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Monday, November 30, 2015

जमदग्निपुर(जौनपुर)-223103 निवासी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, रामानन्द/........../......../रामप्रशाद/रमानाथ/श्रीकांत( +श्रीधर +श्रीप्रकाश), बिशुनपुर, और रामा(सीता)पुर, आज़मगढ़-223225 निवासी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण सारंगधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/-------/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/---/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप (सूर्यस्वामी/सूर्यकांत/सत्यनारायण/लक्ष्मीकांत/लक्ष्मी नारायण/आदित्यनाथ/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश/विक्रमादित्य=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो/रामजानकी), का वंसज विवेक/(((त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव की आतंरिक सुरक्षा शक्ति तो महाशिव भी इसे आप कह सकते है वह "सत्यमेव जयते" का भी छात्र था जो 11-11-1975, मंगलवार सुबह 9.15 बजे (कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गोपी/गिरिधर अस्टमी; वर्त्तमान ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस), धनिष्ठा नक्षत्र, अर्ध मकर व् अर्ध कुंभ राशी में जन्म लिया तदनुसार गिरिधर राशी नाम नक्षत्र के आधार पर प्राप्त किया है ((गिरिधर के संभावित पर्याय से सम्बंधित नाम: गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी (हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार))) जिसमे सबसे प्रचलित नाम है सशरीर परमब्रह्म की अवस्था को प्राप्त करने वाले श्रीकृष्ण का और सब उनके सम्पूरक हो जाते है सशरीर परमब्रह्म अवस्था प्राप्ति की अवस्था में आये विभिन्न जीवन कलाओं में) हूँ और मेरा विकल्प इस संसार में कोई जन्म ही नहीं लिया है आज तक जो शिव और विष्णु दोनों तथा चन्द्र और सूर्य दोनों के लिए उभयनिष्ठ हो और आप विकल्प खोज रहे थे और उसमे भी विकल्प मुझे ही बताना पड़ा वह आप के लिए और भारी पड़ा जब आप मानवता और मेरिट की ही केवल बात कर रहे थे सम्पूर्ण पुरुषार्थ के स्थान पर तो इसमें तो केवल सनातन गौतम गोत्रीय ही उपयुक्त हैं न तो सनातन गौतम गोत्रीय विष्णु भाई ही आप के खेवनहार रहेंगे।

जमदग्निपुर(जौनपुर)-223103  निवासी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, रामानन्द/........../......../रामप्रशाद/रमानाथ/श्रीकांत( +श्रीधर +श्रीप्रकाश), बिशुनपुर, और रामा(सीता)पुर, आज़मगढ़-223225 निवासी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण सारंगधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/-------/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/---/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप (सूर्यस्वामी/सूर्यकांत/सत्यनारायण/लक्ष्मीकांत/लक्ष्मी नारायण/आदित्यनाथ/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश/विक्रमादित्य=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो/रामजानकी),    का वंसज विवेक/(((त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव की आतंरिक सुरक्षा शक्ति तो महाशिव भी इसे आप कह सकते है वह "सत्यमेव जयते" का भी छात्र था  जो 11-11-1975, मंगलवार सुबह 9.15 बजे (कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गोपी/गिरिधर अस्टमी; वर्त्तमान ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस), धनिष्ठा नक्षत्र, अर्ध मकर व् अर्ध कुंभ राशी में जन्म लिया  तदनुसार गिरिधर राशी नाम नक्षत्र के आधार पर प्राप्त किया है ((गिरिधर के संभावित पर्याय से सम्बंधित नाम: गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी (हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार))) जिसमे सबसे प्रचलित नाम है सशरीर परमब्रह्म  की अवस्था को प्राप्त करने वाले श्रीकृष्ण का और सब उनके सम्पूरक हो जाते है सशरीर परमब्रह्म अवस्था प्राप्ति की अवस्था में आये विभिन्न जीवन कलाओं में) हूँ और मेरा विकल्प इस संसार में कोई जन्म ही नहीं लिया है आज तक जो शिव और विष्णु दोनों तथा चन्द्र और सूर्य दोनों के लिए उभयनिष्ठ हो और आप विकल्प खोज रहे थे और उसमे भी विकल्प मुझे ही बताना पड़ा वह आप के लिए और भारी पड़ा जब आप मानवता और मेरिट की ही केवल बात कर रहे थे सम्पूर्ण पुरुषार्थ के स्थान पर तो इसमें तो केवल सनातन गौतम गोत्रीय ही उपयुक्त हैं न तो सनातन गौतम गोत्रीय विष्णु भाई ही आप के खेवनहार रहेंगे।
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur
https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur

मेरे विरुद्ध लड़ाई में मेरे ननिहाल से लेकर मेरे घर और घराने तक के लोगों का प्रयोग किया गया और क्यों और कब किया गया यह मुझको पता है पर किशी को बता नहीं सकता इससे समाजिक समस्या का नया रूप सामने आएगा और उसमे में मामा के गाँव के मामा के विरोधी व् सम्बन्धी सूचना तंत्र के साथ अन्य कार्य में प्रयोग में लए गए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जो प्रयागराज में रहते है(वे पूर्णतः प्रयोग में लाये गए)>>>>>परन्तु मै इस तथ्य को पूर्णतः उजागर करना चाहूँगा की मेरे जन्म से लेकर आजतक कोई ऐसी घटना नहीं हुआ जिसमे मेरे बाबा श्यामाचरण(अर्जुन, कपिल और विजय चाचा ) और राम नयन बाबा का परिवार गाँव से लेकर इस प्रयागराज तक कहीं भी मेरा विरोध किया हो क्योंकि वे जागरूक इंसान होने के साथ स्वार्थी कभी नही रहे मेरे सम्बन्ध में। यही दिक्कत थी मेरे विरोधी की कि वे श्यामाचरण(अर्जुन, कपिल और विजय चाचा ) और राम नयन बाबा के परिवार को मेरे विरोध का हथियार न बना सके। और इस प्रकार वे मेरे प्रत्यक्ष व् परोक्ष सहयोगी बने रहे 2001 से आज 2015 तक।

मेरे विरुद्ध लड़ाई में मेरे ननिहाल से लेकर मेरे घर और घराने तक के लोगों का प्रयोग किया गया और क्यों और  कब किया गया यह मुझको पता है पर किशी को बता नहीं सकता इससे समाजिक समस्या का नया रूप सामने आएगा और उसमे में मामा के गाँव के मामा के विरोधी व् सम्बन्धी सूचना तंत्र के साथ अन्य कार्य में प्रयोग में लए गए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जो प्रयागराज में रहते है(वे पूर्णतः प्रयोग में लाये गए)>>>>>परन्तु मै इस तथ्य को पूर्णतः उजागर करना चाहूँगा की मेरे जन्म से लेकर आजतक कोई ऐसी घटना नहीं हुआ जिसमे मेरे बाबा श्यामाचरण(अर्जुन, कपिल और विजय चाचा ) और राम नयन बाबा का परिवार गाँव से लेकर इस प्रयागराज तक कहीं भी मेरा विरोध किया हो क्योंकि वे जागरूक इंसान होने के साथ स्वार्थी कभी नही रहे मेरे सम्बन्ध में। यही दिक्कत थी मेरे विरोधी  की कि वे श्यामाचरण(अर्जुन, कपिल और विजय चाचा ) और राम नयन बाबा के परिवार को मेरे विरोध का हथियार न बना सके। और इस प्रकार वे मेरे प्रत्यक्ष व् परोक्ष सहयोगी बने रहे 2001 से आज 2015 तक। 

भारतीय समाज में कुसंस्कृति, चरित्रहीनता और अनैतिकता के प्रचार और प्रसार में अपनी पार्टी का लाभ देखने वाले छद्म राष्ट्रभक्त लोग अगर अब अपने ही चारों से खड़ी चरित्रहीन और अनैतिक भक्तों की वजह से मुस्किल में पड़ गए हों और उनके अपने ही परिवार इस सुनामी और ज्वालामुखी की भेंट चढ़ गए हो, तो कृपा करके आत्म चिंतन करते हुए सनातन संस्कृति या सनातन हिन्दू संस्कृति के रक्षक सूत्र सुसंस्कृति, सुचरित्र और सुनैतिकता को बढ़ाने में अन्य राजनैतिक पार्टियों एवं सामाजिक संगठनो का सहयोग करना प्रारम्भ कर दें। क्योंकि जिस काशीराम/रामप्रसाद और अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान को मैंने देखा वे कही से भी किशी मानवमूल्य के विरोधी तत्वों के उत्प्रेरक नहीं हैं/थे और इसलिए भी उनके भक्त लोग भी सुसंस्कृति, सुचरित्र और सुनैतिक बने यही मेरी सलाह है। अगर मुझे कबीर की सहिष्णुता "बकरी पाती खात है ताकि खींची खाल। जो नर बकरी खात हैं ताको कवन हवाल।।" पर ही जाना होता तो काशीराम, जार्ज फर्नांडीज, अटल जी, कलाम जी और नारायणन जी के नाम जो मेरे प्रयाग से बैंगलोर यात्रा के दौरान लिए गए थे वे भी छोटे पड़ जाते ये किशी नेता विशेष के भक्त कैलाश नारायण उत्तम के नाम तो धुल के कण समान भी नहीं है। लेकिन यह बताना जरूरी थी की कोई खिचड़ी मेरा मार्ग अवरुद्ध नहीं कर सकती है तो स्वेताम्बर, पीताम्बर और नीलाम्बर को भी परम स्वेताम्बर बना देने में विस्वास रखता हूँ। किशी का नाम लो भाई तो उसका का पूरा नाम लीजिये उत्तम केवल मत कहिये उत्तम चन्द्र बंदुगुला (दलित ईसाई) कहिये तो उत्तम चन्द्र कौन होता है? यह द्वितीय का चन्द्रमा है जिसको भगवान महादेव अपने सिर पर रखकर उसका सम्मान करते है और वह भी उनका सम्मान बढ़ता है पर यहाँ वह तो गंवार ठहर गया और पार्वती का ही चीर हरण कर लिया जन्म जन्मान्तर के लिए तो हो गया उसकी चरित्र , संस्कृति और संस्कार का असर न गोस्वामी तुलसी दास जी की सहिष्णुता "ढोल, गंवार, सूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।" के अनुसार मैंने उसको समझाने का कार्य किया है की की तुम अपनी सीमा में रहो मुझे अपनी सीमा मत समझाओं जो तुम्हारी समझ में आया तुमने कर ही दिया तो सुनने और समझने की शक्ति लाओ मुंह काला अगर कर लिए हो तो । अब कुछ लोग निजी स्वार्थ में गुरुदेव जोशी को भी बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं नरसिंघ राव बंदुगुला के पुत्र उत्तम चन्द्र बाांडुगुला (दलित ईसाई) को कैलाश नारायण उत्तम(कुर्मावतारी जाती) का पुत्र घोषित कर जिसके लिए काशीराम, जार्ज फर्नांडीज, अटल जी, कलाम जी और नारायणन जी के नाम प्रयोग किये जा चुके हैं तब भी कुछ नहीं हुआ। मैंने सोच रखा था सब कुछ हो जाने दीजिये एक दिन यह एक नजीर बनेगी उसी समाज और पार्टी के विरुद्ध जो यह अनायास का बल प्रयोग किये जा रहे हैं किशी नारी शक्ति पर ही और उसके हितैसी भी बन रहे हैं, उनको बहुत बड़ी गलत फहमी है की कुरमावतारी जाती, दलित समाज, दलित ईसाई , कायस्थ, भूमिहार और वैश्य समाज के कुछ विशेष स्वार्थी लोगों में या स्वयं जोशी गुरुदेव और उनके व्यक्तिगत जीवन के भक्त के दबाव में की मैं "सत्यमेव जयते" और "सत्यम शिवम सुंदरम" के अपने सिद्धांत से पीछे हट जाऊंगा। मुझे कबीर की सहिष्णुता तो नहीं पर गोस्वामी तुलसीदास की सहिष्णुता से पीछे नहीं हटना चाहिए अन्यथा कुछ पार्टी और समुदाय विशेष के लोग द्वारा गोरा-काला, नारीवाद-गैरनारीवाद, दलित-सवर्ण,अल्पसंख्यक -बहुसंख्यक अस्त्र चला आप को हमेशा सत्य से विचलित किया जाता रहेगा जैसे मुझे विचलित करने का श्रेष्ठतम प्रयत्न तब तक हुआ जब तक मैंने पूर्ण सत्य बोलना अपनी अंतिम मजबूरी नहीं समझा।तथाकथित विश्वमहाशक्ति के द्वारा व् उनके अभिकर्ताओं द्वारा मैंने काले, दलित, अल्पसंख्यक और स्त्री नाम पर आरोप सहे लोग मेरे विरुद्ध लाम बंद भी हुए पर सबका पूर्णतः जबाव देने से हिचकता था मानवता के प्रति अन्याय हो न जाय काले, दलित, अल्पसंख्यक और स्त्री के जीवन के साथ कुछ गलत घटित हो गया तो इस डर से पर अंत में देखा की इसका फायदा काले, दलित, अल्पसंख्यक और स्त्री को अपना अस्त्र बना वे उठा रहे तो मैं भी सत्य बोलने को मुखर हो गया जो अब आप सबके सामने है: "Vivekanand and Modern Tradition" ब्लॉग में रूप में।

भारतीय समाज में कुसंस्कृति, चरित्रहीनता और अनैतिकता के प्रचार और प्रसार में अपनी पार्टी का लाभ देखने वाले छद्म राष्ट्रभक्त लोग अगर अब अपने ही चारों से खड़ी चरित्रहीन और अनैतिक भक्तों की वजह से मुस्किल में पड़ गए हों और उनके अपने ही परिवार इस सुनामी और ज्वालामुखी की भेंट चढ़ गए हो, तो कृपा करके आत्म चिंतन करते हुए सनातन संस्कृति या सनातन हिन्दू संस्कृति के रक्षक सूत्र सुसंस्कृति, सुचरित्र और सुनैतिकता को बढ़ाने में अन्य राजनैतिक पार्टियों एवं सामाजिक संगठनो का सहयोग करना प्रारम्भ कर दें। क्योंकि जिस काशीराम/रामप्रसाद और अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान को मैंने देखा वे कही से भी किशी मानवमूल्य के विरोधी तत्वों के उत्प्रेरक नहीं हैं/थे और इसलिए भी उनके भक्त लोग भी सुसंस्कृति, सुचरित्र और सुनैतिक बने यही मेरी सलाह है। अगर मुझे कबीर की सहिष्णुता "बकरी पाती खात है ताकि खींची खाल। जो नर बकरी खात हैं ताको कवन हवाल।।" पर ही  जाना होता तो काशीराम, जार्ज फर्नांडीज, अटल जी, कलाम जी और नारायणन जी के नाम जो मेरे प्रयाग से बैंगलोर यात्रा के दौरान लिए गए थे वे  भी छोटे पड़  जाते ये किशी नेता विशेष के भक्त कैलाश नारायण उत्तम के नाम तो धुल के कण समान भी नहीं है।  लेकिन यह बताना जरूरी थी की कोई खिचड़ी मेरा मार्ग अवरुद्ध नहीं कर सकती है तो स्वेताम्बर, पीताम्बर और नीलाम्बर को भी परम स्वेताम्बर बना देने में विस्वास रखता हूँ। किशी का नाम लो भाई तो उसका का पूरा नाम लीजिये उत्तम केवल मत कहिये उत्तम चन्द्र  बंदुगुला (दलित ईसाई) कहिये तो  उत्तम चन्द्र कौन होता है? यह द्वितीय का चन्द्रमा है जिसको भगवान महादेव अपने सिर पर रखकर उसका सम्मान करते है और वह भी उनका सम्मान बढ़ता है पर यहाँ वह तो गंवार ठहर गया और पार्वती का ही चीर हरण कर लिया जन्म जन्मान्तर के लिए तो हो गया उसकी चरित्र , संस्कृति और संस्कार का असर न गोस्वामी तुलसी दास जी की सहिष्णुता  "ढोल, गंवार, सूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।" के अनुसार मैंने उसको समझाने का कार्य किया है की की तुम अपनी सीमा में रहो मुझे अपनी सीमा मत समझाओं जो तुम्हारी समझ में आया तुमने कर ही दिया तो सुनने और समझने की शक्ति लाओ मुंह काला अगर कर लिए हो तो । अब कुछ लोग निजी स्वार्थ में गुरुदेव जोशी को भी बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं नरसिंघ राव बंदुगुला के पुत्र उत्तम चन्द्र बाांडुगुला (दलित ईसाई)  को कैलाश नारायण उत्तम(कुर्मावतारी जाती) का पुत्र घोषित कर जिसके लिए काशीराम, जार्ज फर्नांडीज, अटल जी, कलाम जी और नारायणन जी के नाम प्रयोग किये जा चुके हैं तब  भी कुछ नहीं हुआ। मैंने सोच रखा था सब कुछ हो जाने दीजिये एक दिन यह एक नजीर बनेगी उसी समाज और पार्टी के विरुद्ध जो यह अनायास का बल प्रयोग किये जा रहे हैं किशी नारी शक्ति पर ही और उसके हितैसी भी बन रहे हैं, उनको बहुत बड़ी  गलत फहमी है की कुरमावतारी जाती, दलित समाज, दलित ईसाई , कायस्थ, भूमिहार और वैश्य समाज के कुछ विशेष स्वार्थी लोगों  में या स्वयं जोशी गुरुदेव और उनके व्यक्तिगत जीवन के भक्त के दबाव में की मैं  "सत्यमेव  जयते" और "सत्यम शिवम सुंदरम" के  अपने सिद्धांत से पीछे हट जाऊंगा। मुझे कबीर की सहिष्णुता तो नहीं पर गोस्वामी तुलसीदास की सहिष्णुता से पीछे नहीं हटना चाहिए अन्यथा कुछ पार्टी और समुदाय विशेष के लोग द्वारा  गोरा-काला,  नारीवाद-गैरनारीवाद, दलित-सवर्ण,अल्पसंख्यक -बहुसंख्यक  अस्त्र  चला आप को हमेशा सत्य से विचलित किया जाता रहेगा जैसे मुझे  विचलित करने का श्रेष्ठतम  प्रयत्न तब तक हुआ जब तक मैंने पूर्ण सत्य बोलना अपनी अंतिम मजबूरी नहीं समझा।तथाकथित विश्वमहाशक्ति के द्वारा व् उनके अभिकर्ताओं द्वारा  मैंने काले, दलित, अल्पसंख्यक और स्त्री नाम पर आरोप सहे लोग मेरे विरुद्ध लाम बंद भी हुए पर  सबका पूर्णतः जबाव देने से  हिचकता था मानवता के प्रति अन्याय हो न जाय काले, दलित, अल्पसंख्यक और स्त्री के जीवन के साथ कुछ गलत घटित हो गया तो इस  डर से पर अंत में देखा की इसका फायदा काले, दलित, अल्पसंख्यक और स्त्री को अपना अस्त्र बना वे  उठा रहे तो मैं भी सत्य बोलने को मुखर हो गया जो अब  आप सबके सामने है: "Vivekanand and Modern Tradition" ब्लॉग में रूप में।  

जब तक हर पार्टी और हर विचार तथा हर क्षेत्र के मेरे छोटे और बड़े नव युवक भाई और बहन और वरिष्ठजन अपने देश और वैश्विक मानवता के लिए सम्पूर्ण समर्पित भाव से कार्य कर रहे है तो उस समय तक के लिए मेरा प्रयागराज विश्विद्यालय व्यवस्था को छोड़ने का कोई प्रश्न ही नहीं खड़ा होता है और जिसके लिए तन समर्पित, मन समर्पित, मान और स्वाभिमान समर्पित; और यह जीवन समर्पित रहा उससे अलग मेरा अस्तित्व ही कहा संभव है?

जब तक हर पार्टी और हर विचार तथा हर क्षेत्र के मेरे छोटे और बड़े नव युवक भाई और बहन और वरिष्ठजन अपने देश और वैश्विक मानवता के लिए सम्पूर्ण समर्पित भाव से कार्य कर रहे है तो उस समय तक के लिए मेरा प्रयागराज विश्विद्यालय व्यवस्था को छोड़ने का कोई प्रश्न ही नहीं खड़ा होता है और जिसके लिए तन समर्पित, मन समर्पित, मान और स्वाभिमान समर्पित; और यह जीवन समर्पित रहा उससे अलग मेरा अस्तित्व ही कहा संभव है?

समाज, राष्ट्र या छोटी से कोई व्यक्ति समूह की इकाई को चलाने में पक्ष विपक्ष की भूमिका यह है की पक्ष नीति बनाये और उसका क्रियान्वन करे और जो त्रुटियाँ/कमिया परिलक्षित हो क्रियान्वन और नीतियों में विपक्ष उसकी आलोचना करे तथा उसे दूर करने में सहयोग करे समाज या उस इकाई के सामान्य सदस्य के हित देखते हुए और इस पर भी दूर न किया जा सके तो जब विपक्ष स्वयं पक्ष बने तो उसे दूर करने का प्रयास करे। सम्मिलनवाद, समाजवाद, पूंजीवाद, साम्यवाद व् धर्मदर्शन युक्त मानववाद सबकी भूमिका के लिए इस वर्तमान विश्व में मानव जीवन को छूने वाले कुछ न कुछ पहलू अवश्य समाहित हैं जो "सत्यमेव जयते" को पूर्ण रूप से प्राप्त करने की दिशा में एक सच्ची राजनीती कड़ी बन सकते हैं। कारन यह की दिशा परिवर्तन भी एक साम्यवाद में आता है जैसा की अंकवाद, पद-वाद, सम्मान प्रतिष्ठा घटा दो या बढ़ा दो वाद, सामाजिक न्यायवाद सहित अन्य अन्य वाद के साथ दिशा परिवर्तन वाद भी मेरे ऊपर प्रयोग किया गया है साम्यवादियों से अलग मत रखने वालों द्वारा भी। ---मेरा मानना है की बहुत से रस्ते हैं जाती/धर्मवाद ख़त्म करने के पर आप जाती/धर्म क्यों ख़त्म करना चाहते हैं और किसके इसारे पर। आप समझ लें की ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म सबसे पहले हैं और जाती बाद में है और प्रारंभिक धर्म भी यही हैं ऋषी सभ्यता से मानव सभ्यता प्रारम्भ होने पर तो कम से कम इन्हे जाती समझो या धर्म इन तीन मूल जाती/धर्म को मत मिटाइये सामाजिक बुराइयों के लिए ये जिम्मेदार नहीं वरन पूरा समाज जिम्मेदार है। बे फिक्र आप अन्य सृजित जाती धर्म को इनमे शामिल कर सकते हैं अच्छे संस्कारवान और चरित्रवान समाज तैयार करके जो इनके समतुल्य व्यवहार कर सकें।

समाज, राष्ट्र या छोटी से कोई व्यक्ति समूह की इकाई को चलाने में पक्ष विपक्ष की भूमिका यह है की पक्ष नीति बनाये और उसका क्रियान्वन करे और जो त्रुटियाँ/कमिया परिलक्षित हो क्रियान्वन और नीतियों में विपक्ष उसकी आलोचना करे तथा उसे दूर करने में सहयोग करे समाज या उस इकाई के सामान्य सदस्य के हित देखते हुए और इस पर भी दूर न किया जा सके तो जब विपक्ष स्वयं पक्ष बने तो उसे दूर करने का प्रयास करे। सम्मिलनवाद, समाजवाद, पूंजीवाद, साम्यवाद व् धर्मदर्शन युक्त मानववाद सबकी भूमिका के लिए इस वर्तमान विश्व में मानव जीवन को छूने वाले कुछ न कुछ पहलू अवश्य समाहित हैं जो "सत्यमेव जयते" को पूर्ण रूप से प्राप्त करने की दिशा में एक सच्ची राजनीती कड़ी बन सकते हैं। कारन यह की दिशा परिवर्तन भी एक साम्यवाद में आता है जैसा की अंकवाद, पद-वाद, सम्मान प्रतिष्ठा घटा दो या बढ़ा दो वाद, सामाजिक न्यायवाद सहित अन्य अन्य वाद के साथ दिशा परिवर्तन वाद भी मेरे ऊपर प्रयोग किया गया है साम्यवादियों से अलग मत रखने वालों द्वारा भी। ---मेरा मानना है की बहुत से रस्ते हैं जाती/धर्मवाद ख़त्म करने के पर आप जाती/धर्म क्यों ख़त्म करना चाहते हैं और किसके इसारे पर। आप समझ लें की ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म सबसे पहले हैं और जाती बाद में है और प्रारंभिक धर्म भी यही हैं ऋषी सभ्यता से मानव सभ्यता प्रारम्भ होने पर तो कम से कम इन्हे जाती समझो या धर्म इन तीन मूल जाती/धर्म को मत मिटाइये सामाजिक बुराइयों के लिए ये जिम्मेदार नहीं वरन पूरा समाज जिम्मेदार है। बे फिक्र आप अन्य सृजित जाती धर्म को इनमे शामिल कर सकते हैं अच्छे संस्कारवान और चरित्रवान समाज तैयार करके जो इनके समतुल्य व्यवहार कर सकें।

यह गुरु भक्ति और शक्ति है की मुझे लक्षमणपुर में वास्तविक काशीराम/रामप्रशाद भी मिले वे चाहे जिन घरों में अपने जीवन दर जीवन काटे हों और यहाँ प्रयागराज में अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान भी मिले, प्रयागराज से विष्व मानवता का सफल नियंत्रण भी हुआ चौदह वर्ष तक 2001-2015, प्रयागराज विश्विद्यालय केंद्रीय विश्विद्यालय पद पुनर्प्राप्त किया अपने प्रस्तावित एक दर्जन केन्द्रों/विभागों में स्थाई 67 पद समेत जिसमे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्ययन केंद्र में मैं स्थाई शिक्षक पद भी ग्रहण (29/30-10-2013 actually it was 29th mid night after 00.00 AM) किया और उसके साथ मेघनाद सहा अंतरिक्ष अध्ययन केंद्र भी विश्विद्यालय का एक केंद्र होने का दर्जा प्राप्त किया अपने माध्यम से विश्विद्यालय में दो शोध छात्र नामांकित कर और उनको को विश्विद्यालय द्वारा शोध प्रमाणपत्र दिलवाकर पर अभी वह शिक्षक विहीन है, फिर भी कार्य केंद्र बनने-बनाने तक थी तो वह पूर्ण हो गया अब जैसा सहयोग और नैतिक जिम्मेदारी इस पुण्य कार्य में किया निःस्वार्थ भाव से उनके शुभचिंतकों ने किया उसके साथ वही हुआ तो किशी के साथ अन्याय कहाँ? अब मेरे लिए करने और मिलाने को कुछ रह कहाँ गया? मेरे सब उद्देश्य पूर्ण हुए पर सन्देश यही की अपने वाह्य संतानों को भी देखिये लेकिन आप सब अपनी चौखट की पूजा करने वाली नैतिक, आनुवंशिक, उत्तराधिकारी संतानों को उसी तरह न भूलियेगा मतलब सुधि अवश्य लीजियेगा और आगे भी लेते रहिएगा जिस तरह से भारद्वाज जी की सुधि ली गयी जो कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) जी के साथ और हनुमान जी के सहयोग से इस विश्वमहाशक्ति प्रयागराज की रक्षा करते है जो सभी सातों सप्तर्षिओं/सात ब्रह्मर्षियों ((आदर्श सप्तर्षि वरिष्ठता क्रम कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)(+दत्तात्रेय +सोमात्रेय)/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र))का प्राकट्य स्थल है (त्रिदेव द्वारा प्राक:प्राचीनतम प्रकृष्ट यज्ञ परिणाम स्वरुप प्राकट्य सात ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि) जिसे आप इला आवास, इला आबाद, अल्लाह आबाद, इलाहाबाद, त्रिवेणी/संगम/प्रयाग/प्रयागराज कहते हैं। और इस प्रकार अच्छा सामाजिक परिवेश कर अपने विशुद्ध सनातन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जैसे आधारभूत संतानों की कम से कम कुछ संख्या बने रहने देने को प्रयास कीजियेगा जिससे की आप की यह सम्पूर्ण मानवता और चमत्कारिक दुनिआ महा शून्य में न समाने पाये।

यह गुरु भक्ति और शक्ति है की मुझे लक्षमणपुर में वास्तविक काशीराम/रामप्रशाद भी मिले वे चाहे जिन घरों में अपने जीवन दर जीवन काटे हों और यहाँ प्रयागराज में अम्बेडकर/अम्बवादेकर/हनुमान भी मिले, प्रयागराज से विष्व मानवता का सफल नियंत्रण भी हुआ चौदह वर्ष तक 2001-2015, प्रयागराज विश्विद्यालय केंद्रीय विश्विद्यालय पद पुनर्प्राप्त किया अपने प्रस्तावित एक दर्जन केन्द्रों/विभागों में स्थाई 67 पद समेत जिसमे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्ययन केंद्र में मैं स्थाई शिक्षक पद भी ग्रहण (29/30-10-2013 actually it was 29th mid night after 00.00 AM) किया और उसके साथ मेघनाद सहा अंतरिक्ष अध्ययन केंद्र भी विश्विद्यालय का एक केंद्र होने का दर्जा प्राप्त किया अपने माध्यम से विश्विद्यालय में दो शोध छात्र नामांकित कर और उनको को विश्विद्यालय द्वारा शोध प्रमाणपत्र दिलवाकर पर अभी वह शिक्षक विहीन है, फिर भी कार्य केंद्र बनने-बनाने तक थी तो वह पूर्ण हो गया अब जैसा सहयोग और नैतिक जिम्मेदारी इस पुण्य कार्य में किया निःस्वार्थ भाव से उनके शुभचिंतकों ने किया उसके साथ वही हुआ तो किशी के साथ अन्याय कहाँ? अब मेरे लिए करने और मिलाने को कुछ रह कहाँ गया? मेरे सब उद्देश्य पूर्ण हुए पर सन्देश यही की अपने वाह्य संतानों को भी देखिये लेकिन आप सब अपनी चौखट की पूजा करने वाली नैतिक, आनुवंशिक, उत्तराधिकारी संतानों को उसी तरह न भूलियेगा मतलब सुधि अवश्य लीजियेगा और आगे भी लेते रहिएगा जिस तरह से भारद्वाज जी की सुधि ली गयी जो कृष्णात्रेय(दुर्वाशा) जी के साथ और हनुमान जी के सहयोग से इस विश्वमहाशक्ति प्रयागराज की रक्षा करते है जो सभी सातों सप्तर्षिओं/सात ब्रह्मर्षियों ((आदर्श सप्तर्षि वरिष्ठता क्रम कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)(+दत्तात्रेय +सोमात्रेय)/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र))का प्राकट्य स्थल है (त्रिदेव द्वारा प्राक:प्राचीनतम प्रकृष्ट यज्ञ परिणाम स्वरुप प्राकट्य सात ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि) जिसे आप इला आवास, इला आबाद, अल्लाह आबाद, इलाहाबाद, त्रिवेणी/संगम/प्रयाग/प्रयागराज कहते हैं। और इस प्रकार अच्छा सामाजिक परिवेश कर अपने विशुद्ध सनातन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जैसे आधारभूत संतानों की कम से कम कुछ संख्या बने रहने देने को प्रयास कीजियेगा जिससे की आप की यह सम्पूर्ण मानवता और चमत्कारिक दुनिआ महा शून्य में न समाने पाये।
http://deathpix.com:8000/wikipedia_en_all_07_2014/A/KBCAOS.html
http://research.omicsgroup.org/index.php/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies

Sunday, November 29, 2015

विश्वामित्र मतलब कौशिक का एक नाम विश्वरथ सम्पूर्ण विश्व में जिसको लेकर वे विजय अभियान पर निकल पड़ते थे मतलब विश्वरथ वह होगा जिसका रथ सम्पूर्ण विश्व का भ्रमण करता था तो जाहिर सी बात है की यह तभी हो सकता है की वह कम से कम थल-वायु या थल-जल पर अवश्य चलता रहा होगा जिसमे उनका रथ वायुयान हो सकने का आसय ज्यादा हो सकता है। पर उस समय विमान कई लोगों के पास था, जब लगाम दशरथ के हांथों में रहती थी तो उनका रथ किशी भी दिशा में जा सकता था और इसका एक विशेष उदहारण जब मुर्क्षित दशरथ को बीच युद्ध मैदान से सीधे निकालकर कैकेयी उनको अयोध्या पहुंचाई थी और इस प्रकार राजा दशरथ उनको तीन बचन का पालन करने का बचन दिए थे और जिसकी परिणति था भगवान श्रीराम का चौदह वर्ष का वनवास, विमान रावण के पास भी था और उसके भाई अहिरावण के पास भी था जो तत्कालीन विश्व का सबसे बड़ा माफिया और वर्तमान पाताललोक=संयुक्तराज्य अमेरिका का राजा भी था हनुमान पुत्र मकरध्वज के राज्याभिषेक होने से पूर्व। लेकिन इसमें को संसय नहीं की अभियांत्रिकी और तकनीकी के सबसे बड़े देवता कश्यप ऋषी के पौत्र विश्वकर्मा ही थे।

विश्वामित्र मतलब कौशिक का एक नाम विश्वरथ सम्पूर्ण विश्व में जिसको लेकर वे विजय अभियान पर निकल पड़ते थे मतलब विश्वरथ वह होगा जिसका रथ सम्पूर्ण विश्व का भ्रमण करता था तो जाहिर सी बात है की यह तभी हो सकता है की वह कम से कम थल-वायु या थल-जल पर अवश्य चलता रहा होगा जिसमे उनका रथ वायुयान हो सकने का आसय ज्यादा हो सकता है। पर उस समय विमान कई लोगों के पास था,  जब लगाम दशरथ के हांथों में रहती थी तो उनका रथ किशी भी दिशा में जा सकता था और इसका एक विशेष उदहारण जब मुर्क्षित दशरथ को बीच युद्ध मैदान से सीधे निकालकर कैकेयी उनको अयोध्या पहुंचाई थी और इस प्रकार राजा दशरथ उनको तीन बचन का पालन करने का बचन दिए थे और जिसकी परिणति था भगवान श्रीराम का चौदह वर्ष का वनवास,  विमान रावण के पास भी था और उसके भाई अहिरावण के पास भी था जो तत्कालीन विश्व का सबसे बड़ा माफिया और वर्तमान पाताललोक=संयुक्तराज्य अमेरिका का राजा भी था हनुमान पुत्र मकरध्वज के राज्याभिषेक होने से पूर्व। लेकिन इसमें को संसय नहीं की अभियांत्रिकी और तकनीकी के सबसे बड़े देवता कश्यप ऋषी के पौत्र विश्वकर्मा ही थे। 

जिस विष्णु(श्रीराम) के द्वारा कश्यप ऋषी के पौत्र बाल्मीकि(प्रथम काव्य रचनाकार) को अद्वितीय ज्ञान प्राप्त हुआ उनके शिष्य भारद्वाज को रावणवध बाद श्रीराम का विरोधी बता देना कहाँ का तर्क है? >>>>कटरा रामलीला समिति, प्रयागराज के अधिकारी महोदय का समाचार पत्र में वक्तव्य था की भारद्वाज ऋषी ने रावण वध का विरोध किया था और श्रीराम के अवश्वमेध यज्ञ में शामिल नहीं हुए पर उनको यह पता होना चाहिए की रावण वध की स्क्रिप्ट ब्रह्मा द्वारा रची गयी थी और वह भी की भारद्वाज आश्रम में ही और रावण वध के बाद भारद्वाज ऋषी का ही पुष्पक विमान भगवान श्रीराम को लेने गया था और इस प्रकार रावण वध से सबसे ज्यादा हर्ष भारद्वाज ऋषी को ही हुआ था और उनके अश्वमेध यज्ञ में वे अपने शिष्य गर्ग को भेजे थे स्वयं नहीं गए इस आधार पर विरोध गलत और असंगत है लंका तक वे पूर्ण आनंद मय हो अपना विमान भेजते है रावण वध की सूचना मिलते ही।

जिस विष्णु(श्रीराम) के द्वारा कश्यप ऋषी के पौत्र बाल्मीकि(प्रथम काव्य रचनाकार) को अद्वितीय ज्ञान प्राप्त हुआ उनके शिष्य भारद्वाज को रावणवध बाद श्रीराम का विरोधी बता देना कहाँ का तर्क है? >>>>कटरा रामलीला समिति, प्रयागराज के अधिकारी महोदय का समाचार पत्र में वक्तव्य था की भारद्वाज ऋषी ने रावण वध का विरोध किया था और श्रीराम के अवश्वमेध यज्ञ में शामिल नहीं हुए पर उनको यह पता होना चाहिए की रावण वध की स्क्रिप्ट ब्रह्मा द्वारा रची गयी थी और वह भी की भारद्वाज आश्रम में ही और रावण वध के बाद भारद्वाज ऋषी का ही पुष्पक विमान भगवान श्रीराम को लेने गया था और इस प्रकार रावण वध से सबसे ज्यादा हर्ष भारद्वाज ऋषी को ही हुआ था और उनके अश्वमेध यज्ञ में वे अपने शिष्य गर्ग को भेजे थे स्वयं नहीं गए इस आधार पर विरोध गलत और असंगत है लंका तक वे पूर्ण आनंद मय हो अपना विमान भेजते है रावण वध की सूचना मिलते ही।

सनातन हिन्दू धर्म पर आरोप लगाने वालों का साथ देने वाले दलित, दलित ईसाई( बलिया, मिर्जापुर, गाजियाबाद, नोएडा, राबर्ट्सगंज, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पादरी, फादर, विशप और पोप), कुर्मावतारी, भूमिहार, कायस्थ व् वैश्य समाज के कुछ विशेष स्वार्थी लोगों मै बता रहा हूँ की आप की खिंचड़ी ने भारद्वाज ऋषी और भारद्वाज ऋषी के प्रयागराज का अपहरण कर लिया था तो पहले उनको मुक्त कराया गया और उनको मानव समाज के हित-अनहित करने वालों से परिचित कराया गया और उनको ज्ञान दिया गया की आप केवल यहां के प्रहरी और निवासी है जबकि यह प्रयागराज समस्त सातों सप्तर्षियों (आदर्श सप्तर्षि वरिष्ठता क्रम कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)(+दत्तात्रेय +सोमात्रेय)/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र)) और इस प्रकार मानवता का मूल स्थान है जिस पर सबका बराबर का अधिकार है और आप की सुरक्षा में दुर्वाशा ऋषी हमेशा रहते हैं पर आप की आतंरिक सूचना शक्ति जिससे आप अन्य गोत्रियों को सटीक सूचना देते थे उसका का क्या हुआ की दुर्वाशा का क्रोधभाजन सज्जन हुए और दुर्जन आप पर हावी होते चले गए।

सनातन हिन्दू धर्म पर आरोप लगाने वालों का साथ देने वाले दलित, दलित ईसाई( बलिया, मिर्जापुर, गाजियाबाद, नोएडा, राबर्ट्सगंज, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पादरी, फादर, विशप और पोप),  कुर्मावतारी, भूमिहार, कायस्थ व् वैश्य समाज के कुछ विशेष स्वार्थी लोगों मै बता रहा हूँ की आप की खिंचड़ी ने भारद्वाज ऋषी और भारद्वाज ऋषी के प्रयागराज का अपहरण कर लिया था तो पहले उनको मुक्त कराया गया और उनको मानव समाज के हित-अनहित करने वालों से परिचित कराया गया और उनको  ज्ञान दिया गया की आप केवल यहां के प्रहरी और निवासी है जबकि यह प्रयागराज समस्त सातों सप्तर्षियों (आदर्श सप्तर्षि वरिष्ठता क्रम कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)(+दत्तात्रेय +सोमात्रेय)/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र)) और इस प्रकार मानवता का मूल स्थान है जिस पर सबका बराबर का अधिकार है और आप की सुरक्षा में दुर्वाशा ऋषी हमेशा रहते हैं पर आप की आतंरिक सूचना शक्ति जिससे आप अन्य गोत्रियों को सटीक सूचना देते थे उसका का क्या हुआ की दुर्वाशा का क्रोधभाजन सज्जन हुए और दुर्जन आप पर हावी होते चले गए। 

अब अगर हम गोस्वामी तुलसीदास की न भी माने और कबीर की ही माने तो इस "सत्यमेव जयते" द्वारा आरोपियों पर आरोप जब सिद्ध किया जा चुका है तो क्या अब कबीर के अनुसार आरोपियों की खाल खींच ली जाय?>>>>>>>>>>कबीर पंथ की सहिष्णुता को सही बताने वालों और गोस्वामी तुलसी दास को गलत बयानी वाला बताने वालों! कबीर की कट्टरता और सहिष्णुता यह है " बकरी पाती खात है, ताकी खींची खाल। जो नर बकरी खात हैं ताको कौन हवाल। "ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी। सकल ताड़ना(गहन पारिश्थितिक पहचान कर उनको पतन से और क्षरण से बचाने के लिए नियंत्रित करने की जरूरत होती है) के अधिकारी" गोस्वामी तुलसीदास की सहिष्णुता पर संदेह करने वालों! क्या मेरे सन्दर्भ में इन 14(2001-2014) वर्षों में गोस्वामी तुलसीदास अपने तथ्यों पर पूर्णतः सत्य नहीं सिद्ध हुए आज के इस पशुवत, अमानवीय और शूद्रवत् मानशिकता वाले वैश्विक समाज की घटनाओं को ध्यान में रखने पर। जो समाज पशुवत, अमानवीय और शूद्रवत् मानशिकता या इनकी मिश्रित मानसिकता रखता है क्या वह मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण के साथ न्याय कर सकता था और क्या मुझ पर शासन और नियंत्रण स्थापित कर सकता है। इस लिए अपनी लेखनी से मुझे यह स्वयं करना पड़ा। मानवता उन्नत होने में बहुत ही श्रेष्ठतम और दीर्घकालिक प्रयास करने होते हैं पर पतन में एक पल भी देरी नही लगती है और वही होता चला आ रहा है और वही हुआ भी। अब अगर हम गोस्वामी तुलसीदास की न भी माने और कबीर की ही माने तो इस "सत्यमेव जयते" द्वारा आरोपियों पर आरोप जब सिद्ध किया जा चुका है तो क्या अब कबीर के अनुसार आरोपियों की खाल खींच ली जाय?

अब अगर हम गोस्वामी तुलसीदास की न भी माने और कबीर की ही माने तो इस "सत्यमेव जयते" द्वारा आरोपियों पर आरोप जब सिद्ध किया जा चुका है तो क्या अब कबीर के अनुसार आरोपियों की खाल खींच ली जाय?>>>>>>>>>>कबीर पंथ की सहिष्णुता को सही बताने वालों और गोस्वामी तुलसी दास को गलत बयानी वाला बताने वालों! कबीर की कट्टरता और सहिष्णुता यह है " बकरी पाती खात है, ताकी खींची खाल। जो नर बकरी खात हैं ताको कौन हवाल। 
"ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी।  सकल ताड़ना(गहन पारिश्थितिक पहचान कर उनको पतन से और क्षरण से बचाने के लिए नियंत्रित करने की जरूरत होती है) के अधिकारी"  गोस्वामी तुलसीदास की सहिष्णुता पर संदेह करने वालों! क्या मेरे सन्दर्भ में इन 14(2001-2014) वर्षों में गोस्वामी तुलसीदास अपने तथ्यों पर पूर्णतः सत्य नहीं सिद्ध हुए आज के इस पशुवत, अमानवीय और शूद्रवत् मानशिकता वाले वैश्विक समाज की घटनाओं को ध्यान में रखने पर। जो समाज पशुवत, अमानवीय और शूद्रवत् मानशिकता या इनकी मिश्रित मानसिकता रखता है क्या वह मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण के साथ न्याय कर सकता था और क्या मुझ पर शासन और नियंत्रण स्थापित कर सकता है।  इस लिए अपनी लेखनी से मुझे यह स्वयं करना पड़ा। मानवता उन्नत होने में बहुत ही श्रेष्ठतम और दीर्घकालिक प्रयास करने होते हैं पर पतन में एक पल भी देरी नही लगती है और वही होता चला आ रहा है और वही हुआ भी। अब अगर हम गोस्वामी तुलसीदास की न भी माने और कबीर की ही माने तो इस "सत्यमेव जयते" द्वारा आरोपियों पर आरोप जब सिद्ध किया जा चुका है तो क्या अब कबीर के अनुसार आरोपियों की खाल खींच ली जाय?   

जिस घर पर मेरे बचपन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ध्वज लगता था उस पर जनसंघ का भी भगवा ध्वज लगाने वाले मेरे घर/कुटुंब/खानदान के बाबा श्रद्धेय डॉ अभयचंद पाण्डेय(जो विश्वहिन्दु परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ और इस प्रकार विश्व मानव संघ का कार्य किये आयुर्विद्या स्नातक प्रमाणपत्र धारक होने बावजूद और इस प्रकार को स्थाई पेशेवर चिकित्सक जीवन भर होने की सोचे भी नहीं) का आज निधन हो गया ईस्वर उनकी आत्मा शान्ति प्रदान करें परन्तु मैंने कल रात्रि में ही उनकी आत्मा शांति हो जाने का कार्य पूर्ण कर चुका था की असली विश्वमहाशक्ति भारत/भारतवर्ष/अखंडभारत/हिन्द/हिन्दुस्थान में ही है।

जिस घर पर मेरे बचपन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ध्वज लगता था उस पर जनसंघ का भी भगवा ध्वज लगाने वाले मेरे घर/कुटुंब/खानदान के बाबा श्रद्धेय डॉ अभयचंद पाण्डेय(जो विश्वहिन्दु परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ और इस प्रकार विश्व मानव संघ का कार्य किये आयुर्विद्या स्नातक प्रमाणपत्र धारक होने  बावजूद और इस प्रकार को स्थाई पेशेवर चिकित्सक जीवन भर होने की सोचे भी नहीं)   का आज निधन हो गया ईस्वर उनकी आत्मा  शान्ति प्रदान करें परन्तु मैंने कल रात्रि में ही उनकी आत्मा शांति हो जाने का कार्य पूर्ण कर चुका था की असली विश्वमहाशक्ति भारत/भारतवर्ष/अखंडभारत/हिन्द/हिन्दुस्थान में ही है। Dr. Abhay Chand Pandey will be rememberd by article Ramapur

यहां उल्लेख करना चाहूँगा की विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव ने अपनी चौदह वर्ष की यात्रा में इस भौतिक संसार में मार्ग में भेजे गए सभी भव बाधाओं को अपनी लक्ष्य पूर्ती के साथ पार करने में दोनों सशरीर परमब्रह्म अवस्था श्रीकृष्ण और श्रीराम को प्राप्त कर लिया है और इसीलिए मेरे द्वारा लिखा था की विवेकानंद(विवेक+आनंद) इन चौदह वर्षों में अपने गुरु श्रीरामकृष्ण हो गए। और इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंश अपने मूल वंश सूर्यवंश मतलब आदित्य में समाहित मान लिए जाय या अलग समझे जाय यह कश्यप ऋषी और समाज संचालन करने वालों पर निर्भर करता है। पुत्र एक में रहें या अलग रहें उनमे शान्ति, शौहार्द्र और समृद्धि सम्पन्नता रहे पिता का यही दायित्व होता है तो वह पूरा हो गया।>>>>>>>"सत्यम शिवम सुंदरम" गुरुकुल जमदग्निपुर(जौनपुर) का भी छात्र रह चुका सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा पर भेंट चढने वाला/अर्पित होने वाला/आहार बनने वाला) पाण्डेय सारंगधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/महादेव/केदारेश्वर/आदिशंकर/-----------/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/---/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप (सूर्यस्वामी/सूर्यकांत/सत्यनारायण/लक्ष्मीकांत/लक्ष्मी नारायण/आदित्यनाथ/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश/विक्रमादित्य=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो/रामजानकी) का विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव की आतंरिक सुरक्षा शक्ति तो महाशिव भी इसे आप कह सकते है वह "सत्यमेव जयते" का भी छात्र था जो 11-11-1975, मंगलवार सुबह 9.15 बजे (कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गोपी/गिरिधर अस्टमी; वर्त्तमान ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस), धनिष्ठा नक्षत्र, अर्ध मकर व् अर्ध कुंभ राशी में जन्म लिया तदनुसार गिरिधर राशी नाम नक्षत्र के आधार पर प्राप्त किया है ((गिरिधर के संभावित पर्याय से सम्बंधित नाम: गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी (हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) जिसमे सबसे प्रचलित नाम है सशरीर परमब्रह्म की अवस्था को प्राप्त करने वाले श्रीकृष्ण का और सब उनके सम्पूरक हो जाते है सशरीर परमब्रह्म अवस्था प्राप्ति की अवस्था में आये विभिन्न जीवन कलाओं में।>>>>यहां उल्लेख करना चाहूँगा की विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव ने अपनी चौदह वर्ष की यात्रा में इस भौतिक संसार में मार्ग में भेजे गए सभी भव बाधाओं को अपनी लक्ष्य पूर्ती के साथ पार करने में दोनों सशरीर परमब्रह्म अवस्था श्रीकृष्ण और श्रीराम को प्राप्त कर लिया है और इसीलिए मेरे द्वारा लिखा था की विवेकानंद(विवेक+आनंद) इन चौदह वर्षों में अपने गुरु श्रीरामकृष्ण हो गए। और इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंश अपने मूल वंश सूर्यवंश मतलब आदित्य में समाहित मान लिए जाय या अलग समझे जाय यह कश्यप ऋषी और समाज संचालन करने वालों पर निर्भर करता है। पुत्र एक में रहें या अलग रहें उनमे शान्ति, शौहार्द्र और समृद्धि सम्पन्नता रहे पिता का यही दायित्व होता है तो वह पूरा हो गया।

यहां उल्लेख करना चाहूँगा की विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव ने अपनी चौदह वर्ष की यात्रा में इस भौतिक संसार में मार्ग में भेजे गए सभी भव बाधाओं को अपनी लक्ष्य पूर्ती के साथ पार करने में दोनों सशरीर परमब्रह्म अवस्था श्रीकृष्ण और श्रीराम को प्राप्त कर लिया है और इसीलिए मेरे द्वारा लिखा था की विवेकानंद(विवेक+आनंद) इन चौदह वर्षों में अपने गुरु श्रीरामकृष्ण हो गए। और इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंश अपने मूल वंश सूर्यवंश मतलब आदित्य में समाहित मान लिए जाय या अलग समझे जाय यह कश्यप ऋषी और समाज संचालन करने वालों पर निर्भर करता है। पुत्र एक में रहें या अलग रहें उनमे शान्ति, शौहार्द्र और समृद्धि सम्पन्नता रहे पिता का यही दायित्व होता है तो वह पूरा हो गया।>>>>>>>"सत्यम शिवम सुंदरम" गुरुकुल जमदग्निपुर(जौनपुर) का भी छात्र रह चुका सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा पर भेंट चढने वाला/अर्पित होने वाला/आहार बनने वाला) पाण्डेय सारंगधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/महादेव/केदारेश्वर/आदिशंकर/-----------/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/---/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप (सूर्यस्वामी/सूर्यकांत/सत्यनारायण/लक्ष्मीकांत/लक्ष्मी नारायण/आदित्यनाथ/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश/विक्रमादित्य=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो/रामजानकी) का विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव की आतंरिक सुरक्षा शक्ति तो महाशिव भी इसे आप कह सकते है वह "सत्यमेव जयते" का भी छात्र था  जो 11-11-1975, मंगलवार सुबह 9.15 बजे (कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गोपी/गिरिधर अस्टमी; वर्त्तमान ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस), धनिष्ठा नक्षत्र, अर्ध मकर व् अर्ध कुंभ राशी में जन्म लिया  तदनुसार गिरिधर राशी नाम नक्षत्र के आधार पर प्राप्त किया है ((गिरिधर के संभावित पर्याय से सम्बंधित नाम: गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी (हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) जिसमे सबसे प्रचलित नाम है सशरीर परमब्रह्म  की अवस्था को प्राप्त करने वाले श्रीकृष्ण का और सब उनके सम्पूरक हो जाते है सशरीर परमब्रह्म अवस्था प्राप्ति की अवस्था में आये विभिन्न जीवन कलाओं में।>>>>यहां उल्लेख करना चाहूँगा की विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव ने अपनी चौदह वर्ष की यात्रा में इस भौतिक संसार में मार्ग में भेजे गए सभी भव बाधाओं को अपनी लक्ष्य पूर्ती के साथ पार करने में दोनों सशरीर परमब्रह्म अवस्था श्रीकृष्ण और श्रीराम को प्राप्त कर लिया है और इसीलिए मेरे द्वारा लिखा था की विवेकानंद(विवेक+आनंद) इन चौदह वर्षों में अपने गुरु श्रीरामकृष्ण हो गए। और इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंश अपने मूल वंश सूर्यवंश मतलब आदित्य में समाहित मान लिए जाय या अलग समझे जाय यह कश्यप ऋषी और समाज संचालन करने वालों पर निर्भर करता है। पुत्र एक में रहें या अलग रहें उनमे शान्ति, शौहार्द्र और समृद्धि सम्पन्नता रहे पिता का यही दायित्व होता है तो वह पूरा हो गया।>>>>>>सत्यम शिवम सुंदरम" गुरुकुल जमदग्निपुर(जौनपुर) का भी छात्र रह चुका विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव की आतंरिक सुरक्षा शक्ति तो महाशिव भी इसे आप कह सकते है >>>>>>>>वह "सत्यमेव जयते" का भी छात्र था|

Saturday, November 28, 2015

असली विश्वमहाशक्ति भारत/अखंडभारत/हिन्दुस्थान/भारतवर्ष में है या भारतवर्ष से बाहर है अब यह अंदाज लगा लिया जाय?

असली विश्वमहाशक्ति भारत/अखंडभारत/हिन्दुस्थान/भारतवर्ष में है या भारतवर्ष से बाहर है अब यह अंदाज लगा लिया जाय?

वर्तमान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (अखंड भारत) में जन्म लिए शांडिल्य(पूर्ण चन्द्र) ऋषी के पिता वशिष्ठ ऋषी थे और माता कश्यप ऋषी की बहन थीं तो मामा और पिता बड़े या भांजा और पुत्र बड़े यह भी लोग समझ लें और जान ले?

वर्तमान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (अखंड भारत) में जन्म लिए शांडिल्य(पूर्ण चन्द्र) ऋषी के पिता वशिष्ठ ऋषी थे और माता कश्यप ऋषी की बहन थीं तो मामा और पिता बड़े या भांजा और पुत्र बड़े यह भी लोग समझ लें और जान ले? 

गर्ग के गुरु भारद्वाज(आंगिरस गोत्रीय), भारद्वाज के गुरु वाल्मीकि जो कश्यप ऋषी के पुत्र वरुणदेव के पुत्र है और अपनी हैरतअंगेज कार्यों से पिता से दूर हुए थे और उनको विष्णु द्वारा आत्म ज्ञान प्राप्त हुआ था और इस प्रकार गर्ग गोत्रीय कश्यप गोत्रियों की शिष्य परम्परा में ही आते हैं। तो गुरु बड़ा हुआ या शिष्य यह सब लोग जान लें? दूसरा की ब्रह्मा से आयुर्विद्या कश्यप ऋषी को हस्तांतरित होते हुए धन्वन्तरि(आंगिरस गोत्रीय) तक पहुँची तो गर्ग गोत्रीय और धन्वन्तरि विभाग अपने को पहचान लें कश्यप गोत्रियों के सामने? पर हाँ कश्यप की द्वितीय पत्नी अदिति से आदित्य (समस्त देव समाज का आविर्भाव हुआ था) तो देवताओं के गुरु बृहस्पति देव आंगिरस गोत्रीय थे तो कशयप के इन देव पुत्र समूह के वरिष्ठ देव गुरु, बृहस्पति महाराज और इस प्रकार उनके पूर्वज आंगिरस ऋषी अवश्य हुए।

गर्ग के गुरु भारद्वाज(आंगिरस गोत्रीय), भारद्वाज के गुरु वाल्मीकि जो कश्यप ऋषी के पुत्र वरुणदेव के पुत्र है और अपनी हैरतअंगेज कार्यों से पिता से दूर हुए थे और उनको विष्णु द्वारा आत्म ज्ञान प्राप्त हुआ था और इस प्रकार गर्ग गोत्रीय कश्यप गोत्रियों की शिष्य परम्परा में ही आते हैं। तो गुरु बड़ा हुआ या शिष्य यह सब लोग जान लें? दूसरा की ब्रह्मा से आयुर्विद्या कश्यप ऋषी को हस्तांतरित होते हुए धन्वन्तरि(आंगिरस गोत्रीय) तक पहुँची तो गर्ग गोत्रीय और धन्वन्तरि विभाग अपने को पहचान लें कश्यप गोत्रियों के सामने? पर हाँ कश्यप की द्वितीय पत्नी अदिति से आदित्य (समस्त देव समाज का आविर्भाव हुआ था) तो देवताओं के गुरु बृहस्पति देव आंगिरस गोत्रीय थे तो कशयप के इन देव पुत्र समूह के वरिष्ठ देव गुरु, बृहस्पति महाराज और इस प्रकार उनके पूर्वज आंगिरस ऋषी अवश्य हुए।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय व् प्रयागराज विश्विद्यालय: सनातन गौतम गोत्रीय क्षत्रिय विष्णु भैया का और मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा पर भेंट चढने वाला/अर्पित होने वाला/आहार बनने वाला) पाण्डेय सारंगधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/-------/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/---/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप (सूर्यस्वामी/सूर्यकांत/सत्यनारायण/लक्ष्मीकांत/लक्ष्मी नारायण/आदित्यनाथ/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश/विक्रमादित्य=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो/रामजानकी) वंसज का क्या सम्बन्ध है यह मै नहीं जानता पर इतना जरूर जनता हूँ की पहली ही नजर में वर्ष 1998 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश करते ही मुझे अपने ही लगे जब की मै उनकी जाती/धर्म दोनों से अपरचित था उस समय और बाद में पता चला यह सब और 1998-99 वर्ष के दौरान भी उनसे मेरी कोई बात भी नहीं हुई और न मेरा उनका कभी सामना हुआ और कटरा, प्रयागराज में उनके रहने के दौरान वर्ष 2001-2004 के बीच विजय नगरम हाल, विज्ञानं संकाय, प्रयागराज विश्विद्यालय के सामने सायंकाल कई बार आमना-सामना भी हुआ पर मैं उनसे छोटे भाई का कर्तव्य निर्वहन भी नहीं किया और कुछ हाल चाल न लिया और न लेने देने लायक था भी जबकि वे मुझे देखकर कुछ ठमके भी। हो सकता है कुछ हाल से हाल मिला होता और चाल से चाल मिला होता तो यह दुनिआ कुछ और होती और इतनी अस्थिरता इस दुनिआ में न आयी होती।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय व् प्रयागराज विश्विद्यालय: सनातन गौतम गोत्रीय क्षत्रिय विष्णु भैया का और मुझ सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा पर भेंट चढने वाला/अर्पित होने वाला/आहार बनने वाला) पाण्डेय सारंगधर/चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/-------/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/---/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप (सूर्यस्वामी/सूर्यकांत/सत्यनारायण/लक्ष्मीकांत/लक्ष्मी नारायण/आदित्यनाथ/श्रीकांत/श्रीधर/श्रीप्रकाश/विक्रमादित्य=जो सूर्य को भी नियंत्रीय कर सके मतलब जो सात सूर्य के घोड़ों की सवारी करता हो/रामजानकी) वंसज का क्या सम्बन्ध है यह मै नहीं जानता पर इतना जरूर जनता हूँ की पहली ही नजर में वर्ष 1998 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश करते ही मुझे अपने ही लगे जब की मै उनकी जाती/धर्म दोनों से अपरचित था उस समय और बाद में पता चला यह सब और 1998-99 वर्ष के दौरान भी उनसे मेरी कोई बात भी नहीं हुई और न मेरा उनका कभी सामना हुआ और कटरा, प्रयागराज में उनके रहने के दौरान वर्ष 2001-2004 के बीच विजय नगरम हाल, विज्ञानं संकाय, प्रयागराज विश्विद्यालय के सामने सायंकाल कई बार आमना-सामना भी हुआ पर मैं उनसे छोटे भाई का कर्तव्य निर्वहन भी नहीं किया और कुछ हाल चाल न लिया और न लेने देने लायक था भी जबकि वे मुझे देखकर कुछ ठमके भी। हो सकता है कुछ हाल से हाल मिला होता और चाल से चाल मिला होता तो यह दुनिआ कुछ और होती और इतनी अस्थिरता इस दुनिआ में न आयी होती। 

Friday, November 27, 2015

जिन दो सशरीर परमब्रह्म रूप-रंग के आधार पर विश्व समाज विभाजन की की बात होती है वे दो तो सप्तर्षि(+अगस्त)/अस्टक ऋषी के अंश और आशीर्वाद से ही सशरीर परमब्रह्म (परमब्रम्ह का गुण किशी को श्रीराम/कृष्ण बनाता है न की रंग भेद किशी को श्रीराम/कृष्ण बनाता है) बने हैं तो फिर मूलतः विभाजन सात(+1)/आठ का ही होना चाहिए इस मानव सभ्यता में तो फिर दो ही दो की रट क्यों लगाई जा रही है स्वार्थपरता में आकर? अगर वैश्विक इकाई मतलब विश्व एकगांव में मूलभूत संख्या आधारित विभाजन, सप्तर्षि(+अगस्त)/अस्टक(सात/आठ) पर आप नहीं आते तो फिर त्रिदेव आधारित एक तिहाई(तिहाई-तिहाई) विभाजन पर आ जाइए और सब लोग स्वर्णकार सुदर्शन धवलानिधी हो जाइए और उस पर भी न हो तो एकल निराकार परमब्रह्म पर आ जाइए जिस तेजोमयी धवल स्वरुप को आप देख भी न सकिये मतलब जीव विहीन पूर्ण महाशून्य का राज हो जाय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में। तो यह है आदर्श सप्तर्षि वरिष्ठता क्रम कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)(+दत्तात्रेय +सोमात्रेय)/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र) ही होगा और इस आदर्शों के प्रतिकूल कभी भी नहीं होगा/हो सकता|

जिन दो सशरीर परमब्रह्म रूप-रंग के आधार पर विश्व समाज विभाजन की की बात होती है वे दो तो सप्तर्षि(+अगस्त)/अस्टक ऋषी के अंश और आशीर्वाद से ही सशरीर परमब्रह्म (परमब्रम्ह का गुण किशी को श्रीराम/कृष्ण बनाता है न की रंग भेद किशी को श्रीराम/कृष्ण बनाता है) बने हैं तो फिर मूलतः विभाजन सात(+1)/आठ का ही होना चाहिए इस मानव सभ्यता में तो फिर दो ही दो की रट क्यों लगाई जा रही है स्वार्थपरता में आकर? अगर वैश्विक इकाई मतलब विश्व एकगांव में मूलभूत संख्या आधारित विभाजन, सप्तर्षि(+अगस्त)/अस्टक(सात/आठ) पर आप नहीं आते तो फिर त्रिदेव आधारित एक तिहाई(तिहाई-तिहाई) विभाजन पर आ जाइए और सब लोग स्वर्णकार सुदर्शन धवलानिधी हो जाइए और उस पर भी न हो तो एकल निराकार परमब्रह्म पर आ जाइए जिस तेजोमयी धवल स्वरुप को आप देख भी न सकिये मतलब जीव विहीन पूर्ण महाशून्य का राज हो जाय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में। तो यह है आदर्श सप्तर्षि वरिष्ठता क्रम कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)(+दत्तात्रेय +सोमात्रेय)/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र) ही होगा और इस आदर्शों के प्रतिकूल कभी भी नहीं होगा/हो सकता|

Thursday, November 26, 2015

जो भाई का "युद्ध कला से दूर-दूर तक नाता नहीं वह मानवता का पर्याय हो और न्यायविद हो और जो अभीष्ट कार्यों में भगवान भरोसे रहता है" उसे हम आगे आने नहीं देते सामाजिक क्षेत्र में ही रखते है, जो भाई "श्रेष्ठ शिक्षक है/ शिक्षण कर समाज निर्माण करता रहा है" उसे भी हम आगे नहीं आने देते, "जो वैद्य है, दार्शनिक है और देवताओं का गुरु(देव तुल्य समाज का निर्माण करता है) है" उसे भी हम संरक्षित श्रेणी में ही रखते हैं, "जो त्याग का प्रतीक है और ब्राह्मणोचित गुण में श्रेष्ठतम है उसका हम संरक्षण और संवर्धन ही करते हैं", "जो क्रोध में नियंत्रण खो देता है और प्रलय मचा आतंक का पर्याय बन जाता है या दानवीर कर्ण या स्वप्नद्रष्टा बना रहता है" उसे भी हम बहुत कम मौक़ा देते हैं, और "जो भाई केवल युद्ध कर अग्निवर्षा करता है उसे शासन करना और स्थिर होना कभी आया ही नहीं केवल युद्ध ही जीतता आया है उसे भी हम आगे नहीं कर सकते", तो जो भाई सबको छाया देते हुए सबकी अच्छाइयाँ और कमिया जानते हुए उनका उचित समाधान प्रस्तुत करते हुए सबको जोड़े रहने और उचित कार्य देने का सर्वगुण सम्पन्न गुण होता है उस बड़े भाई को हम सबसे अगली पक्ति में रखते है। तो यह है आदर्श सप्तर्षि वरिष्ठता क्रम कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)(+दत्तात्रेय +सोमात्रेय)/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र) ही होगा और इस आदर्शों के प्रतिकूल कभी भी नहीं होगा/हो सकता|

जो भाई का "युद्ध कला से दूर-दूर तक नाता नहीं वह मानवता का पर्याय हो और न्यायविद हो और जो अभीष्ट कार्यों में भगवान भरोसे रहता है" उसे हम आगे आने नहीं देते सामाजिक क्षेत्र में ही रखते है,  जो भाई "श्रेष्ठ शिक्षक है/ शिक्षण कर समाज निर्माण करता रहा है" उसे भी हम आगे नहीं आने देते, "जो वैद्य है, दार्शनिक है और देवताओं का गुरु(देव तुल्य समाज का निर्माण करता है) है" उसे भी हम संरक्षित श्रेणी में ही रखते हैं, "जो त्याग का प्रतीक है और ब्राह्मणोचित गुण में श्रेष्ठतम है उसका हम संरक्षण और संवर्धन ही करते हैं", "जो क्रोध में नियंत्रण खो देता है और प्रलय मचा आतंक का पर्याय बन जाता है या दानवीर कर्ण या स्वप्नद्रष्टा बना रहता है" उसे भी हम बहुत कम मौक़ा देते हैं,  और "जो भाई केवल युद्ध कर अग्निवर्षा करता है उसे शासन करना और स्थिर होना कभी आया ही नहीं केवल युद्ध ही जीतता आया है उसे भी हम आगे नहीं कर सकते", तो जो भाई सबको छाया देते हुए सबकी अच्छाइयाँ और कमिया जानते हुए उनका उचित समाधान प्रस्तुत करते हुए सबको जोड़े रहने और उचित कार्य देने का सर्वगुण सम्पन्न गुण होता है उस बड़े भाई को हम सबसे अगली पक्ति में रखते है। तो यह है आदर्श सप्तर्षि वरिष्ठता क्रम कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)(+दत्तात्रेय +सोमात्रेय)/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र) ही होगा और इस आदर्शों के प्रतिकूल कभी भी नहीं होगा/हो सकता|

आदर्श सप्तर्षि वरिष्ठता क्रम कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)(+दत्तात्रेय +सोमात्रेय)/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र) ही होगा और इस आदर्शों के प्रतिकूल कभी भी नहीं होगा/हो सकता|

आदर्श सप्तर्षि वरिष्ठता क्रम कश्यप/मारीच, गौतम, वशिष्ठ, भारद्वाज/आंगिरस, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)(+दत्तात्रेय +सोमात्रेय)/अत्रि, कौशिक(विश्वरथ=विश्वामित्र) ही होगा और इस आदर्शों के प्रतिकूल कभी भी नहीं होगा/हो सकता|

आंगिरस से धन्वन्तरि तो कश्यप से विश्वकर्मा(अभियंता व् तकनीकी विषेशज्ञ समाज: कश्यप और अदिति पुत्र आदित्य के पुत्र समस्त देवता समाज के एक देवता) और भी कि ब्रह्मा ने सर्व प्रथम आयुर्विद्या कश्यप ऋषी को ही हस्तांतरित की थी और कई लोगों से होती हुयी आंगिरस गोत्रीय धन्वन्तरि तक पंहुची थी।

आंगिरस से धन्वन्तरि तो कश्यप से विश्वकर्मा(अभियंता व् तकनीकी विषेशज्ञ समाज: कश्यप और अदिति पुत्र आदित्य के पुत्र समस्त देवता समाज के एक देवता) और भी कि ब्रह्मा ने सर्व प्रथम आयुर्विद्या कश्यप ऋषी को ही हस्तांतरित की थी और कई लोगों से होती हुयी आंगिरस गोत्रीय धन्वन्तरि तक पंहुची थी। 

मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य: १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है| 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।

मुझे अत्यन्त दुःख के साथ कहना पद रहा है की एकबार अशोकचक्र/कालचक्र/महादेवचक्र/धर्मचक्र/समयचक्र टूट चुका था एक दूसरे के प्रति शीतयुद्ध, कपटाचरण, दम्भ, अय्यासी और भोग विलासिता के कारन ही जिसके स्थान पर सुदर्शन चक्र चल रहा था लेकिन वह सुदर्शन चक्र जिसका चल रहा था वह श्रीकृष्ण/गिरिधर भी महादेव भक्त और महादेव दत्तक पुत्र ही था। इस प्रकार अगर अशोकचक्र सुदर्शन चक्र की छाया में पुनर्विकसित हुआ है अभीष्ट युक्तियों से तो इसके बावजूद पारदर्शी सत्य के स्थान पर फिर से एक दूसरे के प्रति शीतयुद्ध, कपटाचरण, दम्भ, अय्यासी और भोग विलासिता जारी है तो फिर इस प्रकार मानवता का सफल सञ्चालन कैसे होगा। आप सभी सप्तर्षि की ही संतान है तो फिर क्यों नहीं सभी लोग अपनी संख्या कम करके पहले अखंड भारत में आ जाइए फिर वर्तमान भारत और फिर कम करते करते उत्तर भारत और फिर हिमालय की तलहटी से उत्तर प्रदेश और उत्तराँचल तक ही सीमित हो जाइए। उस पर भी आप शांतिपूर्वक न रह पाइए तो प्रयाग राज में आकर केवल सात पुनः हो जाइए और उस पर भी न संभव हो तो फिर तीन और फिर एक (निराकार परमब्रह्म: साकार तो श्रीराम/कृष्ण थे) हो जाइए मतलब जितने भी ब्रह्माण्ड हैं सब असीमित ऊर्जा में रूपांतरित हो जाय इस मानवता के समाप्ति के साथ और जो अनवरत जीवन ब्रह्मा का वरदान है वह ध्वस्त हो जाय। वैसे मैंने सिद्ध कर रखा है की समाज में श्रीराम और श्रीकृष्ण अस्तित्व जब तक है तभी तक इस्लाम और ईसाइयत का अस्तित्व है और उनके रहते ही वे नियंत्रित रह सकते हैं | अतः अन्य एक तिहाई जनमानस (हिन्दू +बौद्ध+शिख+जैन+अन्य सांगत पंथ) का कार्य है की की वे अपने योग से श्रीराम/कृष्ण को जीवंत रखे अपने बीच और तभी मानवता शांतिपूर्वक और संतुलित रह पावेगी अन्यथा महादेव का प्रलय प्रवाह इस मानवता को निगल जाएगा और विश्व मानवता का मूल केंद्र भारत भूमि भी उससे अछूती नहीं रहेगी।>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है|
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

अम्बेडकर और काशीराम सुरक्षित हैं क्रमसः प्रयागराज और लक्ष्मणपुर में तो यह केवल उपयुक्त ही नहीं अति आनंद और हर्ष का विषय है पर उनकी एक सनातन सप्तर्षि ब्राह्मण से क्या तुलना जिसने ब्राह्मण धर्म को कभी न छोड़ा हो ? हाँ एक मौलिक तुलना है की की वे भी मानव मात्र है और सनातन सप्तर्षि ब्राह्मण भी मानव मात्र है । >>>>>>दलित ईसाईयों के हांथों नियंत्रित हो उनके हांथों में अपनी इज्जत गिरवी रखने के बदले उनसे शक्ति हांसिल कर उससे लड़ जीत हानशील नहीं कर सकते हैं जो अपनी शक्ति और इज्जत को अपने पुरुषार्थ और चरित्रबल से संरक्षित रखा है। अपने से बड़ों से अपने ही दुर्विचारपूर्ण कर्मों से बार-बार पराजित होने पर भी सत्य से साक्षात्कार न करने की जिद करते हुए अपने से बड़ों को आतंकवादी कह हम इस दुनिया को वास्तविक आतंकवाद से मुक्ति नहीं दे सकते हैं। जिसने आप लोगों को संरक्षण और संवर्धित करने हेतु ही कोई विशेष युद्ध लड़ा ही नहीं आप उसी युद्ध विशेष को युद्ध समझ किशी को महिमा मंडित कर रहे हैं 29 अक्टूबर, 2009 को ही प्रयागराज विश्विद्यालय प्रयागराज में ही में स्थापित विजय को झूंठलाकर और उसके विपरीत ही प्रमाणपत्र देकर तो इस तरह की घटनाएं एक-एक आप करते रहते है क्रमानुसार तो क्या यह आतंकवाद के लिए चिंगारी का कार्य नहीं करता है ? जो सर्वकालिक सत्य और विजय स्थापित हुयी परम मानवता की उसे आप भूल जाते हैं

अम्बेडकर और काशीराम सुरक्षित हैं क्रमसः प्रयागराज और लक्ष्मणपुर में तो यह केवल उपयुक्त ही नहीं अति आनंद और हर्ष का विषय है पर उनकी एक सनातन सप्तर्षि ब्राह्मण से क्या तुलना जिसने ब्राह्मण धर्म को कभी न छोड़ा हो ? हाँ एक मौलिक तुलना है की की वे भी मानव मात्र है और सनातन सप्तर्षि ब्राह्मण भी मानव मात्र है । >>>>>>दलित ईसाईयों के हांथों नियंत्रित हो उनके हांथों में अपनी इज्जत गिरवी रखने के बदले उनसे शक्ति हांसिल कर उससे लड़ जीत हानशील नहीं कर सकते हैं जो अपनी शक्ति और इज्जत को अपने पुरुषार्थ और चरित्रबल से संरक्षित रखा है।  अपने से बड़ों से अपने ही दुर्विचारपूर्ण कर्मों से बार-बार पराजित होने पर भी सत्य से साक्षात्कार न करने की जिद करते हुए अपने से बड़ों को आतंकवादी कह हम इस दुनिया को वास्तविक आतंकवाद से  मुक्ति नहीं दे सकते हैं।  जिसने आप लोगों को संरक्षण और संवर्धित करने हेतु ही कोई विशेष युद्ध लड़ा ही नहीं आप उसी युद्ध विशेष को युद्ध समझ किशी को महिमा मंडित कर रहे हैं 29 अक्टूबर, 2009  को ही प्रयागराज विश्विद्यालय प्रयागराज में ही में स्थापित विजय को झूंठलाकर और उसके विपरीत ही प्रमाणपत्र देकर तो  इस तरह की घटनाएं एक-एक आप करते रहते है क्रमानुसार तो  क्या यह आतंकवाद के लिए चिंगारी का कार्य नहीं करता है ? जो सर्वकालिक सत्य और विजय स्थापित हुयी परम मानवता की उसे आप भूल जाते हैं  

हर सज्जन(सद्-चरित्रवान) की रक्षा हो बिना किशी जाती/धर्म(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उनके व्युत्पन्न तथा इस सम्बन्ध में अपनी एक राय न बना पाने की अवस्था में दिग्भ्रमित लोग/तथाकथित दलित समाज) , धर्म(हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई और अन्य), सम्प्रदाय(सभी धर्मों के अनुसांगिक भाग) तथा आयवर्ग का ध्यान दिए हुए। मै सभी को प्राचीनतम सनातन धर्म या प्राचीनतम सनातन हिन्दू धर्म का ही मानता हूँ। अतः उच्च वर्ग या उच्च आय वर्ग वालों की पत्नी, बहु, बहन और बेटी को भगाकर उसकी इज्जत-आबरू तार तार करते हुए मजबूर कर अपनी नस्ल सुधार का अभीष्ट आसय पूर्ती हेतु विवाह करने हेतु मजबूर करना और इस प्रकार उसका तन-मन-धन लूटकर उसको नंगा और मजबूर कर उसको नीचा दिखाना या निम्न आयवर्ग की पत्नी, बहु, बहन और बेटी का बलात्कार कर और उसे आर्थिक रूप से असहाय कर उसकी खिल्ली उड़ाना मेरा कार्य नहीं है और न उसे मै कभी किया हूँ और न तो आगे करना चाहता हूँ।

हर सज्जन(सद्-चरित्रवान) की रक्षा हो बिना किशी जाती/धर्म(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उनके व्युत्पन्न तथा इस सम्बन्ध में अपनी एक राय न बना पाने की अवस्था में दिग्भ्रमित लोग/तथाकथित दलित समाज) , धर्म(हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई और अन्य), सम्प्रदाय(सभी धर्मों के अनुसांगिक भाग) तथा आयवर्ग का ध्यान दिए हुए। मै सभी को प्राचीनतम सनातन धर्म या प्राचीनतम सनातन हिन्दू धर्म का ही मानता हूँ। अतः उच्च वर्ग या उच्च आय वर्ग वालों की पत्नी, बहु, बहन और बेटी को भगाकर उसकी इज्जत-आबरू तार तार करते हुए मजबूर कर अपनी नस्ल सुधार का अभीष्ट आसय पूर्ती हेतु विवाह करने हेतु मजबूर करना और इस प्रकार उसका तन-मन-धन लूटकर उसको नंगा और मजबूर कर उसको नीचा दिखाना या निम्न आयवर्ग की  पत्नी, बहु, बहन और बेटी का बलात्कार कर और उसे आर्थिक रूप से असहाय कर उसकी खिल्ली उड़ाना मेरा कार्य नहीं है और न उसे मै कभी किया हूँ और न तो आगे करना चाहता हूँ।

Wednesday, November 25, 2015

जो स्वयं तथा अपने अभिकर्ताओं के माध्यम से दूसरों के घर में सेंधमारी/चोरी करता है इस हेतु अपने मीठे जहर और कुसंस्कृति को वैश्विक समाज में घोलता है परोक्ष रूप में और इस प्रकार प्रभावित होने वाले को अतिसय मजबूर कर प्रत्यक्ष रूप से डकैती करने के लिए उकसाता है या उत्प्रेरित करता है वास्तव में वही हिंशा और प्रतिहिंसा का वास्तविक जिम्मेदार होता है।

जो स्वयं तथा अपने अभिकर्ताओं के माध्यम से दूसरों के घर में सेंधमारी/चोरी करता है इस हेतु अपने मीठे जहर और कुसंस्कृति को वैश्विक समाज में घोलता है परोक्ष रूप में और इस प्रकार प्रभावित होने वाले को अतिसय मजबूर कर प्रत्यक्ष रूप से डकैती करने के लिए उकसाता है या उत्प्रेरित करता है वास्तव में वही हिंशा और प्रतिहिंसा का वास्तविक जिम्मेदार होता है। 

कुछ तो विशुद्ध ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य इस विश्व/भारतीय समाज में रहने दीजिये भाई/बहन लोगों।

कुछ तो विशुद्ध ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य इस विश्व/भारतीय समाज में रहने दीजिये भाई/बहन लोगों। 

हमारे सामाजिक मामलों के समयाभाव के कारन तात्कालीन सामाजिक नियमों को तोड़ सुविधाभोगी होने से जो सामाजिक विष/गरल पनप रहा है उसका सेवन/पान कौन नीलकंठ महादेव करेंगे इसका विचार नहीं हो रहा है वस खिंचड़ी समाज का विगुल बजाया जा रहा है। भारतीय संस्कृति में खिंचड़ी सातवें भाग में निहित है पर इस समय तो पूरा विश्व अधिकांसतः खिंचड़ी बन चुका है और जो बचे हैं उनको तरह तरह के प्रलोभन और तरह तरह के अस्त्र चला खिंचड़ी बन जाने को मजबूर किया जा रहा और इस प्रकार पूरे पूरे विश्व को एक महा शून्य में धकेलने का इंतजाम हो चुका है और हमारी तरह जो लोग त्यागी पुरुषों की जमात तैयार करने और इस प्रकार इस तरह की खिंचड़ी का विरोध कर रहे हैं इस जनमानस को महाशून्य से बचाने के लिए उनका इस खिंचड़ी समुदाय के बहुत बड़े वर्ग के विरोध का सामना करना पड रहा है। हमारे सामाजिक मामलों के समयाभाव के कारन तात्कालीन सामाजिक नियमों को तोड़ सुविधाभोगी होने से जो सामाजिक विष/गरल पनप रहा है उसका सेवन/पान कौन नीलकंठ महादेव करेंगे इसका विचार नहीं हो रहा है वस खिंचड़ी समाज का विगुल बजाया जा रहा है।

कुछ तो विशुद्ध ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य इस विश्व/भारतीय समाज में रहने दीजिये भाई/बहन लोगों। >>>>>>हमारे सामाजिक मामलों के समयाभाव के कारन तात्कालीन सामाजिक नियमों को तोड़ सुविधाभोगी होने से जो सामाजिक विष/गरल पनप रहा है उसका सेवन/पान कौन नीलकंठ महादेव करेंगे इसका विचार नहीं हो रहा है वस खिंचड़ी समाज का विगुल बजाया जा रहा है। भारतीय संस्कृति में खिंचड़ी सातवें भाग में निहित है पर इस समय तो पूरा विश्व अधिकांसतः खिंचड़ी बन चुका है और जो बचे हैं उनको तरह तरह के प्रलोभन और तरह तरह के अस्त्र चला खिंचड़ी बन जाने को मजबूर किया जा रहा और इस प्रकार पूरे पूरे विश्व को एक महा शून्य में धकेलने का इंतजाम हो चुका है और हमारी तरह जो लोग त्यागी पुरुषों की जमात तैयार करने और इस प्रकार इस तरह की खिंचड़ी सतत बनाये जाने का विरोध कर रहे हैं इस जनमानस को महाशून्य से बचाने के लिए उनका इस खिंचड़ी समुदाय के बहुत बड़े वर्ग के विरोध का सामना करना पड रहा है। हमारे सामाजिक मामलों के समयाभाव के कारन तात्कालीन सामाजिक नियमों को तोड़ सुविधाभोगी होने से जो सामाजिक विष/गरल पनप रहा है उसका सेवन/पान कौन नीलकंठ महादेव करेंगे इसका विचार नहीं हो रहा है वस खिंचड़ी समाज का विगुल बजाया जा रहा है।>>>>>> कुछ तो विशुद्ध ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य इस विश्व/भारतीय समाज में रहने दीजिये भाई/बहन लोगों।

गुरुर ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुसाक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवेनमः। । अगर गुरु ही स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश हों तो किसको परमब्रह्म नहीं बना सकते?

गुरुर ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुसाक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवेनमः। । अगर गुरु ही स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश हों तो किसको परमब्रह्म नहीं बना सकते? 

Tuesday, November 24, 2015

मौक़ा मिलने पर कोई अपनी कलाबाजी से बाज नहीं आ रहा चाहे दलित हो, कुर्मावतारी हो, वैश्य समाज हो, भूमिहार समाज हो या कायस्थ समाज हो या ईसाइयत पर आज से चौदह वर्ष पूर्व वह दिन का वह समय याद है जब की विवेक कुमार पाण्डेय केवल एक व्यक्तित्व मात्र था और इस प्रयागराज विश्वविद्यालय में कृपापात्र बनाते हुए दी गयी अनुसंधान सहायक (रिसर्च असिस्टेंट) के पद की भूमिका (यहां के लोगों की अपने लिए स्थायी विकल्प रखते हुए के साथ लय से लय मिलाती हुई भउकालिक परन्तु गैरजिम्मेदार भूमिका को किशी कार्य को मूर्तरूप देने के प्रति दृण प्रतिज्ञ न हो को देखते हुए) त्याग देने हेतु पेशकश अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, श्रीश्रीधर (विष्णु) और परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, डॉ प्रेमचंद(शिव) से कर दिया था और इस प्रकार एक विवेकशील प्राणी जो व्यक्तिगत हित में दूरगामी सोच रखता हो वह कार्य पूर्ण कर चुका था तो माँ सरस्वती पुत्र होने का दायित्व और सौभाग्य तभी मई प्राप्त कर चुका था। >>>>>>>>>पर गुरु भी कोई शक्ति होता है: इन दोनों का आदेश हुआ वहाँ तुम्हे गुरुदेव, सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी जी(ब्रह्मा) के कार्यपूर्ती हेतु रुकना है, तो विश्व जनमत मै रुका और यह प्रयागराज विश्विद्यालय में एक दर्जन केंद्र/विभाग में ही दीपक नहीं जले वरन इस विश्व के सम्पूर्ण मानव समाज को एक नया जीवन दान भी मिला एक सुरक्षा कवच बन इस प्रयागराज/भारतवर्ष में अपने को केंद्रित किये रहने के कारन। तो दुनिया में कौन है जो मेरी मेरिट देख सकता है उससे वह जलन होगी जिसे वह वर्दास्त नही कर सके और न वर्दास्त कर सकेंगे जिस हेतु मै स्वयं उनका साम्यवाद सहित सामाजिक न्यायवाद और अन्य-अन्य वाद और अस्त्र वार स्वीकार कर लेता हूँ जो मेरे सम्बन्ध में अनुत्तरण रहे लक्ष्य भेदन में और न मेरी मेरिट का अभी तक कोई विकल्प स्वयं तथाकथित विश्वमहाशक्ति=पातालपुरी=संयुक्तराज्य अमेरिका भी स्वयं प्रस्तुत कर सका जिसकी जी हुजूरी सम्पूर्ण दलित हो, कुर्मावतारी हो, वैश्य समाज हो, भूमिहार समाज हो या कायस्थ समाज हो या ईसाइयत समाज के वे लोग करते हैं जो आज तक मेरा विरोध करते हैं हर प्रकार से सीत युद्ध के माध्यम से और वह सीट युद्ध क्या है और किस प्रकार हो रहा है वह मै उन सबके आंका, तथाकथित विश्वमहाशक्ति=पातालपुरी=संयुक्तराज्य अमेरिका को ही बताऊंगा अगर स्पष्ट प्रश्न होता है और निवेदन होगा की अगर वास्तविक मानवता हित और इस प्रकार अपना तथा अपने अभिकर्ताओं का हित वह तथाकथित विश्वमहाशक्ति=पातालपुरी=संयुक्तराज्य अमेरिका चाहता है तो अपने अभिकर्ताओं मतलब दलित हो, कुर्मावतारी हो, वैश्य समाज हो, भूमिहार समाज हो या कायस्थ समाज हो या ईसाइयत से कह दे की वे अब अपनी हार मान लें और यह सीत युद्ध बंद कर दें! और स्वीकार करलें की मै केवल एकल व्यक्तित्व नही हूँ जो मुझको खिलौना समझ कर खेल रहे हैं ये लोग वरन आप लोगों के ही हित पक्ष में वह ढाल हूँ जो हर वार को रोक रहा है जो मानवता के विरूद्ध है। न्यूनतम चन्द्र हो या पूर्ण चन्द्र हर चन्द्रमा को मै स्वयं सम्मान दिलाता हूँ वह क्या मुझे समझ पायेगा और मेरा वरिष्ठ बनेगा किशी भी जन्म में? यह श्रीराम और श्रीकृष्ण का गौरव है जो क्रमसः सूर्यवंश और चन्द्रवंश में जन्म लिए पर सूर्यवंश और चन्द्र वंश का परम गौरव है जो श्रीराम और श्रीकृष्ण उस वंश में जन्म लिए।

मौक़ा मिलने पर कोई अपनी कलाबाजी से बाज नहीं आ रहा चाहे दलित हो, कुर्मावतारी हो, वैश्य समाज हो, भूमिहार समाज हो या कायस्थ समाज हो या ईसाइयत पर आज से चौदह वर्ष पूर्व वह दिन का वह समय याद है जब की विवेक कुमार पाण्डेय केवल एक व्यक्तित्व मात्र था और इस प्रयागराज विश्वविद्यालय में कृपापात्र बनाते हुए दी गयी अनुसंधान सहायक (रिसर्च असिस्टेंट) के पद की भूमिका (यहां के लोगों की अपने लिए स्थायी विकल्प रखते हुए के साथ लय से लय मिलाती हुई भउकालिक परन्तु गैरजिम्मेदार भूमिका को किशी कार्य को मूर्तरूप देने के प्रति दृण प्रतिज्ञ न हो को देखते हुए) त्याग देने हेतु पेशकश अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, श्रीश्रीधर (विष्णु) और परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, डॉ प्रेमचंद(शिव) से कर दिया था और इस प्रकार एक विवेकशील प्राणी जो व्यक्तिगत हित में दूरगामी सोच रखता हो वह कार्य पूर्ण कर चुका था तो माँ सरस्वती पुत्र होने का दायित्व और सौभाग्य तभी मई प्राप्त कर चुका था। >>>>>>>>>पर गुरु भी कोई शक्ति होता है: इन दोनों का आदेश हुआ वहाँ तुम्हे गुरुदेव, सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी जी(ब्रह्मा) के कार्यपूर्ती हेतु रुकना है, तो विश्व जनमत मै रुका और यह प्रयागराज विश्विद्यालय में एक दर्जन केंद्र/विभाग में ही दीपक नहीं जले वरन इस विश्व के सम्पूर्ण मानव समाज को एक नया जीवन दान भी मिला एक सुरक्षा कवच बन इस प्रयागराज/भारतवर्ष में अपने को केंद्रित किये रहने के कारन। तो दुनिया में कौन है जो मेरी मेरिट देख सकता है उससे वह जलन होगी जिसे वह वर्दास्त नही कर सके और न वर्दास्त कर सकेंगे जिस हेतु मै स्वयं उनका साम्यवाद सहित सामाजिक न्यायवाद और अन्य-अन्य वाद और अस्त्र वार स्वीकार कर लेता हूँ जो मेरे सम्बन्ध में अनुत्तरण रहे लक्ष्य भेदन में और न मेरी मेरिट का अभी तक कोई विकल्प स्वयं तथाकथित विश्वमहाशक्ति=पातालपुरी=संयुक्तराज्य अमेरिका भी स्वयं प्रस्तुत कर सका जिसकी जी हुजूरी सम्पूर्ण दलित हो, कुर्मावतारी हो, वैश्य समाज हो, भूमिहार समाज हो या कायस्थ समाज हो या ईसाइयत  समाज के वे लोग करते हैं जो आज तक मेरा विरोध करते हैं हर प्रकार से सीत युद्ध के माध्यम से और वह सीट युद्ध क्या है और किस प्रकार हो रहा है वह मै उन सबके आंका, तथाकथित विश्वमहाशक्ति=पातालपुरी=संयुक्तराज्य अमेरिका को ही बताऊंगा अगर  स्पष्ट प्रश्न होता है और निवेदन होगा की अगर वास्तविक मानवता हित और इस प्रकार अपना तथा अपने अभिकर्ताओं का हित वह तथाकथित विश्वमहाशक्ति=पातालपुरी=संयुक्तराज्य अमेरिका  चाहता है तो अपने अभिकर्ताओं मतलब दलित हो, कुर्मावतारी हो, वैश्य समाज हो, भूमिहार समाज हो या कायस्थ समाज हो या ईसाइयत से कह दे की वे अब अपनी हार मान लें और यह सीत युद्ध बंद कर दें! और स्वीकार करलें की मै केवल एकल व्यक्तित्व नही हूँ जो मुझको खिलौना समझ कर खेल रहे हैं ये लोग वरन आप लोगों के ही हित पक्ष में वह ढाल हूँ जो हर वार को रोक रहा है जो मानवता के विरूद्ध है। न्यूनतम चन्द्र हो या पूर्ण चन्द्र हर चन्द्रमा को मै स्वयं सम्मान दिलाता हूँ वह क्या मुझे समझ पायेगा और मेरा वरिष्ठ बनेगा किशी भी जन्म में? यह श्रीराम और श्रीकृष्ण का गौरव है जो क्रमसः सूर्यवंश और चन्द्रवंश में जन्म लिए पर सूर्यवंश और चन्द्र वंश का परम गौरव है जो श्रीराम और श्रीकृष्ण उस वंश में जन्म लिए।>>>>>>>गुरुर ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुसाक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवेनमः। । अगर गुरु ही स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश हों तो किसको परमब्रह्म नहीं बना सकते? 

Sunday, November 22, 2015

Saraswati Stotram (सरस्वती स्तोत्रं) 1.या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रान्विता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ।।1।। आशासु राशीभवदंगवल्लीभासैव दासीकृतदुग्धसिन्धुम । मन्दस्मितैर्निन्दितशारदेन्दुं वन्देsरविन्दासनसुन्दरि त्वाम ।।2।। शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे । सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात ।।3।। सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम । देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना: ।।4।। पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्न: सरस्वती । प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ।।5।। शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम । हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम ।।6।। वीणाधरे विपुलमंगलदानशीले, भक्तार्तिनाशिनि विरिंचिहरीशवन्द्ये । कीर्तिप्रदेsखिलमनोरथदे महार्हे, विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम ।।7।। श्वेताब्जपूर्णविमलासनसंस्थिते हे, श्वेताम्बरावृतमनोहरमंजुगात्रे । उद्यन्मनोज्ञसितपंकजमंजुलास्ये, विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम ।।8।। मातस्त्वदीयपदपंकजभक्तियुक्ता, ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय । ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण, भूवह्निवायुगगनाम्बुविनिर्मितेन ।।9।। मोहान्धकारभरिते ह्रदये मदीये, मात: सदैव कुरु वासमुदारभावे । स्वीयाखिलावयवनिर्मलसुप्रभाभि:, शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम ।।10।। ब्रह्मा जगत सृजति पालयतीन्दिरेश:, शम्भुर्विनाशयति देवि तव प्रभावै: । न स्यात्कृपा यदि तव प्रकटप्रभावे, न स्यु: कथंचिदपि ते निजकार्यदक्षा: ।।11।। लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टि: प्रभा धृति: । एताभि: पाहि तनुभिरष्टाभिर्मां सरस्वति ।।12।। सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम: । वेदवेदान्तवेदांगविद्यास्थानेभ्य: एव च ।।13।। सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने । विद्यारुपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोsस्तु ते ।।14।। यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत । तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ।।15।।

Saraswati Stotram (सरस्वती स्तोत्रं)
1.या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रान्विता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ।।1।।
आशासु राशीभवदंगवल्लीभासैव दासीकृतदुग्धसिन्धुम ।
मन्दस्मितैर्निन्दितशारदेन्दुं वन्देsरविन्दासनसुन्दरि त्वाम ।।2।।
शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे ।
सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात ।।3।।
सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम ।
देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना: ।।4।।
पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्न: सरस्वती ।
प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ।।5।।
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम ।
हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम ।।6।।
वीणाधरे विपुलमंगलदानशीले, भक्तार्तिनाशिनि विरिंचिहरीशवन्द्ये ।
कीर्तिप्रदेsखिलमनोरथदे महार्हे, विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम ।।7।।
श्वेताब्जपूर्णविमलासनसंस्थिते हे, श्वेताम्बरावृतमनोहरमंजुगात्रे ।
उद्यन्मनोज्ञसितपंकजमंजुलास्ये, विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम ।।8।।
मातस्त्वदीयपदपंकजभक्तियुक्ता, ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय ।
ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण, भूवह्निवायुगगनाम्बुविनिर्मितेन ।।9।।
मोहान्धकारभरिते ह्रदये मदीये, मात: सदैव कुरु वासमुदारभावे ।
स्वीयाखिलावयवनिर्मलसुप्रभाभि:, शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम ।।10।।
ब्रह्मा जगत सृजति पालयतीन्दिरेश:, शम्भुर्विनाशयति देवि तव प्रभावै: ।
न स्यात्कृपा यदि तव प्रकटप्रभावे, न स्यु: कथंचिदपि ते निजकार्यदक्षा: ।।11।।
लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टि: प्रभा धृति: ।
एताभि: पाहि तनुभिरष्टाभिर्मां सरस्वति ।।12।।
सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम: ।
वेदवेदान्तवेदांगविद्यास्थानेभ्य: एव च ।।13।।
सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने ।
विद्यारुपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोsस्तु ते ।।14।।
यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ।।15।।

विष्णु मंत्र --------------- मंगलम्‌‌ भगवान विष्‍‍णुः, मंगलम्‌‌ गरुड़ध्‍वज:(गरुण ध्वज वाले विष्णु)| मंगलम्‌‌ पण्‍डरीकाक्षः((पुण्डरीक(कमलवत) +अक्ष(आँख)), ‍ मंगलाय त्नोहरि|।

-----------------------विष्णु मंत्र ---------------
मंगलम्‌‌ भगवान विष्‍‍णुः, मंगलम्‌‌ गरुड़ध्‍वज:(गरुण ध्वज वाले विष्णु)|
मंगलम्‌‌ पण्‍डरीकाक्षः((पुण्डरीक(कमलवत) +अक्ष(आँख)), ‍ मंगलाय त्नोहरि|।

Meaning

Auspicious is Lord Vishnu, auspicious is the bearer of the Garuda flag (Lord Vishnu), auspicious is the Lotus-Eyed (Lord Vishnu), all auspiciousness is Hari (Lord Vishnu).

Word by Word Translation

Mangalam = Auspicious
Bhagwan = Lord
Vishnu = Vishnu

Mangalam = Auspicious
Garuda = Lord Vishnu's Vahan (Vehicle) / the Mythical Eagle
Dhwaja = Flag

Mangalam = Auspicious
Pundareekaksham = Eyes like Lotus

Mangalaya = Auspicious
Tano = Form

Hari = Lord Vishnu

शिव मंत्र:
कर्पूरगौरं करुणावतारम् |
संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ||
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे |
भवं भवानि सहितं नमामि ||
I salute the merciful Bhava (i.e. Shiva), and his consort Sati, Adorned with the necklace of the serpent.
Word to Word Meaning:
Karpur Gauram: The one who is as pur/white as a campho(karpur)
Karuna avatar : The personification of compassion
Sansara Saram : The one who is the essence of the world
Bhujagendra haram: The one with the serpent king as his garland
Sada vasantam : Always residing
Hridaya arvinde: In the lotus of the heart
Bhavam Bhavani: Oh Lord and Goddess (Sati: wife of Shiva)
Sahitam Namami: I bow to you both
http://vandemataramvivekananddrvkprssbhupuau.blogspot.in/

ब्रह्मा मंत्र:>>>>>>ॐ ब्रह्मणे नम:।।
Saraswati Stotram (सरस्वती स्तोत्रं) 1.या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रान्विता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ।।1।। 
आशासु राशीभवदंगवल्लीभासैव दासीकृतदुग्धसिन्धुम । मन्दस्मितैर्निन्दितशारदेन्दुं वन्देsरविन्दासनसुन्दरि त्वाम ।।2।। 
शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे । सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात ।।3।।
 सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम । देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना: ।।4।। 
पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्न: सरस्वती । प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ।।5।। 
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम । हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम ।।6।। 
वीणाधरे विपुलमंगलदानशीले, भक्तार्तिनाशिनि विरिंचिहरीशवन्द्ये । कीर्तिप्रदेsखिलमनोरथदे महार्हे, विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम ।।7।। श्वेताब्जपूर्णविमलासनसंस्थिते हे, श्वेताम्बरावृतमनोहरमंजुगात्रे । उद्यन्मनोज्ञसितपंकजमंजुलास्ये, विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम ।।8।। मातस्त्वदीयपदपंकजभक्तियुक्ता, ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय । ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण, भूवह्निवायुगगनाम्बुविनिर्मितेन ।।9।। मोहान्धकारभरिते ह्रदये मदीये, मात: सदैव कुरु वासमुदारभावे । स्वीयाखिलावयवनिर्मलसुप्रभाभि:, शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम ।।10।। 
ब्रह्मा जगत सृजति पालयतीन्दिरेश:, शम्भुर्विनाशयति देवि तव प्रभावै: । न स्यात्कृपा यदि तव प्रकटप्रभावे, न स्यु: कथंचिदपि ते निजकार्यदक्षा: ।।11।। 
लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टि: प्रभा धृति: । एताभि: पाहि तनुभिरष्टाभिर्मां सरस्वति ।।12।।
 सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम: । वेदवेदान्तवेदांगविद्यास्थानेभ्य: एव च ।।13।।
 सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने । विद्यारुपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोsस्तु ते ।।14।।
 यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत । तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ।।15।।

जो स्वयं तथा अपने अभिकर्ताओं के माध्यम से दूसरों के घर में सेंधमारी/चोरी करता है इस हेतु अपने मीठे जहर और कुसंस्कृति को वैश्विक समाज में घोलता है परोक्ष रूप में और इस प्रकार प्रभावित होने वाले को अतिसय मजबूर कर प्रत्यक्ष रूप से डकैती करने के लिए उकसाता है या उत्प्रेरित करता है वास्तव में वही हिंशा और प्रतिहिंसा का वास्तविक जिम्मेदार होता है।

जो स्वयं तथा अपने अभिकर्ताओं के माध्यम से दूसरों के घर में सेंधमारी/चोरी करता है इस हेतु अपने मीठे जहर और कुसंस्कृति को वैश्विक समाज में घोलता है परोक्ष रूप में और इस प्रकार प्रभावित होने वाले को अतिसय मजबूर कर प्रत्यक्ष रूप से डकैती करने के लिए उकसाता है या उत्प्रेरित करता है वास्तव में वही हिंशा और प्रतिहिंसा का वास्तविक जिम्मेदार होता है। 

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् । सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि ॥ भावार्थ:- उन परमेश्वर स्वरूपी शिव संग भवानीको मेरा नमन है जिनका वर्ण कर्पूर समान गौर है, जो करुणाके प्रतिमूर्ति हैं, जो सारे जगतके सार हैं, जिन्होने गलेमें सर्पके हार धारण कर रखे हैं और जो हमारे हृदय रूपी कमलमें सदैव विद्यमान रहते हैं |

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् । सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि ॥ भावार्थ:- उन परमेश्वर स्वरूपी शिव संग भवानीको मेरा नमन है जिनका वर्ण कर्पूर समान गौर है, जो करुणाके प्रतिमूर्ति हैं, जो सारे जगतके सार हैं, जिन्होने गलेमें सर्पके हार धारण कर रखे हैं और जो हमारे हृदय रूपी कमलमें सदैव विद्यमान रहते हैं | 
Meaning: I salute to that Ishwar along with Bhavani (Shiva and Parvati),
who is as white as camphor, an incarnation of compassion,
the essence of this world, who wears a serpant around
his neck and is ever present in the lotus abode of our hearts.RS.
कर्पूरगौरं = White like Kapoor;
करुणावतारं = embodiment of mercy;
संसारसारं = the essence of worldly or familly-life;
भुजगेन्द्रहारं = one who is having the king of snake as the garland or necklace, Shiva;
सदा = always; ever;
वसन्तं = the one who is living or dwelling or the spring season;
हृदयारविन्दे = in the lotus like heart;
भवं = the chain or ocean of births and deaths or the one God who causes it;;
भवानीसहितं = one who has BhavAnI alongside;
नमामि = I bow; salute; pay my respects;

Saturday, November 21, 2015

अपने अंदर कमी से भी दूसरा मजबूत होता है तो केवल गाय और भैंस का माध्य लेकर समानता न लाई जाय वरन हकीकत को स्वीकार लिया जाय की वात्सल्यता, सुशीलता और तीक्ष्ण बुध्धिमात्र गाय का लक्षण है वह काली हो या गोरी हो और इस प्रकार संस्कार और संस्कृति जब हमारी अटल और अटूट होगी तो हमें कोई कमजोर नही कर सकता है। और इसके लिए हमें गाय और भैंस का माध्य लेने की जरूरत नहीं है। जरूरत है तो केवल गाय की शीलता का नाजायज लाभ लेने वालों को चिन्हित कर दंड देने की।>>>>> 2008 में अचानक मामा द्वारा निर्देश होने पर यसवंतपुर, बैंगलोर रेलवे स्टेशन के स्वामित्व प्राप्त अभिकर्ता के यहां से शीघ्रातिशीघ्र किशी भी स्थिति में प्रयागराज को वापसी का टिकट लेते समय: प्रश्न होता है कि की संघ से लगते हो? उत्तर था हाँ| किस संघ से हो? तो उत्तर था अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से। तो फिर संघ से होने न होने का प्रश्न वाचक चिन्ह कैसे लग जाता है? क्या संघ वाला अनुशासन की सीमा में रहते हुए सत्य नही बोल सकता? क्या वास्तविकता स्वीकारना मानवता हित धर्म रक्षा में नहीं आता। क्या अपने धर्म को मानने वालों की सत्य और निष्ठा में ह्रास पर दूसरे धर्मावलम्वियों को बल नहीं मिलता? हम लकीर मिटाने वालों में से नहीं वरन लकीर बड़ी खींचने वालों में से हैं क्योंकि हम अन्य धर्मावलम्वियों को भी सनातन हिन्दू धर्म की उपज मानते हैं जो किन्ही कारणों से अलग मत और मतान्तर बना कुछ दूसरी ही जीवन शैली अपना लिए थे। पर हाँ यदि जलवायवीय समानता है तो देवालय अलग होकर भी बहुत कुछ एक होता है दैनिक जीवन में और अगर जलवायु अलग-अलग है तो देवालय एक होकर भी दैनिक जीवन में बहुत सारी मूलभूत विभेदता स्वयं परिलक्षित होंगी प्राकृतिक रूप से । अतः अपने अंदर कमी से भी दूसरा मजबूत होता है तो केवल गाय और भैंस का माध्य लेकर समानता न लाई जाय वरन हकीकत को स्वीकार लिया जाय की वात्सल्यता, सुशीलता और तीक्ष्ण बुध्धिमात्र गाय का लक्षण है वह काली हो या गोरी हो और इस प्रकार संस्कार और संस्कृति जब हमारी अटल और अटूट होगी तो हमें कोई कमजोर नही कर सकता है। और इसके लिए हमें गाय और भैंस का माध्य लेने की जरूरत नहीं है। जरूरत है तो केवल गाय की शीलता का नाजायज लाभ लेने वालों को चिन्हित कर दंड देने की।

अपने अंदर कमी से भी दूसरा मजबूत होता है तो केवल गाय और भैंस का माध्य लेकर समानता न लाई जाय वरन हकीकत को स्वीकार लिया जाय की वात्सल्यता, सुशीलता और तीक्ष्ण बुध्धिमात्र गाय का लक्षण है वह काली हो या गोरी हो और इस प्रकार संस्कार और संस्कृति जब हमारी अटल और अटूट होगी तो हमें कोई कमजोर नही कर सकता है। और इसके लिए हमें गाय और भैंस का माध्य  लेने की जरूरत नहीं है।  जरूरत है तो केवल गाय की शीलता का नाजायज लाभ लेने वालों को चिन्हित कर दंड देने की।>>>>> 2008 में अचानक मामा द्वारा निर्देश होने पर यसवंतपुर, बैंगलोर रेलवे स्टेशन के स्वामित्व प्राप्त अभिकर्ता के यहां से शीघ्रातिशीघ्र किशी भी स्थिति में प्रयागराज को वापसी का टिकट लेते समय: प्रश्न होता है कि की संघ से लगते हो? उत्तर था हाँ|  किस संघ से हो? तो उत्तर था अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से। तो फिर संघ से होने न होने का प्रश्न वाचक चिन्ह कैसे लग जाता है? क्या संघ वाला अनुशासन की सीमा में रहते हुए सत्य नही बोल सकता? क्या वास्तविकता स्वीकारना मानवता हित धर्म रक्षा में नहीं आता। क्या अपने धर्म को मानने वालों की सत्य और निष्ठा में ह्रास पर दूसरे धर्मावलम्वियों को बल नहीं मिलता? हम लकीर मिटाने वालों में से नहीं वरन लकीर बड़ी खींचने वालों में से हैं क्योंकि हम अन्य धर्मावलम्वियों को भी सनातन हिन्दू धर्म की उपज मानते हैं जो किन्ही कारणों से अलग मत और मतान्तर बना कुछ दूसरी ही जीवन शैली अपना लिए थे।  पर हाँ यदि जलवायवीय समानता है तो देवालय अलग होकर भी बहुत कुछ एक होता है दैनिक  जीवन में और अगर जलवायु  अलग-अलग है तो देवालय एक होकर भी दैनिक  जीवन में बहुत सारी मूलभूत विभेदता स्वयं परिलक्षित होंगी प्राकृतिक रूप से ।  अतः अपने अंदर कमी से भी दूसरा मजबूत होता है तो केवल गाय और भैंस का माध्य लेकर समानता न लाई जाय वरन हकीकत को स्वीकार लिया जाय की वात्सल्यता, सुशीलता और तीक्ष्ण बुध्धिमात्र गाय का लक्षण है वह काली हो या गोरी हो और इस प्रकार संस्कार और संस्कृति जब हमारी अटल और अटूट होगी तो हमें कोई कमजोर नही कर सकता है। और इसके लिए हमें गाय और भैंस का माध्य  लेने की जरूरत नहीं है।  जरूरत है तो केवल गाय की शीलता का नाजायज लाभ लेने वालों को चिन्हित कर दंड देने की।

Friday, November 20, 2015

अगर कपिल ऋषी इस दुनिआ के दादा(बड़े भाई) हैं तो गौरीशंकर=गिरिजाशंकर=केदारेश्वर=आदिशंकर इस दुनिआ के बाबा(बाप के भी बाप) है और ये बाबा उत्तर प्रदेश(काशी-प्रयाग-अयोध्या-मथुरा सांस्कृतिक क्षेत्र) में ही रहते है इसे छोड़कर बाहर नहीं जाते हैं।

अगर कपिल ऋषी इस दुनिआ के दादा(बड़े भाई) हैं तो गौरीशंकर=गिरिजाशंकर=केदारेश्वर=आदिशंकर इस दुनिआ के बाबा(बाप के भी बाप) है और ये बाबा उत्तर प्रदेश(काशी-प्रयाग-अयोध्या-मथुरा सांस्कृतिक क्षेत्र) में ही रहते है इसे छोड़कर बाहर नहीं जाते हैं।  

आद्या=आदितन स्त्री में माँ सरस्वती हुई जिनकी महिमा बेद भी नहीं बखान सकते और प्रकार सरस्वती सबसे बड़ी हुई स्त्री में लक्ष्मी और पार्वती से और उनके संयोगी ब्रह्मा सबसे छोटे, केदारेश्वर=आदिशंकर=महेश सबसे बड़े और उनकी सहयोगिनी पार्वती सबसे छोटी, और विष्णु मझले (मध्यक) और उनकी संयोगिनी लक्ष्मी मध्यक तो सब बराबर हुए पारिवारिक संयोग की अवस्था में। अलग से देखने पर सरस्वती आद्या/सबसे बड़ी स्त्री में और केदारेश्वर आद्या सबसे बड़े पुरुष में।

आद्या=आदितन स्त्री में माँ सरस्वती हुई जिनकी महिमा बेद  भी नहीं बखान सकते और प्रकार सरस्वती सबसे बड़ी हुई स्त्री में लक्ष्मी और पार्वती से और उनके संयोगी ब्रह्मा सबसे छोटे, केदारेश्वर=आदिशंकर=महेश सबसे बड़े और उनकी सहयोगिनी पार्वती सबसे छोटी, और विष्णु मझले (मध्यक) और उनकी संयोगिनी लक्ष्मी मध्यक तो सब बराबर हुए पारिवारिक संयोग की अवस्था में। अलग से देखने पर सरस्वती आद्या/सबसे बड़ी स्त्री में और केदारेश्वर आद्या सबसे बड़े पुरुष में।  

इस दुनिया में आद्या पुरुष में केदारेश्वर=आदिशंकर((+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर(विश्वनाथ)) में विश्व्नाथ नहीं केदारेश्वर=आदिशंकर है तो फिर श्रीराम के ईस्वर केदारेश्वर=आदिशंकर और आदिशंकर के ईस्वर श्रीराम होंगे की नहीं और इसे प्रयागराज विश्विद्यलय, प्रयागराज के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवम महासागर अध्ययन केंद्र से जुड़े लोगों ने अनुभव किया की नहीं? मानव इतिहास का प्रथम स्थल काशी है जहाँ महादेव शिवशंकर=केदारेश्वर=आदिशंकर कीचडयुक्त रूप में इस ब्रह्माण्ड के प्रथम मानव के रूप में विश्व की प्रथम नगरी और प्रथम भूखंड में जन्म लिए थे और अमरनाथ और कैलाश उनके बाद के ठिकाने हैं और कभी ब्रह्मा, विष्णु और शिव के नाम के आगे उत्तम और माध्यम या निकृष्ट लगाने की बेवकूफी करने की जरूरत ही नहीं पड़ती दैहिक रूप में ये तीनों अपने अपने में श्रेष्ठ है। मुझे लगता है की कहानी यही ख़त्म होती है केदारेश्वर=आदिशंकर= महादेव शिव की श्रीराम को परिक्षा लेने की और श्रीराम को केदारेश्वर=आदिशंकर= महादेव शिव की परिक्षा लेने की क्योंकि दोनों एक हो गए श्रीकृष्ण से आगे श्रीराम होते हुए।

इस दुनिया में आद्या पुरुष में केदारेश्वर=आदिशंकर((+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर(विश्वनाथ)) में विश्व्नाथ नहीं केदारेश्वर=आदिशंकर है तो फिर श्रीराम के ईस्वर केदारेश्वर=आदिशंकर और आदिशंकर के ईस्वर श्रीराम होंगे की नहीं और इसे प्रयागराज विश्विद्यलय, प्रयागराज के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवम महासागर अध्ययन केंद्र से जुड़े लोगों ने अनुभव किया की नहीं? मानव इतिहास का प्रथम स्थल काशी है जहाँ महादेव शिवशंकर=केदारेश्वर=आदिशंकर कीचडयुक्त रूप में इस ब्रह्माण्ड के प्रथम मानव के रूप में विश्व की प्रथम नगरी और प्रथम भूखंड में जन्म लिए थे और अमरनाथ और कैलाश उनके बाद के ठिकाने हैं और कभी ब्रह्मा, विष्णु और शिव के नाम के आगे उत्तम और माध्यम या निकृष्ट लगाने की बेवकूफी करने की जरूरत ही नहीं पड़ती दैहिक रूप में ये तीनों अपने अपने में श्रेष्ठ है। मुझे लगता है की कहानी यही ख़त्म होती है केदारेश्वर=आदिशंकर= महादेव शिव की श्रीराम को परिक्षा लेने की और श्रीराम को केदारेश्वर=आदिशंकर= महादेव शिव की परिक्षा लेने की क्योंकि दोनों एक हो गए श्रीकृष्ण से आगे श्रीराम होते हुए।

Thursday, November 19, 2015

लक्ष्मणपुर के बड़े भाई साहब को ऑरकुट पर भारतीय विज्ञानं संस्थान में ही 2008 में मैंने अकेले पोरजेक्ट किया था और बड़े भैया जो गौतम बुद्ध(सिद्धार्थ) पुत्र हैं उनको भी प्रोजेक्ट किया हूँ पर कुछ समय तक अपने को रवाँ करे और सम्मिलन भारतीय और विश्व जनमानस सञ्चालन की आवश्यक आवश्यकता है अतः साम्यवाद, समाजवाद और धर्म-दर्शन वाद की ही तर्ज पर यह ख़त्म होने वाला नहीं और सामाजिक संचाल में इसकी भी अपूरणीय भूमिका हमेशा ही रही और रहेगी मानवता के अंतिम दिन तक जो किशी के चाहने से खत्म नहीं होगी।

लक्ष्मणपुर के बड़े भाई साहब को ऑरकुट पर भारतीय विज्ञानं संस्थान में ही 2008 में मैंने अकेले पोरजेक्ट किया था और बड़े भैया जो गौतम बुद्ध(सिद्धार्थ) पुत्र हैं उनको भी प्रोजेक्ट किया हूँ पर कुछ समय तक अपने को रवाँ करे और सम्मिलन भारतीय और विश्व जनमानस सञ्चालन की आवश्यक आवश्यकता है अतः साम्यवाद, समाजवाद और धर्म-दर्शन वाद की ही तर्ज पर यह ख़त्म होने वाला नहीं और सामाजिक संचाल में इसकी भी अपूरणीय भूमिका हमेशा ही रही और रहेगी मानवता के अंतिम दिन तक जो किशी के चाहने से खत्म नहीं होगी।  

मैंने न्यायालय को उसका कार्य सौपा है और इस प्रकार के कार्य से प्रयागराज विश्विद्यालय की कोई अवमानना न समझा जाय। कारन यह था की कुछ कश्यप पुत्र ऐसे थे जो कश्यप ऋषी को ही धमकी दिलवाने लगे थे और उनके ही वरिष्ठ बनने लगे थे तो पारिवारिक समस्या का शान्ति पूर्ण समाधान करने का कार्य न्यायालय को सौपा गया है गुरुजन और गुरुकुल समेत किशी आदर्श की कोई अवमानना नहीं किया गया और उसमे भी न्याय दर्शन के प्रणेता गौतम ऋषी के सनातन सप्तर्षि ब्राह्मण की देख-रेख में सब चल रहा जिससे की सनातन सप्तर्षि गोत्रों में कश्यप के बाद दूसरे नंबर पर आने वाले गौतम भी अपने ही प्रति सजग रह सके। मुझे अपनी अधिकार माँगने की जरूरत कभी नहीं रही जहां भी गया मेरा अधिकार वहां वहां मिला और मेरे सब अधिकार नीतिगत रूप में हर दर्शन के माध्यम से से मेरे साथ रहे हैं और दुनिया में मेरा अधिकार सर्वदा सुरक्षित है क्योंकि मैं दूसरे के अधिकार को छीनता नहीं। मेर वंसज मेरे उत्तरधिकारी बने विनम्रता से न की वाह्य शक्ति के बल पर बिना मेरी सहमति के उत्तराधिकारी बन मेरा अपमान करें इस हेतु केवल न्यायालय को उसका कार्य सौंपा गया है।

मैंने न्यायालय को उसका कार्य सौपा है और इस प्रकार के कार्य से प्रयागराज विश्विद्यालय की कोई अवमानना न समझा जाय। कारन यह था की कुछ कश्यप पुत्र ऐसे थे जो कश्यप ऋषी को ही धमकी दिलवाने लगे थे और उनके ही वरिष्ठ बनने लगे थे तो पारिवारिक समस्या का शान्ति पूर्ण समाधान करने का कार्य न्यायालय को सौपा गया है गुरुजन और गुरुकुल समेत किशी आदर्श की कोई अवमानना नहीं किया गया और उसमे भी न्याय दर्शन के प्रणेता गौतम ऋषी के सनातन सप्तर्षि ब्राह्मण की देख-रेख में सब चल रहा जिससे की सनातन सप्तर्षि गोत्रों में कश्यप के बाद दूसरे नंबर पर आने वाले गौतम भी अपने ही प्रति सजग रह सके। मुझे अपनी अधिकार माँगने की जरूरत कभी नहीं रही जहां भी गया मेरा अधिकार वहां वहां मिला और मेरे सब अधिकार नीतिगत रूप में हर दर्शन के माध्यम से से मेरे साथ रहे हैं और दुनिया में मेरा अधिकार सर्वदा सुरक्षित है क्योंकि मैं दूसरे के अधिकार को छीनता नहीं। मेर वंसज मेरे उत्तरधिकारी बने विनम्रता से न की वाह्य शक्ति के बल पर बिना मेरी सहमति के उत्तराधिकारी बन मेरा अपमान करें इस हेतु केवल न्यायालय को उसका कार्य सौंपा गया है। 

मैंने तथाकथित रूप से प्रेम विवाह कर अपने को नारीवादी कहलाने वालों या नारीवादी का चोला ओढने वालों का कभी समर्थन करना नहीं सीखा और न स्वार्थवश उनका समर्थन किया हूँ जो जीवन में युवावस्था के दौरान सैम-सामयिक रंगरेलिया और अय्यासी करने के लिए मित्र बन विवाह रचाते है और जीवन की सच्चाई सामने आने और पारिवारिक जिम्म्देदारी सामने आ जाने और परिस्थिति तथा उम्र में ढलान आने पर साथ निभाने के स्थान पर विवाह विच्छेदन की धमकी देते हैं या जीवन नरक बना देते हैं या वास्तव में विवाह विच्छेदन कर लेते हैं। इस्वर और स्वयं माँ देवकाली नारी जाती को ऐसे नारीवादी पुरुषों और स्वयं ऐसी नारीवादिता का समर्थन करने वाली नारियों से बचाएं।

मैंने तथाकथित रूप से प्रेम विवाह कर अपने को नारीवादी कहलाने वालों या नारीवादी का चोला ओढने वालों का कभी समर्थन करना नहीं सीखा और न स्वार्थवश उनका समर्थन किया हूँ जो जीवन में युवावस्था के दौरान सैम-सामयिक रंगरेलिया और अय्यासी करने के लिए मित्र बन विवाह रचाते है और जीवन की सच्चाई सामने आने और पारिवारिक जिम्म्देदारी सामने आ जाने और परिस्थिति तथा उम्र में ढलान आने पर साथ निभाने के स्थान पर विवाह विच्छेदन की धमकी देते हैं या जीवन नरक बना देते हैं या वास्तव में विवाह विच्छेदन कर लेते हैं। इस्वर और स्वयं माँ देवकाली नारी जाती को ऐसे नारीवादी पुरुषों और स्वयं ऐसी नारीवादिता का समर्थन करने वाली नारियों से बचाएं।

>>>हाँ दीप नारायण एक सार्थक शब्द है जिसका अर्थ है भगवान भास्कर=आदित्य=सूर्यदेव इसमें कोई भ्रम किशी को नहीं होना चाहिए।>>>>मेरे बचपन से घरेलु गुरु भानुप्रताप मामा का एक कथन याद आता है और सत्य भी है की "अगर नाम अच्छा और अच्छा अर्थ देने वाला है और उसका अर्थ आप समझते भी हैं तो उसे खाली समय में बार भार लिखने और देखने से ऊर्जा मिलाती है और भी है और वे ऐसा करते भी थे और बहुत सुन्दर लिखावट में कई बार अपना नाम लिखते थे"। >>>हाँ दीप नारायण एक सार्थक शब्द है जिसका अर्थ है भगवान भास्कर=आदित्य=सूर्यदेव इसमें कोई भ्रम किशी को नहीं होना चाहिए।

>>>हाँ दीप नारायण एक सार्थक शब्द है जिसका अर्थ है भगवान भास्कर=आदित्य=सूर्यदेव इसमें कोई  भ्रम किशी को नहीं होना चाहिए।>>>>मेरे बचपन से घरेलु गुरु भानुप्रताप मामा का एक कथन याद आता है और सत्य भी है की "अगर नाम अच्छा और अच्छा अर्थ देने वाला है और उसका अर्थ आप समझते भी हैं तो उसे खाली समय में बार भार लिखने और देखने से ऊर्जा मिलाती है और  भी है और वे ऐसा करते भी थे और बहुत सुन्दर लिखावट में कई बार अपना नाम लिखते थे"। >>>हाँ दीप नारायण एक सार्थक शब्द है जिसका अर्थ है भगवान भास्कर=आदित्य=सूर्यदेव इसमें कोई  भ्रम किशी को नहीं होना चाहिए। 

रंग-भेद पर ब्रह्मास्त्र:>>>> मेरे कुल की/सम्पूर्ण गाँव की कुल देवी ही इसका निदान कर देंगी: मेरी कुल देवी हैं देवकाली (महासरस्वती+महागौरी+महालक्ष्मी) जो रघुवंशी/इक्शाकुवंशीय/सूर्यवंशी/कश्यप गोत्रीय मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के कुल की भी देवी(देवकाली) हैं, तो कौन सा उच्चतम आचरण इस देवी में शामिल नहीं है जिसको देवकाली हम कहते है। तो आचरण, संस्कृति/संस्कार उच्च हो इसका ध्यान हम जरूर देते हैं वह गौरी हों या काली, कपिल ऋषि हों या गौरी शंकर लेकिन यह अल्प कालिक बनावटी आचरण नहीं होना चाहिए वरन गंभीरता पूर्वक धारण किया गया उच्च आचरण हो न की जब प्रदर्शन हो तब सब कुछ ठीक और उसके बाद निकृष्टतम आचरण का प्रदर्शन।

रंग-भेद पर ब्रह्मास्त्र:>>>> मेरे कुल की/सम्पूर्ण गाँव की कुल देवी ही इसका निदान कर देंगी: मेरी कुल देवी हैं देवकाली (महासरस्वती+महागौरी+महालक्ष्मी) जो रघुवंशी/इक्शाकुवंशीय/सूर्यवंशी/कश्यप गोत्रीय मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के कुल की भी देवी(देवकाली) हैं, तो कौन सा उच्चतम आचरण इस देवी में शामिल नहीं है जिसको देवकाली हम कहते है। तो आचरण, संस्कृति/संस्कार उच्च हो इसका ध्यान हम जरूर देते हैं वह गौरी हों या काली, कपिल ऋषि हों या गौरी शंकर लेकिन यह अल्प कालिक बनावटी आचरण नहीं होना चाहिए वरन गंभीरता पूर्वक धारण किया गया उच्च आचरण हो न की जब प्रदर्शन हो तब सब कुछ ठीक और उसके बाद निकृष्टतम आचरण का प्रदर्शन।
https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur 

अगर मेरे साथ कोई काले-गोरे का भाव अभी तक कोई रख रहा तो मेरे माध्यमिक कक्षा के सबसे प्रियतम गुरु श्रद्धेय श्री अमरजीत वर्मा(जिसकी माँ वर/श्रेष्ठ हों या जो माँ को उच्च समझता हो या जिसकी माता कुलीन हों) जो स्वयं कुर्मावतारी भी है जाती से और स्वरुप में कृष्णकाय भी हैं का नाम लूंगा जो गणित के छात्र की विषय सम्बन्धी जानकारी के अलावा चारित्रिक गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देते थे मेरे वरिष्ठ और कनिष्ठ सब भाइयों में चाहे कक्षा हो या कक्षा से बाहर छात्र को विद्यालय के प्रांगण में किशी गलत आदत विशेष की अवस्था में देखते रहे हों। उन्होंने शिक्षकों के सामने टिप्पणी करने में जाती/धर्म नहीं देखा था किशी छात्र का जिसमे हमारे घर के बचपन के गुरु और मेरे मामा, श्री भानु प्रताप पर भी टिप्पणी की थी स्वयं मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि मिश्रा ब्राह्मण, परम गुरु परमपिता परमेश्वर मामा, श्री श्रीधर(विष्णु) से जो सटीक था और भी कई चर्चाये है मेरे अग्रज और अनुज भाई बहनों की जो धनवंतरी और विश्वकर्मा के वंसज बने हैं या अन्य क्षेत्र में गए हैं। मैंने न किशी गोरे या न किशी काले और न वाह्य रूप से किशी कुरूप और सुन्दर का इस लिए समर्थन या विरोध किया है की मुझ पर कोई आरोप लग जाएगा भेद-भाव का वरन मई उसकी गुणवत्ता और योग्यता के साथ उसकी चारित्रिक/नैतिक, संस्कारित/सांस्कृतिक योग्यता का भी ध्यान देते हुए उससे बिना बताये उससे दूर या नजदीक आया हूँ। मेरे ऊपर कोई आरोप लग जाएगा इस डर से किशी जाती/धर्म, गोरा-काला, वाह्य रूप से कुरूप-सुन्दर के आधार पर कोई भेद नहीं किया पर सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण होने के नाते सामाजिक रूप से ब्राह्मणों का समर्थन करता हूँ उनके ब्राह्मण बने रहने को प्रोत्साहित करने के लिए वैश्विक आबादी में जिनकी संख्या नगण्य होती जा रही है क्योंकि हिन्दू संस्कृति के अलावा किशी अन्य संस्कृति में ब्राह्मण का जिक्र तक नहीं है जबकि क्षत्रिय और वैश्य तथा अन्य के स्वरुप को दूसरे रूप में परिभाषित किया गया है पर रावण(अहिरावण) और कुम्भकर्ण, कालनेमि जैसे ब्राह्मणों का नहीं और केवल अल्प कालिक रूप से कोई आरोप लगा दे इसकी चिंता भी नहीं करता।

अगर मेरे साथ कोई काले-गोरे का भाव अभी तक कोई रख रहा तो मेरे माध्यमिक कक्षा के सबसे प्रियतम गुरु श्रद्धेय श्री अमरजीत वर्मा(जिसकी माँ वर/श्रेष्ठ हों या जो माँ को उच्च समझता हो या जिसकी माता कुलीन हों) जो स्वयं कुर्मावतारी भी है जाती से और स्वरुप में कृष्णकाय भी हैं का नाम लूंगा जो गणित के छात्र की विषय सम्बन्धी जानकारी के अलावा चारित्रिक गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देते थे मेरे वरिष्ठ और कनिष्ठ सब भाइयों में चाहे कक्षा हो या कक्षा से बाहर छात्र को विद्यालय के प्रांगण में किशी गलत आदत विशेष की अवस्था में देखते रहे हों। उन्होंने शिक्षकों के सामने टिप्पणी करने में जाती/धर्म नहीं देखा था किशी छात्र का जिसमे हमारे घर के बचपन के गुरु और मेरे मामा, श्री भानु प्रताप पर भी टिप्पणी की थी स्वयं मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्यषि मिश्रा ब्राह्मण, परम गुरु परमपिता परमेश्वर मामा, श्री श्रीधर(विष्णु) से जो सटीक था और भी कई चर्चाये है मेरे अग्रज और अनुज भाई बहनों की जो धनवंतरी और विश्वकर्मा के वंसज बने हैं या अन्य क्षेत्र में गए हैं। मैंने न किशी गोरे या न किशी काले और न वाह्य रूप से किशी कुरूप और सुन्दर का इस लिए समर्थन या विरोध किया है की मुझ पर कोई आरोप लग जाएगा भेद-भाव का वरन मई उसकी गुणवत्ता और योग्यता के साथ उसकी चारित्रिक/नैतिक, संस्कारित/सांस्कृतिक योग्यता का भी ध्यान देते हुए उससे बिना बताये उससे दूर या नजदीक आया हूँ। मेरे ऊपर कोई आरोप लग जाएगा इस डर से किशी जाती/धर्म, गोरा-काला, वाह्य रूप से कुरूप-सुन्दर के आधार पर कोई भेद नहीं किया पर सनातन कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण होने के नाते सामाजिक रूप से ब्राह्मणों का समर्थन करता हूँ उनके ब्राह्मण बने रहने को प्रोत्साहित करने के लिए वैश्विक आबादी में जिनकी संख्या नगण्य होती जा रही है क्योंकि हिन्दू संस्कृति के अलावा किशी अन्य संस्कृति में ब्राह्मण का जिक्र तक नहीं है जबकि क्षत्रिय और वैश्य तथा अन्य के स्वरुप को दूसरे रूप में परिभाषित किया गया है पर रावण(अहिरावण) और कुम्भकर्ण, कालनेमि जैसे ब्राह्मणों का नहीं और केवल अल्प कालिक रूप से कोई आरोप लगा दे इसकी चिंता भी नहीं करता।   

सम्पूर्ण मानव समाज या मानव समाज के किशी भाग/विभाग विशेष कुछ जातीय/धार्मिक समूह के समाज के सांस्कृति और सांस्कारिक परिष्कार के बाद ही वैवाहिक/पारिवारिक सम्बन्ध सफलतम रूप में संभव है।किशी सुसंस्कृत समाज और संस्कारित परिवार के/की एक व्यक्ति/स्त्री विवाह पूर्व तक अपना कौमार्य नहीं भंग होने दिया और दूसरे निम्न पारिवारिक संस्कार का/की दूसरा/दूसरी व्यक्ति/स्त्री बचपन से लेकर जीवन के उस क्षण तक केवल एकल ज्ञान ही रखा और उसके साथ हजारों गन्दगिया स्वयं को और इस समाज को देने वाले व्यभिचारी प्रवृति और अनियंत्रित आहार-व्यवहार-विचार-विहार का आदी रहा हो और इस प्रकार तरह-तरह की अइयासिया करता रहा हो तो क्या इन दोनों परिवार की संस्कृति और संस्कार का माध्य निकालते हुए इनका सामाजिक रूप से पारिवारिक विवाह सम्बन्ध स्थापित करवा देना क्या सामजिक समरसता और सामाजिक न्याय है? मेरे विचारानुसार वह तथाकथित सामाजिक न्याय और समरसता है और मै से तथाकथित सामाजिक न्याय और समरसता का जीवन अंतिम दिन तक विरोध करूंगा इसके लिए कुछ भी त्याग करना पड़े तो निःसंकोच तैयार हूँ। ऐसे तो तन-मन-धन-जीवन समर्पित है मानवता के नाम पर लेकिन सांस्कृतिक और सांस्कारिक संरक्षण के प्रति अडिग और अटल हूँ मै। जो बचपन से लेकर जीवन के उस क्षण तक केवल एकल ज्ञान ही रखा और उसके साथ हजारों गन्दगिया स्वयं को और इस समाज को देने वाले व्यभिचारी प्रवृति और अनियंत्रित आहार-व्यवहार-विचार-विहार का आदी रहा हो और इस प्रकार तरह-तरह की अइयासिया करता रहा हो उसे उसके किये की हम क्यों भुक्ते रोज मर्रा की जिंदगी में ? जब सामजिक रूप से जरूरत पड़ेगी तो पुनः तन-मन-धन-जीवन समर्पित होगा जैसे 14 वर्ष पूर्व समर्पित रहा। अतः सम्पूर्ण मानव समाज या मानव समाज के किशी भाग/विभाग विशेष कुछ जातीय/धार्मिक समूह के समाज के सांस्कृति और सांस्कारिक परिष्कार के बाद ही वैवाहिक/पारिवारिक सम्बन्ध सफलतम रूप में संभव है।

सम्पूर्ण मानव समाज या मानव समाज के किशी भाग/विभाग विशेष कुछ जातीय/धार्मिक समूह के समाज के सांस्कृति और सांस्कारिक परिष्कार के बाद ही वैवाहिक/पारिवारिक सम्बन्ध सफलतम रूप में संभव है।किशी सुसंस्कृत समाज और संस्कारित परिवार के/की एक व्यक्ति/स्त्री विवाह पूर्व तक अपना कौमार्य नहीं भंग होने दिया और दूसरे निम्न पारिवारिक संस्कार का/की दूसरा/दूसरी व्यक्ति/स्त्री बचपन से लेकर जीवन के उस क्षण तक केवल एकल ज्ञान ही रखा और उसके साथ हजारों गन्दगिया स्वयं को और इस समाज को देने वाले व्यभिचारी प्रवृति और अनियंत्रित आहार-व्यवहार-विचार-विहार का आदी रहा हो और इस प्रकार तरह-तरह की अइयासिया करता रहा हो तो क्या इन दोनों परिवार की संस्कृति और संस्कार का माध्य निकालते हुए इनका सामाजिक रूप से पारिवारिक विवाह सम्बन्ध स्थापित करवा देना क्या सामजिक समरसता और सामाजिक न्याय है? मेरे विचारानुसार वह तथाकथित सामाजिक न्याय और समरसता है और मै से तथाकथित सामाजिक न्याय और समरसता का जीवन अंतिम दिन तक विरोध करूंगा इसके लिए कुछ भी त्याग करना पड़े तो निःसंकोच तैयार हूँ। ऐसे तो तन-मन-धन-जीवन समर्पित है मानवता के नाम पर लेकिन सांस्कृतिक और सांस्कारिक संरक्षण के प्रति अडिग और अटल हूँ मै। जो बचपन से लेकर जीवन के उस क्षण तक केवल एकल ज्ञान ही रखा और उसके साथ हजारों गन्दगिया स्वयं को और इस समाज को देने वाले व्यभिचारी प्रवृति और अनियंत्रित आहार-व्यवहार-विचार-विहार का आदी रहा हो और इस प्रकार तरह-तरह की अइयासिया करता रहा हो उसे उसके किये की हम क्यों भुक्ते रोज मर्रा की जिंदगी में ? जब सामजिक रूप से जरूरत पड़ेगी तो पुनः तन-मन-धन-जीवन समर्पित होगा जैसे 14 वर्ष पूर्व समर्पित रहा। अतः सम्पूर्ण मानव समाज या मानव समाज के किशी भाग/विभाग विशेष कुछ जातीय/धार्मिक समूह के समाज के सांस्कृति और सांस्कारिक परिष्कार के बाद ही वैवाहिक/पारिवारिक सम्बन्ध सफलतम रूप में संभव है।

Wednesday, November 18, 2015

दामोदर =योगयोगेश्वर श्रीकृष्ण: 4 वर्ष 100 की संख्या में अकेला ब्राह्मण छात्र जो सम्मान सहित अपनी कशा में श्रेष्ठतम स्थान पाते हुए जीवन जिया था और सब जाती (दलित/पिछड़ा//50/50) और धर्म(कुछ मुस्लिम अल्पसंख्यक) को पहचानता था। मुझसे कौन की लड़ाई स्वयं कैलाश नारायण उत्तम जीत पाएंगे? ((जिस नाम का कोई एक सामान्य अर्थ भी नहीं निकलता और लड़ना हो तो स्वयं ब्रह्मा (जोशी जी) सामने आकर लड़ें हमें बताएं की हम सामाजिक समरसता को नहीं बढ़ा रहे हैं तो क्या कैलाश नारायण उत्तम और उनके समर्थक बढ़ा रहे हैं जो भ्रमित कर दिए हैं दलित ईसाईयों के द्वारा मेरे विरोध में उस पुत्र मोह में जो उनका अपना है ही नहीं। और जब विवाह ही नहीं करने के बदले सम्मान मिला था तो पुत्र की आशा कैसे? जो इस संसार में जो अच्छा किया है या बुरा किया है उसके बदले सम्मान, अपमान और प्रायश्चित करना ही पड़ता है इसमें कस्ट किस बात का? इतनी समरसता और सामजिक कल्याण का भाव है तो किशी को भी अपना पुत्र मान लें या सभी आम नागरिक जो तुल्य उम्र के लगते हैं उनको ही अपना पुत्र मान लें)। दुनिया को बता देना चाहता हूँ की ब्रह्मा (जोशी जी) के लिए कार्य किया था और करूंगा भी लेकिन अगर उनके पास जय-विजय/रावण(अहिरावण)-कुम्भकर्ण जैसे भक्त और उनके समर्थक मेरा विरोध करते रहेंगे तो उसका परिणाम अभिष्ठतम् भयंकर होगा क्योंकि मई स्वयं ब्रह्मा (जोशी जी) ही नहीं हूँ और न ब्रह्मा होने से ही मेरा वर्तमान अस्तित्व संभव हो पाता। अतः जोशी जी के नाशक भक्त जोशी जी को समाप्त कर सकते हैं पर मुझे नहीं। मुझे जोशी जी का जो कार्य करना था कर चुका हूँ मेरे ऊपर उनका कोई एहसान नहीं है और सब कुछ ठीक रहा और उनके दास लोग अपनी सीमा और अवकात समझ गए तो उनका कार्य और सहयोग आगे भी जारी रहेगा उनका मानवहित हेतु दिया गया कार्य)) >>>>>>>>> भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक में नवआगंतुक लोग उनके बदले जो कुछ लड़ाई लड़ना चाह रहे है: आप लोग सुन लीजिये जिसका बेटा देवेन्द्र स्वयं आई टी के सर्वोच्च शहर से 2008 में स्वयं 2014 के लिए प्रायोजित हो चुका था और बाप स्वयं उस सर्वोच्च स्थान पर रहा हो और सहमत भी रहा हो और तहलका मचाया हो वहां की सर्वोच्च संस्थान में सभ्यता, संस्कृति, ससंस्कार, धर्म और दर्शन तथा राजनैतिक और सामाजिक ज्ञान समेत अन्य ज्ञान दर्शन में तो उससे कौन सी लड़ाई आप जीतने चले है? यह त्याग की मूर्ती है जिस पर आप सभी अपने और पराये सभी इस समय भौतिक अवस्था में सुरक्षित हैं। आप चाहें तो हम नाम गिना दें जो लोग उस समय चर्चा में भाग लेते थे उस सर्वोच्च आई टी शहर और उसके सर्वोच्च वैज्ञानिक संस्थान से और उसमे से कुछ लोग मेरे इस फेसबुक पर जुड़े हुए है। जिस जिसकी भी ऊर्जा इस देश को चलाने के लिए लगी हुई है उसका हो सके तो आप सहयोग कीजिये और मेरा विरोध छोड़िये। सीत युद्ध छोड़ दीजिये क्योंकि हम सीत और और अंगारा दोनों युद्ध जीतना जानते हैं और जीत कर दिखाए भी हैं जिसके लिए आप बेचैन होकर कायरों वाली सीत युद्ध जारी किये हुए हैं।

दामोदर =योगयोगेश्वर श्रीकृष्ण: 4 वर्ष 100 की संख्या में अकेला ब्राह्मण छात्र जो सम्मान सहित अपनी कशा में श्रेष्ठतम स्थान पाते हुए जीवन जिया था और सब जाती (दलित/पिछड़ा//50/50) और धर्म(कुछ मुस्लिम अल्पसंख्यक) को पहचानता था। मुझसे कौन की लड़ाई स्वयं कैलाश नारायण उत्तम जीत पाएंगे? ((जिस नाम का कोई एक सामान्य अर्थ भी नहीं निकलता और लड़ना हो तो स्वयं ब्रह्मा (जोशी जी) सामने आकर लड़ें हमें बताएं की हम सामाजिक समरसता को नहीं बढ़ा रहे हैं तो क्या कैलाश नारायण उत्तम और उनके समर्थक बढ़ा रहे हैं जो भ्रमित कर दिए हैं दलित ईसाईयों के द्वारा मेरे विरोध में उस पुत्र मोह में जो उनका अपना है ही नहीं। और जब विवाह ही नहीं करने के बदले सम्मान मिला था तो पुत्र की आशा कैसे?  जो इस संसार में जो अच्छा किया है या बुरा किया है उसके बदले सम्मान, अपमान और प्रायश्चित करना ही पड़ता है इसमें कस्ट किस बात का?  इतनी समरसता और सामजिक कल्याण का भाव है तो किशी को भी अपना पुत्र मान लें या सभी आम नागरिक जो तुल्य उम्र के लगते हैं उनको ही अपना पुत्र मान लें)। दुनिया को बता देना चाहता हूँ की ब्रह्मा (जोशी जी) के लिए कार्य किया था और करूंगा भी लेकिन अगर उनके पास जय-विजय/रावण(अहिरावण)-कुम्भकर्ण जैसे भक्त और उनके समर्थक मेरा विरोध करते रहेंगे तो उसका परिणाम अभिष्ठतम् भयंकर होगा क्योंकि मई स्वयं ब्रह्मा (जोशी जी) ही नहीं हूँ और न ब्रह्मा होने से ही मेरा वर्तमान अस्तित्व संभव हो पाता। अतः जोशी जी के नाशक भक्त जोशी जी को समाप्त कर सकते हैं पर मुझे नहीं। मुझे जोशी जी का जो कार्य करना था कर चुका हूँ मेरे ऊपर उनका कोई एहसान नहीं है और सब कुछ ठीक रहा और उनके दास लोग अपनी सीमा और अवकात समझ गए तो उनका कार्य और सहयोग आगे भी जारी रहेगा उनका मानवहित हेतु दिया गया कार्य)) >>>>>>>>>  भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक में नवआगंतुक लोग उनके बदले जो कुछ लड़ाई लड़ना चाह रहे है: आप लोग सुन लीजिये जिसका बेटा देवेन्द्र स्वयं आई टी के सर्वोच्च शहर से 2008 में स्वयं 2014 के लिए प्रायोजित हो चुका था और बाप स्वयं उस सर्वोच्च स्थान पर रहा हो और सहमत भी रहा हो और तहलका मचाया हो वहां की सर्वोच्च संस्थान में सभ्यता, संस्कृति, ससंस्कार, धर्म और दर्शन तथा राजनैतिक और सामाजिक ज्ञान समेत अन्य ज्ञान दर्शन में तो उससे कौन सी लड़ाई आप जीतने चले है? यह त्याग की मूर्ती है जिस पर आप सभी अपने और पराये सभी इस समय भौतिक अवस्था में सुरक्षित हैं। आप चाहें तो हम नाम गिना दें जो लोग उस समय चर्चा में भाग लेते थे उस सर्वोच्च आई टी शहर और उसके सर्वोच्च वैज्ञानिक संस्थान से और उसमे से कुछ लोग मेरे इस फेसबुक पर जुड़े हुए है। जिस जिसकी भी ऊर्जा इस देश को चलाने के लिए लगी हुई है उसका हो सके तो आप सहयोग कीजिये और मेरा विरोध छोड़िये। सीत युद्ध छोड़ दीजिये क्योंकि हम सीत और और अंगारा दोनों युद्ध जीतना जानते हैं और जीत कर दिखाए भी हैं जिसके लिए आप बेचैन होकर कायरों वाली सीत युद्ध जारी किये हुए हैं। 

शैक्षिक और शोध के उद्देश्य से, दृष्टि से और इस दिशा के निमित्त मेरा ओंकारनाथ(शिव) और कलाम को अपना परम श्रद्धेय गुरु मानना और सम्बोधन करना बहुत ही गूढ़ रहष्य की बात है जो मेरे पूर्वजों के स्थान आजमगढ़(आदिकालीन शक्तिशाली गौतम गोत्रीय क्षत्रिय राजाओं का नगर) का मतलब गृहजनपद से जुडी हुई है(बहुत बारीक से जानने वाले हो सकता है इसको समझ रहे हों) जहां की मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) जौनपुर(जमदग्निपुर) ही है जिस जनपद से मेरी पुरातन कुल माता मतलब बस्ती जनपद से आये बाबा सारंगधर की संयोगिनी थीं।

शैक्षिक और शोध के उद्देश्य से, दृष्टि से और इस दिशा के निमित्त मेरा ओंकारनाथ(शिव) और कलाम को अपना परम श्रद्धेय गुरु मानना और सम्बोधन करना बहुत ही गूढ़ रहष्य की बात है जो मेरे पूर्वजों के स्थान आजमगढ़(आदिकालीन शक्तिशाली गौतम गोत्रीय क्षत्रिय राजाओं का नगर) का  मतलब गृहजनपद से जुडी हुई है(बहुत बारीक से जानने वाले हो सकता है इसको समझ रहे हों) जहां की मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण, मेरे मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) जौनपुर(जमदग्निपुर)  ही है जिस जनपद से मेरी पुरातन कुल माता मतलब बस्ती जनपद से आये बाबा सारंगधर की संयोगिनी थीं।  

सशरीर परमब्रह्म योगयोगेश्वर श्रीकृष्ण/देवकीनन्दन/वाशुदेव स्वयं वशुदेव(कश्यप ऋषि) और देवकी(अदिति) के पुत्र थे मतलब वृष्णिवंशीय/यदुवंशी/चन्द्रवंशीय/ कश्यप गोत्रीय तो थे ही पर उसके साथ कश्यप ऋषि के अवतार, वशुदेव और उनकी द्वितीय पत्नी अदिति की अवतार, देवकी के पुत्र थे और इसीलिये वाशुदेव कहलाये, तो आप उनको ऋषी पुत्र ही कहेंगे।

सशरीर परमब्रह्म योगयोगेश्वर श्रीकृष्ण/देवकीनन्दन/वाशुदेव स्वयं वशुदेव(कश्यप ऋषि) और देवकी(अदिति) के पुत्र थे मतलब वृष्णिवंशीय/यदुवंशी/चन्द्रवंशीय/ कश्यप गोत्रीय तो थे ही पर उसके साथ कश्यप ऋषि के अवतार, वशुदेव और उनकी द्वितीय पत्नी अदिति की अवतार, देवकी के पुत्र थे और इसीलिये वाशुदेव कहलाये, तो आप उनको ऋषी पुत्र ही कहेंगे।

सशरीर परमब्रह्म मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम/दशरथनन्दन/कौशल्यानंदन/रघुनन्दन दशरथ(कश्यप ऋषी) और कौशल्या(अदिति) के पुत्र और इस प्रकार रघुवंश/इक्शाकुवंश/सूर्यवंश/कश्यप गोत्रीय तो थे ही उसके साथ कश्यप ऋषि के अवतार, दशरथ और कश्यप ऋषी की द्वितीय पत्नी अदिति की अवतार, कौशल्या के पुत्र थे तो इस प्रकार इस लौकिक जगत के दीनदयाल भगवान श्रीराम अपने में ऋषी पुत्र ही थे राजसत्ता वाले परिवार में होते हुए भी।

सशरीर परमब्रह्म मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम/दशरथनन्दन/कौशल्यानंदन/रघुनन्दन   दशरथ(कश्यप ऋषी) और कौशल्या(अदिति) के पुत्र और इस प्रकार रघुवंश/इक्शाकुवंश/सूर्यवंश/कश्यप गोत्रीय तो थे ही उसके साथ कश्यप ऋषि के अवतार, दशरथ और कश्यप ऋषी की द्वितीय पत्नी अदिति की अवतार, कौशल्या के पुत्र थे तो इस प्रकार इस लौकिक जगत के दीनदयाल भगवान श्रीराम अपने में ऋषी पुत्र ही थे राजसत्ता वाले परिवार में होते हुए भी।     

एक गलती हिन्दू समाज और विशेषकर क्षत्रिय समाज दूर कर ले और जान ले की सूर्यवंशीय हमेशा कश्यप गोत्रीय ही होगा और जो अन्य गोत्रीय अपने को लिखते हैं वे शूर्यवंश का अनुसरण कर सूर्यवंशीय कहलाये होंगे और अन्य गोत्र भारद्वाज या गौतम लिखते होंगे पर हर मूल सूर्यवंशीय और चन्द्रवंशीय क्षत्रिय का गोत्र कश्यप ही होगा और हर सावर्ण गोत्रीय ब्राह्मण होगा सावर्ण ऋषी की इक्षा शक्ति के कारन क्योंकि कश्यप ऋषी की द्वितीय पत्नी अदिति से आदित्य(जिसका स्वयं अर्थ ऊर्जा का स्वायत्त स्रोत मतलब आप उसे सूर्य ही कह सकते है) का जन्म हुआ और जिनके दो पुत्रों सूर्यबल और चंद्रबल से सूर्यवंश और चन्द्र वंश चला और अन्य देव, नर, नाग, किन्नर व् अन्य-अन्य वंश चला परन्तु कश्यप ऋषी के पौत्र और भगवान आदित्य के एक पुत्र सावर्ण ने ब्राह्मण धर्म अपनाना ही श्रेष्कर समझा और उनके नाम से सावर्ण गोत्र चला जो उच्च कर्म वाला गोत्र कहलाता है जिसका मतलब ही होता है उच्च वर्ण=कर्म वाला। इस प्रकार सावर्ण गोत्रीय ब्राह्मण ही होता है चाहे कोई भी ब्राह्मण क्यों न हो और यह गोत्र भी कश्यप गोत्र की ही क्रमिक संतति ही है।

एक गलती हिन्दू समाज और विशेषकर क्षत्रिय समाज दूर कर ले और जान ले की सूर्यवंशीय हमेशा कश्यप गोत्रीय ही होगा और जो अन्य गोत्रीय अपने को लिखते हैं वे शूर्यवंश का अनुसरण कर सूर्यवंशीय कहलाये होंगे और अन्य गोत्र भारद्वाज या गौतम लिखते होंगे पर हर मूल सूर्यवंशीय और चन्द्रवंशीय क्षत्रिय का गोत्र कश्यप ही होगा और हर सावर्ण गोत्रीय ब्राह्मण होगा सावर्ण ऋषी की इक्षा शक्ति के कारन क्योंकि कश्यप ऋषी की द्वितीय पत्नी अदिति से आदित्य(जिसका स्वयं अर्थ ऊर्जा का स्वायत्त स्रोत मतलब आप उसे सूर्य ही कह सकते है) का जन्म हुआ और जिनके दो पुत्रों सूर्यबल और चंद्रबल से सूर्यवंश और चन्द्र वंश चला और अन्य देव, नर, नाग, किन्नर व् अन्य-अन्य वंश चला परन्तु कश्यप ऋषी के पौत्र और भगवान आदित्य के एक पुत्र सावर्ण ने ब्राह्मण धर्म अपनाना ही श्रेष्कर समझा और उनके नाम से सावर्ण गोत्र चला जो उच्च कर्म वाला गोत्र कहलाता है जिसका मतलब ही होता है उच्च वर्ण=कर्म वाला। इस प्रकार सावर्ण गोत्रीय ब्राह्मण ही होता है चाहे कोई भी ब्राह्मण क्यों न हो और यह गोत्र भी कश्यप गोत्र की ही क्रमिक संतति ही है।  

My Date of Birth (Actual): 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी-1975)

19 नवंबर, 20015 गोपाष्टमी/गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी-2015 कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी (My birthday by Hindu religious day system according Moon Month)
It was Dipawali Parva on 11-11-2015
My Date of Birth (Actual): 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोवर्धन/गिरिधर अस्टमी-1975)
११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस 
Nakshatra: Dhanistha (Rashi: 1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi)
Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग, धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार))
Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)