Google+ Followers

Friday, May 29, 2015

मानव स्वभाव में व्यवहारिक गलतियां कर अपराधबोध की की जिंदगी तो पूरा संसार जी ही रहा है चाहे उससे कुछ लोग गलती कराने का जाल ही बुने रहे हों अपने बराबर करने के लिए पर हे संसार वालों किशी एक को तो उसका अपना जीवन जीने दो इस सन्सार में जो हर संभावित गलतियों को पहले से भांपकर उससे बचने हेतु बड़े से बड़ा त्याग किया हो जीवन में। वही संसार को सच्चाई की राह दिखा सकता है इस दिग्भ्रमित करने वाली मायामयी जीवन की पगडंडियों पर।

मानव स्वभाव में व्यवहारिक गलतियां कर अपराधबोध की की जिंदगी तो पूरा संसार जी ही रहा है चाहे उससे कुछ लोग गलती कराने का जाल ही बुने रहे हों अपने बराबर करने के लिए पर हे संसार वालों किशी एक को तो उसका अपना जीवन जीने दो इस सन्सार में जो हर संभावित गलतियों को पहले से भांपकर उससे बचने हेतु बड़े से बड़ा त्याग किया हो जीवन में। वही संसार को सच्चाई की राह दिखा सकता है इस दिग्भ्रमित करने वाली मायामयी जीवन की पगडंडियों पर।   

Thursday, May 28, 2015

श्रीराम और श्रीकृष्ण की तरह समय और नियम के पुजारी होने का भाव ही हमें न्यायालय की चौखट पर ले गया अन्यथा मई अपना न्याय स्वयं करता हूँ उससे मुझे कोई रोक नहीं सकता है इस विश्व में: जिस श्रीकृष्ण ने महाभारत जैसे युद्ध को बिना स्वयं अस्त्र उठाये(अपवाद गंगा पुत्र भीष्मपितामह) समाप्त कर दिया उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण को जरा नामक बहेलिये के एक तीर से जान गवाना पड़ गया तो इससे आप उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण की तवहीनी करने लगेंगे तो यह आप की मूर्खता है। वह तो उनकी एक और विजय थी की वे समय और नियम के स्वयं पुजारी है। और जिस श्रीराम के तरकस से निकले बाण से वरुणदेव जल विहीन हो सकते है उस श्रीराम को सरयू ने जल समाधि दे दी यह भी उन परमब्रह्म श्रीराम के सन्दर्भ में एक और विजय थी की वे भी समय और नियम के स्वयं पुजारी है। इस दुनिया में आप का जितना कार्य है उसे समाप्त कर आप सामान्य मानव जीवन जीने या सरीर छोड़ने के लिए सदा तैयार रहें और ऐसा हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी विभूतियों के जीवन में होता है और उसका पालन करना पड़ता है। लेकिन कार्य समाप्ति कर लेने पर उनकी तवहीनी की जाय यह एक मूर्खता का द्योतक है व्यक्तिविशेष या समूह विशेष का।

श्रीराम और श्रीकृष्ण की तरह समय और नियम के पुजारी होने का भाव ही हमें न्यायालय की चौखट पर ले गया अन्यथा मई अपना न्याय स्वयं करता हूँ उससे मुझे कोई रोक नहीं सकता है इस विश्व में: जिस श्रीकृष्ण ने महाभारत जैसे युद्ध को बिना स्वयं अस्त्र उठाये(अपवाद गंगा पुत्र भीष्मपितामह) समाप्त कर दिया उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण को जरा नामक बहेलिये के एक तीर से जान गवाना पड़ गया तो इससे आप उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण की तवहीनी करने लगेंगे तो यह आप की मूर्खता है। वह तो उनकी एक और विजय थी की वे समय और नियम के स्वयं पुजारी है। और जिस श्रीराम के तरकस से निकले बाण से वरुणदेव जल विहीन हो सकते है उस श्रीराम को सरयू ने जल समाधि दे दी यह भी उन परमब्रह्म श्रीराम के सन्दर्भ में एक और विजय थी की वे भी समय और नियम के स्वयं पुजारी है। इस दुनिया में आप का जितना कार्य है उसे समाप्त कर आप सामान्य मानव जीवन जीने या सरीर छोड़ने के लिए सदा तैयार रहें और ऐसा हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी विभूतियों के जीवन में होता है और उसका पालन करना पड़ता है। लेकिन कार्य समाप्ति कर लेने पर उनकी तवहीनी की जाय यह एक मूर्खता का द्योतक है व्यक्तिविशेष या समूह विशेष का।

किशी की तवहीनी करना कोई प्रयागराज विश्वविद्यालय के कुछ समूह विशेष के लोगों से शीखे जो वरिष्ठ को कनिष्ठ और कनिष्ठ को वरिष्ठ करने करने के धंधे में लिप्त है उचित पद प्राप्त होने पर स्पस्ट रूप से परिभाषित नियम और पर्याप्त सामन्तराल पर पद ग्रहण तिथि होने के बावजूद। ये रामनगर, जौनपुर के है या रावणनगर, लंका के, भानुप्रताप हैं या राजा प्रतापभानु(रावण के पिता); हरिश्चंद पुत्र रोहितस्व के वंसज हैं या रावण के गण छलिया और झूंठ-प्रपंच का स्वामी कालनेमि।

किशी की तवहीनी करना कोई प्रयागराज विश्वविद्यालय के कुछ समूह विशेष के लोगों से शीखे जो वरिष्ठ को कनिष्ठ और कनिष्ठ को वरिष्ठ करने करने के धंधे में लिप्त है उचित पद प्राप्त होने पर स्पस्ट रूप से परिभाषित नियम और पर्याप्त सामन्तराल पर पद ग्रहण तिथि होने के बावजूद। ये रामनगर, जौनपुर के है या रावणनगर, लंका के, भानुप्रताप हैं या राजा प्रतापभानु(रावण के पिता); हरिश्चंद पुत्र रोहितस्व के वंसज हैं या रावण के गण छलिया और झूंठ-प्रपंच का स्वामी कालनेमि।

Wednesday, May 27, 2015

जिस श्रीकृष्ण ने महाभारत जैसे युद्ध को बिना स्वयं अस्त्र उठाये(अपवाद गंगा पुत्र भीष्मपितामह) समाप्त कर दिया उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण को जरा नामक बहेलिये के एक तीर से जान गवाना पड़ गया तो इससे आप उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण की तवहीनी करने लगेंगे तो यह आप की मूर्खता है। वह तो उनकी एक और विजय थी की वे समय और नियम के स्वयं पुजारी है। और जिस श्रीराम के तरकस से निकले बाण से वरुणदेव जल विहीन हो सकते है उस श्रीराम को सरयू ने जल समाधि दे दी यह भी उन परमब्रह्म श्रीराम के सन्दर्भ में एक और विजय थी की वे भी समय और नियम के स्वयं पुजारी है। इस दुनिया में आप का जितना कार्य है उसे समाप्त कर आप सामान्य मानव जीवन जीने या सरीर छोड़ने के लिए सदा तैयार रहें और ऐसा हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी विभूतियों के जीवन में होता है और उसका पालन करना पड़ता है। लेकिन कार्य समाप्ति कर लेने पर उनकी तवहीनी की जाय यह एक मूर्खता का द्योतक है व्यक्तिविशेष या समूह विशेष का।



जिस  श्रीकृष्ण ने महाभारत जैसे युद्ध को बिना स्वयं अस्त्र उठाये(अपवाद गंगा पुत्र भीष्मपितामह) समाप्त कर दिया उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण को जरा नामक बहेलिये के एक तीर से जान गवाना पड़ गया तो इससे आप उस परमब्रह्म श्रीकृष्ण की तवहीनी करने लगेंगे तो यह आप की मूर्खता है। वह तो उनकी एक और विजय थी की वे समय और नियम के स्वयं पुजारी है। और जिस श्रीराम के तरकस से निकले बाण से वरुणदेव जल विहीन हो सकते है उस श्रीराम को सरयू ने जल समाधि दे दी यह भी उन परमब्रह्म श्रीराम के सन्दर्भ में एक और विजय थी की वे भी समय और नियम के स्वयं पुजारी है। इस दुनिया में आप का जितना कार्य है उसे समाप्त कर आप सामान्य मानव जीवन जीने या सरीर छोड़ने के लिए सदा तैयार रहें और ऐसा हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी विभूतियों के जीवन में होता है और उसका पालन करना पड़ता है। लेकिन कार्य समाप्ति कर लेने पर उनकी तवहीनी की जाय यह एक मूर्खता का द्योतक है व्यक्तिविशेष या समूह विशेष का।

वर्तमान विश्व परिदृश्य तक जोशी-अटल का उद्देश्य लगभग पूरा हो गया है हम अपनी जाती/धर्म भले माने और इस हेतु हम एक दूसरे से भले अलग नजर आएं पर प्रयागराज से लेकर अंतिम विश्वछोर तक मानव मात्र भाई-भाई/बहन-बहन है। >>>>>>>जोशी-अटल बहुत चिल्लाते हो तो ये बताओ उनके लिए क्या कर सकते हो? जीते जी जलना स्वीकार कर जलाये जाने पर तड़पड़ाउंगा भी नहीं और शरीर में हर जगह कील ठोंक दी जाय तो भी विचलित नहीं होऊंगा, मान-सम्मान-स्वाभिमान सब दांव पर लगा सकता हूँ उनके किशी भी उद्देश्य की पूर्ती हेतु और इस हेतु किशी की दासता करनी हो तो भी स्वीकार है। भारतरत्न मिले न मिले अटल को रामरत्न और जोशी को कृष्णरत्न मै स्वयं दूंगा।-----यह थी महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक की श्रीराम(अटल)/कृष्ण(जोशी) भक्ति। और महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक को जो भी कुछ मिला वह थी श्रीराम/कृष्ण की महादेव की भक्ति तो उन दोनों के जीते जी श्रीराम(विष्णुकांत)/कृष्ण(कृष्णकांत) महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक के घर आ गए हैं और हो भी क्यों न जब कुछ नेता अपने जीते जी अपनी मूर्तिया बनवा लेते है तो श्रीराम/कृष्ण अपना प्रतिरूप क्यों नहीं देख सकते अपने जीते जी। फिर से बता देता हूँ की विष्णु अवतार को मात्र दो बार सशरीर परमब्रह्म बनना पड़ा था श्रीराम और श्री कृष्ण के रूप में तो इस बार महादेव ही सशरीर परमब्रह्म बन गए थे विश्व महाविनाश की महाविभीषिका को नियंत्रित करने हेतु।-----वर्तमान विश्व परिदृश्य तक जोशी-अटल का उद्देश्य लगभग पूरा हो गया है हम अपनी जाती/धर्म भले माने और इस हेतु हम एक दूसरे से भले अलग नजर आएं पर प्रयागराज से लेकर अंतिम विश्वछोर तक मानव मात्र भाई-भाई/बहन-बहन है।

वर्तमान विश्व परिदृश्य तक जोशी-अटल का उद्देश्य लगभग पूरा हो गया है हम अपनी जाती/धर्म भले माने और इस हेतु हम एक दूसरे से भले अलग नजर आएं पर प्रयागराज से लेकर अंतिम विश्वछोर तक मानव मात्र भाई-भाई/बहन-बहन है। >>>>>>>जोशी-अटल बहुत चिल्लाते हो तो ये बताओ उनके लिए क्या कर सकते हो? जीते जी जलना स्वीकार कर जलाये जाने पर तड़पड़ाउंगा भी नहीं और शरीर में हर जगह कील ठोंक दी जाय तो भी विचलित नहीं होऊंगा, मान-सम्मान-स्वाभिमान सब दांव पर लगा सकता हूँ उनके किशी भी उद्देश्य की पूर्ती हेतु और इस हेतु किशी की दासता करनी हो तो भी स्वीकार है। भारतरत्न मिले न मिले अटल को रामरत्न और जोशी को कृष्णरत्न मै स्वयं दूंगा।-----यह थी महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक की श्रीराम(अटल)/कृष्ण(जोशी) भक्ति। और महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक को जो भी कुछ मिला वह थी श्रीराम/कृष्ण की महादेव की भक्ति तो उन दोनों के जीते जी श्रीराम(विष्णुकांत)/कृष्ण(कृष्णकांत) महादेव/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक के घर आ गए हैं और हो भी क्यों न जब कुछ नेता अपने जीते जी अपनी मूर्तिया बनवा लेते है तो श्रीराम/कृष्ण अपना प्रतिरूप क्यों नहीं देख सकते अपने जीते जी। फिर से बता देता हूँ की विष्णु अवतार को मात्र दो बार सशरीर परमब्रह्म बनना पड़ा था श्रीराम और श्री कृष्ण के रूप में तो इस बार महादेव ही सशरीर परमब्रह्म बन गए थे विश्व महाविनाश की महाविभीषिका को नियंत्रित करने हेतु।-----वर्तमान विश्व परिदृश्य तक जोशी-अटल का उद्देश्य लगभग पूरा हो गया है हम अपनी जाती/धर्म भले माने और इस हेतु हम एक दूसरे से भले अलग नजर आएं पर प्रयागराज से लेकर अंतिम विश्वछोर तक मानव मात्र भाई-भाई/बहन-बहन है।

महादेव-कश्यप-सूर्यदेव।

महादेव-कश्यप-सूर्यदेव।

त्रिदेव से ऋषि राजनीती होते हुए आतंरिकरिषि राजनीति:---चन्द्रदेव/चाँद को तारे/सूर्यदेव की जरूरत होती है यह सत्य है पर सूर्यदेव को भी चाँद की जरूरत होती है? उत्तर है नहीं? फिर भी क्या सम्बन्ध है की दोनों की समान महत्ता प्रति पादित की जाती है मानव इतिहास में? उत्तर है मानवता की रक्षा हेतु पृथ्वी पर दोनों की महत्ता है। कारन की जो मानव हित की क्रियाएँ केवल रात में चाँद के रहने पर प्रकृति प्रतिपादित करती है वह दिन में सूर्य के रहते नही हो सकती है तो दोनों में से किशी एक के अभाव में मानव जीवन असंतुलित हो सकता है। अतः जिस तारे/सूर्यदेव को चन्द्रदेव/चन्दा की जरूरत नहीं भी है वह सूर्य को जीवन का मूलभूत आधार कहवाने हेतु चन्द्रदेव/चाँद पर निर्भर रहना पड़ता है मानवता के हिट में। --लेकिन मानव समाज में कश्यप ऋषि के दोनों वंसजों सूर्यदेव और चन्द्रदेव की बात आती है तो दोनों कश्यप ऋषि और उनकी दूसरी पत्नी अदिति के पुत्र आदित्य के पुत्र हुए जो सूर्य और चन्द्रमा के समान गुण रखते हैं और एक मानव के रूप में ही वे सूर्यदेव और चन्द्रदेव की ही तरह तेजमय और मृदुल और मनोहारी गुण से समाज को प्रभावित करते हैं और समान ऊर्जा के स्वामी है।--------विवेक पुत्र प्रदीप(सूर्य की ऊर्जा का भी स्वयं में आतंरिक मुख्य स्रोत)/सूर्यकांत। हुआ न स्वयं सूर्यदेव/ सूर्यकांत(सूर्य के स्वामी) का पुत्र । त्रिदेव से ऋषि राजनीती होते हुए आतंरिकरिषि राजनीति----महादेव-कश्यप-सूर्यदेव।

त्रिदेव से ऋषि राजनीती होते हुए आतंरिकरिषि राजनीति:---चन्द्रदेव/चाँद को तारे/सूर्यदेव की जरूरत होती है यह सत्य है पर सूर्यदेव को भी चाँद की जरूरत होती है? उत्तर है नहीं? फिर भी क्या सम्बन्ध है की दोनों की समान महत्ता प्रति पादित की जाती है मानव इतिहास में? उत्तर है मानवता की रक्षा हेतु पृथ्वी पर दोनों की महत्ता है। कारन की जो मानव हित की क्रियाएँ केवल रात में चाँद के रहने पर प्रकृति प्रतिपादित करती है वह दिन में सूर्य के रहते नही हो सकती है तो दोनों में से किशी एक के अभाव में मानव जीवन असंतुलित हो सकता है। अतः जिस तारे/सूर्यदेव को चन्द्रदेव/चन्दा की जरूरत नहीं भी है वह सूर्य को जीवन का मूलभूत आधार कहवाने हेतु चन्द्रदेव/चाँद पर निर्भर रहना पड़ता है मानवता के हिट में। --लेकिन मानव समाज में कश्यप ऋषि के दोनों वंसजों सूर्यदेव और चन्द्रदेव की बात आती है तो दोनों कश्यप ऋषि और उनकी दूसरी पत्नी अदिति के पुत्र आदित्य के पुत्र हुए जो सूर्य और चन्द्रमा के समान गुण रखते हैं और एक मानव के रूप में ही वे सूर्यदेव और चन्द्रदेव की ही तरह तेजमय और मृदुल और मनोहारी गुण से समाज को प्रभावित करते हैं और समान ऊर्जा के स्वामी है।--------विवेक पुत्र प्रदीप(सूर्य की ऊर्जा का भी स्वयं में आतंरिक मुख्य स्रोत)/सूर्यकांत। हुआ न स्वयं सूर्यदेव/ सूर्यकांत(सूर्य के स्वामी) का पुत्र । त्रिदेव से ऋषि राजनीती होते हुए आतंरिकरिषि राजनीति----महादेव-कश्यप-सूर्यदेव।          

Men are from Mars/Mangal Women(not stable on their commitment) are from Venus/Sukra.

Men are from Mars/Mangal Women(not stable on their commitment) are from Venus/Sukra:-
Data Politics after RISHI Politics:
Real/official birthday :
Monday(Somvar) 9 September, 1963/ Wednesday(Budhvar) 1 July, 1964;
Monday(Somvar) 6 September, 1976/ Friday(Sukravar) 1 July, 1977;
Friday(Sukravar) 14 April, 1978/ Friday(Sukravar) 14 April, 1978;

Tuesday(Mangalvar) 11 November(11-11), 1975/Sunday 1 August, 1976

त्रिदेव से ऋषि राजनीती में आ जाने पर:--- मै इस दुनिया के हर कश्यप(प्रयागराज से मूल रूप से कश्मीर में अवस्थिति फिर वहां से दुनिया भर में विचरण कर्ता जिनके वंसजों में स्वयं सावर्ण, सूर्यदेव, चन्द्रदेव, और केवल त्रिदेवों तथा गणनायक/विनायक गणेश को छोड़ सभी देवता आते है इन्द्र से लेकर विश्वकर्मा तक ) गोत्रीय से बताना चाहूँगा की कि अंगारिशा/भारद्वाज जिनके कुल में देवताओं के गुरु बृहस्पति का जन्म हुआ था ऐसे ही एक अंगारिशा/भारद्वाज को गुरु बृहस्पति के समान पूज्य और आदरणीय मान केदारेश्वर बनर्जी केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय की पूर्ण स्थापना का जिम्मा किशी सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण ने ही लिया और उस हेतु सर्वस्व त्याग कर सर्वस्व हांसिल भी किया उनकी स्थापना के साथ। अगर कोई अपने को कश्यप गोत्रीय या इससे जनित या सम्बंधित अन्य गोत्र का समझता है तो कम से कम किशी नेक कार्य में दूसरे कश्यप गोत्रीय के समर्पण और अभीष्ठ त्याग में बाल की खाल नहीं निकालना चाहिए । ब्राह्मण की कन्या का विवाह पाँव पखार कर पूर्ण हिन्दू शास्त्रीय विधि से किशी ईसाई/दलित से करने वालों का अगर वह समर्थन करते हुए उस पक्ष से शक्ति और समर्थन यदि खुद प्राप्त किया हो जबकि ऐसे हिन्दू शस्त्रीय विवाह के बाद भी ब्राह्मण कन्या का नाम ईसाई/दलित जाती सूचक शब्द से साथ भारत सरकार के सरकारी दस्तावेज में दर्ज किया गया हो। अगर जिस हेतु किशी एक को गांधी( वैस्य) बनना पड़ता है पारसी धर्म छोड़ शास्त्रीय विधि से विवाह हेतु वही किशी दुसरे के लिए यह सब सत्य है विदेशी दबाव में तो किशी भारतीय मनीषी और देशभक्त के लिए भारत सरकार का कोई विज्ञान केंद्र भी प्रयागराज विश्वविद्यालय का हो सकता है यह तो स्वयं प्रयागराज विश्वविद्यालय का ही केंद्र था जो भारत सरकार के किशी विज्ञान केंद्र से केवल समयबद्ध सहयोग का समझौता ही किया था।

त्रिदेव से ऋषि राजनीती में आ जाने पर:--- मै इस दुनिया के हर कश्यप(प्रयागराज से मूल रूप से कश्मीर में अवस्थिति फिर वहां से दुनिया भर में विचरण कर्ता जिनके वंसजों में स्वयं सावर्ण, सूर्यदेव, चन्द्रदेव, और केवल त्रिदेवों तथा गणनायक/विनायक गणेश को छोड़ सभी देवता आते है इन्द्र से लेकर विश्वकर्मा तक ) गोत्रीय से बताना चाहूँगा की कि अंगारिशा/भारद्वाज जिनके कुल में देवताओं के गुरु बृहस्पति का जन्म हुआ था ऐसे ही एक अंगारिशा/भारद्वाज को गुरु बृहस्पति के समान पूज्य और आदरणीय मान केदारेश्वर बनर्जी केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय की पूर्ण स्थापना का जिम्मा किशी सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण ने ही लिया और उस हेतु सर्वस्व त्याग कर सर्वस्व हांसिल भी किया उनकी स्थापना के साथ। अगर कोई अपने को कश्यप गोत्रीय या इससे जनित या सम्बंधित अन्य गोत्र का समझता है तो कम से कम किशी नेक कार्य में दूसरे कश्यप गोत्रीय के समर्पण और अभीष्ठ त्याग में बाल की खाल नहीं निकालना चाहिए । ब्राह्मण की कन्या का विवाह पाँव पखार कर पूर्ण हिन्दू शास्त्रीय विधि से किशी ईसाई/दलित से करने वालों का अगर वह समर्थन करते हुए उस पक्ष से शक्ति और समर्थन यदि खुद प्राप्त किया हो जबकि ऐसे हिन्दू शस्त्रीय विवाह के बाद भी ब्राह्मण कन्या का नाम ईसाई/दलित जाती सूचक शब्द से साथ भारत सरकार के सरकारी दस्तावेज में दर्ज किया गया हो। अगर जिस हेतु किशी एक को गांधी( वैस्य) बनना पड़ता है पारसी धर्म छोड़ शास्त्रीय विधि से विवाह हेतु वही किशी दुसरे के लिए यह सब सत्य है विदेशी दबाव में तो किशी भारतीय मनीषी और देशभक्त के लिए भारत सरकार का कोई विज्ञान केंद्र भी प्रयागराज विश्वविद्यालय का हो सकता है यह तो स्वयं प्रयागराज विश्वविद्यालय का ही केंद्र था जो भारत सरकार के किशी विज्ञान केंद्र से केवल समयबद्ध सहयोग का समझौता ही किया था।

Monday, May 25, 2015

प्रकृति के साथ मानव समाज द्वारा अमर्यादित व्यवहार से रूस्ट रूद्र अवस्था को प्राप्त महादेव की नटराज अवस्था को सामान्य अवस्था में पुनः लाने हेतु आजीवन पूर्ण ब्रह्मचर्य ब्राह्मण कुमार की बलि उनके कदमों में चढ़ानी होती है और इस प्रकार महादेव को स्थिर और शांति अवस्था में लाने वाला ब्राह्मण कुमार यदि महादेव का कृपापात्र हो जीवित रह जाता है तो महादेव की ही गतिज शक्ति का सृजनात्मक शक्ति के रूप में स्थानांतरण उस ब्राह्मण कुमार में हो चुका होता है जिसका की सृजन के कार्य हेतु आने वाले समय में व्यवस्था निर्माण की अंतिम अवस्था तक सदुपयोग किया जा सके और इस प्रकार एक माधव(जो किशी भौतिक माता पिता द्वारा जन्म न लिया हो और ये माधव ब्रह्मा, विष्णु और महेश होते है), महादेव का रूपांतरण/शक्ति हस्तांतरण दूसरे माधव, महादेव में हो जाता है।---------यह प्रयागराज को तय करना है की यथोचित समय पर वह आजीवन पूर्ण ब्रह्मचर्य ब्राह्मण कुमार कौन था जिसकी यौवनावस्था (25 /26 वर्ष) में बलि इस प्रयाग राज में दी गयी थी विश्व विनाश की महाविभीषिका को नियंत्रित करने हेतु? वह आजीवन पूर्ण ब्रह्मचर्य ब्राह्मण कुमार, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(महादेव को अर्पित किया जाने वाला और सती/पारवती का आहार विल्वा/बेल पत्र) पाण्डेय विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन थे या कोई और था ? और अगर यह विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन थे तो व्यवस्था निर्माण की आवस्यक सीमा इन 14 वर्षों में पूर्ण हो चुकी है और अब विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन के अनुसार सदियों तक इस व्यवस्था को बनाये रखने हेतु केवल इसके श्रेष्ठतम सञ्चालन का दायित्व ही मानव समाज द्वारा आपेक्षित है महादेव की नटराज अवस्था में पुनः आने से बचने के लिए। और अगर कोई और था तो उसकी अवस्था परिवर्तन की दशा और आजीवन पूर्ण ब्रह्मचर्य ब्राह्मण कुमार के लिए गुण-दोष पर विचार किया जाए और इस प्रकार ऐसे मामले में उसका मत लिया जाए ?

प्रकृति के साथ मानव समाज द्वारा अमर्यादित व्यवहार से रूस्ट रूद्र अवस्था को प्राप्त महादेव की नटराज अवस्था को सामान्य अवस्था में पुनः लाने हेतु आजीवन पूर्ण ब्रह्मचर्य ब्राह्मण कुमार की बलि उनके कदमों में चढ़ानी होती है और इस प्रकार महादेव को स्थिर और शांति अवस्था में लाने वाला ब्राह्मण कुमार यदि महादेव का कृपापात्र हो जीवित रह जाता है तो महादेव की ही गतिज शक्ति का सृजनात्मक शक्ति के रूप में स्थानांतरण उस ब्राह्मण कुमार में हो चुका होता है जिसका की सृजन के कार्य हेतु आने वाले समय में व्यवस्था निर्माण की अंतिम अवस्था तक सदुपयोग किया जा सके और इस प्रकार एक माधव(जो किशी भौतिक माता पिता द्वारा जन्म न लिया हो और ये माधव ब्रह्मा, विष्णु और महेश होते है), महादेव का रूपांतरण/शक्ति हस्तांतरण दूसरे माधव, महादेव में हो जाता है।---------यह प्रयागराज को तय करना है की यथोचित समय पर वह आजीवन पूर्ण ब्रह्मचर्य ब्राह्मण कुमार कौन था जिसकी यौवनावस्था (25 /26 वर्ष) में बलि इस प्रयाग राज में दी गयी थी विश्व विनाश की महाविभीषिका को नियंत्रित करने हेतु? वह आजीवन पूर्ण ब्रह्मचर्य ब्राह्मण कुमार, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(महादेव को अर्पित किया जाने वाला और सती/पारवती का आहार विल्वा/बेल पत्र) पाण्डेय विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन थे या कोई और था ? और अगर यह विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन थे तो व्यवस्था निर्माण की आवस्यक सीमा इन 14 वर्षों में पूर्ण हो चुकी है और अब विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन के अनुसार सदियों तक इस व्यवस्था को बनाये रखने हेतु केवल इसके श्रेष्ठतम सञ्चालन का दायित्व ही मानव समाज द्वारा आपेक्षित है महादेव की नटराज अवस्था में पुनः आने से बचने के लिए। और अगर कोई और था तो उसकी अवस्था परिवर्तन की दशा और आजीवन पूर्ण ब्रह्मचर्य ब्राह्मण कुमार के लिए गुण-दोष पर विचार किया जाए और इस प्रकार ऐसे मामले में उसका मत लिया जाए ?

Saturday, May 23, 2015

यह दुनिया चल रही है क्योंकि हम सब एक हैं और दुनिया की चकाचौंध और माया कायम है क्योंकि हम एक होकर भी अनेकोनेक है:-I contributed the "Vivekanand and Modern Tradition" till date for well being of the humanity to share the thoughts and experience of my own life(A contribution of the person who seen the World's future very bad but also seen it well preserved not by a very skilled and genius Professors, Scientists, Engineers, Doctors, Politicians, Social Worker, Businessman e.t.c. but by the united anonymous effort of the experienced and non experienced gentleman and saints of the each and every society and castes/religions of this world they may be genius Professors, Scientists, Engineers, Doctors, Politicians, Social Worker, Businessman e.t.c.). यह दुनिया चल रही है क्योंकि हम सब एक हैं और दुनिया की चकाचौंध और माया कायम है क्योंकि हम एक होकर भी अनेकोनेक है:------->>>>यह दुनिया चल रही है क्योंकि हम सब एक हैं(एक तो हमारी ऊर्जा का श्रोत परमब्रह्म/ब्रह्म परमात्मा एक ही है और एक हम जीवन जीने के दौरान दम तोड़ लड़खड़ाते भी हैं तो हमारे विरोधी विचार वाले भी हमको जीवन की शक्ति देते हैं जीवन जीते रहने की कि विरोध किसका जब विरोधी ही न हो) और दुनिया की चकाचौंध और माया कायम है क्योंकि हम एक होकर भी अनेकोनेक है(हममे विविधता है प्राकृतिक रूप से भिन्न-भिन्न पारिवारिक और सामाजिक जीवन में जन्म और वास करने से) ।

यह दुनिया चल रही है क्योंकि हम सब एक हैं और दुनिया की चकाचौंध और माया कायम है क्योंकि हम एक होकर भी अनेकोनेक है:-I contributed the "Vivekanand and Modern Tradition" till date for well being of the humanity to share the thoughts and experience of my own life(A contribution of the person who seen the World's future very bad but also seen it well preserved not by a very skilled and genius Professors, Scientists, Engineers, Doctors, Politicians, Social Worker, Businessman e.t.c. but by the united anonymous effort of the experienced and non experienced gentleman and saints of the each and every society and castes/religions of this world they may be genius Professors, Scientists, Engineers, Doctors, Politicians, Social Worker, Businessman e.t.c.).
यह दुनिया चल रही है क्योंकि हम सब एक हैं और दुनिया की चकाचौंध और माया कायम है क्योंकि हम एक होकर भी अनेकोनेक है:------->>>>यह दुनिया चल रही है क्योंकि हम सब एक हैं(एक तो हमारी ऊर्जा का श्रोत परमब्रह्म/ब्रह्म परमात्मा एक ही है और एक हम जीवन जीने के दौरान दम तोड़ लड़खड़ाते भी हैं तो हमारे विरोधी विचार वाले भी हमको जीवन की शक्ति देते हैं जीवन जीते रहने की कि विरोध किसका जब विरोधी ही न हो) और दुनिया की चकाचौंध और माया कायम है क्योंकि हम एक होकर भी अनेकोनेक है(हममे विविधता है प्राकृतिक रूप से भिन्न-भिन्न पारिवारिक और सामाजिक जीवन में जन्म और वास करने से) ।

Friday, May 22, 2015

अक्टूबर, 2007 में मई भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलोर गया था अभी कुछ ही दिन बीते थे इधर मेरे वर्तमान विवाह का प्रसंग अभी चल ही रहा था उधर देवियों/बहनों का नेटवर्क भी वहां बहुत तेज कार्य करने लगा मेरी वहां उपस्थिति जानकार और वायुण्डलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र जहां मई कार्यरत था वहां की कुछ देवियाँ/बहने कहने लगी की भारतीय विज्ञान संस्थान में कोई भी पसंद आया आप को, यदि पसंद आ गया हो तो आप की शादी हम लोग करा देंगे उससे। मैंने कहा की मुझे क्षमा करें मेरा विवाह मेरे मामा तय कर रहे हैं आप देवी लोगों को सादर प्रणाम।(इसके वाद ऐसे प्रयास पर विराम लग गया 18 अप्रैल, 2008 को मामा जी के माध्यम से मान्य किया हुआ अवध क्षेत्र से मेरा रिस्ता हो गया। यह था ऐसे स्थान की देवी लोगों की स्पस्टवादिता, घुलना-मिलना और व्यवहारिकता)

अक्टूबर, 2007 में मई भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलोर गया था अभी कुछ ही दिन बीते थे इधर मेरे वर्तमान विवाह का प्रसंग अभी चल ही रहा था उधर देवियों/बहनों का नेटवर्क भी वहां बहुत तेज कार्य करने लगा मेरी वहां उपस्थिति जानकार और वायुण्डलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र जहां मई कार्यरत था वहां की कुछ देवियाँ/बहने कहने लगी की भारतीय विज्ञान संस्थान में कोई भी पसंद आया आप को, यदि पसंद आ गया हो तो आप की शादी हम लोग करा देंगे उससे। मैंने कहा की मुझे क्षमा करें मेरा विवाह मेरे मामा तय कर रहे हैं आप देवी लोगों को सादर प्रणाम।(इसके वाद ऐसे प्रयास पर विराम लग गया 18 अप्रैल, 2008 को मामा जी के माध्यम से मान्य किया हुआ अवध क्षेत्र से मेरा रिस्ता हो गया। यह था ऐसे स्थान की देवी लोगों की स्पस्टवादिता, घुलना-मिलना और व्यवहारिकता)

Thursday, May 21, 2015

भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर में कुछ विशेष लोगों द्ववारा मुझसे 2008 में कहा गया था की प्रयागराज में आप का कार्य 11/18 सितम्बर, 2007 में ही पूर्ण हो गया और अब आप जिस अच्छे से अच्छे देश में जाना चाहे जा सकते हैं आप को रातों-रात वीसा मिल जाएगा पर मैंने मना किया भारत से कहीं और जाने से और अब तो लोगों को यह बताना चाहता हूँ की मैंने अपना पासपोर्ट रेन्यू नहीं कराया है और न कराऊंगा। अतः जिन लोगों को मेरे बारे में कुछ भी संका हो कहीं जाने के बारे में वे शंका समाधान कर लें। यहां पर बता दूँ की अब जाकर मेरा कार्य पूर्णतः पूर्ण हुआ है न की तब पूर्ण हुआ था।

 भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर में कुछ विशेष लोगों द्ववारा मुझसे 2008 में कहा गया था की प्रयागराज में आप का कार्य 11/18  सितम्बर, 2007 में ही पूर्ण हो गया और अब आप जिस अच्छे से अच्छे देश में जाना चाहे जा सकते हैं आप को रातों-रात वीसा मिल जाएगा पर मैंने मना किया भारत से कहीं और जाने से और अब तो लोगों को यह बताना चाहता हूँ की मैंने अपना पासपोर्ट रेन्यू नहीं कराया है और न कराऊंगा। अतः जिन लोगों को मेरे बारे में कुछ भी संका हो कहीं जाने के बारे में वे शंका समाधान कर लें।  यहां पर बता दूँ की अब जाकर मेरा कार्य पूर्णतः पूर्ण हुआ है न की तब पूर्ण हुआ था।  

जिसका वरिष्ठ इस ब्रह्माण्ड के इतिहास में जन्म ही नहीं लिया उसके वरिष्ठ की खोज हो रही है प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय में जिसे विश्व विभीषिका में वरिष्ठ ये मान भी चुके है काशी से बुलाकर पर स्वार्थी लोग है ये काम निकला तो दिन विसरा वाले हैं ये लोग पर इस बार जड़ इतनी मजबूत आप लोग कर दिए की यह डिगने वाला नहीं की इसे पुनः काशी भेज सकते हैं: संविधान की सीमा जहां समाप्त हो जाती है तो हर न्यायमूर्ति को अधिकार होता है की वह अपने विवेक से काम ले पर प्रयागराज के कुछ क्षत्रिय, भूमिहार, कायस्थ, ईसाई समाज और कुछ ब्राह्मण समाज तथा कुछ अन्य जाती/धर्म के छत्रप लोगों का तथाकथित सर्वशक्तिशाली समाज और प्रयागराज विश्वविद्यालय के धृतराष्ट्र लोग पूर्ण और स्पस्ट रूप से परिभाषित न्याय को लक्ष्मणपुर/लखनऊ में बैठे न्याय के तथाकथित ठीकेदारों के इसारे पर विवेक को ही न्यायालय की चौखट पर जान को मजबूर किये पहले और कोशिस किये की गुस्से में कोई अमर्यादित कदम उठा लिया जाय विवेक द्वारा की जिससे की जीवन के सभी श्रेष्ठ कर्मों पर पर्दा पद जाय किशी को तुलनात्मन रूप से प्रभाव शाली बनाने के लिए और अब जब सत्य से साक्षात्कार करने का समय आया तो भागे-भागे फिर रहे और इस हेतु न्याय के जिरहकर्ता से लेकर न्याय हेतु क्रमांक करता तक को अपने प्रभाव में लेकर अपनी ही सरतों को मनवाने का परोक्ष प्रयत्न कर रहे है सत्य को वाहर आने से पहले तो इससे अच्छा होगा ही क्या जो हो रहा है ?

जिसका वरिष्ठ इस ब्रह्माण्ड के इतिहास में जन्म ही नहीं लिया उसके वरिष्ठ की खोज हो रही है प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय में जिसे विश्व विभीषिका में वरिष्ठ ये मान भी चुके है काशी से बुलाकर पर स्वार्थी लोग है ये काम निकला तो दिन विसरा वाले हैं ये लोग पर इस बार जड़ इतनी मजबूत आप लोग कर दिए की यह डिगने वाला नहीं की इसे पुनः काशी भेज सकते हैं: संविधान की सीमा जहां समाप्त हो जाती है तो हर न्यायमूर्ति को अधिकार होता है की वह अपने विवेक से काम ले पर प्रयागराज के कुछ क्षत्रिय, भूमिहार, कायस्थ,  ईसाई समाज और कुछ ब्राह्मण समाज तथा कुछ अन्य जाती/धर्म के छत्रप लोगों का तथाकथित सर्वशक्तिशाली समाज और प्रयागराज विश्वविद्यालय के धृतराष्ट्र लोग पूर्ण और स्पस्ट रूप से परिभाषित न्याय को लक्ष्मणपुर/लखनऊ में बैठे न्याय के तथाकथित ठीकेदारों के इसारे पर विवेक को ही न्यायालय की चौखट पर जान को मजबूर किये पहले और कोशिस किये की गुस्से में कोई अमर्यादित कदम उठा लिया जाय विवेक द्वारा की जिससे की जीवन के सभी श्रेष्ठ कर्मों पर पर्दा पद जाय किशी को तुलनात्मन रूप से प्रभाव शाली बनाने के लिए और अब जब सत्य से साक्षात्कार करने का समय आया तो भागे-भागे फिर रहे और इस हेतु न्याय के जिरहकर्ता से लेकर न्याय हेतु क्रमांक करता तक को अपने प्रभाव में लेकर अपनी ही सरतों को मनवाने का परोक्ष प्रयत्न कर रहे है सत्य को वाहर आने से पहले तो इससे अच्छा होगा ही क्या जो हो रहा है ?

 Unbiased truth is here in this WIKIPEDIA ARTICLE:  https://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

Monday, May 18, 2015

यह दुनिया की नौटंकी और यह विश्व की असीमित आबादी की मार और लड़ाई हम क्यों झेले जब सभ्यता से जीने को न मिले अच्छे कर्म करने पर भी? पातालपुरी लोग यदि हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर पुत्र मकरध्वज के नियंत्रण में रहती है तो उसके सम्मान की रक्षा हम स्वयं करेंगे पर अगर वे लोग रावण के भाई अहिरावण के नियंत्रण में कार्य करेंगे तो सर्वनाश होगा उनका और इसके लिए वे हमेशा तैयार रहें।----------------------यह कोई पोस्ट नहीं वरन इस प्रयागराजवाशियों और विश्व मानवतावादियों और मानवता विरोधियों दोनों को चेतावनी आने वाले भविष्य के लिए: अज्ञानी कर्णपुर से प्रेरित हो सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल/विल्वा पत्र) पाण्डेय ब्राह्मण को खानदानी पागल कह कर पुकारने वाले प्रयागराज के अरे वे दम्भियों! जिसके असीमित अपमान से निकले प्रयागराज/त्रिवेणी/संगम से पांडेजी(पणजी)/समुद्र तक मतलब 28 जून से 1 जुलाई, 2001 तक के जिसके आँशु ने ही पूरे विश्व को हर तरह से पलट कर रख दिया तो क्या उसे जमीं डोज किया जा सकता था और अगर ऐसा संभव भी हो जाता तो इस प्रकृति और पुरुष के संयोग का क्या होता ज़रा इसका अंदाज लगा लीजियेगा? सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री श्रीधर, मामा जी ने कहा था जिस वृक्ष को मैंने लगाया है अगर वह शूख जाय बिना फल दिए तो मई जीवित कैसे रहूँगा विवेक? दुनियावालों और प्रयागवाशियों इसी विनती का परिणाम है यह हरी भरी दुनिया अन्यथा 11/9 तो केवल एक झांकी थी आजमगढ़ी दुर्वाशा/कृष्णात्रेय/अत्रि और सर्वश्रेष्ठ सती(लक्ष्मी, पारवती, सरस्वती से भी श्रेष्ठ सती) अनुसिया के पुत्र के इस विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र पर विशेष आशीर्वाद की। आप ने जमीं डोज करने का पूरा प्रयास किया पर इसके लिए विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र ही केवल शिव बनकर ही आप का आतप सहन नहीं वरन उसके लिए विश्व में दूसरा करिश्मा हुआ की ब्रह्माण्ड/पृथ्वी के इतिहाश में की वह विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र ही से शिव के सीमा पार करते हुए सशरीर परमब्रह्म बन गए आप के अज्ञानता रूपी कृतित्व की सहन सीलता झेलते झेलते उसी सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री श्रीधर, मामा के लिए वांछित दो फल देने के प्रयास में (जबकि विष्णु ही आज तक के ब्रह्माण्ड में इतिहाश में दो बार जन्म ले परमब्रह्म बने थे एक श्रीराम के रूप से और दूसरे श्रीकृष्ण के रूप में बाकी के विष्णु अवतार में वे विष्णु की सीमा में ही रहकर कार्य पूरा करा लिए थे)। इस पूरे कार्य में वे सृजन अवस्था में ही स्वयं रहे और सब कुछ सह गए और स्वयं त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र का प्रकोप नहीं दिखाए यह था मामा के प्रति बचन के समर्पण। अतः यह पूरी मानवता सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री श्रीधर, मामा के प्रति कृतज्ञ है और उन्ही की वजह से आज चल रही है। इसलिए इससे यह भी सिद्ध होता है की कश्यप वरिष्ठ जरूर पर गौतम श्रेष्ठ हैं। मामा जी के नाम, श्रीधर(=विष्णु) नाम से प्रेरित हो प्रथम फल परमब्रह्म=विष्णुकांत/श्रीराम; और स्वयं मेरे विवेक नाम के राशि नाम, गिरिधर(कृष्ण) से प्रेरित हो द्वितीय फल परमब्रह्म= कृष्णकांत/श्रीकृष्ण। यह दुनिया की नौटंकी और यह विश्व की असीमित आबादी की मार और लड़ाई हम क्यों झेले जब सभ्यता से जीने को न मिले अच्छे कर्म करने पर भी? पातालपुरी लोग यदि मकरध्वज के नियंत्रण में रहती है तो उसके सम्मान की रक्षा हम स्वयं करेंगे पर अगर वे लोग रावण के भाई अहिरावण के नियंत्रण में कार्य करेंगे तो सर्वनाश होगा उनका और इसके लिए वे हमेशा तैयार रहें।

यह दुनिया की नौटंकी और यह विश्व की असीमित आबादी की मार और लड़ाई हम क्यों झेले जब सभ्यता से जीने को न मिले अच्छे कर्म करने पर भी? पातालपुरी लोग यदि हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर पुत्र मकरध्वज के नियंत्रण में रहती है तो उसके सम्मान की रक्षा हम स्वयं करेंगे पर अगर वे लोग रावण के भाई अहिरावण के नियंत्रण में कार्य करेंगे तो सर्वनाश होगा उनका और इसके लिए वे हमेशा तैयार रहें।----------------------यह कोई पोस्ट नहीं वरन इस प्रयागराजवाशियों और विश्व मानवतावादियों और मानवता विरोधियों दोनों को चेतावनी आने वाले भविष्य के लिए: अज्ञानी कर्णपुर से प्रेरित हो सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल/विल्वा पत्र) पाण्डेय ब्राह्मण को खानदानी पागल कह कर पुकारने वाले प्रयागराज के अरे वे दम्भियों!  जिसके असीमित अपमान से निकले प्रयागराज/त्रिवेणी/संगम से पांडेजी(पणजी)/समुद्र तक मतलब 28 जून से 1 जुलाई, 2001 तक के जिसके आँशु ने ही पूरे विश्व को हर तरह से पलट कर रख दिया तो क्या उसे जमीं डोज किया जा सकता था और अगर ऐसा संभव भी हो जाता तो इस प्रकृति और पुरुष के संयोग का क्या होता ज़रा इसका अंदाज लगा लीजियेगा? सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री श्रीधर, मामा जी ने कहा था जिस वृक्ष को मैंने लगाया है अगर वह शूख जाय बिना फल दिए तो मई जीवित कैसे रहूँगा विवेक? दुनियावालों और प्रयागवाशियों इसी विनती का परिणाम है यह हरी भरी दुनिया अन्यथा 11/9 तो केवल एक झांकी थी आजमगढ़ी दुर्वाशा/कृष्णात्रेय/अत्रि और सर्वश्रेष्ठ सती(लक्ष्मी, पारवती, सरस्वती से भी श्रेष्ठ सती) अनुसिया के पुत्र के इस विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र पर विशेष आशीर्वाद की। आप ने जमीं डोज करने का पूरा प्रयास किया पर इसके लिए विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र ही केवल शिव बनकर ही आप का आतप सहन नहीं वरन उसके लिए विश्व में दूसरा करिश्मा हुआ की ब्रह्माण्ड/पृथ्वी के इतिहाश में की वह विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र ही से शिव के सीमा पार करते हुए सशरीर परमब्रह्म बन गए आप के अज्ञानता रूपी कृतित्व की सहन सीलता झेलते झेलते उसी सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री श्रीधर, मामा के लिए वांछित दो फल देने के प्रयास में (जबकि विष्णु ही आज तक के ब्रह्माण्ड में इतिहाश में दो बार जन्म ले परमब्रह्म बने थे एक श्रीराम के रूप से और दूसरे श्रीकृष्ण के रूप में बाकी के विष्णु अवतार में वे विष्णु की सीमा में ही रहकर कार्य पूरा करा लिए थे)। इस पूरे कार्य में वे सृजन अवस्था में ही स्वयं रहे और सब कुछ सह गए और स्वयं त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र का प्रकोप नहीं दिखाए यह था मामा के प्रति बचन के समर्पण। अतः यह पूरी मानवता सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर श्रद्धेय श्री श्रीधर, मामा के प्रति कृतज्ञ है और उन्ही की वजह से आज चल रही है। इसलिए इससे यह भी सिद्ध होता है की कश्यप वरिष्ठ जरूर पर गौतम श्रेष्ठ हैं। मामा जी के नाम, श्रीधर(=विष्णु) नाम से प्रेरित हो प्रथम फल परमब्रह्म=विष्णुकांत/श्रीराम; और स्वयं मेरे विवेक नाम के राशि नाम, गिरिधर(कृष्ण) से प्रेरित हो द्वितीय फल परमब्रह्म= कृष्णकांत/श्रीकृष्ण। यह दुनिया की नौटंकी और यह विश्व की असीमित आबादी की मार और लड़ाई हम क्यों झेले जब सभ्यता से जीने को न मिले अच्छे कर्म करने पर भी? पातालपुरी लोग यदि मकरध्वज के नियंत्रण में रहती है तो उसके सम्मान की रक्षा हम स्वयं करेंगे पर अगर वे लोग रावण के भाई अहिरावण के नियंत्रण में कार्य करेंगे तो सर्वनाश होगा उनका और इसके लिए वे हमेशा तैयार रहें।

सप्त ब्रह्मर्षियों/ सप्तर्षियों में स्वयं कश्यप, त्रिदेवों में महादेव शिव, देवताओं में कश्यप ऋषि के ही वंसज सूर्यनारायण/सूर्यदेव जैसा जिसका स्वरुप जिसका रहा हो उसने जो स्वयं में श्रीधर हों मतलब सत्यनारायण हों मतलब सच्चिदानन्दघन विष्णु हों मतलब रामजानकी/लक्ष्मीनारायण हों मतलब स्वयं शिव के आराध्य मतलब शिव के इस्वर हों उनको भी दूरभाष वार्ता में अहीर कहकर पुकारने वाला रहा हो, वह मै ही था क्योंकि वे जानबूझकर सत्यनारायण होते हुए भी मानवता हित में झूंठे बयान दे रहे थे मुझे नियंत्रित करने हेतु(जानबूझकर मतलब सबकी जानकारी होने के बावजूद सामाजिक हित हेतु सत्य को छुपाने वाला ही अहीर कहलाता है और शीर्सस्थ अनुभवी लोग जो समाज को चलाते है वे व्यक्तिगत रूप से अप्रत्यक्ष स्थान पर जाकर और अप्रत्यक्ष वेश भूषा में सामाजिक दिशा और दशा को जानने, समझने और नियंत्रित करने हेतु आम जनमानस में एक अहीर जैसा व्यव्हार प्रदर्शित करते हैं जानकारी जुटाने हेतु आम जनमानस का ह्रदय टटोलने हेतु जबकि वे जीवन के सभी अंगों से साक्षात्कार अपने जीवन में कर चुके होते हैं)।

Saturday, May 9, 2015

THE AIM AND OBJECTIVE OF THE PEOPLE OF THE WORLD AND SPECIALLY PRAYAGRAJ AND PRAYAGRAJ UNIVERSITY IS NOW FULFILLED THUS ITS THE END OF MY POST:--------- जैसा की चर्चित है की पीपल, अमला(आंवला), बेल(विल्वा) पहचान है कश्यप ऋषि/गोत्रियों की; वरगद पहचान है गौतम ऋषि/गोत्रियों की और तुलसी पहचान है वशिष्ठ ऋषि/गोत्रियों की तो ऐसे पहचान के अनुसार प्रयागराज पर सप्तर्षिओं/सभी सातों ब्रह्मर्षिओं/सातों मूल गोत्रों का एक सामान अधिकार तो है पर इस प्रयागराज पर विशेषाधिकार है आंगिराश/भारद्वाज तथा कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/अत्रि/सोमात्रेय/दत्तात्रेय का और प्रयागराज विश्वविद्यालय पर विशेषाधिकार है गौतम ऋषि/गोत्रियों का जिसकी पहचान ही वरगद है। ---------अगर आप भी गोत्र सम्बन्ध से परिचित हैं तो क्या आप को लगता है की मै सही कह रहा हूँ? यहां तो कश्यप को सब कुछ नियंत्रीय, सुरक्षित और व्यवस्थित करने हेतु ही कश्मीर से बुलाया जाता है सबसे बड़े भाई होने के नाते और जिनके बुलाने पर यहां स्वयं वशिष्ठ, भृगु/जमदग्नि, विश्वामित्र/कौशिक/विश्वरथ ऋषि/गोत्रों समेत महादेव और विष्णु भी यहाँ ब्रह्मा(ब्रह्मा का चार्ज अधिकतर आंगिराश/भारद्वाज ही लेते हैं और केवल विशेष परिस्थिति में यह कश्यप के पास जाता है) के यज्ञ की रक्षा हेतु दौड़े चले आते है जिससे की की मानवता के सञ्चालन की व्यवस्था सुचारू रूप से चलाई जाती रहे। मुझे लगता है की यहाँ गौतम, आंगिराश/भारद्वाज और अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/सोमात्रेय/दत्तात्रेय का इस प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय पर पूर्ण नियंत्रण हो चुका है और अब बाकी लोग अपने-अपने काम में और धाम में वापस लौट सकते हैं और अब सदियों बाद सबकी जरूरत पड़ेगी।

THE AIM AND OBJECTIVE OF THE PEOPLE OF THE WORLD AND SPECIALLY PRAYAGRAJ AND PRAYAGRAJ UNIVERSITY IS NOW FULFILLED THUS ITS THE END OF MY POST:---------
जैसा की चर्चित है की पीपल, अमला(आंवला), बेल(विल्वा) पहचान है कश्यप ऋषि/गोत्रियों की; वरगद पहचान है गौतम ऋषि/गोत्रियों की और तुलसी पहचान है वशिष्ठ ऋषि/गोत्रियों की तो ऐसे पहचान के अनुसार प्रयागराज पर सप्तर्षिओं/सभी सातों ब्रह्मर्षिओं/सातों मूल गोत्रों का एक सामान अधिकार तो है पर इस प्रयागराज पर विशेषाधिकार है आंगिराश/भारद्वाज तथा कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/अत्रि/सोमात्रेय/दत्तात्रेय का और प्रयागराज विश्वविद्यालय पर विशेषाधिकार है गौतम ऋषि/गोत्रियों का जिसकी पहचान ही वरगद है। ---------अगर आप भी गोत्र सम्बन्ध से परिचित हैं तो क्या आप को लगता है की मै सही कह रहा हूँ? यहां तो कश्यप को सब कुछ नियंत्रीय, सुरक्षित और व्यवस्थित करने हेतु ही कश्मीर से बुलाया जाता है सबसे बड़े भाई होने के नाते और जिनके बुलाने पर यहां स्वयं वशिष्ठ, भृगु/जमदग्नि, विश्वामित्र/कौशिक/विश्वरथ ऋषि/गोत्रों समेत महादेव और विष्णु भी यहाँ ब्रह्मा(ब्रह्मा का चार्ज अधिकतर आंगिराश/भारद्वाज ही लेते हैं और केवल विशेष परिस्थिति में यह कश्यप के पास जाता है) के यज्ञ की रक्षा हेतु दौड़े चले आते है जिससे की की मानवता के सञ्चालन की व्यवस्था सुचारू रूप से चलाई जाती रहे। मुझे लगता है की यहाँ गौतम, आंगिराश/भारद्वाज और अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/सोमात्रेय/दत्तात्रेय का इस प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय पर पूर्ण नियंत्रण हो चुका है और अब बाकी लोग अपने-अपने काम में और धाम में वापस लौट सकते हैं और अब सदियों बाद सबकी जरूरत पड़ेगी।

कर्मचारी संघ भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में भीमराव राम जी अम्बेडकर की प्रतिमा के पीछे बने कमरे में मई वह एक मात्र वाह्य छात्र/व्यक्ति था जो सुरक्षाकर्मी की अनदेखी कर घुसा था तो देखा की वहां दुगाजी(अम्बा) और हनुमान(अम्बेडकर/अम्बवादेकर) की मूर्ती सजी है और दीपक लगातार दिन में भी जल रहा है। तो मै लोगों में यही भ्रम दूर करने हेतु यह अनदेखी किया था सुरक्षा कर्मचारियों की कि अम्ब(माँ) वादे(रक्षा का वादा) कर(करनेवाला/हाँथ) मतलब आज तक के मानव इतिहास में देखा जाय तो वह व्यक्ति हनुमान या हनुमान जैसा होगा। और प्रकार कोई अम्बेडकर या अम्बेडकर का अनुयायी या उनके नाम जाप की सुविधा लेकर समाज में खड़ा होने वाला अगर चरित्रहीन हो और किशी नारी की अदूरदर्शिता और अज्ञानता को भांपकर अपने अपने निहित स्वार्थ हेतु और किशी समाज विशेष से प्रतिशोध लेने हेतु अगर उसको मूर्ख बना आकस्मिक ही नहीं जन्म जन्मान्तर के लिए बलात्कार करे तो क्या अम्बेडकर के प्रति शेष जनमानस में सम्मान बचा रहेगा?

कर्मचारी संघ भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में भीमराव राम जी अम्बेडकर की प्रतिमा के पीछे बने कमरे में मई वह एक मात्र वाह्य छात्र/व्यक्ति था जो सुरक्षाकर्मी की अनदेखी कर घुसा था तो देखा की वहां दुगाजी(अम्बा) और हनुमान(अम्बेडकर/अम्बवादेकर) की मूर्ती सजी है और दीपक लगातार दिन में भी जल रहा है। तो मै लोगों में यही भ्रम दूर करने हेतु यह अनदेखी किया था सुरक्षा कर्मचारियों की कि अम्ब(माँ) वादे(रक्षा का वादा) कर(करनेवाला/हाँथ) मतलब आज तक के मानव इतिहास में देखा जाय तो वह व्यक्ति हनुमान या हनुमान जैसा होगा। और प्रकार कोई अम्बेडकर या अम्बेडकर का अनुयायी या उनके नाम जाप की सुविधा लेकर समाज में खड़ा होने वाला अगर चरित्रहीन हो और किशी नारी की अदूरदर्शिता और अज्ञानता को भांपकर अपने अपने निहित स्वार्थ हेतु और किशी समाज विशेष से प्रतिशोध लेने हेतु अगर उसको मूर्ख बना आकस्मिक ही नहीं जन्म जन्मान्तर के लिए बलात्कार करे तो क्या अम्बेडकर के प्रति शेष जनमानस में सम्मान बचा रहेगा?   

जिस भीम(कृष्ण; सभी विष्णु अवतार में मात्र दो में से प्रथम सशरीर परमब्रह्म की द्वितीय अवस्था की बुआ, कुंती के पुत्र) राव रामजी( सभी विष्णु अवतार में मात्र दो में से प्रथम सशरीर परमब्रह्म:ब्रह्मा+विष्णु+महेश की प्रथम अवस्था) अम्बेडकर:अम्बवादेकर(हनुमान: द्वितीय सशरीर परमब्रह्म) मतलब भीम राव राम जी अम्बेडकर में कोई शब्द धर्म विरूद्ध नही है उस नाम वाले से धर्म भीरु/अभीष्ठ आस्था रखने वाले लोगों में धर्म के प्रति उदाशीनता को जन्म देने का प्रयास करना और इस प्रकार नास्तिक बनाना कहाँ का न्याय है? रमा (लक्ष्मी) बाई, शारदा(सरस्वती) कबीर, सविता(सूर्य की शक्ति मतलब सूर्य की पत्नी गायत्री) अम्बेडकर में भी कोई धर्म विरुद्ध नाम बताइये ? अतः ये लोग चाहकर भी आप को धर्म विरूद्ध हो जाने की शिक्षा नहीं दे सकते केवल रूढ़िवाद को छोड़ने का अनुरोध करें के शिवा। यही तक नहीं भीमाशंकर महादेव शिव का एक नाम भी है जो भीम को शिव से ही जोड़ता है। आंबेडकर के अनुयायी से लेकर विरोधी तक अगर किशी को नास्तिक या धर्म विरोधी बनाते हैं तो उनको इस्वर स्वयं दंड देगा मानव के द्वारा दंड की बात ही नहीं करता मै।

जिस भीम(कृष्ण; सभी विष्णु अवतार में मात्र दो में से प्रथम सशरीर परमब्रह्म की द्वितीय अवस्था की बुआ, कुंती के पुत्र) राव रामजी( सभी विष्णु अवतार में मात्र दो में से प्रथम  सशरीर परमब्रह्म:ब्रह्मा+विष्णु+महेश की प्रथम अवस्था)  अम्बेडकर:अम्बवादेकर(हनुमान: द्वितीय सशरीर परमब्रह्म) मतलब भीम राव राम जी अम्बेडकर में कोई शब्द धर्म विरूद्ध नही है उस नाम वाले से धर्म भीरु/अभीष्ठ आस्था रखने वाले लोगों में धर्म के प्रति उदाशीनता को जन्म देने का प्रयास करना और इस प्रकार नास्तिक बनाना कहाँ का न्याय है? रमा (लक्ष्मी) बाई,  शारदा(सरस्वती) कबीर, सविता(सूर्य की शक्ति मतलब सूर्य की पत्नी गायत्री) अम्बेडकर में भी कोई धर्म विरुद्ध नाम बताइये ? अतः ये लोग चाहकर भी आप को धर्म विरूद्ध हो जाने की शिक्षा नहीं दे सकते केवल रूढ़िवाद को छोड़ने का अनुरोध करें के शिवा। यही तक नहीं भीमाशंकर महादेव शिव का एक नाम भी है जो भीम को शिव से ही जोड़ता है। आंबेडकर के अनुयायी से लेकर विरोधी तक अगर किशी को नास्तिक या धर्म विरोधी बनाते हैं तो उनको इस्वर स्वयं दंड देगा मानव के द्वारा दंड की बात ही नहीं करता मै।      

यह गीत भी ट्यून/बजाया जाता था मेरे अनुज प्रभात जी द्वारा मेरे इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय में 2001-2005 के दौरान जब भी मै उनके पास किशी कार्य हेतु पहुंचता था:-- "सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है"। "बुझते दिए को न तुम याद करना"॥ वर्तमान में जो विश्व एक गाँव जैसा संसार जिस भी अवस्था में आप के सामने विद्यमान है मित्रों उसे ही सवेरे का सूरज समझियेगा मतलब चिरन्तर जीवन की ऊर्जा का स्रोत समझियेगा और जो कुछ आप ने खोया है इस विश्व परिवर्तन के दौरान उसे भूल जाइयेगा। क्योंकि वर्तमान विश्व की जो अवस्था है विशेष रूप से उसे मेरे जैसे अनेकानेक लोगों के अपने सर्वस्व त्याग (मान और स्वाभिमान समेत) और बलिदान के बल पर ही से अति सामान्य सामाजिक क्षति के साथ प्राप्त किया गया है। अतः जो अति शूक्ष्म हानि से ही जो महत्तम बचाव और सृजन हुआ है उसके लिए जो कुछ आप ने खोया है इस विश्व परिवर्तन के दौरान उसे भूल जाइयेगा।

यह गीत भी ट्यून/बजाया जाता था मेरे अनुज प्रभात जी द्वारा मेरे इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं समुद्रीय विज्ञान केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय में 2001-2005 के दौरान जब भी मै उनके पास किशी कार्य हेतु पहुंचता था:-- "सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है"। "बुझते दिए को न तुम याद करना"॥ वर्तमान में जो विश्व एक गाँव जैसा संसार जिस भी अवस्था में आप के सामने विद्यमान है मित्रों उसे ही सवेरे का सूरज समझियेगा मतलब चिरन्तर जीवन की ऊर्जा का स्रोत समझियेगा और जो कुछ आप ने खोया है इस विश्व परिवर्तन के दौरान उसे भूल जाइयेगा। क्योंकि वर्तमान विश्व की जो अवस्था है विशेष रूप से उसे मेरे जैसे अनेकानेक लोगों के अपने सर्वस्व त्याग (मान और स्वाभिमान समेत) और बलिदान के बल पर ही से अति सामान्य सामाजिक क्षति के साथ प्राप्त किया गया है। अतः जो अति शूक्ष्म हानि से ही जो महत्तम बचाव और सृजन हुआ है उसके लिए जो कुछ आप ने खोया है इस विश्व परिवर्तन के दौरान उसे भूल जाइयेगा।

Friday, May 8, 2015

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का समर्थक/अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(प्रगतिशील सच्चाई का समर्थक/अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

माननीय जार्ज फर्नांडीज जी/ तत्कालीन बॉम्बे में मेरे अपने सगे बाबा, स्वर्गीय श्री बेचनराम पाण्डेय के सहयोगी(Being Leader of the TRADE UNION in BOMBAY during 1949-1957) और मित्र, सप्रेम नमस्कार! मै अपने सभी जाती/धर्म के भाइयों को पहचानता हूँ और यह मानता हूँ की वे सभी मेरे ही सनातन हिन्दू धर्म जनित की संतान है मतलब मेरे ही परिवार और खानदान से ही हैं। अतः मै यह कहना चाहता हूँ की कि मुझसे किशी भी जाती/धर्म के लोगों का कोई अहित नहीं होगा पर मेरा अहित करने का प्रयास उन लोगों के मातहत द्वारा हुआ है जिसमे प्रत्यक्ष रूप से वे सफल हुए(और परोक्ष रूप से मै सफल हुआ हूँ जो की वास्तविक सफलता है) है अपने काले कारनामों को स्वयं उजागर(जिसका दोस आज तक वे केवल ब्राह्मणो/सवर्णों/हिन्दुओं पर देते रहे) करते हुए तो ऐसे में पुनः ऐसे प्रयास से वे बाज आएं इस हेतु आप से आग्रह है की इस भौगोलोकरण युग में यदि सामाजिक सौहार्द्र बने रहने की आशा यदि केवल मुझसे ही हमेशा की जाएगी तो पुनः यह मेरे साथ एक बहुत बड़ी नाइंसाफी होगी। जैसा की मेरा कोई विकल्प वे लोग प्रस्तुत नहीं कर पाये हैं अभी तक तो वे समझ लें की मै संख्याबल से प्रभावित न होने वाला एक मात्र व्यक्ति हूँ और उनके प्रयास का प्रति उत्तर देने में मै समर्थ हूँ भले अपने सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण मामा जी की बात मानकर प्रयागराज में ही अपने को केंद्रित किया रहा आप के ऐसे ही लोगों के ही समर्थकों/शुभचिंतकों की निगरानी में जिससे की मई कोई कदम न उठा सकूँ इस बात की पुस्टि बनी रहे।

माननीय जार्ज फर्नांडीज जी/ तत्कालीन बॉम्बे में मेरे अपने सगे बाबा, स्वर्गीय श्री बेचनराम पाण्डेय के सहयोगी(Being Leader of the TRADE UNION in BOMBAY during 1949-1957) और मित्र,
सप्रेम नमस्कार!
मै अपने सभी जाती/धर्म के भाइयों को पहचानता हूँ और यह मानता हूँ की वे सभी मेरे ही सनातन हिन्दू धर्म जनित की संतान है मतलब मेरे ही परिवार और खानदान से ही हैं। अतः मै यह कहना चाहता हूँ की कि मुझसे किशी भी जाती/धर्म के लोगों का कोई अहित नहीं होगा पर मेरा अहित करने का प्रयास उन लोगों के मातहत द्वारा हुआ है जिसमे प्रत्यक्ष रूप से वे सफल हुए(और परोक्ष रूप से मै सफल हुआ हूँ जो की वास्तविक सफलता है) है अपने काले कारनामों को स्वयं उजागर(जिसका दोस आज तक वे केवल ब्राह्मणो/सवर्णों/हिन्दुओं पर देते रहे) करते हुए तो ऐसे में पुनः ऐसे प्रयास से वे बाज आएं इस हेतु आप से आग्रह है की इस भौगोलोकरण युग में यदि सामाजिक सौहार्द्र बने रहने की आशा यदि केवल मुझसे ही हमेशा की जाएगी तो पुनः यह मेरे साथ एक बहुत बड़ी नाइंसाफी होगी। जैसा की मेरा कोई विकल्प वे लोग प्रस्तुत नहीं कर पाये हैं अभी तक तो वे समझ लें की मै संख्याबल से प्रभावित न होने वाला एक मात्र व्यक्ति हूँ और उनके प्रयास का प्रति उत्तर देने में मै समर्थ हूँ भले अपने सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण मामा जी की बात मानकर प्रयागराज में ही अपने को केंद्रित किया रहा आप के ऐसे ही लोगों के ही समर्थकों/शुभचिंतकों की निगरानी में जिससे की मई कोई कदम न उठा सकूँ इस बात की पुस्टि बनी रहे।

Thursday, May 7, 2015

बहुत अधिक चपलक या इंटेलीजेंट ही जो था और जिसे विगत बीस वर्षों में हुए परिवर्तन के लिए उत्पन्न स्थिति की गंभीरता का भान जिसे था वह आज भी बहुत अधिक चपलक या इंटेलीजेंट बना हुआ है और उसका दिमाग स्थिर चित्त वाला अभी नहीं हुआ या अति मंद बुद्धि भी वह नहीं हुआ जिससे उसका जीवन असहज न हुआ हो तो उसका अपने जीवन का अनुभव ही क्या था ऐसी विकट अवस्था का आंकलन और उसे देखने और समझने की? वह तो खाली मैदान में सरपट घोड़े दौड़ाने वाली बुद्धि हुई न।-----------विवेक शिक्षा और शोध में किशी से पीछे हो जाएंगे यह लोगों ने सोच कैसे लिया यदि खाली मैदान में सरपट घोड़े दौड़ाने वाली ही बात होती?----------रही बात हुआ क्या? तो जो लोग सामाजिक हित में मेरे लिए मंदक का काम लिए उनसे पूँछिये मुझे मंद क्यों देखना चाह रहे थे और मेरे स्वयं के द्वारा स्वयं को ही सब जानबूझकर मंद बुद्धि वाला स्वीकार कर लेने से जो नवनिर्माण और सामाजिक उत्थान हुआ उस व्यंजना से पूँछिये? इस में उन लोगों का भी विशेष योगदान है जो इसी सामाजिक हित हेतु हुए विश्व परिवर्तन में मेरे शामिल हो जाने के दौरान व्यक्तिगत रूप से इस तीन पीढ़ी की शक्ति लिए हुए चिराग को बुझाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जब की यह उनका प्रयास निरर्थक रहा और ये लोग आगे भी ऐसा करेंगे और वर्तमान में भी ऐसा ही कर रहे है? पर अब भी व्यक्तिगत रूप से मेरे पास कम से कम दो पीढ़ी की शक्ति है जिससे इसका मुकाबला किया जाएगा।

बहुत अधिक चपलक या इंटेलीजेंट ही जो था और जिसे विगत बीस वर्षों में हुए परिवर्तन के लिए उत्पन्न स्थिति की गंभीरता का भान जिसे था वह आज भी बहुत अधिक चपलक या इंटेलीजेंट बना हुआ है और उसका दिमाग स्थिर चित्त वाला अभी नहीं हुआ या अति मंद बुद्धि भी वह नहीं हुआ जिससे उसका जीवन असहज न हुआ हो तो उसका अपने जीवन का अनुभव ही क्या था ऐसी विकट अवस्था का आंकलन और उसे देखने और समझने की? वह तो खाली मैदान में सरपट घोड़े दौड़ाने वाली बुद्धि हुई न।-----------विवेक शिक्षा और शोध में किशी से पीछे हो जाएंगे यह लोगों ने सोच कैसे लिया यदि खाली मैदान में सरपट घोड़े दौड़ाने वाली ही बात होती?----------रही बात हुआ क्या? तो जो लोग सामाजिक हित में मेरे लिए मंदक का काम लिए उनसे पूँछिये मुझे मंद क्यों देखना चाह रहे थे और मेरे स्वयं के द्वारा स्वयं को ही सब जानबूझकर मंद बुद्धि वाला स्वीकार कर लेने से जो नवनिर्माण और सामाजिक उत्थान हुआ उस व्यंजना से पूँछिये? इस में उन लोगों का भी विशेष योगदान है जो इसी सामाजिक हित हेतु हुए विश्व परिवर्तन में मेरे शामिल हो जाने के दौरान व्यक्तिगत रूप से इस तीन पीढ़ी की शक्ति लिए हुए चिराग को बुझाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जब की यह उनका प्रयास निरर्थक रहा और ये लोग आगे भी ऐसा करेंगे और वर्तमान में भी ऐसा ही कर रहे है? पर अब भी व्यक्तिगत रूप से मेरे पास कम से कम दो पीढ़ी की शक्ति है जिससे इसका मुकाबला किया जाएगा।

Wednesday, May 6, 2015

संविधान में धारा, अनुच्छेद और अनुसूची तरह-तरह की जोड़ते जाइए और इससे संविधान की आत्मा सत्य (सत्यमेव जयते) ही मर जाय तो क्या संविधान का उद्देश्य सम्पन्नता, स्वतंत्रता और शान्ति बनी रहेगी। और जब धर्म ही सुरक्षित नहीं तो क्या सत्य सुरक्षित होगा? भाई मेरे किशी भी धर्म की ही बात है यहाँ जिसमे सत्य सर्वोपरि नहीं है अगर वहां की जलवायु को ध्यान में रखा जाय जहां सत्य उस पर लागू किया जा रहा हो। अतः मै सनातन हिन्दू धर्म की बात करता हूँ इस धर्म निरपेक्ष देश में की कि अगर कोई अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी मिश्रित जाती/धर्म कहता है और उस जाती/धर्म का पालन करता है तो क्या वह किसकी आत्मा को कस्ट पहुंचा रहा होता है? जो लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी मिश्रित जाती/धर्म के संक्रमित अवस्था में हैं वे किशी को अपनी जाती का नाम लेने पर क्या वही आपत्ति दर्ज करते हैं? और अगर करते हैं तो गलत करते है क्योंकि उनके मौलिक अधिकार का हनन इससे नहीं होता है। अगर कोई अपनी जाती/धर्म को मानता है और उसी में बना हुआ है तो वह उसके अनुसार कर्म के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी बना रह सकता है अन्यथा अगले जन्म में वह किशी भी जाती/धर्म में जा सकता है अपने उच्च और नीच कर्मों के पर या इनमे भी शरण नहीं पा सकते है। अतः जो लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी मिश्रित जाती/धर्म के संक्रमित अवस्था में हैं वे अपने उच्च और नीच कर्म से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी मिश्रित जाती/धर्म में अगले जन्म में जा सकते हैं या इनमे भी शरण नहीं पा सकते हैं। लेकिन मैं किशी दूसरी छोटी/बड़ी जाती/धर्म को अपमानित और बलात कस्ट देने वालों का समर्थन नही करता हूँ और न किशी को करना चाहिए। मई इस प्रकार धर्मनिरपेक्ष भारतीय संविधान में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी मिश्रित जाती/धर्म के नियमों की रक्षा की व्यवथा बनी रहने तक ही संविधान में धारा, अनुच्छेद और अनुसूची तरह-तरह की जोड़ने की गुजारिस करूंगा क्योंकि सनातन हिन्दू धर्म में ही ये जाती/धर्म आते हैं।

संविधान में धारा, अनुच्छेद और अनुसूची तरह-तरह की जोड़ते जाइए और इससे संविधान की आत्मा सत्य (सत्यमेव जयते) ही मर जाय तो क्या संविधान का उद्देश्य सम्पन्नता, स्वतंत्रता और शान्ति बनी रहेगी। और जब धर्म ही सुरक्षित नहीं तो क्या सत्य सुरक्षित होगा? भाई मेरे किशी भी धर्म की ही बात है यहाँ जिसमे सत्य सर्वोपरि नहीं है अगर वहां की जलवायु को ध्यान में रखा जाय जहां सत्य उस पर लागू किया जा रहा हो। अतः मै सनातन हिन्दू धर्म की बात करता हूँ इस धर्म निरपेक्ष देश में की कि अगर कोई अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी मिश्रित जाती/धर्म कहता है और उस जाती/धर्म का पालन करता है तो क्या वह किसकी आत्मा को कस्ट पहुंचा रहा होता है? जो लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी मिश्रित जाती/धर्म के संक्रमित अवस्था में हैं वे किशी को अपनी जाती का नाम लेने पर क्या वही आपत्ति दर्ज करते हैं? और अगर करते हैं तो गलत करते है क्योंकि उनके मौलिक अधिकार का हनन इससे नहीं होता है। अगर कोई अपनी जाती/धर्म को मानता है और उसी में बना हुआ है तो वह उसके अनुसार कर्म के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी बना रह सकता है अन्यथा अगले जन्म में वह किशी भी जाती/धर्म में जा सकता है अपने उच्च और नीच कर्मों के पर या इनमे भी शरण नहीं पा सकते है। अतः जो लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी मिश्रित जाती/धर्म के संक्रमित अवस्था में हैं वे अपने उच्च और नीच कर्म से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी मिश्रित जाती/धर्म में अगले जन्म में जा सकते हैं या इनमे भी शरण नहीं पा सकते हैं। लेकिन मैं किशी दूसरी छोटी/बड़ी जाती/धर्म को अपमानित और बलात कस्ट देने वालों का समर्थन नही करता हूँ और न किशी को करना चाहिए। मई इस प्रकार धर्मनिरपेक्ष भारतीय संविधान में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी मिश्रित जाती/धर्म के नियमों की रक्षा की व्यवथा बनी रहने तक ही संविधान में धारा, अनुच्छेद और अनुसूची तरह-तरह की जोड़ने की गुजारिस करूंगा क्योंकि सनातन हिन्दू धर्म में ही ये जाती/धर्म आते हैं।         

Tuesday, May 5, 2015

हिन्दुस्थानियों को बहुत नाच नचाया गया ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा अन्य में समानता लाने लेकर और शादी सम्बन्ध स्थापित करने के लिए दवाव बना कर सामाजिक सौहार्द के दुसमन के लेवल से बचने हेतु पर भाई कहीं किशी निकाय-पिंड के लिए बने न्यूटन के नियम का प्रयोग प्रकाश(फोटान) के गुण दोष की व्याख्या के लिए किया जा सकता है इस बात को छोड़कर कि ऊर्जा का रूपांतरण होता है जो सार्वभौमिक भौमिक सत्य है पर इससे किशी निकाय पिंड और प्रकाश की प्रवृत्ति में परिवर्तन नहीं आ सकता है। इसी प्रकार सारभौमिक सत्य यह है की मौलिक समानता ऊर्जा रूपांतरण की तरह हम सबमे है पर हम सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा अन्य सभी एक ही गुण और विचार वाले हो जाएँ यह सदा के लिए सत्य नही है वरन संधि और अपवाद में ही हो तभी तक ठीक है और अगर ऐसा पूर्ण रूप से होता है तो यह सृस्टि और मानवता के संतुलन को विगाड़ सकता है। शादी संबंध मई किशी मित्र के यहां स्थापित करूँ तभी मई उसे बराबर का मानता हूँ और प्रेम करता हूँ तो यह तो सौदा हो गया तो किश बात की मित्रता? पर हां शादी सम्बन्ध बराबर के पारिवारिक संस्कार और संस्कृति में के लोगों के बीच हो जाए तो ठीक ही है। जैसा की मुझे आत्म ज्ञान है की पुनर्जन्म होता है इसका प्रमाण यह सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण परिवार में जन्मा और पांच हजार वर्ष पूर्व का सूर्यवंशीय ग्वाला खुद है जिसने सामाजिक कल्याण हेतु राजा केदार के दो भाग कर केदारेश्वर(धण-पिछला भाग) और पशुपतिनाथ(सर समेत अगला भाग) बनाने का करक हुआ था। अतः अच्छे करिये चाहे इसकी प्रसंशा हो या न हो, कर्मों का उचित फल मिले या न मिले और अपने को आगे के जन्म में अच्छे सुसंस्कृत परिवार में पाइए।

हिन्दुस्थानियों को बहुत नाच नचाया गया ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा अन्य में समानता लाने लेकर और शादी सम्बन्ध स्थापित करने के लिए दवाव बना कर सामाजिक सौहार्द के दुसमन के लेवल से बचने हेतु पर भाई कहीं किशी निकाय-पिंड के लिए बने न्यूटन के नियम का प्रयोग प्रकाश(फोटान) के गुण दोष की व्याख्या के लिए किया जा सकता है इस बात को छोड़कर कि ऊर्जा का रूपांतरण होता है जो सार्वभौमिक भौमिक सत्य है पर इससे किशी निकाय पिंड और प्रकाश की प्रवृत्ति में परिवर्तन नहीं आ सकता है। इसी प्रकार सारभौमिक सत्य यह है की मौलिक समानता ऊर्जा रूपांतरण की तरह हम सबमे है पर हम सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा अन्य सभी एक ही  गुण और विचार वाले हो जाएँ यह सदा के लिए सत्य  नही है वरन संधि और अपवाद में ही हो तभी तक ठीक है और अगर ऐसा पूर्ण रूप से होता है तो यह सृस्टि और मानवता के संतुलन को विगाड़ सकता है। शादी संबंध मई किशी मित्र के यहां स्थापित करूँ तभी मई उसे बराबर का मानता हूँ और प्रेम करता हूँ तो यह तो सौदा हो गया तो किश बात की मित्रता? पर हां शादी सम्बन्ध बराबर के पारिवारिक संस्कार और संस्कृति में के लोगों के बीच हो जाए तो ठीक ही है। जैसा  की मुझे आत्म ज्ञान है की पुनर्जन्म होता है इसका प्रमाण यह सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण परिवार में जन्मा और पांच हजार वर्ष पूर्व का सूर्यवंशीय ग्वाला खुद है जिसने सामाजिक कल्याण हेतु राजा केदार के दो भाग कर केदारेश्वर(धण-पिछला भाग) और पशुपतिनाथ(सर समेत अगला भाग) बनाने का करक हुआ था। अतः अच्छे करिये चाहे इसकी प्रसंशा हो या न हो, कर्मों का उचित फल मिले या न मिले और अपने को आगे के जन्म में अच्छे सुसंस्कृत परिवार में पाइए।     

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

"जिसका मुझे अधिकार नहीं था उसका भी बलिदान दिया" यह गीत मुझे सुनाया जाता था केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय में 2001-2005/6 तो यह सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा मिश्रा ब्राह्मण, मेरे मामा श्रद्धेय श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्रा(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल पत्र/ विल्वा पत्र/शिव और शिवा भोज्य/शिव और शिवा को समर्पित) पाण्डेय ब्राह्मण, मेरे ताऊ जी श्रद्धेय डॉ प्रेम चंद पाण्डेय (शिव) थे जिन्होंने मेरा बलिदान दिया था। और जोशी(ब्रह्मा) के प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागवासी बताएं जिस और किशी का जोशी के कार्य हेतु बलिदान हुआ हो 2001 से लेकर 2014 बीच हुआ हो और जो इस हेतु स्वयं के विकाश हेतु क्रियाशीलता योग्य न रहे हों यह अलग की लोग सहभागिता किये हों उनके कार्य में और यश, योग्यता, और उच्च पद प्राप्त किये हों मतलब उनको तपस्या करने का फल अच्छा मिला है ? मामा और ताऊ जी द्वारा पुत्र तुल्य भांजे और भतीजे का बलिदान तो समझ में आता है पर त्याग किसने किया तो इसका उत्तर है की केवल मैंने? अगर मेरा बलिदान न दिया जाता तो भी मई उस लक्ष्य तक लोगों को पहुंचा देता जिसे वे करना चाहते हैं पर मुझ पर भरोषा कर कार्यहेतु अवसर दिया जाता मेर जीवन भर के अनुभव के अनुसार। मै किशी भी वस्तु के लिए वहसी दीवाना या लोलुप नहीं हो सकता पर स्वाभिमान पर चोट मिटा जोशी का कार्य इससे अच्छे तरीके से पूरा करता। लेकिन यह जो कुछ हुआ उसके लिए पूरी मानवता को सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा मिश्रा ब्राह्मण, मेरे मामा श्रद्धेय श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्रा(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल पत्र/ विल्वा पत्र/शिव और शिवा भोज्य/शिव और शिवा को समर्पित) पाण्डेय ब्राह्मण, मेरे ताऊ जी डॉ प्रेम चाँद पाण्डेय (शिव) का ऋणी होना चाहिए जिनके कारन न्यूनतम हानि में ही महत्तम सृजन हुआ। रही बात जोशी(ब्रह्मा) की तो उनके प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागवाशी उनके हिश्शे का सब कुछ हजम कर चुके हैं।

"जिसका मुझे अधिकार नहीं था उसका भी बलिदान दिया" यह गीत मुझे सुनाया जाता था केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय में 2001-2005/6 तो यह सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा मिश्रा ब्राह्मण, मेरे मामा श्रद्धेय श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्रा(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल पत्र/ विल्वा पत्र/शिव और शिवा भोज्य/शिव और शिवा को समर्पित) पाण्डेय ब्राह्मण, मेरे ताऊ जी श्रद्धेय डॉ प्रेम चंद पाण्डेय (शिव) थे जिन्होंने मेरा बलिदान दिया था। और जोशी(ब्रह्मा) के प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागवासी बताएं जिस और किशी का जोशी के कार्य हेतु बलिदान हुआ हो 2001 से लेकर 2014 बीच हुआ हो और जो इस हेतु स्वयं के विकाश हेतु क्रियाशीलता योग्य न रहे हों यह अलग की लोग सहभागिता किये हों उनके कार्य में और यश, योग्यता, और उच्च पद प्राप्त किये हों मतलब उनको तपस्या करने का फल अच्छा मिला है ? मामा और ताऊ जी द्वारा पुत्र तुल्य भांजे और भतीजे का बलिदान तो समझ में आता है पर त्याग किसने किया तो इसका उत्तर है की केवल मैंने? अगर मेरा बलिदान न दिया जाता तो भी मई उस लक्ष्य तक लोगों को पहुंचा देता जिसे वे करना चाहते हैं पर मुझ पर भरोषा कर कार्यहेतु अवसर दिया जाता मेर जीवन भर के अनुभव के अनुसार। मै किशी भी वस्तु के लिए वहसी दीवाना या लोलुप नहीं हो सकता पर स्वाभिमान पर चोट मिटा जोशी का कार्य इससे अच्छे तरीके से पूरा करता। लेकिन यह जो कुछ हुआ उसके लिए पूरी मानवता को सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा मिश्रा ब्राह्मण, मेरे मामा श्रद्धेय श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्रा(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल पत्र/ विल्वा पत्र/शिव और शिवा भोज्य/शिव और शिवा को समर्पित) पाण्डेय ब्राह्मण, मेरे ताऊ जी डॉ प्रेम चाँद पाण्डेय (शिव) का ऋणी होना चाहिए जिनके कारन न्यूनतम हानि में ही महत्तम सृजन हुआ। रही बात जोशी(ब्रह्मा) की तो उनके प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागवाशी उनके हिश्शे का सब कुछ हजम कर चुके हैं।

Monday, May 4, 2015

आंगिराग/भारद्वाज गोत्रीय शुक्राचार्य शायद अभी तक भूल रहे हैं की मै अभी तक उनके ही अधीन रहते हुए अपने काम को पूर्ण किया हूँ और वे अपने लक्ष्य(दैत्यों के लक्ष्य) में असफल रहे जोशी जी की पूरी शक्ति लेकर भी और जोशी का ही कार्य विगाड़ने में, अगर जोशी जी के कारन उनको मिले हुए अपने अधिकार आज तक याद हो, पर अब मै अपने अनुसार कार्य करने जा रहा हूँ इसलिए वे अब ठीक से मुझे पहचान ले की कौन था मै और उसका अंजाम भी पता कर लें अपने सुभेक्षु चन्द्रदेव से ?

आंगिराग/भारद्वाज गोत्रीय शुक्राचार्य शायद अभी तक भूल रहे हैं की मै अभी तक उनके ही अधीन रहते हुए अपने काम को पूर्ण किया हूँ और वे अपने लक्ष्य(दैत्यों के लक्ष्य) में असफल रहे जोशी जी की पूरी शक्ति लेकर भी और जोशी का ही कार्य विगाड़ने में, अगर जोशी जी के कारन उनको मिले हुए अपने अधिकार आज तक याद हो, पर अब मै अपने अनुसार कार्य करने जा रहा हूँ इसलिए वे अब ठीक से मुझे पहचान ले की कौन था मै  और उसका अंजाम भी पता कर लें अपने सुभेक्षु चन्द्रदेव से 

मैंने बचपन से सीखा और पढ़ा है की आंगिराश/भारद्वाज गोत्र वालों के यहां देवताओं के गुरु बृहस्पति जन्म लेते हैं और भृगु गोत्र में दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य पर इस बार तो मेरा सामना आंगिराश/भारद्वाज गोत्र में जन्म लिए दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य और उनकी दैत्य मंडली से हुआ। जिस तरह भृगु गोत्रीय शुक्राचार्य के शिष्यों का मुकाबला भृगु गोत्रीय दधीचि के जीवन त्याग से मिली हड्डियों को वज्र बना किया गया उसी प्रकार इस युद्ध में आंगिराश/भारद्वाज के ही शिष्यों, गर्ग गोत्रियों के द्वारा पूरे मानव इतिहास में उनके द्वारा प्राप्त सम्पूर्ण यश, कीर्ति और स्वाभिमान को मानव हित में त्यागने के बदले जीता जा सका। उस भृगु गोत्रीय शुक्राचार्य के समय में तो पार्वती को भस्मासुर से भगवान विष्णु बचा लिए थे पर बार तो पार्वती जी भी भस्मासुर के चंगुल से नहीं बच पाईं। इस इसके बाद भी दिशा विहीन गर्ग गोत्रियों द्वारा आंगिराश/भारद्वाज गोत्र में जन्म लिए दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य का अंधानुकरण और अंध समर्थन जारी है और वर्तमान में प्रयागराज विश्वविद्यालय भी आंगिराश/भारद्वाज गोत्र में जन्म लिए दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य और उनकी शिष्य मंडली के इसारे पर चलाया जा रहा है। मेरे अनुसार अगर इसी तरह से प्रयागराज विश्वविद्यालय भी आंगिराश/भारद्वाज गोत्र में जन्म लिए दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य और उनकी मित्र मंडली के इसारे पर चलाया जाता रहा तो प्रयागराज विश्वविद्यालय के वरगद वृक्ष को सूखने में ज्यादा से ज्यादा एक दशक का ही समय पर्याप्त है। एक बार तो गौतम गोत्रीय मेरे मामा जी के आदेश पर मेरे समर्पण और बलिदान से इसकी ऊर्जा और शाख में वृद्धि जरूर हो गयी गुरुवर आंगिराश गोत्रीय जोशी को दिए बचन की मर्यादा को बचाने हेतुं पर अब इसे गौतम गोत्रियों में अभीष्ठ आस्थावान कोई कश्यप गोत्रीय अगर बचाने की कोई कोशिस भी करता है तो वह बेकार होगी अगर ये दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य और उनकी मित्र मंडली के इशारों पर चलती रही।

मैंने बचपन से सीखा और पढ़ा है की आंगिराश/भारद्वाज गोत्र वालों के यहां देवताओं के गुरु बृहस्पति जन्म लेते हैं और भृगु गोत्र में दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य पर इस बार तो मेरा सामना आंगिराश/भारद्वाज गोत्र में जन्म लिए दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य और उनकी दैत्य मंडली से हुआ। जिस तरह भृगु गोत्रीय शुक्राचार्य के शिष्यों का मुकाबला भृगु गोत्रीय दधीचि के जीवन त्याग से मिली हड्डियों को वज्र बना किया गया उसी प्रकार इस युद्ध में आंगिराश/भारद्वाज के ही शिष्यों, गर्ग गोत्रियों के द्वारा पूरे मानव इतिहास में उनके द्वारा प्राप्त सम्पूर्ण यश, कीर्ति और स्वाभिमान को मानव हित में त्यागने के बदले जीता जा सका। उस भृगु गोत्रीय शुक्राचार्य के समय में तो पार्वती को भस्मासुर से भगवान विष्णु बचा लिए थे पर बार तो पार्वती जी भी भस्मासुर के चंगुल से नहीं बच पाईं। इस इसके बाद भी दिशा विहीन गर्ग गोत्रियों द्वारा आंगिराश/भारद्वाज गोत्र में जन्म लिए दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य का अंधानुकरण और अंध समर्थन जारी है और वर्तमान में प्रयागराज विश्वविद्यालय भी आंगिराश/भारद्वाज गोत्र में जन्म लिए दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य और उनकी शिष्य मंडली के इसारे पर चलाया जा रहा है। मेरे अनुसार अगर इसी तरह से प्रयागराज विश्वविद्यालय भी आंगिराश/भारद्वाज गोत्र में जन्म लिए दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य और उनकी मित्र मंडली के इसारे पर चलाया जाता रहा तो प्रयागराज विश्वविद्यालय के वरगद वृक्ष को सूखने में ज्यादा से ज्यादा एक दशक का ही समय पर्याप्त है। एक बार तो गौतम गोत्रीय मेरे मामा जी के आदेश पर मेरे  समर्पण और बलिदान से इसकी ऊर्जा और शाख में वृद्धि जरूर हो गयी गुरुवर आंगिराश गोत्रीय जोशी को दिए बचन की मर्यादा को बचाने हेतुं पर अब इसे गौतम गोत्रियों में अभीष्ठ आस्थावान कोई कश्यप गोत्रीय अगर बचाने की कोई कोशिस भी करता है तो वह बेकार होगी अगर ये दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य और उनकी मित्र मंडली के इशारों पर चलती रही।

Sunday, May 3, 2015

मित्रों कुछ लोग IIT, IISc और MIT में दाखिला लेकर पढने वालों और डिग्री पाने वालों को ब्राह्मण से भी ऊपर बना दिया था पर मई जब भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु जाकर देखा तो पाया की यहां आकर सुसंस्कृत सनातन ब्राह्मण के घर के भी कुछ लडके और लडकिया भी अति विद्वान होते हुए पशुवत और शूद्रवत् होने की प्रथम सीढ़ी पर पाँव रखने से अपने को वंचित नहीं कर पा रहे हैं। और ऐसी ही स्थिति में अन्य कुछ जाती/धर्म के लड़के लड़कियों का क्या हाल होता होगा यह आप सोच भी नहीं सकते हैं(यहां मैंने कुछ शब्द का प्रयोग किया है अपनी स्वाभाविक सुरक्षा हेतु वास्तविकता क्या रही होगी उन दिनों आप समझ सकते हैं)। और ऐसी स्थिति में ही मैंने कहा था की कि डॉन(भगवा) भाई और बबलू(तिरंगा) भाई सभी उच्च और उच्चतम तकनीकी, प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक, मानविकी, सामाजिक विज्ञान शिक्षण संस्थानों को ध्वस्त कर दीजिये मै घर जा रहा हूँ और साथ में जो कुछ पैसा बचा है उससे एक जोड़ी बैल खरीदूंगा और खेती करूंगा लेकिन यह स्थिति अपने भाई और बहनों की मुझे स्वीकार नहीं है इसके बदले आप लोग वैश्विक स्तर पर यह शोध और शिक्षा कार्य विश्व के किशी भी निर्धारित स्थान पर समझौते से करवाइये जहां पर ऐसी स्थिति न पैदा हो और ऐसे में भारतीय जनमांस में को गलत सूचना न जाए ऐसे श्रेष्ठ संस्थानों के सम्बन्ध में।--------मेरा यही एक प्रश्न है उन मेरे भाइयों से जिन्होंने कहा था की शादी तो हर किशी से है किसके पास जननेंद्रि नहीं होती? तो मेरे ऐसे शूद्रवत् विचार वाले मित्रों शायद पशुओं के पास भी जननेंद्रिय होती है आप अपनी संतानो की शादी उनसे अवश्य कीजियेगा। मित्रों जननेंद्रिय ही शादी के लिए अनिवार्य नहीं वरन मानवता, संस्कार, सभ्यता और संस्कृति से व्यक्ति की पहचान होती है जो उस परिवार, कुल-खानदान, समाज और रास्त्र से मिलता है और जब दोनों परिवार के ऐसे गुण परिवार, कुल-खानदान, समाज और रास्त्र की दृस्टि के अनुसार मिलते हैं तो वह लगन सर्वोच्च होता और व्यक्ति को सुखमय और शान्तिमाय जीवन देता है।

मित्रों कुछ लोग IIT, IISc और MIT में दाखिला लेकर पढने वालों और डिग्री पाने वालों को ब्राह्मण से भी ऊपर बना दिया था पर मई जब भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु जाकर देखा तो पाया की यहां आकर सुसंस्कृत सनातन ब्राह्मण के घर के भी कुछ लडके और लडकिया भी अति विद्वान होते हुए पशुवत और शूद्रवत् होने की प्रथम सीढ़ी पर पाँव रखने से अपने को वंचित नहीं कर पा रहे हैं। और ऐसी ही स्थिति में अन्य कुछ जाती/धर्म के लड़के लड़कियों का क्या हाल होता होगा यह आप सोच भी नहीं सकते हैं(यहां मैंने कुछ शब्द का प्रयोग किया है अपनी स्वाभाविक सुरक्षा हेतु वास्तविकता क्या रही होगी उन दिनों आप समझ सकते हैं)। और ऐसी स्थिति में ही मैंने कहा था की कि डॉन(भगवा) भाई और बबलू(तिरंगा) भाई सभी उच्च और उच्चतम तकनीकी, प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक, मानविकी, सामाजिक विज्ञान  शिक्षण संस्थानों को ध्वस्त कर दीजिये मै घर जा रहा हूँ और साथ में जो कुछ पैसा बचा है उससे एक जोड़ी बैल खरीदूंगा और खेती करूंगा लेकिन यह स्थिति अपने भाई और बहनों की मुझे स्वीकार नहीं है इसके बदले आप लोग वैश्विक स्तर पर यह शोध और शिक्षा कार्य विश्व के किशी भी निर्धारित स्थान पर समझौते से करवाइये जहां पर ऐसी स्थिति न पैदा हो और ऐसे में भारतीय जनमांस में को गलत सूचना न जाए ऐसे श्रेष्ठ संस्थानों के सम्बन्ध में।--------मेरा यही एक प्रश्न है उन मेरे भाइयों से जिन्होंने कहा था की शादी तो हर किशी से है किसके पास जननेंद्रि नहीं होती? तो मेरे ऐसे शूद्रवत् विचार वाले मित्रों शायद पशुओं के पास भी जननेंद्रिय होती है आप अपनी संतानो की शादी उनसे अवश्य कीजियेगा। मित्रों जननेंद्रिय ही शादी के लिए अनिवार्य नहीं वरन मानवता, संस्कार, सभ्यता और संस्कृति से व्यक्ति की पहचान होती है जो उस परिवार, कुल-खानदानसमाज और रास्त्र से मिलता है और जब दोनों परिवार के ऐसे गुण परिवार, कुल-खानदानसमाज और रास्त्र की दृस्टि के अनुसार मिलते हैं तो वह लगन सर्वोच्च होता और व्यक्ति को सुखमय और शान्तिमाय जीवन देता है।           

Saturday, May 2, 2015

जिस ब्राह्मण के नाम स्मरण मात्र से कम से कम कोई एक क्षत्रिय और वैश्य तेज और ज्ञान का अनुभव न करें, जिस क्षत्रिय के नाम स्मरण मात्र से कम से कम कोई एक ब्राह्मण और वैश्य शक्ति और आत्मबल का अनुभव न करें और जिस वैश्य के नाम का स्मरण मात्र से कम से कम कोई एक ब्राह्मण और क्षत्रिय धन-वैभव और सम्पन्नता का अनुभव न करें वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की प्राथमिक श्रेणी में ही नहीं। जिस राजा की सत्ता में ये तीनो सतो, तमो और रजो गुण न हो वह राज सत्ता चिर स्थायी हो ही नहीं सकती। अतः राजा ये तीनो गुण रखता है और एक राजा/शासक में ऐसे तीन गुण की एक साथ अनिवार्यता शास्त्र सम्मत है। यही इस मानव समाज को त्रिदेव/त्रिमूति के रूप में देखे जाने का आपस में प्रत्यक्ष और परोक्ष वैचारिक स्वरुप है।

जिस ब्राह्मण के नाम स्मरण मात्र से कम से कम कोई एक क्षत्रिय और वैश्य तेज और ज्ञान का अनुभव न करें, जिस क्षत्रिय के नाम स्मरण मात्र से कम से कम कोई एक ब्राह्मण और वैश्य शक्ति और आत्मबल का अनुभव न करें और जिस वैश्य के नाम का स्मरण मात्र से कम से कम कोई एक ब्राह्मण और क्षत्रिय धन-वैभव और सम्पन्नता का अनुभव न करें वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की प्राथमिक श्रेणी में ही नहीं। जिस राजा की सत्ता में ये तीनो सतो, तमो और रजो गुण न हो वह राज सत्ता चिर स्थायी हो ही नहीं सकती। अतः राजा ये तीनो गुण रखता है और एक राजा/शासक में ऐसे तीन गुण की एक साथ अनिवार्यता शास्त्र सम्मत है। यही इस मानव समाज को त्रिदेव/त्रिमूति के रूप में देखे जाने का आपस में प्रत्यक्ष और परोक्ष वैचारिक स्वरुप है।

Friday, May 1, 2015

सत्यमेव जयते:----सब कुछ अमेरिका और भारत में कार्यरत अमेरिकी एजेंट ही नहीं तय करेंगे जो देश हमसे हजारों वर्ष पीछे है सांस्कृतिक रूप से। अतः जो लोग ब्राह्मणो/सवर्णों/ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके मिश्रण से जनित जातियों की लड़कियों से विवाह कर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य या इनके मिश्रण बन चुके हो उनकी परिक्षा मै लूंगा और इसके साथ जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य इन लोगों का साथ देने हेतु मेरी परिक्षा लिए उनकी भी परिक्षा मै लूंगा और मै उनकी तरही श्रृंगाल की तरह कुछ नही करने वाला हूँ इस लिए खुलेआम इसके लिए तैयार रहने की सलाह दे रहा हूँ आगे के जीवन में।

सत्यमेव जयते:----सब कुछ अमेरिका और भारत में कार्यरत अमेरिकी एजेंट ही नहीं तय करेंगे जो देश हमसे हजारों वर्ष पीछे है सांस्कृतिक रूप से। अतः जो लोग ब्राह्मणो/सवर्णों/ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके मिश्रण से जनित जातियों की लड़कियों से विवाह कर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य या इनके मिश्रण बन चुके हो उनकी परिक्षा मै लूंगा और इसके साथ जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य इन लोगों का साथ देने हेतु मेरी परिक्षा लिए उनकी भी परिक्षा मै लूंगा और मै उनकी तरही श्रृंगाल की तरह कुछ नही करने वाला हूँ इस लिए खुलेआम इसके लिए तैयार रहने की सलाह दे रहा हूँ आगे के जीवन में। 

मै अपने गाँव के इसी सबसे धनाढ्य और तथाकथित दलित श्री रामबहादुर जी के माध्यम से बताना चाहूँगा की मेरे कुलं में दलितों से सब सम्बन्ध मान्य है पर विवाह सम्बन्ध मान्य नहीं है। जिन संतानो का प्रेम परवान चढ़ना है वे चुपचाप घर छोड़ जा सकते है उनके वर हेतु पाँव प्रक्षालन कर आत्म समर्पण मेरे गाँव के संविधान में नहीं लिखा है॥ यह कर्णपुर(मैनचेस्टर) के संविधान में हो सकता है हो। फिर भी जिस किशी के यहां यह विवाह सम्बन्ध मान्य है वे लोग अपना पाँव पखारवा कर अपने बेटे का लगन उनकी बेटियों से करवा सकते हैं पर इसके साथ उनकी यह भी उनकी ही जिम्मेदारी बनती है की जब 2005/6 में विश्वमहाशक्ति उनके यहां चली ही गयीं तो उसके बाद भी तब से लेकर अब तक भी यह तथाकथित सामाजिक न्याय की याचना क्यों की जा रही है उन लोगों की तरफ से जब भौगोलीकरण भी उसके पूर्व से लागु है इस भारत में। यह कौन सा महाशक्ति से संपन्न लोगों का दांव है। यही दो तरफा चाल तो पूरे विश्व को डुबो दिया होता यदि सनातन गौतम गोत्रीय मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्र इस प्रयागराज में मेरी बलि न चढ़ाये होते इस सृस्टि के संरक्षण और पुनर्सृजन के लिए।

मै अपने गाँव के इसी सबसे धनाढ्य और तथाकथित दलित श्री रामबहादुर जी के माध्यम से बताना चाहूँगा की मेरे कुलं में दलितों से सब सम्बन्ध मान्य है पर विवाह सम्बन्ध मान्य नहीं है। जिन संतानो का प्रेम परवान चढ़ना है वे चुपचाप घर छोड़ जा सकते है उनके वर हेतु पाँव प्रक्षालन कर आत्म समर्पण मेरे गाँव के संविधान में नहीं लिखा है॥ यह कर्णपुर(मैनचेस्टर) के संविधान में  हो सकता है हो। फिर भी जिस किशी के यहां यह विवाह सम्बन्ध मान्य है वे लोग अपना पाँव पखारवा कर अपने बेटे का लगन उनकी बेटियों से करवा सकते हैं पर इसके साथ उनकी यह भी उनकी ही जिम्मेदारी बनती है की जब 2005/6 में विश्वमहाशक्ति उनके यहां चली ही गयीं तो उसके बाद भी तब से लेकर अब तक भी यह तथाकथित सामाजिक न्याय की याचना क्यों की जा रही है उन लोगों की तरफ से जब भौगोलीकरण भी उसके पूर्व से लागु है इस भारत में। यह कौन सा महाशक्ति से संपन्न लोगों का दांव है। यही दो तरफा चाल तो पूरे विश्व को डुबो दिया होता यदि सनातन गौतम गोत्रीय मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्र इस प्रयागराज में मेरी बलि न चढ़ाये होते इस सृस्टि के संरक्षण और पुनर्सृजन के लिए।  

इसमें जो अरुचिकर लगे उस गाँव जिसको की मेरे गाँव के ब्राह्मण पूर्वजों को ही केवल दान में दिया गया था और बाकी जातियां को वे अपनी सुविधानुसार यहां लाये है ऐसे मेरे गाँव के तथाकथित दलित काशीराम बाबा के सुपुत्र और गाव के सबसे धनाढ्य तथा प्रशासनिक सेवा से अतिशीघ्र निवृत्त लखनऊ के "काशीकुंज" निवासी श्री राम बहादुर जी और उनके सुपुत्रों जो मुझे ज्ञात उनके बहुमूल्य स्थायी और अस्थायी सम्पत्तियों समेत दोनों पेट्रोल पम्प के प्रत्यक्ष/परोक्ष स्वामी हैं से पूंछ लिया जाय और उनकी राय ली जाय। --------------------तथाकथित पिछड़ा वर्ग से तथाकथित सामाजिक न्याय का लाभ लेने वाले को राष्ट्रहित में भाई भरत जैसा और तथाकथित एस सी/एस टी वर्ग से तथाकथित सामाजिक न्याय का लाभ लेने वाले को राष्ट्रहित में हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर(तुम प्रिय भरतहि सम भाई:हनुमान अपने को कुछ भी मानते रहे हों पर भगवान राम उनको भाई समान ही मानते थे और यह हनुमान का सेवा भाव ही था जो भगवान श्रीराम जो सशरीर प्रथम परमब्रह्म थे के बाद उनको दूसरा सशरीर परमब्रह्म बना दिया मतलब उनको एक जनेऊ धारी शाकाहारी ब्राह्मण, अहिरावण का मर्दन करने वाले क्षत्रिय, अपने भक्तों की झोली भरने वाले वैश्य और भगवान श्रीराम की सेवा में समर्पित एक पूर्ण मल्टी-टास्क भक्त) के लगभग समतुल्य आचरण अनिवार्य हो जाना चाहिए वर्तमान भारत को सामाजिक विस्फोट से बचाने के लिए। और अगर ऐसा नहीं होता है तो ग्राम सभा सदस्य से लेकर संसद सदस्य की पूरी संख्या के वर्तमान आंकड़े में 80% तथाकथित पिछड़े और दलित के साथ 20% तथाकथित सामान्य श्रेणी के ऐसे लोग अपने को एक पूर्ण सामाजिक कार्यकर्ता बनाते हुए अपनी देख रेख में पूर्ण ईमानदारी के साथ केवल आर्थिक तथाकथित सामाजिक न्याय व्यवस्था लागू करने में अपना बहुमूल्य योगदान दें क्योंकि सामाजिक रूप से आज केवल लगभग 10% ही पिछड़े रह गए है बाकी केवल आर्थिक असमानता है जो आर्थिक आज हर किशी के लिए एक अहम जरूरत है। It was 1995 when Ambedakar Nagar/Hanumaan Nagar created as a district as a part of Faizabad/Ayodhya/Ramnagar.

इसमें जो अरुचिकर लगे उस गाँव जिसको की मेरे गाँव के ब्राह्मण पूर्वजों को ही केवल दान में दिया गया था और बाकी जातियां को वे अपनी सुविधानुसार यहां लाये है ऐसे मेरे गाँव के तथाकथित दलित काशीराम बाबा के सुपुत्र और गाव के सबसे धनाढ्य तथा प्रशासनिक सेवा से अतिशीघ्र निवृत्त लखनऊ के "काशीकुंज" निवासी श्री राम बहादुर जी और उनके सुपुत्रों जो मुझे ज्ञात उनके बहुमूल्य स्थायी और अस्थायी सम्पत्तियों समेत दोनों पेट्रोल पम्प के प्रत्यक्ष/परोक्ष स्वामी हैं से पूंछ लिया जाय और उनकी राय ली जाय। --------------------तथाकथित पिछड़ा वर्ग से तथाकथित सामाजिक न्याय का लाभ लेने वाले को राष्ट्रहित में भाई भरत जैसा और तथाकथित एस सी/एस टी वर्ग से तथाकथित सामाजिक न्याय का लाभ लेने वाले को राष्ट्रहित में हनुमान/अम्बेडकर/अम्बवादेकर(तुम प्रिय भरतहि सम भाई:हनुमान अपने को कुछ भी मानते रहे हों पर भगवान राम उनको भाई समान ही मानते थे और यह हनुमान का सेवा भाव ही था जो भगवान श्रीराम जो सशरीर प्रथम परमब्रह्म थे के बाद उनको दूसरा सशरीर परमब्रह्म बना दिया मतलब उनको एक जनेऊ धारी शाकाहारी ब्राह्मण, अहिरावण का मर्दन करने वाले क्षत्रिय, अपने भक्तों की झोली भरने वाले वैश्य और भगवान श्रीराम की सेवा में समर्पित एक पूर्ण मल्टी-टास्क भक्त) के लगभग समतुल्य आचरण अनिवार्य हो जाना चाहिए वर्तमान भारत को सामाजिक विस्फोट से बचाने के लिए। और अगर ऐसा नहीं होता है तो ग्राम सभा सदस्य से लेकर संसद सदस्य की पूरी संख्या के वर्तमान आंकड़े में 80% तथाकथित पिछड़े और दलित के साथ 20% तथाकथित सामान्य श्रेणी के ऐसे लोग अपने को एक पूर्ण सामाजिक कार्यकर्ता बनाते हुए अपनी देख रेख में पूर्ण ईमानदारी के साथ केवल आर्थिक तथाकथित सामाजिक न्याय व्यवस्था लागू करने में अपना बहुमूल्य योगदान दें क्योंकि सामाजिक रूप से आज केवल लगभग 10% ही पिछड़े रह गए है बाकी केवल आर्थिक  असमानता  है जो आर्थिक आज हर किशी के लिए एक अहम जरूरत है। It was 1995 when Ambedakar Nagar/Hanumaan Nagar created as a district as a part of Faizabad/Ayodhya/Ramnagar.

हाँथ के बल गिरने पर आयी अतिसामान्य चोट/खत के दूसरे दिन विंध्यवाशिनी देवी के दर्शन को जाते समय ही प्रथमबार में सीता समाहित मार्ग और दूसरे बार गोपीगंज के लगभग आये भूकम्प (केंद्र पशुपतिनाथ/नेपाल) के दिन धाम में पहुंचकर केवल देवी का दर्शन ही किया गया था और इस बार तो चरण स्पर्श का प्रयास भी नहीं किया: पैर में फ्रैक्चर के तीसरे दिन केदारेश्वर त्रासदी। अब तो स्पस्ट हो गया की नहीं की केवल पिछला पैर राजा केदार का वर्तमान केदार घाटी में ही रहा पर अगला पैर सहित आधा भाग तो सिर सहित पशुपतिनाथ जा चुका था।



हाँथ के बल गिरने पर आयी अतिसामान्य चोट/खत के दूसरे दिन विंध्यवाशिनी देवी के दर्शन को जाते समय ही प्रथमबार में सीता समाहित मार्ग और दूसरे बार गोपीगंज के लगभग आये भूकम्प (केंद्र पशुपतिनाथ/नेपाल) के दिन धाम में पहुंचकर केवल देवी का दर्शन ही किया गया था और इस बार तो चरण स्पर्श का प्रयास भी नहीं किया: पैर में फ्रैक्चर के तीसरे दिन केदारेश्वर त्रासदी। अब तो स्पस्ट हो गया की नहीं की केवल पिछला पैर राजा केदार का वर्तमान केदार घाटी में ही रहा पर अगला पैर सहित आधा भाग तो सिर सहित पशुपतिनाथ जा चुका था।