Google+ Followers

Monday, August 31, 2015

दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र से ही भारतीय व् विश्व मानवता त्रस्त है जब ब्रह्मास्त्र चल जाएगा तो क्या हाल होगा इस भारतभूमि मानवता और विश्वभूमि मानवता का? इसीलिये ब्राह्मण और क्षत्रिय को आरक्षण देना भारतभूमि और विश्वभूमि के लिए विनाशकारी है।

दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र से ही भारतीय व् विश्व मानवता त्रस्त है जब ब्रह्मास्त्र चल जाएगा तो क्या हाल होगा इस भारतभूमि मानवता और विश्वभूमि मानवता का? इसीलिये ब्राह्मण और क्षत्रिय को आरक्षण देना भारतभूमि और विश्वभूमि के लिए विनाशकारी है।

मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण की संतान ने जौनपुर/जमदग्निपुर में जन्म लिया और वही शिक्षा ली है मैंने। यह उस जमदग्निऋषि की कर्म भूमि है जिनके पिता भृगु ने अपने विष्णुअवतार पौत्र परशुराम का त्याग इस लिए कर दिया था क्योंकि वे अपने पिता जमदग्नि की गौ रक्षा हेतु हत्या किये जाने के विरोध में किशी वर्ग विशेष से जबरन सम्पूर्ण भारत की जमीन हथिया लिए रक्तपात करते हुए पर यह भृगुऋषी के अनुसार यह निंदनीय कृत्य था। अतः उन्होंने परशुराम जैसे विष्णुअवतारी पौत्र का बहिस्कार जौनपुर/जमदग्निपुर से कर दिया था सदा सदा के लिए और परशुराम उनकी आज्ञापालन में कभी लौट कर वहां नहीं आये। तो मै इसी भृगुवंशीय जमदग्निऋशी की धारा जौनपुर/जमदग्निपुर पर रहने वाले अपने सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण मामा के आज्ञानुसार अपने को यदि समाज और गुरु हेतु समर्पित कर दिया तो मुझे परशुराम ही बनाने को क्यों सोच रहे हैं आप जिस परशुराम के क्रोध को समाज से उपजे विष के साथ मै पी ले गया। इस भूमि पर जन्म लेने वाले को परशुराम बनना ही जब मना है तो प्रश्नवाचक चिन्ह ही क्यों लग रहा है? लेकिन पुनः असुर बड़े तो संहार उनका करना मेरा दायित्व है और वह जरूर पूरा किया जाएगा। यह तो गुरु आज्ञापूर्ति थी जिसने मुझे भौतिक युद्ध से मना किया था।

मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण की संतान ने जौनपुर/जमदग्निपुर में जन्म लिया और वही शिक्षा ली है मैंने। यह उस जमदग्निऋषि की कर्म भूमि है जिनके पिता भृगु ने अपने विष्णुअवतार पौत्र परशुराम का त्याग इस लिए कर दिया था क्योंकि वे अपने पिता जमदग्नि की गौ रक्षा हेतु हत्या किये जाने के विरोध में किशी वर्ग विशेष से जबरन सम्पूर्ण भारत की जमीन हथिया लिए रक्तपात करते हुए पर यह भृगुऋषी के अनुसार यह निंदनीय कृत्य था। अतः उन्होंने परशुराम जैसे विष्णुअवतारी पौत्र का बहिस्कार जौनपुर/जमदग्निपुर से कर दिया था सदा सदा के लिए और परशुराम उनकी आज्ञापालन में कभी लौट कर वहां नहीं आये। तो मै इसी भृगुवंशीय जमदग्निऋशी की धारा जौनपुर/जमदग्निपुर पर रहने वाले अपने सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण मामा के आज्ञानुसार अपने को यदि समाज और गुरु हेतु समर्पित कर दिया तो मुझे परशुराम ही बनाने को क्यों सोच रहे हैं आप जिस परशुराम के क्रोध को समाज से उपजे विष के साथ मै पी ले गया। इस भूमि पर जन्म लेने वाले को परशुराम बनना ही जब मना है तो प्रश्नवाचक चिन्ह ही क्यों लग रहा है? लेकिन पुनः असुर बड़े तो संहार उनका करना मेरा दायित्व है और वह जरूर पूरा किया जाएगा। यह तो गुरु आज्ञापूर्ति थी जिसने मुझे भौतिक युद्ध से मना किया था।

मेरा विकल्प केवल और केवल सनातन ब्राह्मण ही हो सकता था, है, और रहेगा। लेकिन कोई किशी को प्रस्तुत नहीं कर सका आज तक तो परशुराम बनने को क्यों प्रेरित किया जा रहा है जब बिना हथियार उठाये ही मैदान फतह हो चुका है।

मेरा विकल्प केवल और केवल सनातन ब्राह्मण ही हो सकता था, है, और रहेगा। लेकिन कोई किशी को प्रस्तुत नहीं कर सका आज तक तो परशुराम बनने को क्यों प्रेरित किया जा रहा है जब बिना हथियार उठाये ही मैदान फतह हो चुका है। 

पाप का पिटारा छुपने वाला नहीं था रंगभेदी लड़ाई की आँड से भी और काशीराम, नारायणन, कलाम जैसे लोगों का नाम आगे करके भी और अब प्रयागराज विश्वविद्यालय से कैलाशनाथ का नाम आगे करके भी या किशी को द्वितीय श्रेणी किसी परिक्षा में अंक के आधार पर बनवाकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अलखनिरंजन से या वरिष्ठता में प्रथम क्रम से द्वितीय क्रम का बना कर हरिश्चंद्र पुत्र रोहितस्व के वंसज, आशीस; और भानुप्रताप सिंह द्वारा। भाई इन ब्राह्मण कुल में न आने वाले लोगों की बात ही क्या मै तो सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी(ब्रह्मा) से अपनी शिकायत दर्ज करा दी की भारद्वाज/आंगिरस; उनके शिष्य,गर्ग; और शांडिल्य जब अशोकचक्र/धर्मचक्र/समयचक्र/कालचक्र को टूटने से नहीं बचा सके तो फिर प्रयागराज को केवल भारद्वाज/आंगिरस, गर्ग और शांडिल्य के भरोशे पुनः भविष्य के लिए कैसे छोड़ दिया जाय? और प्रयागराज का सात में विभाजन प्रारम्भ क्यों न हो? जब गंगा, जमुना, सरस्वती ही गंदी कर दी गयी हों तो आज भी केवल राम और कृष्ण आधारित केवल दो में ही विभाजन ही क्यों स्वीकार हो?

पाप का पिटारा छुपने वाला नहीं था रंगभेदी लड़ाई की आँड से भी और काशीराम, नारायणन, कलाम जैसे लोगों का नाम आगे करके भी और अब प्रयागराज विश्वविद्यालय से कैलाशनाथ का नाम आगे करके भी या किशी को द्वितीय श्रेणी किसी परिक्षा में अंक के आधार पर बनवाकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अलखनिरंजन से या वरिष्ठता में प्रथम क्रम से द्वितीय क्रम का बना कर हरिश्चंद्र पुत्र रोहितस्व के वंसज, आशीस; और भानुप्रताप सिंह द्वारा। भाई इन ब्राह्मण कुल में न आने वाले लोगों की बात ही क्या मै तो सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी(ब्रह्मा) से अपनी शिकायत दर्ज करा दी की भारद्वाज/आंगिरस; उनके शिष्य,गर्ग; और शांडिल्य जब अशोकचक्र/धर्मचक्र/समयचक्र/कालचक्र को टूटने से नहीं बचा सके तो फिर प्रयागराज को केवल भारद्वाज/आंगिरस, गर्ग और शांडिल्य के भरोशे पुनः भविष्य के लिए कैसे छोड़ दिया जाय? और प्रयागराज का सात में विभाजन प्रारम्भ क्यों न हो? जब गंगा, जमुना, सरस्वती ही गंदी कर दी गयी हों तो आज भी केवल राम और कृष्ण आधारित केवल दो में ही विभाजन ही क्यों स्वीकार हो?

मूल सप्तर्षि/कुछ वंसज: ---- मारीच/कश्यप, वशिष्ठ/शांडिल्य/व्यासः, गौतम, आंगिरस/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय(सोम), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ। यह हैं मानवता के वाहक सात ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि तो मानवता कम से कम सात भाग में विभाजित की जा सकती है मूल रूप में और ये सब प्रयागराज में जन्म लिए थे प्रकृष्टा यज्ञ/विश्व के प्राचीनतम प्राकयज्ञ से तो प्रयागराज से ही मूलतः सात में विभाजन प्रारम्भ होना चाहिए परमब्रह्म की परमसत्ता और संप्रभुता का।

मूल सप्तर्षि/कुछ वंसज: ---- मारीच/कश्यप, वशिष्ठ/शांडिल्य/व्यासः, गौतम, आंगिरस/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय(सोम), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ।  यह हैं मानवता के वाहक सात ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि तो मानवता कम से कम सात भाग में विभाजित की जा सकती है मूल रूप में और ये सब प्रयागराज में जन्म लिए थे प्रकृष्टा यज्ञ/विश्व के प्राचीनतम प्राकयज्ञ से तो प्रयागराज से ही मूलतः सात में विभाजन प्रारम्भ होना चाहिए परमब्रह्म की परमसत्ता और संप्रभुता का।  

मुझे तो केवल इतना बताना था की प्रयागराज को केवल दो राम और कृष्ण के आधार पर ही नहीं बटेगा बल्कि सात का है और बटेंगा तो कम से कम सात में बांटेगा। राम और कृष्ण एक ही परमब्रह्म/ब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश) के ही रूपांतरित होने वाले दो स्वरुप मात्र है और इनसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश मतलब एक से तीन वाला विभाजन कम से कम और फिर तीन से एक हो परमब्रह्म/ब्रह्म से विभाजन सात ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि का मतलब कम से कम सात में विभाजन। फिर आगे चलकर सप्तर्षिओं के सम्मिलित संतान से मलयदेश(तमिल+केरल का भाग) में जन्मे अगस्त्य/कुम्भज ऋषि के रूप को देखते हुए आठ में विभाजन और इस प्रकार आज के दिनांक में लगभग 105 या इससे कुछ अधिक गोत्रों/ऋषि पुत्रों में विभाजन। फिर भी प्रयागराज में कम से कम सात में विभाजन अवश्यम्भावी और न्यायपूर्ण विभाजन है क्योंकि कम से कम इन सातों का जन्म प्रयागराज में अवश्य हुआ था इसको देखते हुए। पुनः इन सात से सामाजिक व्यवस्था सञ्चालन हेतु, तीन में विभाजन आपसी सामजस्य को ध्यान में रखते हुए ब्रह्मा, विष्णु और महेश के गुण को आधार मानते हुए, पर राम और कृष्ण परमब्रह्म स्वरुप है सूर्य की किरण की तरह जो सतरंगी रूप धारण कर सकते हैं। अतः इनको वर्ण का आधार बना राम और कृष्ण में ही विभाजन समाप्त कर देने के स्थान पर कम से कम सात में विभाजन ही न्यायपूर्ण है। वैसे भी घनश्याम का अर्थ काजल नहीं होता है जिस स्वरुप में कृष्ण को परिभासित किया जा रहा है। टिप्पणी: मूल सप्तर्षि/कुछ वंसज: ---- मारीच/कश्यप, वशिष्ठ/शांडिल्य/व्यासः, गौतम, आंगिरस/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय(सोम), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ। यह हैं मानवता के वाहक सात ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि तो मानवता कम से कम सात भाग में विभाजित की जा सकती है मूल रूप में और ये सब प्रयागराज में जन्म लिए थे प्रकृष्टा यज्ञ/विश्व के प्राचीनतम प्राकयज्ञ से तो प्रयागराज से ही मूलतः सात में विभाजन प्रारम्भ होना चाहिए परमब्रह्म की परमसत्ता और संप्रभुता का।

मुझे तो केवल इतना बताना था की प्रयागराज को केवल दो राम और कृष्ण के आधार पर ही नहीं बटेगा बल्कि सात का है और बटेंगा तो कम से कम सात में बांटेगा।  राम और कृष्ण एक ही परमब्रह्म/ब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश) के ही रूपांतरित होने वाले दो स्वरुप मात्र है और इनसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश मतलब एक से तीन वाला विभाजन कम से कम और फिर तीन से एक हो परमब्रह्म/ब्रह्म से विभाजन सात ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि का मतलब कम से कम सात में विभाजन। फिर आगे चलकर सप्तर्षिओं के सम्मिलित संतान से मलयदेश(तमिल+केरल का भाग) में जन्मे अगस्त्य/कुम्भज ऋषि के रूप को देखते हुए आठ में विभाजन और इस प्रकार आज के दिनांक में लगभग 105 या इससे कुछ अधिक गोत्रों/ऋषि पुत्रों में विभाजन। फिर भी प्रयागराज में कम से कम सात में विभाजन अवश्यम्भावी और न्यायपूर्ण विभाजन है क्योंकि कम से कम इन सातों का जन्म प्रयागराज में अवश्य हुआ था इसको देखते हुए।  पुनः इन सात से सामाजिक व्यवस्था सञ्चालन हेतु, तीन में विभाजन आपसी सामजस्य को ध्यान में रखते हुए ब्रह्मा, विष्णु और महेश के गुण को आधार मानते हुए, पर राम और कृष्ण परमब्रह्म स्वरुप है सूर्य की किरण की तरह जो सतरंगी रूप धारण कर सकते हैं।  अतः इनको वर्ण का आधार बना राम और कृष्ण में ही विभाजन समाप्त कर देने के स्थान पर कम से कम सात में विभाजन ही न्यायपूर्ण है। वैसे भी घनश्याम का अर्थ काजल नहीं होता है जिस स्वरुप में कृष्ण को परिभासित किया जा रहा है।
टिप्पणी: मूल सप्तर्षि/कुछ वंसज: ---- मारीच/कश्यप, वशिष्ठ/शांडिल्य/व्यासः, गौतम, आंगिरस/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय(सोम), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ।  यह हैं मानवता के वाहक सात ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि तो मानवता कम से कम सात भाग में विभाजित की जा सकती है मूल रूप में और ये सब प्रयागराज में जन्म लिए थे प्रकृष्टा यज्ञ/विश्व के प्राचीनतम प्राकयज्ञ से तो प्रयागराज से ही मूलतः सात में विभाजन प्रारम्भ होना चाहिए परमब्रह्म की परमसत्ता और संप्रभुता का।  

जिसके बंधूबांधव जिस अनुपात में जिस वर्ण के थे उसी अनुपात में उस वर्ण के व्यक्ति और व्यक्ति समूह को वह व्यक्ति ग्रहण किया या उसका पक्ष लिया तो इसमे श्रद्धा और प्रेम की लड़ाई किस बात की जब ईमान ही बिक गया वर्णानुपात और स्वबन्धुजन वर्णीय लोगों के प्रतिभ्रामक मोहजाल में। जिसके हिस्से में जो था उसे वह मिल गया और आगे भी मिलता रहेगा अगर ईमान बिकता रहा तो किशी को जातिवादी/धर्मवादी/वर्णवादी, असभ्य, मलेक्ष, मद्यप, दरिद्र(न की केवल गरीब), अज्ञानी, चरित्रहीन, ऐयासबाज जैसे महामण्डलीय उपाधी से अन्याय पूर्ण तरीके महामंडित करने और करवाने की जरूरत ही क्या थी? क्या इससे सत्य को मिटाया जा सकता था बन्धुबान्धव वर्णीय लोगों के प्रति भ्रामक मोहभाव के परिणाम स्वरुप उपजे आचरण की परिणति से। किशी को जातिवादी/धर्मवादी/वर्णवादी, असभ्य, मलेक्ष, मद्यप, दरिद्र(न की केवल गरीब), अज्ञानी, चरित्रहीन, ऐयासबाज जैसे महामण्डलीय उपाधी से अन्याय पूर्ण तरीके महामंडित करने और करवाने के कृत्य ने विश्वसमाज को ऐसे गर्त में धकेल दिया है की जो सबसे उन्नत है आज उसी का जीवन सबसे ज्यादा कसटकर और अशांति से गुजर रहा है।

जिसके बंधूबांधव जिस अनुपात में जिस वर्ण के थे उसी अनुपात में उस वर्ण के व्यक्ति और व्यक्ति समूह को वह व्यक्ति ग्रहण किया या उसका पक्ष लिया तो इसमे श्रद्धा और प्रेम की लड़ाई किस बात की जब ईमान ही बिक गया वर्णानुपात और स्वबन्धुजन वर्णीय लोगों के प्रतिभ्रामक मोहजाल में। जिसके हिस्से में जो था उसे वह मिल गया और आगे भी मिलता रहेगा अगर ईमान बिकता रहा तो किशी को जातिवादी/धर्मवादी/वर्णवादी, असभ्य, मलेक्ष, मद्यप, दरिद्र(न की केवल गरीब), अज्ञानी, चरित्रहीन, ऐयासबाज जैसे महामण्डलीय उपाधी से अन्याय पूर्ण तरीके महामंडित करने और करवाने की जरूरत ही क्या थी? क्या इससे सत्य को मिटाया जा सकता था बन्धुबान्धव वर्णीय लोगों के प्रति भ्रामक मोहभाव के परिणाम स्वरुप उपजे आचरण की परिणति से। किशी को जातिवादी/धर्मवादी/वर्णवादी, असभ्य, मलेक्ष, मद्यप, दरिद्र(न की केवल गरीब), अज्ञानी, चरित्रहीन, ऐयासबाज जैसे महामण्डलीय उपाधी से अन्याय पूर्ण तरीके महामंडित करने और करवाने के कृत्य ने विश्वसमाज को ऐसे गर्त में धकेल दिया है की जो सबसे उन्नत है आज उसी का जीवन सबसे ज्यादा कसटकर और अशांति से गुजर रहा है। 

Sunday, August 30, 2015

जिन लोगों के नंगेपन और अमानवीयता की गगनचुम्बी ईमारत आसमान में इठला रही है उन लोगों की ही बदौलत जो परोपकार में मानवता को बचाये रखने हेतु अपने में धनात्मक ऊर्जा का संचय अपने त्याग, तपश्या और बलिदान के बल पर अप्रतिम रूप से हर हाल में संजोये हुए हैं। आज के दिन में इन लोगों को ये भी ये नंगेपन और अमानवीय संस्कृति वाले अपनी कारगुजारी से नंगा और अमानवीय संस्कृति वाला ही बनाने हेतु अपना आत्मघाती प्रयास जारी रखे हुए है अबाधगति से सबको एक समान बनाने हेतु, जिसको रोकना होगा अगर हम मानवता को अबाधगति से जारी रखने के प्रति बचनबद्ध है। इस तथ्य से कोई अनभिज्ञता जता सकता है क्या की दुनिया में उच्चता का ही क्षरण होता है जो निम्नकोटि का है उसे तो निम्नकोटि का धरातल स्थायी रहने हेतु मिल जाता है जो उस महाशून्य का निर्माण करता है जो आध्यात्मिक संसार के उस महाशून्य की ही तरह ही परोक्ष रूप से होता है पर इसका आचरण कालनेमि जैसा ही होता है जो देखने में संत जैसा लगता है पर वास्तव में संत होता नहीं है मतलब आप जिसमे वाह्य सुख अनुभव कर सकते हैं पर आतंरिक सुख इसमें ढूंढने से भी मिलने वाला नहीं मतलब यह आप के अभीष्ट लक्ष्य से आप को दूर कर देता है अगर आप हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर की तरह उसे पहचान कर उसके कवच से बाहर नहीं निकलते हैं।

जिन लोगों के नंगेपन और अमानवीयता की गगनचुम्बी ईमारत आसमान में इठला रही है उन लोगों की ही बदौलत जो परोपकार में मानवता को बचाये रखने हेतु अपने में धनात्मक ऊर्जा का संचय अपने त्याग, तपश्या और बलिदान के बल पर अप्रतिम रूप से हर हाल में संजोये हुए हैं। आज के दिन में इन लोगों को ये भी ये नंगेपन और अमानवीय संस्कृति वाले अपनी कारगुजारी से नंगा और अमानवीय संस्कृति वाला ही बनाने हेतु अपना आत्मघाती प्रयास जारी रखे हुए है अबाधगति से सबको एक समान बनाने हेतु, जिसको रोकना होगा अगर हम मानवता को अबाधगति से जारी रखने के प्रति बचनबद्ध है। इस तथ्य से कोई अनभिज्ञता जता सकता है क्या की दुनिया में उच्चता का ही क्षरण होता है जो निम्नकोटि का है उसे तो निम्नकोटि का धरातल स्थायी रहने हेतु मिल जाता है जो उस महाशून्य का निर्माण करता है जो आध्यात्मिक संसार के उस महाशून्य की ही तरह ही परोक्ष रूप से होता है पर इसका आचरण कालनेमि जैसा ही होता है जो देखने में संत जैसा लगता है पर वास्तव में संत होता नहीं है मतलब आप जिसमे वाह्य सुख अनुभव कर सकते हैं पर आतंरिक सुख इसमें ढूंढने से भी मिलने वाला नहीं मतलब यह आप के अभीष्ट लक्ष्य से आप को दूर कर देता है अगर आप हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर की तरह उसे पहचान कर उसके कवच से बाहर नहीं निकलते हैं। 

आज मै यह कह सकता हूँ की आज हम मानसिक रूप से बीमार या मानसिक रूप से निर्धन है क्योंकि मेरे मन का संस्कार, मेरे मन की संस्कृति मृत प्राय हो चुकी है या तो स्वयं के द्वारा या अन्यलोगों के द्वारा जो सदैव जाने अनजाने हमको प्रभावित करते रहते है अपना होने के नाते या पड़ोसी होने के नाते या हमसे विद्द्वेश रखने के नाते। जिसको दो जून की रोटी हेतु काम मिल रहा है और दो जून की रोटी हेतु दूसरों के सामने झोली नहीं फैलाना पड रहा है, वे संस्कारवान और सुसंस्कृत जीवन जीने में अक्षम क्यों हैं? यह कोई भाषण का विषय नहीं वरन आत्मचिंतन का विषय है और मानवता को दीर्घकालिक रूप से संरक्षित करने हेतु संकल्प का विषय है जो ऐसी स्थित में कभी भी यह मानवता कोलैप्स कर जाएगी मतलब मानवता महाविनाश को प्राप्त हो सकती है मतलब समाप्त की जा सकती है उन लोगों में भी मनोविकार उत्पन्न हो जाने से जो सकारात्कम/धनात्मक ऊर्जा रखते है मतलब इनकी भी ऊर्जा ऋणात्मक ऊर्जा में बदल जाने से। यह दोषारोपण से ख़त्म होने वाला नहीं वरन आत्म मंथन और आत्मचिंतन के साथ उसका स्वयं निराकरण करने का प्रश्न है।

आज मै यह कह सकता हूँ की आज हम मानसिक रूप से बीमार या मानसिक रूप से निर्धन है क्योंकि मेरे मन का संस्कार, मेरे मन की संस्कृति मृत प्राय हो चुकी है या तो स्वयं के द्वारा या अन्यलोगों के द्वारा जो सदैव जाने अनजाने हमको प्रभावित करते रहते है अपना होने के नाते या पड़ोसी होने के नाते या हमसे विद्द्वेश रखने के नाते। जिसको दो जून की रोटी हेतु काम मिल रहा है और दो जून की रोटी हेतु दूसरों के सामने झोली नहीं फैलाना पड रहा है, वे संस्कारवान और सुसंस्कृत जीवन जीने में अक्षम क्यों हैं? यह कोई भाषण का विषय नहीं वरन आत्मचिंतन का विषय है और मानवता को दीर्घकालिक रूप से संरक्षित करने हेतु संकल्प का विषय है जो ऐसी स्थित में कभी भी यह मानवता कोलैप्स कर जाएगी मतलब मानवता महाविनाश को प्राप्त हो सकती है मतलब समाप्त की जा सकती है उन लोगों में भी मनोविकार उत्पन्न हो जाने से जो सकारात्कम/धनात्मक ऊर्जा रखते है मतलब इनकी भी ऊर्जा ऋणात्मक ऊर्जा में बदल जाने से। यह दोषारोपण से ख़त्म होने वाला नहीं वरन आत्म मंथन और आत्मचिंतन के साथ उसका स्वयं निराकरण करने का प्रश्न है। 

इसका परिणाम यह हो रहा है की नंगेपन और अमानवीयता का व्यवहार करने वालों से रिस्ता करने में मानसिक रूप से गिरे हुए लोगों में होड़ मची हुआ है जो तथाकथित रूप से भारतीय उंच्च सामाजिक स्तर वर्ग से आते है चाहे वह शासक होकर भी याचक वर्ग हो या रेखांकित किया हुआ संस्कार और संस्कृति के प्रतिरक्षक वर्ग के मृतप्राय मानसिकता के लोग जो भारतीय तथाकथित सामाजिक न्याय व्यवस्था से व्यथित हैं। तो इसका परिणाम क्या हो रहा है और क्या होने वाला है? इसका परिणाम यही है की धनात्मक ऊर्जा वाहक लोगों की भी ऊर्जा उत्तरोत्तर ऋणात्मक ऊर्जा में बदलती जा रही है और वह दिन दूर नहीं जब धनात्मक ऊर्जा के वाहक लोगों की सहनसीलता जबाब दे जाएगी और यह मानवता कोलैप्स कर जाएगी मतलब मानवता महाविनाश को प्राप्त हो जाएगी। संस्कार और संस्कृति विहीन धनपशु व्यक्ति और महाविद्वतजन व् समाज को उसका विवेकवान सगा सहोदर भाई भी छोड़ देता है या उससे दूर हट जाता है अगर उसे सही रस्ते पर ला सकने में असमर्थ अपने को पाता है, तो उससे दूरी स्वतः बना लेने में समाज के अन्य वर्ग/जाती/धर्म की क्या बात है? और इसका प्रमुख उदाहरण विभीषण जैसा विवेकवान, इस्वरभक्त और विद्वान स्वयं है जिसने रावण जैसे सर्वसम्पन्न और महापंडित भाई को संस्कार और संस्कृति से भटक जाने पर, उसे छोड़ भगवान श्रीराम का अनुसरण और समर्थन किया। -----यह ऐसा समय है जब संस्कार और संस्कृति के साथ जीने हेतु आवश्यक आवश्यता की सीमा से ऊपर लगभग 98% भारतीय जनता धनार्जन कर रही है(इतनी ही आर्थिक और सामाजिक उन्नति अवस्था आज के श्रेष्ठ उच्च संस्कृति और उच्च संस्कारवान कहे जाने वाले लोगों में भी थी और इससे कुछ ज्यादा उनके पास नहीं था आज से 25 वर्ष पूर्व, तो हुआ न वर्तमान में व्यापक आमजन का केवल और संस्कृति और संस्कार में निर्धन बने रहने के कारण निर्धन कहलाना और एक दूसरे से अलग रहना। यही संस्कृति और संस्कार विहीन हमारा अस्तित्व ही हमें एक दुसरे से अलग किये हुए है और जो लोग विवाह सम्बन्ध के आधार पर समानता चाहते है एक तो यह स्वार्थपूर्ण सम्बन्ध की बात है और विवाह सम्बन्ध बने बिना समान सामजिक स्तर ग्रामीण क्षेत्र के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उनके अन्य व्युत्पन जाती/धर्म के बीच कोई देखे, तो दूसरे विवाह सम्बन्ध के आधार पर समानता को परिभासित करना दिवा स्वप्न भी है, स्वेक्षा से कोई सांस्कृतिक और संस्कार विहीन व्यक्ति के साथ वैवाहिक सम्बन्ध नहीं बनाता है और बन भी जाता है तो सदैव निंदनीय और नारकीय जीवन को जन्म देता है) फिर भी जिस नंगेपन और अमानवीय संस्कार और संस्कृति युक्त गुलामी उसने अपनी अकर्मण्यता और दासतापण में जीने की आदत में उन्होंने स्वीकार की थी और जिससे बचने हेतु महासंग्राम किया था और सफलता भी प्राप्त की थी, आज केवल एक और एक वर्ग/समाज/जाती/धर्म जो सर्वोच्च संस्कार और संस्कृति का स्रोत होते हुए समाज का मार्ग दर्शक व् उसका आइना है, कम से कम इस समय तो हम कह ही सकते है और जिसके अधिकांश लोग ऐसी संस्कृति और संस्कार के वाहक रहे हैं युगों युगों उससे विषाक्त प्रतिशोध लेने के चलते समर्थ हो जाने पर भी बहु संख्यक समाज आज पुनः नंगेपन और अमानवीयता के संस्कार और संस्कृति को अपनाने में कोई घृणा नहीं महसूस कर रहा है क्योंकि भारतीय उच्च संस्कृति और संस्कारयुक्त समाज से द्वेषवश प्रतिशोध उन लोगों को लेना है जिनको की पता ही नहीं की 100 वर्ष पूर्व वे और उनके पूर्वज किस जाती/वर्ग/धर्म/समुदाय के घर और खानदान से थे और हजार वर्ष की वाणी उनको याद आती है। आनुवंशिक गुण भी के जन्म के बाद हमसे दूर हो जाते हैं पर हजार वर्ष शब्द इनकी वाणी से नहीं जाता जबकि सृस्टि कितने दिन से चल रही है यही किसीको ठीक से नहीं पता। इसका परिणाम यह हो रहा है की नंगेपन और अमानवीयता का व्यवहार करने वालों से रिस्ता करने में मानसिक रूप से गिरे हुए लोगों में होड़ मची हुआ है जो तथाकथित रूप से भारतीय उंच्च सामाजिक स्तर वर्ग से आते है चाहे वह शासक होकर भी याचक वर्ग हो या रेखांकित किया हुआ संस्कार और संस्कृति के प्रतिरक्षक वर्ग के मृतप्राय मानसिकता के लोग जो भारतीय तथाकथित सामाजिक न्याय व्यवस्था से व्यथित हैं। तो इसका परिणाम क्या हो रहा है और क्या होने वाला है? इसका परिणाम यही है की धनात्मक ऊर्जा वाहक लोगों की भी ऊर्जा उत्तरोत्तर ऋणात्मक ऊर्जा में बदलती जा रही है और वह दिन दूर नहीं जब धनात्मक ऊर्जा के वाहक लोगों की सहनसीलता जबाब दे जाएगी और यह मानवता कोलैप्स कर जाएगी मतलब मानवता महाविनाश को प्राप्त हो जाएगी।

 इसका परिणाम यह हो रहा है की नंगेपन और अमानवीयता का व्यवहार करने वालों से रिस्ता करने में मानसिक रूप से गिरे हुए लोगों में होड़ मची हुआ है जो तथाकथित रूप से भारतीय उंच्च सामाजिक स्तर वर्ग से आते है चाहे वह शासक होकर भी याचक वर्ग हो या रेखांकित किया हुआ संस्कार और संस्कृति के प्रतिरक्षक वर्ग के मृतप्राय मानसिकता के लोग जो भारतीय तथाकथित सामाजिक न्याय व्यवस्था से व्यथित हैं। तो इसका परिणाम क्या हो रहा है और क्या होने वाला है? इसका परिणाम यही है की धनात्मक ऊर्जा वाहक लोगों की भी ऊर्जा उत्तरोत्तर ऋणात्मक ऊर्जा में बदलती जा रही है और वह दिन दूर नहीं जब धनात्मक ऊर्जा के वाहक लोगों की सहनसीलता जबाब दे जाएगी और यह मानवता कोलैप्स कर जाएगी मतलब मानवता महाविनाश को प्राप्त हो जाएगी।   संस्कार और संस्कृति विहीन धनपशु व्यक्ति और महाविद्वतजन व् समाज को उसका विवेकवान सगा सहोदर भाई भी छोड़ देता है या उससे दूर हट जाता है अगर उसे सही रस्ते पर ला सकने में असमर्थ अपने को पाता है, तो उससे दूरी स्वतः बना लेने में समाज के अन्य वर्ग/जाती/धर्म की क्या बात है? और इसका प्रमुख उदाहरण विभीषण जैसा विवेकवान, इस्वरभक्त और विद्वान स्वयं है जिसने रावण जैसे सर्वसम्पन्न और महापंडित भाई को संस्कार और संस्कृति से भटक जाने पर, उसे छोड़ भगवान श्रीराम का अनुसरण और समर्थन किया। -----यह ऐसा समय है जब संस्कार और संस्कृति के साथ जीने हेतु आवश्यक आवश्यता की सीमा से ऊपर लगभग 98% भारतीय जनता धनार्जन कर रही है(इतनी ही आर्थिक और सामाजिक उन्नति अवस्था आज के श्रेष्ठ उच्च संस्कृति और उच्च संस्कारवान कहे जाने वाले लोगों में भी थी और इससे कुछ ज्यादा उनके पास नहीं था आज से 25 वर्ष पूर्व, तो हुआ न वर्तमान में व्यापक आमजन का केवल और संस्कृति और संस्कार में निर्धन बने रहने के कारण निर्धन कहलाना और एक दूसरे से अलग रहना। यही संस्कृति और संस्कार विहीन हमारा अस्तित्व ही हमें एक दुसरे से अलग किये हुए है और जो लोग विवाह सम्बन्ध के आधार पर समानता चाहते है  एक तो यह स्वार्थपूर्ण सम्बन्ध की बात है और विवाह सम्बन्ध बने बिना समान सामजिक स्तर ग्रामीण क्षेत्र के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उनके अन्य व्युत्पन जाती/धर्म के बीच कोई देखे, तो दूसरे विवाह सम्बन्ध के आधार पर समानता को परिभासित करना दिवा स्वप्न भी है, स्वेक्षा से कोई सांस्कृतिक और संस्कार विहीन व्यक्ति के साथ वैवाहिक सम्बन्ध नहीं बनाता है और बन भी जाता है तो सदैव निंदनीय और नारकीय जीवन को जन्म देता है)  फिर भी जिस नंगेपन और अमानवीय संस्कार और संस्कृति युक्त गुलामी उसने अपनी अकर्मण्यता और दासतापण में जीने की आदत में उन्होंने स्वीकार की थी और जिससे बचने हेतु महासंग्राम किया था और सफलता भी प्राप्त की थी, आज केवल एक और एक वर्ग/समाज/जाती/धर्म जो सर्वोच्च संस्कार और संस्कृति का स्रोत होते हुए समाज का मार्ग दर्शक व् उसका आइना है, कम से कम इस समय तो हम कह ही सकते है और जिसके अधिकांश लोग ऐसी संस्कृति और संस्कार के वाहक रहे हैं युगों युगों उससे विषाक्त प्रतिशोध लेने के चलते समर्थ हो जाने पर भी बहु संख्यक समाज आज पुनः नंगेपन और अमानवीयता के संस्कार और संस्कृति को अपनाने में कोई घृणा नहीं महसूस कर रहा है क्योंकि भारतीय उच्च संस्कृति और संस्कारयुक्त समाज से द्वेषवश प्रतिशोध उन लोगों को लेना है जिनको की पता ही नहीं की 100 वर्ष पूर्व वे और उनके पूर्वज किस जाती/वर्ग/धर्म/समुदाय के घर और खानदान से थे और हजार वर्ष की वाणी उनको याद आती है। आनुवंशिक गुण भी के जन्म के बाद हमसे दूर हो जाते हैं पर हजार वर्ष शब्द इनकी वाणी से नहीं जाता जबकि सृस्टि कितने दिन से चल रही है यही किसीको ठीक से नहीं पता।   इसका परिणाम यह हो रहा है की नंगेपन और अमानवीयता का व्यवहार करने वालों से रिस्ता करने में मानसिक रूप से गिरे हुए लोगों में होड़ मची हुआ है जो तथाकथित रूप से भारतीय उंच्च सामाजिक स्तर वर्ग से आते है चाहे वह शासक होकर भी याचक वर्ग हो या रेखांकित किया हुआ संस्कार और संस्कृति के प्रतिरक्षक वर्ग के मृतप्राय मानसिकता के लोग जो भारतीय तथाकथित सामाजिक न्याय व्यवस्था से व्यथित हैं। तो इसका परिणाम क्या हो रहा है और क्या होने वाला है? इसका परिणाम यही है की धनात्मक ऊर्जा वाहक लोगों की भी ऊर्जा उत्तरोत्तर ऋणात्मक ऊर्जा में बदलती जा रही है और वह दिन दूर नहीं जब धनात्मक ऊर्जा के वाहक लोगों की सहनसीलता जबाब दे जाएगी और यह मानवता कोलैप्स कर जाएगी मतलब मानवता महाविनाश को प्राप्त हो जाएगी।      

Friday, August 28, 2015

आज के दिनाक में वर्ष 2013 की श्रीकृष्ण जन्मास्टमी(28-08-2014) के बुधवार विशेष दिवस और रोहिणी नक्षत्र में ही मेरे द्वितीय पुत्र कृष्णकांत/राशिनाम वाशुदेव का जन्म हुआ था। आप सभी को मुझ विवेक(त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन)/(गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी दिन मंगलवार, 11-11-1975; तथागत राशिनाम गिरिधारी), मेरे प्रथम पुत्र विष्णुकांत/(30-09-2010 दिन बृहस्पतिवार; तथागत राशिनाम वेंकटेश) और पत्नी वन्दना की तरफ से हार्दिक आभार जिन सभी लोगों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आशीर्वाद मेरे द्वितीय पुत्र कृष्णकांत के जन्म पर मिला था।

आज के दिनाक में वर्ष 2013 की श्रीकृष्ण जन्मास्टमी(28-08-2014) के बुधवार विशेष दिवस और रोहिणी नक्षत्र में ही मेरे द्वितीय पुत्र कृष्णकांत/राशिनाम वाशुदेव का जन्म हुआ था। आप सभी को मुझ विवेक(त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन)/(गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी दिन मंगलवार, 11-11-1975; तथागत राशिनाम गिरिधारी), मेरे प्रथम पुत्र विष्णुकांत/(30-09-2010 दिन बृहस्पतिवार; तथागत राशिनाम वेंकटेश) और पत्नी वन्दना की तरफ से हार्दिक आभार जिन सभी लोगों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आशीर्वाद मेरे द्वितीय पुत्र कृष्णकांत के जन्म पर मिला था। 

Sarasvati Vandana

सरस्वती वंदना:
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे॥
जग सिरमौर बनाएं भारत,
वह बल विक्रम दे। वह बल विक्रम दे॥
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे॥
साहस शील हृदय में भर दे,
जीवन त्याग-तपोमर कर दे,
संयम सत्य स्नेह का वर दे,
स्वाभिमान भर दे। स्वाभिमान भर दे॥1॥
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे॥
लव, कुश, ध्रुव, प्रहलाद बनें हम
मानवता का त्रास हरें हम,
सीता, सावित्री, दुर्गा मां,
फिर घर-घर भर दे। फिर घर-घर भर दे॥2॥
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे॥


या कुन्देन्दुतु सार हार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
 या वीणा वरदण्ड मंडित करा या स्वेत पद्मासना।। 
या ब्रह्माच्युत शंकर प्रभृतभीर देवहि सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निः शेष जाड्या पहा।। 

मातु सरस्वती के सम्मान में संदर्भित सरस्वती वन्दना की प्रस्तुति मात्र है यह। 

Wednesday, August 26, 2015

वैसे भी आप मेरे गाँव जाकर ब्राह्मण परिवार में ही भारत और विश्व दर्शन कर सकते हैं पर संस्कार इनके भारतीय हैं या भारतीय संस्कार का पूर्ण समर्थन करते है चाहे किशी पारिस्थितिक बाध्यता में वे इसे पूर्ण रूप से पालन न कर पाते हों। केवल तथाकथित अन्य पिछड़े वर्ग ही नहीं तथाकथित दलित और अनुसूचित जनजातियों समेत अन्य जाति धर्म को भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जैसे समान सामाजिक स्तर के मुख्य अवयव से ही या इनका ही व्युत्पन्न या उनका ही सीधा स्वरुप सिद्ध कर सकता हूँ पर सामाजिक व्यवस्था में भूचाल आने से सामाजिक व्यवस्था को चलाने में बाधा आएगी राजसत्ता में बैठे बड़े और छोटे भाइयों और बहनो को। अतः मेरा प्रयास रहेगा की उनकी क्षमता अनुकूल खुलासा धीरे धीरे अपने आप हो जैसे मई 14 वर्ष पूर्व अचानक यह जान कर भी धीरे-धीरे सब प्रस्तुत कर रहा हूँ। वैसे भी आप मेरे गाँव जाकर ब्राह्मण परिवार में ही भारत और विश्व दर्शन कर सकते हैं पर संस्कार इनके भारतीय हैं या भारतीय संस्कार का पूर्ण समर्थन करते है चाहे किशी पारिस्थितिक बाध्यता में वे इसे पूर्ण रूप से पालन न कर पाते हों। मै अपने गाँव, रामापुर-223225, आजमगढ़ और ननिहाल, बिशुनपुर-223103, जौनपुर में ही भारत और विश्व दर्शन करके ही और अपने सभी गुरुकुल का दर्शन करके ही सब कुछ सामाजिक दर्शन दे रहा हूँ मुझे कही बाहर से उदाहरण नहीं लेना है। आप जिसका भी चाहेंगे और जो चाहेंगे सबका आचरण संज्ञान में आएगा मेरे द्वारा आप के सम्मुख ।

वैसे भी आप मेरे गाँव जाकर ब्राह्मण परिवार में ही भारत और  विश्व दर्शन कर सकते हैं पर संस्कार इनके भारतीय हैं या भारतीय संस्कार का पूर्ण समर्थन करते है चाहे किशी पारिस्थितिक बाध्यता में वे इसे पूर्ण रूप से पालन न कर पाते हों।  केवल तथाकथित अन्य पिछड़े वर्ग ही नहीं तथाकथित दलित और अनुसूचित जनजातियों समेत अन्य जाति धर्म को भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जैसे समान सामाजिक स्तर के मुख्य अवयव से ही या इनका ही व्युत्पन्न या उनका ही सीधा स्वरुप सिद्ध कर सकता हूँ पर सामाजिक व्यवस्था में भूचाल आने से सामाजिक व्यवस्था को चलाने में बाधा आएगी राजसत्ता में बैठे बड़े और छोटे भाइयों और बहनो को। अतः मेरा प्रयास रहेगा की उनकी क्षमता अनुकूल खुलासा धीरे धीरे अपने आप हो जैसे मई 14 वर्ष पूर्व अचानक यह जान कर भी धीरे-धीरे सब प्रस्तुत कर रहा हूँ। वैसे भी आप मेरे गाँव जाकर ब्राह्मण परिवार में ही भारत और  विश्व दर्शन कर सकते हैं पर संस्कार इनके भारतीय हैं या भारतीय संस्कार का पूर्ण समर्थन करते है चाहे किशी पारिस्थितिक बाध्यता में वे इसे पूर्ण रूप से पालन न कर पाते हों।  मै अपने गाँव, रामापुर-223225, आजमगढ़ और ननिहाल, बिशुनपुर-223103, जौनपुर  में ही भारत और विश्व दर्शन करके ही और अपने सभी गुरुकुल का दर्शन करके ही  सब कुछ सामाजिक दर्शन दे रहा हूँ मुझे कही बाहर से उदाहरण नहीं लेना है। आप जिसका भी चाहेंगे और  जो चाहेंगे सबका आचरण संज्ञान में आएगा मेरे द्वारा आप के सम्मुख । टिप्पणी: आर्टिकल Ramapur एंड Bishunpur

शिकायत आंगिरस गोत्रीय सनातन ब्राह्मण जोशी (ब्रह्मा)जी से की आप की सम्पूर्ण संप्रभुता और अधिकार जिन लोगों के पास रहा वे वैयक्तिक विकास को प्रमुखता देते रहे वही आप के कार्य का विरोध भी आतंरिक रूप से अज्ञानता वस दूसरों के दबाव/(वे अन्य शक्तियों को ज्यादा शक्तिशाली समझने लगे जो मुझसे कहीं अत्यंत कमजोर इक्षाशक्ति और मुझसे ही साम दाम दंड भेद का भाव रखती थीं) में करते रहे और इस प्रकार मेरा विरोध कर रहे थे सहमात का खेल खेलते हुए इसके साथ ही साथ आप को ही सर्वोच्च शक्ति समझते हुए मुझे उतने ही पर संतुस्ट रहना सिखाते रहे जितने से मई किशी तरह जी सकूँ पर मई इसे अन्य दो शक्तियों के कार्यपालन और आप के कार्यपूर्ती हेतु सहता रहा। मै केवल इतना समझता था की मुझे अन्य दोनों शक्तियों(विष्णु/गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण मेरे मामा श्रीश्रीधर मिश्र जी और शिव/कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण मेरे ताउजी डॉ प्रेम चंद पाण्डेय) द्वारा आप के कार्यपूर्ती हेतु भेजा गया है तो किशी भी कीमत पर आप का कार्यपूर्ती मेरा ध्धेय रहा और वह पूर्ण होकर ही रहा इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज और वैश्विक रूप से भी। एक ऐसा समय आया था मेरे भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलुरु जैसे भारतीय सर्वोच्च शिक्षण संस्थान में रहने के दौरान मेरी दृस्टि से सब कुछ अनर्थ देख मेरी सहनशीलता जबाब दे गयी और मुझे ऑरकुट पर कहना पड़ा की डान(भगवा) और बबलू(तिरंगा) भाई जय श्रीराम करो सभी ऐसे शिक्षण और शोध संस्थानों का और मै गाँव जाकर एक जोड़ी बैल खरीदकर हल जोतूंगा और इस प्रकार खेती करूंगा पर यह सब बर्दास्त नहीं करूंगा भारत भूमि पर या इन सबको जो इस तरह से जीना चाह रहे हैं उनको विश्व में सामूहिक समझौते के तहत स्थान विशेष पर इस विश्व के किशी स्थान पर केंद्रित करो जहां पर ये शोध करते हुए जो चाहे सो करें अगर इनको भारतीय संस्कृति के आधार पर नहीं रहना है या भारतीय संस्कृति के आधार पर आचरण नहीं करना है । टिप्पणी: मेरे गाँव में मेरे खानदान में खेत में किशी सदस्य द्वारा जुताई का काम अपने खेत पर वर्जित है जबकि अन्य खेती के हर बड़े से छोटे कार्य नहीं वर्जित है और इन सबके बावजूद मैंने खुद बैल खरीदकर गाँव की खेती में ही हल जोतना स्वीकार किया पर जो हो रहा था उसे बर्दास्त नहीं कर सकता था।

शिकायत आंगिरस गोत्रीय सनातन ब्राह्मण जोशी (ब्रह्मा)जी से की आप की सम्पूर्ण संप्रभुता और अधिकार जिन लोगों के पास रहा वे वैयक्तिक विकास को प्रमुखता देते रहे वही आप के कार्य का विरोध भी आतंरिक रूप से अज्ञानता वस दूसरों के दबाव/(वे अन्य शक्तियों को ज्यादा शक्तिशाली समझने लगे जो मुझसे कहीं अत्यंत कमजोर इक्षाशक्ति और मुझसे ही साम दाम दंड भेद का भाव रखती थीं)  में करते रहे और इस प्रकार मेरा विरोध कर रहे थे सहमात का खेल खेलते हुए इसके साथ ही साथ आप को ही सर्वोच्च शक्ति समझते हुए मुझे उतने ही पर संतुस्ट रहना सिखाते रहे जितने से मई किशी तरह जी सकूँ पर मई इसे अन्य दो शक्तियों के कार्यपालन और आप के कार्यपूर्ती हेतु सहता रहा। मै केवल इतना समझता था की मुझे अन्य दोनों शक्तियों(विष्णु/गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण मेरे मामा श्रीश्रीधर मिश्र जी और शिव/कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण मेरे ताउजी डॉ प्रेम चंद पाण्डेय) द्वारा आप के कार्यपूर्ती हेतु भेजा गया है तो किशी भी कीमत पर आप का कार्यपूर्ती मेरा ध्धेय रहा और वह पूर्ण होकर ही रहा इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज और वैश्विक रूप से भी। एक ऐसा समय आया था मेरे भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलुरु जैसे भारतीय सर्वोच्च शिक्षण संस्थान में रहने के दौरान मेरी दृस्टि से सब कुछ अनर्थ देख मेरी सहनशीलता जबाब दे गयी और मुझे ऑरकुट पर कहना पड़ा की डान(भगवा) और बबलू(तिरंगा) भाई जय श्रीराम करो सभी ऐसे शिक्षण और शोध संस्थानों का और मै गाँव जाकर एक जोड़ी बैल खरीदकर हल जोतूंगा और इस प्रकार खेती करूंगा पर यह सब बर्दास्त नहीं करूंगा भारत भूमि पर या इन सबको जो इस तरह से जीना चाह रहे हैं उनको विश्व में सामूहिक समझौते के तहत स्थान विशेष पर इस विश्व के किशी स्थान पर केंद्रित करो जहां पर ये शोध करते हुए जो चाहे सो करें अगर इनको भारतीय संस्कृति के आधार पर नहीं रहना है या भारतीय संस्कृति के आधार पर आचरण नहीं करना है ।  टिप्पणी: मेरे गाँव में मेरे खानदान में खेत में किशी सदस्य द्वारा जुताई का काम अपने खेत पर वर्जित है जबकि अन्य खेती के हर बड़े से छोटे कार्य नहीं वर्जित है और इन सबके बावजूद मैंने खुद बैल खरीदकर गाँव की खेती में ही हल जोतना स्वीकार किया पर जो हो रहा था उसे बर्दास्त नहीं कर सकता था। 

Tuesday, August 25, 2015

अंततः विवेक(त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महादेव की आंतरिक सुरक्षा शक्ति जो उनको शक्ति का मुख्य स्रोत बनाता है या जिसे आप शिव शक्ति या शिवशक्ति का केंद्र कह सकते हैं): ------- जिसकी/रामापुर-223225, आजमगढ़ की कुलदेवी देवकाली(जगतजननी=महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी)=दुर्गा और जिसके/ मेरे ननिहाल/बिशुनपुर-223103, जौनपुर/जमदग्नि(भृगुपुत्र/परशुरामपिता)पुर के मुख्य आराध्य स्वयं महादेव रहे हो तो यदि वह सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला/विल्वा पत्र/बेलपत्र( जो शिव की शक्ति और शिव पर सपमर्पित होने वाला तथा शिवा/पार्वती का आहार है) पाण्डेय ब्राह्मण विवेक कुमार पाण्डेय स्वयं ब्रह्मा(जोशी) के जगति कल्याणहेतु कार्य में स्वयं विष्णु(श्रीधर/मेरे स्वयं के मामा और मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर) और स्वयं शिव(प्रेमचंद/चन्द्रमा प्रेमी/मेरे ताऊ जी और परमपिता परमेश्वर) के आदेशनुसार अगर मै अपने अस्तित्व को समाप्त प्राय कर लेने पर(वैसे में इस मानवता के हित में विषपान भी पसंद किया हूँ पर इसमें अपनी दो पीढ़ी की ऊर्जा, अपने आजीवन सद्कर्मों के बदले मान, सम्मान और अभिमान जो था और अपना 25 वर्ष की उम्र का भविष्य भी इसी दुनिया की चकाचौंध और अस्तित्व बनाये रखने हेतु गुरुदेवों के आदेशानुसार अपना ही अस्तित्व समाप्त प्राय कर दिया था) ऐसे कार्य की पूणर्रूपेण कार्यपूर्ती हो जाने पर भी अगर अस्तित्व में रह गया तो आप मुझ विवेक का आंकलन किस रूप में कर रहे हैं यह आप के ही विवेक पर निर्भर करता है? फिर भी बता दूँ की कही आप आत्मघाती कदम तो नही उठा रहे यह भी आपको अपने विवेक से ही सोचना है।

अंततः विवेक(त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महादेव की आंतरिक सुरक्षा शक्ति जो उनको शक्ति का मुख्य स्रोत बनाता है या जिसे आप शिव शक्ति या शिवशक्ति का केंद्र कह सकते हैं): ------- जिसकी/रामापुर-223225, आजमगढ़ की कुलदेवी देवकाली(जगतजननी=महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी)=दुर्गा और जिसके/ मेरे ननिहाल/बिशुनपुर-223103, जौनपुर/जमदग्नि(भृगुपुत्र/परशुरामपिता)पुर के मुख्य आराध्य स्वयं महादेव रहे हो तो यदि वह सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला/विल्वा पत्र/बेलपत्र( जो शिव की शक्ति और शिव पर सपमर्पित होने वाला तथा शिवा/पार्वती का आहार है) पाण्डेय ब्राह्मण विवेक कुमार पाण्डेय स्वयं ब्रह्मा(जोशी) के जगति कल्याणहेतु कार्य में स्वयं विष्णु(श्रीधर/मेरे स्वयं के मामा और मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर) और स्वयं शिव(प्रेमचंद/चन्द्रमा प्रेमी/मेरे ताऊ जी और परमपिता परमेश्वर) के आदेशनुसार अगर मै अपने अस्तित्व को समाप्त प्राय कर लेने पर(वैसे में इस मानवता के हित में विषपान भी पसंद किया हूँ पर इसमें अपनी दो पीढ़ी की ऊर्जा, अपने आजीवन सद्कर्मों के बदले मान, सम्मान और अभिमान जो था और अपना 25 वर्ष की उम्र का भविष्य भी इसी दुनिया की चकाचौंध और अस्तित्व बनाये रखने हेतु गुरुदेवों के आदेशानुसार अपना ही अस्तित्व समाप्त प्राय कर दिया था) ऐसे कार्य की पूणर्रूपेण कार्यपूर्ती हो जाने पर भी अगर अस्तित्व में रह गया तो आप मुझ विवेक का आंकलन किस रूप में कर रहे हैं यह आप के ही विवेक पर निर्भर करता है? फिर भी बता दूँ की कही आप आत्मघाती कदम तो नही उठा रहे यह भी आपको अपने विवेक से ही सोचना है। 

जो दुर्गा(जगतजननी=महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी) हेतु या उनके किशी कार्यपूर्ती के उद्देश्य हेतु मारा गया या जो श्रीराम/कृष्ण (सशरीर परमब्रह्म=ब्रह्मा+विष्णु+महेश) या उनके किशी कार्यपूर्ती के उद्देश्यहेतु मरा गया वह दुर्गा और श्रीराम में सीधे ही मिल गया तो इससे अच्छा परमपद और क्या हो सकता है जिसे महामानव से लेकर दानव(रावण जैसा महापंडित भी इसी श्रेणी में शामिल है) तक पाना चाहते है।

जो दुर्गा(जगतजननी=महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी) हेतु या उनके किशी कार्यपूर्ती के उद्देश्य हेतु मारा  गया या जो श्रीराम/कृष्ण (सशरीर परमब्रह्म=ब्रह्मा+विष्णु+महेश) या उनके किशी कार्यपूर्ती के उद्देश्यहेतु मरा गया वह दुर्गा और श्रीराम में सीधे ही मिल गया तो इससे अच्छा परमपद और क्या हो सकता है जिसे महामानव से लेकर दानव(रावण जैसा महापंडित भी इसी श्रेणी में शामिल है) तक पाना चाहते है।  

  

मानव अपनी सभ्यता, संस्कृति छोड़ने पर और विकराल प्रलय की स्थिति उपरांत अज्ञानता की स्थिति में पहुँचने के बाद आदिमानव होता रहता है न की आदिमानव से मानव तक का विकाश हुआ। जिसने अपनी संस्कृति और संस्कार छोड़ दिए वह आदिमानव नहीं पशु और राक्षस से भी बदतर हो जाता है और न मानते हों तो दिल्ली में दिसंबर में अभी कुछ वर्ष पूर्व में ही हुई "निर्भया" घटना इसका सबसे ज्वलंत उदहारण है। कोई वैज्ञानिक किशी अमीबा को एक पूर्ण संस्कारित मानव बना कर दिखाए अगर मानव और अन्य जीव जंतुओं को उनका अपने ही रूप में सीधे-शीधे स्वाभिक उत्पति इस्वर प्रदत्त नहीं मानता है।

मानव अपनी सभ्यता, संस्कृति छोड़ने पर और विकराल प्रलय की स्थिति उपरांत अज्ञानता की स्थिति में पहुँचने के बाद आदिमानव होता रहता है न की आदिमानव से मानव तक का विकाश हुआ। जिसने अपनी संस्कृति और संस्कार छोड़ दिए वह आदिमानव नहीं पशु और राक्षस से भी बदतर हो जाता है और न मानते हों तो दिल्ली में दिसंबर में अभी कुछ वर्ष पूर्व में ही हुई "निर्भया" घटना इसका सबसे ज्वलंत उदहारण है। कोई वैज्ञानिक किशी अमीबा को एक पूर्ण संस्कारित मानव बना कर दिखाए अगर मानव और अन्य जीव जंतुओं को उनका अपने ही रूप में सीधे-शीधे स्वाभिक उत्पति इस्वर प्रदत्त नहीं मानता है। 

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:

१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|

२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।

3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।

4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.

5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

अगर विधि के आचार्य को भारतीय संसद द्वारा पूर्ण रूपेण स्थापित विधि के स्पष्ट परिभाषित नियमों के विपरीत आचरण और आदेश करने का हक़ जो संसार दिया है तो वहीं संसार जिसके कारन जन्म और बारम्बार जिसकी सहनशीलता पर अनेकों बार पुनर्जन्म पाया हो तो उसके द्वारा नस्ट ही कर दिया जाय उसके द्वारा तो इसमें क्या गलत है?

अगर विधि के आचार्य को भारतीय संसद द्वारा पूर्ण रूपेण स्थापित विधि के स्पष्ट परिभाषित नियमों के विपरीत आचरण और आदेश करने का हक़ जो संसार दिया है तो वहीं संसार जिसके कारन जन्म और बारम्बार जिसकी सहनशीलता पर अनेकों बार पुनर्जन्म पाया हो तो उसके द्वारा नस्ट ही कर दिया जाय उसके द्वारा तो इसमें क्या गलत है? 

ब्राह्मण बिना यह संसार चल सकता तो मै इतना दिन यह कहने हेतु यह ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" लिखने में न लगता क्योंकि आप बहुत बड़े नेता, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी, सैनिक, अभियंता, चिकित्सक, लिपिक व् अन्य सेवा के लोग जिसमे अन्य धर्म और पंथ के भी ऐसे सेवा क्षेत्र के लोग इस दुनिया को समाप्ती की अंतिम अवश्था तक पहुंचा दिए थे और यह दुनिया अगर स्थिर और संरक्षित रह चुकी है और अबाधगति से चल रही है तो केवल और केवल प्रारंभिक रूप से तात्कालिक स्थिति को भांपते हुए सनातन ब्राह्मणों की क्रिया कुसलता से और तत्पश्चात उनके अनुगामी सद्जन और मानवता के प्रति समर्पित लोगों की सजग क्रियाशीलता की वजह से। मुझे जिस स्वरुप में आप देख रहे हैं वह मेरा अपना स्वरुप आप सबके कर्मों की वजह से है अन्यथा आप मुझे इस स्थान पर न पाते और न तो आप मेरे तेज को बर्दास्त कर पाते। अगर आप लोगों को मेरा उचित विकल्प मिल गया होता तो मै मान लेता की इस संसार में अब सनातन ब्राह्मण प्रासंगिक नहीं रहे केवल आप=ईसाइयत प्रासंगिक हैं।

ब्राह्मण बिना यह संसार चल सकता तो मै इतना दिन यह कहने हेतु यह ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" लिखने में न लगता क्योंकि आप बहुत बड़े नेता, वैज्ञानिक,  प्रशासनिक अधिकारी, सैनिक, अभियंता, चिकित्सक, लिपिक व् अन्य सेवा के लोग जिसमे अन्य धर्म और पंथ के भी ऐसे सेवा क्षेत्र के लोग इस दुनिया को समाप्ती की अंतिम अवश्था तक पहुंचा दिए थे और यह दुनिया अगर स्थिर और संरक्षित रह चुकी है और अबाधगति से चल रही है तो केवल और केवल प्रारंभिक रूप से तात्कालिक स्थिति को भांपते हुए सनातन ब्राह्मणों की क्रिया कुसलता से और तत्पश्चात उनके अनुगामी सद्जन और मानवता के प्रति समर्पित लोगों की सजग क्रियाशीलता की वजह से।  मुझे जिस स्वरुप में आप देख रहे हैं वह मेरा अपना स्वरुप आप सबके कर्मों की वजह से है अन्यथा आप मुझे इस स्थान पर न पाते और न तो आप मेरे तेज को बर्दास्त कर पाते।  अगर आप लोगों को मेरा उचित विकल्प मिल गया होता तो मै मान लेता की इस संसार में अब सनातन ब्राह्मण प्रासंगिक नहीं रहे केवल आप=ईसाइयत प्रासंगिक हैं। 

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

व्यक्तिगत मानवीय स्वरुप में: हर औरत बराबर हैं मतलब यह नहीं होता है की की किशी व्यभिचारिणी को ही आप जीवन संगिनी बना लें या हर पुरुष बराबर हैं इसका मतलब यह नहीं की आप व्यभिचारि पुरुष को अपना जीवन साथी बना लें उसी तरह से दुनिया में बहुत से आयाम होते हैं जो मौलिक रूप में तो समान होते हैं पर हर तरह से समान हो इसकी जिम्मेदारी आप नहीं ले सकते हैं। दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके लिए बहु, बेटी, पत्नी, माँ और बहन का कोई विकल्प नहीं होता है इतना ही नहीं कुछ का खेती/माटी/मातृभूमि से भी रिस्ता होता है और उसका विकल्प नहीं होता है और इसीलिए भारतीय विचार में कहा गया है की खेती और बेटी उसे दें जो उसकी क़द्र करे और जिससे की आप का और उसका सम्मान न जाय। मित्रों रामायण और महाभारत जैसे युद्ध बेटी (किशी की बहु, बेटी, पत्नी, माँ और बहन) और खेती/माटी/मातृभूमि के लिए ही हुआ था। इसमें वही जीता था जिसके लिए बेटी( वह किशी की बहु, बेटी, पत्नी, माँ और बहन हो सकती है) और खेती/माटी/मातृभूमि उसके स्वाभिमान, मान और सम्मान का प्रश्न था और इस 14 वर्ष के युद्ध को भी वही जीता जिसके लिए बेटी( वह किशी की बहु, बेटी, पत्नी, माँ और बहन हो सकती है) और खेती/माटी/मातृभूमि उसके स्वाभिमान, मान और सम्मान का प्रश्न था और इसके एकदम विपरीत चलने वाले लोगो और उनके समुदाय का इस विश्व समुदाय रूपी आईने में चेहरा बेनकाब करना ही पड़ा। वैसे में इस मानवता के हित में विषपान भी पसंद किया हूँ पर इसमें अपनी दो पीढ़ी की ऊर्जा, अपने आजीवन सद्कर्मों के बदले मान, सम्मान और अभिमान जो था और अपना 25 वर्ष की उम्र का भविष्य भी इसी दुनिया की चकाचौंध और अस्तित्व बनाये रखने हेतु गुरुदेवों के आदेशानुसार अपना ही अस्तित्व समाप्त प्राय कर दिया था। यह उस दादी का पौत्र था जो कहा करती थीं की "साहब की आजी/दादी की क्या बात है"? उनकी सेवा घर रहकर नहीं कर सका प्रयागराज में गुरुजन की सेवा/मानवता की रक्षा में व्यस्त होने के नाते पर साहब का काम(ईसाई/दलित समुदाय गठजोड़ को बेनकाब कर) तो उनका पौत्र कर दिया जो वैज्ञानिक से अलग किशी विकल्प के रूप पर पुलिस अधीक्षक पद पर कार्य कर बाद में जीवनपर्यन्त समाज सेवा में समर्पित करना चाह रहा था जबकि मेरे एक इतिहास गुरु समसे आलम खान मुझे जिलाधिकारी/आई ए एस बनने के लिए प्रेरित किये थे मुझसे कक्षा 6 से 8 तक इतिहास का भाषण कक्षा में करवाकर। मेरा पुनः अनुरोध है अप्लसंख्यक (इसके एक विशेष समुदाय) से की ईसाई/दलित समाज के भरोसे आप अगर सनातन हिन्दू धर्म का सत्यानाश करेंगे तो 3 और 3500 ही नहीं समस्त मानवता समाप्त की जा सकती है यह तो एक झांकी भर हो सकता है। अतः जान लीजिये की सनातन ब्राह्मण/हिन्दू बिना यह संसार अस्तित्व में ही नहीं है?

व्यक्तिगत मानवीय स्वरुप में: हर औरत बराबर हैं मतलब यह नहीं होता है की की किशी व्यभिचारिणी को ही आप जीवन संगिनी बना लें या हर पुरुष बराबर हैं इसका मतलब यह नहीं की आप व्यभिचारि पुरुष को अपना जीवन साथी बना लें उसी तरह से दुनिया में बहुत से आयाम होते हैं जो मौलिक रूप में तो समान होते हैं पर हर तरह से समान हो इसकी जिम्मेदारी आप नहीं ले सकते हैं। दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके लिए बहु, बेटी, पत्नी, माँ और बहन का कोई विकल्प नहीं होता है इतना ही नहीं कुछ का खेती/माटी/मातृभूमि से भी रिस्ता होता है और उसका विकल्प नहीं होता है और इसीलिए भारतीय विचार में कहा गया है की खेती और बेटी उसे दें जो उसकी क़द्र करे और जिससे की आप का और उसका सम्मान न जाय। मित्रों रामायण और महाभारत जैसे युद्ध बेटी (किशी की बहु, बेटी, पत्नी, माँ और बहन) और खेती/माटी/मातृभूमि के लिए ही हुआ था। इसमें वही जीता था जिसके लिए बेटी( वह किशी की बहु, बेटी, पत्नी, माँ और बहन हो सकती है) और खेती/माटी/मातृभूमि उसके स्वाभिमान, मान और सम्मान का प्रश्न था और इस 14 वर्ष के युद्ध को भी वही जीता जिसके लिए बेटी( वह किशी की बहु, बेटी, पत्नी, माँ और बहन हो सकती है) और खेती/माटी/मातृभूमि उसके स्वाभिमान, मान और सम्मान का प्रश्न था और इसके एकदम विपरीत चलने वाले लोगो और उनके समुदाय का इस विश्व समुदाय रूपी आईने में चेहरा बेनकाब करना ही पड़ा। वैसे में इस मानवता के हित में विषपान भी पसंद किया हूँ पर इसमें अपनी दो पीढ़ी की ऊर्जा, अपने आजीवन सद्कर्मों के बदले मान, सम्मान और अभिमान जो था और अपना 25 वर्ष की उम्र का भविष्य भी इसी दुनिया की चकाचौंध और अस्तित्व बनाये रखने हेतु गुरुदेवों के आदेशानुसार अपना ही अस्तित्व समाप्त प्राय कर दिया था। यह उस दादी का पौत्र था जो कहा करती थीं की "साहब की आजी/दादी की क्या बात है"? उनकी सेवा घर रहकर नहीं कर सका प्रयागराज में गुरुजन की सेवा/मानवता की रक्षा में व्यस्त होने के नाते पर साहब का काम(ईसाई/दलित समुदाय गठजोड़ को बेनकाब कर) तो उनका पौत्र कर दिया जो वैज्ञानिक से अलग किशी विकल्प के रूप पर पुलिस अधीक्षक पद पर कार्य कर बाद में जीवनपर्यन्त समाज सेवा में समर्पित करना चाह रहा था जबकि मेरे एक इतिहास गुरु समसे आलम खान मुझे जिलाधिकारी/आई ए एस बनने के लिए प्रेरित किये थे मुझसे कक्षा 6 से 8 तक इतिहास का भाषण कक्षा में करवाकर। मेरा पुनः अनुरोध है अप्लसंख्यक (इसके एक विशेष समुदाय) से की ईसाई/दलित समाज के भरोसे आप अगर सनातन हिन्दू धर्म का सत्यानाश करेंगे तो 3 और 3500 ही नहीं समस्त मानवता समाप्त की जा सकती है यह तो एक झांकी भर हो सकता है। अतः जान लीजिये की सनातन ब्राह्मण/हिन्दू बिना यह संसार अस्तित्व में ही नहीं है?

Sunday, August 23, 2015

लेकिन भरद्वाज/आंगिरस और उनके शिष्य, गर्ग जान लें की मै सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण उनके गुरु बाल्मीकि का परपिता हूँ और पुनः उनको कोई गलती नहीं करनी है रही बात शांडिल्य की तो भांजे को समझ आ गयी होगी की मामा कंस नहीं था मै। >>>>>मुझे आप कश्यप, वशिष्ठ और गौतम जैसे तीन सनातन मूल गोत्र का अंश मान लेंगे मेरे गाँव(कश्यप), मेरे ननिहाल(गौतम) और पिता के ननिहाल(वशिष्ठ) में मेरे जन्म से| परमगुरु पद पर तो वशिष्ठ का ही हक सर्वविदित है पर जिस भारद्वाज/आंगिरस कुल में देवताओं के गुरु बृहस्पति जन्म लिए हो वह गुरु महत्वपूर्ण पर गुरु वशिष्ठ और उनके वंसज शांडिल्य से छोटा हो जाता है क्योंकि स्वयं श्रिष्टि के इतिहास में मानव स्वरुप में जन्मे कई विष्णु/त्रिदेव अवतार में मात्र दो सशरीर परमब्रह्म हुए श्रीराम और श्रीकृष्ण और दोनों क्रमसः वशिष्ठ और शांडिल्य के शिष्य हुए है। फिर भी भारद्वाज/आंगिरस कुल जो दार्शनिक और अनुसंधानक के साथ-साथ अपने कुल में धन्वन्तरि जैसे चिकत्साशास्त्र प्रणेता को भी जन्म लिया था वर्तमान समय में किशी कारण वस उनके कुल में दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के जन्म ले लेने के वावजूद एक ऐसे रत्न को जन्म दे चुका है जो ब्रह्मा का परमपद इसी श्रीकृष्ण जन्मास्टमी(05-09-2015) को प्राप्त करेगा और उसका पदाभिषेक मेरे द्वारा होगा जैसे की सनातन गौतम गोत्र से जन्मे पुत्र रत्न का विष्णुपद पर पदाभिषेक मेरे द्वारा किया गया है। ----------किन भरद्वाज/आंगिरस और उनके शिष्य, गर्ग जान लें की मै सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण उनके गुरु बाल्मीकि का परपिता हूँ और पुनः उनको कोई गलती नहीं करनी है रही बात शांडिल्य की तो भांजे को समझ आ गयी होगी की मामा कंस नहीं था मै।

लेकिन भरद्वाज/आंगिरस और उनके शिष्य, गर्ग जान लें की मै सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण उनके गुरु बाल्मीकि का परपिता हूँ और पुनः उनको कोई गलती नहीं करनी है रही बात शांडिल्य की तो भांजे को समझ आ गयी होगी की मामा कंस नहीं था मै। >>>>>मुझे आप कश्यप, वशिष्ठ और गौतम जैसे तीन सनातन मूल गोत्र का अंश मान लेंगे मेरे गाँव(कश्यप), मेरे ननिहाल(गौतम) और पिता के ननिहाल(वशिष्ठ) में मेरे जन्म से|  परमगुरु पद पर तो वशिष्ठ का ही हक सर्वविदित है पर जिस भारद्वाज/आंगिरस कुल में देवताओं के गुरु बृहस्पति जन्म लिए हो वह गुरु महत्वपूर्ण पर गुरु वशिष्ठ और उनके वंसज शांडिल्य से छोटा हो जाता है क्योंकि स्वयं श्रिष्टि के इतिहास में मानव स्वरुप में जन्मे कई विष्णु/त्रिदेव अवतार में मात्र दो सशरीर परमब्रह्म हुए श्रीराम और श्रीकृष्ण और दोनों क्रमसः वशिष्ठ और शांडिल्य के शिष्य हुए है। फिर भी भारद्वाज/आंगिरस कुल जो दार्शनिक और अनुसंधानक के साथ-साथ अपने कुल में धन्वन्तरि जैसे चिकत्साशास्त्र प्रणेता को भी जन्म लिया था वर्तमान समय में किशी कारण वस उनके कुल में दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के जन्म ले लेने के वावजूद एक ऐसे रत्न को जन्म दे चुका है जो ब्रह्मा का परमपद इसी श्रीकृष्ण जन्मास्टमी(05-09-2015) को प्राप्त करेगा और उसका पदाभिषेक मेरे द्वारा होगा जैसे की सनातन गौतम गोत्र से जन्मे पुत्र रत्न का विष्णुपद पर पदाभिषेक मेरे द्वारा किया गया है। ----------किन भरद्वाज/आंगिरस और उनके शिष्य, गर्ग जान लें की मै सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण उनके गुरु बाल्मीकि का परपिता हूँ और पुनः उनको कोई गलती नहीं करनी है रही बात शांडिल्य की तो भांजे को समझ आ गयी होगी की मामा कंस नहीं था मै।     

मै रामा(सीता)पुर, आज़मगढ़ -223225 निवासी, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, सारंगधर(शिव)/…/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्मपितामह)/.... /रामप्रसाद(मालिक)/बेचनराम के पुत्र श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय का पुत्र विवेक कुमार पाण्डेय हूँ तो समझ लीजिये की भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर की मजाक की भाषा में नेचर शोध पत्रिका में प्रकाशित और पेटेंट किया हुआ हूँ तो वैसे भी कोई अस्त्र मुझ पर काम करने वाला नहीं जो डुप्लीकेट पर अक्सर काम कर जाता है। अल्पसंख्यक अस्त्र(इसके एक समुदाय विशेष) की आंड और निर्देशन में गर्ग और शांडिल्य गोत्रियों का ब्रह्मास्त्र, दलितअस्त्र, पिछड़ा अस्त्र; तथा गर्ग, शांडिल्य और इमरती के निर्देशन में तलवार, तराजू और कागज़-कलम अस्त्र सभी ने अपना काम किया है कम से कम तलवार, तराजू, इमरती और कागज़-कलम ने मुझे कागज पर वरिष्ठ से कनिष्ठ बनाने में कोई कसर नही छोड़ी अंतिम समय में पर यदि सभी अस्त्र ने मुझ पर काम कर लिया हो तो मै केवल एक शब्द में पूरी लड़ाई एक ही वाक्य में समाप्त करना चाहूँगा की कि इमरती को ज्ञात हो की मै स्वयं परशुराम का भी गुरु सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, शिव/विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र मतलब स्वयं सशरीर शिव ही था(परशुराम के गुरु स्वयं शिव थे) और इन चौदह वर्षों के दौरान जिसपर विरोध स्वरुप चला कोई अस्त्र काम न दिया वैसे से सबसे सक्षम अस्त्र ब्रह्मास्त्र कम से कम त्रिदेव के तीनों अंश पर काम नहीं करता है। ----------रही बात परमब्रह्म अवश्था की तो जो आचरण, संरक्षण, दिशा-निर्देशन, सृजन और नवनिर्माण मेरे इन 14 वर्ष के स्वरुप के कारण हुआ उसने मुझे भौतिक रूप से राम और कृष्ण दोनों बना दिया था जिसमे से किशी एक के ही पर इस ब्रह्माण्ड का कोई अस्तित्व ही नहीं मतलब श्रीराम और श्रीकृष्ण दो ऐसे स्वरुप है जो अपने में सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) है। मैंने अपनी सूझ-बूझ से काम करते हुए इसी शिव/विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र सीमा का विस्तार करते हुए जिसमे मेरे द्वारा भौतिक रूप से कोई प्रतिवाद नही किया गया कितने भी अस्त्र मेरे ऊपर काम किये हों। मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी) को जन्मे मुझ विवेक को राशिनाम गिरिधारी ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) ने सशरीर परमब्रह्म की अवस्था तक पहुचने में विशेष योगदान दिया पर विशेष परिस्थितियों ने मुझे श्रीकृष्ण की सीमा से श्रीराम के सर्वोच्च आचरण अवस्था तक पहुंचाने में विशेष गोगदान दिया और इस प्रकार विवेक (शिव/विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र) मतलब शिव सीमा का विस्तार परमब्रह्म अवस्था तक होना मानवता के इतिहास में प्रथम घटना होगी जिसमे शिव ने कोई भौतिक रूप से कोई प्रतिवाद नहीं किया उकसाए जाने के बावजूद जबकि विश्व विदित है की सती शोक में वे अपने ससुर/सती पार्वती के पिता काशी के दक्ष प्रजापति का सर ही कटवा दिया था। मै फिर एक बार बताना चाहूँगा की शिव, विष्णु और ब्रह्मा स्वयं परमब्रह्म के एक तिहाई अंश थे तो शिव को शक्ति के स्वामी होने के नाते क्षत्रिय और विष्णु को वैभव का स्वामी होने के नाते वैश्य मान लेना अज्ञानता का प्रतीक है पर यह सत्य है की शिव, विष्णु और ब्रह्मा क्रमसः शक्ति, वैभव और ज्ञान के मूल स्रोत है जिसको जो प्राप्त करना हो वह उनमे से किशी एक, दो या तीनो को अपना आराध्य मान सकता है। मै रामापुर, आज़मगढ़ -223225 निवासी, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, सारंगधर(शिव)/…/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्मपितामह)/.... /रामप्रसाद(मालिक)/बेचनराम के पुत्र श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय का पुत्र विवेक कुमार पाण्डेय हूँ तो समझ लीजिये की भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर की मजाक की भाषा में नेचर शोध पत्रिका में प्रकाशित और पेटेंट किया हुआ हूँ तो वैसे भी कोई अस्त्र मुझ पर काम करने वाला नहीं जो डुप्लीकेट पर अक्सर काम कर जाता है।

मै रामा(सीता)पुर, आज़मगढ़ -223225 निवासी, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, सारंगधर(शिव)/…/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्मपितामह)/.... /रामप्रसाद(मालिक)/बेचनराम के पुत्र श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय का पुत्र विवेक कुमार पाण्डेय हूँ तो समझ लीजिये की भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर की मजाक की भाषा में नेचर शोध पत्रिका में प्रकाशित और पेटेंट किया हुआ हूँ तो वैसे भी कोई अस्त्र मुझ पर काम करने वाला नहीं जो डुप्लीकेट पर अक्सर काम कर जाता है। अल्पसंख्यक अस्त्र(इसके एक समुदाय विशेष) की आंड और निर्देशन में गर्ग और शांडिल्य गोत्रियों का ब्रह्मास्त्र, दलितअस्त्र, पिछड़ा अस्त्र; तथा गर्ग, शांडिल्य और इमरती के निर्देशन में तलवार, तराजू और कागज़-कलम अस्त्र सभी ने अपना काम किया है कम से कम तलवार, तराजू, इमरती और कागज़-कलम ने मुझे कागज पर वरिष्ठ से कनिष्ठ बनाने में कोई कसर नही छोड़ी अंतिम समय में पर यदि सभी अस्त्र ने मुझ पर काम कर लिया हो तो मै केवल एक शब्द में पूरी लड़ाई एक ही वाक्य में समाप्त करना चाहूँगा की कि इमरती को ज्ञात हो की  मै स्वयं परशुराम का भी गुरु सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, शिव/विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र मतलब स्वयं सशरीर शिव ही था(परशुराम के गुरु स्वयं शिव थे) और इन चौदह वर्षों के दौरान जिसपर विरोध स्वरुप चला कोई अस्त्र काम न दिया वैसे से सबसे सक्षम अस्त्र ब्रह्मास्त्र कम से कम त्रिदेव के तीनों अंश पर काम नहीं करता है। ----------रही बात परमब्रह्म अवश्था की तो जो आचरण, संरक्षण, दिशा-निर्देशन, सृजन और नवनिर्माण मेरे इन 14 वर्ष के स्वरुप के कारण हुआ उसने मुझे भौतिक रूप से राम और कृष्ण दोनों बना दिया था जिसमे से किशी एक के ही पर इस ब्रह्माण्ड का कोई अस्तित्व ही नहीं मतलब श्रीराम और श्रीकृष्ण दो ऐसे स्वरुप है जो अपने में सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) है। मैंने अपनी सूझ-बूझ से काम करते हुए इसी शिव/विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र सीमा का विस्तार करते हुए जिसमे मेरे द्वारा भौतिक रूप से कोई प्रतिवाद नही किया गया कितने भी अस्त्र मेरे ऊपर काम किये हों। मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी) को जन्मे मुझ विवेक को राशिनाम गिरिधारी ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) ने सशरीर परमब्रह्म की अवस्था तक पहुचने में विशेष योगदान दिया पर विशेष परिस्थितियों ने मुझे श्रीकृष्ण की सीमा से श्रीराम के सर्वोच्च आचरण अवस्था तक पहुंचाने में विशेष गोगदान दिया और इस प्रकार विवेक (शिव/विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र) मतलब शिव सीमा का विस्तार परमब्रह्म अवस्था तक होना मानवता के इतिहास में प्रथम घटना होगी जिसमे शिव ने कोई भौतिक रूप से कोई प्रतिवाद नहीं किया उकसाए जाने के बावजूद जबकि विश्व विदित है की सती शोक में वे अपने ससुर/सती पार्वती के पिता काशी के दक्ष प्रजापति का सर ही कटवा दिया था। मै फिर एक बार बताना चाहूँगा की शिव, विष्णु और ब्रह्मा स्वयं परमब्रह्म के एक तिहाई अंश थे तो शिव को शक्ति के स्वामी होने के नाते क्षत्रिय और विष्णु को वैभव का स्वामी होने के नाते वैश्य मान लेना अज्ञानता का प्रतीक है पर यह सत्य है की शिव, विष्णु और ब्रह्मा क्रमसः शक्ति, वैभव और ज्ञान के मूल स्रोत है जिसको जो प्राप्त करना हो वह उनमे से किशी एक, दो या तीनो को अपना आराध्य मान सकता है। मै रामापुर, आज़मगढ़ -223225 निवासी, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, सारंगधर(शिव)/…/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्मपितामह)/.... /रामप्रसाद(मालिक)/बेचनराम के पुत्र श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय का पुत्र विवेक कुमार पाण्डेय हूँ तो समझ लीजिये की भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर की मजाक की भाषा में नेचर शोध पत्रिका में प्रकाशित और पेटेंट किया हुआ हूँ तो वैसे भी कोई अस्त्र मुझ पर काम करने वाला नहीं जो डुप्लीकेट पर अक्सर काम कर जाता है। 

Saturday, August 22, 2015

मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण मेरे परम श्रद्धेय मामा श्री श्रीधर(विष्णु) से जिस नर/नारी ने मुझको प्रयागराज से खिंचवा ले जाने की धमकी दी थी उसको अपने कदमों चलकर प्रयाग आकर उनसे क्षमा अब मांगना ही पडेगा जिनकी स्वयं की सहनशीलता और उनके आदेशानुसार उपजी मेरी सहनशीलता से यह संसार वर्तमान अवस्था में दृस्तिगोचर हो रहा जो किशी एक की सहनशीलता का अंत होते ही नाशवान होने वाला था। अब मेरे श्रद्धेय संघ को जिसके लिए मै पूर्ण रूपेण समर्पित हुआ हूँ मेरे हेतु मेरी तरफ से मेरी इस गुरु दक्षिणा की पूर्ती स्वयं करनी चाहिए। क्या श्रद्धेय संघ तैयार है? क्योंकि मुझको प्रयागराज से खिंचवा ले जाने वाला बचा कहाँ जब मै और मामा(मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर) ही संसार/मानवता स्वयं हैं। तो यह बात निकलकर आयी कैसे इसका तो संघ वालों को जबाब देना ही चाहिए या उनको पहले मेरी गुरु दक्षिणा की पूर्ती करनी चाहिए ?

मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण मेरे परम श्रद्धेय मामा श्री श्रीधर(विष्णु) से जिस नर/नारी ने मुझको प्रयागराज से खिंचवा ले जाने की धमकी दी थी उसको अपने कदमों चलकर प्रयाग आकर उनसे क्षमा अब मांगना ही पडेगा जिनकी स्वयं की सहनशीलता और उनके आदेशानुसार उपजी मेरी सहनशीलता से यह संसार वर्तमान अवस्था में दृस्तिगोचर हो रहा जो किशी एक की सहनशीलता का अंत होते ही नाशवान होने वाला था।  अब मेरे श्रद्धेय संघ को जिसके लिए मै पूर्ण रूपेण समर्पित हुआ हूँ  मेरे हेतु मेरी तरफ से मेरी इस गुरु दक्षिणा की पूर्ती स्वयं करनी चाहिए। क्या श्रद्धेय संघ तैयार है? क्योंकि मुझको प्रयागराज से खिंचवा ले जाने वाला बचा कहाँ जब मै और मामा(मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर) ही संसार/मानवता स्वयं हैं।  तो यह बात निकलकर आयी कैसे इसका तो संघ वालों को जबाब देना ही चाहिए या उनको पहले मेरी गुरु दक्षिणा की पूर्ती करनी चाहिए ? 

जब मै ही संसार था उसके बाद भी सब वैसे है जैसे तब था (मेरे संसार होने के पहले) तो दोष किसको दे रहे हो अपनी जिंदगी के जो मिला है उसका सामना और उसका सही प्रकार से उपभोग करना सीखो ईस्वर के प्रसाद के रूप में क्योंकि जो आप के पास है वह भी बहुतों के पास नहीं जिसमे बहुसंख्यक जन द्वारा प्रतिव्यक्ति प्रयोग करने वाला पीने हेतु जल, सांस लेने हेतु सुद्ध प्राण वायु, रहने हेतु आकाश, पैर रखकर खड़े रहने या स्थिर रहने या चलने हेतु स्थान, जीवन जीने की ऊर्जा जिसमे पेट भर भोजन और अन्य संवंधित ऊर्जा जैसे प्रकाश और आवश्यक तापमान। जिनकी संख्या कम है कम से कम वे हमको इन प्रकृति से मिलाने वाली सुविधा तो अपने हिस्से से हमे दे रहे हैं तो अल्पसंख्यक जाती/धर्म से ईर्स्या किस हेतु? यदि दुनिया में आकर्षण बनाये रखना है तो यह उच्च जीवन स्तर और निम्न जीवन स्तर जैसे हंसी मजाक तो आप में और हमारे में होते ही रहेंगे, है की नहीं? सामाजिक रूप से सब तरह के सबसे अधिक सामजिक प्रतिबन्ध के साथ जीवन जीने वाला ब्राह्मण बन कर कौन जीना चाहेगा? उसमे भी सनातन ब्राह्मण बन कर कौन जीवित रहना चाहेगा जब स्वयं सनातन ब्राह्मण ही पथ भ्रमित हो जाएंगे? मै विश्व के किशी भी जाती और धर्म का जीवन जीने के लिए आमंत्रित हो चुका हूँ पर सनातन ब्राह्मण जीवन जीना ही पसंद किया लेकिन इस जीवन से ज्यादा भौतिक सुख उन सब जीवन में थे ऐसा मुझे ज्ञात है पर मै प्रलोभन में नहीं गया। इसका केवल एक और एक करण है की अपने पथ पर अटल रहना भी एक विनम्रता है और वह भी एक मानवता है जैसे की मानवता की निधी से भरपूर सनातन गौतम गोत्रीय भी अपने को सनातन गौतम गोत्रीय बने रहने की प्रतिज्ञा को पूर्ण करने हेतु बड़े से बड़ा त्याग करने हेतु प्रस्तुत रहता है। वह उसमे कोई समझौता नहीं करता है झूंठी मनवता के पाखण्ड पूर्ण बातों में आकर।

 जब मै ही संसार था उसके बाद भी सब वैसे है जैसे तब था (मेरे संसार होने के पहले) तो दोष किसको दे रहे हो अपनी जिंदगी के जो मिला है उसका सामना और उसका सही प्रकार से उपभोग करना सीखो ईस्वर के प्रसाद के रूप में क्योंकि जो आप के पास है वह भी बहुतों के पास नहीं जिसमे बहुसंख्यक जन द्वारा प्रतिव्यक्ति प्रयोग करने वाला पीने हेतु जल, सांस लेने हेतु सुद्ध प्राण वायु, रहने हेतु आकाश, पैर रखकर खड़े रहने या स्थिर रहने या चलने हेतु स्थान, जीवन जीने की ऊर्जा जिसमे पेट भर भोजन और अन्य संवंधित ऊर्जा जैसे प्रकाश और आवश्यक तापमान। जिनकी संख्या कम है कम से कम वे हमको इन प्रकृति से मिलाने वाली सुविधा तो अपने हिस्से से हमे दे रहे हैं तो अल्पसंख्यक जाती/धर्म से ईर्स्या किस हेतु? यदि दुनिया में आकर्षण बनाये रखना है तो यह उच्च जीवन स्तर और निम्न जीवन स्तर जैसे हंसी मजाक तो आप में और हमारे में होते ही रहेंगे, है की नहीं? सामाजिक रूप से सब तरह के सबसे अधिक सामजिक प्रतिबन्ध के साथ जीवन जीने वाला ब्राह्मण बन कर कौन जीना चाहेगा? उसमे भी सनातन ब्राह्मण बन कर कौन जीवित रहना चाहेगा जब स्वयं सनातन ब्राह्मण ही पथ भ्रमित हो जाएंगे? मै विश्व के किशी भी जाती और धर्म का जीवन जीने के लिए आमंत्रित हो चुका हूँ पर सनातन ब्राह्मण जीवन जीना ही पसंद किया लेकिन इस जीवन से ज्यादा भौतिक सुख उन सब जीवन में थे ऐसा मुझे ज्ञात है पर मै प्रलोभन में नहीं गया। इसका केवल एक और एक करण है की अपने पथ पर अटल रहना भी एक विनम्रता है और वह भी एक मानवता है जैसे की मानवता की निधी से भरपूर सनातन गौतम गोत्रीय भी अपने को सनातन गौतम गोत्रीय बने रहने की प्रतिज्ञा को पूर्ण करने हेतु बड़े से बड़ा त्याग करने हेतु प्रस्तुत रहता है। वह उसमे कोई समझौता नहीं करता है झूंठी मनवता के पाखण्ड पूर्ण बातों में आकर। 

अगर प्रथमपूज्य गणेश/विनायक/शिवशक्ति-स्वरुप स्वयं ब्रह्मा का परमपद प्राप्त कर सकते हैं तो समझ लीजिये कि गणेश/विनायक/शिवशक्ति-स्वरुप के रूप में ब्रह्मा के पद पर पदाभिषेक किशी भारद्वाज/आंगिरस गोत्रीय का शीघ्र हो जाएगा। जिस तरह विष्णुपद पर पदाभिषेक किशी गौतम गोत्रीय का हुआ है।

अगर प्रथमपूज्य गणेश/विनायक/शिवशक्ति-स्वरुप स्वयं ब्रह्मा का परमपद प्राप्त कर सकते हैं तो समझ लीजिये कि गणेश/विनायक/शिवशक्ति-स्वरुप के रूप में ब्रह्मा के पद पर पदाभिषेक किशी भारद्वाज/आंगिरस गोत्रीय का शीघ्र हो जाएगा। जिस तरह विष्णुपद पर पदाभिषेक किशी गौतम गोत्रीय का हुआ है।

मेरा केवल एक प्रश्न है इस प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय दोनों से विशेष रूप से और इस पूरे विश्व मानव समुदाय से की अगर मई चरित्रहीन, मद्यप, व्यसनशील और दरिद्र था तो सर्वोच्च चरित्रवान/ब्रह्मचारी, अमृतपाणी, वैरागी/एक पत्नीब्रता, और पूर्ण सम्प्रभु सच्चिदानंद(लक्ष्मीपति=श्रीधर=श्रीकांत=विष्णु) कितने उस समय थे और कितने हैं इस संसार में? मेरा उत्तर है की अगर वह रहा भी होगा तो केवल एक या दो और वह मेरे समान ही रहा होगा जिसका मेरे में और मेरा उसमे रूपांतरण हो सकता होगा समय, परिस्थिति और स्थान विशेष के एक होने पर। इससे बड़ा दावा करने की जरूरत ही मै नहीं समझता तीन में एक के सिद्धांत के अलावा।

मेरा केवल एक प्रश्न है इस प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय दोनों से विशेष रूप से और इस पूरे विश्व मानव समुदाय से की अगर मई चरित्रहीन, मद्यप, व्यसनशील और दरिद्र था तो सर्वोच्च चरित्रवान/ब्रह्मचारी,  अमृतपाणी, वैरागी/एक पत्नीब्रता, और पूर्ण सम्प्रभु सच्चिदानंद(लक्ष्मीपति=श्रीधर=श्रीकांत=विष्णु) कितने उस समय थे और कितने हैं इस संसार में? मेरा उत्तर है की अगर वह रहा भी होगा तो केवल एक या दो और वह मेरे समान ही रहा होगा जिसका मेरे में और मेरा उसमे रूपांतरण हो सकता होगा समय, परिस्थिति और स्थान विशेष के एक होने पर। इससे बड़ा दावा करने की जरूरत ही मै नहीं समझता तीन में एक के सिद्धांत के अलावा।   

Friday, August 21, 2015

पर यहां स्पस्ट कर देना चाहता हूँ की कुछ गुरु दक्षिणा ऐसी होती है जो गुरु द्रोणाचार्य की तरह मांगने पर दी जाती है अर्जुन और एकलव्य द्वारा चाहे अपने स्वसुर( द्रुपद) जैसे निकटतम सम्बन्धी को बंदी बना गुरु के चरण में अर्पित करना हो या अपना अंगूंठा काटकर चरण पर अर्पित करना हो, तो ऐसा कोई गुरु हो तो मै देने के लिए तैयार हूँ और मेरा पूर्ण प्रण है की वह जरूर मिलेगा अगर उससे गुरु और गुरुकुल की गरिमा बढ़ती हो पर वह तो पुनः बता दूँ की यह गुरु दक्षिणा का ऋण माँगने पर निर्भर करता है अप्रत्यक्ष नहीं। 20 अगस्त, 2015 को सम्बंधित व्यक्ति या व्यक्ति समूह को पता चल गया होगा की मुझे कनिष्ठ बनाने का प्रयास किसका था? यह दुनिया के किशी मजबूत से मजबूत व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत विरोध नहीं था न तो किशी एक में यह शक्ति थी तो मुझे कनिष्ठ अपने दम पर बनवा सके पर यह स्वयं मेरे श्रद्धेय संघ द्वारा मेरी परीक्षा थी जिसने मुझे कागज़ पर कनिष्ठ बनवाकर मेरी परिक्षा ली। और सत्य को जानते हुए और अपनी शक्ति को भी पहचानते हुए उसका वाद-प्रतिवाद व्यक्तिगत किशी व्यति या व्यक्ति समूह से नहीं किया वरन मई माननीय प्रयागराज उच्च न्यायलय में न्यायालय के विवेक पर इसे छोड़ दिया हूँ। -------तो अगर संघ मुझे सुन रहा हो तो उसकी चुनौती मई मानवता हित में स्वीकार करता हूँ जब मेरा पुनः समर्पण इस भारत रास्त्र और विश्व मानवता हेतु अपरिहार्य हो चुका है। वैसे मई संघ के परमपूज्य भगवाध्वज(गुरूजी) को गुरु दक्षिणा अपने जीवन से जुड़े लोगों के प्रति कर्त्तव्य के भी बलिदान से दे चुका हूँ अपने जीवन का मान, सम्मान, स्वाभिमान भी त्याग चुका हूँ तन , मन, धन इन सब की बात ही क्या? फिर भी मई समर्पण के लिए सहर्ष तैयार हूँ। पर यहां स्पस्ट कर देना चाहता हूँ की कुछ गुरु दक्षिणा ऐसी होती है जो गुरु द्रोणाचार्य की तरह मांगने पर दी जाती है अर्जुन और एकलव्य द्वारा चाहे अपने स्वसुर को बंदी बना गुरु के चरण में अर्पित करना हो या अपना अंगूंठा काटकर चरण पर अर्पित करना हो, तो ऐसा कोई गुरु हो तो मै देने के लिए तैयार हूँ और मेरा पूर्ण प्रण है की वह जरूर मिलेगा अगर उससे गुरु और गुरुकुल की गरिमा बढ़ती हो पर वह तो पुनः बता दूँ की यह गुरु दक्षिणा का ऋण माँगने पर निर्भर करता है अप्रत्यक्ष नहीं।

पर यहां स्पस्ट कर देना चाहता हूँ की कुछ गुरु दक्षिणा ऐसी होती है जो गुरु द्रोणाचार्य की तरह मांगने पर दी जाती है अर्जुन और एकलव्य द्वारा चाहे अपने स्वसुर( द्रुपद) जैसे निकटतम सम्बन्धी को बंदी बना गुरु के चरण में अर्पित करना हो या अपना अंगूंठा काटकर चरण पर अर्पित करना हो, तो ऐसा कोई गुरु हो तो मै देने के लिए तैयार हूँ और मेरा पूर्ण प्रण है की वह जरूर मिलेगा अगर उससे गुरु और गुरुकुल की गरिमा बढ़ती हो पर वह तो पुनः बता दूँ की यह गुरु दक्षिणा का ऋण माँगने पर निर्भर करता है अप्रत्यक्ष नहीं। 20 अगस्त, 2015 को सम्बंधित व्यक्ति या व्यक्ति समूह को पता चल गया होगा की मुझे कनिष्ठ बनाने का प्रयास किसका था? यह दुनिया के किशी मजबूत से मजबूत व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत विरोध नहीं था न तो किशी एक में यह शक्ति थी तो मुझे कनिष्ठ अपने दम पर बनवा सके पर यह स्वयं मेरे श्रद्धेय संघ द्वारा मेरी परीक्षा थी जिसने मुझे कागज़ पर कनिष्ठ बनवाकर मेरी परिक्षा ली। और सत्य को जानते हुए और अपनी शक्ति को भी पहचानते हुए उसका वाद-प्रतिवाद व्यक्तिगत किशी व्यति या व्यक्ति समूह से नहीं किया वरन मई माननीय प्रयागराज उच्च न्यायलय में न्यायालय के विवेक पर इसे छोड़ दिया हूँ। -------तो अगर संघ मुझे सुन रहा हो तो उसकी चुनौती मई मानवता हित में स्वीकार करता हूँ जब मेरा पुनः समर्पण इस भारत रास्त्र और विश्व मानवता हेतु अपरिहार्य हो चुका है। वैसे मई संघ के परमपूज्य भगवाध्वज(गुरूजी) को गुरु दक्षिणा अपने जीवन से जुड़े लोगों के प्रति कर्त्तव्य के भी बलिदान से दे चुका हूँ अपने जीवन का मान, सम्मान, स्वाभिमान भी त्याग चुका हूँ तन , मन, धन इन सब की बात ही क्या? फिर भी मई समर्पण के लिए सहर्ष तैयार हूँ। पर यहां स्पस्ट कर देना चाहता हूँ की कुछ गुरु दक्षिणा ऐसी होती है जो गुरु द्रोणाचार्य की तरह मांगने पर दी जाती है अर्जुन और एकलव्य द्वारा चाहे अपने स्वसुर को बंदी बना गुरु के चरण में अर्पित करना हो या अपना अंगूंठा काटकर चरण पर अर्पित करना हो, तो ऐसा कोई गुरु हो तो मै देने के लिए तैयार हूँ और मेरा पूर्ण प्रण है की वह जरूर मिलेगा अगर उससे गुरु और गुरुकुल की गरिमा बढ़ती हो पर वह तो पुनः बता दूँ की यह गुरु दक्षिणा का ऋण माँगने पर निर्भर करता है अप्रत्यक्ष नहीं।

2001 से 2004 के समय में प्रयागराज में ही रहने वाले मेरे छोटे नाना पराशनाथ(शिव) जिनकी आयु 80 वर्ष के लगभग थी वे मेरे मामा श्री श्रीधर(विष्णु) से यहां प्रयागराज में मिलने पर और उनके गाँव बिशुनपुर-223103, जौनपुर में जाकर मिलने पर कहते थे की कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं और जब बाहर निकलता हूँ प्रयागराज में ही तो पत्थर मेरे ऊपर फेंकते हैं, तो मेरे मामा श्री श्रीधर(विष्णु) लोग यह उनके मन का फितूर बताते थे और वृध्धवस्था का असर बताते थे मेरे जैसा व्यक्ति समझ सकता था की नाना सत्य कहते थे और ऐसे व्यक्ति हैं इस प्रयागराज में जो बहुत से लोगों को केवल एक विशेस व्यक्ति पर केंद्रित कर सकते हैं जैसे की मुझे भी मनोवैज्ञानिक रूप से हर तरह से मनोरोगी बनाने हेतु प्रभावित किया जा रहा था और मेरी सायकिल का अक्सर प्रयागराज विश्वविद्यालय से देर शाम और रात के वक्त जाते ही पूर्व में ही पंचर रहना; और मेरे बारे में वह सब असभ्य वक्तव्य फैलाना जिसे मई यहां कह नहीं सकता और अगर मई किशी कार्य विशेष को पूर्ण करने हेतु और पूर्ण किये बिना न हटने हेतु नियुक्त न किया गया होता तो शायद इसे बर्दास्त न कर पाटा और उसका जबाब भौतिक रूप से जरूर देता पर मई अपने लिए नहीं वरन मानवता के शीर्ष पुरुष के कार्य हेतु अपने परम गुरु परमपिता परमेश्वर, मामा श्रीधर(विष्णु) और परमपिता परमेश्वर, ताउजी प्रेमचंद(शिव) के द्वारा उनके गुरु परम श्रद्धेय जोशी(ब्रह्मा) के द्वारा लक्षित कार्य हेतु समर्पित किया जा चुका था तो कुछ जबाब मई नहीं दे सकता था भौतिक रूप से। लेकिन इतना जरूर कहूँगा की मेरे नाना पारसनाथ मिश्रा अवश्य उन्ही शक्तियों के शिकार थे जो मेरा भी पीछा कर रही थीं। तो वे शक्तियां देश द्रोही थीं जो विदेशी शक्ति के अंदर कार्य कर रही थी चाहे उन शक्तियों के कार्यकर्ता देशी ही क्यों न रहे हों। उन शक्तिओं को जबाब जरूर मिलेगा। जोशी जी जब आप के कार्यकर्ताओं के बलिदान पर कोई संस्थान या केंद्र बन रहा था और आप अपने दल की बदनामी की कीमत पर उसे बनवा ही रहे थे तो उसके मालिक और करता धरता दूसरे दल के रहे हो जो दल आप का विरोध कर रहे थे तो उसके बाद भी आप का कार्य सफल हुआ है आप के कार्यकर्ता की हर तिजोरी और कम्प्यूटर की कम से कम एक चाभी उन्ही लोगों के हाँथ में रहते हुए तो केवल और केवल रामानंद के परिवार के बल पर जिनके एक वंसज का एक बड़ा पुत्र(मेरे नाना, रमानाथ) पूर्ण कांग्रेसी और छोटा पुत्र(छोटे नाना) आप के दल के। फिर भी बताऊंगा की मेरे कांग्रेसी नाना के सभी पुत्र और वंसज आप के दल के ही रहे और मेर बाबा के कांग्रेसी कार्यकर्ता होने के बावजूद स्वयं मै तो आप के लिए समर्पित ही था तो यह था करिश्मा आप के विश्व स्तरीय जादुई कार्य पूर्ती का।

 2001 से 2004 के समय में प्रयागराज में ही रहने वाले मेरे छोटे नाना पराशनाथ(शिव) जिनकी आयु 80 वर्ष के लगभग थी वे मेरे मामा श्री श्रीधर(विष्णु) से यहां प्रयागराज में मिलने पर और उनके गाँव बिशुनपुर-223103, जौनपुर में जाकर मिलने पर कहते थे की कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं और जब बाहर निकलता हूँ प्रयागराज में ही तो पत्थर मेरे ऊपर फेंकते हैं, तो मेरे मामा श्री श्रीधर(विष्णु) लोग यह उनके मन का फितूर बताते थे और वृध्धवस्था का असर बताते थे मेरे जैसा व्यक्ति समझ सकता था की नाना सत्य कहते थे और ऐसे व्यक्ति हैं इस प्रयागराज में जो बहुत से लोगों को केवल एक विशेस व्यक्ति पर केंद्रित कर सकते हैं जैसे की मुझे भी मनोवैज्ञानिक रूप से हर तरह से मनोरोगी बनाने हेतु प्रभावित किया जा रहा था और मेरी सायकिल का अक्सर प्रयागराज विश्वविद्यालय से देर शाम और रात के वक्त जाते ही पूर्व में ही पंचर रहना; और मेरे बारे में वह सब असभ्य वक्तव्य फैलाना जिसे मई यहां कह नहीं सकता और अगर मई किशी कार्य विशेष को पूर्ण करने हेतु और पूर्ण किये बिना न हटने हेतु नियुक्त न किया गया होता तो शायद इसे बर्दास्त न कर पाटा और उसका जबाब भौतिक रूप से जरूर देता पर मई अपने लिए नहीं वरन मानवता के शीर्ष पुरुष के कार्य हेतु अपने परम गुरु परमपिता परमेश्वर, मामा श्रीधर(विष्णु) और परमपिता परमेश्वर, ताउजी प्रेमचंद(शिव) के द्वारा उनके गुरु परम श्रद्धेय जोशी(ब्रह्मा) के द्वारा लक्षित कार्य हेतु समर्पित किया जा चुका था तो कुछ जबाब मई नहीं दे सकता था भौतिक रूप से। लेकिन इतना जरूर कहूँगा की मेरे नाना पारसनाथ मिश्रा अवश्य उन्ही शक्तियों के शिकार थे जो मेरा भी पीछा कर रही थीं। तो वे शक्तियां देश द्रोही थीं जो विदेशी शक्ति के अंदर कार्य कर रही थी चाहे उन शक्तियों के कार्यकर्ता देशी ही क्यों न रहे हों। उन शक्तिओं को जबाब जरूर मिलेगा। जोशी जी जब आप के कार्यकर्ताओं के बलिदान पर कोई संस्थान या केंद्र बन रहा था और आप अपने दल की बदनामी की कीमत पर उसे बनवा ही रहे थे तो उसके मालिक और करता धरता दूसरे दल के रहे हो जो दल आप का विरोध कर रहे थे तो उसके बाद भी आप का कार्य सफल हुआ है आप के कार्यकर्ता की हर तिजोरी और कम्प्यूटर की कम से कम एक चाभी उन्ही लोगों के हाँथ में रहते हुए तो केवल और केवल रामानंद के परिवार के बल पर जिनके एक वंसज का एक बड़ा पुत्र(मेरे नाना, रमानाथ) पूर्ण कांग्रेसी और छोटा पुत्र(छोटे नाना) आप के दल के। फिर भी बताऊंगा की मेरे कांग्रेसी नाना के सभी पुत्र और वंसज आप के दल के ही रहे और मेर बाबा के कांग्रेसी कार्यकर्ता होने के बावजूद स्वयं मै तो आप के लिए समर्पित ही था तो यह था करिश्मा आप के विश्व स्तरीय जादुई कार्य पूर्ती का। 

Thursday, August 20, 2015

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं की आज की तारिख में मेरे गाँव रामा(=सीता)पुर में आर्थिक रूप से ही देखने पर सबसे अधिक संपन्न उत्तर प्रदेश सरकार में आधिकारिक पद से सेवा निवृत्त/अवकास प्राप्त तथाकथित दलित काशीराम पुत्र श्री राम बहादुर जी हैं जिनके पास अप्रत्यक्ष रूप से कम से कम मेरे संज्ञान में दो पेट्रोल पम्प और चल-अचल संपत्ति है तथा एक तथाकथित दलित विशेष समाज उत्थान का वीणा उठायी पार्टी के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सदस्य भी है; तो मै ऐसे तथाकथित हिन्दू दलित समाज से विनम्र निवेदन करूंगा की वे अपनी वर्तमान आय राशि का कुछ अंश भारत में दलितों के धर्म परिवर्तन को रोकने और उनके आर्थिक और सामाजिक उत्थान में लगाए जिसमे विशेष रूप से दलित समाज की बहनों और माताओं को विशेष प्रमुखता दी जाय जिसमे अधिकतम कोशिस हो की माताओं और बहनो से कोई भारी कार्य न लिया जाय। वैसे भारत में बहुत से संगठन इन पर कार्य करते होंगे पर यदि राम बहादुर चाचा जैसे लोग दक्षिण भारत से प्रारम्भ कर उत्तर भारत तक ऐसे श्रेष्ठं कार्य को बढ़ावा देंगे और सहभागिता करेंगे आर्थिक और सामाजिक रूप से तो मेरा पूर्ण विशवास है की दलित समाज का उत्थान 50 वर्षों में अवश्य हो जाएगा। रही बात समाज चलने की तो हर किशी कार्य के लिए कोई न कोई व्यक्ति समाज से तैयार होता रहेगा और समाज का कोई कार्य रुकने वाला नहीं पर मेरे विचार पर अमल किया गया तो निश्चित रूप से कम से कम दलित समाज के अंतिम व्यक्ति का जीवन स्तर जरूर उत्थान होगा और सत्य से भागकर धर्म परिवर्तन करने की प्रवृत्ति जो उत्तर भारत समेत अधिकतम रूप से दक्षिण भारत में है दलित समाज में वह अवश्य रुकेगी। रही बार प्रतिशोध की तो मुझसे प्रतिशोध कर दलित समाज ने अपना बहुत कुछ खोया है और अपना तीव्रगति से होने वाला उत्थान भी धीमा किया है अपने कुछ विशेष नेताओं की दुर्गति से मृत्यु के साथ-साथ तो आप को बता दें की इस काले और गोर की लड़ाई और मुझ जैसे सत्य के समर्थक का विरोध कर आप अपने समाज की कमियों को छुपा नहीं सकते थे और यह भी अब आप जान गए होंगे की पद और प्रतिष्ठा किस जाती/धर्म के व्यक्ति को प्रभावित नहीं करती है केवल और केवल हर समाज से कुछ विशेष सज्जन पुरुष को छोड़कर। तो आइये हम प्राण करते हैं की हम प्रलोभन में आकर सामाजिक सत्य और जीवन के सत्य से भागते हुए हर दलित ही नही हर समाज के लोगों के धर्म परिवर्तन को रोकने और विशेस रूप से दलित और अन्य भारतीय समाज के उत्थान के लिए अपने जीवन के कुछ समय और आय को समर्पित करने को बढ़ावा देंगे। मेरे विचार से इसी से समूचे भारतीय नहीं विश्व समाज का उत्थान होगा क्योंकि भारत विश्व गुरु है और गुरु स्वस्थ और निरोग रहता है तो शिष्य भी निरोग रहता है इसी क्रम में भारत उत्थान से विश्व उत्थान अवश्य ही होगा।

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं की आज की तारिख में मेरे गाँव रामा(=सीता)पुर में आर्थिक रूप से ही देखने पर सबसे अधिक संपन्न उत्तर प्रदेश सरकार में आधिकारिक पद से सेवा निवृत्त/अवकास प्राप्त तथाकथित दलित काशीराम पुत्र श्री राम बहादुर जी हैं जिनके पास अप्रत्यक्ष रूप से कम से कम मेरे संज्ञान में दो पेट्रोल पम्प और चल-अचल संपत्ति है तथा एक तथाकथित दलित विशेष समाज उत्थान का वीणा उठायी पार्टी के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सदस्य भी है; तो मै ऐसे तथाकथित हिन्दू दलित समाज से विनम्र निवेदन करूंगा की वे अपनी वर्तमान आय राशि का कुछ अंश भारत में दलितों के धर्म परिवर्तन को रोकने और उनके आर्थिक और सामाजिक उत्थान में लगाए जिसमे विशेष रूप से दलित समाज की बहनों और माताओं को विशेष प्रमुखता दी जाय जिसमे अधिकतम कोशिस हो की माताओं और बहनो से कोई भारी कार्य न लिया जाय। वैसे भारत में बहुत से संगठन इन पर कार्य करते होंगे पर यदि राम बहादुर चाचा जैसे लोग दक्षिण भारत से प्रारम्भ कर उत्तर भारत तक ऐसे श्रेष्ठं कार्य को बढ़ावा देंगे और सहभागिता करेंगे आर्थिक और सामाजिक रूप से तो मेरा पूर्ण विशवास है की दलित समाज का उत्थान 50 वर्षों में अवश्य हो जाएगा। रही बात समाज चलने की तो हर किशी कार्य के लिए कोई न कोई व्यक्ति समाज से तैयार होता रहेगा और समाज का कोई कार्य रुकने वाला नहीं पर मेरे विचार पर अमल किया गया तो निश्चित रूप से कम से कम दलित समाज के अंतिम व्यक्ति का जीवन स्तर जरूर उत्थान होगा और सत्य से भागकर धर्म परिवर्तन करने की प्रवृत्ति जो उत्तर भारत समेत अधिकतम रूप से दक्षिण भारत में है दलित समाज में वह अवश्य रुकेगी। रही बार प्रतिशोध की तो मुझसे प्रतिशोध कर दलित समाज ने अपना बहुत कुछ खोया है और अपना तीव्रगति से होने वाला उत्थान भी धीमा किया है अपने कुछ विशेष नेताओं की दुर्गति से मृत्यु के साथ-साथ तो आप को बता दें की इस काले और गोर की लड़ाई और मुझ जैसे सत्य के समर्थक का विरोध कर आप अपने समाज की कमियों को छुपा नहीं सकते थे और यह भी अब आप जान गए होंगे की पद और प्रतिष्ठा किस जाती/धर्म के व्यक्ति को प्रभावित नहीं करती है केवल और केवल हर समाज से कुछ विशेष सज्जन पुरुष को छोड़कर। तो आइये हम प्राण करते हैं की हम प्रलोभन में आकर सामाजिक सत्य और जीवन के सत्य से भागते हुए हर दलित ही नही हर समाज के लोगों के धर्म परिवर्तन को रोकने और विशेस रूप से दलित और अन्य भारतीय समाज के उत्थान के लिए अपने जीवन के कुछ समय और आय को समर्पित करने को बढ़ावा देंगे। मेरे विचार से इसी से समूचे भारतीय नहीं विश्व समाज का उत्थान होगा क्योंकि भारत विश्व गुरु है और गुरु स्वस्थ और निरोग रहता है तो शिष्य भी निरोग रहता है इसी क्रम में भारत उत्थान से विश्व उत्थान अवश्य ही होगा।    

या तो आप वैश्विक संप्रभुता में अपने हिस्से भर का लीजिये या विकल्प के रूप में अपने कर्मों के बदले अधिकार प्राप्त कीजिये और इस प्रकार अपनी संप्रभुता बढाइये। विश्व एक गाँव की व्यवस्था के लाभ को लेना प्रारम्भ कर देने वाले हर विश्व नागरिक को वैस्विक संप्रभुता के नियमों का पालन तो करना ही पडेगा और उसका एक ही उपचार है " या तो आप वैश्विक संप्रभुता में अपने हिस्से भर का लीजिये या विकल्प के रूप में अपने कर्मों के बदले अधिकार प्राप्त कीजिये और इस प्रकार अपनी संप्रभुता बढाइये", इसके अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं रह गया है।>>>>> विदेशी मिसनरिया जो भारतीय सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करती है और उसके संतुलन को प्रभावित करती हैं, उनके भारत स्थित अभिकर्ता और हिन्दू समाज के ही अन्य वर्ग के कुछ विशेष लोग यदि ब्राह्मण/सवर्ण समाज की लड़कियों के स्थान पर या उनके साथ ब्राह्मण के लड़कों के भी जीवन का ध्यान रखे होते या उनका भी साथ दिए होते और उनको भी अपने घर में जगह दिए होते वाह्य रूप से ही सही या ब्राह्मण/सवर्ण समाज का घर उजाड़ने का व्यापक कार्यक्रम न बनाये होते तो जो कुछ हुआ विगत दो दसक में वह न हुआ होता। जो कुछ हुआ था इन चौदह वर्ष में उसके लिए प्रायश्चित का कोई प्रश्न ही नहीं है वह तो एक झांकी भर था शक्ति प्रदर्शन और समान संप्रभुता के बंटवारे हेतु आधिकारिक रूप से प्रार्थना पत्र भरना भर था। विश्व समाज को पूर्ण रूपेण विचार करना चाहिए था की डॉन भाई(भगवा) की शक्ति/संयुक्त त्रिदेव शक्ति/परमब्रह्म शक्ति से स्व-स्व एकल त्रिदेव शक्ति संतुलन हेतु परमब्रह्म की शक्ति की पूर्ण संप्रभुता का बंटवारा कभी भी होता है तो हिस्सा एक तिहाई, एक तिहाई और एक तिहाई का ही होगा इनसे चाहे जितने जाती/धर्म ने अपना सामाजिक अस्तित्व पाया हो विभाजन होते होते या कोई अपनी संख्या शक्ति कितना ही क्यों न बढ़ा लिया हो जैसे शिव, विष्णु और ब्रह्मा के गुणात्मक विभाजन और सम्मिलन का अपना अलग अलग असर होता है संयुक्त त्रिदेव/परमब्रह्म शक्ति से निकलने पर। या तो आप वैश्विक संप्रभुता में अपने हिस्से भर का लीजिये या विकल्प के रूप में अपने कर्मों के बदले अधिकार प्राप्त कीजिये और इस प्रकार अपनी संप्रभुता बढाइये। विश्व एक गाँव की व्यवस्था के लाभ को लेना प्रारम्भ कर देने वाले हर विश्व नागरिक को वैस्विक संप्रभुता के नियमों का पालन तो करना ही पडेगा और उसका एक ही उपचार है " या तो आप वैश्विक संप्रभुता में अपने हिस्से भर का लीजिये या विकल्प के रूप में अपने कर्मों के बदले अधिकार प्राप्त कीजिये और इस प्रकार अपनी संप्रभुता बढाइये", इसके अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं रह गया है।

या तो आप वैश्विक संप्रभुता में अपने हिस्से भर का लीजिये या विकल्प के रूप में अपने कर्मों के बदले अधिकार प्राप्त  कीजिये और इस प्रकार अपनी संप्रभुता बढाइये। विश्व एक गाँव की व्यवस्था के लाभ को लेना प्रारम्भ कर देने वाले हर विश्व नागरिक को वैस्विक संप्रभुता के नियमों का पालन तो करना ही पडेगा और उसका एक ही उपचार है " या तो आप वैश्विक संप्रभुता में अपने हिस्से भर का लीजिये या विकल्प के रूप में अपने कर्मों के बदले अधिकार प्राप्त  कीजिये और इस प्रकार अपनी संप्रभुता बढाइये", इसके अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं रह गया है।>>>>> विदेशी मिसनरिया जो भारतीय सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करती है और उसके संतुलन को प्रभावित करती हैं, उनके भारत स्थित अभिकर्ता और हिन्दू समाज के ही अन्य वर्ग के कुछ विशेष लोग यदि ब्राह्मण/सवर्ण समाज की लड़कियों के स्थान पर या उनके साथ ब्राह्मण के लड़कों के भी जीवन का ध्यान रखे होते या उनका भी साथ दिए होते और उनको भी अपने घर में जगह दिए होते वाह्य रूप से ही सही या ब्राह्मण/सवर्ण समाज का घर उजाड़ने का व्यापक कार्यक्रम न बनाये होते तो जो कुछ हुआ विगत दो दसक में वह न हुआ होता।  जो कुछ हुआ था इन चौदह वर्ष में उसके लिए प्रायश्चित का कोई प्रश्न ही नहीं है वह तो एक झांकी भर था शक्ति प्रदर्शन और समान संप्रभुता के बंटवारे हेतु आधिकारिक रूप से प्रार्थना पत्र भरना भर था। विश्व समाज को पूर्ण रूपेण विचार करना चाहिए था की डॉन भाई(भगवा) की शक्ति/संयुक्त त्रिदेव शक्ति/परमब्रह्म शक्ति से स्व-स्व एकल त्रिदेव शक्ति संतुलन हेतु परमब्रह्म की शक्ति की पूर्ण संप्रभुता का बंटवारा कभी भी होता है तो हिस्सा एक तिहाई, एक तिहाई और एक तिहाई का ही होगा इनसे चाहे जितने जाती/धर्म ने अपना सामाजिक अस्तित्व पाया हो विभाजन होते होते या कोई अपनी संख्या शक्ति कितना ही क्यों न बढ़ा लिया हो जैसे शिव, विष्णु और ब्रह्मा के गुणात्मक विभाजन और सम्मिलन का अपना अलग अलग असर होता है संयुक्त त्रिदेव/परमब्रह्म शक्ति से निकलने पर। या तो आप वैश्विक संप्रभुता में अपने हिस्से भर का लीजिये या विकल्प के रूप में अपने कर्मों के बदले अधिकार प्राप्त  कीजिये और इस प्रकार अपनी संप्रभुता बढाइये। विश्व एक गाँव की व्यवस्था के लाभ को लेना प्रारम्भ कर देने वाले हर विश्व नागरिक को वैस्विक संप्रभुता के नियमों का पालन तो करना ही पडेगा और उसका एक ही उपचार है " या तो आप वैश्विक संप्रभुता में अपने हिस्से भर का लीजिये या विकल्प के रूप में अपने कर्मों के बदले अधिकार प्राप्त  कीजिये और इस प्रकार अपनी संप्रभुता बढाइये", इसके अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं रह गया है। 

Wednesday, August 19, 2015

मै जिसे पदासीन किया हूँ विष्णुपद पर मतलब विष्णु पदाभिषेक क्या हूँ वह मेरी अभीष्ट परीक्षा साबित होगी पर अंत तक मै सफलता पूर्वक अपने दायित्वों को पूर्ण कर पाउँगा जब विष्णु की सीमा का विस्तार करते हुए उनको परमब्रह्म की सीमा तक विस्तार करने का समय आएगा (वैसे मानवता के दुश्मनों का राक्षसीपन पुनः अगर बहुत अधिक बढ़ा किसी कारन- वैसे उसे मै बढ़ने नहीं दूंगा अपने संज्ञान में आने पर) तो मेरा पूर्ण समर्थन, सहयोग और अनुभव साथ होगा उस विष्णु को परमब्रह्म अवस्था तक विस्तार करने में।

मै जिसे पदासीन किया हूँ विष्णुपद पर मतलब विष्णु पदाभिषेक क्या हूँ वह मेरी अभीष्ट परीक्षा साबित होगी पर अंत तक मै सफलता पूर्वक अपने दायित्वों को पूर्ण कर पाउँगा जब विष्णु की सीमा का विस्तार करते हुए उनको परमब्रह्म की सीमा तक विस्तार करने का समय आएगा (वैसे मानवता के दुश्मनों का राक्षसीपन पुनः अगर बहुत अधिक बढ़ा किसी कारन- वैसे उसे मै बढ़ने नहीं दूंगा अपने संज्ञान में आने पर) तो मेरा पूर्ण समर्थन, सहयोग और अनुभव साथ होगा उस विष्णु को परमब्रह्म अवस्था तक विस्तार करने में।  

ब्राह्मणो का आशीर्वाद जैसी अप्रत्यक्ष शक्ति लेकर इस संसार को नियंत्रित करने वाला हर जाती/धर्म का कश्यप गोत्रीय यदि उन ब्राह्मणो की रक्षा नहीं करेगा और उनका सम्मान नहीं करेगा तो शक्ति कहाँ से पायेगा इस संसार को नियंत्रित करने के लिए और ये कश्यप गोत्रीय ही नहीं, वरन प्रशासन तंत्र में रहने वाले तथा राजनेताओं के घर में भी ब्राह्मणों का विशेष महत्त्व होता है चाहे वे समाज के सामने मंच पर चढ़कर पानी पी पी कर ब्राह्मणो को गाली देते हों।

ब्राह्मणो का आशीर्वाद जैसी अप्रत्यक्ष शक्ति लेकर इस संसार को नियंत्रित करने वाला हर जाती/धर्म का कश्यप गोत्रीय यदि उन ब्राह्मणो की रक्षा नहीं करेगा और उनका सम्मान नहीं करेगा तो शक्ति कहाँ से पायेगा इस संसार को नियंत्रित करने के लिए और ये कश्यप गोत्रीय ही नहीं, वरन प्रशासन तंत्र में रहने वाले तथा राजनेताओं के घर में भी ब्राह्मणों का विशेष महत्त्व होता है चाहे वे समाज के सामने मंच पर चढ़कर पानी पी पी कर ब्राह्मणो को गाली देते हों। 

मेरी परिक्षा में फिल्मी दुनिआ में आमिर और सलमान खान बंधू कैसे असफल कहे जा सकते है और मई उनकी प्रसंशा क्यों न करून जिन्होंने मुझे भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संवर्धन और संरक्षण हेतु किशी भी हद तक जाने को प्रोत्साहित किये और इस प्रकार अप्रत्यक्ष समर्थन किये ऐसे कार्य हेतु मुझे अपना लिखित सन्देश अपने-अपने माध्यम से उस समय भिजवाकर जब मेरे भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर जाने से पूर्व दक्षिण से सदा सदा से लेकर तब तक मात खाने वाले अभियांत्रिकी संकाय के कुछ विश्वकर्मा के वंसज, उत्तर भारतीय और दक्षिण के हिन्दू भाई पता नहीं किस स्वार्थ्य में दक्षिण के एक व्यक्ति विशेस के समर्थन में और मेरे प्रभाव से उनके गोरख धंधे(क्या धंधे ऐसे उच्च संस्थानों में होते हैं उससे प्रबुद्ध समाज परिचित है की कौन संस्थाएं और मिशिनरिया उनका समर्थन करती हैं) पर असर पहुँचने के कारन मेरा प्रभाव ख़त्म करने हेतु मुझको वहां भी ब्राह्मण वादी और हिन्दू आतंकवादी सिध्द करने से वहां भी बाज नहीं आये कुछ और लोगों के समर्थन को लेकर और यहां तक की मेरे प्रोजेक्ट एसोसिएट की फ़ेलोशिप में बढ़ोत्तरी सबसे पहले लागू हो जाने पर भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर के तत्कालीन निदेशक, आचार्य पद्मनाभम(विष्णु) बलराम पर ब्राह्मणवाद का आरोप लगाने लगे जबकि ऐसे कार्य में उनका कोई हाँथ हो ही नहीं सकता तकनीकी रूप से उत्तरशोधक(पीडीएफ) के फ़ेलोशिप की बढ़ोत्तरी ही संस्थान पर निर्भर करता है।

मेरी परिक्षा में फिल्मी दुनिआ में आमिर और सलमान खान बंधू कैसे असफल कहे जा सकते है और मई उनकी प्रसंशा क्यों न करून जिन्होंने मुझे भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संवर्धन और संरक्षण हेतु किशी भी हद तक जाने को प्रोत्साहित किये और इस प्रकार अप्रत्यक्ष समर्थन किये ऐसे कार्य हेतु मुझे अपना लिखित सन्देश अपने-अपने माध्यम से उस समय भिजवाकर जब मेरे भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर जाने से पूर्व दक्षिण से सदा सदा से लेकर तब तक मात खाने वाले अभियांत्रिकी संकाय के कुछ विश्वकर्मा के वंसज, उत्तर भारतीय और दक्षिण के हिन्दू भाई पता नहीं किस स्वार्थ्य में दक्षिण के एक व्यक्ति विशेस के समर्थन में और मेरे प्रभाव से उनके गोरख धंधे(क्या धंधे ऐसे उच्च संस्थानों में होते हैं उससे प्रबुद्ध समाज परिचित है की कौन संस्थाएं और मिशिनरिया उनका समर्थन करती हैं) पर असर पहुँचने के कारन मेरा प्रभाव ख़त्म करने हेतु मुझको वहां भी ब्राह्मण वादी और हिन्दू आतंकवादी सिध्द करने से वहां भी बाज नहीं आये कुछ और लोगों के समर्थन को लेकर और यहां तक की मेरे प्रोजेक्ट एसोसिएट की फ़ेलोशिप में बढ़ोत्तरी सबसे पहले लागू हो जाने पर भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर के तत्कालीन निदेशक, आचार्य पद्मनाभम(विष्णु) बलराम पर ब्राह्मणवाद का आरोप लगाने लगे जबकि ऐसे कार्य में उनका कोई हाँथ हो ही नहीं सकता तकनीकी रूप से उत्तरशोधक(पीडीएफ) के फ़ेलोशिप की बढ़ोत्तरी ही संस्थान पर निर्भर करता है। 

सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण पंडित रामानंद मिश्र के कुल के दाढ़ी वाले पंडित जी मतलब पंडित रमानाथ(नामतः विष्णु) मिश्रा जो पंडित रामानंद की मूलभूमि पर अपने व्यापक क्षेत्र विशेष के लिए उच्च अनुकरणीय श्रेष्ठ आचरण वाला जीवन गुजारे एक संस्कृत शिक्षक के रूप में और जो प्रयागराज के ही एक गुरुकुल के छात्र थे और सभी गुरुकुलों की सामूहिक परिक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर्ता थे मैं उनका व्यक्तिगत रूप से नाती था मतलब कम से कम आंगिरस गोत्रीय जोशी जी उनसे उम्र में कम थे अगर मेरे नाना जी के सगे छोटे भाई पारसनाथ(नामतः शिव) मिश्र के मित्र थे तो मेरे नाना कम से कम उनके बड़े भाई हुए। और मै एक ऐसा आचरण विकशित किया अपने में जो मेरे नाना पंडित रमानाथ मिश्र के अनुकूल और छोटे नाना के अनुपालक के रूप में हो तो मेरे ऊपर उन दोनों का सामान असर हुआ इसका। तो आचरण की दृस्टि से मै जोशी जी से कभी पीछे नहीं हो सकता और न मैंने व्यापक दृस्टि से देखे जाने पर कोई ऐसा कृत्य छोड़ा है जो समाज के लिए निंदनीय हो और किशी को कोई शिकायत हो तो उस घटना का जिक्र करे तो मई उसका स्पस्टीकरण दे सकता हूँ की वह किशी तरह से गलत नहीं था। Note: नाना दाढ़ी रखते थे पर सप्ताह में एक दिन बनवाते थे जिसे एक दिन बाद ही दाढ़ी दिखने लगती थी तो दाढ़ी जिस दिन बनवाते थे उस दिन छात्रों के लिए विशेष अनुशासन का दिन होता था।

सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण पंडित रामानंद मिश्र के कुल के दाढ़ी वाले पंडित जी मतलब  पंडित रमानाथ(नामतः विष्णु) मिश्रा जो पंडित रामानंद की मूलभूमि पर अपने व्यापक क्षेत्र विशेष के लिए उच्च अनुकरणीय श्रेष्ठ आचरण वाला जीवन गुजारे एक संस्कृत शिक्षक के रूप में और जो प्रयागराज के ही एक गुरुकुल के छात्र थे और सभी गुरुकुलों की सामूहिक परिक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर्ता थे मैं उनका व्यक्तिगत रूप से नाती था मतलब कम से कम आंगिरस गोत्रीय जोशी जी उनसे उम्र में कम थे अगर मेरे नाना जी के सगे छोटे भाई पारसनाथ(नामतः शिव) मिश्र के मित्र थे तो मेरे नाना कम से कम उनके बड़े भाई हुए। और मै एक ऐसा आचरण विकशित किया अपने में जो मेरे नाना पंडित रमानाथ मिश्र के अनुकूल और छोटे नाना के अनुपालक के रूप में हो तो मेरे ऊपर उन दोनों का सामान असर हुआ इसका।  तो आचरण की दृस्टि से मै जोशी जी से कभी पीछे नहीं हो सकता और न मैंने व्यापक दृस्टि से देखे जाने पर कोई ऐसा कृत्य छोड़ा है जो समाज के लिए निंदनीय हो और किशी को कोई शिकायत हो तो उस घटना का जिक्र करे तो मई उसका स्पस्टीकरण दे सकता हूँ की वह किशी तरह से गलत नहीं था।  Note: नाना दाढ़ी रखते थे पर सप्ताह में एक दिन बनवाते थे जिसे एक दिन बाद ही दाढ़ी दिखने लगती थी तो दाढ़ी जिस दिन बनवाते थे उस दिन छात्रों के लिए विशेष अनुशासन का दिन होता था। 
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur

मै सब कुछ जानते हुए 14 वर्ष से नाटक ही कर रहा हूँ और देख रहा हूँ की आप लोग इस संसार को अच्छे से अच्छी तरह से चलाने के लिए कितना प्रयास और कितना अच्छा अभिनय कर रहे हैं? मुझे भी संतुस्ती है अभी तक के आप लोगों के अभिनय को देखकर की मुझको भी न्यायलय में जाने को मजबूर कर देते हैं आप लोग अकाट्य सत्य को जानते हुए की मेरा कोई श्रेष्ठ और वरिष्ठ आज तक इस मानवता के इतिहास में कोई जन्म ही नहीं लिया। >>>>>>>>मै कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण था न की हिरण्यकश्यप जिसकी शक्ति की तुलना आप दलित/ईसाई नरसिंघ/सिम्हाद्री या नरसिंघ बांडुगुला के पुत्र से कर रहे थे वह तब जबकि आप लोग स्वयं मेरे लिए पुत्र और शिष्य समान सिद्ध कर दिए गए। एक व्यक्ति अगणित लोगों का पुत्र हो सकता है पर आनुवंशिक रूप से किशी एक का ही पुत्र होगा तो आप उसकी रक्षा में अनावश्यक मौखिक रूप से उसका बाप क्यों बन रहे हैं जिसकी सुरक्षा हेतु उसका बाप और निकट सम्बन्धी मौखिक रूप से मेरे भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलोर(दक्षिण) में रहते हुए महान से महान पुरुषों को बनाया जा चुका है और बनाये जाने के बावजूद भी उसकी कमियों पर पर्दा नहीं पद सका। किशी की तीन पीढ़ी की शक्ति कम से कम दूसरों से 60 वर्ष का आतंरिक शक्ति दे देता है तो उसपर सनातन ब्राह्मण तो किस बात की समानता या किस बात का मेरा विकल्प? दुनिआ में कुछ लोग ऐसे होते ही हैं की जिनका विकल्प स्वयं ब्रह्मा भी नही खोज सकते है तो आप लोग क्यों खोज रहे थे? और अगर खोज रहे थे तो आप को असफलता ही हाँथ लगनी थी। मै सब कुछ जानते हुए 14 वर्ष से नाटक ही कर रहा हूँ और देख रहा हूँ की आप लोग इस संसार को अच्छे से अच्छी तरह से चलाने के लिए कितना प्रयास और कितना अच्छा अभिनय कर रहे हैं? मुझे भी संतुस्ती है अभी तक के आप लोगों के अभिनय को देखकर की मुझको भी न्यायलय में जाने को मजबूर कर देते हैं आप लोग अकाट्य सत्य को जानते हुए की मेरा कोई श्रेष्ठ और वरिष्ठ आज तक इस मानवता के इतिहास में कोई जन्म ही नहीं लिया।

मै सब कुछ जानते हुए 14 वर्ष से नाटक ही कर रहा हूँ और देख रहा हूँ की आप लोग इस संसार को अच्छे से अच्छी तरह से चलाने के लिए कितना प्रयास और कितना अच्छा अभिनय कर रहे हैं? मुझे भी संतुस्ती है अभी तक के आप लोगों के अभिनय को देखकर की मुझको भी न्यायलय में जाने को मजबूर कर देते हैं आप लोग अकाट्य सत्य को जानते हुए की मेरा कोई श्रेष्ठ और वरिष्ठ आज तक इस मानवता के इतिहास में कोई जन्म ही नहीं लिया। >>>>>>>>मै कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण था न की हिरण्यकश्यप जिसकी शक्ति की तुलना आप दलित/ईसाई नरसिंघ/सिम्हाद्री या नरसिंघ बांडुगुला के पुत्र से कर रहे थे वह तब जबकि आप लोग स्वयं मेरे लिए पुत्र और शिष्य समान सिद्ध कर दिए गए। एक व्यक्ति अगणित लोगों का पुत्र हो सकता है पर आनुवंशिक रूप से किशी एक का ही पुत्र होगा तो आप उसकी रक्षा में अनावश्यक मौखिक रूप से उसका बाप क्यों बन रहे हैं जिसकी सुरक्षा हेतु उसका बाप और निकट सम्बन्धी मौखिक रूप से मेरे भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलोर(दक्षिण) में रहते हुए महान से महान पुरुषों को बनाया जा चुका है और बनाये जाने के बावजूद भी उसकी कमियों पर पर्दा नहीं पद सका। किशी की तीन पीढ़ी की शक्ति कम से कम दूसरों से 60 वर्ष का आतंरिक शक्ति दे देता है तो उसपर सनातन ब्राह्मण तो किस बात की समानता या किस बात का मेरा विकल्प? दुनिआ में कुछ लोग ऐसे होते ही हैं की जिनका विकल्प स्वयं ब्रह्मा भी नही खोज सकते है तो आप लोग क्यों खोज रहे थे? और अगर खोज रहे थे तो आप को असफलता ही हाँथ लगनी थी। मै सब कुछ जानते हुए 14 वर्ष से नाटक ही कर रहा हूँ और देख रहा हूँ की आप लोग इस संसार को अच्छे से अच्छी तरह से चलाने के लिए कितना प्रयास और कितना अच्छा अभिनय कर रहे हैं? मुझे भी संतुस्ती है अभी तक के आप लोगों के अभिनय को देखकर की मुझको भी न्यायलय में जाने को मजबूर कर देते हैं आप लोग अकाट्य सत्य को जानते हुए की मेरा कोई श्रेष्ठ और वरिष्ठ आज तक इस मानवता के इतिहास में कोई जन्म ही नहीं लिया।

Tuesday, August 18, 2015

जोशी जी के प्रयागराज के पोषणकर्ता लोग! जोशी जी बाबर की तरह निर्वासित हैं तो आप जैसे लोगों के कारन जो रावणकुल के नाम से ही किशी संस्था या केंद्र के निर्माण की सलाह दे देते हैं या उनको मना नहीं कर सकते ऐसे कार्य से जिसमे की रावणकुल के नाम से बने शोधपीठ पर आज तक कोई योग्य नहीं पाया गया या चयनित ही नही किया गया । जोशी की प्रयागराज विश्वविद्यालय की परियोजना पूर्ण हुई ही तो वह केवल और केवल विशेष रूप से उत्तरांचल/उत्तराखंड, मराठवाड़ा और केरल के गुरु क्षेत्र मतलब जोशी जी के ही गुरु क्षेत्र जमदग्निपुर/जौनपुर के ननिहाल बिशुनपुर-223103 के लोगों और उसमे विशेषरूप से रामानन्द/।/रामप्रसाद/रमानाथ(+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(श्रीधर+श्रीप्रकाश) सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि मिश्रा कुल के कारन और ऋषिदुर्वाषा और गौतम गोत्रीय क्षत्रियों के क्षेत्र आज़मगढ़ के मेरे गाँव के रामापुर-223225 के सारंगधर(शिव) /.... /देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म पितामह)/ के सनातन कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण कुल के कारन जिसमे एक-एक कर पूरा विश्व समाज/मनवता को ही अपने में जोड़ लिया और सबको एक सूत्र में पिरो दिया जो दोनों कुल एक क्षत्रिय और एक मुस्लिम(कालपूर्व क्षत्रिय) द्वारा दिए दान की जमीन के मूल वासी हैं। इन लोगों ने मुझको दाँव पर लगा दिया था जोशी के लिए मुझे इसका परिणाम बारम्बार उनको बताने के बाद भी। मुझे न जन्म देने वाले माता-पिता समझ पाये और न पालन करता; और न ही विषयबोधकर्ता गुरु वाला समझ पाये पर यहां तो मई साधन मात्र बना। अगर मुझे यह कार्य करना होता तो यह कार्य भी होता और वह कार्य भी होता लेकिन मुझे चुनौती जिस कार्य की थी वह पूर्ण हुआ। वह कार्य मेरे परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि मिश्रा मेरे मामा श्री श्रीधर मिश्रा के स्वाभिमान के प्रतिकूल था तो मेरी रूचि और अरुचि का प्रश्न ही नही आता है। कार्य पूरा होने का कारण जोशी की परियोजना भी पूर्ण हुई और मेरा ब्राह्मण नाम पर विरोध हुआ था तो अपने को सर्वोच्च ब्राह्मण और इसके साथ ही साथ पूरे विश्व को ब्राह्मणो की संतान भी सिध्द किया इन 14 वर्षों में, जिसे आप कह सकते हैं की सम्पूर्ण समाज को सात ब्रह्मर्षियों/सप्तर्षियों की संतान सिद्ध किया। जिसको तथाकथित सामाजिक न्याय को अपने निहित स्वार्थ हेतु भुनाना हो इसे पुनः परिभाषित करे क्योंकि मुझ तीन पीढ़ी की शक्ति लेकर जीने वाले ने सिद्ध किया है कि मेरे साथ तथाकथित सामाजिक न्याय के तहत दूसरों पर वरीयता पाने वालों ने मतलब तथाकथित सामाजिक न्याय प्राप्तकर्ता ने ही अन्याय किया है। अतएव मै इस तथाकथित सामाजिक न्याय को रद कर वैश्विक परिश्थिति को ध्यान में रखते हुए इसे पुनः परिभाषित करने की मांग करता हूँ मेरे स्वयं के द्वारा लिखित ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" जैसे समसामयिक स्थानीय और वैश्विक परिस्थितिजन्य भावपूर्ण विचार और उसके वास्तविक रूप से वर्तमान विश्व स्थानीय समाज में दर्शनवलोकन के प्रभाव को देखते हुए। भाई जिस समाज के साथ तथाकथित विश्वमहाशक्ति हो वे लोग कम से कम तथाकथित सामाजिक न्याय का लाभ न ले जिस सुविधा और सेवा को सार्वजनिक हित की पूंजी से विकसित किया गया हो। टिप्पणी :- -जो परमब्रह्म अवस्था को प्राप्त हो चुका हो उससे भी असंभव वही हो सकता है जो धर्म विरुद्ध होता है।

जोशी जी के प्रयागराज के पोषणकर्ता लोग!   जोशी जी बाबर की तरह निर्वासित हैं तो आप जैसे लोगों के कारन जो रावणकुल के नाम से ही किशी संस्था या केंद्र के निर्माण की सलाह दे देते हैं या उनको मना नहीं  कर सकते ऐसे कार्य से जिसमे की रावणकुल के नाम से बने शोधपीठ पर आज तक कोई योग्य नहीं पाया गया या चयनित ही नही किया गया । जोशी की प्रयागराज विश्वविद्यालय की परियोजना पूर्ण हुई ही तो वह केवल और केवल विशेष रूप से उत्तरांचल/उत्तराखंड, मराठवाड़ा और केरल के गुरु क्षेत्र मतलब जोशी जी के ही गुरु क्षेत्र जमदग्निपुर/जौनपुर के  ननिहाल बिशुनपुर-223103 के लोगों और उसमे विशेषरूप से रामानन्द/।/रामप्रसाद/रमानाथ(+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(श्रीधर+श्रीप्रकाश) सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि मिश्रा कुल के कारन और ऋषिदुर्वाषा और गौतम गोत्रीय क्षत्रियों के क्षेत्र आज़मगढ़ के मेरे गाँव के रामापुर-223225 के सारंगधर(शिव) /.... /देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म पितामह)/ के सनातन कश्यपगोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण कुल के कारन जिसमे एक-एक कर पूरा विश्व समाज/मनवता  को ही अपने में जोड़ लिया और सबको एक सूत्र में पिरो दिया जो दोनों कुल एक क्षत्रिय और एक मुस्लिम(कालपूर्व क्षत्रिय) द्वारा दिए दान की जमीन के मूल वासी हैं। इन लोगों ने मुझको दाँव पर लगा दिया था जोशी के लिए मुझे इसका परिणाम बारम्बार उनको बताने के बाद भी। मुझे न जन्म देने वाले माता-पिता समझ पाये और न पालन करता;  और न ही विषयबोधकर्ता गुरु वाला समझ पाये पर यहां तो मई साधन मात्र बना।  अगर मुझे यह कार्य करना होता तो यह कार्य भी होता और वह कार्य भी होता लेकिन मुझे चुनौती जिस कार्य की थी वह पूर्ण हुआ। वह कार्य मेरे  परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि मिश्रा मेरे मामा श्री श्रीधर मिश्रा के स्वाभिमान के प्रतिकूल था तो मेरी रूचि और अरुचि का प्रश्न ही नही आता है।  कार्य पूरा होने का कारण जोशी की परियोजना भी पूर्ण हुई और मेरा ब्राह्मण नाम पर विरोध हुआ था तो अपने को सर्वोच्च ब्राह्मण और इसके साथ ही साथ पूरे विश्व को ब्राह्मणो की संतान भी सिध्द किया इन 14 वर्षों में, जिसे आप कह सकते हैं की सम्पूर्ण समाज को सात ब्रह्मर्षियों/सप्तर्षियों की संतान सिद्ध किया।   जिसको तथाकथित सामाजिक न्याय को अपने निहित स्वार्थ हेतु भुनाना हो इसे पुनः परिभाषित करे क्योंकि मुझ तीन पीढ़ी की शक्ति लेकर जीने वाले ने सिद्ध किया है कि मेरे साथ तथाकथित सामाजिक न्याय के तहत दूसरों पर वरीयता पाने वालों ने मतलब तथाकथित सामाजिक न्याय प्राप्तकर्ता ने ही अन्याय किया है। अतएव मै इस तथाकथित सामाजिक न्याय को रद कर  वैश्विक परिश्थिति को ध्यान में रखते हुए इसे पुनः परिभाषित करने की मांग करता हूँ मेरे स्वयं के द्वारा लिखित ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" जैसे समसामयिक स्थानीय और वैश्विक परिस्थितिजन्य भावपूर्ण विचार और उसके वास्तविक रूप से वर्तमान विश्व  स्थानीय समाज में दर्शनवलोकन के प्रभाव को देखते हुए।  भाई जिस समाज के साथ तथाकथित विश्वमहाशक्ति हो वे लोग कम से कम तथाकथित सामाजिक न्याय का लाभ न ले जिस सुविधा और सेवा को सार्वजनिक हित की  पूंजी से विकसित किया गया हो। 
टिप्पणी :- -जो परमब्रह्म अवस्था को प्राप्त हो चुका हो उससे भी असंभव वही हो सकता है जो धर्म विरुद्ध होता है।   

Monday, August 17, 2015

किशी का मैनेजमेंट बहुत अच्छा चल रहा था और वह किशी व्यक्ति विशेष और विशिष्ट व्यक्तियों का सिपहसालार बन सामाजिकता और शाख बढ़ा रहा था भविष्य में अपनी प्रभुसत्ता कायम करने और रखने के लिए; कोई बहुत अच्छा अनुसंधान/शोधकर्ता बना हुआ था आवश्यकता से अधिक वाक्पटु और चपलवट ज्ञानवान बना हुआ था; और कोई बहुत बड़ा स्वामिभक्त बन ऐसे गुरु की छाया और उस गुरु के अधिकार का सुखभोग कर रहा था जो दूसरों के बलिदान पर कायम था तो इसमें से कोई ब्रह्मा, विष्णु और महेश या परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) हो सकता है क्या जिसमे स्वयं की मौलिकता और स्वयं का वाह्य दुनिया से एक कदम अलग कर दिए जाने पर जिसका कोई आधार स्वयं में निहित न हो(बिना जुआड़ टेकनोलोजी के जिसका कोई काम न चलता हो) चाहे किशी भी सेवा या किशी क्षेत्र में हो ? तो मै कैसे उनको ब्रह्मा, विष्णु और महेश या परमब्रह्म मान कर उनका पदाभिषेक कर सकता था? जो उपयुक्त था उसका विष्णु के रूप में पदाभिषेक हुआ वह मानवता हित में आवश्यकता पड़ने पर परमब्रह्म की सीमा तक जब विस्तार करने को होगा तब उसकी पूर्ण सहायता जारी रहेगी।

किशी का मैनेजमेंट बहुत अच्छा चल रहा था और वह किशी व्यक्ति विशेष और विशिष्ट व्यक्तियों का सिपहसालार बन सामाजिकता और शाख बढ़ा रहा था भविष्य में अपनी प्रभुसत्ता कायम करने और रखने के लिए; कोई बहुत अच्छा अनुसंधान/शोधकर्ता बना हुआ था आवश्यकता से अधिक वाक्पटु और चपलवट ज्ञानवान बना हुआ था; और कोई बहुत बड़ा स्वामिभक्त बन ऐसे गुरु की छाया और उस गुरु के अधिकार का सुखभोग कर रहा था जो दूसरों के बलिदान पर कायम था तो इसमें से कोई ब्रह्मा, विष्णु और महेश या परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) हो सकता है क्या जिसमे स्वयं की मौलिकता और स्वयं का वाह्य दुनिया से एक कदम अलग कर दिए जाने पर जिसका कोई आधार स्वयं में निहित न हो(बिना जुआड़ टेकनोलोजी के जिसका कोई काम न चलता हो) चाहे किशी भी सेवा या किशी क्षेत्र में हो ?  तो मै कैसे उनको ब्रह्मा, विष्णु और महेश या परमब्रह्म मान कर उनका पदाभिषेक कर सकता था? जो उपयुक्त था उसका विष्णु के रूप में पदाभिषेक हुआ वह मानवता हित में आवश्यकता पड़ने पर परमब्रह्म की सीमा तक जब विस्तार करने को होगा तब उसकी पूर्ण सहायता जारी रहेगी। 

अगर सनातन हिन्दू धर्म से अलग हट कुछ नए मार्ग पर चलने वाले दूसरे नए धर्मों का भारत में विस्तार हो तो कम से कम दूसरे देशों में जहां पर इस नए धर्मों का उदय हुआ है या इनका विस्तार है आज तो वहा सनातन हिन्दू धर्म का भी अस्तित्व क्रमसः और अधिक मजबूत हो तभी मानवता में संतुलन स्थापित होगा और मानवता प्रफुल्लित होगी।

अगर सनातन हिन्दू धर्म से अलग हट कुछ नए मार्ग पर चलने वाले दूसरे नए धर्मों का भारत में विस्तार हो तो कम से कम दूसरे देशों में जहां पर इस नए धर्मों का उदय हुआ है या इनका विस्तार है आज तो वहा सनातन हिन्दू धर्म का भी अस्तित्व क्रमसः और अधिक मजबूत हो तभी मानवता में संतुलन स्थापित होगा और मानवता प्रफुल्लित होगी। 

हकीकत की दुनिया में जीने वाले के सपने नहीं होते ऐसा किसने कहा है? हकीकत की दुनिया में जीने वाले के भी सपने होते हैं पर उसका ह्रदय विशाल होना चाहिए। यह हकीकत की दुनिया में देखे जाने वाला स्वप्न ही तो था की सम्पूर्ण कायनात/मानवता इसी प्रयागराज में जन्म लेने वाले सात ब्रह्मर्षियों/सप्तर्षियों की संतान सिद्ध कर दी गयी इन मात्र 14(2001-2015) वर्षों में मतलब जिन/जिस वास्तविक ब्राह्मणों/ब्राह्मण का सबसे ज्यादा विरोध हुआ गैर ब्राह्मण समाज की पूर्ण स्थापना के स्वपन को साकार करने के लिए तो वह स्वप्न ही असत्य निकला और इसके विपरीत तो स्वयं एक ब्राह्मण स्वप्नद्रस्ता के स्वप्न के अनुकूल श्रीराम, श्रीकृष्ण समेत समस्त मानवता उसी ब्राह्मण समुदाय की संतान सिद्ध हो गयी।

हकीकत की दुनिया में जीने वाले के सपने नहीं होते ऐसा किसने कहा है? हकीकत की दुनिया में जीने वाले के भी सपने होते हैं पर उसका ह्रदय विशाल होना चाहिए। यह हकीकत की दुनिया में देखे जाने वाला स्वप्न ही तो था की सम्पूर्ण कायनात/मानवता इसी प्रयागराज में जन्म लेने वाले सात ब्रह्मर्षियों/सप्तर्षियों की संतान सिद्ध कर दी गयी इन मात्र 14(2001-2015) वर्षों में मतलब जिन/जिस वास्तविक ब्राह्मणों/ब्राह्मण का सबसे ज्यादा विरोध हुआ गैर ब्राह्मण समाज की पूर्ण स्थापना के स्वपन को साकार करने के लिए तो वह स्वप्न ही असत्य निकला और इसके विपरीत तो स्वयं एक ब्राह्मण स्वप्नद्रस्ता के स्वप्न के अनुकूल श्रीराम, श्रीकृष्ण समेत समस्त मानवता उसी ब्राह्मण समुदाय की संतान सिद्ध हो गयी। 

Friday, August 14, 2015

Although although I was the source of energy of many people from my childhood but minimum near about time of extreme load on mine for the welfare of the world humanity centralizing myself in Prayagraj is: Shravan Shivaratri/Shrikrishna Janmastami dated 18-08-2001/11-08-2001 to corresponding Shravan Shivaratri/Janmastami dated 11-08-2015/05-09-2015| Although 1/3 part comes under the course of my duty for humanity but the name Vivek=Trayambak= Trilochan=Trinetra=Shiv and Rashi name Giridhar((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) has given me this load and also the will power to perform my duty too. [ Actually Vivek is the one of the child of Goddess Saraswati of her own among Vivek-Pragya-Gyan-Vidya like Lord Brahma have his seven Manas putra i.e. the Saptarshi i.e. the Sevan Brahmarshi and thus Vivek himself is not even less important than any of these Saptarshi; Lord Brahma and Saraswati had only physical son called Daksh Prajapati of Kashi/Varanasi known as father of all the female of the world including Sati/Uma/Aparna/Parvati. Lord Shiv's supreme protector is also known as Vivek=Trayambak=Trilochan=Trinetra thus Vivek~Shiv)| Apart from this I want to say that I was always follower of Lord Shri Ram from my childhood. [11 /12 अगस्त, 2015, श्रावण शिवरात्रि और मानवता की रक्षा हेतु शिव द्वारा महासमुद्रमन्थन का विषपान:Tuesday, 14-08-2001 to Friday, 14-08-2015 = 14 Years due course time period for World wide social welfare load]

Although although I was the source of energy of many people from my childhood but minimum near about time of extreme load on mine for the welfare of the world humanity centralizing myself in Prayagraj is: Shravan Shivaratri/Shrikrishna Janmastami dated 18-08-2001/11-08-2001 to corresponding Shravan Shivaratri/Janmastami dated 11-08-2015/05-09-2015| Although 1/3 part comes under the course of my duty for humanity but the name Vivek=Trayambak= Trilochan=Trinetra=Shiv and Rashi name Giridhar((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) has given me this load and also the will power to perform my duty too. [ Actually Vivek is the one of the child of Goddess Saraswati of her own among Vivek-Pragya-Gyan-Vidya like Lord Brahma have his seven Manas putra i.e. the Saptarshi i.e. the Sevan Brahmarshi and thus Vivek himself is not even less important than any of these Saptarshi; Lord Brahma and Saraswati had only physical son called Daksh Prajapati of Kashi/Varanasi known as father of all the female of the world including Sati/Uma/Aparna/Parvati. Lord Shiv's supreme protector is also known as Vivek=Trayambak=Trilochan=Trinetra thus Vivek~Shiv)|  Apart from this I want to say that I was always follower of Lord Shri Ram from my childhood. [11 /12 अगस्त, 2015, श्रावण शिवरात्रि और मानवता की रक्षा हेतु शिव द्वारा महासमुद्रमन्थन का विषपान:Tuesday, 14-08-2001 to Friday, 14-08-2015 = 14 Years due course time period for World wide social welfare load]

Wednesday, August 12, 2015

विष्णु भैया को प्रथम सुझाव: मै सैकड़ों बार निम्नतम जीवन स्तर से लेकर श्रेष्ठतम जीवन स्तर और दलित से लेकर ब्राह्मण तक जिस किशी को मै बिशुनपुर-223103, जौनपुर (अपने ननिहाल) गाँव और रामापुर-223225, आजमगढ़(अपने गाँव) और इस दोनों के पड़ोसी क्षेत्र, पास पड़ोस की सीमा से लेकर नेशनल इंटर कॉलेज, पट्टिनरेन्द्रपुर; गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, समोधपुर; तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर; काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी; प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज; भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलोर और सभी शिक्षण स्थल के लोगों को भी तक जानता था खाली समय में बैठकर उनका अप्रत्यक्ष उनका अभिवादन कर और स्मरण कर उससे शक्ति लिया करता था। मुझे आशा है की जब आप विश्व समाज हेतु और सर्व कल्याण निमित्त पदासीन हुए हैं तो कई ऐसे अवसर आएंगे जब दलित बस्ती, अल्पसंख्यक बस्ती समेत सम्पूर्ण नर नारी जिनको आप जानते है उनके अप्रत्यक्ष अभिवादन करने से उन लोगों से आप को अप्रत्यक्ष ऊर्जा मिलेगी और शांति मिलेगी अपना कार्य करने में। इस संसार में सभी तरह के लोग जीवन की लालसा रखते हैं तो इस जीवन श्रृंखला को चलाने हेतु अगर हर तबके से प्रत्यक्ष न सही अप्रत्यक्ष ऊर्जा लेना कोई गलत नहीं और कोई चोरी नहीं है। क्योंकि आप द्वारा अर्जित ऊर्जा विश्व में अन्य सभी लोगों को मिलेगी जो इन सब जाती/धर्म/वर्ग से सम्बन्ध रखते है।

विष्णु भैया को प्रथम सुझाव: मै सैकड़ों बार निम्नतम जीवन स्तर से लेकर श्रेष्ठतम जीवन स्तर और दलित से लेकर ब्राह्मण तक जिस किशी को मै बिशुनपुर-223103, जौनपुर (अपने ननिहाल) गाँव और रामापुर-223225, आजमगढ़(अपने गाँव) और इस दोनों के पड़ोसी क्षेत्र, पास पड़ोस की सीमा से लेकर नेशनल इंटर कॉलेज, पट्टिनरेन्द्रपुर; गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, समोधपुर; तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय,  जौनपुर; काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी;  प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज;  भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलोर और सभी शिक्षण स्थल के लोगों को भी तक जानता था खाली समय में बैठकर उनका अप्रत्यक्ष उनका अभिवादन कर और स्मरण कर उससे शक्ति लिया करता था। मुझे आशा है की जब आप विश्व समाज हेतु और सर्व कल्याण निमित्त पदासीन हुए हैं तो कई ऐसे अवसर आएंगे जब दलित बस्ती, अल्पसंख्यक बस्ती समेत सम्पूर्ण नर नारी जिनको आप जानते है उनके अप्रत्यक्ष अभिवादन करने से उन लोगों से आप को अप्रत्यक्ष ऊर्जा मिलेगी और शांति मिलेगी अपना कार्य करने में। इस संसार में सभी तरह के लोग जीवन की लालसा रखते हैं तो इस जीवन श्रृंखला को चलाने हेतु अगर हर तबके से प्रत्यक्ष न सही अप्रत्यक्ष ऊर्जा लेना कोई गलत नहीं और कोई चोरी नहीं है। क्योंकि आप द्वारा अर्जित ऊर्जा विश्व में अन्य सभी लोगों को मिलेगी जो इन सब जाती/धर्म/वर्ग से सम्बन्ध रखते है।   

Tuesday, August 11, 2015

तीनो मुख्य धर्म और उनकी सभी शाखाये इस प्रयागराज में प्रभावी रूप में मौजूद है और मई उनको शाक्षी मान कर "Vivekaanand and Modern tradition" ब्लॉग लिखा हूँ बिना किशी प्रकार के भय और भेद के और इसे मई भारतीय विज्ञानं संस्थान, बैंगलोर में भी लिखा था और यही नहीं जब वहा मुझे दुनिया के किशी भी भाग में जाने हेतु 2007 के अंतिम दिनों में प्रस्ताव मिला था किशी समूह विशेष से जिसे मई ठुकरा दिया था उसी क्षण मान लीजिये अगर मै वहां जाता तो भी इसी तरह लिखता यह जानते हुए की इससे मेरा जो व्यक्तिगत नुक्सान होना था वह हो ही रहा है यहाँ प्रयागराज में सभी धर्मों के व्यापक प्रभाव होते हुए। कोई धर्म संख्या में ज्यादा तो कोई शक्ति में ज्यादा तो कोई आर्थिक और वैश्विक प्रभाव में ज्यादा इस वैश्विक युग में और सभी अपनी अपनी सत्ता बनाये हुए है बराबर यहाँ इस प्रयागराज में तो जिस अवस्था में मै हूँ वह अपने दम पर हूँ। क्योंकि जो मेरे शुभ चिंतक मामा जी के परिवार के बाद में मुझसे जुटे वे वाह्य शक्तियों के दास हो चुके है और मई उन शक्तियों को केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्यन केंद्र से नीचे उतरते हुए सड़क पार करते ही चन्द्रशेखर पार्क, कंपनी गार्डन स्थित भारतीय संग्रहालय की बिल्डिंग के सामने ही पा चुका हूँ तो विदेश जाने की जरूरत ही क्या ? फिर भी अंत तह इतना कहूँगा की केवल ईसाइयत के बल पर यह दुनिया नहीं चलाई जा सकती है और केवल ईसाइयत/जलवत गुण के बल पर चलाने की कोशिस हुई तो अग्नी तत्व अनियंत्रित होंगे ही इसे कौन रोक सकेगा। अतः अग्नि, जल और थल तीनो गुणों का समावेश जरूरी है इस संसार को चलाने में जिस तरह सूर्य, समुद्र(जलराशि) और पृथ्वी/स्थल का समन्वय इस जीवमंडल को चला रहा है।

तीनो मुख्य धर्म और उनकी सभी शाखाये इस प्रयागराज में प्रभावी रूप में मौजूद है और मई उनको शाक्षी मान कर "Vivekaanand and Modern tradition" ब्लॉग लिखा हूँ बिना किशी प्रकार के भय और भेद के और इसे मई भारतीय विज्ञानं संस्थान, बैंगलोर में भी लिखा था और यही नहीं जब वहा मुझे दुनिया के किशी भी भाग में जाने हेतु 2007 के अंतिम दिनों में प्रस्ताव मिला था किशी समूह विशेष से जिसे मई ठुकरा दिया था उसी क्षण मान लीजिये अगर मै वहां जाता तो भी इसी तरह लिखता यह जानते हुए की इससे मेरा जो व्यक्तिगत नुक्सान होना था वह हो ही रहा है यहाँ प्रयागराज में सभी धर्मों के व्यापक प्रभाव होते हुए। कोई धर्म संख्या में ज्यादा तो कोई शक्ति में ज्यादा तो कोई आर्थिक और वैश्विक प्रभाव में ज्यादा इस वैश्विक युग में और सभी अपनी अपनी सत्ता बनाये हुए है बराबर यहाँ इस प्रयागराज में तो जिस अवस्था में मै हूँ वह अपने दम पर हूँ।  क्योंकि जो मेरे शुभ चिंतक मामा जी के परिवार के बाद में मुझसे जुटे वे वाह्य शक्तियों के दास हो चुके है और मई उन शक्तियों को केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्यन केंद्र से नीचे उतरते हुए सड़क पार करते ही चन्द्रशेखर पार्क, कंपनी गार्डन स्थित भारतीय संग्रहालय की बिल्डिंग के सामने ही पा चुका हूँ तो विदेश जाने की जरूरत ही क्या ? फिर भी अंत तह इतना कहूँगा की केवल ईसाइयत के बल पर यह दुनिया नहीं चलाई जा सकती है और केवल ईसाइयत/जलवत गुण के बल पर चलाने की कोशिस हुई तो अग्नी तत्व अनियंत्रित होंगे ही इसे कौन रोक सकेगा। अतः अग्नि, जल और थल तीनो गुणों का समावेश जरूरी है इस संसार को चलाने में जिस तरह सूर्य, समुद्र(जलराशि) और पृथ्वी/स्थल का समन्वय इस जीवमंडल को चला रहा है।   

अगर शोध और शिक्षण/ब्राह्मण कर्म करने वाला शिव स्वयं की सीमा का विस्तार करते हुए सशरीर परमब्रह्म को प्राप्त हो सकता है तो पूर्ण शिक्षित और प्रशासनिक/क्षत्रिय कर्म करने वाला विष्णु सीमा विस्तार करते हुए सशरीर परमब्रह्म क्यों नहीं हो सकता। एक शिक्षक होते हुए भी जो मर्यादित आचरण नहीं कर पा रहा है उसको विष्णु मान ही नहीं सकता और न उससे विष्णु की सीमा का स्वयं विस्तार कर सशरीर परमब्रह्म बन सकने की आशा कोई कर सकता है। इस लिए मै जाती/धर्म भेद से ऊपर उठ विष्णु भैया को विष्णु के परमपद हेतु विष्णु पदाअभिषेक करता हूँ और उनसे आशा करता हूँ की वे इस संसार के लिए अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए भविष्य में अपनी सीमा का विस्तार सशरीर परमब्रह्म तक करेंगे।---------कुछ देवियों को बताना चाहूँगा की मै कम से कम इतना बड़ा जरूर हूँ की घोर जातिवाद का दूसरे पर आरोप लगाने वाला होते हुए स्वयं अपनी जाती के घोर जातिवादी शक्तियों के बल पर दूसरों का अधिकार और पद छीनने का प्रयास नहीं करता हूँ। और वे जान लें दूसरे का पद छीनने से नहीं मिलता है जो कालचक्र को साक्षी बना चुका हो पर हाँ वह उच्च कर्म से ही मिलता है और मै आज जाती/धर्म से ऊपर उठाते हुए भैया विष्णु को उस योग्य समझते हुए सावन के पावन माह में बुधवार/ज्ञान दिवस के दिन ही उनका विष्णु पदाभिषेक कर रहा हूँ जो पूर्ण रूपेण अपना विस्तार परमब्रह्म अवस्था तक करेंगे और इस हेतु मई उनका पूर्ण समर्थन और सहयोग करूंगा।

अगर शोध और शिक्षण/ब्राह्मण कर्म करने वाला शिव स्वयं की सीमा का विस्तार करते हुए सशरीर परमब्रह्म को प्राप्त हो सकता है तो पूर्ण शिक्षित और प्रशासनिक/क्षत्रिय कर्म करने वाला विष्णु सीमा विस्तार करते हुए सशरीर परमब्रह्म क्यों नहीं हो सकता। एक शिक्षक होते हुए भी जो मर्यादित आचरण नहीं कर पा रहा है उसको विष्णु मान ही नहीं सकता और न उससे विष्णु की सीमा का स्वयं विस्तार कर सशरीर परमब्रह्म बन सकने की आशा कोई कर सकता है। इस लिए मै जाती/धर्म भेद से ऊपर उठ विष्णु भैया को विष्णु के परमपद हेतु विष्णु पदाअभिषेक करता हूँ और उनसे आशा करता हूँ की वे इस संसार के लिए अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए भविष्य में अपनी सीमा का विस्तार सशरीर परमब्रह्म तक करेंगे।---------कुछ देवियों को बताना चाहूँगा की मै कम से कम इतना बड़ा जरूर हूँ की घोर जातिवाद का दूसरे पर आरोप लगाने वाला होते हुए स्वयं अपनी जाती के घोर जातिवादी शक्तियों के बल पर दूसरों का अधिकार और पद छीनने का प्रयास नहीं करता हूँ। और वे जान लें दूसरे का पद छीनने से नहीं मिलता है जो कालचक्र को साक्षी बना चुका हो पर हाँ वह उच्च कर्म से ही मिलता है और मै आज जाती/धर्म से ऊपर उठाते हुए भैया विष्णु को उस योग्य समझते हुए सावन के पावन माह में बुधवार/ज्ञान दिवस के दिन ही उनका विष्णु पदाभिषेक कर रहा हूँ जो पूर्ण रूपेण अपना विस्तार परमब्रह्म अवस्था तक करेंगे और इस हेतु मई उनका पूर्ण समर्थन और सहयोग करूंगा।
11 /12 अगस्त, 2015, श्रावण शिवरात्रि और मानवता की रक्षा हेतु शिव द्वारा महासमुद्रमन्थन का विषपान


स्वयं रामापुर, आज़मगढ़-223225 का सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव को अर्पित और शिवा का आहार होने वाला) पाण्डेय ब्राह्मण, जो सारंगधर(शिव)/------/देवव्रत(गंगापुत्र) कुल का सदस्य होते हुए देवव्रत की मूल भूमिधरी पर रहने का गौरव प्राप्त किये हुए है वह शिव स्वरुप का विस्तार करते हुए अभूतपूर्व रूपेण परमब्रह्म अवस्था को प्राप्त हुआ और ब्रह्मा द्वारा दिए गए कार्य को परिणति तक पहुंचाया इस प्रयागराज में अपने को अवस्थित कर, उस बिशुनपुर, जौनपुर-223203 के सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार जो रामानंद/..../रामप्रशाद/रमानाथ(पारशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर/श्रीप्रकाश) मतलब रामानंद कुल के परिवार जो रामानंद की मूल भूमिधरी पर बने रहने का गौरव प्राप्त है के सहयोग से, तो जाहिर सी बात है की जो विष्णु हमेशा परमब्रह्म का स्वरुप प्राप्त करते है वे भी शिव और ब्रह्मा की शक्ति अर्जित कर ऐसे परमब्रह्म स्वरुप प्राप्त करते होंगे। लेकिन इस दौरान शिव को परमब्रह्म बनना था तो विष्णु को अभूतपूर्व कस्ट हुआ जितना शिव को नहीं होता था विष्णु को परमब्रह्म रूप में बने रहने हेतु सहयोग देने में तो भविष्य में विष्णु को ही पुनः परमब्रह्म बनाने हेतु ब्रह्मा और शिव को केवल वाह्य सहयोग व् समर्थन विधि को सर्वश्रेष्ठ माना जाय मतलब जो जिसका काम है वही उसे करे तो किशी को कुछ कस्ट नहीं होगा पर क्या किया जाय स्थिति ऐसी थी की इसमे शिव को ही समर्पित होना था। जब मै स्वयं केदारेश्वर/आदिशंकर बन शिव सीमा विस्तार परमब्रह्म तक किया तो फिर बिशुनपुर में कौन महादेव शेष बचा? वहां तो महादेव स्वयं विष्णु भक्त होते हैं, तो कौन और किस प्रकार का महादेव था जो रामानंद की भूमिधरी पर आसीन पारिवारिक सदस्य का विरोध किया? निः संदेह यह धूर्तता थी और उसका परिणाम उनको भुक्तना होगा।

 स्वयं रामापुर, आज़मगढ़-223225 का सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव को अर्पित और शिवा का आहार होने वाला)  पाण्डेय ब्राह्मण,  जो सारंगधर(शिव)/------/देवव्रत(गंगापुत्र)  कुल का सदस्य होते हुए देवव्रत की मूल भूमिधरी पर रहने का गौरव प्राप्त किये हुए है वह शिव स्वरुप का विस्तार करते हुए अभूतपूर्व रूपेण परमब्रह्म अवस्था को प्राप्त हुआ और ब्रह्मा द्वारा दिए गए कार्य को परिणति तक पहुंचाया इस प्रयागराज में अपने को अवस्थित कर, उस बिशुनपुर, जौनपुर-223203 के सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार जो रामानंद/..../रामप्रशाद/रमानाथ(पारशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर/श्रीप्रकाश) मतलब रामानंद कुल के परिवार जो रामानंद की मूल भूमिधरी पर बने रहने का गौरव प्राप्त है के सहयोग से, तो जाहिर सी बात है की जो विष्णु हमेशा परमब्रह्म का स्वरुप प्राप्त करते है वे भी शिव और ब्रह्मा की शक्ति अर्जित कर ऐसे परमब्रह्म स्वरुप प्राप्त करते होंगे। लेकिन इस दौरान शिव को परमब्रह्म बनना था तो विष्णु को अभूतपूर्व कस्ट हुआ जितना शिव को नहीं होता था विष्णु को परमब्रह्म रूप में बने रहने हेतु सहयोग देने में तो भविष्य में विष्णु को ही पुनः परमब्रह्म बनाने हेतु ब्रह्मा और शिव को केवल वाह्य सहयोग व् समर्थन विधि को सर्वश्रेष्ठ माना जाय मतलब जो जिसका काम है वही उसे करे तो किशी को कुछ कस्ट नहीं होगा पर क्या किया जाय स्थिति ऐसी थी की इसमे शिव को ही समर्पित होना था।  जब मै स्वयं केदारेश्वर/आदिशंकर बन शिव सीमा विस्तार परमब्रह्म तक किया तो फिर बिशुनपुर में कौन महादेव शेष बचा? वहां तो महादेव स्वयं विष्णु भक्त होते हैं, तो कौन और किस प्रकार का महादेव था जो रामानंद की भूमिधरी पर आसीन पारिवारिक सदस्य का विरोध किया? निः संदेह यह धूर्तता थी और उसका परिणाम उनको भुक्तना होगा।       

श्री गोरक्षनारायण - श्री हरी विष्णु नारायण स्वरूपम- श्री गोरक्षब्रह्म - श्री ब्रह्म स्वरूपम:-अलखनिरंजन(अलख-निरंजन ” शब्द गुरू गोरखनाथ(शिव स्वरुप) के भी थे तो स्वाभाविक रूप से अलखनिरंजन भगवान विष्णु हुए जो शिव के आराध्य थे) का सर्वप्रथम उद्घोष करने अत्रि ऋषि के पुत्र , दुर्वासा/कृष्णात्रेय ऋषि और सोमात्रेय ऋषि के भाई, दत्तात्रेय जी पूरी दुनिया के साथ ईस्वर को भी जगा गए और इस प्रकार विष्णु भगवान अपनी आनंद निद्रा से जग गए पर संजय भाई कितने ह्रदय से मामा के दरवाजे पर आने पर ही अलखनिरंजन कर मामा, श्रीधर(विष्णु) को जगाते रह गए लेकिन संजय भाई का कल्याण नहीं हुआ मामा श्रीधर के जग जाने पर भी। लेकिन एक चीज हुई की मेरी सहन शीलता में अद्वितीय वृद्धि हुई क्योंकि संजय भाई मेरी लगभग समान उम्र के कुछ बड़े भाई थे और मेरी दादी जी के सगे मामा के पौत्र थे तो मै भी अलखनिरंजन नाम उनकी ही भाषा और उनसे भी ऊंची आवाज में कहता चाहता था कम से कम मामा के घर के सामने और संजय के आने के पूर्व पर मामा मुझे रोके हुए थे ऐसा करने से। यहाँ केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवंअ समुद्र अध्यन केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज में दूसरे संजय उनके समरूप का भी यही हाल था लेकिन मै दूर तक सोचता की जिसके घर मई उनके पुरखों को तराने हेतु भोज करने जाता था दादी का ननिहाल होने के नाते मै उस पर वार करून तो मर्यादा तार-तार होगी। चालाक होना ठीक है पर पूरी दुनिया मूर्ख है तो कुछ चालक ही अगर मूर्ख बनाते रहते है तभी यह दुनिया चलती है इसे भी संजय भाई के समरूप को जानना चाहिए जो त्रिमूर्ति:तीन लोग मिलकर केवल एक त्रिमूर्ति जोशी जी का उत्तराधिकार लिए जी रहे हैं। ( अलख प्रकाश का दूसरा नाम है . निरंजन का अर्थ है अपनी दृष्टि की सुद्धता| यानी अलख निरंजन का अर्थ है की पूर्ण प्रकाश मे बिना किसी दुर्भावना के प्राकृति का दर्शन करना, आपको कुछ वैसा ही अनुभव होगा जैसा एक शिशु को पहली बार आँखे खोलने पर अनुभव होता है.(‘अलख निरंजन’ का भावार्थ क्या है ? ‘अलख निरंजन’।>>>>>>‘अलख निरंजन’का भावार्थ इस प्रकार है । अंजन यानी अज्ञान । अज्ञान नष्ट होना यानी निरंजन; इसलिए निरंजनका अर्थ है ज्ञान होना । लक्ष यानी देखना अथवा देख पाना । अलक्ष यानी वह जो इतना चमकीला, तेजस्वी है कि, उसे देख न पाएं । ‘अलक्ष’ शब्दका अपभ्रंश है ‘अलख’ । तो ‘अलख निरंजन’ का अर्थ हुआ, ज्ञानका चमकीला तेज, जिसे देख पाना संभव न होते हुए भी उसका प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है । इसका एक अर्थ और भी है – अघोरपंथियों के अनुसार अलख का अर्थ होता है जगाना (या पुकारना) और निरंजन का अर्थ होता है अनंत काल का स्वामी … हे अनंतकाल के स्वामी जागो ..देखो हम पुकार रहे है । अलख का अर्थ – अगोचर ; जो देखा न जा सके है !निरंजन परमात्मा को कहते है!अलख्- निरंजन का अर्थ है == परमात्मा जो देखा न जा सके ! :”अलख-निरंजन ” शब्द गुरू गोरखनाथ(शिव स्वरुप) के भी थे तो स्वाभाविक रूप से अलखनिरंजन भगवान विष्णु हुए जो शिव के आराध्य थे)|

श्री गोरक्षनारायण - श्री हरी विष्णु नारायण स्वरूपम- श्री गोरक्षब्रह्म - श्री ब्रह्म स्वरूपम:-अलखनिरंजन(अलख-निरंजन ” शब्द गुरू गोरखनाथ(शिव स्वरुप) के भी थे तो स्वाभाविक रूप से अलखनिरंजन भगवान विष्णु हुए जो शिव के आराध्य थे) का सर्वप्रथम उद्घोष करने अत्रि ऋषि के पुत्र , दुर्वासा/कृष्णात्रेय ऋषि और सोमात्रेय ऋषि  के भाई,    दत्तात्रेय जी पूरी दुनिया के साथ ईस्वर को भी जगा गए और इस प्रकार विष्णु भगवान अपनी आनंद निद्रा से जग गए पर संजय भाई कितने ह्रदय से मामा के दरवाजे पर आने पर ही अलखनिरंजन कर मामा, श्रीधर(विष्णु) को जगाते रह गए लेकिन संजय भाई का कल्याण नहीं हुआ मामा श्रीधर के जग जाने पर भी। लेकिन एक चीज हुई की मेरी सहन शीलता में अद्वितीय वृद्धि हुई क्योंकि संजय भाई मेरी लगभग समान उम्र के कुछ बड़े भाई थे और मेरी दादी जी के सगे मामा के पौत्र थे तो मै भी अलखनिरंजन नाम उनकी ही भाषा और उनसे भी ऊंची आवाज में कहता चाहता था कम से कम मामा के घर के सामने और संजय के आने के पूर्व पर मामा मुझे रोके हुए थे ऐसा करने से। यहाँ केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवंअ समुद्र अध्यन केंद्र, प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज में दूसरे संजय उनके समरूप का भी यही हाल था लेकिन मै दूर तक सोचता की जिसके घर मई उनके पुरखों को तराने हेतु भोज करने जाता था दादी का ननिहाल होने के नाते मै उस पर वार करून तो मर्यादा तार-तार होगी। चालाक होना ठीक है पर पूरी दुनिया मूर्ख है तो कुछ चालक ही अगर मूर्ख बनाते रहते है तभी यह दुनिया चलती है इसे भी संजय भाई के समरूप को जानना चाहिए जो त्रिमूर्ति:तीन लोग मिलकर केवल एक त्रिमूर्ति जोशी जी का उत्तराधिकार लिए जी रहे हैं। ( अलख प्रकाश का दूसरा नाम है . निरंजन का अर्थ है अपनी दृष्टि की सुद्धता| यानी अलख निरंजन का अर्थ है की पूर्ण प्रकाश मे बिना किसी दुर्भावना के प्राकृति का दर्शन करना, आपको कुछ वैसा ही अनुभव होगा जैसा एक शिशु को पहली बार आँखे खोलने पर अनुभव होता है.(‘अलख निरंजन’ का भावार्थ क्या है ? ‘अलख निरंजन’।>>>>>>‘अलख निरंजन’का भावार्थ इस प्रकार है । अंजन यानी अज्ञान । अज्ञान नष्ट होना यानी निरंजन; इसलिए निरंजनका अर्थ है ज्ञान होना । लक्ष यानी देखना अथवा देख पाना । अलक्ष यानी वह जो इतना चमकीला, तेजस्वी है कि, उसे देख न पाएं । ‘अलक्ष’ शब्दका अपभ्रंश है ‘अलख’ । तो ‘अलख निरंजन’ का अर्थ हुआ, ज्ञानका चमकीला तेज, जिसे देख पाना संभव न होते हुए भी उसका प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है । इसका एक अर्थ और भी है – अघोरपंथियों के अनुसार अलख का अर्थ होता है जगाना (या पुकारना) और निरंजन का अर्थ होता है अनंत काल का स्वामी … हे अनंतकाल के स्वामी जागो ..देखो हम पुकार रहे है । अलख का अर्थ – अगोचर ; जो देखा न जा सके है !निरंजन परमात्मा को कहते है!अलख्- निरंजन का अर्थ है == परमात्मा जो देखा न जा सके ! :”अलख-निरंजन ” शब्द गुरू गोरखनाथ(शिव स्वरुप) के भी थे तो स्वाभाविक रूप से अलखनिरंजन भगवान विष्णु हुए जो शिव के आराध्य थे)|

मुझे सामाजिक अपराध या आपराधिक मामलों में लिप्त कर उसका निदान चाहेंगे तो मेरा निर्णय इतना कठोर होगा की उसमे दया याचिका दाखिल करने का भी समय नहीं मिलेगा और न विवेचना के समय तक अपराधियों को कैद में रह सुखभोग का समय मिलेगा। क्योंकि यह समाज बचा रह पाता है तभी तो अपराध और अपराधी जाने अनजाने हो जाते रहेंगे पर इस संसार को चिरन्तर बनाये रखने वाले या जिनके कारन समाज बना रह पता है असीमित सहनसीलता वाले उन संत और सज्जन व्यक्तियों से ऐसे अपराध और अपराधिक व्यक्तियों को दूर ही रहना चाहिए जो आम नागरिक से कुछ अलग व्यवहार करते है। अतः ऐसे अपराध और अपराधी व्यक्तियों से लोगों से मेरा संपर्क न होने दें और हुआ तो वह उस अपराधी और जिस समाज से वह आता है उस समाज की अपूरणीय क्षति होगी।

मुझे सामाजिक अपराध या आपराधिक मामलों में लिप्त कर उसका निदान चाहेंगे तो मेरा निर्णय इतना कठोर होगा की उसमे दया याचिका दाखिल करने का भी समय नहीं मिलेगा और न विवेचना के समय तक अपराधियों को कैद में रह सुखभोग का समय मिलेगा। क्योंकि यह समाज बचा रह पाता है तभी तो अपराध और अपराधी जाने अनजाने हो जाते रहेंगे पर इस संसार को चिरन्तर बनाये रखने वाले या जिनके कारन समाज बना रह पता है असीमित सहनसीलता वाले उन संत और सज्जन व्यक्तियों से ऐसे अपराध और अपराधिक व्यक्तियों को दूर ही रहना चाहिए जो आम नागरिक से कुछ अलग व्यवहार करते है। अतः ऐसे अपराध और अपराधी व्यक्तियों से लोगों से मेरा संपर्क न होने दें और हुआ तो वह उस अपराधी और जिस समाज से वह आता है उस समाज की अपूरणीय क्षति होगी।

एक ब्राह्मण बने रहने या ब्राह्मण धर्म/जाती/उपजाति नाम रखने की कीमत जो मैंने चुकाई है बचपन से लेकर आज तक तो ऐसे ही हर सनातन हिन्दू अपने जीवन में सनातन हिन्दू होने की कीमत चुकता करता रहे तो किशी भी धर्म और जाती के व्यक्ति के व्यक्तित्व का अवनमन नहीं वरन उन्नयन हो जाएगा। फिर भी मै कहता हूँ की किशी एक जाती/धर्म के बल पर इस मानव संसार को चलाये रखना संभव नहीं है। मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

एक ब्राह्मण बने रहने या ब्राह्मण धर्म/जाती/उपजाति नाम रखने की कीमत जो मैंने चुकाई है बचपन से लेकर आज तक तो ऐसे ही हर सनातन हिन्दू अपने जीवन में सनातन हिन्दू होने की कीमत चुकता करता रहे तो किशी भी धर्म और जाती के व्यक्ति के व्यक्तित्व का अवनमन नहीं वरन उन्नयन हो जाएगा। फिर भी मै कहता हूँ की किशी एक जाती/धर्म के बल पर इस मानव संसार को चलाये रखना संभव नहीं है।  मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्यगण जो 1998 से लेकर 2013 तक स्वयंदूसरे की जमीन हड़पने के लिए असफल कोशिस करते रहे और उस पर दबाव बना उसकी भावी पीढ़ी को बर्बाद करने की कोशिस के तहत संघ की ही संपर्क शक्ति को अपनी ऐसी गलत नीति के तहत अनुचित साधन के रूप में प्रयोग में लाते रहे तो, ऐसे स्वयं सेवक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को छोड़ दें तभी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कल्याण होगा और वह अपने अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त करेगा केवल और केवल निःस्वार्थ समर्पित स्वयं सेवकों के बल पर और सच्चे कार्य में संघ शक्ति के प्रयोग के बल पर।

वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्यगण जो 1998 से लेकर 2013 तक स्वयंदूसरे की जमीन हड़पने के लिए असफल कोशिस करते रहे और उस पर दबाव बना उसकी भावी पीढ़ी को बर्बाद करने की कोशिस के तहत संघ की ही संपर्क शक्ति को अपनी ऐसी गलत नीति के तहत अनुचित साधन के रूप में प्रयोग में लाते रहे तो, ऐसे स्वयं सेवक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को छोड़ दें तभी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कल्याण होगा और वह अपने अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त करेगा केवल और केवल निःस्वार्थ समर्पित स्वयं सेवकों के बल पर और सच्चे कार्य में संघ शक्ति के प्रयोग के बल पर।   

Monday, August 10, 2015

मै भारत रत्न/मिसाइलमैन/भरतीय पूर्व राष्ट्रपति, दिवंगत श्री कलाम जी, भारतीय पूर्व राष्ट्रपति, स्वर्गीय के आर नारायणन जी; और भारतरत्न/ तथाकथित संविधान निर्माता परन्तु वास्तविक संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के पदासीन अधिकारी, डॉ अम्बवादेकर/आंबेडकर जी को सांत्वना देना चाहता हूँ की उन दिनों साफ सफाई की द्रिस्टीकोण से और अति सामाजिक संघर्ष के संक्रमण काल से गुजर रहे गुलाम देश की यथा स्थिति की वजह से वास्तविक रूप से आप जैसे लोगों के साथ कुछ बलात और अपमान जनक व्यवहार हुए होंगे पर मुझे आप लोगों की छाया और छवि को भी नीलाम करने वाले विदेशी मानशिकता के आप के समर्थक लोगों की वजह(उनका विदेशी एजेंट या सीधे विदेशी हांथों के लिए दलित अस्त्र बन जाने से) और उनकी राजनीती की गिरफ्त में आये सवर्णों ने मुझ सवर्ण को ही उस सवर्ण समुदाय ने ही अछूत, मद्यप, चरित्रहीन, दरिद्र नारायण(केवल गरीब नहीं) और देहसुख/अय्यासी में लिप्त सिद्ध किया था इसी प्रयाग में और आज भी मई अछूत हूँ उन लोगों के लिए। लेकिन आज के बाद से कोई दलित अस्त्र काम नहीं आएगा क्योंकि आप लोगों की छाया में लिप्त लोग मुझे अछूत सिद्ध करने वाले उन दलितों के रिस्तेदार हो चुके हैं और आप लोगों में से कोई अब इस दुनिया में नहीं रह गए हैं जिनके नाम को ले लेकर मुझे वारम्बार वार करने से रोका गया। मैंने कहा था की भारतीय विज्ञान संस्थान में मेरे द्वारा कुछ घटना विशेष के बाद मुझे लगता था की मई चल रहा हूँ या उड़ रहा हूँ तो मुझे लगता था की मुझे चलने या उड़ने में कुछ बाधा महसूस हो रही है तीव्रगति से चलने में तो मुझे परम श्रद्धेय गुरु कलाम और देवाशीष सेनगुप्ता गुरु जी मुझे जैसे किशी बंधन से अपनी तरफ खींच रहे हों फिर भी मई कुछ बाधा महशूस करने के बावजूद भी मई गतिमान ही रहता था तो इससे पता होना चाहिए की मई उनसे ज्यादा क्षमतावान हूँ। फिर भी सामाजिक मर्यादा बंधन में और इस सृस्टि की रक्षा हेतु समर्पित होने के नाते मई अपने को स्वनियंट्रित रखता हूँ और इसको कुछ लोग अगर मेरी कमजोरी समझते हों तो कलाम गुरुदेव से अपनी शक्ति माप लीजियेगा जिनसे मई अपने को ज्यादा क्षमतावान बता चुका हूँ सहनशीलता समेत हर क्षेत्रवत दृस्टि से। कलाम गुरुदेव से ज्यादा तनाव मई झेलकर जी रहा हूँ, शायद ही कोई ऐसा व्यक्तित्व न होता जिसको ब्रेन हैमरेज न हो गया होता जिसके दिमाग में एक साथ असीमित ज्ञान उसके दिमाग में प्रवेश किया होता जितना की मेरे दिमाग में प्रवेश किया एक साथ। >>>>कलाम जी पैसा और बल केवल और केवल सज्जन और सुसंस्कृत व्यक्ति को ही नहीं प्रभावित करता होगा पर कोई जाती और धर्म इससे अछूता नहीं जिसको प्रभावित न करता हो या अभी आप अपनी ही जाती और धर्म के ऐसे लोगों को देखे न हो: ---- याद है की मै रामानंद/..../रामप्रशाद/रमानाथ(पारशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर/श्रीप्रकाश), रामानंद कुल का एक मात्र परिवार जिसको रामानंद की मूल भूमिधरी पर बने रहने का गौरव प्राप्त है उस सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार बिशुनपुर, जौनपुर-223203 के परिवार का नाती बिशुनपुर प्राथमिक विद्यालय में सबसे मेधावी छात्र होने के बावजूद एक दिन जब सबसे आगे बैठने वाले आर्थिक रूप से सक्षम घर का तथाकथित दलित परिवार के छात्र के स्थान पर बैठ गया तो मेरा अज्ञानता में कुछ देर बाद जब वह आया तो पहले से ही मुझे उसके स्थान पर बैठा देख आग बबूला हो गया और तत्कालीन रूप से शारीरिक रूपसे मुझसे शक्तिशाली होने की वजह से पीछे से ही मुझे उठा कर मुझे जमीन पर पटक दिया मारपीट करता रहा एक शिक्षिका के आने तक। इस दुनिया को सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने को कहने वाला मई साफ सुथरे ढंग से बने किशी भी भोजन को कही भी साफ सुथरा स्थान बना कर वहां खा लेने को हूँ और खाया भी हूँ और बता दूँ की उपर्युक्त लडके के अलावा मेरे प्राथमिक कक्षा के दो दलित बचपन के सहपाठी मित्र श्री सुरलीराम(बिशुनपुर) और श्री सुरेंद्रकुमार(मलूकपुर-बिशुनपुर) अपने गंदे से गंदे किताब-काँपी के झोले में आम-इमली या अमरख या आंवला या कुछ भी दे दिए है तो मई अवश्य खाता रहा हूँ वहां भी और आगे के कक्षा में भी और 2001 से इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्ययन केंद्र पर तो हर जाती और धर्म के लोगों के साथ लाइ-चना और अन्य खाद्य के साथ चटनी भी एक ही स्थान पर रही खाई जाती है जो सबका जूठन हो जाता है अपने आप। जिस समय में छुवाछूत रही है उस समय 99% ब्राह्मण के घर भी साबुन नहीं रहता था वह भी रेगिस्तानी/मरुस्थी मिटटी से कपड़ा और काली मिटटी से बाल और सरीर धोया करता था। अतः जो सफाई नहीं करता था या साफ सुथरा नहीं रहता था या जो खान पान और संस्कार से अलग था वह अलग हो ही जाता था और आज भी हर जाती और धर्म के लोग अलग-अलग खानपान और अलग अलग संस्कार की वजह से अलग थलग हैं। आज संख्याबल की राजनीती हावी है न की सत्य की राजनीती तो जो लोकतंत्र या विश्व तंत्र संख्याबल के आगे सत्य का गला घोंटता है उसे 11-9 जैसी विभीषिका का सामना करना ही होगा। उदहारण मई देता हूँ मेरा 500 बीघे का गाँव बाबा सारंगधर को मुस्लिम जागीरदार से मिले पांच गाँव में से एक था तो जाहिर सी बात है की वह ब्राह्मणो का गाँव ही था परन्तु आज उसी गाँव में आबादी की दृस्टि से ब्राह्मण आधे से भी कम हो गए हैं तो क्या उन ब्राह्मणों को अब उसी स्थिति में जीना चाहिए जिस स्थिति में अन्य जी रहे हैं। भैया एक रेखा को बढ़ने के लिए दूसरी की रसद पानी क्यों बंद की जा रही है जिसको स्वयं में ही अपना विकास करने का नैसर्गिक अधिकार है? अरे भाई आप दूसरों को बढाइये इससे आप को कौन रोक रहा है पर अगर आप कहें की बहुमत जो कहे वही सत्य तो फिर वास्तविक सत्य जानने वाला अपना काम करेगा ही। समान सस्कार के बीच पारिवारिक सम्बन्ध पर मेरा कोई समझौता नहीं और अगर किशी की एतराज हो तो उसे यह समझना चाहिए की संस्कारित होने के लिए पैसे की जरूरत नहीं उसे अपने अंदर विकसित करने की जरूरत होती है और संस्कार आप के भी अच्छे हुए तो आप भी किशी की पसंद हो सकते है तो कोई सरकार संस्कार सीखा देगी आप इसके भरोसे न रहकर क्रमिक रूप से संस्कार सीखते और शीखाते रहिये अपने लोगों को। अगर कोई पारिवारिक सम्बन्ध नहीं भी आप से बनाएगा तो भी आप आतंरिक रूपसे शांति और संतुस्ती महसूस करेंगे।

मै भारत रत्न/मिसाइलमैन/भरतीय पूर्व राष्ट्रपति, दिवंगत श्री कलाम जी, भारतीय पूर्व राष्ट्रपति, स्वर्गीय के आर नारायणन जी; और भारतरत्न/ तथाकथित संविधान निर्माता परन्तु वास्तविक संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के पदासीन अधिकारी, डॉ अम्बवादेकर/आंबेडकर जी को सांत्वना देना चाहता हूँ की उन दिनों साफ सफाई की द्रिस्टीकोण से और अति सामाजिक संघर्ष के संक्रमण काल से गुजर रहे गुलाम देश की यथा स्थिति की वजह से वास्तविक रूप से आप जैसे लोगों के साथ कुछ बलात और अपमान जनक व्यवहार हुए होंगे पर मुझे आप लोगों की छाया और छवि को भी नीलाम करने वाले विदेशी मानशिकता के आप के समर्थक लोगों की वजह(उनका विदेशी एजेंट या सीधे विदेशी हांथों के लिए दलित अस्त्र बन जाने से) और उनकी राजनीती की गिरफ्त में आये सवर्णों ने मुझ सवर्ण को ही उस सवर्ण समुदाय ने ही अछूत, मद्यप, चरित्रहीन, दरिद्र नारायण(केवल गरीब नहीं) और देहसुख/अय्यासी में लिप्त सिद्ध किया था इसी प्रयाग में और आज भी मई अछूत हूँ उन लोगों के लिए। लेकिन आज के बाद से कोई दलित अस्त्र काम नहीं आएगा क्योंकि आप लोगों की छाया में लिप्त लोग मुझे अछूत सिद्ध करने वाले उन दलितों के रिस्तेदार हो चुके हैं और आप लोगों में से कोई अब इस दुनिया में नहीं रह गए हैं जिनके नाम को ले लेकर मुझे वारम्बार वार करने से रोका गया। मैंने कहा था की भारतीय विज्ञान संस्थान में मेरे द्वारा कुछ घटना विशेष के बाद मुझे लगता था की मई चल रहा हूँ या उड़ रहा हूँ तो मुझे लगता था की मुझे चलने या उड़ने में कुछ बाधा महसूस हो रही है तीव्रगति से चलने में तो मुझे परम श्रद्धेय गुरु कलाम और देवाशीष सेनगुप्ता गुरु जी मुझे जैसे किशी बंधन से अपनी तरफ खींच रहे हों फिर भी मई कुछ बाधा महशूस करने के बावजूद भी मई गतिमान ही रहता था तो इससे पता होना चाहिए की मई उनसे ज्यादा क्षमतावान हूँ। फिर भी सामाजिक मर्यादा बंधन में और इस सृस्टि की रक्षा हेतु समर्पित होने के नाते मई अपने को स्वनियंट्रित रखता हूँ और इसको कुछ लोग अगर मेरी कमजोरी समझते हों तो कलाम गुरुदेव से अपनी शक्ति माप लीजियेगा जिनसे मई अपने को ज्यादा क्षमतावान बता चुका हूँ सहनशीलता समेत हर क्षेत्रवत दृस्टि से। कलाम गुरुदेव से ज्यादा तनाव मई झेलकर जी रहा हूँ, शायद ही कोई ऐसा व्यक्तित्व न होता जिसको ब्रेन हैमरेज न हो गया होता जिसके दिमाग में एक साथ असीमित ज्ञान उसके दिमाग में प्रवेश किया होता जितना की मेरे दिमाग में प्रवेश किया एक साथ। >>>>कलाम जी पैसा और बल केवल और केवल सज्जन और सुसंस्कृत व्यक्ति को ही नहीं प्रभावित करता होगा पर कोई जाती और धर्म इससे अछूता नहीं जिसको प्रभावित न करता हो या अभी आप अपनी ही जाती और धर्म के ऐसे लोगों को देखे न हो: ---- याद है की मै रामानंद/..../रामप्रशाद/रमानाथ(पारशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर/श्रीप्रकाश), रामानंद कुल का एक मात्र परिवार जिसको रामानंद की मूल भूमिधरी पर बने रहने का गौरव प्राप्त है उस सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार बिशुनपुर, जौनपुर-223203 के परिवार का नाती बिशुनपुर प्राथमिक विद्यालय में सबसे मेधावी छात्र होने के बावजूद एक दिन जब सबसे आगे बैठने वाले आर्थिक रूप से सक्षम घर का तथाकथित दलित परिवार के छात्र के स्थान पर बैठ गया तो मेरा अज्ञानता में कुछ देर बाद जब वह आया तो पहले से ही मुझे उसके स्थान पर बैठा देख आग बबूला हो गया और तत्कालीन रूप से शारीरिक रूपसे मुझसे शक्तिशाली होने की वजह से पीछे से ही मुझे उठा कर मुझे जमीन पर पटक दिया मारपीट करता रहा एक शिक्षिका के आने तक। इस दुनिया को सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने को कहने वाला मई साफ सुथरे ढंग से बने किशी भी भोजन को कही भी साफ सुथरा स्थान बना कर वहां खा लेने को हूँ और खाया भी हूँ और बता दूँ की उपर्युक्त लडके के अलावा मेरे प्राथमिक कक्षा के दो दलित बचपन के सहपाठी मित्र श्री सुरलीराम(बिशुनपुर) और श्री सुरेंद्रकुमार(मलूकपुर-बिशुनपुर) अपने गंदे से गंदे किताब-काँपी के झोले में आम-इमली या अमरख या आंवला या कुछ भी दे दिए है तो मई अवश्य खाता रहा हूँ वहां भी और आगे के कक्षा में भी और 2001 से इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्ययन केंद्र पर तो हर जाती और धर्म के लोगों के साथ लाइ-चना और अन्य खाद्य के साथ चटनी भी एक ही स्थान पर रही खाई जाती है जो सबका जूठन हो जाता है अपने आप। जिस समय में छुवाछूत रही है उस समय 99% ब्राह्मण के घर भी साबुन नहीं रहता था वह भी रेगिस्तानी/मरुस्थी मिटटी से कपड़ा और काली मिटटी से बाल और सरीर धोया करता था। अतः जो सफाई नहीं करता था या साफ सुथरा नहीं रहता था या जो खान पान और संस्कार से अलग था वह अलग हो ही जाता था और आज भी हर जाती और धर्म के लोग अलग-अलग खानपान और अलग अलग संस्कार की वजह से अलग थलग हैं। आज संख्याबल की राजनीती हावी है न की सत्य की राजनीती तो जो लोकतंत्र या विश्व तंत्र संख्याबल के आगे सत्य का गला घोंटता है उसे 11-9 जैसी विभीषिका का सामना करना ही होगा। उदहारण मई देता हूँ मेरा 500 बीघे का गाँव बाबा सारंगधर को मुस्लिम जागीरदार से मिले पांच गाँव में से एक था तो जाहिर सी बात है की वह ब्राह्मणो का गाँव ही था परन्तु आज उसी गाँव में आबादी की दृस्टि से ब्राह्मण आधे से भी कम हो गए हैं तो क्या उन ब्राह्मणों को अब उसी स्थिति में जीना चाहिए जिस स्थिति में अन्य जी रहे हैं। भैया एक रेखा को बढ़ने के लिए दूसरी की रसद पानी क्यों बंद की जा रही है जिसको स्वयं में ही अपना विकास करने का नैसर्गिक अधिकार है? अरे भाई आप दूसरों को बढाइये इससे आप को कौन रोक रहा है पर अगर आप कहें की बहुमत जो कहे वही सत्य तो फिर वास्तविक सत्य जानने वाला अपना काम करेगा ही। समान सस्कार के बीच पारिवारिक सम्बन्ध पर मेरा कोई समझौता नहीं और अगर किशी की एतराज हो तो उसे यह समझना चाहिए की संस्कारित होने के लिए पैसे की जरूरत नहीं उसे अपने अंदर विकसित करने की जरूरत होती है और संस्कार आप के भी अच्छे हुए तो आप भी किशी की पसंद हो सकते है तो कोई सरकार संस्कार सीखा देगी आप इसके भरोसे न रहकर क्रमिक रूप से संस्कार सीखते और शीखाते रहिये अपने लोगों को। अगर कोई पारिवारिक सम्बन्ध नहीं भी आप से बनाएगा तो भी आप आतंरिक रूपसे शांति और संतुस्ती महसूस करेंगे।