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Friday, July 31, 2015

तो इस प्रकार श्रिष्टि के आज तक के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ प्रमदाचरण= प्रमद (सुन्दर) + आचरण( व्यवहार व् चरित्र) वाले केवल श्रीराम और श्रीकृष्ण हुए। अतः अगर हम उनके अनुयायी और उनके सामानांतर चलने वाले (क्रमसः इस्लाम और ईसाइयत के अनुयायी हैं) हैं तो कम से कम हम उच्च आचरण तो रखे।(इस बात को ध्यान में रखते हुए की दो सामानांतर रेखाओं में से अगर कोई भी टूटती है तो दूसरी अनियंत्रित हो जाती है और एक बात और इस्लाम और ईसाइयत जैसे द्वन्दात्मक विचार जो अपने उद्देश्य में किशी परिस्थिति विशेष में सही है सामान्य से अलग हो वे प्रयागराज में सप्तर्षि के मानव सभ्यता प्रारम्भ से रहे हैं जो यरूसलेम में जाकर पहले इस्लाम और फिर ईसाइयत जैसे नए धर्म/पंथ/सम्प्रदाय के रूप में मानव समाज के सामने आये।।>>>>>>>>> प्रमदाचरण= प्रमद (सुन्दर) + आचरण(व्यवहार व् चरित्र)। तो सर्वश्रेष्ठ प्रमदाचरण कौन हुआ आज तक के मानव इतिहास में सार्वजनिक जीवन में तो वह भगवान श्रीराम तथा उसके बाद भगवान श्रीकृष्ण(मानव जीवन के हर पहलू को देखते हुए जैसी जैसी परिस्थितिया उनके सामने बाल्यकाल से लेकर जरासंध द्वारा बंधक बनाये गए अनगिनत संतों और ब्राह्मणो की बलि न दे दी जाय श्रीकृष्ण के मथुरा पर अपना अधिकार न छोड़ने के बदले तो ऐसे में उनकी की रक्षा हेतु मथुरा छोड़ द्वारिका जाने तक और महाभारत काल तक आयी) हुए। श्रेष्ठ प्रमदाचरण शब्द से त्रिदेव में महादेव भी वंचित हो जाते है क्योंकि उनका रौद्र रूप और विशेष कर सती/उमा/पारवती के यज्ञ में भस्म हो जाने पर उनके हेतु विलाप में क्रोधित हो अपने दूत वीरभद्र को भेजकर काशी के ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र मतलब सती/उमा के पिता मतलब दक्ष प्रजापति का सिर कटवाना ऐसा प्रकरण अपने क्रोध को न रोक पाने और इस प्रकार व्यक्तिगत अपने जीवन से सम्बंधित हो जाने का प्रकरण व्यक्तिगत रूप से हो जाने के कारन तथा भक्त वत्सलता में सुर और असुर का ध्यान न करते हुए असुरों को भी अभय दान का बारम्बार कृत्य जिससे मानवता त्राहि माम कई बार कर चुका हो। तो और कौन हुआ त्रिदेव में श्रेष्ठ प्रमदाचरण वह हैं विष्णु जिन्होंने कभी भी न तो असुरों को अभयदान दिया और न उनका कभी पक्ष लिया और न कभी क्रोध वस कोई मर्यादा तोड़ी। ब्रह्मा जी क्यों नहीं श्रेष्ठ प्रमदाचरण की सीमा में आते तो यह उनका असुरों से भी अगाध प्रेम होना महादेव की तरह और उनके जीवन से सम्बंधित उनका अन्य आचरण उनको श्रेष्ठ प्रमदाचरण शब्द से बाहर कर देता है। फिर भी त्रिदेव जगत कल्याण हेतु समर्पित हैं इसलिए वे श्रेष्ठ प्रमदाचरण की श्रेणी में अपने आप आते है जिसमे की महादेव का रौद्र नटराज रूप अमानवीयता के चरम पर पहुँचजाने के परिणाम स्वरुप उनके द्वारा सृष्टि विनाश के बाद पुनः मानवतायुक्त सृष्टि रचना का कारक बनता है और ब्रह्मा का असुरों के प्रति भी प्रेम उनका अपना पुत्रों के प्रति समदर्शी आचरण की श्रेणी को दर्शाता है लेकिन उसका उद्देश्य असुरों द्वारा मानवता का विनाश नहीं रहता है। तो इस प्रकार श्रिष्टि के आज तक के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ प्रमदाचरण= प्रमद (सुन्दर) + आचरण( व्यवहार व् चरित्र) वाले केवल श्रीराम और श्रीकृष्ण हुए। अतः अगर हम उनके अनुयायी और उनके सामानांतर चलने वाले (क्रमसः इस्लाम और ईसाइयत के अनुयायी हैं) हैं तो कम से कम हम उच्च आचरण तो रखे।(इस बात को ध्यान में रखते हुए की दो सामानांतर रेखाओं में से अगर कोई भी टूटती है तो दूसरी अनियंत्रित हो जाती है और एक बात और इस्लाम और ईसाइयत जैसे द्वन्दात्मक विचार जो अपने उद्देश्य में किशी परिस्थिति विशेष में सही है सामान्य से अलग हो वे प्रयागराज में सप्तर्षि के मानव सभ्यता प्रारम्भ से रहे हैं जो यरूसलेम में जाकर पहले इस्लाम और फिर ईसाइयत जैसे नए धर्म/पंथ/सम्प्रदाय के रूप में मानव समाज के सामने आये।

तो इस प्रकार श्रिष्टि के आज तक के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ प्रमदाचरण= प्रमद (सुन्दर) + आचरण( व्यवहार व् चरित्र) वाले केवल श्रीराम और श्रीकृष्ण हुए। अतः अगर हम उनके अनुयायी और उनके सामानांतर चलने वाले (क्रमसः इस्लाम और ईसाइयत के अनुयायी हैं) हैं तो कम से कम हम उच्च आचरण तो रखे।(इस बात को ध्यान में रखते हुए की दो सामानांतर रेखाओं में से अगर कोई भी टूटती है तो दूसरी अनियंत्रित हो जाती है और एक बात और इस्लाम और ईसाइयत जैसे द्वन्दात्मक विचार जो अपने उद्देश्य में किशी परिस्थिति विशेष में सही है सामान्य से अलग हो वे प्रयागराज में सप्तर्षि के मानव सभ्यता प्रारम्भ से रहे हैं जो यरूसलेम में जाकर पहले इस्लाम और फिर ईसाइयत जैसे नए धर्म/पंथ/सम्प्रदाय के रूप में मानव समाज के सामने आये।।>>>>>>>>> प्रमदाचरण= प्रमद (सुन्दर) + आचरण(व्यवहार व् चरित्र)। तो सर्वश्रेष्ठ प्रमदाचरण कौन हुआ आज तक के मानव इतिहास में सार्वजनिक जीवन में तो वह भगवान श्रीराम तथा उसके बाद भगवान श्रीकृष्ण(मानव जीवन के हर पहलू को देखते हुए जैसी जैसी परिस्थितिया उनके सामने बाल्यकाल से लेकर जरासंध द्वारा बंधक बनाये गए अनगिनत संतों और ब्राह्मणो की बलि न दे दी जाय श्रीकृष्ण के मथुरा पर अपना अधिकार न छोड़ने के बदले तो ऐसे में उनकी की रक्षा हेतु मथुरा छोड़ द्वारिका जाने तक और महाभारत काल तक आयी) हुए। श्रेष्ठ प्रमदाचरण शब्द से त्रिदेव में महादेव भी वंचित हो जाते है क्योंकि उनका रौद्र रूप और विशेष कर सती/उमा/पारवती के यज्ञ में भस्म हो जाने पर उनके हेतु विलाप में क्रोधित हो अपने दूत वीरभद्र को भेजकर काशी के ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र मतलब सती/उमा के पिता मतलब दक्ष प्रजापति का सिर कटवाना ऐसा प्रकरण अपने क्रोध को न रोक पाने और इस प्रकार व्यक्तिगत अपने जीवन से सम्बंधित हो जाने का प्रकरण व्यक्तिगत रूप से हो जाने के कारन तथा भक्त वत्सलता में सुर और असुर का ध्यान न करते हुए असुरों को भी अभय दान का बारम्बार कृत्य जिससे मानवता त्राहि माम कई बार कर चुका हो।  तो और कौन हुआ त्रिदेव में श्रेष्ठ प्रमदाचरण वह हैं विष्णु जिन्होंने कभी भी न तो असुरों को अभयदान दिया और न उनका कभी पक्ष लिया और न कभी क्रोध वस कोई मर्यादा तोड़ी। ब्रह्मा जी क्यों नहीं श्रेष्ठ प्रमदाचरण की सीमा में आते तो यह उनका असुरों से भी अगाध प्रेम होना महादेव की तरह और उनके जीवन से सम्बंधित उनका अन्य आचरण उनको श्रेष्ठ प्रमदाचरण शब्द से बाहर कर देता है। फिर भी त्रिदेव जगत कल्याण हेतु समर्पित हैं इसलिए वे श्रेष्ठ प्रमदाचरण की श्रेणी में अपने आप आते है जिसमे की महादेव का रौद्र नटराज रूप अमानवीयता के चरम पर पहुँचजाने के परिणाम स्वरुप उनके द्वारा सृष्टि विनाश के बाद पुनः मानवतायुक्त सृष्टि रचना का कारक बनता है  और ब्रह्मा का असुरों के प्रति भी प्रेम उनका अपना पुत्रों के प्रति समदर्शी आचरण की श्रेणी को दर्शाता है लेकिन उसका उद्देश्य असुरों द्वारा मानवता का विनाश नहीं रहता है। तो इस प्रकार श्रिष्टि के आज तक के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ प्रमदाचरण= प्रमद (सुन्दर) + आचरण( व्यवहार व् चरित्र) वाले केवल श्रीराम और श्रीकृष्ण हुए। अतः अगर हम उनके अनुयायी और उनके सामानांतर चलने वाले (क्रमसः इस्लाम और ईसाइयत के अनुयायी हैं) हैं तो कम से कम हम उच्च आचरण तो रखे।(इस बात को ध्यान में रखते हुए की दो सामानांतर रेखाओं में से अगर कोई भी टूटती है तो दूसरी अनियंत्रित हो जाती है और एक बात और इस्लाम और ईसाइयत जैसे द्वन्दात्मक विचार जो अपने उद्देश्य में किशी परिस्थिति विशेष में सही है सामान्य से अलग हो वे प्रयागराज में सप्तर्षि के मानव सभ्यता प्रारम्भ से रहे हैं जो यरूसलेम में जाकर पहले इस्लाम और फिर ईसाइयत जैसे नए धर्म/पंथ/सम्प्रदाय के रूप में मानव समाज के सामने आये।

जहाँ श्रीराम(रघुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय) के गुरु जगतद्रस्ता वशिष्ठ जी थे बही श्रीकृष्ण(वृष्णिवंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय/कश्यप गोत्रीय) के गुरु संदीपन शांडिल्य मतलब शांडिल्य ऋषि की संतान (वशिष्ठ ऋषि की कश्मीर को मानव आवास योग्य बनाने वाले कश्यप ऋषि के कुल की कन्या से जन्म ली हुई वह संतान हैं जो वर्तमान आज़ाद कश्मीर में जन्म लिए थे)। शांडिल्य ऋषि का आश्रम शारदावन, कश्मीर बोलेयर घाटी में स्थित है। जो आधुनिक शारदा कस्बा नाम से जाना जाता है जो किसनगंगा नदी के किनारे आज़ाद कश्मीर में है। शांडिल्य= शान + दिलम = पूर्ण + चन्द्रमा=पूर्ण चन्द्र= पूर्ण चन्द्र के पुजारी या पूर्ण चन्द्र के पुजारी। .

जहाँ श्रीराम(रघुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय) के गुरु जगतद्रस्ता वशिष्ठ जी थे बही श्रीकृष्ण(वृष्णिवंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय/कश्यप गोत्रीय) के गुरु संदीपन शांडिल्य मतलब शांडिल्य ऋषि की संतान (वशिष्ठ ऋषि की कश्मीर को मानव आवास योग्य बनाने वाले कश्यप ऋषि के कुल की कन्या से जन्म ली हुई वह संतान हैं जो वर्तमान आज़ाद कश्मीर में जन्म लिए थे)।  शांडिल्य ऋषि का आश्रम शारदावन, कश्मीर बोलेयर घाटी में स्थित है। जो आधुनिक शारदा कस्बा नाम से जाना जाता है जो किसनगंगा नदी के किनारे आज़ाद कश्मीर में है। शांडिल्य= शान + दिलम = पूर्ण + चन्द्रमा=पूर्ण चन्द्र=   पूर्ण चन्द्र के पुजारी या पूर्ण चन्द्र के पुजारी।  .

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः।। ध्यानमूलं गुरुर्मूति, पूजामूलं गुरोर्पदं। मन्त्रमूलं गुरुवाक्यं, मोक्षमूलं गुरोर्पदं।। अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरुवे नमः।। अज्ञान-तिमिरान्धस्य, ज्ञानाञ्ज-शलाक्या। चक्षुरुन्मीलितं येन, तस्मै श्रीगुरुवे नमः।। ॐ श्रीगुरुवे नमः| गुरू पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें|

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
ध्यानमूलं गुरुर्मूति, पूजामूलं गुरोर्पदं।
मन्त्रमूलं गुरुवाक्यं, मोक्षमूलं गुरोर्पदं।।
अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरुवे नमः।।
अज्ञान-तिमिरान्धस्य, ज्ञानाञ्ज-शलाक्या।
चक्षुरुन्मीलितं येन, तस्मै श्रीगुरुवे नमः।।
ॐ श्रीगुरुवे नमः
गुरू पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें

Thursday, July 30, 2015

व्यापक प्रश्न व्यापक भारतीय समाज से की कि अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह को प्रोत्साहित करने वाले कितने आप गैर ब्राह्मण लोग अपने घर पर आप की ही जाती/धर्म की लड़की से विवाह किये हुए ब्राह्मण को अपना पुरोहित स्वीकार करेंगे? और अगर वह ब्राह्मण, व्यभिचारी, मद्यप और हर तरह की चारित्रिक बुराइयों में लगा हो तो क्या आप उसको अपना पुरोहित बना रहने देंगे? क्या आप को विश्वास है की वह पूजा पध्धति के दौरान आप के घर में कभी कोई कुकृत्य नहीं करेगा मौक़ा लगाने पर यदि उसके अंदर सब तरह की बुराइया मौजूद हैं उसमे? उसी तरह से सभी जाती और धर्म के संभ्रांत व्यक्ति अपना नौकर भी कम से कम उपर्युक्त कमियों वाला भी नहीं चाहता है? तो क्यों न हम एक सुआचारयुक्त समाज को बने रहने दें और अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह को कम मान्यता और प्रसय दें जहाँ से कोई दूसरी जिंदगी और दूसरी राह संभव न हो सके उन दोनों के लिए मतलब सामान्य स्थिति में इससे ज्यादा से ज्यादा बचा जाय। *******जय हिन्द।

व्यापक प्रश्न व्यापक भारतीय समाज से की कि अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह को प्रोत्साहित करने वाले कितने आप गैर ब्राह्मण लोग अपने घर पर आप की ही जाती/धर्म की लड़की से विवाह किये हुए ब्राह्मण को अपना पुरोहित स्वीकार करेंगे? और अगर वह ब्राह्मण, व्यभिचारी, मद्यप और हर तरह की चारित्रिक बुराइयों में लगा हो तो क्या आप उसको अपना पुरोहित बना रहने देंगे? क्या आप को विश्वास है की वह पूजा पध्धति के दौरान आप के घर में कभी कोई कुकृत्य नहीं करेगा मौक़ा लगाने पर यदि उसके अंदर सब तरह की बुराइया मौजूद हैं उसमे? उसी तरह से सभी जाती और धर्म के संभ्रांत व्यक्ति अपना नौकर भी कम से कम उपर्युक्त कमियों वाला भी नहीं चाहता है? तो क्यों न हम एक सुआचारयुक्त समाज को बने रहने दें और अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह को कम मान्यता और प्रसय दें जहाँ से कोई दूसरी जिंदगी और दूसरी राह संभव न हो सके उन दोनों के लिए मतलब सामान्य स्थिति में इससे ज्यादा से ज्यादा बचा जाय। *******जय हिन्द।

विवेक(गिरधर):---हनुमान: जाके बल से गिरिवर(हिमालय) कांपे रोग दोष सब निकट न झांके।; गिरिधर का प्रथम धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान(महादेव/रूद्र का ग्यारहवा अवतार); गिरधर द्वितीय गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण(सशरीर परमब्रम्ह)।; गिरधर तृतीय मेरु:-मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु; गिरधर चतुर्थ:- धरणीधर शेषनाग; विवेक:- त्रिनेत्र, त्रिलोचन, त्रयम्बक(स्वयं शक्ति के स्वामी महादेव की भी स्वयं की रक्षा शक्ति विवेक ही है जिसके बिना स्वयं त्रिदेव भी शूद्रवत् हो सकते है: जिस प्रकार ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र दक्ष प्रजापति के अलावा ब्रह्मा के सात मानस पुत्र मतलब सात ब्रह्मर्षि मतलब सप्तर्षि उसी तरह सरस्वती के चार मानस संतान विवेक-प्रज्ञा और ज्ञान-विद्या)। त्रिदेव वरिष्ठता क्रम महादेव, विष्णु, ब्रह्मा काशी में और प्रयागराज में ब्रह्मा, विष्णु, और महेश/महादेव जो की उनकी त्रिशक्ति के वरिष्ठता क्रम के सिद्धांत के अनुसार है मतलब क्रमानुसार सरस्वती, लक्ष्मी और सती/पारवती ((सरस्वती और ब्रह्मा के के भौतिक पुत्र काशी के दक्ष प्रजापति (समस्त नारी जगत के पिता मतलब नारी जगत के स्रोत) की पुत्री मतलब सरस्वती की पौत्री)) की के वरिष्ठता है। साथ ब्रह्मर्षि वरिष्ठता/श्रेष्ठता अनुसार: कश्यप/गौतम, वशिष्ठ, गौतम/कश्यप, अंगिरस, भृगु, अत्रि, विश्वामित्र=कौशिक=विश्वरथ|

विवेक(गिरधर):---हनुमान: जाके बल से गिरिवर(हिमालय) कांपे रोग दोष सब निकट न झांके।;
गिरिधर का प्रथम धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान(महादेव/रूद्र का ग्यारहवा अवतार);
गिरधर द्वितीय गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण(सशरीर परमब्रम्ह)।; 
गिरधर तृतीय मेरु:-मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु;
गिरधर चतुर्थ:- धरणीधर शेषनाग;
विवेक:- त्रिनेत्र, त्रिलोचन, त्रयम्बक(स्वयं शक्ति के स्वामी महादेव की भी स्वयं की रक्षा शक्ति विवेक ही है जिसके बिना स्वयं त्रिदेव भी शूद्रवत् हो सकते है: जिस प्रकार ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र दक्ष प्रजापति के अलावा ब्रह्मा के सात मानस पुत्र मतलब सात ब्रह्मर्षि मतलब सप्तर्षि उसी तरह सरस्वती के चार मानस संतान विवेक-प्रज्ञा और ज्ञान-विद्या)। त्रिदेव वरिष्ठता क्रम महादेव, विष्णु, ब्रह्मा काशी में और प्रयागराज में ब्रह्मा, विष्णु, और महेश/महादेव जो की उनकी त्रिशक्ति के वरिष्ठता क्रम के सिद्धांत के अनुसार है मतलब क्रमानुसार सरस्वती, लक्ष्मी और सती/पारवती ((सरस्वती और ब्रह्मा के के भौतिक पुत्र काशी के दक्ष प्रजापति (समस्त नारी जगत के पिता मतलब नारी जगत के स्रोत) की पुत्री मतलब सरस्वती की पौत्री)) की के वरिष्ठता है। साथ ब्रह्मर्षि वरिष्ठता/श्रेष्ठता अनुसार: कश्यप/गौतम, वशिष्ठ, गौतम/कश्यप, अंगिरस, भृगु, अत्रि, विश्वामित्र=कौशिक=विश्वरथ|  

Wednesday, July 29, 2015

राजा यदु भी चन्द्रवंशीय क्षत्रिय थे पर अपने चन्द्रवंशीय भाइयों द्वारा लगातार उपेक्षित किये जाने से व्यथित हो अपने पाँचों पुत्रों से कहा की मेरा नया वंश चलेगा और तुम सब चंद्रवंशी से एक कदम दूर हो मेरे नाम के वंश को आगे बढ़ाओ गए और इस प्रकार तुम सब पहले यदुवंशीय हो और तुम्हारी आने वाली सभी पीढ़िया यदुवंशी ही होंगे। यह है इस दुनिया का पांच अंक से लगाव, पर यह पांच अंक का लगाव स्वयं में तीन अंक के लगाव को संरक्षण और समर्थन के लिए हैं, न की आपस में विद्वेष और घृणा फैलाने तथा अनायास एक दूसरे का विरोध करने के लिए हैं। इसी चन्द्रवंश के यदुवंश की एक शाखा, वृष्णि वंश में योगयोगेश्वर जनार्दन श्रीकृष्ण का जन्म हुआ जो दुनिया के आजतक के इतिहास में भगवान श्रीराम (जो तीन अंक की सीमा में ही रहकर सब कुछ कर गए) के बाद दूसरे एकमात्र सशरीर परमब्रह्म हुए। और दोनों विष्णु अवतार होते हुए इस विष्णु की सीमा का विस्तार करते हुए सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) की अवस्था को सशरीर प्राप्त किये अपने ज्ञान, जप, तप, तपश्या, बलिदान और त्याग (अपने ही जीवन की अभीष्टम प्रिय वस्तु का मानवता हित में त्याग) से। ईसाइयत सामानांतर चलाती है श्रीकृष्ण के और इस्लाम सामानांतर चलता है श्रीराम के और इसप्रकार पांच महाभूत युक्त मानव विचारधारा का आविर्भाव होता है विश्व मानवता में जो चिरन्तर जारी है।

राजा यदु भी चन्द्रवंशीय क्षत्रिय थे पर अपने चन्द्रवंशीय भाइयों द्वारा लगातार उपेक्षित किये जाने से व्यथित हो अपने पाँचों पुत्रों से कहा की मेरा नया वंश चलेगा और तुम सब चंद्रवंशी से एक कदम दूर हो मेरे नाम के वंश को आगे बढ़ाओ गए और इस प्रकार तुम सब पहले यदुवंशीय हो और तुम्हारी आने वाली सभी पीढ़िया यदुवंशी ही होंगे।  यह है इस दुनिया का पांच अंक से लगाव, पर यह पांच अंक का लगाव स्वयं में तीन अंक के लगाव को संरक्षण और समर्थन के लिए हैं, न की आपस में विद्वेष और घृणा फैलाने तथा अनायास एक दूसरे का विरोध करने के लिए हैं। इसी चन्द्रवंश के यदुवंश की एक शाखा, वृष्णि वंश में योगयोगेश्वर जनार्दन श्रीकृष्ण का जन्म हुआ जो दुनिया के आजतक के इतिहास में भगवान श्रीराम (जो तीन अंक की सीमा में ही रहकर सब कुछ कर गए) के बाद दूसरे एकमात्र सशरीर परमब्रह्म हुए। और दोनों विष्णु अवतार होते हुए इस विष्णु की सीमा का विस्तार करते हुए सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) की अवस्था को सशरीर प्राप्त किये अपने ज्ञान, जप, तप, तपश्या, बलिदान और त्याग (अपने ही जीवन की अभीष्टम प्रिय वस्तु का मानवता हित में त्याग) से। ईसाइयत सामानांतर चलाती है श्रीकृष्ण के और इस्लाम सामानांतर चलता है श्रीराम के और इसप्रकार पांच महाभूत युक्त मानव विचारधारा का आविर्भाव होता है विश्व मानवता में जो चिरन्तर जारी है।    

जिस तरह से जल में डूबने वाले को बचाने के लिए कोई जाता है तो डूबने वाला उसके कंधे पर चढ़ लेता है चाहे बचाने वाला उसे लेकर स्वयं डूब जाय और इस प्रकार दोनों डूब जायेंगे इसकी चिंता उसे न रहते हुए स्वयं को बचने की चिंता ही उसे रहती है उसी प्रकार यह दुनिया अपने पाप से इतनी दब गयी थी विगत 14 वर्षों में की इसको उबारने वाला ही डूबा दिया जाने वाला था, पर लोग क्या करें वह स्वयं विवेक ठहर गया जो पूर्णतः मानव विकाश को रोकते हुए लगभग पूर्ण रूप से ही सबकी जीवन रक्षा भी किया और उनकी उन्नति को अबाधगति से जारी रहने दिया और नवीनतम सृजन, दुनिया के एक छोर के व्यक्ति का दुनिया के अंतिम छोर तक के व्यक्ति का सम्मिलन कराते हुए और महा सामाजिक परिवर्तन भी गिरिधारी बन जारी किया जाते रहने दिया। सम्पूर्ण मानवता को भविष्य में व्यक्तिगत रूप से अपने द्वारा किशी भी तरह का छोड़ा हुआ कचरा और वायरस स्वयं नष्ट करने या समुचित प्रयोग में लाये जा सकने वाले स्थान पर स्वयं पहुंचाने को कह गया और इस प्रकार भविष्य के कर्मों के प्रति सचेत कर गया लोगों को। दुनिया को यही कस्ट सत्ता रहा की विवेक सब कर ठीक किया पर छोड़ा हुआ कचरा और वायरस स्वयं नष्ट करने या समुचित प्रयोग में लाये जा सकने वाले स्थान पर स्वयं पहुंचाने को कह गया।

जिस तरह से जल में डूबने वाले को बचाने के लिए कोई जाता है तो डूबने वाला उसके कंधे पर चढ़ लेता है चाहे बचाने वाला उसे लेकर स्वयं डूब जाय और इस प्रकार दोनों डूब जायेंगे इसकी चिंता उसे न रहते हुए स्वयं को बचने की चिंता ही उसे रहती है उसी प्रकार यह दुनिया अपने पाप से इतनी दब गयी थी विगत 14  वर्षों में की इसको उबारने वाला ही डूबा दिया जाने वाला था, पर लोग क्या करें वह स्वयं विवेक ठहर गया जो पूर्णतः मानव विकाश को रोकते हुए लगभग पूर्ण रूप से ही सबकी जीवन रक्षा भी किया और उनकी उन्नति को अबाधगति से जारी रहने दिया और नवीनतम सृजन, दुनिया के एक छोर के व्यक्ति का दुनिया के अंतिम छोर तक के व्यक्ति का सम्मिलन कराते हुए और महा सामाजिक परिवर्तन भी गिरिधारी बन जारी किया जाते रहने दिया। सम्पूर्ण मानवता को भविष्य में व्यक्तिगत रूप से अपने द्वारा किशी भी तरह का छोड़ा हुआ कचरा और वायरस स्वयं नष्ट करने या समुचित प्रयोग में लाये जा सकने वाले स्थान पर स्वयं पहुंचाने को कह गया और इस प्रकार भविष्य के कर्मों के प्रति सचेत कर गया लोगों को। दुनिया को यही कस्ट सत्ता रहा की विवेक सब कर ठीक किया पर छोड़ा हुआ कचरा और वायरस स्वयं नष्ट करने या समुचित प्रयोग में लाये जा सकने वाले स्थान पर स्वयं पहुंचाने को कह गया। 

Tuesday, July 28, 2015

भीम की जरूरत विपत्तिकाल और युद्ध काल में पड़ती ही पड़ती है चाहे अन्य किशी काल में ऐसा हो न हो। इसे हर भारतीय एवं विश्व के किशी भी परिदृश्य के हिंसाब में देखा जाए तो यह कथन सत्य ही निकलेगा।

भीम की जरूरत विपत्तिकाल और युद्ध काल में पड़ती ही पड़ती है चाहे अन्य किशी काल में ऐसा हो न हो। इसे हर भारतीय एवं विश्व के किशी भी परिदृश्य के हिंसाब में देखा जाए तो यह कथन सत्य ही निकलेगा।

हांथी को पालने हेतु/नियंत्रण में लाने हेतु पहले जंगली हांथी को एक बहुत बड़े खाई में गिराते हैं और बहुत दिनों तक भूखे हुए उसका बल जब कम हो जाता है तो उसे बाहर निकाल लोहे के रस्से और लोहे के अंकुश/भाले से नियंत्रण में ले मन मुताबिक नचाया जाता है। तो मेरे भद्रजन मै हांथी और घोड़ा नहीं एक विचारवान और व्यवहारिक व्यक्ति हूँ जो कार्य विशेष में व्यस्त था। अतः आप खाई में गिरा हुआ जंगली हांथी या अपने अंकुश और लोहे की रस्सी से नियंत्रित रहने वाला पालतू हांथी समझने की भूल नहीं कीजियेगा कभी। यह तो किशी को गुरु मान गुरु मर्यादा न तोड़ सकने की शक्ल में नियंत्रित रहता था। गुरुदक्षिणा पूर्ण हो चुकी है उसी नियंत्रण में एक समय विशेस तक रहते रहते पर अब वह स्थिति नहीं रही और न वह गुरु वह गुरु रहा।

हांथी को पालने हेतु/नियंत्रण में लाने हेतु पहले जंगली हांथी को एक बहुत बड़े खाई में गिराते हैं और बहुत दिनों तक भूखे हुए उसका बल जब कम हो जाता है तो उसे बाहर निकाल लोहे के रस्से और लोहे के अंकुश/भाले से नियंत्रण में ले मन मुताबिक नचाया जाता है। तो मेरे भद्रजन मै हांथी और घोड़ा नहीं एक विचारवान और व्यवहारिक व्यक्ति हूँ  जो कार्य विशेष में व्यस्त था।  अतः आप खाई में गिरा हुआ जंगली हांथी या अपने अंकुश और लोहे की रस्सी से नियंत्रित रहने वाला पालतू हांथी समझने की भूल नहीं कीजियेगा कभी। यह तो किशी को गुरु मान गुरु मर्यादा न तोड़ सकने की शक्ल में नियंत्रित रहता था। गुरुदक्षिणा पूर्ण हो चुकी है उसी नियंत्रण में एक समय विशेस तक रहते रहते पर अब वह स्थिति नहीं रही और न वह गुरु वह गुरु रहा।    

मैंने अपने ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition " और आचरण से किशी भी धर्म का विरोध नहीं किया वरन इतना सन्देश जरूर दिया है की कोई बौद्धिस्ट अगर गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण से ऊपर कभी नहीं हो सकता तो कोई इस्लाम अनुयायी या ईसाइयत अनुयायी अपने संगत किशी कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण कि संतान से ऊपर कैसे हो सकता है? और इसलिए सनातन हिन्दू धर्म का क्षरण होना इस्लाम, ईसाइयत बौद्धिस्ट समेत अन्य सभी जाती और पंथ के क्षरण होने का रास्ता साफ करेगा। पूरी दुनिया पर तो ईसाइयत, इस्लाम और बौद्धिस्ट का शासन है और उसे समृद्धिवान, ऊर्जावान(शक्तिशाली), शांतिमय-ज्ञानमय वे नहीं बना पा रहे हैं तो भारत में उनके अनुयायी बहुमत में आ गए तो क्या उनके पास जादू की छड़ी आ जाएगी की उसे घुमा दिया और सभी भारतीय जनता समृद्धिवान, ऊर्जावान(शक्तिशाली), शांतिमय-ज्ञानमय हो जाएगी। अतः जितना अपने हाँथ में है पहले उसे ठीक से सम्भालना शीखना चाहिए तथा अंटार्कटिक संधि की तरह कोई वायरस समाज में नहीं छोड़ना चाहिए जो विदेश में भी जा छती पहुंचाए पर नहीं, आप ऐसा जीवन जी रहे हैं जो भारतीय संस्कृति दूर से ही नहीं बर्दास्त कर पा रही थी पर आप उस संस्कृति को नजदीक ले आ गए लेकिन जब आप भारतीय संस्कृति अपने यहां इसके बदले कुछ हद तक भी नहीं अपनाये तो संतुलन कैसे बनेगा और इस प्रकार इस विश्व का क्या होगा जब संयम इस देश के विशिस्ट जनो और सज्जनों का भी जबाब दे जाएगा? अतः भारत में जितने लोग आप के पंथ का स्वेक्षा से अनुसरण करें या कर रहे हैं उसी पर सीमित रहिये मैंने सबकी कारगुजारी और पौरुस देख लिया है और यह भी पता हो गया है की करिश्मा जो सनातन हिन्दू धर्म के बजरंगबली और भारतीय त्रिदेव और त्रिदेवियों से नहीं हो पाता उसे आप आप के देवजन कैसे करवा लेते हैं? मूर्खों को समझा सकते है आप लोग अच्छी तरीके से पर विवेक(जो सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मणो का पुत्र और सनातन गौतम ब्राह्मणों का नाती हो) को नहीं समझा सकते है और इसी लिए बोला हूँ की बाप से होसियारी नहीं चलती है सभी सनातन हिन्दू/ब्राह्मण झुक गए हो पर मुझे नहीं झुकना था आप लोगों के सामने पूरे विश्व को सनातन हिन्दू की संतान बताना ही था और रही बात सभी नए पंथों और धर्मों की तो वे विचार और द्वन्द विश्व के केंद्र प्रयागराज में ही रहे जो अनुकूल स्थान पा यरूसलेम में प्रस्फुटित हो इस्लाम और तदुपरांत ईसाइयत का प्रादुर्भाव हुआ। जिन्होंने क्रमसः संतान हिन्दू धर्मावलम्बियों के कमजोर पड़ने पर पुनः भारत के इस केंद्र तक अपनी पहुँच स्थापित करते हुए पूरे विश्व के सभी जाती/धर्म/पंथ को प्रयागराज से जोड़ा और प्रयागराज को विश्व का केंद्र माना। वैसे भी भारतीय सप्तर्षि परिपाटी में सप्तर्षि/सात ब्रह्मर्षि जिनसे मानव जाती का सृजन हुआ वे प्रयागराज में ही सप्तर्षि हेतु ब्रह्मा द्वारा आयोजित प्रकृष्टा यज्ञ जो विश्व का प्राचीनतम यज्ञ है से जनित माने जाते हैं और इस लिए भी इसे प्रयाग या प्रयागराज कहते हैं।

मैंने अपने ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition " और आचरण से किशी भी धर्म का विरोध नहीं किया वरन इतना सन्देश जरूर दिया है की कोई बौद्धिस्ट अगर गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण से ऊपर कभी नहीं हो सकता तो कोई इस्लाम अनुयायी या ईसाइयत अनुयायी अपने संगत किशी कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण कि संतान से ऊपर कैसे हो सकता है? और इसलिए सनातन हिन्दू धर्म का क्षरण होना इस्लाम, ईसाइयत बौद्धिस्ट समेत अन्य सभी जाती और पंथ के क्षरण होने का रास्ता साफ करेगा। पूरी दुनिया पर तो ईसाइयत, इस्लाम और बौद्धिस्ट का शासन है और उसे समृद्धिवान, ऊर्जावान(शक्तिशाली), शांतिमय-ज्ञानमय वे नहीं बना पा रहे हैं तो भारत में उनके अनुयायी बहुमत में आ गए तो क्या उनके पास जादू की छड़ी आ जाएगी की उसे घुमा दिया और सभी भारतीय जनता  समृद्धिवान, ऊर्जावान(शक्तिशाली), शांतिमय-ज्ञानमय हो जाएगी।  अतः जितना अपने हाँथ में है पहले उसे ठीक से सम्भालना शीखना चाहिए तथा अंटार्कटिक संधि की तरह कोई वायरस समाज में नहीं छोड़ना चाहिए जो विदेश में भी जा छती पहुंचाए पर नहीं, आप ऐसा जीवन जी रहे हैं जो भारतीय संस्कृति दूर से ही नहीं बर्दास्त कर पा रही थी पर आप उस संस्कृति को नजदीक ले आ गए लेकिन जब आप भारतीय संस्कृति अपने यहां इसके बदले कुछ हद तक भी नहीं अपनाये तो संतुलन कैसे बनेगा और इस प्रकार इस विश्व का क्या होगा जब संयम इस देश के विशिस्ट जनो और सज्जनों का भी जबाब दे जाएगा? अतः भारत में जितने लोग आप के पंथ का स्वेक्षा से अनुसरण करें या कर रहे हैं उसी पर सीमित रहिये मैंने सबकी कारगुजारी और पौरुस देख लिया है और यह भी पता हो गया है की करिश्मा जो सनातन हिन्दू धर्म के बजरंगबली और भारतीय त्रिदेव और त्रिदेवियों से नहीं हो पाता उसे आप आप के देवजन कैसे करवा लेते हैं? मूर्खों को समझा सकते है आप लोग अच्छी तरीके से पर विवेक(जो सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मणो का पुत्र और सनातन गौतम ब्राह्मणों का नाती हो) को नहीं समझा सकते है और इसी लिए बोला हूँ की बाप से होसियारी नहीं चलती है सभी सनातन हिन्दू/ब्राह्मण झुक गए हो पर मुझे नहीं झुकना था आप लोगों के सामने पूरे विश्व को सनातन हिन्दू की संतान बताना ही था और रही बात सभी नए पंथों और धर्मों की तो वे विचार और द्वन्द विश्व के केंद्र प्रयागराज में ही रहे जो अनुकूल स्थान पा यरूसलेम में प्रस्फुटित हो इस्लाम और तदुपरांत ईसाइयत का प्रादुर्भाव हुआ। जिन्होंने क्रमसः संतान हिन्दू धर्मावलम्बियों के कमजोर पड़ने पर पुनः भारत के इस केंद्र तक अपनी पहुँच स्थापित करते हुए पूरे विश्व के सभी जाती/धर्म/पंथ को प्रयागराज से जोड़ा और प्रयागराज को विश्व का केंद्र माना। वैसे भी भारतीय सप्तर्षि परिपाटी में सप्तर्षि/सात ब्रह्मर्षि जिनसे मानव जाती का सृजन हुआ वे प्रयागराज में ही सप्तर्षि हेतु ब्रह्मा द्वारा आयोजित प्रकृष्टा यज्ञ जो विश्व का प्राचीनतम यज्ञ है से जनित माने जाते हैं और इस लिए भी इसे प्रयाग या प्रयागराज कहते हैं। मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

महान व्यक्तित्व व् वैज्ञानिक जो भारतवर्ष के 11वे राष्ट्रपति भी बने उनको 2012 फरवरी माह के प्रथम सप्ताह में मै अपना "परम श्रद्धेय गुरु" कह सम्बोधित किया था काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में लिखे पत्र में, उनकी आत्मा ने हम लोगों का साथ छोड़ दिया। यह भारत रास्त्र और व्यक्तिगत रूप में मेरे परिवार जन की एक अपूरणीय छति हुई है। ईस्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें। (परम श्रद्धेय गुरु: कारन अगर मै शोध किया होता भौतिकी विभाग के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ओंकारनाथ श्रीवास्तव शोध समूह में तो एक नाभिकीय भौतिकी में परास्नातक होने के कारन डॉ कलाम ही मेरे आदर्श थे और मेरे शोध का उद्देश्य रक्षा क्षेत्र ही होता।)

महान व्यक्तित्व व् वैज्ञानिक जो भारतवर्ष के 11वे राष्ट्रपति भी बने उनको 2012 फरवरी माह के प्रथम सप्ताह में मै अपना "परम श्रद्धेय गुरु" कह सम्बोधित किया था काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में लिखे पत्र में, उनकी आत्मा ने हम लोगों का साथ छोड़ दिया। यह भारत रास्त्र और व्यक्तिगत रूप में मेरे परिवार जन की एक अपूरणीय छति हुई है। ईस्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें। (परम श्रद्धेय गुरु: कारन अगर मै शोध किया होता भौतिकी विभाग के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ओंकारनाथ श्रीवास्तव शोध समूह में तो एक नाभिकीय भौतिकी में परास्नातक होने के कारन डॉ कलाम ही मेरे आदर्श थे और मेरे शोध का उद्देश्य रक्षा क्षेत्र ही होता।)

Monday, July 27, 2015

इससे बड़े नाम मुझे 14 वर्ष के प्रयागराज इतिहास में सुनाने को नहीं मिले थे और कोई नाम हो तो बताइये क्योंकि इनके लिए बिशुनपुर, जौनपुर के आरएसएस वाले श्री पारसनाथ मिश्रा जी का नाम ही बहुत था।

इससे बड़े नाम मुझे 14 वर्ष के प्रयागराज इतिहास में सुनाने को नहीं मिले थे और कोई नाम हो तो बताइये क्योंकि इनके लिए बिशुनपुर, जौनपुर के आरएसएस वाले श्री पारसनाथ मिश्रा जी का नाम ही बहुत था। 

खिलौना मै 1995 में सीख गया था एन सी सी में रहने पर जिसमे जौनपुर, वाराणसी समूह से प्रथम था मै पर जो लड़ाई मुझको लड़ना था उसमे इन खिलौने से नहीं लड़ना था। इसके लिए आप को खिलौनों को छोड़ना पडेगा नहीं तो आप वही किशी का काम तमाम कर देंगे या करवा देंगे और जेल चले जायेंगे तथा इस प्रकार आप उस लक्ष से विरत अपने आप हो गए। मेरी जिससे लड़ाई थी इसमे तथाकथित विश्वमहाशक्ति और उसके समर्थित लोग लड़ रहे थे जिनको विवेक कुमार पाण्डेय फोबिआ हो गया था और वे सभी लोग ईसाई शक्ति को अजेय समझ गए थे और सनातन हिन्दू संस्कृति पर जैसे विजय पा गए हो ऐसा उनको लगता है। पर क्या करें मेरे जैसे व्यक्ति ने उनकी जीती हुई लड़ाई का पाशा ही पलट दिया उलटे सनातन हिन्दू धर्म से जनित उनको बना दिया। दुर्भाग्य यह की कुछ आम भारतीय मेरे ही विरुद्ध लड़ने लगे यह न समझते हुए की सांस्कृतिक रूप से जो विश्व को जीत गया पूरे विश्व पर उसका शासन पक्का हो गया और उस हेतु विदेशी शक्तियां और इनके अभिकर्ता (एजेंट) मेरा घेराव की हुए थे।

खिलौना मै 1995 में सीख गया था एन सी सी में रहने पर जिसमे जौनपुर, वाराणसी समूह से प्रथम था मै पर जो लड़ाई मुझको लड़ना था उसमे इन खिलौने से नहीं लड़ना था। इसके लिए आप को खिलौनों को छोड़ना पडेगा नहीं तो आप वही किशी का काम तमाम कर देंगे या करवा देंगे और जेल चले जायेंगे तथा इस प्रकार आप उस लक्ष से विरत अपने आप हो गए। मेरी जिससे लड़ाई थी इसमे तथाकथित विश्वमहाशक्ति और उसके समर्थित लोग लड़ रहे थे जिनको विवेक कुमार पाण्डेय फोबिआ हो गया था और वे सभी लोग ईसाई शक्ति को अजेय समझ गए थे और सनातन हिन्दू संस्कृति पर जैसे विजय पा गए हो ऐसा उनको लगता है। पर क्या करें मेरे जैसे व्यक्ति ने उनकी जीती हुई लड़ाई का पाशा ही पलट दिया उलटे सनातन हिन्दू धर्म से जनित उनको बना दिया। दुर्भाग्य यह की कुछ आम भारतीय मेरे ही विरुद्ध लड़ने लगे यह न समझते हुए की सांस्कृतिक रूप से जो विश्व को जीत गया पूरे विश्व पर उसका शासन पक्का हो गया और उस हेतु विदेशी शक्तियां और इनके अभिकर्ता (एजेंट) मेरा घेराव की हुए थे।
RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।
  

आप मुझसे अतीक और अशोक और इनके माध्यम से अपने से क्या डराने की कोशिस कर रहे हैं या उत्तर प्रदेश के अन्य ऐसे लोगों से। इसके साथ मई कहना चाहूँगा की सार्वजनिक कार्य में अगर लग्न हूँ और ऊपर और नीचे दोनों जगह भ्रस्टाचार व्याप्त है और उसको समर्थन है और सहमति तथा प्रसय जारी है तो सामान्य जन का जीवन अगर गुजार रहा हूँ तो अगर लोकमत गलत दिशा में जा रहा है तो उसके प्रति आगाह जरूर करता हूँ लेकिन मै किशी लोकमत के समूह पर अपना विचार थोपता नहीं हूँ। और यह आगाह करने का कार्य मई कर भी रहा हूँ अपने इस ब्लॉग " Vivekanand and Modern Tradition" के माध्यम से। लेकिन व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित कार्यों में मै ऊपर जैसा ही हूँ जैसा की लिख चुका हूँ मतलब जैसे के साथ तैसा व्यवहार रहेगा या 19 पर 20 ही रहूँगा 14 वर्ष पहले को दिए दंड की तरह। मै डॉन(भगवा) स्वयं रह चुका हूँ फिर भी सामजिक समरसता और सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने हेतु डॉन(भगवा) के सामने सिर झुका सम्मान करता हूँ। अतः शंका समाधान अभी उन लोगों का कर देता हूँ किशी भी दुर्दांत अपराधी, माफिया या कुख्यात राजनेता और दुनिया की किशी बड़ी से बड़ी सत्ता का कोई डर नहीं है। तो बता दूँ विगत 14 वर्ष तक विश्वनवनिर्माण, नवसृजन, विश्वपरिवर्तन, विश्व संरक्षण और प्रयागराज में विश्वमंथन हेतु कार्य में जब से मेरा अर्पण हुआ है और जब से मई केंद्रित हूँ इस प्रयागराज में उस समय से मेरे ऊपर आतंक की छाया से लेकर हर तरह की दृश्य और अदृश्य तथा मनोवैज्ञानिक आशंकाएं मडरा रही थीं जिसमे दुर्दांत अपराधी, माफिया, आतंकी संगठन और कुख्यात राजनेता के साथ साथ तो उस समय भी मई अकेले भारत के किशी भी भाग में घूमा हूँ बिना किशी गिरोह/समूह और सुरक्षा हथियार के वह भी बैंगलोर जैसे जगह पर अपनी बात बेबाक रखा हूँ था सबसे सहमति प्राप्त किया हूँ अपने विचार के पक्ष में ऐसे में भी किशी भी समूह का साथ नहीं लिया हूँ तथा बिना किशी समूह और अस्त्र सस्त्र के वहां कई बार आया और गया हूँ तो इलाहाबाद, आजमगढ़, जौनपुर समेत निकटतम से लेकर दूर तक के उत्तर प्रदेश के किशी भी भाग, भारत के किशे भी भाग तथा विश्व के किशी दुर्दांत अपराधी, माफिया या कुख्यात राजनेता या शासक का मुझे डर नहीं है और इतना ही नहीं उस तथाकथित विश्व महाशक्ति और समर्थकों का भी कोई डर नहीं। पर हाँ अब उसे और उसकी समर्थित शक्तियों को सदा-सदा मुझसे डरना होगा की अगर वे कोई गलत कदम पुनः उठाये है तो विश्व विनाश होगा केवल तथाकथित महाशक्ति विनाश ही नहीं। इसके साथ मई कहना चाहूँगा की सार्वजनिक कार्य में अगर लग्न हूँ और ऊपर और नीचे दोनों जगह भ्रस्टाचार व्याप्त है और उसको समर्थन है और सहमति तथा प्रसय जारी है तो सामान्य जन का जीवन अगर गुजार रहा हूँ तो अगर लोकमत गलत दिशा में जा रहा है तो उसके प्रति आगाह जरूर करता हूँ लेकिन मै किशी लोकमत के समूह पर अपना विचार थोपता नहीं हूँ। और यह आगाह करने का कार्य मई कर भी रहा हूँ अपने इस ब्लॉग " Vivekanand and Modern Tradition" के माध्यम से। लेनिक व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित कार्यों में मै ऊपर जैसा ही हूँ जैसा की लिख चुका हूँ मतलब जैसे के साथ तैसा व्यवहार रहेगा या 19 पर 20 ही रहूँगा 14 वर्ष पहले को दिए दंड की तरह।

आप मुझसे अतीक और अशोक और इनके माध्यम से अपने से क्या डराने की कोशिस कर रहे हैं या उत्तर प्रदेश के अन्य ऐसे लोगों से।  इसके साथ मई कहना चाहूँगा की सार्वजनिक कार्य में अगर लग्न हूँ और ऊपर और नीचे दोनों जगह भ्रस्टाचार व्याप्त है और उसको समर्थन है और सहमति तथा प्रसय जारी है तो सामान्य जन का जीवन अगर गुजार रहा हूँ तो अगर लोकमत गलत दिशा में जा रहा है तो उसके प्रति आगाह जरूर करता हूँ लेकिन मै किशी लोकमत के समूह पर अपना विचार थोपता नहीं हूँ। और यह आगाह करने का कार्य मई कर भी रहा हूँ अपने इस ब्लॉग " Vivekanand and Modern Tradition" के माध्यम से।  लेकिन व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित कार्यों में मै ऊपर जैसा ही हूँ जैसा की लिख चुका हूँ मतलब जैसे के साथ तैसा व्यवहार रहेगा या 19 पर 20 ही रहूँगा 14 वर्ष पहले को दिए दंड की तरह। मै डॉन(भगवा) स्वयं रह चुका हूँ फिर भी सामजिक समरसता और सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने हेतु डॉन(भगवा) के सामने सिर झुका सम्मान करता हूँ। अतः शंका समाधान अभी उन लोगों का कर देता हूँ  किशी भी दुर्दांत अपराधी, माफिया या कुख्यात राजनेता और दुनिया की किशी बड़ी से बड़ी सत्ता का कोई डर नहीं है। तो बता दूँ विगत 14 वर्ष तक विश्वनवनिर्माण, नवसृजन, विश्वपरिवर्तन, विश्व संरक्षण और प्रयागराज में विश्वमंथन हेतु कार्य में जब से मेरा अर्पण हुआ है और जब से मई केंद्रित हूँ इस प्रयागराज में उस समय से मेरे ऊपर आतंक की छाया से लेकर हर तरह की दृश्य और अदृश्य तथा मनोवैज्ञानिक आशंकाएं मडरा रही थीं जिसमे दुर्दांत अपराधी, माफिया, आतंकी संगठन और कुख्यात राजनेता के साथ साथ तो उस समय भी मई अकेले भारत के किशी भी भाग में घूमा हूँ बिना किशी गिरोह/समूह और सुरक्षा हथियार के वह भी बैंगलोर जैसे जगह पर अपनी बात बेबाक रखा हूँ था सबसे सहमति प्राप्त किया हूँ अपने विचार के पक्ष में ऐसे में भी किशी भी समूह का साथ नहीं लिया हूँ तथा बिना किशी समूह और अस्त्र सस्त्र के वहां कई बार आया और गया हूँ तो इलाहाबाद, आजमगढ़, जौनपुर समेत निकटतम से लेकर दूर तक के उत्तर प्रदेश के किशी भी भाग, भारत के किशे भी भाग तथा विश्व के किशी दुर्दांत अपराधी, माफिया या कुख्यात राजनेता  या शासक का मुझे डर नहीं है और इतना ही नहीं उस तथाकथित विश्व महाशक्ति और समर्थकों का भी कोई डर नहीं। पर हाँ अब उसे और उसकी समर्थित शक्तियों को सदा-सदा मुझसे डरना होगा की अगर वे कोई गलत कदम पुनः उठाये है तो विश्व विनाश होगा केवल तथाकथित महाशक्ति विनाश ही नहीं। इसके साथ मई कहना चाहूँगा की सार्वजनिक कार्य में अगर लग्न हूँ और ऊपर और नीचे दोनों जगह भ्रस्टाचार व्याप्त है और उसको समर्थन है और सहमति तथा प्रसय जारी है तो सामान्य जन का जीवन अगर गुजार रहा हूँ तो अगर लोकमत गलत दिशा में जा रहा है तो उसके प्रति आगाह जरूर करता हूँ लेकिन मै किशी लोकमत के समूह पर अपना विचार थोपता नहीं हूँ। और यह आगाह करने का कार्य मई कर भी रहा हूँ अपने इस ब्लॉग " Vivekanand and Modern Tradition" के माध्यम से।  लेनिक व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित कार्यों में मै ऊपर जैसा ही हूँ जैसा की लिख चुका हूँ मतलब जैसे के साथ तैसा व्यवहार रहेगा या 19 पर 20 ही रहूँगा 14 वर्ष पहले को दिए दंड की तरह।

 किशी भी दुर्दांत अपराधी, माफिया या आतंकवादी, कुख्यात राजनेता और दुनिया की किशी बड़ी से बड़ी सत्ता का कोई व्यक्ति मेरे साथ पहले 5 वर्ष रह ले और तब भी मेरे जैसा कार्य करले और अगर धर्म सम्मत हो तो जैसा कार्य मई कर रहा अगर वे ऐसा कर लिए तो मई उनके जैसा कार्य बिना उनके जैसा हुए ही कर सकता हूँ।   

जो लोग इतने पिछड़े हैं की 11/18 सितम्बर, 2007 में पूर्ण कार्य को अभी तक नहीं समझ पाये था तथा 29 अक्टूबर, 2009 को जो कार्य मेरे द्वारा अपनी अभीष्ट पूर्णता प्राप्त कर लिया स्पस्ट नियमो द्वारा परिभाषित होने पर भी उसे प्रयागराज न्यायालय में भेज दे रहे है अपनी मानसिक पिछड़ेपन की गवाही देते हुए, तो जो 6/7 वर्ष पीछे स्वयं चल रहा हो तो अगर वह कहे की मेरी मेरिट/प्रतिभा कम है और मै पीछे की सोचता हूँ तो उसके सनकीपन के भगवान हे मालिक और तो वह जिसका नेतृत्व करेगा उसकी भाग्य को हम क्या कहें? कारण की अगर मेरे सामने वाला पश्चगामी है तो मुझे भी पीछे से द्रिस्टान्त प्रस्तुत करने होते हैं और यही साजिस मेरे सामने वाले 29 अक्टूबर, 2009 से न करते रहे होते आज तक तो शायद उनका स्थान कही और ऊंचा हुआ होता और रास्ते निष्कंटक होते।

जो लोग इतने पिछड़े हैं की 11/18 सितम्बर, 2007 में पूर्ण कार्य को अभी तक नहीं समझ पाये था तथा 29 अक्टूबर, 2009 को जो कार्य मेरे द्वारा अपनी अभीष्ट पूर्णता प्राप्त कर लिया स्पस्ट नियमो द्वारा परिभाषित होने पर भी उसे प्रयागराज न्यायालय में भेज दे रहे है अपनी मानसिक पिछड़ेपन की गवाही देते हुए, तो जो 6/7 वर्ष पीछे स्वयं चल रहा हो तो अगर वह कहे की मेरी मेरिट/प्रतिभा कम है और मै पीछे की सोचता हूँ तो उसके सनकीपन के भगवान हे मालिक और तो वह जिसका नेतृत्व करेगा उसकी भाग्य को हम क्या कहें?  कारण की अगर मेरे सामने वाला पश्चगामी है तो मुझे भी पीछे से द्रिस्टान्त प्रस्तुत करने होते हैं और यही साजिस मेरे सामने वाले  29 अक्टूबर, 2009 से न करते रहे होते आज तक तो शायद उनका स्थान कही और ऊंचा हुआ होता और रास्ते निष्कंटक होते।

जिस सनातन ब्राह्मण के स्थान पर स्वयं सनातन ब्राह्मण में भी कोई टिक न सका उसके स्थान पर किस-किस को आप पेश करने की कोशिस किये चले जा रहे है? सनातन ब्राह्मण का स्थान स्वयं कोई अन्य ब्राह्मण भी नहीं ले सकता तो कोई और क्या लेगा? ब्रह्मा, विष्णु और महेश परमब्रह्म के ही अंश है इस हेतु महेश और विष्णु भी भिक्षाटन करते रहे हैं मतलब एक ब्राह्मण का अधिकार परमब्रह्म का अंश होने के कारन उनका अपने आप बन जाता है जबकि वे क्रमसः शक्ति और समृद्धि के स्वामी स्वयं रहे है। दोनों का भिक्षातन उदाहरण मानवता की रक्षा हेतु बार-बार मानवता के इतिहास में आया है जिससे आप ब्रह्मा, विष्णु और महेश को क्रमसः ज्ञान, समृद्धि और शक्ति के स्वामी कह सकते हैं और स्वयं हेतु नहीं वरन मानवता को बचाने हेतु शिव और विष्णु भी दाता होते हुए भी भिक्षाटन किये हैं।

जिस सनातन ब्राह्मण के स्थान पर स्वयं सनातन ब्राह्मण में भी कोई टिक न सका उसके स्थान पर किस-किस को आप पेश करने की कोशिस किये चले जा रहे है? सनातन ब्राह्मण का स्थान स्वयं कोई अन्य ब्राह्मण भी नहीं ले सकता तो कोई और क्या लेगा? ब्रह्मा, विष्णु और महेश परमब्रह्म के ही अंश है इस हेतु महेश और विष्णु भी भिक्षाटन करते रहे हैं मतलब एक ब्राह्मण का अधिकार परमब्रह्म का अंश होने के कारन उनका अपने आप बन जाता है जबकि वे क्रमसः शक्ति और समृद्धि के स्वामी स्वयं रहे है। दोनों का भिक्षातन उदाहरण मानवता की रक्षा हेतु बार-बार मानवता के इतिहास में आया है जिससे आप ब्रह्मा, विष्णु और महेश को क्रमसः ज्ञान, समृद्धि और शक्ति के स्वामी कह सकते हैं और स्वयं हेतु नहीं वरन मानवता को बचाने हेतु शिव और विष्णु भी दाता होते हुए भी भिक्षाटन किये हैं।   

Sunday, July 26, 2015

राम(विष्णु) के ईस्टदेव शिव=रामेश्वर और शिव के ईस्टदेव राम(विष्णु) तथा राम के लिए माता, सती/उमा/पारवती और शिव के लिए माता, सीता=रामा(लक्ष्मी)। यह होता है सम्बन्ध शिव/ रामेश्वर/केदारेश्वर/रामनाथ और रमानाथ/राम/कृष्ण(विष्णु) का आज तक के इतिहास में।

राम(विष्णु) के ईस्टदेव शिव=रामेश्वर और शिव के ईस्टदेव राम(विष्णु) तथा राम के लिए माता, सती/उमा/पारवती और शिव के लिए माता, सीता=रामा(लक्ष्मी)। यह होता है सम्बन्ध शिव/ रामेश्वर/केदारेश्वर/रामनाथ और रमानाथ/राम/कृष्ण(विष्णु) का आज तक के इतिहास में। 

Saturday, July 25, 2015

मै जब बिशुनपुर का नमक खाया हूँ तो भाइयों की शक्ति मई लिया था विशेष उद्देश्य पूर्ती हेतु लेकिन उद्देश्य पूर्ती के बाद मै विष्णु (बिशुनपुर) का हक़ नहीं ले सकता पर बिशुनपुर का अधिकार सुपात्र को हो या लेने वाला सुपात्र बने तो मुझे कुछ संतुस्ती रहेगी। और इसी तरह प्रयागराज(ब्रह्मा) भी अपने उत्तराधिकारी सुपात्र को चुने जिससे मुझे विवेक:त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक(रामापुर) को बार बार अपमानित न होना पड़े नहीं तो ज्ञान और समृद्धि धारी की धारी रह जाएगी।

मै जब बिशुनपुर का नमक खाया हूँ तो भाइयों की शक्ति मई लिया था विशेष उद्देश्य पूर्ती हेतु लेकिन उद्देश्य पूर्ती के बाद मै विष्णु (बिशुनपुर) का हक़ नहीं ले सकता पर बिशुनपुर का अधिकार सुपात्र को हो या लेने वाला सुपात्र बने तो मुझे कुछ संतुस्ती रहेगी। और इसी तरह प्रयागराज(ब्रह्मा) भी अपने उत्तराधिकारी सुपात्र को चुने जिससे मुझे विवेक:त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक(रामापुर) को बार बार अपमानित न होना पड़े नहीं तो ज्ञान और समृद्धि धारी की धारी रह जाएगी।

प्रेमचंद (शिव) भी कार्यालय और शैक्षिक आंकड़ों के आधार पर शुक्रवारीय हैं पर पारिवारिक सूत्र अनुसार में सोमवार को जन्म लिए थे जैसे की मै शैक्षिक आंकड़े के अनुसार रविवारीय हूँ पर वास्तविक जन्मदिन मेरा मंगलवार है। बार-बार संकेत दे रहा हूँ अपने अनुज सहकर्मी शुक्रवारी भाई( वास्तविक जन्मदिन=शैक्षिक आंकड़े के अनुसार) को की आप बड़े भैया विष्णु की शक्ति लेकर टिके हुए है (जिनका मै काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से इतना सम्मान करता था की उनके सम्मुख कभी नहीं हुआ और यहां प्रयागराज के कतरा में जब रहते थे और विज्ञान संकाय में जब कभी सामना भी होता था तो मई ऐसा व्यवहार करता था की जैसे मई उनको पहचानता हे नहीं हूँ), पर क्या करें आप तो कालिदास बने हैं उनको समझ में आ ही नहीं रहा है? कम से कम दुनिया बदल गयी है उसका ख्याल करते हुए अपने आचरण में पवित्रता और गंभीरता लाइए। बलराम/रेवतीरमन जी आप सही समझ रहे थे की शुक्रवारी से नवनिर्माण और नव सृजन नहीं हो सकता और किशी शुक्रवारी का कार्य नहीं पूर्ण हुआ वह केवल विद्वान और दार्शनिक भले हो सकता है पर आप को पता होना चाहिए की शुक्रवारी के कार्य पूर्ती का जिम्मा बिशुनपुर, जौनपुर-223103, अंतर्गत काशी:वाराणसी मंडल के जिस श्रीधर(विष्णु)(मेरे मामा और परमगुरु परमपिता परमेश्वर) ने दिया था वे स्वयं माध्यमिक विद्यालय में उस समय भौतिकी के प्रवक्ता(वर्तमान में उसी विद्यालय के प्रधानाचार्य) रहते हुए भी वास्तविक रूप से बैलो द्वारा खींचे जाने वाले हल से रविवार या छुट्टी के दिन या विद्यालय समय से पूर्व तक खेत की जुताई अक्सर किया करते थे मितव्ययिया और समयोपयोग की दृस्टि से। और मई स्वयं राशि नाम गिरिधारी और नामतः विवेक:त्रिलोचन:त्रयम्बक: त्रिनेत्र: महादेव का स्वयं का भी सुरक्षा चक्र उनकी नक़ल कर जब हल चलना कक्षा 8 में शिख गया था तो कभी-कभी मै भी हल चलता था मजदूरों के समय से न मिलने और मामा को इस कार्य से विरत करने हेतु जबकि मेरे गाव रामा(सीता)पुर, आज़मगढ़-223225 में मेरे खानदान(गाँव का सबसे प्रमुख खानदान) में आकर में गाँव की जमीन पर मेरे खानदान के किशी सदस्य द्वारा स्वयं से खेत में जाकर हल से जुताई मना थी वह सीत(हल) से सीता का जन्म के कारन प्रतिबंधित किया गया होगा तो गाँव रामापुर में जाकर कभी जुताई मई नहीं किया हूँ बैलों के हल से जबकि खेती गृहस्ती के सब वह कार्य किया हूँ जो मामा जानते थे। लेकिन मामा मुझसे एक कार्य मुझसे अधिक जानते थे वह था वह खपरैल वाले घऱ पर चढ़ उसकी छवाई स्वयं से करना जानते थे और उस कार्य में मुझे कभी शामिल नहीं होने दिए इसके शिवा की की मई उस सामग्री को नीचे से दूँ। अब सनातन ब्राह्मण हम और मामा वास्तविक बलराम/रेवतीरमन हुए या आप जैसे ब्रह्मक्षत्रिय बलराम/रेवतीरमन; नारायण वंश के काशीनरेश ही बता दीजिये की आप सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण, बिशुनपुर, जौनपुर-223103, अंतर्गत काशी:वाराणसी(महादेव) मंडल और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा को अर्पित होने वाला) पाण्डेय ब्राह्मण, रामापुर, आजमगढ़-223225, अंतर्गत, आज़मगढ़ मंडल(ऋषि दुर्वाशा क्षेत्र) से ज्यादा धर्म कर्म जानने लगे जो आपत्ति दर्ज करा रहे है की किशी शुक्रवारी का कार्य नहीं पूर्ण हुआ वह केवल विद्वान और दार्शनिक भले हो सकता है। भाई कार्य तो पूर्ण हुआ इसमें कोई संदेह नहीं इसमें मै कोई समझौता नहीं कर सकता पर पर उसके द्वारा हुआ है की नहीं लेकिन सुभारम्भ उसने ही किया है। दुनिया के इतिहास में कोई ऐसा प्रमुख पात्र नहीं हुआ गिरिधर(राशिनाम) और विवेक(सांसारिक नाम) के अनुसार आचरण में मैंने दुनिया के इतिहास में कौन ऐसा प्रमुख पात्र रहा हो जिसका आचरण मैंने न किया हो और तभी ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे तीन नाम में समाप्त होने वाले सभी आचरण के कारन मैंने कह दिया की मैंने सशरीर परमब्रह्म का आचरण कर अपने पुत्रों का वह नाम रखा है जिन दोनों को आप परमब्रह्म ही बोलेंगे (विष्णुकांत और कृष्णकांत) और वे दोनो परमब्रह्म है राम और कृष्ण। जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण कहो या राम जरूर है की कृष्ण और राम मिलकर राम ही बनते है। ---अतः बलराम/रेवतीरमण जी आप मान लीजिये की बिशुनपुर और रामापुर अगर कह रहे है की जोशी का कार्यपूर्ण हुआ तो हो गया है और इसलिए भी आप को मानना पडेगा की दुनिया का अंत जो विगत एक दशक में कभी भी संभावी था जिसे बिशुनपुर और रामपुर के क्रमश रामप्रशाद मिश्र और रामप्रशाद पाण्डेय परिवार ने विशेष रूप से कवच की भूमिका निभायी और इस प्रकार इन दोनों के माध्यम से विश्व के सभी भद्रजन ने अहम भूमिका निभाई, तो बिशुनपुर और रामापुर के अंत के साथ इस सृस्टि का अंत निश्चित था जिसको शीधे अर्थों में कहें तो जो एक का परनाती और एक का प्रपौत्र था उस विवेक(गिरिधारी) के भौतिक लीला समाप्ति के साथ सब कुछ समाप्त ही था। अतः जब मेरे समर्थक और मेरे विरोधी जो आपस में लड़ रहे थे किशी ने भौतिक रूप से मुझे कोई नुक्सान पहुंचाने की हिम्मत नहीं की केवल कुछ विरोधी मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करने हेतु वह वह कृतिम परिवेश पैदा कराये जो मुझे मानसिक कस्ट पहुंचाते थे। लेकिन अब उसका भी जबाब मै दूंगा और देने योग्य हूँ और अब मेरे जबाबी कार्य को बलात नहीं कह सकते क्योंकि आप दोनों ने तथाकथित विश्वमहाशक्ति को सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय विवाह नियमों का मजाक उड़ाते हुए दलित ईसाई के यहां भेजवा दिए है तो वह भी पक्ष शक्तिशाली हो गया है 2001-2006-2008 से विशेष रूप से जो बाकी थी जुलाई, 2015 में हो गया है। आप लोगों को राम-राम; जिसके ऊपर कोई सत्ता ही नहीं बची उसको भी प्रयागराज न्यायलय में भेजवा दिया आप दोनों ने इसके लिए आप का विशेष आभार, पर कालचक्र का विरोधी महादेव का आहार होता है और महादेव से बचने हेतु कोई विष्णु के ही पास जाता है तो इस संसार को एक मात्र विष्णु प्रदाता गौतम गोत्रीय ब्राह्मणो का गाँव बिशुनपुर ही है और उसमे भी गाँव के मध्य में रामानंद कुल का विशेष घर रामप्रशाद/रमानाथ मिश्र का घर और यह उस घर का नाती है जो यह कह और लिख रहा है। हमने दोनों घरों से जो शिखा की अपाहिज और भिखारी ब्राह्मण से हम सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय विवाह कर सकते है पर मलिन बस्ती में हम सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय विवाह पद्धति से विवाह नहीं कर सकते अपने लडके लड़कियों की जब तक की वह विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके मिश्रित जाती/धर्म का अपने को सामाजिक, धार्मिक और संवैधानिक रूप से स्वीकार नहीं करता है। यह अलग है की ये लडके और लडकिया घर से अलग हो न्यायलय द्वारा या आर्यसमाज के नियम से अपना विवाह से किशी म्लेक्ष से भी विवाह भले रचा लें और अपनी जिन्दगी अपने तरीके से जिए। >>>>>>>>>>>>>>>>>>>कालिदास वर्ण में काले नहीं, गौर वर्ण थे और वे उत्तराखंड क्षेत्र से थे और काशी के पंडित उनको विद्योत्तमा को जीवनभर अपमानित करने हेतु उनका जीवन संगी बना दिए शास्त्रार्थ में छल कर पर विद्योत्तमा के व्यंग और ताने ने उनको महाकवि कालिदास बना दिया उस कालिदास को जो जिस डाल को काट रहे थे उसी पर बैठे थे और उस भाग पर जो कटने पर पेड़ से अलग हो जमीन पर आता।

प्रेमचंद (शिव) भी कार्यालय और शैक्षिक आंकड़ों के आधार पर शुक्रवारीय हैं पर पारिवारिक सूत्र अनुसार में सोमवार को जन्म लिए थे जैसे की मै शैक्षिक आंकड़े के अनुसार रविवारीय हूँ पर वास्तविक जन्मदिन मेरा मंगलवार है। बार-बार संकेत दे रहा हूँ अपने अनुज सहकर्मी शुक्रवारी भाई( वास्तविक जन्मदिन=शैक्षिक आंकड़े के अनुसार) को की आप बड़े भैया विष्णु की शक्ति लेकर टिके हुए है (जिनका मै काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से इतना सम्मान करता था की उनके सम्मुख कभी नहीं हुआ और यहां प्रयागराज के कतरा में जब रहते थे और विज्ञान संकाय में जब कभी सामना भी होता था तो मई ऐसा व्यवहार करता था  की जैसे मई उनको पहचानता हे नहीं हूँ), पर क्या करें आप तो कालिदास बने हैं उनको समझ में आ ही नहीं रहा है? कम से कम दुनिया बदल गयी है उसका ख्याल करते हुए अपने आचरण में पवित्रता और गंभीरता लाइए।  बलराम/रेवतीरमन जी आप सही समझ रहे थे की शुक्रवारी से नवनिर्माण और नव सृजन नहीं हो सकता और किशी शुक्रवारी का कार्य नहीं पूर्ण हुआ वह केवल विद्वान और दार्शनिक भले हो सकता है पर आप को पता होना चाहिए की शुक्रवारी के कार्य पूर्ती का जिम्मा बिशुनपुर, जौनपुर-223103, अंतर्गत काशी:वाराणसी मंडल के जिस श्रीधर(विष्णु)(मेरे मामा और परमगुरु परमपिता परमेश्वर) ने दिया था वे स्वयं माध्यमिक विद्यालय में उस समय भौतिकी के प्रवक्ता(वर्तमान में उसी विद्यालय के प्रधानाचार्य) रहते हुए भी वास्तविक रूप से बैलो द्वारा खींचे जाने वाले हल से रविवार या छुट्टी के दिन या विद्यालय समय से पूर्व तक खेत की जुताई अक्सर किया करते थे मितव्ययिया और समयोपयोग की दृस्टि से। और मई स्वयं राशि नाम गिरिधारी और नामतः विवेक:त्रिलोचन:त्रयम्बक: त्रिनेत्र: महादेव का स्वयं का भी सुरक्षा चक्र उनकी नक़ल कर जब हल चलना कक्षा 8 में शिख गया था तो कभी-कभी मै भी हल चलता था मजदूरों के समय से न मिलने और मामा को इस कार्य से विरत करने हेतु जबकि मेरे गाव रामा(सीता)पुर, आज़मगढ़-223225 में मेरे खानदान(गाँव का सबसे प्रमुख खानदान) में आकर में गाँव की जमीन पर मेरे खानदान के किशी सदस्य द्वारा स्वयं से खेत में जाकर हल से जुताई मना थी वह सीत(हल) से सीता का जन्म के कारन प्रतिबंधित किया गया होगा तो गाँव रामापुर में जाकर कभी जुताई मई नहीं किया हूँ बैलों के हल से जबकि खेती गृहस्ती के सब वह कार्य किया हूँ जो मामा जानते थे। लेकिन मामा मुझसे एक कार्य मुझसे अधिक जानते थे वह था वह खपरैल वाले घऱ पर चढ़ उसकी छवाई स्वयं से करना जानते थे और उस कार्य में मुझे कभी शामिल नहीं होने दिए इसके शिवा की की मई उस सामग्री को नीचे से दूँ।  अब सनातन ब्राह्मण हम और मामा वास्तविक बलराम/रेवतीरमन हुए या आप जैसे ब्रह्मक्षत्रिय बलराम/रेवतीरमन; नारायण वंश के काशीनरेश ही बता दीजिये की आप सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण, बिशुनपुर, जौनपुर-223103, अंतर्गत काशी:वाराणसी(महादेव) मंडल और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा को अर्पित होने वाला) पाण्डेय ब्राह्मण, रामापुर, आजमगढ़-223225, अंतर्गत, आज़मगढ़ मंडल(ऋषि दुर्वाशा क्षेत्र) से ज्यादा धर्म कर्म जानने लगे जो आपत्ति दर्ज करा रहे है की किशी शुक्रवारी का कार्य नहीं पूर्ण हुआ वह केवल विद्वान और दार्शनिक भले हो सकता है। भाई कार्य तो पूर्ण हुआ इसमें कोई संदेह नहीं इसमें मै कोई समझौता नहीं कर सकता पर पर उसके द्वारा हुआ है की नहीं लेकिन सुभारम्भ उसने ही किया है।  दुनिया के इतिहास में कोई ऐसा प्रमुख पात्र नहीं हुआ गिरिधर(राशिनाम) और विवेक(सांसारिक नाम) के अनुसार आचरण में मैंने दुनिया के इतिहास में कौन ऐसा प्रमुख पात्र रहा हो जिसका आचरण मैंने न किया हो और तभी ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे तीन नाम में समाप्त होने वाले सभी आचरण के कारन मैंने कह दिया की मैंने सशरीर परमब्रह्म का आचरण कर अपने पुत्रों का वह नाम रखा है जिन दोनों को आप परमब्रह्म ही बोलेंगे (विष्णुकांत और कृष्णकांत) और वे दोनो परमब्रह्म है राम और कृष्ण। जग में प्यारे हैं दो नाम चाहे कृष्ण कहो या राम जरूर है की कृष्ण और राम मिलकर राम ही बनते है। ---अतः बलराम/रेवतीरमण जी आप मान लीजिये की बिशुनपुर और रामापुर अगर कह रहे है की जोशी का कार्यपूर्ण हुआ तो हो गया है और इसलिए भी आप को मानना पडेगा की दुनिया का अंत जो विगत एक दशक में कभी भी संभावी था जिसे बिशुनपुर और रामपुर के क्रमश रामप्रशाद मिश्र और रामप्रशाद पाण्डेय परिवार ने विशेष रूप से कवच की भूमिका निभायी और इस प्रकार इन दोनों के माध्यम से विश्व के सभी भद्रजन ने अहम भूमिका निभाई, तो बिशुनपुर और रामापुर के अंत के साथ इस सृस्टि का अंत निश्चित था जिसको शीधे अर्थों में कहें तो जो एक का परनाती और एक का प्रपौत्र था उस विवेक(गिरिधारी) के भौतिक लीला समाप्ति के साथ सब कुछ समाप्त ही था। अतः जब मेरे समर्थक और मेरे विरोधी जो आपस में लड़ रहे थे किशी ने भौतिक रूप से मुझे कोई नुक्सान पहुंचाने की हिम्मत नहीं की केवल कुछ विरोधी मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करने हेतु वह वह कृतिम परिवेश पैदा कराये जो मुझे मानसिक कस्ट पहुंचाते थे। लेकिन अब उसका भी जबाब मै दूंगा और देने योग्य हूँ और अब मेरे जबाबी कार्य को  बलात नहीं कह सकते क्योंकि आप दोनों ने तथाकथित विश्वमहाशक्ति को सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय विवाह नियमों का मजाक उड़ाते हुए दलित ईसाई के यहां भेजवा दिए है तो वह भी पक्ष शक्तिशाली हो गया है 2001-2006-2008 से विशेष रूप से जो बाकी थी जुलाई, 2015 में हो गया है। आप लोगों को राम-राम; जिसके ऊपर कोई सत्ता ही नहीं बची उसको भी प्रयागराज न्यायलय में भेजवा दिया आप दोनों ने इसके लिए आप का विशेष आभार, पर कालचक्र का विरोधी महादेव का आहार होता है और महादेव से बचने हेतु कोई विष्णु के ही पास जाता है तो इस संसार को एक मात्र विष्णु प्रदाता गौतम गोत्रीय ब्राह्मणो का गाँव बिशुनपुर ही है और उसमे भी गाँव के मध्य में रामानंद कुल का विशेष घर रामप्रशाद/रमानाथ मिश्र का घर और यह उस घर का नाती है जो यह कह और लिख रहा है। हमने दोनों घरों से जो शिखा की अपाहिज और भिखारी ब्राह्मण से हम  सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय विवाह कर सकते है पर मलिन बस्ती में हम सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रीय विवाह पद्धति से विवाह नहीं कर सकते अपने लडके लड़कियों की जब तक की वह विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके मिश्रित जाती/धर्म का अपने को सामाजिक, धार्मिक और संवैधानिक रूप से स्वीकार नहीं करता है। यह अलग है की ये लडके और लडकिया घर से अलग हो न्यायलय द्वारा या आर्यसमाज के नियम से अपना विवाह से किशी म्लेक्ष से भी विवाह भले रचा लें और अपनी जिन्दगी अपने तरीके से जिए। >>>>>>>>>>>>>>>>>>>कालिदास वर्ण में काले नहीं, गौर वर्ण थे और वे उत्तराखंड क्षेत्र से थे और काशी के पंडित उनको विद्योत्तमा को जीवनभर अपमानित करने हेतु उनका जीवन संगी बना दिए शास्त्रार्थ में छल कर पर विद्योत्तमा के व्यंग और ताने ने उनको महाकवि कालिदास बना दिया उस कालिदास को जो जिस डाल को काट रहे थे उसी पर बैठे थे और उस भाग पर जो कटने पर पेड़ से अलग हो जमीन पर आता।

जो एक तरफ और पूरी दुनिया एक तरफ फिर भी याचना हुई विष्णु(श्रीधर) और शिव(प्रेमचंद) द्वारा ब्रह्मा(जोशी) का कार्यपूर्ण करने हेतु प्रयागराज में जमे रहने हेतु तो कार्यपूर्ण हो जाने पर तूं कौन है प्रश्न पूंछने वाला पहले अपनी सुरक्षा का इंतजाम करले दूर-दूर तक के अपने लगे-सगे की शक्ति का आह्वान करके। क्योंकि तथाकथित विश्वमहाशक्ति भी एक बार चपेट में आ चुका है गलती करके जिसको भी मेरा प्रयागराज में रहना ही विनाश को और आगे नहीं बढ़ने दिया। बात अब आगे बड़ी तो रावणकुल का पुनः नाश प्रारम्भ होगा क्योंकि जोशी का लक्ष्य पूर्ण हो है अब। मई दूसरी जिम्मेदारी ऐसी नहीं लेने वाला जिसमे दोषी ही लाभार्थी और उत्तराधिकारी हो मेरी जिम्मेदारी की छाया, मेरे द्वारा सृजन का और मेरे द्वारा किये गए नवनिर्माण का।

जो एक तरफ और पूरी दुनिया एक तरफ फिर भी याचना हुई विष्णु(श्रीधर) और शिव(प्रेमचंद) द्वारा ब्रह्मा(जोशी) का कार्यपूर्ण करने हेतु प्रयागराज में जमे रहने हेतु तो कार्यपूर्ण हो जाने पर तूं कौन है प्रश्न पूंछने वाला पहले अपनी सुरक्षा का इंतजाम करले दूर-दूर तक के अपने लगे-सगे की शक्ति का आह्वान करके। क्योंकि तथाकथित विश्वमहाशक्ति भी एक बार चपेट में आ चुका है गलती करके जिसको भी मेरा प्रयागराज में रहना ही विनाश को और आगे नहीं बढ़ने दिया। बात अब आगे बड़ी तो रावणकुल का पुनः नाश प्रारम्भ होगा क्योंकि जोशी का लक्ष्य पूर्ण हो है अब। मई दूसरी जिम्मेदारी ऐसी नहीं लेने वाला जिसमे दोषी ही लाभार्थी और उत्तराधिकारी हो मेरी जिम्मेदारी की छाया, मेरे द्वारा सृजन का और मेरे द्वारा किये गए नवनिर्माण का।

Friday, July 24, 2015

मेरी साइकिल पंचर कौन लोग करवाते थे यह तो पता हो गया है(क्योंकि केंद्र पर आते समय ठीक रही थी पर जाने से पूर्व ही पंचर होती थी मतलब एक पक्षीय, क्या वे कांटे एक दिशा विशेष से प्रभावित नहीं थे?) शाम के अँधेरे में| अभी स्वयं को जो मिला उससे पचाना आता ही नहीं मुझे जो मिला उसे देख परेशान हो गए हैं अभी से।

मेरी साइकिल पंचर कौन लोग करवाते थे यह तो पता हो गया है(क्योंकि केंद्र पर आते समय ठीक रही थी पर जाने से पूर्व ही पंचर होती थी मतलब एक पक्षीय, क्या वे कांटे एक दिशा विशेष से प्रभावित नहीं थे?) शाम के अँधेरे में| अभी स्वयं को जो मिला उससे पचाना आता ही नहीं मुझे जो मिला उसे देख परेशान हो गए हैं अभी से।

अब जोशी बताएँगे की उनका कार्य स्वयं सशरीर परमब्रह्म: विष्णुकांत और कृष्णकांत ने पूरा किया है की नहीं।

अब जोशी बताएँगे की उनका कार्य स्वयं सशरीर परमब्रह्म: विष्णुकांत और कृष्णकांत ने पूरा किया है की नहीं। 

मै प्रयागराज विश्विद्यालय के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडल एवं महासागर केंद्र पर गुरु(त्रिभुवननाथ शुक्ला जीजा जी), सह कर्मी बंधू(जिनके भाई मेरे ननिहाल बिशुनपुर में भी बहुत परेशान किये थे मेरा नियंत्रण भंग करवाने की कीमत पर: ये मेरे दादी के ननिहाल(दादी का ननिहाल भी वही रामानंद का खानदान था) के शंकर नाना के पौत्र थे और परमात्मा नाना के पुत्र थे और यहां समरनाथ मामा की कुटिल बुद्धि इतनी सी ही हो सकती है सोचकर इनकी बदमासी पर से ध्यान आज भी हटा लेता हूँ) के बाद तीसरा व्यक्ति आने वाला मै था और सके शिव(प्रेमचंद) के शैक्षिक गुरु जी(स्वयं स्वरुप मेरे नाना रमानाथ मिश्रा) सबको देख मै कह दिया था की यह मेरा घर है और कई बार मै स्वयं यहाँ शोध छात्र होने से मना किया था और आना भी नहीं चाहता था उस स्थान पर जहां पर सैकड़ों बार मेरी साईकिल पंचर कराई जाती थी शाम होने पर। यह क्या भाई रात में तो साईकिल कभी बन पाती थी कभी नहीं भी। -------मेरे अनुज और सहकर्मी आप मुझसे मेरिट में इस और आगे के ही नहीं जन्म जन्मान्तर नहीं होंगे। अतः इतराइये नहीं मेरिट देखी कैसे जाती है मई आप को कुछ दिन में बताऊंगा। जोशी(ब्रह्मा), श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(महेश) एक साथ जहां उपस्थित हो वहां मई अपना पक्ष रखना चाहता हूँ। मै विशष करके जोशी जी से केवल इतना कहना चाहूँगा की उनके उत्तराधिकारी और उनके गोत्र विशेष के एक उनके विशेष उत्तराधिकारी और उनके गोत्र के शिष्य गोत्र वाले बचकाना हरकत न करें नहीं तो जोशी जी आप की छाया मै अब उनपर बर्दास्त करने वाला नहीं क्योंकि आप के कार्यपूर्ती तक उनका बचकाना हरकत बर्दास्त था और मई अब सब कार्य पूर्ण समझ लिया हूँ और जो समझ गए हैं उनको समझा भी दिया हूँ और जो नहीं समझे है वे बहुत जल्दी अच्छे से समझ जाएंगे अब सब कार्य पूर्ण हैं।

मै प्रयागराज विश्विद्यालय के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडल एवं महासागर केंद्र पर गुरु(त्रिभुवननाथ शुक्ला जीजा जी), सह कर्मी बंधू(जिनके भाई मेरे ननिहाल बिशुनपुर में भी बहुत परेशान किये थे मेरा नियंत्रण भंग करवाने की कीमत पर: ये मेरे दादी के ननिहाल(दादी का ननिहाल भी वही रामानंद का खानदान था) के शंकर नाना के पौत्र थे और परमात्मा नाना के पुत्र थे और यहां समरनाथ मामा की कुटिल बुद्धि इतनी सी ही हो सकती है सोचकर इनकी बदमासी पर से ध्यान आज भी हटा लेता हूँ) के बाद तीसरा व्यक्ति आने वाला मै था और सके शिव(प्रेमचंद) के शैक्षिक गुरु जी(स्वयं स्वरुप मेरे नाना रमानाथ मिश्रा) सबको देख मै कह दिया था की यह मेरा घर है और कई बार मै स्वयं यहाँ शोध छात्र होने से मना किया था और आना भी नहीं चाहता था उस स्थान पर जहां पर सैकड़ों बार मेरी साईकिल पंचर कराई जाती थी शाम होने पर। यह क्या भाई रात में तो साईकिल कभी बन पाती थी कभी नहीं भी। -------मेरे अनुज और सहकर्मी आप मुझसे मेरिट में इस और आगे के ही नहीं जन्म जन्मान्तर नहीं होंगे। अतः इतराइये नहीं मेरिट देखी कैसे जाती है मई आप को कुछ दिन में बताऊंगा। जोशी(ब्रह्मा), श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(महेश) एक साथ जहां उपस्थित हो वहां मई अपना पक्ष रखना चाहता हूँ। मै विशष करके जोशी जी से केवल इतना कहना चाहूँगा की उनके उत्तराधिकारी और उनके गोत्र विशेष के एक उनके विशेष उत्तराधिकारी और उनके गोत्र के शिष्य गोत्र वाले बचकाना हरकत न करें नहीं तो जोशी जी आप की छाया मै अब उनपर बर्दास्त करने वाला नहीं क्योंकि आप के कार्यपूर्ती तक उनका बचकाना हरकत बर्दास्त था और मई अब सब कार्य पूर्ण समझ लिया हूँ और जो समझ गए हैं उनको समझा भी दिया हूँ और जो नहीं समझे है वे बहुत जल्दी अच्छे से समझ जाएंगे अब सब कार्य पूर्ण हैं।

This is the reason why most learned person of various field do not want that this centre place and University(of this central palce) of world grow so much that people of this region avoid to go out of this region which will certainly causes a huge world wide problem.>>>>>>>>If people of the central India in general do not want to become resident of the remote region out of Prayagraj/Allahabad/Triveni /Sangam, then I will appreciate the Idea that we should reduce our population in a very large scale and thus Indians live surrounding the Prayagraj i.e surrounding the area of Prayagraj-Kashi and Mathura-Ayodhya only and thus whole world live in the extended India only(Akhand-Bharat).

This is the reason why most learned person of various field do not want that this centre place and University(of this central palce) of world grow so much that people of this region avoid to go out of this region which will certainly causes a huge world wide problem.>>>>>>>>If people of the central India in general do not want to become resident of the remote region out of Prayagraj/Allahabad/Triveni /Sangam, then I will appreciate the Idea that we should reduce our population in a very large scale and thus Indians live surrounding the Prayagraj i.e surrounding the area of Prayagraj-Kashi and Mathura-Ayodhya only and thus whole world live in the extended India only(Akhand-Bharat).

जोशी(ब्रह्मा), श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(महेश) एक साथ जहां उपस्थित हो वहां मई अपना पक्ष रखना चाहता हूँ। मै विशष करके जोशी जी से केवल इतना कहना चाहूँगा की उनके उत्तराधिकारी और उनके गोत्र विशेष के एक उनके विशेष उत्तराधिकारी और उनके गोत्र के शिष्य गोत्र वाले बचकाना हरकत न करें नहीं तो जोशी जी आप की छाया मै अब उनपर बर्दास्त करने वाला नहीं क्योंकि आप के कार्यपूर्ती तक उनका बचकाना हरकत बर्दास्त था और मई अब सब कार्य पूर्ण समझ लिया हूँ और जो समझ गए हैं उनको समझा भी दिया हूँ और जो नहीं समझे है वे बहुत जल्दी अच्छे से समझ जाएंगे अब सब कार्य पूर्ण हैं।

जोशी(ब्रह्मा), श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(महेश) एक साथ जहां उपस्थित हो वहां मई अपना पक्ष रखना चाहता हूँ। मै विशष करके जोशी जी से केवल इतना कहना चाहूँगा की उनके उत्तराधिकारी और उनके गोत्र विशेष के एक उनके विशेष उत्तराधिकारी और उनके गोत्र के शिष्य गोत्र वाले बचकाना हरकत न करें नहीं तो जोशी जी आप की छाया मै अब उनपर बर्दास्त करने वाला नहीं क्योंकि आप के कार्यपूर्ती तक उनका बचकाना हरकत बर्दास्त था और मई अब सब कार्य पूर्ण समझ लिया हूँ और जो समझ गए हैं उनको समझा भी दिया हूँ और जो नहीं समझे है वे बहुत जल्दी अच्छे से समझ जाएंगे अब सब कार्य पूर्ण हैं।

Vishnukant=Lord of Vishnu=Pramabrahm(Brahma+Vishnu+Mahesh). This is my energy and therefore my first son named Vishnukant by me. Second son named Krishnkant=Lord of Krishna=means its again Parambrahma(Brahma+ Vishnu+Mahesh) or Krishna of the just in the battle of the Mahabharat at the time of preaching to Arjuna| || इसी दिन के लिए मई थमा था की लोग जाने की मै जोशी(ब्रह्मा), श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(महेश) की सम्मिलत शक्ति स्वयं था। जब लोग मान लेंगे तभी मई लेखनी बंद कर भौतिक संसार के कार्य में किशी को भी पछाड़ने की क्रिया में लग्न होऊंगा। मुझे चन्द्रमा और शुक्राचार्य की शिक्षा और शक्ति नहीं चाहिए। वे स्वयं मेरी शक्ति पर प्रयागराज में कायम रहे जोशी के वादे को पूर्ण करने और इस सृस्टि को संरक्षित रखते हुए उनके वादे को पूर्ण करने और सामान्य ढंग से उसके सञ्चालन को जारी रखने हेतु। दुःख इस बात का है की जोशी के सिपहसालार जोशी से तो लाभ लिए हर तरह से और मुझको यह समझे की जोशी का मई एहसानमंद हूँ जिसको की उनके कार्यपूर्ती हेतु भेजा गया था विष्णु (श्रीधर) और महेश(प्रेमचंद) द्वारा। मई जोशी और जोशी के नाम का हर तरहसे भरपूर लाभ लेने वालों का एहसान मंद नहीं नहीं हूँ और अगर संका स्वयं जोशी को हो तो वे स्वयं तथा विष्णु (श्रीधर) और महेश(प्रेमचंद) स्वयं उपस्थित हो क्रमवार जानकारी लें मुझसे की किश तरह से उनका कार्य पूर्ण किया गया मेरे द्वारा उनके उत्तराधिकारियों द्वारा सब तरह के अपमान सह वह यह जोशी का ही कार्य पूर्ण हो जाय भले ही उनके उत्तराधिकारी मुझको कुछ भी कहें और कैसा भी व्यवहार करें। -----------कहा जाता है की जो लोग क्षमतावान होते है वे कुछ कहते नहीं करते है तो मई सब कुछ कर चुका था फिर भी जोशी के ही लोग जोशी के हेतु किये कार्य को अपना कार्य बताने हेतु जोशी का कार्य नहीं मान रहे थे। क्योंकि मुझसे उनको द्वेष और ईर्ष्या तथा आतंरिक दुश्मनी रही होगी कोई। पर इसी दिन के लिए मई थमा था की लोग जाने की मै जोशी(ब्रह्मा), श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(महेश) की सम्मिलत शक्ति स्वयं था। जब लोग मान लेंगे तभी मई लेखनी बंद कर भौतिक संसार के कार्य में किशी को भी पछाड़ने की क्रिया में लग्न होऊंगा। मुझे चन्द्रमा और शुक्राचार्य की शिक्षा और शक्ति नहीं चाहिए। वे स्वयं मेरी शक्ति पर प्रयागराज में कायम रहे जोशी के वादे को पूर्ण करने और इस सृस्टि को संरक्षित रखते हुए उनके वादे को पूर्ण करने और सामान्य ढंग से उसके सञ्चालन को जारी रखने हेतु।

Vishnukant=Lord of Vishnu=Pramabrahm(Brahma+Vishnu+Mahesh). This is my energy and therefore my first son named Vishnukant by me. Second son named Krishnkant=Lord of Krishna=means its again Parambrahma(Brahma+ Vishnu+Mahesh) or Krishna of the just in the battle of the Mahabharat at the time of preaching to Arjuna| || इसी दिन के लिए मई थमा था की लोग जाने की मै जोशी(ब्रह्मा), श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(महेश) की सम्मिलत शक्ति स्वयं था। जब लोग मान लेंगे तभी मई लेखनी बंद कर भौतिक संसार के कार्य में किशी को भी पछाड़ने की क्रिया में लग्न होऊंगा। मुझे चन्द्रमा और शुक्राचार्य की शिक्षा और शक्ति नहीं चाहिए। वे स्वयं मेरी शक्ति पर प्रयागराज में कायम रहे जोशी के वादे को पूर्ण करने और इस सृस्टि को संरक्षित रखते हुए उनके वादे को पूर्ण करने और सामान्य ढंग से उसके सञ्चालन को जारी रखने हेतु। दुःख इस बात का है की जोशी के सिपहसालार जोशी से तो लाभ लिए हर तरह से और मुझको यह समझे की जोशी का मई एहसानमंद हूँ जिसको की उनके कार्यपूर्ती हेतु भेजा गया था विष्णु (श्रीधर) और महेश(प्रेमचंद) द्वारा।  मई जोशी और जोशी के नाम का हर तरहसे भरपूर लाभ लेने वालों का एहसान मंद नहीं नहीं हूँ और अगर संका स्वयं जोशी को हो तो वे स्वयं तथा  विष्णु (श्रीधर) और महेश(प्रेमचंद) स्वयं उपस्थित हो क्रमवार जानकारी लें मुझसे की किश तरह से उनका कार्य पूर्ण किया गया मेरे द्वारा उनके उत्तराधिकारियों द्वारा सब तरह के अपमान सह वह यह जोशी का ही कार्य पूर्ण हो जाय भले ही उनके उत्तराधिकारी मुझको कुछ भी कहें और कैसा भी व्यवहार करें। -----------कहा जाता है की जो लोग क्षमतावान होते है वे कुछ कहते नहीं करते है तो मई सब कुछ कर चुका था फिर भी जोशी के ही लोग जोशी के हेतु किये कार्य को अपना कार्य बताने हेतु जोशी का कार्य नहीं मान रहे थे। क्योंकि मुझसे उनको द्वेष और ईर्ष्या तथा आतंरिक दुश्मनी रही होगी कोई। पर इसी दिन के लिए मई थमा था की लोग जाने की मै जोशी(ब्रह्मा), श्रीधर(विष्णु) और प्रेमचंद(महेश) की सम्मिलत शक्ति स्वयं था। जब लोग मान लेंगे तभी मई लेखनी बंद कर भौतिक संसार के कार्य में किशी को भी पछाड़ने की क्रिया में लग्न होऊंगा। मुझे चन्द्रमा और शुक्राचार्य की शिक्षा और शक्ति नहीं चाहिए। वे स्वयं मेरी शक्ति पर प्रयागराज में कायम रहे जोशी के वादे को पूर्ण करने और इस सृस्टि को संरक्षित रखते हुए उनके वादे को पूर्ण करने और सामान्य ढंग से उसके सञ्चालन को जारी रखने हेतु। 

If people of the central India in general do not want to become resident of the remote region out of Prayagraj/Allahabad/Triveni/Sangam, then I will appreciate the Idea that we should reduce our population in a very large scale and thus Indians live surrounding the Prayagraj i.e surrounding the area of Prayagraj-Kashi and Mathura-Ayodhya only thus whole world in the extended India only(Akhand-Bharat).

If people of the central India in general do not want to  become resident  of the remote region out of Prayagraj/Allahabad/Triveni/Sangam, then I will appreciate the Idea that we should reduce our population in a very large scale and thus Indians live surrounding the Prayagraj i.e surrounding the area of Prayagraj-Kashi and Mathura-Ayodhya only thus whole world in the extended India only(Akhand-Bharat).   

क्या किसान वह है जिसने पढने हेतु एक दिन भी अपने खेत में काम नहीं किया और पढने में भी केवल माध्यम स्तर का रहा और जिसके पढाई हेतु पुस्तैनी खेत का कुछ हिस्सा भी चला गया और जिस व्यव्शाय में आया उसमे भी प्रवेश हेतु श्रीकृष्ण और सुदामा की तरह किशी श्रीकृष्ण के अनुग्रह की भी चर्चा होती है पढ़ाई में उनके मध्यम स्तरीय की वजह से?

क्या  किसान वह है जिसने पढने हेतु एक दिन भी अपने खेत में काम नहीं किया और पढने में भी केवल माध्यम स्तर का रहा और जिसके पढाई हेतु पुस्तैनी खेत का कुछ हिस्सा भी चला गया और जिस व्यव्शाय में आया उसमे भी प्रवेश हेतु श्रीकृष्ण और सुदामा की तरह किशी श्रीकृष्ण के अनुग्रह की भी चर्चा होती है पढ़ाई में उनके मध्यम स्तरीय  की वजह से? 

अगर कोई किशी पत्र और पत्रिका या किशी मीडिआ के माध्यम से यह कहता है की इस विश्वविद्यालय के लिए किशी ने कुछ नहीं किया तो वह गलत है क्योंकि कम से कम जोशी के प्रयाश ने कुछ रंग लाया था जिसके गवाह हैं लगभग एक दर्जन स्थाई शिक्षक युक्त नए विषयों के केंद्र जो सञ्चालन में आने के कुछ समय बाद स्थायित्व व् पहचान पाये, पर यह जरूर है की जोशी की सत्ता को जिन लोगों ने संभाला वे क्या हैं? और क्या किये? और किस वाह्य शक्ति के दबाव में वे कार्य कर रहे हैं? और क्यों दबाव में हैं ? विचार कर इसका हल जरूरी है। जो सञ्चालन किये उन्होंने कुछ किया है। क्योंकि उनको ही अकेले दोस देना जरूरी नहीं, जो सत्ता का सञ्चालन किये और जो वर्तमान में कर रहे हैं वरन "किस वाह्य शक्ति के दबाव में वे कार्य कर रहे हैं? और क्यों दबाव में हैं? और इसमें उनका क्या स्वार्थ्य है?" यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। वास्तविकता तो यही है की विष्णु की उत्पत्ति गौतम के यहां और शिव की उत्पत्ति कश्यप के यहां और ब्रह्मा की उत्पत्ति अंगिरस/भारद्वाज के यहां ही होती है सामान्यतः| पर यह सदैव सर्वकालिक सत्य भी नहीं। पर यह सत्य है की विष्णु का मानव अवतार कश्यप के यहां ही अधिकतम हुआ है। लेकिन इस बार के ब्रह्मा(जोशी, अल्लाहाबाद) और उनके समर्थक(उनके वे उत्तरधिकारी जो प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय को अपनी सत्ता समझते है और अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिए अपने अभिकर्ता के द्वारा इस विश्वविद्यालय का संचालन चाहते है) स्वयं सनातन हिन्दू शास्त्रीय नियम की सीमा में बद्ध जीवन यापन अपने शिष्यों को नहीं शिखा सके या सीमा में बद्ध जीवन यापन सीखने में असमर्थ रहे, जबकि विष्णु (श्रीधर, विशुनपुर-223103, जौनपुर)) और शिव(प्रेम चंद, रामापुर-223225, आजमगढ़) जिसपर भरोषा किये जोशी के ही कार्यपूर्ती हेतु वह उस कार्य को पूर्ण करते हुए अपने जप, तप, संयम और त्याग के बल पर सर्वोच्च शिखर पर आज भी कायम है। जोशी के प्रयास से कुछ समय के लिए इस विश्वविद्यालय को जगा देने के बाद भी वर्तमान में इस विश्वविद्यालय का रसातल में चले जाना यह सिद्ध करता है की जो जड़ निद्रा में सोने का अभ्यस्त हो गया हो अपने व्यसन की वजह से वह हाँथीं की चिघ्घाड़ और सिंह की गर्जना से भी उठने वाला नहीं और उठ भी गया तो समय मिलते ही पुनः सो जाएगा। अगर कोई किशी पत्र और पत्रिका या किशी मीडिआ के माध्यम से यह कहता है की इस विश्वविद्यालय के लिए किशी ने कुछ नहीं किया तो वह गलत है क्योंकि कम से कम जोशी के प्रयाश ने कुछ रंग लाया था जिसके गवाह हैं लगभग एक दर्जन स्थाई शिक्षक युक्त नए विषयों के केंद्र जो सञ्चालन में आने के कुछ समय बाद स्थायित्व व् पहचान पाये, पर यह जरूर है की जोशी की सत्ता को जिन लोगों ने संभाला वे क्या हैं? और क्या किये? और किस वाह्य शक्ति के दबाव में वे कार्य कर रहे हैं? और क्यों दबाव में हैं ? विचार कर इसका हल जरूरी है। जो सञ्चालन किये उन्होंने कुछ किया है। क्योंकि उनको ही अकेले दोस देना जरूरी नहीं, जो सत्ता का सञ्चालन किये और जो वर्तमान में कर रहे हैं वरन "किस वाह्य शक्ति के दबाव में वे कार्य कर रहे हैं? और क्यों दबाव में हैं? और इसमें उनका क्या स्वार्थ्य है?" यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अगर कोई किशी पत्र और पत्रिका या किशी मीडिआ के माध्यम से यह कहता है की इस विश्वविद्यालय के लिए किशी ने कुछ नहीं किया तो वह गलत है क्योंकि कम से कम जोशी के प्रयाश ने कुछ रंग लाया था जिसके गवाह हैं लगभग एक दर्जन स्थाई शिक्षक युक्त नए विषयों के केंद्र जो सञ्चालन में आने के कुछ समय बाद स्थायित्व व् पहचान पाये, पर यह जरूर है की जोशी की सत्ता को जिन लोगों ने संभाला वे क्या हैं? और क्या किये? और किस वाह्य शक्ति के दबाव में वे कार्य कर रहे हैं? और क्यों दबाव में हैं ? विचार कर इसका हल जरूरी है। जो सञ्चालन किये उन्होंने कुछ किया है। क्योंकि उनको ही अकेले दोस देना जरूरी नहीं, जो सत्ता का सञ्चालन किये और जो वर्तमान में कर रहे हैं वरन "किस वाह्य शक्ति के दबाव में वे कार्य कर रहे हैं? और क्यों दबाव में हैं? और इसमें उनका क्या स्वार्थ्य है?" यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। वास्तविकता तो यही है की विष्णु की उत्पत्ति गौतम के यहां और शिव की उत्पत्ति कश्यप के यहां और ब्रह्मा की उत्पत्ति अंगिरस/भारद्वाज के यहां ही होती है सामान्यतः| पर यह सदैव सर्वकालिक सत्य भी नहीं। पर यह सत्य है की विष्णु का मानव अवतार कश्यप के यहां ही अधिकतम हुआ है। लेकिन इस बार के ब्रह्मा(जोशी, अल्लाहाबाद) और उनके समर्थक(उनके वे उत्तरधिकारी जो प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय को अपनी सत्ता समझते है और अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिए अपने अभिकर्ता के द्वारा इस विश्वविद्यालय का संचालन चाहते है) स्वयं सनातन हिन्दू शास्त्रीय नियम की सीमा में बद्ध जीवन यापन अपने शिष्यों को नहीं शिखा सके या सीमा में बद्ध जीवन यापन सीखने में असमर्थ रहे, जबकि विष्णु (श्रीधर, विशुनपुर-223103, जौनपुर)) और शिव(प्रेम चंद, रामापुर-223225, आजमगढ़) जिसपर भरोषा किये जोशी के ही कार्यपूर्ती हेतु वह उस कार्य को पूर्ण करते हुए अपने जप, तप, संयम और त्याग के बल पर सर्वोच्च शिखर पर आज भी कायम है। जोशी के प्रयास से कुछ समय के लिए इस विश्वविद्यालय को जगा देने के बाद भी वर्तमान में इस विश्वविद्यालय का रसातल में चले जाना यह सिद्ध करता है की जो जड़ निद्रा में सोने का अभ्यस्त हो गया हो अपने व्यसन की वजह से वह हाँथीं की चिघ्घाड़ और सिंह की गर्जना से भी उठने वाला नहीं और उठ भी गया तो समय मिलते ही पुनः सो जाएगा। अगर कोई किशी पत्र और पत्रिका या किशी मीडिआ के माध्यम से यह कहता है की इस विश्वविद्यालय के लिए किशी ने कुछ नहीं किया तो वह गलत है क्योंकि कम से कम जोशी के प्रयाश ने कुछ रंग लाया था जिसके गवाह हैं लगभग एक दर्जन स्थाई शिक्षक युक्त नए विषयों के केंद्र जो सञ्चालन में आने के कुछ समय बाद स्थायित्व व् पहचान पाये, पर यह जरूर है की जोशी की सत्ता को जिन लोगों ने संभाला वे क्या हैं? और क्या किये? और किस वाह्य शक्ति के दबाव में वे कार्य कर रहे हैं? और क्यों दबाव में हैं ? विचार कर इसका हल जरूरी है। जो सञ्चालन किये उन्होंने कुछ किया है। क्योंकि उनको ही अकेले दोस देना जरूरी नहीं, जो सत्ता का सञ्चालन किये और जो वर्तमान में कर रहे हैं वरन "किस वाह्य शक्ति के दबाव में वे कार्य कर रहे हैं? और क्यों दबाव में हैं? और इसमें उनका क्या स्वार्थ्य है?" यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।

Thursday, July 23, 2015

महामाया(लक्ष्मी) जी को कम से कम एक पंचवर्षीय योजना बना तमिल प्रवास करना चाहिए एक सामान्य नारी बनकर और सामान्य जीवन जीकर तब उनके भेजे के अंदर मेरी बात अवश्य जाएगी।

महामाया(लक्ष्मी) जी को कम से कम एक पंचवर्षीय योजना बना तमिल प्रवास करना चाहिए एक सामान्य नारी बनकर और सामान्य जीवन जीकर तब उनके भेजे के अंदर मेरी बात अवश्य जाएगी।  

All the women including Sati/Parvati are daughter of Daksh Prajapati of the Kashi who was physical son of Lord Brahma and Saraswati excluding Lakshmi and itself Saraswati. Lord Brahma and then Vishnu married first then Lord Shiva Married although Lord Shiva, Lord Vishnu and then Brahma came in existence that seniority order maintained at Kashi today too. And for Prayagraj its order is Brahma, Vishnu and Mahesh this may be based on their marriage.

All the women including Sati/Parvati are daughter of Daksh Prajapati of the Kashi who was physical son of Lord Brahma and Saraswati excluding Lakshmi and itself Saraswati. Lord Brahma and then Vishnu married first then Lord Shiva Married although Lord Shiva, Lord Vishnu and then Brahma came in existence that seniority order maintained at Kashi today too. And for Prayagraj its order is Brahma, Vishnu and Mahesh this may be based on their marriage.

सती:पारवती को छोड़ दक्ष प्रजापति की सभी कन्याओं का विवाह कश्यप से हुआ था और इस प्रकार हिमालय के दोनों किनारे को अपना ठिकाना बनाये महादेव शिवशंकर(कैलाश पर्वत) और कश्यप(कश्मीर) आपस में शाढु भाई हैं। कश्यप की दूसरी पत्नी अदिति के पुत्रों मतलब आदित्य से समस्त इंद्र, विश्वकर्मा, पवन, वरुण, अग्नि, धरणी, निलय जैसे देवता सहित चन्द्र देव/यदुवंश/वृष्टि वंस/श्रीकृष्ण, सूर्यदेव/सूर्यवंश/रघुवंश/श्रीराम और सावर्ण ऋषि का जन्म हुआ और जिसमे से उनकी पहली पत्नी दिति से सभी दानव जन्म लिए तथा अन्य पत्नियों से नरवंश, नागवंश, किन्नर वंस, गन्धर्व वंश, गरुण(विष्णु का वाहन), अरुण(सूर्यसारथी)।>>>>>>तो दैत्यों को नियंत्रित/ह्रदय परिवर्तन कौन गोत्रीय करेगा यह तो कश्यप ऋषी के यहाँ अधिकतम विष्णु अवतार और उनके द्वारा दैत्यों का विनाश/दैत्यों का ह्रदय परिवर्तन इसका उदाहरण है।

सती:पारवती को छोड़ दक्ष प्रजापति की सभी कन्याओं का विवाह कश्यप से हुआ था और इस प्रकार हिमालय के दोनों किनारे को अपना ठिकाना बनाये महादेव शिवशंकर(कैलाश पर्वत) और कश्यप(कश्मीर) आपस में शाढु भाई हैं। कश्यप की दूसरी पत्नी अदिति के पुत्रों मतलब आदित्य से समस्त इंद्र, विश्वकर्मा, पवन, वरुण, अग्नि, धरणी, निलय जैसे देवता सहित चन्द्र देव/यदुवंश/वृष्टि वंस/श्रीकृष्ण, सूर्यदेव/सूर्यवंश/रघुवंश/श्रीराम और सावर्ण ऋषि का जन्म हुआ  और जिसमे से उनकी पहली पत्नी दिति से सभी दानव जन्म लिए तथा अन्य पत्नियों  से  नरवंश, नागवंश, किन्नर वंस, गन्धर्व वंश, गरुण(विष्णु का वाहन), अरुण(सूर्यसारथी)।>>>>>>तो दैत्यों को नियंत्रित/ह्रदय परिवर्तन कौन गोत्रीय करेगा यह तो कश्यप ऋषी के यहाँ अधिकतम विष्णु अवतार और उनके द्वारा दैत्यों का विनाश/दैत्यों का ह्रदय परिवर्तन इसका उदाहरण है।

गर्ग के गुरु भारद्वाज के गुरु बाल्मीक के पिता वरुणदेव का पिता कश्यप और इस प्रकार भारद्वाज के गुरु कश्यप और इस प्रकार गर्ग के भी गुरु कश्यप तथा वशिष्ठ के पुत्र शांडिल्य के मामा कश्यप। तो मामा और गुरु अगर बड़े होते हैं तो मै, कश्यप स्वयं शांडिल्य और गर्ग से बड़ा हुआ। इस प्रकार सूर्यवंश(कश्यप गोत्रीय क्षत्रियों) द्वारा निर्धारित तीन श्रेष्ठतम गोत्र (गर्ग, गौतम, शांडिल्य) में से केवल गौतम मुझसे बड़े हुए। वरिष्ठता सभी अनुमानित लगभग 105 मानव जगत के गोत्रों पर कश्यप की है । उनसे केवल गुणवत्ता में वशिष्ठ और गौतम श्रेष्ठ हुए। यह भी सत्य की ब्राह्मणत्व की दृस्टि से सर्वोच्च गोत्र भृगु ही है इसमे कोई संदेह नहीं यहां तक की श्रीकृष्ण ने अपने को ऋषियों में भृगु ही कहा है। [गलत फहमी दूर हो लोगों से की दशरथ के बहन का विवाह वशिष्ठ से हुआ था वरन सत्य यह है की दशरथ स्वयं कश्यप ऋषि के अवतार जरूर थे पर कश्यप ऋषि के कुल की कन्या का विवाह वशिष्ठ ऋषि से हुआ था वह दशरथ अवतार से पूर्व की बात है। और वर्तमान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में ही मतलब कश्यप ऋषि द्वारा बसाये गए कश्मीर में ही कश्यप कुल की इस कन्या और वशिष्ठ से जन्म ली संतान शांडिल्य का जन्म हुआ था।)

गर्ग के गुरु भारद्वाज के गुरु बाल्मीक के पिता वरुणदेव का पिता कश्यप और इस प्रकार भारद्वाज के गुरु कश्यप और इस प्रकार गर्ग के भी गुरु कश्यप तथा वशिष्ठ के पुत्र शांडिल्य के मामा कश्यप। तो मामा और गुरु अगर बड़े होते हैं तो मै, कश्यप स्वयं शांडिल्य और गर्ग से बड़ा हुआ। इस प्रकार सूर्यवंश(कश्यप गोत्रीय क्षत्रियों) द्वारा निर्धारित तीन श्रेष्ठतम गोत्र (गर्ग, गौतम, शांडिल्य) में से केवल गौतम मुझसे बड़े हुए। वरिष्ठता सभी अनुमानित लगभग 105 मानव जगत के गोत्रों पर कश्यप की है । उनसे केवल गुणवत्ता में वशिष्ठ और गौतम श्रेष्ठ हुए। यह भी सत्य की ब्राह्मणत्व की दृस्टि से सर्वोच्च गोत्र भृगु ही है इसमे कोई संदेह नहीं यहां तक की श्रीकृष्ण ने अपने को ऋषियों में भृगु ही कहा है। [गलत फहमी दूर हो लोगों से की दशरथ के बहन का विवाह वशिष्ठ से हुआ था वरन सत्य यह है की दशरथ स्वयं कश्यप ऋषि के अवतार जरूर थे पर कश्यप ऋषि के कुल की कन्या का विवाह वशिष्ठ ऋषि से हुआ था वह दशरथ अवतार से पूर्व की बात है। और वर्तमान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में ही मतलब कश्यप ऋषि द्वारा बसाये गए कश्मीर में ही कश्यप कुल की इस कन्या और वशिष्ठ से जन्म ली संतान शांडिल्य का जन्म हुआ था।)

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

2001 से ही प्रयागराज में धन्वनतरी समूह, उनके वंसज और परिवार तथा उनसे धन्वन्तरीयों से जुड़े हुए लोग मुझे प्रयागराज में मानवता शिखा रहे थे और जिस दक्षिण में उत्तर के विश्वकर्मा के वसजों की कभी भी दाल न गली और 3 माह में मैंने वहां की सब राजनीती भेद दिया अम्बेडकर को हनुमान बता तो वे उत्तर के विश्वकर्मा के वंसज स्वयं दक्षिण के विश्वकर्मा के वंसज में बचाव में स्वयं मेरे सामने आ गए और मुझे अभियांत्रिकी और तकनिकी की श्रेष्ठता सीखा रहे थे तो उनको भी बताना पड़ा की कश्यप के पौत्र विश्वकर्मा के पेशेवर वंसज आप चुप हो जाइए क्योंकि मै स्वयं कश्यप हूँ। अभी आंबेडकर को हनुमान बताया ही था की 2009 की मेरा पूर्ण शास्त्रीय विधि मान्य विवाह 2008 में हो चूका था तो प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय के विशेष समूह के लोग पुनः मुझे लोग कमजोर समझ लिए गृहस्ती में आ जाने पर(की अगर नहीं भी कमजोर हैं तो इनको पारिवारिक साम-दाम-दंड-भेद से किशी भी तरह कमजोर किया जा सकता है) तो >>>>>>>>दूसरा खुलासा प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज में करना पड़ा की आप के नगर रक्षक अम्बेडकर मतलब हनुमान जी भी शादीसुदा थे और "जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी" थे। (वैसे मै यह न चाहते हुए भी सार्वजनिक किया था इन प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज के तथाकथित ठीकेदारों की करतूत की वजह से। सार्वजनिक इस लिए नहीं करना चाहता था की लोग उनको अखण्ड आजीवन ब्रह्मचारी आज तक जानते थे। और सार्वजनिक खुलासा भी किया की वे अपने गुरु सूर्यदेन/सूर्यनारायण की गुरुदक्षिणा को पूर्ण करने हेतु उनकी पुत्री सुवर्चला से विवाह किये थी और मकरध्वज उनके पुत्र थे जो अपने माँ सुवर्चला के साथ रावण के भाई अहिरावण जो विश्व का सर्वोच्च माफिया था उसकी की नगरी पातालपुरी(वर्तमान विश्व का तथाकथित सर्वशक्तिशाली देश) में रहती थी। अहिरावण द्वारा मायावी तरीके से रामायण के युद्ध क्षेत्र से सोते समय ही श्रीराम -लक्षमण का हरण करने पर हनुमान पवनवेग से बगल से गुजर अप्रत्यक्ष रूप से अहिरावण के मायावी 5 दीपक बुझा (सीधे तौर पर दीपक बुझाना हिन्दू धर्म की मान्यता में नहीं है जिसके कारन श्रीराम-लक्षमण ऐसा नहीं कर सकते थे) जब उसकी नगरी में प्रवेश कर अहिरावण को मार कर आ रहे थे तो श्रीराम -लक्षमण की उपस्थिति में मकरध्वज का पातालपुरी के राजा के रूप में राज्याभिषेक कर वे लोग वापस आ गए थे)। अम्बेडकर/हनुमान जी के व्यक्तिगत जीवन को सार्वजनिक करने को उनके प्रयागराज वासी और उसमे से विशेष रूप से प्रयागराज विश्वविद्यालय के लोग ही जिम्मेदार हैं जो अम्बेडकर का अवतार समझते थे और प्रयागराज और प्रयागराज विश्विद्यालय पर अपना एक छत्रराज्य चाह रहे थे। प्रयागराज और प्रयागराज विश्विद्यालय लोगों को समझना होगा की यहां गंगा और यमुना का मिलान दोनों को गंगा बनाता है और इन दोनों के माध्यम से कृष्ण और राम मिलकर राम ही बनते है और इस प्रकार आंबेडकर/आंबवडेकर/हनुमान द्वितीय परमब्रह्म जरूर हो सकते हैं पर प्रथम परमब्रह्म राम(कृष्ण) ही होते है और अम्बेडकर/हनुमान को राम अपना भाई अवश्य मानते है(तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई) पर राम(कृष्ण) की महिमा अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान से ज्यादा ही है।

2001 से ही प्रयागराज में धन्वनतरी समूह, उनके वंसज और परिवार तथा उनसे धन्वन्तरीयों से जुड़े हुए लोग मुझे प्रयागराज में मानवता शिखा रहे थे और जिस दक्षिण में उत्तर के विश्वकर्मा के वसजों की कभी भी दाल न गली और 3 माह में मैंने वहां की सब राजनीती भेद दिया अम्बेडकर को हनुमान बता तो वे उत्तर के विश्वकर्मा के वंसज स्वयं दक्षिण के विश्वकर्मा के वंसज में बचाव में स्वयं मेरे सामने आ गए और मुझे अभियांत्रिकी और तकनिकी की श्रेष्ठता सीखा रहे थे तो उनको भी बताना पड़ा की कश्यप के पौत्र विश्वकर्मा के पेशेवर वंसज आप चुप हो जाइए क्योंकि मै स्वयं कश्यप हूँ। अभी आंबेडकर को हनुमान बताया ही था की 2009 की मेरा पूर्ण शास्त्रीय विधि मान्य विवाह 2008 में हो चूका था तो प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय के विशेष समूह के लोग पुनः मुझे लोग कमजोर समझ लिए गृहस्ती में आ जाने पर(की अगर नहीं भी कमजोर हैं तो इनको पारिवारिक साम-दाम-दंड-भेद से किशी भी तरह कमजोर किया जा सकता है) तो >>>>>>>>दूसरा खुलासा प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज में करना पड़ा की आप के नगर रक्षक अम्बेडकर मतलब हनुमान जी भी शादीसुदा थे और "जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी" थे। (वैसे मै यह न चाहते हुए भी सार्वजनिक किया था इन प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज के तथाकथित ठीकेदारों की करतूत की वजह से। सार्वजनिक इस लिए नहीं करना चाहता था की लोग उनको अखण्ड आजीवन ब्रह्मचारी आज तक जानते थे। और सार्वजनिक खुलासा भी किया की वे अपने गुरु सूर्यदेन/सूर्यनारायण की गुरुदक्षिणा को पूर्ण करने हेतु उनकी पुत्री सुवर्चला से विवाह किये थी और मकरध्वज उनके पुत्र थे जो अपने माँ सुवर्चला के साथ रावण के भाई अहिरावण जो विश्व का सर्वोच्च माफिया था उसकी की नगरी पातालपुरी(वर्तमान विश्व का तथाकथित सर्वशक्तिशाली देश) में रहती थी। अहिरावण द्वारा मायावी तरीके से रामायण के युद्ध क्षेत्र से सोते समय ही श्रीराम -लक्षमण का हरण करने पर हनुमान पवनवेग से बगल से गुजर अप्रत्यक्ष रूप से अहिरावण के मायावी 5 दीपक बुझा (सीधे तौर पर दीपक बुझाना हिन्दू धर्म की मान्यता में नहीं है जिसके कारन श्रीराम-लक्षमण ऐसा नहीं कर सकते थे) जब उसकी नगरी में प्रवेश कर अहिरावण को मार कर आ रहे थे तो श्रीराम -लक्षमण की उपस्थिति में मकरध्वज का पातालपुरी के राजा के रूप में राज्याभिषेक कर वे लोग वापस आ गए थे)। अम्बेडकर/हनुमान जी के व्यक्तिगत जीवन को सार्वजनिक करने को उनके प्रयागराज वासी और उसमे से विशेष रूप से प्रयागराज विश्वविद्यालय के लोग ही जिम्मेदार हैं जो अम्बेडकर का अवतार समझते थे और प्रयागराज और प्रयागराज विश्विद्यालय पर अपना एक छत्रराज्य चाह रहे थे। प्रयागराज और प्रयागराज विश्विद्यालय लोगों को समझना होगा की यहां गंगा और यमुना का मिलान दोनों को गंगा बनाता है और इन दोनों के माध्यम से कृष्ण और राम मिलकर राम ही बनते है और इस प्रकार आंबेडकर/आंबवडेकर/हनुमान द्वितीय परमब्रह्म जरूर हो सकते हैं पर प्रथम परमब्रह्म राम(कृष्ण) ही होते है और अम्बेडकर/हनुमान को राम अपना भाई अवश्य मानते है(तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई) पर राम(कृष्ण) की महिमा अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान से ज्यादा ही है। 

Wednesday, July 22, 2015

किसने क्या किया मै क्यों बताऊँ जब सत्य सामने न लाया जा सका पर मई जनता हूँ जिसने जो किया उसका जबाब और वह प्रगतिशील सत्य आप को दे रहा हूँ। मई क्यों बताऊँ की मई किसका जबाव दे रहा। लेकिन मेरा जबाब तो मानवता की रक्षा के लिए है और उन्होंने जो किया वह मदांधता ही कहा जा सकता है। और अगर उनकी मदांधता से ब्रह्मास्त्र चले थे तो उसका जबाब देने वाला सब ब्रह्मास्त्र सह गया मतलब सभी ब्रह्मास्त्रों को हाँथ से पकड़कर स्वयं अपने तरकस में रखा लिया था और वह ब्रह्मास्त्र अब मानवता की रक्षा हेतु प्रयोग में आएगा और वैसे भी ब्रह्मास्त्र मानवता की रक्षा हेतु ही चलाने के लिए ब्रह्मा से प्राप्त किये जाते है और अमानवीय प्रयोग में यह काम तो कर सकता है पर परमब्रह्म श्रीकृष्ण के द्वारा उस निर्दोस परीक्षित को प्राणदान मिल ही जाता है जिस निर्दोष पर अश्वत्थामा जैसे लोग प्रतिशोध में आकर अमानवीय व्यवहार करते हुए ब्रह्मास्त्र चलाते है ।

किसने क्या किया मै क्यों बताऊँ जब सत्य सामने न लाया जा सका पर मई जनता हूँ जिसने जो किया उसका जबाब और वह प्रगतिशील सत्य आप को दे रहा हूँ। मई क्यों बताऊँ की मई किसका जबाव दे रहा। लेकिन मेरा जबाब तो मानवता की रक्षा के लिए है और उन्होंने जो किया वह मदांधता ही कहा जा सकता है। और अगर उनकी मदांधता से ब्रह्मास्त्र चले थे तो उसका जबाब देने वाला सब ब्रह्मास्त्र सह गया मतलब सभी ब्रह्मास्त्रों को हाँथ से पकड़कर स्वयं अपने तरकस में रखा लिया था और वह ब्रह्मास्त्र अब मानवता की रक्षा हेतु प्रयोग में आएगा और वैसे भी ब्रह्मास्त्र मानवता की रक्षा हेतु ही चलाने के लिए ब्रह्मा से प्राप्त किये जाते है और अमानवीय प्रयोग में यह काम तो कर सकता है पर परमब्रह्म श्रीकृष्ण के द्वारा उस निर्दोस परीक्षित को प्राणदान मिल ही जाता है जिस निर्दोष पर अश्वत्थामा जैसे लोग प्रतिशोध में आकर अमानवीय व्यवहार करते हुए ब्रह्मास्त्र चलाते है । 

The 2008 presidential campaign of Barack Hussein(Islamic proves Islamic origin and Islamic name itself ) Obama, then junior United States Senator from Illinois, was announced at an event on February 10, 2007 who taken oath on 20th January, 2009. Thus person against me should needed to quit United State of America in 2009, if they and their agents made an association or lobbying in Hindus due to myself belonging from the Village, Ramapur, Azamgarh-223225 which is donated by Landlord who followed the Islam(Muslim) although his origin was Sanatan Hindu(Kshatriya). The persons whose village and cities name is Faizabad, Mirzapur, Nizamuddeenpur, Haazipur, Rahimpur, Kareempur, Sultanpur, Akbarpur, Muhammadpur, Allahabad, Shahjahanpur, Aligarh , Allahapur, Hyderabad and others too many cities and villages named by Islamic words should also boycotted by the Hindus and Christians. Thus in this way my village and my maternal village Ramapur and Bishunpur is the holiest because the inner core of my homes are these.

The 2008 presidential campaign of Barack Hussein(Islamic proves Islamic  origin and Islamic name itself ) Obama, then junior United States Senator from Illinois, was announced at an event on February 10, 2007 who taken oath on 20th January, 2009. Thus person against me should needed to quit United State of America in 2009, if they and their agents made an association or lobbying in Hindus due to myself belonging from the Village, Ramapur, Azamgarh-223225 which is donated by Landlord who followed the Islam(Muslim) although his origin was Sanatan Hindu(Kshatriya).   The persons whose village and cities name is Faizabad, Mirzapur, Nizamuddeenpur, Haazipur, Rahimpur, Kareempur, Sultanpur, Akbarpur, Muhammadpur, Allahabad, Shahjahanpur, Aligarh , Allahapur, Hyderabad and others too many cities and villages named by Islamic words should also boycotted by the Hindus and Christians. Thus in this way my village and my maternal village Ramapur and Bishunpur is the holiest because the inner core of my homes are these.  

जिस समुदाय के द्वारा दिए 500 बीघे दान की जमीन पर मेरे गाँव रामपुर, आजमगढ़--223225 के बसे होने से मेरे विरुद्ध गुटबाजी में एक अद्वितीय वृद्धि हुई मेरे श्रेष्ठतम सनातन ब्राह्मण आचरण करने पर भी तथाकथित रूप से पश्चिमी संस्कृति समर्थित समुदाय और स्वयं अज्ञानी, पोंगापंथी और अधूरे धार्मिक ज्ञान वाले सनातन हिन्दू समुदाय के बहुत बड़े वर्ग द्वारा कुछ स्वार्थ परता वस और बहकावे में आ झूंठे स्वाभिमान के खातिर जो अंत में चूर-2 भी हुआ; तो कहना है की चंद समय उपरांत से लेकर आज तक तथाकथित रूप से पश्चिमी संस्कृति समर्थित समुदाय का जरूर है पर उसी समुदाय विशेष के मूल का व्यक्ति(जिस समुदाय के द्वारा दिए 500 बीघे दान की जमीन पर मेरे गाँव रामपुर, आजमगढ़--223225 बसा है) तथाकथित सर्शक्तिशाली देश का श्रेष्ठतम व्यक्ति बना हुआ है वह भी दो बार से जो तथाकथित रूप से पश्चिमी संस्कृति समर्थित समुदाय के लिए विशेष महत्त्व का है। अतः मेरे अंदर ब्राह्मणत्व के गुण देखने चाहिए थे लोगों को। क्योंकि दान देने वाला किशी भी समुदाय से रहा हो वह ब्राह्मणत्व मेरे पूर्वजों में देख ही यह गाँव दान दिया होगा। यह बात जरूर है की ब्राह्मण को जो दान दिया वह उसकी सुरक्षा के प्रति और उस गाँव के एक ब्राह्मण गाँव बने रहने के प्रति चिंतित जरूर हो सकता है तो इस गाँव के एक-एक ब्राह्मण का कर्तव्य भी बनाता है की कम से कम जमाने के अनुसार ही सही वे ब्राह्मण बन ही जीवित रहे किशी भी स्थान और किशी भी जीवन क्षेत्र में रहे उसका वशिष्ठ, भृगु और गौतम जैसा ब्राह्मण जैसा जीवन न ही सही।

जिस समुदाय के द्वारा दिए 500 बीघे दान की जमीन पर मेरे गाँव रामपुर, आजमगढ़--223225 के बसे होने से मेरे विरुद्ध गुटबाजी में एक अद्वितीय वृद्धि हुई मेरे श्रेष्ठतम सनातन ब्राह्मण आचरण करने पर भी तथाकथित रूप से पश्चिमी संस्कृति समर्थित समुदाय और स्वयं अज्ञानी, पोंगापंथी और अधूरे धार्मिक ज्ञान वाले सनातन हिन्दू समुदाय के बहुत बड़े वर्ग द्वारा कुछ स्वार्थ परता वस और बहकावे में आ झूंठे स्वाभिमान के खातिर जो अंत में चूर-2 भी हुआ; तो कहना है की चंद समय उपरांत से लेकर आज तक तथाकथित रूप से पश्चिमी संस्कृति समर्थित समुदाय का जरूर है पर उसी समुदाय विशेष के मूल का व्यक्ति(जिस समुदाय के द्वारा दिए 500 बीघे दान की जमीन पर मेरे गाँव रामपुर, आजमगढ़--223225 बसा है) तथाकथित सर्शक्तिशाली देश का श्रेष्ठतम व्यक्ति बना हुआ है वह भी दो बार से जो तथाकथित रूप से पश्चिमी संस्कृति समर्थित समुदाय के लिए विशेष महत्त्व का है। अतः मेरे अंदर ब्राह्मणत्व के गुण देखने चाहिए थे लोगों को। क्योंकि दान देने वाला किशी भी समुदाय से रहा हो वह ब्राह्मणत्व मेरे पूर्वजों में देख ही यह गाँव दान दिया होगा। यह बात जरूर है की ब्राह्मण को जो दान दिया वह उसकी सुरक्षा के प्रति और उस गाँव के एक ब्राह्मण गाँव बने रहने के प्रति चिंतित जरूर हो सकता है तो इस गाँव के एक-एक ब्राह्मण का कर्तव्य भी बनाता है की कम से कम जमाने के अनुसार ही सही वे ब्राह्मण बन ही जीवित रहे किशी भी स्थान और किशी भी जीवन क्षेत्र में रहे उसका वशिष्ठ, भृगु और गौतम जैसा ब्राह्मण जैसा जीवन न ही सही।

https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur

1994 में प्रयागराज विश्विद्यालय में पिता जी के स्वाथ्य का ध्यान रखने और पारिवारिक मर्यादानुसार खानदानी जमीन जो सरप्लस भी थी/है परिस्थिति अनुसार उस पर हम हाँथ नहीं लगा सकते थे और मेरे अपने बाबा के द्वारा क्रय की गयी जमीन भी मेरे लिए खानदानी ही थी और मै अपने मामा जी पर भी अतिरिक्त बोझ नहीं दाल सकता था तो ऐसी परिस्थिति में प्रवेश लेना संभव नहीं था और इसी विचार से प्रयागराज विश्विद्यालय और उसके किशी संघटक कालेज में फार्म ही नहीं डाला था। अतः मेरे प्रवेश का प्रश्न ही नहीं उठता न तो मेरी इस हेतु यहाँ प्रवेश में और यहां पढने हेतु प्रतिभा क्षमता का। वस प्रयागराज में 4-5 माह स्वयं से ही इंजीनियरिंग प्रवेश परिक्षा की तैयारी(उस पर उसी वर्ष तकनिकी शिक्षा में आरक्षण/सामाजिक न्याय उसी सत्र/वर्ष लग गया था) करते हुए अक्सर सुबह रशूलाबाद घाट पर स्नान के समय गंगा मइया से इस विनती के साथ वापस जौनपुर चला गया की कि जीवन में यदि सरकारी सेवा का अवसर मिले तो गंगा मैया वह सेवा अवसर आप के किनारे बसे किशी शहर में मिले। और उसी प्रयागराज शहर में 2001 में अस्थायी निर्धारित समयबद्ध सेवा व् शोध हेतु आया और 2009 में स्थायी सरकारी शिक्षा व् शोध सेवा में आया भी| काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी भी गंगा नदी के किनारे है जहां पर 1998 से 2000 तक भौतिकी से स्नातकोत्तर के दौरान रहा पर सेवारत प्रयागराज में 2001 में ही आया|

1994 में प्रयागराज विश्विद्यालय में पिता जी के स्वाथ्य का ध्यान रखने और पारिवारिक मर्यादानुसार खानदानी जमीन जो सरप्लस भी थी/है परिस्थिति अनुसार उस पर हम हाँथ नहीं लगा सकते थे और मेरे अपने बाबा के द्वारा क्रय की गयी जमीन भी मेरे लिए खानदानी ही थी और मै अपने मामा जी पर भी अतिरिक्त बोझ नहीं दाल सकता था तो ऐसी परिस्थिति में प्रवेश लेना संभव नहीं था और इसी विचार से प्रयागराज विश्विद्यालय और उसके किशी संघटक कालेज में फार्म ही नहीं डाला था। अतः मेरे प्रवेश का प्रश्न ही नहीं उठता न तो मेरी इस हेतु यहाँ प्रवेश में और यहां पढने हेतु प्रतिभा क्षमता का। वस प्रयागराज में 4-5 माह स्वयं से ही इंजीनियरिंग प्रवेश परिक्षा की तैयारी(उस पर उसी वर्ष तकनिकी शिक्षा में आरक्षण/सामाजिक न्याय  उसी सत्र/वर्ष लग गया था) करते हुए अक्सर सुबह रशूलाबाद घाट पर स्नान के समय गंगा मइया से इस विनती के साथ वापस जौनपुर चला गया की कि जीवन में यदि सरकारी सेवा का अवसर मिले तो गंगा मैया वह सेवा अवसर आप के किनारे बसे किशी शहर में मिले। और उसी प्रयागराज शहर में 2001 में अस्थायी निर्धारित समयबद्ध सेवा व् शोध हेतु आया और 2009 में स्थायी सरकारी शिक्षा व् शोध सेवा में आया भी| काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी भी गंगा नदी के किनारे है जहां पर 1998 से 2000 तक भौतिकी से स्नातकोत्तर के दौरान रहा पर सेवारत प्रयागराज में 2001 में ही आया|

Tuesday, July 21, 2015

दुर्भाग्य की बात है ऐसे ब्राह्मण बालक को रजस्व ब्राह्मण समुदाय, ब्रह्मक्षत्रिय, क्षत्रिय, वैश्य, इनसे मिश्रित अन्य सवर्ण समुदाय सहित स्वयं ब्राह्मण समुदाय के वे लोग नियंत्रित कर रहे थे या नियंत्रित करने का दावा करते हैं जो दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र तथा अल्पसंख्यक अस्त्र को चलाने वालों द्वारा स्वयं नियंत्रीय हो रहे थे। तो भाई बताइये की क्या मै उन रजस्व ब्राह्मण समुदाय, ब्रह्मक्षत्रिय, क्षत्रिय, वैश्य, इनसे मिश्रित अन्य सवर्ण समुदाय सहित स्वयं ब्राह्मण समुदाय द्वारा नियंत्रित हो सकता हूँ कभी ? उत्तर है नहीं । मै स्वनियंत्रित सदा ही रहा हूँ | मुझे नियंत्रित करने की किशी में योग्यता ही नहीं, वरन मै स्वतः सज्जन, श्रेष्ठ, और वरिष्ठजन का सम्मान करता हूँ और मानवता हित में यदि दूरगामी अच्छे परिणाम आ सकते है तो मै अपने मार्ग को कुछ परिवर्तित कर सकता हूँ जब मेरा सीधा मार्ग मानवता को कुछ कस्टकारी लगता हो। और यही नहीं थमता मानवता हिट में अपना अधिकार और सर्वप्रिय वस्तु ही नहीं सर्वस्व मान, स्वाभिमान, मन, कर्म, बचन और प्राण तक दे सकता हूँ। और इस प्रकार मानवता की रक्षा मेरा सर्व प्रथम कर्तव्य है तो इस हेतु महत्तम लोगों को नाराज या आनंद प्रदान करने वाली अपनी वाणी "Vivekanand and Modern Tradition"/विवेकानंद और आधुनिक रीती-रिवाज" को विश्वव्यापक रूप दे रहा हूँ। >>>>>>>>>तीन गेंद(दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र तथा अल्पसंख्यक अस्त्र और इस प्रकार तथाकथित सामाजिक न्याय प्रक्रिया जिसका सदुपयोग भी है आनुवंशिक गुण और दोष का अनुपात ग्रामीण और महानगरीय/शहरी क्षेत्र में एक सीमा विशेष तक कुछ सुरक्षित बन सका है व्यापक शहरीकरण हो जाने पर भी; और दूसरा सामाजिक और आर्थिक चेतना जगाने में और इस प्रकार भारतीय समाज को केवल अधिकार के प्रति जीवंत बनाने में विशेष रूप से जिसमे नैतिक दायित्व और कर्तव्य पालन तथा कर्तव्य करने में पूर्ण योग्य होने की कोशिस चाहे कम ही रही हो क्योंकि जो असर हुआ वह वर्तमान भारतीय समाज बयान कर रहा है, लेकिन मैं कहना चाहूँगा की इसके प्रभावानुसार भारतीय समाज में उत्पन्न जाती/धर्म की अभूतपूर्व खाई के माध्यम से वैश्विक जगत और स्वयं भारत में ही इस भारतीय समाज को नैतिक और सांस्कृतिक रूप से नीचे गिराने में विदेशी अभिकर्ताओं ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है जिसके अभाव में आर्थिक उत्थान जो वास्तव में हुआ अवस्य है वह भी महत्वहीन हो चुका है मानव जीवन में अशांति और अनावश्यक प्रतिद्वंदिता, प्रतिस्पर्धा, प्रतिशोध और एक दूसरे पर अविश्वास की चिंगारी जगते रहने से जबकि इसको हर क्षेत्र के भारतीय मनीषियों और कुशल राजनीतिज्ञों के अभीष्ट प्रयास से कम किया जा रहा है वर्तमान में) में पूरा रजस्व ब्राह्मण समुदाय, पूरा ब्रह्मक्षत्रिय समाज, पूरा क्षत्रिय समाज, पूरा वैश्य समाज, इनसे मिश्रित अन्य सवर्ण समुदाय सहित स्वयं ब्राह्मण समुदाय पैवेलियन वापस चला गया तो क्या? इन दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र को चलाने वालों और स्वयं जो लोग यह अस्त्र बने उनको भी स्वयं इन्ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य समाज का वंसज सिद्ध करने वाला तो जीवित ही था जो सभी की करतूत देख रहा था समाज में ही रहकर परन्तु समाज से अलग बनकर और वह था रामापुर, आजमगढ़-223225 के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण परिवार का वंसज और बिशुनपुर, जौनपुर-223103 के सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण परिवार का नाती सभी अस्त्रों के वंसजों बीच चार वर्ष शिक्षा लिया था एक ही एकलौता सनातन ब्राह्मण बालक का जीवन जीते हुए। उसे उन लोगों के गुण दोष के आधार पर मालूम था की ब्राह्मण के अभाव में ब्राह्मण समाज के समान्तर चलने वाली ये सामाजिक रेखाएं एक न एक दिन अवस्य अनियंत्रीय होगी ही और तब उनको जीवन एक ब्राह्मण ही देगा वह ब्राह्मण चाहे स्वयं श्रीकृष्ण जैसे यदुवंशी को ही क्यों न बनाना पड़े( जो महाभारत के प्रारम्भ में परमब्रह्म(ब्रह्मा +विष्णु + महेश) स्वरुप में अाये थे और किशी सशरीर परमब्रह्म स्वरुप में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य सभी के पूर्ण अंश एक होते हुए भी मौजूद होते है न की केवल एक तिहाई अंश सबका, तो उपदेशक शक्ति उनकी इसी परमब्रह्म स्वरुप में आयी थी)।>>>>> दुर्भाग्य की बात है ऐसे ब्राह्मण बालक को रजस्व ब्राह्मण समुदाय, ब्रह्मक्षत्रिय, क्षत्रिय, वैश्य, इनसे मिश्रित अन्य सवर्ण समुदाय सहित स्वयं ब्राह्मण समुदाय के वे लोग नियंत्रित कर रहे थे या नियंत्रित करने का दावा करते हैं जो दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र तथा अल्पसंख्यक अस्त्र को चलाने वालों द्वारा स्वयं नियंत्रीय हो रहे थे। तो भाई बताइये की क्या मै उन रजस्व ब्राह्मण समुदाय, ब्रह्मक्षत्रिय, क्षत्रिय, वैश्य, इनसे मिश्रित अन्य सवर्ण समुदाय सहित स्वयं ब्राह्मण समुदाय द्वारा नियंत्रित हो सकता हूँ कभी ? उत्तर है नहीं । मै स्वनियंत्रित सदा ही रहा हूँ मुझे कोई नियंत्रित करने की किशी में योग्यता ही नहीं वरन मई स्वतः सज्जन, श्रेष्ठ, और वरिष्ठ जान का सम्मान करता हूँ और मानवता हित में यदि दूरगामी अच्छे परिणाम आ सकते है तो मै अपने मार्ग को कुछ परिवर्तित कर सकता हूँ जब मेरा सीधा मार्ग मानवता को कुछ कस्टकारी लगता हो। और यही नहीं थमता मानवता हिट में अपना अधिकार और सर्वप्रिय वस्तु ही नहीं सर्वस्व मान, स्वाभिमान, मन, कर्म, बचन और प्राण तक दे सकता हूँ। और इस प्रकार मानवता की रक्षा मेरा सर्व प्रथम कर्तव्य है तो इस हेतु महत्तम लोगों को नाराज या आनंद प्रदान करने वाली अपनी वाणी "Vivekanand and Modern Tradition"/विवेकानंद और आधुनिक रीती-रिवाज" को विश्वव्यापक रूप दे रहा हूँ।

दुर्भाग्य की बात है ऐसे ब्राह्मण बालक को रजस्व ब्राह्मण समुदाय, ब्रह्मक्षत्रिय, क्षत्रिय, वैश्य, इनसे मिश्रित अन्य सवर्ण समुदाय सहित स्वयं ब्राह्मण समुदाय के वे लोग नियंत्रित कर रहे थे या नियंत्रित करने का दावा करते हैं जो दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र तथा अल्पसंख्यक अस्त्र को चलाने वालों द्वारा स्वयं नियंत्रीय हो रहे थे। तो भाई बताइये की क्या मै उन रजस्व ब्राह्मण समुदाय, ब्रह्मक्षत्रिय, क्षत्रिय, वैश्य, इनसे मिश्रित अन्य सवर्ण समुदाय सहित स्वयं ब्राह्मण समुदाय द्वारा नियंत्रित हो सकता हूँ कभी ? उत्तर है नहीं । मै स्वनियंत्रित सदा ही रहा हूँ | मुझे नियंत्रित करने की किशी में योग्यता ही नहीं, वरन मै स्वतः सज्जन, श्रेष्ठ, और वरिष्ठजन का सम्मान करता हूँ और मानवता हित में यदि दूरगामी अच्छे परिणाम आ सकते है तो मै अपने मार्ग को कुछ परिवर्तित कर सकता हूँ जब मेरा सीधा मार्ग मानवता को कुछ कस्टकारी लगता हो। और यही नहीं थमता मानवता हिट में अपना अधिकार और सर्वप्रिय वस्तु ही नहीं सर्वस्व मान, स्वाभिमान, मन, कर्म, बचन और प्राण तक दे सकता हूँ। और इस प्रकार मानवता की रक्षा मेरा सर्व प्रथम कर्तव्य है तो इस हेतु महत्तम लोगों को नाराज या आनंद प्रदान करने वाली अपनी वाणी "Vivekanand and Modern Tradition"/विवेकानंद और आधुनिक रीती-रिवाज" को विश्वव्यापक रूप दे रहा हूँ। >>>>>>>>>तीन गेंद(दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र तथा अल्पसंख्यक अस्त्र और इस प्रकार तथाकथित सामाजिक न्याय प्रक्रिया जिसका सदुपयोग भी है आनुवंशिक गुण और दोष का अनुपात ग्रामीण और महानगरीय/शहरी क्षेत्र में एक सीमा विशेष तक कुछ सुरक्षित बन सका है व्यापक शहरीकरण हो जाने पर भी; और दूसरा सामाजिक और आर्थिक चेतना जगाने में और इस प्रकार भारतीय समाज को केवल अधिकार के प्रति जीवंत बनाने में विशेष रूप से जिसमे नैतिक दायित्व और कर्तव्य पालन तथा कर्तव्य करने में पूर्ण योग्य होने की कोशिस चाहे कम ही रही हो क्योंकि जो असर हुआ वह वर्तमान भारतीय समाज बयान कर रहा है, लेकिन मैं कहना चाहूँगा की इसके प्रभावानुसार भारतीय समाज में उत्पन्न जाती/धर्म की अभूतपूर्व खाई के माध्यम से वैश्विक जगत और स्वयं भारत में ही इस भारतीय समाज को नैतिक और सांस्कृतिक रूप से नीचे गिराने में विदेशी अभिकर्ताओं ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है जिसके अभाव में आर्थिक उत्थान जो वास्तव में हुआ अवस्य है वह भी महत्वहीन हो चुका है मानव जीवन में अशांति और अनावश्यक प्रतिद्वंदिता, प्रतिस्पर्धा, प्रतिशोध और एक दूसरे पर अविश्वास की चिंगारी जगते रहने से जबकि इसको हर क्षेत्र के भारतीय मनीषियों और कुशल राजनीतिज्ञों के अभीष्ट प्रयास से कम किया जा रहा है वर्तमान में) में पूरा रजस्व ब्राह्मण समुदाय, पूरा ब्रह्मक्षत्रिय समाज, पूरा क्षत्रिय समाज, पूरा वैश्य समाज, इनसे मिश्रित अन्य सवर्ण समुदाय सहित स्वयं ब्राह्मण समुदाय पैवेलियन वापस चला गया तो क्या? इन दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र को चलाने वालों और स्वयं जो लोग यह अस्त्र बने उनको भी स्वयं इन्ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य समाज का वंसज सिद्ध करने वाला तो जीवित ही था जो सभी की करतूत देख रहा था समाज में ही रहकर परन्तु समाज से अलग बनकर और वह था रामापुर, आजमगढ़-223225 के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण परिवार का वंसज और बिशुनपुर, जौनपुर-223103 के सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण परिवार का नाती सभी अस्त्रों के वंसजों बीच चार वर्ष शिक्षा लिया था एक ही एकलौता सनातन ब्राह्मण बालक का जीवन जीते हुए। उसे उन लोगों के गुण दोष के आधार पर मालूम था की ब्राह्मण के अभाव में ब्राह्मण समाज के समान्तर चलने वाली ये सामाजिक रेखाएं एक न एक दिन अवस्य अनियंत्रीय होगी ही और तब उनको जीवन एक ब्राह्मण ही देगा वह ब्राह्मण चाहे स्वयं श्रीकृष्ण जैसे यदुवंशी को ही क्यों न बनाना पड़े( जो महाभारत के प्रारम्भ में परमब्रह्म(ब्रह्मा +विष्णु + महेश) स्वरुप में अाये थे और किशी सशरीर परमब्रह्म स्वरुप में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य सभी के पूर्ण अंश एक होते हुए भी मौजूद होते है न की केवल एक तिहाई अंश सबका, तो उपदेशक शक्ति उनकी इसी परमब्रह्म स्वरुप में आयी थी)।>>>>> दुर्भाग्य की बात है ऐसे ब्राह्मण बालक को रजस्व ब्राह्मण समुदाय, ब्रह्मक्षत्रिय, क्षत्रिय, वैश्य, इनसे मिश्रित अन्य सवर्ण समुदाय सहित स्वयं ब्राह्मण समुदाय के वे लोग नियंत्रित कर रहे थे या नियंत्रित करने का दावा करते हैं जो दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र तथा अल्पसंख्यक अस्त्र को चलाने वालों द्वारा स्वयं नियंत्रीय हो रहे थे। तो भाई बताइये की क्या मै उन रजस्व ब्राह्मण समुदाय, ब्रह्मक्षत्रिय, क्षत्रिय, वैश्य, इनसे मिश्रित अन्य सवर्ण समुदाय सहित स्वयं ब्राह्मण समुदाय द्वारा नियंत्रित हो सकता हूँ कभी ? उत्तर है नहीं । मै स्वनियंत्रित सदा ही रहा हूँ मुझे कोई नियंत्रित करने की किशी में योग्यता ही नहीं वरन मई स्वतः सज्जन, श्रेष्ठ, और वरिष्ठ जान का सम्मान करता हूँ और मानवता हित में यदि दूरगामी अच्छे परिणाम आ सकते है तो मै अपने मार्ग को कुछ परिवर्तित कर सकता हूँ जब मेरा सीधा मार्ग मानवता को कुछ कस्टकारी लगता हो। और यही नहीं थमता मानवता हिट में अपना अधिकार और सर्वप्रिय वस्तु ही नहीं सर्वस्व मान, स्वाभिमान, मन, कर्म, बचन और प्राण तक दे सकता हूँ। और इस प्रकार मानवता की रक्षा मेरा सर्व प्रथम कर्तव्य है तो इस हेतु महत्तम लोगों को नाराज या आनंद प्रदान करने वाली अपनी वाणी "Vivekanand and Modern Tradition"/विवेकानंद और आधुनिक रीती-रिवाज" को विश्वव्यापक रूप दे रहा हूँ।

अपनी कुत्षित चाल के अनुसार रंगभेद और जाती/धर्म भेद का किशी पर आरोप प्रत्यारोप चला समाज में अपना स्वार्थ सिद्ध करने का अवसर ढूंढने वाले व्यक्ति, व्यक्ति समूह, वाह्य देश और उस देश के अपने ही देश में रहने वाले अभिकर्ता जो अपने ही देश से होते हों या वाह्य देश के अपने ही देश में रहने वाले अभिकर्ता यह न समझे की वे सत्यमेव जयते से पार पा जाएंगे। यह संभव ही नहीं है। जानकारी के लिए बता दें की मानवता के अनुसार दुर्दांत अपराधी भी मरता है तो इस संसार को दुआ देता है की मै तो जा ही रहा पर बची मानवता सुरक्षित रहे और यह बची हुई मानवता इस सत्यमेव जयते के आधार पर ही टिकी रहती है जो हर व्यक्ति का उसके लिए अपने जीवन जैसी बहुमूल्य धन बचाने हेतु महत्तम आवश्यता आ जाने के पल में उसका सत्य से शाक्षात्कार कराता है: ----------जिन लोगों को अपने लिए पत्नी, पुत्र और पुत्री गौर वर्ण चाहिए था और कम से कम पत्नी गौर वर्ण मिलने पर विवाह किये हो तो अगर वे भी किशी पर रंगभेद का आरोप कभी लगाते रहे हों तो उनकी बात पर विश्वास करना स्वयं में ही आधारहीन ही है। उनके जीवन संगिनी से बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है। यह भारतदेश गौर व् श्याम वर्ण का देश है ही पर श्याम सुन्दर कृष्ण को भी यहाँ गौर वर्ण गोपिकाएँ ही प्यारी रही हैं। कृष्ण को कामदेव के अवतार प्रतिदुम्न जैसे अतीव सुन्दर गौर पुत्र ही चाहिए थे| तो किस बात का रंगभेद का आरोप? तो भाई गोरा व्यक्ति भी अगर अपना परिवार गोरा ही चाहता है तो इसमे उसकी क्या खता है? अगर वह रंग भेद के आधार पर किशी कृष्णकाय का न अधिकार मारता हो और न ही उसका अहित करता हो। यह अफ़्रीकी देश और अमेरिकी/पश्चिमी देश देश का रंगभेद नहीं है जो इस के लिए किशी पर संगीन आरोप लगा उसे किशी समुदाय विशेष से अलग किया जाय। यहां रंग बदल सकता है पर रूप एक जैसे ही होते है तो यह अफ़्रीकी देश और अमेरिकी/पश्चिमी देश की नस्लीय/रंगभेदी व्यवस्था में आता ही नहीं है। लेकिन यह मानना पड़ेगी की सुंदरता सबको प्यारी लगती है तो एक समान स्वरुप के दो लोगों में गौर वर्ण प्रभावी कुछ लोगों को लगने लगता है। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ वंशानुगत विचार के अनुसार अच्छे रूप पर कृष्ण काया के साथ वाले वर या वधु को खानदान के लिए हितकर माना जाता है। वैसे भी हम उस देश में रहते हैं जहां विश्व की सबसे सुन्दर नारी(गौरा पार्वती) ने ही काली का रूप धारण किया था और सुंदरता के स्वामी (विष्णु) जिनको मोहिनी रूप में विश्व की सुन्दरतम स्त्री से भी सुन्दर रूप ग्रहण कर लेने का स्वामित्व हांसिल था वे भी समुद्रमंथन में कृष्णकाय बन बन गए थे कुर्मावतारी हो।

अपनी कुत्षित चाल के अनुसार रंगभेद और जाती/धर्म भेद का किशी पर आरोप प्रत्यारोप चला समाज में अपना स्वार्थ सिद्ध करने का अवसर ढूंढने वाले व्यक्ति, व्यक्ति समूह, वाह्य देश और उस देश के अपने ही देश में रहने वाले अभिकर्ता जो अपने ही देश से होते हों या वाह्य देश के अपने ही देश में रहने वाले अभिकर्ता यह न समझे की वे सत्यमेव जयते से पार पा जाएंगे। यह संभव ही नहीं है। जानकारी के लिए बता दें की मानवता के अनुसार दुर्दांत अपराधी भी मरता है तो इस संसार को दुआ देता है की मै तो जा ही रहा पर बची मानवता सुरक्षित रहे और यह बची हुई मानवता इस सत्यमेव जयते के आधार पर ही टिकी रहती है जो हर व्यक्ति का उसके लिए अपने जीवन जैसी बहुमूल्य धन बचाने हेतु महत्तम आवश्यता आ जाने के पल में उसका सत्य से शाक्षात्कार कराता है: ----------जिन लोगों को अपने लिए पत्नी, पुत्र और पुत्री गौर वर्ण चाहिए था और कम से कम पत्नी गौर वर्ण मिलने पर विवाह किये हो तो अगर वे भी किशी पर रंगभेद का आरोप कभी लगाते रहे हों तो उनकी बात पर विश्वास करना स्वयं में ही आधारहीन ही है। उनके जीवन संगिनी से बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है। यह भारतदेश गौर व् श्याम वर्ण का देश है ही पर श्याम सुन्दर कृष्ण को भी यहाँ गौर वर्ण गोपिकाएँ ही प्यारी रही हैं। कृष्ण को कामदेव के अवतार प्रतिदुम्न जैसे अतीव सुन्दर गौर पुत्र ही चाहिए थे| तो किस बात का रंगभेद का आरोप? तो भाई गोरा व्यक्ति भी अगर अपना परिवार गोरा ही चाहता है तो इसमे उसकी क्या खता है? अगर वह रंग भेद के आधार पर किशी कृष्णकाय का न अधिकार मारता हो और न ही उसका अहित करता हो। यह अफ़्रीकी देश और अमेरिकी/पश्चिमी देश देश का रंगभेद नहीं है जो इस के लिए किशी पर संगीन आरोप लगा उसे किशी समुदाय विशेष से अलग किया जाय। यहां रंग बदल सकता है पर रूप एक जैसे ही होते है तो यह अफ़्रीकी देश और अमेरिकी/पश्चिमी देश की नस्लीय/रंगभेदी व्यवस्था में आता ही नहीं है। लेकिन यह  मानना पड़ेगी की सुंदरता सबको प्यारी लगती है तो एक समान स्वरुप के दो लोगों में गौर वर्ण प्रभावी कुछ लोगों को लगने लगता है। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ वंशानुगत विचार के अनुसार अच्छे रूप पर कृष्ण काया के साथ वाले वर या वधु को खानदान के लिए हितकर माना जाता है। वैसे भी हम उस देश में रहते हैं जहां विश्व की सबसे सुन्दर नारी(गौरा पार्वती) ने ही काली का रूप धारण किया था और सुंदरता के स्वामी (विष्णु) जिनको मोहिनी रूप में विश्व की सुन्दरतम स्त्री से भी सुन्दर रूप ग्रहण कर लेने का स्वामित्व हांसिल था वे भी समुद्रमंथन में कृष्णकाय  बन बन गए थे कुर्मावतारी हो। 

Monday, July 20, 2015

मै विषय और व्यक्ति परक नहीं वस्तुतः सिद्धांत परक हूँ लेकिन विषय में तब जाना पड़ता है जब सिद्धांत को विषय और व्यक्ति के दर्शन की आवश्यकता हो जाय प्रमाण के रूप में। अतः लोग एक दसक पूर्व जिन लोगों पर अंगुली उठा रहे थे उसी विषय में आज उंगली उठाने वाले और उनका समुदाय विषयासक्त है प्रमाण के साथ यह बताना अतिआवश्यक और अनिवार्य हो गया था। पुनः मै विषय परक और व्यक्ति परक नहीं वरन सिद्धांत परक हूँ इस तथ्य पर ध्यान दिया जाय पर पुनः प्रमाण की जरूरत पडी तो विषय और व्यक्ति से साक्षात्कार करवाना पडेगा।

मै विषय और व्यक्ति परक नहीं वस्तुतः सिद्धांत परक हूँ लेकिन विषय में तब जाना पड़ता है जब सिद्धांत को विषय और व्यक्ति के दर्शन की आवश्यकता हो जाय प्रमाण के रूप में। अतः लोग एक दसक पूर्व जिन लोगों पर अंगुली उठा रहे थे उसी विषय में आज उंगली उठाने वाले और उनका समुदाय विषयासक्त है प्रमाण के साथ यह बताना अतिआवश्यक और अनिवार्य हो गया था। पुनः मै विषय परक और व्यक्ति परक नहीं वरन सिद्धांत परक हूँ इस तथ्य पर ध्यान दिया जाय पर पुनः प्रमाण की जरूरत पडी तो विषय और व्यक्ति से साक्षात्कार करवाना पडेगा। 

Sunday, July 19, 2015

जातीय और धार्मिक एकता को पारिवारिक रिस्ता स्थापित करने की शर्त पर बढ़वा देना स्वार्थ परक राजनीति और ऊर्जावान संयमित जीवन जीने वाले समाज की ऊर्जा का अवनमन माना जाना चाहिए। कारन यह की जल की तरह ऊर्जा स्वयं में ही निम्नगामी है और अगर उसको निम्नगामी बनाया गया तो पूरे विश्व का ऊर्जा स्तर गिर जाएगा और उतनी भी ऊर्जा नहीं बचेगी जितने से समाज को सुचाऊ रूप से चलाया जाय। एक और एक ही रास्ता बचेगा की हर जाती और धर्म से बहुत सारे पूर्ण आजीवन ब्रह्मचारी/ब्रह्मचारिणी तैयार किये जाय जो ऊर्जा स्तर बनाये रहें। वैसे यह संयमित जीवन जीने वाले समाज को बनाये रखने से ज्यादा कठिन रास्ता है।

जातीय और धार्मिक एकता को पारिवारिक रिस्ता स्थापित करने की शर्त पर बढ़वा देना स्वार्थ परक राजनीति और ऊर्जावान संयमित जीवन जीने वाले समाज की ऊर्जा का अवनमन माना जाना चाहिए। कारन यह की जल की तरह ऊर्जा स्वयं में ही निम्नगामी है और अगर उसको निम्नगामी बनाया गया तो पूरे विश्व का ऊर्जा स्तर गिर जाएगा और उतनी भी ऊर्जा नहीं बचेगी जितने से समाज को सुचाऊ रूप से चलाया जाय। एक और एक ही रास्ता बचेगा की हर जाती और धर्म से बहुत सारे पूर्ण आजीवन ब्रह्मचारी/ब्रह्मचारिणी तैयार किये जाय जो ऊर्जा स्तर बनाये रहें।  वैसे यह संयमित जीवन जीने वाले समाज को बनाये रखने से ज्यादा कठिन रास्ता है। 

अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह में पिता का वंश चलता है तो संतान का गोत्र पिता का होता है और माता अगर अलग हो संतान का पालन करती है अपने पिता के पद चिन्हो पर चल या अलग से स्वतंत्र जीवन जीत हुए तो इस प्रकार यदि उसका वंश चलता है तो संतान का गोत्र मात्र और मात्र कश्यप गोत्र ही होता है सनातन हिन्दू धर्म के काशी और विंध्याचल के प्रकांड विद्वानों के अनुसार। और अगर कोई सनातन हिन्दू धर्म में प्रवेश करता है विश्व की किशी भी जाती और धर्म से तो हिन्दू धर्म में प्रवेश उसका कश्यप गोत्र में माध्यम से ही होगा मतलब कश्यप गोत्र हिन्दू धर्म का प्रथम द्वार है।

अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक  विवाह में पिता का वंश चलता है तो संतान का गोत्र पिता का होता है और माता अगर अलग हो संतान का पालन करती है अपने पिता के पद चिन्हो पर चल या अलग से स्वतंत्र जीवन जीत हुए तो इस प्रकार यदि उसका वंश चलता है तो संतान का गोत्र मात्र और मात्र कश्यप गोत्र ही होता है सनातन हिन्दू धर्म के काशी और विंध्याचल के प्रकांड विद्वानों के अनुसार। और अगर कोई सनातन हिन्दू धर्म में प्रवेश करता है विश्व की किशी भी जाती और धर्म से तो हिन्दू धर्म में प्रवेश उसका कश्यप गोत्र में माध्यम से ही होगा मतलब कश्यप गोत्र हिन्दू धर्म का प्रथम द्वार है। 

(टिप्पणी: एक लड़का समूह में बैठा अपनी बारी आने पर कहानी सुना रहा था तो उसमे कहा था मेरे पिता इतने बड़े बहादुर थे की वे जोस में आकर शेर से जाकर लड़ गए थे तो लोग कौतुहल से बोले की अरे फिर क्या हुआ, तो लड़का बोला फिर क्या था शेर मेरे पिता को चीर कर खा गया उनको। तो कम से कम भारतीय समाज से तो यह कह सकता हूँ की आप अपने बाप से मत टकराइएगा नहीं तो इस शेर की तरह आप का बाप आप का अंत निश्चित कर सकता है। ) लगातार सांसारिक मायाजाल वाले मजबूत पक्ष का दामन थामने वाले यदि भगवान श्रीराम के भोज में शामिल हो सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण का दर्जा प्राप्त किये सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण, रक्षा क्षेत्र तथा विद्वत समाज में उच्चतम स्थान प्राप्त और इस दृस्टि से सबसे समर्थ्य परिवार का पक्ष ले और उसकी उन्नति का ठीका ले यदि उसकी संतान को निम्नलिखित मलिन बस्ती के परिवार के अपने से कम उम्र के लडके के पास पहुंचा जन्म जन्मान्तर के लिए मलिन बना सकते हैं तो फिर मलिन बस्ती की संतान को कहाँ पहुंचाएंगे यह सोचने का विषय है ? शायद उनको ऐसा ही करना था इसीलिये मुझे इस प्रयागराज में मद्यप, चरित्रहीन, व्यसनी और दरिद्र सिद्ध किया जा रहा था आज के एक दसक पहले जिससे की मै मलिन बस्ती वालों से भी निम्न कोटि का प्राणी समझा जाऊं और तुलनात्मक रूप से वे सही साबित हो जिनका पक्ष लिए थे उसको उन्नत श्रेणी का बता। वैसे भी मै विना अपना कार्य पूर्ण किये यहाँ से हटाने वाला नहीं था कितना भी कस्ट और अपमान किया जाता और प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित किया जा रहा था। उन सांसारिक मायाजाल वाले मजबूत पक्ष का दामन थामने वाले लोगों की तुलना में पृथ्वी के केंद्र प्रयागराज जहां पर सबसे अधिक तनाव महसूस किया जाता है संसार के अन्य भाग की तुलना में सामान्य जीवन जीने में भी वही मै इतने ऊँचे किशी समुदाय विशेष के नहीं वरन उच्चतम से लेकर एक निम्नतम आय और सामाजिक वर्ग के लोगों के कार्य हेतु समर्पित था और कार्य ऐसा था की उस समय मै कुछ न कह सकने को ही श्रेष्कर समझा था जिसका कारन था दाँव पर मै लगा था पर आत्मविकाश और वाह्यविकाश दूसरे लोग कर रहे थे और इस प्रकार मुझे उनको इस कार्य में जोड़ना ही एक रास्ता था न की अपने मान और स्वाभिमान की चिंता करना और उस हेतु सांसारिक लड़ाई में शामिल होना। (टिप्पणी: एक लड़का कहानी सुना रहा था तो उसमे कहा था मेरे पिता इतने बड़े बहादुर थे की वे जोस में आकर शेर से जाकर लड़ गए थे तो लोग कौतुहल से बोले की अरे फिर क्या हुआ, तो लड़का बोला शेर मेरे पिता कोचीर कर खा गया उनको। तो कम से कम भारतीय समाज से तो यह ख सकता हूँ की आप अपने बाप से मत टकराइएगा नहीं तो अंत निश्चित है आप का।>>>> अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह में पिता का वंश चलता है तो संतान का गोत्र पिता का होता है और माता अगर अलग हो संतान का पालन करती है अपने पिता के पद चिन्हो पर चल या अलग से स्वतंत्र जीवन जीत हुए तो इस प्रकार यदि उसका वंश चलता है तो संतान का गोत्र मात्र और मात्र कश्यप गोत्र ही होता है सनातन हिन्दू धर्म के काशी और विंध्याचल के प्रकांड विद्वानों के अनुसार। )

(टिप्पणी: एक लड़का समूह में बैठा अपनी बारी आने पर कहानी सुना रहा था तो उसमे कहा था मेरे पिता इतने बड़े बहादुर थे की वे जोस में आकर शेर से जाकर लड़ गए थे तो लोग कौतुहल से बोले की अरे फिर क्या हुआ, तो लड़का बोला फिर क्या था शेर मेरे पिता को चीर कर खा गया उनको। तो कम से कम भारतीय समाज से तो यह कह सकता हूँ की आप अपने बाप से मत टकराइएगा नहीं तो इस शेर की तरह आप  का बाप आप का अंत निश्चित कर सकता है। )   लगातार सांसारिक मायाजाल वाले मजबूत पक्ष का दामन थामने वाले यदि भगवान श्रीराम के भोज में शामिल हो सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण का दर्जा प्राप्त किये सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण, रक्षा क्षेत्र तथा विद्वत समाज में उच्चतम स्थान प्राप्त और इस दृस्टि से सबसे समर्थ्य परिवार का पक्ष ले और उसकी उन्नति का ठीका ले यदि उसकी संतान को निम्नलिखित मलिन बस्ती के परिवार के अपने से कम उम्र के लडके के पास पहुंचा जन्म जन्मान्तर के लिए मलिन बना सकते हैं तो फिर मलिन बस्ती की संतान को कहाँ पहुंचाएंगे यह सोचने का विषय है ? शायद उनको ऐसा ही करना था इसीलिये मुझे इस प्रयागराज में मद्यप, चरित्रहीन, व्यसनी और दरिद्र सिद्ध किया जा रहा था आज के एक दसक पहले जिससे की मै मलिन बस्ती वालों से भी निम्न कोटि का प्राणी समझा जाऊं और तुलनात्मक रूप से वे सही साबित हो जिनका पक्ष लिए थे उसको उन्नत श्रेणी का बता। वैसे भी मै विना अपना कार्य पूर्ण किये यहाँ से हटाने वाला नहीं था कितना भी कस्ट और अपमान किया जाता और प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित किया जा रहा था। उन सांसारिक मायाजाल वाले मजबूत पक्ष का दामन थामने वाले लोगों की तुलना में पृथ्वी के केंद्र प्रयागराज जहां पर सबसे अधिक तनाव महसूस किया जाता है संसार के अन्य भाग की तुलना में सामान्य जीवन जीने में भी वही मै इतने ऊँचे किशी समुदाय विशेष के नहीं वरन उच्चतम से लेकर एक निम्नतम आय और सामाजिक वर्ग के लोगों के कार्य हेतु समर्पित था और कार्य ऐसा था की उस समय मै कुछ न कह सकने को ही श्रेष्कर समझा था जिसका कारन था दाँव पर मै लगा था पर आत्मविकाश और वाह्यविकाश दूसरे लोग कर रहे थे और इस प्रकार मुझे उनको इस कार्य में जोड़ना ही एक रास्ता था न की अपने मान और स्वाभिमान की चिंता करना और उस हेतु सांसारिक लड़ाई में शामिल होना। (टिप्पणी: एक लड़का कहानी सुना रहा था तो उसमे कहा था मेरे पिता इतने बड़े बहादुर थे की वे जोस में आकर शेर से जाकर लड़ गए थे तो लोग कौतुहल से बोले की अरे फिर क्या हुआ, तो लड़का बोला शेर मेरे पिता कोचीर कर खा गया उनको। तो कम से कम भारतीय समाज से तो यह ख सकता हूँ की आप अपने बाप से मत टकराइएगा नहीं तो अंत निश्चित है आप का।>>>> अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह में पिता का वंश चलता है तो संतान का गोत्र पिता का होता है और माता अगर अलग हो संतान का पालन करती है अपने पिता के पद चिन्हो पर चल या अलग से स्वतंत्र जीवन जीत हुए तो इस प्रकार यदि उसका वंश चलता है तो संतान का गोत्र मात्र और मात्र कश्यप गोत्र ही होता है सनातन हिन्दू धर्म के काशी और विंध्याचल के प्रकांड विद्वानों के अनुसार। )
6-3-327  and 6-3-327/B  Erramanzil Colony, Balapura Slum, Hyderabad-500082

M 72 Bandugula Balraj  / Bandugula Mogulaiah

M 37 Bandugula UTTAM CHANDRA/ 6-3-327/B/ Bandugula NARSING RAO

F69 Bandugula Eshvaramma / Bandugula Balraj

M 42 B Muralidhar / Bandugula Balraj

F 38 Bandugula ANITHA  / Bandugula MURALIDHAR

F 35 Bandugula MALINI  / Bandugula NITIN CHANDRA

F68  Bandugula SATYANARAYANA / Bandugula B MOGULAIAH

F  61 Bandugula SHOBHARANI  / Bandugula SATYANARAYANA

M 36 Bandugula SIDDHARTHA  /  Bandugula SATYNARAYANA

M 34 Bandugula SHARAT CHANDRA / Bandugula SATYANARAYANA

F 56 Bandugula Umalatha / Bandugula Narsingh Rao

M 35 Bandugula NITIN CHANDRA / Bandugula NARSING RAO

M 31 Bandugula NATRAJ / Bandugula SATYANARAYANA

F 32 BANDUGULA BHAVANI PRASANNA  / Bandugula SIDDHARTHA

M 59 BANDUGULA A RAMULU / Bandugula A NARASAPPA

F 49 BANDUGULA A VARA LAXMI / Bandugula A RAMULU

   

टिप्पणी: भूलियेगा नहीं कश्यप ही मनु और उनकी द्वितीय पत्नी अदिति ही श्रद्धा/सतरूपा थी और कश्य के सबसे प्रमुख दो और अवतार है राजा दशरथ(श्रीराम के पिता) और वशुदेव(श्रीकृष्ण के पिता) तथा इसके अलावा विष्णु के अधिकांश मानव अवतार के पिता कश्यप ऋषि के ही अवतार रहे हैं। क्रमसः प्रथम महाविलायक कश्यप गोत्र(सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण) जिसमे मुस्लिम, ईसाई समेत समस्त धर्म और जाती के समर्थ और पद दलित तथा अनाथ लोगों को सनातन हिन्दू धर्म में वापस मिला कश्यप गोत्रीय हिन्दू का दर्जा(हिन्दू धर्म का प्रथम सोपान) देने की शक्ति हांसिल है हिन्दू धर्म के अग्रिम क्रमिक सोपान में पहुँचाने हेतु उचित कार्य अनुपालन में कठोर से कठोर निर्णय लेने और उसका पालन करवा लेने की शक्ति से साथ ही; >>>>और द्वितीय महाविलायक गौतम गोत्र (सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण) (गौतम गोत्रीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम के बौद्ध विचार वाले पंथ के माध्यम से विशेष कर हिन्दू जाती/धर्म के ही पद दलित और अनाथ लोगों को बौद्ध विचार के पंथ में शामिल करवा) परिवार का पुत्र और नाती(पुत्री की संतान) जब दाँव पर लगा ही दिया गया था तो हर जाती और धर्म तथा विविध सामजिक और आर्थिक परिवेश के लोगों को उस विशेष कार्य को विगाड़ने और उस पर अपनी प्रभुसत्ता दाँव पर लगाने तथा अनावश्यक जोर आजमाइश करने की जरूरत ही नहीं रह गयी थी लेकिन क्या किया जाय दिग्भ्रमित और मदांध लोगों को अपना धन, बल, ज्ञान और समय गंवाने की आदत सी बन गयी है व्यर्थ के कार्य को करने में मतलब जो संभव है ही नहीं वहां भी अपनी दिग्भ्रमित छवि और मदांधता की पहचान वे छोड़ने से बाज नहीं आते हैं। टिप्पणी: भूलियेगा नहीं कश्यप ही मनु और उनकी द्वितीय पत्नी अदिति ही श्रद्धा/सतरूपा थी और कश्य के सबसे प्रमुख दो और अवतार है राजा दशरथ(श्रीराम के पिता) और वशुदेव(श्रीकृष्ण के पिता) तथा इसके अलावा अन्य कई विष्णु अवतार के पिता कश्यप ऋषि के ही अवतार रहे हैं। When human life is made too painful by ourself then what will do the Kashyapa and Gautam? Our collective effort and well human being only can solve this problem means we should call for right when we do our duty first.

टिप्पणी: भूलियेगा नहीं कश्यप ही मनु और उनकी द्वितीय पत्नी अदिति ही श्रद्धा/सतरूपा थी और कश्य के सबसे प्रमुख दो और अवतार है राजा दशरथ(श्रीराम के पिता) और वशुदेव(श्रीकृष्ण के पिता) तथा इसके अलावा विष्णु के अधिकांश मानव अवतार के पिता कश्यप ऋषि के ही अवतार रहे हैं।    क्रमसः प्रथम महाविलायक कश्यप गोत्र(सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण) जिसमे मुस्लिम, ईसाई समेत समस्त धर्म और जाती के समर्थ और पद दलित तथा अनाथ लोगों को सनातन हिन्दू धर्म में वापस मिला कश्यप गोत्रीय हिन्दू का दर्जा(हिन्दू धर्म का प्रथम सोपान) देने की शक्ति हांसिल है हिन्दू धर्म के अग्रिम क्रमिक सोपान में पहुँचाने हेतु उचित कार्य अनुपालन में कठोर से कठोर निर्णय लेने और उसका पालन करवा लेने की शक्ति से साथ ही; >>>>और द्वितीय महाविलायक गौतम गोत्र (सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण) (गौतम गोत्रीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम के बौद्ध विचार वाले पंथ के माध्यम से विशेष कर हिन्दू जाती/धर्म के ही पद दलित और अनाथ लोगों को बौद्ध विचार के पंथ में शामिल करवा) परिवार का पुत्र और नाती(पुत्री की संतान) जब दाँव पर लगा ही दिया गया था तो हर जाती और धर्म तथा विविध सामजिक और आर्थिक परिवेश के लोगों को उस विशेष कार्य को विगाड़ने और उस पर अपनी प्रभुसत्ता दाँव पर लगाने तथा अनावश्यक जोर आजमाइश करने की जरूरत ही नहीं रह गयी थी लेकिन क्या किया जाय दिग्भ्रमित और मदांध लोगों को अपना धन, बल, ज्ञान और समय गंवाने की आदत सी बन गयी है व्यर्थ के कार्य को करने में मतलब जो संभव है ही नहीं वहां भी अपनी दिग्भ्रमित छवि और मदांधता की पहचान वे छोड़ने से बाज नहीं आते हैं। टिप्पणी: भूलियेगा नहीं कश्यप ही मनु और उनकी द्वितीय पत्नी अदिति ही श्रद्धा/सतरूपा थी और कश्य के सबसे प्रमुख दो और अवतार है राजा दशरथ(श्रीराम के पिता) और वशुदेव(श्रीकृष्ण के पिता) तथा इसके अलावा अन्य कई विष्णु अवतार के पिता कश्यप ऋषि के ही अवतार रहे हैं।  When human life is made too painful by ourself then what will do the Kashyapa and Gautam? Our collective effort and well human being only can solve this problem means we should call for right when we do our duty first.

Saturday, July 18, 2015

टिप्पणी:- विवेक के अभाव में हर प्राणी ज्ञान रहते हुए भी शूद्रवत् व्यवहार करता है। 11-11-1975, 9.15 बजे सुबह मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी को जन्म लेने वाला वाह्य नाम रूप में विवेक/त्रिलोचन/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/महादेव शिव शंकर की एक मात्र स्वयं की रक्षाकारी शक्ति तो आतंरिक रूप से अर्ध्य कुम्भ और अर्ध्य मकर राशि और धनिष्ठा नक्षत्र के गिरिधारी((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/10th शिव अवतार)) में जहां महादेव शिव की और विष्णु की शक्ति समाहित तो वाह्य नाम विवेक ही स्वयं में उसे सरस्वती के स्वयं के चार संतान (2: विवेक-प्रज्ञा, 2: ज्ञान-विद्या=4) में से एक बना उसको सरस्वती से और इस प्रकार ब्रह्मा से भी जोड़ता है ((ब्रह्मा के स्वयं के 7 संतान उनके मानस पुत्र सात ब्रह्मर्षि मतलब सप्तर्षि: मारीच/कश्यप है, शांडिल्य/व्यासः/परासर/वशिष्ठ, गौतम, भारद्वाज/आंगिरस, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/ सोमात्रेय/अत्रि, जमदग्नि(परशुराम पिता)/भृगु, कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ)) और ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशी के दक्ष प्रजाति हैं जो समस्त स्त्री जगत के पिता है) । इसके साथ ही साथ इनके तथाकथित दलित गुरु श्री धनराज हरिजन(धंजू) द्वारा दी गयी आभासीय/कार्यालयी जन्म तिथि 01-08-1976 उनको रविवारीय बना सूर्यदेव से सीधे-शीधे जोड़ देता है।

 टिप्पणी:- विवेक के अभाव में हर प्राणी ज्ञान रहते हुए भी शूद्रवत् व्यवहार करता है। 11-11-1975, 9.15 बजे सुबह मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी को जन्म लेने वाला वाह्य नाम रूप में विवेक/त्रिलोचन/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/महादेव शिव शंकर की एक मात्र स्वयं की रक्षाकारी शक्ति तो आतंरिक रूप से अर्ध्य कुम्भ और अर्ध्य मकर राशि और धनिष्ठा नक्षत्र के गिरिधारी((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/10th शिव अवतार)) में जहां महादेव शिव की और विष्णु की शक्ति समाहित तो वाह्य नाम विवेक ही स्वयं में उसे सरस्वती के स्वयं के चार संतान (2विवेक-प्रज्ञा, 2ज्ञान-विद्या=4) में से एक बना उसको सरस्वती से और इस प्रकार ब्रह्मा से भी जोड़ता है ((ब्रह्मा के स्वयं के 7 संतान उनके मानस पुत्र सात ब्रह्मर्षि मतलब सप्तर्षि: मारीच/कश्यप है, शांडिल्य/व्यासः/परासर/वशिष्ठ, गौतम, भारद्वाज/आंगिरस, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/ सोमात्रेय/अत्रि, जमदग्नि(परशुराम पिता)/भृगु, कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ)) और ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशी के दक्ष प्रजाति हैं जो समस्त स्त्री जगत के पिता है) । इसके साथ ही साथ इनके तथाकथित दलित गुरु श्री धनराज हरिजन(धंजू) द्वारा दी गयी आभासीय/कार्यालयी जन्म तिथि 01-08-1976 उनको रविवारीय बना सूर्यदेव से सीधे-शीधे जोड़ देता है।