Google+ Followers

Thursday, April 30, 2015

Why Hi! Raja Bhaiya if Vivek is alive? It was my words when this word, Hi! used by Sandeep and Sarojkant for friendly greeting or to attract attention or welcome formalities in CAOS, IISc Bangalore at meeting any day during 2007/2008/2009.(Hi used for grief in Hindi).



Why Hi! Raja Bhaiya if Vivek is alive? It was my words when this word, Hi! used by Sandeep and Sarojkant for friendly greeting or to attract attention or welcome formalities in CAOS, IISc Bangalore at meeting any day during 2007/2008/2009.(Hi used for grief in Hindi).

Tuesday, April 28, 2015

परिवार, जाती, धर्म, समाज और देश की सीमाएं तोडना हमें भी आता है पर हम इसे अपना बड़प्पन नहीं समझते वरन अपनी मजबूरी समझते हैं अपने कर्तव्यों के न पालन कर पा सकने की। और ऐसा करके हम उनको अपमानित, नीच और तुछ्य नहीं समझ सकते जो की इन सब मर्यादाओं का पालन करते हुए जड़ कह दिए जाते है पर मै कुरीतियों का समर्थक नहीं हूँ वरन प्रगतिशील सच्चाई का समर्थक हूँ।

परिवार, जाती, धर्म, समाज और देश की सीमाएं तोडना हमें भी आता है पर हम इसे अपना बड़प्पन नहीं समझते वरन अपनी मजबूरी समझते हैं अपने कर्तव्यों के न पालन कर पा सकने की। और ऐसा करके हम उनको अपमानित, नीच और तुछ्य नहीं समझ सकते जो की इन सब मर्यादाओं का पालन करते हुए जड़ कह दिए जाते है पर मै कुरीतियों का समर्थक नहीं हूँ वरन प्रगतिशील सच्चाई का समर्थक हूँ।

प्रोफेसर त्रिपाठी जी ! विवेक कुमार पाण्डेय(भौतिक शास्त्र)/अविनाश चौबे(चिकित्साशास्त्र)/पुरुषोत्तम(उत्तम पुरुष न की उत्तम चन्द्र) सिंह(रसायन शास्त्र) में मै कहां स्थापित हूँ एक संयमिक और संतुलित अवस्था में इस विश्व के केंद्र प्रयाग-काशी में। तो लोग देख लें की मेरा रेफरेन्स केवल कक्षा और विषय विशेष तक ही सिमित था की कहीं और भी काम करता था इस समाज में इन चौदह वर्षों में? मै स्वाभिमान की रक्षा हेतु प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय की स्थानीय परिस्थितियों में इसीलिए कभी नहीं झुका, इसे प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय वाले चाहे जो भी समझे हों और चाहे जो भी समझें। क्योंकि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय अंतर्राष्ट्रीय पटल पर तब से ही कार्यरत है विषय के साथ विश्व की सर्वोच्च संस्कृति के धरोहर के संरक्षण करता के रूप में और मेरी मर्यादा की पताका वहां ऊंची और नीची होती जिस पटल पर अविनाश भाई और पुरुषोत्तम भाई कार्य कर रहे थे इस विश्व परिवर्तन के दौरान मेरे समानांतर।

प्रोफेसर त्रिपाठी जी ! विवेक कुमार पाण्डेय(भौतिक शास्त्र)/अविनाश चौबे(चिकित्साशास्त्र)/पुरुषोत्तम(उत्तम पुरुष न की उत्तम चन्द्र) सिंह(रसायन शास्त्र) में मै कहां स्थापित हूँ एक संयमिक और संतुलित अवस्था में इस विश्व के केंद्र प्रयाग-काशी में। तो लोग देख लें की मेरा रेफरेन्स केवल कक्षा और विषय विशेष तक ही सिमित था की कहीं और भी काम करता था इस समाज में इन चौदह वर्षों में?
मै स्वाभिमान की रक्षा हेतु प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय की स्थानीय परिस्थितियों में इसीलिए कभी नहीं झुका, इसे प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय वाले चाहे जो भी समझे हों और चाहे जो भी समझें। क्योंकि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय अंतर्राष्ट्रीय पटल पर तब से ही कार्यरत है विषय के साथ विश्व की सर्वोच्च संस्कृति के धरोहर के संरक्षण करता के रूप में और मेरी मर्यादा की पताका वहां ऊंची और नीची होती जिस पटल पर अविनाश भाई और पुरुषोत्तम भाई कार्य कर रहे थे इस विश्व परिवर्तन के दौरान मेरे समानांतर।

मित्रों कुछ लोग अभी तक मेरी मेधा शक्ति का आंकलन मेरे किशी कक्षा में होने या किशी विषय विशेष का शिक्षक और उसमे प्रदर्शन और शोध होने से कर रह हैं तो मई उनसे पूंछता हूँ की अब वे इस पूरी दुनिया में मेरा विकल्प और मुझसे ज्यादा मेधा शक्ति का व्यक्ति बता दें। और वे बताएं की मैंने कहाँ प्रथम स्थान नहीं लिया इस पूरे ब्रह्माण्ड में यह एक विषय या एक कक्षा छोड़िये।----------------भौतिकी परास्नातक की प्रथमवर्ष की परिक्षा नहीं हुयी थी 1999 में यह जनवरी का समय था बिशुनपुर चौराहे पर मै खड़ा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय आने हेतु वाहन का इन्तजार कर रहा था। ऐसे में किशी व्यक्ति विशेष के द्वारा भौतिकी कक्षा में प्रथम स्थान न की प्रतह्म श्रेणी की बात आयी तो, मै ऐसा कुछ सोचकर नहीं पढ़ रहा था पर अंदाज था की परास्नातक प्रथम श्रेणी निकल जाएगा इतना विश्वास जरूर था तो मै यह सुनकर चुप रहा, पर मेरे सामने खड़े श्री अमरनाथ(रामानंद/शंकर/अमरनाथ) मामा ने कहा पांडे भौतिकी कक्षा ही नहीं पूरे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रथम आएंगे। मित्रों यह था मेरे मामा के गाँव के लोगों का मेरे ऊपर विशवास जिनका की मतभेद मेरे स्वयं के मामा श्रीधर(विष्णु)(रामानंद/रामप्रशाद/रमानाथ/श्रीधर) के परिवार से भी रहा हो उसके बावजूद वे मेरे बारे में ऐसा ही सोचते थे।----दूसरी घटना गाजीपुर मेरे अद्वितीय मित्र और सहपाठी डॉ विनय शंकर पाण्डेय/वाराणसी के विवाह की है 2001 में जब उनके पिता जी, श्रीश्याममूर्ति पाण्डेय जी जिनको की मै भी पिता जी ही कहता हूँ ने मेरे बारात में देरी से पहुंचने पर कहा था की घराती लोगों से कहा था मुझसे अति स्नेह और प्रेम के जोश में की बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को टॉपर लड़का अभी नहीं आया है जब वह आएगा तो द्वार पर बरात जाएगी। तो मित्रों कुछ लोग अभी तक मेरी मेधा शक्ति का आंकलन मेरे किशी कक्षा में होने या किशी विषय विशेष का शिक्षक और उसमे प्रदर्शन और शोध होने से कर रह हैं तो मई उनसे पूंछता हूँ की अब वे इस पूरी दुनिया में मेरा विकल्प और मुझसे ज्यादा मेधा शक्ति का व्यक्ति बता दें। और वे बताएं की मैंने कहाँ प्रथम स्थान नहीं लिया इस पूरे ब्रह्माण्ड में यह एक विषय या एक कक्षा छोड़िये। यह उनके लिए विशेष है जो हार-दर हार खाने के बावजूद भी अपने तात्कालिक हिट हेतु नियम की व्याख्या और उसका अनुपालन अपने अनुसार साम-दाम-दंड-भेद से करवाते हैं न की यहां मदांधता का प्रदर्शन है।

मित्रों कुछ लोग अभी तक मेरी मेधा शक्ति का आंकलन मेरे किशी कक्षा में होने या किशी विषय विशेष का शिक्षक और उसमे प्रदर्शन और शोध होने से कर रह हैं तो मई उनसे पूंछता हूँ की अब वे इस पूरी दुनिया में मेरा विकल्प और मुझसे ज्यादा मेधा शक्ति का व्यक्ति बता दें। और वे बताएं की मैंने कहाँ प्रथम स्थान नहीं लिया इस पूरे ब्रह्माण्ड में यह एक विषय या एक कक्षा छोड़िये।----------------भौतिकी परास्नातक की प्रथमवर्ष की परिक्षा नहीं हुयी थी 1999 में यह जनवरी का समय था बिशुनपुर चौराहे पर मै खड़ा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय आने हेतु वाहन  का इन्तजार कर रहा था। ऐसे में किशी व्यक्ति विशेष के द्वारा भौतिकी कक्षा में प्रथम स्थान न की प्रतह्म श्रेणी की बात आयी तो, मै ऐसा कुछ सोचकर नहीं पढ़ रहा था पर अंदाज था की परास्नातक प्रथम श्रेणी निकल जाएगा इतना विश्वास जरूर था तो मै यह सुनकर चुप रहा, पर मेरे सामने खड़े श्री अमरनाथ(रामानंद/शंकर/अमरनाथ) मामा ने कहा पांडे भौतिकी कक्षा ही नहीं पूरे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रथम आएंगे। मित्रों यह था मेरे मामा के गाँव के लोगों का मेरे ऊपर विशवास जिनका की मतभेद मेरे स्वयं के मामा श्रीधर(विष्णु)(रामानंद/रामप्रशाद/रमानाथ/श्रीधर)  के परिवार से भी रहा हो उसके बावजूद वे मेरे बारे में ऐसा ही सोचते थे।----दूसरी घटना गाजीपुर मेरे अद्वितीय मित्र और सहपाठी डॉ विनय शंकर पाण्डेय/वाराणसी के विवाह की है 2001 में जब उनके पिता जी, श्रीश्याममूर्ति पाण्डेय जी जिनको की मै भी पिता जी ही कहता हूँ ने मेरे बारात में देरी से पहुंचने पर कहा था की घराती लोगों से कहा था मुझसे अति स्नेह और प्रेम के जोश में की बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को टॉपर लड़का अभी नहीं आया है जब वह आएगा तो द्वार पर बरात जाएगी। तो मित्रों कुछ लोग अभी तक मेरी मेधा शक्ति का आंकलन मेरे किशी कक्षा में होने या किशी विषय विशेष का शिक्षक और उसमे प्रदर्शन और शोध होने से कर रह हैं तो मई उनसे पूंछता हूँ की अब वे इस पूरी दुनिया में मेरा विकल्प और मुझसे ज्यादा मेधा शक्ति का व्यक्ति बता दें। और वे बताएं की मैंने कहाँ प्रथम स्थान नहीं लिया इस पूरे ब्रह्माण्ड में यह एक विषय या एक कक्षा छोड़िये। यह उनके लिए विशेष है जो हार-दर हार खाने के बावजूद भी अपने तात्कालिक हिट हेतु नियम की व्याख्या और उसका अनुपालन अपने अनुसार साम-दाम-दंड-भेद से करवाते हैं न की यहां मदांधता का प्रदर्शन है।  

Monday, April 27, 2015

अगर देवियाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके मिश्रण से अलग किशी अन्य से लगन करती हैं और उस देवी का ही वंश चलता हुआ माना जाता है तो उनके वंसज का गोत्र मात्र और मात्र कश्यप गोत्र ही होगा। अगर किशी अन्य धर्म के व्यक्ति को सनातन हिन्दू धर्म में सम्मिलित किया जाता है तो प्रथम प्रवेश में उसका गोत्र मात्र और मात्र कश्यप में ही होगा जो की हिन्दू धर्म का प्रथम प्रवेश द्वार है और निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी उन्नति को प्राप्त हो वह ब्राह्मण का स्थान प्राप्त कर सकता है न की प्रारंभिक अवस्था ही उसकी ब्राह्मण ही हो जाएगी पर वह सनातन ब्राह्मण का स्थान नही ले सकता है। जबकि बौद्ध पंथ/धर्म स्वीकार करने पर ब्राह्मण जैसी अवस्था को ही प्राप्त होने का सवाल ही नहीं है सनातन ब्राह्मण तो बहुत दूर की बात है ऐसे पंथ को जिसको की साक्यवंशीय(शाकाहारी वंश) गौतम गोत्रीय क्षत्रिय, सिद्धार्थ गौतम ने प्रयोग में लाया है और जिसने सनातन हिन्दू धर्म को ब्राह्मण धर्म मात्र ही कह दिया जबकि सनातन हिन्दू धर्म ब्राह्मण धर्म, क्षत्रिय धर्म और वैस्य धर्म का समाकलित रूप है। इसी से आप आंकलन कर सकते हैं श्रेष्ठता का की सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण, गौतम गोत्रीय क्षत्रिय और गौतम गोत्रीय वैश्य ही बौद्ध मत को आसानी से अपनाना नहीं चाहते हैं बौद्ध पंथ में शीर्ष स्थान ब्राह्मण की व्यवस्था के इस पंथ में अभाव में। आप और आप की आने वाली पीढ़ी को सनातन हिन्दू धर्म में प्रवेश से कठिन किन्तु श्रेष्ठ स्थान ब्राह्मण(न की सनातन ब्राह्मण) का मिल सकता है पर बौद्ध धर्म के सरल रास्ते पर चलकर आप ब्राह्मण तो कभी भी नहीं बन सकते हैं। अब आप सनातन ब्राह्मण और ब्राह्मण परिवार के त्याग को पहचानिये जो आज तक सभी धर्मों और पन्थो के शासन के अधीन रहते हुए अभी तक अपना चिराग बुझने नहीं दिया। दुनिया ने उन्नति की और ब्राहमण अवनति किये यह मै मान ही नहीं सकता पर इतना मान सकता हूँ की यदि उनकी अवनति हुई है तो वह क्रियाशीलता में नहीं वरन शेष समाज एक समूह विशेस ने उनको भी चरित्रहीनता के कूप में अवश्य धकेला होगा आधी आबादी के माध्यम से और यहाँ इससे ज्यादा स्पस्ट मई कुछ नहीं कह सकता की आधी आबादी किसको कहते हैं। और इस शेष समाज के समूह विशेष की यह चालाकी पूरे समाज को महाविनाश के कूप में अवश्य ले जाएगी जो सच्चाई की डगर पर चलने वालों का घर ही उजाड़ देने का कार्य करते हैं। बचाना हो तो वर्तमान में इस दुनिया को चलाने वाले बचा लें प्रयोग में आने वाली आधुनिकतम तकनीकी के प्रयोग से जो सर्व सुलभ हैं इस वैज्ञानिक युग ने जब की लोग सूर्य, चन्द्र और मंगल पर जा रहे हैं पर पृथ्वी ही सुरक्षित नहीं है।-------------सब प्रकार से संशाधन और वैभव से संपन्न किन्तु सबके वाबजूद जीवन से निराश रहने की अवस्था की तुलना में अभावग्रस्त कठिन जीवन जिसमे जीवन जीने की उत्कट इक्षा बनी रहे ऐसी जीवन की ऐसी अवस्था सर्वोपरि है। अतः गरीबों को उतना ही उन्नत बनाइये जिसमे की वे वैचारिक रूप से अपने अंदर एक सज्जन व्यक्ति का जीवन जीने इक्षा को बनाये रखें। गुणवानों और सम्पन्न लोगों की कमी नहीं वरन सुसंस्कृत और सज्जन लोगों की कमी सर्वत्र द्रिस्तिगोचर हो रही है।-------------------क्या युग है जिसमे सामाजिक अवनति/गिरावट से प्रभावित हो गंगा और पार्वती का अधः पतन इतना हो गया है की कि उनका प्रेम और लगन चन्द्रमा से होता जा रहा है और लगभग हर चंद्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/सारंगधर शिव विरहा होते जा रहे हैं कर्तव्यों और मर्यादा के पालन में? कब तक चंद्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/सारंगधर शिव ऐसे चन्द्रमा, गंगा, और पार्वती को भोलेदानी आशुतोष हो अपने सिर और हृदयकुंज में आश्रय प्रदान करेंगे? अरे भाई उनका त्रिनेत्र/त्रयम्बक/विवेक कभी न कभी तो जागेगा ही न जब उनका स्वयं का एक त्रिमूर्ति इकाई बने रहने का निरपेक्ष स्वतांत्रिक स्वाभिमान जाग्रत होगा?

अगर देवियाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके मिश्रण से अलग किशी अन्य से लगन करती हैं और उस देवी का ही वंश चलता हुआ माना जाता है तो उनके वंसज का गोत्र मात्र और मात्र कश्यप गोत्र ही होगा। अगर किशी अन्य धर्म के व्यक्ति को सनातन हिन्दू धर्म में सम्मिलित किया जाता है तो प्रथम प्रवेश में उसका गोत्र मात्र और मात्र कश्यप में ही होगा जो की हिन्दू धर्म का प्रथम प्रवेश द्वार है और निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी उन्नति को प्राप्त हो वह ब्राह्मण का स्थान प्राप्त कर सकता है न की प्रारंभिक अवस्था ही उसकी ब्राह्मण ही हो जाएगी पर वह सनातन ब्राह्मण का स्थान नही ले सकता है। जबकि बौद्ध पंथ/धर्म स्वीकार करने पर ब्राह्मण जैसी अवस्था को ही प्राप्त होने का सवाल ही नहीं है सनातन ब्राह्मण तो बहुत दूर की बात है ऐसे पंथ को जिसको की साक्यवंशीय(शाकाहारी वंश) गौतम गोत्रीय क्षत्रिय, सिद्धार्थ गौतम ने प्रयोग में लाया है और जिसने सनातन हिन्दू धर्म को ब्राह्मण धर्म मात्र ही कह दिया जबकि सनातन हिन्दू धर्म ब्राह्मण धर्म, क्षत्रिय धर्म और वैस्य धर्म का समाकलित रूप है। इसी से आप आंकलन कर सकते हैं श्रेष्ठता का की सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण, गौतम गोत्रीय क्षत्रिय और गौतम गोत्रीय वैश्य ही बौद्ध मत को आसानी से अपनाना नहीं चाहते हैं बौद्ध पंथ में शीर्ष स्थान ब्राह्मण की व्यवस्था के इस पंथ में अभाव में।  आप और आप की आने वाली पीढ़ी को सनातन हिन्दू धर्म में प्रवेश से कठिन किन्तु श्रेष्ठ स्थान ब्राह्मण(न की सनातन ब्राह्मण) का मिल सकता है पर बौद्ध धर्म के सरल रास्ते पर चलकर आप ब्राह्मण तो कभी भी नहीं बन सकते हैं। अब आप सनातन ब्राह्मण और ब्राह्मण परिवार के त्याग को पहचानिये जो आज तक सभी धर्मों और पन्थो के शासन के अधीन रहते हुए अभी  तक अपना चिराग बुझने नहीं दिया।  दुनिया ने उन्नति की और ब्राहमण अवनति किये यह मै मान ही नहीं सकता पर इतना मान सकता हूँ की यदि उनकी अवनति हुई है तो वह क्रियाशीलता में नहीं वरन शेष समाज एक समूह विशेस ने उनको भी चरित्रहीनता के कूप में अवश्य धकेला होगा आधी आबादी के माध्यम से और यहाँ इससे ज्यादा स्पस्ट मई कुछ नहीं कह सकता की आधी आबादी किसको कहते हैं। और इस शेष समाज के समूह विशेष की यह चालाकी पूरे समाज को महाविनाश के कूप में अवश्य ले जाएगी जो सच्चाई की डगर पर चलने वालों का घर ही उजाड़ देने का कार्य करते हैं। बचाना हो तो वर्तमान में इस दुनिया को चलाने वाले बचा लें प्रयोग में आने वाली आधुनिकतम तकनीकी के प्रयोग से जो सर्व सुलभ हैं इस वैज्ञानिक युग ने जब की लोग सूर्य, चन्द्र और मंगल पर जा रहे हैं पर पृथ्वी ही सुरक्षित नहीं है।-------------सब प्रकार से संशाधन और वैभव से संपन्न किन्तु सबके वाबजूद जीवन से निराश रहने की अवस्था की तुलना में अभावग्रस्त कठिन जीवन जिसमे जीवन जीने की उत्कट इक्षा बनी रहे ऐसी जीवन की ऐसी अवस्था सर्वोपरि है। अतः गरीबों को उतना ही उन्नत बनाइये जिसमे की वे वैचारिक रूप से अपने अंदर एक सज्जन व्यक्ति का जीवन जीने इक्षा को बनाये रखें। गुणवानों और सम्पन्न लोगों की कमी नहीं वरन सुसंस्कृत और सज्जन लोगों की कमी सर्वत्र द्रिस्तिगोचर हो रही है।-------------------क्या युग है जिसमे सामाजिक अवनति/गिरावट से प्रभावित हो गंगा और पार्वती का अधः पतन इतना हो गया है की कि उनका प्रेम और लगन चन्द्रमा से होता जा रहा है और लगभग हर चंद्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/सारंगधर शिव विरहा होते जा रहे हैं कर्तव्यों और मर्यादा के पालन में? कब तक चंद्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/सारंगधर शिव ऐसे चन्द्रमा, गंगा, और पार्वती को भोलेदानी आशुतोष हो अपने सिर और हृदयकुंज में आश्रय प्रदान करेंगे? अरे भाई उनका त्रिनेत्र/त्रयम्बक/विवेक कभी न कभी तो जागेगा ही न जब उनका स्वयं का एक त्रिमूर्ति इकाई बने रहने का निरपेक्ष स्वतांत्रिक स्वाभिमान जाग्रत होगा?

गुणवानों और सम्पन्न लोगों की कमी नहीं वरन सुसंस्कृत और सज्जन लोगों की कमी सर्वत्र द्रिस्तिगोचर हो रही है।

गुणवानों और सम्पन्न लोगों की कमी नहीं वरन सुसंस्कृत और सज्जन लोगों की कमी सर्वत्र द्रिस्तिगोचर हो रही है।  

सब प्रकार से संशाधन और वैभव से संपन्न किन्तु सबके वाबजूद जीवन से निराश रहने की अवस्था की तुलना में अभावग्रस्त कठिन जीवन जिसमे जीवन जीने की उत्कट इक्षा बनी रहे ऐसी जीवन की ऐसी अवस्था सर्वोपरि है। अतः गरीबों को उतना ही उन्नत बनाइये जिसमे की वे वैचारिक रूप से अपने अंदर एक सज्जन व्यक्ति का जीवन जीने इक्षा को बनाये रखें। गुणवानों और सम्पन्न लोगों की कमी नहीं वरन सुसंस्कृत और सज्जन लोगों की कमी सर्वत्र द्रिस्तिगोचर हो रही है।

सब प्रकार से संशाधन और वैभव से संपन्न किन्तु सबके वाबजूद जीवन से निराश रहने की अवस्था की तुलना में अभावग्रस्त कठिन जीवन जिसमे जीवन जीने की उत्कट इक्षा बनी रहे ऐसी जीवन की ऐसी अवस्था सर्वोपरि है। अतः गरीबों को उतना ही उन्नत बनाइये जिसमे की वे वैचारिक रूप से अपने अंदर एक सज्जन व्यक्ति का जीवन जीने इक्षा को बनाये रखें। गुणवानों और सम्पन्न लोगों की कमी नहीं वरन सुसंस्कृत और सज्जन लोगों की कमी सर्वत्र द्रिस्तिगोचर हो रही है।    

क्या युग है जिसमे सामाजिक अवनति/गिरावट से प्रभावित हो गंगा और पार्वती का अधः पतन इतना हो गया है की कि उनका प्रेम और लगन चन्द्रमा से होता जा रहा है और लगभग हर चंद्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/सारंगधर शिव विरहा होते जा रहे हैं कर्तव्यों और मर्यादा के पालन में? कब तक चंद्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/सारंगधर शिव ऐसे चन्द्रमा, गंगा, और पार्वती को भोलेदानी आशुतोष हो अपने सिर और हृदयकुंज में आश्रय प्रदान करेंगे? अरे भाई उनका त्रिनेत्र/त्रयम्बक/विवेक कभी न कभी तो जागेगा ही न जब उनका स्वयं का एक त्रिमूर्ति इकाई बने रहने का निरपेक्ष स्वतांत्रिक स्वाभिमान जाग्रत होगा?

क्या युग है जिसमे सामाजिक अवनति/गिरावट से प्रभावित हो गंगा और पार्वती का अधः पतन इतना हो गया है की कि उनका प्रेम और लगन चन्द्रमा से होता जा रहा है और लगभग हर चंद्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/सारंगधर शिव विरहा होते जा रहे हैं कर्तव्यों और मर्यादा के पालन में? कब तक चंद्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/सारंगधर शिव ऐसे चन्द्रमा, गंगा, और पार्वती को भोलेदानी आशुतोष हो अपने सिर और हृदयकुंज में आश्रय प्रदान करेंगे? अरे भाई उनका त्रिनेत्र/त्रयम्बक/विवेक कभी न कभी तो जागेगा ही न जब उनका स्वयं का एक त्रिमूर्ति इकाई बने रहने का निरपेक्ष स्वतांत्रिक स्वाभिमान जाग्रत होगा? 

Thursday, April 23, 2015

पातालपुर तो दो ध्रुवी विचारों में बटा है जिसमे से एक हैं रावण के भाई अहिरावण के विचार वाले (यहाँ बताना चाहूँगा की ये अहिरावण विश्व के सबसे बड़े माफिया थे और इसलिए इनके समर्थक माफियागिरी से और अपनी तानाशाही से पातालपूरी को चलना चाहते है और उसी प्रकार दुनिया में साम्राज्य बनाये रखना चाहते है), और दूसरे हैं हनुमान और सुवर्चला(सूर्यनारायण की पुत्री) के पुत्र मकरध्वज के विचार वाले (जो सज्जनता से अपने कर्मों को करते हुए विश्व को अपनी उदारता और क्रियाशीलता से चलाना चाहते हैं)। तो पातालपुरी की समझ जिसमे नहीं होती है वह इनके एजेंटों/अभिकर्ताओं की बनरघुड़किया से डरे और इनके सम्राट के सामने सर झुकाये पर जो समझ गया है वह उनकी भी कमजोरियों को जानता है और जानता है की इस दुनिया का असली बाप भारतवर्ष= अखंडभारत है न की पातालपुरी, र पातालपुरी के सञ्चालन करता हर उसी देश में हैं जिसमे की आप रहते है इसके लिए कोई खुफिया सूचना की जरूरत नहीं एक सीधा सा उत्तर है जो जिस/जिसके कार्य के बदले जैसा खाता है वह उसी की गाता है और यही दुनिया के सभी देशों के गुप्तचर संस्थाओं की कुंजी है और यही विश्व को एक सूत्र में पिरोता भी है। और भारत में भी बहुत से ऐसे लोग हैं जिनको इस दुनिया चलाने की समझ रखते है इसी लिए भारत को कम कर आंकना उनकी चालाकी होती है पर वे लोग गलती कर देते हैं मुझ जैसे लोगों को ठीक से न पहचान पाने की अन्यथा मानवता की रक्षा और सञ्चालन में मै उनका उनसे बड़ा सहयोगी हूँ । राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवक मई जन्म से ही नहीं जन्म जन्मान्तर से ही हूँ। अतः मुझसे यह पूंछने वाले गलती कर देते हैं की मई स्वयंसेवक कब से हूँ? लोग जो सामने है उतना ही देखते है बाकी का उनको दिखाई ही नहीं देता है न?

पातालपुर तो दो ध्रुवी विचारों में बटा  है जिसमे से एक हैं रावण के भाई अहिरावण के विचार वाले (यहाँ बताना चाहूँगा की ये अहिरावण विश्व के सबसे बड़े माफिया थे और इसलिए इनके समर्थक माफियागिरी से और अपनी तानाशाही से पातालपूरी को चलना चाहते है और उसी प्रकार दुनिया में  साम्राज्य बनाये रखना चाहते है), और दूसरे हैं हनुमान और सुवर्चला(सूर्यनारायण की पुत्री) के पुत्र मकरध्वज के विचार वाले (जो सज्जनता से अपने कर्मों  को  करते हुए विश्व को अपनी उदारता और क्रियाशीलता से चलाना चाहते हैं)। तो पातालपुरी की समझ जिसमे नहीं होती है वह इनके एजेंटों/अभिकर्ताओं की बनरघुड़किया से डरे और इनके सम्राट के सामने सर झुकाये पर जो समझ गया है वह उनकी भी कमजोरियों को जानता है और जानता है की इस दुनिया का असली बाप भारतवर्ष= अखंडभारत है न की पातालपुरी, र पातालपुरी के सञ्चालन करता हर उसी देश में हैं जिसमे की आप रहते है इसके लिए कोई खुफिया सूचना की जरूरत नहीं एक सीधा सा उत्तर है जो जिस/जिसके कार्य के बदले जैसा खाता है वह उसी की गाता है और यही दुनिया के सभी देशों के गुप्तचर संस्थाओं की कुंजी है और यही विश्व को एक सूत्र में पिरोता भी है। और भारत में भी बहुत से ऐसे लोग हैं जिनको इस दुनिया चलाने की समझ रखते है इसी लिए भारत को कम कर आंकना  उनकी चालाकी होती है पर वे लोग गलती कर देते हैं मुझ जैसे लोगों को ठीक से न पहचान पाने की अन्यथा मानवता की रक्षा और सञ्चालन में मै उनका उनसे बड़ा सहयोगी हूँ । राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवक मई जन्म से ही नहीं जन्म जन्मान्तर से ही हूँ। अतः मुझसे यह पूंछने वाले गलती कर देते हैं की मई स्वयंसेवक कब से हूँ?  लोग जो सामने है उतना ही देखते है बाकी का उनको दिखाई ही नहीं देता है न?      

मै भी जाती/धर्म इस लिए मानता था/हूँ की यह पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था पूर्णतः ध्वस्त न जाय जिससे की महाविध्वंश जैसी स्थिति न उत्पन्न हो और परिणामतः मानव समाज ही न ख़त्म जाय अन्यथा विश्व हर व्यक्ति जैसा कार्य कर सकने में समर्थ हूँ। ब्राह्मण बने रहने में जो गर्व का अनुभव होता है उसके लिए त्याग भी करना पड़ता है पर इस त्याग में "सत्यमेव जयते" का पूर्ण न सही पर पूर्ण पालन का महत्तम प्रयास अन्य भाई लोगों को करना चाहिए। मतलब आप पारिवारिक जिम्मेदारिओं और मान्यताओं को नहीं मानेंगे तो परिवार कहाँ जीवित रहेगा और परिवार जीवित नहीं रहा तो समाज कहाँ जीवित रहेगा और समाज नहीं रहा तो तथाकथित सामाजिक न्याय कहाँ से आप पाएंगे और क्या पशुवत जीने वाले लोग आप कोई सेवा या सुविधा देंगे? अतः तथाकथित सामाजिक न्याय को पाना है तो कम से कम ब्राह्मण और ब्राह्मणो के परिवार को न नष्ट कीजिये क्योंकि विश्व में कर्मणा ब्राह्मण मिल जाएंगे और सर्वाहारी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आप को मिल जाएंगे पर संस्कार और संस्कृति जितनी सनातन ब्राह्मण की श्रेष्ठ होगी उतना आपके द्वारा तैयार किये वाले केवल कर्मणा ब्राह्मण और सर्वाहारी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की नहीं होगी अन्यथा अगर ये केवल पशुवत हुए आप लोगों से अपनी आत्मरक्षा हेतु तो आप राक्षस निश्चित रूप से बन जाएंगे और राक्षस युक्त समाज की स्थिरता के भगवान ही मालिक। कम से कम इतना तो प्रयास हो की किशी भी संवैधानिक व्यवस्था से "सत्यमेव जयते" की संप्रभुता और प्रतिष्ठां पर कोई आंच न आये अन्यथा जब संविधान में स्वयं इसकी आत्मा, सत्य ही नहीं है संविधान में तो केवल संविधान का अंग लेकर क्रियान्वन कैसे संभव है। आम जन मानस केवल सत्य से साक्षात्कार हेतु ही इसका पालन करता है न की संविधान की खामियों का प्रयोग कर सत्य को मार दिए जाने वाले न्याय को स्वीकार कर इसका पालन करता है।

मै भी जाती/धर्म इस लिए मानता था/हूँ की यह पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था पूर्णतः ध्वस्त न  जाय जिससे  की महाविध्वंश जैसी स्थिति न उत्पन्न हो और परिणामतः  मानव समाज ही न ख़त्म  जाय अन्यथा विश्व हर व्यक्ति जैसा कार्य  कर सकने में समर्थ हूँ।  ब्राह्मण बने रहने में जो गर्व का अनुभव होता है उसके लिए त्याग भी करना पड़ता है पर इस त्याग में "सत्यमेव जयते" का पूर्ण न सही पर पूर्ण पालन का  महत्तम प्रयास अन्य भाई लोगों को करना चाहिए। मतलब आप पारिवारिक जिम्मेदारिओं और मान्यताओं को नहीं मानेंगे तो परिवार कहाँ जीवित रहेगा और परिवार जीवित नहीं रहा तो समाज कहाँ जीवित रहेगा और समाज  नहीं रहा तो तथाकथित सामाजिक न्याय कहाँ से आप पाएंगे और क्या पशुवत जीने वाले लोग आप  कोई सेवा या सुविधा देंगे? अतः तथाकथित सामाजिक न्याय को पाना है तो कम से कम ब्राह्मण और ब्राह्मणो के परिवार को न नष्ट कीजिये क्योंकि विश्व में कर्मणा ब्राह्मण  मिल जाएंगे और सर्वाहारी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आप को मिल जाएंगे पर संस्कार और संस्कृति जितनी सनातन ब्राह्मण की श्रेष्ठ होगी उतना आपके द्वारा तैयार किये  वाले केवल कर्मणा ब्राह्मण और सर्वाहारी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की नहीं होगी अन्यथा अगर ये केवल पशुवत हुए आप लोगों से अपनी आत्मरक्षा हेतु तो आप राक्षस निश्चित रूप से बन जाएंगे और राक्षस युक्त समाज की स्थिरता के भगवान ही मालिक। कम से कम इतना तो प्रयास हो की किशी भी संवैधानिक व्यवस्था से "सत्यमेव जयते" की संप्रभुता और प्रतिष्ठां पर कोई आंच न आये अन्यथा जब संविधान में स्वयं इसकी आत्मा, सत्य ही नहीं है संविधान में तो केवल संविधान का अंग लेकर क्रियान्वन कैसे संभव है। आम जन मानस केवल सत्य से साक्षात्कार हेतु ही इसका पालन करता है न की संविधान की खामियों का प्रयोग कर सत्य को मार दिए जाने वाले न्याय को स्वीकार कर इसका पालन करता है।       

किशी ने ने अपना सीना छोटा कर लिया और किशी ने अपना सीना बढ़ा लिया पर जिसके सीने की विशालता ने हनुमान जी की तरह केवल एक या दो को ही नहीं वरन तत्कालीन इस पूरे विश्व की मानवता को सुरक्षित रखा, "वे चाहे पक्ष, विपक्ष या निरपेक्ष ही क्यों न रहे हों" तो, उसका इस मानवता के प्रति त्याग, बलिदान, प्रयास(तपश्या), सहनशीलता और उदारता कितनी होगी जिसकी सहनशीलता के जबाब दे जाने पर इस संसार की तस्वीर ही कुछ और होती ? उसके बाद भी सीता की तरह अग्नि परिक्षा? सहनशीलता हर किशी की सराहनीय है पर जो सर्वसमर्थ हो उत्तर देने में उसकी सहनशीलता श्रेष्कर है औरों से जो उत्तर न दे सकने में समर्थ हैं सहनशील बने रहते है पर समर्थवान सहनशील रहा तो उसके पीछे मानवता के एकबार पुनः सृजन का भाव ही रहा होगा जिसमे उस उत्तर देने की ऊर्जा को एक सकारात्मक दिशा दी गयी। जिसका परिणाम सकारात्मक रहा लेकिन अब भी उसी के विरोध में प्रश्नकाल और इस बहाने झूंठे श्रेय लेने वालों भरमार जिन्होंने गंगा में केवल डुबकी लगाने के बदले सेवा/सुविधा, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

किशी ने ने अपना सीना छोटा कर लिया और किशी ने अपना सीना बढ़ा लिया पर जिसके सीने की विशालता ने हनुमान जी की तरह केवल एक या दो को ही नहीं वरन तत्कालीन इस पूरे विश्व की मानवता को सुरक्षित रखा, "वे चाहे पक्ष, विपक्ष या निरपेक्ष ही क्यों न रहे हों" तो, उसका इस मानवता के प्रति त्याग, बलिदान, प्रयास(तपश्या), सहनशीलता और उदारता कितनी होगी जिसकी सहनशीलता के जबाब दे जाने पर इस संसार की तस्वीर ही कुछ और होती ? उसके बाद भी सीता की तरह अग्नि परिक्षा? सहनशीलता हर किशी की सराहनीय है पर जो सर्वसमर्थ हो उत्तर देने में उसकी सहनशीलता श्रेष्कर है औरों से जो उत्तर न दे सकने में समर्थ हैं  सहनशील बने रहते है पर समर्थवान सहनशील रहा तो उसके पीछे मानवता के एकबार पुनः सृजन का भाव ही रहा होगा जिसमे  उस उत्तर देने की ऊर्जा को एक सकारात्मक दिशा दी गयी। जिसका परिणाम सकारात्मक रहा लेकिन अब भी उसी के विरोध में प्रश्नकाल और इस बहाने झूंठे श्रेय लेने वालों  भरमार जिन्होंने गंगा में केवल डुबकी लगाने के बदले सेवा/सुविधा, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।  

Saturday, April 18, 2015

वरिष्ठता बस्ती जनपद से आये सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण बाबा सारंग(चन्द्र)धर/(चन्द्रधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/=महेश)/रामप्रसाद/रामअवध/गजाधर/आदिशंकर/सतीश/सुभाष/अभयचंद (रामापुर-223225, आजम(महान)गढ़/आर्यमगढ़/महान लोगों का स्थान) की रही और श्रेष्ठता गोरखपुर जनपद से आये सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण बाबा निवाजी/रामानंद/रामानुज(लक्षमण)/श्रीनिवाश(विष्णु)/रामप्रशाद/रमानाथ(विष्णु)/पारसनाथ(शिव)/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश/शशिधर/भानुप्रताप)(बिशुनपुर-223103, जौनपुर/जमदग्निपुर) की रही एक ब्राह्मण के रूप में तो मई क्या कहता? मुझे मान्य है की दुनिया को चमत्कारिक बनाने के लिए कुछ नियम टूटते है पर इसका मतलब यह नहीं की पूर्ण निर्धारित नियम तोड़ दें और ऐसा हुआ था और अगर ऐसा हुआ था तो "सत्यमेव जयते"/"सुदर्शन चक्र" ने अपना काम किया अशोकचक्र/शिव के कालचक्र/समय चक्र/24 ऋषियों के धर्मचक्र के स्थान पर और इस प्रकार विश्व व्यापक परिवर्तन हुए जिसमे न्यूनतम विनाश हुया। सृजनात्मक शक्ति कश्यप की ज्यादा रही गौतम की तुलना में पर विम्रता और इस्वर में निष्ठा में पीछे रहे जिससे एक ब्राह्मण में मानवता का जो स्थान गौतम का है उसकी दृस्टि से कश्यप पीछे रहे और इसी लिए कश्यप प्रोफेसर पाण्डेय भी इस महा युद्ध/महा समुद्र मंथन में लगभग तीन बार सशरीर बिशुनपुर-223103 , जौनपुर/जमदग्निपुर में स्वयं उपस्थित हो अपने से पद और उम्र दोनों में छोटे गौतम गोत्रीय लोगों से आशीर्वाद और शक्ति अर्जित किये कार्यपूर्ती हेतु जिसका की मई गवाह हूँ किशी को अगर न दिखाई दिया हो।

वरिष्ठता बस्ती जनपद से आये सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण बाबा सारंग(चन्द्र)धर/(चन्द्रधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/=महेश)/रामप्रसाद/रामअवध/गजाधर/आदिशंकर/सतीश/सुभाष/अभयचंद (रामापुर-223225, आजम(महान)गढ़/आर्यमगढ़/महान लोगों का स्थान) की रही और श्रेष्ठता गोरखपुर जनपद से आये सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण बाबा निवाजी/रामानंद/रामानुज(लक्षमण)/श्रीनिवाश(विष्णु)/रामप्रशाद/रमानाथ(विष्णु)/पारसनाथ(शिव)/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश/शशिधर/भानुप्रताप)(बिशुनपुर-223103, जौनपुर/जमदग्निपुर) की रही एक ब्राह्मण के रूप में तो मई क्या कहता? मुझे मान्य है की दुनिया को चमत्कारिक बनाने के लिए कुछ नियम टूटते है पर इसका मतलब यह नहीं की पूर्ण निर्धारित नियम तोड़ दें और ऐसा हुआ था और अगर ऐसा हुआ था तो "सत्यमेव जयते"/"सुदर्शन चक्र" ने अपना काम किया अशोकचक्र/शिव के कालचक्र/समय चक्र/24 ऋषियों के धर्मचक्र के स्थान पर और इस प्रकार विश्व व्यापक परिवर्तन हुए जिसमे न्यूनतम विनाश हुया। सृजनात्मक शक्ति कश्यप की ज्यादा रही गौतम की तुलना में पर विम्रता और इस्वर में निष्ठा में पीछे रहे जिससे एक ब्राह्मण में मानवता का जो स्थान गौतम का है उसकी दृस्टि से कश्यप पीछे रहे और इसी लिए कश्यप प्रोफेसर पाण्डेय भी इस महा युद्ध/महा समुद्र मंथन में लगभग तीन बार सशरीर बिशुनपुर-223103 , जौनपुर/जमदग्निपुर में स्वयं उपस्थित हो अपने से पद और उम्र दोनों में छोटे गौतम गोत्रीय लोगों से आशीर्वाद और शक्ति अर्जित किये कार्यपूर्ती हेतु जिसका की मई गवाह हूँ किशी को अगर न दिखाई दिया हो।

Friday, April 17, 2015

पांच हजार वर्ष पूर्व के एक सूर्यवंशीय ग्वाले(जिसने केदारनाथ और पशुपतिनाथ को अलग किया था सामाजिक मर्यादा की रक्षा हेतु और पुनः उनको इस प्रयागराज में केदारेश्वर का रूप दे दिया जोड़कर और इस प्रकार प्रायश्चित पूर्ण किया शिवांश को पूर्ण शिव बनाकर) के अनुभवानुसार जो की वर्तमान में एक कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय सनातन ब्राह्मण है इस सात ब्रह्मर्षियों/सप्तर्षियों के नाम से चले सात मूलभूत गोत्र गौतम, वशिष्ठ/पारासर/व्यास, कश्यप/मारीच, आंगिरस/भारद्वाज/गुरुबृहस्पति, भृगु/जमदाग्नि(परशुराम)/भार्गव/दधीचि/शुक्राचार्य, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय(दत्त)/सोमात्रेय(सोमा), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ में गौतम सबसे श्रेष्ठ और कश्यप सबसे वरिष्ठ है। इसको कोई भी इस सूर्यवंशीय ग्वाले की तरह जीवन यापन कर एक सनातन ब्राह्मण परिवार में जन्म पा अनुभव कर सकता है। रही अन्य की तो वशिष्ठ सबसे श्रेष्ठ गुरु, आंगिरस/भारद्वाज सबसे बड़े दार्शनिक और वैज्ञानिक, भृगु/जमदग्नि(परशुराम) सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोचित गुण/लक्षणों वाले, अत्रि/दुर्वाशा(कृष्णात्रेय) सबसे तेजस्वी, और कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ/सूर्य:गायत्रीमंत्र के प्रणेता जो सबसे छोटे है ये सबसे बड़े योद्धा और क्षत्रिय गुण वाले इसीलिये इनको अशोकचक्र/समयचक्र/शिव का कालचक्र/ 24 ऋषियों का धर्म चक्र में सबसे प्रमुख और पहला स्थान है जिसमे याज्ञवल्क जी को 24 वां स्थान मिलता है। एक सबसे प्रमुख रहस्य यह की आंगिरस के संतति गुरु बृहस्पति जो देवताओं के गुरु है और भृगु की संतति शुक्राचार्य जो दैत्यों के गुरु हैं के साथ विशेष बात यह रही की दुनिया के लगभग सभी देवता भी कश्यप/अदिति के पुत्र और दुनिया के अधिकतम दैत्य भी कश्यप/दिति(अदिति की बड़ी बहन) इस प्रकार दिति और अदिति के काशी के दक्ष प्रजापति की पुत्री होने के नाते सभी के परनाना ब्रह्मदेव ही हुए क्योंकि काशी के दक्ष प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र थे। अगर सातों ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि ब्रह्मा के मानस पुत्र थे तो विवेक, ज्ञान, और विद्या ये सरस्वती के मानस पुत्र हैं। तो ऐसे में मै विवेक स्वयं सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण होने के नाते वरिष्ठ हूँ और अधिकतम देव और दानव मुझसे सम्बंधित है तो मै निर्धारित करता हूँ की शान्तिभंग होने से पहले किशी तथ्य तक सबसे पहले पहुंचा जाय और समस्या का विकल्प ग्राउंड जीरो से खोजा जाय और जब नहीं संभालता है तो कोई न कोई कश्यप गोत्रीय श्रीराम और श्रीकृष्ण जन्म लेगा और दोषी व्यक्ति को उचित सजा देगा ही इसमे कोई तथाकथित सामाजिक न्याय और तथाकथित मानवता नहीं देखी जाएगी और न कितना नुक्सान हुआ यह देखा जाएगा क्योंकि बता दिया गया है की दुनिया एक(परमब्रह्म) है तब भी चलेगी, तीन(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) उससे हुए तब भी चलेगी, उससे चार(दूसरा परमब्रह्म हनुमान/नारद) हुए तब भी चलेगी और सब युगल हुए मतलब आठ हुए तब भी चलेगी सात और हुए तब भी चलेगी और एक(अगस्त्य/कुम्भज ऋषि) हुए तब भी चलगी और आज जितने हम हैं इतनी रही तब भी चलेगा और इससे बहुत कम हो जाएगी तब भी चलेगी लेकिन अगर पूर्ण निर्धारित सत्य शेष नहीं रह गया इस तथाकथित सामाजिक न्याय और तथाकथित मानवता के पालन में तो कुछ भी नहीं बचेगा जैसा की नयी सहस्राब्दी के संक्रमण काल में कभी भी घटित होने वाला था और सांकेतिक रूप में कुछ हुआ भी था।-------जो घटना के रहस्य के जानकार हैं उनको अबकी बार भृगुवंशी शुक्राचार्य का काम किये या आंगिरस/भरद्वाज गोत्रीय शुक्राचार्य का कार्य किये इसको लेकर संदेह में है जबकि अमूमन यह होता है कि आंगिरस/भारद्वाज गोत्रीय गुरुब्रह्स्पति का कार्य करते हैं न कि शुक्राचार्य का जिसे इस विश्व समाज को ज्ञात करना है पर कश्यप गोत्रियों ने कार्य पूर्ण कर जिसको वे गुरु वृहस्पति समझते थे प्रारंभिक युग में उस आंगिरस गुरुदेव को यज्ञ समापन करवा पूर्ण लक्ष्य प्राप्त की घोसना कर चुके हैं। वर्तमान में जो भी विशेष व्यक्ति या उसका समूह जो कुछ भी कर रहा है वह सब भविष्य को बचाने के लिए अभी से अंकित किया जा रहा है जिन व्यक्तियों को इस संसार को चलाने का दायित्व इस समय दिया गया है और व्यक्ति और व्यक्ति समूह का कार्य उसका भविष्य निर्धारित करेगा। अतः अपने कर्मो के प्रति जबाब देह होते हुए कुछ आप लोग करें तो अधिकतम समाज हित होगा।

पांच हजार वर्ष पूर्व के एक सूर्यवंशीय ग्वाले(जिसने केदारनाथ और पशुपतिनाथ को अलग किया था सामाजिक मर्यादा की रक्षा हेतु और पुनः उनको इस प्रयागराज में केदारेश्वर का रूप दे दिया जोड़कर और इस प्रकार प्रायश्चित पूर्ण किया शिवांश को पूर्ण शिव बनाकर)  के अनुभवानुसार जो की वर्तमान में एक कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय सनातन ब्राह्मण है इस सात ब्रह्मर्षियों/सप्तर्षियों के नाम से चले सात मूलभूत गोत्र गौतम, वशिष्ठ/पारासर/व्यास, कश्यप/मारीच, आंगिरस/भारद्वाज/गुरुबृहस्पति, भृगु/जमदाग्नि(परशुराम)/भार्गव/दधीचि/शुक्राचार्य, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय(दत्त)/सोमात्रेय(सोमा), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ में गौतम सबसे श्रेष्ठ और कश्यप सबसे वरिष्ठ है। इसको कोई भी इस सूर्यवंशीय ग्वाले की तरह जीवन यापन कर एक सनातन ब्राह्मण परिवार में जन्म पा अनुभव कर सकता है। रही अन्य की तो वशिष्ठ सबसे श्रेष्ठ गुरु, आंगिरस/भारद्वाज सबसे बड़े दार्शनिक और वैज्ञानिक, भृगु/जमदग्नि(परशुराम) सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोचित गुण/लक्षणों वाले, अत्रि/दुर्वाशा(कृष्णात्रेय) सबसे तेजस्वी, और कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ/सूर्य:गायत्रीमंत्र के प्रणेता जो सबसे छोटे है ये सबसे बड़े योद्धा और क्षत्रिय गुण वाले इसीलिये इनको अशोकचक्र/समयचक्र/शिव का कालचक्र/ 24 ऋषियों का धर्म चक्र में सबसे प्रमुख और पहला स्थान है जिसमे याज्ञवल्क जी को 24 वां स्थान मिलता है।  एक सबसे प्रमुख रहस्य यह की आंगिरस के संतति गुरु बृहस्पति जो देवताओं के गुरु है और भृगु की संतति शुक्राचार्य जो दैत्यों के गुरु हैं के साथ विशेष बात यह रही की दुनिया के लगभग सभी देवता भी कश्यप/अदिति के पुत्र और दुनिया के अधिकतम  दैत्य भी कश्यप/दिति(अदिति की बड़ी बहन) इस प्रकार दिति और अदिति के काशी के दक्ष प्रजापति की पुत्री होने  के नाते सभी के परनाना ब्रह्मदेव ही हुए क्योंकि  काशी के दक्ष प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र थे। अगर सातों ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि ब्रह्मा के मानस पुत्र थे तो विवेक, ज्ञान, और विद्या ये सरस्वती के मानस  पुत्र हैं।  तो ऐसे में मै विवेक स्वयं सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण होने के नाते वरिष्ठ हूँ और अधिकतम देव और दानव मुझसे सम्बंधित है तो मै निर्धारित करता हूँ की शान्तिभंग होने से पहले किशी तथ्य तक सबसे पहले पहुंचा जाय और समस्या का विकल्प ग्राउंड जीरो से खोजा जाय और जब नहीं संभालता है तो कोई न कोई कश्यप गोत्रीय श्रीराम और श्रीकृष्ण जन्म लेगा और दोषी व्यक्ति को उचित सजा देगा ही इसमे कोई तथाकथित सामाजिक न्याय और तथाकथित मानवता नहीं देखी जाएगी और न कितना नुक्सान हुआ यह देखा जाएगा क्योंकि बता दिया  गया है की दुनिया एक(परमब्रह्म) है तब भी चलेगी, तीन(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) उससे हुए तब भी चलेगी, उससे चार(दूसरा परमब्रह्म हनुमान/नारद) हुए तब भी चलेगी  और सब युगल हुए मतलब आठ हुए तब भी चलेगी  सात और हुए तब भी चलेगी और एक(अगस्त्य/कुम्भज ऋषि) हुए तब भी चलगी और आज जितने हम हैं इतनी रही तब भी चलेगा और इससे बहुत कम हो जाएगी तब भी चलेगी लेकिन अगर पूर्ण निर्धारित सत्य शेष नहीं रह गया इस तथाकथित सामाजिक न्याय और तथाकथित मानवता के पालन में तो कुछ भी नहीं बचेगा जैसा की नयी सहस्राब्दी के संक्रमण काल में  कभी भी घटित होने वाला था और सांकेतिक रूप में कुछ हुआ भी था।-------जो घटना के रहस्य के जानकार हैं उनको अबकी बार भृगुवंशी शुक्राचार्य का काम किये या आंगिरस/भरद्वाज गोत्रीय शुक्राचार्य का कार्य किये इसको लेकर संदेह में है जबकि अमूमन यह होता है कि आंगिरस/भारद्वाज गोत्रीय गुरुब्रह्स्पति का कार्य करते हैं  न कि शुक्राचार्य का जिसे इस विश्व समाज को ज्ञात करना है पर कश्यप गोत्रियों ने कार्य पूर्ण कर जिसको वे गुरु वृहस्पति समझते थे प्रारंभिक युग में उस आंगिरस गुरुदेव को यज्ञ समापन करवा पूर्ण लक्ष्य प्राप्त की घोसना कर चुके हैं। वर्तमान में जो भी विशेष व्यक्ति या उसका समूह जो कुछ भी कर रहा है वह सब भविष्य को बचाने के लिए अभी से अंकित किया जा रहा है जिन व्यक्तियों को इस संसार को चलाने का दायित्व इस समय दिया गया है और व्यक्ति और व्यक्ति समूह का कार्य उसका भविष्य निर्धारित करेगा। अतः अपने कर्मो के प्रति जबाब देह होते हुए कुछ आप लोग करें तो अधिकतम समाज हित होगा।

नमामि त्रिदेवे (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को शक्ति प्रदानकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के अस्तित्व को मूलभूत सृस्टि संचालक बनाने वाले: बाकी सब जाती/धर्म की उत्पत्ति के स्रोत यही हैं) इन तीन प्रथम नागरिक त्रिदेव(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) को अपने मूल स्वरुप में बने रहने के लिए नारी शक्ति की भी जरूरत नहीं पड़ती अगर इन तीन के आगे और सृजन न करना हो इनको माधव कहा गया है मतलब इनको जन्म देने वाला कोई नहीं होता ये प्रकट होते है और इस सृस्टि में यह तीन शक्ति एक तीन से दूसरे तीन व्यक्ति या किशी एक ही व्यक्ति में स्थान्तरित होते रहते हैं। मैंने आप लोगों को यही सन्देश दिया है की जब तक इस सृस्टि में दाल, चावल और आटा रहेगा तभी तक मिलावटी भोजन आप बना सकते हैं तरह-तरह के वे स्वादिष्ट और अच्छे गुणवत्ता वाले हो सकते हैं पर स्थायित्व आप को दाल, चावल और आटा पर ही आकर मिलेगा और आप की मूल शक्ति भी दाल, चावल और आंटे से ही आंकी जाएगी और जब विनाश की घड़ी आयी थी तब भी आप इसी दाल, चावल और आंटे को ही आगे किये थे नियंत्रित करने के लिए आप के अंदर जो भी तत्व जिससे सम्बंधित था अलग-अलग हो इसी दाल, चावल और आंटे में मिलने लगा और इन तीनों को नियंत्रक की स्थिति में आने को बाध्य कर दिया। आप को इसलिए बाप/जनक/दशरथ/वशुदेव से युद्ध नहीं करना चाहिए और आप दाल, चावल और आंटे के अस्तित्व पर कभी भी प्रश्न चिन्ह न लगाईयेगा लजीज व्यंजन इससे बना कर इतराते हुए। नमामि त्रिदेवे जिनको अपने मूल स्वरुप में बने रहने के लिए नारी शक्ति की भी जरूरत नहीं पड़ती अगर इन तीन के आगे और सृजन न करना हो।

नमामि त्रिदेवे (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को शक्ति प्रदानकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के अस्तित्व को मूलभूत सृस्टि संचालक बनाने वाले: बाकी सब जाती/धर्म की उत्पत्ति के स्रोत यही हैं)  इन तीन प्रथम नागरिक त्रिदेव(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) को अपने मूल स्वरुप में बने रहने के लिए नारी शक्ति की भी जरूरत नहीं पड़ती अगर इन तीन के आगे और सृजन न करना हो इनको माधव कहा गया है मतलब इनको जन्म देने वाला कोई नहीं होता ये प्रकट होते है और इस सृस्टि में यह तीन शक्ति एक तीन से दूसरे तीन व्यक्ति या किशी एक ही व्यक्ति में स्थान्तरित होते रहते हैं। मैंने आप लोगों को यही सन्देश दिया है की जब तक इस सृस्टि में दाल, चावल और आटा रहेगा तभी तक मिलावटी भोजन आप बना सकते हैं तरह-तरह के वे स्वादिष्ट और अच्छे गुणवत्ता वाले हो सकते हैं पर स्थायित्व आप को दाल, चावल और आटा पर ही आकर मिलेगा और आप की मूल शक्ति भी दाल, चावल और आंटे से ही आंकी जाएगी और जब विनाश की घड़ी आयी थी तब भी आप इसी दाल, चावल और आंटे को ही आगे किये थे नियंत्रित करने के लिए आप के अंदर जो भी तत्व जिससे सम्बंधित था अलग-अलग हो इसी दाल, चावल और आंटे में मिलने लगा और इन तीनों को नियंत्रक की स्थिति में आने को बाध्य कर दिया। आप को इसलिए बाप/जनक/दशरथ/वशुदेव से युद्ध नहीं करना चाहिए और आप दाल, चावल और आंटे के अस्तित्व पर कभी भी प्रश्न चिन्ह न लगाईयेगा  लजीज व्यंजन इससे बना कर इतराते हुए। नमामि त्रिदेवे जिनको अपने मूल स्वरुप में बने रहने के लिए नारी शक्ति की भी जरूरत नहीं पड़ती अगर इन तीन के आगे और सृजन न करना हो।

गौतम गोत्रीय अत्यंत शौर्यशाली क्षत्रिय वीर राजाओं का क्षेत्र रहा है अवध और काशी का बफर क्षेत्र(आजमगढ़) जिनका अवध के राजाओं से वैवाहिक सम्बन्ध(सूर्यवंश/कश्यप का गौतम से सम्बन्ध जो मान्य है उत्तर भारतीयों में ) रहे हैं आदिकाल से जिसके अंतिम राजा विक्रमजीत/विक्रमादित्य रहे है| गौतम गोत्रीय शौर्यशाली क्षत्रिय वीर राजाओं ने चंगेज खान को भी इस क्षेत्र में घुसने नहीं दिया जो की बंगाल और बिहार तक चला गया जौनपुर होते हुए लेकिन इस इंच भूमि भी इन गौतम गोत्रीय क्षत्रियों की नहीं प्राप्त कर सका। भारत में अंग्रेजों के प्रथम पदार्पण हो जाने पर ऐसे शूर वीर गौतम गोत्रीय क्षत्रियों ने वैवाहिक सम्बन्ध इस्लाम अनुयायी कन्या से करके भारत के सबसे अलग और अंतिम क्षत्रिय राजा की उपाधि धारण किये जिन्होंने अपने पुत्रों को नाम इस्लाम जगत का रखा और वे दो पुत्र थे आज़म और अज़मत और इनकी यही शूरवीरता इस्लाम अनुयायी हो जाने पर भी आज तक बनी है जो आन-बान-शान पर मर मिटने वाले है वक्त दर वक्त इस देश और समाज के लिए। पर हो सकता है कुछ स्थिर और एक निश्चित सीमा तक सोचने वाले इनको ठीक से समझने में भूल कर देते हों क्योंकि वाह्य दुनिया से इनका सम्बन्ध बहुत पुराना है।

गौतम गोत्रीय अत्यंत शौर्यशाली क्षत्रिय वीर राजाओं का क्षेत्र रहा है अवध और काशी का बफर क्षेत्र(आजमगढ़) जिनका अवध के राजाओं से वैवाहिक सम्बन्ध(सूर्यवंश/कश्यप का गौतम से सम्बन्ध जो मान्य है उत्तर भारतीयों में ) रहे हैं आदिकाल से जिसके अंतिम राजा विक्रमजीत/विक्रमादित्य रहे है| गौतम गोत्रीय शौर्यशाली क्षत्रिय वीर राजाओं ने चंगेज खान को भी इस क्षेत्र में घुसने नहीं दिया जो की बंगाल और बिहार तक चला गया जौनपुर होते हुए लेकिन इस इंच भूमि भी इन गौतम गोत्रीय क्षत्रियों की नहीं प्राप्त कर सका। भारत में अंग्रेजों के प्रथम पदार्पण हो जाने पर ऐसे शूर वीर गौतम गोत्रीय क्षत्रियों ने वैवाहिक सम्बन्ध इस्लाम अनुयायी कन्या से करके भारत के सबसे अलग और अंतिम क्षत्रिय राजा की उपाधि धारण किये जिन्होंने अपने पुत्रों को नाम इस्लाम जगत का रखा और वे दो पुत्र थे आज़म और अज़मत और इनकी यही शूरवीरता इस्लाम अनुयायी हो जाने पर भी आज तक बनी है जो आन-बान-शान पर मर मिटने वाले है वक्त दर वक्त इस देश और समाज के लिए। पर हो सकता है कुछ स्थिर और एक निश्चित सीमा तक सोचने वाले इनको ठीक से समझने में भूल कर देते हों क्योंकि वाह्य दुनिया से इनका सम्बन्ध बहुत पुराना है।
  Re; मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।  

इसलिए मै तो मामा के यहां के हर वरिष्ठ व्यक्ति द्वारा भांजे और नाती कहा जाता हूँ वह किशी जाती और धर्म से रहा हो तो किशी प्रयागराज विश्वविद्यालय में जौनपुर के किशी प्रोफेसर को मामा कह दिया तो वह सालीनता कहा जा सकता है इसका कोई अलग अर्थ न निकला जाय जिससे की अर्थ से अनर्थ हो जाय।>>>>>मेरी जहां तक बात है तो न की मेरे गाँव बल्कि आजमगढ़ के मेरे पांच गाँव(रामापुर-223225, लग्गूपुर, औराडार, गुमकोठी, बाग़बहार) और स्वयं ओरिल के सभी लोगों के पुरोधा कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय संतान ब्राह्मण, बाबा सारंग(चन्द्र)धर/चन्द्रधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर जिनको एक मुस्लिम/इस्लाम अनुयायी हो चुके जागीरदार ने ये सब गांव दान में दिए थे इस बस्ती जनपद से आये बाबा जी को किन्तु दादी/माता जौनपुर जनपद के पास की थीं तो पूरा जौनपुर हम लोगों का मामा है। और जौनपुर विश्वगुरु है तो जाहिर सी बात है की हम लोगों की प्रथम गुरु हमारी माता है उत्तराधिकार पिता से हमें भले ही प्राप्त हो। यह मेरे लिए सुनहरा अवसर था की मई जौनपुर में ही सनातन वशिष्ठ गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण दादी के यहां(भरारी/भर्रारी-223203) जन्म लिया और सनातन गौतम गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण माता के यहां(बिशुनपुर-223103) जीवन का अधिकतम समय व्यतीत किया और वही से ऊर्जा भी लेता हूँ अभी तक आवश्यक पड़ने पर। इसलिए मै तो मामा के यहां के हर वरिष्ठ व्यक्ति द्वारा भांजे और नाती कहा जाता हूँ वह किशी जाती और धर्म से रहा हो तो किशी प्रयागराज विश्वविद्यालय में जौनपुर के किशी प्रोफेसर को मामा कह दिया तो वह सालीनता कहा जा सकता है इसका कोई अलग अर्थ न निकला जाय जिससे की अर्थ से अनर्थ हो जाय।

 इसलिए मै तो मामा के यहां के हर वरिष्ठ व्यक्ति द्वारा भांजे और नाती कहा जाता हूँ वह किशी जाती और धर्म से रहा हो तो किशी प्रयागराज विश्वविद्यालय में जौनपुर के किशी प्रोफेसर को मामा कह दिया तो वह सालीनता कहा जा सकता है इसका कोई अलग अर्थ न निकला जाय जिससे की अर्थ से अनर्थ हो जाय।>>>>>मेरी जहां तक बात है तो न की मेरे गाँव बल्कि आजमगढ़ के मेरे पांच गाँव(रामापुर-223225, लग्गूपुर, औराडार, गुमकोठी, बाग़बहार) और स्वयं ओरिल के सभी लोगों के पुरोधा कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय संतान ब्राह्मण, बाबा सारंग(चन्द्र)धर/चन्द्रधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर जिनको एक मुस्लिम/इस्लाम अनुयायी हो चुके जागीरदार ने ये सब गांव दान में दिए थे इस बस्ती जनपद से आये बाबा जी को किन्तु दादी/माता जौनपुर जनपद के पास की थीं तो पूरा जौनपुर हम लोगों का मामा है। और जौनपुर विश्वगुरु है तो जाहिर सी बात है की हम लोगों की प्रथम गुरु हमारी माता है उत्तराधिकार पिता से हमें भले ही प्राप्त हो। यह मेरे लिए सुनहरा अवसर था की मई जौनपुर में ही सनातन वशिष्ठ गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण दादी के यहां(भरारी/भर्रारी-223203) जन्म लिया और सनातन गौतम गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण माता के यहां(बिशुनपुर-223103) जीवन का अधिकतम समय व्यतीत किया और वही से ऊर्जा भी लेता हूँ अभी तक आवश्यक पड़ने पर।  इसलिए मै तो मामा के यहां के हर वरिष्ठ व्यक्ति द्वारा भांजे और नाती कहा जाता हूँ वह किशी जाती और धर्म से रहा हो तो किशी प्रयागराज विश्वविद्यालय में जौनपुर के किशी प्रोफेसर को मामा कह दिया तो वह सालीनता कहा जा सकता है इसका कोई अलग अर्थ न निकला जाय जिससे की अर्थ से अनर्थ हो जाय।        

Thursday, April 16, 2015

आप लोगों को एक कहानी जीवन की सुनानी है की अतिथि देवो भव और सत्यम शिवम सुंदरम के लिए कुछ कैसे त्याग सकते है: गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय(सरस्वतीमहिमा महती महीयताम्), समोधपुर, जौनपुर/जमदग्निपर से हम, तेज प्रताप सिंह, संजीव उपाध्याय, श्रीकृष्ण पाण्डेय, शुभाष पाण्डेय भौतिकी (एलेक्ट्रॉनिक्स) में परास्नातक छात्र थे तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय(सत्यम शिवम सुंदरम) , जौनपुर में और वहां भूपतिपत्ति के एक बाबू साहब के मकान में रहते थे जो प्रोफेसर थे कलकत्ता विश्वविद्यालय में और बरसठी, जौनपुर उनका पैतृक निवास था। हम लोगों के साथ संजय मिश्रा जी रहते थे जो रसायन विज्ञान के छात्र थे इसी कालेज में और सब एक साथ में रहने के कारन जब कोई अकेला पड़ जाता है तो जाहिर सी बात है की उसका मन कमरे पर नहीं लगता और आज की तरह मोबाइल भी नहीं था की इंटरनेट और गाना लगा के बिजी रहे कोई। तो एक दिन रसायनशास्त्र की कक्षा नहीं चलनी थी और संजय कहे की भाई हम भी चलते हैं और आप लोगों के साथ भौतिकी पढ़ते है यहाँ रूम पर बैठकर क्या करेंगे। मने मना किया पर हम सभी गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय समोधपुर से थे तो सभी और चार मित्रों ने कहा चलने दीजिये बहुत होगा कोई शिक्षक बार निकल देगा अगर ध्यान देगा तब। विभागाध्यक्ष डॉ विजय नारायण गुप्ता की कक्षा लगी और वे पढ़ाते समय कुछ पूंछने लगे एक दिन पहले के क्लास से सम्बंधित क्रम में होने से तो अब संजय की बारी आ गयी। उन्होंने पूंछ की आप कौन बाकी को तो मई जनता हूँ, तो संजय बोले रसायन शास्त्र का छात्र हूँ वह कुछ मित्र मुझे यहां लाये हैं। किसके साथ आये हैं खड़े होइए! कोई वह मित्र नहीं खड़ा हो रहा जो संजय को विशेष रूप से लाया था| मई सोचा की यह तो ठीक नहीं है संजय को अपमानित ज्यादा होना पड़ रहा है। अतः मैंने कहा की गुरूजी मई लेके आया हूँ। वे बोले की चक्के महाविद्यालय से हो, नहीं गांधी स्मारक महाविद्यालय समोधपुर, जौनपुर से। तो क्या ऐसा समोधपुर वाले कर सकते हैं क्या? दिन बीत गया किशी तरह से पर मई सोच लिया की इस कॉलेज को छोड़ना है विभागाध्यक्ष की नजर में सब ठीक नहीं रहा और संयोग से अगस्त में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय(विद्यायामृतसमसनुते), वाराणसी पहुँच गया। वहा प्रोफेसर फूल चंद मिश्रा से मिलाने जब वे एक बार आये थे तो प्रणाम कर आशीर्वाद लेने पर परिचय बताया तो वे मुस्कारे लगे। यह था सत्य को स्वीकारने और अतिथि देवो भव का परिणाम और उससे सम्बंधित एक छोटी सी घटना जिसमे संजय को मैंने लाया था यह अधूरा सत्य था क्योंकि मैंने उनको मना किया था और जब मित्र लोग नही माने तो मई कहा ठीक है चलिए और एक अतिथि हो चुके भौतिकी की कक्षा में आकर संजय मिश्रा जी।

आप लोगों को एक कहानी जीवन की सुनानी है की अतिथि देवो भव और सत्यम शिवम सुंदरम के लिए कुछ कैसे त्याग सकते है: गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय(सरस्वतीमहिमा महती महीयताम्), समोधपुर, जौनपुर/जमदग्निपर से हम, तेज प्रताप सिंह, संजीव उपाध्याय, श्रीकृष्ण पाण्डेय, शुभाष पाण्डेय भौतिकी (एलेक्ट्रॉनिक्स) में परास्नातक छात्र थे तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय(सत्यम शिवम सुंदरम) , जौनपुर में और वहां भूपतिपत्ति के एक बाबू साहब के मकान में रहते थे जो प्रोफेसर थे कलकत्ता विश्वविद्यालय में और बरसठी, जौनपुर उनका पैतृक निवास था। हम लोगों के साथ संजय मिश्रा जी रहते थे जो रसायन विज्ञान के छात्र थे इसी कालेज में और सब एक साथ में रहने के कारन जब कोई अकेला पड़ जाता है तो जाहिर सी बात है की उसका मन कमरे पर नहीं लगता और आज की तरह मोबाइल भी नहीं था की इंटरनेट और गाना लगा के बिजी रहे कोई। तो एक दिन रसायनशास्त्र की कक्षा नहीं चलनी थी और संजय कहे की भाई हम भी चलते हैं और आप लोगों के साथ भौतिकी पढ़ते है यहाँ रूम पर बैठकर क्या करेंगे। मने मना किया पर हम सभी गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय समोधपुर से थे तो सभी और चार मित्रों ने कहा चलने दीजिये बहुत होगा कोई शिक्षक बार निकल देगा अगर ध्यान देगा तब। विभागाध्यक्ष डॉ विजय नारायण गुप्ता की कक्षा लगी और वे पढ़ाते समय कुछ पूंछने लगे एक दिन पहले के क्लास से सम्बंधित क्रम में होने से तो अब संजय की बारी आ गयी। उन्होंने पूंछ की आप कौन बाकी को तो मई जनता हूँ, तो संजय बोले रसायन शास्त्र का  छात्र हूँ वह कुछ मित्र मुझे यहां लाये हैं। किसके साथ आये हैं खड़े होइए! कोई वह मित्र नहीं खड़ा हो रहा जो संजय को विशेष रूप से लाया था| मई सोचा की यह तो ठीक नहीं है संजय को अपमानित ज्यादा होना पड़  रहा है। अतः मैंने कहा की गुरूजी मई लेके आया हूँ। वे बोले की चक्के महाविद्यालय से हो, नहीं गांधी स्मारक महाविद्यालय समोधपुर, जौनपुर से। तो क्या ऐसा समोधपुर वाले कर सकते हैं क्या?  दिन बीत गया किशी तरह से पर मई सोच लिया की इस कॉलेज को छोड़ना है विभागाध्यक्ष की नजर में सब ठीक नहीं रहा और संयोग से अगस्त में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय(विद्यायामृतसमसनुते), वाराणसी पहुँच गया। वहा प्रोफेसर फूल चंद मिश्रा से मिलाने जब वे एक बार आये थे तो प्रणाम कर आशीर्वाद लेने पर परिचय बताया तो वे मुस्कारे लगे। यह था सत्य को स्वीकारने और अतिथि देवो भव का परिणाम और उससे सम्बंधित एक छोटी सी घटना जिसमे संजय को मैंने लाया था यह अधूरा सत्य था क्योंकि मैंने उनको मना किया था और जब मित्र  लोग नही माने तो मई कहा ठीक है चलिए और एक अतिथि हो चुके भौतिकी की कक्षा में आकर संजय मिश्रा जी।     

In the RAM/KRISHNA HOSTEL, BANARAS HINDU UNIVERSITY, Varanasi, I was the person mimicry zed by ATAL and JOSHI due to favoring BJP and RSS in comparison with the so called social justice Parties like BSP, SP and RJD those had full regional control in UP and Bihar at that time of 1998-2000 although in the center there was BJP Govt. There is a huge change in the vision and thoughts of these parties due to recognizance of their own person in the Brahmin/Sawarns. At that time(1998-2000) this so called social justice was based on Brahmin/ Savarns specially versus non-Brahmin/Savarn and now at this time it is 87%(BRAHMIN+KSHATRIY+ VAISYA+ all their Mixed from) versus other one i.e. 13% >>>This is the true struggle for which my sacrifice played good role. With this progress I am satisfied and hope a time will come very soon when there will be no need of so called social justice by Govt. forming parties but we all be based on the Suprem Power GOD i.e. Suprem DEEN DAYAL. This was myself on orkut at Indian Institute of Science, Bangalore that If India Govt. is not giving Bharat Ratn to Atal ji then I will give RAM RATN to ATAL JI and KRISHN RATNA TO JOSHI JI. I hope Vishnukant(Rashi name Venkatesh, Thursday, 30-09-2010, SHRI Ram Janmbhoomi clear cut decision in favor of Ram-lala with social boundary ) is Ram Ratn and Krishnakant(Rashi name Vaashudev, Wednesday, 28-08-2013, ShriKrishn Janmastami) is the Krishn Ratn. I assume both will be with us and will memorized for them in future.

In the RAM/KRISHNA HOSTEL, BANARAS HINDU UNIVERSITY, Varanasi, I was the person mimicry zed by ATAL and JOSHI due to favoring BJP and RSS in comparison with the so called social justice Parties like BSP, SP and RJD those had full regional control in UP and Bihar at that time of 1998-2000 although in the center there was BJP Govt. There is a huge change in the vision and thoughts of these parties due to recognizance of their own person in the Brahmin/Sawarns. At that time(1998-2000) this so called social justice was based on Brahmin/ Savarns specially versus non-Brahmin/Savarn and now at this time it is 87%(BRAHMIN+KSHATRIY+ VAISYA+ all their Mixed from) versus other one i.e. 13% >>>This is the true struggle for which my sacrifice played good role. With this progress I am satisfied and hope a time will come very soon when there will be no need of so called social justice by Govt. forming parties but we all be based on the Suprem Power GOD i.e. Suprem DEEN DAYAL. This was myself on orkut at Indian Institute of Science, Bangalore that If India Govt. is not giving Bharat Ratn to Atal ji then I will give RAM RATN to ATAL JI and KRISHN RATNA TO JOSHI JI. I hope Vishnukant(Rashi name Venkatesh, Thursday, 30-09-2010, SHRI Ram Janmbhoomi clear cut decision in favor of Ram-lala with social boundary ) is Ram Ratn and Krishnakant(Rashi name Vaashudev, Wednesday, 28-08-2013, ShriKrishn Janmastami) is the Krishn Ratn. I assume both will be with us and will memorized for them in future.

I hope not only myself but we all 13 only passed from the National Inter College Pattinarendrapur jaunpur​ in 1993 in the science (maths and biology) have done well in his life, especially in social field, in regime of care taker govt. of BJP in leadership of Mananeey Kalyan Singh under the Education Ministry of the present Home Minister of India, Govt. i.e Mananeey Rajnath Singh, although the teachers evaluated our answer sheet of Intermediate in that year 1993 in Garhwal (the thorn in Uttar Pradesh) not done good with us by doing general marking . It given me 2nd position in the college with twins(Mr. Rajesh Mishra) among the academic year 1991-93 only students although I was at 1st position in the entrance of intermediate. My over all performance of the 2 year was better than all and having highest marks in High School (443/600) among intermediate students. But this laid down our moral too weak to became an engineer in life, but it played the better role to make my life happiest and useful, so that I reached here in the Prayagraj Vishvavidyalay/ Allaah-Aabaad University. I am satisfied with the results. Although all my 13 classmates are the my closest but one of the nearest by heart and closest in SANGH is Shri Balvant Singh who know me very well and working at the most important place of SANGH as a teacher/Acharya and he used maximum of his energy for his family and society. I can say that all thirteen blessed by our Gurus but specially my Maths Guru Shri Amarjeet Verma((althogh they/Shri Shridhar Mishra(Physics)/ Shri Shiv Prashad Singh(chemistry)/Shri Gyanendra Singh(Biology)/Shri Amarjeet Verma(Maths)/Shri Dinesh Pratap Singh(English)/Shri Radhe Shyam Tiwari(Hindi) produces many engineers/doctors/scientists/others) had hoped that from a distance away I will work more for society than in Science, I think I have done well and the brief result is "Vivekanand and Madern Tradition". How much it influences the society I don't know but many of our close friend benefited and got a basic look of our culture, society and religion. People should know that Jaunpur/Jamadagnipur by the mean of Jagadamni Rishi's son Lord Parashuram cultivated the people of hole India started from Kerala to Uttarakhand. Thus produces so many scientist and knowledgeable person in the world and India, so people of Jaunpur need to work for society specially with the gaining knowledge, power and wealth. Among my all 13 classmates 10 from maths are: Vivek Kumar Pandey, Satyadev Tiwari, Rajesh Mishra, Santosh Dube, Balvant Singh, Tej Pratap Singh, Pradep Singh, Ashwani Singh (Maurya), Subhash Yadva, Om Praksh Yadva. Here i do'nt want to give name of Bio classmates because all these three are female. Once I pray the world Gurubhoomi, Jaunpur for continue the his duty of spreading knowledge and Indian culture & moral values according the Sanatan Hindu Religion. Never said that there is not even a Single Brahmin remained in this world.

I hope not only myself but we all 13 only passed from the National Inter College Pattinarendrapur jaunpur​ in 1993 in the science (maths and biology) have done well in his life, especially in social field, in regime of care taker govt. of BJP in leadership of Mananeey Kalyan Singh under the Education Ministry of the present Home Minister of India, Govt. i.e Mananeey Rajnath Singh,  although the teachers evaluated our answer sheet of Intermediate in that year 1993 in Garhwal (the thorn in Uttar Pradesh) not done good with us by doing general marking . It given me 2nd position in the college with twins(Mr. Rajesh Mishra) among the academic year 1991-93 only students although I was at 1st position in the entrance of intermediate. My over all performance of the 2 year was better than all and having highest marks in High School (443/600) among intermediate students.  But this laid down our moral too weak to became an engineer in life, but it played the better role to make my life happiest and useful, so that I reached here in the Prayagraj Vishvavidyalay/ Allaah-Aabaad University. I am satisfied with the results. Although all my 13 classmates are the my closest but one of the nearest by heart and closest in SANGH is Shri Balvant Singh who know me very well and working at the most important place of SANGH as a teacher/Acharya and he used maximum of his energy for his family and society. I can say that all thirteen blessed by our Gurus but specially my Maths Guru Shri Amarjeet Verma((althogh they/Shri Shridhar Mishra(Physics)/ Shri Shiv Prashad Singh(chemistry)/Shri Gyanendra Singh(Biology)/Shri Amarjeet Verma(Maths)/Shri Dinesh Pratap Singh(English)/Shri Radhe Shyam Tiwari(Hindi)  produces many engineers/doctors/scientists/others) had hoped that from a distance away I will work more for society than in Science, I think I have done well and the brief result is "Vivekanand and Madern Tradition". How much it influences the society I don't know but many of our close friend benefited and got a basic look of our culture, society  and religion. People should know that Jaunpur/Jamadagnipur by the mean of Jagadamni Rishi's son Lord Parashuram cultivated the people of hole India started from Kerala to Uttarakhand. Thus produces so many scientist and knowledgeable person in the world and India, so people of Jaunpur need to work for society specially with the gaining knowledge, power and wealth. Among my all 13 classmates 10 from maths are: Vivek Kumar Pandey, Satyadev Tiwari, Rajesh Mishra, Santosh Dube, Balvant Singh, Tej Pratap Singh,  Pradep Singh,  Ashwani Singh (Maurya), Subhash Yadva, Om Praksh Yadva. Here i do'nt want to give name of Bio classmates because all these three are female.  Once I pray the world Gurubhoomi, Jaunpur for continue the his duty of spreading knowledge and Indian culture & moral values according the Sanatan Hindu Religion.  Never said that there is not even a Single Brahmin remained in this world.

भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु के हर विभाग, छात्रावास और केंद्र की दो बार पूजा और अर्चना और जसवन्तपुर, बेंगलुरु के गायत्री मंदिर से प्रारम्भ कर सबसे पहले जयप्रकाश नारायण पार्क जाकर रुका था और इस प्रकार वहां से जसवंतपुर के लगभग हर मंदिर और कुछ खुले हुए गिरिजाघर में कलमा और गायत्रीमंत्र सहित स्तुति और सास्टांग प्रणाम सहित आगे बढ़ता गया भारतीय जनता पार्टी से लेकर लगभग हर पार्टी के जनता के सेवार्थ जसवन्तपुर में खुले हुए कार्यालय को सास्टांग दंडवत करते हुए और इसके साथ सामान्य सज्जन बस्तियों और मलिन बस्ती/झुग्गी झोपड़ी के लोगों को सादर नमन किया और जसवन्तपुर में रेलवे के किनारे मलिन बस्ती का व् आवास याद है जो बहुत ही स्वक्ष था और वहा गांधी, नेहरू, इंदिरा, पटेल, राजीव गांधी के साथ अम्बेडकर का बड़ा दीवाल वाला चित्र लगा था और कुछ महिलायें एक बच्चे को खेलारही थीं जैसे घर के कार्य से निवृत्त हों तो मै उस बच्चे को गोंद लिया उनसे मांग कर तो वे महिलायें कहने लगी की लगता है इनका बच्च खो गया है तभी दूसरे के बच्चे को भी गोंद उठा लिए हैं(उन दिनों मेरी केवल शादी हुई थी एक वर्ष के कुछ कम समय पूर्व 18 अप्रैल, 2008 को )। इसके बाद मल्लेश्वरम के विशाल उपरिलिंग मंदिर का लेटते हुए चक्कर लगना और उसके बाद कुछ एक और मल्लेश्वरम के मंदिर होते हुए लौट आना मुझे उसी तरह उस दक्षिण भारतीय क्षेत्र में ऊर्जा प्राप्त हुयी जो की मै बिशुनपुर-जौनपुर-223103 और रामापुर-आजमगढ़-223225 के हर जाती/धर्म के परिचित चहरे का परोक्ष प्रणाम कर आशीर्वाद ग्रहण कर शक्ति हासिल करता था। ---------------मात्र इतने प्रयास ने ही मुझे सभी पापों से मुक्ति मिल गयी जो की इस केदारेश्वर बनर्जी के पूर्ण स्थापना हेतु प्रारंभिक दिनों से लेकर प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक पूर्ण केंद्र के रूप में आ जाने के विकाश यात्रा में हुए थी और इसके बाद हमें अपने सहयोगियों समेत स्थायी शिक्षक की योग्यता प्राप्त हुई।

भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु के हर विभाग, छात्रावास और केंद्र की दो बार पूजा और अर्चना और जसवन्तपुर, बेंगलुरु के गायत्री मंदिर से प्रारम्भ कर सबसे पहले जयप्रकाश नारायण पार्क जाकर रुका था और इस प्रकार वहां से जसवंतपुर के लगभग हर मंदिर और कुछ खुले हुए गिरिजाघर में कलमा और गायत्रीमंत्र सहित स्तुति और सास्टांग प्रणाम सहित आगे बढ़ता गया भारतीय जनता पार्टी से लेकर लगभग हर पार्टी के जनता के सेवार्थ जसवन्तपुर में खुले हुए कार्यालय को सास्टांग दंडवत करते हुए और इसके साथ सामान्य सज्जन बस्तियों और मलिन बस्ती/झुग्गी झोपड़ी के लोगों को सादर नमन किया और जसवन्तपुर में रेलवे के किनारे मलिन बस्ती का व् आवास याद है जो बहुत ही स्वक्ष था और वहा गांधी, नेहरू, इंदिरा, पटेल, राजीव गांधी के साथ अम्बेडकर का बड़ा दीवाल वाला चित्र लगा था और कुछ महिलायें एक बच्चे को खेलारही थीं जैसे घर के कार्य से निवृत्त हों तो मै उस बच्चे को गोंद लिया उनसे मांग कर तो वे महिलायें कहने लगी की लगता है इनका बच्च खो गया है तभी दूसरे के बच्चे को भी गोंद उठा लिए हैं(उन दिनों मेरी केवल शादी हुई थी एक वर्ष के कुछ कम समय पूर्व 18 अप्रैल, 2008 को )।  इसके बाद मल्लेश्वरम के विशाल उपरिलिंग मंदिर का लेटते हुए चक्कर लगना और उसके बाद कुछ एक और मल्लेश्वरम के मंदिर होते हुए लौट आना मुझे उसी तरह उस दक्षिण भारतीय क्षेत्र में ऊर्जा प्राप्त हुयी जो की मै बिशुनपुर-जौनपुर-223103 और रामापुर-आजमगढ़-223225 के हर जाती/धर्म के परिचित चहरे का परोक्ष प्रणाम कर आशीर्वाद ग्रहण कर शक्ति हासिल करता था। ---------------मात्र इतने प्रयास ने ही मुझे सभी पापों से मुक्ति मिल गयी जो की इस केदारेश्वर बनर्जी के पूर्ण स्थापना हेतु प्रारंभिक दिनों से लेकर प्रयागराज विश्वविद्यालय के एक पूर्ण केंद्र के रूप में आ जाने के विकाश यात्रा में हुए थी और इसके बाद हमें अपने सहयोगियों समेत स्थायी शिक्षक की योग्यता प्राप्त हुई।        

Wednesday, April 15, 2015

नेहरू(नेह=प्रेम करने वाला) में सर्वश्रेस्ठ नेहरू कौन है यह तो एक विकट प्रश्न है पर जहां तक मुझे समझ है शिव/पारवती((प्रथम पारिवारिक संरचना जिनके स्वयं के दो पुत्र कार्तिकेय/मुरुगन और ऋद्धि-शिध्धि के पति और प्रथम पूज्य देव गणेश/विनायक जिनका की शीर्षस्थ त्रिदेवों(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के बाद प्रथम स्थान है: प्रेम के साथ परिवार की संकल्पना ही सर्वश्रेष्ठ है)) के कारन शिव प्रथम सर्वश्रेष्ठ नेहरू और श्रीराम/कृष्ण द्वितीय सर्वश्रेष्ठ नेहरू हुए तो नेहरू विज्ञान केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय के प्रांगण में केदारेश्वर/आदिशंकर/शिव बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र या केदारेश्वर बनर्जी केंद्र प्रासंगिक ही नहीं अभिष्ठतम प्रासंगिक है।

नेहरू(नेह=प्रेम करने वाला) में सर्वश्रेस्ठ नेहरू कौन है यह तो एक विकट प्रश्न है पर जहां तक मुझे समझ है शिव/पारवती((प्रथम पारिवारिक संरचना जिनके स्वयं के दो पुत्र कार्तिकेय/मुरुगन और ऋद्धि-शिध्धि के पति और प्रथम पूज्य देव गणेश/विनायक जिनका की शीर्षस्थ त्रिदेवों(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के बाद प्रथम स्थान है: प्रेम के साथ परिवार की संकल्पना ही सर्वश्रेष्ठ है))  के कारन शिव प्रथम सर्वश्रेष्ठ नेहरू और श्रीराम/कृष्ण द्वितीय सर्वश्रेष्ठ नेहरू हुए तो नेहरू विज्ञान केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय के प्रांगण में केदारेश्वर/आदिशंकर/शिव  बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र या केदारेश्वर बनर्जी केंद्र प्रासंगिक ही नहीं अभिष्ठतम प्रासंगिक है। 

जो बाबा आँखों से नहीं देखते है और विरला विश्वनाथ मंदिर, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गाना गाते है सुबह शाम उनके बगल वैठे मई भी भज सुन रहा था वे एकाएक गाना बंद कर मुझसे कहने लगे बेटा मीरा तो नर्तकी थी और कृष्ण को अपना पति मानती थी पर क्या कृष्ण राधा को छोड़ मीरा के हो जाते हैं? इसका यह मतलब नहीं की कोई किशी से प्रेम नहीं कर सकता है वरन मीरा तो कृष्ण से अलौकिक प्रेम करती थी जब राधा कृष्ण की समकालीन थी फिर भी कृष्ण का मीरा से भक्तिभाव में पति वाला प्रेम था और राधा से समानता का प्रेम था। -------यह सब क्या था दुनिया चलाने वालों का मै भी गुलाम हूँ और उनके इस तरह के प्रयास सराहना करता हूँ किशी भी स्थिति नियंत्रित करने के प्रयास की।

जो बाबा आँखों से नहीं देखते है और विरला विश्वनाथ मंदिर, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गाना गाते है सुबह शाम उनके बगल वैठे मई भी भज सुन रहा था वे एकाएक गाना बंद कर मुझसे कहने लगे बेटा मीरा तो नर्तकी थी और कृष्ण को अपना पति मानती थी पर क्या कृष्ण राधा को छोड़ मीरा के हो जाते हैं? इसका यह मतलब नहीं की कोई किशी से प्रेम नहीं कर सकता है वरन मीरा तो कृष्ण से अलौकिक प्रेम करती थी जब राधा कृष्ण की समकालीन थी फिर भी कृष्ण का मीरा से भक्तिभाव में पति वाला प्रेम था और राधा से समानता का प्रेम था। -------यह सब क्या था दुनिया चलाने वालों का मै भी गुलाम हूँ और उनके इस तरह के प्रयास  सराहना करता हूँ किशी भी स्थिति  नियंत्रित करने के प्रयास की।  

जिन लोगों ने प्रयागराज विश्वविद्यालय से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जाते समय 30 जनवरी, 2012 को दोपहर 12-50 के लगभग मुझ गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी के दिन जन्म लेने वाले विवेक/राशिनाम गिरिधर का परीक्षण गोपीगंज से सीता समाहित स्थल जाने वाले रास्ते के पास पहुँचाने पर किया था वस में उनसे मै बताना चाहूँगा की विष्णुकांत/राशि नाम वेंकटेश)(30-09-2010) स्वयं में पूर्ण ब्रह्म/परमब्रम्ह श्रीराम थे पर आप के कृष्णकांत/राशिनाम वाशुदेव(राशिनाम वाशुदेव से ये कृष्णपुत्र या कृष्ण के स्वामी नहीं किन्तु कृष्ण ही हुए) वास्तविक श्रीकृष्णजन्मास्ट्मी के बुधवार दिन की तरह बुधवार को श्रीकृष्णजन्मास्ट्मी को 28-08-2013 को जन्म लिए जिस दिन वास्तविक श्रीकृष्ण जन्मास्टमी से ज्यादा समय के लिए रोहिणी नक्षत्र का मुहूर्त था 4 .15 शाम से लेकर अर्ध रात्रि तक था। इस प्रकार 30 और 28 दोनों मुझमे ही समाहित मुझसे ही निकले।---------दूसरा यह की उसी समय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय प्रवास के दौरान आप लोगों में तब तक शंका की बात सोचकर मंगलवार 31-01-2012 को मै विरला विश्व्नाथ मंदिर, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आरती के समय तक जमा रहा और आप के इस सिद्ध विश्वनाथ के सिर का सिंगार आरती के समय गिर गया था और यदि मै दिनांक सही नहीं बता रहा तो इसे आप दो-चार दिन आगे पीछे विडिओ कैमरा की आरती फुटेज देख लीजियेगा मै 4-02-2012 तक वहा प्रवास किया था। इतना ही नहीं 2011 के प्रारंभिक दिनों में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के पुराछात्र सम्मलेन में व्याख्यान देने आये प्रोफेसर प्रेम चंद पाण्डेय के साथ प्रोफेसर केशव प्रशाद सिंह के द्वारा स्वयं से तक किराए की गाड़ी विंध्यवाशिनी का दरसन करने गया था तो प्रोफेसर पाण्डेय माँ का चरण स्पर करते हुए निकले और पीछे मई था और चरण स्पर्श करने के लिए हाँथ बढ़ाया और मेरा हाँथ माँ के चहरे पर पता नहीं कैसे चला गया जो गलती मई कर ही नहीं सकता और पुजारी बाबा जोर से बिगड़ गए और बगल के पुजारी ने कहा जाने दीजिये गलती हो गयी होगी वैसे ऐसा होना नहीं चाहिए।---------मै केवल इतना कहना चाह रहा हूँ की यह दुनिया परीक्षण लेने वाले चला रहे हैं और वे परीक्षण लें यह ठीक है पर जो स्वयं सिद्ध हो चुका है उसका बार-२ परीक्षण ठीक नहीं है| और अगर बार बार ले रहे हैं जानने समझने के बाद तो यह ज्यादती है और मेरे सहनशीलता को ज्वाला में बदलने की वे आशा लगाए हुए है जो होने वाला नहीं क्योंकि अब इस सृष्टि की रक्षा का व्रत है मेरा। मेरा कार्य पूरा हो गया है केवल देख-रेख और उपयुक्त उत्तराधिकारी की तलाश है।----------मैंने अपनी शक्ति को सतीश भाई के साथ सितम्बर, 2008 में बेंगलुरु से प्रयागराज आने पर इसी प्रयागराज से स्वयं वाराणसी जा कर पुनर्प्राण प्रतिष्ठा हेतु बड़ा गणेश मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर, दुर्गा मंदिर/कुण्ड, संकटमोचन मंदिर, तुलसी मानस मंदिर, बिरला काशी विश्वनाथ मंदिर (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) में स्थानांतरित किया था जो मंदिर शिव के कालचक्र के टूट जाने से मृतप्राय लगभग हो चुके थे और दर्शनार्थियों को दर्शन फल देने की शक्ति क्षीण हो चुकी थी।तो मेरा परीक्षण किस बात का बचा था मेरा। शिव के सिर का श्रृंगार गिरना ही था मेरे सामने।

जिन लोगों ने प्रयागराज विश्वविद्यालय से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जाते समय 30 जनवरी, 2012 को दोपहर 12-50 के लगभग मुझ गोपा/गोवर्धन/गिरिधर  अस्टमी के दिन जन्म लेने वाले विवेक/राशिनाम गिरिधर का परीक्षण गोपीगंज से सीता समाहित स्थल जाने वाले रास्ते के पास पहुँचाने पर किया था वस में उनसे मै बताना चाहूँगा की विष्णुकांत/राशि नाम वेंकटेश)(30-09-2010)  स्वयं में पूर्ण ब्रह्म/परमब्रम्ह श्रीराम थे पर आप के कृष्णकांत/राशिनाम वाशुदेव(राशिनाम वाशुदेव से ये कृष्णपुत्र या कृष्ण के स्वामी नहीं किन्तु कृष्ण ही हुए)  वास्तविक श्रीकृष्णजन्मास्ट्मी के बुधवार दिन की तरह बुधवार को श्रीकृष्णजन्मास्ट्मी को 28-08-2013 को जन्म लिए जिस दिन वास्तविक श्रीकृष्ण जन्मास्टमी से ज्यादा समय  के लिए रोहिणी नक्षत्र का मुहूर्त था 4 .15 शाम से लेकर अर्ध रात्रि तक था। इस प्रकार 30 और 28  दोनों मुझमे ही समाहित  मुझसे ही निकले।---------दूसरा यह की उसी समय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय प्रवास के दौरान आप लोगों में तब तक शंका की बात सोचकर मंगलवार 31-01-2012  को मै विरला विश्व्नाथ मंदिर, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आरती  के समय तक जमा रहा और आप के इस सिद्ध विश्वनाथ के सिर का सिंगार आरती के समय गिर गया था और यदि मै दिनांक सही नहीं बता रहा तो इसे आप दो-चार दिन आगे पीछे विडिओ कैमरा की आरती फुटेज देख लीजियेगा मै 4-02-2012 तक वहा प्रवास किया था। इतना ही नहीं 2011 के प्रारंभिक दिनों में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के पुराछात्र सम्मलेन में व्याख्यान देने आये प्रोफेसर प्रेम चंद पाण्डेय के साथ प्रोफेसर केशव प्रशाद सिंह के द्वारा स्वयं से तक किराए की गाड़ी  विंध्यवाशिनी का दरसन करने गया था तो प्रोफेसर पाण्डेय माँ का चरण स्पर करते हुए निकले और पीछे मई था और चरण स्पर्श करने के लिए हाँथ बढ़ाया और मेरा हाँथ माँ के चहरे पर पता नहीं कैसे चला गया जो गलती मई कर ही नहीं सकता और पुजारी बाबा  जोर से बिगड़ गए और बगल के पुजारी ने कहा जाने दीजिये गलती हो गयी होगी वैसे ऐसा होना नहीं चाहिए।---------मै केवल इतना कहना चाह रहा हूँ की यह दुनिया परीक्षण लेने वाले चला रहे हैं और वे परीक्षण लें यह ठीक है पर जो स्वयं सिद्ध हो चुका है उसका बार-२ परीक्षण ठीक नहीं है| और अगर बार बार ले रहे हैं जानने समझने के बाद तो यह ज्यादती है और  मेरे सहनशीलता को ज्वाला में बदलने की वे आशा लगाए हुए है जो होने वाला नहीं क्योंकि अब इस सृष्टि की रक्षा का व्रत है मेरा।  मेरा कार्य पूरा हो गया है केवल देख-रेख और उपयुक्त उत्तराधिकारी की तलाश है।----------मैंने अपनी शक्ति को सतीश भाई के साथ सितम्बर, 2008 में बेंगलुरु से प्रयागराज आने पर इसी प्रयागराज से स्वयं वाराणसी जा कर पुनर्प्राण प्रतिष्ठा हेतु बड़ा गणेश मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर, दुर्गा मंदिर/कुण्ड, संकटमोचन मंदिर, तुलसी मानस मंदिर, बिरला काशी विश्वनाथ मंदिर (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) में स्थानांतरित किया था जो मंदिर शिव के कालचक्र के टूट जाने से मृतप्राय लगभग हो चुके थे और दर्शनार्थियों को दर्शन फल देने की शक्ति क्षीण हो चुकी थी।तो मेरा परीक्षण किस बात का बचा था मेरा। शिव के सिर का श्रृंगार गिरना ही था मेरे सामने।   

the Meghnad/Ravan Vadh said that after death every one returned his pure form and intermingled with the Akhilanand/Sachchidanand Ghan Vishnu of Vaikunth Dham/ksheer Sagar thus we should not worry about our relation with the demon active elements of the society.>>>>Pramila (Very capable of Analysing, judging and discriminating) and Urmila (Wave of passion originated from the heart) both are the Greatest Sati of the Ramayan era. Pramila became sati after Meghnad vadh by Lakshamana and Urmila became Sati for the period of exile of Lord Ram. Pramila also know as Sulochna(fair eyes means whose eyes have good analysis power means Pramila)| -------------Mythological history say that Sulochna/Pramila/Meghnad was sister of Urmila/Lakshman|----------but the Meghnad/Ravan Vadh said that after death every one returned his pure form and intermingled with the Akhilanand/Sachchidanand Ghan Vishnu of Vaikunth Dham/ksheer Sagar thus we should not worry about our relation with the demon active elements of the society.

the Meghnad/Ravan Vadh said that after death every one returned his pure form and intermingled with the Akhilanand/Sachchidanand Ghan Vishnu of Vaikunth Dham/ksheer Sagar thus we should not worry about our relation with the demon active elements of the society.>>>>Pramila (Very capable of Analysing, judging and discriminating) and Urmila (Wave of passion originated from the heart) both are the Greatest Sati of the Ramayan era. Pramila became sati after Meghnad vadh by Lakshamana and Urmila became Sati for the period of exile of Lord Ram. Pramila also know as Sulochna(fair eyes means whose eyes have good analysis power means Pramila)| -------------Mythological history say that Sulochna/Pramila/Meghnad was sister of Urmila/Lakshman|----------but the Meghnad/Ravan Vadh said that after death every one returned his pure form and intermingled with the Akhilanand/Sachchidanand Ghan Vishnu of Vaikunth Dham/ksheer Sagar thus we should not worry about our relation with the demon active elements of the society.

Re; मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।



मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

Bali's wife was Tara, who married Sugreeva after Bali was killed. Similarly, Ravana's "supreme" wife was Mandodari who married Vibheeshana after Ravana's death. But originally wives of (a) Sugreeva was RUMA and (b) Vibheeshan's wife was SARAMA, before these guys married their brothers' widows? Sarama (daughter of the Gandharva king Shailusha). On the other hand, Mandodari was the daughter of demon-king Maya of Meerut, Uttar Pradesh and thus Meghnad's maternal town is the Meerut, Uttar Pradesh. And that is why some people belonging any way from Meerut is favouring him at Prayagraj but the same time they forget that Kedareshwar/ Aadishankar is oldest and 1st ever form of Lord Shiva comes in the existence on the earth at Kashi. and Meghnad's father Ravana started his worship only after Shiva gone to Kailash by which Ravana became too much powerful. Thus Kedareswar/ Adishankar/Aadya's made the base of the Meghnad first, which his follower should keep in mind.

Bali's wife was Tara, who married Sugreeva after Bali was killed. Similarly, Ravana's "supreme" wife was Mandodari who married Vibheeshana after Ravana's death. But originally wives of (a) Sugreeva was RUMA and (b) Vibheeshan's wife was SARAMA, before these guys married their brothers' widows? Sarama (daughter of the Gandharva king Shailusha). On the other hand, Mandodari was the daughter of demon-king Maya of Meerut, Uttar Pradesh and thus Meghnad's maternal town is the Meerut, Uttar Pradesh. And that is why some people belonging any way from Meerut is favouring him at Prayagraj but the same time they forget that Kedareshwar/ Aadishankar is oldest and 1st ever form of Lord Shiva comes in the existence on the earth at Kashi. and Meghnad's father Ravana started his worship only after Shiva gone to Kailash by which Ravana became too much powerful. Thus Kedareswar/ Adishankar/Aadya's made the base of the Meghnad first,  which his follower should keep in mind.

The complete Ravana's clan is as follows: Sage Vishrava, son of sage Pulatsya had four wives. First, Ilavida of whom Kubera was the son. Second, Pushpatkota/Kaikasi (daughter of Sumali and Tatka). They had three children: Ravana, Kumbhkaran and Kumbhinasi. Third, Raka who bore four children: Khar, Dushan, Trishra and Shurpnakha. And fourth: Malini, mother of Vibhishana.| Kaikashi:Mother of Ravan and Kaikayee:Mother of bharat who was responsible for exile of Ram is good junction.



The complete Ravana's clan is as follows: Sage Vishrava, son of sage Pulatsya had four wives. First, Ilavida of whom Kubera was the son. Second, Pushpatkota/Kaikasi (daughter of Sumali and Tatka). They had three children: Ravana, Kumbhkaran and Kumbhinasi. Third, Raka who bore four children: Khar, Dushan, Trishra and Shurpnakha. And fourth: Malini, mother of Vibhishana.| Kaikashi:Mother of Ravan and Kaikayee:Mother of bharat who was responsible for exile of Ram is good junction.

The son of Draupadi and Arjuna known as Shrutikirti (Male) ( . Draupadi had five sons, one by each husband: Prativindhya (by Yudhishthira), Srutasoma (by Bhima), Srutakirtti (by Arjuna), Satanika (by Nakula) and Srutakarman (by Sahadeva). All of these sons were killed by Ashwatthama on the last day of Mahabharata war.



The son of Draupadi and Arjuna known as Shrutikirti (Male) ( . Draupadi had five sons, one by each husband: Prativindhya (by Yudhishthira), Srutasoma (by Bhima), Srutakirtti (by Arjuna), Satanika (by Nakula) and Srutakarman (by Sahadeva). All of these sons were killed by Ashwatthama on the last day of Mahabharata war.

Panchkanya who called as Divine Kanya although the given birth to childs: Ahilya, Tara, Mandodari, Kunti and Draupadi.



Panchkanya who called as Divine Kanya although the given birth to childs: Ahilya, Tara, Mandodari, Kunti and Draupadi.

Kushdhwaj, brother of Janaka. He was the ruler of Sankashya (Kashi) was father of Mandavi/Bharat and Shrutkirti/Shatrughna--------Janak, King of Mithila/janakpur whose rel name was Sheeradhwaj and his wife Sunayana was father and mother of Bhoomisuta:Sita and Urmila(real daughter)



Kushdhwaj, brother of Janaka. He was the ruler of Sankashya (Kashi) was father of Mandavi/Bharat and Shrutkirti/Shatrughna--------Janak, King of Mithila/janakpur whose rel name was Sheeradhwaj and his wife Sunayana was father and mother of Bhoomisuta:Sita and Urmila(real daughter)

Ram-Vishnu, Lakshman-Sheshnag, Bhrat-Garun, Shatrughn-Panchajanyaa Shankh/Conch & Sudarshan Chakra-------------Incarnations of Vishnu's possessions| That is why I tolled that after broken of the Ashok Chakra/Samaya Chakra/Dharm Chakra of 24 Rishis/Shiva Chakra/Kaal Chakra, there was working Sudardhan Chakra of Vishnu/Krishna at the place of it and common people got it even as Ashok Chakra.



Ram-Vishnu, Lakshman-Sheshnag, Bhrat-Garun, Shatrughn-Panchajanyaa Shankh/Conch & Sudarshan Chakra-------------Incarnations of Vishnu's possessions| That is why I tolled that after broken of the Ashok Chakra/Samaya Chakra/Dharm Chakra of 24 Rishis/Shiva Chakra/Kaal Chakra, there was working Sudardhan Chakra of Vishnu/Krishna at the place of it and common people got it even as Ashok Chakra.

Ram-Sita:--- Luv and Kush:: Bharat-Mandavi: -------Taksha and Pushkala :: Lakshman-Urmila:---- Angad and Dharmaketu/Chandraketu :: Shatrughan-Shrutkeerti:------- Subahu and Shatrughati. (All twins and all sons!)

Ram-Sita:--- Luv and Kush::
Bharat-Mandavi: -------Taksha and Pushkala ::
Lakshman-Urmila:---- Angad and Dharmaketu/Chandraketu ::
Shatrughan-Shrutkeerti:------- Subahu and Shatrughati. 
(All twins and all sons!)

Tuesday, April 14, 2015

यह है रामापुर मतलब सीतापुर के मान और मर्यादा की रक्षा के प्रति त्याग और समर्पण।>>>>>>सायद लंका में हनुमान/अम्बेडकर/अम्बावडेकर से सीता जी ने कहा था की अगर वे(श्रीराम) दो माह के भीतर न आये तो मै अपना प्राण त्याग दूंगी रावण से अपने सतीत्व की रक्षा हेतु। यह तो लंका की बात है जहाँ सीता की आबरू एक साल/वर्ष तक बची रही और तब तक उनका प्राण उसी मायावी शरीर में था उनके सतीत्व पर रावण की छाया भी नहीं पडी थी और दो माह के अंत तक श्रीराम ने उनको छुड़ा लिया पर इस बार अहिरावण और मकरध्वज जैसे परस्पर दो विरोधी शक्तियों के साम्राज्य पातालपुरी की बात थी जहां पहुंचते ही सीता और सती(पारवती) का सत्तित्व जबाब दे जाता है फिर भी बड़ बोलों को बता दें की सायद 15 अगस्त से 15 सितम्बर होने पर एक माह पूरा होता है पर 25 वे दिन में ही सांकेतिक रूप से अहिरावण और मकरध्वज के पातालपुरी के साम्राज्य पर विजय पा लिया गया था लव(हिन्दू)-कुश द्वारा इसमें अम्बेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान की सेवा लेने की जरूरत ही नहीं पडी और उसी दिन से सीता/सती(पारवती) को परालौकिक रूप से प्रयागराज में सृजन के कार्य में बुला लिया गया था और अहिरावण और मकरध्वज के साम्राज्य पातालपुरी की सीता/सती(पारवती) को उनके शव के रूप में मकरध्वज को आत्मबल प्रदान करने हेतु छोड़ दिया गया था। कहने का मतलब अम्बेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान की जरूरत स्वयं के पुत्र लव(हिन्दू)-कुश रहते नहीं पडी। >>>>>यह है रामापुर(राम की आभा/छाया) मतलब सीतापुर के मान और मर्यादा की रक्षा के प्रति त्याग और समर्पण। जो लोग इस्वर पर अप्रत्यक्ष सबसे ज्यादा विशवास करते हैं और इस्वर को जीवित रखने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं या तो वे इस्वर का वाह्य रूप से सबसे ज्यादा विरोध करते हैं या राक्षसी प्रवृत्ति वाले जिनको डर रहता है की ईस्वरी शक्तियां बढ़ीं तो मेरा गंदा धंधा बंद हो जाएगा। मित्रों मै अपने ऊपर न्याय को राक्षसी प्रवृत्तियों के भरोसे नहीं छोड़ते या उनके ऊपर नहीं छोड़ते जो राक्षसी प्रवृति के डर में आकर आत्मरक्षा में गलत करते जा रहे हैं। अतः मई मानता हूँ की सनातन ब्राह्मण का विकल्प अगर कोई हो सकता है तो सनातन ब्राह्मण ही होगा तो उसी लिए मई भी जिद किया हूँ अन्यथा मै दूध का दूध और पानी का पानी कर चुका हूँ। और भी कुछ लोग सोचते थे की मै अम्बेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान जैसी सेवा नहीं दे सकता तो मै बता दूँ की मै विष्णु के उन दो अवतार जो ही केवल परमब्रह्म(ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक साथ) बन चुके हैं आज तक इसे सृस्टि में कहने का मतलब श्रीरामकृष्ण, तो मै भी स्वयं वह व्यवहार इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ध्यन केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय में कर चुका हूँ जिस पर सृजन कार्य हेतु मै 11-09-2001 को मै नियमतः आया था तो द्वितीयपरमब्रह्म(अम्बेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान) बनने में क्या बहुत कुछ करना था।

RAMAPUR-223225 यह है रामापुर मतलब सीतापुर के मान और मर्यादा की रक्षा के प्रति त्याग और समर्पण।>>>>>>सायद लंका में हनुमान/अम्बेडकर/अम्बावडेकर  से सीता जी ने कहा था की अगर वे(श्रीराम) दो माह के भीतर न आये तो मै अपना प्राण त्याग दूंगी रावण से अपने सतीत्व की रक्षा हेतु। यह तो लंका की बात है जहाँ सीता की आबरू एक साल/वर्ष तक बची रही और तब तक उनका प्राण उसी मायावी शरीर में था उनके सतीत्व पर रावण की छाया भी नहीं पडी थी और दो माह के अंत तक श्रीराम ने उनको छुड़ा लिया पर इस बार अहिरावण और मकरध्वज जैसे परस्पर दो विरोधी शक्तियों के साम्राज्य पातालपुरी की बात थी जहां पहुंचते ही सीता और सती(पारवती) का सत्तित्व जबाब दे जाता है फिर भी बड़ बोलों को बता दें की सायद 15 अगस्त से 15 सितम्बर होने पर एक माह पूरा होता है पर 25 वे दिन में ही सांकेतिक रूप से अहिरावण और मकरध्वज के पातालपुरी के साम्राज्य पर विजय पा लिया गया था लव(हिन्दू)-कुश द्वारा इसमें अम्बेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान की सेवा लेने की जरूरत ही नहीं पडी और उसी दिन से सीता/सती(पारवती) को परालौकिक रूप से प्रयागराज में सृजन के कार्य में बुला लिया गया था और अहिरावण और मकरध्वज के साम्राज्य पातालपुरी की सीता/सती(पारवती) को उनके शव के रूप में मकरध्वज को आत्मबल प्रदान करने हेतु छोड़ दिया गया था। कहने का मतलब  अम्बेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान  की जरूरत स्वयं के पुत्र लव(हिन्दू)-कुश रहते नहीं पडी। >>>>>यह है रामापुर(राम की आभा/छाया) मतलब सीतापुर के मान और मर्यादा की रक्षा के प्रति त्याग और समर्पण। जो लोग इस्वर पर अप्रत्यक्ष सबसे ज्यादा विशवास करते हैं और इस्वर को जीवित रखने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं या तो वे इस्वर का वाह्य रूप से सबसे ज्यादा विरोध करते हैं या राक्षसी प्रवृत्ति वाले जिनको डर रहता है की ईस्वरी शक्तियां बढ़ीं तो मेरा गंदा धंधा बंद हो जाएगा। मित्रों मै अपने ऊपर न्याय को राक्षसी प्रवृत्तियों के भरोसे नहीं छोड़ते या उनके ऊपर नहीं छोड़ते जो राक्षसी प्रवृति के डर में आकर आत्मरक्षा में गलत करते जा रहे हैं। अतः मई मानता हूँ की सनातन ब्राह्मण का विकल्प अगर कोई हो सकता है तो सनातन ब्राह्मण ही होगा तो उसी लिए मई भी जिद किया हूँ अन्यथा मै दूध का दूध और पानी का पानी कर चुका हूँ। और भी कुछ लोग सोचते थे की मै अम्बेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान जैसी सेवा नहीं दे सकता तो मै बता दूँ की मै विष्णु के उन दो अवतार जो ही केवल परमब्रह्म(ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक साथ) बन चुके हैं आज तक इसे सृस्टि में कहने का मतलब श्रीरामकृष्ण, तो मै भी स्वयं वह व्यवहार इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ध्यन केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय में कर चुका हूँ जिस पर सृजन कार्य हेतु मै 11-09-2001 को मै नियमतः आया था तो द्वितीयपरमब्रह्म(अम्बेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान) बनने में क्या बहुत कुछ करना था।     

Monday, April 13, 2015

मेरे गिरिधारी नाम में एक पौराणिक/धार्मिक और सामाजिक विभूति का नाम छिपा है जिसका नाम है अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान/मारुतिनंदन/केशरीनन्दन/शंकरसुमन/आंजनेय/अंजनीपुत्र तो श्रीराम/कृष्ण की भक्ति क्यों न मिलाती?: -------तो मै तो कम से कम विश्वनाथप्रताप(विश्वेश्वर)/महामृत्युंजय/केदारेश्वर/महादेव के तीनो प्रारंभिक मूल स्वरुप का विकल्प तो स्वयं में हूँ विवेक/त्रिनेत्र/त्रयम्बक/त्रिलोचन नामधारी होने की ही वजह से और गोपास्ट्मी/गोवर्धन अस्टमी:गिरिधर अस्टमी को जन्म लेने से मिले राशिनाम गिरिधारी होने की वहज से गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण, गिरी मरुधर/मेरु:मदिराचल धारी कुर्मावतारी विष्णु, गिरी धरणीधर:पृथ्वीधर शेषनाग, गिरी धौलागिरी:हिमालय धारी अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान/मारुतिनंदन/केशरीनन्दन/शंकरसुमन/आंजनेय/अंजनीपुत्र तो हूँ ही।

मेरे गिरिधारी नाम में एक पौराणिक/धार्मिक और सामाजिक विभूति का नाम छिपा है जिसका नाम है अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान/मारुतिनंदन/केशरीनन्दन/शंकरसुमन/आंजनेय/अंजनीपुत्र  तो श्रीराम/कृष्ण की भक्ति क्यों न मिलाती?: -------तो मै तो कम से कम  विश्वनाथप्रताप(विश्वेश्वर)/महामृत्युंजय/केदारेश्वर/महादेव के तीनो प्रारंभिक मूल स्वरुप का विकल्प तो स्वयं में हूँ विवेक/त्रिनेत्र/त्रयम्बक/त्रिलोचन नामधारी होने की ही वजह से और गोपास्ट्मी/गोवर्धन अस्टमी:गिरिधर अस्टमी को जन्म लेने से मिले राशिनाम गिरिधारी होने की वहज से गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण, गिरी मरुधर/मेरु:मदिराचल धारी कुर्मावतारी विष्णु, गिरी धरणीधर:पृथ्वीधर शेषनाग, गिरी धौलागिरी:हिमालय धारी अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान/मारुतिनंदन/केशरीनन्दन/शंकरसुमन/आंजनेय/अंजनीपुत्र तो हूँ ही।

Lord Shri Ram/Krishna is the divine supreme power who called as Param Brahm embodied on the earth by birth. Lord Shri Ram followed Brahman(who were the follower of progressive truth) and the Lord Shri Krishna got name Ranchhor (who run away from the battle) although he was able to defeat the Magadh Naresh Jarashandhi in all the way but for keeping safe the kidnapped Brahmins and his devotees (as a result after some time in Shri Krishna's regimes these Brahmana and devotees turned him as Yaduvanshi when the Durvasha's curse ruined/demolished the Yaduvansh)|-------A person who got Vishnukant/Venkatesh(Lord of vishnu i.e. Parambrahm i.e. Shri Ram/Krishna) and Krishnkant/rashiname:Vaashudev named two sons with matching all the Grah and Nakshatra and also Rashi name, how not be able to respect and preserve the Brahmin's. There is one religion/caste Brahmin whose number not matter with his 1/3 of total world power if real way the attribute of Brahmin's are present in them. They are our torch bearer and forefathers whose origin is the Prayagraj/Trveni/Sangam Allaha-Abaad/allahabad and thus our origin is also Prayaagraj/Allahaabad. The Trimurti's are also the part of the same Parambrahm who were done the Prakrishtha Yagya/Saptarshi Prakaty Yagya at Prayagraj. Thus Brahma, Vishnu and Mahesh have no any fixed caste/religion but they are source of knowledge, source of prosperity and wealth, and source of power respectively which is respectively needed for a Brahmin, Vashya and Kshatriya specially with a common minimum need of all these three (knowledge, wealth & prosperity, and power). Thus a part of society gives TRIMURTY a caste/religion in his own way.

Lord Shri Ram/Krishna is the divine supreme power who called as Param Brahm embodied on the earth by birth. Lord Shri Ram followed Brahman(who were the follower of  progressive truth) and the Lord Shri Krishna got name Ranchhor (who run away from the battle) although he was able to defeat the Magadh Naresh Jarashandhi in all the way but for keeping safe the kidnapped  Brahmins and his devotees (as a result after some time in Shri Krishna's regimes  these Brahmana and devotees turned him as Yaduvanshi when the Durvasha's curse ruined/demolished the Yaduvansh)|-------A person who got Vishnukant/Venkatesh(Lord of vishnu i.e. Parambrahm i.e. Shri Ram/Krishna) and Krishnkant/rashiname:Vaashudev named two sons with matching all the Grah and Nakshatra and also Rashi name, how not be able to respect and preserve the Brahmin's. There is one religion/caste Brahmin whose number not matter with his 1/3 of total world power if real way the attribute of Brahmin's are present in them. They are our torch bearer and forefathers whose origin is the Prayagraj/Trveni/Sangam Allaha-Abaad/allahabad and thus our origin is also Prayaagraj/Allahaabad. The Trimurti's are also the part of the same Parambrahm who were done the Prakrishtha Yagya/Saptarshi Prakaty Yagya at Prayagraj. Thus Brahma, Vishnu and Mahesh have no any fixed caste/religion but they are source of knowledge, source of prosperity and wealth,  and source of power respectively which is respectively needed for a Brahmin, Vashya and Kshatriya specially with a common minimum need of all these three (knowledge, wealth &  prosperity, and power). Thus a part of society gives TRIMURTY a caste/religion in his own way.

ब्रह्मा और विष्णु को अपना उत्तराधिकारी मिल गया हो तो उनकी इक्षा वे अपना पद उस उत्तराधिकारी को निर्विवाद रूप से दे सकने में समर्थ और सक्षम है मुझको उनके सन्दर्भ में कोई आपत्ति दर्ज नहीं करानी है, पर मेरा उत्तराधिकारी और विकल्प कोई अभी तक मिला ही नहीं जिसकी शक्ति के बल पर स्वयं सत्यनारायण विष्णु भी इस मानव समाज में सत्य कहने और विधाता ब्रह्मा कोई विधान बनाने में समर्थ हो सकें। अतः वे मेरे सन्दर्भ में कोई निर्णय बिना मेरी सहमति के न लें तभी अच्छा अच्छा तब होगा जब वे मेरे सम्बन्ध में कोई भी दखलंदाजी न करें।

ब्रह्मा और विष्णु को अपना उत्तराधिकारी मिल गया हो तो उनकी इक्षा वे अपना पद उस उत्तराधिकारी को निर्विवाद रूप से दे सकने में समर्थ और सक्षम है मुझको उनके सन्दर्भ में कोई आपत्ति दर्ज नहीं करानी है, पर मेरा उत्तराधिकारी और विकल्प कोई अभी तक मिला ही नहीं जिसकी शक्ति के बल पर स्वयं सत्यनारायण विष्णु भी इस मानव समाज में सत्य कहने और विधाता ब्रह्मा कोई विधान बनाने में समर्थ हो सकें। अतः वे मेरे सन्दर्भ में कोई निर्णय बिना मेरी सहमति के न लें तभी अच्छा अच्छा तब होगा जब वे मेरे सम्बन्ध में कोई भी दखलंदाजी न करें।

Sunday, April 12, 2015

अब विश्वनाथ और अम्बवादेकर/हनुमान के उस सामाजिक न्याय के फार्मूले की क्या जरूरत रह गयी है मेरा यह फार्मूला जो दे रहा हूँ वह प्रयोग में लाया जा सकता हैं या २) कुर्मावतारी और नान कुर्मावतारी संख्या के अनुपात में सरकारी सेवा/सुविधा और अधिकार/कर्तव्य का विभाजन कर दिया जाय लेकिन फिर संख्या के घटने बढ़ने से इस पर कोई अंतिम विराम न लगे सृस्टि के अंत तक।----------प्रवासी भारतीयों और अंग्रेजों के अनुयायी बहुत बड़े सामाजिक न्यायवादी नेता ने बहुत ही अच्छी सामाजिक न्याय तकनीकी अपनाई है और उसका सार्वजनिक प्रयोग जारी कर रखा है की सामाजिक और आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़े हुए को सामाजिक और आर्थिक रूप से विकसित बनाना हो उसके साथ बहुत उन्नत सामाजिक और आर्थिक व्यक्तित्व की बेटी का रिस्ता करवा दीजिए तो मेरे मित्रों आज उसी तथाकथित दलित महाधिनायक आंबेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान/केशरीनन्दन/शंकर सुमन के जन्मदिन के आने पर सिर पर मैला धोने वालों की बात की जा रही है जिनको गिनाया जा रहा भारतीय समाज के 1/300 आबादी इस काम में लगी है तो उनका जीवन स्तर सामाजिक और आर्थिक रूप से कैसे उठाया जाय इस पर कुछ अभी तक ख़ास नहीं हुआ तो मई इसका भी फार्मूला बता देता हूँ: तथाकथित दलित महाधिनायक आंबेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान/केशरीनन्दन/शंकर सुमन के सबसे निष्ठावान अनुयायी जो भारत देश से लेकर विदेशों में उच्चतम पदों, सामाजिक कार्यकर्ता के पदों, और किशी भी भारतीय श्रेष्ठ सेवा के पदों, राजनयिक और राजनैतिक पद पर आसीन हो या पूर्व में रहे हों अगर इस "सिर पर मैला धोने वालों की बात की जा रही है जिनको गिनाया जा रहा भारतीय समाज के 1/300 आबादी" के यहाँ अपनी बेटी का रिस्ता मानवता के नाते अगर करना स्वयं प्रारम्भ कर देते हैं तो वे स्वयं आर्थिक और सामाजिक रूप से उन्नत हो जाएंगे क्योंकि इन तथाकथित दलित महाधिनायक आंबेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान/केशरीनन्दन/शंकर सुमन के सबसे निष्ठावान अनुयायी जो भारत देश से लेकर विदेशों में उच्चतम पदों, सामाजिक कार्यकर्ता के पदों, और किशी भी भारतीय श्रेष्ठ सेवा के पदों, राजनयिक और राजनैतिक पद पर आसीन रहे हों या हों से बेटी का रिस्ता अन्य भारतीय समाज तथाकथित दलित महाधिनायक आंबेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान/केशरीनन्दन/शंकर सुमन से ही स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया था तो सर पर मैला धोने वालों के साथ बेटी का रिस्ता मानवता के नाते ही इनको अब करना चाहिए ऐसा मेरा मत है लेकिन मै किशी को आदेश नही दे रहा हूँ न ही कोई नियम बना रहा हूँ वर्ण आजिज आ गया हूँ ऐसे तथाकथित विचारकों से जो दीनदयालों आंबेडकर, काशीराम, विश्वनाथ प्रताप, गांधी और अटल जी जैसे लोगों के अंतिम जीवन से शिक्षा नहीं ले रहे हैं जिनसे बड़ा कोई दीन दयाल अभी तक जन्म ही नहीं लिया है भारतीय राजनीती में। दुनिया में सबसे ज्यादा मल ढोने का काम एक आम भारतीय किशान करता है जिसकी आबादी 65% है जो सम्पूर्ण भारतीयों के अन्नदाता है और जिनका पूरे 24 घण्टे की सेवा है भारतीय लोगों के लिए और आप लोगों को 1/300 की ज्यादा चिंता लगी रहती है जो मुस्किल से विशेष महानगरीय जनता जो केवल पूरी भारतीय आबादी के 2-5 % लोगों के ही काम आते हैं यह 24 घंटे की सेवा नहीं है और आप ओट बैंक का खेल खेलने वाले ज्ञान लोगों के लिए और भारतीय व्यवस्था के दमन के पोषको से समर्थन के नाते यह सब प्रपंच रचते हैं। अब विश्वनाथ और अम्बवादेकर/हनुमान के उस सामाजिक न्याय के फार्मूले की क्या जरूरत रह गयी है मेरा यह फार्मूला जो दे रहा हूँ वह प्रयोग में लाया जा सकता हैं या २) कुर्मावतारी और नान कुर्मावतारी संख्या के अनुपात में सरकारी सेवा/सुविधा और अधिकार/कर्तव्य का विभाजन कर दिया जाय लेकिन फिर संख्या के घटने बढ़ने से इस पर कोई अंतिम विराम न लगे सृस्टि के अंत तक।-------------केवल आप सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनेताओं में से कोई एक आगे आकर वेश्यावृत्ति जैसे कार्य का समूल उन्मूलन करा दीजिये (जिस बेटे बेटियों के माता और पिता वेश्यावृत्ति में लिप्त हैं उनका दर्द सर से मैला ढोने वाले बच्चों के दर्द से ज्यादा दर्द होता है और समाज में उनका तिरस्कार इनसे ज्यादा होता है) उसी दिन से ६ माह के अंदर मै सिर से मैला धोने की व्यवस्था पूर्ण रूप से ख़त्म करवा दूंगा।

अब विश्वनाथ और अम्बवादेकर/हनुमान के उस सामाजिक न्याय के फार्मूले  की क्या जरूरत रह गयी है मेरा यह फार्मूला जो दे रहा  हूँ वह प्रयोग में लाया जा सकता हैं या २) कुर्मावतारी और नान कुर्मावतारी संख्या के अनुपात में सरकारी सेवा/सुविधा और अधिकार/कर्तव्य का विभाजन कर दिया जाय लेकिन फिर संख्या के घटने बढ़ने से इस पर कोई अंतिम विराम न लगे सृस्टि के अंत तक।----------प्रवासी भारतीयों और अंग्रेजों के अनुयायी बहुत बड़े सामाजिक न्यायवादी नेता ने बहुत ही अच्छी सामाजिक न्याय तकनीकी अपनाई है और उसका सार्वजनिक प्रयोग जारी कर रखा है की सामाजिक और आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़े हुए को सामाजिक और आर्थिक रूप से विकसित बनाना हो उसके साथ बहुत उन्नत सामाजिक और आर्थिक व्यक्तित्व की बेटी का रिस्ता करवा दीजिए तो मेरे मित्रों आज उसी तथाकथित दलित महाधिनायक आंबेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान/केशरीनन्दन/शंकर सुमन के जन्मदिन के आने पर सिर पर मैला धोने वालों की बात की जा रही है जिनको गिनाया जा रहा  भारतीय समाज के 1/300 आबादी इस काम में लगी है तो उनका जीवन स्तर सामाजिक और आर्थिक रूप से कैसे उठाया जाय इस पर कुछ अभी तक ख़ास नहीं हुआ तो मई इसका भी फार्मूला बता देता हूँ: तथाकथित दलित महाधिनायक आंबेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान/केशरीनन्दन/शंकर सुमन के सबसे निष्ठावान अनुयायी जो भारत देश से लेकर विदेशों में उच्चतम पदों, सामाजिक कार्यकर्ता के पदों, और किशी भी भारतीय श्रेष्ठ सेवा के पदों, राजनयिक और राजनैतिक पद पर आसीन हो या पूर्व में रहे हों अगर इस "सिर पर मैला धोने वालों की बात की जा रही है जिनको गिनाया जा रहा  भारतीय समाज के 1/300 आबादी" के यहाँ अपनी बेटी का रिस्ता मानवता के नाते अगर करना स्वयं प्रारम्भ कर देते हैं तो वे स्वयं आर्थिक और सामाजिक रूप से उन्नत हो जाएंगे क्योंकि इन  तथाकथित दलित महाधिनायक आंबेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान/केशरीनन्दन/शंकर सुमन के सबसे निष्ठावान अनुयायी जो भारत देश से लेकर विदेशों में उच्चतम पदों, सामाजिक कार्यकर्ता के पदों, और किशी भी भारतीय श्रेष्ठ सेवा के पदों, राजनयिक और राजनैतिक पद पर आसीन रहे हों या हों से बेटी का रिस्ता अन्य भारतीय समाज तथाकथित दलित महाधिनायक आंबेडकर/अम्बावडेकर/हनुमान/केशरीनन्दन/शंकर सुमन से ही स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया था तो सर पर मैला धोने वालों के साथ बेटी का रिस्ता मानवता के नाते ही इनको अब करना चाहिए ऐसा मेरा मत है लेकिन मै किशी को आदेश नही  दे रहा हूँ न ही कोई नियम बना रहा हूँ वर्ण आजिज आ गया हूँ ऐसे तथाकथित विचारकों से जो दीनदयालों आंबेडकर, काशीराम, विश्वनाथ प्रताप, गांधी और अटल जी जैसे लोगों के अंतिम जीवन से शिक्षा नहीं ले रहे हैं जिनसे बड़ा कोई दीन दयाल अभी तक जन्म ही नहीं लिया है भारतीय राजनीती में। दुनिया में सबसे ज्यादा मल ढोने का काम एक आम भारतीय किशान करता है जिसकी आबादी 65% है जो सम्पूर्ण भारतीयों के अन्नदाता है और जिनका पूरे 24 घण्टे की सेवा है भारतीय लोगों के लिए और आप लोगों को 1/300 की ज्यादा चिंता लगी रहती है जो मुस्किल से विशेष महानगरीय जनता जो केवल पूरी भारतीय आबादी के 2-5 % लोगों के ही काम आते हैं यह 24 घंटे की सेवा नहीं है और आप ओट बैंक का खेल खेलने वाले ज्ञान लोगों के लिए और भारतीय व्यवस्था के दमन के पोषको से समर्थन के नाते यह सब प्रपंच रचते हैं। अब विश्वनाथ और अम्बवादेकर/हनुमान के उस सामाजिक न्याय के फार्मूले  की क्या जरूरत रह गयी है मेरा यह फार्मूला जो दे रहा  हूँ वह प्रयोग में लाया जा सकता हैं या २) कुर्मावतारी और नान कुर्मावतारी संख्या के अनुपात में सरकारी सेवा/सुविधा और अधिकार/कर्तव्य का विभाजन कर दिया जाय लेकिन फिर संख्या के घटने बढ़ने से इस पर कोई अंतिम विराम न लगे सृस्टि के अंत तक।-------------केवल आप सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनेताओं में से कोई एक आगे आकर वेश्यावृत्ति जैसे कार्य का समूल उन्मूलन करा दीजिये (जिस बेटे बेटियों के माता और पिता वेश्यावृत्ति में लिप्त हैं उनका दर्द सर से मैला ढोने वाले बच्चों के दर्द से ज्यादा दर्द होता है और समाज में उनका तिरस्कार इनसे ज्यादा होता है) उसी दिन से ६ माह के अंदर मै सिर से मैला धोने की व्यवस्था पूर्ण रूप से ख़त्म करवा दूंगा।
            

National Cadet Corps having 1st Position in the 96 UP BN, Jaunpur, Varanasi Group in Army Wing: 1995-1997--------तथाकथित सामाजिक न्याय को खत्म कीजिये और मेरे गाँव से लेकर ननिहाल तक ब्राह्मणों के घर में भी कुर्मावतारी विष्णु और शंकर पाइए और न मिलते हों तो मुझसे मिलये मई साक्षात्कार उनका कराऊंगा । -----मै तो कम से कम विश्वनाथप्रताप/महामृत्युंजय/केदारेश्वर का विकल्प तो स्वयं में हूँ विवेक/त्रिनेत्र/त्रयम्बक/त्रिलोचन नामधारी होने की ही वजह से और गोपास्ट्मी/गोवर्धन अस्टमी:गिरिधर अस्टमी को जन्म लेने से मिले राशिनाम गिरिधारी होने की वहज से गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण, गिरी मरुधर/मेरु:मदिराचल धारी कुर्मावतारी विष्णु, गिरी धरणीधर:पृथ्वीधर शेषनाग, गिरी धौलागिरी:हिमालय धारी अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान/मारुतिनंदन/केशरीनन्दन/शंकरसुमन/आंजनेय/अंजनीपुत्र तो हूँ ही और इन सब चरित्रों का निर्वहन इस प्रयागराज और बेंगलुरु/ मिनी अमेरिका में रहते हुए किया भी हूँ तो क्या इसमे भी किशी कुर्मावतारी अहमद हो संदेह है? और है तो सामने आये मई उसको अपनी शक्ति देखूंगा लेकिन पहले वह मेरे जैंसा जीवन जीकर देखाए स्वयं न की अपने किशी गुलाम कुत्ते के पिल्ले को मेरे सामने भेज दे। --------फिर भी मई समझता हूँ की मैंने जो लिखा है वह किया है अतः इस्वर ने विष्णुकांत/परमब्रह्म श्रीराम और कृष्णकांत/परमब्रह्म श्रीकृष्ण को स्वयं मेरे पाश भेज दिया है इनके विशेष दिन पर ही तो जब परम ब्रह्म ही मेरे पास आकर गवाही दे रहे हैं तो इनके किशी एक अवतार की बात किया जाना मेर साथ नाइंसाफी है और इस नाइंसाफी को दूर अगर 11/11 -9/9 नहीं कर सका तो मई स्वयं 11-11 इसे दूर कर दूंगा पहले इस तथाकथित सामाजिक न्याय को भारत से दूर उसी तरह कर दीजिये जिस तरह से भारतीय शहीदों ने अंग्रेजों को नहीं वरन गुलामी की जंजीर को तोड़ा था और जिसकी पुनः प्राप्ति हेतु एक भारतीय नेता के माध्यम से इस तथाकथित सामाजिक न्याय को आप के पास पुनः भेज दिया गया जो तो जीवन भर अच्छा जीवन जिया वृद्धावस्था में दूसरा विवाह भी रचाया लेकिन आप इस लिए इसे स्वीकार किये की इसकी अवहेलना मानवमात्र की अवहेलना करार दे दिया जाता पर वही मानवमात्र अगर मेरे जैसे उच्च भारतीय वैचारिक व्यक्तित्व के आत्मबल पर छूट पहुंचाए विदेशी मानशिकता वालों का अभिकर्ता हो तो आप इस समय इस तथाकथित सामाजिक न्याय के चोले को तोड़ सकने के लिए स्वतंत्र है जब 2005/2006 में उसे विश्वमहाशक्ति मिल ही चुकी है और 2008 में अशोकचक्र पूर्णरूपेण टूट चुका है तो किस संविधान की रक्षा इस कागज़ में अशोकचक्र से करेंगे जिस सत्य को छुपाने के लिए मुझे पागल, दीवालिया, दारूबाज, चरित्रहीन, दरिद्र, और अन्य अन्य विभूषित नाम दिए गए।-----मई वहशी आशिक और पागल दीवाना होऊंगा यह कृषि जन्म में मत सोचियेगा पर यह जरूर है की दुनिया में राधा और किशन जन्म लेते हैं पर राधा को भी समान सामाजिक और धार्मिक जीवन दिया जाना इस समाज का काम है और अगर यह समाज यह नहीं कर सका तो उसे राधा-कृष्ण और राम-सीता की परिकल्पना छोड़ शुक्राचार्य के नाम की माला जपनी चाहिए जो इस दुनिया को सदा ही विनाश की और ले गए है। आप जितना चाहें तथाकथित सामाजिक न्याय के अस्त्र को किशी एक से किशी दूसरे पर घुमाकर अपना उल्लू सीधा करते रहे और विदेशों को फ़ायदा पहुचाते रहें पर "सत्यमेव जयते" आप देशी किन्तु विदेशी एजेंटों/अभिकर्ताओं और नेताओं का पर्दा फास कर ही दिया की अधिकतम विदेश और विदेशी मानसिकता के लोगों के फायदे के लिए उच्च स्तर पर इस तथाकथित सामाजिक न्याय का उपयोग हो रहा है इसके माध्यम से भारतीय सामाजिक व्यवस्था का मजाक उड़ाकर और इसकी गहन संस्कृति पर हमला कर। आर्थिक समानता की तेजी के साथ सांस्कृतिक, सामाजिक, संस्कारित और धार्मिक समानता नहीं आ जाती है इसका हर तबके के वे लोग गवाह हैं जो संस्कारित, सुसंस्कृत और सामाजिक ताने बाने को पीढ़ी डर पीढ़ी बनाये हुए हैं अपने त्याग, बलिदान और तपस्या के बल पर। एक ही रास्ता बचा है की एक ग्रामसभा सदस्य से लेकर संसद सदस्य और समाज सेवी संस्थाएं अपना कुछ समय इस कार्य में दें की एक मजबूत व्यवस्था नीचे से लेकर ऊपर तक बने की कौन-कौन से लोग जो जन्मना पारिवारिक स्थिति और जीवन में किशी घटनावार पारिवारिक स्थिति के वास्तविक वांछनीय नागरिक हैं जिनको सरकारी सामाजिक सहायता/सेवा की जरूरत वास्तविक रूप से है चाहे वे जिस भी समाज से आते हों। -------तथाकथित सामाजिक न्याय को खत्म कीजिये और मेरे गाँव से लेकर ननिहाल तक ब्राह्मणों के घर में भी कुर्मावतारी विष्णु और शंकर पाइए और न मिलते हों तो मुझसे मिलये मई साक्षात्कार उनका कराऊंगा ।

National Cadet Corps having 1st Position in the 96 UP BN, Jaunpur, Varanasi Group in Army Wing: 1995-1997--------तथाकथित सामाजिक न्याय को खत्म कीजिये और मेरे गाँव से लेकर ननिहाल तक ब्राह्मणों के घर में भी कुर्मावतारी विष्णु और शंकर पाइए और न मिलते हों तो मुझसे मिलये मई साक्षात्कार उनका  कराऊंगा । -----मै तो कम से कम  विश्वनाथप्रताप/महामृत्युंजय/केदारेश्वर का विकल्प तो स्वयं में हूँ विवेक/त्रिनेत्र/त्रयम्बक/त्रिलोचन नामधारी होने की ही वजह से और गोपास्ट्मी/गोवर्धन अस्टमी:गिरिधर अस्टमी को जन्म लेने से मिले राशिनाम गिरिधारी होने की वहज से गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण, गिरी मरुधर/मेरु:मदिराचल धारी कुर्मावतारी विष्णु, गिरी धरणीधर:पृथ्वीधर शेषनाग, गिरी धौलागिरी:हिमालय धारी अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान/मारुतिनंदन/केशरीनन्दन/शंकरसुमन/आंजनेय/अंजनीपुत्र तो हूँ ही और इन सब चरित्रों का निर्वहन इस प्रयागराज और बेंगलुरु/ मिनी अमेरिका में रहते हुए किया भी हूँ तो क्या इसमे भी किशी कुर्मावतारी अहमद हो संदेह है? और है तो सामने आये मई उसको अपनी शक्ति देखूंगा लेकिन पहले वह मेरे जैंसा जीवन जीकर देखाए स्वयं न की अपने किशी गुलाम कुत्ते के पिल्ले को मेरे सामने भेज दे। --------फिर भी मई समझता हूँ की मैंने जो लिखा है वह किया है अतः इस्वर ने विष्णुकांत/परमब्रह्म श्रीराम और कृष्णकांत/परमब्रह्म श्रीकृष्ण को स्वयं मेरे पाश भेज दिया है इनके विशेष दिन पर ही तो जब परम ब्रह्म ही मेरे पास आकर गवाही दे रहे हैं तो इनके किशी एक अवतार की बात किया जाना मेर साथ नाइंसाफी है और इस नाइंसाफी को दूर अगर 11/11 -9/9 नहीं कर सका तो मई स्वयं 11-11 इसे दूर कर दूंगा पहले इस तथाकथित सामाजिक न्याय को भारत से दूर उसी तरह कर दीजिये जिस तरह से भारतीय शहीदों ने अंग्रेजों को नहीं वरन  गुलामी की जंजीर को तोड़ा था और जिसकी पुनः प्राप्ति हेतु एक भारतीय नेता के माध्यम से इस तथाकथित सामाजिक न्याय को आप के पास पुनः भेज दिया गया जो तो  जीवन भर अच्छा जीवन जिया वृद्धावस्था में दूसरा विवाह भी रचाया लेकिन आप इस लिए इसे स्वीकार किये की इसकी अवहेलना मानवमात्र की अवहेलना करार दे दिया जाता पर वही मानवमात्र अगर मेरे जैसे उच्च भारतीय वैचारिक व्यक्तित्व के आत्मबल पर छूट पहुंचाए विदेशी मानशिकता वालों का अभिकर्ता हो तो आप इस समय इस तथाकथित सामाजिक न्याय के चोले को तोड़ सकने के लिए स्वतंत्र है जब 2005/2006 में उसे विश्वमहाशक्ति मिल ही चुकी है और 2008 में अशोकचक्र पूर्णरूपेण टूट चुका है तो किस संविधान की रक्षा इस कागज़ में अशोकचक्र से करेंगे जिस सत्य को छुपाने के लिए मुझे पागल, दीवालिया, दारूबाज, चरित्रहीन, दरिद्र, और अन्य अन्य विभूषित नाम दिए गए।-----मई वहशी आशिक और पागल दीवाना होऊंगा यह कृषि जन्म में मत सोचियेगा पर यह जरूर है की दुनिया में राधा और किशन जन्म लेते हैं पर राधा को भी समान सामाजिक और धार्मिक जीवन दिया जाना इस समाज का काम है और अगर यह समाज यह नहीं कर सका तो उसे राधा-कृष्ण और राम-सीता की परिकल्पना छोड़ शुक्राचार्य के नाम की माला जपनी चाहिए जो इस दुनिया को सदा ही विनाश की और ले गए है।  आप जितना चाहें तथाकथित सामाजिक न्याय के अस्त्र को किशी एक से किशी दूसरे पर घुमाकर अपना उल्लू सीधा करते रहे और विदेशों को फ़ायदा पहुचाते रहें पर "सत्यमेव जयते" आप देशी किन्तु विदेशी एजेंटों/अभिकर्ताओं और नेताओं का पर्दा फास कर ही दिया की अधिकतम विदेश और विदेशी मानसिकता के लोगों के फायदे के लिए उच्च स्तर पर इस तथाकथित सामाजिक न्याय का उपयोग हो रहा है इसके माध्यम से भारतीय सामाजिक व्यवस्था का मजाक उड़ाकर और इसकी गहन संस्कृति पर हमला कर। आर्थिक समानता की तेजी के साथ सांस्कृतिक, सामाजिक, संस्कारित और धार्मिक समानता नहीं आ जाती है इसका हर तबके के वे लोग गवाह हैं जो संस्कारित, सुसंस्कृत और सामाजिक ताने बाने को पीढ़ी डर पीढ़ी बनाये हुए हैं अपने त्याग, बलिदान और तपस्या के बल पर। एक ही रास्ता बचा है की एक ग्रामसभा सदस्य से लेकर संसद सदस्य और समाज सेवी संस्थाएं अपना कुछ समय इस कार्य में दें की एक मजबूत व्यवस्था नीचे से लेकर ऊपर तक बने की कौन-कौन से लोग जो जन्मना पारिवारिक स्थिति और जीवन में किशी घटनावार पारिवारिक स्थिति के वास्तविक वांछनीय नागरिक हैं जिनको सरकारी सामाजिक सहायता/सेवा की जरूरत वास्तविक रूप से है चाहे वे जिस भी समाज से आते हों। -------तथाकथित सामाजिक न्याय को खत्म कीजिये और मेरे गाँव से लेकर ननिहाल तक ब्राह्मणों के घर में भी कुर्मावतारी विष्णु और शंकर पाइए और न मिलते हों तो मुझसे मिलये मई साक्षात्कार उनका  कराऊंगा । 



Saturday, April 11, 2015

शिक्षा और शोध मेरा व्यवसाय था जीविकोपार्जन के लिए इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र पर लेकिन मै तो शिक्षा और शोध के साथ प्रहरी/क्षत्रिय की ही भूमिका में था इस विश्व मानवता और इसप्रकार इस केंद्र की रक्षा के लिए इस प्रयागराज विश्वविद्यालय में। National Cadet Corps 1st Position in the 96 UP BN, Jaunpur, Varanasi Group in Army Wing: 1995-1997 आप जितना चाहें तथाकथित सामाजिक न्याय के अस्त्र को किशी एक से किशी दूसरे पर घुमाकर अपना उल्लू सीधा करते रहे और विदेशों को फ़ायदा पहुचाते रहें पर "सत्यमेव जयते" आप देशी किन्तु विदेशी एजेंटों/अभिकर्ताओं और नेताओं का पर्दा फास कर ही दिया की अधिकतम विदेश और विदेशी मानसिकता के लोगों के फायदे के लिए उच्च स्तर पर इस तथाकथित सामाजिक न्याय का उपयोग हो रहा है इसके माध्यम से भारतीय सामाजिक व्यवस्था का मजाक उड़ाकर और इसकी गहन संस्कृति पर हमला कर। आर्थिक समानता की तेजी के साथ सांस्कृतिक, सामाजिक, संस्कारित और धार्मिक समानता नहीं आ जाती है इसका हर तबके के वे लोग गवाह हैं जो संस्कारित, सुसंस्कृत और सामाजिक ताने बाने को पीढ़ी डर पीढ़ी बनाये हुए हैं अपने त्याग, बलिदान और तपस्या के बल पर। एक ही रास्ता बचा है की एक ग्रामसभा सदस्य से लेकर संसद सदस्य और समाज सेवी संस्थाएं अपना कुछ समय इस कार्य में दें की एक मजबूत व्यवस्था नीचे से लेकर ऊपर तक बने की कौन-कौन से लोग जो जन्मना पारिवारिक स्थिति और जीवन में किशी घटनावार पारिवारिक स्थिति के वास्तविक वांछनीय नागरिक हैं जिनको सरकारी सामाजिक सहायता/सेवा की जरूरत वास्तविक रूप से है चाहे वे जिस भी समाज से आते हों।

शिक्षा और शोध मेरा व्यवसाय था जीविकोपार्जन के लिए इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र पर लेकिन मै तो शिक्षा और शोध के साथ प्रहरी/क्षत्रिय की ही भूमिका में था इस विश्व मानवता और इसप्रकार इस केंद्र की रक्षा के लिए इस प्रयागराज विश्वविद्यालय में। National Cadet Corps 1st Position in the 96 UP BN, Jaunpur, Varanasi Group in Army Wing: 1995-1997
आप जितना चाहें तथाकथित सामाजिक न्याय के अस्त्र को किशी एक से किशी दूसरे पर घुमाकर अपना उल्लू सीधा करते रहे और विदेशों को फ़ायदा पहुचाते रहें पर "सत्यमेव जयते" आप देशी किन्तु विदेशी एजेंटों/अभिकर्ताओं और नेताओं का पर्दा फास कर ही दिया की अधिकतम विदेश और विदेशी मानसिकता के लोगों के फायदे के लिए उच्च स्तर पर इस तथाकथित सामाजिक न्याय का उपयोग हो रहा है इसके माध्यम से भारतीय सामाजिक व्यवस्था का मजाक उड़ाकर और इसकी गहन संस्कृति पर हमला कर। आर्थिक समानता की तेजी के साथ सांस्कृतिक, सामाजिक, संस्कारित और धार्मिक समानता नहीं आ जाती है इसका हर तबके के वे लोग गवाह हैं जो संस्कारित, सुसंस्कृत और सामाजिक ताने बाने को पीढ़ी डर पीढ़ी बनाये हुए हैं अपने त्याग, बलिदान और तपस्या के बल पर। एक ही रास्ता बचा है की एक ग्रामसभा सदस्य से लेकर संसद सदस्य और समाज सेवी संस्थाएं अपना कुछ समय इस कार्य में दें की एक मजबूत व्यवस्था नीचे से लेकर ऊपर तक बने की कौन-कौन से लोग जो जन्मना पारिवारिक स्थिति और जीवन में किशी घटनावार पारिवारिक स्थिति के वास्तविक वांछनीय नागरिक हैं जिनको सरकारी सामाजिक सहायता/सेवा की जरूरत वास्तविक रूप से है चाहे वे जिस भी समाज से आते हों।

जिन लोगों के घर विश्वमहाशक्ति चली गयी हों; जिन लोगों ने विश्वमहाशक्ति के निम्नतम स्तर पर पतन से अर्जित गतिज ऊर्जा का मेरे विरुद्ध प्रयोग किया संकीर्ण मानसिकता से भरे स्वार्थ में (शुक्राचार्य बता दूँ की कि दुश्मन का दुश्मन मित्र होता है जैसी छोटी सोच मे सृजन तो नही के बराबर पर विनाश ज्यादा है) और जो स्वयं शासक हो चुके हो उनको तो कम से कम सार्वजनिक सामूहिक धन पर आधारित सरकारी सहायता/सेवा लेना बंद कर देना चाहिए न 2005/2006 से तो कम से कम 2008 से जब की सप्रमाण अशोकचक्र टूट गया और ठीक उसी समय मेरे परिवार के अन्नदाता श्री बरखु दादा भी 2008 में ही अचानक मेरे परिवार की अन्नदाता सेवा लायक नहीं बचे ईस्वरी प्रकोप से जो उस निम्नतन समाज के शुभचिंतक और स्वयंसेवक भी थे जो उनसे बात करने पर पता चलता था और सब कमी हमारे जैसे लोगों में ही नजर आती थी ? उनके भतीजे काशीराम पुत्र श्रीराम बहादुर जो तो मुख्य विकाश अधिकारी(आयुक्त) पद से सेवानिवृत्त हैं और जो गोमती नगर लखनऊ में "काशी कुञ्ज" भवन में रहते हैं जिनके पास मुझे ज्ञात स्रोत के अनुसार कम से कम दो पेट्रोल पम्प और बड़े शहर में बड़े कृषि फार्म के मालिक है और इस मेरे गाँव सबसे बड़े धनड्य है से मै पूंछता हूँ मेरे कितना ही गरीब होने के बाद भी उनके पुत्र या आने वाले वंसज मेरे घर की किशी कन्या का हाँथ थाम सकते है सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से और हमारे घर के लोग उनका पैर धो अपनी लड़की उनके पुत्र या वंसज के साथ विदा कर देंगे? और यहां उस विश्वमहाशक्ति को अर्जित करने के वाद भी आप और आप का समाज यदि याचक(सरकारी सहायता/सेवा की) का चरित्र धारण किये हुए है तो आम भारतीय जो अपना जाती/पंथ/धर्म मानते हुए इसे (इस जाती/पंथ/धर्म) सदा ही अर्जित करते हुए त्याग का जीवन यापन करता के साथ यह वही अन्याय है जो मेरे साथ हुआ?-----------------------------------------------------------------------बेली फार्म, अल्लाहाबाद यूनिवर्सिटी टीचर्स कालोनी में प्रथम बार हॉउस अलॉटमेंट में सबसे पहले तीन फॉर्म मटेरियल साइंस के तीन शिक्षकों के पड़े थे और एटमोस्फियरिक एंड ओसियन साइंस से हम दो लोग गए फार्म जमा करने तो पता चला की जिसका फार्म और शपथपत्र दोनों एक साथ पहले पड़ेंगे उसी के अनुसार रूम मिलेंगे तो ऐसे में मैंने उसी समय कचेहरी से शपथ पत्र बनवाकर सबसे पहले दोनों जमा करने की औपचारिका पूरी कर दी पर इसके बावजूद मुझे पहला फ्लैट नहीं मिला किसको मिला यह तो प्रयागराज में कुर्मावतारी लोग तक करते हैं जहां मेरी बात आती है तो इसके पीछे मेरे सामने लाये जाने वाले लोगों से ज्यादा वे लोग जिम्मेदार है जो 11-9-2001, 11-9-2007, 18-9-2007, को मात खाए है और 29/30-10-2009 पूर्णरूप से मात खा गए। तो ये वे लोग हैं जो बिना आधार की लड़ाई कर रहे हैं जिनका आधार मैंने स्वयं तैयार किया अपनी सहन शीलता के बल पर और अपनी सहनशीलता से अपने मातहतों को ही कस्ट दिया वस उसका एक और एक कारन था की गुरुदेव जोशी को दिए वादे को पूरा करना किशी भी स्थिति में और पूरा करने के बाद उस उचित समय की तलास की लोगों को यह बताने के अवसर मिले बताने को की वादा कैसे और कब का पूरा हो चुका है और अब बेकार की लड़ाई हारे लोग कर रहे हैं धुल की रस्सी बंधने जैसा। मै कल रहूँ या न रहूँ क्योंकि 11-9-2001 को ही स्पस्ट हो गया था की समय सबसे बड़ा बलवान है न की व्यक्ति और उसकी व्यवस्था और समय बलवान तो 11-9-2001, 11-9-2007, 18-9-2007, को मात खाए है और 29/30-10-2009 को ही सब कुछ हो चुका है। कौन राजा और कौन जोगी यह आगे का समय बताएगा पर इतना पुनः बताना चाहूँगा की मै न्यूनतन सुविधा लेकर संघर्ष किया हूँ दिग्गज हस्तियों का क्योंकि मेरे साथ मेरे तीन पीढ़ी की शक्ति और विचार और व्यवहार है जिसे मैंने अपने 15 वर्ष(हाई स्कूल-1991) की परिक्षा के बाद से ही पारिवारिक जिम्मेदारियों से हाशिल किया हूँ और दिखने के लिए कोई भी रहा हो जिम्मेदार पर केंद्रीय शक्ति और उसका अनुकूल और प्रतिकूल असर मेरे दिल/दिमाग पर ही होना था। तो जो तीन पीढ़ी की शक्ति लिए हो उस दीपक को यूं ही पागल, मद्यप, चरित्रहीन और दीवालिया घोषित कर आप अपनी सार्वजनिक गलती को क्यूँ छिपाना चाहते थे/है। इसके साथ प्रारम्भ में मुझे जातिवादी और रंगभेदी आप और आप के लोग कहे अब आप और आप के लोग स्वयं यही कर रहे हैं जिसको मई यहाँ उद्दृत कर रहा हूँ और आप और आप के मातहत चरित्रहीनता की सारी हद पार करते हुए अशोकचक्र तक तोड़ डाले इसका क्या जबाब है। अशोकचक्र तोड़ दिया आप ने और आप का तथाकथित सामाजिक न्याय जीता रहा। वाह क्या न्याय है आप का अरे इसे तो 2005/2006 में उसी दिन नहीं तो 2008 में सदा-सदा के लिए ख़त्म हो जाना चाहिए था। फिर भी आप लोग जीवित किये हुए हैं। अभी तो केवल लेखनी चल रही है एक दिन जब मई चलूँगा समाज में तो अल्पमत में कौन है और बहुमत में कौन है और वास्तविक रूप से कौन शक्तिशाली था वह पता चलेगा और आप का जाती/धर्म और रंगभेद सब काम नही आएगा और सब अपना जाती/धर्म और रंग मानते हुए सब जाती/धर्म और रूप-रंग के साथ अपनी जिम्मेदारी संभालते हुए ये भेद दूर करेंगे। बहुत हुआ आप का अँधेरे में तीर चलना और लाल बुझक्कड़ होना।

जिन लोगों के घर विश्वमहाशक्ति चली गयी हों; जिन लोगों ने विश्वमहाशक्ति के निम्नतम स्तर पर पतन से अर्जित गतिज ऊर्जा का मेरे विरुद्ध प्रयोग किया संकीर्ण मानसिकता से भरे स्वार्थ में (शुक्राचार्य  बता दूँ की कि दुश्मन का दुश्मन मित्र होता है जैसी छोटी सोच मे सृजन तो नही के बराबर पर विनाश ज्यादा है) और जो स्वयं शासक हो चुके हो उनको तो कम से कम सार्वजनिक सामूहिक धन पर आधारित सरकारी सहायता/सेवा लेना बंद कर देना चाहिए न 2005/2006  से  तो कम से कम 2008 से जब की सप्रमाण अशोकचक्र टूट गया और ठीक उसी समय मेरे  परिवार के अन्नदाता श्री बरखु दादा भी 2008 में ही अचानक मेरे परिवार की अन्नदाता सेवा लायक नहीं बचे ईस्वरी  प्रकोप से जो उस निम्नतन समाज के शुभचिंतक और स्वयंसेवक भी थे जो उनसे बात करने पर पता चलता था और सब कमी हमारे जैसे लोगों में ही नजर आती थी ? उनके भतीजे काशीराम पुत्र श्रीराम बहादुर जो तो मुख्य विकाश अधिकारी(आयुक्त) पद से सेवानिवृत्त हैं और जो गोमती नगर लखनऊ में "काशी कुञ्ज" भवन में रहते हैं जिनके पास मुझे ज्ञात स्रोत के अनुसार कम से कम दो पेट्रोल पम्प और  बड़े शहर में बड़े कृषि फार्म के मालिक है और इस  मेरे गाँव सबसे बड़े धनड्य है से मै पूंछता हूँ मेरे कितना ही गरीब होने के बाद भी उनके पुत्र या आने वाले वंसज मेरे घर की किशी कन्या का हाँथ थाम सकते है सामाजिक, संवैधानिक और  धार्मिक रूप से और हमारे घर के लोग उनका पैर धो अपनी लड़की उनके पुत्र या वंसज के साथ विदा कर देंगे? और यहां उस विश्वमहाशक्ति को अर्जित करने के वाद भी आप और आप का समाज यदि याचक(सरकारी सहायता/सेवा की)  का चरित्र धारण किये हुए है तो आम भारतीय जो अपना जाती/पंथ/धर्म मानते हुए इसे (इस जाती/पंथ/धर्म) सदा ही अर्जित करते हुए त्याग का जीवन यापन करता के साथ यह वही अन्याय है जो मेरे साथ हुआ?-----------------------------------------------------------------------बेली फार्म, अल्लाहाबाद यूनिवर्सिटी टीचर्स कालोनी में प्रथम बार हॉउस अलॉटमेंट में सबसे पहले तीन फॉर्म मटेरियल साइंस के तीन शिक्षकों के पड़े थे और एटमोस्फियरिक एंड ओसियन साइंस से हम दो लोग गए फार्म जमा करने तो पता चला की जिसका फार्म और शपथपत्र दोनों एक साथ पहले पड़ेंगे उसी के अनुसार रूम मिलेंगे तो ऐसे में मैंने उसी समय कचेहरी से शपथ पत्र बनवाकर सबसे पहले दोनों जमा करने की औपचारिका पूरी कर दी पर इसके बावजूद मुझे पहला फ्लैट नहीं मिला किसको मिला यह तो प्रयागराज में कुर्मावतारी लोग तक करते हैं जहां मेरी बात आती है तो इसके पीछे मेरे सामने लाये जाने वाले लोगों से ज्यादा वे लोग जिम्मेदार है जो 11-9-2001, 11-9-2007, 18-9-2007, को मात खाए है और 29/30-10-2009 पूर्णरूप से मात खा गए। तो ये वे लोग हैं जो बिना आधार की लड़ाई कर रहे हैं जिनका आधार मैंने स्वयं तैयार किया अपनी सहन शीलता के बल पर और अपनी सहनशीलता से अपने मातहतों को ही कस्ट दिया वस उसका एक और एक कारन था की गुरुदेव जोशी को दिए वादे को पूरा करना किशी भी स्थिति में और पूरा करने के बाद उस उचित समय की तलास की लोगों को यह बताने के अवसर मिले बताने को की वादा कैसे और कब का पूरा हो चुका है और अब बेकार की लड़ाई हारे लोग कर रहे हैं धुल की रस्सी बंधने जैसा। मै कल रहूँ या न रहूँ क्योंकि 11-9-2001 को ही स्पस्ट हो गया था की समय सबसे बड़ा बलवान है न की व्यक्ति और उसकी व्यवस्था और समय बलवान तो 11-9-2001, 11-9-2007, 18-9-2007, को मात खाए है और 29/30-10-2009 को ही सब कुछ हो चुका है। कौन राजा और कौन जोगी यह आगे का समय बताएगा पर इतना पुनः बताना चाहूँगा की मै न्यूनतन सुविधा लेकर संघर्ष किया हूँ दिग्गज हस्तियों का क्योंकि मेरे साथ मेरे तीन पीढ़ी की शक्ति और विचार और व्यवहार है जिसे मैंने अपने 15 वर्ष(हाई स्कूल-1991) की परिक्षा के बाद से ही पारिवारिक जिम्मेदारियों से हाशिल किया हूँ और दिखने के लिए कोई भी रहा हो जिम्मेदार पर केंद्रीय शक्ति और उसका अनुकूल और प्रतिकूल असर मेरे दिल/दिमाग पर ही होना था। तो जो तीन पीढ़ी की शक्ति लिए हो उस दीपक को यूं ही पागल, मद्यप, चरित्रहीन और दीवालिया घोषित कर आप अपनी सार्वजनिक गलती को क्यूँ छिपाना चाहते थे/है। इसके साथ प्रारम्भ में मुझे जातिवादी और रंगभेदी आप और आप के लोग कहे अब आप और आप के लोग स्वयं यही कर रहे हैं जिसको मई यहाँ उद्दृत कर रहा हूँ और आप और आप के मातहत चरित्रहीनता की सारी हद पार करते हुए अशोकचक्र तक तोड़ डाले इसका क्या जबाब है। अशोकचक्र तोड़ दिया आप ने और आप का तथाकथित सामाजिक न्याय जीता रहा। वाह क्या न्याय है आप का अरे इसे तो 2005/2006 में उसी दिन नहीं तो 2008  में सदा-सदा के लिए ख़त्म हो जाना चाहिए था। फिर भी आप लोग जीवित  किये हुए हैं। अभी तो केवल लेखनी चल रही है एक दिन जब मई चलूँगा समाज में तो अल्पमत में कौन है और बहुमत में कौन है और वास्तविक रूप से कौन शक्तिशाली था वह पता चलेगा और आप का जाती/धर्म और रंगभेद सब काम नही आएगा और सब अपना जाती/धर्म और रंग मानते हुए सब जाती/धर्म और रूप-रंग के साथ अपनी जिम्मेदारी संभालते हुए ये भेद दूर करेंगे। बहुत हुआ आप का अँधेरे में तीर चलना और लाल बुझक्कड़ होना।     

Thursday, April 9, 2015

मेरे पिता प्रदीप(सतत स्वैक्षिक ऊर्जा/प्रकाश का स्वयं का स्रोत)/सूर्यकांत(सूर्य के भी प्रकाश और ऊर्जा स्रोत) का /रामजानकी/सत्यनारायण/राधाकृष्ण के सनातन कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण रामापुर-223225 गांव के खानदान((रामप्रशाद+रामअवध (+गजाधर) +राजेंद्र/आद्यशंकर/त्रिभुवननाथ/सतीश/यदुनाथ)) का पूरा कुनबा देवव्रत की संतान है मतलब शाब्दिक रूप से गंगापुत्र भीष्म की संतान हैं हम लोग तो वादापूर्ण करना हमारा व्रत रहा है। मेरे मेरी माता पुष्पा(पुष्प पर आशीन देवी)/सरस्वती/लक्ष्मी/शिद्धिदात्री(दुर्गा का नवा स्वरुप)/पञ्च गायत्री/गायत्री के सनातन गौतमगोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण बिशुनपुर-223103 गाँव के खानदान (((रामप्रशाद((रमानाथ(विष्णु)/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश +पारसनाथ(शिव)/शशिधर/भानुप्रताप) +राम अजोर/इसनरायण/जयनारायण/राजेन्द्र/महेंद्र/सुरेन्द्र/नरेंद्र+चन्द्रवली/रामनारायण/शिवपूजन/सत्यनारायण)) + देवव्रत((शंकर/(अमरनाथ+समरनाथ)+छोटकुन)/परमात्मा))+केदारनाथ(त्रिभुवन नाथ+रामभवन) का कुनबा रामानंद की संतान है जिनका शाब्दिक अर्थ ही परमब्रह्म परमानंद परमात्मा है। पिता जी के ननिहाल जहां मै जन्म लिया हूँ गोपाअस्टमी/गोवर्धन अस्टमी/गिरिधर अस्टमी के दिन 11-11-1975 में के सनातन वशिष्ठ गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण भरारी(भर्रारी/तेज गतिशील)) का कुनबा रमाकांत/शेषनारायण/देवनारायण/इसनरायण/लक्ष्मीनारायण + लालताप्रशाद/पृथ्वेश हैं।-------इस प्रकार मै गौतम, वशिष्ठ, मारीच/कश्यप, आंगिरश/भारद्वाज/बृहस्पतिदेव, भृगु/भार्गव/जमदग्नि/दधीचि/शुक्राचार्य, अत्रि/दुर्वाशा(कृष्णात्रेय)/दत्तात्रेय(दत्त)/सोमात्रेय(सोम), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ में से कम से कम तीन ऋषिओं गौतम, वशिष्ठ और कश्यप/मारीच के अंश से अवश्य हूँ और गोत्रान्तर्गत विवाह होंने से मै सातों का अंश लिए जी रहा हूँ जिसमे से मई भृगु/भार्गव/जमदग्नि के जमदग्निपुर/जौनपुर में जन्म लिया और पला-पढ़ा-बढ़ा हूँ तथा गौतम गोत्रियों (प्रतापी गौतम गोत्रीय राजा विक्रमादित्य/विक्रमजीत के पुत्र आज़म/महान के नाम से बसे और इतिहास में गौतम गोत्रीय क्षत्रियों के गढ़ कहे जाने वाले अवध और काशी के बफर(बीच) के क्षेत्र आर्यमगढ़/आजमगढ़ से पैतृक रूप से हूँ) के क्षेत्र से हूँ जो दुर्वाशा ऋषि का भी क्षेत्र रहा है जैसा की दुर्वाशा ऋषि आश्रम प्रयाग के साथ-२ यहां आज भी आस्था और विशवास का केंद्र है सनातन के साथ आधुनिक संस्कृति की दृस्टि से भी। आंगिरश/भारद्वाज/बृहस्पतिदेव के गोत्र भारद्वाज से कश्यप का शीधा सम्बन्ध है गुरु शिष्य का जिसमे कश्यप के पौत्र बाल्मीक के शिष्य हैं भारद्वाज और इस प्रकार भारद्वाज शिष्यकुल जिसे गर्ग गोत्र कहते हैं वह भी कश्यप के शिष्यकुल में आ जाते हैं और उनका भी सम्बन्ध मुझ कश्यप गोत्रीय से स्थापित हो जाता है। अगर हम मानते हैं की भारत हस्तिनापुर(मेरठ) के राजा दुस्यंत, और मेनका तथा विश्वामित्र की पुत्री शकुन्तला के पुत्र भरत द्वारा आर्यव्रत क्षेत्र बनाये गए भारत वर्ष में मई रहता हूँ तो मेरा ही नहीं वर्ण सभी भारत वाशियों का सम्बन्ध कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ से हो जाता है स्वयं में ही। इतना ही नहीं सप्तर्षिओं/सात ब्रह्म ऋषियों के उद्गम स्थल प्रयागराज में मै वर्तमान में हूँ तो प्रकार भी सप्तऋषियों से सम्बन्ध स्थापित हो गया है मेरा उन तीन प्रारंभिक ऋषियों से जेनेटिक सम्बन्ध के साथ ।

मेरे पिता प्रदीप(सतत स्वैक्षिक ऊर्जा/प्रकाश का स्वयं का स्रोत)/सूर्यकांत(सूर्य के भी प्रकाश और ऊर्जा स्रोत) का /रामजानकी/सत्यनारायण/राधाकृष्ण के सनातन कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण रामापुर-223225 गांव के खानदान((रामप्रशाद+रामअवध (+गजाधर) +राजेंद्र/आद्यशंकर/त्रिभुवननाथ/सतीश/यदुनाथ)) का पूरा कुनबा देवव्रत की संतान है मतलब शाब्दिक रूप से गंगापुत्र भीष्म की संतान हैं हम लोग तो वादापूर्ण करना हमारा व्रत रहा है। मेरे मेरी माता पुष्पा(पुष्प पर आशीन देवी)/सरस्वती/लक्ष्मी/शिद्धिदात्री(दुर्गा का नवा स्वरुप)/पञ्च गायत्री/गायत्री के सनातन गौतमगोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण बिशुनपुर-223103 गाँव के खानदान (((रामप्रशाद((रमानाथ(विष्णु)/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश +पारसनाथ(शिव)/शशिधर/भानुप्रताप+राम अजोर/इसनरायण/जयनारायण/राजेन्द्र/महेंद्र/सुरेन्द्र/नरेंद्र+चन्द्रवली/रामनारायण/शिवपूजन/सत्यनारायण)) + देवव्रत((शंकर/(अमरनाथ+समरनाथ)+छोटकुन)/परमात्मा))+केदारनाथ(त्रिभुवन नाथ+रामभवन) का कुनबा रामानंद की  संतान है जिनका शाब्दिक अर्थ ही परमब्रह्म परमानंद परमात्मा है। पिता जी के ननिहाल जहां मै जन्म लिया हूँ गोपाअस्टमी/गोवर्धन अस्टमी/गिरिधर अस्टमी के दिन 11-11-1975 में के सनातन वशिष्ठ गोत्रीय मिश्रा ब्राह्मण भरारी(भर्रारी/तेज गतिशील)का कुनबा रमाकांत/शेषनारायण/देवनारायण/इसनरायण/लक्ष्मीनारायण + लालताप्रशाद/पृथ्वेश हैं।-------इस प्रकार मै गौतम, वशिष्ठ, मारीच/कश्यप, आंगिरश/भारद्वाज/बृहस्पतिदेव, भृगु/भार्गव/जमदग्नि/दधीचि/शुक्राचार्य, अत्रि/दुर्वाशा(कृष्णात्रेय)/दत्तात्रेय(दत्त)/सोमात्रेय(सोम), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ में से कम से कम तीन ऋषिओं गौतम, वशिष्ठ और कश्यप/मारीच के अंश से अवश्य हूँ और गोत्रान्तर्गत विवाह होंने से मै सातों का अंश लिए जी रहा हूँ जिसमे से मई भृगु/भार्गव/जमदग्नि के जमदग्निपुर/जौनपुर में जन्म लिया और पला-पढ़ा-बढ़ा हूँ तथा गौतम गोत्रियों (प्रतापी गौतम गोत्रीय राजा विक्रमादित्य/विक्रमजीत के पुत्र आज़म/महान के नाम से बसे और इतिहास में गौतम गोत्रीय क्षत्रियों के गढ़ कहे जाने वाले अवध और काशी के बफर(बीच) के क्षेत्र आर्यमगढ़/आजमगढ़ से पैतृक रूप से हूँ) के क्षेत्र से हूँ जो दुर्वाशा ऋषि का भी क्षेत्र रहा है जैसा की दुर्वाशा ऋषि आश्रम प्रयाग के साथ-२ यहां आज भी आस्था और विशवास का केंद्र है सनातन के साथ आधुनिक संस्कृति की दृस्टि से भी।   आंगिरश/भारद्वाज/बृहस्पतिदेव के गोत्र भारद्वाज से कश्यप का शीधा सम्बन्ध है गुरु शिष्य का जिसमे कश्यप के पौत्र बाल्मीक के शिष्य हैं भारद्वाज और इस प्रकार भारद्वाज  शिष्यकुल जिसे गर्ग गोत्र कहते हैं वह भी कश्यप के शिष्यकुल में आ जाते हैं और उनका भी सम्बन्ध मुझ कश्यप गोत्रीय से स्थापित हो  जाता है। अगर हम मानते हैं की भारत हस्तिनापुर(मेरठ) के राजा दुस्यंत, और मेनका तथा  विश्वामित्र की पुत्री शकुन्तला के पुत्र भरत द्वारा आर्यव्रत क्षेत्र बनाये गए भारत वर्ष में मई रहता हूँ तो मेरा ही नहीं वर्ण सभी भारत वाशियों का सम्बन्ध कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ से हो जाता है स्वयं में ही। इतना ही नहीं सप्तर्षिओं/सात ब्रह्म ऋषियों  के उद्गम स्थल प्रयागराज में मै वर्तमान में हूँ तो प्रकार भी सप्तऋषियों से सम्बन्ध स्थापित हो गया है मेरा उन तीन प्रारंभिक  ऋषियों से जेनेटिक सम्बन्ध के साथ ।