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Friday, October 30, 2015

देवाशीष (देव +आशीष) गुरु जी, कृपा पात्रता के लिए विवेकानंद (विवेक + आनंद) द्वारा हार्दिक धन्यवाद! आप मेरे गुरु हैं ही इसमें दो राय कहाँ पर जीवन में एक ऐसा बिंदु जरूर आएगा जहाँ मै ही काम आऊंगा क्योंकि बिंदु के लिए स्थान की जरूरत प्रत्यक्ष में पड़ती हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि उसके अस्तित्व के लिए शून्य स्थान ही चाहिए और वह मै विवेक हूँ और मई शून्य में रह चुका हूँ और इस अवश्था के लिए मतलब दृष्टिगत होने में आनन्द भाई की भूमिका के साथ विनय शंकर भाई की भूमिका अद्वितीय है जिनसे अधिकाँशतः में ही दूरभाष से जुड़ता हूँ अक्सर और वे इतने आश्वस्त रहते है मेरे शुभ-शुभ के निमित्त की मुझे याद थोड़े ज्यादा दिन में करते है पर मुझसे सदा जुड़े रहने का साहस उनमे ही था/है भी। अतः हम दो होकर भी एक ही हैं।>>>>छोटे भाइयों का आग्रह है की विनय शंकर भाई और हम अनन्य(राम=कृष्ण) होते हुए भी दो स्वरुप(राम+कृष्ण) में बने रहें और दोनों गुण दो में रहे और इस लिए हम और विनय शंकर भाई दोनों एकल-एकल स्वभाव रखूंगा। पर अगर कभी द्वितीयक और एकक दोनों स्वाभाव परिलक्षित हो जाय तो उन लोगों को भी क्षमा करना चाहिए क्योंकि यह तो उनकी इक्षा है की हम दोनों दो हों। >>>बड़े भैया विष्णु को उपर्युक्त शिवातर के बाद विष्णु अवतार से विस्तार कर परमब्रह्म (ब्रह्मा + विष्णु+ महेश) अवस्था(=राम=कृष्ण) के लिए तैयार कर लिया गया है और हम लोग आवश्यता पड़ने पर उनका सहयोग करने हेतु तत्पर है। वैसे बड़े भैया को पहले अवसर दिया जाना चाहिए था अपनी सीमा विस्तार के लिए पर कार्य तो विवेक=त्रयम्बक=त्रिलोचन=त्रिनेत्र =शंकर=शिव को ही हस्तांतरित कर होना था अतिसय विकट और दुरूह परिस्थिति को संभालने में तो वह कार्य शिव द्वारा पूर्ण किया गया और अव हजारों वर्ष बाद ही शिव-अवतार को परमब्रह्म बनना पडेगा यदि सब कुछ ठीक से चलता रहा और तब तक विष्णु अवतार ही होते रहेंगे क्रमानुसार हजारों वर्ष तक क्योंकि अगर विष्णु का काम शिव को करना पडेगा तो इसी तरह पुनः मानवता हित हेतु विष्णु अपने अधिकार से वंचित होते रहेंगे। अतः मानवता का संचालन ठीक ठंग से किया जाना चाहिए जससे शिव को विष्णु का कार्य मतलब शिव को परमब्रह्म नहीं बनना पड़े केवल विष्णु ही परमब्रह्म बनते रहें।

देवाशीष (देव +आशीष) गुरु जी,
कृपा पात्रता के लिए विवेकानंद (विवेक + आनंद) द्वारा हार्दिक धन्यवाद!
आप मेरे गुरु हैं ही इसमें दो राय कहाँ पर जीवन में एक ऐसा बिंदु जरूर आएगा जहाँ मै ही काम आऊंगा क्योंकि बिंदु के लिए स्थान की जरूरत प्रत्यक्ष में पड़ती हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि उसके अस्तित्व के लिए शून्य स्थान ही चाहिए और वह मै विवेक हूँ और मई शून्य में रह चुका हूँ और इस अवश्था के लिए मतलब दृष्टिगत होने में आनन्द भाई की भूमिका के साथ विनय शंकर भाई की भूमिका अद्वितीय है जिनसे अधिकाँशतः में ही दूरभाष से जुड़ता हूँ अक्सर और वे इतने आश्वस्त रहते है मेरे शुभ-शुभ के निमित्त की मुझे याद थोड़े ज्यादा दिन में करते है पर मुझसे सदा जुड़े रहने का साहस उनमे ही था/है भी। अतः हम दो होकर भी एक ही हैं।>>>>छोटे भाइयों का आग्रह है की विनय शंकर भाई और हम अनन्य(राम=कृष्ण) होते हुए भी दो स्वरुप(राम+कृष्ण) में बने रहें और दोनों गुण दो में रहे और इस लिए हम और विनय शंकर भाई दोनों एकल-एकल स्वभाव रखूंगा। पर अगर कभी द्वितीयक और एकक दोनों स्वाभाव परिलक्षित हो जाय तो उन लोगों को भी क्षमा करना चाहिए क्योंकि यह तो उनकी इक्षा है की हम दोनों दो हों। >>>बड़े भैया विष्णु को उपर्युक्त शिवातर के बाद विष्णु अवतार से विस्तार कर परमब्रह्म (ब्रह्मा + विष्णु+ महेश) अवस्था(=राम=कृष्ण) के लिए तैयार कर लिया गया है और हम लोग आवश्यता पड़ने पर उनका सहयोग करने हेतु तत्पर है। वैसे बड़े भैया को पहले अवसर दिया जाना चाहिए था अपनी सीमा विस्तार के लिए पर कार्य तो विवेक=त्रयम्बक=त्रिलोचन=त्रिनेत्र =शंकर=शिव को ही हस्तांतरित कर होना था अतिसय विकट और दुरूह परिस्थिति को संभालने में तो वह कार्य शिव द्वारा पूर्ण किया गया और अव हजारों वर्ष बाद ही शिव-अवतार को परमब्रह्म बनना पडेगा यदि सब कुछ ठीक से चलता रहा और तब तक विष्णु अवतार ही होते रहेंगे क्रमानुसार हजारों वर्ष तक क्योंकि अगर विष्णु का काम शिव को करना पडेगा तो इसी तरह पुनः मानवता हित हेतु विष्णु अपने अधिकार से वंचित होते रहेंगे। अतः मानवता का संचालन ठीक ठंग से किया जाना चाहिए जससे शिव को विष्णु का कार्य मतलब शिव को परमब्रह्म नहीं बनना पड़े केवल विष्णु ही परमब्रह्म बनते रहें।

Thursday, October 29, 2015

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और प्रयागराज विश्वविद्यालय के सुभेक्षु जानो इस सम्पूर्ण दुनिया से बता दीजिये कि भारत से बाहर की सभी नदियाँ तो बहुत पहले से गंदी हैं आप उनके स्वक्ष रहने की आशा भी मत कीजिये, पर अगर गंगा, जमुना और सरस्वती गंदी हो गयी थी तो भारतीय महाद्वीप की ये सब नदियाँ "कावेरी, नर्मदा नदी, महानदी, कोशी, कृष्णा, गोदावरी, गंडक, घाघरा, चेनाब, झेलम, दामोदर, नर्मदा, ताप्ती, बेतवा, पद्मा, फल्गू, बागमती, ब्रह्मपुत्र, भागीरथी, महानदी, महानंदा, यमुना, रावी, व्यास, सतलुज, सिन्धु, सुवर्णरेखा, हुगली, काली, गंडक, घाघरा नदी, इन्द्रावती, त्रिशूल, झेलम, किशन, गंगा, पुँछ, लिदार, करेवाल, सिंध, सिन्धु नदी, सतलुज, व्यास, झेलम, चिनाब, रावी, शिंगार, गिलगित, श्योक, चिनाब , चन्द्रभागा, रावी, साहो, सुइल, स्पिती, बस्पा, व्यास, तीर्थन, पार्वती, हुरला, रामगंगा, गोमती, बागमती, गंडक,कोसी, सोन, अलकनंदा, भागीरथी, पिण्डार, मंदाकिनी, बेतवा, केन, टोंस, गिरी, काली, सिंध, आसन, घाघरा, शारदा, करनली, कुवाना, राप्ती, चौकिया, खोन, कोसी, इन्द्रावती, तामुर, अरुण, बेतवा , सिंध, सिप्ता, पार्वती, बनास, दामोदर नदी, कोनार, जामुनिया, बराकर, सोन नदी, रिहन्द, कुनहड़, ब्रह्मपुत्र नदी, घनसिरी, कपिली, सुवनसिती, मानस, लोहित, नोवा, पद्मा, दिहांग, सियोनाथ, हसदेव, उंग, ईब, स्वर्ण रेखा, प्राणहिता, पेनगंगा, वर्धा, वेनगंगा, मंजीरा, पुरना, कृष्णा, कोयना, यरला, वर्णा, पंचगंगा, दूधगंगा, घाटप्रभा, मालप्रभा, भीमा, तुंगप्रभा, मूसी, हेमावती, लोकपावना, शिमला, भवानी, अमरावती, स्वर्णवती, तवा, शेर, शक्कर, दूधी, बर्ना, पूरणा, बेतूल, गंजल, गोमई, वाकल, हाथमती, सुकड़ी, जनाई, बांडी, सोड्रा, मौसी, खारी, सोम, जोखम, अनास, सोरन, जलांगी, पाआधनी, चित्रावती, सागीलेरू, कुमुदवती, वर्धा, हगरी, हिंद, तुंगा, भद्रा, मेदेई, सिलेरु, कोटरी, चम्बल नदी, जोखम, बनास नदी, सारनी, नारंगी", गंदी चुकी थी और अभी भी गंदी हैं भी और इन सबको साफ करने का प्रयास हम सबको करना और और स्वयं इन नदियों का भी सहयोग अपेक्षित है एक प्राकृतिक स्रोत होने के नाते|

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और प्रयागराज विश्वविद्यालय के सुभेक्षु जानो इस सम्पूर्ण दुनिया से बता दीजिये कि भारत से बाहर की सभी नदियाँ तो बहुत पहले से गंदी हैं आप उनके स्वक्ष रहने की आशा भी मत कीजिये, पर अगर गंगा, जमुना और सरस्वती गंदी हो गयी थी तो भारतीय महाद्वीप की ये सब नदियाँ "कावेरी, नर्मदा नदी, महानदी, कोशी, कृष्णा, गोदावरी, गंडक, घाघरा, चेनाब, झेलम, दामोदर, नर्मदा, ताप्ती, बेतवा, पद्मा, फल्गू, बागमती, ब्रह्मपुत्र, भागीरथी, महानदी, महानंदा, यमुना, रावी, व्यास, सतलुज, सिन्धु, सुवर्णरेखा, हुगली, काली, गंडक, घाघरा नदी, इन्द्रावती, त्रिशूल, झेलम, किशन, गंगा, पुँछ, लिदार, करेवाल, सिंध, सिन्धु नदी, सतलुज, व्यास, झेलम, चिनाब, रावी, शिंगार, गिलगित, श्योक, चिनाब , चन्द्रभागा, रावी, साहो, सुइल, स्पिती, बस्पा, व्यास, तीर्थन, पार्वती, हुरला, रामगंगा, गोमती, बागमती, गंडक,कोसी, सोन, अलकनंदा, भागीरथी, पिण्डार, मंदाकिनी, बेतवा, केन, टोंस, गिरी, काली, सिंध, आसन, घाघरा, शारदा, करनली, कुवाना, राप्ती, चौकिया, खोन, कोसी, इन्द्रावती, तामुर, अरुण, बेतवा , सिंध, सिप्ता, पार्वती, बनास, दामोदर नदी, कोनार, जामुनिया, बराकर, सोन नदी, रिहन्द, कुनहड़, ब्रह्मपुत्र नदी, घनसिरी, कपिली, सुवनसिती, मानस, लोहित, नोवा, पद्मा, दिहांग, सियोनाथ, हसदेव, उंग, ईब, स्वर्ण रेखा, प्राणहिता, पेनगंगा, वर्धा, वेनगंगा, मंजीरा, पुरना, कृष्णा, कोयना, यरला, वर्णा, पंचगंगा, दूधगंगा, घाटप्रभा, मालप्रभा, भीमा, तुंगप्रभा, मूसी, हेमावती, लोकपावना, शिमला, भवानी, अमरावती, स्वर्णवती, तवा, शेर, शक्कर, दूधी, बर्ना, पूरणा, बेतूल, गंजल, गोमई, वाकल, हाथमती, सुकड़ी, जनाई, बांडी, सोड्रा, मौसी, खारी, सोम, जोखम, अनास, सोरन, जलांगी, पाआधनी, चित्रावती, सागीलेरू, कुमुदवती, वर्धा, हगरी, हिंद, तुंगा, भद्रा, मेदेई, सिलेरु, कोटरी, चम्बल नदी, जोखम, बनास नदी, सारनी, नारंगी", गंदी चुकी थी और अभी भी गंदी हैं भी और इन सबको साफ करने का प्रयास हम सबको करना और और स्वयं इन नदियों का भी सहयोग अपेक्षित है एक प्राकृतिक स्रोत होने के नाते| 

Wednesday, October 28, 2015

"Vivekanand and Modern Tradition" revised (11 September August, 2013 to till date): It was initiated first from Indian Institute of Science Bangalore in 2008 but all posts deleted in May, 2013 due to an incident but that was not natural and happened for saving the life of one baby child, therefore I started writing again. I hope this will be useful for the world humanity not only for Indians.

"Vivekanand and Modern Tradition" revised (11 September August, 2013 to till date): It was initiated first from Indian Institute of Science Bangalore in 2008 but all posts deleted in May, 2013 due to an incident but that was not natural and happened for saving the life of one baby child, therefore I started writing again. I hope this will be useful for the world humanity not only for Indians. 
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14 वर्ष का वृतांत: सनातन अंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण मिलन ने सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण, शिव:विवेक:त्रयम्बक:त्रिनेत्र: त्रिलोचन (+विष्णु/गिरिधर) को श्रीकृष्ण बना दिया और सनातन कौशिक(विश्वामित्र/विश्वरथ) गोत्रीय ब्राह्मण मिलन ने श्रीकृष्ण को श्रीराम बना दिया और इस प्रकार विवेकानंद(विवेक+आनंद)/गिरिधर स्वयं अपने गुरु श्री राम/कृष्ण परमहंश हो गए।

14 वर्ष का वृतांत: सनातन अंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण मिलन ने सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण, शिव:विवेक:त्रयम्बक:त्रिनेत्र: त्रिलोचन (+विष्णु/गिरिधर) को श्रीकृष्ण बना दिया और सनातन कौशिक(विश्वामित्र/विश्वरथ) गोत्रीय ब्राह्मण मिलन ने श्रीकृष्ण को श्रीराम बना दिया और इस प्रकार विवेकानंद(विवेक+आनंद)/गिरिधर स्वयं अपने गुरु श्री राम/कृष्ण परमहंश हो गए। 

भगवान श्रीकृष्ण के एक मात्र पुत्र प्रद्दुम्न थे जो कामदेव अवतार थे (कामदेव को शिव के त्रिनेत्र=विवेक ने जलाया था तो विष्णु भगवान के कहा था की तुम सामाजिक कल्याण हेतु यदि शिव को ध्यान मुद्रा से दूर कर सती/पार्वती से संयोग कराने में सफल होते हो और उस दौरान तुम्हारी मृत्यु भी होती है तो तुम्हारा मान बढ़ा मै अगले मन्वंतर में तुमको अपने पुत्र रत्न होने का अवसर दूंगा), उनकी मात्र पुत्री चारुमती थीं जिसका मतलब होता है सुन्दर मति/ज्ञान वाली। श्रीकृष्ण के पुत्र प्रतद्दुम्न को केवल एक मात्र पुत्र अनिरुद्ध थे जिस नाम का अभीष्ट मतलब सबसे सटीक अर्थ स्वयं श्रीकृष्ण ही होता है। यदुवंश के चरम अवश्था में यदुवंशियों द्वारा जब संतों का अपमान होने पर दुर्वाशा के श्राप से समस्त यदुवंश का श्रीकृष्ण समेत अंत हुआ तो श्रीकृष्ण भक्त ब्राह्मण और श्रीकृष्ण भक्त अन्य सनातन समाज जो श्रीकृष्ण के प्रति सत्य-निष्ठां और भक्ति के कारन यदुवंश के नाश से दुखी थे और जिनके कारन श्रीकृष्ण में मथुरा छोड़ कंश के ससुर और मगध नरेश जरासन्धि से इन लोगों को मुक्त कराया था और अपमानित रणछोर नाम प्राप्त किया था बार-बार जऱसंधि को हारने और आगे भी हराते रहने में सक्षम होने के बावजूद भी, वही भक्त और ब्राह्मण समाज यदुवंशी समाज का पुनः सृजन किया।

भगवान श्रीकृष्ण के एक मात्र पुत्र प्रद्दुम्न थे जो कामदेव अवतार थे (कामदेव को शिव के त्रिनेत्र=विवेक ने जलाया था तो विष्णु भगवान के कहा था की तुम सामाजिक कल्याण हेतु यदि शिव को ध्यान मुद्रा से दूर कर सती/पार्वती से संयोग कराने में सफल होते हो और उस दौरान तुम्हारी मृत्यु भी होती है तो तुम्हारा मान बढ़ा मै अगले मन्वंतर में तुमको अपने पुत्र रत्न होने का अवसर दूंगा), उनकी मात्र पुत्री चारुमती थीं जिसका मतलब होता है सुन्दर मति/ज्ञान वाली। श्रीकृष्ण के पुत्र प्रतद्दुम्न को केवल एक मात्र पुत्र अनिरुद्ध थे जिस नाम का अभीष्ट मतलब सबसे सटीक अर्थ स्वयं श्रीकृष्ण ही होता है।  यदुवंश के चरम अवश्था में यदुवंशियों द्वारा जब संतों का अपमान होने पर दुर्वाशा के श्राप से समस्त यदुवंश का श्रीकृष्ण समेत अंत हुआ तो श्रीकृष्ण  भक्त ब्राह्मण और श्रीकृष्ण भक्त अन्य सनातन समाज जो श्रीकृष्ण के प्रति सत्य-निष्ठां और भक्ति  के कारन यदुवंश के नाश से दुखी थे और जिनके कारन श्रीकृष्ण में मथुरा छोड़ कंश के ससुर और मगध नरेश जरासन्धि से इन लोगों को मुक्त कराया था और अपमानित रणछोर नाम प्राप्त किया था बार-बार जऱसंधि को हारने और आगे भी हराते रहने में सक्षम होने के बावजूद भी, वही भक्त और ब्राह्मण समाज यदुवंशी समाज का पुनः सृजन किया।   

प्रयागराज वाशियों सितम्बर 2001 से अगस्त 2004 के बीच दो बार चाय में कुछ पदार्थ मिला मुझे नपुंसक बनाने की कोशिस हुई थी इसी प्रयाग में जिसका अतिसय या पूर्ण रूपेण असर भी हुआ पर इस्वर की कृपा से वे सज्जन सफल नहीं हो सके। दोनों बार लगा था की मेरा पुरुषार्थ साथ छोड़ दिया उन सज्जन को भी जानता हूँ पर अन्त भला तो सब भला इस कारन उनके नाम को मै मृत्यु हो जाने पर भी उजागर नहीं कर सकता क्योंकि वाह्य समाज की की दृस्टि से वे मेरे तात्क्षणिक हितैशी थे तो अब उनको बदनाम क्यों किया जाय कारण यह की संदेह होने पर भी दूसरी बार उनके द्वारा दी गयी चाय पीने से मना नहीं किया था दूसरी बार मैं समझ गया था की वे मेरे विरुद्ध कार्यकरने वालों के एजेंट थे मेरे तथाकथित सुभेक्छु बाद में थे। भौतिकी विभाग कार्यालय, काशी हिन्दू विश्विद्यालय के मऊ वाले राय साहब(नाम जनता हूँ पर नाम तो नहीं लूंगा) यदि आप काशी हिन्दू विश्विद्यालय से ही मेरे ऊपर दाँव लगाए और मै अगर उस निमित्त दिए गए कार्य करने में सफल रहा तो समझिए की आप दाँव जीत गए।

प्रयागराज वाशियों सितम्बर 2001 से अगस्त 2004 के बीच दो बार चाय में कुछ पदार्थ मिला मुझे नपुंसक बनाने की कोशिस हुई थी इसी प्रयाग में जिसका अतिसय या पूर्ण रूपेण असर भी हुआ पर इस्वर की कृपा से वे सज्जन सफल नहीं हो सके। दोनों बार लगा था की मेरा पुरुषार्थ साथ छोड़ दिया उन सज्जन को भी जानता हूँ पर अन्त भला तो सब भला इस कारन उनके नाम को मै मृत्यु हो जाने पर भी उजागर नहीं कर सकता क्योंकि वाह्य समाज की की दृस्टि से वे मेरे तात्क्षणिक हितैशी थे तो अब उनको बदनाम क्यों किया जाय कारण यह की संदेह होने पर भी दूसरी बार उनके द्वारा दी गयी चाय पीने से मना नहीं किया था दूसरी बार मैं समझ गया था की वे मेरे विरुद्ध कार्यकरने वालों के एजेंट थे मेरे तथाकथित सुभेक्छु बाद में थे। भौतिकी विभाग कार्यालय, काशी हिन्दू विश्विद्यालय के मऊ वाले राय साहब(नाम जनता हूँ पर नाम तो नहीं लूंगा) यदि आप काशी हिन्दू विश्विद्यालय से ही मेरे ऊपर दाँव लगाए और मै अगर उस निमित्त दिए गए कार्य करने में सफल रहा तो समझिए की आप दाँव जीत गए। 

Monday, October 26, 2015

शरद पूर्णिमा की अमृतवर्षाने वाली प्राकृतिक गुणों से भरपूर चांदनी रात में भगवान श्रीकृष्ण की वर्षाने वाली राधा और उनकी सहेली गोपिकाओं के साथ महारासलीला को भौतिकतावादी शारीरिक चरित्रहीनता से जोड़ लेने वालों का मतिभ्रम तोड़ने का एक तथ्यपूर्ण प्रयास:----प्रथम तथ्य से मैं इस मानव समाज को अवगत कराना चाहूँगा की पहला तथ्य कृष्ण और राधा की उम्र में 13 वर्ष का अंतर था और इस प्रकार राधा स्वयं श्रीकृष्ण से 13 वर्ष बड़ी थीं तो राधा/गोपियों-कृष्ण का प्रेम आध्यात्मिक स्तर का था जिसे आप रासलीला कहते हैं न की भौतिकतावादी शारीरिक चरित्रहीनता। और दूसरा तथ्य श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में की जब वे 7 वर्ष के थे तभी वे कंश को मरने के बाद अपने पिता वशुदेव के कुलगुरु संदीपनी शांडिल्य के यहाँ शिक्षा लेने चले गए थे मतलब उस बालयकाल की अवश्था में ही वे नन्द गाँव और ब्रज और वृन्दावन में गोचारण, रासलीला और कंशवध सब कर चुके थे। तीसरा तथ्य संदीपनी शाण्डिय ऋषि के आश्रम से शिक्षा लेने के उपरांत श्रीकृष्ण अपने गुरु की गुरुदक्षिणा में उनके सागर में समा गये मृत पुत्र को पुनर्जीवित कर वापस ला गुरु से मिलाने वाले दिव्यगुण से परिचित हो परशुराम ने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र भेंट किया था जिसको आजीवन ब्रह्मचारी ही अपनी अंगुली में धारण कर सकता है तो तो श्रीकृष्ण का ब्रह्मचर्य बाल्यकाल में भांग हुआ होता तो परशुराम न उसे देते और न श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र को धारण कर पाते यह अगल है की रुक्मिणी से विवाह के बाद भी वे धारणकर्ता बने रहे थे तो वह हनुमान/अम्बवादेकर/आंबेडकर की तरह ब्रह्मचर्य वे बने रहे मतलब "जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी" और उनकी कितनी भी पैट रानियों रही हों जिनकी संख्या सोलह हजार या करोड़ भी बता दिया जाय उनके उनका कोई भौतिक पुत्र नहीं रहा है वे कृष्ण के स्वप्नद्रस्ता पुत्र भले ही जन्म दें हों। तो इस प्रकार हनुमान ही नहीं श्रीराम, श्रीकृष्ण और त्रिदेव (ब्रह्मा+विष्णु+महेश) सभी हनुमान की ही तरह जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी ही रहे हैं। तभी विष्णु अवतार दिव्यशक्ति श्रीकृष्ण परशुराम द्वारा दिया सुदर्शन चक्र धारण कर सके और तभी विष्णु अवतार दिव्यशक्ति श्रीराम परशुराम द्वारा दिए गए धनुष को स्वयंवर में प्रत्यंचाा चढ़ा कर तोड़ सके और दूसरे भेंड़ किये गए शिव धनुष को धारण कर उसका प्रयोग कर सके रावण वध में।

शरद पूर्णिमा की अमृतवर्षाने वाली प्राकृतिक गुणों से भरपूर चांदनी रात में भगवान श्रीकृष्ण की वर्षाने वाली राधा और उनकी सहेली गोपिकाओं के साथ महारासलीला को भौतिकतावादी शारीरिक चरित्रहीनता  से जोड़ लेने वालों का मतिभ्रम तोड़ने का एक तथ्यपूर्ण प्रयास:----प्रथम तथ्य से मैं इस मानव समाज को अवगत कराना चाहूँगा की पहला तथ्य कृष्ण और राधा की उम्र में 13 वर्ष का अंतर था और इस प्रकार राधा स्वयं श्रीकृष्ण से 13 वर्ष बड़ी थीं तो राधा/गोपियों-कृष्ण का प्रेम आध्यात्मिक स्तर का था जिसे आप रासलीला कहते हैं न की भौतिकतावादी शारीरिक चरित्रहीनता। और दूसरा तथ्य श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में की जब वे 7 वर्ष के थे तभी वे कंश को मरने के बाद अपने पिता वशुदेव के कुलगुरु संदीपनी शांडिल्य के यहाँ शिक्षा लेने चले गए थे मतलब उस बालयकाल की अवश्था में ही वे नन्द गाँव और ब्रज और वृन्दावन में गोचारण, रासलीला और कंशवध सब कर चुके थे। तीसरा तथ्य संदीपनी शाण्डिय ऋषि के आश्रम से शिक्षा लेने के उपरांत श्रीकृष्ण अपने गुरु की गुरुदक्षिणा में उनके सागर में समा गये मृत पुत्र को पुनर्जीवित कर वापस ला गुरु से मिलाने वाले दिव्यगुण से परिचित हो परशुराम ने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र भेंट किया था जिसको आजीवन ब्रह्मचारी ही अपनी अंगुली में धारण कर सकता है तो तो श्रीकृष्ण का ब्रह्मचर्य बाल्यकाल में भांग हुआ होता तो परशुराम न उसे देते और न श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र को धारण कर पाते यह अगल है की रुक्मिणी से विवाह के बाद भी वे  धारणकर्ता बने रहे थे तो वह हनुमान/अम्बवादेकर/आंबेडकर की तरह ब्रह्मचर्य वे बने रहे मतलब "जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी" और उनकी कितनी भी पैट रानियों रही हों जिनकी संख्या सोलह हजार या करोड़ भी बता दिया जाय उनके उनका कोई भौतिक पुत्र नहीं रहा है वे कृष्ण के स्वप्नद्रस्ता पुत्र भले ही जन्म दें हों। तो इस प्रकार हनुमान ही नहीं श्रीराम, श्रीकृष्ण और त्रिदेव (ब्रह्मा+विष्णु+महेश) सभी हनुमान की ही तरह जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी ही रहे हैं। तभी विष्णु अवतार दिव्यशक्ति श्रीकृष्ण परशुराम द्वारा दिया सुदर्शन चक्र धारण कर सके और तभी विष्णु अवतार दिव्यशक्ति श्रीराम परशुराम द्वारा दिए गए धनुष को स्वयंवर में प्रत्यंचाा चढ़ा कर तोड़ सके और दूसरे भेंड़ किये गए शिव धनुष को धारण कर उसका प्रयोग कर सके रावण वध में।  

Sunday, October 25, 2015

लेकिन मेरा मत है की जो उत्तर प्रदेश से बाहर दूसरे प्रदेश में जाय या दूसरे देश में जाय उनका भी हर ढंग से ध्यान रखा जाय जितना की यहां रहने वालों का।

लेकिन मेरा मत है की जो उत्तर प्रदेश से बाहर दूसरे प्रदेश में जाय या दूसरे देश में जाय उनका भी हर ढंग से ध्यान रखा जाय जितना की यहां रहने वालों का।

मित्रों आप मुझे कुछ बताने का प्रयास कर रहे हैं तो वह बिशुनपुर वाले मामा हिस्ट्रोरी वाले और पुलिस विभाग वाले आज़मगढ़ के नाना को भी पहचानता हूँ यही नहीं केंद्र के वरिष्ठतम और प्रथम बिशुनपुर के नाना को भी पहचानता हूँ। आप सभी भी तो मेरे अपने ही हैं और सब कुछ होने के साथ मई भी एक समाज विज्ञानी भी हूँ तो इसी लिए आप सब में जीवन के प्रति उमंग बना रहे और सुचारू रूप से जीवन चलता रहे श्रद्धेय श्री नेता जी और लक्ष्मणपुर/अवध से नियंत्रण में लगे बड़े भाई की तरह ही आप का हौंसला और धैर्य बनाये रखा हूँ और उनका भी सहयोग करने का वचन लिया हूँ बैंगलोर में ही इसीलिये संघ के साथ-साथ उसका भी दायित्व निभा रहा हूँ और आप का भी धैर्य उससे ज्यादा बनाये रखना चाहता हूँ।

मित्रों आप मुझे कुछ बताने का प्रयास कर रहे हैं तो वह बिशुनपुर वाले मामा हिस्ट्रोरी वाले और पुलिस विभाग वाले आज़मगढ़ के नाना को भी पहचानता हूँ यही नहीं  केंद्र के वरिष्ठतम और प्रथम बिशुनपुर के नाना को भी पहचानता हूँ। आप सभी भी तो मेरे अपने ही हैं और सब कुछ होने के साथ मई भी एक समाज विज्ञानी भी हूँ तो इसी लिए आप सब में जीवन के प्रति उमंग बना रहे और सुचारू रूप से जीवन चलता रहे श्रद्धेय श्री नेता जी और लक्ष्मणपुर/अवध से नियंत्रण में लगे बड़े भाई की तरह  ही आप का हौंसला और धैर्य बनाये रखा हूँ और उनका भी सहयोग करने का वचन लिया हूँ बैंगलोर में ही  इसीलिये संघ के साथ-साथ उसका भी दायित्व निभा रहा हूँ और आप का भी धैर्य उससे ज्यादा बनाये रखना चाहता हूँ। 

"Vivekanand and Modern Tradition" ब्लॉग वह व्यक्ति लिखा है जिसका पूरा परिवार वास्तविक दलित परन्तु वर्तमान में तथाकथित दलित परिवारों के भरोशे जीवन जिया है 1957 से लेकर 2008 में और 2008 में अशोकचक्र जब टूटा था उसी समय के लगभग मेरे घर का कार्यभार देखने वाले उस दादा को पक्षाघात हुआ और फिर काम करने लायक नहीं रह गए मेरे घर पर। तो आप समझ सकते हैं की यह सब केवल संयोग ही होता है की कुछ और?

"Vivekanand and Modern Tradition" ब्लॉग वह व्यक्ति लिखा है जिसका पूरा परिवार वास्तविक दलित परन्तु वर्तमान में तथाकथित दलित परिवारों के भरोशे जीवन जिया है 1957 से लेकर 2008 में और 2008 में अशोकचक्र जब टूटा था उसी समय के लगभग मेरे घर का कार्यभार देखने वाले उस दादा को पक्षाघात हुआ और फिर काम करने लायक नहीं रह गए मेरे घर पर। तो आप समझ सकते हैं की यह सब केवल संयोग ही होता है की कुछ और? 

भारतीय संविधान कहाँ के स्रोत से और किस देश के स्रोत से बना है इस पर ध्यान न देकर इसे भीम राव रामजी अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान ने ड्राप्ट किया था और राजेंद्र प्रशाद के अध्यक्षता में संविधान निर्मात्री सभा में बैठे भारतीयों के द्वारा बनाया गया था और भीम, राव, रामजी, अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान और राजेन्द्रप्रसाद में कम से कम कोई ऐसा शब्द नहीं जो धार्मिक न हो और इन नामों की वजह से जो कुछ लिखा गया है अगर उसका कोई स्रोत भी न हो तब भी मुझे मान्य है।

भारतीय संविधान कहाँ के स्रोत से और किस देश के स्रोत से बना है इस पर ध्यान न देकर इसे भीम राव रामजी अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान ने ड्राप्ट किया था और राजेंद्र प्रशाद के अध्यक्षता में संविधान निर्मात्री सभा में बैठे भारतीयों के द्वारा बनाया गया था और भीम, राव, रामजी, अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान और राजेन्द्रप्रसाद  में कम से कम कोई ऐसा शब्द नहीं जो धार्मिक न हो और इन नामों की वजह से जो कुछ लिखा गया है अगर उसका कोई स्रोत भी न हो तब भी मुझे मान्य है। 

मेरे 14 वर्ष के त्याग, तपश्या और बलिदान की कीमत इतनी कम नहीं की कोई मंत्री, विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, संतरी, व्यवसायी, विद्याविसारद और स्वयं तथाकथित विश्वमहाशक्ति के नायक लोग, बराक हुसैन(इस्लामिक नाम) ओबामा या अन्य सभी देश, मेरी अपनी वर्तमान सामान्य व्यक्ति वाली निजी जिंदगी से कोई खिलवाड़ कर सके या मुझे नचा सकें और विश्वास न हो तो एक बंद कमरे में बहस कर के देख लें पर मैं हिंदी में ही बहस करूंगा और उसी दिन से लेखनी छोड़ मई मुखर हो जाऊंगा अभी बोलने में हिचकिचाता तो कोई टिक नहीं पायेगा वहस में: --------- एक तथ्य पर ध्यान आकृष्ट कर रहा हूँ की यदि किशी जाती धर्म की कुछ लडकिया विवाह पूर्व कौमार्य भंग होने और इस प्रकार माँ बन जाने के दर से आत्म ह्त्या कर ले या कोई बिन विवाह माँ बनकर जीये या चरित्रहीनता का शिकार होते हुए दबाव बस ही सही मलिन बस्ती के युवक से विवाह कर ले, तो क्या वह जाती/धर्म समाप्त कर दी जाय या उसे नौतिक आधार पर समाप्त समझा जाय? हाँ इससे उस जाती/धर्म के लोगों में मनोबल की दृस्टि से अवसाद की स्थिति जरूर आती है पर यह ध्यान दिया जाना चाहिए की उसी जाती/धर्म के लडके स्वयं अपने ही जाती/धर्म के लिए ही नहीं सम्पूर्ण विश्ब के मानव जाती के अनगिनत जाती/धर्म के लिए आदर्श रूप रेखा ऐसी तय किये हैं क्या जिससे की सबके आत्म सम्मान और स्वाभिमान को मजबूत बनाया गया हो और जितनी पतन की घटनाएं हुई हो उससे ज्यादा उनके प्रभाव में रूकी हो। हम और हमारे वंसज अपनी जिन्दगी चुनौतियों से भले जिएंगे मेरी तरह पर उसमे जिंदादिली होगी और वे जीते हुए ही मरे समान नहीं दिखेंगे >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>मित्रों मरुश्थल में भटकते हुए मुसाफिर को तड़प-तड़प कर मरने से भला जीवन को तत्काल सुरक्षित कर देने वाला तालाब का गंदा पानी भी अमृत समान लगता है तो यह परिस्थिति वस है लेकिन इसका मतलब यह नहीं की सभी पानी में समानता और समरसता लाने हेतु इसी को आदर्श मानते हुए सम्पूर्ण समाज हमेशा गन्दा पानी पीना सुरु कर दे और अनेकों बिमारियों को स्वयं आमंत्रित कर एक-एक कर मानवता का ही अंत कर दे।

मेरे 14 वर्ष के त्याग, तपश्या और बलिदान की कीमत इतनी कम नहीं की कोई मंत्री, विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, संतरी, व्यवसायी, विद्याविसारद और स्वयं तथाकथित विश्वमहाशक्ति के नायक लोग, बराक हुसैन(इस्लामिक नाम) ओबामा या अन्य सभी देश,  मेरी अपनी वर्तमान सामान्य व्यक्ति वाली निजी जिंदगी से कोई खिलवाड़ कर सके या मुझे नचा सकें और विश्वास न हो तो एक बंद कमरे में बहस कर के देख लें पर मैं हिंदी में ही बहस करूंगा और उसी दिन से लेखनी छोड़ मई मुखर हो जाऊंगा अभी बोलने में हिचकिचाता तो कोई टिक नहीं पायेगा वहस में: --------- एक तथ्य पर ध्यान आकृष्ट कर रहा हूँ की यदि किशी जाती धर्म की कुछ लडकिया विवाह पूर्व कौमार्य भंग होने और इस प्रकार माँ बन जाने के दर से आत्म ह्त्या कर ले या कोई बिन विवाह माँ बनकर जीये या चरित्रहीनता का शिकार होते हुए दबाव बस ही सही मलिन बस्ती के युवक से विवाह कर ले, तो क्या वह जाती/धर्म समाप्त कर दी जाय या उसे नौतिक आधार पर समाप्त समझा जाय? हाँ इससे उस जाती/धर्म के लोगों में मनोबल की दृस्टि से अवसाद की स्थिति जरूर आती है पर यह ध्यान दिया जाना चाहिए की उसी जाती/धर्म के लडके स्वयं अपने ही जाती/धर्म के लिए ही नहीं सम्पूर्ण विश्ब के मानव जाती के अनगिनत जाती/धर्म के लिए आदर्श रूप रेखा ऐसी तय किये हैं क्या जिससे की सबके आत्म सम्मान और स्वाभिमान को मजबूत बनाया गया हो और जितनी पतन की घटनाएं हुई हो उससे ज्यादा उनके प्रभाव में रूकी हो। हम और हमारे वंसज अपनी जिन्दगी चुनौतियों से भले जिएंगे मेरी तरह पर उसमे जिंदादिली होगी और वे जीते हुए ही मरे समान नहीं दिखेंगे >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>मित्रों मरुश्थल में भटकते हुए मुसाफिर को तड़प-तड़प कर मरने से भला जीवन को तत्काल सुरक्षित कर देने वाला तालाब का गंदा पानी भी अमृत समान लगता है तो यह परिस्थिति वस है लेकिन इसका मतलब यह नहीं की सभी पानी में समानता और समरसता लाने हेतु इसी को आदर्श मानते हुए सम्पूर्ण समाज हमेशा गन्दा पानी पीना सुरु कर दे और अनेकों बिमारियों को स्वयं आमंत्रित कर एक-एक कर मानवता का ही अंत कर दे।   

Saturday, October 24, 2015

कैसे "सत्यमेव जयते" थे/हो तुम जिसको मेरा विकल्प पता नहीं हो सका 14 वर्षों तक जबकि मुझे स्वयं अगस्त , 1998 से मालुम था और मुझे ही मेरे समानुवंशिक सनातन गौतम गोत्रीय क्षत्रिय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भौतिकविज्ञानी बड़े भैया, विष्णु के नाम को अपना एकमात्र विकल्प बताना पड़ा। तो अंदाजा हो गया होगा की द्विवेदी जी किस विष्णु की शक्ति लिए विष्णु/श्रीधर बने घूम रहे थे और उनका क्या नाता था गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण लोगों के गाव बिशुनपुर से? और एक और सनातन कश्यप गोत्रीय बड़े भैया, पाण्डेय स्वयं किश जोशी(आंगिराज/भारद्वाज: ब्रह्मा/प्रयागराज) की शक्ति लिए घूम रहे थे? और मै स्वयं किस शिव की शक्ति लिए हुए उनकी शक्ति का विस्तार करते हुए अन्य दो और (विष्णु + ब्रह्मा) की शक्ति लिए सशरीर परमब्रह्म बना घूम रहा था? तो बिशुनपुर-223103, जौनपुर/ नायब काशी(वाराणसी), रामापुर-223225, आजमगढ़/स्वतः नायब और प्रयागराजविश्विद्यालय-211002/प्रयागराज/स्वतः नायब से विश्व की कोई मानव अछूता नहीं रह जाता है, वह किशी देश, राज्य, जनपद, तहसील, ब्लॉक, परगना और गाँव-गली में रहने वाला हो।

कैसे "सत्यमेव जयते" थे/हो तुम जिसको मेरा विकल्प पता नहीं हो सका 14 वर्षों तक जबकि मुझे स्वयं अगस्त , 1998 से मालुम था और मुझे ही मेरे समानुवंशिक सनातन गौतम गोत्रीय क्षत्रिय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भौतिकविज्ञानी बड़े भैया, विष्णु के नाम को अपना एकमात्र विकल्प बताना पड़ा। तो अंदाजा हो गया होगा की द्विवेदी जी किस विष्णु की शक्ति लिए विष्णु/श्रीधर बने घूम रहे थे और उनका क्या नाता था गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण लोगों के गाव बिशुनपुर से? और एक और सनातन कश्यप गोत्रीय बड़े भैया, पाण्डेय स्वयं किश जोशी(आंगिराज/भारद्वाज: ब्रह्मा/प्रयागराज) की शक्ति लिए घूम रहे थे? और मै स्वयं किस शिव की शक्ति लिए हुए उनकी शक्ति का विस्तार करते हुए अन्य दो और (विष्णु + ब्रह्मा) की शक्ति लिए सशरीर परमब्रह्म बना घूम रहा था? तो बिशुनपुर-223103, जौनपुर/ नायब काशी(वाराणसी), रामापुर-223225, आजमगढ़/स्वतः नायब और प्रयागराजविश्विद्यालय-211002/प्रयागराज/स्वतः नायब से विश्व की कोई मानव अछूता नहीं रह जाता है, वह किशी देश, राज्य, जनपद, तहसील, ब्लॉक, परगना और गाँव-गली में रहने वाला हो।

जो देश डॉक्टर प्रेमचंद(शिव) और श्रीश्रीधर(विष्णु ), जो मानवता के महायज्ञ के पूर्णकर्ता है और जिनका कर्जदार सम्पूर्ण विश्व मानवता का केंद्र प्रयागराज विश्विद्यालय/प्रयागराज और स्वयं मानवता के महायज्ञ के श्रीगणेश करता ब्रह्मा(जोशी) स्वयं हैं, ऐसे लोगों की सत्य निष्ठा पर संदेह करे(जिनकी सत्यता का प्रमाण मेरा स्वयं का अस्तित्व है) उस देश का नियंत्रण जहाँ से हो रहा होता है यह आम जन समझ सकते है। पर यह ज्यादा दिन चलेगा नहीं।

जो देश डॉक्टर प्रेमचंद(शिव) और श्रीश्रीधर(विष्णु ), जो मानवता के महायज्ञ के पूर्णकर्ता है और जिनका कर्जदार सम्पूर्ण विश्व मानवता का केंद्र प्रयागराज विश्विद्यालय/प्रयागराज और स्वयं मानवता के महायज्ञ के श्रीगणेश करता ब्रह्मा(जोशी) स्वयं हैं, ऐसे लोगों की सत्य निष्ठा पर संदेह करे(जिनकी सत्यता का प्रमाण मेरा स्वयं का अस्तित्व है) उस देश का नियंत्रण जहाँ से हो रहा होता है यह आम जन समझ सकते है। पर यह ज्यादा दिन चलेगा नहीं। 

मेरे इस फेसबुक में काशी हिन्दू विश्विद्यालय के पुरुषोत्तम भाई/जो स्वयं रसायनविज्ञानी हैं और विष्वकर्मा के वंसज तैयार करने वाले भाई भी हैं और इनके मित्र अविनाश भाई/ परास्नातक धन्वन्तरि भी है और अब हैं पेज पर की नहीं मुझे पता नहीं पर उनकी जानकारी में मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ की ये दोनों जो कर सकते थे समान परिश्थितियों में मै भी वैसा करने की योग्यता रखता था पर जिस परिस्थिति का सामना मैंने किया है ये दोनों लोग नहीं कर सकते थे तो अब दूसरा कोई विकल्प आप लोग मत लाइए और न इतना ऊर्जा वाला कोई था जितनी ऊर्जा उन दोनों लोगों में स्वयं थी। अंतर सिर्फ इतना था की मेरा आत्मनियंत्रण इनसे अच्छा था? लेकिन मेरा विकल्प मेरे इस फेसबुक में काशी हिन्दू विश्विद्यालय के भौतिक विज्ञानी बड़े भैया, विष्णु जरूर हैं और वे आनुवंशिक स्तर पर मेरे समतुल्य हैं और वे मेरा पूर्ण विकल्प वे हमेशा हो सकते है।

मेरे इस फेसबुक में काशी हिन्दू विश्विद्यालय के पुरुषोत्तम भाई/जो स्वयं रसायनविज्ञानी हैं  और विष्वकर्मा के वंसज तैयार करने वाले भाई भी हैं और इनके मित्र अविनाश भाई/ परास्नातक धन्वन्तरि  भी है और अब हैं पेज पर की नहीं मुझे पता नहीं पर उनकी जानकारी में  मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ की ये दोनों जो कर सकते थे समान परिश्थितियों में मै भी वैसा करने की योग्यता रखता था पर जिस परिस्थिति का सामना मैंने किया है ये दोनों लोग नहीं कर सकते थे तो अब दूसरा कोई विकल्प आप लोग मत लाइए और न इतना ऊर्जा वाला कोई था जितनी ऊर्जा उन दोनों लोगों में स्वयं थी। अंतर सिर्फ इतना था की मेरा आत्मनियंत्रण इनसे अच्छा था? लेकिन मेरा विकल्प मेरे इस फेसबुक में काशी हिन्दू विश्विद्यालय के भौतिक विज्ञानी बड़े भैया,  विष्णु जरूर हैं और वे आनुवंशिक स्तर पर मेरे समतुल्य  हैं और वे  मेरा पूर्ण विकल्प वे हमेशा हो सकते है।  

इस परम "सत्यमेव जयते" को पचाने और बर्दास्त करने के लिए पूरी दुनिया को रामापुर-223225, आजमगढ़ या बिशुनपुर-223103, जौनपुर में किशी सनातन ब्राह्मण के यहाँ नया जन्म लेना होगा या त्रिकाल दर्शी का आशीर्वाद प्राप्त करना होगा परमब्रह्म श्रीकृष्ण से संजय की तरह। इसी लिए स्वयं "सत्यमेव जयते" का पुजारी देश स्वयं ही "सत्यमेव जयते" को नहीं पचा पा रहा है। मैंने तो सत्य स्वीकार कर लिया और उसे पचा लिया और अपना कर्तव्य भी पूरा करता रहा पर इंटेलिजेंस के मान सिंह और महामाया को सत्य बर्दास्त नहीं हुआ न जो काशीराम और उनके समर्थको का समर्थन कर रहे थे न? तो सत्यमेव जयते इतना सस्ता नहीं की हर कोई उसे पचा सके? है की नहीं? तथाकथित विश्व महाशक्ति और उसके समर्थक अंततः अपनी अवकात पर आ गए और अब स्वयं "सत्यमेव जयते" को सत्यमेव जयते पच नहीं रहा है।

इस परम "सत्यमेव जयते" को पचाने और बर्दास्त करने के लिए पूरी दुनिया को  रामापुर-223225, आजमगढ़ या बिशुनपुर-223103, जौनपुर में किशी सनातन ब्राह्मण के यहाँ नया जन्म लेना होगा या त्रिकाल दर्शी का आशीर्वाद प्राप्त करना होगा परमब्रह्म श्रीकृष्ण से संजय की तरह। इसी लिए स्वयं "सत्यमेव जयते" का पुजारी देश स्वयं ही "सत्यमेव जयते" को नहीं पचा पा रहा है। मैंने तो सत्य स्वीकार कर लिया और उसे पचा लिया और अपना कर्तव्य भी पूरा करता रहा पर इंटेलिजेंस के मान सिंह और महामाया को सत्य बर्दास्त नहीं हुआ न जो काशीराम और उनके समर्थको का समर्थन कर रहे थे न? तो सत्यमेव जयते इतना सस्ता नहीं की हर कोई उसे पचा सके? है की नहीं? तथाकथित विश्व महाशक्ति और उसके समर्थक अंततः अपनी अवकात पर आ गए और अब स्वयं "सत्यमेव जयते" को सत्यमेव जयते पच नहीं रहा है।

मैंने तो सत्य स्वीकार कर लिया और उसे पचा लिया और अपना कर्तव्य भी पूरा करता रहा पर इंटेलिजेंस के मान सिंह और महामाया को सत्य बर्दास्त नहीं हुआ न जो काशीराम और उनके समर्थको का समर्थन कर रहे थे न? तो सत्यमेव जयते इतना सस्ता नहीं की हर कोई उसे पचा सके? है की नहीं? तथाकथित विश्व महाशक्ति और उसके समर्थक अंततः अपनी अवकात पर आ गए और अब स्वयं "सत्यमेव जयते" को सत्यमेव जयते पच नहीं रहा है।

http://timesofindia.indiatimes.com/india/Job-for-bribe-scam-in-Antarctic-study-centre/articleshow/49512081.cms?from=mdr


मैंने तो सत्य स्वीकार कर लिया और उसे पचा लिया और अपना कर्तव्य भी पूरा करता रहा पर इंटेलिजेंस के मान सिंह और महामाया को सत्य बर्दास्त नहीं हुआ न जो काशीराम और उनके समर्थको का समर्थन कर रहे थे न?  तो सत्यमेव जयते इतना सस्ता नहीं की हर कोई उसे पचा सके? है की नहीं? तथाकथित विश्व महाशक्ति और उसके समर्थक अंततः अपनी अवकात पर आ गए और अब स्वयं "सत्यमेव जयते" को सत्यमेव जयते पच नहीं रहा है। 

तो अब स्वयं महामाया बताएंगी की कि रामापुर-223225, आजमगढ़ के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय श्री राम प्रशाद पाण्डेय बड़े या उसी गाँव में मलिन बस्ती के श्री काशीराम बड़े?

तो अब स्वयं महामाया बताएंगी की कि रामापुर-223225, आजमगढ़ के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय श्री राम प्रशाद पाण्डेय बड़े या उसी गाँव में मलिन बस्ती के श्री काशीराम बड़े?

भीम भी पवन(+पाण्डु) पुत्र और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/मारुती/केशरीनन्दन/पवनपुत्र/आंजनेय भी पवन(+केशरी(शंकर)) पुत्र, पर रुद्रावतारी हनुमान का पुरुषार्थ उनसे ज्यादा था शंकरसुमन होने के नाते। जिसमे से भीम श्रीकृष्ण की बुआ कुंती के पुत्र और हनुमान उनके अनन्य भक्त जो सम्पूर्ण महा भारत में धर्मध्वज (केशरिया) के वाहक रहे। पर भीम भी स्त्रीजाति के सम्मान की रक्षा भी उससे ज्यादा करते थे जितना की उनसे स्त्रीजाति प्रेम करती थी और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर भी उससे ज्यादास्त्रीजाति के सम्मान की रक्षा करते थे। कीचक हो, दुशासन हो या स्वयं दुर्योधन इनका वध भीम ने ही किया था। तो अगर कोई भीम और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर अपने कर्तव्यों के विरुद्ध स्वयं स्त्री जाती का चीर हरण करे तो क्या आप उस भीम का सम्मान करेंगे?

भीम भी पवन(+पाण्डु) पुत्र और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर/मारुती/केशरीनन्दन/पवनपुत्र/आंजनेय भी पवन(+केशरी(शंकर)) पुत्र, पर रुद्रावतारी हनुमान का पुरुषार्थ उनसे ज्यादा था शंकरसुमन होने के नाते। जिसमे से भीम श्रीकृष्ण की बुआ कुंती के पुत्र और हनुमान उनके अनन्य भक्त जो सम्पूर्ण महा भारत में धर्मध्वज (केशरिया) के वाहक रहे। पर भीम भी स्त्रीजाति के सम्मान की रक्षा भी उससे ज्यादा करते थे जितना की उनसे स्त्रीजाति प्रेम करती थी और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर भी उससे ज्यादास्त्रीजाति के सम्मान की रक्षा  करते थे। कीचक हो, दुशासन हो या स्वयं दुर्योधन इनका वध भीम ने ही किया था। तो अगर कोई भीम और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर अपने कर्तव्यों के विरुद्ध स्वयं स्त्री जाती का चीर हरण करे तो क्या आप उस भीम का सम्मान करेंगे?

मान सिंह का इंटेलिजेंस क्या कर रहा था जबकि मेरा इंटेलिजेंस तो मलिन बस्ती वाले स्वर्गीय नरसिंघ राव बांडगुला/बलराज बांडगुला के घर तक पहुँच गया। कितनी/कितनी तह थी स्वर्गीय नरसिंघ राव/बलराज बांडगुला के पुत्र पर की उत्तर से दक्षिण और फिर उत्तर तक ऐसे महान विभूतियों नारायणन, काशीराम, बाजपाई, फर्नांडीज, कलाम गुरु और अब कैलाश तक की छाया ली जा रही थी/है, तब भी कोई इंटेलीजेंस काम नहीं आया सत्य को उजागर करने से रोक लेने में। सत्यमेव जयते। जय हिन्द-जय भारत।

मान सिंह का इंटेलिजेंस क्या कर रहा था जबकि मेरा इंटेलिजेंस तो मलिन बस्ती वाले स्वर्गीय नरसिंघ राव बांडगुला/बलराज बांडगुला के घर तक पहुँच गया। कितनी/कितनी तह थी स्वर्गीय नरसिंघ राव/बलराज बांडगुला के पुत्र पर की उत्तर से दक्षिण और फिर उत्तर तक ऐसे महान विभूतियों नारायणन, काशीराम, बाजपाई, फर्नांडीज, कलाम गुरु और अब कैलाश तक की छाया ली जा रही थी/है, तब भी कोई इंटेलीजेंस काम नहीं आया सत्य को उजागर करने से रोक लेने में। सत्यमेव जयते। जय हिन्द-जय भारत। 

मेरिट(प्रतिभा) की मेरिट कहाँ चरने चली जाती थी जब प्रोफेसर ए वी लागू सर और प्रोफेसर एस. एन मुखर्जी सर क्वान्टम मैकेनिक्स बेस्ड नुक्लिएर पार्टिकल स्टेट्स और एनर्जी रिलेटेड प्रॉब्लम देते थे। तो उसे वे कौन दो छात्र थे सबसे पहले हल कर दिखाते थे(अब यहाँ मेरे ऊपर क्षेत्रवाद का भी आरोप लग जाएगा और नारी विरोधी भी पर चरित्रहीनता को बढ़ावा देना ही आज समाज में भ्रस्टाचार का प्रमुख कारन नहीं हैं क्या?) । क्या यह दिमाग की तीव्रता मेरिट में नहीं आती सामने आयी समश्या को शीघ्रता से समझना और उसका तुरंत हल निकालना? बाकी अन्य सभी पेपर में तो रट कर और चैतन्य मन वालों की याददास्त क्षमता से भी अंक आ सकते है भौतकी मास्टर डिग्री में।

मेरिट(प्रतिभा) की मेरिट कहाँ चरने चली जाती थी जब प्रोफेसर ए वी लागू सर और प्रोफेसर एस. एन मुखर्जी सर क्वान्टम मैकेनिक्स बेस्ड नुक्लिएर पार्टिकल स्टेट्स और एनर्जी रिलेटेड प्रॉब्लम देते थे। तो उसे वे कौन दो छात्र थे सबसे पहले हल कर दिखाते थे(अब यहाँ मेरे ऊपर क्षेत्रवाद का भी आरोप लग जाएगा और नारी विरोधी भी पर चरित्रहीनता को बढ़ावा देना ही आज समाज में भ्रस्टाचार का प्रमुख कारन नहीं हैं क्या?) । क्या यह दिमाग की तीव्रता मेरिट में नहीं आती सामने आयी समश्या को शीघ्रता से समझना और उसका तुरंत हल निकालना? बाकी अन्य सभी पेपर में तो रट कर और चैतन्य मन वालों की याददास्त क्षमता से भी अंक आ सकते है भौतकी मास्टर डिग्री में।  

जिस दक्षिण को मै तीन महीन के अंदर राजनीती सीखा दिया और उनके पसीने छूटने लगे और मुस्किल में उनका दो वर्ष बीता(2007-2009), उसी दक्षिण की राजनैतिक विद्या उधार लेकर महामाया जी मेरे विरुद्ध लड़ाई छेंड़े हुए थीं तो वह मै गुरु कार्य में व्यस्त था। अतः उचित जबाब आप को नहीं मिल रहा था। आप हार मान लीजिये नहीं तो उससे ज्यादा मुस्किल अब होने वाली है।

जिस दक्षिण को मै तीन महीन के अंदर राजनीती सीखा दिया और उनके पसीने छूटने लगे और मुस्किल में उनका दो वर्ष बीता(2007-2009), उसी दक्षिण की राजनैतिक विद्या उधार लेकर महामाया जी मेरे विरुद्ध लड़ाई छेंड़े हुए थीं तो वह मै गुरु कार्य में व्यस्त था। अतः उचित जबाब आप को नहीं मिल रहा था। आप हार मान लीजिये नहीं तो उससे ज्यादा मुस्किल अब होने वाली है।

Friday, October 23, 2015

हनुमान/अम्बावडेकर/अम्बेडकर ब्रह्मचारी है वर्तमान तथाकथित विश्वमहाशक्ति (पाताल लोक) के नरेश मकरध्वज के पिता होने के बाजजूद तो विश्व के वे पुरुष/स्त्रीय ब्रह्मचर्य हैं, जो एकक/एकल पति/पत्नी प्रथा को पत्नीव्रत/पतिव्रता को सदाचार पूर्वक निभाते/निभाती हैं। कारन की हनुमान को अपने गुरु सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला से गुरुदक्षिणा पूर्ती हेतु विवाह करना पड़ा था जिनको वे तथाकथित विश्वमहाशक्ति (पाताल लोक) छोड़ आये थे जहा रावण के भाई अहिरावण(तत्कालीन सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा माफिया) का साम्राज्य था और वे उसके निगरानी में थी और सुवर्चला को पता था की अहिरावण के जिन पाँचों मायावी दीपक बिना मुंह से फूके जो बुझा सकता है वह पवन पुत्र हनुमान ही होंगे और उन दीपकों के बगल से पवन वेग से गुजरने के कारन वे दीपक अपने आप बुझ जाएंगे जिनको सनातन हिन्दू परम्परा में मुंह से बुझाना मना है और कोई सनातन हिन्दू धर्मी मुंह से दीपक बुझाएगा नहीं और इन मायावी दीपक के जलते अहिरावण तक पहुंचना मुसलकिल था तो अहिरावण ले राम-रावण युद्ध के समय रात के समय ही छावनी में जाकर श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण कर अहिरावण उनको इस पाताल लोक ले गया था तो हनुमान उसी रात उड़ते हुए पाताललोक पहुँच गए और दीपक बुझते हुए आगे बढे तो वहां द्वारपाल मकरध्वज माता के द्वारा दी गयी जानकारी से अपने पिता हनुमान को पहचान गए। और जब हनुमान अहिरावण को मार कर भगवान श्रीराम और लक्षमण के साथ आने लगे तो भगवान श्रीराम ने मकरध्वज का राजतिलक करते हुए वर्तमान तथाकथित विश्वमहाशक्ति (पाताल लोक) का राजा बना दिया था। यह थी अखंड ब्रह्मचारी श्रीहनुमान की कहानी और जिसे जानने के बाद कहा गया की "जिसकी एक नारी, सदा ब्रह्मचारी" क्योंकि अब दूसरा कोई उदाहरण मिलना मुस्किल था किशी अखंड ब्रह्मचारी का।

हनुमान/अम्बावडेकर/अम्बेडकर ब्रह्मचारी है वर्तमान तथाकथित विश्वमहाशक्ति (पाताल लोक) के नरेश मकरध्वज के पिता होने के बाजजूद तो विश्व के वे पुरुष/स्त्रीय ब्रह्मचर्य हैं, जो एकक/एकल पति/पत्नी प्रथा को पत्नीव्रत/पतिव्रता को सदाचार पूर्वक निभाते/निभाती हैं। कारन की हनुमान को अपने गुरु सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला से गुरुदक्षिणा पूर्ती हेतु विवाह करना पड़ा था जिनको वे तथाकथित विश्वमहाशक्ति (पाताल लोक) छोड़ आये थे जहा रावण के भाई अहिरावण(तत्कालीन सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा माफिया) का साम्राज्य था और वे उसके निगरानी में थी और सुवर्चला को पता था की अहिरावण के जिन पाँचों मायावी दीपक बिना मुंह से फूके जो बुझा सकता है वह पवन पुत्र हनुमान ही होंगे और उन दीपकों के बगल से पवन वेग से गुजरने के कारन वे दीपक अपने आप बुझ जाएंगे जिनको सनातन हिन्दू परम्परा में मुंह से बुझाना मना है और कोई सनातन हिन्दू धर्मी मुंह से दीपक बुझाएगा नहीं और इन मायावी दीपक के जलते अहिरावण तक पहुंचना मुसलकिल था तो  अहिरावण ले राम-रावण युद्ध के समय रात के समय ही छावनी में जाकर श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण कर अहिरावण उनको इस पाताल लोक ले गया था तो हनुमान उसी रात उड़ते हुए पाताललोक पहुँच गए और दीपक बुझते हुए आगे बढे तो वहां द्वारपाल मकरध्वज माता के द्वारा दी गयी जानकारी से अपने पिता हनुमान को पहचान गए। और जब हनुमान अहिरावण को मार कर भगवान श्रीराम और लक्षमण के साथ आने लगे तो भगवान श्रीराम ने मकरध्वज का राजतिलक करते हुए वर्तमान तथाकथित विश्वमहाशक्ति (पाताल लोक) का राजा बना दिया था। यह थी अखंड ब्रह्मचारी श्रीहनुमान की कहानी  और जिसे जानने के बाद कहा गया की "जिसकी एक नारी, सदा ब्रह्मचारी" क्योंकि अब दूसरा कोई उदाहरण मिलना मुस्किल था किशी अखंड ब्रह्मचारी का।  

त्रिदेवों और श्रीराम को पाने के लिए त्रिदेवियां और सीता ही तप और पूजा-अर्चना करती हैं त्रिदेव नहीं, त्रिदेव तो आपस में एक दूसरे में ही लीन हो समाधिष्ठ रहते हैं।

त्रिदेवों और श्रीराम को पाने के लिए त्रिदेवियां और सीता ही तप और पूजा-अर्चना करती हैं त्रिदेव नहीं, त्रिदेव तो आपस में एक दूसरे में ही लीन हो समाधिष्ठ रहते हैं।

27 Daughters Day (4th Sunday of September)|बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान। Special| पूरी रामायण ख़त्म हुई पर सीता के बाप कौन थे? तो मित्रों जब जनक=पिता=बाप ही सीता के बाप थे तो सीता जैसी पुत्री के बाप को भी जानना और खोजना होगा? तो बाबा डॉ. अभय चंद पाण्डेय मेरे प्रथम पुत्र के जन्म पर होने वाले अखंड रामचरित मानस पाठ में शामिल होने आये थे अपने ठिकाने से और बोले बेटा विवेक पत्थर पर दूब निकल आयी है मेरे इस बात को ध्यान करना और अपनी संतति और समाज को आगे ले जाना। मेरी ईस्वर से यही शुभकामना और तुम्हारे परिवार के स्वर्णिम भविष्य का अाशीर्वाद है। >>>>मैंने सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा/सती/पारवती को अर्पित होने वाला या उनका आहार) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा, डॉ. अभय चंद पाण्डेय अभी तक आह्वाहन नहीं किया था पर मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण नाना, श्रद्धेय पारसनाथ से अगर कुछ ज्यादा नहीं तो कुछ कम इस मानव समाज को नहीं दिए हैं। दोनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जन संघ, विश्वहिंदू परिषद् और भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ जीवन में जहां जहां से सम्बंधित रहे हर स्थान पर मानवता को संरक्षित करने का ही प्रयास किया। मै इतना सौभाग्यशाली था की इन दोनों का ह्रदय से आशीर्वाद और दूर भले रहते रहे हों विचारों मुझे प्रभावित किये रहे और जब भी मिलना हुआ पैर छू कर उनका अाशीर्वाद जो ग्रहण किया तो यह सारी कायनात मुझे समझ न पायी मानवता हित में मेरा त्याग, बलिदान और समर्पण कितना हो सकता है और मुझमे कितनी ऊर्जा और सहनशीलता है। लेकिन मित्रो यह सब इन दोनो का मुझे पर उतना ही प्रभाव था जितना की मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा जी, श्रीश्रीधर(विष्णु) मिश्रा और परमपिता परमेश्वर डॉ प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय का और यही कारन था की मुझे सामाजिक कार्यों में उतनी ही रूचि रही है जितनी की शिक्षा और शोध में और आप को आज तक के मेरे जीवन सूत्र में यह प्रतिबिम्ब परिलक्षित हो रहा है।

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Daughters Day (4th Sunday of September)|बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान। Special|
पूरी रामायण ख़त्म हुई पर सीता के बाप कौन थे? तो मित्रों जब जनक=पिता=बाप ही सीता के बाप थे तो सीता जैसी पुत्री के बाप को भी जानना और खोजना होगा? तो बाबा डॉ. अभय चंद पाण्डेय मेरे प्रथम पुत्र के जन्म पर होने वाले अखंड रामचरित मानस पाठ में शामिल होने आये थे अपने ठिकाने से और बोले बेटा विवेक पत्थर पर दूब निकल आयी है मेरे इस बात को  ध्यान करना और अपनी संतति और समाज को आगे ले जाना।  मेरी ईस्वर से यही शुभकामना और तुम्हारे परिवार के स्वर्णिम भविष्य का अाशीर्वाद है। >>>>मैंने सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा/सती/पारवती को अर्पित होने वाला या उनका आहार)  पाण्डेय ब्राह्मण बाबा,  डॉ. अभय चंद पाण्डेय अभी तक आह्वाहन नहीं किया था पर मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण नाना, श्रद्धेय पारसनाथ से अगर कुछ ज्यादा नहीं तो कुछ कम इस मानव समाज को नहीं दिए हैं।  दोनों  ने  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जन संघ, विश्वहिंदू परिषद् और भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ जीवन में जहां जहां से सम्बंधित रहे हर स्थान पर मानवता को संरक्षित करने का ही प्रयास किया। मै इतना सौभाग्यशाली था की इन दोनों का ह्रदय से आशीर्वाद और दूर भले रहते रहे हों विचारों मुझे प्रभावित किये रहे और जब भी मिलना हुआ पैर छू कर उनका अाशीर्वाद जो ग्रहण किया तो यह सारी कायनात मुझे समझ न पायी मानवता हित में मेरा त्याग, बलिदान और समर्पण कितना हो सकता है और मुझमे कितनी ऊर्जा और सहनशीलता है।  लेकिन मित्रो यह सब इन दोनो का मुझे पर उतना ही प्रभाव था जितना की मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा जी, श्रीश्रीधर(विष्णु) मिश्रा और परमपिता परमेश्वर डॉ प्रेमचंद(शिव) पाण्डेय का और यही कारन था की मुझे सामाजिक कार्यों में उतनी ही रूचि रही है जितनी की शिक्षा और शोध में और आप को आज तक के मेरे जीवन सूत्र में यह प्रतिबिम्ब परिलक्षित हो रहा है।
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Daughters Day (4th Sunday of September) बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान।Special|
सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी? क्या परनर का हाथ कुलीनस्त्री कभी धरेगी? पर अगर यह हो रहा है तो इसके प्रायोजक दंड और अपमान भुगतने के लिए तैयार हो जाए! क्योंकि ऐसा किशी सामान्य मानवीय और सामाजिक मान्य विधि से संभव नहीं वरन बलात गिरे हुए कृत्य से व्यक्तित्व को प्रभावित कर और गिराकर ही संभव है। और ऐसे लोग इतने गिरे होते हैं की उनको इस बात की चिंता करने की जरूरत ही नहीं की उनकी कन्या/स्त्री के साथ भी ऐसा हो सकता है उनसे भी गिरे किशी पशुवत/पतित मानव के द्वारा।
धर्मनिरपेक्षता का क़ानून कहता है कि हर धर्म की मौलिक नियमों की रक्षा की जाय तो मित्रों यदि किशी धर्म के किशी स्पस्ट और व्यापक मौलिक नियम की रक्षा यदि नहीं हुई, तो भारतीय संविधान जिस अशोकचक्र के बूते चल रहा वह अशोकचक्र टूटा की नहीं? अशोकचक्र टूटने की पूर्ण आशंका के तहत लव-कुश/हिन्दू-कुश ने अपना कार्य 2001 में पूर्ण किया था और उसके बाद भी अशोकचक्र तोड़ेजाने का प्रयास अनवरत जारी रहा और 2005/6  में अशोकचक्र टूटा ही कुछ विशेष ईसाई/दलित गठ जोड़ से और उसको सामाजिक और कानूनी मान्यता भी मिल गयी सनातन हिन्दू संस्कृति के मौलिक शास्त्रीय विवाह नियम का मजाक उठाते हुए मतलब धार्मिक और सामाजिक भ्रस्टाचार के साथ धर्मनिरपेक्ष देश में संवैधानिक भ्रस्टाचार को गंगाजल के सामान पवित्र और दूषण रहित तथा अनुकरणीय सिद्ध करते हुए महिमामंडित कर दिया गया। -------तो आप मुझसे या किशी अन्य भारतीय से विशेषकर ब्राह्मण/सवर्ण समाज से किस संवैधानिक नियम पालन की आशा करते हैं? अगर नियम पालन हो रहा है तो समझ लीजिये की जो कुछ हुआ वह त्याग और समर्पण से कम कुछ नहीं था और उसके लिए मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि ब्राह्मण, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर मिश्रा(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, मेरे ताऊ जी श्रद्धेय डॉ प्रेमचंद पाण्डेय(शिव) की भूरि-भूरि प्रसंशा और गुणगान होना चाहिए जिन्होंने सब कुछ जानते हुए भी मुझको प्रयागराज मानवता हित में में दफन हो जाने को कहा पर मेरा स्वयं का सुकार्यों से उपजे यश और तत्परिणाम स्वरुप लोगों के आशीर्वाद की शक्ति और बड़ों के आशीर्वाद ने इस 2003 में दफन हुए इस व्यक्ति को समाज में एक बहुत उच्च मानवमूल्य वाले स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया। लेकिन मेरा निवेदन है की पुनः किशी ब्राह्मण/सवर्ण की कन्या का शास्त्रीय नियमों के तहत किशी ईसाई/दलित युवक का पाँवपूजन विधि द्वारा हुए विवाह को समाज मान्यता न दे अगर वह विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके व्युत्क्रम जाती/धर्म को सामाजिक, धार्मिक(धार्मिक रीती-रिवाज और नियम क़ानून को मानता हो या मानना स्वीकार किया हो) और संवैधानिक रूप से स्वीकार न किया हो, चाहे इसे संवैधानिक न्यायलय या आर्यसमाज मान्यता भले देता हो, और गर ऐसा नहीं होता है तो फिर सामाजिक आधार पर आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था नहीं हो या उच्च सामाजिक वर्ग किशी महान कार्य की आशा न की जाय उसके नैतिक दायित्व को अधिक बताते हुए। ---
सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी? क्या परनर का हाथ कुलीनस्त्री कभी धरेगी? पर अगर यह हो रहा है तो इसके प्रायोजक दंड और अपमान भुगतने के लिए तैयार हो जाए! क्योंकि ऐसा किशी सामान्य मानवीय और सामाजिक मान्य विधि से संभव नहीं वरन बलात गिरे हुए कृत्य से व्यक्तित्व को प्रभावित कर और गिराकर ही संभव है। और ऐसे लोग इतने गिरे होते हैं की उनको इस बात की चिंता करने की जरूरत ही नहीं की उनकी कन्या/स्त्री के साथ भी ऐसा हो सकता है उनसे भी गिरे किशी पशुवत/पतित मानव के द्वारा।  

27 Daughters Day (4th Sunday of September) Special| बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान। आप की हर वयस्क लाडली को इस्वर माह में एक बार उसके शरीर को गंगा जल की तरह पवित्र बना देता है>>>>सम्मान सहित जीने की इक्षा रखने वाला वाला हर पिता-भाई और सम्बंधित बंधू-बांधव व् सखा(जो दो शरीर होकर भी एक मन और आत्मा हो निःस्वार्थ भाव में भी) को पता होना चाहिए की आप की हर वयस्क लाडली को इस्वर माह में एक बार उसके शरीर को गंगा जल की तरह पवित्र बना देता है तो रह जाता है मन जिसमे आप के कुलीन संस्कार भरे होते है पर यदि सामाजिक चकाचौंध, किशी पारिस्थितिक मजबूरी और अज्ञानता की वजन से उसके कदम गलत रास्ते पर चले जाते है वह एक- दो चार दिन नहीं दो-चार वर्ष भी आप की पहुँच से बाहर हो जाए और इस दौरान उसका कौमार्य भंग को जाय( ईश्वर करें की आप का संस्कार ऐसा गरिमामयी और अटूट आस्था का हो की आप की लाडली का मनोबल न टूटे और वह अपना मानसिक नियंत्रण न खोये), तो भी अगर आप की लाडली तक आप की पहुँच हो पाती है या वह स्वयं आप तक पहुँचती है किशी तरह तब भी आप और आप के समाज(विशेष रूप) को अपनी उस लाडली का किशी दूसरे ऐसे समाज के उस युवक से जो विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके व्युत्क्रम जाती/धर्म को सामाजिक, धार्मिक(धार्मिक रीती-रिवाज और नियम क़ानून को मानता हो या मानना स्वीकार किया हो) और संवैधानिक रूप से स्वीकार न किया हो उसके साथ जन्मजन्मांतर के लिए बलात्कार के लिए पुनः विवाह कर न भेंजें। क्योंकि इससे आप का मनोबल और आप का समाज तथा बंधू-बांधव और सखागण सबका मनोबल गिरता है और कुछ न कुछ मानसिक कष्ट और अवशाद आप के दूर दराज के लोगों को भी होता है जो सम्मान सहित जीवन जीना चाहते है इस दुनिया में। वैसे जब ईस्वर उसके शरीर को माह में एक बार गंगाजल की तरह पवित्र बना ही देता है तो फिर पुनः वापस आयी हुयी आप की लाडली का मनः परिवर्तन (Brain Wash) होना ही केवल जरूरी रह जाता है/ या होना होता है, जिसे आप सब बंधू-बांधव-सखा और सगे-सम्बन्धी कर सकते हैं। मेरा पुनः निवेदन है की किशी ब्राह्मण/सवर्ण की कन्या का शास्त्रीय नियमों के तहत किशी ईसाई/दलित युवक का पाँवपूजन विधि द्वारा हुए विवाह को समाज मान्यता न दे अगर वह विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके व्युत्क्रम जाती/धर्म को सामाजिक, धार्मिक(धार्मिक रीती-रिवाज और नियम क़ानून को मानता हो या मानना स्वीकार किया हो) और संवैधानिक रूप से स्वीकार न किया हो, चाहे इसे संवैधानिक न्यायलय या आर्यसमाज मान्यता भले देता हो। और गर ऐसा नहीं होता है तो फिर सामाजिक आधार पर आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था नहीं हो या उच्च सामाजिक वर्ग किशी महान कार्य की आशा न की जाय उसके नैतिक दायित्व को अधिक बताते हुए। ---सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी? क्या परनर का हाथ कुलीनस्त्री कभी धरेगी? पर अगर यह हो रहा है तो इसके प्रायोजक दंड और अपमान भुगतने के लिए तैयार हो जाए! क्योंकि ऐसा किशी सामान्य मानवीय और सामाजिक मान्य विधि से संभव नहीं वरन बलात गिरे हुए कृत्य से व्यक्तित्व को प्रभावित कर और गिराकर ही संभव है। और ऐसे लोग इतने गिरे होते हैं की उनको इस बात की चिंता करने की जरूरत ही नहीं की उनकी कन्या/स्त्री के साथ भी ऐसा हो सकता है उनसे भी गिरे किशी पशुवत/पतित मानव के द्वारा।----धर्मनिरपेक्षता का क़ानून कहता है कि हर धर्म की मौलिक नियमों की रक्षा की जाय तो मित्रों यदि किशी धर्म के किशी स्पस्ट और व्यापक मौलिक नियम की रक्षा यदि नहीं हुई, तो भारतीय संविधान जिस अशोकचक्र के बूते चल रहा वह अशोकचक्र टूटा की नहीं? अशोकचक्र टूटने की पूर्ण आशंका के तहत लव-कुश/हिन्दू-कुश ने अपना कार्य 2001 में पूर्ण किया था और उसके बाद भी अशोकचक्र तोड़ेजाने का प्रयास अनवरत जारी रहा और 2005/6 में अशोकचक्र टूटा ही कुछ विशेष ईसाई/दलित गठ जोड़ से और उसको सामाजिक और कानूनी मान्यता भी मिल गयी सनातन हिन्दू संस्कृति के मौलिक शास्त्रीय विवाह नियम का मजाक उठाते हुए मतलब धार्मिक और सामाजिक भ्रस्टाचार के साथ धर्मनिरपेक्ष देश में संवैधानिक भ्रस्टाचार को गंगाजल के सामान पवित्र और दूषण रहित तथा अनुकरणीय सिद्ध करते हुए महिमामंडित कर दिया गया। -------तो आप मुझसे या किशी अन्य भारतीय से विशेषकर ब्राह्मण/सवर्ण समाज से किस संवैधानिक नियम पालन की आशा करते हैं? अगर नियम पालन हो रहा है तो समझ लीजिये की जो कुछ हुआ वह त्याग और समर्पण से कम कुछ नहीं था और उसके लिए मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि ब्राह्मण, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर मिश्रा(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, मेरे ताऊ जी श्रद्धेय डॉ प्रेमचंद पाण्डेय(शिव) की भूरि-भूरि प्रसंशा और गुणगान होना चाहिए जिन्होंने सब कुछ जानते हुए भी मुझको प्रयागराज मानवता हित में में दफन हो जाने को कहा पर मेरा स्वयं का सुकार्यों से उपजे यश और तत्परिणाम स्वरुप लोगों के आशीर्वाद की शक्ति और बड़ों के आशीर्वाद ने इस 2003 में दफन हुए इस व्यक्ति को समाज में एक बहुत उच्च मानवमूल्य वाले स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया।

27 Daughters Day (4th Sunday of September) Special| बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान। आप की हर वयस्क लाडली को इस्वर माह में एक बार उसके शरीर को गंगा जल की तरह पवित्र बना देता है>>>>सम्मान सहित जीने की इक्षा रखने वाला वाला हर पिता-भाई और सम्बंधित बंधू-बांधव व् सखा(जो दो शरीर होकर भी एक मन और आत्मा हो निःस्वार्थ भाव में भी) को पता होना चाहिए की आप की हर वयस्क लाडली को इस्वर माह में एक बार उसके शरीर को गंगा जल की तरह पवित्र बना देता है तो रह जाता है मन जिसमे आप के कुलीन संस्कार भरे होते है पर यदि सामाजिक चकाचौंध, किशी पारिस्थितिक मजबूरी और अज्ञानता की वजन से उसके कदम गलत रास्ते पर चले जाते है वह एक-  दो चार दिन नहीं दो-चार वर्ष भी आप की पहुँच से बाहर हो जाए और इस दौरान उसका कौमार्य भंग को जाय(  ईश्वर करें की आप का संस्कार ऐसा गरिमामयी और अटूट आस्था का हो की आप की लाडली का मनोबल न टूटे और वह अपना मानसिक नियंत्रण न खोये), तो भी अगर आप की लाडली  तक आप की पहुँच हो पाती है या वह स्वयं आप तक पहुँचती है किशी तरह तब भी आप और आप के समाज(विशेष रूप) को अपनी उस लाडली  का किशी दूसरे ऐसे समाज के उस युवक से जो विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके व्युत्क्रम जाती/धर्म को सामाजिक, धार्मिक(धार्मिक रीती-रिवाज और नियम क़ानून को मानता हो या मानना स्वीकार किया हो) और संवैधानिक रूप से स्वीकार न किया हो उसके साथ जन्मजन्मांतर के लिए बलात्कार के लिए पुनः विवाह कर न भेंजें। क्योंकि इससे आप का मनोबल और आप का समाज तथा बंधू-बांधव और सखागण सबका मनोबल गिरता है और कुछ न कुछ मानसिक कष्ट और अवशाद आप के दूर दराज के लोगों को भी होता है जो सम्मान सहित जीवन जीना चाहते है इस दुनिया में। वैसे जब ईस्वर उसके शरीर को माह में एक बार गंगाजल की तरह पवित्र बना ही देता है तो फिर पुनः वापस आयी हुयी आप की लाडली का मनः परिवर्तन (Brain Wash) होना ही केवल जरूरी रह जाता है/ या होना होता है, जिसे आप सब बंधू-बांधव-सखा और सगे-सम्बन्धी कर सकते हैं। मेरा पुनः निवेदन है की किशी ब्राह्मण/सवर्ण की कन्या का शास्त्रीय नियमों के तहत किशी ईसाई/दलित युवक का पाँवपूजन विधि द्वारा हुए विवाह को समाज मान्यता न दे अगर वह विवाह पूर्व अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इनके व्युत्क्रम जाती/धर्म को सामाजिक, धार्मिक(धार्मिक रीती-रिवाज और नियम क़ानून को मानता हो या मानना स्वीकार किया हो) और संवैधानिक रूप से स्वीकार न किया हो, चाहे इसे संवैधानिक न्यायलय या आर्यसमाज मान्यता भले देता हो। और गर ऐसा नहीं होता है तो फिर सामाजिक आधार पर आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था नहीं हो या उच्च सामाजिक वर्ग किशी महान कार्य की आशा न की जाय उसके नैतिक दायित्व को अधिक बताते हुए। ---सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी? क्या परनर का हाथ कुलीनस्त्री कभी धरेगी? पर अगर यह हो रहा है तो इसके प्रायोजक दंड और अपमान भुगतने के लिए तैयार हो जाए! क्योंकि ऐसा किशी सामान्य मानवीय और सामाजिक मान्य विधि से संभव नहीं वरन बलात गिरे हुए कृत्य से व्यक्तित्व को प्रभावित कर और गिराकर ही संभव है। और ऐसे लोग इतने गिरे होते हैं की उनको इस बात की चिंता करने की जरूरत ही नहीं की उनकी कन्या/स्त्री के साथ भी ऐसा हो सकता है उनसे भी गिरे किशी पशुवत/पतित मानव के द्वारा।----धर्मनिरपेक्षता का क़ानून कहता है कि हर धर्म की मौलिक नियमों की रक्षा की जाय तो मित्रों यदि किशी धर्म के किशी स्पस्ट और व्यापक मौलिक नियम की रक्षा यदि नहीं हुई, तो भारतीय संविधान जिस अशोकचक्र के बूते चल रहा वह अशोकचक्र टूटा की नहीं? अशोकचक्र टूटने की पूर्ण आशंका के तहत लव-कुश/हिन्दू-कुश ने अपना कार्य 2001 में पूर्ण किया था और उसके बाद भी अशोकचक्र तोड़ेजाने का प्रयास अनवरत जारी रहा और 2005/6 में अशोकचक्र टूटा ही कुछ विशेष ईसाई/दलित गठ जोड़ से और उसको सामाजिक और कानूनी मान्यता भी मिल गयी सनातन हिन्दू संस्कृति के मौलिक शास्त्रीय विवाह नियम का मजाक उठाते हुए मतलब धार्मिक और सामाजिक भ्रस्टाचार के साथ धर्मनिरपेक्ष देश में संवैधानिक भ्रस्टाचार को गंगाजल के सामान पवित्र और दूषण रहित तथा अनुकरणीय सिद्ध करते हुए महिमामंडित कर दिया गया। -------तो आप मुझसे या किशी अन्य भारतीय से विशेषकर ब्राह्मण/सवर्ण समाज से किस संवैधानिक नियम पालन की आशा करते हैं? अगर नियम पालन हो रहा है तो समझ लीजिये की जो कुछ हुआ वह त्याग और समर्पण से कम कुछ नहीं था और उसके लिए मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि ब्राह्मण, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर मिश्रा(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, मेरे ताऊ जी श्रद्धेय डॉ प्रेमचंद पाण्डेय(शिव) की भूरि-भूरि प्रसंशा और गुणगान होना चाहिए जिन्होंने सब कुछ जानते हुए भी मुझको प्रयागराज मानवता हित में में दफन हो जाने को कहा पर मेरा स्वयं का सुकार्यों से उपजे यश और तत्परिणाम स्वरुप लोगों के आशीर्वाद की शक्ति और बड़ों के आशीर्वाद ने इस 2003 में दफन हुए इस व्यक्ति को समाज में एक बहुत उच्च मानवमूल्य वाले स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया।

श्री रामबहादुर चचा वंसज श्री काशीराम! अगर स्थायी निवाशी रामा(सीता)पुर( (रामा: सीता का वह नाम जो भगवान श्रीराम के नाम से ही जाना जाता है)-223225, आजमगढ़ के दोनों भाइयों सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शक्ति/सती/पारवती को अर्पित होने वाला) ब्राह्मण पाण्डेय परिवार, श्रद्धेय श्री शारंगधर(शाब्दिक अर्थ महादेव शिवशंकर)/......./देवव्रत(शाब्दिक अर्थ गंगापुत्र भीष्म)/…/ रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप(शाब्दिक अर्थ सूर्यस्वामी/सूर्यकान्त/रामजानकी/लक्ष्मीनारायण/सत्यनारायण) और मलिन बस्ती के श्री काशीराम (असली काशीराम) के बीच ही लड़ाई थी तो वह हमे "रामप्रशाद" के वंसज, विवेक कुमार को जीतना ही था और लीजिये हम जीत गए जिसे बताने और समझाने में हमें 14 वर्ष अनावश्यक लगाना पड़ा और कम से कम मलिन बस्ती के काशीराम और उनके समर्थको को अपनी हार मान लेने में ही अच्छाई है। लेकिन भाई को कभी भी निकृष्टता पर उतारू नहीं होना चाहिए की मर्यादा भंग हो जाय भाई-भाई के प्रेम की। इस दुनिया का खेल कितना निराला है?

श्री रामबहादुर चचा वंसज श्री काशीराम! अगर स्थायी निवाशी रामा(सीता)पुर( (रामा: सीता का वह नाम जो भगवान श्रीराम के नाम से ही जाना जाता है)-223225, आजमगढ़ के दोनों भाइयों सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शक्ति/सती/पारवती को अर्पित होने वाला) ब्राह्मण पाण्डेय परिवार, श्रद्धेय श्री शारंगधर(शाब्दिक अर्थ महादेव शिवशंकर)/......./देवव्रत(शाब्दिक अर्थ गंगापुत्र भीष्म)/…/ रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप(शाब्दिक अर्थ सूर्यस्वामी/सूर्यकान्त/रामजानकी/लक्ष्मीनारायण/सत्यनारायण) और मलिन बस्ती के श्री काशीराम (असली काशीराम) के बीच ही लड़ाई थी तो वह हमे "रामप्रशाद" के वंसज, विवेक कुमार को जीतना ही था और लीजिये हम जीत गए जिसे बताने और समझाने में हमें 14 वर्ष अनावश्यक लगाना पड़ा और कम से कम मलिन बस्ती के काशीराम और उनके समर्थको को अपनी हार मान लेने में ही अच्छाई है। लेकिन भाई को कभी भी निकृष्टता पर उतारू नहीं होना चाहिए की मर्यादा भंग हो जाय भाई-भाई के प्रेम की। इस दुनिया का खेल कितना निराला है?
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur

दुनिआ यदि जाती/पंथ/धर्म के आधार पर चलाई जाय तब भी हम अपना कर्तव्यनिष्ठ स्वाभिमान पूर्वक जीवन का रास्ता खोज लेंगे और यदि यह दुनिया बिना जाती/पंथ/धर्म के आधार पर चलाई जाएगी तब भी हम अपना कर्तव्यनिष्ठ स्वाभिमान पूर्वक जीवन का रास्ता खोज लेंगे, तो अब आप को तय करना है की किससे दुनिया चलाई जाय और इस वैश्विक युग में आप केवल भारत को सम्प्रभु वह इकाई नहीं मान सकते हैं जिसपर वाह्य दुनिआ का कोई असर नहीं होगा। तो ऐसे में यदि आप मिश्रित रस्ते का विकल्प भी चुनेंगे तो भी हमें मान्य है लेकिन "सत्यमेव जयते" का कहीं भी हनन न हो। हम तो वह हैं जो बड़े भाई बलराम को छोटे भाई श्रीकृष्ण का अधिकार जरूर देते है पर वह भी श्रीकृष्ण की ही मर्यादा की रक्षा करने के लिए और उनके ही निमित्त और इस प्रकार श्रीकृष्ण से मानवता की रक्षा करवा रेवती रमन, बलराम और राधारमण, श्रीकृष्ण के भातृ प्रेम और भातृ भाव को अमर कराने वाले हैं।

दुनिआ यदि जाती/पंथ/धर्म के आधार पर चलाई जाय तब भी हम अपना कर्तव्यनिष्ठ स्वाभिमान पूर्वक जीवन का रास्ता खोज लेंगे और यदि यह दुनिया बिना जाती/पंथ/धर्म के आधार पर चलाई जाएगी तब भी हम अपना कर्तव्यनिष्ठ स्वाभिमान पूर्वक जीवन का रास्ता खोज लेंगे, तो अब आप को तय करना है की किससे दुनिया चलाई जाय और इस वैश्विक युग में आप केवल भारत को सम्प्रभु वह इकाई नहीं मान सकते हैं जिसपर वाह्य दुनिआ का कोई असर नहीं होगा। तो ऐसे में यदि आप मिश्रित रस्ते का विकल्प भी चुनेंगे तो भी हमें मान्य है लेकिन "सत्यमेव जयते" का कहीं भी हनन न हो। हम तो वह हैं जो बड़े भाई बलराम को छोटे भाई श्रीकृष्ण का अधिकार जरूर देते है पर वह भी श्रीकृष्ण की ही मर्यादा की रक्षा करने के लिए और उनके ही निमित्त और इस प्रकार श्रीकृष्ण से मानवता की रक्षा करवा रेवती रमन, बलराम और राधारमण, श्रीकृष्ण के भातृ प्रेम और भातृ भाव को अमर कराने वाले हैं। 

गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर(जमदग्निपुर), 1994-1997 में मेरे गुरुदेव श्रद्धेय डॉ गिरिजा शंकर दुबे ने था की कोई जरूरी नहीं हर प्रश्न का उत्तर दे दिया जाय पर प्रयागराज विश्विद्यालय/प्रयागराज-काशी हिन्दू विश्विद्यालय/वाराणसी(काशी) (2000 -2007) से लेकर भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर/बैंगलोर (2007-2009) तक मेरा जो विरोध किया गया था उसका अप्रत्यक्ष उत्तर मैंने दे दिया है और आप लोग भी अपनी क्षमता का अंदाजा कर लीजिये। आरक्षण भारतीय और विशेष कर वैश्विक समाज के लिए हितकारी है जिसमे विशेष कर ब्राह्मण/सवर्णों को अपनी मिट्टी से जोड़ते हुए उनको आध्यात्मिकता से जुड़े रहने के लिए, बसर्ते शिक्षा में प्रवेश से लेकर सरकारी सेवा के अवसर में से किशी में भी आरक्षण का लाभ पाने वाले भी सामाजिक सत्यता को स्वीकार करते हुए अपनी जाती/वर्ग की लड़कियों का मतलब अपनी आधी आबादी जिनकी संख्या को भी वे अपनी संख्या में जोड़कर आरक्षण माँगते है और जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति पुरुषवर्ग से भी पीछे है उनका ही जीवन स्तर विवाह सम्बन्ध स्थापित करते हुए उठाने की सीमा से बद्ध रहें और इस प्रकार सामजिक अनाचार न फैलाये अपनी इस सीमा से बाहर जाते हुए और शक्ति प्रदर्शन न करें अन्यथा 2001-2008 जैसी घटनाओं से भी बड़ी महाविभीषिका जन्म ले सकती है। सामाजिक, धार्मिक, संवैधानिक वैध नियमों को स्वयं तोड़ने वालों के साथ भी विनम्रता से व्यवहार क्या व्यक्तित्व की विशालता में नहीं आता? अगर ऐसे व्यक्ति परहित जीवन छोड़ तुछ्य मानशिकता वालों के प्रतिशोध का जबाब गंभीर प्रतिशोधात्मक कार्यों से देते तो इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज, भारतवर्ष और विश्व एक गाँव तथा विश्व मानवता का भविष्य कैसा होता? दूसरों की बहन, बेटियों और बहुओं को पहले चरित्रहीन बनाने और फिर यह सार्वजनिक करने की धमकी देकर अपने मायाजाल में फंसाते हुए उनको भगाकर अपना घर वसाने वाले अपनी संतानों से किस प्रकार अच्छे चरित्र की आशा कर सकते हैं और वे किस प्रकार के समाज का निर्माण करेंगे यह आज परिलक्षित हो रहा है? टिप्पणी: अंतर्धार्मिक और दलित समाज से शास्त्रीय हिन्दू विवाह वैध नहीं और वैध तब जब विवाह पूर्व वर अपने को सामजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का का स्वीकार कर लिया हो मतलब उसे उस समय(विवाह के पूर्व) तक सनातन धर्म के पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत समस्त अधिकतम देवी, देवता और नियम-क़ानून मान्य हो क्योंकि शास्त्रीय हिन्दू विवाह एक ऐसा कर्म-कांड है जिसमे पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत लगभग समस्त अधिकतम देवी, देवता का आह्वान होता है अग्निदेव(ऊर्जा/प्रकाश) को शाक्षी मान हुए विवाह पध्धति के परिपालन में। और अगर वह विवाह पूर्व वर अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का स्वीकार कर लिया है तो फिर वह दलित या अन्य दूसरे धर्म का कहलाने का अधिकारी नहीं रह जाएगा मतलब दलित या अन्यधर्म के तहत लाभ से वंचित हो जाएगा और जब वह धर्मान्तरण करेगा तभी दूसरे धर्म में जा सकता है। इसके इतर कोई भी अन्य विधि से विवाह कर सकता है पर वह धर्म-पति/पत्नी नहीं कहे जा सकेंगे|

गांधी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर(जमदग्निपुर), 1994-1997 में मेरे गुरुदेव श्रद्धेय डॉ  गिरिजा शंकर दुबे ने था की कोई जरूरी नहीं हर प्रश्न का उत्तर दे दिया जाय पर प्रयागराज विश्विद्यालय/प्रयागराज-काशी हिन्दू विश्विद्यालय/वाराणसी(काशी) (2000 -2007)  से लेकर भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर/बैंगलोर (2007-2009) तक मेरा जो विरोध किया गया था उसका अप्रत्यक्ष उत्तर मैंने दे दिया है और आप लोग भी अपनी क्षमता का अंदाजा कर लीजिये।

आरक्षण भारतीय  और विशेष कर वैश्विक समाज के लिए हितकारी है जिसमे विशेष कर ब्राह्मण/सवर्णों को अपनी मिट्टी से जोड़ते हुए उनको आध्यात्मिकता से जुड़े रहने के लिए, बसर्ते शिक्षा में प्रवेश से लेकर सरकारी सेवा के अवसर में से किशी में भी आरक्षण  का लाभ पाने वाले भी सामाजिक सत्यता को स्वीकार करते हुए अपनी जाती/वर्ग की लड़कियों का मतलब अपनी आधी आबादी जिनकी संख्या को भी वे अपनी संख्या में जोड़कर आरक्षण माँगते है और जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति पुरुषवर्ग से भी पीछे है उनका ही जीवन स्तर विवाह सम्बन्ध स्थापित करते हुए उठाने की सीमा से बद्ध रहें और इस प्रकार सामजिक अनाचार न फैलाये अपनी इस सीमा से बाहर जाते हुए और शक्ति प्रदर्शन न करें अन्यथा 2001-2008 जैसी घटनाओं से भी बड़ी महाविभीषिका जन्म ले सकती है।

सामाजिक, धार्मिक, संवैधानिक वैध नियमों को स्वयं तोड़ने वालों के साथ भी विनम्रता से व्यवहार क्या व्यक्तित्व की विशालता में नहीं आता? अगर ऐसे व्यक्ति परहित जीवन छोड़ तुछ्य मानशिकता वालों के प्रतिशोध का जबाब गंभीर प्रतिशोधात्मक कार्यों से देते तो इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज, भारतवर्ष और विश्व एक गाँव तथा विश्व मानवता का भविष्य कैसा होता? दूसरों की बहन, बेटियों और बहुओं को पहले चरित्रहीन बनाने और फिर यह सार्वजनिक करने की धमकी देकर अपने मायाजाल में फंसाते हुए उनको भगाकर अपना घर वसाने वाले अपनी संतानों से किस प्रकार अच्छे चरित्र की आशा कर सकते हैं और वे किस प्रकार के समाज का निर्माण करेंगे यह आज परिलक्षित हो रहा है?
टिप्पणी:
अंतर्धार्मिक और दलित समाज से शास्त्रीय हिन्दू विवाह वैध नहीं और वैध तब जब विवाह पूर्व वर अपने को सामजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का का स्वीकार कर लिया हो मतलब उसे उस समय(विवाह के पूर्व) तक सनातन धर्म के पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत समस्त अधिकतम देवी, देवता और नियम-क़ानून मान्य हो क्योंकि शास्त्रीय हिन्दू विवाह एक ऐसा कर्म-कांड है जिसमे पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत लगभग समस्त अधिकतम देवी, देवता का आह्वान होता है अग्निदेव(ऊर्जा/प्रकाश) को शाक्षी मान हुए विवाह पध्धति के परिपालन में। और अगर वह विवाह पूर्व वर अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का स्वीकार कर लिया है तो फिर वह दलित या अन्य दूसरे धर्म का कहलाने का अधिकारी नहीं रह जाएगा मतलब दलित या अन्यधर्म के तहत लाभ से वंचित हो जाएगा और जब वह धर्मान्तरण करेगा तभी दूसरे धर्म में जा सकता है। इसके इतर कोई भी अन्य विधि से विवाह कर सकता है पर वह धर्म-पति/पत्नी नहीं कहे जा सकेंगे|


आरक्षण भारतीय और विशेष कर वैश्विक समाज के लिए हितकारी है जिसमे विशेष कर ब्राह्मण/सवर्णों को अपनी मिट्टी से जोड़ते हुए उनको आध्यात्मिकता से जुड़े रहने के लिए, बसर्ते शिक्षा में प्रवेश से लेकर सरकारी सेवा के अवसर में से किशी में भी आरक्षण का लाभ पाने वाले भी सामाजिक सत्यता को स्वीकार करते हुए अपनी जाती/वर्ग की लड़कियों का मतलब अपनी आधी आबादी जिनकी संख्या को भी वे अपनी संख्या में जोड़कर आरक्षण माँगते है और जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति पुरुषवर्ग से भी पीछे है उनका ही जीवन स्तर विवाह सम्बन्ध स्थापित करते हुए उठाने की सीमा से बद्ध रहें और इस प्रकार सामजिक अनाचार न फैलाये अपनी इस सीमा से बाहर जाते हुए और शक्ति प्रदर्शन न करें अन्यथा 2001-2008 जैसी घटनाओं से भी बड़ी महाविभीषिका जन्म ले सकती है।

आरक्षण भारतीय  और विशेष कर वैश्विक समाज के लिए हितकारी है जिसमे विशेष कर ब्राह्मण/सवर्णों को अपनी मिट्टी से जोड़ते हुए उनको आध्यात्मिकता से जुड़े रहने के लिए, बसर्ते शिक्षा में प्रवेश से लेकर सरकारी सेवा के अवसर में से किशी में भी आरक्षण  का लाभ पाने वाले भी सामाजिक सत्यता को स्वीकार करते हुए अपनी जाती/वर्ग की लड़कियों का मतलब अपनी आधी आबादी जिनकी संख्या को भी वे अपनी संख्या में जोड़कर आरक्षण माँगते है और जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति पुरुषवर्ग से भी पीछे है उनका ही जीवन स्तर विवाह सम्बन्ध स्थापित करते हुए उठाने की सीमा से बद्ध रहें और इस प्रकार सामजिक अनाचार न फैलाये अपनी इस सीमा से बाहर जाते हुए और शक्ति प्रदर्शन न करें अन्यथा 2001-2008 जैसी घटनाओं से भी बड़ी महाविभीषिका जन्म ले सकती है।

सामाजिक, धार्मिक, संवैधानिक वैध नियमों को स्वयं तोड़ने वालों के साथ भी विनम्रता से व्यवहार क्या व्यक्तित्व की विशालता में नहीं आता? अगर ऐसे व्यक्ति परहित जीवन छोड़ तुछ्य मानशिकता वालों के प्रतिशोध का जबाब गंभीर प्रतिशोधात्मक कार्यों से देते तो इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज, भारतवर्ष और विश्व एक गाँव तथा विश्व मानवता का भविष्य कैसा होता? दूसरों की बहन, बेटियों और बहुओं को पहले चरित्रहीन बनाने और फिर यह सार्वजनिक करने की धमकी देकर अपने मायाजाल में फंसाते हुए उनको भगाकर अपना घर वसाने वाले अपनी संतानों से किस प्रकार अच्छे चरित्र की आशा कर सकते हैं और वे किस प्रकार के समाज का निर्माण करेंगे यह आज परिलक्षित हो रहा है?
टिप्पणी:
अंतर्धार्मिक और दलित समाज से शास्त्रीय हिन्दू विवाह वैध नहीं और वैध तब जब विवाह पूर्व वर अपने को सामजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का का स्वीकार कर लिया हो मतलब उसे उस समय(विवाह के पूर्व) तक सनातन धर्म के पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत समस्त अधिकतम देवी, देवता और नियम-क़ानून मान्य हो क्योंकि शास्त्रीय हिन्दू विवाह एक ऐसा कर्म-कांड है जिसमे पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत लगभग समस्त अधिकतम देवी, देवता का आह्वान होता है अग्निदेव(ऊर्जा/प्रकाश) को शाक्षी मान हुए विवाह पध्धति के परिपालन में। और अगर वह विवाह पूर्व वर अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का स्वीकार कर लिया है तो फिर वह दलित या अन्य दूसरे धर्म का कहलाने का अधिकारी नहीं रह जाएगा मतलब दलित या अन्यधर्म के तहत लाभ से वंचित हो जाएगा और जब वह धर्मान्तरण करेगा तभी दूसरे धर्म में जा सकता है। इसके इतर कोई भी अन्य विधि से विवाह कर सकता है पर वह धर्म-पति/पत्नी नहीं कहे जा सकेंगे|

दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् । सत्यपूता वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥ In this verse Chanakya explains what device is to be used to secure or purify different things. Secure your step, he says, by watching carefully before you step further. Strain your drink water with a cloth, your speech with truth (satya) and behavior by disciplining the mind.

दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।
सत्यपूता वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥
In this verse Chanakya explains what device is to be used to secure or purify different things. Secure your step, he says, by watching carefully before you step further. Strain your drink water with a cloth, your speech with truth (satya) and behavior by disciplining the mind.

Thursday, October 22, 2015

सामाजिक, धार्मिक, संवैधानिक वैध नियमों को स्वयं तोड़ने वालों के साथ भी विनम्रता से व्यवहार क्या व्यक्तित्व की विशालता में नहीं आता? अगर ऐसे व्यक्ति परहित जीवन छोड़ तुछ्य मानशिकता वालों के प्रतिशोध का जबाब गंभीर प्रतिशोधात्मक कार्यों से देते तो इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज, भारतवर्ष और विश्व एक गाँव तथा विश्व मानवता का भविष्य कैसा होता? दूसरों की बहन, बेटियों और बहुओं को पहले चरित्रहीन बनाने और फिर यह सार्वजनिक करने की धमकी देकर अपने मायाजाल में फंसाते हुए उनको भगाकर अपना घर वसाने वाले अपनी संतानों से किस प्रकार अच्छे चरित्र की आशा कर सकते हैं और वे किस प्रकार के समाज का निर्माण करेंगे यह आज परिलक्षित हो रहा है? टिप्पणी: अंतर्धार्मिक और दलित समाज से शास्त्रीय हिन्दू विवाह वैध नहीं और वैध तब जब विवाह पूर्व वर अपने को सामजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का का स्वीकार कर लिया हो मतलब उसे उस समय(विवाह के पूर्व) तक सनातन धर्म के पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत समस्त अधिकतम देवी, देवता और नियम-क़ानून मान्य हो क्योंकि शास्त्रीय हिन्दू विवाह एक ऐसा कर्म-कांड है जिसमे पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत लगभग समस्त अधिकतम देवी, देवता का आह्वान होता है अग्निदेव(ऊर्जा/प्रकाश) को शाक्षी मान हुए विवाह पध्धति के परिपालन में। और अगर वह विवाह पूर्व वर अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का स्वीकार कर लिया है तो फिर वह दलित या अन्य दूसरे धर्म का कहलाने का अधिकारी नहीं रह जाएगा मतलब दलित या अन्यधर्म के तहत लाभ से वंचित हो जाएगा और जब वह धर्मान्तरण करेगा तभी दूसरे धर्म में जा सकता है। इसके इतर कोई भी अन्य विधि से विवाह कर सकता है पर वह धर्म-पति/पत्नी नहीं कहे जा सकेंगे|

सामाजिक, धार्मिक, संवैधानिक वैध नियमों को स्वयं तोड़ने वालों के साथ भी विनम्रता से व्यवहार क्या व्यक्तित्व की विशालता में नहीं आता?  अगर ऐसे व्यक्ति परहित जीवन छोड़ तुछ्य मानशिकता वालों के प्रतिशोध का जबाब गंभीर प्रतिशोधात्मक कार्यों से देते तो इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज, भारतवर्ष और विश्व एक गाँव तथा विश्व मानवता का भविष्य कैसा होता? दूसरों की बहन, बेटियों और बहुओं को पहले चरित्रहीन बनाने और फिर यह सार्वजनिक करने की धमकी देकर अपने मायाजाल में फंसाते हुए उनको भगाकर अपना घर वसाने वाले अपनी संतानों से किस प्रकार अच्छे चरित्र की आशा कर सकते हैं और वे किस प्रकार के समाज का निर्माण करेंगे यह आज परिलक्षित हो रहा है?  

टिप्पणी:

अंतर्धार्मिक और दलित समाज से शास्त्रीय हिन्दू विवाह वैध नहीं और वैध तब जब विवाह पूर्व वर अपने को सामजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का का स्वीकार कर लिया हो मतलब उसे उस समय(विवाह के पूर्व) तक सनातन धर्म के पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत समस्त अधिकतम देवी, देवता और नियम-क़ानून मान्य हो क्योंकि शास्त्रीय हिन्दू विवाह एक ऐसा कर्म-कांड है जिसमे पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत लगभग समस्त अधिकतम देवी, देवता का आह्वान होता है अग्निदेव(ऊर्जा/प्रकाश) को शाक्षी मान हुए विवाह पध्धति के परिपालन में। और अगर वह विवाह पूर्व वर अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का स्वीकार कर लिया है तो फिर वह दलित या अन्य दूसरे धर्म का कहलाने का अधिकारी नहीं रह जाएगा मतलब दलित या अन्यधर्म के तहत लाभ से वंचित हो जाएगा और जब वह धर्मान्तरण करेगा तभी दूसरे धर्म में जा सकता है। इसके इतर कोई भी अन्य विधि से विवाह कर सकता है पर वह धर्म-पति/पत्नी नहीं कहे जा सकेंगे|
http://vandemataramvivekananddrvkprssbhupuau.blogspot.in/

जो कार्य रावण ने नहीं किया मर्यादा की रक्षा करने हेतु वह कार्य एक तथाकथित दलित/ईसाई को शिखंडी बनाते हुए करवा दिया तथाकथित महाविश्वशक्ति मतलब पातालपुरी के अहिरावण गुट ने किया और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर पुत्र मकरध्वज को भनक तक नहीं लगी या उस समय ये पातालपुरी के राजा मकरध्वज स्वयं रावण के भाई अहिरावण के द्वारा नियंत्रीय हो गए थे तो पश्चाताप तो करना ही पडेगा हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर और उनके पुत्र मकरध्वज को यह अपमान झेलते हुए न।

जो कार्य रावण ने नहीं किया मर्यादा की रक्षा करने हेतु वह कार्य एक तथाकथित दलित/ईसाई को शिखंडी बनाते हुए करवा दिया तथाकथित महाविश्वशक्ति मतलब पातालपुरी के अहिरावण गुट ने किया और हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर पुत्र मकरध्वज को भनक तक नहीं लगी या उस समय ये पातालपुरी के राजा मकरध्वज स्वयं रावण के भाई अहिरावण के द्वारा नियंत्रीय हो गए थे तो पश्चाताप तो करना ही पडेगा  हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर और उनके पुत्र  मकरध्वज को  यह अपमान झेलते हुए न।  

फेसबुक खोलने पर पर होम पेज सबसे पहले खुलता है तो पंद्रह दिन पहले एक देवी जी जो दिल्ली की सबसे नामी-गिरामी विश्वविद्यालय में पढ़ी थीं उनके पेज के अनुसार, उनका कथन था की जिस देश में कामसूत्र की रचना हुई है उसी भारत देश में नारी की स्वक्षन्द्ता और नेचुरल फ्रीडम बाधित, और लिविंग रिलेशनशिप पर लोग उंगली उठाते हैं और जीना दूभर कर देते हैं। आप को बता दूँ की ये जातिगत टाइटल के अनुसार भारतीय समाज के संपन्न/मध्यम वर्ग की ही थीं और भारत के सर्वाधिक दिनों तक अंकवाद (मार्क-वाद) से प्रभावित प्रदेश की थीं। तो जो देवियाँ स्वक्षन्द्ता चाहती हैं, पर कर्तव्य और उत्तर दायित्व नहीं चाहती हैं मतलब इनको केवल स्वतन्त्रता पसंद नहीं जिसमे स्वक्षन्द्ता की एक सीमा अवश्य होती है; नेचुरल फ्रीडम का मतलब निर्वत्र आदिमानव जीवन समझती हो तो ऐसे लोग जो कामसूत्र को गलत सन्दर्भ में प्रयोग में लाना चाहती हैं उसे केवल बेड रूम और मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रखना चाहती हैं तो उनकी रक्षा कौन अम्बवादेकर/अम्बेडकर/हनुमान कर पायेगा?

फेसबुक खोलने पर पर होम पेज सबसे पहले खुलता है तो पंद्रह दिन पहले एक देवी जी जो दिल्ली की सबसे नामी-गिरामी विश्वविद्यालय में पढ़ी थीं उनके पेज के अनुसार, उनका कथन था की जिस देश में कामसूत्र की रचना हुई है उसी भारत देश में नारी की स्वक्षन्द्ता और नेचुरल फ्रीडम बाधित, और लिविंग रिलेशनशिप पर लोग उंगली उठाते हैं और जीना दूभर कर देते हैं। आप को बता दूँ की ये जातिगत टाइटल के अनुसार भारतीय समाज के संपन्न/मध्यम वर्ग की ही थीं और भारत के सर्वाधिक दिनों तक अंकवाद (मार्क-वाद) से प्रभावित प्रदेश की थीं। तो जो देवियाँ स्वक्षन्द्ता चाहती हैं, पर कर्तव्य और उत्तर दायित्व नहीं चाहती हैं मतलब इनको केवल स्वतन्त्रता पसंद नहीं जिसमे स्वक्षन्द्ता की एक सीमा अवश्य होती है; नेचुरल फ्रीडम का मतलब निर्वत्र आदिमानव जीवन समझती हो तो ऐसे लोग जो कामसूत्र को गलत सन्दर्भ में प्रयोग में लाना चाहती हैं उसे केवल बेड रूम और मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रखना चाहती हैं तो उनकी रक्षा कौन अम्बवादेकर/अम्बेडकर/हनुमान कर पायेगा?

दूसरों की बहन, बेटियों और बहुओं को पहले चरित्रहीन बनाने और फिर यह सार्वजनिक करने की धमकी देकर अपने मायाजाल में फंसाते हुए उनको भगाकर अपना घर वसाने वाले अपनी संतानों से किस प्रकार अच्छे चरित्र की आशा कर सकते हैं और वे किस प्रकार के समाज का निर्माण करेंगे यह आज परिलक्षित हो रहा है।

दूसरों की बहन, बेटियों और बहुओं को पहले चरित्रहीन बनाने और फिर यह सार्वजनिक करने की धमकी देकर अपने मायाजाल में फंसाते हुए उनको भगाकर अपना घर वसाने वाले अपनी संतानों से किस प्रकार अच्छे चरित्र की आशा कर सकते हैं और वे किस प्रकार के समाज का निर्माण करेंगे यह आज परिलक्षित हो रहा है।  

Wednesday, October 21, 2015

अग्रवाल सर आप किशी के प्रतिशोध में इस बार आप दुर्योधन के पक्ष में खड़े हो गुटबंदी किये हुए हैं कुछ जाती समूहों का, हो सकता है की कभी आप पांडवों के पक्ष में निष्पक्ष भाव से खड़े रहते रहे हों और तब आप को हार/जीत दोनों में सम्मान मिला हो ! आप को बता दें की यदि ऐसा ही है जैसा मै समझा हूँ तो आप ही हार 29--10-2009 को ही हो गयी थी और अब यह तो मै औपचारिकता निभा रहा हूँ आप की हार का इन्जार सार्वजनिक करने के लिए और यह भी आप को सम्मान देने की ही औपचारिकता है और जीवन भर निभाई मर्यादा की रक्षा हेतु भी औपचारिकता है अन्यथा श्रीकृष्ण बनना शेष रह गया होता तो सत्य को जानते हुए सत्य के लिए जो कुछ भी कर गुजर जाता वह नियम बन जाता पर उसमे श्रीराम जैसी मर्यादा कहाँ रह जाती? मैं पुनः आप से और इस भारतीय समाज से कहूँगा की प्रतिशोध किशी से निभाना ठीक नहीं क्योंकि इस दुनिया जिसको आप लोग देखे रहे हैं वह मेरी ही सहनशीलता पर टिकी है जबकि संकेत देने के बावजूद रस्साकशी होती रही और उसे मै ही सहता रहा विश्व के इस केंद्र, प्रयागराज और इस प्रकार प्रयागराज विश्विद्यालय में अपने को स्थिर करते हुए (बीच में दो वर्ष सुदूर दक्षिण भले रहा पर उस समय यह केंद्र, प्रयागराज ही वहा कार्यरत था और यही रस्साकशी ही वहां भी होती रही)। ।<<<< विवेक कुमार पाण्डेय (राशि नाम- गिरिधारी)।

अग्रवाल सर आप किशी के प्रतिशोध में इस बार आप दुर्योधन के पक्ष में खड़े हो गुटबंदी किये हुए हैं कुछ जाती समूहों का, हो सकता है की कभी आप पांडवों के पक्ष में निष्पक्ष भाव से खड़े रहते रहे हों और तब आप को हार/जीत दोनों में सम्मान मिला हो ! आप को बता दें की यदि ऐसा ही है जैसा मै समझा हूँ तो आप ही हार 29--10-2009 को ही हो गयी थी और अब यह तो मै औपचारिकता निभा रहा हूँ आप की हार का इन्जार सार्वजनिक करने के लिए और यह भी आप को सम्मान देने की ही औपचारिकता है और जीवन भर निभाई मर्यादा की रक्षा हेतु भी औपचारिकता है अन्यथा श्रीकृष्ण बनना शेष रह गया होता तो सत्य को जानते हुए सत्य के लिए जो कुछ भी कर गुजर जाता वह नियम बन जाता पर उसमे श्रीराम जैसी मर्यादा कहाँ रह जाती? मैं पुनः आप से और इस भारतीय समाज से कहूँगा की प्रतिशोध किशी से निभाना ठीक नहीं क्योंकि इस दुनिया जिसको आप लोग देखे रहे हैं वह मेरी ही सहनशीलता पर टिकी है जबकि संकेत देने के बावजूद रस्साकशी होती रही और उसे मै ही सहता रहा विश्व के इस केंद्र, प्रयागराज और इस प्रकार प्रयागराज विश्विद्यालय में अपने को स्थिर करते हुए (बीच में दो वर्ष सुदूर दक्षिण भले रहा पर उस समय यह केंद्र, प्रयागराज ही वहा कार्यरत था और यही रस्साकशी ही वहां भी होती रही)। ।<<<< विवेक कुमार पाण्डेय (राशि नाम- गिरिधारी)। 

मैंने कहा था न की क्रमसः कश्यप गोत्र( सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण, अन्य कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू, रघुवंशीय/इक्शाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू , तथा वृष्णि वंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू ) और गौतम गोत्र( सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण व् अन्य गौतम गोत्रीय सनातन हिन्दू व् बौद्धीस्ट मतावलम्बी) अकेले ही इस विश्व के ईसाइयत+इस्लाम तथा दलित व् अन्य समाज को समझने, समझाने व् समझौता कर विश्व जनमत को चलाने में सक्षम हैं; और वह सत्य निकला और यही सूत्र आगे भी काम आएगा। अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।

मैंने कहा था न की क्रमसः कश्यप गोत्र( सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण, अन्य कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू, रघुवंशीय/इक्शाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू , तथा वृष्णि वंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू )  और गौतम गोत्र( सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण व् अन्य गौतम गोत्रीय सनातन हिन्दू व् बौद्धीस्ट मतावलम्बी) अकेले ही इस विश्व के ईसाइयत+इस्लाम तथा  दलित व् अन्य समाज  को समझने, समझाने व् समझौता कर विश्व जनमत को चलाने में सक्षम हैं; और वह सत्य निकला और यही सूत्र आगे भी काम आएगा।  अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने  अनियंत्रित हो जाता है)  को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने  अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला  दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित  समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही  नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा। 

मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है| 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

मुझे अत्यन्त दुःख के साथ कहना पद रहा है की एकबार अशोकचक्र/कालचक्र/महादेवचक्र/धर्मचक्र/समयचक्र टूट चुका था एक दूसरे के प्रति शीतयुद्ध, कपटाचरण, दम्भ, अय्यासी और भोग विलासिता के कारन ही जिसके स्थान पर सुदर्शन चक्र चल रहा था लेकिन वह सुदर्शन चक्र जिसका चल रहा था वह  श्रीकृष्ण/गिरिधर भी महादेव  भक्त और महादेव दत्तक पुत्र ही था। इस प्रकार अगर अशोकचक्र सुदर्शन चक्र की छाया में पुनर्विकसित हुआ है अभीष्ट युक्तियों  से तो इसके बावजूद पारदर्शी सत्य के स्थान पर फिर से एक दूसरे के प्रति शीतयुद्ध, कपटाचरण, दम्भ, अय्यासी और भोग विलासिता जारी है तो फिर इस प्रकार मानवता का सफल सञ्चालन कैसे होगा। आप सभी सप्तर्षि की ही संतान है तो फिर क्यों नहीं सभी लोग अपनी संख्या कम करके पहले अखंड भारत में आ जाइए फिर वर्तमान भारत और फिर कम करते करते उत्तर भारत और फिर हिमालय की तलहटी से उत्तर प्रदेश और उत्तराँचल  तक ही सीमित हो जाइए।  उस पर भी आप शांतिपूर्वक न रह पाइए तो प्रयाग राज में आकर केवल सात पुनः हो जाइए और उस पर भी न संभव हो तो फिर तीन और फिर एक (निराकार परमब्रह्म: साकार तो श्रीराम/कृष्ण थे) हो जाइए मतलब जितने भी ब्रह्माण्ड हैं सब असीमित ऊर्जा में रूपांतरित हो जाय इस मानवता के समाप्ति के साथ और जो अनवरत जीवन ब्रह्मा का वरदान है वह ध्वस्त हो जाय। वैसे मैंने सिद्ध कर रखा है की समाज में श्रीराम और श्रीकृष्ण अस्तित्व जब तक है तभी तक इस्लाम और ईसाइयत का अस्तित्व है और उनके रहते ही वे नियंत्रित रह सकते हैं | अतः अन्य एक तिहाई जनमानस (हिन्दू +बौद्ध+शिख+जैन+अन्य सांगत पंथ) का कार्य है की की वे अपने योग से श्रीराम/कृष्ण को जीवंत रखे अपने बीच और तभी मानवता  शांतिपूर्वक और संतुलित रह पावेगी अन्यथा महादेव का प्रलय प्रवाह इस मानवता को निगल जाएगा और विश्व मानवता का मूल केंद्र भारत भूमि भी उससे अछूती नहीं रहेगी।>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित  समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है|

3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन  गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

हम आपके अनुसार अल्प संख्य ही हैं तो क्या हुआ? मुझमे जो हुनर और सजीव जिंदगी(निर्जीव जिंदगी भी होती है इसको ध्यान रखियेगा) की इक्षा शक्ति है उससे हम ज़िंदा हैं न की मेरे पास जो धन-सम्पदा है वह ही मेरे जीवन का आधार है। अतः जिस किशी को आप बहुसंख्यक समझते हैं और जिनको लाभ पहुंचाकर समानता लाना चाह रहे है उनकी सेवा का अवसर देकर देखिये की आप से ज्यादा ही भला मुझसे होगा, न की उनके लिए और अपने लिए मुझसे प्रतिशोध लेने की कोशिस कर आप अपने को ही समाप्त प्राय ऐसा कर लीजिये की कुत्ते भी बाहर से आकर आप पर हाँथ-मुँह-पैर चला कर चले जाय और आप तब तक सोते और समझते ही रह जाय की क्या हुआ और क्यों हुआ और ऐसे क्या करें की पुनः ऐसा न हो । अगर नहीं कुछ तो कम से कम संस्कार, संस्कृति, संगीत, कला तथा विज्ञान जो जीवन का मूल आधार और जीवन को रोचक और सजीव बनाने वाला है वह मेरे ही साथ ज़िंदा है या कहिये की कम से कम इसके वाहक हम ही हैं आजतक हो सकता है की बहुत कुछ अच्छा-बुरा हमसे अवश्य हुआ हो मानव स्वभाव वस। जय हिन्द, जय भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।

हम आपके अनुसार अल्प संख्य ही हैं तो क्या हुआ? मुझमे जो हुनर और सजीव जिंदगी(निर्जीव जिंदगी भी होती है इसको ध्यान रखियेगा) की इक्षा शक्ति है उससे हम ज़िंदा हैं न की मेरे पास जो धन-सम्पदा है वह ही मेरे जीवन का आधार है। अतः जिस किशी को आप बहुसंख्यक समझते हैं और जिनको लाभ पहुंचाकर समानता लाना चाह रहे है उनकी सेवा का अवसर देकर देखिये की आप से ज्यादा ही भला मुझसे होगा, न की उनके लिए और अपने लिए मुझसे प्रतिशोध लेने की कोशिस कर आप अपने को ही समाप्त प्राय ऐसा कर लीजिये की कुत्ते भी बाहर से आकर आप पर हाँथ-मुँह-पैर चला कर चले जाय और आप तब तक सोते और समझते ही रह जाय की क्या हुआ और क्यों हुआ और ऐसे क्या  करें की पुनः ऐसा न हो । अगर नहीं कुछ तो कम से कम संस्कार, संस्कृति, संगीत, कला तथा विज्ञान जो जीवन का मूल आधार और जीवन को रोचक और सजीव बनाने वाला है वह मेरे ही साथ ज़िंदा है या कहिये की कम से कम इसके वाहक हम ही हैं आजतक  हो सकता है की बहुत कुछ अच्छा-बुरा हमसे अवश्य हुआ हो मानव स्वभाव वस। जय हिन्द, जय भारत, जय श्रीराम/कृष्ण।    

Tuesday, October 20, 2015

माता शैलपुत्री

माता शैलपुत्री
(माता शैलपुत्री (Mata Shailputri): नवरात्र के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है. मां दुर्गा अपने प्रथम स्वरूप में शैलपुत्री के रूप में जानी जाती हैं. पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लेने से भगवती को शैलपुत्री कहा गया. भगवती का वाहन वृषभ है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है)|
ध्यान मंत्र
वंदे वांच्छितलाभायाचंद्रार्धकृतशेखराम्.
वृषारूढांशूलधरांशैलपुत्रीयशस्विनीम्॥
पूणेंदुनिभांगौरी मूलाधार स्थितांप्रथम दुर्गा त्रिनेत्रा.
पटांबरपरिधानांरत्नकिरीटांनानालंकारभूषिता॥
प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांतकपोलांतुंग कुचाम्.
कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीक्षीणमध्यांनितंबनीम्॥
स्तोत्र मंत्र
प्रथम दुर्गा त्वहिभवसागर तारणीम्.
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
त्रिलोकजननींत्वंहिपरमानंद प्रदीयनाम्.
सौभाग्यारोग्यदायनीशैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन.
भुक्ति, मुक्ति दायनी,शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन.
भुक्ति, मुक्ति दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
कवच मंत्र
ओमकार:में शिर: पातुमूलाधार निवासिनी.
हींकार,पातुललाटेबीजरूपामहेश्वरी॥
श्रीकार:पातुवदनेलज्जारूपामहेश्वरी.
हूंकार:पातुहृदयेतारिणी शक्ति स्वघृत॥
फट्कार:पातुसर्वागेसर्व सिद्धि फलप्रदा

माता ब्रह्मचारिणी

माता ब्रह्मचारिणी
(नवरात्र का दूसरा दिन है. नवरात्र के दूसरे दिन माता के ब्रह्मचारिणी स्वरुप की पूजा की जाती है. भगवती दुर्गा की नौ शक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है. ब्रह्म का अर्थ है, तपस्या, तप का आचरण करने वाली भगवती, जिस कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया, वेदस्तत्वंतपो ब्रह्म, वेद, तत्व और ताप [ब्रह्म] अर्थ है ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है, इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बायें हाथ में कमण्डल रहता है| माता ब्रह्मचारिणी की पूजा और साधना करने से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है. ऐसा भक्त इसलिए करते हैं ताकि उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकें)|
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
ध्यान मंत्र
वन्दे वांच्छितलाभायचन्द्रर्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलुधराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णास्वाधिष्ठानास्थितांद्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
धवल परिधानांब्रह्मरूपांपुष्पालंकारभूषिताम्॥
पद्मवंदनापल्लवाराधराकातंकपोलांपीन पयोधराम्।
कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीनिम्न नाभि नितम्बनीम्॥
स्तोत्र मंत्र
तपश्चारिणीत्वंहितापत्रयनिवारिणीम्।
ब्रह्मरूपधराब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
नवचक्रभेदनी त्वंहिनवऐश्वर्यप्रदायनीम्।
धनदासुखदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रियात्वंहिभुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदामानदा,ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्।
कवच मंत्र
त्रिपुरा में हृदयेपातुललाटेपातुशंकरभामिनी।
अर्पणासदापातुनेत्रोअर्धरोचकपोलो॥
पंचदशीकण्ठेपातुमध्यदेशेपातुमहेश्वरी॥
षोडशीसदापातुनाभोगृहोचपादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातुब्रह्मचारिणी॥

मां चंद्रघंटा

मां चंद्रघंटा
(3rd Day of Navaratri: माता भगवती के चन्द्रघंटा स्वरुप की पूजा करने का है. माता के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचन्द्र है, जिस कारण इन्हें चन्द्रघंटा कहा जाता है| मां चन्द्रघण्टा का वाहन सिंह है जिस पर दस भुजाधारी माता चन्द्रघंटा प्रसन्न मुद्रा में विराजित होती हैं. देवी के इस रूप में दस हाथ और तीन आंखें हैं. आठ हाथों में शस्त्र हैं, तो दो हाथ भक्तों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में हैं. देवी के इस रूप की पूजा कांचीपुरम में की जाती है. इनका रूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है. इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है, इनके दस हाथ हैं, इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र, बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं. इनका वाहन सिंह है, इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्धत रहने की होती है. इनके घंटे सी भयानक चंडध्वनि से अत्याचारी दानव, दैत्य, राक्षस सदैव प्रकम्पित रहते हैं)
ध्यान मंत्र
वन्दे वाच्छित लाभाय चन्द्रर्घकृत शेखराम्.
सिंहारूढा दशभुजां चन्द्रघण्टा यशंस्वनीम्॥
कंचनाभां मणिपुर स्थितां तृतीयं दुर्गा त्रिनेत्राम्.
खड्ग, गदा, त्रिशूल, चापशंर पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्यां नानालंकार भूषिताम्.
मंजीर हार, केयूर, किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुग कुचाम्.
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटिं नितम्बनीम्॥
स्तोत्र मंत्र
आपद्धद्धयी त्वंहि आधा शक्ति: शुभा पराम्.
अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यीहम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्ट मंत्र स्वरूपणीम्.
धनदात्री आनंददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायनीम्.
सौभाग्यारोग्य दायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥
कवच मंत्र
रहस्यं श्रणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने.
श्री चन्द्रघण्टास्य कवचं सर्वसिद्धि दायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोद्धारं बिना होमं.
स्नान शौचादिकं नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिकम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च.
न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥

माता कूष्माण्डा

माता कूष्माण्डा
(मां दुर्गा अपने चतुर्थ स्वरूप में माता कूष्माण्डा (Mata Kushmanda) के नाम से जानी जाती हैं. नवरात्र (Navratri) के चौथे दिन आयु, यश, बल व ऐश्वर्य को प्रदान करने वाली भगवती कूष्माण्डा की उपासना-आराधना का विधान है| अपनी मंद हंसी द्वारा अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें माता कूष्माण्डा (Mata Kushmanda) के नाम से अभिहित किया गया है. जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर अंधकार ही अंधकार परिव्याप्त था तब इन्हीं देवी ने अपने ईषत हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी. अत: यही सृष्टि की आदि स्वरूपा आदि शक्ति मानी जाती हैं. इनके पूर्व ब्रह्माण्ड का अस्तित्व था ही नहीं. इनकी आठ भुजाएं हैं. अत: ये अष्टभुजा देवी के नाम से विख्यात हैं. इनके सात हाथों में क्रमश: कमण्डल, धनुष बाण, कमल, पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं. आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है. इनका वाहन सिंह है| अपनी मंद, हल्की हंसी द्वारा ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के रूप में पूजा जाता है. संस्कृत भाषा मेंमाता कूष्माण्डा (Mata Kushmanda) को कुम्हड़ कहते हैं. बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है. इस कारण से भी मां कूष्माण्डा कहलाती हैं|)
ध्यान मंत्र
वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्.
सिंहरूढा अष्टभुजा कुष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्.
कमण्डलु चाप, बाण, पदमसुधाकलश चक्र गदा जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीया कृदुहगस्या नानालंकार भूषिताम्.
मंजीर हार केयूर किंकिण रत्‍‌नकुण्डल मण्डिताम्.
प्रफुल्ल वदनां नारू चिकुकां कांत कपोलां तुंग कूचाम्.
कोलांगी स्मेरमुखीं क्षीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ॥
स्त्रोत मंत्र
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनीम्.
जयंदा धनदां कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगन्माता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्.
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुंदरी त्वंहि दु:ख शोक निवारिणाम्.
परमानंदमयी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
कवच मंत्र
हसरै मे शिर: पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्.
हसलकरीं नेत्रथ, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे वाराही उत्तरे तथा.
पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम.
दिग्दिध सर्वत्रैव कूं बीजं सर्वदावतु॥

स्कन्दमाता

स्कन्दमाता
(शेर पर सवार होकर माता दुर्गा अपने पांचवें स्वरुप स्कन्दमाता के रुप में भक्तजनों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहती हैं. कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री देवी स्कन्दमाता (Skandmata) का यह स्वरूप देवताओं की सेना के मुखिया स्कन्द कुमार (कार्तिकेय) की माता का स्वरूप है, इसलिए उन्हें स्कन्दमाता कहा जाता है| स्कन्दमाता (Skandmata) शेर की सवारी पर विराजमान हैं और उनकी चार भुजाएं हैं| चतुर्भुजी और त्रिनेत्री माता ने अपने दो हाथों में कमलदल लिए हैं और एक हाथ से अपनी गोद में ब्रह्मस्वरूप स्कन्द कुमार को थामा हुआ है. चौथा हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में है| इनका वर्ण पूर्णतः श्वेत है और ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं, जिस कारण माता को पद्मासना देवी भी कहा जाता है)
मंत्र : सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया |
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ||
नवरात्र पर्व (Navaratri festival) के पांचवें दिन मां स्कन्दमाता (Skandmata) की पूजा इस सरल मंत्र से करने से माता की कृपा बनी रहती है.
ध्यान मंत्र
वन्दे वांछित कामर्थेचन्द्रार्घकृतशेखराम्.
सिंहारूढाचतुर्भुजास्कन्धमातायशस्वनीम्॥
धवलवर्णाविशुद्ध चक्रस्थितांपंचम दुर्गा त्रिनेत्राम.
अभय पदमयुग्म करांदक्षिण उरूपुत्रधरामभजेम्॥
पटाम्बरपरिधानाकृदुहज्ञसयानानालंकारभूषिताम्.
मंजीर हार केयूर किंकिणिरत्नकुण्डलधारिणीम..
प्रभुल्लवंदनापल्लवाधरांकांत कपोलांपीन पयोधराम्.
कमनीयांलावण्यांजारूत्रिवलींनितम्बनीम्॥
स्तोत्र मंत्र
नमामि स्कन्धमातास्कन्धधारिणीम्.
समग्रतत्वसागरमपारपारगहराम्॥
शिप्रभांसमुल्वलांस्फुरच्छशागशेखराम्.
ललाटरत्‍‌नभास्कराजगतप्रदीप्तभास्कराम्॥
महेन्द्रकश्यपाíचतांसनत्कुमारसंस्तुताम्.
सुरासेरेन्द्रवन्दितांयथार्थनिर्मलादभुताम्॥
मुमुक्षुभिíवचिन्तितांविशेषतत्वमूचिताम्.
नानालंकारभूषितांकृगेन्द्रवाहनाग्रताम्..
सुशुद्धतत्वातोषणांत्रिवेदमारभषणाम्.
सुधाíमककौपकारिणीसुरेन्द्रवैरिघातिनीम्॥
शुभांपुष्पमालिनीसुवर्णकल्पशाखिनीम्.
तमोअन्कारयामिनीशिवस्वभावकामिनीम्॥
सहस्त्रसूर्यराजिकांधनज्जयोग्रकारिकाम्.
सुशुद्धकाल कन्दलांसुभृडकृन्दमज्जुलाम्॥
प्रजायिनीप्रजावती नमामिमातरंसतीम्.
स्वकर्मधारणेगतिंहरिप्रयच्छपार्वतीम्॥
इनन्तशक्तिकान्तिदांयशोथमुक्तिदाम्.
पुन:पुनर्जगद्धितांनमाम्यहंसुराíचताम॥
जयेश्वरित्रिलाचनेप्रसीददेवि पाहिमाम्॥
कवच मंत्र
ऐं बीजालिंकादेवी पदयुग्मधरापरा.
हृदयंपातुसा देवी कातिकययुता॥
श्रींहीं हुं ऐं देवी पूर्वस्यांपातुसर्वदा.
सर्वाग में सदा पातुस्कन्धमातापुत्रप्रदा॥
वाणवाणामृतेहुं फट् बीज समन्विता.
उत्तरस्यातथाग्नेचवारूणेनेत्रतेअवतु॥
इन्द्राणी भैरवी चैवासितांगीचसंहारिणी.
सर्वदापातुमां देवी चान्यान्यासुहि दिक्षवै॥

माँ कात्यायनी

माँ कात्यायनी
(नवरात्र पर्व (Navratri Festival) का छठा दिन: मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है. महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न होकर माता ने आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था|)
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम ॥
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कात्यायनी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है. या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ. हे माँ, मुझे दुश्मनों का संहार करने की शक्ति प्रदान कर.
ध्यान मंत्र
वन्दे वांछित मनोरथार्थचन्द्रार्घकृतशेखराम्.
सिंहारूढचतुर्भुजाकात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णवर्णाआज्ञाचक्रस्थितांषष्ठम्दुर्गा त्रिनेत्राम।
वराभीतंकरांषगपदधरांकात्यायनसुतांभजामि॥
पटाम्बरपरिधानांस्मेरमुखींनानालंकारभूषिताम्।
मंजीर हार केयुरकिंकिणिरत्नकुण्डलमण्डिताम्॥
प्रसन्नवंदनापज्जवाधरांकातंकपोलातुगकुचाम्।
कमनीयांलावण्यांत्रिवलीविभूषितनिम्न नाभिम्॥
स्तोत्र मंत्र
कंचनाभां कराभयंपदमधरामुकुटोज्वलां।
स्मेरमुखीशिवपत्नीकात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥
पटाम्बरपरिधानांनानालंकारभूषितां
सिंहास्थितांपदमहस्तांकात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥
परमदंदमयीदेवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति,परमभक्ति्कात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥
विश्वकर्ती,विश्वभर्ती,विश्वहर्ती,विश्वप्रीता।
विश्वाचितां,विश्वातीताकात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥
कां बीजा, कां जपानंदकां बीज जप तोषिते।
कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥
कांकारहíषणीकां धनदाधनमासना।
कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥
कां कारिणी कां मूत्रपूजिताकां बीज धारिणी।
कां कीं कूंकै क:ठ:छ:स्वाहारूपणी॥
कवच मंत्र
कात्यायनौमुख पातुकां कां स्वाहास्वरूपणी।
ललाटेविजया पातुपातुमालिनी नित्य संदरी॥
कल्याणी हृदयंपातुजया भगमालिनी॥

माँ कालरात्रि

माँ कालरात्रि
(नवरात्रि के सातवें दिन मां भगवती के सातवें स्वरूप: मां कालरात्रि का शरीर का रंग अंधकार की तरह गहरा काला है. इनके शरीर के केश बिखरे हुए गले में विद्युत सदृश चमकीली माला है. इनके तीन नेत्र हैं, जो ब्रह्मांड की तरह गोल हैं. इन तीनों से विद्युत की ज्योति चमकती रहती है. नासिका से श्वास प्रश्वांस छोड़ने पर हजारों अग्नि की ज्वालाएं निकलती रहती हैं. इनका वाहन गदहा है| माता कालरात्रि के ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ में चमकती तलवार है, इसके नीचे हाथ में वरमुद्रा है, जिससे भक्तों को अभीष्ट वर देती हैं. बांधे हाथ में जलती हुई मशाल है और नीचे वाले हाथ में अभयमुद्रा है. जिससे अपने सेवकों को अभयदान करती हैं और भक्तों को सभी कष्टों से मुक्त करती हैं. अतएव शुभ करने से ही शुभकारी भी हैं|)
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्मा खरास्थिता |
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ||
वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा |
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिभयंकरी ||

महागौरी

महागौरी
( नवरात्र का आठवां दिन: मां गौरी को शिव की अर्धागनी और गणेश की माता के रुप में जाना जाता है. महागौरी की शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है. इनकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं| भगवती महागौरी वृषभ के पीठ पर विराजमान हैं, जिनके मस्तक पर चन्द्र का मुकुट है. मणिकान्तिमणि के समान कान्ति वाली अपनी चार भुजाओं में शंख, चक्र, धनुष और बाण धारण किए हुए हैं, जिनके कानों में रत्नजडितकुण्डल झिलमिलाते हैं, ऐसी भगवती महागौरी हैं|)
मंत्र : या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
ध्यान मंत्र :-
वन्दे वांछित कामार्थेचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
सिंहारूढाचतुर्भुजामहागौरीयशस्वीनीम्॥
पुणेन्दुनिभांगौरी सोमवक्रस्थितांअष्टम दुर्गा त्रिनेत्रम।
वराभीतिकरांत्रिशूल ढमरूधरांमहागौरींभजेम्॥
पटाम्बरपरिधानामृदुहास्यानानालंकारभूषिताम्।
मंजीर, कार, केयूर, किंकिणिरत्न कुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांत कपोलांचैवोक्यमोहनीम्।
कमनीयांलावण्यांमृणालांचंदन गन्ध लिप्ताम्॥
स्तोत्र मंत्र :-
सर्वसंकट हंत्रीत्वंहिधन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदाचतुर्वेदमयी,महागौरीप्रणमाम्यहम्॥
सुख शांति दात्री, धन धान्य प्रदायनीम्।
डमरूवाघप्रिया अघा महागौरीप्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यमंगलात्वंहितापत्रयप्रणमाम्यहम्।
वरदाचैतन्यमयीमहागौरीप्रणमाम्यहम्॥
कवच मंत्र :-
ओंकार: पातुशीर्षोमां, हीं बीजंमां हृदयो।
क्लींबीजंसदापातुनभोगृहोचपादयो॥
ललाट कर्णो,हूं, बीजंपात महागौरीमां नेत्र घ्राणों।
कपोल चिबुकोफट् पातुस्वाहा मां सर्ववदनो॥

माँ सिद्धिदात्री

माँ  सिद्धिदात्री
(आदि शक्ति भगवती का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिनकी चार भुजाएं हैं. उनका आसन कमल है. दाहिनी ओर नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा, बाई ओर से नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प है| मां सिद्धिदात्री सुर और असुर दोनों के लिए पूजनीय हैं. जैसा कि मां के नाम से ही प्रतीत होता है मां सभी इच्छाओं और मांगों को पूरा करती हैं. ऐसा माना जाता है कि देवी का यह रूप यदि भक्तों पर प्रसन्न हो जाता है, तो उसे 26 वरदान मिलते हैं. हिमालय के नंदा पर्वत पर सिद्धिदात्री का पवित्र तीर्थस्थान है.)
आइए, नवरात्र के अवसर पर हम जगत माता देवी दुर्गा से यह प्रार्थना करें :
सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:.
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दु:ख भाग्यवेत्.
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेणसंस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
ध्यान मंत्र
वन्दे वंछितमनरोरार्थेचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
कमलस्थिताचतुर्भुजासिद्धि यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णानिर्वाणचक्रस्थितानवम् दुर्गा त्रिनेत्राम।
शंख, चक्र, गदा पदमधरा सिद्धिदात्रीभजेम्॥
पटाम्बरपरिधानांसुहास्यानानालंकारभूषिताम्।
मंजीर, हार केयूर, किंकिणिरत्नकुण्डलमण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनापल्लवाधराकांत कपोलापीनपयोधराम्।
कमनीयांलावण्यांक्षीणकटिंनिम्ननाभिंनितम्बनीम्॥
स्तोत्र मंत्र
कंचनाभा शंखचक्रगदामधरामुकुटोज्वलां।
स्मेरमुखीशिवपत्नीसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥
पटाम्बरपरिधानांनानालंकारभूषितां।
नलिनस्थितांपलिनाक्षींसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥
परमानंदमयीदेवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति,परमभक्तिसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥
विश्वकतींविश्वभर्तीविश्वहतींविश्वप्रीता।
विश्वíचताविश्वतीतासिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारणीभक्तकष्टनिवारिणी।
भवसागर तारिणी सिद्धिदात्रीनमोअस्तुते।।
धर्माथकामप्रदायिनीमहामोह विनाशिनी।
मोक्षदायिनीसिद्धिदात्रीसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥
कवच मंत्र
ओंकार: पातुशीर्षोमां, ऐं बीजंमां हृदयो।
हीं बीजंसदापातुनभोगृहोचपादयो॥
ललाट कर्णोश्रींबीजंपातुक्लींबीजंमां नेत्र घ्राणो।
कपोल चिबुकोहसौ:पातुजगत्प्रसूत्यैमां सर्व वदनो॥

विदेशी तथा तेलगु/तमिल दिशा निर्देश पर फिल्मी अंदाज में पिछड़े वर्ग को मिलाओ ब्राह्मणो/सवर्णो को रगड़ो और फिर रहस्य बाहर आ जाय तो ब्राह्मण/सवर्ण को मिलाओ पिछड़ों को रगड़ो पर यह तो केवल दो बार ही संभव था। इस तरह की राजनैतिक तकनीति तो गदहा भी समझ जाएगा और वह उजागर हो ही गयी है तो क्या उससे आगे कोई राजनीती आप को आ रही है या आगे आप को राजनीती नहीं करनी है/थी लक्ष्मी जी।

विदेशी तथा तेलगु/तमिल दिशा निर्देश पर फिल्मी अंदाज में पिछड़े वर्ग को मिलाओ ब्राह्मणो/सवर्णो को रगड़ो और फिर रहस्य बाहर आ जाय तो ब्राह्मण/सवर्ण को मिलाओ  पिछड़ों को रगड़ो पर यह तो केवल दो बार ही संभव था। इस तरह की राजनैतिक तकनीति तो गदहा भी समझ जाएगा और वह उजागर हो ही गयी है तो क्या उससे आगे कोई राजनीती आप को आ रही है या आगे आप को राजनीती नहीं करनी है/थी लक्ष्मी जी। 

अंतरराष्ट्रीय झंझावातों के बीच इस दुनिया के केंद्र, प्रयागराज और इस प्रकार प्रयागराज विश्विद्यालय में बटुकेश्वर(=शिव का वह स्वरुप जो कार्यउपरांत विष्णु के प्रभाव से नियंत्रित हुआ)/खेत्रपाल के समय में जोशी(ब्रह्मा) के दिशानिर्देशन में तैयार किये गए खेतों में बीज बोन से लेकर वृक्ष विकाश तक और इस पौध से पुनः बीज विस्तारण प्रक्रिया प्रारम्भ होने तक का ठीका लेने वाला कौन था? जिसकी प्रारंभिक प्रक्रिया पूरी होने से पूर्व ही जोशी खुद विस्थापित कर दिए गए हो प्रयागराज से पर प्रयागराज विश्विद्यालय में उनका श्रेष्ठतम उद्देश पूर्ण होने से कोई रोक न सका। ----------अगर अब भी जो न समझा हो तो अब समझ जाइए:---------- वह थे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, शिव(प्रेमचंद) और सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा विष्णु(श्रीधर) और उनके शुभेक्षु-सहयोगी और समर्पित लोग जो इनके दिशा निर्देशन पर अपने कार्य से विचलित नहीं हुए। अतः 67 नए स्वयंसेवको को ज्यादा इतराना नहीं चाहिए इलाहाबाद विश्विद्यालय में आकर और एक चमचे की तरह नहीं वरन एक दक्ष वैश्विक शिक्षक की तरह नवीन चुनौतियों से समक्ष अपनी भूमिका निभानी चाहिए। >>>>>>>आप जब हमसे कही मिलते है तो कुछ आभासी बात करते और कुछ अपने मन वाली करते हैं तथा संसारिक रूप से मेरे पक्ष-विपक्ष में कार्य करते है और बयान देते है उसी तरह से जब मै और वे दो और एक लोग भी भी आप से मिलते हैं तो देश-काल-परिस्थिति के अनुसार ही बात करते है, पर मेरी असली ऊर्जा यह है जो मै लिख रहा हूँ; और सांसारिक ऊर्जा यह है जो मै आप के सामने व्यवहार करता हूँ उसी प्रकार किशी सशरीर परमब्रह्म ने जोशी में ब्रह्मा, प्रेमचंद में शिव और श्रीधर में विष्णु की शक्ति देखी और उसी शक्ति को अपनी शक्ति बना सशरीर अवस्था में परमब्रह्म के अपने कार्य को अंजाम देता रहता है|>>>>>>>>>>जब श्रीराधा की सीमा यशोदा के ही किशी रिस्तेदार या जातीय/धार्मिक सम कक्ष तक ही सीमित रहती है तभी तक आप किशी विष्णु/शिव अवतारी को केवल श्रीकृष्ण की सीमा के अंदर बाँध सकते है, पर जब राधा की सीमा उससे बाहर हुई तो वह विष्णु या यदि विशेस संभावित परिस्थिति का शिव/रूद्र अवतारी श्रीकृष्ण केवल समय विशेष का सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) (गुरु सांदीपनि शांडिल्य के पुत्र पुनरदत्त के जीवन वापस करने वाला तथा अर्जुन मोह को दूर करने हेतु श्रीमद्भागवत के उपदेश काल के लिए ही समय बद्ध सशरीर परमब्रह तथा शेष समय विष्णु अवतारी) ही नहीं वरन शेष जीवनोपरांत सशरीर परमब्रह्म बना जाता है। विष्णु के द्वारपाल जय-विजय/रावण-कुम्भकर्ण की तरह प्रयागराज के आज तक के इतिहास में सर्वोच्च ब्राह्मणोचित व्यवहार करने वाले जननेता जो अंतरराष्ट्रीय छविवाले रहे हों उनको उनके विशेष निकटतम द्वारपालों/शिष्यों ने विश्वव्यापक परिदृश्य में वैश्विक परिस्थितिओं को ध्यान में रखे बिना स्थानीय राजनीति और किशी जाती/धर्म विशेष के प्रतिशोध में उनको दर-दर का भिखारी बना दिया मतलब जितनी सेवा नहीं की उनको उससे ज्यादा दर्द दिया अपने वंसजों और मातहतों के कुकृत्य द्वारा और दर्द ऐसा की पूरे जीवन की कीर्ति और यश पर पर्दा पड़ गया। इसी लिए कहा जाता है की "जीवन में चतुर दुश्मन मिलना, मूर्ख मित्र/दास/भक्त/शिष्य से ज्यादा श्रेष्कर है"।

अंतरराष्ट्रीय झंझावातों के बीच इस दुनिया के केंद्र, प्रयागराज और इस प्रकार प्रयागराज विश्विद्यालय में बटुकेश्वर(=शिव का वह स्वरुप जो कार्यउपरांत विष्णु के प्रभाव से नियंत्रित हुआ)/खेत्रपाल के समय में जोशी(ब्रह्मा) के दिशानिर्देशन में तैयार किये गए खेतों में बीज बोन से लेकर वृक्ष विकाश तक और इस पौध से पुनः बीज विस्तारण प्रक्रिया प्रारम्भ होने तक का ठीका लेने वाला कौन था? जिसकी प्रारंभिक प्रक्रिया पूरी होने से पूर्व ही जोशी खुद विस्थापित कर दिए गए हो प्रयागराज से पर प्रयागराज विश्विद्यालय में उनका श्रेष्ठतम उद्देश पूर्ण होने से कोई रोक न सका। ----------अगर अब भी जो न समझा हो तो अब समझ जाइए:---------- वह थे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, शिव(प्रेमचंद) और सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा विष्णु(श्रीधर) और उनके शुभेक्षु-सहयोगी और समर्पित लोग जो इनके दिशा निर्देशन पर अपने कार्य से विचलित नहीं हुए। अतः 67 नए स्वयंसेवको को ज्यादा इतराना नहीं चाहिए इलाहाबाद विश्विद्यालय में आकर और एक चमचे की तरह नहीं वरन एक दक्ष वैश्विक शिक्षक की तरह नवीन चुनौतियों से समक्ष अपनी भूमिका निभानी चाहिए। >>>>>>>आप जब हमसे कही मिलते है तो कुछ आभासी बात करते और कुछ अपने मन वाली करते हैं तथा संसारिक रूप से मेरे पक्ष-विपक्ष में कार्य करते है और बयान देते है उसी तरह से जब मै और वे दो और एक लोग भी भी आप से मिलते हैं तो देश-काल-परिस्थिति के अनुसार ही बात करते है, पर मेरी असली ऊर्जा यह है जो मै लिख रहा हूँ; और सांसारिक ऊर्जा यह है जो मै आप के सामने व्यवहार करता हूँ उसी प्रकार किशी सशरीर परमब्रह्म ने जोशी में ब्रह्मा, प्रेमचंद में शिव और श्रीधर में विष्णु की शक्ति देखी और उसी शक्ति को अपनी शक्ति बना सशरीर अवस्था में परमब्रह्म के अपने कार्य को अंजाम देता रहता है|>>>>>>>>>>जब श्रीराधा की सीमा यशोदा के ही किशी रिस्तेदार या जातीय/धार्मिक सम कक्ष तक ही सीमित रहती है तभी तक आप किशी विष्णु/शिव अवतारी को केवल श्रीकृष्ण की सीमा के अंदर बाँध सकते है, पर जब राधा की सीमा उससे बाहर हुई तो वह विष्णु या यदि विशेस संभावित परिस्थिति का शिव/रूद्र अवतारी श्रीकृष्ण केवल समय विशेष का सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) (गुरु सांदीपनि शांडिल्य के पुत्र पुनरदत्त के जीवन वापस करने वाला तथा अर्जुन मोह को दूर करने हेतु श्रीमद्भागवत के उपदेश काल के लिए ही समय बद्ध सशरीर परमब्रह तथा शेष समय विष्णु अवतारी) ही नहीं वरन शेष जीवनोपरांत सशरीर परमब्रह्म बना जाता है। विष्णु के द्वारपाल जय-विजय/रावण-कुम्भकर्ण की तरह प्रयागराज के आज तक के इतिहास में सर्वोच्च ब्राह्मणोचित व्यवहार करने वाले जननेता जो अंतरराष्ट्रीय छविवाले रहे हों उनको उनके विशेष निकटतम द्वारपालों/शिष्यों ने विश्वव्यापक परिदृश्य में वैश्विक परिस्थितिओं को ध्यान में रखे बिना स्थानीय राजनीति और किशी जाती/धर्म विशेष के प्रतिशोध में उनको दर-दर का भिखारी बना दिया मतलब जितनी सेवा नहीं की उनको उससे ज्यादा दर्द दिया अपने वंसजों और मातहतों के कुकृत्य द्वारा और दर्द ऐसा की पूरे जीवन की कीर्ति और यश पर पर्दा पड़ गया। इसी लिए कहा जाता है की "जीवन में चतुर दुश्मन मिलना, मूर्ख मित्र/दास/भक्त/शिष्य से ज्यादा श्रेष्कर है"।
https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur


आप जब हमसे कही मिलते है तो कुछ आभासी बात करते और कुछ अपने मन वाली करते हैं तथा संसारिक रूप से मेरे पक्ष-विपक्ष में कार्य करते है और बयान देते है उसी तरह से जब मै और वे दो और एक लोग भी भी आप से मिलते हैं तो देश-काल-परिस्थिति के अनुसार ही बात करते है, पर मेरी असली ऊर्जा यह है जो मै लिख रहा हूँ; और सांसारिक ऊर्जा यह है जो मै आप के सामने व्यवहार करता हूँ उसी प्रकार किशी सशरीर परमब्रह्म ने जोशी में ब्रह्मा, प्रेमचंद में शिव और श्रीधर में विष्णु की शक्ति देखी और उसी शक्ति को अपनी शक्ति बना सशरीर अवस्था में परमब्रह्म के अपने कार्य को अंजाम देता रहता है।

आप जब हमसे कही मिलते है तो कुछ आभासी बात करते और कुछ अपने मन वाली करते हैं तथा संसारिक रूप से मेरे पक्ष-विपक्ष में कार्य करते है और बयान देते है उसी तरह से जब मै और वे दो और एक लोग भी भी आप से मिलते हैं तो देश-काल-परिस्थिति के अनुसार ही बात करते है, पर मेरी असली ऊर्जा यह है जो मै लिख रहा हूँ; और सांसारिक ऊर्जा यह है जो मै आप के सामने व्यवहार करता हूँ उसी प्रकार किशी सशरीर परमब्रह्म ने जोशी में ब्रह्मा, प्रेमचंद में शिव और श्रीधर में विष्णु की शक्ति देखी और उसी शक्ति को अपनी शक्ति बना सशरीर अवस्था में परमब्रह्म के अपने कार्य को अंजाम देता रहता है। 

अंतरराष्ट्रीय झंझावातों के बीच इस दुनिया के केंद्र, प्रयागराज और इस प्रकार प्रयागराज विश्विद्यालय में बटुकेश्वर(=शिव का वह स्वरुप जो कार्यउपरांत विष्णु के प्रभाव से नियंत्रित हुआ)/खेत्रपाल के समय में जोशी(ब्रह्मा) के दिशानिर्देशन में तैयार किये गए खेतों में बीज बोन से लेकर वृक्ष विकाश तक और इस पौध से पुनः बीज विस्तारण प्रक्रिया प्रारम्भ होने तक का ठीका लेने वाला कौन था? जिसकी प्रारंभिक प्रक्रिया पूरी होने से पूर्व ही जोशी खुद विस्थापित कर दिए गए हो प्रयागराज से पर प्रयागराज विश्विद्यालय में उनका श्रेष्ठतम उद्देश पूर्ण होने से कोई रोक न सका। ----------अगर अब भी जो न समझा हो तो अब समझ जाइए:---------- वह थे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, शिव(प्रेमचंद) और सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा विष्णु(श्रीधर) और उनके शुभेक्षु-सहयोगी और समर्पित लोग जो इनके दिशा निर्देशन पर अपने कार्य से विचलित नहीं हुए। अतः 67 नए स्वयंसेवको को ज्यादा इतराना नहीं चाहिए इलाहाबाद विश्विद्यालय में आकर और एक चमचे की तरह नहीं वरन एक दक्ष वैश्विक शिक्षक की तरह नवीन चुनौतियों से समक्ष अपनी भूमिका निभानी चाहिए। >>>>>>>>>>>>>>>>>जब श्रीराधा की सीमा यशोदा के ही किशी रिस्तेदार या जातीय/धार्मिक सम कक्ष तक ही सीमित रहती है तभी तक आप किशी विष्णु/शिव अवतारी को केवल श्रीकृष्ण की सीमा के अंदर बाँध सकते है, पर जब राधा की सीमा उससे बाहर हुई तो वह विष्णु या यदि विशेस संभावित परिस्थिति का शिव/रूद्र अवतारी श्रीकृष्ण केवल समय विशेष का सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) (गुरु सांदीपनि शांडिल्य के पुत्र पुनरदत्त के जीवन वापस करने वाला तथा अर्जुन मोह को दूर करने हेतु श्रीमद्भागवत के उपदेश काल के लिए ही समय बद्ध सशरीर परमब्रह तथा शेष समय विष्णु अवतारी) ही नहीं वरन शेष जीवनोपरांत सशरीर परमब्रह्म बना जाता है। विष्णु के द्वारपाल जय-विजय/रावण-कुम्भकर्ण की तरह प्रयागराज के आज तक के इतिहास में सर्वोच्च ब्राह्मणोचित व्यवहार करने वाले जननेता जो अंतरराष्ट्रीय छविवाले रहे हों उनको उनके विशेष निकटतम द्वारपालों/शिष्यों ने विश्वव्यापक परिदृश्य में वैश्विक परिस्थितिओं को ध्यान में रखे बिना स्थानीय राजनीति और किशी जाती/धर्म विशेष के प्रतिशोध में उनको दर-दर का भिखारी बना दिया मतलब जितनी सेवा नहीं की उनको उससे ज्यादा दर्द दिया अपने वंसजों और मातहतों के कुकृत्य द्वारा और दर्द ऐसा की पूरे जीवन की कीर्ति और यश पर पर्दा पड़ गया। इसी लिए कहा जाता है की "जीवन में चतुर दुश्मन मिलना, मूर्ख मित्र/दास/भक्त/शिष्य से ज्यादा श्रेष्कर है"।

अंतरराष्ट्रीय झंझावातों के बीच इस दुनिया के केंद्र, प्रयागराज और इस प्रकार प्रयागराज विश्विद्यालय में बटुकेश्वर(=शिव का वह स्वरुप जो कार्यउपरांत विष्णु के प्रभाव से नियंत्रित हुआ)/खेत्रपाल के समय में जोशी(ब्रह्मा) के दिशानिर्देशन में तैयार किये गए खेतों में बीज बोन से लेकर वृक्ष विकाश तक और इस पौध से पुनः बीज विस्तारण प्रक्रिया प्रारम्भ होने तक का ठीका लेने वाला कौन था? जिसकी प्रारंभिक प्रक्रिया पूरी होने से पूर्व ही जोशी खुद विस्थापित कर दिए गए हो प्रयागराज से पर प्रयागराज विश्विद्यालय में उनका श्रेष्ठतम उद्देश पूर्ण होने से कोई रोक न सका। ----------अगर अब भी जो न समझा हो तो अब समझ जाइए:---------- वह थे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, शिव(प्रेमचंद) और सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा विष्णु(श्रीधर) और उनके शुभेक्षु-सहयोगी और समर्पित लोग जो इनके दिशा निर्देशन पर अपने कार्य से विचलित नहीं हुए। अतः 67 नए स्वयंसेवको को ज्यादा इतराना नहीं चाहिए इलाहाबाद विश्विद्यालय में आकर और एक चमचे की तरह नहीं वरन एक दक्ष वैश्विक शिक्षक की तरह नवीन चुनौतियों से समक्ष अपनी भूमिका निभानी चाहिए। >>>>>>>>>>>>>>>>>जब श्रीराधा की सीमा यशोदा के ही किशी रिस्तेदार या जातीय/धार्मिक सम कक्ष तक ही सीमित रहती है तभी तक आप किशी विष्णु/शिव अवतारी को केवल श्रीकृष्ण की सीमा के अंदर बाँध सकते है, पर जब राधा की सीमा उससे बाहर हुई तो वह विष्णु या यदि विशेस संभावित परिस्थिति का शिव/रूद्र अवतारी श्रीकृष्ण केवल समय विशेष का सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) (गुरु सांदीपनि शांडिल्य के पुत्र पुनरदत्त के जीवन वापस करने वाला तथा अर्जुन मोह को दूर करने हेतु श्रीमद्भागवत के उपदेश काल के लिए ही समय बद्ध सशरीर परमब्रह तथा शेष समय विष्णु अवतारी) ही नहीं वरन शेष जीवनोपरांत सशरीर परमब्रह्म बना जाता है। विष्णु के द्वारपाल जय-विजय/रावण-कुम्भकर्ण की तरह प्रयागराज के आज तक के इतिहास में सर्वोच्च ब्राह्मणोचित व्यवहार करने वाले जननेता जो अंतरराष्ट्रीय छविवाले रहे हों उनको उनके विशेष निकटतम द्वारपालों/शिष्यों ने विश्वव्यापक परिदृश्य में वैश्विक परिस्थितिओं को ध्यान में रखे बिना स्थानीय राजनीति और किशी जाती/धर्म विशेष के प्रतिशोध में उनको दर-दर का भिखारी बना दिया मतलब जितनी सेवा नहीं की उनको उससे ज्यादा दर्द दिया अपने वंसजों और मातहतों के कुकृत्य द्वारा और दर्द ऐसा की पूरे जीवन की कीर्ति और यश पर पर्दा पड़ गया। इसी लिए कहा जाता है की "जीवन में चतुर दुश्मन मिलना, मूर्ख मित्र/दास/भक्त/शिष्य से ज्यादा श्रेष्कर है"।

इतना ही नहीं हमारे कुल के पुरोहित श्रद्धेय श्री चिन्तामणि चतुर्वेदी जी भी भार्गव गोत्र(भृगुवंशीय) हैं जो गोत्र सर्वोच्च ब्राह्मणोचित गुण वाला गोत्र है जिसमे दधीचि और स्वयं भृगु ऋषि जैसे त्यागी महान आत्माओं ने जन्म लिया।>>>>>>>>ब्राह्मणो का सम्मान मै ब्राह्मण होने के कारन नहीं करता वरन मानवता के सर्वोच्च गुण त्याग की प्रतिमूर्ति होने के कारन और सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण/कश्यप गोत्रीय हूँ और कश्यप ऋषि ने भृगुवंशी परशुराम से वादा किया था की मेरे मैं और वंसज इस सृष्टि के अंतिम दिन तक ब्राह्मणो का सम्मान और रक्षा करेंगे और उनके इस आश्वासन पर ही भृगुवंशी परशुराम ने क्षत्रिय कुल के विरोध में उठाये हुए कदम को वापस लेते हुए क्षत्रियों से हड़पी हुई जमीन(उस समय क्षत्रिय भू स्वामी की जमीन जिसे आज पूरे भारत की जनता की जमीन आप कह सकते है उसे कश्यप ऋषि ने जिस क्षत्रिय का था और वे भी अन्य लोग जो इसके पात्र थी और इसे लेना चाहे उनको दे दिया था) कश्यप ऋषि को वापस करते हुए महेंद्र गिरी/पर्वत पर शान्ति की खोज हेतु तपश्या में लीन हो गए। वैसे भी मै बताना चाहता हूँ की किशी भी देवता के मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश किया हुआ हर जाती/धर्म का व्यक्ति मेरे लिए ब्राह्मण समान है वसरते वह कालनेमि के रूप में न पहचान लिया जाय और मै उसका दंडवत चरण स्पर्श प्रणाम करता हूँ। यही नहीं मेरा यज्ञोपवीत, रक्षासूत्र और मेरे परिवार में धार्मिक कर्मकांड करवा कर मुझे आशीर्वाद देने की क्षमता रखने वाला भी मेरे लिए ब्राह्मण समान है। भृगुवंश से मेरे कुल का एक विशेष रिस्ता है की कि मेरी कुलमातासमेत अधिकतर माताएं जौनपुर/जमदग्नि(भृगुपुत्र भृगुवंशी)पुर से ही हैं। इतना ही नहीं हमारे कुल के पुरोहित श्रद्धेय श्रीचिन्तामणि चतुर्वेदी जी भी भार्गव गोत्र(भृगुवंशीय) हैं जो गोत्र सर्वोच्च ब्राह्मणोचित गुण वाला गोत्र है जिसमे दधीचि और स्वयं भृगु ऋषि जैसे त्यागी महान आत्माओं ने जन्म लिया जिन्होंने क्रमसः दधीचि जीते जी अपने को गला कर शरीर त्याग किया और अपनी अस्थियों को देवताओं को वज्र बनाने हेतु देते हुए उनको विजय दिलवाई; और भृगु ऋषि ने मानवता की रक्षा हेतु अपने विष्णु अवतारी पौत्र, परशुराम का त्याग किया और उनको उनके पिता के क्षेत्र जौनपुर/जमदग्निपुर में सदा-सदा आने से मना कर दिया और परशुराम ने भी जौनपुर(जमदग्निपुर) को सदा-सदा के लिए छोड़ दिया और पूरे भारत भ्रमण के दौरान कभी भी वे यहां नहीं आये।

इतना ही नहीं हमारे कुल के पुरोहित श्रद्धेय श्री चिन्तामणि चतुर्वेदी जी भी भार्गव गोत्र(भृगुवंशीय) हैं जो गोत्र सर्वोच्च ब्राह्मणोचित गुण वाला गोत्र है जिसमे दधीचि और स्वयं भृगु ऋषि जैसे त्यागी महान आत्माओं ने जन्म लिया।>>>>>>>>ब्राह्मणो का सम्मान मै ब्राह्मण होने के कारन नहीं करता वरन मानवता के सर्वोच्च गुण त्याग की प्रतिमूर्ति होने के कारन और सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण/कश्यप गोत्रीय हूँ और कश्यप ऋषि ने भृगुवंशी परशुराम से वादा किया था की मेरे मैं और वंसज इस सृष्टि के अंतिमदिन तक ब्राह्मणो का सम्मान और रक्षा करेंगे और उनके इस आश्वासन पर ही भृगुवंशी परशुराम ने क्षत्रिय कुल के विरोध में उठाये हुए कदम को वापस लेते हुए क्षत्रियों से हड़पी हुई जमीन(उस समय क्षत्रिय भू स्वामी की जमीन जिसे आज पूरे भारत की जनता की जमीन आप कह सकते है उसे कश्यप ऋषि ने जिस क्षत्रिय का था और वे भी अन्य लोग जो इसके पात्र थी और इसे लेना चाहे उनको दे दिया था) कश्यप ऋषि को वापस करते हुए महेंद्र गिरी/पर्वत पर शान्ति की खोज हेतु तपश्या में लीन हो गए। वैसे भी मै बताना चाहता हूँ की किशी भी देवता के मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश किया हुआ हर जाती/धर्म का व्यक्ति मेरे लिए ब्राह्मण समान है वसरते वह कालनेमि के रूप में न पहचान लिया जाय और मै उसका दंडवत चरण स्पर्श प्रणाम करता हूँ। यही नहीं मेरा यज्ञोपवीत, रक्षासूत्र और मेरे परिवार में धार्मिक कर्मकांड करवा कर मुझे आशीर्वाद देने की क्षमता रखने वाला भी मेरे लिए ब्राह्मण समान है। भृगुवंश से मेरे कुल का एक विशेष रिस्ता है की कि मेरी कुलमातासमेत अधिकतर माताएं जौनपुर/जमदग्नि(भृगुपुत्र भृगुवंशी)पुर से ही हैं। इतना ही नहीं हमारे कुल के पुरोहित श्रद्धेय श्रीचिन्तामणि चतुर्वेदी जी भी भार्गव गोत्र(भृगुवंशीय) हैं जो गोत्र सर्वोच्च ब्राह्मणोचित गुण वाला गोत्र है जिसमे दधीचि और स्वयं भृगु ऋषि जैसे त्यागी महान आत्माओं ने जन्म लिया जिन्होंने क्रमसः दधीचि जीते जी अपने को गला कर शरीर त्याग किया और अपनी अस्थियों को देवताओं को वज्र बनाने हेतु देते हुए उनको विजय दिलवाई; और भृगु ऋषि ने मानवता की रक्षा हेतु अपने विष्णु अवतारी पौत्र, परशुराम का त्याग किया और उनको उनके पिता के क्षेत्र जौनपुर/जमदग्निपुर में सदा-सदा आने से मना कर दिया और परशुराम ने भी जौनपुर(जमदग्निपुर) को सदा-सदा के लिए छोड़ दिया और पूरे भारत भ्रमण के दौरान कभी भी वे यहां नहीं आये।

Monday, October 19, 2015

जब श्रीराधा की सीमा यशोदा के ही किशी रिस्तेदार या जातीय/धार्मिक सम कक्ष तक ही सीमित रहती है तभी तक आप किशी विष्णु/शिव अवतारी को केवल श्रीकृष्ण की सीमा के अंदर बाँध सकते है, पर जब राधा की सीमा उससे बाहर हुई तो वह विष्णु या यदि विशेस संभावित परिस्थिति का शिव/रूद्र अवतारी श्रीकृष्ण केवल समय विशेष का सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) (गुरु सांदीपनि शांडिल्य के पुत्र पुनरदत्त के जीवन वापस करने वाला तथा अर्जुन मोह को दूर करने हेतु श्रीमद्भागवत के उपदेश काल के लिए ही समय बद्ध सशरीर परमब्रह तथा शेष समय विष्णु अवतारी) ही नहीं वरन शेष जीवनोपरांत सशरीर परमब्रह्म बना जाता है। विष्णु के द्वारपाल जय-विजय/रावण-कुम्भकर्ण की तरह प्रयागराज के आज तक के इतिहास में सर्वोच्च ब्राह्मणोचित व्यवहार करने वाले जननेता जो अंतरराष्ट्रीय छविवाले रहे हों उनको उनके विशेष निकटतम द्वारपालों/शिष्यों ने विश्वव्यापक परिदृश्य में वैश्विक परिस्थितिओं को ध्यान में रखे बिना स्थानीय राजनीति और किशी जाती/धर्म विशेष के प्रतिशोध में उनको दर-दर का भिखारी बना दिया मतलब जितनी सेवा नहीं की उनको उससे ज्यादा दर्द दिया अपने वंसजों और मातहतों के कुकृत्य द्वारा और दर्द ऐसा की पूरे जीवन की कीर्ति और यश पर पर्दा पड़ गया। इसी लिए कहा जाता है की "जीवन में चतुर दुश्मन मिलना, मूर्ख मित्र/दास/भक्त/शिष्य से ज्यादा श्रेष्कर है"।

जब श्रीराधा की सीमा यशोदा के ही किशी रिस्तेदार या जातीय/धार्मिक सम कक्ष तक ही सीमित रहती है तभी तक आप किशी विष्णु/शिव अवतारी को केवल श्रीकृष्ण की सीमा के अंदर बाँध सकते है, पर जब राधा की सीमा उससे बाहर हुई तो वह विष्णु या यदि विशेस संभावित परिस्थिति का शिव/रूद्र अवतारी श्रीकृष्ण केवल समय विशेष का सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) (गुरु सांदीपनि शांडिल्य के पुत्र पुनरदत्त के जीवन वापस करने वाला तथा अर्जुन मोह को दूर करने हेतु श्रीमद्भागवत के उपदेश काल के लिए ही समय बद्ध सशरीर परमब्रह तथा शेष समय विष्णु अवतारी) ही नहीं वरन शेष जीवनोपरांत सशरीर परमब्रह्म बना जाता है। विष्णु के द्वारपाल जय-विजय/रावण-कुम्भकर्ण की तरह प्रयागराज के आज तक के इतिहास में सर्वोच्च ब्राह्मणोचित व्यवहार करने वाले जननेता जो अंतरराष्ट्रीय छविवाले रहे हों उनको उनके विशेष निकटतम द्वारपालों/शिष्यों ने विश्वव्यापक परिदृश्य में वैश्विक परिस्थितिओं को ध्यान में रखे बिना स्थानीय राजनीति और किशी जाती/धर्म विशेष के प्रतिशोध में उनको दर-दर का भिखारी बना दिया मतलब जितनी सेवा नहीं की उनको उससे ज्यादा दर्द दिया अपने वंसजों और मातहतों के कुकृत्य द्वारा और दर्द ऐसा की पूरे जीवन की कीर्ति और यश पर पर्दा पड़ गया। इसी लिए कहा जाता है की "जीवन में चतुर दुश्मन मिलना, मूर्ख मित्र/दास/भक्त/शिष्य से ज्यादा श्रेष्कर है"। 

Friday, October 16, 2015

मैंने कहा था न की क्रमसः कश्यप गोत्र( सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण, अन्य कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू, रघुवंशीय/इक्शाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू , तथा वृष्णि वंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू ) और गौतम गोत्र( सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण व् अन्य गौतम गोत्रीय सनातन हिन्दू व् बौद्धीस्ट मतावलम्बी) अकेले ही इस विश्व के ईसाइयत+इस्लाम तथा दलित व् अन्य समाज को समझने, समझाने व् समझौता कर विश्व जनमत को चलाने में सक्षम हैं; और वह सत्य निकला और यही सूत्र आगे भी काम आएगा। अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।

मैंने कहा था न की क्रमसः कश्यप गोत्र( सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण, अन्य कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू, रघुवंशीय/इक्शाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू , तथा वृष्णि वंशीय/यदुवंशीय/चन्द्रवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय सनातन हिन्दू ) और गौतम गोत्र( सनातन गौतम गोत्रीय ब्राह्मण व् अन्य गौतम गोत्रीय सनातन हिन्दू व् बौद्धीस्ट मतावलम्बी) अकेले ही इस विश्व के ईसाइयत+इस्लाम तथा दलित व् अन्य समाज को समझने, समझाने व् समझौता कर विश्व जनमत को चलाने में सक्षम हैं; और वह सत्य निकला और यही सूत्र आगे भी काम आएगा। अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।

सामाजिक, धार्मिक, संवैधानिक वैध नियमों को स्वयं तोड़ने वालों के साथ भी विनम्रता से व्यवहार क्या व्यक्तित्व की विशालता में नहीं आता? अगर ऐसे व्यक्ति परहित जीवन छोड़ तुछ्य मानशिकता वालों के प्रतिशोध का जबाब गंभीर प्रतिशोधात्मक कार्यों से देते तो इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज, भारतवर्ष और विश्व एक गाँव तथा विश्व मानवता का भविष्य कैसा होता?

सामाजिक, धार्मिक, संवैधानिक वैध नियमों को स्वयं तोड़ने वालों के साथ भी विनम्रता से व्यवहार क्या व्यक्तित्व की विशालता में नहीं आता?  अगर ऐसे व्यक्ति परहित जीवन छोड़ तुछ्य मानशिकता वालों के प्रतिशोध का जबाब गंभीर प्रतिशोधात्मक कार्यों से देते तो इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज, भारतवर्ष और विश्व एक गाँव तथा विश्व मानवता का भविष्य कैसा होता?

टिप्पणी:

अंतर्धार्मिक और दलित समाज से शास्त्रीय हिन्दू विवाह वैध नहीं और वैध तब जब विवाह पूर्व वर अपने को सामजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का का स्वीकार कर लिया हो मतलब उसे उस समय(विवाह के पूर्व) तक सनातन धर्म के पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत समस्त अधिकतम देवी, देवता और नियम-क़ानून मान्य हो क्योंकि शास्त्रीय हिन्दू विवाह एक ऐसा कर्म-कांड है जिसमे पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत लगभग समस्त अधिकतम देवी, देवता का आह्वान होता है अग्निदेव(ऊर्जा/प्रकाश) को शाक्षी मान हुए विवाह पध्धति के परिपालन में। और अगर वह विवाह पूर्व वर अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का स्वीकार कर लिया है तो फिर वह दलित या अन्य दूसरे धर्म का कहलाने का अधिकारी नहीं रह जाएगा मतलब दलित या अन्यधर्म के तहत लाभ से वंचित हो जाएगा और जब वह धर्मान्तरण करेगा तभी दूसरे धर्म में जा सकता है। इसके इतर कोई भी अन्य विधि से विवाह कर सकता है पर वह धर्म-पति/पत्नी नहीं कहे जा सकेंगे|