Google+ Followers

Tuesday, June 30, 2015

ब्रह्मा, विष्णु और महेश जिसकी क्षमता पर विश्वाश किये और जिसने उनके सपनों को साकार किया सशरीर परमब्रह्म स्वरुप में तो उस परमब्रह्म के स्वयं के अस्तित्व के लिए सहयोगी और विरोधी दोनों अपने ही थे और यही नहीं इस स्वरुप में सशरीर बने रहने के लिए और न्यूनतम विनाश के साथ विश्वमहापरिवर्तन और विश्व का एक बार नए प्रकार से सृजन हेतु जिसने अपने विरोधियों के बचाव हेतु अपने ही सहयोगियों का सामना किया हो विश्व के केंद्र प्रयागराज में अपने को यम-नियम पूर्वक केंद्रित कर उसकी क्षमता और सामर्थ्य तथा योग्यता पर प्रश्न चिन्ह स्वयं प्रयागराज में उपस्थित हो उसका सम्मुख -सामना कर स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश नहीं कर सकते तो भानु प्रताप और आशीष के माध्यम से कोई और क्या प्रश्न चिन्ह लगा सकता है? वह कौन सी योग्यता, सामर्थ्य और क्षमता है जिसको कालचक्र ने मार न दिया हो? जिसको समय ने विजय दे दी हो उसको किसीकी प्रशस्तिपत्र और धारकपत्र की सहायता लेने या उसे संजोये रहने की जरूरत ही क्या? जिसको समय ने विजयश्री दे दिया हो उसे प्रमाण पत्र की जरूरत ही कहाँ रही? वह सशरीर परमब्रह्म सभी जाती/धर्म के छत्रपों की सामर्थ्य वह देख चुका है और यही नहीं उसकी ही सहनशीलता पर न्यूनतम विनाश के साथ विश्वमहापरिवर्तन और विश्व का एक बार नए प्रकार से सृजन संभव हो सका है जिसमे वह सबके सामर्थ्य, योग्यता और युद्ध कौसल को देख चुका है। अतः आप सनातन हिन्दू धर्मियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य जाती/धर्मावलम्बियों और इनसे सृजित अन्य जाती/धर्मावलम्बियों) व् सनातन धर्म से ही सृजित मुख्य नए धर्मावलम्बियों(इस्लाम/मुस्लिम धर्म और ईसाइयत/क्रिश्चियनिटी) अपनी-अपनी ऊर्जा को नियंत्रित करते हुए शांतिपूर्वक भाईचारे में रहना और अपनी-अपनी गलती को स्वीकार करते हुए प्रगतिशील सच्चाई के साथ आगे बढ़ना शीख जाइए जिससे अब सहस्र वर्षों में ऐसी आज के चौदह वर्ष पूर्ण की स्थिति न आने पावे।*******जय हिन्द।

ब्रह्मा, विष्णु और महेश जिसकी क्षमता पर विश्वाश किये और जिसने उनके सपनों को साकार किया सशरीर परमब्रह्म स्वरुप में तो उस परमब्रह्म के स्वयं के अस्तित्व के लिए सहयोगी और विरोधी दोनों अपने ही थे और यही नहीं इस स्वरुप में सशरीर बने रहने के लिए और न्यूनतम विनाश के साथ विश्वमहापरिवर्तन और विश्व का एक बार नए प्रकार से सृजन हेतु जिसने अपने विरोधियों के बचाव हेतु अपने ही सहयोगियों का सामना किया हो विश्व के केंद्र प्रयागराज में अपने को यम-नियम पूर्वक केंद्रित कर उसकी क्षमता और सामर्थ्य तथा योग्यता पर प्रश्न चिन्ह स्वयं प्रयागराज में उपस्थित हो उसका सम्मुख -सामना कर स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश नहीं कर सकते तो भानु प्रताप और आशीष के माध्यम से कोई और क्या प्रश्न चिन्ह लगा सकता है? वह कौन सी योग्यता, सामर्थ्य और क्षमता है जिसको कालचक्र ने मार न दिया हो? जिसको समय ने विजय दे दी हो उसको किसीकी प्रशस्तिपत्र और धारकपत्र की सहायता लेने या उसे संजोये रहने की जरूरत ही क्या? जिसको समय ने विजयश्री दे दिया हो उसे प्रमाण पत्र की जरूरत ही कहाँ रही? वह सशरीर परमब्रह्म सभी जाती/धर्म के छत्रपों की सामर्थ्य वह देख चुका है और यही नहीं उसकी ही सहनशीलता पर न्यूनतम विनाश के साथ विश्वमहापरिवर्तन और विश्व का एक बार नए प्रकार से सृजन संभव हो सका है जिसमे वह सबके सामर्थ्य, योग्यता और युद्ध कौसल को देख चुका है। अतः आप सनातन हिन्दू धर्मियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य जाती/धर्मावलम्बियों और इनसे सृजित अन्य जाती/धर्मावलम्बियों) व् सनातन धर्म से ही सृजित मुख्य नए धर्मावलम्बियों(इस्लाम/मुस्लिम धर्म और ईसाइयत/क्रिश्चियनिटी) अपनी-अपनी ऊर्जा को नियंत्रित करते हुए शांतिपूर्वक भाईचारे में रहना और अपनी-अपनी गलती को स्वीकार करते हुए प्रगतिशील सच्चाई के साथ आगे बढ़ना शीख जाइए जिससे अब सहस्र वर्षों में ऐसी आज के चौदह वर्ष पूर्ण की स्थिति न आने पावे।*******जय हिन्द।

Wednesday, June 24, 2015

त्रिभुवनेश्वर/भुवनेश्वर(शिव) की धरा पर जगदीश्वर/जगदीश/जगन्नाथ(विष्णु) कैसा अद्भुद संयोग है यह शिव और विष्णु में समानता का। दोनों नाम समानार्थक हो कर भी दो बिंदु को निरूपित करते हैं जिन दो बिन्दुओं का कार्य और ध्येय एक ही है की तीसरे बिंदु विरंचि/ब्रह्मा द्वारा रचा यह संसार हर प्राणी के साथ समान संरक्षण भाव रखते हुए चलता रहे और इस प्रकार इन दोनों बिन्दुओं का प्रयागराज से मिलन मतलब तीसरे बिंदु से मिलान इनको पूर्णता देता है और इस प्रकार परमेश्वर/परमब्रह्म/ब्रह्म का पद प्राप्त होता है।

त्रिभुवनेश्वर/भुवनेश्वर(शिव) की धरा पर जगदीश्वर/जगदीश/जगन्नाथ(विष्णु) कैसा अद्भुद संयोग है यह शिव और विष्णु में समानता का।  दोनों नाम समानार्थक हो कर भी दो बिंदु को निरूपित करते हैं जिन दो बिन्दुओं का कार्य और ध्येय एक ही है की तीसरे बिंदु विरंचि/ब्रह्मा द्वारा रचा यह संसार हर प्राणी के साथ समान संरक्षण भाव रखते हुए चलता रहे और इस प्रकार इन दोनों बिन्दुओं का प्रयागराज से मिलन मतलब तीसरे बिंदु से मिलान इनको पूर्णता देता है और इस प्रकार परमेश्वर/परमब्रह्म/ब्रह्म का पद प्राप्त होता है।

अपना भ्रम कुछ लोग दूर करले:- मै सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल/बिलवा पत्र जो पारवती/सती का आहार और शिव पर अर्पण होने वाला हो) पाण्डेय ब्राह्मण हूँ मुझे क्षत्रिय, और वैश्य अलग से बनने की जरूरत नहीं है इसमें यह गुण स्वयं प्रकट हो जाते है और इसी लिए ये ऋषियों में कश्यप गोत्र राजा गोत्र है मतलब माध्यम स्तर पर सभी गुण सदा रहते है और परिस्थिति आने पर वशिष्ठ और विश्वामित्र का गुण भी आ जाता है। (अगर कश्यप सत्य बोलने से डरेंगे तो ऋषियों में कालचक्र के पालंन करवाने वाले और ऋषियों में आग्नेय अस्त्र कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) की बारी आ जाती है। इनसे अगर ब्राह्मणो की रक्षा नहीं हो पाती है तो भृगुवंशीय परशुराम की बारी आ जाती है। अतः ये समुद्र जैसे गंभीर विचार युक्त गौतम और आकाश जैसे उन्नत विचार युक्त आंगिरस/भरद्वाज के सहयोग से चलने वाले है। इन सबके साथ दुनिया के किशी जाती और धर्म के व्यक्ति के सनातन हिन्दू धर्म में प्रवेश पर ये उसको अपने गोत्र में शामिल करवाने वाले अगर हैं तो उससे सनातन हिन्दुधर्म के तहत आचरण करने को प्रेरित करने वाले और उनको उन्नत और निम्न स्थान पर पुनः भेजने वाले भी वही है अन्यथा स्थिति अनियंत्रित हो जाती है और धर्मचक्र/कालचक्र के रक्षक दुर्वाशा की बारी आ जाती है कालचक्रधारी महाकाल(शिव) के रूद्र रूप में महाविनाश की स्थिति आने से बचाने हेतु मतलब महाकाल शिव को नटराज अवस्था में आने बचाने हेतु।)

अपना भ्रम कुछ लोग दूर करले:- मै सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल/बिलवा पत्र जो पारवती/सती का आहार और शिव पर अर्पण होने वाला हो) पाण्डेय ब्राह्मण हूँ मुझे क्षत्रिय, और वैश्य अलग से बनने की जरूरत नहीं है इसमें यह गुण स्वयं प्रकट हो जाते है और इसी लिए ये ऋषियों में कश्यप गोत्र राजा गोत्र है मतलब माध्यम स्तर पर सभी गुण सदा रहते है और परिस्थिति आने पर वशिष्ठ और विश्वामित्र का गुण भी आ जाता है। (अगर कश्यप सत्य बोलने से डरेंगे तो ऋषियों में कालचक्र के पालंन करवाने वाले और ऋषियों में आग्नेय अस्त्र कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) की बारी आ जाती है। इनसे अगर ब्राह्मणो की रक्षा नहीं हो पाती है तो भृगुवंशीय परशुराम की बारी आ जाती है। अतः ये समुद्र जैसे गंभीर विचार युक्त गौतम और आकाश जैसे उन्नत विचार युक्त आंगिरस/भरद्वाज के सहयोग से चलने वाले है।  इन सबके साथ दुनिया के किशी जाती और धर्म के व्यक्ति के सनातन हिन्दू धर्म में प्रवेश पर ये उसको अपने गोत्र में शामिल करवाने वाले अगर हैं तो उससे सनातन हिन्दुधर्म के तहत आचरण करने को प्रेरित करने वाले और उनको उन्नत और निम्न स्थान पर पुनः भेजने वाले भी वही है अन्यथा स्थिति अनियंत्रित हो जाती है और धर्मचक्र/कालचक्र के रक्षक दुर्वाशा की बारी आ जाती है कालचक्रधारी महाकाल(शिव) के रूद्र रूप में महाविनाश की स्थिति आने से बचाने हेतु मतलब महाकाल शिव को नटराज अवस्था में आने बचाने हेतु।)

मै कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल/बिलवा पत्र जो पारवती/सती का आहार और शिव पर अर्पण होने वाला हो) पाण्डेय ब्राह्मण केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनो से मिश्रित हिन्दू समाज के लिए ही ब्राह्मण की पात्रता पूर्ण नहीं की है वरन सनातन हिन्दू समाज समेत मुस्लिम/इस्लाम और ईसाई/क्रिस्चियन समाज के लिए भी स्थापित श्रेष्ठतम ब्राह्मण परिभाषा के तहत जो पात्रता होनी चाहिए उसे भी पूर्ण किया हूँ। अतः सत्यमेव जयते के विपरीत दिशा में कार्य करने वाले किशी भी जाती/धर्म के क्षत्रप का विरोध करने की सामर्थ्य मुझमे है और उसका हर तरह का जबाब भी मेरे पास था और उस जबाब के आधार पर सबको नियंत्रित भी किया केवल मात्र कलम और अपने आचरण के सहारे जबकि अस्त्र-शस्त्र शिक्षा भी मैंने ले रखी है 96 यू पी बी एन जौनपुर, वाराणसी, भारतीय शैन्य शिक्षार्थी दल(थल सेना विंग) में जिसमे लिखित में प्रथम स्थान था।

मै कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेल/बिलवा पत्र जो पारवती/सती का आहार और शिव पर अर्पण होने वाला हो) पाण्डेय ब्राह्मण केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनो से मिश्रित हिन्दू समाज के लिए ही ब्राह्मण की पात्रता पूर्ण नहीं की है वरन सनातन हिन्दू समाज समेत मुस्लिम/इस्लाम और ईसाई/क्रिस्चियन समाज के लिए भी स्थापित श्रेष्ठतम ब्राह्मण परिभाषा के तहत जो पात्रता होनी चाहिए उसे भी पूर्ण किया हूँ। अतः सत्यमेव जयते के विपरीत दिशा में कार्य करने वाले किशी भी जाती/धर्म के क्षत्रप का विरोध करने की सामर्थ्य मुझमे है और उसका हर तरह का जबाब भी मेरे पास था और उस जबाब के आधार पर सबको नियंत्रित भी किया केवल मात्र कलम और अपने आचरण के सहारे जबकि अस्त्र-शस्त्र शिक्षा भी मैंने ले रखी है 96 यू पी बी एन  जौनपुर, वाराणसी,  भारतीय शैन्य शिक्षार्थी दल(थल सेना विंग) में जिसमे लिखित में प्रथम स्थान था।

जिसे कालचक्र के धारणकर्ता त्रिभुवनेश्वर(प्रेम चंद:चन्द्रमा का सबसे बड़ा प्रेमी जिसने उनको सिर पर चढ़ा रखा है जिनको की सामान्यतः भुवनेश्वर से ही सम्बोधित करते है) ने और देवाशीष ने वरिष्ठ बना दिया हो उसको सूर्यनारायण और आशीष के माध्यम से कौन कनिष्ठ बना सकता है। जाहिर सी बात है यह दोयम दर्जे की राजनीती करने वालों का कार्य है जिसे वे लोग स्वीकार नहीं करते थे और अब उनके कार्य से यह स्वयं प्रमाणित हो गया है की उनकी राजनीति हमेशा दोयम दर्जे की रही है और वे भी दोयम दर्जे के लोग है जो कालचक्र को इसलिए नकार रहे है क्योंकि जब उनको मौक़ा था वरिष्ठं किशी को बनाने का तो उस समय भी वे दोयम दर्जे के कार्य में व्यस्त थे या कहा जाय तो कुछ भी अनुचित नहीं होगा की दोयम दर्जे के लोगों को वरिष्ठ पद पर पहुंचना ही नहीं था। कालचक्र किशी का मोहताज नहीं वह अपना कार्य अग्रिम रूप से ही कर लेता है किशी की जी हुजूरी और दासता नहीं करता है। -------मै स्वयं ऐसा व्यक्ति हूँ जिसमे गलत चलने वाली कलम को तोड़ देने की शक्ति है मेरा दुनिआ की कोई शक्ति कुछ नहीं कर सकती जो सत्यमेव जयते के प्रतिकूल चलने की कोशिस करती हो पर यह सम्मान मुझे यम और नियम का पालन करने का आदर्श प्रस्तुत करने को कहता है:>>>>>> Allahabad University Alumni Association (AUAA), Registered Under Society Act 1860 (Reg. no. 407/2000), Alumni Chapter- NCR Ghaziabad (Greater Noida): 2007-2008. Famous alumni include: Our Proud Past Prof. Prem Chand Pandey (Dr, P.C. Pandey, SAC/ISRO,NCAOR/MoES, CORAL/IIT Kgp): Founder Director of National centre for Antarctic and Ocean Research (NCAOR), Goa, 1st student of University of Allahabad who got Bhatnagar award and Uttar Pradesh Vigyan Gaurav award along with many other award of science, he got Gold medal award of NASA, USA for his short span of time good work there as ISRO, Govt. of India employ on training. His help for new scientific centres in UoA indirectly is very important and was at exact turning period of university's future vision in modern era. KBCAOS/MNCOSS, IIDS is one of the on surface example known by all related with UoA. Ram Chandra Sinha, Former IAS Officer, Former Secretary to the Chief Minister of Bihar, Chairman of the Patna Improvement Trust, Divisional Commissionor (Bhaglpur), Commissioner (Agriculture, Education), Sub Divisional Officer, District Magistrate, founder of the Sudha Co-Operative, now Senior Advocate. Harivansh Rai Bachchan, Poet Krishna Prakash Bahadur, Author H.N. Bahuguna, former Deputy Prime Minister of India Prof. Harish Chandra, Mathematician Acharya Narendra Dev Mohammad Hidayatullah, Former Chief Justice, Supreme Court of India Ranganath Mishra, former Chief Justice of India Gulzari Lal Nanda, former Prime Minister of India Motilal Nehru Govind Ballabh Pant Prof. Govind Jee. Prof. University of Illinois, Former head- International society for Photobiology. Gopal Swarup Pathak, former Vice President of India Dr V.K.Rai, Plant physiology Dr. Shankar Dayal Sharma, Former President of India Chandra Shekhar, Former Prime Minister of India Satyendra Narayan Sinha, Former Chief Minister of Bihar Prof. Ram Chandra Shukla, Painter. Surya Bahadur Thapa Prof. Vijai K Tripathi Kamal Narain Singh, former Chief Justice of India Nikhil Kumar, former IPS, Member of Parliament India Prof. Daulat Singh Kothari, Physicist Prof. Kundan Singh Singwi, Physicist Prof. Govind Swarup, Physicist Udit Raj, Social Activist Pankaj Mishra, Author Krishna Kumar Sharma, Quit India Movement Leader and Activist, Prominent Poet and Literary Figure Vishwanath Pratap Singh,10th Prime Minister of India Murli Manohar Joshi,B.J.P leader and former Minister for Human resource&development Dharmendra Singh Yadav , Member of Parliament India Radhey Shyam Sharma, IPS, Former Director Vigilance UP Maharishi Mahesh Yogi Dhananjaya Kumar, Yogacharya, Poet Mahadevi Varma (poet and writer) Mukhtar Zaman, freedom fighter, leading journalist Dr Umesh C Yadav, Research scientist, Univ of Texas, USA Indu Kant Shukla, Litterateur,Poet,Writer. Prafulla Kumar Rai, MP for Gorakhpur (Uttar Pradesh) D.P. Chandel, equity researcher (New york, USA) Dr. Vivek Kumar Pandey PDF at Centre for Atmospheric & Oceanic Sciences, IISc Bangalore, 1st doctorate from K.Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies(KBCAOS,IIDS), University of Allahabad(UoA), Allahabad and (1st batch JRF of National Centre for Antarctic and Ocean Research (NCAOR), Goa,Master of Science Department of Physics(Nuclear)-2000, BHU, Varanasi, B.Sc. from Purvanchal University, Jaunpur (U.P.) Contact: ALLAHABAD UNIVERSITY ALUMNI ASSOCIATION IIND FLOOR, III-B-1, NEHRU NAGAR GHAZIABAD- 201001 Phone: 0120 – 2792976 References: http://archive.is/aKXW http://archive.is/7ocui http://archive.is/Mn8Oe http://archive.is/NAet Article: A silent crusader who is making efforts to restore AU's past glory Article from: The Hindustan Times Article date: August 26, 2005 NEW DELHI, India, Aug 26 -- SIX YEARS back, when the demand of giving Central Status to Allahabad University was gathering momentum, one man had already launched a silent crusade to restore the past glory of 'Oxford of the East' to make the whole world know about the 'powerful' men, which the university has produced till date. It was an extraordinary effort of Naveen Chandra, a bank employee, that led to the formation of Allahabad University Alumni Association in Ghaziabad. The Association boasts of 500 members, including Mumbai Commissioner of Police AN Roy, SBI Chairman AK Purwar, Ex-Delhi Police Chief Ajay Raj Sharma and former Defence Secretary Dr Yogendra Narain, who at some Article: Alumni relive those golden' glorious days Article from: The Hindustan Times Article date: February 18, 2008 Smriti Malaviya Hindustan Times NEW DELHI, India, Feb. 18 -- THE ALUMNI Convention at Allahabad University (AU) was more of an emotional and happy reunion of former students, than an event glorifying the past achievements of the varsity. The event gave an opportunity to former students and inmates of AU hostels to share their wonderful moments, which they spent at the university, with the new generation. Talking with HT Allahabad Live, two former inmates of Sir Sunder Lal Hostel who have come from Ghaziabad and Noida, admitted that the time spent at the university was the 'golden' period of their life. DK Singh 'Dadda' 'The time I spent at SSL Hostel was Article: AU alumni meet in Ghaziabad in October Article from: The Hindustan Times Article date: August 2, 2006 NEW DELHI, India, Aug 2 -- ALLAHABAD UNIVERSITY (AU) vice-chancellor Prof RG Harshe will participate in a conference to be hosted by the AU Alumni Association (AUAA) Ghaziabad and Noida chapter, at Ghaziabad in October. An AUAA delegation met Prof Harshe recently at his residence and invited him to the conference. AUAA founding secretary Naveen Chandra and PN Tandon also informed Prof Harshe about the activities carried out by the association in Ghaziabad and adjoining areas. According to Chandra, AUAA had been successful in marking it presence through social and cultural activities in Ghaziabad and the entire National Capital Region. The activities included hosting cricket Hindi starts from square and will take the Hindi words when past on facebook. इस दुनिया में बिना कुछ दिए भीख भी नहीं मिलाती और माँगने पर मौत भी नहीं मिलाती है वरन भींख के बदले दुआ आप स्वयं दो या न दो पर दुआ देने वाले को आप से मिल ही जाती है और आप अपने दुर्दिन से खिन्न हो मौत भी ईस्वर से मांगते हैं तो वह तभी मिलाती है जब आप के पूर्व और इस जन्म के पापा कट जाते है आप की दीन-हीन दशा और कास्ट सहने से(बिना पूर्व जन्म के पाप काटे सुदामा को भी अपने मित्र भगवान श्रीकृष्ण के यहां जाने को सुशीला भी प्रेरित न कर सकी यह जानते हुए भी की श्रीकृष्ण और सुदामा में बहुत ही गहरी दोस्ती है): तो इन 42 महानुभाव में कुछ दम और सामजिक और वैज्ञानिक योगदान नजर आया ही होगा जो इनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय का गौरवशाली पुराछात्रों में स्थान दिया था सम्बंधित लोगों ने।

जिसे कालचक्र के धारणकर्ता त्रिभुवनेश्वर(प्रेम चंद:चन्द्रमा का सबसे बड़ा प्रेमी जिसने उनको सिर पर चढ़ा रखा है जिनको की  सामान्यतः भुवनेश्वर से ही सम्बोधित करते है) ने और देवाशीष ने वरिष्ठ बना दिया हो उसको सूर्यनारायण और आशीष के माध्यम से कौन कनिष्ठ बना सकता है। जाहिर सी बात है यह दोयम दर्जे की राजनीती करने वालों का कार्य है जिसे वे लोग स्वीकार नहीं करते थे और अब उनके कार्य से यह स्वयं प्रमाणित हो गया है की उनकी राजनीति हमेशा दोयम दर्जे की रही है और वे भी दोयम दर्जे के लोग है जो कालचक्र को इसलिए नकार रहे है क्योंकि जब उनको मौक़ा था वरिष्ठं किशी को बनाने का तो उस समय भी वे दोयम दर्जे के कार्य में व्यस्त थे या कहा जाय तो कुछ भी अनुचित नहीं होगा की दोयम दर्जे के लोगों को वरिष्ठ पद पर पहुंचना ही नहीं था। कालचक्र किशी का मोहताज नहीं वह अपना कार्य अग्रिम रूप से ही कर लेता है किशी की जी हुजूरी और दासता नहीं करता है। -------मै स्वयं ऐसा व्यक्ति हूँ जिसमे गलत चलने वाली कलम को तोड़ देने की शक्ति है मेरा दुनिआ की कोई शक्ति कुछ नहीं कर सकती जो सत्यमेव जयते के प्रतिकूल चलने की कोशिस करती हो पर यह सम्मान मुझे यम और नियम का पालन करने का आदर्श प्रस्तुत करने को कहता है:>>>>>>

Allahabad University Alumni Association (AUAA), Registered Under Society Act 1860 (Reg. no. 407/2000), Alumni Chapter- NCR Ghaziabad (Greater Noida): 2007-2008.

Famous alumni include:
Our Proud Past

Prof. Prem Chand Pandey (Dr, P.C. Pandey, SAC/ISRO,NCAOR/MoES,  CORAL/IIT Kgp): Founder Director of National centre for Antarctic and  Ocean Research (NCAOR), Goa, 1st student of University of Allahabad  who got Bhatnagar award and Uttar Pradesh Vigyan Gaurav award along with many other award of science, he got Gold medal award of NASA, USA  for his short span of time good work there as ISRO, Govt. of India
employ on training. His help for new scientific centres in UoA  indirectly is very important and was at exact turning period of  university's future vision in modern era. KBCAOS/MNCOSS, IIDS is one  of the on surface example known by all related with UoA.
Ram Chandra Sinha, Former IAS Officer, Former Secretary to the Chief  Minister of Bihar, Chairman of the Patna Improvement Trust, Divisional  Commissionor (Bhaglpur), Commissioner (Agriculture, Education), Sub  Divisional Officer, District Magistrate, founder of the Sudha  Co-Operative, now Senior Advocate.
Harivansh Rai Bachchan, Poet
Krishna Prakash Bahadur, Author
H.N. Bahuguna, former Deputy Prime Minister of India
Prof. Harish Chandra, Mathematician
Acharya Narendra Dev
Mohammad Hidayatullah, Former Chief Justice, Supreme Court of India
Ranganath Mishra, former Chief Justice of India
Gulzari Lal Nanda, former Prime Minister of India
Motilal Nehru
Govind Ballabh Pant
Prof. Govind Jee. Prof. University of Illinois, Former head-
International society for Photobiology.
Gopal Swarup Pathak, former Vice President of India
Dr V.K.Rai, Plant physiology
Dr. Shankar Dayal Sharma, Former President of India
Chandra Shekhar, Former Prime Minister of India
Satyendra Narayan Sinha, Former Chief Minister of Bihar
Prof. Ram Chandra Shukla, Painter.
Surya Bahadur Thapa
Prof. Vijai K Tripathi
Kamal Narain Singh, former Chief Justice of India
Nikhil Kumar, former IPS, Member of Parliament India
Prof. Daulat Singh Kothari, Physicist
Prof. Kundan Singh Singwi, Physicist
Prof. Govind Swarup, Physicist
Udit Raj, Social Activist
Pankaj Mishra, Author
Krishna Kumar Sharma, Quit India Movement Leader and Activist,
Prominent Poet and Literary Figure
Vishwanath Pratap Singh,10th Prime Minister of India
Murli Manohar Joshi,B.J.P leader and former Minister for Human
resource&development
Dharmendra Singh Yadav , Member of Parliament India
Radhey Shyam Sharma, IPS, Former Director Vigilance UP
Maharishi Mahesh Yogi
Dhananjaya Kumar, Yogacharya, Poet
Mahadevi Varma (poet and writer)
Mukhtar Zaman, freedom fighter, leading journalist
Dr Umesh C Yadav, Research scientist, Univ of Texas, USA
Indu Kant Shukla, Litterateur,Poet,Writer.
Prafulla Kumar Rai, MP for Gorakhpur (Uttar Pradesh)
D.P. Chandel, equity researcher (New york, USA)
Dr. Vivek Kumar Pandey PDF at Centre for Atmospheric & Oceanic  Sciences, IISc Bangalore, 1st doctorate from K.Banerjee Centre of  Atmospheric and Ocean  Studies(KBCAOS,IIDS), University of  Allahabad(UoA), Allahabad and (1st batch JRF of National Centre for Antarctic and Ocean Research (NCAOR), Goa,Master of Science Department of Physics(Nuclear)-2000, BHU, Varanasi, B.Sc. from Purvanchal  University, Jaunpur (U.P.)

Contact: ALLAHABAD UNIVERSITY ALUMNI ASSOCIATION
IIND FLOOR, III-B-1, NEHRU NAGAR
GHAZIABAD- 201001
Phone: 0120 – 2792976

      References:



 

Article: A silent crusader who is making efforts to restore AU's past glory

Article from:
The Hindustan Times
Article date:
August 26, 2005


NEW DELHI, India, Aug 26 -- SIX YEARS back, when the demand of giving Central Status to Allahabad University was gathering momentum, one man had already launched a silent crusade to restore the past glory of 'Oxford of the East' to make the whole world know about the 'powerful' men, which the university has produced till date.
It was an extraordinary effort of Naveen Chandra, a bank employee, that led to the formation of Allahabad University Alumni Association in Ghaziabad. The Association boasts of 500 members, including Mumbai Commissioner of Police AN Roy, SBI Chairman AK Purwar, Ex-Delhi Police Chief Ajay Raj Sharma and former Defence Secretary Dr Yogendra Narain, who at some

Article: Alumni relive those golden' glorious days

Article from:
The Hindustan Times
Article date:
February 18, 2008


Smriti Malaviya
Hindustan Times
NEW DELHI, India, Feb. 18 -- THE ALUMNI Convention at Allahabad University (AU) was more of an emotional and happy reunion of former students, than an event glorifying the past achievements of the varsity. The event gave an opportunity to former students and inmates of AU hostels to share their wonderful moments, which they spent at the university, with the new generation.
Talking with HT Allahabad Live, two former inmates of Sir Sunder Lal Hostel who have come from Ghaziabad and Noida, admitted that the time spent at the university was the 'golden' period of their life.
DK Singh 'Dadda'
'The time I spent at SSL Hostel was


Article: AU alumni meet in Ghaziabad in October

Article from:
The Hindustan Times
Article date:
August 2, 2006


NEW DELHI, India, Aug 2 -- ALLAHABAD UNIVERSITY (AU) vice-chancellor Prof RG Harshe will participate in a conference to be hosted by the AU Alumni Association (AUAA) Ghaziabad and Noida chapter, at Ghaziabad in October.
An AUAA delegation met Prof Harshe recently at his residence and invited him to the conference. AUAA founding secretary Naveen Chandra and PN Tandon also informed Prof Harshe about the activities carried out by the association in Ghaziabad and adjoining areas.
According to Chandra, AUAA had been successful in marking it presence through social and cultural activities in Ghaziabad and the entire National Capital Region. The activities included hosting cricket




Hindi starts from square and will take the Hindi words when past on facebook.
            इस दुनिया में बिना कुछ दिए भीख भी नहीं मिलाती और माँगने पर मौत भी नहीं मिलाती है वरन भींख के बदले दुआ आप स्वयं  दो या दो पर दुआ देने वाले को आप से मिल ही जाती है और आप अपने दुर्दिन से खिन्न हो मौत भी ईस्वर से मांगते हैं तो वह तभी मिलाती है जब आप के पूर्व और इस जन्म के पापा कट जाते है आप की दीन-हीन दशा और कास्ट सहने से(बिना पूर्व जन्म के पाप काटे सुदामा को भी अपने मित्र भगवान श्रीकृष्ण के यहां जाने को सुशीला भी प्रेरित कर सकी यह जानते हुए भी की श्रीकृष्ण और सुदामा में बहुत ही गहरी दोस्ती है):  तो इन 42 महानुभाव में कुछ दम और सामजिक और वैज्ञानिक योगदान नजर आया ही होगा जो इनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय का गौरवशाली पुराछात्रों में स्थान दिया था सम्बंधित लोगों ने
 

Tuesday, June 23, 2015

WORLD AGAIN BECAME A VILLAGE: People should have a local and a global cell for each work to govern even a local unit. I given 14 year time to adjust these things in its own way, as these assumptions were only in the mind of highest controlling authority, were in general not in mind of a lay man but at a sudden came in my mind by observation of some unusual changes which was occurring. Thus I realized a huge burden how to convey the message to society which came in my small mind and how to correlate this things to form valuable facts which society can adopt in a good way which generally flowed in the mind of a very experienced person who thinks these but from a long distance from a common man's life. This is in form of my blog "Vivekanand and Moden Tradition".

WORLD AGAIN BECAME A VILLAGE: People should have a local and a global cell for each work to govern even a local unit. I given 14 year time to adjust these things in its own way, as these assumptions were only in the mind of highest controlling authority, were in general not in mind of a lay man but at a sudden came in my mind by observation of some unusual changes which was occurring. Thus I realized a huge burden how to convey the message to society which came in my small mind and how to correlate this things to form valuable facts which society can adopt in a good way which generally flowed in the mind of a very experienced person who thinks these but from a long distance from a common man's life. This is in form of my blog "Vivekanand and Moden Tradition".

जिसे मै सामाजिक रूप से लिख रहा हूँ उसे सार्वजनिक रूप से सामान्यतः एक सनातन ब्राह्मण ही लिख सकता है चुनौती के साथ वह यह है की रामजानकी=सत्यनारायण=लक्ष्मीनारायण=मानवीय द्रृस्ति से सर्वोच्च भौतिक ऊर्जा=प्रदीप=सूर्य की ऊर्जा का भी स्वयं में ही निहित या अन्तःनिहित स्रोत=सूर्य का स्वामी=सूर्यकान्त= " अतः इनका पुत्र कम से सूर्य या लव/हिन्दू-कुश ही होंगे जो चन्द्रमा को भी रोशन करने वाला स्वयं होगा वह चाहे उत्तम चन्द्रमा हो या मध्यम चन्द्रमा। मतलब एक अन्तः निहित इकाई के रूप में भी वह सूर्यपुत्र कर्ण का बाप या स्वामी ही होगा कर्णपुर वालों! यह माया का असर है की समान सामाजिक और आर्थिक परिस्थतियों में दुर्वाशा की भूमि प्रयागराज और आजमगढ़(श्रेष्ठ जनों की भूमि) का सनातन ब्राह्मण, कर्णपुर के सनातन ब्राह्मण से स्वयं श्रेष्ठ होता ही है जिसे सिद्ध करने की जरूरत ही कभी नहीं पड़नी चाहिए थी और न पड़ेगी कभी लेकिन लोग सिद्ध करवाने पर उतारु थे तो पुनः सिद्ध हो ही गया और इसके साथ ही साथ उत्तर प्रदेश की धरा(अयोध्या+ काशी+मथुरा+प्रयागराज) से अलग किशी स्थान के स्वयं सनातन ब्राह्मण की और उस स्थान के सनातन ब्राह्मण या किशी अन्य जाती/धर्म की श्रेष्ठता की बात ही क्या? कोई भी सर्वश्रेष्ठ संवैधानिक पद या वैभव पा लेने पर भी सनातन ब्राह्मण का पद एक जन्म बाद ही प्राप्त हो सकता है लेकिन सनातन ब्राह्मण का दायित्व भी सबसे कठिन होता है इसे भी जान लेना चाहिए उस सनातन ब्राह्मण को भी। All Sanatan/Eternal SEVEN Rishis/Saptarshi as SEVEN SUNS as Seven Horses of the chariot of Lord Ramjanaki governed by CHARIOTEER called Dharm/Religion. Means all the seven Rishis are forced to follow the Dharm/Religion.

जिसे मै सामाजिक रूप से लिख रहा हूँ उसे सार्वजनिक रूप से सामान्यतः एक सनातन ब्राह्मण ही लिख सकता है चुनौती के साथ वह यह है की रामजानकी=सत्यनारायण=लक्ष्मीनारायण=मानवीय द्रृस्ति से सर्वोच्च भौतिक ऊर्जा=प्रदीप=सूर्य की ऊर्जा का भी स्वयं में ही निहित या अन्तःनिहित स्रोत=सूर्य का स्वामी=सूर्यकान्त= " अतः इनका पुत्र कम से सूर्य या लव/हिन्दू-कुश ही होंगे जो चन्द्रमा को भी रोशन करने वाला स्वयं होगा वह चाहे उत्तम चन्द्रमा हो या मध्यम चन्द्रमा। मतलब एक अन्तः निहित इकाई के रूप में भी वह सूर्यपुत्र कर्ण का बाप या स्वामी ही होगा कर्णपुर वालों! यह माया का असर है की समान सामाजिक और आर्थिक परिस्थतियों में दुर्वाशा की भूमि प्रयागराज और आजमगढ़(श्रेष्ठ जनों की भूमि) का सनातन ब्राह्मण, कर्णपुर के सनातन ब्राह्मण से स्वयं श्रेष्ठ होता ही है जिसे सिद्ध करने की जरूरत ही कभी नहीं पड़नी चाहिए थी और न पड़ेगी कभी लेकिन लोग सिद्ध करवाने पर उतारु थे तो पुनः सिद्ध हो ही गया और इसके साथ ही साथ उत्तर प्रदेश की धरा(अयोध्या+ काशी+मथुरा+प्रयागराज) से अलग किशी स्थान के स्वयं सनातन ब्राह्मण की और उस स्थान के सनातन ब्राह्मण या किशी अन्य जाती/धर्म की श्रेष्ठता की बात ही क्या? कोई भी सर्वश्रेष्ठ संवैधानिक पद या वैभव पा लेने पर भी सनातन ब्राह्मण का पद एक जन्म बाद ही प्राप्त हो सकता है लेकिन सनातन ब्राह्मण का दायित्व भी सबसे कठिन होता है इसे भी जान लेना चाहिए उस सनातन ब्राह्मण को भी। All Sanatan/Eternal SEVEN Rishis/Saptarshi as SEVEN SUNS as Seven Horses of the chariot of Lord Ramjanaki governed by CHARIOTEER called Dharm/Religion. Means all the seven Rishis are forced to follow the Dharm/Religion.  

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण में स्थित "विरला विश्वनाथ मंदिर" के सामने बिहारी चाय की दूकान पर बड़े भाई अखिलेश सिंह की उपस्थिति में विनयशंकर पाण्डेय भाई से फरवरी, 2012 में कहा था की बहुत बड़ी बीमारी समाज में ये हो गयी है की सब लोग कृष्ण(भाद्रप कृष्णपक्ष अस्टमी। कृष्णपक्ष: चद्रमा प्रभावी) ही बनते जा रहे हैं, कुछ लोग तो राम(चैत्र शुक्लपक्ष नवमी।शुक्लपक्ष: सूर्य प्रभावी) बने नहीं तो संतुलन बिगड़ता ही जाएगा जिसको अंततः नियंत्रित कर पाना बहुत ही मुस्किल होगा। वक्तब्य मैंने वाह्य समाज के लिए दिया पर मेरे घर बृहस्पतिवारीय शुक्ल पक्षीय तो अपना प्रभाव दिखाते हुए 2010 में ही आ चुके थे पर बुधवारीय कृष्ण पक्षीय स्वयं कृष्ण 2013 की जन्मास्टमी को ही मेरे घर आ गए। लेकिन समाज में मेरी इक्षा और वक्तव्य का असर हुआ और बहुत बड़ी संख्या में मानशिक रूप से ही सही शुक्लपक्षीय गुण वाले जनों का जन्म समाज में हुआ और तद फलानुसार अनुसार सामाजिक संतुलन कायम हुआ वर्तमान में।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण में स्थित "विरला विश्वनाथ मंदिर" के सामने बिहारी चाय की दूकान पर बड़े भाई अखिलेश सिंह की उपस्थिति में विनयशंकर पाण्डेय भाई से फरवरी, 2012 में कहा था की बहुत बड़ी बीमारी समाज में ये हो गयी है की सब लोग कृष्ण(भाद्रप कृष्णपक्ष अस्टमी। कृष्णपक्ष: चद्रमा प्रभावी) ही बनते जा रहे हैं, कुछ लोग तो राम(चैत्र शुक्लपक्ष नवमी।शुक्लपक्ष: सूर्य प्रभावी) बने नहीं तो संतुलन बिगड़ता ही जाएगा जिसको अंततः नियंत्रित कर पाना बहुत ही मुस्किल होगा। वक्तब्य मैंने वाह्य समाज के लिए दिया पर मेरे घर बृहस्पतिवारीय शुक्ल पक्षीय तो अपना प्रभाव दिखाते हुए 2010 में ही आ चुके थे पर बुधवारीय कृष्ण पक्षीय स्वयं कृष्ण 2013 की जन्मास्टमी को ही मेरे घर आ गए। लेकिन समाज में मेरी इक्षा और वक्तव्य का असर हुआ और बहुत बड़ी संख्या में मानशिक रूप से ही सही शुक्लपक्षीय गुण वाले जनों का जन्म समाज में हुआ और तद फलानुसार अनुसार सामाजिक संतुलन कायम हुआ वर्तमान में।

Friday, June 19, 2015

गुरु सबसे श्रेष्ठ होता है इसलिए वशिष्ठ सर्वश्रेष्ठ है और अगर वह गुरु परब्रह्म मतलब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनो हो तो ऐसा गुरु जगश्रेष्ठ मतलब जगदीश हुआ मतलब भगवान विष्णु का परमब्रह्म स्वरुप हुआ मतलब श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों हुए। लेकिन मित्रों इस बार इसी भगवान विष्णु के परमब्रह्म स्वरुप की कृपा से भगवान शंकर ने परमब्रह्म का स्वरुप धारण किया था और एक मात्र रास्ता यही था विश्व को संभावित महाविनाश की विभीषिका से बचाने का और अत्यल्प विनाश के साथ इस श्रिष्टि का एक महापरिवर्तन और महानवनिर्माण के साथ सृजन करने हेतु जिसमे आद्यतन भी नूतन अनुभव किया है। और यह था आद्यशंकर=केदारेश्वर(1 -आद्यशंकर=केदारेश्वर, 2 -महामृत्युंजय, 3-विश्वेश्वर=विश्वनाथ) का परब्रह्म के रूप में महास्वरूप जिसने विश्वनाथ को भी महापरिवर्तन(जिसमे सनातन हिन्दू धर्म के मुख्य धार्मिक अवयव ब्राह्मण, क्षत्रिय वैस्य धर्म/जाती वाले विशेष रूप से प्रभावित हुए) और महानवनिर्माण में पीछे छोड़ दिया मतलब आद्यतम केदारेश्वर=आद्याशंकर ने नवीनतम विश्वनाथ की सीमा से भी और आगे जाते हुए परब्रह्म का स्वरुप ले महामिशाल(जिसमे सनातन हिन्दू धर्म के मुख्य धार्मिक अवयव ब्राह्मण, क्षत्रिय वैस्य धर्म/जाती और इनके व्युत्पन्न से सृजित नए पंथ और समुदाय मतलब मुसलमान/इस्लामानुआई और ईसाई/क्रिश्चियन समेत पूरा विश्व समुदाय प्रभावित हुआ) कायम किये जिस पर की इस श्रिष्टि के इतिहाश में केवल और केवल विष्णु का ही अधिकार था। तो लीजिये विश्वमहाकल्याण और इसके साथ प्रयागराज विश्वविद्यालय में महाकार्य विशेष की पूर्ती के साथ विष्णु को उनका यह अधिकार वापस किया जा रहा है जिनकी शक्ति प्राप्त कर केदारेश्वर=आदिशंकर परब्रह्म की महाअवस्था प्राप्त करने का महामिशाल कायम करते है। और इसके साथ ही शक्ति संतुलन पुनः स्थापित हो रहा है इस प्रयागराज की धरती पर जिस पर की ब्रह्मा और विष्णु का प्रथम अधिकार है और शिव का काशी की धरा पर जिससे की ब्रह्मा, विष्णु और महेश क्रम प्रयागराज और महादेव, विष्णु और ब्रह्मा/विरंचि का क्रम काशी में पुनः मान्य हो रहा है। विष्णु का मध्यम कद ही वह स्थान है जिससे इनके परब्रह्म बनने पर शक्ति संतुलन विशेष रूप से बना रहता है और इसमें इस शक्ति संतुलन से जनकल्याण की संभावना अति बलवती होती है और प्राणी जन शांति और वैभव प्राप्त करते है।>>>>>>>>मानवता को बचाने की यह सबसे श्रेष्ठ कसरत/योग जो इन चौदह वर्षों में हुआ है ऐसे कार्य में महत्तम भूमिका निभाने वाले और सर्वश्रेष्ठ मानवतावादी गौतम इसलिए सर्वश्रेष्ठ हुए मतलब वशिष्ठ से भी श्रेष्ठ। अतः श्रेष्ठता का क्रम गौतम, वशिष्ठ, कश्यप/मारीच, आंगिराश/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/सोमात्रेय/दत्तात्रेय, कौशिक/विश्वरथ/विश्वामित्र हुआ जबकि वरिष्ठता क्रम में कश्यप प्रथम स्थान पर आ जाते हैं और गौतम तृतीय पर चले जाते है मतलब यह क्रम कश्यप/मारीच, वशिष्ठ, गौतम, आंगिराश/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/सोमात्रेय/दत्तात्रेय, कौशिक/विश्वरथ/विश्वामित्र हो जाता है।

गुरु सबसे श्रेष्ठ होता है इसलिए वशिष्ठ सर्वश्रेष्ठ है और अगर वह गुरु परब्रह्म मतलब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनो हो तो ऐसा गुरु जगश्रेष्ठ मतलब जगदीश हुआ मतलब भगवान विष्णु का परमब्रह्म स्वरुप हुआ मतलब श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों हुए। लेकिन मित्रों इस बार इसी भगवान विष्णु के परमब्रह्म स्वरुप की कृपा से भगवान शंकर ने परमब्रह्म का स्वरुप धारण किया था और एक मात्र रास्ता यही था विश्व को संभावित महाविनाश की विभीषिका से बचाने का और अत्यल्प विनाश के साथ इस श्रिष्टि का एक महापरिवर्तन और महानवनिर्माण के साथ सृजन करने हेतु जिसमे आद्यतन भी नूतन अनुभव किया है। और यह था आद्यशंकर=केदारेश्वर(1 -आद्यशंकर=केदारेश्वर, 2 -महामृत्युंजय, 3-विश्वेश्वर=विश्वनाथ) का परब्रह्म के रूप में महास्वरूप जिसने विश्वनाथ को भी महापरिवर्तन(जिसमे सनातन हिन्दू धर्म के मुख्य धार्मिक अवयव ब्राह्मण, क्षत्रिय  वैस्य धर्म/जाती वाले विशेष रूप से प्रभावित हुए) और महानवनिर्माण में पीछे छोड़ दिया मतलब आद्यतम केदारेश्वर=आद्याशंकर ने नवीनतम विश्वनाथ की सीमा से भी और आगे जाते हुए परब्रह्म का स्वरुप ले महामिशाल(जिसमे सनातन हिन्दू धर्म के मुख्य धार्मिक अवयव ब्राह्मण, क्षत्रिय  वैस्य धर्म/जाती और इनके व्युत्पन्न से सृजित नए पंथ और समुदाय मतलब मुसलमान/इस्लामानुआई और ईसाई/क्रिश्चियन समेत पूरा विश्व समुदाय प्रभावित हुआ) कायम किये जिस पर की इस श्रिष्टि के इतिहाश में केवल और केवल विष्णु का ही अधिकार था। तो लीजिये विश्वमहाकल्याण और इसके साथ प्रयागराज विश्वविद्यालय में महाकार्य विशेष की पूर्ती के साथ विष्णु को उनका यह अधिकार वापस किया जा रहा है जिनकी शक्ति प्राप्त कर केदारेश्वर=आदिशंकर परब्रह्म की महाअवस्था प्राप्त करने का महामिशाल कायम करते है। और इसके साथ ही शक्ति संतुलन पुनः स्थापित हो रहा है इस प्रयागराज की धरती पर जिस पर की ब्रह्मा और विष्णु का प्रथम अधिकार है और शिव का काशी की धरा पर जिससे की ब्रह्मा, विष्णु और महेश क्रम प्रयागराज और महादेव, विष्णु और ब्रह्मा/विरंचि का क्रम काशी में पुनः मान्य हो रहा है। विष्णु का मध्यम कद ही वह स्थान है जिससे इनके परब्रह्म बनने पर शक्ति संतुलन विशेष रूप से बना रहता है और इसमें इस शक्ति संतुलन से जनकल्याण की संभावना अति बलवती होती है और प्राणी जन शांति और वैभव प्राप्त करते है।>>>>>>>>मानवता को बचाने की यह सबसे श्रेष्ठ कसरत/योग जो इन चौदह वर्षों में हुआ है ऐसे कार्य में महत्तम भूमिका निभाने वाले और सर्वश्रेष्ठ मानवतावादी गौतम इसलिए सर्वश्रेष्ठ हुए मतलब वशिष्ठ से भी श्रेष्ठ। अतः श्रेष्ठता का क्रम गौतम, वशिष्ठ, कश्यप/मारीच, आंगिराश/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/सोमात्रेय/दत्तात्रेय, कौशिक/विश्वरथ/विश्वामित्र हुआ जबकि वरिष्ठता क्रम में कश्यप प्रथम स्थान पर आ जाते हैं और गौतम तृतीय पर चले जाते है मतलब यह क्रम कश्यप/मारीच,  वशिष्ठ, गौतम, आंगिराश/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/सोमात्रेय/दत्तात्रेय, कौशिक/विश्वरथ/विश्वामित्र  हो जाता है।        
    

Thursday, June 18, 2015

Not sold the parental land which in general was excess in comparison with the others as per suggestion of our ancestors, which was most easy way for preparation for admission in Engineering classes and other competitive examinations after Post-Graduation and also for family support(being only son of my father who was graduate in political science and Hindi, and but was based on agriculture as he came in dipresion while pursuing his post graduation in Political Science from Tilakdhari P G College, the then under DDU University, Gorakhpur) ; not became a private tutor who teaches door to door that is against my family tradition but became teacher of Physics and Maths both for Engineering and Medical in a private coaching in Allahabad at its primary stage; and most important is that I not entered in Movie's Hall in till date life although from 8th class I used to pass through two good Picture Hall in Shahaganj, Jaunpur in one or two months when ever I goes to my home(Village Ramapur) which is 30 Km from maternal Uncles village Bishunpur by bicycle. I also want to add that after my High School only, I was indirect chief of my family. I was perfect Brahmachari till the marriage and now too Brahmachari as per Hanuman ji i.e. the Singled wife relation in the same caste and classically verified. From seeking (MILKING) milk and grazing of buffaloes and cows to plaughing /cultivation, there was no any work remain in the agriculture field which I have not done and also even today can not do by reunion. Even though with my full belief I can say that upto graduation there was no single classmate stand superior than me in over all performance in the all classes in that area which most cultured first and also with culture it is the most education part of the world too i.e. in Jaunpur.>>>>>>>>How people comparing me with others whom I know well that they are projected and highly supported and in many way they can not restricted him for even an single activity. Even here I completed my task and then taken entry in that centre of this University with our colleagues. I know that I have not done much more than others in the subjective area but without losing my moral, using Indian training and Indian facilities; I am satisfactory with my work while others can not deny from the fact that they have not taken any external help and support and also promotion from back side. I also add that in my field which is very close to the nature there is no natural/basic research is going on in India because for MODEL code and Software we depends on the foreign countries experts. We are just analyse and report about these Model and Software application.

Not sold the parental land which in general was excess in comparison with the others as per suggestion of our ancestors, which was most easy way for preparation for admission in Engineering classes and other competitive examinations after Post-Graduation and also for family support(being only son of my father who was graduate in political science and Hindi, and but was based on agriculture as he came in dipresion while pursuing his post graduation in Political Science from Tilakdhari P G College, the then under DDU University, Gorakhpur) ; not became a private tutor who teaches door to door that is against my family tradition but became teacher of Physics and Maths both for Engineering and Medical in a private coaching in Allahabad at its primary stage; and most important is that I not entered in Movie's Hall in till date life although from 8th class I used to pass through two good Picture Hall in Shahaganj, Jaunpur in one or two months when ever I goes to my home(Village Ramapur) which is 30 Km from maternal Uncles village Bishunpur by bicycle. I also want to add that after my High School only, I was indirect chief of my family. I was perfect Brahmachari till the marriage and now too Brahmachari as per Hanuman ji i.e. the Singled wife relation in the same caste and classically verified. From seeking (MILKING) milk  and grazing of  buffaloes and cows to plaughing /cultivation, there was no any work remain in the agriculture field which I have not done and also even today can not do by reunion. Even though with my full belief I can say that upto graduation there was no single classmate stand superior than me in over all performance in the all classes in that area which most cultured first and also with culture it is the most education part of the world too i.e. in Jaunpur.>>>>>>>>How people comparing me with others whom I know well that they are projected and highly supported and in many way they can not restricted him for even an single activity. Even here I completed my task and then taken entry in that centre of this University with our colleagues. I know that I have not done much more than others in the subjective area but without losing my moral, using Indian training and Indian facilities;  I am satisfactory with my work while others can not deny from the fact that they have not taken any external help and support and also promotion from back side. I also add that in my field  which is very close to the nature there is no natural/basic research is going on in India because for MODEL code and Software we depends on the foreign countries experts. We are just analyse and report about these Model and Software application.

Saturday, June 13, 2015

और इसी लिए प्रयागराज-काशी से सभी लोगों को दुनिया चलाने के लिए धीरे-धीरे अपने सब गुण को बांटने और शक्ति देने जाना पड़ा और जाना पड़ता भी है भिन्न-भिन्न वैश्विक भागों में। क्योंकि किशी एक के गुण से यह संसार नहीं चलना था। और इस घुमक्कडी की सुरुआत सप्तर्षियों में तमस/क्षत्रिय गुण की सर्वाधिक्ता वाले विश्वामित्र/विश्वरथ(जिनका रथ पूरे विश्व में भ्रमण करता था)/कौशिक किये थे गौतम, वशिष्ठ, कश्यप, अंगिरस/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय, विश्वामित्र/विश्वरथ/कौशिक। और इसीलिये कहता हूँ की सभी क्षत्रियों को और वैश्यों वे हिन्दू के रूप में हों या अन्य धर्म के मतावलम्बियों के रूप में उनको शेष दुनिया अपने जिम्मे ले लेना चाहिए पर कम से कम भारत में ब्राह्मणों का संरक्षण करना चाहिए जैसा की मेरे मामा का गाँव क्षत्रिय द्वारा दान में मिला था और मेरे पांच गाँव एक मुस्लिम जागीरदार (कदाचिद् पूर्व में क्षत्रिय) द्वारा दान में मिला था जो ब्राह्मण संरक्षण का श्रेष्ठतम उदाहरण है।

और इसी लिए प्रयागराज-काशी से सभी लोगों को दुनिया चलाने के लिए धीरे-धीरे अपने सब गुण को बांटने और शक्ति देने जाना पड़ा और जाना पड़ता भी है भिन्न-भिन्न वैश्विक भागों में। क्योंकि किशी एक के गुण से यह संसार नहीं चलना था। और इस घुमक्कडी की सुरुआत सप्तर्षियों में तमस/क्षत्रिय गुण  की सर्वाधिक्ता वाले विश्वामित्र/विश्वरथ(जिनका रथ पूरे विश्व में भ्रमण करता था)/कौशिक किये थे गौतम, वशिष्ठ, कश्यप, अंगिरस/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय, विश्वामित्र/विश्वरथ/कौशिक। और इसीलिये कहता हूँ की सभी क्षत्रियों को और वैश्यों वे हिन्दू के रूप में हों या अन्य धर्म के मतावलम्बियों के रूप में उनको शेष दुनिया अपने जिम्मे ले लेना चाहिए पर कम से कम भारत में ब्राह्मणों का संरक्षण करना चाहिए जैसा की मेरे मामा का गाँव क्षत्रिय द्वारा दान में मिला था और मेरे पांच गाँव एक मुस्लिम जागीरदार (कदाचिद् पूर्व में क्षत्रिय) द्वारा दान में मिला था जो ब्राह्मण संरक्षण का श्रेष्ठतम उदाहरण है।  https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur
https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur

मै भी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण का नाती था लेकिन कोई मुझे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण तुल्य भी नहीं माना सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण की बात तो बहुत दूर मै एक सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय का पात्र ही अदा करने को बाध्य हुआ इस जगत में चाहे अनचाहे भी। अतः मै कैसे मान लू की बेटा पिता के पक्ष का नहीं होता। मई बता दूँ की मेरे सामने परिस्थिति मेरे पहचान की समयानुसार आती रही पर मैं न सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण जैसा व्यवहार कर पाया और न समाज ने उतना महत्त्व और सम्मान दिया। अतः आप लोगों से भी मेरा कहना है की जो नाम आप रखते हैं, जिस जाती और धर्म से है और जहां रहते है, जिस नक्षत्र में जन्म लेते हैं, जिस दिन जन्म लेते है, जिसका खाते हैं, जो व्यव्शाय करते है और जैसा आचरण करते है और जैसा आनुवंशिक गुण आप को मिला है वह आप को समय आने पर अपना असर दिखाता है अलग अलग परिस्थिति में।

मै भी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण का नाती था लेकिन कोई मुझे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण तुल्य भी नहीं माना सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण की बात तो बहुत दूर मै एक सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय का पात्र ही अदा करने को बाध्य हुआ इस जगत में चाहे अनचाहे भी। अतः मै कैसे मान लू की बेटा पिता के पक्ष का नहीं होता। मई बता दूँ की मेरे सामने परिस्थिति मेरे पहचान की समयानुसार आती रही पर मैं न सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण जैसा व्यवहार कर पाया और न समाज ने उतना महत्त्व और सम्मान दिया। अतः आप लोगों से भी मेरा कहना है की जो नाम आप रखते हैं, जिस जाती और धर्म से है और जहां रहते है, जिस नक्षत्र में जन्म लेते हैं, जिस दिन जन्म लेते है, जिसका खाते हैं, जो व्यव्शाय करते है और जैसा आचरण करते है और जैसा आनुवंशिक गुण आप को मिला है वह आप को समय आने पर अपना असर दिखाता है अलग अलग परिस्थिति में।  

मुसलमान(मुसल्लम ईमान)/इस्लाम आप को सच्चाई बता सकता है और ईसाई/क्रिश्चिएनिटी आप को पनाह दे सकता है पर दुबारा इस दुनिया को जिंदगी मतलब आप के दोबारा जिंदगी की सुरुआत को रफ्तार केवल एक सनातन ब्राह्मण/सनातन हिन्दू ही दे सकता है केंद्र बिंदु बनकर। तो अब इस पूरी दुनिया को जिंदगी की रफ्तार पुनः मिल गयी है| इसे एक बहुत बड़े संभावित विनाश को टालते हुए संरक्षण की नीति बनाते हुए महापरिवर्तन की शक्ल को दे कर। और इस महा परिवर्तन के बाद इस दुनिया में एक सच्चा हिन्दू, सच्चा मुसलमान और सच्चा ईसाई और इनके संगत संघटक पंथ और समुदाय सदा-सदा सुरक्षित महसूस करेंगे।

मुसलमान(मुसल्लम ईमान)/इस्लाम आप को सच्चाई बता सकता है और ईसाई/क्रिश्चिएनिटी आप को पनाह दे सकता है पर दुबारा इस दुनिया को जिंदगी मतलब आप के दोबारा जिंदगी की सुरुआत को रफ्तार केवल एक सनातन ब्राह्मण/सनातन हिन्दू ही दे सकता है केंद्र बिंदु बनकर।  तो अब इस पूरी दुनिया को जिंदगी की रफ्तार पुनः मिल गयी है| इसे एक बहुत बड़े संभावित विनाश को टालते हुए संरक्षण की नीति बनाते हुए महापरिवर्तन की शक्ल को दे कर। और इस महा परिवर्तन के बाद इस दुनिया में एक सच्चा हिन्दू, सच्चा मुसलमान और सच्चा ईसाई और इनके संगत संघटक पंथ और समुदाय सदा-सदा सुरक्षित महसूस करेंगे।  

मेरा सिद्धांत है की मै उस दरवाजे पर नहीं जाता जहाँ मेरा अधिकार नहीं बनाता ।>>>>>>>>>>>>>स्वयं विष्णु अवतार सशरीर परमब्रह्म भगवान श्रीराम की समय सीमा तय करने स्वयं काल मिलाने आया था और उसी समय महाकाल के अवतार अत्रिपुत्र दुर्वाशा(कृष्णात्रेय) भी आ गए तो भगवान श्रीराम जैसे कालजयी लोगों की प्रतिभा(मेरिट) भी काल को नहीं मिटा सकी और उसी तरह स्वयं विष्णु अवतार सशरीर परमब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण भी महाकाल के अवतार अत्रिपुत्र दुर्वाशा(कृष्णात्रेय) के श्राप के माध्यम से काल पर विजय नहीं पा सके और इन मात्र दो विष्णु अवतार जो सशरीर परमब्रह्म हुए सृस्टि के प्रारम्भ से लेकर आज तक की प्रतिभा(मेरिट) भी काल को नहीं मिटा सकी तो किशी सशरीर मानव की क्या अवकात जो काल को मिटा पाये? अतः मेरे वरिष्ठता और कनिष्ठता के सम्बन्ध में इस दुनिया के सर्वोच्च न्यायलय का निर्णय मेरे पक्ष में हो चुका है प्राकृतिक रूप से काल/समय की सत्ता को सर्वोच्च सत्ता मानते हुए और अब इसके सम्बन्ध में निर्णय प्रयागराज न्यायालय को करना है। और परोक्ष चुनौती को स्वीकार करते हुए इसे प्रयागराज न्यायलय तक चुनौती के रूप में पहुचाना ही मेरी विजय थी बाकी प्रयागराज न्यायलय की महिमा जाने इस दुनिया के सर्वोच्च न्यायलय के मेरे पक्ष में दिए निर्णय के प्रति उसका क्या नजरिया है? मेरा सिद्धांत है की मै उस दरवाजे पर नहीं जाता जहाँ मेरा अधिकार नहीं बनाता

मेरा सिद्धांत है की मै उस दरवाजे पर नहीं जाता जहाँ मेरा अधिकार नहीं बनाता ।>>>>>>>>>>>>>स्वयं विष्णु अवतार सशरीर परमब्रह्म भगवान श्रीराम की समय सीमा तय करने स्वयं काल मिलाने आया था और उसी समय महाकाल के अवतार अत्रिपुत्र दुर्वाशा(कृष्णात्रेय) भी आ गए तो भगवान श्रीराम जैसे कालजयी लोगों की प्रतिभा(मेरिट) भी काल को नहीं मिटा सकी और उसी तरह स्वयं विष्णु अवतार सशरीर परमब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण भी महाकाल के अवतार अत्रिपुत्र दुर्वाशा(कृष्णात्रेय) के श्राप के माध्यम से काल पर विजय नहीं पा सके और इन मात्र दो विष्णु अवतार जो सशरीर परमब्रह्म हुए सृस्टि के प्रारम्भ से लेकर आज तक की प्रतिभा(मेरिट) भी काल को नहीं मिटा सकी तो किशी सशरीर मानव की क्या अवकात जो काल को मिटा पाये? अतः मेरे वरिष्ठता और कनिष्ठता के सम्बन्ध में इस दुनिया के सर्वोच्च न्यायलय का निर्णय मेरे पक्ष में हो चुका है प्राकृतिक रूप से काल/समय की सत्ता को सर्वोच्च सत्ता मानते हुए और अब इसके सम्बन्ध में निर्णय प्रयागराज न्यायालय को करना है। और परोक्ष चुनौती को स्वीकार करते हुए इसे प्रयागराज न्यायलय तक चुनौती के रूप में पहुचाना ही मेरी विजय थी बाकी प्रयागराज न्यायलय की महिमा जाने इस दुनिया के सर्वोच्च न्यायलय के मेरे पक्ष में दिए निर्णय के प्रति उसका क्या नजरिया है? मेरा सिद्धांत है की मै उस दरवाजे पर नहीं जाता जहाँ मेरा अधिकार नहीं बनाता ।https://en.wikipedia.org/wiki/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

देश के 80 प्रतिसत किसान की जोत सीमा इतनी कम है की उनको खेती और उससे सम्बंधित देख रेख और पशु पालन में वार्षिक औसत कार्य समय के अनुसार एक मजदूर से ज्यादा समय तक कार्य करना पड़ता है तथा इसके साथ खेती की पूंजी डूबने का जोखिम और मानसिक दबाव ऊपर से रहता है। जबकि दैनिक मजदूर पारिश्रमिक पाकर हर चिंता से मुक्त रहता है उसे फसल की बर्बादी से कुछ नहीं लेना-देना रहता है। केवल वह मूल्य वृद्धि की शंका से ही व्यथित होता है अगर फल वर्बाद हुई किसानों की तो क्योंकि उसे इसे क्रय करना पड़ता है जबकि किसान की दुनिया उजड़ जाती है अगर रबी या खरीफ या जायद की एक भी फसल बर्बाद हुई।

देश के 80 प्रतिसत किसान की जोत सीमा इतनी कम है की उनको खेती और उससे सम्बंधित देख रेख और पशु पालन में वार्षिक औसत कार्य समय के अनुसार एक मजदूर से ज्यादा समय तक कार्य करना पड़ता है तथा इसके साथ खेती की पूंजी डूबने का जोखिम और मानसिक दबाव ऊपर से रहता है। जबकि दैनिक मजदूर पारिश्रमिक पाकर हर चिंता से मुक्त रहता है उसे फसल की बर्बादी से कुछ नहीं लेना-देना रहता है। केवल वह मूल्य वृद्धि की शंका से ही व्यथित होता है अगर फल वर्बाद हुई किसानों की तो क्योंकि उसे इसे क्रय करना पड़ता है जबकि किसान की दुनिया उजड़ जाती है अगर रबी या खरीफ या जायद की एक भी फसल बर्बाद हुई।

अगर पूरे विश्व में नहीं तो कम से कम भारत में अब गोरे और काले की राजनीती अवस्य बंद होनी चाहिए क्योंकि भारत में दोनों का रूप, कद-काठी और नाक नक्स उत्तर से लेकर दक्षिण तक एक जैसी होती है जब की जिन देशों में रंग भेद है वहां शारीरिक बनावट, रूप, कद-काठी और नाक नक्स और रंग दोनों में व्युत्क्रम/विपरीत(एकदम अलग) है। अतः वे जेनिटिकल एक पिता की संतान नहीं हो सकते पर हमारे यहां सब कुछ एक है पर रंग में किशी-किशी के थोड़ा अंतर हो जाता है और वे एक ही पिता की संतान पूर्ण रूप से जेनेटिकल हो सकते है।>>>>>>>>>>>> जब किशी को सुरक्षा चाहिए और जान पहचान की बन आती है तो दक्षिण वालों(कर्णाटक /भारतीय विज्ञान संस्थान वालों) के अनुसार नारायणन जी, सिम्हाद्री जी और कलाम जी का वंसज हो जाता है और उत्तर वालों (प्रयागराज/प्रयागराज विश्वविद्यालय वालों) के अनुसार कैलाशनाथ उत्तम का पुत्र हो जाता है फिर भी मै मान लेता हूँ की इनका पुत्र गया तो क्या ये लोग सनातन ब्राह्मण पुत्र स्वयं हैं जो की इनका पुत्र सनातन ब्राह्मण के तुल्य हो जायेगा। इसीलिये कार्य वही कीजिये जिसमे अंत तक आप अपनी क्षमता अनुसार और स्वयं के बल पर सही और सक्षम साबित हों। वैसे किशी को गलत तरीके से किशी और का वंसज बताकर महिमा मंडित करने का और दूसरे को नियंत्रित करने और गलत साबित करने का यह प्रयास या तरीका ठीक नहीं। किशी को नाराज नहीं होना चाहिए क्योंकि ये सनातन ब्राह्मण आज भी अनारक्षित है और अल्पसंख्यक में भी नहीं आते हैं और त्याग पूर्ण जीवन बिता रहे हैं क्षमतावान होते हुए भी अगर वे वास्तविक ब्राह्मण शब्द की सीमा में आते हैं। ऐसा नहीं की कोई भी नहीं आता वरन बहुसंख्यक ब्राह्मण वास्तविक ब्राह्मण शब्द की सीमा में आते हैं और कानूनन तो सभी ब्राह्मण वास्तविक ब्राह्मण की सीमा में आते हैं क्योंकि सरकार की तरफ से इनसे लगभग हर शिक्षा में प्रवेश हेतु आवेदन पत्र पर और नौकरी हेतु आवेदन पत्र पर जो इनकी जाती पूँछी जाती है। उससे भी ज्यादा दिक्कत तब है जब वह ब्राह्मण गोरा हो जाय जिससे कुछ तथाकथित तमिल भाई रास्ता भी उल्टे दिशा में बता देते हैं जबकि सांवला/श्याम रंग का होने पर वही तमिल भाई लगभग सही रास्ता बताते हैं। ऐसा ही उत्तर भारत में एक पार्टी और समुदाय विशेष के लोग है जो अपने घर में ही गोर लोगों से खफा होने के नाते गोर रंग के ब्राह्मणों का भी परोक्ष विरोध करते है। अगर पूरे विश्व में नहीं तो कम से कम भारत में अब गोरे और काले की राजनीती अवस्य बंद होनी चाहिए क्योंकि भारत में दोनों का रूप, कद-काठी और नाक नक्स उत्तर से लेकर दक्षिण तक एक जैसी होती है जब की जिन देशों में रंग भेद है वहां शारीरिक बनावट, रूप, कद-काठी और नाक नक्स और रंग दोनों में व्युत्क्रम/विपरीत(एकदम अलग) है। अतः वे जेनिटिकल एक पिता की संतान नहीं हो सकते पर हमारे यहां सब कुछ एक है पर रंग में किशी-किशी के थोड़ा अंतर हो जाता है और वे एक ही पिता की संतान पूर्ण रूप से जेनेटिकल हो सकते है।



अगर पूरे विश्व में नहीं तो कम से कम भारत में अब गोरे और काले की राजनीती अवस्य बंद होनी चाहिए क्योंकि भारत में दोनों का रूप, कद-काठी और नाक नक्स उत्तर से लेकर दक्षिण तक एक जैसी होती है जब की जिन देशों में रंग भेद है वहां शारीरिक बनावट, रूप, कद-काठी और नाक नक्स और रंग दोनों में व्युत्क्रम/विपरीत(एकदम अलग) है। अतः वे जेनिटिकल एक पिता की संतान नहीं हो सकते पर हमारे यहां सब कुछ एक है पर रंग में किशी-किशी के थोड़ा अंतर हो जाता है और वे एक ही पिता की संतान पूर्ण रूप से जेनेटिकल हो सकते है।>>>>>>>>>>>> जब किशी को सुरक्षा चाहिए और जान पहचान की बन आती है तो दक्षिण वालों(कर्णाटक /भारतीय विज्ञान संस्थान वालों) के अनुसार नारायणन जी, सिम्हाद्री जी और कलाम जी का वंसज हो जाता है और उत्तर वालों (प्रयागराज/प्रयागराज विश्वविद्यालय वालों) के अनुसार कैलाशनाथ उत्तम का पुत्र हो जाता है फिर भी मै मान लेता हूँ की इनका पुत्र गया तो क्या ये लोग सनातन ब्राह्मण पुत्र स्वयं हैं जो की इनका पुत्र सनातन ब्राह्मण के तुल्य हो जायेगा। इसीलिये कार्य वही कीजिये जिसमे अंत तक आप अपनी क्षमता अनुसार और स्वयं के बल पर सही और सक्षम साबित हों। वैसे किशी को गलत तरीके से किशी और का वंसज बताकर महिमा मंडित करने का और दूसरे को नियंत्रित करने और गलत साबित करने का यह प्रयास या तरीका ठीक नहीं। किशी को नाराज नहीं होना चाहिए क्योंकि ये सनातन ब्राह्मण आज भी अनारक्षित है और अल्पसंख्यक में भी नहीं आते हैं और त्याग पूर्ण जीवन बिता रहे हैं क्षमतावान होते हुए भी अगर वे वास्तविक ब्राह्मण शब्द की सीमा में आते हैं। ऐसा नहीं की कोई भी नहीं आता वरन बहुसंख्यक ब्राह्मण वास्तविक ब्राह्मण शब्द की सीमा में आते हैं और कानूनन तो सभी ब्राह्मण वास्तविक ब्राह्मण की सीमा में आते हैं क्योंकि सरकार की तरफ से इनसे लगभग हर शिक्षा में प्रवेश हेतु आवेदन पत्र पर और नौकरी हेतु आवेदन पत्र पर जो इनकी जाती पूँछी जाती है। उससे भी ज्यादा दिक्कत तब है जब वह ब्राह्मण गोरा हो जाय जिससे कुछ तथाकथित तमिल भाई रास्ता भी उल्टे दिशा में बता देते हैं जबकि सांवला/श्याम रंग का होने पर वही तमिल भाई लगभग सही रास्ता बताते हैं। ऐसा ही उत्तर भारत में एक पार्टी और समुदाय विशेष के लोग है जो अपने घर में ही गोर लोगों से खफा होने के नाते गोर रंग के ब्राह्मणों का भी परोक्ष विरोध करते है। अगर पूरे विश्व में नहीं तो कम से कम भारत में अब गोरे और काले की राजनीती अवस्य बंद होनी चाहिए क्योंकि भारत में दोनों का रूप, कद-काठी और नाक नक्स उत्तर से लेकर दक्षिण तक एक जैसी होती है जब की जिन देशों में रंग भेद है वहां शारीरिक बनावट, रूप, कद-काठी और नाक नक्स और रंग दोनों में व्युत्क्रम/विपरीत(एकदम अलग) है। अतः वे जेनिटिकल एक पिता की संतान नहीं हो सकते पर हमारे यहां सब कुछ एक है पर रंग में किशी-किशी के थोड़ा अंतर हो जाता है और वे एक ही पिता की संतान पूर्ण रूप से जेनेटिकल हो सकते है।

Friday, June 12, 2015

अपने मानव जीवन में एक ही इक्षा है की अगले मानव जीवन में सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मणों के गाँव बिशुनपुर, जौनपुर-223103 के रामानंद, रामानुज, श्रीनिवाश खानदान में रामानंद की उसी जमीन पर जिस पर की मेरे नाना श्री रमानाथ/राम प्रशाद मिश्रा का मकान है पर वास करने वाले परिवार में मेरा जन्म हो जहां की मैंने अपने बचपन और यौवन के जीवन का अधिकांश समय गुजारा है क्योंकि यह सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण राम प्रशाद पाण्डेय परिवार का पुत्र सनातन वशिष्ठ गोत्रियो ब्राह्मणो के घर(भर्रारी-जौनपुर-223103) जन्म और बचपन का कुछ समय गुजार चुका है जिन लोगों का ननिहाल स्वयं बिशुनपुर के रामानंद खानदान में ही है। मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा जी, श्री श्रीधर मिश्र(विष्णु) का एक बार कहना था की तुम तो यही के ही हो पर मामा जी मुझे इसी जमीन पर वाशिंदे का पुत्र बनाना है गौतम ग्रोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण जो बनकर सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मणो में स्थान जो पाना रह गया है जिस परिवार से श्रेष्ठ ब्राह्मण सदा-सदा के जीवन में मैंने नहीं देखा यह बात है की दिखावटी में बहुत से लोग श्रेष्ठ ब्राह्मण होने का ढोंग रचते हैं मतलब जितना सामान्य जीवन में ब्राह्मणोचित होते नहीं उससे ज्यादा किशी समय विशेष पर दिखावा करने है परमश्रेष्ठ ब्राह्मण होने का। मई जनता हूँ की कश्यप वरिष्ठ पर उनसे श्रेष्ठ "सर्वश्रेष्ठ गुरु" वशिष्ठ और उनसे भी श्रेष्ठ "न्याय दर्शन के प्रणेता" गौतम है जो श्रेष्ठता में दुनिया के सब तरह के पराक्रम और वैभव मौजूद होने के कश्यप को तीसरे स्थान पर भेज देते हैं गुरु गुण और मानवता में सर्श्रेष्ठ होने की वजह से। अतः कश्यप के लिए वशिष्ठ और गौतम किशी त्रिदेव(ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से किशी एक ) से कम नहीं। मैंने अपनी सहन शक्ति का विस्तार करते हुए भारतीय संस्कृति के प्रभाव को कम करने हेतु और नीचा दिखाने हेतु सर्व समर्थ शक्तिओं और उनकी साजिशों का सामना किया है जो दिखाई नहीं देता क्योंकि उसमे अपने लोग ही उन शक्तियों के माध्यम होते हैं पर इस दौरान मैंने ब्राह्मण धर्म और ब्रह्मचर्य धर्म दोनों का कही भी उल्लंघन नहीं किया है मतलब बचपन से विवाह तक अखंड ब्रह्मचारी और विवाह से आज तक "जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी" रहा हूँ हनुमान जी की तरह जिनकी की एक पत्नी थी गुरु सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला जिनसे एक पुत्र थे मकरध्वज। जो प्रयागराज वाशी मुझे मद्यप, सुरा-सुंदरी भोगी और दरिद्र तथा पागल कह रहे थे उनके पास जो प्रमाण हो सामने लाये मेर विरुद्ध मई सहर्ष सामना करूंगा और आप को समुचित उत्तर दूंगा। मै तथाकथित सामाजिक न्याय वादियों को भ्रमित भी कर सकता हूँ मतलन मई दुनिया का सबसे अमीर भी हूँ और सबसे गरीब जिसने पूरी दुनिया को जीवन दान दिया है अपनी सहन सीलता से मतलब दुनिया में कोई मानव ही नहीं बचता या बचेगा तो आप अपना तथाकथित सामाजिक न्याय कहाँ लागू करेंगे और ये आप के दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र सब व्यर्थ साबित होंगे। वैसे भी मई किशी गांव का ग्रामीणों की दृष्टि से सबसे अमीर हूँ जमीनी जायदाद में तो मई दरिद्र तो सभी ग्रामीण दरिद्र। आप गरीब कह सकते हैं दुनिया के किशी भी बादशाह को भी पर दरिद्र नहीं क्योंकि परम सत्ता के आगे सब गरीब हैं। और मई गरीब से नहीं दरिद्र कहे जाने से आहात था। यहां आप एक और बात पर ध्यान दीजिये सूर्य पुत्री यमुना भी थी जिनको तनुजा भी कहते है इसी लिए और वे पटरानी है भगवान श्रीकृष्ण की इस प्रकार चंद्रवंशी श्रीकृष्ण का सम्बन्ध सूर्यवंश और हनुमान दोनों से हो जाता है। तो भगवान श्रीकृष्ण और हनुमान जी स्वामी और भक्त के अलावा शाढ़ू भाई भी हो गए और सूर्यदेव मतलब सूर्यवंश से भी सम्बंधित हो गए।

अपने मानव जीवन में एक ही इक्षा है की अगले मानव जीवन में सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मणों के गाँव बिशुनपुर, जौनपुर-223103 के रामानंद, रामानुज, श्रीनिवाश खानदान में रामानंद की उसी जमीन पर जिस पर की मेरे नाना श्री रमानाथ/राम प्रशाद मिश्रा का मकान है पर वास करने वाले परिवार में मेरा जन्म हो जहां की मैंने अपने बचपन और यौवन के जीवन का अधिकांश समय गुजारा है क्योंकि यह सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण राम प्रशाद पाण्डेय परिवार का पुत्र सनातन वशिष्ठ गोत्रियो ब्राह्मणो के घर(भर्रारी-जौनपुर-223103) जन्म और बचपन का कुछ समय गुजार चुका है जिन लोगों का ननिहाल स्वयं बिशुनपुर के रामानंद खानदान में ही है। मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा जी, श्री श्रीधर मिश्र(विष्णु) का एक बार कहना था की तुम तो यही के ही हो पर मामा जी मुझे इसी जमीन पर वाशिंदे का पुत्र बनाना है गौतम ग्रोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण जो बनकर सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मणो में स्थान जो पाना रह गया है जिस परिवार से श्रेष्ठ ब्राह्मण सदा-सदा के जीवन में मैंने नहीं देखा यह बात है की दिखावटी में बहुत से लोग श्रेष्ठ ब्राह्मण होने का ढोंग रचते हैं मतलब जितना सामान्य जीवन में ब्राह्मणोचित होते नहीं उससे ज्यादा किशी समय विशेष पर दिखावा करने है परमश्रेष्ठ ब्राह्मण होने का। मई जनता हूँ की कश्यप वरिष्ठ पर उनसे श्रेष्ठ "सर्वश्रेष्ठ गुरु" वशिष्ठ और उनसे भी श्रेष्ठ "न्याय दर्शन के प्रणेता" गौतम है जो श्रेष्ठता में दुनिया के सब तरह के पराक्रम और वैभव मौजूद होने के कश्यप को तीसरे स्थान पर भेज देते हैं गुरु गुण और मानवता में सर्श्रेष्ठ होने की वजह से। अतः कश्यप के लिए वशिष्ठ और गौतम किशी त्रिदेव(ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से किशी एक ) से कम नहीं। मैंने अपनी सहन शक्ति का विस्तार करते हुए भारतीय संस्कृति के प्रभाव को कम करने हेतु और नीचा दिखाने हेतु सर्व समर्थ शक्तिओं और उनकी साजिशों का सामना किया है जो दिखाई नहीं देता क्योंकि उसमे अपने लोग ही उन शक्तियों के माध्यम होते हैं पर इस दौरान मैंने ब्राह्मण धर्म और ब्रह्मचर्य धर्म दोनों का कही भी उल्लंघन नहीं किया है मतलब बचपन से विवाह तक अखंड ब्रह्मचारी और विवाह से आज तक "जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी" रहा हूँ हनुमान जी की तरह जिनकी की एक पत्नी थी गुरु सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला जिनसे एक पुत्र थे मकरध्वज। जो प्रयागराज वाशी मुझे मद्यप, सुरा-सुंदरी भोगी और दरिद्र तथा पागल कह रहे थे उनके पास जो प्रमाण हो सामने लाये मेर विरुद्ध मई सहर्ष सामना करूंगा और आप को समुचित उत्तर दूंगा। मै तथाकथित सामाजिक न्याय वादियों को भ्रमित भी कर सकता हूँ मतलन मई दुनिया का सबसे अमीर भी हूँ और सबसे गरीब जिसने पूरी दुनिया को जीवन दान दिया है अपनी सहन सीलता से मतलब दुनिया में कोई मानव ही नहीं बचता या बचेगा तो आप अपना तथाकथित सामाजिक न्याय कहाँ लागू करेंगे और ये आप के दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र सब व्यर्थ साबित होंगे। वैसे भी मई किशी गांव का ग्रामीणों की दृष्टि से सबसे अमीर हूँ जमीनी जायदाद में तो मई दरिद्र तो सभी ग्रामीण दरिद्र। आप गरीब कह सकते हैं दुनिया के किशी भी बादशाह को भी पर दरिद्र नहीं क्योंकि परम सत्ता के आगे सब गरीब हैं। और मई गरीब से नहीं दरिद्र कहे जाने से आहात था। यहां आप एक और बात पर ध्यान दीजिये सूर्य पुत्री यमुना भी थी जिनको तनुजा भी कहते है इसी लिए और वे पटरानी है भगवान श्रीकृष्ण की इस प्रकार चंद्रवंशी श्रीकृष्ण का सम्बन्ध सूर्यवंश और हनुमान दोनों से हो जाता है। तो भगवान श्रीकृष्ण और हनुमान जी स्वामी और भक्त के अलावा शाढ़ू भाई भी हो गए और सूर्यदेव मतलब सूर्यवंश से भी सम्बंधित हो गए।
Note:- If one take benefit of any scheme and arrangement for his progress then he should only use it for his progress not for defaming and demoralized others and also he must not become the weapon of the so called ant social and anti national elements. I agree the people in the back side should have some privilege to come in front line but some people or group of people from the needy person are becoming the hand of anti social and anti national elements this derails the social and moral values of the person who got affected by these persons or group.

Wednesday, June 10, 2015

"विश्व एक गाँव" तो हो गया पर गाँव ही उजड़ गए मतलब उसमे वसने वाले जीवंत लोगों जैसे लोग नहीं बचे हैं या बहुत गिने चुने लोग बचे है वस ये गाँव तो एक आस्थावान दर्शनीय स्थल बन गए हैं जो हम सबके आनुवांशिक पहचान और अन्न दाता होने के कारन शेष हैं। मेरे मामा जी के गाँव बिशुनपुर, जौनपुर में मेरे नाना श्रद्धेय श्री रमानाथ मिश्र और पंडित राम निहोर मिश्र जी जैसे जीवट और स्पस्टवादी लोग नहीं रहे जो नवयुवको को भारतीय संस्कृति के प्रति जबाबदेव आचरण वाला बनने को प्रेरित कर सकें; और मेरे गाँव रामापुर आज़मगढ़ में मेरे घराने के बाबा द्वय श्रद्धेय श्री आद्याशंकर पाण्डेय और श्री सुभाष चंद पाण्डेय जी जैसे लोग नहीं रहे हो अपनी बात के पक्के इतने हों की जो ठान लिए उसके लिए सामाजिक रूप से और कानूनन कितना भी प्रयास करना हो पीछे हटने वाले नहीं। यहां मै इन दो गांव से वाहरी दुनिया के लिए गाँव से वाहर गए लोगों की नहीं वरन केवल ग्राम स्तर पर जीवन जी कर बाहर की दुनिया में जीने वाले लोगों को जीवन का सन्देश देने वाले सिद्ध पुरुष की बात किया हूँ जिनको की लोग उनके गुण विशेष के नाते याद करते है पर हाँ ये मेरे सन्निकट के हैं लेकिन और बहुत से नाम ऐसे हैं जिनको हम लोग याद करते है जिनसे आचरण और व्यवहार से जाकर हम मानवता का पाठ सीखते थे उनके बीच आपस में कितना भी मतभेद रहे हों पर मानवीय मूल्य उनमे हमेशस संचित रहे है जिनको विशेष सामाजिक सामूहिक कार्य में प्रत्यक्ष रूप से देख सकते थे।------ अतः आइये हम इस " विश्व एक गाँव" होने से वीरान इन गाँवों को पुनः इस "विश्व एक गाँव" अवस्था में ही जीवंत करने का संकल्प ले और इनको भी भौतिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करें जिससे यहां से पलायन बंद हो। जय हिन्द।

"विश्व एक गाँव" तो हो गया पर गाँव ही उजड़ गए मतलब उसमे वसने वाले जीवंत लोगों जैसे लोग नहीं बचे हैं या बहुत गिने चुने लोग बचे है वस ये गाँव तो एक आस्थावान दर्शनीय स्थल बन गए हैं जो हम सबके आनुवांशिक पहचान और अन्न दाता होने के कारन शेष हैं। मेरे मामा जी के गाँव बिशुनपुर, जौनपुर में मेरे नाना श्रद्धेय श्री रमानाथ मिश्र और पंडित राम निहोर मिश्र जी जैसे जीवट और स्पस्टवादी लोग नहीं रहे जो नवयुवको को भारतीय संस्कृति के प्रति जबाबदेव आचरण वाला बनने को प्रेरित कर सकें; और मेरे गाँव रामापुर आज़मगढ़ में मेरे घराने के बाबा द्वय श्रद्धेय श्री आद्याशंकर पाण्डेय और श्री सुभाष चंद पाण्डेय जी जैसे लोग नहीं रहे हो अपनी बात के पक्के इतने हों की जो ठान लिए उसके लिए सामाजिक रूप से और कानूनन कितना भी प्रयास करना हो पीछे हटने वाले नहीं। यहां मै इन दो गांव से वाहरी दुनिया के लिए गाँव से वाहर गए लोगों की नहीं वरन केवल ग्राम स्तर पर जीवन जी कर बाहर की दुनिया में जीने वाले लोगों को जीवन का सन्देश देने वाले सिद्ध पुरुष की बात किया हूँ जिनको की लोग उनके गुण विशेष के नाते याद करते है पर हाँ ये मेरे सन्निकट के हैं लेकिन और बहुत से नाम ऐसे हैं जिनको हम लोग याद करते है जिनसे आचरण और व्यवहार से जाकर हम मानवता का पाठ सीखते थे उनके बीच आपस में कितना भी मतभेद रहे हों पर मानवीय मूल्य उनमे हमेशस संचित रहे है जिनको विशेष सामाजिक सामूहिक कार्य में प्रत्यक्ष रूप से देख सकते थे।------ अतः आइये हम इस " विश्व एक गाँव" होने से वीरान इन गाँवों को पुनः इस "विश्व एक गाँव" अवस्था में ही जीवंत करने का संकल्प ले और इनको भी भौतिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करें जिससे यहां से पलायन बंद हो। जय हिन्द।

जब सम्पूर्ण विश्व एक गाँव हो गया है सार्वजनिक रूप से एक आम विश्व नागरिक के लिए भी तो मित्र एक दूसरे से लड़ाई किस बात की। मै तो दुनिया चलाने वालों का सहयोग कर रहा हूँ अपने स्वयं के लिए निर्धारित कार्य और निर्धारित प्रकृति को बनाये रख कर नहीं तो मई तो इतने सहज भाव से जीवन की नौटंकी को आम नागरिक के सामने रख देता की एक बहुत बड़ी अव्यवस्था व्याप्त हो जाती तो उससे मेरे अथाह ज्ञान, असीमित अनुभव और श्रेष्ठतम त्याग का और जीवन का क्या उपयोग होगा इस विश्व जन मानस के लिए। अतः आप सब लोगों से मेरी विनम्र प्रार्थना है की इस मानव जीवन को मानवता की राह पर सतत चलने देने के लिए सचेत हो अपनी तरफ से त्याग, तपस्या और बलिदान देते रहिये और फल को उस महाशक्ति शाली और महाऊर्जामयी परमब्रह्म छोड़ दीजिये।

जब सम्पूर्ण विश्व एक गाँव हो गया है सार्वजनिक रूप से एक आम विश्व नागरिक के लिए भी तो मित्र एक दूसरे से लड़ाई किस बात की। मै तो दुनिया चलाने वालों का सहयोग कर रहा हूँ अपने स्वयं के लिए निर्धारित कार्य और निर्धारित प्रकृति को बनाये रख कर नहीं तो मई तो इतने सहज भाव से जीवन की नौटंकी को आम नागरिक के सामने रख देता की एक बहुत बड़ी अव्यवस्था व्याप्त हो जाती तो उससे मेरे अथाह ज्ञान, असीमित अनुभव और श्रेष्ठतम त्याग का और जीवन का क्या उपयोग होगा इस विश्व जन मानस के लिए। अतः आप सब लोगों से मेरी विनम्र प्रार्थना है की इस मानव जीवन को मानवता की राह पर सतत चलने देने के लिए सचेत हो अपनी तरफ से त्याग, तपस्या और बलिदान देते रहिये और फल को उस महाशक्ति शाली और महाऊर्जामयी परमब्रह्म छोड़ दीजिये।

सनातन हिन्दू संस्कृति के अनुसार सूर्यवंश की सत्ता यदि कर्णाटक और तमिल में थी तो आंध्र में चन्द्रवंश(सूर्यवंश के सम्पूरक) की; तथा केरल, कोंकण, गोवा तथा वृहत्तर महारास्ट्र (जिसका विस्तार गुजरात के कुछ भाग तक था) में भृगुवंश/परशुराम की सत्ता थी दक्षिण भारत की दृस्टि से।[अस्त्र सस्त्र की शिक्षा की द्रिस्टी से भगवान शिव के शिष्य परशुराम अपने पिता जमदग्नि ऋषि की मृत्यु का बदला लेने का कार्य जारी रखने के कारन अपने बाबा भृगु ऋषि द्वारा अपने पिता के कार्य क्षेत्र जमदग्निपुर/जौनपुर(जिसे मुसलिम सत्ता के दौरान सिराजे हिन्द नाम से नवाजा गया था और आज भी संस्कृति और शिक्षा दोनों की दृस्टि से विश्व में सर्वोच्च स्थान रखता है) से सदा सदा के लिए निर्वाषित किये गए थे और सुदूर दक्षिण में केरल को अपना प्रथम ठिकाना बना ज्ञान और ध्यान की शिक्षा देने के साथ वहां से कोंकण होते हुए पुनः उत्तर तक अपना अस्त्र शास्त्र शिक्षा और प्रचार-प्रसार करते हुए युद्ध और जाती विशेष का दमन कर भूमि हड़प नीति जारी किये रहे और मनमुताबिक शासक बनाते रहे और उत्तरांचल/उत्तराखंड तक जाकर भी अस्त्र सस्त्र शिक्षा और दीक्षा देते रहे और वहां भी पुराना कार्य जारी रखे और अंत उनके काम से व्यथित हो कश्यप ऋषि ने उनसे यह कार्य छोड़ शान्ति हेतु दूर एकांत में जाने का निवेदन किये तो वे महेन्द्रगिरि पर्वत में गुम हो गए। परन्तु परशुराम विष्णु अवतार की सीमा तक ही सीमित रहे परमब्रह्म तक न जा सके थे अपने कार्य को संपादित करने हेतु अपने उग्र स्वभाव और तदानुसार अपने स्वभावानुसार जीवन से एक गृहस्थ जीवन हेतु मार्गदर्शन न दे पाने के अभाव में]।

सनातन हिन्दू संस्कृति के अनुसार सूर्यवंश की सत्ता यदि कर्णाटक और तमिल में थी तो आंध्र में चन्द्रवंश(सूर्यवंश के सम्पूरक) की; तथा केरल, कोंकण, गोवा तथा वृहत्तर महारास्ट्र (जिसका विस्तार गुजरात के कुछ भाग तक था) में भृगुवंश/परशुराम की सत्ता थी दक्षिण भारत की दृस्टि से।[अस्त्र सस्त्र की शिक्षा की द्रिस्टी से भगवान शिव के शिष्य परशुराम अपने पिता जमदग्नि ऋषि की मृत्यु का बदला लेने का कार्य  जारी रखने के कारन अपने बाबा भृगु ऋषि द्वारा अपने पिता के कार्य क्षेत्र जमदग्निपुर/जौनपुर(जिसे मुसलिम सत्ता के दौरान सिराजे हिन्द नाम से नवाजा गया था और आज भी संस्कृति और शिक्षा दोनों की दृस्टि से विश्व में सर्वोच्च स्थान रखता है) से सदा सदा के लिए निर्वाषित किये गए थे और सुदूर दक्षिण में केरल को अपना प्रथम ठिकाना बना ज्ञान और ध्यान की शिक्षा देने के साथ वहां से कोंकण होते हुए पुनः उत्तर तक अपना अस्त्र शास्त्र शिक्षा और प्रचार-प्रसार करते हुए युद्ध और जाती विशेष का दमन कर भूमि हड़प नीति जारी किये रहे और मनमुताबिक शासक बनाते रहे और उत्तरांचल/उत्तराखंड तक जाकर भी अस्त्र सस्त्र शिक्षा और दीक्षा देते रहे और वहां भी पुराना कार्य जारी रखे और अंत उनके काम से व्यथित हो कश्यप ऋषि ने उनसे यह कार्य छोड़ शान्ति हेतु दूर एकांत में जाने का निवेदन किये तो वे महेन्द्रगिरि पर्वत में गुम हो गए। परन्तु परशुराम विष्णु अवतार की सीमा तक ही सीमित रहे परमब्रह्म तक न जा सके थे अपने कार्य को संपादित करने हेतु अपने उग्र स्वभाव और तदानुसार अपने स्वभावानुसार जीवन से एक गृहस्थ जीवन हेतु मार्गदर्शन न दे पाने के अभाव में]।