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Wednesday, September 30, 2015

It is SANATAN GAUTAM GOTRIY VYASHI MISHRA BRAHMINS VILLAGE, BISHUNPUR'S RESIDENT RAMANAND/...../RAM PRASHAD MISHRA's PRANAATI and SANATAN KASHYAP GOTRIY TRIPHALA PANDEY BRAHMINS VILLAGE, RAMAPUR'S RESIDENT SARANGADHAR(SHIVA)/.../../DEVVRAT (GANGA PUTRA BHEESHM) /..../RAM PRASHAD PANDEY'S PRAPAUTRA i.e. Vivek Kumar Pandey

It is SANATAN GAUTAM GOTRIY VYASHI MISHRA BRAHMINS VILLAGE, BISHUNPUR'S RESIDENT RAMANAND/...../RAM PRASHAD MISHRA's PRANAATI and SANATAN KASHYAP GOTRIY TRIPHALA PANDEY BRAHMINS VILLAGE, RAMAPUR'S RESIDENT SARANGADHAR(SHIVA)/.../../DEVVRAT (GANGA PUTRA BHEESHM) /..../RAM PRASHAD PANDEY'S PRAPAUTRA i.e. Vivek Kumar Pandey
Bishunpur
Ramapur

KBCAOS

Kedareswar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies

KBCAOS

K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies

क्या उस ब्राह्मण को उच्चतम ब्राह्मण कहेंगे जिसने किशी कार्यहेतु ब्राह्मणो/सनातन धर्मी हिन्दुओ/प्रयागराज विश्विद्यालय/प्रयागराज/भारतीयों की इज्जत गिरवी रखे जाने के बदले उस कार्य के पूर्ण हो जाने पर भी वह कार्य पूर्ण हुआ की नहीं हुआ? ऐसे कार्य के पूर्ण हो जाने पर भी ऐसे अकाट्य तथ्य पर निजी स्वार्थ हेतु विदेशी दबाव में प्रश्नचिन्ह लगा रहा है ? क्या उस कार्य को पूर्ण मानकर ब्राह्मणो/सनातन धर्मी हिन्दुओ/प्रयागराज विश्विद्यालय/प्रयागराज/भारतीयों की इज्जत और मानमर्यादा को वापस दिला देना या अपनी इज्जत और मानमर्यादा वापस पा जाना गुनाह है? मेरे शब्दों में यह कदापि गुनाह नहीं वरन पूर्ण कालिक और मर्यादित कदम है और इसके बदले किशी दूसरे, तीसरे या अनगिनत झूंठे मामले में फंसाये जाने पर भी सम्मान और मर्यादा की रक्षा हेतु प्रयागराज उच्च न्यायालय में जाने की बात क्या? अगर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय या स्वयं इस्वर के दरबार में न्याय के लिए जाना पड़े तो स्वीकार है। क्योंकि स्वयं कोई न्यायालय या कोई भी इस्वर शिव के समय/धर्म/अशोक चक्र/काल चक्र के आधार पर स्पस्ट नियम की अनदेखी कर दिए हुए निर्णय को अमान्य करेगा ही करेगा।

क्या उस ब्राह्मण को उच्चतम ब्राह्मण कहेंगे जिसने किशी कार्यहेतु ब्राह्मणो/सनातन धर्मी हिन्दुओ/प्रयागराज विश्विद्यालय/प्रयागराज/भारतीयों की इज्जत गिरवी रखे जाने के बदले उस कार्य के पूर्ण हो जाने पर भी वह कार्य पूर्ण हुआ की नहीं हुआ? ऐसे कार्य के पूर्ण हो जाने पर भी ऐसे अकाट्य तथ्य पर निजी स्वार्थ हेतु विदेशी दबाव में प्रश्नचिन्ह लगा रहा है ? क्या उस कार्य को पूर्ण मानकर ब्राह्मणो/सनातन धर्मी हिन्दुओ/प्रयागराज विश्विद्यालय/प्रयागराज/भारतीयों की इज्जत और मानमर्यादा को वापस दिला देना या अपनी इज्जत और मानमर्यादा वापस पा जाना गुनाह है? मेरे शब्दों में यह कदापि गुनाह नहीं वरन पूर्ण कालिक और मर्यादित कदम है और इसके बदले किशी दूसरे, तीसरे या अनगिनत झूंठे मामले में फंसाये जाने पर भी सम्मान और मर्यादा की रक्षा हेतु प्रयागराज उच्च न्यायालय में जाने की बात क्या? अगर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय या स्वयं इस्वर के दरबार में न्याय के लिए जाना पड़े तो स्वीकार है। क्योंकि स्वयं कोई न्यायालय या कोई भी इस्वर शिव के समय/धर्म/अशोक चक्र/काल चक्र के आधार पर स्पस्ट नियम की अनदेखी कर दिए हुए निर्णय को अमान्य करेगा ही करेगा। 
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K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies
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Tuesday, September 29, 2015

बागवान (बलिया/भूमिहार और प्रतापगढ़/क्षत्रिय) 11/18-09-2007 में मेरा कार्य पूर्ण मान लेते हैं भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में 2008 में पर उसी बागवान की बगिया की मूली उखाड़नें वाले अभी कल तक अपनी राजनीति जारी किये हुए थे इतना ही नहीं अभी तक मुझे विवादित बना दिए और मर्यादा जारी रखने की शर्त पर मुझे प्रयागराज न्यायलय में उसे वाद मानते हुए जाना पड़ा जिसको की मै 29 अक्टूबर, 2009 को ही प्राप्त और सिद्ध कर चुका हूँ यह सिद्ध करते हुए की चुनौतियों से खेलना ही मेरा खेल है। माँ सरस्वती की चार मानस संतान, विवेक, प्राज्ञ और ज्ञान, विद्या में से विवेक किससे प्रतिभा में पीछे होने वाला है। जब मुझको शिक्षा करने दिया गया तो मैंने शिक्षा में श्रेष्कर कर दिखाया(हाई स्कूल) और जब शिक्षा, गृहस्ती और राजनीती कराई गयी(माध्यमिक से लेकर स्नातकोत्तर) तब भी उसके अनुसार शिक्षा में अच्छा कर दिखाया और जब केवल राजनीति और शोध कराया गया तो राजनीति और शोध में श्रेष्कर किया और जब शोध, गृहस्ती, शिक्षण और राजनीती कराई गयी तब भी सबको देखते हुए श्रेष्कर किया तो किस प्रतिभा की बात की जाती है और किस श्रेष्ठम् ब्राह्मण की बात की जाती है जो मुझसे भी ज्यादा श्रेष्कर हुआ आज के युग में। बागवान (बलिया/भूमिहार और प्रतापगढ़/क्षत्रिय) 2007 में मेरा कार्य पूर्ण मान लेते हैं भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में 2008 में (These similar personal are responsible to give me place in The HONOR list of "PROUD PAST ALUMNI" of ALLAHABAD UNIVERSITY ALUMNI ASSOCIATION, UNIVERSITY OF ALLAHABAD in till date historical 42 personalities) पर उसी बागवान की बगिया की मूली उखाड़नें वाले अभी कल तक अपनी राजनीति जारी किये हुए थे इतना ही नहीं अभी तक मुझे विवादित बना दिए और मर्यादा जारी रखने की शर्त पर मुझे प्रयागराज न्यायलय में उसे वाद मानते हुए जाना पड़ा जिसको की मै 29 अक्टूबर, 2009 को ही प्राप्त और सिद्ध कर चुका हूँ यह सिद्ध करते हुए की चुनौतियों से खेलना ही मेरा खेल है। अब आप समझ सकते हैं की बागवान की बाग़ की मूली उखाड़ने वाले जो 7/8 वर्ष पीछे चलते है वे भी मुझसे ज्यादा प्रतिभावान बने रहने की लड़ाई लड़ते हैं। कारन क्या है? कारन यह है की वे पश्चिमी देश जो हमसे सांस्कृतिक रूप से पीछे हैं ये बागवान की बाग़ की मूली उखाड़ने वाले लोग उनलोगों की लड़ाई लड़ रहे है तो 7/8 वर्ष पीछे चलेंगे ही सभ्यता और संस्कृति तथा प्रतिभाशक्ति में भी।

बागवान (बलिया/भूमिहार और प्रतापगढ़/क्षत्रिय) 11/18-09-2007 में मेरा कार्य पूर्ण मान लेते हैं भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में 2008 में पर उसी बागवान की बगिया की मूली उखाड़नें वाले अभी कल तक अपनी राजनीति जारी किये हुए थे इतना ही नहीं अभी तक मुझे विवादित बना दिए और मर्यादा जारी रखने की शर्त पर मुझे प्रयागराज न्यायलय में उसे वाद मानते हुए जाना पड़ा जिसको की मै 29 अक्टूबर, 2009 को ही प्राप्त और सिद्ध कर चुका हूँ यह सिद्ध करते हुए की चुनौतियों से खेलना ही मेरा खेल है। माँ सरस्वती की चार मानस संतान, विवेक, प्राज्ञ और ज्ञान, विद्या में से विवेक किससे प्रतिभा में पीछे होने वाला है। जब मुझको शिक्षा करने दिया गया तो मैंने शिक्षा में श्रेष्कर कर दिखाया(हाई स्कूल) और जब शिक्षा, गृहस्ती और राजनीती कराई गयी(माध्यमिक से लेकर स्नातकोत्तर) तब भी उसके अनुसार शिक्षा में अच्छा कर दिखाया और जब केवल राजनीति और शोध कराया गया तो राजनीति और शोध में श्रेष्कर किया और जब शोध, गृहस्ती, शिक्षण और राजनीती कराई गयी तब भी सबको देखते हुए श्रेष्कर किया तो किस प्रतिभा की बात की जाती है और किस श्रेष्ठम् ब्राह्मण की बात की जाती है जो मुझसे भी ज्यादा श्रेष्कर हुआ आज के युग में। बागवान (बलिया/भूमिहार और प्रतापगढ़/क्षत्रिय) 2007 में मेरा कार्य पूर्ण मान लेते हैं भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में 2008 में (These similar personal are responsible to give me place in The HONOR list of "PROUD PAST ALUMNI" of ALLAHABAD UNIVERSITY ALUMNI ASSOCIATION, UNIVERSITY OF ALLAHABAD in till date historical 42 personalities) पर उसी बागवान की बगिया की मूली उखाड़नें वाले अभी कल तक अपनी राजनीति जारी किये हुए थे इतना ही नहीं अभी तक मुझे विवादित बना दिए और मर्यादा जारी रखने की शर्त पर मुझे प्रयागराज न्यायलय में उसे वाद मानते हुए जाना पड़ा जिसको की मै 29 अक्टूबर, 2009 को ही प्राप्त और सिद्ध कर चुका हूँ यह सिद्ध करते हुए की चुनौतियों से खेलना ही मेरा खेल है। अब आप समझ सकते हैं की बागवान की बाग़ की मूली उखाड़ने वाले जो 7/8 वर्ष पीछे चलते है वे भी मुझसे ज्यादा प्रतिभावान बने रहने की लड़ाई लड़ते हैं। कारन क्या है? कारन यह है की वे पश्चिमी देश जो हमसे सांस्कृतिक रूप से पीछे हैं ये बागवान की बाग़ की मूली उखाड़ने वाले लोग उनलोगों की लड़ाई लड़ रहे है तो 7/8 वर्ष पीछे चलेंगे ही सभ्यता और संस्कृति तथा प्रतिभाशक्ति में भी।

BUT WITHOUT REFORM/PARISHKAR IT IS NOT POSSIBLE THUS I SUGGESTED THE WAY WITH PAST EVENT TO MAKE SUBLIMATE/RETOUCH/TOUCH UP/REFORM IN THE INDIANS AS WELL AS THE WORLD CITIZEN IN FORM OF "VIVEKANAND AND MODERN TRADITION"| Its total 14 year when I entered in The KEDARESHWAR BANERJEE CENTRE OF ATMOSPHERIC AND OCEAN SCIENCE by LAW on 11th SEPTEMBER, 2001 although I came here in March 11, 2001 first for inquire the condition for continue the research and was not very satisfied with seeing all responsible person resembling and also actively of my own person but given interview on the direction of my Parampita Parameshwar, My Tauji Dr. Prem Chand Pandey on 3/4 Sepetember, 2001 and got selected and became the man of University of Allahabad for whole life. Also an interesting event in my life that I blessed by a son (first son, Vishnukant Pandey) in the same month, September (2010). Also one thing more that the person born in Kartik i.e. Kartikey(Elder son of Lord Shiva-Parvati) became Lord Ganesha(Second and Mind born son i.e. the Goddess Parvati assumed him as son for guarding her and thus Lord Shiva and Goddess Parvati both assumed him as his real son and also in an examination he declared him as fird God after TRIDEV/Brahma+Vishnu+ Mahesh) for the University of Allahabad and thus the world because of the process of human creation was continued on that day when whole world was going to ruined due to their own deed. Only the Ganesha was not an end but the event from Kashi/Varanasi to Allahabad to Bangalore made me the so capable that both the only Parambrahm(i.e. Lord Shriram and Shrikrishna who were only two incarnation of Lord Vishnu who achieved the position of Parambrahma i.e. the position of Lord Brahma+Vishnu+Mahesh in physical bodies) came in my house as my son. Thus second son born on the 28th August, 2013, on the holy occasion of Lord Shrikrishna Janmastami named Krishnakant.-----It was 14 year journey of the person who born on 11-11-1975, Monday on GOPI/GOPA/GOWARDHAN /GIRIDHAR (Event in life of Lord ShriKrishna) SHUKLA PAKSH ASTAMI of KARTIK Month i.e. Vivek/Trayambak/Trinetra/Trilochan (Rashiname Giridhar/11th incarnation of Rudra(Shiva) i.e. Dhaula (Himalay) Giridhari Hanuman/ Madirachal(Meru) Dhari Kurmavatari Lord Vishnu/ /Dharanidhar Sheshnag/Gowardhan Dhari Lord ShriKrishna| So many meaning taken from the name Giridhar because of the deed done event by event produced and also naturally came to me to face which can not be described in public.

RAGHUPATI/YADUPATI RAGHAV/VRISHNIVATS RAJARAM/ YOGA YOGESHWAR SHRIKRISHNA PATIT PAWAN SEETA-RAM /RADHA-KRISHN|
BUT WITHOUT REFORM/PARISHKAR IT IS NOT POSSIBLE THUS I SUGGESTED THE WAY WITH PAST EVENT TO MAKE SUBLIMATE/RETOUCH/TOUCH UP/REFORM IN THE INDIANS AS WELL AS THE WORLD CITIZEN IN FORM OF "VIVEKANAND AND MODERN TRADITION"| Its total 14 year when I entered in The KEDARESHWAR BANERJEE CENTRE OF ATMOSPHERIC AND OCEAN SCIENCE by LAW on 11th SEPTEMBER, 2001 although I came here in March 11, 2001 first for inquire the condition for continue the research and was not very satisfied with seeing all responsible person resembling and also actively of my own person but given interview on the direction of my Parampita Parameshwar, My Tauji Dr. Prem Chand Pandey on 3/4 Sepetember, 2001 and got selected and became the man of University of Allahabad for whole life. Also an interesting event in my life that I blessed by a son (first son, Vishnukant Pandey) in the same month, September (2010). Also one thing more that the person born in Kartik i.e. Kartikey(Elder son of Lord Shiva-Parvati) became Lord Ganesha(Second and Mind born son i.e. the Goddess Parvati assumed him as son for guarding her and thus Lord Shiva and Goddess Parvati both assumed him as his real son and also in an examination he declared him as fird God after TRIDEV/Brahma+Vishnu+ Mahesh)  for the University of Allahabad and thus the world because of the process of human creation was continued on that day when whole world was going to ruined due to their own deed. Only the Ganesha was not an end but the event from Kashi/Varanasi to Allahabad to Bangalore made me the so capable that both the only Parambrahm(i.e. Lord Shriram and Shrikrishna who were only  two incarnation of Lord Vishnu who achieved the position of Parambrahma i.e. the position of Lord Brahma+Vishnu+Mahesh in physical bodies) came in my house as my son. Thus second son born on the 28th August, 2013, on the holy occasion of Lord Shrikrishna Janmastami named Krishnakant.-----It was 14 year journey of the person who born on 11-11-1975, Monday on GOPI/GOPA/GOWARDHAN /GIRIDHAR (Event in life of Lord ShriKrishna) SHUKLA PAKSH ASTAMI of KARTIK Month i.e. Vivek/Trayambak/Trinetra/Trilochan (Rashiname Giridhar/11th incarnation of Rudra(Shiva) i.e. Dhaula (Himalay) Giridhari Hanuman/ Madirachal(Meru) Dhari Kurmavatari Lord Vishnu/ /Dharanidhar Sheshnag/Gowardhan Dhari Lord ShriKrishna| So many meaning taken from the name Giridhar because of the deed done event by event produced and also naturally came to me to face which can not be described in public.

English peoples who addressed me HI! Five means Hi! Pandey through e-mail messages many times should know that SUN'S BASE(SOURCE)/ BHARYA/WIFE GAYATRI/SAVITA IS THE ONLY PANCHMUKHI(FIVE HEADED) GODDESS| And Also 11th Rudra(Shiva) incarnation, Hanuman/Ambavaadekar /Ambedakar had five Head| हर जाती और धर्म के लोगों को हिन्दुस्तानी कहलाने के लिए हिन्दुस्तानी संस्कार होने चाहिए अगर यह सत्य है तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा इनके व्युत्क्रम जाति/धर्म कहलाने के अपने संस्कार होते है, और उसी तरह सनातन ब्राह्मण कहलाने के अपने संस्कार होते हैं, जो संस्कार इस सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा इनके व्युत्क्रम जाति/धर्म को अन्य भारतीय जाति/धर्म से जोड़ सके तो भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को जोड़ दिया गया जो सनातन ब्राह्मण मतलन सप्तर्षियों/सात ब्रह्मर्षियों ((मारीच/कश्यप, वशिष्ठ/शांडिल्य/व्यास, गौतम, आंगिरस/भारद्वाज/धन्वन्तरि/गुरु बृहस्पति, भृगु/जमदग्नि/दधीचि/परशुराम, अत्रि/दुर्वाषा(कृष्णात्रेय)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय(सोम), कौशिक=विश्वामित्र=विश्वरथ( प्रथम सप्तर्षि जिन्होंने सर्वप्रथम विश्व भ्रमण प्रारम्भ किया और घूम-घूम कर हर जगह शासन किये तथा जिन्होंने इस्वर की शक्ति प्राप्त होने का माध्यम सूर्य और उसका स्रोतउनकी भार्या गायत्री/सविता को मानते हुए गायत्री मंत्र श्रोत रचे और शिव के काल/समय/धर्म/अशोक चक्र के प्रथम रक्षक भी यही हैं मतलब शिव के काल/समय/धर्म/अशोक चक्र के चौबीस ऋषियों में प्रथम ऋषि मतलब चौबीस तीलियों में प्रथम तीली/तेली यही हैं)) की ही संतान हैं: पर मानव जीवन तो सभ्यता और संस्कृति से ही जीवन्त हो सकता है न? मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

English peoples who addressed me HI! Five means Hi! Pandey through e-mail messages many times should know that SUN'S BASE(SOURCE)/ BHARYA/WIFE GAYATRI/SAVITA IS THE ONLY PANCHMUKHI(FIVE HEADED) GODDESS| And Also 11th Rudra(Shiva) incarnation, Hanuman/Ambavaadekar /Ambedakar had five Head| हर जाती और धर्म के लोगों को हिन्दुस्तानी कहलाने के लिए हिन्दुस्तानी संस्कार होने चाहिए अगर यह सत्य है तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा इनके व्युत्क्रम जाति/धर्म कहलाने के अपने संस्कार होते है, और उसी तरह सनातन ब्राह्मण कहलाने के अपने संस्कार होते हैं, जो संस्कार इस सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा इनके व्युत्क्रम जाति/धर्म को अन्य भारतीय जाति/धर्म से जोड़ सके तो भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को जोड़ दिया गया जो सनातन ब्राह्मण मतलन सप्तर्षियों/सात ब्रह्मर्षियों ((मारीच/कश्यप, वशिष्ठ/शांडिल्य/व्यास, गौतम, आंगिरस/भारद्वाज/धन्वन्तरि/गुरु बृहस्पति, भृगु/जमदग्नि/दधीचि/परशुराम, अत्रि/दुर्वाषा(कृष्णात्रेय)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय(सोम), कौशिक=विश्वामित्र=विश्वरथ( प्रथम सप्तर्षि जिन्होंने सर्वप्रथम विश्व भ्रमण प्रारम्भ किया और घूम-घूम कर हर जगह शासन किये तथा जिन्होंने इस्वर की शक्ति प्राप्त होने का माध्यम सूर्य और उसका स्रोतउनकी भार्या गायत्री/सविता को मानते हुए गायत्री मंत्र श्रोत रचे और शिव के काल/समय/धर्म/अशोक चक्र के प्रथम रक्षक भी यही हैं मतलब शिव के काल/समय/धर्म/अशोक चक्र के चौबीस ऋषियों में प्रथम ऋषि मतलब चौबीस तीलियों में प्रथम तीली/तेली यही हैं)) की ही संतान हैं:
पर मानव जीवन तो सभ्यता और संस्कृति से ही जीवन्त हो सकता है न?
मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

27 Daughters Day (4th Sunday of September) Special| बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान। आप की हर वयस्क लाडली को इस्वर माह में एक बार उसके शरीर को गंगा जल की तरह पवित्र बना देता है>>>>सम्मान सहित जीने की इक्षा रखने वाला वाला हर पिता-भाई और सम्बंधित बंधू-बांधव व् सखा(जो दो शरीर होकर भी एक मन और आत्मा हो निःस्वार्थ भाव में भी) को पता होना चाहिए की आप की हर वयस्क लाडली को इस्वर माह में एक बार उसके शरीर को गंगा जल की तरह पवित्र बना देता है तो रह जाता है मन जिसमे आप के कुलीन संस्कार भरे होते है पर यदि सामाजिक चकाचौंध, किशी पारिस्थितिक मजबूरी और अज्ञानता की वजन से उसके कदम गलत रास्ते पर चले जाते है वह एक- दो चार दिन नहीं दो-चार वर्ष भी आप की पहुँच से बाहर हो जाए और इस दौरान उसका कौमार्य भंग को जाय( ईश्वर करें की आप का संस्कार ऐसा गरिमामयी और अटूट आस्था का हो की आप की लाडली का मनोबल न टूटे और वह अपना मानसिक नियंत्रण न खोये), तो भी अगर आप की लाडली तक आप की पहुँच हो पाती है या वह स्वयं आप तक पहुँचती है किशी तरह तब भी आप और आप के समाज(विशेष रूप) को अपनी उस लाडली का किशी दूसरे ऐसे समाज के उस युवक से जो विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके व्युत्क्रम जाती/धर्म को सामाजिक, धार्मिक(धार्मिक रीती-रिवाज और नियम क़ानून को मानता हो या मानना स्वीकार किया हो) और संवैधानिक रूप से स्वीकार न किया हो उसके साथ जन्मजन्मांतर के लिए बलात्कार के लिए पुनः विवाह कर न भेंजें। क्योंकि इससे आप का मनोबल और आप का समाज तथा बंधू-बांधव और सखागण सबका मनोबल गिरता है और कुछ न कुछ मानसिक कष्ट और अवशाद आप के दूर दराज के लोगों को भी होता है जो सम्मान सहित जीवन जीना चाहते है इस दुनिया में। वैसे जब ईस्वर उसके शरीर को माह में एक बार गंगाजल की तरह पवित्र बना ही देता है तो फिर पुनः वापस आयी हुयी आप की लाडली का मनः परिवर्तन (Brain Wash) होना ही केवल जरूरी रह जाता है/ या होना होता है, जिसे आप सब बंधू-बांधव-सखा और सगे-सम्बन्धी कर सकते हैं। मेरा पुनः निवेदन है की किशी ब्राह्मण/सवर्ण की कन्या का शास्त्रीय नियमों के तहत किशी ईसाई/दलित युवक का पाँवपूजन विधि द्वारा हुए विवाह को समाज मान्यता न दे अगर वह विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके व्युत्क्रम जाती/धर्म को सामाजिक, धार्मिक(धार्मिक रीती-रिवाज और नियम क़ानून को मानता हो या मानना स्वीकार किया हो) और संवैधानिक रूप से स्वीकार न किया हो, चाहे इसे संवैधानिक न्यायलय या आर्यसमाज मान्यता भले देता हो। और गर ऐसा नहीं होता है तो फिर सामाजिक आधार पर आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था नहीं हो या उच्च सामाजिक वर्ग किशी महान कार्य की आशा न की जाय उसके नैतिक दायित्व को अधिक बताते हुए। ---सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी? क्या परनर का हाथ कुलीनस्त्री कभी धरेगी? पर अगर यह हो रहा है तो इसके प्रायोजक दंड और अपमान भुगतने के लिए तैयार हो जाए! क्योंकि ऐसा किशी सामान्य मानवीय और सामाजिक मान्य विधि से संभव नहीं वरन बलात गिरे हुए कृत्य से व्यक्तित्व को प्रभावित कर और गिराकर ही संभव है। और ऐसे लोग इतने गिरे होते हैं की उनको इस बात की चिंता करने की जरूरत ही नहीं की उनकी कन्या/स्त्री के साथ भी ऐसा हो सकता है उनसे भी गिरे किशी पशुवत/पतित मानव के द्वारा।----धर्मनिरपेक्षता का क़ानून कहता है कि हर धर्म की मौलिक नियमों की रक्षा की जाय तो मित्रों यदि किशी धर्म के किशी स्पस्ट और व्यापक मौलिक नियम की रक्षा यदि नहीं हुई, तो भारतीय संविधान जिस अशोकचक्र के बूते चल रहा वह अशोकचक्र टूटा की नहीं? अशोकचक्र टूटने की पूर्ण आशंका के तहत लव-कुश/हिन्दू-कुश ने अपना कार्य 2001 में पूर्ण किया था और उसके बाद भी अशोकचक्र तोड़ेजाने का प्रयास अनवरत जारी रहा और 2005/6 में अशोकचक्र टूटा ही कुछ विशेष ईसाई/दलित गठ जोड़ से और उसको सामाजिक और कानूनी मान्यता भी मिल गयी सनातन हिन्दू संस्कृति के मौलिक शास्त्रीय विवाह नियम का मजाक उठाते हुए मतलब धार्मिक और सामाजिक भ्रस्टाचार के साथ धर्मनिरपेक्ष देश में संवैधानिक भ्रस्टाचार को गंगाजल के सामान पवित्र और दूषण रहित तथा अनुकरणीय सिद्ध करते हुए महिमामंडित कर दिया गया। -------तो आप मुझसे या किशी अन्य भारतीय से विशेषकर ब्राह्मण/सवर्ण समाज से किस संवैधानिक नियम पालन की आशा करते हैं? अगर नियम पालन हो रहा है तो समझ लीजिये की जो कुछ हुआ वह त्याग और समर्पण से कम कुछ नहीं था और उसके लिए मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि ब्राह्मण, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर मिश्रा(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, मेरे ताऊ जी श्रद्धेय डॉ प्रेमचंद पाण्डेय(शिव) की भूरि-भूरि प्रसंशा और गुणगान होना चाहिए जिन्होंने सब कुछ जानते हुए भी मुझको प्रयागराज मानवता हित में में दफन हो जाने को कहा पर मेरा स्वयं का सुकार्यों से उपजे यश और तत्परिणाम स्वरुप लोगों के आशीर्वाद की शक्ति और बड़ों के आशीर्वाद ने इस 2003 में दफन हुए इस व्यक्ति को समाज में एक बहुत उच्च मानवमूल्य वाले स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया।

27 Daughters Day (4th Sunday of September) Special| बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान। आप की हर वयस्क लाडली को इस्वर माह में एक बार उसके शरीर को गंगा जल की तरह पवित्र बना देता है>>>>सम्मान सहित जीने की इक्षा रखने वाला वाला हर पिता-भाई और सम्बंधित बंधू-बांधव व् सखा(जो दो शरीर होकर भी एक मन और आत्मा हो निःस्वार्थ भाव में भी) को पता होना चाहिए की आप की हर वयस्क लाडली को इस्वर माह में एक बार उसके शरीर को गंगा जल की तरह पवित्र बना देता है तो रह जाता है मन जिसमे आप के कुलीन संस्कार भरे होते है पर यदि सामाजिक चकाचौंध, किशी पारिस्थितिक मजबूरी और अज्ञानता की वजन से उसके कदम गलत रास्ते पर चले जाते है वह एक-  दो चार दिन नहीं दो-चार वर्ष भी आप की पहुँच से बाहर हो जाए और इस दौरान उसका कौमार्य भंग को जाय(  ईश्वर करें की आप का संस्कार ऐसा गरिमामयी और अटूट आस्था का हो की आप की लाडली का मनोबल न टूटे और वह अपना मानसिक नियंत्रण न खोये), तो भी अगर आप की लाडली  तक आप की पहुँच हो पाती है या वह स्वयं आप तक पहुँचती है किशी तरह तब भी आप और आप के समाज(विशेष रूप) को अपनी उस लाडली  का किशी दूसरे ऐसे समाज के उस युवक से जो विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके व्युत्क्रम जाती/धर्म को सामाजिक, धार्मिक(धार्मिक रीती-रिवाज और नियम क़ानून को मानता हो या मानना स्वीकार किया हो) और संवैधानिक रूप से स्वीकार न किया हो उसके साथ जन्मजन्मांतर के लिए बलात्कार के लिए पुनः विवाह कर न भेंजें। क्योंकि इससे आप का मनोबल और आप का समाज तथा बंधू-बांधव और सखागण सबका मनोबल गिरता है और कुछ न कुछ मानसिक कष्ट और अवशाद आप के दूर दराज के लोगों को भी होता है जो सम्मान सहित जीवन जीना चाहते है इस दुनिया में। वैसे जब ईस्वर उसके शरीर को माह में एक बार गंगाजल की तरह पवित्र बना ही देता है तो फिर पुनः वापस आयी हुयी आप की लाडली का मनः परिवर्तन (Brain Wash) होना ही केवल जरूरी रह जाता है/ या होना होता है, जिसे आप सब बंधू-बांधव-सखा और सगे-सम्बन्धी कर सकते हैं। मेरा पुनः निवेदन है की किशी ब्राह्मण/सवर्ण की कन्या का शास्त्रीय नियमों के तहत किशी ईसाई/दलित युवक का पाँवपूजन विधि द्वारा हुए विवाह को समाज मान्यता न दे अगर वह विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके व्युत्क्रम जाती/धर्म को सामाजिक, धार्मिक(धार्मिक रीती-रिवाज और नियम क़ानून को मानता हो या मानना स्वीकार किया हो) और संवैधानिक रूप से स्वीकार न किया हो, चाहे इसे संवैधानिक न्यायलय या आर्यसमाज मान्यता भले देता हो। और गर ऐसा नहीं होता है तो फिर सामाजिक आधार पर आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था नहीं हो या उच्च सामाजिक वर्ग किशी महान कार्य की आशा न की जाय उसके नैतिक दायित्व को अधिक बताते हुए। ---सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी? क्या परनर का हाथ कुलीनस्त्री कभी धरेगी? पर अगर यह हो रहा है तो इसके प्रायोजक दंड और अपमान भुगतने के लिए तैयार हो जाए! क्योंकि ऐसा किशी सामान्य मानवीय और सामाजिक मान्य विधि से संभव नहीं वरन बलात गिरे हुए कृत्य से व्यक्तित्व को प्रभावित कर और गिराकर ही संभव है। और ऐसे लोग इतने गिरे होते हैं की उनको इस बात की चिंता करने की जरूरत ही नहीं की उनकी कन्या/स्त्री के साथ भी ऐसा हो सकता है उनसे भी गिरे किशी पशुवत/पतित मानव के द्वारा।----धर्मनिरपेक्षता का क़ानून कहता है कि हर धर्म की मौलिक नियमों की रक्षा की जाय तो मित्रों यदि किशी धर्म के किशी स्पस्ट और व्यापक मौलिक नियम की रक्षा यदि नहीं हुई, तो भारतीय संविधान जिस अशोकचक्र के बूते चल रहा वह अशोकचक्र टूटा की नहीं? अशोकचक्र टूटने की पूर्ण आशंका के तहत लव-कुश/हिन्दू-कुश ने अपना कार्य 2001 में पूर्ण किया था और उसके बाद भी अशोकचक्र तोड़ेजाने का प्रयास अनवरत जारी रहा और 2005/6 में अशोकचक्र टूटा ही कुछ विशेष ईसाई/दलित गठ जोड़ से और उसको सामाजिक और कानूनी मान्यता भी मिल गयी सनातन हिन्दू संस्कृति के मौलिक शास्त्रीय विवाह नियम का मजाक उठाते हुए मतलब धार्मिक और सामाजिक भ्रस्टाचार के साथ धर्मनिरपेक्ष देश में संवैधानिक भ्रस्टाचार को गंगाजल के सामान पवित्र और दूषण रहित तथा अनुकरणीय सिद्ध करते हुए महिमामंडित कर दिया गया। -------तो आप मुझसे या किशी अन्य भारतीय से विशेषकर ब्राह्मण/सवर्ण समाज से किस संवैधानिक नियम पालन की आशा करते हैं? अगर नियम पालन हो रहा है तो समझ लीजिये की जो कुछ हुआ वह त्याग और समर्पण से कम कुछ नहीं था और उसके लिए मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि ब्राह्मण, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर मिश्रा(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, मेरे ताऊ जी श्रद्धेय डॉ प्रेमचंद पाण्डेय(शिव) की भूरि-भूरि प्रसंशा और गुणगान होना चाहिए जिन्होंने सब कुछ जानते हुए भी मुझको प्रयागराज मानवता हित में में दफन हो जाने को कहा पर मेरा स्वयं का सुकार्यों से उपजे यश और तत्परिणाम स्वरुप लोगों के आशीर्वाद की शक्ति और बड़ों के आशीर्वाद ने इस 2003 में दफन हुए इस व्यक्ति को समाज में एक बहुत उच्च मानवमूल्य वाले स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया। 

Monday, September 28, 2015

27 Daughters Day (4th Sunday of September) बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान।Special| सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी? क्या परनर का हाथ कुलीनस्त्री कभी धरेगी? पर अगर यह हो रहा है तो इसके प्रायोजक दंड और अपमान भुगतने के लिए तैयार हो जाए! क्योंकि ऐसा किशी सामान्य मानवीय और सामाजिक मान्य विधि से संभव नहीं वरन बलात गिरे हुए कृत्य से व्यक्तित्व को प्रभावित कर और गिराकर ही संभव है। और ऐसे लोग इतने गिरे होते हैं की उनको इस बात की चिंता करने की जरूरत ही नहीं की उनकी कन्या/स्त्री के साथ भी ऐसा हो सकता है उनसे भी गिरे किशी पशुवत/पतित मानव के द्वारा। धर्मनिरपेक्षता का क़ानून कहता है कि हर धर्म की मौलिक नियमों की रक्षा की जाय तो मित्रों यदि किशी धर्म के किशी स्पस्ट और व्यापक मौलिक नियम की रक्षा यदि नहीं हुई, तो भारतीय संविधान जिस अशोकचक्र के बूते चल रहा वह अशोकचक्र टूटा की नहीं? अशोकचक्र टूटने की पूर्ण आशंका के तहत लव-कुश/हिन्दू-कुश ने अपना कार्य 2001 में पूर्ण किया था और उसके बाद भी अशोकचक्र तोड़ेजाने का प्रयास अनवरत जारी रहा और 2005/6 में अशोकचक्र टूटा ही कुछ विशेष ईसाई/दलित गठ जोड़ से और उसको सामाजिक और कानूनी मान्यता भी मिल गयी सनातन हिन्दू संस्कृति के मौलिक शास्त्रीय विवाह नियम का मजाक उठाते हुए मतलब धार्मिक और सामाजिक भ्रस्टाचार के साथ धर्मनिरपेक्ष देश में संवैधानिक भ्रस्टाचार को गंगाजल के सामान पवित्र और दूषण रहित तथा अनुकरणीय सिद्ध करते हुए महिमामंडित कर दिया गया। -------तो आप मुझसे या किशी अन्य भारतीय से विशेषकर ब्राह्मण/सवर्ण समाज से किस संवैधानिक नियम पालन की आशा करते हैं? अगर नियम पालन हो रहा है तो समझ लीजिये की जो कुछ हुआ वह त्याग और समर्पण से कम कुछ नहीं था और उसके लिए मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि ब्राह्मण, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर मिश्रा(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, मेरे ताऊ जी श्रद्धेय डॉ प्रेमचंद पाण्डेय(शिव) की भूरि-भूरि प्रसंशा और गुणगान होना चाहिए जिन्होंने सब कुछ जानते हुए भी मुझको प्रयागराज मानवता हित में में दफन हो जाने को कहा पर मेरा स्वयं का सुकार्यों से उपजे यश और तत्परिणाम स्वरुप लोगों के आशीर्वाद की शक्ति और बड़ों के आशीर्वाद ने इस 2003 में दफन हुए इस व्यक्ति को समाज में एक बहुत उच्च मानवमूल्य वाले स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया। लेकिन मेरा निवेदन है की पुनः किशी ब्राह्मण/सवर्ण की कन्या का शास्त्रीय नियमों के तहत किशी ईसाई/दलित युवक का पाँवपूजन विधि द्वारा हुए विवाह को समाज मान्यता न दे अगर वह विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके व्युत्क्रम जाती/धर्म को सामाजिक, धार्मिक(धार्मिक रीती-रिवाज और नियम क़ानून को मानता हो या मानना स्वीकार किया हो) और संवैधानिक रूप से स्वीकार न किया हो, चाहे इसे संवैधानिक न्यायलय या आर्यसमाज मान्यता भले देता हो, और गर ऐसा नहीं होता है तो फिर सामाजिक आधार पर आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था नहीं हो या उच्च सामाजिक वर्ग किशी महान कार्य की आशा न की जाय उसके नैतिक दायित्व को अधिक बताते हुए। --- सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी? क्या परनर का हाथ कुलीनस्त्री कभी धरेगी? पर अगर यह हो रहा है तो इसके प्रायोजक दंड और अपमान भुगतने के लिए तैयार हो जाए! क्योंकि ऐसा किशी सामान्य मानवीय और सामाजिक मान्य विधि से संभव नहीं वरन बलात गिरे हुए कृत्य से व्यक्तित्व को प्रभावित कर और गिराकर ही संभव है। और ऐसे लोग इतने गिरे होते हैं की उनको इस बात की चिंता करने की जरूरत ही नहीं की उनकी कन्या/स्त्री के साथ भी ऐसा हो सकता है उनसे भी गिरे किशी पशुवत/पतित मानव के द्वारा।

27 Daughters Day (4th Sunday of September) बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान।Special| सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी? क्या परनर का हाथ कुलीनस्त्री कभी धरेगी? पर अगर यह हो रहा है तो इसके प्रायोजक दंड और अपमान भुगतने के लिए तैयार हो जाए! क्योंकि ऐसा किशी सामान्य मानवीय और सामाजिक मान्य विधि से संभव नहीं वरन बलात गिरे हुए कृत्य से व्यक्तित्व को प्रभावित कर और गिराकर ही संभव है। और ऐसे लोग इतने गिरे होते हैं की उनको इस बात की चिंता करने की जरूरत ही नहीं की उनकी कन्या/स्त्री के साथ भी ऐसा हो सकता है उनसे भी गिरे किशी पशुवत/पतित मानव के द्वारा। धर्मनिरपेक्षता का क़ानून कहता है कि हर धर्म की मौलिक नियमों की रक्षा की जाय तो मित्रों यदि किशी धर्म के किशी स्पस्ट और व्यापक मौलिक नियम की रक्षा यदि नहीं हुई, तो भारतीय संविधान जिस अशोकचक्र के बूते चल रहा वह अशोकचक्र टूटा की नहीं? अशोकचक्र टूटने की पूर्ण आशंका के तहत लव-कुश/हिन्दू-कुश ने अपना कार्य 2001 में पूर्ण किया था और उसके बाद भी अशोकचक्र तोड़ेजाने का प्रयास अनवरत जारी रहा और 2005/6 में अशोकचक्र टूटा ही कुछ विशेष ईसाई/दलित गठ जोड़ से और उसको सामाजिक और कानूनी मान्यता भी मिल गयी सनातन हिन्दू संस्कृति के मौलिक शास्त्रीय विवाह नियम का मजाक उठाते हुए मतलब धार्मिक और सामाजिक भ्रस्टाचार के साथ धर्मनिरपेक्ष देश में संवैधानिक भ्रस्टाचार को गंगाजल के सामान पवित्र और दूषण रहित तथा अनुकरणीय सिद्ध करते हुए महिमामंडित कर दिया गया। -------तो आप मुझसे या किशी अन्य भारतीय से विशेषकर ब्राह्मण/सवर्ण समाज से किस संवैधानिक नियम पालन की आशा करते हैं? अगर नियम पालन हो रहा है तो समझ लीजिये की जो कुछ हुआ वह त्याग और समर्पण से कम कुछ नहीं था और उसके लिए मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि ब्राह्मण, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर मिश्रा(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, मेरे ताऊ जी श्रद्धेय डॉ प्रेमचंद पाण्डेय(शिव) की भूरि-भूरि प्रसंशा और गुणगान होना चाहिए जिन्होंने सब कुछ जानते हुए भी मुझको प्रयागराज मानवता हित में में दफन हो जाने को कहा पर मेरा स्वयं का सुकार्यों से उपजे यश और तत्परिणाम स्वरुप लोगों के आशीर्वाद की शक्ति और बड़ों के आशीर्वाद ने इस 2003 में दफन हुए इस व्यक्ति को समाज में एक बहुत उच्च मानवमूल्य वाले स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया। लेकिन मेरा निवेदन है की पुनः किशी ब्राह्मण/सवर्ण की कन्या का शास्त्रीय नियमों के तहत किशी ईसाई/दलित युवक का पाँवपूजन विधि द्वारा हुए विवाह को समाज मान्यता न दे अगर वह विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके व्युत्क्रम जाती/धर्म को सामाजिक, धार्मिक(धार्मिक रीती-रिवाज और नियम क़ानून को मानता हो या मानना स्वीकार किया हो) और संवैधानिक रूप से स्वीकार न किया हो, चाहे इसे संवैधानिक न्यायलय या आर्यसमाज मान्यता भले देता हो, और गर ऐसा नहीं होता है तो फिर सामाजिक आधार पर आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था नहीं हो या उच्च सामाजिक वर्ग किशी महान कार्य की आशा न की जाय उसके नैतिक दायित्व को अधिक बताते हुए। --- सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी? क्या परनर का हाथ कुलीनस्त्री कभी धरेगी? पर अगर यह हो रहा है तो इसके प्रायोजक दंड और अपमान भुगतने के लिए तैयार हो जाए! क्योंकि ऐसा किशी सामान्य मानवीय और सामाजिक मान्य विधि से संभव नहीं वरन बलात गिरे हुए कृत्य से व्यक्तित्व को प्रभावित कर और गिराकर ही संभव है। और ऐसे लोग इतने गिरे होते हैं की उनको इस बात की चिंता करने की जरूरत ही नहीं की उनकी कन्या/स्त्री के साथ भी ऐसा हो सकता है उनसे भी गिरे किशी पशुवत/पतित मानव के द्वारा।

Sunday, September 27, 2015

27 Daughters Day (4th Sunday of September)|बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान। Special| पूरी रामायण ख़त्म हुई पर सीता के बाप कौन थे? तो मित्रों जब जनक=पिता=बाप ही सीता के बाप थे तो सीता जैसी पुत्री के बाप को भी जानना और खोजना होगा? तो बाबा डॉ. अभय चंद पाण्डेय मेरे प्रथम पुत्र के जन्म पर होने वाले अखंड रामचरित मानस पाठ में शामिल होने आये थे अपने ठिकाने से और बोले बेटा विवेक पत्थर पर दूब निकल आयी है मेरे इस बात को ध्यान करना और अपनी संतति और समाज को आगे ले जाना। मेरी ईस्वर से यही शुभकामना और तुम्हारे परिवार के स्वर्णिम भविष्य का अाशीर्वाद है। >>>>मैंने सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा/सती/पारवती को अर्पित होने वाला या उनका आहार) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा, डॉ. अभय चंद पाण्डेय अभी तक आह्वाहन नहीं किया था पर मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण नाना, श्रद्धेय पारसनाथ से अगर कुछ ज्यादा नहीं तो कुछ कम इस मानव समाज को नहीं दिए हैं। दोनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जन संघ, विश्वहिंदू परिषद् और भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ जीवन में जहां जहां से सम्बंधित रहे हर स्थान पर मानवता को संरक्षित करने का ही प्रयास किया। मै इतना सौभाग्यशाली था की इन दोनों का ह्रदय से आशीर्वाद और दूर भले रहते रहे हों विचारों मुझे प्रभावित किये रहे और जब भी मिलना हुआ पैर छू कर उनका अाशीर्वाद जो ग्रहण किया तो यह सारी कायनात मुझे समझ न पायी मानवता हित में मेरा त्याग, बलिदान और समर्पण कितना हो सकता है और मुझमे कितनी ऊर्जा और सहनशीलता है। लेकिन मित्रो यह सब इन दोनो का मुझे पर उतना ही प्रभाव था जितना की मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा जी, श्रीश्रीधर(विष्णु) मिश्रा और परमपिता परमेश्वर डॉ प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय का और यही कारन था की मुझे सामाजिक कार्यों में उतनी ही रूचि रही है जितनी की शिक्षा और शोध में और आप को आज तक के मेरे जीवन सूत्र में यह प्रतिबिम्ब परिलक्षित हो रहा है।

27  Daughters Day (4th Sunday of September)|बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान। Special|
पूरी रामायण ख़त्म हुई पर सीता के बाप कौन थे? तो मित्रों जब जनक=पिता=बाप ही सीता के बाप थे तो सीता जैसी पुत्री के बाप को भी जानना और खोजना होगा? तो बाबा डॉ. अभय चंद पाण्डेय मेरे प्रथम पुत्र के जन्म पर होने वाले अखंड रामचरित मानस पाठ में शामिल होने आये थे अपने ठिकाने से और बोले बेटा विवेक पत्थर पर दूब निकल आयी है मेरे इस बात को  ध्यान करना और अपनी संतति और समाज को आगे ले जाना।  मेरी ईस्वर से यही शुभकामना और तुम्हारे परिवार के स्वर्णिम भविष्य का अाशीर्वाद है। >>>>मैंने सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा/सती/पारवती को अर्पित होने वाला या उनका आहार)  पाण्डेय ब्राह्मण बाबा,  डॉ. अभय चंद पाण्डेय अभी तक आह्वाहन नहीं किया था पर मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण नाना, श्रद्धेय पारसनाथ से अगर कुछ ज्यादा नहीं तो कुछ कम इस मानव समाज को नहीं दिए हैं।  दोनों  ने  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जन संघ, विश्वहिंदू परिषद् और भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ जीवन में जहां जहां से सम्बंधित रहे हर स्थान पर मानवता को संरक्षित करने का ही प्रयास किया। मै इतना सौभाग्यशाली था की इन दोनों का ह्रदय से आशीर्वाद और दूर भले रहते रहे हों विचारों मुझे प्रभावित किये रहे और जब भी मिलना हुआ पैर छू कर उनका अाशीर्वाद जो ग्रहण किया तो यह सारी कायनात मुझे समझ न पायी मानवता हित में मेरा त्याग, बलिदान और समर्पण कितना हो सकता है और मुझमे कितनी ऊर्जा और सहनशीलता है।  लेकिन मित्रो यह सब इन दोनो का मुझे पर उतना ही प्रभाव था जितना की मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा जी, श्रीश्रीधर(विष्णु) मिश्रा और परमपिता परमेश्वर डॉ प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय का और यही कारन था की मुझे सामाजिक कार्यों में उतनी ही रूचि रही है जितनी की शिक्षा और शोध में और आप को आज तक के मेरे जीवन सूत्र में यह प्रतिबिम्ब परिलक्षित हो रहा है। 

Saturday, September 26, 2015

चाहे रघुवंशीय/इक्शाकुवंशीय((इक्शाकु+(इला=चन्द्रवंश)/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय हो या वृष्णिवंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय हो अगर ये दोनों समाज को नहीं नियंत्रित कर पा रहे हैं/ सकते/सके तो अपने पिता/बाबा मतलब सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण का सहयोग और आशीर्वाद लेने से हिचकना नहीं चाहिए और अगर लिए भी तो कोई एहसान उनपर नहीं किया गया यह तो मानवता की रक्षा हेतु किया गया है।

चाहे रघुवंशीय/इक्शाकुवंशीय((इक्शाकु+(इला=चन्द्रवंश))/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय हो या वृष्णिवंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय हो अगर ये दोनों समाज को नहीं नियंत्रित कर पा रहे हैं/ सकते/सके तो अपने पिता/बाबा मतलब सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण का सहयोग और आशीर्वाद लेने से हिचकना नहीं चाहिए और अगर लिए भी तो कोई एहसान उनपर नहीं किया गया यह तो मानवता की रक्षा हेतु किया गया है। 

जिस श्रीधर(विष्णु) मामा को मै अपना परमगुरु परमपिता परमेश्वर मानता था/हूँ/रहूँगा उनको ही मै अहीर(मानवता हित में ज्ञात तथ्य को छुपाने वाला) कहा था फोन पर भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में रहते हुए बिशुनपुर में बैठे हुए जब मुझे शांत करा रहे थे मुझसे सम्बंधित जानकारी सूत्रों द्वारा मिलने पर, परन्तु उसी बैंगलोर में रहते हुए ऑरकुट पर यह भी कहा था की इस दुनिया की सब रिध्धि-सिध्धि, गायत्री और गीता उन्ही की हैं, उन्ही का गुणगान करती हैं और समस्त जगत के साथ विशेष रूप से नारी जगत के रक्षक भी वही ही हैं तो समस्त नारी जगत उनका गुणगान क्यों न करे? और इस दुनिया की सब रिध्धि-सिध्धि, गायत्री और गीता हैं भी उन्ही की क्योंकि सरस्वती और ब्रह्मा के एक मात्र भौतिक पुत्र काशी के राजा दक्ष(ब्रह्मा) प्रजापति के परमेश्वर श्रीधर(विष्णु) ही हैं, जो दक्ष प्रजापति देवी सती/उमा/गिरिजा/पारवती/अपर्णा समेत समस्त नारी जगत के पिता हैं जिसमे देवों की माता/ कश्यप ऋषि की पत्नी अदिति भी शामिल हैं। अतः राजा दक्ष प्रजापति को हर संकट से उबरने वाले श्रीधर(विष्णु) का नारी जाती का शुभचिंतक होना स्वयं में ही निहित है, तो मेरा वाक्य सत्य ही था की रिध्धि-सिध्धि, गायत्री और गीता उन्ही की हैं और समस्त नारी समाज उन्ही का गुणगान करती हैं। देवों के देव महादेव/केदारेश्वर भी उन्ही में लीन रहते हैं और वे ही महादेव के परमास्था के देवादिदेव है पर श्रीधर(विष्णु) के भी परमास्था के देवादिदेव महादेव/केदारेश्वर ही हैं, अन्य कोई नहीं यह भी सत्य है। और यही एक मात्र कारन था मेरी श्रीधर(विष्णु) आस्था का की की 30-09-2010 सुबह 5- 11 बजे, दिन वृहस्पतिवार मेरे प्रथम पुत्र(+ 28-10-2013, शायं 8-12 बजे, दिन बुधवार द्वितीयपुत्र कृष्णकांत/राशिनाम वाशुदेव/बुधवारीय श्रीकृष्णजन्मास्ट्मी, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म बुधवार वाली अस्टमी को ही हुआ था रोहिणी नक्षत्र में) जन्म के उपरांत दोपहर को प्रयागराज उच्च न्यायलय द्वारा भगवान श्रीराम के पक्ष में लगभग पूर्ण फैसला आने के बावजूद विष्णुकांत/राशिनाम वेंकटेश नाम रखा मतलब विष्णु शब्द चुराया और विष्णुकांत इसलिए की भगवान श्रीराम जीवन के अंतिम समय तक परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) अवस्था सशरीर प्राप्त कर लिए थे। अतः विष्णु का स्वामी/(कांत) विष्णुकांत नाम रखा जो भगवान श्रीराम को ही निरूपित करता है सशरीर होने के नाते(और एक दूसरा कारन भी था की गाँव के घर में रामजी चाचा का होना)|

जिस श्रीधर(विष्णु) मामा को मै अपना परमगुरु परमपिता परमेश्वर मानता था/हूँ/रहूँगा उनको ही मै अहीर(मानवता हित में ज्ञात तथ्य को छुपाने वाला) कहा था फोन पर भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में रहते हुए बिशुनपुर में बैठे हुए जब मुझे शांत करा  रहे थे मुझसे सम्बंधित जानकारी सूत्रों द्वारा मिलने पर, परन्तु उसी बैंगलोर में रहते हुए ऑरकुट पर यह भी कहा था की  इस दुनिया की सब रिध्धि-सिध्धि, गायत्री और गीता उन्ही की हैं, उन्ही का गुणगान करती हैं और समस्त जगत के साथ विशेष रूप से नारी जगत के रक्षक भी वही ही हैं तो समस्त नारी जगत उनका गुणगान क्यों न करे? और इस दुनिया की सब रिध्धि-सिध्धि, गायत्री और गीता हैं भी उन्ही की क्योंकि सरस्वती और ब्रह्मा के एक मात्र भौतिक पुत्र  काशी के राजा दक्ष(ब्रह्मा) प्रजापति के परमेश्वर श्रीधर(विष्णु) ही हैं, जो दक्ष प्रजापति देवी सती/उमा/गिरिजा/पारवती/अपर्णा समेत समस्त नारी जगत के पिता हैं जिसमे देवों की माता/ कश्यप ऋषि की पत्नी अदिति भी शामिल हैं।  अतः राजा दक्ष प्रजापति को हर संकट से उबरने वाले  श्रीधर(विष्णु) का नारी जाती का शुभचिंतक होना स्वयं में ही निहित है, तो मेरा वाक्य सत्य ही था की रिध्धि-सिध्धि, गायत्री और गीता उन्ही की हैं और समस्त नारी समाज उन्ही का गुणगान करती हैं। देवों के देव महादेव/केदारेश्वर भी उन्ही में लीन रहते हैं और वे ही महादेव के परमास्था के देवादिदेव है पर श्रीधर(विष्णु) के भी परमास्था के देवादिदेव महादेव/केदारेश्वर ही हैं, अन्य कोई नहीं यह भी सत्य है। और यही एक मात्र कारन था मेरी श्रीधर(विष्णु) आस्था का की की 30-09-2010 सुबह 5- 11  बजे, दिन वृहस्पतिवार मेरे प्रथम पुत्र(+ 28-10-2013, शायं 8-12 बजे, दिन बुधवार द्वितीयपुत्र कृष्णकांत/राशिनाम वाशुदेव/बुधवारीय  श्रीकृष्णजन्मास्ट्मी, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म बुधवार वाली अस्टमी को ही हुआ था रोहिणी नक्षत्र में)  जन्म के उपरांत दोपहर को प्रयागराज उच्च न्यायलय द्वारा भगवान श्रीराम के पक्ष में लगभग पूर्ण फैसला आने के बावजूद विष्णुकांत/राशिनाम वेंकटेश नाम रखा मतलब विष्णु शब्द चुराया और विष्णुकांत इसलिए की भगवान श्रीराम जीवन के अंतिम समय तक परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) अवस्था सशरीर प्राप्त कर लिए थे। अतः विष्णु का स्वामी/(कांत) विष्णुकांत नाम रखा जो भगवान श्रीराम को ही निरूपित करता है सशरीर होने के नाते(और एक दूसरा कारन भी था की गाँव के घर में रामजी चाचा का होना)|  

मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

Tuesday, September 22, 2015

इतिहास का वह काल खंड बता दीजिये जब सामाजिक और आर्थिक असमानता न रही हो और न रहेगी? पर आर्थिक और सामाजिक रूप से असमानता लाने का जिम्मेदार जिस ब्राह्मण समुदाय को विश्व में माना जाता है वह केवल अखंड भारत में मात्र 10-12% और वर्तमान भारत में भी मुस्किल से केवल 15-18% है। तो भाई अब भी असमानता वही ला रहा इस प्रजातान्त्रिक जिसमे शासन हर नागरिक का माना जाता है देश में, तो यह मान लीजिये की सामाजिक और आर्थिक समानता हमेशा ही रहेगी। क्योंकि ब्राह्मणों में ही एक विशेष समान सांस्कृतिक कैटेगरी के लोग बनते जा रहे तो यह उनका एक विशेष सामाजिक स्तर बनता जा रहा है और इस प्रकार एक नया समाजिक स्तर मुँह बाए सबके सामने खड़ा है और आर्थिक को रोकने की हिम्मत विज्ञान नहीं कर सका जिसने सबको औसत साधन संपन्न बना दिया है समानता लाने के ही उद्देश्य से तो और कौन करेगा? यहाँ यह उल्लेखनीय है की जितनी सामाजिक समानता विज्ञान ने लाई है उतनी किशी सामाजिक नेतृत्व ने नहीं लाई है और यह वैज्ञानिक समुदाय सम्पूर्ण समुदाय का नगण्य हिस्सा मात्र है तो क्या उसे भी संख्याबल में भाव में तौला जाय जैसे की कुछ संख्याबल का लाभ लेने वाले नेता अक्सर बोलते फिरते हैं। जिन वैज्ञानिकों ने भारतीय विज्ञान की बुनियाद को बनाया क्या वे अभिजात्यवर्ग या ब्राह्मण/सवर्ण समुदाय से नहीं थे/हैं जिन्होंने सबको साधन सम्पन्न बना दिया हो मूलभूत सुविधाओं की दृस्टि से और एक औसत वैज्ञानिक मूलभूत सुविधाओं, विधियों और वैश्विक वैज्ञानिक सूत्रों से युक्त किया भावी वैज्ञानिकों को जो सभी सामाजिक वर्ग से आते हैं। Note: आज भी वे स्थान जहां ब्राह्मणों की संख्या ज्यादा है और यदि वे सक्रीय हैं स्थानीय रूप से और उनकी वहां कुछ सुनवाई होती है तो स्वाभाविक रूप से अधिकांसतः ऐसे स्थान सांस्कृतिक रूप से भारत और इस विश्व में उच्च स्थान रखते है।

इतिहास का वह काल खंड बता दीजिये जब सामाजिक और आर्थिक असमानता न रही हो और न रहेगी? पर आर्थिक और सामाजिक रूप से असमानता लाने का जिम्मेदार जिस ब्राह्मण समुदाय को विश्व में माना जाता है वह केवल अखंड भारत में मात्र 10-12% और वर्तमान भारत में भी मुस्किल से केवल 15-18% है। तो भाई अब भी असमानता वही ला रहा इस प्रजातान्त्रिक जिसमे शासन हर नागरिक का माना जाता है देश में, तो यह मान लीजिये की सामाजिक और आर्थिक समानता हमेशा ही रहेगी। क्योंकि ब्राह्मणों में ही एक विशेष समान सांस्कृतिक कैटेगरी के लोग बनते जा रहे तो यह उनका एक विशेष सामाजिक स्तर बनता जा रहा है और इस प्रकार एक नया समाजिक स्तर मुँह बाए सबके सामने खड़ा है और आर्थिक को रोकने की हिम्मत विज्ञान नहीं कर सका जिसने सबको औसत साधन संपन्न बना दिया है समानता लाने के ही उद्देश्य से तो और कौन करेगा? यहाँ यह उल्लेखनीय है की जितनी सामाजिक समानता विज्ञान ने लाई है उतनी किशी सामाजिक नेतृत्व ने नहीं लाई है और यह वैज्ञानिक समुदाय सम्पूर्ण समुदाय का नगण्य हिस्सा मात्र है तो क्या उसे भी संख्याबल में भाव में तौला जाय जैसे की कुछ संख्याबल का लाभ लेने वाले नेता अक्सर बोलते फिरते हैं। जिन वैज्ञानिकों ने भारतीय विज्ञान की बुनियाद को बनाया क्या वे अभिजात्यवर्ग या ब्राह्मण/सवर्ण समुदाय से नहीं थे/हैं जिन्होंने सबको साधन सम्पन्न बना दिया हो मूलभूत सुविधाओं की दृस्टि से और एक औसत वैज्ञानिक मूलभूत सुविधाओं, विधियों और वैश्विक वैज्ञानिक सूत्रों से युक्त किया भावी वैज्ञानिकों को जो सभी सामाजिक वर्ग से आते हैं। Note: आज भी वे स्थान जहां ब्राह्मणों की संख्या ज्यादा है और यदि वे सक्रीय हैं स्थानीय रूप से और उनकी वहां कुछ सुनवाई होती है तो स्वाभाविक रूप से अधिकांसतः ऐसे स्थान सांस्कृतिक रूप से भारत और इस विश्व में उच्च स्थान रखते है। 

विश्व में धर्म परिवर्तन कर्ताओं(हिन्दू/सनातन हिन्दू से अन्य धर्म में) और उनके समर्थको: इस विश्व को गैर ब्राह्मणों और गैर हिन्दुओं ने अपने कब्जे में ले रखा है तो संपूर्ण विश्व को औसतन आर्थिक और सामाजिक रूप से कम से भारत से अधिक समृद्ध क्यों नहीं बनाया जा सका है?

विश्व में धर्म परिवर्तन कर्ताओं(हिन्दू/सनातन हिन्दू से अन्य धर्म में) और उनके समर्थको: इस विश्व को गैर ब्राह्मणों और गैर हिन्दुओं ने अपने कब्जे में ले रखा है तो संपूर्ण विश्व को औसतन आर्थिक और सामाजिक रूप से कम से भारत से अधिक समृद्ध क्यों नहीं बनाया जा सका है? 

कुछ देशों के बहुत बड़े समाज शास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा भारत में आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग की कागजी हिमायत बहुत की जाती है पर उनके देश में भारत के अभिजात्यवर्ग या हर वर्ग के सबसे आगे की पंक्ति के लोगों को आमंत्रण और वीजा सबसे अधिक दिया जाता है पर भारत के सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को आमंत्रण और वीजा क्यों नहीं दिया जाता है। अगर ऐसा होता है तो वे भी आर्थिक और सामजिक रूप से समपन्न हो जाएंगे और उनका धर्म परिवर्तन कराने वाले लोग भी शान्ति से जीवन काटेंगे और उन सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी अपनी कलम नहीं चलानी पड़ेगी और भारत सरकार का भी काम आसान हो जाएगा। क्या मात्र कागजी हिमायत करना एक सांस्कृतिक वार नहीं?

कुछ देशों के बहुत बड़े समाज शास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा भारत में आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग की कागजी हिमायत बहुत की जाती है पर उनके देश में भारत के अभिजात्यवर्ग या हर वर्ग के सबसे आगे की पंक्ति के लोगों को आमंत्रण और वीजा सबसे अधिक दिया जाता है पर भारत के सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को आमंत्रण और वीजा क्यों नहीं दिया जाता है। अगर ऐसा होता है तो वे भी आर्थिक और सामजिक रूप से समपन्न हो जाएंगे और उनका धर्म परिवर्तन कराने वाले लोग भी शान्ति से जीवन काटेंगे और उन सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी अपनी कलम नहीं चलानी पड़ेगी और भारत सरकार का भी काम आसान हो जाएगा। क्या मात्र कागजी हिमायत करना एक सांस्कृतिक वार नहीं?

ब्राह्मण/सवर्ण समुदाय द्वारा ईसाई/दलित का पाँवपूजन करके कन्यादान देते हुए शास्त्रीय नियम से पुत्री का विवाह (जो की शास्त्रीय नियमों का स्वयं में उल्लंघन है) कर देने से सामाजिक सौहार्द बढ़ना होता तो कब का बढ़ गया होता। सामाजिक सच्चाई को स्वीकार कर लेना ही सामाजिक सौहार्द बढ़ा सकता है इसके सिवा कोई प्रयास हो वह व्यर्थ होगा। सामाजिक सच्चाई यह है की कि सांस्कारिक समानता जो पारिवारिक मूल्यों पर निर्भर करती है उसको झूंठलाया नहीं जा सकता है जिसको बदलने में वर्षों लग जाते हैं। और जो संस्कारवान हैं या समय के साथ साथ अपने संस्कार की भी अभिवृद्धि कर रहे हैं वे आर्थिक और सामाजिक रूप से ब्राह्मण/सवर्ण समुदाय की औसत समानता और संपन्नता प्राप्त हो जाने पर स्वयं स्वीकार कर लेते हैं की कि उनकी आवश्यक आवश्यकता पूर्ण हो चुकी है। पर जिसमे संस्कार का स्तर ही निन्न है उसकी भूंख है की मिटती ही नहीं है चाहे आप अपने पूरे परिवार को उसके परिवार में विलीन कर दो, "पाँवपूजन करके कन्यादान देते हुए शास्त्रीय नियम से पुत्री का विवाह", तो बहुत सामान्य क्रम है। अतः सामाजिक सौहार्द्र को बढ़ावा देने के लिए हम अपने संस्कार ही मिटा दें तो यह हमारी कैसी सम्पन्नता और कैसा सांस्कृतिक विकाश वरन यह तो हमारा कूप मंडूप होना मात्र ही है। सामने वाला अपने संस्कार और अधिकार नहीं छोड़ रहा है और हम हैं की अपनी रही सही संस्कृति और संस्कार ही मिटाये जा रहे है। इसे आप का मतिभ्रम नंगापन कहेंगे

ब्राह्मण/सवर्ण समुदाय द्वारा ईसाई/दलित का पाँवपूजन करके कन्यादान देते हुए शास्त्रीय नियम से पुत्री का विवाह (जो की शास्त्रीय नियमों का स्वयं में उल्लंघन है) कर देने से सामाजिक सौहार्द बढ़ना होता तो कब का बढ़ गया होता। सामाजिक सच्चाई को स्वीकार कर लेना ही सामाजिक सौहार्द बढ़ा सकता है इसके सिवा कोई प्रयास हो वह व्यर्थ होगा। सामाजिक सच्चाई यह है की कि सांस्कारिक समानता जो पारिवारिक मूल्यों पर निर्भर करती है उसको झूंठलाया नहीं जा सकता है जिसको बदलने में वर्षों लग जाते हैं। और जो संस्कारवान हैं या समय के साथ साथ अपने संस्कार की भी अभिवृद्धि कर रहे हैं वे आर्थिक और सामाजिक रूप से ब्राह्मण/सवर्ण समुदाय की औसत समानता और संपन्नता प्राप्त हो जाने पर स्वयं स्वीकार कर लेते हैं की कि उनकी आवश्यक आवश्यकता पूर्ण हो चुकी है। पर जिसमे संस्कार का स्तर ही निन्न है उसकी भूंख है की मिटती ही नहीं है चाहे आप अपने पूरे परिवार को उसके परिवार में विलीन कर दो, "पाँवपूजन करके कन्यादान देते हुए शास्त्रीय नियम से पुत्री का विवाह", तो बहुत सामान्य क्रम है। अतः सामाजिक सौहार्द्र को बढ़ावा देने के लिए हम अपने संस्कार ही मिटा दें तो यह हमारी कैसी सम्पन्नता और कैसा सांस्कृतिक विकाश वरन यह तो हमारा कूप मंडूप होना मात्र ही है। सामने वाला अपने संस्कार और अधिकार नहीं छोड़ रहा है और हम हैं की अपनी रही सही संस्कृति और संस्कार ही मिटाये जा रहे है। इसे आप का मतिभ्रम नंगापन कहेंगे 

Monday, September 21, 2015

हैदराबाद/तमिलनाडु के दलित/ईसाई भाई लोग अब मेरी विषयवार मेरिट के बारे में श्री सत्यनारायण जी सही न्याय करेंगे यदि उन दिनों में जैसा मेरा विरोध और असहयोग हुआ था उसी तरह इनका भी असहयोग और विरोध किया जाय इस प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय में। वैसे इनको केवल इस संस्था को चलाना मात्र है न की कोई सृजन करना और न तो स्वयं इसके साथ शोध करना है जो दूसरों के ही पर निर्भर भी करता है। मुझे आशा है की दि उन दिनों में जैसा मेरा विरोध और असहयोग हुआ था उसी तरह इनका भी असहयोग और विरोध किया जाय इस प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय में तो जो कार्य सिम्हाद्री=नरसिंघा किये है उसका उचित प्रतिउत्तर श्री सत्यनारायण जी के माध्यम से मिलेगा। वैसे मेरे पिताजी श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय एक सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण थे पर प्रदीप का मतलब सूर्यकान्त/रामजानकी/लक्ष्मीनारायण/लक्ष्मी कांत/श्रीकांत/श्रीधर/विष्णु/सत्यनारायण ही होता है। क्या सत्यनारायण का सत्य पालन विना कालचक्र/समयचक्र/धर्मचक्र/अशोकचक्र के हो सकता है? तो उत्तर आता है की नहीं तो फिर कालचक्र के धारणकर्ता कौन है? तो उत्तर फिर वही आता है की महादेव/शिव| तो फिर शिव आधार हुए स्वयं ब्रह्मा और विष्णु के की नहीं? जब वास्तविक स्थिति में ब्रह्मा के आधार स्वयं विष्णु ही हों। शिव=पञ्च तत्व, विष्णु=पञ्च तत्व समायोजन और ब्रह्मा=समायोजित पंचतत्व का सृस्टिगत कार्यों में उपयोग।>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>मेरे शिक्षा का यह वह दौर था जब गाँव के केंद्र में रहने वाले मेरे मामा के घर को केंद्र बना राजनीती को गरमाने का कार्य प्रयागराज से जारी था जो 2013 में समाप्त हुआ है। 74% अंक के साथ प्रथम स्थान प्राप्त राष्ट्रीय माध्यमिक विद्यालय/नेशनल इण्टर कालेज पट्टिनरेन्द्रपुर(राष्ट्रीय मेरिट छात्रवृत्ति उच्चतर शिक्षा तक:1081/91), कई कालेजों से आये लगभग दो सौ छात्रों के इण्टर में प्रवेश हेतु परीक्षा में प्रथम स्थान और लगातार दो वर्ष के सत्र में कक्षा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भीषण उदर और वात पीड़ा से ग्रस्त रहने के बावजूद जिसमे शिक्षकों की विषय शिक्षा को कक्ष में छोड़कर कई बार बाहर आना पड़ा था और रात में पढाई छोड़कर सो जाना पड़ता था और इसका कोई इलाज नहीं हो सका था लगभग दो वर्ष तक जो इण्टर की परिक्षा में 58% अंक के साथ कालेज में द्वितीय स्थान तो जाहिर है यह सामूहिक छति थी औसत मूल्यांकन के कारन अन्यथा केवल एक मात्र नियमित छात्र ही 60% अंक का पाल्हा मात्र न छूता। और इस प्रकार उत्तीर्ण हुए मात्र 13 छात्रों का ही नहीं वरन अन्य उत्तीर्ण न हो सकने वाले छात्रों का भी कृतिम अंक रहा होगा ऐसी मेरी धारणा है। विज्ञान स्नातक में उसी इण्टर कालेज जिसमे इण्टर की परिक्षा दी थी उसी से जुड़े गांधी स्मारक महाविद्यालय में 69% अंक के साथ द्वितीय स्थान रहा उसी शक्ति के साथ परिक्षा होने पर भी और इसके साथ ही राष्ट्रीय सैन्य शिक्षा प्रशिक्षण (NCC) में 96 यू. पी. बी एन, जौनपुर-वाराणसी/काशी में प्रथम स्थान तथा विज्ञान परास्नातक में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सिम्हाद्री=नरसिंघा की कृपा पात्रता से 59% अंक का होना भी कृतिम अंक है इण्टर मीडिएट की ही तरह जिसका प्रमाण है की मेरे प्रयोगात्मक में श्रेष्ठ प्रदर्शन होने के बावजूद मेरा 13 लोगों में 8वां अंक स्थान था प्रयोगात्मक परिक्षा में जिसमे की परीक्षक पीठ थप-थपाकर शाबासी दिया हो।

हैदराबाद/तमिलनाडु के दलित/ईसाई भाई लोग अब मेरी विषयवार मेरिट के बारे में श्री सत्यनारायण जी सही न्याय करेंगे यदि उन दिनों में जैसा मेरा विरोध और असहयोग हुआ था उसी तरह इनका भी असहयोग और विरोध किया जाय इस प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय में। वैसे इनको केवल इस संस्था को चलाना मात्र है न की कोई सृजन करना और न तो स्वयं इसके साथ शोध करना है जो दूसरों के ही पर निर्भर भी करता है।  मुझे आशा है की दि उन दिनों में जैसा मेरा विरोध और असहयोग हुआ था उसी तरह इनका भी असहयोग और विरोध किया जाय इस प्रयागराज और प्रयागराज विश्वविद्यालय में तो जो कार्य सिम्हाद्री=नरसिंघा किये है उसका उचित प्रतिउत्तर श्री सत्यनारायण जी के माध्यम से मिलेगा।  वैसे मेरे पिताजी श्री प्रदीप कुमार पाण्डेय एक सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण थे पर प्रदीप का मतलब सूर्यकान्त/रामजानकी/लक्ष्मीनारायण/लक्ष्मी कांत/श्रीकांत/श्रीधर/विष्णु/सत्यनारायण ही होता है। क्या सत्यनारायण का सत्य पालन विना कालचक्र/समयचक्र/धर्मचक्र/अशोकचक्र के हो सकता है? तो उत्तर आता है की नहीं तो फिर कालचक्र के धारणकर्ता कौन है?  तो उत्तर फिर वही आता है की महादेव/शिव|  तो फिर शिव आधार हुए स्वयं ब्रह्मा और विष्णु के की नहीं?  जब वास्तविक स्थिति में ब्रह्मा के आधार स्वयं विष्णु ही हों। शिव=पञ्च तत्व, विष्णु=पञ्च तत्व समायोजन और ब्रह्मा=समायोजित पंचतत्व का सृस्टिगत कार्यों में उपयोग।>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>मेरे शिक्षा का यह वह दौर था जब गाँव के केंद्र में रहने वाले मेरे मामा के घर को केंद्र बना राजनीती को गरमाने का कार्य प्रयागराज से जारी था जो 2013 में समाप्त हुआ है। 74% अंक के साथ प्रथम स्थान प्राप्त राष्ट्रीय माध्यमिक विद्यालय/नेशनल इण्टर कालेज पट्टिनरेन्द्रपुर(राष्ट्रीय मेरिट छात्रवृत्ति उच्चतर शिक्षा तक:1081/91),  कई कालेजों से आये लगभग दो सौ छात्रों के इण्टर में प्रवेश हेतु परीक्षा में प्रथम स्थान और लगातार दो वर्ष के सत्र में कक्षा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भीषण उदर और वात पीड़ा से ग्रस्त रहने के बावजूद जिसमे शिक्षकों की विषय शिक्षा को कक्ष में छोड़कर कई बार बाहर आना पड़ा था और रात में पढाई छोड़कर सो जाना पड़ता था और इसका कोई इलाज नहीं हो सका था लगभग दो वर्ष तक जो  इण्टर की परिक्षा में 58% अंक के साथ कालेज में द्वितीय स्थान तो जाहिर है यह सामूहिक छति थी औसत मूल्यांकन के कारन अन्यथा केवल एक मात्र नियमित छात्र ही 60% अंक का पाल्हा मात्र न छूता। और इस प्रकार उत्तीर्ण हुए मात्र 13 छात्रों का ही नहीं वरन अन्य उत्तीर्ण न हो सकने वाले छात्रों का भी कृतिम अंक रहा होगा ऐसी मेरी धारणा है। विज्ञान स्नातक में उसी इण्टर कालेज जिसमे इण्टर की परिक्षा दी थी उसी से जुड़े गांधी स्मारक महाविद्यालय में 69% अंक के साथ द्वितीय स्थान रहा उसी शक्ति के साथ परिक्षा होने पर भी और इसके साथ ही राष्ट्रीय सैन्य शिक्षा प्रशिक्षण (NCC) में 96 यू. पी. बी एन, जौनपुर-वाराणसी/काशी में प्रथम स्थान तथा विज्ञान परास्नातक में  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सिम्हाद्री=नरसिंघा की कृपा पात्रता से 59% अंक का होना भी कृतिम अंक है इण्टर मीडिएट की ही तरह जिसका प्रमाण है की मेरे प्रयोगात्मक में श्रेष्ठ प्रदर्शन होने के बावजूद मेरा 13 लोगों में 8वां अंक स्थान था प्रयोगात्मक परिक्षा में जिसमे की परीक्षक पीठ थप-थपाकर शाबासी दिया हो। 

आदरणीय मेरिट/प्रतिभा(मतलब प्रयागराजविश्वविद्यालय और प्रयागराज), आप की मेरिट और मेरिट प्रदर्शन का आधार भी मै हूँ। अगर परिस्थितिओं को ध्यान में रखा जाय तो मेरी स्वयं की मेरिट इस संसार में किशी से कम नहीं थी और न तो है, पर देखने का अंदाज होना चाहिए, पर इसके लिए आप लोगों को केवल बाँस बुद्धि नहीं वरन मेरी तरह उपर्युक्त प्रकार से आधार भी बनना पडेगा, जो मेरे सामने आयी परिस्थितिओं के अनुसार आप लोगों से किशी भी जीवन में संभव नहीं है। अगर अभी तक आप लोगों की समझ में न आया हो इतना सब कहने के बावजूद की कि एक सनातन ब्राह्मण/सनातन हिन्दू का स्थान कोई ईसाइयत और इस्लाम नहीं ले सकता है तो और मेरी केवल विषयवार मेरी मेरिट क्यों गिरती चली गयी हाई स्कूल में बाद; और हद तब हो गयी जब परास्नातक में भी मुझसे कम अंक पाने वालों की भी विषयवार मेरिट शोध पत्र प्रकासन के द्वारा ही सही मुझसे ज्यादा हो गयी हो तो आप समझ सकते है की स्वाभिमान अगर मेरा भी झुक जाता; और मै भी विदेशी सत्ता के आगे नत हो जाता या विदेश गमन का प्रस्ताव स्वीकार कर लेता भारतीय विज्ञान संस्थान में 2008 में, तो मेरी मेरिट पर प्रश्नचिन्ह न लगता? पर स्वाभिमान नहीं झुकना क्या मेरिट को बढ़ावा नहीं देता है केवल विषय और विषय शोध सम्बन्धी मेरिट के सापेक्ष? तो मेरी वही मेरिट सही; पर झुकना उस दुनिया के सामने जो अज्ञानतावश पुत्रवत व्यवहार किया, यह संभव नहीं। अब तो सैद्धांतिक रूप से पिता तुल्य व्यवहार ही होगा ऐसी दुनिया और उन लोगों से भी होगा जो मेरे पूज्य रहे है उन दिनों और आज भी पूज्य हैं, पर एक सामान्य जीवन में सभ्य व्यक्ति बन सज्जनतापूर्ण जीवन जीने के प्रयास में रहता हूँ और उसमे सैद्धांतिक रूप से हर किशी के सामने झुकता हूँ, जो उन दिनों में अपने से उम्र और विचार में श्रेष्ठ रहे हों , जिसके लिए स्वयं नियति से ही अनुमति प्राप्त होती है। एक सनातन ब्राह्मण/सनातन हिन्दू का स्थान कोई ईसाइयत और इस्लाम नहीं ले सकता है इसको सार्वजनिक रूप से किशी ने व्यवहारिक जीवन जीते हुए अभी तक क्यों नही कह सका और क्या है जो मई इसे सार्वजनिक रूप से कहते हुए चुनौती दे रहा हूँ। 2013 से आज तक 2015 ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" में दिए सन्देश, 2007 -2009 तक भारतीय विज्ञान संस्थान में ऑरकुट में दिए सन्देश के समानार्थक था जिसने वहां की सब मेरिट को एक नव सन्देश दिया था जो अपने में एक भूचाल से कम असर नहीं किया। यह वही स्थान था जहाँ 2008 में ही सितम्बर, 2007 में प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज का मेरा कार्य पूर्ण बता मुझे भारत से बाहर दुनिया के किशी भी देश में जाने हेतु पूर्ण व्यवस्था देने तक की बात कुछ समूह विशेष के लोगों न की थी। मतलब प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज से 8 वर्ष आगे चलता है समसामयिक व्यवहार और वैश्विक परिदृश्य में। तो 8 वर्ष पीछे रहने वाले मेरा क्या निर्णय करेंगे और मेरिट देखेंगे? मै तो प्रयागराज की दार्शनिक दुनिया को केवल प्रणाम करता हूँ और सप्तर्षियों के उद्गम स्थल को अपना उद्गम स्थल समझ प्रणाम करता हूँ, न की विशेष जनों के ही दुष्कर्मों से शेष बची सत्ता और दूसरों के त्याग और बलिदान की सृजनात्मक सत्ता को अपनी सत्ता कहने वाले तपस्वियों और न की उस सत्ता पर दूकान चलाने वाले तपस्वियों को प्रणाम करता हूँ। ---इरादा केवल एक और एक है की या तो ह्रदय परिवर्तन होगा प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज का या महादेव/शिव भी प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज छोड़ेंगे जब इसके मूलदेव विष्णु और ब्रह्मा स्वयं इसे छोड़ दिए हो व्यथित हो।

आदरणीय मेरिट/प्रतिभा(मतलब प्रयागराजविश्वविद्यालय और प्रयागराज),
आप की मेरिट और मेरिट प्रदर्शन का आधार भी मै हूँ। अगर परिस्थितिओं को ध्यान में रखा जाय तो मेरी स्वयं की मेरिट इस संसार में किशी से कम नहीं थी और न तो है, पर देखने का अंदाज होना चाहिए, पर इसके लिए आप लोगों को केवल बाँस बुद्धि नहीं वरन मेरी तरह उपर्युक्त प्रकार से आधार भी बनना पडेगा, जो मेरे सामने आयी परिस्थितिओं के अनुसार आप लोगों से किशी भी जीवन में संभव नहीं है। अगर अभी तक आप लोगों की समझ में न आया हो इतना सब कहने के बावजूद की कि एक सनातन ब्राह्मण/सनातन हिन्दू का स्थान कोई ईसाइयत और इस्लाम नहीं ले सकता है तो और मेरी केवल विषयवार मेरी मेरिट क्यों गिरती चली गयी हाई स्कूल में बाद; और हद तब हो गयी जब परास्नातक में भी मुझसे कम अंक पाने वालों की भी विषयवार मेरिट शोध पत्र प्रकासन के द्वारा ही सही मुझसे ज्यादा हो गयी हो तो आप समझ सकते है की स्वाभिमान अगर मेरा भी झुक जाता; और मै भी विदेशी सत्ता के आगे नत हो जाता या विदेश गमन का प्रस्ताव स्वीकार कर लेता भारतीय विज्ञान संस्थान में 2008 में, तो मेरी मेरिट पर प्रश्नचिन्ह न लगता? पर स्वाभिमान नहीं झुकना क्या मेरिट को बढ़ावा नहीं देता है केवल विषय और विषय शोध सम्बन्धी मेरिट के सापेक्ष? तो मेरी वही मेरिट सही; पर झुकना उस दुनिया के सामने जो अज्ञानतावश पुत्रवत व्यवहार किया, यह संभव नहीं। अब तो सैद्धांतिक रूप से पिता तुल्य व्यवहार ही होगा ऐसी दुनिया और उन लोगों से भी होगा जो मेरे पूज्य रहे है उन दिनों और आज भी पूज्य हैं, पर एक सामान्य जीवन में सभ्य व्यक्ति न सज्जनतापूर्ण जीवन जीने के प्रयास में रहता हूँ और उसमे सैद्धांतिक रूप से हर किशी के सामने झुकता हूँ, जो उन दिनों में अपने से उम्र और विचार में श्रेष्ठ रहे हों , जिसके लिए स्वयं नियति से ही अनुमति प्राप्त होती है। एक सनातन ब्राह्मण/सनातन हिन्दू का स्थान कोई ईसाइयत और इस्लाम नहीं ले सकता है इसको सार्वजनिक रूप से किशी ने व्यवहारिक जीवन जीते हुए अभी तक क्यों नही कह सका और क्या है जो मई इसे सार्वजनिक रूप से कहते हुए चुनौती दे रहा हूँ। 2013 से आज तक 2015 ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" में दिए सन्देश, 2007 -2009 तक भारतीय विज्ञान संस्थान में ऑरकुट में दिए सन्देश के समानार्थक था जिसने वहां की सब मेरिट को एक नव सन्देश दिया था जो अपने में एक भूचाल से कम असर नहीं किया। यह वही स्थान था जहाँ 2008 में ही सितम्बर, 2007 में प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज का मेरा कार्य पूर्ण बता मुझे भारत से बाहर दुनिया के किशी भी देश में जाने हेतु पूर्ण व्यवस्था देने तक की बात कुछ समूह विशेष के लोगों न की थी। मतलब प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज से 8 वर्ष आगे चलता है समसामयिक व्यवहार और वैश्विक परिदृश्य में। तो 8 वर्ष पीछे रहने वाले मेरा क्या निर्णय करेंगे और मेरिट देखेंगे? मै तो प्रयागराज की दार्शनिक दुनिया को केवल प्रणाम करता हूँ और सप्तर्षियों के उद्गम स्थल को अपना उद्गम स्थल समझ प्रणाम करता हूँ, न की विशेष जनों के ही दुष्कर्मों से शेष बची सत्ता और दूसरों के त्याग और बलिदान की सृजनात्मक सत्ता को अपनी सत्ता कहने वाले तपस्वियों और न की उस सत्ता पर दूकान चलाने वाले तपस्वियों को प्रणाम करता हूँ। ---इरादा केवल एक और एक है की या तो ह्रदय परिवर्तन होगा प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज का या महादेव/शिव भी प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज छोड़ेंगे जब इसके मूलदेव विष्णु और ब्रह्मा स्वयं इसे छोड़ दिए हो व्यथित हो।
http://archive.is/7ocui
https://archive.is/4HDpi
http://archive.is/aKXW
http://prabook.org/web/person-view.html?profileId=116713
http://wpedia.goo.ne.jp/enwiki/Vivek_Kumar_Pandey
http://www.allduniv.ac.in/index.php?option=com_k2&view=item&layout=item&id=786
https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur
https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Dr._Vivek_Kumar_Pandey.JPG

अगर मै पुत्रवत एक-एक की मेरिट बताना सुरु किया तो क्या होगा इस समाज का? जिनके कारन मेरी विषयवार तथा विषयशोधवार मेरिट या तो गिरी या बढ़ न सकी।  क्योंकि जिस परिस्थिति में था उस समय लक्ष्य विशेष और मेरे सम्पूर्ण जीवन से जुड़े सब सब पहलू में केवल सही और गलत करने वाले को ही मै पहचानने की विशेष विद्या और ज्ञान से परिपूर्ण हुआ। तो कौन सही और कौन गलत मुझे सब पता है पर जब जाने और अनजाने अपने और पराये सब किशी न किशी हद तक गलती के भागीदार रहे और अपने भी मेरे और पराये भी मेरे ठहर गए तो क्या मै यह संसार छोड़ दूँ ? और सबको आप से परिचित कराऊँ किसके कारन मेरी विषयवार मेरिट का यह हाल है ? अतः विषयवार मेरिट की विवेचना को यही छोड़िये और अपनी वास्तविक मेरिट पर आइये जो आप के जीवन के हर क्षेत्र से लेकर आप के विषयवार मेरिट को आंकलित करते हुए बनती है।   

Thursday, September 17, 2015

अब शायद मेरे लिए बहुत कुछ कहना शेष नहीं रहा पर यह मेरा सन्यास लेना नहीं है सामाजिक चेतना तंत्र माध्यम से विचार को प्रसारित करने का। आप को मेरा सन्देश "Vivekanand and Modern Tradition" व्यापक अर्थ और व्यापक भाव में सामाजिक और धार्मिक के साथ जीवन के अन्य क्षेत्र में भी कुछ सीमा तक जरूर उपयोग में आएगा ऐसी आशा के साथ इसे लिखना कुछ समय तक निलंबित करता हूँ।---------ईसाइयत और इस्लाम यह भूल कभी न करे की की हिंदुत्व को समाप्त कर वे इसका स्थान ले सकते हैं इस विश्व में जिसमे विशेष रूप से ईसाइयत का पूरी दुनिया को अपने आगोस में लेने का प्रयास जो बीसवी सदी के अंतिम दिनों में और योजनाबद्ध तरीके के 2001 के प्रारम्भ में और आगे भी जारी रहा वह मेरे जैसे व्यक्तित्व का उनके पास विकल्प न होने से अपने औंधे मुह गिरता रहा और पुनः उनको पीछे लौटना पड़ा तथा अपनी तथाकथित महाशक्ति का मूल्यांकन करना पड़ा जिसको ढाल बना वे अपने को अजेय समझ रहे थे। मेरा ईसाइयत और इस्लाम से कोई शत्रुता नहीं है न तो उनकी संप्रभुता पर हम कोई वार करते हैं, न किये हैं और न वार करने के इक्षुक है, पर हम उनको भी अपने से मतांतरित समुदाय/सम्प्रदाय समझते है और इस हेतु हम स्वयं उनसे नियंत्रित न होकर सनातन हिन्दू संस्कृति से स्वयं इस विश्व को नियंत्रित करना चाहते है। छल और बल से हांसिल की हुई सम्पति, संप्रभुता तथा मानवीय शक्ति(मानव संख्याबल) उसी प्रकार अपने काम नहीं आती जैसे छल और बल की अधिकता उसी कुनबे जिसको इस प्रकार हांसिल किया गया था स्वयं उस कुनबे(मानव महासंघ) को नष्ट कर देती है। मतलब जिस समाज के साथ छल-बल से उसे छल-बल का प्रयोग करने वाला हांसिल किया था उस समाज को उसका अंश एक न एक दिन किसी प्रकार से वापस अवश्य आता है और अधिकाँश विश्वजनमत गैर हिन्दू होकर भी सनातन हिन्दू संस्कृति अपने में समाहित किये हुए है और उसी में पुनः मिलना चाहता है चाहे अपने जाती/धर्म/सम्प्रदाय के आडम्बर वह कितना ही दिखाता हो। --------आइये हम सब मूल सनातन हिन्दू संस्कृति के लोग अपनी इस मूल संतान हिन्दू संस्कृति में वापस आ जाय हमारा चोला चाहे किशी भी जाती/धर्म/सम्प्रदाय या मत-मतान्तर का क्यों न हो।

अब शायद मेरे लिए बहुत कुछ कहना शेष नहीं रहा पर यह मेरा सन्यास लेना नहीं है सामाजिक चेतना तंत्र माध्यम से विचार को प्रसारित करने का। आप को मेरा सन्देश "Vivekanand and Modern Tradition" व्यापक अर्थ और व्यापक भाव में सामाजिक और धार्मिक के साथ जीवन के अन्य क्षेत्र में भी कुछ सीमा तक जरूर उपयोग में आएगा ऐसी आशा के साथ इसे लिखना कुछ समय तक निलंबित करता हूँ।---------ईसाइयत और इस्लाम यह भूल कभी न करे की की हिंदुत्व को समाप्त कर वे इसका स्थान ले सकते हैं इस विश्व में जिसमे विशेष रूप से ईसाइयत का पूरी दुनिया को अपने आगोस में लेने का प्रयास जो बीसवी सदी के अंतिम दिनों में और योजनाबद्ध तरीके के 2001 के प्रारम्भ में और आगे भी जारी रहा वह मेरे जैसे व्यक्तित्व का उनके पास विकल्प न होने से अपने औंधे मुह गिरता रहा और पुनः उनको पीछे लौटना पड़ा तथा अपनी तथाकथित महाशक्ति का मूल्यांकन करना पड़ा जिसको ढाल बना वे अपने को अजेय समझ रहे थे। मेरा ईसाइयत और इस्लाम से कोई शत्रुता नहीं है न तो उनकी संप्रभुता पर हम कोई वार करते हैं, न किये हैं और न वार करने के इक्षुक है, पर हम उनको भी अपने से मतांतरित समुदाय/सम्प्रदाय समझते है और इस हेतु हम स्वयं उनसे नियंत्रित न होकर सनातन हिन्दू संस्कृति से स्वयं इस विश्व को नियंत्रित करना चाहते है। छल और बल से हांसिल की हुई सम्पति, संप्रभुता तथा मानवीय शक्ति(मानव संख्याबल) उसी प्रकार अपने काम नहीं आती जैसे छल और बल की अधिकता उसी कुनबे जिसको इस प्रकार हांसिल किया गया था स्वयं उस कुनबे(मानव महासंघ) को नष्ट कर देती है। मतलब जिस समाज के साथ छल-बल से उसे छल-बल का प्रयोग करने वाला हांसिल किया था उस समाज को उसका अंश एक न एक दिन किसी प्रकार से वापस अवश्य आता है और अधिकाँश विश्वजनमत गैर हिन्दू होकर भी सनातन हिन्दू संस्कृति अपने में समाहित किये हुए है और उसी में पुनः मिलना चाहता है चाहे अपने जाती/धर्म/सम्प्रदाय के आडम्बर वह कितना ही दिखाता हो। --------आइये हम सब मूल सनातन हिन्दू संस्कृति के लोग अपनी इस मूल संतान हिन्दू संस्कृति में वापस आ जाय हमारा चोला चाहे किशी भी जाती/धर्म/सम्प्रदाय या मत-मतान्तर का क्यों न हो।  

Wednesday, September 16, 2015

Solar Dynasty(Suryavansh)>Vaivasvata Manu>Ikshvaku((+Moon Dynasty (Chandravansh)> ILLA))>ILLA(Man who became woman after sex exchange by biochemical process and who have his decedent as Pururavas)> Pururavas >Nahusha>Yayati(+ other five brother Yati, Samyati, Ayati, Viyati and Kriti)>> Yayati>Yadu>Yadavas|>>>>>> Ila to Illahabad(Illahas Vihar or Illa Aavas at the Region Jhoonshi=Sangam)>Allahabad which is the Prayagraj.>>> Thus the Moon Dynasty(Chandravansh) or Chandravanshiya are also from Kashyap Gotra as Sun or Surya is one of the Aditya(Son of Kahsyap and his second wife Aditya, whose son were also all Devas known as Aditya except the TRIDEV) and also a part of the Solar Dynasty but not from the Atri's son, Som or Somatrey Gotra. Even a lay man knows that Chandra(Moon)'s Kanti=Light comes from the Sun means Shashikant is also know as Sun or Surya. After Durvash Rishi's curs the Yaduvansh ruined, but the Brahmins and other devotees of the Lord Shri Krishna became the main cause to grow the Yaduvans again for whom the Lord Shri Krishna given name Ranchhor, by leaving the battle means for whom he physically left the Mathura for Kansha's father-in-law, Jarasandhi to make free his Brahmins and other devotees who were banned by Jarasandhi.

Solar Dynasty(Suryavansh)>Vaivasvata Manu>Ikshvaku((+Moon Dynasty (Chandravansh)> ILLA))>ILLA(Man who became woman after sex exchange by biochemical process and who have his decedent as Pururavas)> Pururavas >Nahusha>Yayati(+ other five brother Yati, Samyati, Ayati, Viyati and Kriti)>> Yayati>Yadu>Yadavas|>>>>>> Ila to Illahabad(Illahas Vihar or Illa Aavas at the Region Jhoonshi=Sangam)>Allahabad which is the Prayagraj.>>> Thus the Moon Dynasty(Chandravansh) or Chandravanshiya are also from Kashyap Gotra as Sun or Surya is one of the Aditya(Son of Kahsyap and his second wife Aditya, whose son were also all Devas known as Aditya except the TRIDEV) and also a part of the Solar Dynasty but not from the Atri's son, Som or Somatrey Gotra. Even a lay man knows that Chandra(Moon)'s Kanti=Light comes from the Sun means Shashikant is also know as Sun or Surya. After Durvash Rishi's curs the Yaduvansh ruined, but the Brahmins and other devotees of the Lord Shri Krishna became the main cause to grow the Yaduvans again for whom the Lord Shri Krishna given name Ranchhor, by leaving the battle means for whom he physically left the Mathura for Kansha's father-in-law, Jarasandhi to make free his Brahmins and other devotees who were banned by Jarasandhi. 

ऐसा महा युग परिवर्तन हुआ इन 14 वर्षों में की कि जिसमे विष्णु और ब्रह्मा प्रयागराज से क्रमसः आजमगढ़/काशी और काशी/काशी चले गए और महादेव/शिव काशी से प्रयागराज आ गए।

ऐसा महा युग परिवर्तन हुआ इन 14 वर्षों में की कि जिसमे विष्णु और ब्रह्मा प्रयागराज से क्रमसः आजमगढ़/काशी और काशी/काशी चले गए और महादेव/शिव काशी से प्रयागराज आ गए।  

जब तीनो शक्तियों(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) को मै धारण कर सकता था मतलब एक में ही संलयनित कर सकता था(जिसमे एक सीमा तक तीनो के सम्मिलन/स्थितिज ऊर्जा को एक स्थान पर केंद्रित करने हेतु आवस्यक क्षय ऊर्जा भी गतिज ऊर्जा के रूप में समाज हित में ही लगी थी मेरे भौतिक शरीर के साथ), ऐसे में जब इन तीन शक्तियों के मिलने ही मानवता रूपी पूर्णता या मानवता रूपी पूर्ण शून्य का निर्माण होता है तो फिर बचता क्या था जिसके लिए मेरे पक्ष वाले मेरे ही विनाश से डरते थे। मेरे भौतिक सशरीर का विनाश मेरी इक्षा पर निर्भर है या काल चक्र के अनुसार तब से ही नही अब से कम से कम 42 वर्ष है। एक महाविश्व परिवर्तन या महा समुद्रमंथन जो जारी था चौदह वर्ष से उसमे पक्ष भी मेरा और विपक्ष भी मेरा था। अज्ञानता वस सामूहिक रूप से पुरुषार्थ के टकराव के रूप में विनाश हो रहा था नकारात्कम ऊर्जा प्रयोग से, पर उसकी भरपाई/संरक्षण और नवनिर्माण मै कर रहा था। फिर भी मेरा पुरुषार्थ क्या है? इस पर अभी तक प्रश्नचिन्ह ही लग रहा है सबको एक महाविभीषिका से बचा नवजीवन और पुनर्जन्म देने वाले पर। क्योंकि उनके अनुमान की सीमा से पर होने से उनको विस्वास ही नहीं की ऐसा कोई हो सकता है क्या? ऐसा महा युग परिवर्तन हुआ इन 14 वर्षों में की कि जिसमे विष्णु और ब्रह्मा प्रयागराज से क्रमसः आजमगढ़/काशी और काशी/काशी चले गए और महादेव/शिव काशी से प्रयागराज आ गए।

जब तीनो शक्तियों(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) को मै धारण कर सकता था मतलब एक में ही संलयनित कर सकता था(जिसमे एक सीमा तक तीनो के सम्मिलन/स्थितिज ऊर्जा को एक स्थान पर केंद्रित करने हेतु आवस्यक क्षय ऊर्जा भी गतिज ऊर्जा के रूप में समाज हित में ही लगी थी मेरे भौतिक शरीर के साथ), ऐसे में जब इन तीन शक्तियों के मिलने ही मानवता रूपी पूर्णता या मानवता रूपी पूर्ण शून्य का निर्माण होता है तो फिर बचता क्या था जिसके लिए मेरे पक्ष वाले मेरे ही विनाश से डरते थे। मेरे भौतिक सशरीर का विनाश मेरी इक्षा पर निर्भर है या काल चक्र के अनुसार तब से ही नही अब से कम से कम 42 वर्ष है। एक महाविश्व परिवर्तन या महा समुद्रमंथन जो जारी था चौदह वर्ष से उसमे पक्ष भी मेरा और विपक्ष भी मेरा था। अज्ञानता वस सामूहिक रूप से पुरुषार्थ के टकराव के रूप में विनाश हो रहा था नकारात्कम ऊर्जा प्रयोग से, पर उसकी भरपाई/संरक्षण और नवनिर्माण मै कर रहा था। फिर भी मेरा पुरुषार्थ क्या है? इस पर अभी तक प्रश्नचिन्ह ही लग रहा है सबको एक महाविभीषिका से बचा नवजीवन और पुनर्जन्म  देने वाले पर। क्योंकि उनके अनुमान की सीमा से पर होने से उनको विस्वास ही नहीं की ऐसा कोई हो सकता है क्या?   ऐसा महा युग परिवर्तन हुआ इन 14 वर्षों में की कि जिसमे विष्णु और ब्रह्मा प्रयागराज से क्रमसः आजमगढ़/काशी और काशी/काशी चले गए और महादेव/शिव काशी से प्रयागराज आ गए।   

Tuesday, September 15, 2015

मंगला चरण:----- गणेश, सूर्यदेव, सरस्वती, भगवती दुर्गा/गौरी/त्रयम्बकी, त्रिदेवों में विष्णु और नारायण/विष्णु अवतार में वाशुदेव श्रीकृष्ण और दशरथ नंदन श्रीराम की स्तुति की जाती है। सरस्वती:---तुलसीदासजी ने अपने रामचरितमानस में लिखा है, धर्म से विरति, विरति से ज्ञाना। ज्ञान मोक्षप्रद वेद बखाना ॥ वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ भावार्थ:- शब्दों के अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और मंगलों को करने वाली श्री सरस्वती जी और श्री गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ। यस्योदये जगदिदं प्रतिबोधमेति, मध्यस्थिते प्रसरति प्रकॄतिक्रियासु। अस्तं गते स्वपिति चोच्छव्सितैकमात्रं, भावत्रये स जयति प्रकटप्रभाव: ॥ भावार्थ:- जिसके उदय होने पर समस्त संसार जागॄत हो जाता है, तथा मध्याकाश में पहुंचने पर समस्त जगत अपने कर्मों मे लग जाता है, और अस्त होने पर केवल श्वास और प्रतिश्वास हे महशूस हो, यानी जगत सो जाये, इस तरह से जिस देवता का प्रभाव प्रकट है, ऐसे भगवान सूर्य की जय हो ॥ गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थ जम्बूफल चारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम् ॥ भावार्थ:- श्री गणेशजी की महिमा का बखान करते वक्त जो भी स्मरण किया जाता है, उसमे भूत यानी पिछले इतिहास को याद करना जरूरी है,गण जो शरीर मे और संसार में सहायता देने के कारक हैं, साथ में अपना सहयोग देने को तत्पर हैं,भारत को जम्बू द्वीप के नाम से जाना जाता है, और जो भी फ़ल इसधरती पर हैं, उनको प्राप्त करने के लिये धर्म,अर्थ,काम, और मोक्ष रूपी सत,रज, और तम से मिश्रित साधनों के लिये उमा सुत यानी शक्ति पुत्र जो किसी भी प्रकार के तप्त साधन को सतुलित करने के बाद प्रयोगार्थ बनाते है, और किसी भी विघ्न को दूर करने के लिये शुरु से ही पाद यानी सबसे नीचे की श्रेणी से कार्य शुरु करने का उपक्रम मान लेना चाहिये. नीलाम्बुज श्यामल कोमलांगम, सीता समारोह पित वामभागम। पड़ौमहासायक चारु चापं, नामानि रामम रघुवंश नाथम।। सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्। येषांहृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः॥ तदेव लग्नं सुदिनं तदेव, ताराबलं चन्द्रबलं तदेव। विद्याबलं देवबलं तदेव, लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि॥ मंगलम भगवान् विष्णु, मंगलम गरुड़ध्वजः |मंगलम पुन्डरी काक्षो; मंगलायतनो हरि || सर्व मंगल मांग्लयै, शिवे सर्वार्थ साधिके | शरण्ये त्रयम्बके गौरी, नारायणी नमोस्तुते || सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥ धम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि॥ विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा। संग्रामे संगटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥ शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥ अभीप्सितार्थसिद्धयर्थं पूजितो यः सुरासुरै॥ सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतय नमः॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥ सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्। येषांहृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः॥ तदेव लग्नं सुदिनं तदेव, ताराबलं चन्द्रबलं तदेव। विद्याबलं देवबलं तदेव, लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि॥ लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः। येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मम॥ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपास्ते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ समृतेः सकलकल्याणं भाजनं यत्र जायते। पुरूषं तमजं नित्यं ब्रजामि शरमं हरित्॥ सर्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः। देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनः॥ विश्वेशं माधवंढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम्। वन्द काशीं गुहां गंगां भवनीं मणिकर्णिकाम्॥ वक्रतुण्ड महाकाय कोटि सूर्य सम प्रभ। निर्विध्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ (Meaning: 1: O Lord Ganesha, of Curved Trunk, Large Body, and with the Brilliance of a Million Suns, 2: Please Make All my Works Free of Obstacles, Always) विनायकम् गुरुं भानु ब्रह्म-विष्णु-महेश्वरा। सरस्वतीं प्रणम्यादौ सर्वकार्यार्थ सिद्धये॥ वसुदेवम् सुतं देव कंस चाणूरमर्दनम्। दवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥ शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमा माद्यां जगद्व्यापिनीं। वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्॥ हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां। वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदाम्॥ या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्र वस्त्रावृता। या वीणावरदण्डमण्डिकरा या श्वेतपद्मासना॥ या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥ ब्रह्मा मुरारि स्त्रिपुरन्त कारी भानुः शशी भुमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। अर्थात् वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है । यह जगत् भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योँकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है । इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है । उस पूर्ण मेँ से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है । ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

मंगला चरण:----- गणेश, सूर्यदेव, सरस्वती, भगवती दुर्गा/गौरी/त्रयम्बकी, त्रिदेवों में विष्णु और नारायण/विष्णु अवतार में वाशुदेव श्रीकृष्ण और दशरथ नंदन श्रीराम की स्तुति की जाती है।
सरस्वती:---तुलसीदासजी ने अपने रामचरितमानस में लिखा है, धर्म से विरति, विरति से ज्ञाना। ज्ञान मोक्षप्रद वेद बखाना ॥
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥
भावार्थ:- शब्दों के अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और मंगलों को करने वाली श्री सरस्वती जी और श्री गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ।
यस्योदये जगदिदं प्रतिबोधमेति, मध्यस्थिते प्रसरति प्रकॄतिक्रियासु। अस्तं गते स्वपिति चोच्छव्सितैकमात्रं, भावत्रये स जयति प्रकटप्रभाव: ॥
भावार्थ:- जिसके उदय होने पर समस्त संसार जागॄत हो जाता है, तथा मध्याकाश में पहुंचने पर समस्त जगत अपने कर्मों मे लग जाता है, और अस्त होने पर केवल श्वास और प्रतिश्वास हे महशूस हो, यानी जगत सो जाये, इस तरह से जिस देवता का प्रभाव प्रकट है, ऐसे भगवान सूर्य की जय हो ॥
गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थ जम्बूफल चारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम् ॥
भावार्थ:- श्री गणेशजी की महिमा का बखान करते वक्त जो भी स्मरण किया जाता है, उसमे भूत यानी पिछले इतिहास को याद करना जरूरी है,गण जो शरीर मे और संसार में सहायता देने के कारक हैं, साथ में अपना सहयोग देने को तत्पर हैं,भारत को जम्बू द्वीप के नाम से जाना जाता है, और जो भी फ़ल इसधरती पर हैं, उनको प्राप्त करने के लिये धर्म,अर्थ,काम, और मोक्ष रूपी सत,रज, और तम से मिश्रित साधनों के लिये उमा सुत यानी शक्ति पुत्र जो किसी भी प्रकार के तप्त साधन को सतुलित करने के बाद प्रयोगार्थ बनाते है, और किसी भी विघ्न को दूर करने के लिये शुरु से ही पाद यानी सबसे नीचे की श्रेणी से कार्य शुरु करने का उपक्रम मान लेना चाहिये.
नीलाम्बुज श्यामल कोमलांगम, सीता समारोह पित वामभागम। पड़ौमहासायक चारु चापं, नामानि रामम रघुवंश नाथम।। 
सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्। येषांहृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः॥ तदेव लग्नं सुदिनं तदेव, ताराबलं चन्द्रबलं तदेव। विद्याबलं देवबलं तदेव, लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि॥ मंगलम भगवान् विष्णु, मंगलम गरुड़ध्वजः |मंगलम पुन्डरी काक्षो; मंगलायतनो हरि ||
सर्व मंगल मांग्लयै, शिवे सर्वार्थ साधिके | शरण्ये त्रयम्बके गौरी, नारायणी नमोस्तुते ||
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा। संग्रामे संगटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
अभीप्सितार्थसिद्धयर्थं पूजितो यः सुरासुरै॥ सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतय नमः॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥
सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्। येषांहृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः॥
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव, ताराबलं चन्द्रबलं तदेव। विद्याबलं देवबलं तदेव, लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि॥
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः। येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मम॥
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपास्ते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
समृतेः सकलकल्याणं भाजनं यत्र जायते। पुरूषं तमजं नित्यं ब्रजामि शरमं हरित्॥
सर्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः। देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनः॥
विश्वेशं माधवंढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम्। वन्द काशीं गुहां गंगां भवनीं मणिकर्णिकाम्॥
वक्रतुण्ड महाकाय कोटि सूर्य सम प्रभ। निर्विध्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ (Meaning: 1: O Lord Ganesha, of Curved Trunk, Large Body, and with the Brilliance of a Million Suns, 2: Please Make All my Works Free of Obstacles, Always)
विनायकम् गुरुं भानु ब्रह्म-विष्णु-महेश्वरा। सरस्वतीं प्रणम्यादौ सर्वकार्यार्थ सिद्धये॥
वसुदेवम् सुतं देव कंस चाणूरमर्दनम्। दवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमा माद्यां जगद्व्यापिनीं।
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्॥
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदाम्॥
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्र वस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डिकरा या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
ब्रह्मा मुरारि स्त्रिपुरन्त कारी भानुः शशी भुमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु॥
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
अर्थात् वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है । यह जगत् भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योँकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है । इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है । उस पूर्ण मेँ से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है ।
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

Monday, September 14, 2015

पिता, दशरथ(कश्यप/मनु) के बचन की रक्षा हेतु कौशल्या/अदिति पुत्र रघुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय श्रीराम अपने अधिकार को छोड़ वन जा सकते हैं तथा गुरु, वशिष्ठ की आज्ञा मानकर धरती माँ में समाहित होने वाली सीता के लिए विलाप छोड़ धरती माँ को पलटने के लिए प्रत्यंचा पर चढ़ाया रामबाण वापस ले सकते हैं श्रीराम और कुछ समय पश्चात उसी धरती माँ की गोंद में बहने वाली सरयू में समाहित हो सकते हैं; देवकी नंदन वृष्णि वंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय/कश्यप गोत्रीय श्रीकृष्ण उद्धव के बुलावे पर बचपन से राक्षसी प्रवृति के लोगों द्वारा मारने का प्रयास करने वाले कंस के पास(द्वन्द युद्ध:हर तरह का द्वन्द) जा सकते हैं अपनी प्रियतम राधा को छोड़कर, जहाँ वे अपने माता(देवकी/अदिति)-पिता(कश्यप/मनु) समेत अन्य प्रजा जन के हित व् रक्षा हेतु कंस वध करते हैं इसके साथ ही साथ ब्राह्मणों और अन्य अपने भक्त जो कृष्ण नाम जाप करते रहते थे उनकी कंस के ससुर जरासन्धि से रक्षा हेतु कई वार विजयी होते हुए भी ब्राह्मण समाज और भक्त समाज की रक्षा हेतु दैहिक रूप से मथुरा छोड़ कर द्वारिका जा रन-छोर जैसे अपमानित नाम वाला कहला सकते हैं। तो मित्रों मै स्वयं सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा/सती/ अपर्णा/उमा/पारवती/गिरिजा का आहार/उन पर अर्पित होने वाला) पाण्डेय ब्राह्मण विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र (गिरधारी) अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा श्रीधर(विष्णु) और अपने परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण मेरे ताऊ जी डॉ. प्रेमचंद(शिव नामतः) हेतु क्या कुछ त्याग नहीं कर सकता था| बलिदान और तपश्या की ही बात ही क्या जब यही तक ही सीमित नहीं रहा? बलिदान और तपश्या तो मै सबके साथ कर ही रहा हूँ; और त्याग मै केवल अपनी ही पीढ़ी तक का नहीं तीन पीढ़ी के अरमानो का त्याग कर चुका हूँ और इस प्रकार बस्ती जनपद से आये हुए बाबा सारंगधर(शिव नामतः) के जिनको एक मुस्लिम(हिन्दू ) जागीरदार से पांच गाँव दान में मिले थे के अक्षर सह वचनो का पालन करने वाले पांच गावों में से एक मात्र कुल के कुलकमल का भी त्याग इस प्रयाग में हो चुका था। तो भाई कौन था, है और रहेगा जिसे मेरा विकल्प कहा जा सकता है समकालीन परिवेश में? लेकिन यह भूल कदापि सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) श्रीराम और श्रीकृष्ण को भी स्वीकार नहीं था की किशी भी स्थिति में उनके ईस्टदेव महादेव/महेश भोलेनाथ शिव शंकर की कभी मानहानि हो तो मै भी उसी महादेव के मानहानि रोकने हेतु ही आज भी उनके नाम हेतु अडिग हूँ हो सकता है की यह गुरु इक्षा के विपरीत हो? यद्यपि मुझे कोई लिखित आदेश प्राप्त नहीं हुआ है जिस पर विचार किया जा सके मेरे अंदर का भाव परिवर्तित करने हेतु। कारन मेरे लिए तत्कालीन महादेव स्वयं प्रेमचंद, विष्णु स्वयं श्रीधर और ब्रह्मा स्वयं सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी ही थे तो इन तीनों को एक साथ ला कर उनके बीच मेरे विचार प्रस्तुत हो। वैसे ब्रह्मा को भी विदित हो की मेघनाद का विलय जब श्रीराम में हो सकता है तो फिर मेघनाद का विलय महादेव में होना और आशान है क्योंकि महादेव की ही शक्ति थी जो उसके पूरे कुल में बोलती थी उसके पिता रावण समेत और जब श्रीराम ने रामेश्वरम में ज्योतिर्लिंग स्थापित करवा उससे भी बड़ी शिव भक्ति प्राप्त की थी तभी उसके पिता रावण का वध संभव हो सका था। तो मेघनाद का विलय महादेव/केदारेश्वर/आदिशंकर में क्यों न मान लिया जाय जिससे महादेव का मान हानि भी न हो और मेघनाद का सम्मान भी बना रहे?

पिता, दशरथ(कश्यप/मनु) के बचन की रक्षा हेतु कौशल्या/अदिति पुत्र रघुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय श्रीराम अपने अधिकार को छोड़ वन जा सकते हैं तथा गुरु, वशिष्ठ की आज्ञा मानकर धरती माँ में समाहित होने वाली सीता के लिए विलाप छोड़ धरती माँ को पलटने के लिए प्रत्यंचा पर चढ़ाया रामबाण वापस ले सकते हैं श्रीराम और कुछ समय पश्चात उसी धरती माँ की गोंद में बहने वाली सरयू में समाहित हो सकते हैं; देवकी नंदन वृष्णि वंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय/कश्यप गोत्रीय श्रीकृष्ण उद्धव के बुलावे पर बचपन से राक्षसी प्रवृति के लोगों द्वारा मारने का प्रयास करने वाले कंस के पास(द्वन्द युद्ध:हर तरह का द्वन्द) जा सकते हैं अपनी प्रियतम राधा को छोड़कर, जहाँ वे अपने माता(देवकी/अदिति)-पिता(कश्यप/मनु) समेत अन्य प्रजा जन के हित व् रक्षा हेतु कंस वध करते हैं इसके साथ ही साथ ब्राह्मणों और अन्य अपने भक्त जो कृष्ण नाम जाप करते रहते थे उनकी कंस के ससुर जरासन्धि से रक्षा हेतु कई वार विजयी होते हुए भी ब्राह्मण समाज और भक्त समाज की रक्षा हेतु दैहिक रूप से मथुरा छोड़ कर द्वारिका जा रन-छोर जैसे अपमानित नाम वाला कहला सकते हैं। तो मित्रों मै स्वयं सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा/सती/ अपर्णा/उमा/पारवती/गिरिजा का आहार/उन पर अर्पित होने वाला) पाण्डेय ब्राह्मण विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र (गिरधारी) अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा श्रीधर(विष्णु) और अपने परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण मेरे ताऊ जी डॉ. प्रेमचंद(शिव नामतः) हेतु क्या कुछ त्याग नहीं कर सकता था| बलिदान और तपश्या की ही बात ही क्या जब यही तक ही सीमित नहीं रहा? बलिदान और तपश्या तो मै सबके साथ कर ही रहा हूँ; और त्याग मै केवल अपनी ही पीढ़ी तक का नहीं तीन पीढ़ी के अरमानो का त्याग कर चुका हूँ और इस प्रकार बस्ती जनपद से आये हुए बाबा सारंगधर(शिव नामतः) के जिनको एक मुस्लिम(हिन्दू ) जागीरदार से पांच गाँव दान में मिले थे के अक्षर सह वचनो का पालन करने वाले पांच गावों में से एक मात्र कुल के कुलकमल का भी त्याग इस प्रयाग में हो चुका था। तो भाई कौन था, है और रहेगा जिसे मेरा विकल्प कहा जा सकता है समकालीन परिवेश में? लेकिन यह भूल कदापि सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) श्रीराम और श्रीकृष्ण को भी स्वीकार नहीं था की किशी भी स्थिति में उनके ईस्टदेव महादेव/महेश भोलेनाथ शिव शंकर की कभी मानहानि हो तो मै भी उसी महादेव के मानहानि रोकने हेतु ही आज भी उनके नाम हेतु अडिग हूँ हो सकता है की यह गुरु इक्षा के विपरीत हो? यद्यपि मुझे कोई लिखित आदेश प्राप्त नहीं हुआ है जिस पर विचार किया जा सके मेरे अंदर का भाव परिवर्तित करने हेतु। कारन मेरे लिए तत्कालीन महादेव स्वयं प्रेमचंद, विष्णु स्वयं श्रीधर और ब्रह्मा स्वयं सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी ही थे तो इन तीनों को एक साथ ला कर उनके बीच मेरे विचार प्रस्तुत हो। वैसे ब्रह्मा को भी विदित हो की मेघनाद का विलय जब श्रीराम में हो सकता है तो फिर मेघनाद का विलय महादेव में होना और आशान है क्योंकि महादेव की ही शक्ति थी जो उसके पूरे कुल में बोलती थी उसके पिता रावण समेत और जब श्रीराम ने रामेश्वरम में ज्योतिर्लिंग स्थापित करवा उससे भी बड़ी शिव भक्ति प्राप्त की थी तभी उसके पिता रावण का वध संभव हो सका था। तो मेघनाद का विलय महादेव/केदारेश्वर/आदिशंकर में क्यों न मान लिया जाय जिससे महादेव का मान हानि भी न हो और मेघनाद का सम्मान भी बना रहे?   

Friday, September 4, 2015

सबको नया जन्म और जीवन दान देने वाला गरीब तो फिर अमीर कौन था, है और रहेगा? देखने को तो ब्रह्मा और महादेव दोनों गरीब थे पूर्णसंप्रभु विष्णु को छोड़कर, फिर भी जितने देव , दानव, नर, किन्नर को वरदान ब्रह्मा और महेश ने दिए हैं उतना विष्णु ने नहीं दिए है यह अलग बात है की विष्णु का वरदान केवल सज्जनों के लिए ही रहा हो। तो दानवों को दिए वरदान ने ब्रह्मा और महेश को विष्णु से कम सम्प्रभु बना दिया तो फिर दानव को वरदान देना ब्रह्मा और महेश बंद कर दें तो वे भी सम्प्रभु हो सकते है। इस तथ्य का विशेष निहितार्थ है की विश्व में दानव कम तैयार किये जायँ तो समाज के लिए ब्रह्मा और महेश के प्रति भी विशेष स्नेह जागृत होगा केवल उनसे वे वरदान ही नहीं उनके सन्निकट भी जाना पसंद करेंगे। तो संसार ने किशी महादेव और ब्रह्मा को देखा जो किशी दानव को वरदान और शक्ति न दिए हों। मानवता के दानव को वरदान और मानवता के दानव को जीवन देने की जरूरत रह गयी है क्या इस आज के जीवन के परिप्रेक्ष में?

सबको नया जन्म और जीवन दान देने वाला गरीब तो फिर अमीर कौन था, है और रहेगा? देखने को तो ब्रह्मा और महादेव दोनों गरीब थे पूर्णसंप्रभु विष्णु को छोड़कर, फिर भी जितने देव , दानव, नर, किन्नर को वरदान ब्रह्मा और महेश ने दिए हैं उतना विष्णु ने नहीं दिए है यह अलग बात है की विष्णु का वरदान केवल सज्जनों के लिए ही रहा हो। तो दानवों को दिए वरदान ने ब्रह्मा और महेश को विष्णु से कम सम्प्रभु बना दिया तो फिर दानव को वरदान देना ब्रह्मा और महेश बंद कर दें तो वे भी सम्प्रभु हो सकते है। इस तथ्य का विशेष निहितार्थ है की विश्व में दानव कम तैयार किये जायँ तो समाज के लिए ब्रह्मा और महेश के प्रति भी विशेष स्नेह जागृत होगा केवल उनसे वे वरदान ही नहीं उनके सन्निकट भी जाना पसंद करेंगे। तो संसार ने किशी महादेव और ब्रह्मा को देखा जो किशी दानव को वरदान और शक्ति न दिए हों। मानवता के दानव को वरदान और मानवता के दानव को जीवन देने की जरूरत रह गयी है क्या इस आज के जीवन के परिप्रेक्ष में?

Thursday, September 3, 2015

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का। 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

RE:---मेरे द्वारा सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:

१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|

२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।

3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।

4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.

5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।-------------------सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।
http://vandemataramvivekananddrvkprssbhupuau.blogspot.in/

प्रयागराज विश्वविद्यालय वाशियों से ब्रह्मा भी गए/काशी हिन्दू विश्वविद्यालय/काशी और विष्णु/काशी हिन्दू विश्वविद्यालय/आजमगढ़ भी गए और अब मेरा और विरोध हुआ मेरे काशी जाने के लिए तो महादेव भी जाएंगे लेकिन वह भी मेरी इक्षा पर निर्भर है जौनपुर जाएंगे या काशी। जिसका जो भी लिया था मुझ विवेक/त्रिनेत्र/त्रयम्बक/त्रिलोचन ने अपनी शिव सीमा का सशरीर परमब्रह्म/श्रीराम/श्रीकृष्ण सीमा तक विस्तार के लिए सब वापस किया जा रहा और वापस किया भी जाएगा किशी सनातन हिन्दू धर्मी/सनातन धर्मी अपने को या अपने मूल को सनातन धर्मी मानने वाले उचित व्यति और उचित स्थान को। आप को वही ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा उनके सम्मिलित स्वरुप से उपजे श्रीराम और कृष्ण चाहिए जो सत्ता और धन, बल के आगे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से घुटने टेकें। यह अब मुझे पूर्ण रूपेण ज्ञात हो गया है और उसमे वह धन, बल और सत्ता वाले जो ईसाई और इस्लाम के इसारे पर चलती हो सनातन बहुसंख्यक हिन्दू केवल अपने निजी स्वार्थवस हाँ में हाँ मिलाने वाले रहते है। तो समझिए की वह भी जल्द ही पूरा होगा केवल मेरा विरोध करते रहिये और अपने घर आभासी राम और कृष्ण पैदा करते रहिये और उनकी पूजा करते रहिये तथा अपने मन का पुलाब तैयार करते हुए किशी को ब्रह्मा, विष्णु और महेश समझते रहिये। ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा इसकी सम्मिलित शक्ति से जनित सशरीर परमब्रह्म किशी की जी हुजूरी नहीं किया करते और स्थिर चित्त वाले होते हैं गंभीर से गंभीर समस्या के आ जाने अपर उसके निदान हेतु भी। कितने वास्तविक ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा श्रीराम और श्रीकृष्ण आपके थे और वे किस तरह से धन, बल और सत्ता के आगे घुटने टेक रहे थे और इस प्रकार विशेष रूप से ईसाई और कुछ संख्या में इस्लाम लोगों के इसारे पर मेरे विरोध में लामबंद हो रहे थे सब मैंने देखा था है। इस्लाम और ईसाइयत की इतनी इज्जत है आप में तो इस्लाम और ईसाइयत को ये बता दो की नंगेपण और अमानवीय कार्य को बढ़ावा और समर्थन देने वाला इस्लाम और ईसाइयत का अनुयायी हो ही नहीं सकता है। जिसमे मेरे सम्बन्ध में यह प्रचार किया था की मै मद्यप, चरित्रहीन, ऐयासवाज, दरिद्र(न की केवल गरीब), लालची और पागल है, वह एक दसक पूर्व किसके इसारे पर इस प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज में किया जा रहा था। क्या इतना कहने मै प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज छोड़ देता या किशी के धन, बल और सत्ता के आगे झुकने वाला था मै क्या। मेरा जो कार्य था मानवता हेतु वह इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज में रहकर पूर्ण किया मैं जिससे मै पूर्ण संतुस्ट हूँ। पर दल-दल में बनायी गयी इमारत खुद तो नीचे जाती है और जिस धरातल पर बनती है वह और भी नीचे चला जाता है वही हाल प्रयागराज विश्विद्यालय का हुआ पर यहाँ से दुनिया में एक क्रांति और विश्वपरिवर्तन किया गया सामाजिक रूप से मानवता का सृजन और संवर्धन, संरक्षण करते हुए वह हजारों वर्ष बाद ही होता है। जो चेतना विश्व एक गाँव को होने के लिए चाहिए वह पूर्ण करते हुए सनातन हिन्दू धर्म को दोनों प्रमुख धर्मो से जोड़ दिया गया और इस प्रकार एक वैश्विक सूत्र में पूरी विश्व मानवता का एक मंजु तैयार हो गया है। एक लम्बे समयांतराल पर वास्तविक श्रीराम और श्रीकृष्ण एक बार पुनः अपनी पूर्ण शक्ति के साथ प्रकट होंगे नामतः व्यक्ति के अंदर इस प्रयाग की धरा पर इस वचन के साथ मै पुनः अपने वैश्विक कार्य पर सन्तुस्टी व्यक्त करते हुए मेरे कार्य में संलग्न इस्लाम अनुयायी, अंतिम समय में ईसाइयत अनुयायी समेत सम्पूर्ण सनातन धर्म और शेष अन्य धर्म के लोगों को सादर साधुवाद एवं प्रणाम करता हूँ इस आशा के साथ की इस प्रयागराज की धरती को ब्रह्मा, विष्णु, और महेश था श्रीराम/कृष्ण का व्यापक सक्रिय नहीं पर आवश्यक सक्रीय स्वरुप पुनः देखने को मिलेगा। क्योंकि इतने कष्ट जो 14 वर्षों में हुए हैं वे बार-बार ऐसे किशी मानव को न सहने पड़े और न मानवता का इतना ह्रास हो कम से कम एक हजार वर्ष से कम में।********जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

प्रयागराज विश्वविद्यालय वाशियों से ब्रह्मा भी गए/काशी हिन्दू विश्वविद्यालय/काशी  और विष्णु/काशी हिन्दू विश्वविद्यालय/आजमगढ़ भी गए और अब मेरा और विरोध हुआ मेरे काशी जाने के लिए तो महादेव भी जाएंगे लेकिन वह भी मेरी इक्षा पर निर्भर है जौनपुर जाएंगे या काशी। जिसका जो भी लिया था मुझ विवेक/त्रिनेत्र/त्रयम्बक/त्रिलोचन ने अपनी शिव सीमा का सशरीर परमब्रह्म/श्रीराम/श्रीकृष्ण सीमा तक विस्तार के लिए सब वापस किया जा रहा और वापस किया भी जाएगा किशी सनातन हिन्दू धर्मी/सनातन धर्मी अपने को या अपने मूल को सनातन धर्मी मानने वाले उचित व्यति और उचित स्थान को। आप को  वही ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा उनके सम्मिलित स्वरुप से उपजे श्रीराम और कृष्ण चाहिए जो सत्ता और धन, बल के आगे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से घुटने टेकें। यह अब मुझे पूर्ण रूपेण ज्ञात हो गया है और उसमे वह धन, बल और सत्ता वाले जो ईसाई और इस्लाम के इसारे पर चलती हो सनातन बहुसंख्यक हिन्दू केवल अपने निजी स्वार्थवस हाँ में हाँ मिलाने वाले रहते है। तो समझिए की वह भी जल्द ही पूरा होगा केवल मेरा विरोध करते रहिये और अपने घर आभासी  राम और कृष्ण पैदा करते रहिये और उनकी पूजा करते रहिये तथा अपने मन का पुलाब तैयार करते हुए किशी को ब्रह्मा, विष्णु और महेश समझते रहिये। ब्रह्मा, विष्णु  और महेश तथा इसकी सम्मिलित शक्ति से जनित सशरीर परमब्रह्म किशी की जी हुजूरी नहीं किया करते और स्थिर चित्त वाले होते हैं गंभीर से गंभीर समस्या के आ जाने अपर उसके निदान हेतु भी। कितने वास्तविक ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा श्रीराम और श्रीकृष्ण आपके थे और वे किस तरह से धन, बल और सत्ता के आगे घुटने टेक रहे थे और इस प्रकार विशेष रूप से ईसाई और कुछ संख्या में इस्लाम लोगों के इसारे पर मेरे विरोध में लामबंद हो रहे थे सब मैंने देखा था है। इस्लाम और ईसाइयत की इतनी इज्जत है आप में तो इस्लाम और ईसाइयत को ये बता दो की नंगेपण और अमानवीय कार्य को बढ़ावा और समर्थन देने वाला इस्लाम और ईसाइयत का अनुयायी हो ही नहीं सकता है। जिसमे मेरे सम्बन्ध में यह प्रचार किया था की मै मद्यप, चरित्रहीन, ऐयासवाज, दरिद्र(न की केवल गरीब), लालची और पागल है, वह एक दसक पूर्व किसके इसारे पर इस प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज में किया जा रहा था। क्या इतना कहने मै प्रयागराज विश्वविद्यालय और प्रयागराज छोड़ देता या किशी के धन, बल और सत्ता के आगे झुकने वाला था मै क्या। मेरा जो कार्य था मानवता हेतु वह इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज में रहकर पूर्ण किया मैं जिससे मै पूर्ण संतुस्ट हूँ। पर दल-दल में बनायी गयी इमारत खुद तो नीचे जाती है और जिस धरातल पर बनती है वह और भी नीचे चला जाता है वही हाल प्रयागराज विश्विद्यालय का हुआ पर यहाँ से दुनिया में एक क्रांति और विश्वपरिवर्तन किया गया सामाजिक रूप से मानवता का सृजन और संवर्धन, संरक्षण करते हुए वह हजारों वर्ष बाद ही होता है। जो चेतना विश्व एक गाँव को होने के लिए चाहिए वह  पूर्ण करते हुए सनातन हिन्दू धर्म को दोनों प्रमुख धर्मो से जोड़ दिया गया और इस प्रकार एक वैश्विक सूत्र में पूरी विश्व मानवता का एक मंजु तैयार हो गया है। एक लम्बे समयांतराल पर वास्तविक श्रीराम और श्रीकृष्ण एक बार पुनः अपनी पूर्ण शक्ति के साथ प्रकट होंगे  नामतः व्यक्ति के अंदर इस प्रयाग की धरा पर इस वचन के साथ मै पुनः अपने वैश्विक कार्य पर सन्तुस्टी व्यक्त करते हुए मेरे कार्य में संलग्न इस्लाम अनुयायी, अंतिम समय में ईसाइयत अनुयायी समेत सम्पूर्ण सनातन धर्म और शेष अन्य धर्म के लोगों को सादर साधुवाद एवं प्रणाम करता हूँ इस आशा के साथ की इस प्रयागराज की धरती को ब्रह्मा, विष्णु, और महेश था श्रीराम/कृष्ण का व्यापक सक्रिय नहीं पर आवश्यक सक्रीय स्वरुप  पुनः देखने को मिलेगा। क्योंकि इतने कष्ट जो 14 वर्षों में हुए हैं वे बार-बार ऐसे किशी मानव को न सहने पड़े और न मानवता का इतना ह्रास हो कम से कम एक हजार वर्ष से कम में।********जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

जिस शुक्राचार्य को मेरे विरद्ध लगाया गया था उनके कम से कम दो हमसकल मुझे पता थे उस समय एक मेरे मामा के गाँव और मेरे अपने रिस्तेदार और मामा के ही रामानंद कुल से परन्तु दो तीन-चार पीढ़ी पहले के घर से और दूसरे उस समय जिस समय मुझे ज्ञात था भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर में। तो शुक्राचार्य को पता होना चाहिए की मै उनका गुरु स्वयं महादेव था अतः उनकी शुक्राचारी काम नहीं आयी। और गुरु शिष्य का नुक्सान कभी नहीं चाहता तो मुझसे उनका नुक्सान कुछ नहीं हुआ परन्तु उन्होंने मुझे परेशानी दे कर कुछ तनाव मुझे जरूर दिए पर उनके मेरी सीधी टक्कर न हो इस हेतु दिशा परिवर्तन ने मेरा प्रभाव और मेरी ख्याति दी और बढ़ा दी है। वैसे मुझे लगभग पूरा बिशुनपुर-223103, जौनपुर अपना भांजा मानता था और मामा जैसा प्रेम करता था पर मेरे मामा के घर से अमरनाथ, राजेंद्र, राधेश्याम मामा का चाहे जो सम्बन्ध रहा हो ग्रामीण सीमा के अंदर वे मेरे मामा की तरह ही प्रेम और अटूट विश्वास करते थे मेरे द्वारा किये गए हर आचरण की सार्थकता का, यह अलग था की वे मेरे लिए उतना कुछ प्रत्यक्ष नहीं कर सकते थे जितना की मेरे अपने सगे मामा, मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, श्रीश्रीधर मिश्र। यह अमरनाथ मामा का सम्बन्ध और परमात्मा मामा और मामी का मेरे प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम मेरे सम्बन्ध में शुक्राचारी भाई के लिए वरदान था विशेष रूप से मेरी सहन शीलता की सीमा इनके प्रति बढ़ाने में क्योंकि इनके हम शक्ल उनके भतीजे और पुत्र है। अपने शुक्राचारी गुण की अधिकता और शुक्राचारियों को विशेष लाभ पहुंचाने के कारन ही ये ब्रह्मा पद पाने से वंचित हो गए जबकि यह पद इनके ही गोत्र को ही मिला पर काशी/वाराणसी के हाँथ चला गया। अगर ये अपनी कुछ मानसिक गतिज ऊर्जा को मानसिक स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तित कर ले गए होते तो इनका स्वभाव यह न रहता और ये जोशी (ब्रह्मा) का परमपद लेते उनकी तरह शुक्रवारी होकर भी मतलब शुक्रवारी होकर भी शुक्राचारी न हो पाते और न शुक्राचारियों को कोई लाभ विशेष पहुंचा पाते। फिर भी भौतिक और सांसारिक रूप में इन्होने बहुत कुछ हांसिल किया है जोशी(ब्रह्मा) के नाम पर इनके गोत्र विशेष का होने के कारन।

जिस शुक्राचार्य को मेरे विरद्ध लगाया गया था उनके कम से कम दो हमसकल मुझे पता थे उस समय एक मेरे मामा के गाँव और मेरे अपने रिस्तेदार और मामा के ही रामानंद कुल से परन्तु दो तीन-चार पीढ़ी पहले के घर से और दूसरे उस समय जिस समय मुझे ज्ञात था भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर में। तो शुक्राचार्य को पता होना चाहिए की मै उनका गुरु स्वयं महादेव था अतः उनकी शुक्राचारी काम नहीं आयी। और गुरु शिष्य का नुक्सान कभी नहीं चाहता तो मुझसे उनका नुक्सान कुछ नहीं हुआ परन्तु उन्होंने मुझे परेशानी दे कर कुछ तनाव मुझे जरूर दिए पर उनके मेरी सीधी टक्कर न हो इस हेतु दिशा परिवर्तन ने मेरा प्रभाव और मेरी ख्याति दी और बढ़ा दी है। वैसे मुझे लगभग पूरा बिशुनपुर-223103, जौनपुर अपना भांजा मानता था और मामा जैसा प्रेम करता था पर मेरे मामा के घर से अमरनाथ, राजेंद्र, राधेश्याम मामा का चाहे जो सम्बन्ध रहा हो ग्रामीण सीमा के अंदर वे मेरे मामा की तरह ही प्रेम और अटूट विश्वास करते थे मेरे द्वारा किये गए हर आचरण की सार्थकता का, यह अलग था की वे मेरे लिए उतना कुछ प्रत्यक्ष नहीं कर सकते थे जितना की मेरे अपने सगे मामा, मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, श्रीश्रीधर मिश्र। यह अमरनाथ मामा का सम्बन्ध और परमात्मा मामा और मामी का मेरे प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम मेरे सम्बन्ध में शुक्राचारी भाई के लिए वरदान था विशेष रूप से मेरी सहन शीलता की सीमा इनके प्रति बढ़ाने में क्योंकि इनके हम शक्ल उनके भतीजे और पुत्र है। अपने शुक्राचारी गुण की अधिकता और शुक्राचारियों को विशेष लाभ पहुंचाने के कारन ही ये ब्रह्मा पद पाने से वंचित हो गए जबकि यह पद इनके ही गोत्र को ही मिला पर काशी/वाराणसी के हाँथ चला गया। अगर ये अपनी कुछ मानसिक गतिज ऊर्जा को मानसिक स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तित कर ले गए होते तो इनका स्वभाव यह न रहता और ये जोशी (ब्रह्मा) का परमपद लेते उनकी तरह शुक्रवारी होकर भी मतलब शुक्रवारी होकर भी शुक्राचारी न हो पाते और न शुक्राचारियों को कोई लाभ विशेष पहुंचा पाते। फिर भी भौतिक और सांसारिक रूप में इन्होने बहुत कुछ हांसिल किया है जोशी(ब्रह्मा) के नाम पर इनके गोत्र विशेष का होने के कारन।

एक बड़े भाई के लिए लगभग पूरा दक्षिण भारत/गोवा/कोंकण/मराठवाड़ा/गुजरात छोड़ दिया पर अब जब मई प्रयागराज में अपना केंद्र बना लिया तो अब बोला जा रहा है की दूसरे बड़े भाई के लिए प्रयागराज छोड़ दो और काशी चले जाओ वह रे शुक्राचार्य के ईसाइयत और कुछ सीमा विशेष तक मुस्लिम धर्म से आने वाले समर्थक।

एक बड़े भाई के लिए लगभग पूरा दक्षिण भारत/गोवा/कोंकण/मराठवाड़ा/गुजरात  छोड़ दिया पर अब जब मई प्रयागराज में अपना केंद्र बना लिया तो अब बोला जा रहा है की दूसरे बड़े भाई के लिए प्रयागराज छोड़ दो और काशी चले जाओ वह रे शुक्राचार्य के ईसाइयत और कुछ सीमा विशेष तक मुस्लिम धर्म से आने वाले समर्थक। 

बड़े भैया के समर्थक मतलब ईसाई भाई लोग कहते हैं की तुम्हारा सबसे बड़ा देवता तो दारु पीता है और मांस खाता है और नाचता है तो तुम ऐसे देवता मतलब महादेव/शिव/शंकर वाले धर्म को क्यों मानते हो पर इस प्रयाग में अपने को अपना केंद्र बनाकर उस सबसे बड़े देवता ने तो ऐसा कुछ नहीं किया। तो कम से कम जो कुछ सनातन धर्मी हिन्दू बचे हैं उनको तो हिन्दू बनकर रहने दीजिये बड़े भाई लोगों के समर्थक लोग।

बड़े भैया के समर्थक मतलब ईसाई भाई लोग कहते हैं की तुम्हारा सबसे बड़ा देवता तो दारु पीता है और मांस खाता है और नाचता है तो तुम ऐसे देवता मतलब महादेव/शिव/शंकर वाले धर्म को क्यों मानते हो पर इस प्रयाग में अपने को अपना केंद्र बनाकर उस सबसे बड़े देवता ने तो ऐसा कुछ नहीं किया। तो कम से कम जो कुछ सनातन धर्मी हिन्दू बचे हैं उनको तो हिन्दू बनकर रहने दीजिये बड़े भाई लोगों के समर्थक लोग।  

आज वैश्विक युग है हम विश्व के एक कोने में बैठे विश्व के किशी भी कोने से जुड़े है ऐसे में त्रिदेव भी विश्व व्यापक और सनातन धर्म या सनातन हिन्दू धर्म से ही होना चाहिए जो किशी भी स्थिति में अभय होकर निर्विवादित निर्णय लेते हुए मानवता हिट की किशी भी समस्या के समाधान हेतु समर्पित हो मानवता का कल्याण करा सके। त्रिदेव में से ही ब्रह्मा का परमपद भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय/काशी को जा रहा है जो पूर्व घोषित और सर्वविदित सनातन भारद्वाज/आंगिरस गोत्रीय को ही। जबकि त्रिदेव में से ही विष्णु के परमपद पर जिस सनातन गौतम गोत्रीय का पदाभिषेक किया गया है वह भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय/आजमगढ़ से ही है। लेकिन त्रिदेव में से शिव का परमपद अभी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय/प्रयागराज विश्वविद्यालय/जौनपुर/आजमगढ़/प्रयागराज के पास ही रहेगा। श्रीकृष्ण जन्मास्टमी को घोषणा करनी थी पर लगभग पूर्ण रूप से घोषणा आज ही हो जा रही है। ब्रह्मा और विष्णु नाम का अनुमान लगाते रहिये आप लोग पर ध्यान रखिये जिस प्रकार का परिवेश है उसको ध्यान में रखते हुए शुक्रचार्यों से निपटने में जो पूर्ण सक्षम और सुक्रचार्यों के प्रति भी न्यायवादी हो सकता है ऐसे लोगों को विष्णु और ब्रह्मा का परमपद दिया जा रहा है न की उन कमजोर लोगों को जो डर वश कोई निर्णय पूर्ण रूप से मान लेते है अपने ऊपर आये धर्म संकट से बचने के लिए। ब्रह्मा के पद को विशेष रूप से उस तर्ज पर तय किया गया है की जब प्रयागराज से प्रथम पूज्य गणेश/शिव शक्त्यांश को जब ब्रह्मा का परम पद प्राप्त कर सकते हैं तो ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रतह्म पूज्य वास्तविक गणेश/शंकर अवश्य ब्रह्मा के दायित्व को पूर्ण रूपेण निभाएंगे। जो भी कमी ब्रह्मा और विष्णु पदाभिषेक पात्रों में रहेगी वह मै पूर्ण करूंगा अपने अनुभव के आधार पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दिशा निर्देशन से।

आज वैश्विक युग है हम विश्व के एक कोने में बैठे विश्व के किशी भी कोने से जुड़े है ऐसे में त्रिदेव भी विश्व व्यापक और सनातन धर्म या सनातन हिन्दू धर्म से ही होना चाहिए जो किशी भी स्थिति में अभय होकर निर्विवादित निर्णय लेते हुए मानवता हिट की किशी भी समस्या के समाधान हेतु समर्पित हो मानवता का कल्याण करा सके। त्रिदेव में से ही ब्रह्मा का परमपद भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय/काशी को जा रहा है जो पूर्व घोषित और सर्वविदित सनातन भारद्वाज/आंगिरस गोत्रीय को ही। जबकि त्रिदेव में से ही विष्णु के परमपद पर जिस सनातन गौतम गोत्रीय का पदाभिषेक किया गया है वह भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय/आजमगढ़ से ही है। लेकिन त्रिदेव में से शिव का परमपद अभी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय/प्रयागराज विश्वविद्यालय/जौनपुर/आजमगढ़/प्रयागराज के पास ही रहेगा। श्रीकृष्ण जन्मास्टमी को घोषणा करनी थी पर लगभग पूर्ण रूप से घोषणा आज ही हो जा रही है। ब्रह्मा और विष्णु नाम का अनुमान लगाते रहिये आप लोग पर ध्यान रखिये जिस प्रकार का परिवेश है उसको ध्यान में रखते हुए शुक्रचार्यों से निपटने में जो पूर्ण सक्षम और सुक्रचार्यों के प्रति भी न्यायवादी हो सकता है ऐसे लोगों को विष्णु और ब्रह्मा का परमपद दिया जा रहा है न की उन कमजोर लोगों को जो डर वश कोई निर्णय पूर्ण रूप से मान लेते है अपने ऊपर आये धर्म संकट से बचने के लिए। ब्रह्मा के पद को विशेष रूप से उस तर्ज पर तय किया गया है की जब प्रयागराज से प्रथम पूज्य गणेश/शिव शक्त्यांश को जब ब्रह्मा का परम पद प्राप्त कर सकते हैं तो ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रतह्म पूज्य वास्तविक गणेश/शंकर अवश्य ब्रह्मा के दायित्व को पूर्ण रूपेण निभाएंगे। जो भी कमी ब्रह्मा और विष्णु पदाभिषेक पात्रों में रहेगी वह मै पूर्ण करूंगा अपने अनुभव के आधार पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दिशा निर्देशन से। 

जब शिव/राम/कृष्ण का अपमान किया गया हो और उनकी इक्षा और आज्ञा की अवहेलना की गयी हो धन, बल और ज्ञान का अभिमान दिखाते हुए उस कार्य के लिए जिसके विदित होने पर समझौते परिणाम स्वरुप वे भी विपक्षियों की बात पर ही हो सकता है की सहमत होते अपने शिव/राम/कृष्ण नाम अर्थ पालन हेतु ही सही; और यदि वे शिव/राम/कृष्ण यदि रामा(सीता)पुर-223225, आजमगढ़ से रहे हों तो जाहिर सी बात है की अपने पूज्य के अपमान में प्रतिशोधात्मक कार्य लव-कुश/हिन्दू-कुश किये होंगे। यह तो एक आपसी समझ का अभाव ही रहा न दोनों पक्ष का तो यह अंतर्विरोध तो दूर किया जा सकता था इसके लिए जो पक्ष अतिसय प्रभावित हुआ है उसको इसकी पहल करनी थी पहले न, तो दोस किस किसको दे रहे हैं? लव-कुश/हिन्दू-कुश को जो परिणाम मिलना था मिला और वे अपना कार्य कर गए तो हाय तोबा किस बात की? तो इसी लिए कहता हूँ की कि जो गुरु, शिव/श्रीराम/कृष्ण के लिए या उनके आदेश पालन में बलिदान दे दिया या जिसका बलिदान दे दिया गया या जो जगत जननी/जगदम्बा श्री दुर्गा/सीता के लिए या उनके आदेश पालन में बलिदान दे दिया या जिसका बलिदान दे दिया गया वह अपने गुरु, शिव/श्रीराम/कृष्ण और श्री दुर्गा/सीता में ही पूर्ण रूप से समाहित हो गया इसके लिए न्यायलय तक की दौड़ और बवाल किस बात का?

जब शिव/राम/कृष्ण का अपमान किया गया हो और उनकी इक्षा और आज्ञा की अवहेलना की गयी हो धन, बल और ज्ञान का अभिमान दिखाते हुए उस कार्य के लिए जिसके विदित होने पर समझौते परिणाम स्वरुप वे भी विपक्षियों की बात पर ही हो सकता है की सहमत होते अपने शिव/राम/कृष्ण नाम अर्थ पालन हेतु ही सही; और यदि वे शिव/राम/कृष्ण यदि रामा(सीता)पुर-223225, आजमगढ़ से रहे हों तो जाहिर सी बात है की अपने पूज्य के अपमान में प्रतिशोधात्मक कार्य लव-कुश/हिन्दू-कुश किये होंगे। यह तो एक आपसी समझ का अभाव ही रहा न दोनों पक्ष का तो यह अंतर्विरोध तो दूर किया जा सकता था इसके लिए जो पक्ष अतिसय प्रभावित हुआ है उसको इसकी पहल करनी थी पहले न, तो दोस किस किसको दे रहे हैं? लव-कुश/हिन्दू-कुश को जो परिणाम मिलना था मिला और वे अपना कार्य कर गए तो हाय तोबा किस बात की? तो इसी लिए कहता हूँ की कि जो गुरु, शिव/श्रीराम/कृष्ण के लिए या उनके आदेश पालन में बलिदान दे दिया या जिसका बलिदान दे दिया गया या जो जगत जननी/जगदम्बा श्री दुर्गा/सीता के लिए या उनके आदेश पालन में बलिदान दे दिया या जिसका बलिदान दे दिया गया वह अपने गुरु, शिव/श्रीराम/कृष्ण और श्री दुर्गा/सीता में ही पूर्ण रूप से समाहित हो गया इसके लिए न्यायलय तक की दौड़ और बवाल किस बात का?

Wednesday, September 2, 2015

केवल भारतभूमि नहीं इस धरती माँ पर मानवता संचित और अबाधगति से चलाती रहे उसके लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष किस जाती/धर्म के मानव का महामानव के रूप में नमन और अभिवादन नहीं किया हूँ तो किसी के सामने झुकने में मुझे क्या रखा है। लेकिन तथ्य जो समाज हित, रास्त्र हिट और विश्व मानवता के हित में हो उसके लिए किसी व्यक्ति, रास्त्र, समाज या स्वयं अपने सामने भी नहीं झुकना चाहिए। झुकना उस गुरु के सामने चाहिए जो तथ्य से अवगत हो मानवता के अभीष्ट हित मतलब समाज हित, रास्त्र हिट और विश्व मानवता के हित उस तथ्य का अभीष्टतम प्रयोग कर सके। पर अगर उस व्यक्ति का ऐसा गुरु स्वयं इस्वर हो गया तो इस्वर और गुरु में कोई अंतर रहा। तो वह गुरु विश्व व्यापक हुआ की नहीं?

केवल भारतभूमि नहीं इस धरती माँ पर मानवता संचित और अबाधगति से चलाती रहे उसके लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष किस जाती/धर्म के मानव का महामानव के रूप में नमन और अभिवादन नहीं किया हूँ तो किसी के सामने झुकने में मुझे क्या रखा है। लेकिन तथ्य जो समाज हित,  रास्त्र हिट और विश्व मानवता के हित में हो उसके लिए किसी व्यक्ति, रास्त्र, समाज या स्वयं अपने सामने भी नहीं झुकना चाहिए। झुकना उस गुरु के सामने चाहिए जो तथ्य से अवगत हो मानवता के अभीष्ट हित मतलब समाज हित,  रास्त्र हिट और विश्व मानवता के हित उस तथ्य का अभीष्टतम प्रयोग कर सके।  पर अगर उस व्यक्ति का ऐसा गुरु स्वयं इस्वर हो गया तो इस्वर और गुरु में कोई अंतर रहा। तो वह गुरु विश्व व्यापक हुआ की नहीं? 

कितने लोगों को भरोषा है की केवल ईसाइयत या ईसाइयत कर्म में रत हो कर यह संसार चल सकता है? मेरा मत है की की ईसाइयत, इस्लाम और तथाकथित दलित को सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण/सनातन धर्मीहिन्दू के जिम्मेदारी और बौद्धिस्टो/बौद्धमार्गी और शेष तथाकथित दलित लोगों को सनातन गौतम गोत्रिय ब्राह्मण/सनातन धर्मीहिन्दुओं की जिम्मेदारी पर छोड़ दीजिये। शेष पांच गोत्र को इनको संभालने की जरूरत ही नहीं और इस प्रकार कश्यप और गौतम में से भी जो बचते है तथा शेष अन्य पांच गोत्रियों को ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य जाती/धर्म के आधार पर चलाइये। तो बताइये की यह संसार केवल ईसाइयत या केवल इस्लाम के भरोशे चल सकता है क्या?

कितने लोगों को भरोषा है की केवल ईसाइयत या ईसाइयत कर्म में रत हो कर यह संसार चल सकता है? मेरा मत है की की ईसाइयत, इस्लाम और तथाकथित दलित को सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण/सनातन धर्मीहिन्दू  के जिम्मेदारी और बौद्धिस्टो/बौद्धमार्गी और शेष तथाकथित दलित लोगों को सनातन गौतम गोत्रिय ब्राह्मण/सनातन धर्मीहिन्दुओं की जिम्मेदारी पर छोड़ दीजिये। शेष पांच गोत्र  को इनको संभालने की जरूरत ही नहीं और इस प्रकार कश्यप और गौतम में से भी जो बचते है तथा शेष अन्य पांच गोत्रियों को ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य जाती/धर्म के आधार पर चलाइये। तो बताइये की यह संसार केवल ईसाइयत या केवल इस्लाम के भरोशे चल सकता है क्या? 

पाप का पिटारा छुपने वाला नहीं था रंगभेदी लड़ाई की आँड से भी और काशीराम, नारायणन, कलाम जैसे लोगों का नाम आगे करके भी और अब प्रयागराज विश्वविद्यालय से कैलाशनाथ का नाम आगे करके भी या किशी को द्वितीय श्रेणी किसी परिक्षा में अंक के आधार पर बनवाकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अलखनिरंजन से या वरिष्ठता में प्रथम क्रम से द्वितीय क्रम का बना कर हरिश्चंद्र पुत्र रोहितस्व के वंसज, आशीस; और भानुप्रताप सिंह द्वारा। भाई इन ब्राह्मण कुल में न आने वाले लोगों की बात ही क्या मै तो सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी(ब्रह्मा) से अपनी शिकायत दर्ज करा दी की भारद्वाज/आंगिरस; उनके शिष्य,गर्ग; और शांडिल्य जब अशोकचक्र/धर्मचक्र/समयचक्र/कालचक्र को टूटने से नहीं बचा सके तो फिर प्रयागराज को केवल भारद्वाज/आंगिरस, गर्ग और शांडिल्य के भरोशे पुनः भविष्य के लिए कैसे छोड़ दिया जाय? और प्रयागराज का सात में विभाजन प्रारम्भ क्यों न हो? जब गंगा, जमुना, सरस्वती ही गंदी कर दी गयी हों तो आज भी केवल राम और कृष्ण आधारित केवल दो में ही विभाजन ही क्यों स्वीकार हो? मूल सप्तर्षि/कुछ वंसज: ---- मारीच/कश्यप, वशिष्ठ/शांडिल्य/व्यासः, गौतम, आंगिरस/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय(सोम), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ। यह हैं मानवता के वाहक सात ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि तो मानवता कम से कम सात भाग में विभाजित की जा सकती है मूल रूप में और ये सब प्रयागराज में जन्म लिए थे प्रकृष्टा यज्ञ/विश्व के प्राचीनतम प्राकयज्ञ से तो प्रयागराज से ही मूलतः सात में विभाजन प्रारम्भ होना चाहिए परमब्रह्म की परमसत्ता और संप्रभुता का।

पाप का पिटारा छुपने वाला नहीं था रंगभेदी लड़ाई की आँड से भी और काशीराम, नारायणन, कलाम जैसे लोगों का नाम आगे करके भी और अब प्रयागराज विश्वविद्यालय से कैलाशनाथ का नाम आगे करके भी या किशी को द्वितीय श्रेणी किसी परिक्षा में अंक के आधार पर बनवाकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अलखनिरंजन से या वरिष्ठता में प्रथम क्रम से द्वितीय क्रम का बना कर हरिश्चंद्र पुत्र रोहितस्व के वंसज, आशीस; और भानुप्रताप सिंह द्वारा। भाई इन ब्राह्मण कुल में न आने वाले लोगों की बात ही क्या मै तो सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी(ब्रह्मा) से अपनी शिकायत दर्ज करा दी की भारद्वाज/आंगिरस; उनके शिष्य,गर्ग; और शांडिल्य जब अशोकचक्र/धर्मचक्र/समयचक्र/कालचक्र को टूटने से नहीं बचा सके तो फिर प्रयागराज को केवल भारद्वाज/आंगिरस, गर्ग और शांडिल्य के भरोशे पुनः भविष्य के लिए कैसे छोड़ दिया जाय? और प्रयागराज का सात में विभाजन प्रारम्भ क्यों न हो? जब गंगा, जमुना, सरस्वती ही गंदी कर दी गयी हों तो आज भी केवल राम और कृष्ण आधारित केवल दो में ही विभाजन ही क्यों स्वीकार हो?
मूल सप्तर्षि/कुछ वंसज: ---- मारीच/कश्यप, वशिष्ठ/शांडिल्य/व्यासः, गौतम, आंगिरस/भारद्वाज, भृगु/जमदग्नि, अत्रि/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय(सोम), कौशिक/विश्वामित्र/विश्वरथ। यह हैं मानवता के वाहक सात ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि तो मानवता कम से कम सात भाग में विभाजित की जा सकती है मूल रूप में और ये सब प्रयागराज में जन्म लिए थे प्रकृष्टा यज्ञ/विश्व के प्राचीनतम प्राकयज्ञ से तो प्रयागराज से ही मूलतः सात में विभाजन प्रारम्भ होना चाहिए परमब्रह्म की परमसत्ता और संप्रभुता का। 

कहा चली गयी थी बेटों की समझ की वे कालिदास से भी गए गुजरे हो गए थे। अरे भाई कालिदास तो डाल काट रहे थे वे गिरते तो बच जाते और थोड़े बहुत कष्ट से जीते या बहुत होता तो मर जाते पर ये बेटे तो अपनी उस मर्यादा से अलग हो रहे थे जिससे अलग होकर वे जी नहीं सकते थे और अगर वे बचते भी तो वे जीते जी मुर्दा लास/मृतशरीर जैसा जीवन जीते जिस पर कुत्ते भी हाँथ, पाँव, मुख का कमाल दिखाकर भौ भौ करके चले जाते। सनातन ब्राह्मण था, हूँ और रहूँगा और बेटों को ही परास्त करूंगा जब भी वे उद्दंडता करेंगे पर उनकी हत्या करके नहीं वरण अपनी कलम से।*******सत्यमेव जयते।

कहा चली गयी थी बेटों की समझ की वे कालिदास से भी गए गुजरे हो गए थे। अरे भाई कालिदास तो डाल काट रहे थे वे गिरते तो बच जाते और थोड़े बहुत कष्ट से जीते या बहुत होता तो मर जाते पर ये बेटे तो अपनी उस मर्यादा से अलग हो रहे थे जिससे अलग होकर वे जी नहीं सकते थे और अगर वे बचते भी तो वे जीते जी मुर्दा लास/मृतशरीर जैसा जीवन जीते जिस पर कुत्ते भी हाँथ, पाँव, मुख का कमाल दिखाकर  भौ भौ करके चले जाते। सनातन ब्राह्मण था, हूँ और रहूँगा और बेटों को ही परास्त करूंगा जब भी वे उद्दंडता करेंगे पर उनकी हत्या करके नहीं वरण अपनी कलम से।*******सत्यमेव जयते। 

बिशुनपुर, जौनपुर-223103 का सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण का रामानंद(+रामानुज+श्रीनिवाश)/..../रामप्रसाद/रमानाथ(+पारसनाथ/शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर+श्रीप्रकाश) कुल है मेरा ननिहाल और रामा(सीता)पुर, आजमगढ़-223225 का सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव शक्ति व् शिव पर अर्पित होने वाला और शिवा/पारवती/सती का आहार) पाण्डेय ब्राह्मण का सारंगधर(चन्द्रधर/राकेशधर/शशिधर/चंद्रशेखर=शिव)/..../देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/…/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप(सूर्य ऊर्जा का स्रोत=सूर्यकान्त/लक्ष्मीनारायण/रामजानकी/सत्यनारायण/लक्ष्मीकांत) कुल है मुझ गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी, मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी, 11-11-1975, सुबह 9. 15, जन्मतः गिरिधारी राशिनाम स्वरुप विवेक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक का। तदनुसार धनिष्ठा नक्षत्र और राशि =(1/2 कुम्भ और 1/2 मकर राशि))। टिप्पणी:- गिरिधारी:---गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) जिसको सामाजिक रूप से हुई गलतियों के परिणामतः अपने द्वारा दूसरे परमब्रह्म श्रीराम तक के आचरण में रूपांतरित करना पड़ा शिव//त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक/विवेक की सीमा का विस्तार करते हुए। कितना कष्ट हुआ होगा उसे जिसका अधिकार मैंने लिया और कितना कष्ट मेरे सुभेक्षुजनो को हुआ होगा जो मुझे इस स्वरुप में बर्दास्त किये और इसके शिवा मै क्या कहूँ उन लोगों को जो मुझे सुने और देखे और मेरा अनुसरण और विरोध किये मानव स्वभाव के कारन।

बिशुनपुर, जौनपुर-223103 का सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण का रामानंद(+रामानुज+श्रीनिवाश)/..../रामप्रसाद/रमानाथ(+पारसनाथ/शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर+श्रीप्रकाश) कुल है मेरा ननिहाल और रामा(सीता)पुर, आजमगढ़-223225 का सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव शक्ति व् शिव पर अर्पित होने वाला और शिवा/पारवती/सती का आहार) पाण्डेय ब्राह्मण का सारंगधर(चन्द्रधर/राकेशधर/शशिधर/चंद्रशेखर=शिव)/..../देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/…/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप(सूर्य ऊर्जा का स्रोत=सूर्यकान्त/लक्ष्मीनारायण/रामजानकी/सत्यनारायण/लक्ष्मीकांत) कुल है मुझ गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी, मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी, 11-11-1975, सुबह 9. 15, जन्मतः गिरिधारी राशिनाम स्वरुप विवेक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक का। तदनुसार धनिष्ठा नक्षत्र और राशि =(1/2 कुम्भ और 1/2 मकर राशि))।  टिप्पणी:- गिरिधारी:---गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) जिसको सामाजिक रूप से हुई गलतियों के परिणामतः अपने द्वारा दूसरे परमब्रह्म श्रीराम तक के आचरण में रूपांतरित करना पड़ा शिव//त्रिनेत्र/त्रिलोचन/त्रयम्बक/विवेक की सीमा का विस्तार करते हुए। कितना कष्ट हुआ होगा उसे जिसका अधिकार मैंने लिया और कितना कष्ट मेरे सुभेक्षुजनो को हुआ होगा जो मुझे इस स्वरुप में बर्दास्त किये और इसके शिवा मै क्या कहूँ उन लोगों को जो मुझे सुने और देखे और मेरा अनुसरण और विरोध किये मानव स्वभाव के कारन।
https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur

विश्वगुरु जौनपुर/जमदग्नि(भृगुपुत्र/परसुरामपिता)पुर की धरा पर जन्म लेकर मै ही नहीं कोई भी परशुराम कैसे बन सकता है जब विष्णुअवतार परशुराम को उनके बाबा भृगु ऋषी प्रतिशोध के तहत परशुराम के कार्य को निंदनीय मान उनको जौनपुर/जमदग्निपुर आने से मना किया था और परशुराम कभी भी जौनपुर/जमदग्निपुर की जमीन पर वापस आने के वचन को निभाते हुए चिरंजीवी होते हुए भी सदा इस धारा का मान ही बढाए हैं पर वापस नहीं आये हैं कभी जौनपुर/जमदग्निपुर। मेरी माता ही नहीं मेरी कुल माता बाबा सारंगधर(नामतः शिव) की धर्म पत्नी भी जौनपुर से ही है और मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्रा जी ने भी मुझे गुरु, श्रद्धेय जोशी जी(ब्रह्मा) में मानवता में आमूलचूल परिवर्तन के यज्ञ (कार्य) हेतु समर्पित किया था तो मेरा परशुराम बनना ही अप्रासंगिक था/है। ----मेरे लिए ही नहीं मेरे साथ अगर मेरे कुल और जनपद आज़मगढ़ वाले भी हैं तो उनको भी अपना गुरु उसी विश्वगुरु जौनपुर/जमदग्निपुर को मानना चाहिए जो विश्वगुरु है जिसे ज्ञान, विज्ञान, सभ्यता, संस्कृत और मानवता का केंद्र होने के नाते "सिराजे हिन्द" शब्द से मध्यकाल में नवाजा गया था। और कहा जाता है कही श्रेष्ठं ब्रेन और ग्रेन दोनों है भारत में तो मतलब श्रेष्ठ बौद्धिक और आर्थिक(कृषि पैदावार की दृस्टि से) सम्पदा दोनों है तो वह जौनपुर ही है। -------वैसे भी मै भगवान परशुराम का सम्मान करता हूँ एक योग्य योद्धा, श्रेष्ठ गुरु और विशेष रूप से सुसंस्कार/अनुसासन और युद्धकला के श्रेष्ठतम गुरु के रूप में (उनके अपने जीवन के कटु अनुभव और प्रतिशोध को छोड़ देने पर) पर उनकी तरह जौनपुर/जमदग्निपुर नहीं छोड़ सकता और इस प्रकार न केरल, कांकड़, गोवा, मराठवाड़ा और गुजरात को अपना निवास बनाना चाहता हूँ और न ही तो क्रोध शांति हेतु उत्तराँचल/उत्तराखंड महेन्द्रगिरि पर्वत जाना है मुझे। टिप्पणी : विश्व के इतिहास में ब्राह्मणत्व के श्रेष्ठगुण, "त्याग" को चरम पर पहुंचा भृगुगोत्र/भृगुवंश ब्राह्मणत्व में शीर्ष स्थान रखता है सप्तर्षियों/सात ब्रह्मर्षियों में जिसमे विशेष रूप से दधीच मानवता की रक्षा हेतु देह का त्याग और स्वयं भृगु ऋषी द्वारा अपने पौत्र परशुराम का त्याग।

विश्वगुरु जौनपुर/जमदग्नि(भृगुपुत्र/परसुरामपिता)पुर की धरा पर जन्म लेकर मै ही नहीं कोई भी परशुराम कैसे बन सकता है जब विष्णुअवतार परशुराम को उनके बाबा भृगु ऋषी प्रतिशोध के तहत परशुराम के कार्य को निंदनीय मान उनको जौनपुर/जमदग्निपुर आने से मना किया था और परशुराम कभी भी जौनपुर/जमदग्निपुर की जमीन पर वापस आने के वचन को निभाते हुए चिरंजीवी होते हुए भी सदा इस धारा का मान ही बढाए हैं पर वापस नहीं आये हैं कभी जौनपुर/जमदग्निपुर। मेरी माता ही नहीं मेरी कुल माता बाबा सारंगधर(नामतः शिव) की धर्म पत्नी भी जौनपुर से ही है और मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर मिश्रा जी ने भी मुझे गुरु, श्रद्धेय जोशी जी(ब्रह्मा) में मानवता में आमूलचूल परिवर्तन के यज्ञ (कार्य) हेतु समर्पित किया था तो मेरा परशुराम बनना ही अप्रासंगिक था/है। ----मेरे लिए ही नहीं मेरे साथ अगर मेरे कुल और जनपद आज़मगढ़ वाले भी हैं तो उनको भी अपना गुरु उसी विश्वगुरु जौनपुर/जमदग्निपुर को मानना चाहिए जो विश्वगुरु है जिसे ज्ञान, विज्ञान, सभ्यता, संस्कृत और मानवता का केंद्र होने के नाते "सिराजे हिन्द" शब्द से मध्यकाल में नवाजा गया था। और कहा जाता है कही श्रेष्ठं ब्रेन और ग्रेन दोनों है भारत में तो मतलब श्रेष्ठ बौद्धिक और आर्थिक(कृषि पैदावार की दृस्टि से) सम्पदा दोनों है तो वह जौनपुर ही है। -------वैसे भी मै भगवान परशुराम का सम्मान करता हूँ एक योग्य योद्धा, श्रेष्ठ गुरु और विशेष रूप से सुसंस्कार/अनुसासन और युद्धकला के श्रेष्ठतम गुरु के रूप में (उनके अपने जीवन के कटु अनुभव और प्रतिशोध को छोड़ देने पर) पर उनकी तरह जौनपुर/जमदग्निपुर नहीं छोड़ सकता और इस प्रकार न केरल, कांकड़, गोवा, मराठवाड़ा और गुजरात को अपना निवास बनाना चाहता हूँ और न ही तो क्रोध शांति हेतु उत्तराँचल/उत्तराखंड महेन्द्रगिरि पर्वत जाना है मुझे। टिप्पणी : विश्व के इतिहास में ब्राह्मणत्व के श्रेष्ठगुण, "त्याग" को चरम पर पहुंचा भृगुगोत्र/भृगुवंश ब्राह्मणत्व में शीर्ष स्थान रखता है सप्तर्षियों/सात ब्रह्मर्षियों में जिसमे विशेष रूप से दधीच मानवता की रक्षा हेतु देह का त्याग और स्वयं भृगु ऋषी द्वारा अपने पौत्र परशुराम का त्याग। 

Tuesday, September 1, 2015

ब्रह्मा और सरस्वती में एक और केवल एकमात्र भौतिक पुत्र काशी/वाराणसी के दक्ष प्रजापति की ही संतान सती/पारवती समेत सम्पूर्ण नारी जगत है या तो कहिये की सम्पूर्ण विश्व नारी जगत का श्रोत हैं ये, तो उनमे वे भी नारियां आती है जो राक्षसीपन, कुसंस्कृत और कुसंस्कारित लोगों में सानिध्य आ, उनके घर जा या उनके शोषण में आने के नाते या सामजिक गिरावट आने के साथ उनके में में राक्षसीपन, कुसंस्कार और कुसंस्कृत घर कर गयी है और उन लोगों के जीवन स्तर में गिरावट के साथ उनका भी जीवन स्तर घट गया है, फिर जो बची नारियाँ हैं और जिनके अंदर सुसंस्कार और सुसंस्कृति बचा हुआ है ऐसे नारी जगत को कुसंस्कारवान, कुसंस्कृतवान् बनाने का घिनौना कार्य तीव्रगति से क्यों चलाया जा रहा है राक्षसी पशुवत मंशिकतावाले लोगों के इसारे पर? मेरे विचार से उसी समाज विशेष के हर पुरुष जो समृद्ध हो रहे हैं वे के नारी संसार का उत्थान और जीवन स्तर समृध्द बनाने का वीणा उठाएंगे तो यह एक श्रेष्कर कार्य होगा नारी उत्थान का और मानवसमाज उत्थान का।

ब्रह्मा और सरस्वती में एक और केवल एकमात्र भौतिक पुत्र काशी/वाराणसी के दक्ष प्रजापति की ही संतान सती/पारवती समेत सम्पूर्ण नारी जगत है या तो कहिये की सम्पूर्ण विश्व नारी जगत का श्रोत हैं ये, तो उनमे वे भी नारियां आती है जो राक्षसीपन, कुसंस्कृत और कुसंस्कारित लोगों में सानिध्य आ, उनके घर जा या उनके शोषण में आने के नाते या सामजिक गिरावट आने के साथ उनके में में राक्षसीपन, कुसंस्कार और कुसंस्कृत घर कर गयी है और उन लोगों के जीवन स्तर में गिरावट के साथ उनका भी जीवन स्तर घट गया है,  फिर जो बची नारियाँ हैं और जिनके अंदर सुसंस्कार और सुसंस्कृति बचा हुआ है ऐसे नारी जगत को कुसंस्कारवान, कुसंस्कृतवान् बनाने का घिनौना कार्य तीव्रगति से क्यों चलाया जा रहा है राक्षसी  पशुवत मंशिकतावाले लोगों के इसारे पर? मेरे विचार से उसी समाज विशेष के हर पुरुष जो समृद्ध हो रहे हैं वे  के नारी संसार का उत्थान और जीवन स्तर समृध्द बनाने का वीणा उठाएंगे तो यह एक श्रेष्कर कार्य होगा नारी उत्थान का और मानवसमाज उत्थान का।     

ब्रह्मा, क्षत्रिय, वैस्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म में समान सांस्कृतिक और संस्कारित मान्यता होने के कारन ही सनातन हिन्दू शास्त्रीय नियमों के तहत हर उस वर का कन्या के पिता और माता तथा सगे सम्बन्धियों द्वारा पाँवधोकर कन्यादान सांस्कृतिक नियमों के तहत मान्य है जिसमे वर अपने विवाह पूर्व अपने को इन समान सांस्कारिक वर्ग(ब्रह्मा, क्षत्रिय, वैस्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का) का स्वीकार करता है सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से। अगर विवाह पूर्व जो ऐसा नहीं करता तो उस विवाह का शास्त्रीय नियम की परिधि में होना ही नियम विरुद्ध या अवैध है। वह केवल न्यायलय, आर्यसमाज या अन्य वैवाहिक विधि से ही मान्य होगा जो धर्म पति पत्नी नहीं कहे जा सकते है वर्ण केवल पति पत्नी ही कहलाने योग्य होंगे। तो हम संस्कारित और सुसंस्कृतवान् हों मतलब गतिज ऊर्जा के साथ साथ स्थितिज ऊर्जा के वाहक हों हम तो इसमें क्या परेशानी है?

ब्रह्मा, क्षत्रिय, वैस्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म में समान सांस्कृतिक और संस्कारित मान्यता होने के कारन ही सनातन हिन्दू शास्त्रीय नियमों के तहत हर उस वर का कन्या के पिता और माता तथा सगे  सम्बन्धियों द्वारा पाँवधोकर कन्यादान सांस्कृतिक नियमों के तहत मान्य है जिसमे वर अपने विवाह पूर्व अपने को इन समान सांस्कारिक वर्ग(ब्रह्मा, क्षत्रिय, वैस्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का) का स्वीकार करता है सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से। अगर विवाह पूर्व जो ऐसा नहीं करता तो उस विवाह का शास्त्रीय नियम की परिधि में होना ही नियम विरुद्ध या अवैध है। वह केवल न्यायलय, आर्यसमाज या अन्य वैवाहिक विधि से ही मान्य होगा जो धर्म पति पत्नी नहीं कहे जा सकते है वर्ण केवल पति पत्नी ही कहलाने योग्य होंगे। तो हम संस्कारित और सुसंस्कृतवान् हों मतलब गतिज ऊर्जा के साथ साथ स्थितिज ऊर्जा के वाहक हों हम तो इसमें क्या परेशानी है?  

एक मूल सुझाव जो कुंजी है भारत व् विश्व शान्ति एवं समृध्धता की: आप किशी का/की रसास्वादन ले लेने की कामुकता और आतुरता से ज्यादा उसका/उसकी सस्कृति और संस्कार आप अपने घरों में रहने वाले/रहने वालियों को देते या नक़ल करने को कहते तो शायद आप को किशी के घर में डकैती डालने, छल करने और चोरी की जरूरत ही न पड़ती और न आरक्षण जैसी वैसाखी की लेने की जो सामाजिक असंतोष को उसी तरह जन्म दे रहा जैसा की विकराल असमानता के समय था और जिस समय इस आरक्षण को अतिआवश्यक समझा जा सकता था। अगर आप ऐसा करते है तो सांस्कारिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्यों सहित हर दृस्टि से संपन्न होते है या होंगे।

एक मूल सुझाव जो कुंजी है भारत व् विश्व शान्ति एवं समृध्धता की:  आप किशी का/की रसास्वादन ले लेने की कामुकता और आतुरता से ज्यादा उसका/उसकी सस्कृति और संस्कार आप अपने घरों में रहने वाले/रहने वालियों को देते या नक़ल करने को कहते तो शायद आप को किशी के घर में डकैती डालने, छल करने और चोरी की जरूरत ही न पड़ती और न आरक्षण जैसी वैसाखी की लेने की जो सामाजिक असंतोष को उसी तरह जन्म दे रहा जैसा की विकराल असमानता के समय था और जिस समय इस आरक्षण को अतिआवश्यक समझा जा सकता था। अगर आप ऐसा करते है तो सांस्कारिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्यों सहित हर दृस्टि से संपन्न होते है या होंगे।

हर अस्त्र को निरस्त करने वाला हर अस्त्र की कारगुजारी देखता रहा 14 वर्ष जिससे किशी को कुछ कहने का मौक़ा न मिले की मैंने अपनी दक्षता अभी दिखाई ही नहीं। पर अगर अब दिखा लिए हों तो सज्जनों की तरह अपनी क्षमता/दक्षता की सीमा में रहना सीख लीजिये उस तथाकथित विश्वशक्ति महाशक्ति के साथ जिसको आप अथक परिश्रम कर को हांसिल कर लिए हैं। आप के अस्त्रों से मेरा क्या बिगड़ना था मतलब सत्य का क्या बाल बांका होना था पर आप स्वयं आत्महत्या कर रहे थे अपने ही किये कराये तिकड़म से पर मेरे अप्रत्यक्ष अस्त्र के वार आप को हजारों वर्ष तक याद आएंगे।>>>>>> केवल ब्राह्मण ही नहीं सनातन ब्राह्मण हूँ और उसमे से कश्यप(+गौतम+वशिष्ठ) गोत्रियों की संतान हूँ जिनका क्रमसः प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान पर गणना सम्पूर्ण गुण-दोस के आधार पर हमेशा रही है सप्तर्षिओं/सात ब्रह्मर्षियों में।~~~~~दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र से ही भारतीय व् विश्व मानवता त्रस्त है जब ब्रह्मास्त्र चल जाएगा तो क्या हाल होगा इस भारतभूमि मानवता और विश्वभूमि मानवता का? इसीलिये ब्राह्मण और क्षत्रिय को आरक्षण देना भारतभूमि और विश्वभूमि के लिए विनाशकारी है।

हर अस्त्र को निरस्त करने वाला हर अस्त्र की कारगुजारी देखता रहा 14 वर्ष जिससे किशी को कुछ कहने का मौक़ा न मिले की मैंने अपनी दक्षता अभी दिखाई ही नहीं। पर अगर अब दिखा लिए हों तो सज्जनों की तरह अपनी क्षमता/दक्षता की सीमा में रहना सीख लीजिये उस तथाकथित विश्वशक्ति महाशक्ति के साथ जिसको आप अथक परिश्रम कर को हांसिल कर लिए हैं। आप के अस्त्रों से मेरा क्या बिगड़ना था मतलब सत्य का क्या बाल बांका होना था पर आप स्वयं आत्महत्या कर रहे थे अपने ही किये कराये तिकड़म से पर मेरे अप्रत्यक्ष अस्त्र के वार आप को हजारों वर्ष तक याद आएंगे।>>>>>> केवल ब्राह्मण ही नहीं सनातन ब्राह्मण हूँ और उसमे से कश्यप(+गौतम+वशिष्ठ) गोत्रियों की संतान हूँ जिनका क्रमसः प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान पर गणना सम्पूर्ण गुण-दोस के आधार पर हमेशा रही है सप्तर्षिओं/सात ब्रह्मर्षियों में।~~~~~दलित अस्त्र, पिछड़ा अस्त्र, अल्पसंख्यक अस्त्र से ही भारतीय व् विश्व मानवता त्रस्त है जब ब्रह्मास्त्र चल जाएगा तो क्या हाल होगा इस भारतभूमि मानवता और विश्वभूमि मानवता का? इसीलिये ब्राह्मण और क्षत्रिय को आरक्षण देना भारतभूमि और विश्वभूमि के लिए विनाशकारी है।