पित था और वाह्य शोध कार्य के साथ लगा हुआ था पहले दौर के शोधक छात्र के रूप में तो उसकी अनुभूति: जबकि वाह्य ज्ञान के अनुरूप अवस्था में उसे सशरीर बाहर आकर देखने पर वास्तविक रूप से कुछ नहीं होता रहता था और मौसम सामान्य रहता था लेकिन अंदर की बात वर्णन करून तो कि कब कौन लोग केदारेश्वर बनेर्जी केंद्र पर आते थे तो मुझे लगता था वर्षात हो रही है, कब कौन लोग केदारेश्वर बनेर्जी केंद्र पर आते थेलगता था विजली चमक रही है, कब कौन लोग केदारेश्वर बनेर्जी केंद्र पर आते थे लगता था तूफान आ गया है और बहुत तेज वर्षात और आंधी चल रही है, कब कौन लोग केदारेश्वर बनेर्जी केंद्र पर आते थे और किसके आने से लगता था की अग्नि की वर्षा हो रही लू से और कब लगता था की मै शेषनाग हूँ पृथ्वी के ऊपर होने वाले पाप के बोझ से पृथ्वी भारी होती जा रही है और मेरा गर्दन टूट रहा है पृथ्वी के बोझ से और कब कौन लोग केदारेश्वर बनेर्जी केंद्र पर आते थे तो मुझे लगता था मुझ शेषनाग को पर पेट्रोल छिड़क कर जलाया जा रहा है, कब लगता था मै स्वयं उड़ रहा हूँ। -------यह था आतंरिक स्वरुप मेरा। हर व्यक्ति मानवाधिकार की मूल भावना के तहत मौलिक अधिकार की दृस्टि से बराबर है पर प्राकृतिक रूप से सबकी आभा का असर अलग अलग होता है उसे संस्कृति और परिस्थिति जो मिलती है उससे प्रभावित होने के साथ उसका थोड़ा परिमार्जन होता है।

Thursday, March 12, 2015

रामापुर से हूँ इस लिए रामा=सीता=जगत-जननी=भूमिसुता मतलब भूमिहार/जनक/ व्यवहार में तथाकथित इमरती भी उतने प्रिय हैं जितने की राम मतलब सूर्यवंशीय(कश्यपगोत्रीय)/रघुवंशीय/व्यवहार में अग्नि।

रामापुर से हूँ इस लिए रामा=सीता=जगत-जननी=भूमिसुता मतलब भूमिहार/जनक/ व्यवहार में तथाकथित इमरती  भी उतने प्रिय हैं जितने की राम मतलब सूर्यवंशीय(कश्यपगोत्रीय)/रघुवंशीय/व्यवहार में अग्नि।  

"Terror is better than Characterlessness". In connection with the comment from one of my Junior on it, I have following justification: अगर टिप्पणी हुई है चरित्र हीनता पर मेरे द्वारा तो वह शारीरिक, व्यक्तिगत, सामूहिक, संस्थागत, रास्ट्रीय और वैश्विक समाज में मानवमूल्यों के ह्रास रूपी चरित्र हीनता से है जिसका कि मुकाबला ही नहीं किया जा सकता है प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर दृण शक्ति के बल पर भी और यह दीर्घकालिक समय में किशी तरह नियंत्रण में आता है पर वही आतंक का मुकाबला दृण शक्ति के बल पर किया जा सकता है प्रत्यक्ष तौर पर ही।--------मै किशी भी तरह आतंकवाद को बढ़ावा नहीं दे रहा पर चरित्रहीनता की स्थिति पर आतंकवाद से ज्यादा ध्यान देने पर लोगों का ध्यान आक्रिस्ट कर रहा हूँ और उसे आतंकवाद से बड़ा सामाजिक क्षतिकारक मान रहा हूँ।



"Terror is better than Characterlessness". In connection with the comment from one of my Junior on it, I have following justification: अगर टिप्पणी हुई है चरित्र हीनता पर मेरे द्वारा तो वह शारीरिक, व्यक्तिगत, सामूहिक, संस्थागत, रास्ट्रीय और वैश्विक समाज में मानवमूल्यों के ह्रास रूपी चरित्र हीनता से है जिसका कि मुकाबला ही नहीं किया जा सकता है प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर दृण शक्ति के बल पर भी और यह दीर्घकालिक समय में किशी तरह नियंत्रण में आता है पर वही आतंक का मुकाबला दृण शक्ति के बल पर किया जा सकता है प्रत्यक्ष तौर पर ही।--------मै किशी भी तरह आतंकवाद को बढ़ावा नहीं दे रहा पर चरित्रहीनता की स्थिति पर आतंकवाद से ज्यादा ध्यान देने पर लोगों का ध्यान आक्रिस्ट कर रहा हूँ और उसे आतंकवाद से बड़ा सामाजिक क्षतिकारक मान रहा हूँ।

"जहां न पहुंचय रवि वह पहुँचय कवि;दूरदृस्टीवान:विवेकवान" केवल आसय समझिए और यह समझिए मेरी किशी पर आसक्ति नहीं वरण "एकै साढ़े सब सधै| सब साधे सब जाय" हेतु मैंने यहाँ तक आप को लाया और "Vivekanand and Modern tradition" का प्रादुर्भाव हुआ: कहानी वहां से सुरु करूँ जब 2001 में मै महसूस किया की राम/शिव की गंगा और कृष्ण की जमुना में इस प्रयागराज से प्रलयकारी आग लगी थी और उसमे मई स्वयं और यह पूरा विश्व जल रहा था जबकि उस समय सामान्य जन प्रयाग/काशी में एक में ही मिलाने वाली गंगा, जमुना और सरस्वती में ही गन्दगी की बात कर रहे थे उस समय पर यहीं तक सीमित नहीं थी गंगा और जमुना के विलुप्त होने से पूरा संसार विलुप्त होने वाला था। बात गंगा-यमुना में ही गन्दगी तक सीमित नहीं थी मै तो 2007-2008 में पाया की कृष्णा, कावेरी, महानदी, नर्मदा, ताप्ती, गंडक, ब्रह्मपुत्र और पंचनद समेत पूरे भारत की नदिया गंदी हो गयी थीं पश्चिमी देशों द्वारा छोड़े गए सॉफ्टवेयर वायरस से। और तभी डॉन(भगवा) और बबलू(तिरंगा) भाई से आह्वान किया था भारतीय विज्ञान बंगलुरु में 2008 के प्रथम तिमाही में की अगर सभी वैज्ञानिक, तकनिकी और उच्तम सामाजिक विज्ञान संस्थानों का यही हाल है तो सबको ख़त्म कर दो या खाली करा लो और चारागाह तथा कृषि क्षेत्र घोषित कर दो बहुत हो गयी तकनिकी और विज्ञान वस इसे आने वाली पीढ़ी के लिए जीवित करने वाले कुछ लोग पर छोड़ दो वह विश्व के किशी भी कोने में हों। ---------मानवता के ठीकेदार और हैरतअंगेज करिश्मा दिखाने की पों वाजी करें वाले लोग जो तथाकथित विश्वमहाशक्ति के एजेंट/अभिकर्ता अंदर से है और मुझसे से खर खाए हैं उनकी करामात का ही असर यह सब होता है जिससे वे स्वयं बचने में वे ब्रह्मा(जोशी) की छाया में चले जाया करते हैं और विष्णु और शिव और इस प्रकार श्रीराम/कृष्ण को भी परेशान होना पड़ता है।



"जहां न पहुंचय रवि वह पहुँचय कवि;दूरदृस्टीवान:विवेकवान" केवल आसय समझिए और यह समझिए मेरी किशी पर आसक्ति नहीं वरण "एकै साढ़े सब सधै| सब साधे सब जाय" हेतु मैंने यहाँ तक आप को लाया और "Vivekanand and Modern tradition" का प्रादुर्भाव हुआ: कहानी वहां से सुरु करूँ जब 2001 में मै महसूस किया की राम/शिव की गंगा और कृष्ण की जमुना में इस प्रयागराज से प्रलयकारी आग लगी थी और उसमे मई स्वयं और यह पूरा विश्व जल रहा था जबकि उस समय सामान्य जन प्रयाग/काशी में एक में ही मिलाने वाली गंगा, जमुना और सरस्वती में ही गन्दगी की बात कर रहे थे उस समय पर यहीं तक सीमित नहीं थी गंगा और जमुना के विलुप्त होने से पूरा संसार विलुप्त होने वाला था। बात गंगा-यमुना में ही गन्दगी तक सीमित नहीं थी मै तो 2007-2008 में पाया की कृष्णा, कावेरी, महानदी, नर्मदा, ताप्ती, गंडक, ब्रह्मपुत्र और पंचनद समेत पूरे भारत की नदिया गंदी हो गयी थीं पश्चिमी देशों द्वारा छोड़े गए सॉफ्टवेयर वायरस से। और तभी डॉन(भगवा) और बबलू(तिरंगा) भाई से आह्वान किया था भारतीय विज्ञान बंगलुरु में 2008 के प्रथम तिमाही में की अगर सभी वैज्ञानिक, तकनिकी और उच्तम सामाजिक विज्ञान संस्थानों का यही हाल है तो सबको ख़त्म कर दो या खाली करा लो और चारागाह तथा कृषि क्षेत्र घोषित कर दो बहुत हो गयी तकनिकी और विज्ञान वस इसे आने वाली पीढ़ी के लिए जीवित करने वाले कुछ लोग पर छोड़ दो वह विश्व के किशी भी कोने में हों। ---------मानवता के ठीकेदार और हैरतअंगेज करिश्मा दिखाने की पों वाजी करें वाले लोग जो तथाकथित विश्वमहाशक्ति के एजेंट/अभिकर्ता अंदर से है और मुझसे से खर खाए हैं उनकी करामात का ही असर यह सब होता है जिससे वे स्वयं बचने में वे ब्रह्मा(जोशी) की छाया में चले जाया करते हैं और विष्णु और शिव और इस प्रकार श्रीराम/कृष्ण को भी परेशान होना पड़ता है।

प्रयागराज विश्वविद्यालय के सूर्यनारायण/भानु और चन्द्रदेव/राकेश मेरे साथ न्याय नहीं कर सके पर विकिपीडिया ने मेरे प्रयागराज विश्वविद्यालय के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ध्यन केंद्र (K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studie) नामक पत्रलेख में मेरे साथ न्याय कर ही दिया।

प्रयागराज विश्वविद्यालय के सूर्यनारायण/भानु और चन्द्रदेव/राकेश मेरे साथ न्याय नहीं कर सके पर विकिपीडिया ने मेरे प्रयागराज विश्वविद्यालय के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ध्यन केंद्र (K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studie) नामक पत्रलेख में मेरे साथ न्याय कर ही दिया। https://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

https://archive.today/b8N8l

प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय वालों अब आप रंग-रूप की लड़ाई स्वयं कर रहे हैं उससे जिसपर आप रूप रंग की लड़ाई करने का आरोप लगा रहे थे जिनको पूर्ण विष्णु में भी कूर्मरूप न दिखाई दे जिससे की वे कूर्मावतार लिए थे जो विष्णु भी उसी परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) में शामिल हैं जिसकी सशरीर अवस्था को वह स्वयं प्राप्त हो चुका हो। जिसमे विष्णु हो वह गुरु श्रेष्ठ हुआ ही, जिसमे शिव हो वह आचार्य अपने में ही है नियंता के रूप में सहन शक्ति से प्राप्त ज्ञान के आधार पर और जो ब्रह्मा भी है वह ज्ञान का भण्डार और जीवन दीप अपने आप ही हुआ और इस प्रकार परमब्रह्म तीनो शक्तिओं में से किशी भी एक स्वरुप को प्राप्त कर सकता है। ( जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण/कृष्णकांत कहो या राम/विष्णुकांत। भगवान श्रीराम स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के लिए भी अनुकरणीय है यह अलग है की परिश्थिति उनकी कुछ भिन्न थी )।------------------------------------भारद्वाज ऋषि के केंद्रीय सप्तर्षि अंगारिशा के पुत्र देवताओं के गुरु(गुरु बृहस्पति) से भी जब जमदग्नि(परशुराम) के केंद्रीय सप्तर्षि भृगु के पुत्र दैत्यों के गुरु(गुरु शुक्राचार्य) के शिष्य दैत्य भारी पड़े थे तो भृगुवंशीय(भार्गव) दधीचि का त्याग देवताओं की रक्षा किया था पर इसबार इस महापरिवर्तन में (1997-2014) मानव मूल्य की रक्षा हेतु दैत्यों से लड़ने और गुरु बृहस्पति(सनातन आंगिरास/भरद्वाज/ गुरुदेव जोशी) जो स्वयं ब्रह्मा स्वरुप है के बरगद के बृक्ष के सम्मान की रक्षा हेतु स्वयं गुरु बृहस्पति की शक्ति के श्रोत भगवान विष्णु (सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण मेरे मामा श्रीधर मिश्र) और शुक्राचार्य के आराध्य भगवान शिव( सनातन कश्यप गोत्रीय मेरे ताऊ प्रोफेसर प्रेम चंद पाण्डेय) ही उतर आये थे। अब आप समझिए की जिस साधक/साधन का प्रयोग हुआ इस विश्व महासमुद्रमन्थन/विश्वमहापरिवर्तन में दधीचि की तरह क्या वह कुर्मावतारी विष्णु, नीलकंठ महादेव, स्वयं रुद्रावतारी विष्णु सेवक हनुमान, नवनिर्मांकर्ता गणेश समेत समस्त संभावित लौकिक/परलौकिक विभूतियों की अवस्था से होते हुए दो मात्र ऐसे भगवान सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश/शिव/केदारेश्वर) श्रीराम और श्रीकृष्ण की तरह सशरीर परमब्रह्म की अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ होगा? मित्रों ऐसा हुआ है जैसा की विष्णु अवतारी श्रीराम जनता के भ्रम को मिटाने हेतु माता सीता का त्याग करके सशरीर परमब्रह्म की अवस्था को प्राप्त हुए थे लव-कुश से मिलने के बाद भी और विष्णु अवतारी श्रीकृष्ण महाभारत के समय सशरीर परमब्रह्म की अवस्था को प्राप्त हुए थे और इसी लिए उसको भी वे दो ही आराध्य लगे( जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण/कृष्णकांत कहो या राम/विष्णुकांत) जिनको वह अपने घर बुला लिया है। प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय वालों अब आप रंग-रूप की लड़ाई स्वयं कर रहे हैं उससे जिसपर आप रूप रंग की लड़ाई करने का आरोप लगा रहे थे जिनको पूर्ण विष्णु में भी कूर्मरूप न दिखाई दे जिससे की वे कूर्मावतार लिए थे जो विष्णु भी उसी परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) में शामिल हैं जिसकी सशरीर अवस्था को वह स्वयं प्राप्त हो चुका हो। जिसमे विष्णु हो वह गुरु श्रेष्ठ हुआ ही, जिसमे शिव हो वह आचार्य अपने में ही है नियंता के रूप में सहन शक्ति से प्राप्त ज्ञान के आधार पर और जो ब्रह्मा भी है वह ज्ञान का भण्डार और जीवन दीप अपने आप ही हुआ और इस प्रकार परमब्रह्म तीनो शक्तिओं में से किशी भी एक स्वरुप को प्राप्त कर सकता है। ( जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण/कृष्णकांत कहो या राम/विष्णुकांत। भगवान श्रीराम स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के लिए भी अनुकरणीय है यह अलग है की परिश्थिति उनकी कुछ भिन्न थी )।



प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय वालों अब आप रंग-रूप की लड़ाई स्वयं कर रहे हैं उससे जिसपर आप रूप रंग की लड़ाई करने का आरोप लगा रहे थे जिनको पूर्ण विष्णु में भी कूर्मरूप न दिखाई दे जिससे की वे कूर्मावतार लिए थे जो विष्णु भी उसी परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) में शामिल हैं जिसकी सशरीर अवस्था को वह स्वयं प्राप्त हो चुका हो। जिसमे विष्णु हो वह गुरु श्रेष्ठ हुआ ही, जिसमे शिव हो वह आचार्य अपने में ही है नियंता के रूप में सहन शक्ति से प्राप्त ज्ञान के आधार पर और जो ब्रह्मा भी है वह ज्ञान का भण्डार और जीवन दीप अपने आप ही हुआ और इस प्रकार परमब्रह्म तीनो शक्तिओं में से किशी भी एक स्वरुप को प्राप्त कर सकता है। ( जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण/कृष्णकांत कहो या राम/विष्णुकांत। भगवान श्रीराम स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के लिए भी अनुकरणीय है यह अलग है की परिश्थिति उनकी कुछ भिन्न थी )।------------------------------------भारद्वाज ऋषि के केंद्रीय सप्तर्षि अंगारिशा के पुत्र देवताओं के गुरु(गुरु बृहस्पति) से भी जब जमदग्नि(परशुराम) के केंद्रीय सप्तर्षि भृगु के पुत्र दैत्यों के गुरु(गुरु शुक्राचार्य) के शिष्य दैत्य भारी पड़े थे तो भृगुवंशीय(भार्गव) दधीचि का त्याग देवताओं की रक्षा किया था पर इसबार इस महापरिवर्तन में (1997-2014) मानव मूल्य की रक्षा हेतु दैत्यों से लड़ने और गुरु बृहस्पति(सनातन आंगिरास/भरद्वाज/ गुरुदेव जोशी) जो स्वयं ब्रह्मा स्वरुप है के बरगद के बृक्ष के सम्मान की रक्षा हेतु स्वयं गुरु बृहस्पति की शक्ति के श्रोत भगवान विष्णु (सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण मेरे मामा श्रीधर मिश्र) और शुक्राचार्य के आराध्य भगवान शिव( सनातन कश्यप गोत्रीय मेरे ताऊ प्रोफेसर प्रेम चंद पाण्डेय) ही उतर आये थे। अब आप समझिए की जिस साधक/साधन का प्रयोग हुआ इस विश्व महासमुद्रमन्थन/विश्वमहापरिवर्तन में दधीचि की तरह क्या वह कुर्मावतारी विष्णु, नीलकंठ महादेव, स्वयं रुद्रावतारी विष्णु सेवक हनुमान, नवनिर्मांकर्ता गणेश समेत समस्त संभावित लौकिक/परलौकिक विभूतियों की अवस्था से होते हुए दो मात्र ऐसे भगवान सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश/शिव/केदारेश्वर) श्रीराम और श्रीकृष्ण की तरह सशरीर परमब्रह्म की अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ होगा? मित्रों ऐसा हुआ है जैसा की विष्णु अवतारी श्रीराम जनता के भ्रम को मिटाने हेतु माता सीता का त्याग करके सशरीर परमब्रह्म की अवस्था को प्राप्त हुए थे लव-कुश से मिलने के बाद भी और विष्णु अवतारी श्रीकृष्ण महाभारत के समय सशरीर परमब्रह्म की अवस्था को प्राप्त हुए थे और इसी लिए उसको भी वे दो ही आराध्य लगे( जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण/कृष्णकांत कहो या राम/विष्णुकांत) जिनको वह अपने घर बुला लिया है। प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय वालों अब आप रंग-रूप की लड़ाई स्वयं कर रहे हैं उससे जिसपर आप रूप रंग की लड़ाई करने का आरोप लगा रहे थे जिनको पूर्ण विष्णु में भी कूर्मरूप न दिखाई दे जिससे की वे कूर्मावतार लिए थे जो विष्णु भी उसी परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) में शामिल हैं जिसकी सशरीर अवस्था को वह स्वयं प्राप्त हो चुका हो। जिसमे विष्णु हो वह गुरु श्रेष्ठ हुआ ही, जिसमे शिव हो वह आचार्य अपने में ही है नियंता के रूप में सहन शक्ति से प्राप्त ज्ञान के आधार पर और जो ब्रह्मा भी है वह ज्ञान का भण्डार और जीवन दीप अपने आप ही हुआ और इस प्रकार परमब्रह्म तीनो शक्तिओं में से किशी भी एक स्वरुप को प्राप्त कर सकता है। ( जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण/कृष्णकांत कहो या राम/विष्णुकांत। भगवान श्रीराम स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के लिए भी अनुकरणीय है यह अलग है की परिश्थिति उनकी कुछ भिन्न थी )।