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Sunday, January 31, 2016

आप लोगों के मनोविनोद हेतु प्रस्तुति: ---ब्रह्मा:ज्ञान के स्वयं निहित स्रोत जिससे ब्रह्मज्ञानी बहुतों को हम कह देते हैं; विष्णु: विनम्रभावी परमगुरु जिनको त्रिदेवों में वास्तविक गुरु बृहस्पति(देवताओं के गुरु) कहते हैं; और शिव:शंकर परमाचार्य(जीवन में आये आयामों और अन्तर्निहित मूक ज्ञान के मिलन से उपजे शोध परिणामो पर आधारित ज्ञान के आधार पर वक्तव्य दाता)>>>>तो क्या इसीलिये शोध करने वालों को अधिकतर शंकर:शिव बनना पड़ता है या शिव:शंकर बनने हेतु शोध करना पड़ता है।

आप लोगों के मनोविनोद हेतु प्रस्तुति: ---ब्रह्मा:ज्ञान के स्वयं निहित स्रोत जिससे ब्रह्मज्ञानी बहुतों को हम कह देते हैं; विष्णु: विनम्रभावी परमगुरु जिनको त्रिदेवों में वास्तविक गुरु बृहस्पति(देवताओं के गुरु) कहते हैं; और शिव:शंकर  परमाचार्य(जीवन में आये आयामों और अन्तर्निहित मूक ज्ञान के मिलन से उपजे शोध परिणामो पर आधारित ज्ञान के आधार पर वक्तव्य दाता)>>>>तो क्या इसीलिये शोध करने वालों को अधिकतर शंकर:शिव बनना पड़ता है या शिव:शंकर बनने हेतु शोध करना पड़ता है।   

Saturday, January 30, 2016

परमब्रह्म/ब्रह्म>>त्रिमूर्ति:त्रिदेव मतलब ब्रह्मा, विष्णु महेश प्रयाग के अनुसार और शिव, विष्णु और ब्रह्मा काशी के अनुसार>>>>सप्तर्षि:सात ब्रह्मर्षि (कश्यप, गौतम, व्यास/परासर/वशिष्ठ, भारद्वाज/धन्वन्तरि/आंगिरस, जमदग्नि/दाधीच/भृगु, कृष्णात्रेय:दुर्वाशा/सोमात्रेय/दत्तात्रेय/अत्रि, कौशिक:विश्वामित्र:विश्वरथ): जब मै सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र विवेक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/त्रयम्बक/महाशिव स्वयं था तो मुझे ब्रह्मा का मानस पुत्र क्यों बनना जरूरी था? इसका उत्तर यही है की दुनिया बदल गयी है पर सप्तर्षि, ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सभी मानक स्त्री और पुरुष तथा मानक विभूतिया नहीं बदली हैं तो महाशिव को पुनः महाशिव/विवेक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/त्रयम्बक बन अनादि होना सिद्ध करना था तो शिव के अलावा दूसरा अनादि महाशिव ही होगा तो वह दूसरा अनादि महाशिव/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/राम/विवेक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/त्रयम्बक है और इसीलिये ये एक दूसरे के ईस्टदेव और रक्षक है। इसीलिये मेरी उपस्थिति इस प्रयागराज में ही अनिवार्य थी और रहेगी भी।

परमब्रह्म/ब्रह्म>>त्रिमूर्ति:त्रिदेव मतलब ब्रह्मा, विष्णु महेश प्रयाग के अनुसार और शिव, विष्णु और ब्रह्मा काशी के अनुसार>>>>सप्तर्षि:सात ब्रह्मर्षि (कश्यप, गौतम, व्यास/परासर/वशिष्ठ, भारद्वाज/धन्वन्तरि/आंगिरस, जमदग्नि/दाधीच/भृगु, कृष्णात्रेय:दुर्वाशा/सोमात्रेय/दत्तात्रेय/अत्रि, कौशिक:विश्वामित्र:विश्वरथ): जब मै सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र विवेक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/त्रयम्बक/महाशिव स्वयं था तो मुझे ब्रह्मा का मानस पुत्र क्यों बनना जरूरी था? इसका उत्तर यही है की दुनिया बदल गयी है पर सप्तर्षि, ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सभी मानक स्त्री और पुरुष तथा मानक विभूतिया नहीं बदली हैं तो महाशिव को पुनः महाशिव/विवेक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/त्रयम्बक बन अनादि होना सिद्ध करना था तो शिव के अलावा दूसरा अनादि महाशिव ही होगा तो वह दूसरा अनादि महाशिव/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/राम/विवेक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/त्रयम्बक है और इसीलिये ये एक दूसरे के ईस्टदेव और रक्षक है। इसीलिये मेरी उपस्थिति इस प्रयागराज में ही अनिवार्य थी और रहेगी भी।


1. कश्यप(विवाह में रिकार्डधारी): 13 शादिया ब्रह्मा को पिता मारीच द्वारा दिए बचन की पूर्ती हेतु ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र सती:पारवती:उमा:गिरिजा:अपर्णा के पिता काशिराज दक्षप्रजापति की ही सती:पारवती:उमा:गिरिजा:अपर्णा के अलावा शेष सभी कन्याओं से जिनका शिव-सती और सती के चिता भष्म प्रकरण के कारन विवाह नहीं हो रहा था से विवाह किये थे जिनसे देव, दानव, नर, किन्नर, नाग, गन्धर्व, गरुण(विष्णु वाहन)), अरुण(सुर्यवाहन) वंश ने जन्म लिया। बलि (असुर दान बली राजा जो भृगुवंशी था) के अलावा अधिकतर दानव इन्ही प्रथम पत्नी दिति से और त्रिदेवों के अलावा सभी देवता इनकी दूसरी पत्नी अदिति से रहे है ((आदित्य(कश्यप और अदिति पुत्र):इंद्र, विश्वकर्मा:श्रेष्ठं अभियंता, सूर्य, चन्द्र, पञ्च भूत देव: धरनी/मृदा, पवन, अग्नि, आकाश, वरुणदेव व् अन्य-अन्य))।यह सब कुछ तो सम्पूर्ण मानवता को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी भी उन्ही की है।
3. गौतम न्याय दर्शन के प्रणेता और मानवता के अभीष्ट पुजारी।
4. सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी, गुरु और पुरोहित। जिनके वंसज वेदव्यास ने 18 पुराण, 4 वेद समेत ज्ञान, विज्ञान की अनेकोनेक रचनाये की हैं।
5. श्रेष्ठ वैज्ञानिक व् मानव दर्शन के अभीष्ट ज्ञाता।
6 श्रेष्ठतम ब्राह्मणत्व गुण त्याग अभीष्ट धारणकर्ता।
7 . परमतेज और विनम्रता दोनों के संवाहक।
2 . कौशिक:विश्वामित्र:विश्वरथ: सबसे अधिक युद्ध जीतने व् भारत से बाहर वैश्विक रूप से राज्य स्थापित करने का रिकार्ड पर किशी राज्य सत्ता को बहुत अधिक समय तक बनाये रखने की कला नहीं हांसिल कर पाये और भ्रमणकारी बने रहे और राज्य दर राज्य जीतते रहे। ब्रह्मर्षि होते हुए क्षत्रिय गुण की अधिकता रही। अतः इनको अभीष्ट क्षत्रिय गुण वाला मानते हैं जिन्होंने गायत्रीमंत्र को जन्मदिया और उसकी सिद्धी भी की पहली बार जिसकी अंतिम और 24 वी सिद्धि हमारे अशोकचक्र के 24 आदर्श ऋषि याज्ञवल्क्य ही कर सके हैं आज तक जिसकी वजह से अशोकचक्र/समयचक्र/कालचक्र/धर्मचक्र में 24 रेखाएं ही हैं।

बस्ती जनपद, उत्तर प्रदेश से आकर 500 बीघे के रामापुर-223225, आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश समेत पाँच गाँव को एक मुस्लिम(मूलतः क्षत्रिय) जागीरदार से दान में पाये हुए सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा/सती/पारवती/उमा/गिरिजा/अपर्णा/गौरी पर अर्पित होने वाला या भेंट चढने वाला या उनका आहार) पाण्डेय ब्राह्मण सारंगधर(चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/महादेव/केदारेश्वर/आदिशंकर) बाबा के वंसज देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/-----/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप(=स्वतः निहित ऊर्जा और प्रकाश का एकमात्र स्रोत = सूर्य की भी ऊर्जा का स्रोत=सूर्यकान्त=सूर्यस्वामी=आदित्यनाथ= रामजानकी=लक्ष्मीनारायण =सत्यनारायण) का पुत्र, विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव होने का दायित्व निर्वहन के साथ अपने ताउजी, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, परमपिता परमेश्वर डॉ प्रेमचंद (शिव=सोमनाथ= सारंगधर=चंद्रशेखर=शशांक=शशिधर=राकेशधर =शम्भू=महादेव=विश्वनाथ= केदारेश्वर=आदिशंकर) और गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से आकर 300 बीघे के बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार द्वारा दान में पाये हुए सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के वंसज रामानंद/रामप्रशाद/रमानाथ/ श्रीधर=विष्णु=लक्ष्मीकांत=श्रीकांत =श्रीधर=श्रीप्रकाश= सच्चिदानंद=चतुर्भुज= कमलेश्वर=चक्रधर= पद्मधर(अपने मामा और परमगुरु परमपिता परमेश्वर) दोनों के पुत्र के रूप में बिना उत्तराधिकार जो मानवीय आदर्श और जो पुत्रवत कर्तव्य होते हैं मानवता में योगदान और उनके सनातन अंगरिसा ब्राह्मण गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) के श्रेष्ठ वचन की रक्षा और इस प्रकार समर्पण भाव से मानवता की रक्षा हेतु उसका पूर्णतः पालन किया हूँ मन, कर्म, वाणी, आहार-विहार का पालन करते हुए और मान, सम्मान, स्वाभिमान तथा अपनी तीन पीढ़ी की ऊर्जा और आकांछाओं का त्याग और समन करते हुए। मै विश्वास दिलाना चाहता हूँ की मेरा कोई भी कार्य मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की ही तर्ज पर सप्तर्षि(कश्यप, गौतम, व्यास/परासर/वशिष्ठ, भारद्वाज/धन्वन्तरि/आंगिरस, जमदग्नि/दाधीच/भृगु, कृष्णात्रेय:दुर्वाशा/सोमात्रेय/दत्तात्रेय/अत्रि, कौशिक:विश्वामित्र:विश्वरथ)के आदर्शों के प्रतिकूल कभी भी नहीं होगा हो सकता है की तात्कालिक रूप में कुछ लोगों को मेरा कुछ कार्य योग योगेश्वर श्रीकृष्ण जैसा लगे और तात्कालिक चोट उनको अनुभव हो पर संभावना यही रहेगी की पूर्णतः सप्तर्षि नियमों के अनुसार ही मेरा आचरण रहेगा।>>>>यहां उल्लेख करना चाहूँगा की विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव ने अपनी चौदह वर्ष की यात्रा में इस भौतिक संसार में मार्ग में भेजे गए सभी भव बाधाओं को अपनी लक्ष्य पूर्ती के साथ पार करने में दोनों सशरीर परमब्रह्म अवस्था श्रीकृष्ण और श्रीराम को प्राप्त कर लिया है और इसीलिए मेरे द्वारा लिखा था की विवेकानंद(विवेक+आनंद) इन चौदह वर्षों में अपने गुरु श्रीरामकृष्ण/शिवरामकृष्ण/रामकृष्ण/राम हो गए। और इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंश अपने मूल वंश सूर्यवंश मतलब आदित्य मतलब कश्यप और उनकी दूसरी पत्नी अदिति पुत्र एक में ही समाहित मान लिए जाय या अलग समझे जाय यह कश्यप ऋषी और समाज संचालन करने वालों पर निर्भर करता है। पुत्र एक में रहें या अलग रहें उनमे शान्ति, शौहार्द्र और समृद्धि सम्पन्नता रहे पिता का यही दायित्व होता है तो वह पूरा हो गया।

बस्ती जनपद, उत्तर प्रदेश से आकर 500 बीघे के रामापुर-223225, आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश समेत पाँच गाँव को एक मुस्लिम(मूलतः क्षत्रिय) जागीरदार से दान में पाये हुए सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(शिव और शिवा/सती/पारवती/उमा/गिरिजा/अपर्णा/गौरी पर अर्पित होने वाला या भेंट चढने वाला या उनका आहार) पाण्डेय ब्राह्मण सारंगधर(चंद्रशेखर/शशिधर/राकेशधर/महादेव/केदारेश्वर/आदिशंकर) बाबा के वंसज देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/-----/रामप्रशाद/बेचनराम/प्रदीप(=स्वतः निहित ऊर्जा और प्रकाश का एकमात्र स्रोत = सूर्य की भी ऊर्जा का स्रोत=सूर्यकान्त=सूर्यस्वामी=आदित्यनाथ= रामजानकी=लक्ष्मीनारायण =सत्यनारायण) का पुत्र, विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव होने का दायित्व निर्वहन के साथ अपने ताउजी, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, परमपिता परमेश्वर डॉ प्रेमचंद (शिव=सोमनाथ= सारंगधर=चंद्रशेखर=शशांक=शशिधर=राकेशधर =शम्भू=महादेव=विश्वनाथ= केदारेश्वर=आदिशंकर) और गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से आकर 300 बीघे के बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार द्वारा दान में पाये हुए सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के वंसज रामानंद/रामप्रशाद/रमानाथ/ श्रीधर=विष्णु=लक्ष्मीकांत=श्रीकांत =श्रीधर=श्रीप्रकाश= सच्चिदानंद=चतुर्भुज= कमलेश्वर=चक्रधर= पद्मधर(अपने मामा और परमगुरु परमपिता परमेश्वर) दोनों के पुत्र के रूप में बिना उत्तराधिकार जो मानवीय आदर्श और जो पुत्रवत कर्तव्य होते हैं मानवता में योगदान और उनके सनातन अंगरिसा ब्राह्मण गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) के श्रेष्ठ वचन की रक्षा और इस प्रकार समर्पण भाव से मानवता की रक्षा हेतु उसका पूर्णतः पालन किया हूँ मन, कर्म, वाणी, आहार-विहार का पालन करते हुए और मान, सम्मान, स्वाभिमान तथा अपनी तीन पीढ़ी की ऊर्जा और आकांछाओं का त्याग और समन करते हुए। मै विश्वास दिलाना चाहता हूँ की मेरा कोई भी कार्य मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की ही तर्ज पर सप्तर्षि(कश्यप, गौतम, व्यास/परासर/वशिष्ठ, भारद्वाज/धन्वन्तरि/आंगिरस, जमदग्नि/दाधीच/भृगु, कृष्णात्रेय:दुर्वाशा/सोमात्रेय/दत्तात्रेय/अत्रि, कौशिक:विश्वामित्र:विश्वरथ)के आदर्शों के प्रतिकूल कभी भी नहीं होगा हो सकता है की तात्कालिक रूप में कुछ लोगों को मेरा कुछ कार्य योग योगेश्वर श्रीकृष्ण जैसा लगे और तात्कालिक चोट उनको अनुभव हो पर संभावना यही रहेगी की पूर्णतः सप्तर्षि नियमों के अनुसार ही मेरा आचरण रहेगा।>>>>यहां उल्लेख करना चाहूँगा की विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिव/महाशिव ने अपनी चौदह वर्ष की यात्रा में इस भौतिक संसार में मार्ग में भेजे गए सभी भव बाधाओं को अपनी लक्ष्य पूर्ती के साथ पार करने में दोनों सशरीर परमब्रह्म अवस्था श्रीकृष्ण और श्रीराम को प्राप्त कर लिया है और इसीलिए मेरे द्वारा लिखा था की विवेकानंद(विवेक+आनंद) इन चौदह वर्षों में अपने गुरु श्रीरामकृष्ण/शिवरामकृष्ण/रामकृष्ण/राम हो गए। और इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंश अपने मूल वंश सूर्यवंश मतलब आदित्य मतलब कश्यप और उनकी दूसरी पत्नी अदिति पुत्र एक में ही समाहित मान लिए जाय या अलग समझे जाय यह कश्यप ऋषी और समाज संचालन करने वालों पर निर्भर करता है। पुत्र एक में रहें या अलग रहें उनमे शान्ति, शौहार्द्र और समृद्धि सम्पन्नता रहे पिता का यही दायित्व होता है तो वह पूरा हो गया।

अगर मेरा अस्तित्व आप मानते हैं तो यह मानना पडेगा की विश्व के सम्पूर्ण और सब प्रकार जी ऊर्जा के स्रोत, परमब्रह्म मतलब ब्रह्म के तीनों अंश: शक्ति के स्रोत, महादेव शिव; हर प्रकार के वैभव के श्रोत, विष्णु; और ज्ञान के स्रोत ब्रह्मा और उनकी दैवीय शक्तियों की स्रोत उनकी भार्या तीनों देवियों: ज्ञान की स्रोत, सरस्वती; वैभव के स्रोत लक्ष्मी और शक्ति की स्रोत गौरी:पारवती:उमा:सती:अपर्णा का भी अस्तित्व इस संसार में है और अगर ऐसा है तो ब्रह्मा/सरस्वती, विष्णु/लक्ष्मी और शिव/गौरी:पारवती भी उसी परमब्रह्म जिसे आप ब्रह्म कहते है के अंश होने के नाती इनका कोई एक जाति/धर्म आप नहीं मान सकते है ये सभी जाति/धर्म के लिए शक्ति, वैभव और ज्ञान के स्रोत हैं। और अगर ब्रह्मा, विष्णु और शिव और उनकी संयोगिनी देवियों का अस्तित्व है तो उनके गुण के अनुसार जन्मत(सनातन सप्त ब्रह्मर्षि गोत्रीय) या कर्मतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का अस्तित्व है इस संसार में और रहा है इसीलिए मेरा यह वर्तमान अस्तित्व संभव है और इतना ही नहीं आप ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य और उनकी संतति को विश्वव्यापक रूप में जारी रखने में सहयोग करने हेतु इस्लाम और ईसाइयत का भी अस्तित्व है इस संसार में। तो आप ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य या इनके व्युत्पन्न जाति/धर्म, तथा इस्लाम और ईसाइयत में से किशी में अपने को न पाते हो तो क्या पर अगर मेरा अस्तित्व है और आप समझते हों तो ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य या इनके व्युत्पन्न जाति/धर्म, तथा इस्लाम और ईसाइयत इनका अस्तित्व है जिस कारन मेरा और इस प्रकार आप सभी का वर्तमान अस्तित्व इस संसार में संभव है। अतः सम्पूर्ण वैश्विक मानव समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य जाती/धर्म या ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य या इनके व्युत्पन्न जाति/धर्म, तथा इस्लाम और ईसाइयत जाति /धर्म की ही संतान है इसे कोई माने या न माने यह उसका अपना विवेक है लेकिन परमब्रह्म/ब्रह्म से शिव, विष्णु और ब्रह्मा और उनकी संयोगी देवियाँ और उनके द्वारा जन्मे सप्त ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि और अस्टक ब्रह्मर्षि (सातों ऋषियों के सम्मिलित गुण/संकर गुण वाले अगस्त्य या कुम्भज ऋषी) जिनका शिव, विष्णु और ब्रह्मा के गुणों द्वारा गोत्र विधि से संचालित उनसे जन्मा यह संसार इस बात को प्रमाणित अवश्य करता है की आप सभी मानव समाज ब्राह्मणो(अगर सात ब्रह्मर्षि जनित ही मान लिया जाय) या ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जनित है जिनके विश्व व्यापक संचालन हेतु जन्मे धर्मों में मुख्य सनातन हिन्दू धर्म के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य व् उनके व्युत्पन्न जाती/धर्म के साथ मुख्यतः क्रमसः इस्लाम और ईसाइयत शामिल और अपरिहार्य जाति/धर्म बन गए हैं। अब आम मानव समाज को सोचना है की क्या ईसाइयत और इस्लाम के अनुयायी उस कार्य/धर्म को विश्व्यापाक मानवता सञ्चालन हेतु ईमानदारी से अपने जाति/धर्म को जारी रखना चाहते हैं की नहीं?

अगर मेरा अस्तित्व आप मानते हैं तो यह मानना पडेगा की विश्व के सम्पूर्ण और सब प्रकार जी ऊर्जा के स्रोत, परमब्रह्म मतलब ब्रह्म के तीनों अंश: शक्ति के स्रोत,  महादेव शिव; हर प्रकार के वैभव के श्रोत, विष्णु; और ज्ञान के स्रोत ब्रह्मा और उनकी दैवीय शक्तियों की स्रोत उनकी भार्या तीनों देवियों: ज्ञान की स्रोत, सरस्वती; वैभव के स्रोत लक्ष्मी और शक्ति की स्रोत गौरी:पारवती:उमा:सती:अपर्णा का भी अस्तित्व इस संसार में है और अगर ऐसा है तो ब्रह्मा/सरस्वती, विष्णु/लक्ष्मी और शिव/गौरी:पारवती भी उसी परमब्रह्म जिसे आप ब्रह्म कहते है के अंश होने के नाती इनका कोई एक जाति/धर्म आप नहीं मान सकते है ये सभी जाति/धर्म के लिए शक्ति, वैभव और ज्ञान के स्रोत हैं। और अगर ब्रह्मा, विष्णु और शिव और उनकी संयोगिनी देवियों का अस्तित्व है तो उनके गुण के अनुसार जन्मत(सनातन सप्त ब्रह्मर्षि गोत्रीय) या कर्मतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का अस्तित्व है इस संसार में और रहा है इसीलिए मेरा यह वर्तमान अस्तित्व संभव है और इतना ही नहीं आप ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य और उनकी संतति को विश्वव्यापक रूप में जारी रखने में सहयोग करने हेतु इस्लाम और ईसाइयत का भी अस्तित्व है इस संसार में। तो आप ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य या इनके व्युत्पन्न जाति/धर्म, तथा  इस्लाम और  ईसाइयत में से किशी में अपने को न पाते हो तो क्या पर अगर मेरा अस्तित्व है और आप समझते हों तो ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य या इनके व्युत्पन्न जाति/धर्म, तथा  इस्लाम और  ईसाइयत इनका अस्तित्व है जिस कारन मेरा और इस प्रकार आप सभी का वर्तमान अस्तित्व इस संसार में संभव है। अतः सम्पूर्ण वैश्विक मानव समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य जाती/धर्म या ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य या इनके व्युत्पन्न जाति/धर्म, तथा  इस्लाम और  ईसाइयत जाति /धर्म की ही संतान है इसे कोई माने या न माने यह उसका अपना विवेक है लेकिन परमब्रह्म/ब्रह्म से शिव, विष्णु और ब्रह्मा और उनकी संयोगी देवियाँ और उनके द्वारा जन्मे सप्त ब्रह्मर्षि/सप्तर्षि और अस्टक ब्रह्मर्षि (सातों ऋषियों के सम्मिलित गुण/संकर गुण वाले अगस्त्य या कुम्भज ऋषी) जिनका शिव, विष्णु और ब्रह्मा के गुणों द्वारा गोत्र विधि से संचालित उनसे जन्मा यह संसार इस बात को प्रमाणित अवश्य करता है की आप सभी मानव समाज ब्राह्मणो(अगर सात ब्रह्मर्षि जनित ही मान लिया जाय)  या ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जनित है जिनके विश्व व्यापक संचालन हेतु जन्मे धर्मों में मुख्य सनातन हिन्दू धर्म के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य व् उनके व्युत्पन्न जाती/धर्म के साथ मुख्यतः क्रमसः इस्लाम और ईसाइयत शामिल और अपरिहार्य जाति/धर्म बन गए हैं। अब आम मानव समाज को सोचना है की क्या ईसाइयत और इस्लाम के अनुयायी उस कार्य/धर्म को विश्व्यापाक मानवता सञ्चालन हेतु ईमानदारी से अपने जाति/धर्म को जारी रखना चाहते हैं की नहीं?   

यही मेरी सहनशीलता और सहिष्णुता है पूरे 14 वर्ष से और इस दौरान मेरी सहनशीलता के ही भरोशे आप के सब तंत्र काम करते रहे मै कहीं नहीं रोका और आप को एहसाह रहा रहा की सब कुछ सही है और हरा-हरा ही सब कुछ है और ऊपर से मेरे ऊपर टिप्पणी भी जारी रही अपनी-अपनी समझ के अनुसार छोटे से लेकर बड़ों द्वारा पर क्या "सत्यमेव जयते" तक आप पहुँच सके ? तो फिर वही घिसा-पिटा सब तंत्र क्यों चलता रहे?>>>>>जब "सत्यमेव जयते" के सामने वैश्विक और स्थानीय तथाकथित सामाजिक न्याय तंत्र, संख्याबल तंत्र, प्रजातंत्र, गणतंत्र, प्रशासनिक तंत्र व् शासन तंत्र, खुफिया तंत्र अन्य-अन्य सभी तंत्र भी विफल हो गए फिर भी आप लोग किशी एक न एक को हारी हुई प्रतियोगिता को किशी तरह पुनः जीतने का निरर्थक प्रयत्न किये जा रहे हैं जब वैश्विक और स्थानीय शीर्ष संस्थाएं व् शीर्ष महापुरुष और सभी तंत्र आप के विफल रहे। "सत्येव जयते" को कायम रखने मतलब मानवता को कायम रखने हेतु आप लोग अब कुछ और तंत्र से वैश्विक जीवन कायम रखने का प्रयास कीजिये क्योंकि ये सब अनुत्तीर्ण चुके हैं और इस कार्य में मै और मेरा ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" आप सबका सहयोग करेगा और मै सब कुछ जानते हुए आप लोगों के समर्थन में ही व्यवहारिक जीवन जीने का दायित्व निभा रहा हूँ। -------यही मेरी सहनशीलता और सहिष्णुता है पूरे 14 वर्ष से और इस दौरान मेरी सहनशीलता के ही भरोशे आप के सब तंत्र काम करते रहे मै कहीं नहीं रोका और आप को एहसाह रहा रहा की सब कुछ सही है और हरा-हरा ही सब कुछ है और ऊपर से मेरे ऊपर टिप्पणी भी जारी रही अपनी-अपनी समझ के अनुसार छोटे से लेकर बड़ों द्वारा पर क्या "सत्यमेव जयते" तक आप पहुँच सके ? तो फिर वही घिसा-पिटा सब तंत्र क्यों चलता रहे?

यही मेरी सहनशीलता और सहिष्णुता है पूरे 14 वर्ष से और इस दौरान मेरी सहनशीलता के ही भरोशे आप के सब तंत्र काम करते रहे मै कहीं नहीं रोका और आप को एहसाह रहा रहा की सब कुछ सही है और हरा-हरा ही सब कुछ है और ऊपर से मेरे ऊपर टिप्पणी भी जारी रही अपनी-अपनी समझ के अनुसार छोटे से लेकर बड़ों द्वारा पर क्या "सत्यमेव जयते" तक आप पहुँच सके ? तो फिर वही घिसा-पिटा सब तंत्र क्यों चलता रहे?>>>>>जब "सत्यमेव जयते" के सामने वैश्विक और स्थानीय तथाकथित सामाजिक न्याय तंत्र, संख्याबल तंत्र, प्रजातंत्र, गणतंत्र, प्रशासनिक तंत्र व् शासन तंत्र, खुफिया तंत्र अन्य-अन्य सभी तंत्र भी विफल हो गए फिर भी आप लोग किशी एक न एक को हारी हुई प्रतियोगिता को किशी तरह पुनः जीतने का निरर्थक प्रयत्न किये जा रहे हैं जब वैश्विक और स्थानीय शीर्ष संस्थाएं व् शीर्ष महापुरुष और सभी तंत्र आप के विफल रहे। "सत्येव जयते" को कायम रखने मतलब मानवता को कायम रखने हेतु आप लोग अब कुछ और तंत्र से वैश्विक जीवन कायम रखने का प्रयास कीजिये क्योंकि ये सब अनुत्तीर्ण चुके हैं और इस कार्य में मै और मेरा ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" आप सबका सहयोग करेगा और मै सब कुछ जानते हुए आप लोगों के समर्थन में ही व्यवहारिक जीवन जीने का दायित्व निभा रहा हूँ। -------यही मेरी सहनशीलता और सहिष्णुता है पूरे 14 वर्ष से और इस दौरान मेरी सहनशीलता के ही भरोशे आप के सब तंत्र काम करते रहे मै कहीं नहीं रोका और आप को एहसाह रहा रहा की सब कुछ सही है और हरा-हरा ही सब कुछ है और ऊपर से मेरे ऊपर टिप्पणी भी जारी रही अपनी-अपनी समझ के अनुसार छोटे से लेकर बड़ों द्वारा पर क्या "सत्यमेव जयते" तक आप पहुँच सके ? तो फिर वही घिसा-पिटा सब तंत्र क्यों चलता रहे?

Friday, January 29, 2016

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः | स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते || (गीता ३.२१) द्वारा परमब्रह्म श्रीकृष्ण वाया महर्षि व्यासः(वशिष्ठ जी के वंसज) भावार्थ: (जिसका चरित्र उत्कृष्ठ होता है वे देव तुल्य होते है। और जो उसका साक्ष्य भी समाज में प्रस्तुत कर देता है लोग उसका अनुसरण करना सुरु कर देते है: Whose Character is excellent they are equivalent to god (Dev) and who gave its evidence publicly in his life, people follows their character in his own life).>>>> (मुझे आशा है की मेरे प्रारंभिक जीवन से लेकर आज तक जिन लोगों का स्नेह और निष्ठा मेरे में जितनी थी वे अपने जीवन में उसके अनुरूप मुझसे आशातीत फल प्राप्त कर चुके हैंI I hope the person have affection and devotion in me have got the corresponding response in the his life from my side).>>>>>"परहित सरिस धरम नहीं भाई| पर पीड़ा सम नहीं अधमाईI---श्री रामचरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसीदास>>> प्रिय मित्रों मै अपने धर्म से बाहर गया कुछ सामान्य व्यवहार वालों को कभी लगा हो भी तो वह मै किशी दूसरे की सहायता या उसके मंगल जीवन की कामना हेतु गया होऊंगा न की केवल अपने स्वार्थवश जो धर्म की वास्तविक परिभासा के अंतर्गत ही आता है उससे बाहर हो ही नहीं सकता जैसा की गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरित मानस में उपर्युक्त काव्य चौपाइयों के माध्यम से परिभासित किया है:परहित सरिस धरम नहीं भाई| पर पीड़ा सम नहीं अधमाईI। (Dear friends, I gone beyond the religion if some people have only common experience think so, then that was only for support of others, which never violated the rule of religion according the actual definition of the religion given in Shri Ramcharait Manas by Goswami Tulsi Das as defined and described by the above lines in Hindi: Parahit Saris Dharam Nahi Bhai| Pari Peeda Sam Nahi Adhmaai||).

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः | स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते || (गीता ३.२१) द्वारा परमब्रह्म श्रीकृष्ण वाया महर्षि व्यासः(वशिष्ठ जी के वंसज) भावार्थ: (जिसका चरित्र उत्कृष्ठ होता है वे देव तुल्य होते है। और जो उसका साक्ष्य भी समाज में प्रस्तुत कर देता है लोग उसका अनुसरण करना सुरु कर देते है: Whose Character is excellent they are equivalent to god (Dev) and who gave its evidence publicly in his life, people follows their character in his own life).>>>> (मुझे आशा है की मेरे प्रारंभिक जीवन से लेकर आज तक जिन लोगों का स्नेह और निष्ठा मेरे में जितनी थी वे अपने जीवन में उसके अनुरूप मुझसे आशातीत फल प्राप्त कर चुके हैंI I hope the person have affection and devotion in me have got the corresponding response in the his life from my side).>>>>>"परहित सरिस धरम नहीं भाई| पर पीड़ा सम नहीं अधमाईI---श्री रामचरित मानस द्वारा गोस्वामी तुलसीदास>>> प्रिय मित्रों मै अपने धर्म से बाहर गया कुछ सामान्य व्यवहार वालों को कभी लगा हो भी तो वह मै किशी दूसरे की सहायता या उसके मंगल जीवन की कामना हेतु गया होऊंगा न की केवल अपने स्वार्थवश जो धर्म की वास्तविक परिभासा के अंतर्गत ही आता है उससे बाहर हो ही नहीं सकता जैसा की गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरित मानस में उपर्युक्त काव्य चौपाइयों के माध्यम से परिभासित किया है:परहित सरिस धरम नहीं भाई| पर पीड़ा सम नहीं अधमाईI। (Dear friends, I gone beyond the religion if some people have only common experience think so, then that was only for support of others, which never violated the rule of religion according the actual definition of the religion given in Shri Ramcharait Manas by Goswami Tulsi Das as defined and described by the above lines in Hindi: Parahit Saris Dharam Nahi Bhai| Pari Peeda Sam Nahi Adhmaai||).

Thursday, January 28, 2016

केवल वाह्य दृश्य संसार को ही देख पाने वालों के लिए प्रयाग((प्राक-यज्ञ~ सप्तर्षि~ सभी सात ब्रह्मर्षि(कश्यप, गौतम, व्यास/परासर/वशिष्ठ, भारद्वाज/धन्वन्तरि/आंगिरस, जमदग्नि/दाधीच/भृगु, कृष्णात्रेय:दुर्वाशा/सोमात्रेय/दत्तात्रेय/अत्रि, कौशिक:विश्वामित्र:विश्वरथ) को मानवता/श्रिष्टि के मूल कारक है उनके संसार में प्रकट करने हेतु ब्रह्मा द्वारा आयोजित ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा किया हुआ प्राचीनतम मानव श्रिष्टि का प्राचीनतम, प्रकृष्टा यज्ञ का स्थान))/प्रयागराज/अल्लाहाबाद/अल्लाह आबाद/इला आवास/इला आबाद दोआब है पर अंतर्दृष्टी/अंतरचक्षु वालो के लिए यह त्रिआब/त्रिधारा है और प्रयागराज के उस तीसरी धारा का श्रोत और उसका प्रभाव दोआब/द्विधारा के साथ समता मूलक संयोजन कर मानवता को विश्व व्यापकता/विश्वबंधुत्व के बीज को बोता है जिसका परिणाम है यह चराचर मानवता। अतः सर्वजन समानता वाला संसार नहीं वरन समतामूलक/समरस समाज लक्ष्य होना चाहिए सर्वजन में मौलिक मानवीय आधिकारिक समानता होने पर भी क्योंकि सर्वजन समानता वाला समाज निष्क्रिय या स्थिर या नीरसता भरा होता है शीघ्र ही ऐसा हो जाता है वैसे भी सरकारी प्रतिष्ठान/शासन/प्रशासन/निजी प्रतिष्ठान सर्वजन समानता वाला नहीं वरन समतामूलक/समरस समाज को ही अपना रहे हैं। उदाहरण के तौर पर आप जिलाधिकारी के कार्य का दायित्व किशी भी जाति/धर्म में किशी चपरासी को नहीं दे सकते है जबकि दोनों में मौलिक समानता है और जिलाधिकारी, लिपिक और चपरासी मिलकर एक समतामूलक/समरस कार्यालय कहे जा सकते हैं अपने अपने दायित्व निर्वहन को करते हुए।

केवल वाह्य दृश्य संसार को ही देख पाने वालों के लिए प्रयाग((प्राक-यज्ञ~ सप्तर्षि~ सभी सात ब्रह्मर्षि(कश्यप, गौतम, व्यास/परासर/वशिष्ठ, भारद्वाज/धन्वन्तरि/आंगिरस, जमदग्नि/दाधीच/भृगु, कृष्णात्रेय:दुर्वाशा/सोमात्रेय/दत्तात्रेय/अत्रि, कौशिक:विश्वामित्र:विश्वरथ) को मानवता/श्रिष्टि के मूल कारक है उनके संसार में प्रकट करने हेतु ब्रह्मा द्वारा आयोजित ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा किया हुआ प्राचीनतम मानव श्रिष्टि का प्राचीनतम, प्रकृष्टा यज्ञ का स्थान))/प्रयागराज/अल्लाहाबाद/अल्लाह आबाद/इला आवास/इला आबाद दोआब है पर अंतर्दृष्टी/अंतरचक्षु वालो के लिए यह त्रिआब/त्रिधारा है और प्रयागराज के उस तीसरी धारा का श्रोत और उसका प्रभाव दोआब/द्विधारा के साथ समता मूलक संयोजन कर मानवता को विश्व व्यापकता/विश्वबंधुत्व के बीज को बोता है जिसका परिणाम है यह चराचर मानवता। अतः सर्वजन समानता वाला संसार नहीं वरन समतामूलक/समरस समाज लक्ष्य होना चाहिए सर्वजन में मौलिक मानवीय आधिकारिक समानता होने पर भी क्योंकि सर्वजन समानता वाला समाज निष्क्रिय या स्थिर या नीरसता भरा होता है शीघ्र ही ऐसा हो जाता है वैसे भी सरकारी प्रतिष्ठान/शासन/प्रशासन/निजी प्रतिष्ठान सर्वजन समानता वाला नहीं वरन समतामूलक/समरस समाज को ही अपना रहे हैं। उदाहरण के तौर पर आप जिलाधिकारी के कार्य का दायित्व किशी भी जाति/धर्म में किशी चपरासी को नहीं दे सकते है जबकि दोनों में मौलिक समानता है और जिलाधिकारी, लिपिक और चपरासी मिलकर एक समतामूलक/समरस कार्यालय कहे जा सकते हैं अपने अपने दायित्व निर्वहन को करते हुए।

प्रयागराज वालों अब आप अहमद बंधू/भाई और उसी श्रेणी के अन्य लोगों से सीखी हुयी रात/सायंकालीन धुंध के समय में मेरी सायकिल/वाहन पंचर करने की राजनीती बंद कर दिए हैं इसके लिए विशेष धन्यवाद पर जो तिकड़म वाली तुच्य राजनीती करते हैं और योजनाबद्ध तरीके से किशी की रेकी कर उसके किशी अमुक स्थान पर मौक़ा लगते ही दुर्घटनाग्रस्त कर अपंग बनाने का प्रयास करते है भाड़े के गरीब टट्टुओं के माध्यम से आप इसे भी छोड़ दीजिये और मेरी राजनीती कला से सीख लीजिये मै आप को वह राजनीति सिखाऊंगा की प्रयागराज इस भारतवर्ष में ही नहीं वरन सम्पूर्ण विश्व में रामराज्य कायम करके दिखलायेगा।

प्रयागराज वालों अब आप अहमद बंधू/भाई और उसी श्रेणी के अन्य लोगों से सीखी हुयी रात/सायंकालीन धुंध के समय में मेरी सायकिल/वाहन पंचर करने की राजनीती बंद कर दिए हैं इसके लिए विशेष धन्यवाद पर जो तिकड़म वाली तुच्य राजनीती करते हैं और योजनाबद्ध तरीके से किशी की रेकी कर उसके किशी अमुक स्थान पर मौक़ा लगते ही दुर्घटनाग्रस्त कर अपंग बनाने का प्रयास करते है भाड़े के गरीब टट्टुओं के माध्यम से आप इसे भी छोड़ दीजिये और मेरी राजनीती कला से सीख लीजिये मै आप को वह राजनीति सिखाऊंगा की प्रयागराज इस भारतवर्ष में ही नहीं वरन सम्पूर्ण विश्व में रामराज्य कायम करके दिखलायेगा।

जून/जुलाई, 2001 के आगे के क्रम में अगस्त, 2001 में सलोरी/प्रयागराज के गंगेश्वर मंदिर के पास पूर्ण उफान पर बहती गंगा (राम और शिव की मर्यादा) और यमुना(कृष्ण की मर्यादा) में आग की जो लपेट सरस्वती का मानसपुत्र विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव(शिव और शिवा:पारवती:सती की आतंरिक रक्षा शक्ति) महसूस किया था वह केवल इन दो नदियों में आग की लपेट नहीं थी वरन सम्पूर्ण विश्व की नदियों में आग की लपेट का सम्मलित प्रभाव इन दो नदियों के माध्यम से परिलक्षित हो रहा था मतलब इनकी इक्षा के विरुद्ध इनको अमर्यादित बनाने का कुचक्र जारी था जो अब 2016 में पूर्ण नियंत्रित हो चुका है और अब इन नदियों में आग नहीं लगेगी वरन जो इनमे आग लगाते है मतलब इनको अमर्यादित करने का कुचक्र रचते है साम, दाम, दंड और भेद का प्रयोगकर| अब उनके जीवन में आग लगेगी? क्या आप इस यज्ञ में शामिल होंगे?

जून/जुलाई, 2001 के आगे के क्रम में अगस्त, 2001 में सलोरी/प्रयागराज के गंगेश्वर मंदिर के पास पूर्ण उफान पर बहती गंगा (राम और शिव की मर्यादा) और यमुना(कृष्ण की मर्यादा) में आग की जो लपेट सरस्वती का मानसपुत्र विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव(शिव और शिवा:पारवती:सती की आतंरिक रक्षा शक्ति) महसूस किया था वह केवल इन दो नदियों में आग की लपेट नहीं थी वरन सम्पूर्ण विश्व की नदियों में आग की लपेट का सम्मलित प्रभाव इन दो नदियों के माध्यम से परिलक्षित हो रहा था मतलब इनकी इक्षा के विरुद्ध इनको अमर्यादित बनाने का कुचक्र जारी था जो अब 2016 में पूर्ण नियंत्रित हो चुका है और अब इन नदियों में आग नहीं लगेगी वरन जो इनमे आग लगाते है मतलब इनको अमर्यादित करने का कुचक्र रचते है साम, दाम, दंड और भेद का प्रयोगकर| अब उनके जीवन में आग लगेगी? क्या आप इस यज्ञ में शामिल होंगे?

सृस्टिगत अनेकोनेक कालयात्रा और मर्यादित आचरण में जब आप जब मुझसे बड़े नहीं थे तो मेरे पवित्र सत्य सम्बन्ध के बारे में बिना मेरी सहमति के निर्णय कैसे ले लिए थे? मेरी सहमति ली गयी होती तो मै दाधीच को मात दे देता जैसे मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र/विल्वापत्र शिव और शिवा(पारवती/सती) का भोग्य/आहार/अरपणेय/अर्पण्य) पाण्डेय ब्राह्मण ताउजी डॉ प्रेमचंद(शिव) अपने सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) की कार्यपूर्ती यज्ञ में मेरा अर्पण कर दिए थे और उसमे मैंने पूर्व घटनाचक्र आयाम और उसके परिणाम को चेता स्वयं तप, बलिदान और त्याग किया हूँ।>>>>>साहब आंशू प्रयाग से निकलने सुरु हुए थे 28 June, 2001 में और पणजी(पाण्डेयजी) तक गिरे थे मतलब 36 घंटे अनवरत और एहसास हुआ था की "काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विरासत" को ऐयासबाजी वाले होटल के कमरे में भारतीय तकनीकी संस्थान दिल्ली के किशी मास्टर डिग्रीधारी जो ऐयासबाज, सुरा और शराब और कबाब का शौक़ीन है को उस ऐसे गौरवशाली विरासत को परोस दिया गया है आजीवन के लिए और जिसका अतिसय घृणित सामाजिक परिणाम होना है", परिणाम तो होना था उन आंशुओं के निः स्वार्थभाव गिरने का ((जिसमे भाव था काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विरासत के प्रति मित्रवत प्रेम भाव (जिस प्रेम सम्बन्ध को कोई पारिवारिक सम्बन्ध का नाम आप दे सकते हैं भौतिक पिपासा से अनंत दूरी लिए हुए इतना पवित्र सम्बन्ध था)| निः स्वार्थभाव का उदहारण है उस तिकड़ी के द्वितीयक जिससे भाई का भी सम्बन्ध है और जीजा का भी कारन उनकी भार्या मुझको अपना भाई मानती हैं न की ज्येष्ठ)) और वह अकाट्य है और अकाट्य रहा है और आगे भी अकाट्य रहेगा। और आपने तो उस स्वप्न से भी गया गुजरा उस विरासत को बना दिया तो स्वयं आपने अपने को किस लायक छोड़ा है जो सामने आकर बात कर सके? धिक्कार-धिक्कार-धिक्कार है आपको, है की नहीं?

जून/जुलाई, 2001 के आगे के क्रम में अगस्त, 2001 में सलोरी/प्रयागराज के गंगेश्वर मंदिर के पास पूर्ण उफान पर बहती गंगा (राम और शिव की मर्यादा) और यमुना(कृष्ण की मर्यादा) में आग की जो लपेट सरस्वती का मानसपुत्र विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव(शिव और शिवा:पारवती:सती की आतंरिक रक्षा शक्ति) महसूस किया था वह केवल इन दो नदियों में आग की लपेट नहीं थी वरन सम्पूर्ण विश्व की नदियों में आग की लपेट का सम्मलित प्रभाव इन दो नदियों के माध्यम से परिलक्षित हो रहा था मतलब इनकी इक्षा के विरुद्ध इनको अमर्यादित बनाने का कुचक्र जारी था जो अब 2016 में पूर्ण नियंत्रित हो चुका है और अब इन नदियों में आग नहीं लगेगी वरन जो इनमे आग लगाते है मतलब इनको अमर्यादित करने का कुचक्र रचते है साम, दाम, दंड और भेद का प्रयोगकर| अब उनके जीवन में आग लगेगी? क्या आप इस यज्ञ में शामिल होंगे?

सृस्टिगत अनेकोनेक कालयात्रा और मर्यादित आचरण में जब आप जब मुझसे बड़े नहीं थे तो मेरे पवित्र सत्य सम्बन्ध के बारे में बिना मेरी सहमति के निर्णय कैसे ले लिए थे? मेरी सहमति ली गयी होती तो मै दाधीच को मात दे देता जैसे मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र/विल्वापत्र शिव और शिवा(पारवती/सती) का भोग्य/आहार/अरपणेय/अर्पण्य) पाण्डेय ब्राह्मण ताउजी डॉ प्रेमचंद(शिव) अपने सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) की कार्यपूर्ती यज्ञ में मेरा अर्पण कर दिए थे और उसमे मैंने पूर्व घटनाचक्र आयाम और उसके परिणाम को चेता स्वयं तप, बलिदान और त्याग किया हूँ।>>>>>साहब आंशू प्रयाग से निकलने सुरु हुए थे 28 June, 2001 में और पणजी(पाण्डेयजी) तक गिरे थे मतलब 36 घंटे अनवरत और एहसास हुआ था की "काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विरासत" को ऐयासबाजी वाले होटल के कमरे में भारतीय तकनीकी संस्थान दिल्ली के किशी मास्टर डिग्रीधारी जो ऐयासबाज, सुरा और शराब और कबाब का शौक़ीन है को उस ऐसे गौरवशाली विरासत को परोस दिया गया है आजीवन के लिए और जिसका अतिसय घृणित सामाजिक परिणाम होना है", परिणाम तो होना था उन आंशुओं के निः स्वार्थभाव गिरने का ((जिसमे भाव था काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विरासत के प्रति मित्रवत प्रेम भाव (जिस प्रेम सम्बन्ध को कोई पारिवारिक सम्बन्ध का नाम आप दे सकते हैं भौतिक पिपासा से अनंत दूरी लिए हुए इतना पवित्र सम्बन्ध था)| निः स्वार्थभाव का उदहारण है उस तिकड़ी के द्वितीयक जिससे भाई का भी सम्बन्ध है और जीजा का भी कारन उनकी भार्या मुझको अपना भाई मानती हैं न की ज्येष्ठ)) और वह अकाट्य है और अकाट्य रहा है और आगे भी अकाट्य रहेगा। और आपने तो उस स्वप्न से भी गया गुजरा उस विरासत को बना दिया तो स्वयं आपने अपने को किस लायक छोड़ा है जो सामने आकर बात कर सके? धिक्कार-धिक्कार-धिक्कार है आपको, है की नहीं?

सृस्टिगत अनेकोनेक कालयात्रा और मर्यादित आचरण में जब आप जब मुझसे बड़े नहीं थे तो मेरे पवित्र सत्य सम्बन्ध के बारे में बिना मेरी सहमति के निर्णय कैसे ले लिए थे? मेरी सहमति ली गयी होती तो मै दाधीच को मात दे देता जैसे मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र/विल्वापत्र शिव और शिवा(पारवती/सती) का भोग्य/आहार/अरपणेय/अर्पण्य) पाण्डेय ब्राह्मण ताउजी डॉ प्रेमचंद(शिव) अपने सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) की कार्यपूर्ती यज्ञ में मेरा अर्पण कर दिए थे और उसमे मैंने पूर्व घटनाचक्र आयाम और उसके परिणाम को चेता स्वयं तप, बलिदान और त्याग किया हूँ।>>>>>साहब आंशू प्रयाग से निकलने सुरु हुए थे 28 June, 2001 में और पणजी(पाण्डेयजी) तक गिरे थे मतलब 36 घंटे अनवरत और एहसास हुआ था की "काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विरासत" को ऐयासबाजी वाले होटल के कमरे में भारतीय तकनीकी संस्थान दिल्ली के किशी मास्टर डिग्रीधारी जो ऐयासबाज, सुरा और शराब और कबाब का शौक़ीन है को उस ऐसे गौरवशाली विरासत को परोस दिया गया है आजीवन के लिए और जिसका अतिसय घृणित सामाजिक परिणाम होना है", परिणाम तो होना था उन आंशुओं के निः स्वार्थभाव गिरने का ((जिसमे भाव था काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विरासत के प्रति मित्रवत प्रेम भाव (जिस प्रेम सम्बन्ध को कोई पारिवारिक सम्बन्ध का नाम आप दे सकते हैं भौतिक पिपासा से अनंत दूरी लिए हुए इतना पवित्र सम्बन्ध था)| निः स्वार्थभाव का उदहारण है उस तिकड़ी के द्वितीयक जिससे भाई का भी सम्बन्ध है और जीजा का भी कारन उनकी भार्या मुझको अपना भाई मानती हैं न की ज्येष्ठ)) और वह अकाट्य है और अकाट्य रहा है और आगे भी अकाट्य रहेगा। और आपने तो उस स्वप्न से भी गया गुजरा उस विरासत को बना दिया तो स्वयं आपने अपने को किस लायक छोड़ा है जो सामने आकर बात कर सके? धिक्कार-धिक्कार-धिक्कार है आपको, है की नहीं? 

Wednesday, January 27, 2016

अतः मौलिक समानता थी राम और कृष्ण में विष्णु का अवतार होने से और इस प्रकार दोनों में भेद न होते हुए भी पारिस्थितिक परिस्थितियों के कारन आये हुए उपर्युक्त भेद को कुछ लोग भेद मानते है है तो इसको आप यह कह दीजिये की राम और कृष्ण में समानता नहीं है तो गलत होगा| लेकिन जो शिवरामकृष्ण हो चुका हो और अभीष्ट लक्ष्य पूर्ती के उपरान्त भी कम से कम राम उसमे शेष हो तो उस विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव(शिव और शिवा:सती:पारवती:गौरी:गिरिजा:उमा:अपर्णा के भी आंतरिक सुरक्षा कवच) को आप कैसे परिभाषित करेंगे जब राम और कृष्ण में ही आप उलझ जा रहे हैं। काशीराम, नारायणन, जॉर्ज फर्नांडीज, कलाम गुरु, अटल जी, जोशी जी, अद्यवानी(ॐ) जी तक का नाम प्रयुक्त हो चुका है जिनका मुझसे कुछ न कुछ रिस्ता निकल गया तो फिर "माया(आदिशक्ति(देवकाली= महासरस्वती+महालक्ष्मी+ महागौरी) स्वरूपा लक्ष्मी" और "अम्बेडकर(हनुमान)/अम्बवादेकर का नाम क्यों नहीं जुड़ा अभी तक क्या सम्बन्ध है "माया" और कृष्ण" का? >>>>>>>श्रीपेरंबदूर, चेन्नई, तमिलनाडु चलता हूँ मै और मुझे भी उड़ा दो वहाँ चलकर अगर दम हो आप लोगों में यह था मेरा भाष्य मार्च, 2009 में यसवंतपुर/मलेश्वरम्, बंगलौर में स्वक्षंद भ्रमण के दौरान यसवंतपुर सब्जी बाजार में माला और फूल बेच रही महिलाओं से उनको 500 और 500 रूपया देते हुए | देश का किशी भी पार्टी का किसी भी जाती/धर्म का उच्च दर्जा प्राप्त राजनेता हो वह देश का अमूल्य धरोहर है हमारा और वही नहीं हर सामान्य नागरिक भी तो किशी भी षडयंत्र से उसकी मृत्यु निंदनीय है कारन की उसके मृत होने से उसका व्यक्तिगत परिवार तो प्रभावित होता ही है पर उसके साथ वह विचार मृत हो जाता है जो उसमे पनपता उसके लम्बे अनुभव के दौरान जिसे उसके सामाजिक परिवार (नागरिको) को दिए बिना उसकी अकाल मृत्यु उसकी हो जाने पर मौलिक मृत्यु की तरह उसके वैचारिक धरोहर को सहेज कर समाज को लाभान्वित नहीं किया जा सकता है। मित्रों "माया" नाम था उस कन्या जिसके मातृत्व सुख के बलिदान के बदले श्रीकृष्ण के जन्म के दिन वसुदेव द्वारा यशोदा की नवजात पुत्री "माया" की हेरा फेरी से कृष्ण का जीवन कंश के प्रत्यक्ष पकड़ द्वारा मृत्यु से बचाया जा सका था पर माया((आदिशक्ति(देवकाली= महासरस्वती+महालक्ष्मी+ महागौरी) स्वरूपा लक्ष्मी: वह लक्ष्मी जो दुर्गा का रूप धारण किये हुए हो तो लक्ष्मी, सरस्वती और पारवती/सती तीनो ही जरूरत पड़ने पर आदिशक्ति बन सकती हैं) कंश के हाँथ से निकलते ही आकाश मार्ग से अदृश्य हो गयीं अपनी शक्तियों के प्रकटीकरण द्वारा। इसलिए हर कृष्ण के लिए स्त्रीशक्ति उसकी सुरक्षा कवच ज्यादा ही राम की की तुलना में तो कृष्ण ने गोवर्धनधारी मतलब गिरिधारी हो कृष्ण से जलने वाले इंद्र के प्रकोप से गाय, गोपी गोपिकाओं को सुरक्षा दिया था पर आप राम को निरापद पा सकते हैं जो व्यवहारिकता तक ही नारी शक्ति पर निर्भर थे मतलब केवल और केवल मातृशक्ति और अर्धनारीश्वर शक्ति जगत जननी "सीता" तक ही।>>>>>>> अतः मौलिक समानता थी राम और कृष्ण में विष्णु का अवतार होने से और इस प्रकार दोनों में भेद न होते हुए भी पारिस्थितिक परिस्थितियों के कारन आये हुए उपर्युक्त भेद को कुछ लोग भेद मानते है है तो इसको आप यह कह दीजिये की राम और कृष्ण में समानता नहीं है तो गलत होगा| लेकिन जो शिवरामकृष्ण हो चुका हो और अभीष्ट लक्ष्य पूर्ती के उपरान्त भी कम से कम राम उसमे शेष हो तो उस विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव(शिव और शिवा:सती:पारवती:गौरी:गिरिजा:उमा:अपर्णा के भी आंतरिक सुरक्षा कवच) को आप कैसे परिभाषित करेंगे जब राम और कृष्ण में ही आप उलझ जा रहे हैं। काशीराम, नारायणन, जॉर्ज फर्नांडीज, कलाम गुरु, अटल जी, जोशी जी, अद्यवानी(ॐ) जी तक का नाम प्रयुक्त हो चुका है तो फिर "माया" का नाम क्यों नहीं जुड़ा अभी तक क्या सम्बन्ध है "माया" और कृष्ण" का?

अतः मौलिक समानता थी राम और कृष्ण में विष्णु का अवतार होने से और इस प्रकार दोनों में भेद न होते हुए भी पारिस्थितिक परिस्थितियों के कारन आये हुए उपर्युक्त भेद को कुछ लोग भेद मानते है है तो इसको आप यह कह दीजिये की राम और कृष्ण में समानता नहीं है तो गलत होगा|  लेकिन जो शिवरामकृष्ण हो चुका हो और अभीष्ट लक्ष्य पूर्ती के उपरान्त भी कम से कम राम उसमे शेष हो तो उस विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव(शिव और शिवा:सती:पारवती:गौरी:गिरिजा:उमा:अपर्णा के भी आंतरिक सुरक्षा कवच) को आप कैसे परिभाषित करेंगे जब राम और कृष्ण में ही आप उलझ जा रहे हैं। काशीराम, नारायणन,  जॉर्ज फर्नांडीज, कलाम गुरु, अटल जी, जोशी जी, अद्यवानी(ॐ) जी तक का नाम प्रयुक्त हो चुका है जिनका मुझसे कुछ न कुछ रिस्ता निकल गया तो फिर "माया(आदिशक्ति(देवकाली= महासरस्वती+महालक्ष्मी+ महागौरी) स्वरूपा लक्ष्मी" और "अम्बेडकर(हनुमान)/अम्बवादेकर का नाम क्यों नहीं जुड़ा अभी तक क्या सम्बन्ध है "माया" और कृष्ण" का? >>>>>>>श्रीपेरंबदूर, चेन्नई, तमिलनाडु चलता हूँ मै और मुझे भी उड़ा दो वहाँ चलकर अगर दम हो आप लोगों में यह था मेरा भाष्य  मार्च, 2009 में यसवंतपुर/मलेश्वरम्, बंगलौर में स्वक्षंद भ्रमण के दौरान यसवंतपुर सब्जी बाजार में माला और फूल बेच रही महिलाओं से उनको 500 और 500 रूपया देते हुए |  देश का किशी भी पार्टी का किसी भी जाती/धर्म का उच्च दर्जा प्राप्त राजनेता हो वह देश का अमूल्य धरोहर है हमारा और वही नहीं हर सामान्य नागरिक भी तो किशी भी षडयंत्र से उसकी मृत्यु निंदनीय है कारन की उसके मृत होने से उसका व्यक्तिगत परिवार तो प्रभावित होता ही है पर उसके साथ वह विचार मृत हो जाता है जो उसमे पनपता उसके लम्बे अनुभव के दौरान जिसे उसके सामाजिक परिवार (नागरिको) को दिए बिना उसकी अकाल मृत्यु  उसकी हो जाने पर मौलिक मृत्यु की तरह उसके वैचारिक धरोहर को सहेज कर समाज को लाभान्वित नहीं किया जा सकता है। मित्रों "माया" नाम था उस कन्या  जिसके मातृत्व सुख के बलिदान के बदले श्रीकृष्ण के जन्म के दिन वसुदेव द्वारा  यशोदा की नवजात पुत्री "माया" की हेरा फेरी से कृष्ण का जीवन कंश के प्रत्यक्ष पकड़ द्वारा मृत्यु से बचाया जा सका था पर माया((आदिशक्ति(देवकाली= महासरस्वती+महालक्ष्मी+ महागौरी) स्वरूपा लक्ष्मी: वह लक्ष्मी जो दुर्गा का रूप धारण किये हुए हो तो लक्ष्मी, सरस्वती और पारवती/सती तीनो ही जरूरत पड़ने पर आदिशक्ति बन सकती हैं) कंश के हाँथ से निकलते ही आकाश मार्ग से अदृश्य हो गयीं अपनी शक्तियों के प्रकटीकरण द्वारा। इसलिए हर कृष्ण के लिए स्त्रीशक्ति उसकी सुरक्षा कवच ज्यादा ही राम की की तुलना में तो कृष्ण ने गोवर्धनधारी मतलब गिरिधारी हो कृष्ण से जलने वाले इंद्र के प्रकोप से गाय, गोपी  गोपिकाओं को सुरक्षा दिया था पर आप राम  को निरापद पा सकते हैं जो व्यवहारिकता तक ही नारी शक्ति पर निर्भर थे मतलब केवल और केवल मातृशक्ति और अर्धनारीश्वर शक्ति जगत जननी "सीता" तक ही।>>>>>>> अतः मौलिक समानता थी राम और कृष्ण में विष्णु का अवतार होने से और इस प्रकार दोनों में भेद न होते हुए भी पारिस्थितिक परिस्थितियों के कारन आये हुए उपर्युक्त भेद को कुछ लोग भेद मानते है है तो इसको आप यह कह दीजिये की राम और कृष्ण में समानता नहीं है तो गलत होगा|  लेकिन जो शिवरामकृष्ण हो चुका हो और अभीष्ट लक्ष्य पूर्ती के उपरान्त भी कम से कम राम उसमे शेष हो तो उस विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव(शिव और शिवा:सती:पारवती:गौरी:गिरिजा:उमा:अपर्णा के भी आंतरिक सुरक्षा कवच) को आप कैसे परिभाषित करेंगे जब राम और कृष्ण में ही आप उलझ जा रहे हैं। काशीराम, नारायणन,  जॉर्ज फर्नांडीज, कलाम गुरु, अटल जी, जोशी जी, अद्यवानी(ॐ) जी तक का नाम प्रयुक्त हो चुका है तो फिर "माया" का नाम क्यों नहीं जुड़ा अभी तक क्या सम्बन्ध है "माया" और कृष्ण" का?  

बहुत भोले इंसान हो साहब ! दरिया दिखा रहे हो उसको जिसकी थाह(गंभीरता) बड़े से बड़े महासागर स्वयं नहीं आंक सके। जो दरिया महासागर में समा जाती है आप तो उस दरिया में ही समा जाते हो तो आप मेरा आंकलन क्या करोगे? किसकी अवहेलना किये थे आज से 14 पूर्व और 1992 से किसकी अवहेलना सदा से करते चले आ रहे हो और आप सदा क्या से क्या होते रहे हो और किसके सहारे टिके थे और आज भी टिके हो यह तो मै अपने जन्म से देख रहा हूँ| फिर उसी के साथ गुस्ताखी ? क्या चाल, चरित्र और चेहरा है आप का। आप अपने चेलों की तरह लटक जाओगे बिना आधार के और हँस आपका कही उतरने का आधार नहीं पायेगा? संधि तो आप और आप के चेलों को ही करनी होगी किशी भी कीमत पर तभी सही मतभेद दूर हो सकेगा अन्यथा आप और आप के चेले तथा आप का हंश बिना आधार पाये उड़ता रहे देखते हैं उसको ऊर्जा/भोजन कब तक और कहाँ से मिलता रहेगा?

बहुत भोले इंसान हो साहब ! दरिया दिखा रहे हो उसको जिसकी थाह(गंभीरता) बड़े से बड़े महासागर स्वयं नहीं आंक सके। जो दरिया महासागर में समा जाती है आप तो उस दरिया में ही समा जाते हो तो आप मेरा आंकलन क्या करोगे? किसकी अवहेलना किये थे आज से 14 पूर्व और 1992 से किसकी अवहेलना सदा से करते चले आ रहे हो और आप सदा क्या से क्या होते रहे हो और किसके सहारे टिके थे और आज भी टिके हो यह तो मै अपने जन्म से देख रहा हूँ| फिर उसी के साथ गुस्ताखी ? क्या चाल, चरित्र और चेहरा है आप का। आप अपने चेलों की तरह लटक जाओगे बिना आधार के और हँस आपका कही उतरने का आधार नहीं पायेगा? संधि तो आप और आप के चेलों को ही करनी होगी किशी भी कीमत पर तभी सही मतभेद दूर हो सकेगा अन्यथा आप और आप के चेले तथा आप का हंश बिना आधार पाये उड़ता रहे देखते हैं उसको ऊर्जा/भोजन कब तक और कहाँ से मिलता रहेगा?

Tuesday, January 26, 2016

Happy Republic Day

Dear Friends,
Happy Republic Day to all of you.
Jai Hind, Jai Bharatvarsh|
मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है|
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र/विल्वापत्र शिव और शिवा(पारवती/सती) का भोग्य/आहार/अरपणेय/अर्पण्य) पाण्डेय ब्राह्मण ताउजी डॉ प्रेमचंद(शिव) अपने सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) की कार्यपूर्ती यज्ञ में मेरा अर्पण कर दिए थे और उसमे मैंने पूर्व घटनाचक्र आयाम और उसके परिणाम को चेता स्वयं टप, बलिदान और त्याग किया था तो उसमे मै किशी को कैसे दण्ड दे सकता हूँ? रामेस्वरम (रामः यस्य इस्वरः सह =रामस्य इस्वरः सह मतलब वह जिसके इस्वर राम हों या राम जिसके इस्वर हों वह): It is one of the twelve Jyotirlinga Temples dedicated to Lord Shiva| and one of the four DHAMS of Lord Vishnu in South. The other three DHAM are Badrikashram ( North ), Dwarka ( west) and Puri ( east). A must visit pilgrimage for both the Vaishnavist as well as the Shaivist of Hinduism. The temple constitutes a major part of the popular spiritual tourism destinations in India. The actual temple is believed to have been built by Lord Rama himself and thus it has gained an esteemed position in Indian mythological reference. This is the only place where the Shiva and Vishnu both are present simultaneous one on front side other on back side. Ramjharoka Temple - The footprints of Lord Rama is placed on a Chakra at the Ramjharoka Temple. The chakra has been placed at the highest point of Rameshwaram. This point is at a distance of 5 kms from Rameshwaram town. Since it is the highest point of Rameshwaram, therefore it provides a fantastic view of the blue ocean waters below. Rameshwaram has many small temples, apart from the main temples, dedicated to Lord Rama, Lakshaman, Sita and Hanuman.

मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र/विल्वापत्र शिव और शिवा(पारवती/सती) का भोग्य/आहार/अरपणेय/अर्पण्य) पाण्डेय ब्राह्मण ताउजी डॉ प्रेमचंद(शिव) अपने सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) की कार्यपूर्ती यज्ञ में मेरा अर्पण कर दिए थे और उसमे मैंने पूर्व घटनाचक्र आयाम और उसके परिणाम को चेता स्वयं टप, बलिदान और त्याग किया था तो उसमे मै किशी को कैसे दण्ड दे सकता हूँ? रामेस्वरम (रामः यस्य इस्वरः सह =रामस्य इस्वरः सह मतलब वह जिसके इस्वर राम हों या राम जिसके इस्वर हों वह): It is one of the twelve Jyotirlinga Temples dedicated to Lord Shiva| and one of the four DHAMS of Lord Vishnu in South. The other three DHAM are Badrikashram ( North ), Dwarka ( west) and Puri ( east). A must visit pilgrimage for both the Vaishnavist as well as the Shaivist of Hinduism. The temple constitutes a major part of the popular spiritual tourism destinations in India. The actual temple is believed to have been built by Lord Rama himself and thus it has gained an esteemed position in Indian mythological reference. This is the only place where the Shiva and Vishnu both are present simultaneous one on front side other on back side. Ramjharoka Temple - The footprints of Lord Rama is placed on a Chakra at the Ramjharoka Temple. The chakra has been placed at the highest point of Rameshwaram. This point is at a distance of 5 kms from Rameshwaram town. Since it is the highest point of Rameshwaram, therefore it provides a fantastic view of the blue ocean waters below. Rameshwaram has many small temples, apart from the main temples, dedicated to Lord Rama, Lakshaman, Sita and Hanuman.

Monday, January 25, 2016

दुनिआ में ऐसी कोई विद्या या कला नहीं है जिसमे मै, विवेक (सरस्वती की प्रथम मानस संतान=माइंड बोर्न सन/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव(शिव और शिवा:पारवती:सती का भी रक्षक)/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/श्रीराम/राम) समपारिस्थिकीय परिवेश में प्रवीण नहीं हो सकता और कोई ऐसा शोध विषय नहीं है जिसमे मै समपारिस्थिकीय परिवेश में अभीष्ट सफलता किशी एक मानव की तुलना में हांसिल नहीं कर सकता पर मैं तो सब जप-तप, बलिदान और त्याग अपने अभीष्ट लक्ष्यपूर्ति के साथ-साथ इस चाल, चरित्र और चेहरे को पूर्ण रूप से हर किशी भी स्थिति में बनाये रखने के लिए ही किया और उसे पाकर ही रहा।

दुनिआ में ऐसी कोई विद्या या कला नहीं है जिसमे मै, विवेक (सरस्वती की प्रथम मानस संतान=माइंड बोर्न सन/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव(शिव और शिवा:पारवती:सती का भी रक्षक)/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/श्रीराम/राम) समपारिस्थिकीय परिवेश में प्रवीण नहीं हो सकता और कोई ऐसा शोध विषय नहीं है जिसमे मै समपारिस्थिकीय परिवेश में अभीष्ट सफलता किशी एक मानव की तुलना में हांसिल नहीं कर सकता पर मैं तो सब जप-तप, बलिदान और त्याग अपने अभीष्ट लक्ष्यपूर्ति के साथ-साथ इस चाल, चरित्र और चेहरे को पूर्ण रूप से हर किशी भी स्थिति में बनाये रखने के लिए ही किया और उसे पाकर ही रहा। 

Sunday, January 24, 2016

निहित स्वार्थ और आनुवंशिक परिष्कार हेतु चरितहीनता को समाज में बढ़ाते हो तो फिर आतंक से क्यों डरते हो यह आतंक तो चरित्रहीनता से ही बढ़ रहा है न।

निहित स्वार्थ और आनुवंशिक परिष्कार हेतु चरितहीनता को समाज में बढ़ाते हो तो फिर आतंक से क्यों डरते हो यह आतंक तो चरित्रहीनता से ही बढ़ रहा है न। 

जय हिन्द

जय हिन्द: मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किया हुआ 5 प्रमुख तथ्य:
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है|
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

15 वर्ष से एक वर्ग जिसकी बेटी सबसे नामीगिरामी विश्विद्यालय के नामीगिरामी विषय विशेष में प्रथम स्थान प्राप्तकर्ता और वह उनके दामाद के साथ तथाकथित महाविश्वशक्ति और उसके समकक्ष देश में जीवनरत/कार्यरत है और वह वर्ग जिसकी बहु उसी सबसे नामीगिरामी विश्विद्यालय के नामीगिरामी विषय विशेष में द्वितीय स्थान प्राप्तकर्ता और बहु और बेटे दोनों एक साथ तथाकथित महाविश्वशक्ति देश में जीवनरत/कार्यरत है, उस वर्ग को अब भी आरक्षण चाहिए तो यह क्या मजाक और क्या अंधा क़ानून है और अगर यह सामाजिक न्याय है तो फिर सामाजिक अन्याय क्या होगा? अगर यह अंधा क़ानून जारी है और इसे मानवता का सफल सञ्चालन हेतु अनिवार्य आप लोग कहते हैं तो फिर वैश्विक समाज के ऊपर जो विकराल संकट आये है इन समय अंतराल में और जो संकट के बादल छाये रहते हैं आगे के लिए भी तो वह भी मानवता के सफल सञ्चालन के लिए ही जरूरी है और वह भी इस विश्व समाज और वैश्विक सामाजिक जीवन के अभिन्न अंग है। और आप लोग ही स्थानीय स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक मानवता के स्तर में गिरावट आ रही है उसके प्रति जबाब देह हैं न की समाज का वह वर्ग जिसके ऊपर आप की अंगुली हमेशा से उठी रहती थी और आज भी उठी रहती है। कोई आप के तथाकथित सामाजिक न्याय के पैमाने पर अंगुली उठता है तो आप बर्रे की तरह उस पर पिल पड़ते हैं और सवर्ण/ब्राह्मण समुदाय के कुछ कुत्ते भी उसी की टांग खिचाई में स्वार्थवास जुट जाते हैं जिस सवर्ण/ब्राह्मण वर्ग की नीव की ईंट ही अब बची हैं और केवल वही अब साम दाम दंड भेद के द्वारा प्रायोजित विदेशी सांस्कृतिक विस्तारवाद का जमकर मुकाबला कर रहा है और सदियों से इस साम दाम दंड भेद के द्वारा प्रायोजित विदेशी सांस्कृतिक विस्तारवाद का मुकाबला करने के नाते विदेशी शक्तियों के शीर्ष निशाने पर हमेशा रहा है। और जिस दिन यह नीव भी दल- दल में समा गयी तो फिर यह भारतीय समाज ही नहीं विश्वसमाज भी धरासायी हो जाएगा। अतः यह मत सोचिये की सवर्ण/ब्राह्मण समाज का नष्ट होना आपके या इस विश्व के हित में है जिससे की आप सुसंस्कृतिवान सामाजिक जीवन जीना शीखे हैं और सुसंस्कृतिवान होकर जी रहे हैं। दुनिया का कोई समाज बता दीजिये जहां पर कोई दलित और पिछड़ा न रहता हो? और मुझे वहां ले चलिए मैं आप को बताऊंगा की वहां कौन दलित और कौन पिछड़ा है?

15 वर्ष से एक वर्ग जिसकी बेटी सबसे नामीगिरामी विश्विद्यालय के नामीगिरामी विषय विशेष में प्रथम स्थान प्राप्तकर्ता और वह उनके दामाद के साथ तथाकथित महाविश्वशक्ति और उसके समकक्ष देश में जीवनरत/कार्यरत है और वह वर्ग जिसकी बहु उसी सबसे नामीगिरामी विश्विद्यालय के नामीगिरामी विषय विशेष में द्वितीय स्थान प्राप्तकर्ता और बहु और बेटे दोनों एक साथ तथाकथित महाविश्वशक्ति देश में जीवनरत/कार्यरत है, उस वर्ग को अब भी आरक्षण चाहिए तो यह क्या मजाक और क्या अंधा क़ानून है और अगर यह सामाजिक न्याय है तो फिर सामाजिक अन्याय क्या होगा?  अगर यह अंधा क़ानून जारी है और इसे मानवता का सफल सञ्चालन हेतु अनिवार्य आप लोग कहते हैं तो फिर वैश्विक समाज के ऊपर जो विकराल संकट आये है इन समय अंतराल में और जो संकट के बादल छाये रहते हैं आगे के लिए भी तो वह भी मानवता के सफल सञ्चालन के लिए ही जरूरी है और वह भी इस विश्व समाज और वैश्विक सामाजिक जीवन के अभिन्न अंग है। और आप लोग ही स्थानीय स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक मानवता के स्तर में  गिरावट आ रही है उसके प्रति जबाब देह हैं न की समाज का वह वर्ग जिसके ऊपर आप की अंगुली हमेशा से उठी रहती थी और आज भी उठी रहती है। कोई आप के तथाकथित सामाजिक न्याय के पैमाने पर अंगुली उठता है तो आप बर्रे की तरह उस पर पिल पड़ते हैं और सवर्ण/ब्राह्मण समुदाय के कुछ कुत्ते भी उसी की टांग खिचाई में स्वार्थवास जुट जाते हैं जिस सवर्ण/ब्राह्मण वर्ग की नीव की ईंट ही अब बची हैं और केवल वही अब साम दाम दंड भेद के द्वारा प्रायोजित विदेशी सांस्कृतिक विस्तारवाद का जमकर मुकाबला कर रहा है और सदियों से इस साम दाम दंड भेद के द्वारा प्रायोजित विदेशी सांस्कृतिक विस्तारवाद का मुकाबला करने के नाते विदेशी शक्तियों के शीर्ष निशाने पर हमेशा रहा है। और जिस दिन यह नीव भी दल- दल में समा गयी तो फिर यह भारतीय समाज ही नहीं विश्वसमाज भी धरासायी हो जाएगा। अतः यह मत सोचिये की सवर्ण/ब्राह्मण समाज का नष्ट होना आपके या इस विश्व के हित में है जिससे की आप सुसंस्कृतिवान सामाजिक जीवन जीना शीखे हैं और सुसंस्कृतिवान होकर जी रहे हैं। दुनिया का कोई समाज बता दीजिये जहां पर कोई दलित  और पिछड़ा न रहता हो?  और मुझे वहां ले चलिए मैं आप को बताऊंगा की वहां कौन दलित और कौन पिछड़ा है?    

Saturday, January 23, 2016

चाल, चरित्र और चेहरा में किसका सब अच्छा प्रदर्शन रहा इसे स्वयं नारायणन और उनके तथाकथित भतीजे सिम्हाद्री को अपनी अपराध शोध विद्या का प्रयोग करना चाहिए। मै तो मानता हूँ की किशी मित्र को अपनी स्वार्थपूर्ति और अपने विषय विशेष में अमर्यादित रूप से सम्मिलित कर उस समाज जिसमे वह विषयासक्त है के लिए संख्याबल बढ़ाने हेतु चरित्रहीन और पथभ्रमित(डी रेल =derail) करना मानवता के इतिहास में सबसे बड़ा अपराध है और इससे भुक्तभोगी ही नहीं वरन उससे जुड़े माता, पिता, रिस्तेदार, मित्र, भाई, बहन, सगे-सम्बन्धी, गुरु-गुरुकुल समेत, रास्त्र और यह सम्पूर्ण विश्व मानव समाज प्रभावित होता है और आज भारत समेत इस विश्व में एक समाज विशेष ऐसे डिरेलिंग का का कालाबाजार बहुत ज्यादा बढ़ा लिया है जिसको चिन्हित कर दण्ड देने का कार्य करना मानवता की रक्षा के लिए बहुत भी आवश्यक है। >>>>साहब डरता तो किशी से नहीं पर एक तथ्य से डर लगता है की कहीं मेरे लिए ब्रह्मा की मानवता रूपी खेती मेर लिए ही सूनी न हो जाय मतलब किशी समूह विशेष की मूर्खता से मेरे द्वारा या या मेरे लिए ही यह ब्रह्माण्ड जन शून्य/मानवता विहीन न हो जाय। इस चौदह वर्ष के दौरान मै इसे ही बचाता रहा की ब्रह्माण्ड जन शून्य/मानवता विहीनता मेरे द्वारा या मेरे लिए ही न हो जाए। पर मै तो उसपर कायम रहा पर नारायणन के तथाकथित भतीजे सिम्हाद्री और उनके राक्षस कुल ने जो किया वह अक्षम्य है मेरे द्वारा जिसे मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र/विल्वापत्र शिव और शिवा(पारवती/सती) का भोग्य/आहार/अरपणेय/अर्पण्य) पाण्डेय ब्राह्मण ताउजी डॉ प्रेमचंद(शिव) अपने सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) की कार्यपूर्ती यज्ञ में मेरा अर्पण कर दिए थे और उसमे मैंने पूर्व घटनाचक्र आयाम और उसके परिणाम को चेता स्वयं टप, बलिदान और त्याग किया था तो उसमे मै किशी को कैसे दण्ड दे सकता हूँ? इसका न्याय समाज को करना है की समाज को जो दृस्तिगोचर होता है उसी पर सामाजिक न्याय होगा या मेरे जैसे जिन अनगिनत अदृश्य लोगों के तप, बलिदान और त्याग से यह समाज चल रहा है उस अदृश्य शक्ति को ध्यानगत करते हुए और वर्तमान समाज दोनों को ध्यान में रखते हुए सामजिक न्याय होगा क्योंकि अदृश्य समाज के कार्यों में संख्याबल और दो दूनी चार लागू नहीं होता है।>>>>>> चाल, चरित्र और चेहरा में किसका सब अच्छा प्रदर्शन रहा इसे स्वयं नारायणन और सिम्हाद्री को अपनी अपराध शोध विद्या का प्रयोग करना चाहिए। मै तो मानता हूँ की किशी मित्र को अपनी स्वार्थपूर्ति और अपने विषय विशेष में अमर्यादित रूप से सम्मिलित कर उस समाज जिसमे वह विषयासक्त है के लिए संख्याबल बढ़ाने हेतु चरित्रहीन और पथभ्रमित(डी रेल =derail) करना मानवता के इतिहास में सबसे बड़ा अपराध है और इससे भुक्तभोगी ही नहीं वरन उससे जुड़े माता, पिता, रिस्तेदार, मित्र, भाई, बहन, सगे-सम्बन्धी, गुरु-गुरुकुल समेत, रास्त्र और यह सम्पूर्ण विश्व मानव समाज प्रभावित होता है और आज भारत समेत इस विश्व में एक समाज विशेष ऐसे डिरेलिंग का का कालाबाजार बहुत ज्यादा बढ़ा लिया है जिसको चिन्हित कर दण्ड देने का कार्य करना मानवता की रक्षा के लिए बहुत भी आवश्यक है।

चाल, चरित्र और चेहरा में किसका सब अच्छा प्रदर्शन रहा इसे स्वयं नारायणन और उनके तथाकथित भतीजे सिम्हाद्री को अपनी अपराध शोध विद्या का प्रयोग करना चाहिए। मै तो मानता हूँ की किशी मित्र को अपनी स्वार्थपूर्ति और अपने विषय विशेष में अमर्यादित रूप से सम्मिलित कर उस समाज जिसमे वह विषयासक्त है के लिए संख्याबल बढ़ाने हेतु चरित्रहीन और पथभ्रमित(डी रेल =derail) करना मानवता के इतिहास में सबसे बड़ा अपराध है और इससे भुक्तभोगी ही नहीं वरन उससे जुड़े माता, पिता, रिस्तेदार, मित्र, भाई, बहन, सगे-सम्बन्धी, गुरु-गुरुकुल समेत, रास्त्र और यह सम्पूर्ण विश्व मानव समाज प्रभावित होता है और आज भारत समेत इस विश्व में एक समाज विशेष ऐसे डिरेलिंग का का कालाबाजार बहुत ज्यादा बढ़ा लिया है जिसको चिन्हित कर दण्ड देने का कार्य करना मानवता की रक्षा के लिए बहुत भी आवश्यक है। >>>>साहब डरता तो किशी से नहीं पर एक तथ्य से डर लगता है की कहीं मेरे लिए ब्रह्मा की मानवता रूपी खेती मेर लिए ही सूनी न हो जाय मतलब किशी समूह विशेष की मूर्खता से मेरे द्वारा या या मेरे लिए ही यह ब्रह्माण्ड जन शून्य/मानवता विहीन न हो जाय। इस चौदह वर्ष के दौरान मै इसे ही बचाता रहा की ब्रह्माण्ड जन शून्य/मानवता विहीनता मेरे द्वारा या मेरे लिए ही न हो जाए। पर मै तो उसपर कायम रहा पर नारायणन के तथाकथित भतीजे सिम्हाद्री और उनके राक्षस कुल ने जो किया वह अक्षम्य है मेरे द्वारा जिसे मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र/विल्वापत्र शिव और शिवा(पारवती/सती) का भोग्य/आहार/अरपणेय/अर्पण्य) पाण्डेय ब्राह्मण ताउजी डॉ प्रेमचंद(शिव) अपने सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) की कार्यपूर्ती यज्ञ में मेरा अर्पण कर दिए थे और उसमे मैंने पूर्व घटनाचक्र आयाम और उसके परिणाम को चेता स्वयं टप, बलिदान और त्याग किया था तो उसमे मै किशी को कैसे दण्ड दे सकता हूँ? इसका न्याय समाज को करना है की समाज को जो दृस्तिगोचर होता है उसी पर सामाजिक न्याय होगा या मेरे जैसे जिन अनगिनत अदृश्य लोगों के तप, बलिदान और त्याग से यह समाज चल रहा है उस अदृश्य शक्ति को ध्यानगत करते हुए और वर्तमान समाज दोनों को ध्यान में रखते हुए सामजिक न्याय होगा क्योंकि अदृश्य समाज के कार्यों में संख्याबल और दो दूनी चार लागू नहीं होता है।>>>>>> चाल, चरित्र और चेहरा में किसका सब अच्छा प्रदर्शन रहा इसे स्वयं नारायणन और सिम्हाद्री को अपनी अपराध शोध विद्या का प्रयोग करना चाहिए। मै तो मानता हूँ की किशी मित्र को अपनी स्वार्थपूर्ति और अपने विषय विशेष में अमर्यादित रूप से सम्मिलित कर उस समाज जिसमे वह विषयासक्त है के लिए संख्याबल बढ़ाने हेतु चरित्रहीन और पथभ्रमित(डी रेल =derail) करना मानवता के इतिहास में सबसे बड़ा अपराध है और इससे भुक्तभोगी ही नहीं वरन उससे जुड़े माता, पिता, रिस्तेदार, मित्र, भाई, बहन, सगे-सम्बन्धी, गुरु-गुरुकुल समेत, रास्त्र और यह सम्पूर्ण विश्व मानव समाज प्रभावित होता है और आज भारत समेत इस विश्व में एक समाज विशेष ऐसे डिरेलिंग का का कालाबाजार बहुत ज्यादा बढ़ा लिया है जिसको चिन्हित कर दण्ड देने का कार्य करना मानवता की रक्षा के लिए बहुत भी आवश्यक है।

Wednesday, January 20, 2016

दुनिया में कहीं दूसरी जगह जाने पर परिवार खोजना पड़ता है पर काशी से प्रयाग आने पर मुझे 2001 मार्च में ही मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्धययन केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज पर नाना, मामा, ममेरे भाई, बड़े भैया/जीजा और सितम्बर तक छोटे मामा और छोटे सगोत्रीय (सावर्ण/कश्यप) भाई भी मिल गए थे। तो मेरा इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्धययन केंद्र को मेरा घर/परिवार/केंद्र कहना उस समय उचित क्यों नहीं था जो आज 14 वर्ष बाद साबित हुआ है। कारन यह की हम सभी उसी मनु/कश्यप ऋषि/दशरथ/वशुदेव की संतान हैं कहे जाते है और कहे जाएंगे जिनकी प्रेरणा से अन्य छः सप्तर्षि भी मानव जीवन /पारिवारिक जीवन जीने को प्रेरित हुए और यह श्रृंखला बन गयी है तो ऐसे में मेरा केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्धययन केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज को अपना परिवार कह देना उस समय अव्यवस्था फैला सकता था और ऐसा कहने पर आज भी अव्यवस्था फैल सकती है कभी भी और इसलिए मैं लोगों को पहचानते हुए शीधे कुछ नहीं कहता हूँ और आप से भी निवेदन करता हूँ की मानवता की अभीष्ट रक्षा में अगर सही बोलना बाधा हो तो उस सत्य को पी जाइये और व्यवहारिकता को ही सामने आने दीजिये। मै आप सभी को पहचानता हूँ पर आप सभी को अपने श्रेष्ठ कर्तव्य की तरफ प्रेरित करता हूँ और जीवन में जो विषपान आप व्यवस्था बनाने के लिए स्वयं कर रहे हैं उस व्यवस्था को कभी न मिटायें और न किशी अज्ञानी और दुस्ट को मिटाने की इजाजत दें और मेरा यहां तक मानना है की हो सके तो उसका प्रतिरोध भी करे जो आप से संभव हो। विशेषकर मै प्रयागराज-काशी-अयोध्या-मथुरा की संस्कृति को किशी भी कीमत पर बनाये रखने का पक्षधर हूँ और आज इस युग में मानवता का यही मूल केंद्र है विष्वमानवता को ऊर्जा दे रहा है जो अनवरत इस विश्व मानवता को ऊर्जा देता आ रहा है पर आज उसका स्पष्ट प्रकटीकरण हो चुका है जिसे पूरा विश्व देखा रहा है और साक्ष पा चुका है।

दुनिया में कहीं दूसरी जगह जाने पर परिवार खोजना पड़ता है पर काशी से प्रयाग आने पर मुझे 2001 मार्च में ही मुझे केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्धययन केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज पर नाना, मामा, ममेरे भाई, बड़े भैया/जीजा और सितम्बर तक छोटे मामा और छोटे सगोत्रीय (सावर्ण/कश्यप) भाई भी मिल गए थे। तो मेरा इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्धययन केंद्र को मेरा घर/परिवार/केंद्र कहना उस समय उचित क्यों नहीं था जो आज 14 वर्ष बाद साबित हुआ है। कारन यह की हम सभी उसी मनु/कश्यप ऋषि/दशरथ/वशुदेव की संतान हैं कहे जाते है और कहे जाएंगे जिनकी प्रेरणा से अन्य छः सप्तर्षि भी मानव जीवन /पारिवारिक जीवन जीने को प्रेरित हुए और यह श्रृंखला बन गयी है तो ऐसे में मेरा केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्धययन केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज को अपना परिवार कह देना उस समय अव्यवस्था फैला सकता था और ऐसा कहने पर आज भी अव्यवस्था फैल सकती है कभी भी और इसलिए मैं लोगों को पहचानते हुए शीधे कुछ नहीं कहता हूँ और आप से भी निवेदन करता हूँ की मानवता की अभीष्ट रक्षा में अगर सही बोलना बाधा हो तो उस सत्य को पी जाइये और व्यवहारिकता को ही सामने आने दीजिये। मै आप सभी को पहचानता हूँ पर आप सभी को अपने श्रेष्ठ कर्तव्य की तरफ प्रेरित करता हूँ और जीवन में जो विषपान आप व्यवस्था बनाने के लिए स्वयं कर रहे हैं उस व्यवस्था को कभी न मिटायें और न किशी अज्ञानी और दुस्ट को मिटाने की इजाजत दें और मेरा यहां तक मानना है की हो सके तो उसका प्रतिरोध भी करे जो आप से संभव हो। विशेषकर मै प्रयागराज-काशी-अयोध्या-मथुरा की संस्कृति को किशी भी कीमत पर बनाये रखने का पक्षधर हूँ और आज इस युग में मानवता का यही मूल केंद्र है विष्वमानवता को ऊर्जा दे रहा है जो अनवरत इस विश्व मानवता को ऊर्जा देता आ रहा है पर आज उसका स्पष्ट प्रकटीकरण हो चुका है जिसे पूरा विश्व देखा रहा है और साक्ष पा चुका है। 

Tuesday, January 19, 2016

Note: खुदा का लाख-लाख शुक्र है की बेटा अभी तक तू ज़िंदा है नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर अगस्त/ सितम्बर, 2008 में यह जिस फकीर बाबा की आवाज थी उसमे कितना स्नेह और वात्सल्य छुपा था, तो समझ लीजिये की मैंने ऐसे नहीं कहा था की श्रीराम के समानांतर चलने वाला इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर चलने वाला ईसाइयत दोनों उस स्थिति से हतप्रभ हो गए थे जब श्रीरामकृष्ण मतलब शिवरामकृष्ण मतलब रामकृष्ण मतलब राम के विलुप्त होने की अवस्था आ गयी थी और जिसके होते ही इस्लाम और ईसाईयत समेत सम्पूर्ण मानव समाज समाप्त होने वाला था, तो उस फकीर बाबा तक मेरी आवाज पंहुच रही हो तो मै उनसे कहना चाहूँगा की मेरा कार्यकाल 1957 से प्रारम्भ हुआ था और 2057 तक रहेगा और यह मेरी तीन पीढ़ी की सम्पूर्ण शक्ति मेरी आने वाली पीढ़ी में सम्मिलित हो चुकी है मेरे वंसज के विष्णुकांत और कृष्णकांत(स्वयं में सशरीर परमब्रह्म=विष्णु+ब्रह्मा+महेश=स्वयं में श्रीरामकृष्ण मतलब शिवरामकृष्ण मतलब रामकृष्ण मतलब पूर्णपद राम) ) के रूप में। तो यह दुनिया चल रही है तो निश्चित है की ब्रह्मा, विष्णु और महेश दृस्तिगोचर भले नहीं हों व्यक्तिगत रूप में जिनका एक निकाय से दूसरे निकाय में स्थानांतरण होता रहता है पर श्रीरामकृष्ण मतलब शिवरामकृष्ण मतलब रामकृष्ण मतलब राम मतलब सशरीर परमब्रह्म अवश्य हमारे विश्व मानव समाज में किशी न किशी रूप में अवश्य प्रस्तुत रहते है और तभी सभी जाति/धर्म में जीवन संचार सुचारू रूप से जारी है इसे कोई नकार नहीं सकता है जिनके जीवन मानकों (जलवायवीय तथ्य और कर्तव्य मूलक तथ्य का समरस अमृत) का मानव समूह द्वारा अपने जीवन में उल्लंघन और उसका परिणाम इसकी पुस्टी करता है।

खुदा का लाख-लाख शुक्र है की बेटा अभी तक तू ज़िंदा है नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर अगस्त/ सितम्बर, 2008 में यह जिस फकीर बाबा की आवाज थी उसमे कितना स्नेह और वात्सल्य छुपा था, तो समझ लीजिये की मैंने ऐसे नहीं कहा था की श्रीराम के समानांतर चलने वाला इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर चलने वाला ईसाइयत दोनों उस स्थिति से हतप्रभ हो गए थे जब श्रीरामकृष्ण मतलब शिवरामकृष्ण मतलब रामकृष्ण मतलब राम के विलुप्त होने की अवस्था आ गयी थी और जिसके होते ही इस्लाम और ईसाईयत समेत सम्पूर्ण मानव समाज समाप्त होने वाला था, तो उस फकीर बाबा तक मेरी आवाज पंहुच रही हो तो मै उनसे कहना चाहूँगा की मेरा कार्यकाल 1957 से प्रारम्भ हुआ था और 2057 तक रहेगा और यह मेरी तीन पीढ़ी की सम्पूर्ण शक्ति मेरी आने वाली पीढ़ी में सम्मिलित हो चुकी है मेरे वंसज के विष्णुकांत और कृष्णकांत(स्वयं में सशरीर परमब्रह्म=विष्णु+ब्रह्मा+महेश=स्वयं में श्रीरामकृष्ण मतलब शिवरामकृष्ण मतलब रामकृष्ण मतलब पूर्णपद राम) ) के रूप में। तो यह दुनिया चल रही है तो निश्चित है की ब्रह्मा, विष्णु और महेश दृस्तिगोचर भले नहीं हों व्यक्तिगत रूप में जिनका एक निकाय से दूसरे निकाय में स्थानांतरण होता रहता है पर श्रीरामकृष्ण मतलब शिवरामकृष्ण मतलब रामकृष्ण मतलब राम मतलब सशरीर परमब्रह्म अवश्य हमारे विश्व मानव समाज में किशी न किशी रूप में अवश्य प्रस्तुत रहते है और तभी सभी जाति/धर्म में जीवन संचार सुचारू रूप से जारी है इसे कोई नकार नहीं सकता है जिनके जीवन मानकों (जलवायवीय तथ्य और कर्तव्य मूलक तथ्य का समरस अमृत) का मानव समूह द्वारा अपने जीवन में उल्लंघन और उसका परिणाम इसकी पुस्टी करता है।

Monday, January 18, 2016

गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: | गुरुर्साक्षात परब्रम्ह तस्मै श्री गुरवे नम :|| ध्यानमुलं गुरुर्मुति पूजामूलं गुरो: पदम् | मंत्रमूलं गुरुर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो: कृपा || अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् | तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम: || त्वमेव माता च पिता त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव | त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव सर्व मम देव देव || ब्रम्हानंद परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति| द्वंदातीतं गगनसदृशं तत्वंमस्यादिलक्ष्यम् | एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधिसाक्षिभूतं| भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि || ‘ॐ सहनाववतु ... सहनौ भुनक्तु ....सहवीर्य करवावहै...| तेजस्विनावधीतमस्तु... मा विद्विषावहै....ॐ शांति...शांति... शांति: |’ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमदुच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पुर्नेवावशिष्यते ||

गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: | गुरुर्साक्षात परब्रम्ह तस्मै श्री गुरवे नम :|| ध्यानमुलं गुरुर्मुति पूजामूलं गुरो: पदम् | मंत्रमूलं गुरुर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो: कृपा || अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् | तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम: || त्वमेव माता च पिता त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव | त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव सर्व मम देव देव || ब्रम्हानंद परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति| द्वंदातीतं गगनसदृशं तत्वंमस्यादिलक्ष्यम् | एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधिसाक्षिभूतं| भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि || ‘ॐ सहनाववतु ... सहनौ भुनक्तु ....सहवीर्य करवावहै...| तेजस्विनावधीतमस्तु... मा विद्विषावहै....ॐ शांति...शांति... शांति: |’ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमदुच्यते | पूर्णस्य पूर्णमादाय पुर्नेवावशिष्यते ||

त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ गुरु (श्रेष्ठ मानवीय आचरण से युक्त ज्ञान और उससे अर्जित ज्ञानदाता पद) सम्पूर्ण वैभव युक्त विष्णु हैं (देवों के गुरु, बृहस्पति देव के समान और इसलिए असली गुरु बृहस्पति, विष्णु को ही मानते हैं) , सर्वश्रेष्ठ आचार्य(अपने शोध व् अनुसंधान ज्ञान से अर्जित ज्ञान से प्राप्त ज्ञानदाता पद) शक्ति के पुंज शिव हैं और सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता(ज्ञान के स्वयंनिहित स्रोत) ब्रह्मा है जिनसे ब्रह्म ज्ञान की संज्ञा का भाव लिया जाता है।

त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ गुरु (श्रेष्ठ मानवीय आचरण से युक्त ज्ञान और उससे अर्जित ज्ञानदाता पद) सम्पूर्ण वैभव युक्त विष्णु हैं (देवों के गुरु, बृहस्पति देव के समान और इसलिए असली गुरु बृहस्पति, विष्णु को ही मानते हैं) , सर्वश्रेष्ठ आचार्य(अपने शोध व् अनुसंधान ज्ञान से अर्जित ज्ञान से प्राप्त ज्ञानदाता पद) शक्ति के पुंज शिव हैं और सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता(ज्ञान के स्वयंनिहित स्रोत) ब्रह्मा है जिनसे ब्रह्म ज्ञान की संज्ञा का भाव लिया जाता है।

If nothing happen by seeing one, then what happen by writing which must needed a medium of seeing and the ability to feel something for happening>>>>I has not written a single word and article before I was not completed the work assigned for me from 2001 to 11/18th September, 2007 and after this writing of article was my business(this is because, what a bad words not used for me and what bad was not done that was possible by the company of real culprit and writing of the article i.e. creation of history for the work carried out for the people was only way to defeat them)>>>> तथाकथित विश्वमहाशक्ति वालों असली गुनाहगार/दोषी और उसका उचित दंड घोषित कीजिये और वास्तविक विश्वमहाशक्ति द्वारा आरक्षण रहित भारत और विश्व पाइए(वास्तविक गुनाहगार/दोषी व्यक्ति को ही इस मारीचकीय छद्म प्रकासन पर आपत्ति होनी चाहिए या जो इस मारीचकीय छद्म प्रकासन पर आपत्ति कर रहा वह ही असली गुनाहगार/दोषी है):

 If nothing happen by seeing one, then what happen by writing which must needed a medium of seeing and the ability to feel something for happening>>>>I has not written a single word and article before I was not completed the work assigned for me from 2001 to 11/18th September, 2007 and after this writing of article was my business(this is because,  what a bad words not used for me and what bad was not done that was possible by the company of real culprit and writing of the article i.e. creation of history for the work carried out for the people was only way to defeat them)>>>> तथाकथित विश्वमहाशक्ति वालों असली गुनाहगार/दोषी और उसका उचित दंड घोषित कीजिये और वास्तविक विश्वमहाशक्ति द्वारा आरक्षण रहित भारत और विश्व पाइए(वास्तविक गुनाहगार/दोषी व्यक्ति को ही इस मारीचकीय छद्म प्रकासन पर आपत्ति होनी चाहिए या जो इस मारीचकीय छद्म प्रकासन पर आपत्ति कर रहा वह ही असली गुनाहगार/दोषी है): 

जिस मंगल और रवि में तीन तीन शुक्र और दो सोम (चन्द्र) और बुद्ध और शुक्र को आसमान की ऊंचाइयां दी हो तो आप सोच सकते हैं की वह मंगल और रवि बिना बृहस्पति और शनि के प्रभाव के किया होगा क्या?

जिस मंगल और रवि में तीन तीन शुक्र और दो सोम (चन्द्र) और बुद्ध और शुक्र को आसमान की ऊंचाइयां दी हो तो आप सोच सकते हैं की वह मंगल और रवि बिना बृहस्पति और शनि के प्रभाव के किया होगा क्या?

जब एक सोम(चन्द्र) और बुद्ध का अधिकार एक सोम और शुक्र तथा एक शुक्र और शुक्र स्वयं ले रहे हों तो उसके पास ऋण के सिवा बचता ही क्या है? और वह ऋण स्वयं धन क्यों बना हुआ विश्व विजय कर था यह तो मंगल और रवि की महिमा समझने वाले समझ सकते हैं?

जब एक सोम(चन्द्र) और बुद्ध  का अधिकार एक सोम और शुक्र तथा एक शुक्र और शुक्र स्वयं ले रहे हों तो  उसके पास ऋण के सिवा बचता ही क्या है? और वह ऋण स्वयं धन क्यों बना हुआ विश्व विजय कर था यह तो मंगल और रवि की महिमा समझने वाले समझ सकते हैं?

आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर सबसे पिछड़े को आरक्षण यदि होना चाहिए तो केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय में यह किसको मिलना चाहिए यह सबसे पहले तय होना चाहिए ? जाहिर सी बात सिद्ध होगी की यह मुझे मिलना चाहिए पर अगर मुझे मिलना चाहिए तो यह आरक्षण लेना मेरे लिए धिक्कार होगा। और अगर लेता हूँ तो फिर लोग वे तड़प-तड़प कर मर जाएंगे जो मेरा अधिकार खाकर डकार गए और सुरक्षति विकल्प भी मुझे नहीं दे पाये। ऐसा तो रावण तथा भस्मासुर भी नहीं कर पाये थे क्रमसः मलय देश(तमिल-केरल- तेलगू ) स्थित सप्तर्षि समूह की सम्मिलित संतान कुम्भज/अगस्त्य ऋषी के चातुर्य और सीता के सतीत्व से, तथा विष्णु और ब्रह्मा के प्रयास से। अब तो कम से कम तमिल और आंध्र जो अगस्त्य(कुम्भज) तथा विष्णु और ब्रह्मा का भी दायित्व न निभा सके शांत हो चुपचाप सप्तर्षियों को सुने और प्रश्न न करें।

आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर सबसे पिछड़े को आरक्षण यदि होना चाहिए तो केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय में यह किसको मिलना चाहिए यह सबसे पहले तय होना चाहिए ?  जाहिर सी बात सिद्ध होगी की यह मुझे मिलना चाहिए पर अगर मुझे मिलना चाहिए तो यह आरक्षण लेना मेरे लिए धिक्कार होगा। और अगर लेता हूँ तो फिर लोग वे तड़प-तड़प कर मर जाएंगे जो मेरा अधिकार खाकर डकार गए और सुरक्षति विकल्प भी मुझे नहीं दे पाये। ऐसा तो रावण तथा भस्मासुर भी नहीं कर पाये थे क्रमसः मलय देश(तमिल-केरल- तेलगू ) स्थित सप्तर्षि समूह की सम्मिलित संतान कुम्भज/अगस्त्य ऋषी के चातुर्य और सीता के सतीत्व से, तथा विष्णु और ब्रह्मा के प्रयास से।  अब तो कम से कम तमिल और आंध्र जो अगस्त्य(कुम्भज) तथा विष्णु और ब्रह्मा का भी दायित्व न निभा सके शांत हो चुपचाप सप्तर्षियों को सुने और प्रश्न न करें।

Sunday, January 17, 2016

If nothing happen by seeing one, then what happen by writing which must needed a medium of seeing and the ability to feel something for happening>>>>I has not written a single word and article before I was not completed the work assigned for me from 2001 to 11/18th September, 2007 and after this writing of article was my business(this is because, what a bad words not used for me and what bad was not done that was possible by the company of real culprit and writing of the article i.e. creation of history for the work carried out for the people was only way to defeat them)>>>> तथाकथित विश्वमहाशक्ति वालों असली गुनाहगार/दोषी और उसका उचित दंड घोषित कीजिये और वास्तविक विश्वमहाशक्ति द्वारा आरक्षण रहित भारत और विश्व पाइए(वास्तविक गुनाहगार/दोषी व्यक्ति को ही इस मारीचकीय छद्म प्रकासन पर आपत्ति होनी चाहिए या जो इस मारीचकीय छद्म प्रकासन पर आपत्ति कर रहा वह ही असली गुनाहगार/दोषी है):

If nothing happen by seeing one, then what happen by writing which must needed a medium of seeing and the ability to feel something for happening>>>>I has not written a single word and article before I was not completed the work assigned for me from 2001 to 11/18th September, 2007 and after this writing of article was my business(this is because, what a bad words not used for me and what bad was not done that was possible by the company of real culprit and writing of the article i.e. creation of history for the work carried out for the people was only way to defeat them)>>>> तथाकथित विश्वमहाशक्ति वालों असली गुनाहगार/दोषी और उसका उचित दंड घोषित कीजिये और वास्तविक विश्वमहाशक्ति द्वारा आरक्षण रहित भारत और विश्व पाइए(वास्तविक गुनाहगार/दोषी व्यक्ति को ही इस मारीचकीय छद्म प्रकासन पर आपत्ति होनी चाहिए या जो इस मारीचकीय छद्म प्रकासन पर आपत्ति कर रहा वह ही असली गुनाहगार/दोषी है):
http://wpedia.goo.ne.jp/enwiki/User:Vivek_Kumar_Pandey
https://archive.is/b8N8l
https://archive.is/4HDpi
http://www.vbprofiles.com/people/dr-vivek-kumar-pandey-ph-d-3e1429c09e597c100769274f
http://prabook.org/web/person-view.html?profileId=116713

Thursday, January 14, 2016

हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर(गौरवर्णीय) आर्य और जामवंत(कृष्णकाय) द्रविण की राजनीति ही भारत का और इस प्रकार विश्व का बंटाधार कर रही है। जबकि केवल कटु सत्य ही नही वरन प्रगतिशील सच्चाई का प्रतिपालक आर्य और द्रविण:तत्व:माया मतलब धनसंपदा का प्रतिपालक ही द्रविण है।

हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर(गौरवर्णीय)  आर्य और जामवंत(कृष्णकाय) द्रविण की राजनीति ही भारत का और इस प्रकार विश्व का बंटाधार कर रही है। जबकि केवल कटु सत्य ही नही वरन प्रगतिशील सच्चाई का प्रतिपालक आर्य और द्रविण:तत्व:माया मतलब धनसंपदा का प्रतिपालक ही द्रविण है। 

भारतवर्ष को सम्पूर्ण विश्व को मानवीय संसाधन का अनादि अनवरत निर्याता देश होने की पुष्टि करने वाला स्रोत है भारत में जाती/धर्म आधारित शिक्षापद, निःशुल्क संसाधन, सेवापद में आरक्षण न की पद दलित व्यवस्था समाप्ति हेतु है: 20 वर्ष के अनुभव के आधार पर मै आज कह सकता हूँ की भारत में आरक्षण की व्यवस्था का लाभ विदेश के लिए और विदेशी मानसिकता का रोग पाले लोगों के लिए हितकर है न की आम भारतीय समाज व्यवस्था के लिए और पद दलित व्यवस्था समाप्ति हेतु है। कारन यह की जिसने इसका लाभ लिया है और जो ले रहा है वही मेरे जैसा नया पद दलित तैयार कर रहा था/है जिसका कि इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हूँ विदेशी मानसिकता से सरोबोर नारायणन के तथाकथित भतीजे सिम्हाद्री और उनके द्वारा विदेशी इसारे पर की गयी घृणित तानाशाही और प्रतिशोध भरी मानसिकता का मुझ पर प्रथम प्रहार, जिसका परिणाम है यह बदला हुआ और ठगा-ठगा हुआ मानव समाज जिसमें सबको यही लगता है की मुझे किशी अपने ने ही ठगा है वह चाहे पद दलित हो या सर्व संपन्न। तो आरक्षण से शक्ति लीजिये और मुझ पर वार कीजिये देखिये विदेश और विदेशी मानसिकता का रोग पाले लोगों का समर्थन आप को अवश्य मिलेगा और उससे विदेशियो का नाश होगा और परिणाम स्वरुप आप का भी नाश होगा और इस प्रकार मानव समाज का नाश होगा।

भारतवर्ष को सम्पूर्ण विश्व को मानवीय संसाधन का अनादि अनवरत निर्याता देश होने की पुष्टि करने वाला स्रोत है भारत में जाती/धर्म आधारित शिक्षापद, निःशुल्क संसाधन, सेवापद  में आरक्षण न की पद दलित व्यवस्था समाप्ति हेतु है:  20 वर्ष के अनुभव के आधार पर मै आज कह सकता हूँ की भारत में आरक्षण की व्यवस्था का लाभ विदेश के लिए और विदेशी मानसिकता का रोग पाले लोगों के लिए हितकर है न की आम भारतीय समाज व्यवस्था के लिए और पद दलित व्यवस्था समाप्ति हेतु है। कारन यह की जिसने इसका लाभ लिया है और जो ले रहा है वही मेरे जैसा नया पद दलित तैयार कर रहा था/है जिसका कि इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हूँ विदेशी मानसिकता से सरोबोर नारायणन के तथाकथित भतीजे सिम्हाद्री और उनके द्वारा विदेशी इसारे पर की गयी घृणित तानाशाही और प्रतिशोध भरी मानसिकता का  मुझ पर प्रथम प्रहार, जिसका परिणाम है यह बदला हुआ और ठगा-ठगा हुआ मानव समाज जिसमें सबको यही लगता है की मुझे किशी अपने ने ही ठगा है वह चाहे पद दलित हो या सर्व संपन्न। तो आरक्षण से शक्ति लीजिये और मुझ पर वार कीजिये देखिये विदेश और विदेशी मानसिकता का रोग पाले लोगों का समर्थन आप को अवश्य मिलेगा और उससे विदेशियो का नाश होगा और परिणाम स्वरुप आप का भी नाश होगा और इस प्रकार मानव समाज का नाश होगा। 

Wednesday, January 13, 2016

आप अपने प्रतिशोध, मदांधता और राक्षसवृत्ति वाली राजनीती के तहत पाण्डेय को पाण्डेय से प्रतिस्थापित करने की मानसिकता छोड़ दीजिये और यह सोचिये की असत्य और अन्याय तो हमने कर दिया किशी का वास्तविक घर बर्बाद करके अपने स्वार्थ सिद्धि में पर उसके घर का प्रतीक को भी बर्बाद कर महा असत्य और महा अन्याय न करें अन्यथा आप जानें, आप का पुरुषार्थ जाने और यह संसार जाने और संसार की होने वाली पीढ़ी जाने?

आप अपने प्रतिशोध, मदांधता और राक्षसवृत्ति वाली राजनीती के तहत पाण्डेय को पाण्डेय से प्रतिस्थापित करने की  मानसिकता छोड़ दीजिये और यह सोचिये की असत्य और अन्याय तो हमने कर दिया किशी का वास्तविक घर बर्बाद करके अपने स्वार्थ सिद्धि में पर उसके घर का प्रतीक को भी बर्बाद कर महा असत्य और महा अन्याय न करें अन्यथा आप जानें, आप का पुरुषार्थ जाने और यह संसार जाने और संसार की होने वाली पीढ़ी जाने?


हर व्यक्ति का प्रयोग और उसके अनेकोनेंक प्रकार हैं लेकिन किशी विशेष व्यक्तित्व(धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और आधुनिक महत्त्व के) का प्रयोग हो जाए जो बहुत बड़ा महत्वाकांछी और तदनुरूप आचरण और गूढ़-अगूढ़ (प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जैसे हम सब मानवमात्र है तो यह निश्चित है की सब मौलिक रूप से बराबर है यह प्रत्यक्ष न्याय और प्रत्यक्ष पुरुषार्थ है पर जो हमारी अपनी आनुवंशिक और पारिस्थितिकीय पहचान है वह अप्रत्क्ष न्याय और अप्रत्यक्ष पुरुषार्थ है) पुरुषार्थ वाला रहा हो तो फिर तो वह परिवर्तन उसी प्रयोग के दौरान ही होगा जाएगा समाज में जो उसके जीवनकाल में होना था।>>>>>माध्यमिक से लेकर स्नातक की कक्षा के दौरान मै अपने पिता जी की मानसिक अवसाद की स्थिति को दूर करने हेतु यत्न में परामर्श हेतु जिस परिचित डॉ साहब(एक अग्रज सहपाठिनी जो स्वयं इस समय डॉ हैं और प्रयागराज में ही है उनके बड़े भाई साहब) के पास जाता था स्नातक के अंतिम दिनों में उनका कहना था की तुम ज्यादा परेशान न हो अपनी पढ़ाई करो प्रदीप जी जिस अवस्था में हैं उनका उसी अवस्था में उपयोग है और वह हो रहा है वह इतना मै कर सकता हूँ की तुम लोगों और उनको कोई परेसानी नहीं होगी केवल नुस्खे अनुसार दवा प्रयोग करते रहना। >>>>यही मुझ जैसे व्यक्ति के उपयोग की बात भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में 2007 में ही मेरे प्रवेश करने दो माह के दौरान वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र के एक छोटे राजा भैया ने कही जो वायुमंडलीय विज्ञानं में मॉडलिंग में शोध किये थे बाद में और स्नातक संगणक विज्ञान में थे। तो मैं अगर उपयोग में लाया गया था तो कौन लोग लाये थे? और वह कार्य हुआ है की नहीं तो मै जनता हूँ की वह कार्य हो चुका है और कौन लोग लाये थे यह भी पता है और यह भी पता है की उसमे से कुछ लोग हुए कार्य का श्रेय केवल स्वयं और अपने चहेतों को दे चुके हैं और दे भी रहे हैं। लेकिन मै अति आनंद महसूस करता हूँ इतना जानकर की कार्य हो गया है वह भी जो विष्वमानवता कल्याण का अदृश्य कार्य था और वह भी जो भौतिक रूप में वर्तमान में मौजूद है लोगों को अपनी हकदारी दिखाने का वह भी। विश्व मानवता हेतु जिनका उपयोग हुआ है 10 वर्ष अंतराल अनुसार आयुवर्ष 80 वर्ष, 70 वर्ष, 60 वर्ष, 50 वर्ष, 40 वर्ष में तो इसमे मै 80 वर्ष, 60 वर्ष और 40 वर्ष स्वयं था/हूँ। और मै वह अनुभूतिकरण व् विमोचक यन्त्र था जिसको 2001 में अनुभव हुआ की गंगा, जमुना लगी आग केवल उनकी स्वयं की आग नहीं वरन वह सम्पूर्ण विश्व की नदियों में लगी आग थी और जिसका विमोचन यह है की वह आग अब शांत हो गयी है यह सहस्राब्दी समयांतराल के विष्वमानवता इतिहास का यह 2000 से लेकर 2015 तक का 14 वर्ष का इतिहास एक विशेष अध्यायः होगा जिसमे में कोई भी असावधानी वाला पल मानवता की गाड़ी को पटरी से उतार सकती थी और इस लिए यह 14 वर्ष सहस्राब्दी समयांतराल के विष्वमानवता इतिहास का विशेष अध्याय होगा।

हर व्यक्ति का प्रयोग और उसके अनेकोनेंक प्रकार हैं लेकिन किशी विशेष व्यक्तित्व(धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और आधुनिक महत्त्व के) का प्रयोग हो जाए जो बहुत बड़ा महत्वाकांछी और तदनुरूप आचरण और गूढ़-अगूढ़ (प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जैसे हम सब मानवमात्र है तो यह निश्चित है की सब मौलिक रूप से बराबर है यह प्रत्यक्ष न्याय और प्रत्यक्ष पुरुषार्थ है पर जो हमारी अपनी आनुवंशिक और पारिस्थितिकीय पहचान है वह अप्रत्क्ष न्याय और अप्रत्यक्ष पुरुषार्थ है) पुरुषार्थ वाला रहा हो तो फिर तो वह परिवर्तन उसी प्रयोग के दौरान ही होगा जाएगा समाज में जो उसके जीवनकाल में होना था।>>>>>माध्यमिक से लेकर स्नातक की कक्षा के दौरान मै अपने पिता जी की मानसिक अवसाद की स्थिति को दूर करने हेतु यत्न में परामर्श हेतु जिस परिचित डॉ साहब(एक अग्रज सहपाठिनी जो स्वयं इस समय डॉ हैं और प्रयागराज में ही है उनके बड़े भाई साहब) के पास जाता था स्नातक के अंतिम दिनों में उनका कहना था की तुम ज्यादा परेशान न हो अपनी पढ़ाई करो प्रदीप जी जिस अवस्था में हैं उनका उसी अवस्था में उपयोग है और वह हो रहा है वह इतना मै कर सकता हूँ की तुम लोगों और उनको कोई परेसानी नहीं होगी केवल नुस्खे अनुसार दवा प्रयोग करते रहना। >>>>यही मुझ जैसे व्यक्ति के उपयोग की बात भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर में 2007 में ही मेरे प्रवेश करने दो माह के दौरान वायुमंडलीय एवं महासागरीय विज्ञान केंद्र के एक छोटे राजा भैया ने कही जो वायुमंडलीय विज्ञानं में मॉडलिंग में शोध किये थे बाद में और स्नातक संगणक विज्ञान में थे। तो मैं अगर उपयोग में लाया गया था तो कौन लोग लाये थे? और वह कार्य हुआ है की नहीं तो मै जनता हूँ की वह कार्य हो चुका है और कौन लोग लाये थे यह भी पता है और यह भी पता है की उसमे से कुछ लोग हुए कार्य का श्रेय केवल स्वयं और अपने चहेतों को दे चुके हैं और दे भी रहे हैं। लेकिन मै अति आनंद महसूस करता हूँ इतना जानकर की कार्य हो गया है वह भी जो विष्वमानवता कल्याण का अदृश्य कार्य था और वह भी जो भौतिक रूप में वर्तमान में मौजूद है लोगों को अपनी हकदारी दिखाने का वह भी। विश्व मानवता हेतु जिनका उपयोग हुआ है 10 वर्ष अंतराल अनुसार आयुवर्ष 80 वर्ष, 70 वर्ष, 60 वर्ष, 50 वर्ष, 40 वर्ष में तो इसमे मै 80 वर्ष, 60 वर्ष और 40 वर्ष स्वयं था/हूँ। और मै वह अनुभूतिकरण व् विमोचक यन्त्र था जिसको 2001 में अनुभव हुआ की गंगा, जमुना लगी आग केवल उनकी स्वयं की आग नहीं वरन वह सम्पूर्ण विश्व की नदियों में लगी आग थी और जिसका विमोचन यह है की वह आग अब शांत हो गयी है यह सहस्राब्दी समयांतराल के विष्वमानवता इतिहास का यह 2000 से लेकर 2015 तक का 14 वर्ष का इतिहास एक विशेष अध्यायः होगा जिसमे में कोई भी असावधानी वाला पल मानवता की गाड़ी को पटरी से उतार सकती थी और इस लिए यह 14 वर्ष सहस्राब्दी समयांतराल के विष्वमानवता इतिहास का विशेष अध्याय होगा।

Tuesday, January 12, 2016

इससे ज्यादा क्या कहूँ की डॉन(भगवा:सत्यमेव जयते) भी मै हूँ और ॐ भी मै था/हूँ और आगे भी रहूँगा। >>>>बड़े भाई साहब आप विवाहित थे और जिन परिस्थियों को बिना किशी निकाय में स्थायित्व और बिना किशी समर्थन को सामाजिक रूप से झेला हूँ उसे वही समझ सकता है जिसकी परिस्थिति मेरी जैसी रही हो और वह विश्व्विनाश की लीला को भांपते हुए उसे संरचनात्मक मोड़ देने के लिए मानवता इतिहास में कार्य किया हो। आप उस दृतिगत कार्य को कर रहे थे अपने समूह के साथ जो सहज रूप से हर एक श्रेष्ठ और पदासीन व्यक्ति के जीवन में सहज रूप से आता है और जिसे लोग जानते हुए आप और आप और आप के समूह को दे रहे थे पर मै आजीवन अखंड ब्रह्मचर्य, विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन उस कार्य को कर रहा था जो आप समेत इस विश्व का कोई देख नहीं रहा था और मुझे ही अनुभव हो रहा था और यह भी की जो मेरे सिवा कोई कर नहीं सकता था वह कार्य चाहे आप रहे हों या आप का समूह सभी या दुनिया का कोई अन्य व्यक्ति भी तथाकथित विश्वमहाशक्ति से ही क्यों न रहा हो या हो या होगा : मानव जगत के जीवन के सभी मानको समय और सभी परिस्थियों के अनुकूल मैंने अपने स्वयं के परिवार से लेकर विश्व्जगत और सम्बन्धियों को उनके सभी प्रश्नों के जबाब दे दिए हैं पर जो "जागते हुए सोता है" या "समझते हुए नहीं समझता है" उसको स्वयं सच्चिदानंद परमब्रह्म अगर निराकार हो सकता हो इस जगत में तो वे भी नहीं समझा सकते है उसे मै विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/महाशिव क्या समझा सकता हूँ जिसमे न चाहते हुए भी सांसारिकता का कुछ न कुछ अंश जरूर है । पर इतना जरूर कहूँगा की जिस समय जो किया हूँ वायुमंडलीय एवं महासागरीय ज्ञान के अलावा वह विश्व के सबसे तेज सोच सकने वाले से ज्यादा सोच कर किया हूँ तत्कालीन परिस्थितिओं के अनुकूल जिससे की विष्वमानवता को दीर्घकालित लाभ ज्यादा से ज्यादा हो और उसका नियंत्रण सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर तत्कालीन रूप से सभव हो।>>>>मेरा तो कोई समूह नहीं रहा है मई जो किया उसका जबाब दिया हूँ पर मेरे स्वयं के परिवार से लेकर विश्व्जगत और मेरे सम्बन्धि व् सुभेक्षुजन अपने समूह के साथ कार्य किये है तो वे अपने समूह की उपलब्धियों, खामियों और असत्य आचरण और समाज पर उसके अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव को अक्षरसह जबाब दें अब मै प्रश्न करूंगा और उसके बाद उनको जो संदेह और अकाट्य प्रमाण उपलब्ध हो उसका जबाब मै अकेले काम का अकेले दूंगा। अन्यथा मेरे स्वयं के परिवार से लेकर विश्व्जगत और मेरे सम्बन्धि व् सुभेक्षुजन अपने समूह सहित अपने कार्यों की स्वयं समीक्षा कर मेरे प्रति उनका कितना अनुराग, वात्सल्य व् प्रेम सहयोग, संरक्षण और संपोषण रहा और उसके प्रति और विश्वसमाज के प्रति मेरा क्या त्याग, बलिदान, तप और समर्पण रहा? और अगर मै किशी एक के साथ अन्याय किया हूँ तो वह बता दे।

इससे ज्यादा क्या कहूँ की डॉन(भगवा:सत्यमेव जयते) भी मै हूँ और ॐ भी मै था/हूँ और आगे भी रहूँगा। >>>>बड़े भाई साहब आप विवाहित थे और जिन परिस्थियों को बिना किशी निकाय में स्थायित्व और बिना किशी समर्थन को सामाजिक रूप से झेला हूँ उसे वही समझ सकता है जिसकी परिस्थिति मेरी जैसी रही हो और वह विश्व्विनाश की लीला को भांपते हुए उसे संरचनात्मक मोड़ देने के लिए मानवता इतिहास में कार्य किया हो। आप उस दृतिगत कार्य को कर रहे थे अपने समूह के साथ जो सहज रूप से हर एक श्रेष्ठ और पदासीन व्यक्ति के जीवन में सहज रूप से आता है और जिसे लोग जानते हुए आप और आप और आप के समूह को दे रहे थे पर मै आजीवन अखंड ब्रह्मचर्य, विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन उस कार्य को कर रहा था जो आप समेत इस विश्व का कोई देख नहीं रहा था और मुझे ही अनुभव हो रहा था और यह भी की जो मेरे सिवा कोई कर नहीं सकता था वह कार्य चाहे आप रहे हों या आप का समूह सभी या दुनिया का कोई अन्य व्यक्ति भी तथाकथित विश्वमहाशक्ति  से ही क्यों न रहा हो या हो या होगा : मानव जगत के जीवन के सभी मानको समय और सभी परिस्थियों के अनुकूल मैंने अपने स्वयं के परिवार से लेकर विश्व्जगत और सम्बन्धियों को उनके सभी प्रश्नों के जबाब दे दिए हैं पर जो "जागते हुए सोता है" या "समझते हुए नहीं समझता है" उसको स्वयं सच्चिदानंद परमब्रह्म अगर निराकार हो सकता हो इस जगत में तो वे भी नहीं समझा सकते है उसे मै विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/महाशिव क्या समझा सकता हूँ जिसमे न चाहते हुए भी सांसारिकता का कुछ न कुछ अंश जरूर है । पर इतना जरूर कहूँगा की जिस समय जो किया हूँ वायुमंडलीय एवं महासागरीय ज्ञान के अलावा वह विश्व के सबसे तेज सोच सकने वाले से ज्यादा सोच कर किया हूँ तत्कालीन परिस्थितिओं के अनुकूल जिससे की विष्वमानवता को दीर्घकालित लाभ ज्यादा से ज्यादा हो और उसका नियंत्रण सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर तत्कालीन रूप से सभव हो।>>>>मेरा तो कोई समूह नहीं रहा है मई जो किया उसका जबाब दिया हूँ पर मेरे स्वयं के परिवार से लेकर विश्व्जगत और मेरे सम्बन्धि व् सुभेक्षुजन अपने समूह के साथ कार्य किये है तो वे अपने समूह की उपलब्धियों, खामियों और असत्य आचरण और समाज पर उसके अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव को अक्षरसह जबाब दें अब मै प्रश्न करूंगा और उसके बाद उनको जो संदेह और अकाट्य प्रमाण उपलब्ध हो उसका जबाब मै अकेले काम का अकेले दूंगा। अन्यथा मेरे स्वयं के परिवार से लेकर विश्व्जगत और मेरे सम्बन्धि व् सुभेक्षुजन अपने समूह सहित अपने कार्यों की स्वयं समीक्षा कर मेरे प्रति उनका कितना अनुराग, वात्सल्य व् प्रेम सहयोग, संरक्षण और संपोषण रहा और उसके प्रति और विश्वसमाज के प्रति मेरा क्या त्याग, बलिदान, तप और समर्पण रहा? और अगर मै किशी एक के साथ अन्याय किया हूँ तो वह बता दे।

रामानन्द((रामानंद =राम(वह नाम जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाला और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाला है) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और विवेकानंद(विवेकानंद = (विवेक(महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और सच्चिदानंद(सच्चिदानंद =सत(सत्य)+चित(चित्त) +आनंद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और ब्रह्मानंद (ब्रह्मानंद=ब्रह्मा+आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो) मे भेद करना बहुत ही कठिन है एक जन सामान्य में लिए पर सांसारिक परिप्रेक्ष में रामानंद और विवेकानंद अवस्था की प्राप्ति ज्ञानमार्ग, भक्ति मार्ग और कर्ममार्ग के सम्मिलित योग से संभव है लेकिन चारों में रामानंद अवस्था ही सर्वोपरि है जो सत्य से और ज्ञान से साक्षात्कार ही नहीं कराता है वरन उचित अवसर प्रदान कर सांसारिकता में रहकर ही भवसागर से मुक्ति का उपाय और मार्ग भी सुझाता है सामान्य जीवन अवश्था में ही रहते हुए। >>>>>>>>ब्रह्मानंद= ब्रह्मा+ आनंद ही होगा न की ब्रह्म + आनंद क्योंकि ब्रह्म मतलब ही परमब्रह्म होता है तो उसके लिए ब्रह्मानंद या परमब्रह्मानन्द जैसा शब्द प्रयुक्त नहीं होता क्योकि ब्रह्म मतलब परमब्रह्म ही सच्चिदानंद अवस्था है जिसको ब्रह्मानंद नहीं कहते है और यही ही तो है विवेचना असली मतलब की सच्चिदानंद, ब्रह्मानंद, विवेकानंद और रामानंद में लोग भ्रमित हो जाते है। जनक जरूर विदेह हैं पर सच्चिदानंद ही असली विदेह स्थिति है जिसमे सांसारिकता रंचमात्र नहीं छू पाती है तो फिर सामान्यजन का व्यवहारिक जीवन संभव कैसे होगा? उसी तरह विवेकानंद विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिदेव/ की वह अवस्था जो असली माने में सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) हो मतलब स्थूल जगत से उसका नाता जरूर हो और ऐसी अवस्था श्रीराम मतलब राम मतलब श्रीरामकृष्ण मतलब शिवरामकृष्ण की अवस्था है पर रामानंद में और अधिक स्थूल जगत समाया है जिसमे सामाजिक रिश्ते और स्थूल जगत भी उसके हिस्से हो जाते हैं और जो केवल सत्य से और ज्ञान से साक्षात्कार ही नहीं कराता है वरन व्यक्ति को उचित अवसर प्रदान कर सांसारिकता में रहकर ही भवसागर से मुक्ति का उपाय और मार्ग भी सुझाता है सामान्य जीवन अवश्था में ही रहते हुए। जिसमे सत्य और ज्ञान का साक्षात्कार जरूर होता है पर कालचक्र और साम्यावस्था के साथ व्यक्ति को अपने को परिमार्जित और विकाश का समय भी दिया जाता है।

रामानन्द((रामानंद =राम(वह नाम जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाला और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाला है) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और विवेकानंद(विवेकानंद = (विवेक(महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और सच्चिदानंद(सच्चिदानंद =सत(सत्य)+चित(चित्त) +आनंद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और ब्रह्मानंद (ब्रह्मानंद=ब्रह्मा+आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो) मे भेद करना बहुत ही कठिन है एक जन सामान्य में लिए पर सांसारिक परिप्रेक्ष में रामानंद और विवेकानंद अवस्था की प्राप्ति ज्ञानमार्ग, भक्ति मार्ग और कर्ममार्ग के सम्मिलित योग से संभव है लेकिन चारों में रामानंद अवस्था ही सर्वोपरि है जो सत्य से और ज्ञान से साक्षात्कार ही नहीं कराता है वरन उचित अवसर प्रदान कर सांसारिकता में रहकर ही भवसागर से मुक्ति का उपाय और मार्ग भी सुझाता है सामान्य जीवन अवश्था में ही रहते हुए। >>>>>>>>ब्रह्मानंद= ब्रह्मा+ आनंद ही होगा न की ब्रह्म + आनंद क्योंकि ब्रह्म मतलब ही परमब्रह्म होता है तो उसके लिए ब्रह्मानंद या परमब्रह्मानन्द जैसा शब्द प्रयुक्त नहीं होता क्योकि ब्रह्म मतलब परमब्रह्म ही सच्चिदानंद अवस्था है जिसको ब्रह्मानंद नहीं कहते है और यही ही तो है विवेचना असली मतलब की सच्चिदानंद, ब्रह्मानंद, विवेकानंद और रामानंद में लोग भ्रमित हो जाते है। जनक जरूर विदेह हैं पर सच्चिदानंद ही असली विदेह स्थिति है जिसमे सांसारिकता रंचमात्र नहीं छू पाती है तो फिर सामान्यजन का व्यवहारिक जीवन संभव कैसे होगा? उसी तरह विवेकानंद विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिदेव/ की वह अवस्था जो असली माने में सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) हो मतलब स्थूल जगत से उसका नाता जरूर हो और ऐसी अवस्था श्रीराम मतलब राम मतलब श्रीरामकृष्ण मतलब शिवरामकृष्ण की अवस्था है पर रामानंद में और अधिक स्थूल जगत समाया है जिसमे सामाजिक रिश्ते और स्थूल जगत भी उसके हिस्से हो जाते हैं और जो केवल सत्य से और ज्ञान से साक्षात्कार ही नहीं कराता है वरन व्यक्ति को उचित अवसर प्रदान कर सांसारिकता में रहकर ही भवसागर से मुक्ति का उपाय और मार्ग भी सुझाता है सामान्य जीवन अवश्था में ही रहते हुए। जिसमे सत्य और ज्ञान का साक्षात्कार जरूर होता है पर कालचक्र और साम्यावस्था के साथ व्यक्ति को अपने को परिमार्जित और विकाश का समय भी दिया जाता है।

Monday, January 11, 2016

रामानन्द((रामानंद =राम(वह नाम जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाला और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाला है) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और विवेकानंद(विवेकानंद = (विवेक(महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और सच्चिदानंद(सच्चिदानंद =सत(सत्य)+चित(चित्त) +आनंद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और ब्रह्मानंद (ब्रह्मानंद=ब्रह्मा+आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो) मे भेद करना बहुत ही कठिन है एक जन सामान्य में लिए पर सांसारिक परिप्रेक्ष में रामानंद और विवेकानंद अवस्था की प्राप्ति ज्ञानमार्ग, भक्ति मार्ग और कर्ममार्ग के सम्मिलित योग से संभव है लेकिन चारों में रामानंद अवस्था ही सर्वोपरि है जो सत्य से और ज्ञान से साक्षात्कार ही नहीं कराता है वरन उचित अवसर प्रदान कर सांसारिकता में रहकर ही भवसागर से मुक्ति का उपाय और मार्ग भी सुझाता है सामान्य जीवन अवश्था में ही रहते हुए।

रामानन्द((रामानंद =राम(वह नाम जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाला और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाला है) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और विवेकानंद(विवेकानंद = (विवेक(महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और सच्चिदानंद(सच्चिदानंद =सत(सत्य)+चित(चित्त) +आनंद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो)) और ब्रह्मानंद (ब्रह्मानंद=ब्रह्मा+आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो) मे भेद करना बहुत ही कठिन है एक जन सामान्य में लिए पर सांसारिक परिप्रेक्ष में रामानंद और विवेकानंद अवस्था की प्राप्ति ज्ञानमार्ग, भक्ति मार्ग और कर्ममार्ग के सम्मिलित योग से  संभव है लेकिन चारों में  रामानंद अवस्था ही सर्वोपरि है जो सत्य से और ज्ञान से साक्षात्कार ही नहीं कराता है वरन उचित अवसर प्रदान कर सांसारिकता में रहकर ही भवसागर से मुक्ति का उपाय और मार्ग भी सुझाता है सामान्य जीवन अवश्था में ही रहते हुए।  

Sunday, January 10, 2016

मुझे जो अभीष्ट लक्ष्य और उद्देश्य मिला था वह पूरा हो चुका है और अब लक्ष्य और उद्देश्य रह गया है केवल उसे गतिक साम्य में बनाये रखने का तो मै किशी स्त्रीशक्ति समाज के अधिकार के प्रति अन्याय न हो तो मै कृष्णत्व और व्यासत्व सिद्धांत के अनुरूप स्वयं मेरे विरुद्ध बिछाये गए राजनैतिक शतरंज की चाल को उसका जबाब दे दूँ नहीं तो ये लोग यह भी मेरी कुदक्षता(डिमेरिट) और अकुशाग्रता समझेंगे : तो जबाब यह है की 29 ओक्टूबर, 2009 की आधी रात और 30 अक्टूबर, 2009 के प्रथम प्रहर में प्रयागराज विश्विद्यालय में तीन अलग-अलग पद में से दो अलग-अलग पद के साथ तीसरे और प्रथम मौलिक पद पर प्रथमतः पदभार ग्रहण करके मैंने शिवत्व की श्रेणी मौलिक रूप से प्राप्त कर ली थी शिक्षण और शोध कार्य सम्पादन स्थल पर भी कोई अन्य उसके एक क्षण या एक दिन या 19 दिन बाद या एक हजार वर्ष बाद कौन पद ग्रहण किया उससे मुझपर कोई असर होने वाला है क्या जब स्थायित्व प्रथमतः प्राप्त कर लेने के बाद वरिष्ठता की बात तो वही सिद्ध हो गयी? आगे जाकर कोई क्या बने इससे क्या असर पहुंचने वाला है और इस प्रकार यह किशी स्त्रीशक्ति समाज के साथ न्याय समझा जाए। पर रही रामत्व और किशी अन्य स्त्रीशक्ति समाज के अधिकार की बात है तो मै उसी वरिष्ठता के लिए सामान्यजन सांसारिकता का निर्वहन करने हेतु और उसे ही सिद्ध करने हेतु न्यायालय को उसका कार्यभार दिया हूँ और यत्न कर रहा हूँ गुरुजन और गुरुकुल की मर्यादा की रक्षा हेतु।

मुझे जो अभीष्ट लक्ष्य और उद्देश्य मिला था वह पूरा हो चुका है और अब लक्ष्य और उद्देश्य रह गया है केवल उसे गतिक साम्य में बनाये रखने का तो मै किशी स्त्रीशक्ति समाज के अधिकार के प्रति अन्याय न हो तो मै कृष्णत्व और व्यासत्व सिद्धांत के अनुरूप स्वयं मेरे विरुद्ध बिछाये गए राजनैतिक शतरंज की चाल को उसका जबाब दे दूँ नहीं तो ये लोग यह भी मेरी कुदक्षता(डिमेरिट) और अकुशाग्रता समझेंगे : तो जबाब यह है की 29 ओक्टूबर, 2009 की आधी रात और 30 अक्टूबर, 2009 के प्रथम प्रहर में प्रयागराज विश्विद्यालय में तीन अलग-अलग पद में से दो अलग-अलग पद के साथ तीसरे और प्रथम मौलिक पद पर प्रथमतः पदभार ग्रहण करके मैंने शिवत्व की श्रेणी मौलिक रूप से प्राप्त कर ली थी शिक्षण और शोध कार्य सम्पादन स्थल पर भी कोई अन्य उसके एक क्षण या एक दिन या 19 दिन बाद या एक हजार वर्ष बाद कौन पद ग्रहण किया उससे मुझपर कोई असर होने वाला है क्या जब स्थायित्व प्रथमतः प्राप्त कर लेने के बाद वरिष्ठता की बात तो वही सिद्ध हो गयी? आगे जाकर कोई क्या बने इससे क्या असर पहुंचने वाला है और इस प्रकार यह किशी स्त्रीशक्ति समाज के साथ न्याय समझा जाए। पर रही रामत्व और किशी अन्य स्त्रीशक्ति समाज के अधिकार की बात है तो मै उसी वरिष्ठता के लिए सामान्यजन सांसारिकता का निर्वहन करने हेतु और उसे ही सिद्ध करने हेतु न्यायालय को उसका कार्यभार दिया हूँ और यत्न कर रहा हूँ गुरुजन और गुरुकुल की मर्यादा की रक्षा हेतु।

  http://research.omicsgroup.org/index.php/K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies
My Merit (2008) before interview for entering in the Prayagraj University in 2009:
My Merit (2008) before interview for entering in the Prayagraj University in 2009: 

Saturday, January 9, 2016

राम विस्तृत अर्थ में श्रीराम मतलब श्रीरामकृष्ण और विस्तृत अर्थ में शिवरामकृष्ण मतलब महाशिव ही महादेवी/त्रिदेवियों में आदिदेवी/त्रिदेवियों में आद्या मतलब सरस्वती का मानस पुत्र विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन है जो संसार के रक्षक त्रिदेवों में आदिदेव मतलब महादेव मतलब शिव/शंकर/केदारेश्वर(+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर:विश्वनाथ) और शिवा:पारवती/उमा/अपर्णा/गिरिजा/गौरी की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति है मतलब शिव और शिवा की सुरक्षा कौन कर सकता है जो उनका भी भक्त हो और जो उनका भी स्वामी हो तो वह श्रीराम मतलब श्रीरामकृष्ण और विस्तृत अर्थ में शिवरामकृष्ण मतलब राम ही हो सकते है मतलव सशरीर परमब्रह्म मतलब विष्णुकांत(सशरीर ब्रह्मा+विष्णु+महेश) हे हो सकते है। तो विष्णुकांत और कृष्णकांत दो होकर भी एक ही है मतलब महाशिव मतलब विवेक ही है जिसमे जिसमे विष्णुकांत मौलिक और कृष्णकांत ऐक्षिक है जो कृष्ण चरित्र मुझमे पाये जाने हेतु 30 जनवरी, 2012 को हुए उस परीक्षण का परिणाम हैं जो काशी हिन्दू विश्विद्यालय को निकलने पर प्रयागराज से काशी जाने वाले मुख्य मार्ग पर ही सीतासमाहित स्थल, सीतामढी जाने वाले मार्ग के को निकले रास्ते से आगे मुख्यमार्ग पर और गोपीगंज से पहले सार्वजनिक यातायात साधन में 5 मिनट के लिए विशेष रूप से हुआ था पर किसने यह परीक्षण आयोजित किया था मुझे नही पता?

राम विस्तृत अर्थ में श्रीराम मतलब श्रीरामकृष्ण और विस्तृत अर्थ में शिवरामकृष्ण मतलब महाशिव ही महादेवी/त्रिदेवियों में आदिदेवी/त्रिदेवियों में आद्या मतलब सरस्वती का मानस पुत्र विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन है जो संसार के रक्षक त्रिदेवों में आदिदेव मतलब महादेव मतलब शिव/शंकर/केदारेश्वर(+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर:विश्वनाथ) और शिवा:पारवती/उमा/अपर्णा/गिरिजा/गौरी की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति है मतलब शिव और शिवा की सुरक्षा कौन कर सकता है जो उनका भी भक्त हो और जो उनका भी स्वामी हो तो वह श्रीराम मतलब श्रीरामकृष्ण और विस्तृत अर्थ में शिवरामकृष्ण मतलब राम ही हो सकते है मतलव सशरीर परमब्रह्म मतलब विष्णुकांत(सशरीर ब्रह्मा+विष्णु+महेश) हे हो सकते है। तो विष्णुकांत और कृष्णकांत दो होकर भी एक ही है मतलब महाशिव मतलब विवेक ही है जिसमे जिसमे विष्णुकांत मौलिक और कृष्णकांत ऐक्षिक है जो कृष्ण चरित्र मुझमे पाये जाने हेतु 30 जनवरी, 2012 को हुए उस परीक्षण का परिणाम हैं जो काशी हिन्दू विश्विद्यालय को निकलने पर प्रयागराज से काशी जाने वाले मुख्य मार्ग पर ही सीतासमाहित स्थल, सीतामढी जाने वाले मार्ग के को निकले रास्ते से आगे मुख्यमार्ग पर और गोपीगंज से पहले सार्वजनिक यातायात साधन में 5 मिनट के लिए विशेष रूप से हुआ था पर किसने यह परीक्षण आयोजित किया था मुझे नही पता?

लेकिन इस रोचक और चमत्कारिक दुनिया का ऐसा प्रकोप जिसमे बिशुनपुर-223103, जौनपुर(जमदग्निपुर के जिस सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा श्रद्धेय श्री रामानन्द((रामानंद =राम(वह नाम जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाले और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाले) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो))/---/रामप्रसाद मिश्रा के कुल और रामापुर-223225, आजमगढ़(आर्यमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (त्रिफला: बेलपत्र:विल्वपत्र:-शिव और शिवा:पारवती:गौरी:गिरिजा:उमा:अपर्णा को समर्पित होने वाला उनका भोज्य जो भोज्य हुआ और शेष बचा तो शिवत्व को ही प्राप्त हुआ) पाण्डेय श्रद्धेय श्री सारंगधर(चंद्रशेखर/शशिधर/शशांकशेखर/राकेशधर)/-----/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/----/रामप्रसाद पाण्डेय के कुल मुझ विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन को ही मिटाना सोच लिया गया था तो वह दुनिया कोई देख नहीं पायेगा किशी भी युग में क्योंकि कोई दूसरा मानवता के इतिहास में न हुआ है और न ही होगा और न वर्तमान में है।>>>>>>> पुनः मेरा कहना है की इस दुनिया को रोचक और चमत्कारिक ढंग से जीना है तो मानव मात्र को कष्ट उठाना ही पडेगा अपने पूर्व और इस जीवन में किये गए कर्मों के बदले नैसर्गिक न्याय के अनुसार(, न की आप को जाल में फँसा कर या युक्तियुक्त व्यवस्था के जाल में फंसाये जानें के परिणाम स्वरुप की अवस्था में सांसारिक व्यक्ति द्वारा थोपे गए न्याय से,) अगर कुछ आप को मिला है जीवन में आप को। आप अपना तथाकथित सामाजिक न्याय जबरदस्ती लादकर एक व्यसन का सुख भोगचुके और एक बचपन से समय का स्वयं के और सामाजिक कार्य में उपयोग में लाने वाले त्यागी पुरुष को बराबर सिद्ध नहीं कर सकते हैं किशी पद, प्रतिष्ठा और पंहुच को आधार बनाकर। कोई कुकृत्य करता हुआ अविवाहित रहा और दूसरा अखंड ब्रह्मचर्य के साथ साथ अविवाहित भी रहा तो दोनों में समानता लाने के लिए उसे आप अपने शासनिक और प्रशासनिक जाल में तिकड़ी के खिलाफ तिकड़म अपनाकर फनसाते हुए अपना तथाकथित सामाजिक न्याय लाद कर बराबर नहीं सिद्ध नहीं कर सकते हैं। जिसके साथ काशी की सभी शक्तिया लगी रही हो इन सभी प्रमुख मंदिरों श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, तुलसी मानस मंदिर, संकटमोचन मंदिर, दुर्गाकुण्ड(दुर्गामंदिर) और विरला विश्वनाथ मंदिर (काशी हिन्दू विश्विद्यालय प्रांगण:परिसर), बड़ा गणेश मंदिर के माध्यम से 2001 से 2008 तक उसको आप अपने प्रशासनिक और शासनिक जाल के तहत नपुंसक बना रहे थे जिसमे असफल होने के बाद पूर्णतः पागल सिद्ध करने का प्रयास किये और इसके लिए 2009 से सब युक्ति प्रयोग में ला रहे हैं और अब आप लोग चाह रहे हैं की मै तथाकथित महाशक्ति को महाशक्ति मान लूँ तो वह संभव नहीं। मैं नारी शक्ति का सम्मान करता हूँ तो किशी के साथ अन्याय नहीं होगा मेरे द्वारा तो आदर्श स्थिति में जिसने जो भी प्रयास किया मेरे साथ या मेरे लिए उसको उतना ही हक़ और अधिकार जरूर दूंगा अपने जीवन में पर उससे ज्यादा का उसको एक अंश भी नहीं मिलेगा लेकिन वास्तविक और प्रत्यक्ष जीवन में उसका ही अधिकार होगा जो सार्वजनिक रूप से साथ दिया इन 14 वर्षों में मेरे लिए मानवता हित हेतु निर्धारित विष्वमानवता संरक्षण, संवर्धन, उन्नयन और समृद्धि हेतु कार्य में और इसके साथ प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज में प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज वालों की इक्षापूर्ति हेतु इसके पुनर केन्द्रीयकरण और इसके साथ ही साथ 14 नए केन्द्रों/विभागों को स्थायित्व देने हेतु लगभग 70-80 स्थायी शिक्षक पद प्रदान करवाने में जिसमे से की एक पद के माध्यम से मेरा भी स्थायित्व निर्धारित हुआ है। >>>>लेकिन इस रोचक और चमत्कारिक दुनिया का ऐसा प्रकोप जिसमे बिशुनपुर-223103, जौनपुर(जमदग्निपुर के जिस सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा श्रद्धेय श्री रामानन्द((रामानंद =राम(वह नाम जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाले और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाले) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो))/---/रामप्रसाद मिश्रा के कुल और रामापुर-223225, आजमगढ़(आर्यमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय श्रद्धेय श्री सारंगधर(चंद्रशेखर/शशिधर/शशांकशेखर/राकेशधर)/-----/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/----/रामप्रसाद पाण्डेय के कुल मुझ विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन को ही मिटाना सोच लिया गया था तो वह दुनिया कोई देख नहीं पायेगा किशी भी युग में क्योंकि कोई दूसरा मानवता के इतिहास में न हुआ है और न ही होगा और न वर्तमान में है।

लेकिन इस रोचक और चमत्कारिक दुनिया का ऐसा प्रकोप जिसमे बिशुनपुर-223103, जौनपुर(जमदग्निपुर के जिस सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा श्रद्धेय श्री रामानन्द((रामानंद =राम(वह नाम जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाले और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाले) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो))/---/रामप्रसाद मिश्रा के कुल और रामापुर-223225, आजमगढ़(आर्यमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (त्रिफला: बेलपत्र:विल्वपत्र:-शिव और शिवा:पारवती:गौरी:गिरिजा:उमा:अपर्णा को समर्पित होने वाला उनका भोज्य जो भोज्य हुआ और शेष बचा तो शिवत्व को ही प्राप्त हुआ) पाण्डेय श्रद्धेय श्री सारंगधर(चंद्रशेखर/शशिधर/शशांकशेखर/राकेशधर)/-----/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/----/रामप्रसाद पाण्डेय के कुल मुझ विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन को ही मिटाना सोच लिया गया था तो वह दुनिया कोई देख नहीं पायेगा किशी भी युग में क्योंकि कोई दूसरा मानवता के इतिहास में न हुआ है और न ही होगा और न वर्तमान में है।>>>>>>> पुनः मेरा कहना है की इस दुनिया को रोचक और चमत्कारिक ढंग से जीना है तो मानव मात्र को कष्ट उठाना ही पडेगा अपने पूर्व और इस जीवन में किये गए कर्मों के बदले नैसर्गिक न्याय के अनुसार(, न की आप को जाल में फँसा कर या युक्तियुक्त व्यवस्था के जाल में फंसाये जानें के परिणाम स्वरुप की अवस्था में सांसारिक व्यक्ति द्वारा थोपे गए न्याय से,) अगर कुछ आप को मिला है जीवन में आप को। आप अपना तथाकथित सामाजिक न्याय जबरदस्ती लादकर एक व्यसन का सुख भोगचुके और एक बचपन से समय का स्वयं के और सामाजिक कार्य में उपयोग में लाने वाले त्यागी पुरुष को बराबर सिद्ध नहीं कर सकते हैं किशी पद, प्रतिष्ठा और पंहुच को आधार बनाकर। कोई कुकृत्य करता हुआ अविवाहित रहा और दूसरा अखंड ब्रह्मचर्य के साथ साथ अविवाहित भी रहा तो दोनों में समानता लाने के लिए उसे आप अपने शासनिक और प्रशासनिक जाल में तिकड़ी के खिलाफ तिकड़म अपनाकर फनसाते हुए अपना तथाकथित सामाजिक न्याय लाद कर बराबर नहीं सिद्ध नहीं कर सकते हैं। जिसके साथ काशी की सभी शक्तिया लगी रही हो इन सभी प्रमुख मंदिरों श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, तुलसी मानस मंदिर, संकटमोचन मंदिर, दुर्गाकुण्ड(दुर्गामंदिर) और विरला विश्वनाथ मंदिर (काशी हिन्दू विश्विद्यालय प्रांगण:परिसर), बड़ा गणेश मंदिर के माध्यम से 2001 से 2008 तक उसको आप अपने प्रशासनिक और शासनिक जाल के तहत नपुंसक बना रहे थे जिसमे असफल होने के बाद पूर्णतः पागल सिद्ध करने का प्रयास किये और इसके लिए 2009 से सब युक्ति प्रयोग में ला रहे हैं और अब आप लोग चाह रहे हैं की मै तथाकथित महाशक्ति को महाशक्ति मान लूँ तो वह संभव नहीं। मैं नारी शक्ति का सम्मान करता हूँ तो किशी के साथ अन्याय नहीं होगा मेरे द्वारा तो आदर्श स्थिति में जिसने जो भी प्रयास किया मेरे साथ या मेरे लिए उसको उतना ही हक़ और अधिकार जरूर दूंगा अपने जीवन में पर उससे ज्यादा का उसको एक अंश भी नहीं मिलेगा लेकिन वास्तविक और प्रत्यक्ष जीवन में उसका ही अधिकार होगा जो सार्वजनिक रूप से साथ दिया इन 14 वर्षों में मेरे लिए मानवता हित हेतु निर्धारित विष्वमानवता संरक्षण, संवर्धन, उन्नयन और समृद्धि हेतु कार्य में और इसके साथ प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज में प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज वालों की इक्षापूर्ति हेतु इसके पुनर केन्द्रीयकरण और इसके साथ ही साथ 14 नए केन्द्रों/विभागों को स्थायित्व देने हेतु लगभग 70-80 स्थायी शिक्षक पद प्रदान करवाने में जिसमे से की एक पद के माध्यम से मेरा भी स्थायित्व निर्धारित हुआ है। >>>>लेकिन इस रोचक और चमत्कारिक दुनिया का ऐसा प्रकोप जिसमे बिशुनपुर-223103, जौनपुर(जमदग्निपुर के जिस सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा श्रद्धेय श्री रामानन्द((रामानंद =राम(वह नाम जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाले और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाले) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो))/---/रामप्रसाद मिश्रा के कुल और रामापुर-223225, आजमगढ़(आर्यमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय श्रद्धेय श्री सारंगधर(चंद्रशेखर/शशिधर/शशांकशेखर/राकेशधर)/-----/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/----/रामप्रसाद पाण्डेय के कुल मुझ विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन को ही मिटाना सोच लिया गया था तो वह दुनिया कोई देख नहीं पायेगा किशी भी युग में क्योंकि कोई दूसरा मानवता के इतिहास में न हुआ है और न ही होगा और न वर्तमान में है।

राधा वह है जो अपने प्रिये के अभीस्त लक्ष्य के प्राप्ति में बाधा न बनने हेतु भौतिक रूप से साथ तो छोड़ दे पर आध्यात्मिक और मानशिक रूप से नहीं और पिता के दबाव वस् शादी करे भी तो प्रिये कृष्ण के सामान सामाजिक स्थिति वाले (यशोदा के ही रिश्तेदार या अन्य ग्वाले "रायन" से ) से जिससे की प्रिये कृष्ण पर कोई अन्य समाज छीटा काशी भी न कर सके। ऐसी राधा और कृष्ण भारतीय समाज में बहुत से उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने वालों में से हैं। याद रहे इस अवस्था तक कृष्ण स्वयं किशी के यहाँ पनाह लिए हुए थे और पाले पोसे गए थे पर उनके माता-पिता वाशुदेव और देवकी सामान्य जन भी न हो कर एक वंदी थे जिनका सब कुछ कंश के कब्जे में था और उन्ही को छुडाने हेतु मथुरा जाने पर राधा का विवाह रायन से कर दिया गया। अतः कृष्ण भी इस अवस्था तक बहुत धनी या भाग्य शाली नहीं कहे जा सकते जिनके जीवन पर भी संकट के बादल बचपन से ही थे और एक-एक कर वे उसे समाप्त करते रह गए इस अवस्था तक।-------------पर राम के लिए सीता वह हैं जो अत्यंत पतिव्रता है और पति के साथ जंगल भी जाती हैं और हरण हो जाने पर भी पति के सिवा किशी अन्य को स्वप्न में भी नहीं सोच सकती हैं इसके लिए अग्नि परिक्षा भी देकर सफल निकलती हैं विश्व के सर्व शक्तिमान और सर्व सम्म्पन्न रावण से शादी करने की बात तो दूर।-----------------पार्वती की पतिव्रता के बारे में तो कहना ही क्या जो पति का अपमान देख स्वयं को अग्नी में अर्पित कर देती हैं पिटा के ही यज्ञ में और पति को छोड़ने की बात ही क्या और यही स्थित लक्ष्मी और सरस्वती की है क्रमशः विष्णु और ब्रह्मा के साथ। इसी क्रम में सती दुर्वाशा ऋषि की माँ सती-ईस्ट, अनुसूइया का क्या कहना है जो तीनो देवियों (लक्ष्मी। सरस्वती और पार्वती ) से भी एक कदम आगे निकली पतिव्रता में। मै स्वयं इस बात का प्रमाण हूँ की आज भी इस तरह के पुरुष हैं भारतवर्ष में पर देवियों की कमी हो रही हैं हर क्षेत्र में एक सामान्य किशान से लेकर एक बहुत बड़े ऋषि महर्षि, श्रेष्ठतम उद्यमी और सेनाध्यक्ष तक के लिए इन राधा, सीता, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती और अनुसूइया का आचरण कर पाने के लिए। ---किशी भी स्त्री या पुरुष की भौतिकवादी मंशिकता ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है वरन हमारे अंदर दूर्द्रिस्ती की कमी है की हम नैतिकता को भूले जा रहे हैं और कर्त्तव्य परायणता से दूर हट रहे हैं की कोई दूसरा हमारी कमियों पर से पर्दा न उठाये अतः हम किशी को पागल सिध्ध कर मलाईदार स्थान पर बने रहें और क़ानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर सत्य से बचते रहें पर यह कुछ ही समय तक संभव है। क्योंकि भारत के संविधान के ऊपर भी एक संविधान है और वह है "सत्यमेव जयते का संविधान" और जो व्यक्ति इस पर विशवास करता है उसे दुनिया की कोई शक्ति जमींदोज नहीं कर सकती हैं और इसी लिए भारत भी जमींदोज नहीं किया जा ।----जय हिन्द, जय, भारत, जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।

राधा वह है जो अपने प्रिये के अभीस्त लक्ष्य के प्राप्ति में बाधा न बनने हेतु भौतिक रूप से साथ तो छोड़ दे पर आध्यात्मिक और मानशिक रूप से नहीं और पिता के दबाव वस् शादी करे भी तो प्रिये कृष्ण के सामान सामाजिक स्थिति वाले (यशोदा के ही रिश्तेदार या अन्य ग्वाले "रायन" से ) से जिससे की प्रिये कृष्ण पर कोई अन्य समाज छीटा काशी भी न कर सके। ऐसी राधा और कृष्ण भारतीय समाज में बहुत से उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने वालों में से हैं। याद रहे इस अवस्था तक कृष्ण स्वयं किशी के यहाँ पनाह लिए हुए थे और पाले पोसे गए थे पर उनके माता-पिता वाशुदेव और देवकी सामान्य जन भी न हो कर एक वंदी थे जिनका सब कुछ कंश के कब्जे में था और उन्ही को छुडाने हेतु मथुरा जाने पर राधा का विवाह रायन से कर दिया गया। अतः कृष्ण भी इस अवस्था तक बहुत धनी या भाग्य शाली नहीं कहे जा सकते जिनके जीवन पर भी संकट के बादल बचपन से ही थे और एक-एक कर वे उसे समाप्त करते रह गए इस अवस्था तक।-------------पर राम के लिए सीता वह हैं जो अत्यंत पतिव्रता है और पति के साथ जंगल भी जाती हैं और हरण हो जाने पर भी पति के सिवा किशी अन्य को स्वप्न में भी नहीं सोच सकती हैं इसके लिए अग्नि परिक्षा भी देकर सफल निकलती हैं विश्व के सर्व शक्तिमान और सर्व सम्म्पन्न रावण से शादी करने की बात तो दूर।-----------------पार्वती की पतिव्रता के बारे में तो कहना ही क्या जो पति का अपमान देख स्वयं को अग्नी में अर्पित कर देती हैं पिटा के ही यज्ञ में और पति को छोड़ने की बात ही क्या और यही स्थित लक्ष्मी और सरस्वती की है क्रमशः विष्णु और ब्रह्मा के साथ। इसी क्रम में सती दुर्वाशा ऋषि की माँ सती-ईस्ट, अनुसूइया का क्या कहना है जो तीनो देवियों (लक्ष्मी। सरस्वती और पार्वती ) से भी एक कदम आगे निकली पतिव्रता में।
मै स्वयं इस बात का प्रमाण हूँ की आज भी इस तरह के पुरुष हैं भारतवर्ष में पर देवियों की कमी हो रही हैं हर क्षेत्र में एक सामान्य किशान से लेकर एक बहुत बड़े ऋषि महर्षि, श्रेष्ठतम उद्यमी और सेनाध्यक्ष तक के लिए इन राधा, सीता, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती और अनुसूइया का आचरण कर पाने के लिए। ---किशी भी स्त्री या पुरुष की भौतिकवादी मंशिकता ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है वरन हमारे अंदर दूर्द्रिस्ती की कमी है की हम नैतिकता को भूले जा रहे हैं और कर्त्तव्य परायणता से दूर हट रहे हैं की कोई दूसरा हमारी कमियों पर से पर्दा न उठाये अतः हम किशी को पागल सिध्ध कर मलाईदार स्थान पर बने रहें और क़ानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर सत्य से बचते रहें पर यह कुछ ही समय तक संभव है। क्योंकि भारत के संविधान के ऊपर भी एक संविधान है और वह है "सत्यमेव जयते का संविधान" और जो व्यक्ति इस पर विशवास करता है उसे दुनिया की कोई शक्ति जमींदोज नहीं कर सकती हैं और इसी लिए भारत भी जमींदोज नहीं किया जा ।----जय हिन्द, जय, भारत, जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।

Friday, January 8, 2016

काशीराम जी, नारायणन जी, जार्ज फर्नांडीज जी, कलाम गुरु, अटल जी, जोशी गुरुदेव इन लोगों प्रयोग हो चुका और इनके प्रयोग के बाद शायद आद्यवानी(ॐ) जी बचते हैं तो यह समझ लीजिये की यदि ॐ महामंत्र है तो राम उससे भी बड़ा महामंत्र है। और अगर वह ॐ शब्द त्रिदेवों में आद्या मतलब महादेव शिव के डमरू से निकला है तो उसे मानव संसार में परिचित करने हेतु आकृति महादेवी/त्रिदेवियों में आदिदेवी/त्रिदेवियों में आद्या मतलब सरस्वती(जिनका मानस पुत्र विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन है) ने दी है और उस महादेव के लिए भी महाशिव उनकी आतंरिक सुरक्षा शक्ति विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन है इसे भी समझकर ॐ और विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन में किसका का स्थान ऊपर या नीचे है यह आप निश्चित कर सकते हैं। वैसे भी यदि राम भी महामंत्र और ॐ भी महामंत्र है तो बिशुनपुर-223103, जौनपुर(जमदग्निपुर के जिस सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा श्रद्धेय श्री रामानन्द((रामानंद =राम(वह नाम जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाले और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाले) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो))/---/रामप्रसाद मिश्रा के कुल और रामापुर-223225, आजमगढ़(आर्यमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय श्रद्धेय श्री सारंगधर(चंद्रशेखर/शशिधर/शशांकशेखर/राकेशधर)/-----/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/----/रामप्रसाद पाण्डेय के कुल के आगे कोई टिक सकता है क्या इस दुनिया में जो सत्यधारी/सत्यव्रत/सत्यनारायण/रामजानकी/विक्रमादित्य/आदित्यनाथ व्यवहार में, आचरण में, सभ्यता में, संस्कृति में और समकुलीनता में न हो ?

काशीराम जी, नारायणन जी, जार्ज फर्नांडीज जी, कलाम गुरु, अटल जी, जोशी गुरुदेव इन लोगों  प्रयोग हो चुका और इनके प्रयोग के बाद शायद आद्यवानी(ॐ) जी बचते हैं तो यह समझ लीजिये की यदि ॐ महामंत्र है तो राम उससे भी बड़ा महामंत्र है। और अगर वह ॐ शब्द त्रिदेवों में आद्या मतलब महादेव शिव के डमरू से निकला है तो उसे मानव संसार में परिचित करने हेतु आकृति महादेवी/त्रिदेवियों में आदिदेवी/त्रिदेवियों में आद्या मतलब सरस्वती(जिनका मानस पुत्र  विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन है) ने दी है और उस महादेव के लिए भी महाशिव उनकी आतंरिक सुरक्षा शक्ति विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन है इसे भी समझकर ॐ और विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिदेव/त्रिनेत्र/त्रिलोचन में किसका का स्थान ऊपर या नीचे है यह आप निश्चित कर सकते हैं।  वैसे भी यदि राम भी महामंत्र और ॐ भी महामंत्र है तो बिशुनपुर-223103, जौनपुर(जमदग्निपुर के जिस सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा श्रद्धेय श्री रामानन्द((रामानंद =राम(वह नाम जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाले और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाले) + आंनद (जो अन्तर्निहित तथा लौकिक और पारलौकिक प्रसन्नता हो))/---/रामप्रसाद मिश्रा के कुल और रामापुर-223225, आजमगढ़(आर्यमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय श्रद्धेय श्री सारंगधर(चंद्रशेखर/शशिधर/शशांकशेखर/राकेशधर)/-----/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/----/रामप्रसाद पाण्डेय के कुल के आगे कोई टिक सकता है क्या इस दुनिया में जो सत्यधारी/सत्यव्रत/सत्यनारायण/रामजानकी/विक्रमादित्य/आदित्यनाथ व्यवहार में,  आचरण में, सभ्यता में, संस्कृति में और समकुलीनता में  न हो ?

Thursday, January 7, 2016

लोग दूसरे के पापों पर पर्दा डालकर और उसकी सफाई प्रस्तुत कर स्वयं कष्ट मोल ले रहे हैं | इस संसार में जिस स्थान पर कभी जाकर सत्य का अनुभव नहीं किया हो उसे उत्तर भारत विशेषकर प्रयाग-काशी के अति सुसंस्कृत सभ्य समाज की दृष्टि से देख रहे हैं| मै दो वर्ष का अनुभव, प्रशिक्षण और शोध वही रहकर कर और वहां बाहर दूर देश में जिसके एक पैर रहते थे के बीच में बैठकर अनुभव कर लिखा हूँ और सत्य को उजागर किया हूँ। अतः बिशुनपुर-223103, जौनपुर(जमदग्निपुर के जिस सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा श्रद्धेय श्री रामानन्द((रामानंद =राम(वह जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाले और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाले) + आंनद (जो अन्तर्निहित और पारलौकिक प्रसन्नता हो))/---/रामप्रसाद मिश्रा के कुल और रामापुर-223225, आजमगढ़(आर्यमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय श्रद्धेय श्री सारंगधर(चंद्रशेखर/शशिधर/शशांकशेखर/राकेशधर)/-----/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/----/रामप्रसाद पाण्डेय के कुल की तुलना दलित ईसाई नरसिंघराव बांडगुला/बलराज बांडगुला परिवारों से करने से पूर्व आप को डूब मारना चाहिए।

लोग दूसरे के पापों पर पर्दा डालकर और उसकी सफाई प्रस्तुत कर स्वयं कष्ट मोल ले रहे हैं | इस संसार में जिस स्थान पर कभी जाकर सत्य का अनुभव नहीं किया हो उसे उत्तर भारत विशेषकर प्रयाग-काशी के अति सुसंस्कृत सभ्य समाज की दृष्टि से देख रहे हैं| मै दो वर्ष का अनुभव, प्रशिक्षण और शोध वही रहकर कर और वहां बाहर दूर देश में जिसके एक पैर रहते थे के बीच में बैठकर अनुभव कर लिखा हूँ और सत्य को उजागर किया हूँ। अतः बिशुनपुर-223103, जौनपुर(जमदग्निपुर के जिस सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा श्रद्धेय श्री रामानन्द((रामानंद =राम(वह जो शिव के समान भवसागर के पापों को जला देने वाले और विष्णु के समान भवसागर के पापों से मुक्ति देने वाले) + आंनद (जो अन्तर्निहित और पारलौकिक प्रसन्नता हो))/---/रामप्रसाद मिश्रा के कुल और रामापुर-223225, आजमगढ़(आर्यमगढ़) के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय श्रद्धेय श्री सारंगधर(चंद्रशेखर/शशिधर/शशांकशेखर/राकेशधर)/-----/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/----/रामप्रसाद पाण्डेय के कुल की तुलना दलित ईसाई नरसिंघराव बांडगुला/बलराज बांडगुला परिवारों से करने से पूर्व आप को डूब मारना चाहिए।http://vandemataramvivekananddrvkprssbhupuau.blogspot.in/

सभी के जीवन के अच्छे और बुरे कर्मों का फल और उसका फैसला उसके जीवन के काल में ही देने का वरदान मतलब सत्य और असत्य को निश्चित करने की शक्ति स्वयं शनि को उनके गुरु शंकर भगवान मतलब शिव ने ही दिया था तो इस प्रकार शनिवार शिव के शिष्य शनि के दिन होने के नाते शिव का ही दिन है और शिव को चन्द्रमा प्यारा जरूर है पर जो चन्द्र कभी किशी अवस्था/दशा में व्यक्ति के जीवन में शुख और शांति का कारक होता है वह कभी किशी अवस्था में अपार दुःख और अशांति का कारक बन जाता है तो सोमवार:चंद्रवार भी शिव का ही दिन जरूर है लेकिन शक्तियाँ शनिवार की ज्यादा हैं इसे लोगों को समझ लेना चाहिए। >>>>>>>>मै तो विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन हूँ जिसके बिना स्वयं यह संसार नहीं अपितु स्वयं शिव और शक्ति दोनों निप्राण और शव समान हैं है तो मेरे स्वयं के लिए कोई खतरा नहीं आप लोगों के किशी कृत्य से पर यही मेरा अवमूल्यन जो तब हुआ था और अव भी जारी है और वर्तमान में भी आप लोग जो अपनी राजनीती जारी रखे है अकाट्य सत्य दलित ईसाई नरसिंघराव बंदुगुला/बलराज बंदुगुला का सत्य उजागर होने पर भी और उसका दुष्परिणाम पा जाने पर भी तो इसका प्रमाण आप लोगों को चाहिए तो आप मेरी छोटी नानी कैलाशी(नामतः पारवती)/पारसनाथ(नामतः शिव) नानी की कस्टकारी अवस्था और उस तथाकथित दलित/दलित बरखुराम दादा जिनके परिश्रम से मेरा परिवार 1957 से 2008 तक विशेष रूप से पाला था उनका अकस्मात् 2008 में पक्षाघात जिससे वे किशी कार्य लायक नहीं बचे थे के दैवीय कारणों को विशेष रूप से समझ लीजिये। मै आप लोगों से कुछ नहीं कहूँगा पर आप लोग स्वयं सचेत हो जाइए और शनि को उसका कार्य न करना पड़े पुनः सत्य असत्य को उजागर करने के लिए।

सभी के जीवन के अच्छे और बुरे कर्मों का फल और उसका फैसला उसके जीवन के काल में ही देने का वरदान मतलब सत्य और असत्य को निश्चित करने की शक्ति स्वयं शनि को उनके गुरु शंकर भगवान मतलब शिव ने ही दिया था तो इस प्रकार शनिवार शिव के शिष्य शनि के दिन होने के नाते शिव का ही दिन है और शिव को चन्द्रमा प्यारा जरूर है पर जो चन्द्र कभी किशी अवस्था/दशा में व्यक्ति के जीवन में शुख और शांति का कारक होता है वह कभी किशी अवस्था में अपार दुःख और अशांति का कारक बन जाता है तो सोमवार:चंद्रवार भी शिव का ही दिन जरूर है लेकिन शक्तियाँ शनिवार की ज्यादा हैं इसे लोगों को समझ लेना चाहिए। >>>>>>>>मै तो विवेक/महाशिव/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन हूँ जिसके बिना स्वयं यह संसार नहीं अपितु स्वयं शिव और शक्ति दोनों निप्राण और शव समान हैं है तो मेरे स्वयं के लिए कोई खतरा नहीं आप लोगों के किशी कृत्य से पर यही मेरा अवमूल्यन जो तब हुआ था और अव भी जारी है और वर्तमान में भी आप लोग जो अपनी राजनीती जारी रखे है अकाट्य सत्य दलित ईसाई नरसिंघराव बंदुगुला/बलराज बंदुगुला का सत्य उजागर होने पर भी और उसका दुष्परिणाम पा जाने पर भी तो इसका प्रमाण आप लोगों को चाहिए तो आप मेरी छोटी नानी कैलाशी(नामतः पारवती)/पारसनाथ(नामतः शिव) नानी की कस्टकारी अवस्था और उस तथाकथित दलित/दलित बरखुराम दादा जिनके परिश्रम से मेरा परिवार 1957 से 2008 तक विशेष रूप से पाला था उनका अकस्मात् 2008 में पक्षाघात जिससे वे किशी कार्य लायक नहीं बचे थे के दैवीय कारणों को विशेष रूप से समझ लीजिये। मै आप लोगों से कुछ नहीं कहूँगा पर आप लोग स्वयं सचेत हो जाइए और शनि को उसका कार्य न करना पड़े पुनः सत्य असत्य को उजागर करने के लिए। 

Wednesday, January 6, 2016

Reply of Vivek:Mahashiv:Trayambak:Trinetra:Trilochan to all the Daughters of Kashiraj Daksha Prajapati (Physical son of Lord Brahma and Mahadevi:Oldest Goddess Saraswati) those can say as source of origin of all the Women of this universe:>>>>>>The he who created the Shakti:Power:Prakriti(Nature:Women) and Shiv i.e. the Source of existence of every living's life in the universe both created by the Bramh i.e. the Parambrahm thus a person attained the status of embodied Brahma i.e the embodied Paramabrah i.e. the status of embodied Parambrahma(Brahma+Vishnu+Mahesh) can be say the source of origin of Shakti:Power:Prakriti(Nature:Women) and Shiv (i.e. the Source of existence of every living things life in the universe) both itself that called Maha Shiv:Vivek:Trayambak:Trinetra:Trilochan i.e. the mentor son of only Mahadevi:Oldest Goddess Saraswati.

Reply of Vivek:Mahashiv:Trayambak:Trinetra:Trilochan to all the Daughters of Kashiraj Daksha Prajapati (Physical son of Lord Brahma and Mahadevi:Oldest Goddess Saraswati) those can say as source of origin of all the Women of this universe:>>>>>>The he who created the Shakti:Power:Prakriti(Nature:Women) and Shiv i.e. the Source of existence of every living's life in the universe both created by the Bramh i.e. the Parambrahm thus a person attained the status of embodied Brahma i.e the embodied Paramabrah i.e. the status of embodied Parambrahma(Brahma+Vishnu+Mahesh) can be say the source of origin of Shakti:Power:Prakriti(Nature:Women) and Shiv (i.e. the Source of existence of every living things life in the universe) both itself that called Maha Shiv:Vivek:Trayambak:Trinetra:Trilochan i.e. the mentor son of only Mahadevi:Oldest Goddess Saraswati.   

Tuesday, January 5, 2016

जिस व्यक्ति के बाबा का प्रियतम मित्र एक योग्यतम ईसाई रहा हो और जिसका पूरा परिवार पहले तो आंशिक रूप से पर 1957 से 2008 तक पूर्ण रूप से दलित के माध्यम से मिले अन्नधनराशि के भरोशे पूर्ण रूप से चला हो तो अगर उसने ईसाई और दलित समाज पर कुछ भी और किशी हद तक नहीं वरन केवल दलित ईसाई समाज पर आपत्ति जाहिर की हो तो यह समझना चाहिए की ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कोई है तो वह मानव पहले है और उसकी मानवता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता क्योंकि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म होना मानवधर्म के एक स्तर विशेष से ऊपर की मानवीय विशेषता है जिससे मानवता का मूल्य सुशोभित किया जाता है एक और कदम आगे बढ़कर। हमें तो आपत्ति इस बात पर है की ईसाइयत विश्व में हिन्दू समाज में ही भंवर में जीवन जीने वाले भूले-भटके दलित समाज को ईसाई बना उनको दलित ईसाई बना अपनी संख्या वृद्धि करता जा रहा है और जिस ईसाई समाज को हिन्दू समाज सांस्कृतिक रूप से अपने से श्रेष्ठ नहीं मानता है और तो वह है भी जो अब सिद्ध हो चूका है उसी हिन्दू समाज के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म को दलित ईसाई समाज के माध्यम से कुचलने की पूरी रणनीति सांस्कृतिक रूप से चला रहा है। लेकिन उसको ज्ञांत हो की जिस दिन मानवता का मूल प्रयागराज-काशी भी सनातन ब्राह्मण/सनातन हिन्दू विहीन हो गया उसी दिन यह संसार विलुप्त होगा और इसे विलुप्त होने से कोई रोक नहीं सकता है क्योंकि सब जाती/धर्म(कर्म आधारित व् जलवायवीय दोनों) को समान ऊर्जा दाता है यह सनातन हिन्दू समाज जो इस प्रयागराज-काशी में जमा रहता है । अतः ईसाइयत अपना मायाजाल और अपने अभिकर्ता संसार को निायंत्रित कर कम से कम प्रयागराज-काशी की संस्कृति से सम्बंधित किशी कार्य में बाधा न डाले अपने को विश्वमहाशक्ति समझकर। कोई भी दुविधा हो तो सनातन हिन्दू समाज से संपर्क हेतु स्वतंत्र है। जिस प्रकार से 14 वर्ष पूर्व विश्व पर अपना आधिपत्य समझ अपनी करतूत किया था ईसाइयत ने वह दोबारा नहीं होना चाहिए। (अभी भी कुछ तो कमिया रह गयीं हैं सनातन हिन्दू धर्म के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म के अतिरिक्त हिन्दू समाज जिसे दलित या तथाकथित दलित समाज सनातन हिन्दू समाज में कहते है जिससे ये जिस भी धर्म को स्वीकार करते है उसके सच्चे वाहक नहीं हो सकते है जिसका परिणाम है की मेरा अधिकार सुरक्षित नहीं रह सका जिसे मैं आदर्श रूप में सुरक्षित कर दिया हूँ अपनी क्षमता और दर्शन का उपयोग कर) सनातन हिन्दू धर्म मतलब ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म को सन्देश: पथिक: बहुत अच्छी नींद आयी थी। सोकर बहुत आराम मिला। पथिक को उत्तर: जैसी नींद आयी थी और जिस नींद से जगे हैं वह मुझसे पूँछियेगा। ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिकपुत्र काशिराज दक्ष प्रजापति की कन्याये ही स्त्री जगत की मूल स्रोत। उन कन्याओं की आवाज या उत्तर वर्तमान साबित बचे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म के लोगों के समूह को: आप जितने बड़े ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म हैं यह सब हम बहनों को पता है और आप जिस नींद में सो रहे थे और उस नींद से कैसे जगे हैं और आप कैसे साबित बचे हैं यह भी हम सब बहनों को पता है जिन्होंने न केवल अपना जीवन ही बलिदान नहीं किया है वरन आप लोगों को सुरक्षित रखने हेतु कठोर तपश्या और त्याग किया है।

जिस व्यक्ति के बाबा का प्रियतम मित्र एक योग्यतम ईसाई रहा हो और जिसका पूरा परिवार पहले तो आंशिक रूप से पर 1957 से 2008 तक पूर्ण रूप से दलित के माध्यम से मिले अन्नधनराशि के भरोशे पूर्ण रूप से चला हो तो अगर उसने ईसाई और दलित समाज पर कुछ भी और किशी हद तक नहीं वरन केवल दलित ईसाई समाज पर आपत्ति जाहिर की हो तो यह समझना चाहिए की ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कोई है तो वह मानव पहले है और उसकी मानवता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता क्योंकि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म होना मानवधर्म के एक स्तर विशेष से ऊपर की मानवीय विशेषता है जिससे मानवता का मूल्य सुशोभित किया जाता है एक और कदम आगे बढ़कर। हमें तो आपत्ति इस बात पर है की ईसाइयत विश्व में हिन्दू समाज में ही भंवर में जीवन जीने वाले भूले-भटके दलित समाज को ईसाई बना उनको दलित ईसाई बना अपनी संख्या वृद्धि करता जा रहा है और जिस ईसाई समाज को हिन्दू समाज सांस्कृतिक रूप से अपने से श्रेष्ठ नहीं मानता है और तो वह है भी जो अब सिद्ध हो चूका है उसी हिन्दू समाज के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म को दलित ईसाई समाज के माध्यम से कुचलने की पूरी रणनीति सांस्कृतिक रूप से चला रहा है। लेकिन उसको ज्ञांत हो की जिस दिन मानवता का मूल प्रयागराज-काशी भी सनातन ब्राह्मण/सनातन हिन्दू विहीन हो गया उसी दिन यह संसार विलुप्त होगा और इसे विलुप्त होने से कोई रोक नहीं सकता है क्योंकि सब जाती/धर्म(कर्म आधारित व् जलवायवीय दोनों) को समान ऊर्जा दाता है यह सनातन हिन्दू समाज जो इस प्रयागराज-काशी में जमा रहता है । अतः ईसाइयत अपना मायाजाल और अपने अभिकर्ता संसार को निायंत्रित कर कम से कम प्रयागराज-काशी की संस्कृति से सम्बंधित किशी कार्य में बाधा न डाले अपने को विश्वमहाशक्ति समझकर। कोई भी दुविधा हो तो सनातन हिन्दू समाज से संपर्क हेतु स्वतंत्र है। जिस प्रकार से 14 वर्ष पूर्व विश्व पर अपना आधिपत्य समझ अपनी करतूत किया था ईसाइयत ने वह दोबारा नहीं होना चाहिए। (अभी भी कुछ तो कमिया रह गयीं हैं सनातन हिन्दू धर्म के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म के अतिरिक्त हिन्दू समाज जिसे दलित या तथाकथित दलित समाज सनातन हिन्दू समाज में कहते है जिससे ये जिस भी धर्म को स्वीकार करते है उसके सच्चे वाहक नहीं हो सकते है जिसका परिणाम है की मेरा अधिकार सुरक्षित नहीं रह सका जिसे मैं आदर्श रूप में सुरक्षित कर दिया हूँ अपनी क्षमता और दर्शन का उपयोग कर)
सनातन हिन्दू धर्म मतलब ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म को सन्देश:
पथिक: बहुत अच्छी नींद आयी थी। सोकर बहुत आराम मिला।
पथिक को उत्तर: जैसी नींद आयी थी और जिस नींद से जगे हैं वह मुझसे पूँछियेगा।
ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिकपुत्र काशिराज दक्ष प्रजापति की कन्याये ही स्त्री जगत की मूल स्रोत।
उन कन्याओं की आवाज या उत्तर वर्तमान साबित बचे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म के लोगों के समूह को: आप जितने बड़े ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा उनकी व्युत्पन्न जाति/धर्म हैं यह सब हम बहनों को पता है और आप जिस नींद में सो रहे थे और उस नींद से कैसे जगे हैं और आप कैसे साबित बचे हैं यह भी हम सब बहनों को पता है जिन्होंने न केवल अपना जीवन ही बलिदान नहीं किया है वरन आप लोगों को सुरक्षित रखने हेतु कठोर तपश्या और त्याग किया है।

Monday, January 4, 2016

जिसको अपने मरने पर ही स्वर्ग देखना है उसे मरने से कौन रोक सकता है और ये वही लोग हैं मुझको प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज से खिंचवा लेने की बात करने वालों के लिए "मरे को मारे सहमति दार" का कार्य आज तक किये हैं और अब भी कर रहे हैं सब कुछ देखने के बावजूद तो उनकी मिटी हुई हस्ती तो और मिटने से स्वयं केदारेश्वर क्यों रोक सकने का दम भरेंगे? मतलब उनका भला कौन कर सकता है? उनको तो अपने मरे ही स्वर्ग देखना है मेरे त्याग, बलिदान और तपश्या से वे भले ही मान-सान और सोहरत बटोरे रहे हों। उनको नहीं पता की उनकी तो दो-तीन नहीं कई पीढिया भी लग जायँ तो भी उनसे वह कार्य नहीं हो सकता हैं (उनसे वह कार्य नहीं हो सकता हैं जिनके जीवन के पुण्य के परिणामी हक को वे स्वयं भस्मासुर और रावण कुल के उस कार्य का समर्थन कर गँवा चुके है, जिसे भस्मासुर और रावण भी नहीं किया, और ऐसे गिरे हुए का उद्धार भी कौन केदारेश्वर और श्रीराम करेगा जिसको की अपने पाप का प्रायश्चित अपने जीवन में ही भुगतना है कस्ट भोग-भोग कर, उसे मुक्ति नही मिलनी है केदारेश्वर और श्रीराम से), यह तो केवल उससे हो सकता है जिसके लगने से केवल एक सप्तर्षि ही नहीं मतलब केवल एक ब्रह्मर्षि ब्राह्मण ही नहीं वरन उसके लगने से सातों सप्तर्षि मतलब सातों ब्रह्मर्षि ब्राह्मण का सम्पूर्ण विश्व में फैला मानवता का पुजारी कुनबा/विष्वमानवता हितकारी कुटुंब लगा हुआ था।

जिसको अपने मरने पर ही स्वर्ग देखना है उसे मरने से कौन रोक सकता है और ये वही लोग हैं  मुझको प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज से खिंचवा लेने की बात करने वालों के लिए "मरे को मारे सहमति दार" का कार्य आज तक किये हैं और अब भी कर रहे हैं सब कुछ देखने के बावजूद तो उनकी मिटी हुई हस्ती तो और मिटने से स्वयं केदारेश्वर क्यों रोक सकने का दम भरेंगे? मतलब उनका भला कौन कर सकता है? उनको तो अपने मरे ही स्वर्ग देखना है मेरे त्याग, बलिदान और तपश्या से वे भले ही मान-सान और सोहरत बटोरे रहे हों। उनको नहीं पता की उनकी तो दो-तीन नहीं कई पीढिया भी लग जायँ तो भी उनसे वह कार्य नहीं हो सकता हैं (उनसे वह कार्य नहीं हो सकता हैं जिनके जीवन के पुण्य के परिणामी हक को वे स्वयं भस्मासुर और रावण कुल के उस कार्य का समर्थन कर गँवा चुके है,  जिसे भस्मासुर और रावण भी नहीं किया, और ऐसे गिरे हुए का उद्धार भी कौन केदारेश्वर और श्रीराम करेगा जिसको की अपने पाप का प्रायश्चित अपने जीवन में ही भुगतना है कस्ट भोग-भोग कर, उसे मुक्ति नही मिलनी है केदारेश्वर और श्रीराम से), यह तो केवल उससे हो सकता है जिसके लगने से केवल एक सप्तर्षि ही नहीं मतलब केवल एक ब्रह्मर्षि ब्राह्मण ही नहीं वरन उसके लगने से सातों सप्तर्षि मतलब सातों ब्रह्मर्षि ब्राह्मण का सम्पूर्ण विश्व में फैला मानवता का पुजारी कुनबा/विष्वमानवता हितकारी कुटुंब लगा हुआ था। 

Saturday, January 2, 2016

जिनको अपनी संतति के जीवन की चिंता करने का समय नहीं वे कम से कम उस समाज का निर्माण करें के जिस समाज के लिए वे मशीन की तरह कार्य किये जा रहे है उनका वह समाज ही उनकी सन्तति की चिंता कर सके अपनी संतति की तरह।

जिनको अपनी संतति के जीवन की चिंता करने का समय नहीं वे कम से कम उस समाज का निर्माण करें के जिस समाज के लिए वे मशीन की तरह कार्य किये जा रहे है उनका वह समाज ही उनकी सन्तति की चिंता कर सके अपनी संतति की तरह।

University of Allahabad regained status of Central University and got near about 70-80 permanent faculty position for 14 =12 +2 in 14 years (2001-2015) in form of planned post not only the 7 positions of K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies but whole history centered on the base of correspondence for Kedareswar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies and outcomes after that to fulfill the requirement of other centres too.

University of Allahabad regained status of Central University and got near about 70-80 permanent faculty position for 14 =12 +2 in 14 years (2001-2015) in form of planned post not only the 7 positions of K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies but whole history centered on the base of correspondence for Kedareswar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies and outcomes after that to fulfill the requirement of other centres too.
• K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies
• Centre of Food Technology
• Centre of Bio-technology
• Centre of Bioinformatics
• Centre of Behavioural and Cognitive Sciences
• Centre of Environmental Science
• Centre of Material Science
• Department of Physical Education(Re-structure)
• Centre of Globalization and Development Studies
• School of Modern Languages
• Department of Sociology 
• Centre of Theater & Film Institutes
• Gandhian Studies – 
• South Asia and International Study

Friday, January 1, 2016

इन 14(2001-2015) वर्ष की समयावधि में अवस्था ऐसी आयी थी जिसमे श्रीराम के समानांतर चलने वाला इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर चलने वाली ईसाइयत दोनों श्रीरामकृष्ण के अस्तित्व समाप्त होने की आसंका से स्वयं को भी सामानांतर पद चिन्ह न मिलने की आसंका बीच श्रीरामकृष्ण को ही सम्पोषित किये मतलब इस प्रकार इसके माध्यम से सनातन हिन्दू संस्कृति को ही सम्पोषित किये मतलब विश्व मानवता इतिहास का अभूतपूर्व उदहारण इस भारत में प्रस्तुत हुआ इन 14 वर्ष की समयावधि में। वह सामाजिक जीवन जिसमे दम हो, जो रोचक हो तो ऐसे अच्छे जीवन को जिसको जीना हैं तो वह सांसार में कभी अभाव और भोगविलास की वस्तुओं से त्याग की अवस्था में उस विष्वमानवता को जीना सीख लेना चाहिए अन्यथा भोग्यवादी दृश्टिकोण का जीवन ईसाइयत से पूरे विश्व को धक लेगा और मानवता का अंत अवश्यम्भावी हो जाएगा हिंदुत्वभाव समाप्त होते ही जिसमे जीवन की सभी अवस्थाओं का गतिक साम्य रहता है व्यक्ति के आयुवर्ग और पारिवारिक संस्कार और सामूहिक संस्कृति के अनुसार। और इस क्रम में ईसाइयत संस्कृति को उसका बड़ा भाई इस्लाम संस्कृति ही नियंत्रित कर सकेगा परन्तु किशी भी अवस्था में हिन्दू संस्कृति का पूर्ण विनाश नहीं होना चाहिए वरन मै अब कहना चाहूँगा की वर्तमान से ज्यादा ह्रास हिन्दू संस्कृति बर्दास्त नहीं कर सकती है और अब इसका संरक्षण और संवर्धन अतिअनिवार्य है। इन 14(2001-2015) वर्ष की समयावधि में अवस्था ऐसी आयी थी जिसमे श्रीराम के समानांतर चलने वाला इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर चलने वाली ईसाइयत दोनों श्रीरामकृष्ण के अस्तित्व समाप्त होने की आसंका से स्वयं को भी सामानांतर पद चिन्ह न मिलने की आसंका बीच श्रीरामकृष्ण को ही सम्पोषित किये मतलब इस प्रकार इसके माध्यम से सनातन हिन्दू संस्कृति को ही सम्पोषित किये मतलब विश्व मानवता इतिहास का अभूतपूर्व उदहारण इस भारत में प्रस्तुत हुआ इन 14 वर्ष की समयावधि में।

इन 14(2001-2015)  वर्ष की समयावधि में अवस्था ऐसी आयी थी जिसमे श्रीराम के समानांतर चलने वाला इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर चलने वाली ईसाइयत दोनों श्रीरामकृष्ण के अस्तित्व समाप्त होने की आसंका से स्वयं को भी सामानांतर पद चिन्ह न मिलने की आसंका बीच श्रीरामकृष्ण को ही सम्पोषित किये मतलब इस प्रकार इसके माध्यम से सनातन हिन्दू संस्कृति को ही सम्पोषित किये मतलब विश्व मानवता इतिहास का अभूतपूर्व उदहारण इस भारत में प्रस्तुत हुआ इन 14 वर्ष की समयावधि में।   वह सामाजिक जीवन जिसमे दम हो, जो रोचक हो तो ऐसे अच्छे जीवन को जिसको जीना हैं तो वह सांसार में कभी अभाव और भोगविलास की वस्तुओं से त्याग की अवस्था में  उस विष्वमानवता को जीना सीख लेना चाहिए अन्यथा भोग्यवादी दृश्टिकोण का जीवन ईसाइयत से पूरे विश्व को धक लेगा और मानवता का अंत अवश्यम्भावी हो जाएगा हिंदुत्वभाव समाप्त होते ही जिसमे जीवन की सभी अवस्थाओं का गतिक साम्य रहता है व्यक्ति के आयुवर्ग और पारिवारिक संस्कार और सामूहिक संस्कृति के अनुसार। और इस क्रम में ईसाइयत संस्कृति को उसका बड़ा भाई इस्लाम संस्कृति ही नियंत्रित कर सकेगा परन्तु किशी भी अवस्था में हिन्दू संस्कृति का पूर्ण विनाश नहीं होना चाहिए वरन मै अब कहना चाहूँगा की वर्तमान से ज्यादा ह्रास हिन्दू संस्कृति बर्दास्त नहीं कर सकती है और अब इसका संरक्षण और संवर्धन अतिअनिवार्य है।  इन 14(2001-2015)  वर्ष की समयावधि में अवस्था ऐसी आयी थी जिसमे श्रीराम के समानांतर चलने वाला इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर चलने वाली ईसाइयत दोनों श्रीरामकृष्ण के अस्तित्व समाप्त होने की आसंका से स्वयं को भी सामानांतर पद चिन्ह न मिलने की आसंका बीच श्रीरामकृष्ण को ही सम्पोषित किये मतलब इस प्रकार इसके माध्यम से सनातन हिन्दू संस्कृति को ही सम्पोषित किये मतलब विश्व मानवता इतिहास का अभूतपूर्व उदहारण इस भारत में प्रस्तुत हुआ इन 14 वर्ष की समयावधि में।  

रामपुर ख़ास: निः संदेह मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण और मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, श्रीधर(विष्णु) मामा मुझसे पुरुषार्थ में श्रेष्ठ है पर मै आज तक यही बताता रही की मै सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी(ब्रह्मा), सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण श्रीधर(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, डॉ प्रेमचंद(शिव) ताउजी के विश्व मानवता के हेतु संचित कार्य को पूर्णता इस लिए दे सका क्योंकि मेरे पास सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण परिवार की तीन पीढ़ी की संचित ऊर्जा थी और 2008 में अपने घर पर घराने की एक बूढ़ी शुक्ला परिवार से आयी दादी से अपने मौसीरे भाई जो पुलिस में है((वे मौसियेरे भाई इस फेसबुक मित्र मंडली में हैं जिनके साथ श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, तुलसी मानस मंदिर, संकटमोचन मंदिर, दुर्गाकुण्ड(दुर्गामंदिर) और विरला विश्वनाथ मंदिर (काशी हिन्दू विश्विद्यालय प्रांगण:परिसर), बड़ा गणेश मंदिर समेत 6 प्रमुख मंदिरों को उनकी शक्ति लौटाई थी 2008 में मैंने)) उनके सामने कहा था की प्रेमचंद(शिव), श्रीधर(विष्णु) और जोशी(ब्रह्मा) का कार्य अब उनके चाचा मतलब मेरे बाबा श्री बेचन राम(कांग्रेसी) और पिता श्री प्रदीप(रामजानकी=सत्यनारायण=आदित्यनाथ= सूर्यकान्त= विक्रमादित्य ) पूर्ण करने में लगे हैं मेरे साथ।

रामपुर ख़ास: निः संदेह मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण और मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, श्रीधर(विष्णु) मामा मुझसे पुरुषार्थ में श्रेष्ठ है पर मै आज तक यही बताता रही की मै सनातन आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण जोशी(ब्रह्मा), सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण श्रीधर(विष्णु) और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय, डॉ प्रेमचंद(शिव) ताउजी के विश्व मानवता के हेतु संचित कार्य को पूर्णता इस लिए दे सका क्योंकि मेरे पास सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण परिवार की तीन पीढ़ी की संचित ऊर्जा थी और 2008 में अपने घर पर घराने की एक बूढ़ी शुक्ला परिवार से आयी दादी से अपने मौसीरे भाई जो पुलिस में है((वे मौसियेरे भाई इस फेसबुक मित्र मंडली में हैं जिनके साथ श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, तुलसी मानस मंदिर, संकटमोचन मंदिर, दुर्गाकुण्ड(दुर्गामंदिर) और विरला विश्वनाथ मंदिर (काशी हिन्दू विश्विद्यालय प्रांगण:परिसर), बड़ा गणेश मंदिर समेत 6 प्रमुख मंदिरों को उनकी शक्ति लौटाई थी 2008 में मैंने)) उनके सामने कहा था की  प्रेमचंद(शिव), श्रीधर(विष्णु) और जोशी(ब्रह्मा) का कार्य अब उनके चाचा मतलब मेरे बाबा श्री बेचन राम(कांग्रेसी) और पिता श्री प्रदीप(रामजानकी=सत्यनारायण=आदित्यनाथ= सूर्यकान्त= विक्रमादित्य ) पूर्ण करने में लगे हैं मेरे साथ।

रामपुर ख़ास और राजीव भाई केवल नाम की ही बात नहीं करता वरन उस नाम की बात करता हूँ जो वैसा व्यक्तित्व भी हो : आप के प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वाले और आप के के कांग्रेसी विचारधारा वाले ही प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज और कांग्रेस की वर्तमान अवस्था के लिए जिम्मेदार है हमने उसे कोई छति नहीं पंहुचायी है इनको विश्वास रहता है की हम तिकड़म और षड़यंत्र बना कर हाँथ पर हाँथ रख कर बैठें और इंतज़ार करते रहे कोई महादेव जैसा व्यक्तित्व अपने आप आ कर फंसेगा ही और उसका स्वयं का स्वाभिमान और जमीर आहात होगा ही हम लोगों का शुभचिंतक होने के नाते और मजबूर होकर शुभकार्य और मानवता विरुद्ध कार्य करने वाले असुरों का संघार करेगा ही और हम स्वयं हाँथ पर हाँथ रखकर नमो-नमो करें और ब्राह्मणो की जाती का विग्रह करें और अपनी बेटियों को दूसरे जाती धर्म वालों के घर भेजें और उनकी बेटिओं से रिस्ता भी करें इस प्रकार स्वयं को और असुरों को ही वह शक्ति प्रदान करें जिससे की महादेव के कार्य में और विघ्न पहुंचे।>>>>>>>> तो मैंने 2007 में प्रयागराज विश्विद्यालय स्थिति अपना लक्ष्य पूरा किया ईसाई शासन के अधीन स्थापित विश्विद्यालय में पहली बार भारतीय सरकार के कार्यकाल में लक्ष्य के तहत निर्धारित नए सबसे अधिक केन्द्रों/विभागों के 67-69 स्थाई शिक्षक पद स्वीकृति करवाने में महत्वपूर्ण परोक्ष भूमिका निभाते हुए और दो वर्ष के ही दक्षिण प्रवास के दौरान 2007-28 अक्टूबर, 2009 के बीच आप के लिए मतलब कांग्रेस में लिए विशेष काल बने असुरों का संघार भी किया। तो मै एक व्यक्ति बनकर ही नहीं जिया हूँ वरन वह व्यक्तित्व हूँ जिसके खड़े होने पर विशाल जन समूह का तन, मन, कर्म, वचन और जीवन समर्पित हो जाता है मेरे समर्पित होते ही। तो मैं केवल नाम नहीं नाम अनुरूप व्यक्तित्व की बात करता हूँ जिसका कोई विकल्प न हो और उन लोगों में से नहीं जो अपना अधिकार सुरक्षित कर और रणनीति के तहत अधिक अधिकार के लिए लड़ते रहे हों और अब भी लड़ रहे हों जिसमे खोना कुछ न हो पाना ही पाना हो। और इसी लिए आप लोग इस चिंता से दूर हो परमात्मा को साक्षी मान यह विश्वास रखें की मैंने न कभी कांग्रेस को नुक्सान पंहुचाया है और न मेरे किशी कार्य से कांग्रेस को नुकशान पहुंचता है वरन आप के कांग्रेसी स्नेही जनों के कार्य ही ऐसे हैं की आप को छति हो रही है और वे भी ब्राह्मणो की ही जाति विग्रह पर लग गए है जिस पर पूरा विश्व लगा हुआ है जबकि पूरे विश्व का जन्म इन्ही ब्राह्मणो(सप्तर्षियों=सात ब्रह्मर्षियों) से ही हुआ है।

रामपुर ख़ास और राजीव भाई केवल नाम की ही बात नहीं करता वरन उस नाम की बात करता हूँ जो वैसा व्यक्तित्व भी हो : आप के प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वाले और आप के के कांग्रेसी विचारधारा वाले ही प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज और कांग्रेस की वर्तमान अवस्था के लिए जिम्मेदार है हमने उसे कोई छति नहीं पंहुचायी है इनको विश्वास रहता है की हम तिकड़म और षड़यंत्र बना कर हाँथ पर हाँथ रख कर बैठें और इंतज़ार करते रहे कोई महादेव जैसा व्यक्तित्व अपने आप आ कर फंसेगा ही और उसका स्वयं का स्वाभिमान और जमीर आहात होगा ही हम लोगों का शुभचिंतक होने के नाते और मजबूर होकर शुभकार्य और मानवता विरुद्ध कार्य करने वाले असुरों का संघार करेगा ही और हम स्वयं हाँथ पर हाँथ रखकर नमो-नमो करें और ब्राह्मणो की जाती का विग्रह करें और अपनी बेटियों को दूसरे जाती धर्म वालों के घर भेजें और उनकी बेटिओं से रिस्ता भी करें इस प्रकार स्वयं को और असुरों को ही वह शक्ति प्रदान करें जिससे की महादेव के कार्य में और विघ्न पहुंचे।>>>>>>>> तो मैंने 2007 में प्रयागराज विश्विद्यालय स्थिति अपना लक्ष्य पूरा किया ईसाई शासन के अधीन स्थापित विश्विद्यालय में पहली बार भारतीय सरकार के कार्यकाल में लक्ष्य के तहत निर्धारित नए सबसे अधिक केन्द्रों/विभागों के 67-69 स्थाई शिक्षक पद स्वीकृति करवाने में महत्वपूर्ण परोक्ष भूमिका निभाते हुए और दो वर्ष के ही दक्षिण प्रवास के दौरान 2007-28 अक्टूबर, 2009 के बीच आप के लिए मतलब कांग्रेस में लिए विशेष काल बने असुरों का संघार भी किया। तो मै एक व्यक्ति बनकर ही नहीं जिया हूँ वरन वह व्यक्तित्व हूँ जिसके खड़े होने पर विशाल जन समूह का तन, मन, कर्म, वचन और जीवन समर्पित हो जाता है मेरे समर्पित होते ही। तो मैं केवल नाम नहीं नाम अनुरूप व्यक्तित्व की बात करता हूँ जिसका कोई विकल्प न हो और उन लोगों में से नहीं जो अपना अधिकार सुरक्षित कर और रणनीति के तहत अधिक अधिकार के लिए लड़ते रहे हों और अब भी लड़ रहे हों जिसमे खोना कुछ न हो पाना ही पाना हो। और इसी लिए आप लोग इस चिंता से दूर हो परमात्मा को साक्षी मान यह विश्वास रखें की मैंने न कभी कांग्रेस को नुक्सान पंहुचाया है और न मेरे किशी कार्य से कांग्रेस को नुकशान पहुंचता है वरन आप के कांग्रेसी स्नेही जनों के कार्य ही ऐसे हैं की आप को छति हो रही है और वे भी ब्राह्मणो की ही जाति विग्रह पर लग गए है जिस पर पूरा विश्व लगा हुआ है जबकि पूरे विश्व का जन्म इन्ही ब्राह्मणो(सप्तर्षियों=सात ब्रह्मर्षियों) से ही हुआ है।