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Monday, February 29, 2016

सोमवार दिनांक, 30 जनवरी, 2012 को प्रयागराज विश्विद्यालय से काशी हिन्दू विश्विद्यालय जाते समय जी टी रोड से सीता समाहित स्थल सीतामढी की दिशा में जाने वाले मार्ग और गोपीगंज के बीच सार्वजनिक वाहन(बस) में मेरी ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) की 5 मिनट की परिक्षा के बाद शनिवार दिनांक 4 फरवरी, 2012 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर स्थित विरला विश्वनाथ मंदिर के सामने बिहारी चाय की दूकान पर बड़े भाई डॉ अखिलेश सिंह के सामने कोरिआ से कुछ दिन के लिए घर आये डॉ विनयशंकर पाण्डेय भाई जो मुझसे मिलने काशी हिन्दू विश्विद्यालय आये थे उनसे मैनें कहा था की सभी लोग या तो ऋषी महर्षि बन रहे हो या कृष्ण का रसिया स्वरुप ही बनते जा रहे हो कोई भी तो सियापति राम बनजाइये? तो 28 अगस्त, 2013 को श्रीकृष्णजन्मास्ठमी को मेरे द्वितीय पुत्र कृष्णकांत(राशिनाम वाशुदेव) के जन्म के बाद मेरा स्वरुप कुछ राम की दिशा में अग्रसर हुआ वैसे प्रथम पुत्र विष्णुकांत (विष्णुस्वामी:ब्रह्मा+विष्णु+महेश:परमब्रह्म:ब्रह्म:राम) अपने में ही राम हैं पर समय की माँग कुछ ऐसी थी की मुझे ही उस तरफ अग्रसर होना पड़ा लेकिन मै इसमें अपने सहपाठियों और गुरुकुल वासियों को दोष नहीं देता हूँ क्योंकि उसमे से कुछ ऐसे है जो कुछ लेकर ही सही, सही बोलते तो कम से कम है।

सोमवार दिनांक, 30 जनवरी, 2012 को प्रयागराज विश्विद्यालय से काशी हिन्दू विश्विद्यालय जाते समय जी टी रोड से सीता समाहित स्थल सीतामढी की दिशा में जाने वाले मार्ग और गोपीगंज के बीच सार्वजनिक वाहन(बस) में मेरी ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) की 5 मिनट की परिक्षा के बाद शनिवार दिनांक 4 फरवरी, 2012 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर स्थित विरला विश्वनाथ मंदिर के सामने बिहारी चाय की दूकान पर बड़े भाई डॉ अखिलेश सिंह के सामने कोरिआ से कुछ दिन के लिए घर आये डॉ विनयशंकर पाण्डेय भाई जो मुझसे मिलने काशी हिन्दू विश्विद्यालय आये थे उनसे मैनें कहा था की सभी लोग या तो ऋषी महर्षि बन रहे हो या कृष्ण का रसिया स्वरुप ही बनते जा रहे हो कोई भी तो सियापति राम बनजाइये? तो 28 अगस्त, 2013 को श्रीकृष्णजन्मास्ठमी को मेरे द्वितीय पुत्र कृष्णकांत(राशिनाम वाशुदेव) के जन्म के बाद मेरा स्वरुप कुछ राम की दिशा में अग्रसर हुआ वैसे प्रथम पुत्र विष्णुकांत (विष्णुस्वामी:ब्रह्मा+विष्णु+महेश:परमब्रह्म:ब्रह्म:राम) अपने में ही राम हैं पर समय की माँग कुछ ऐसी थी की मुझे ही उस तरफ अग्रसर होना पड़ा लेकिन मै इसमें अपने सहपाठियों और गुरुकुल वासियों को दोष नहीं देता हूँ क्योंकि उसमे से कुछ ऐसे है जो कुछ लेकर ही सही, सही बोलते तो कम से कम है।

Sunday, February 28, 2016

समझौता अपने स्वार्थ में मै भी कर लेता पर नहीं किया क्योंकि मेरा विकल्प कोई नहीं था जिसकी धारण क्षमता इतनी हो जो विष्वविनाश के प्रवाह को रोक लेता और साबित भी बचता तो जब मेरे समझौते से सब चला जाता अपने भी और पराये भी तो समझौते में मुझे कोई मेधाशक्ति/मेरिट नजर नहीं आयी।

मेरे गाँव रामापुर का कोई भी व्यक्ति अपने संज्ञान में मेरा विरोध मेरे जन्म से नहीं किया है अज्ञानता वस भले किया हो पर ईर्ष्या क्या होती है की जिससे तीन पीढ़ी की दूरी रही हो उसी का प्रयोग हुआ है श्रीधर(विष्णु) का विरोध का माध्यम बना जो इनकी ईर्ष्या का कारन ही था की  ये भूल गए की देवियों की रक्षा अगर राम नहीं कर सकते है तो कोई और कर ही नही सकता और तो और राम ही इस ब्रह्माण्ड में जीवन के एक मात्र मूल आधार है>>>>आप रामानंद कुल के रामानंद/---/रामप्रसाद कुल के रमानाथ/श्रीधर(विष्णु) कुल से बदला लेने लायक और दंड देने लायक अपने को समझ लिए थे तो उनको साम-दाम-दण्ड-भेद से दंड देना और बदला लेना कैसा रहा? इसे आप लोग बता दीजिये और आप के बदला लेने का उद्देश्य क्या मेरी ((सारंगधर(चंद्रशेखर)/---/देवव्रत (गंगापुत्र)/--/रामप्रसाद/बेचन (बचन) राम/प्रदीप पुत्र विवेक) की मेरिट को मिट्टी में मिलना और अपने पाल्य (जो दूसरों के पास थे)) की मेरिट को अनैतिक तरीके से ही सही एन केन प्रकारेण ऊंचा करना नहीं था? आप की मेधाशक्ति/मेरिट बढ़ गयी है मै मान ही लेता हूँ देवी कुल और उनके समर्थक, पर आप जो गन्दगी किये हैं अश्लील शाहित्य और चलचित्र देखकर/दिखाकर और इस माध्यम से अधिकतर समाज को अपने में मिलाने हेतु अधिकतर लोगों में उसे परोस कर तो उस गन्दगी को पहले साफ करिये अपनी बढ़ी हुई मेधाशक्ति/मेरिट से। न मै इंटरमीडिएट में द्वितीय श्रेणी हूँ न परास्नातक में तो क्या राज छुपा है इसमें की प्रथम श्रेणी से एक या दो प्रतिसत कम हो गया? तो मै इस राज को राज ही रहने दे रहा हूँ जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण था मेरा ऐसी कक्षाओं में सैद्धन्ति और प्रयोगात्मक दोनों में सामूहिक प्रदर्शन जिसके निचले मानक छात्रों से कम का भी अंक मिला मुझे परीक्षक द्वारा शाबासी दिए जाने के बावजूद। समझौता अपने स्वार्थ में मै भी कर लेता पर नहीं किया क्योंकि मेरा विकल्प  कोई नहीं था जिसकी धारण क्षमता इतनी हो जो विष्वविनाश के प्रवाह को रोक लेता और साबित भी बचता तो जब मेरे समझौते से सब चला जाता अपने भी और पराये भी तो समझौते में मुझे कोई मेधाशक्ति/मेरिट नजर नहीं आयी।

देवीकुल अपनी मेरिट/मेधा शक्ति और समय पहले दलित ईसाई को दलित फिर वैश्य/क्षत्रिय/ब्राह्मण बनाने में लगाए तब रामानंद/--/रामप्रशाद और सारंगधर(चंद्रशेखर)/../देवव्रत/--/रामप्रशाद कुल की बराबरी करे।>>>>>>>स्नातक के गुरुदेव डॉ गिरिजाशंकर दुबे कहते थे की जब सब तुमको सब कुछ पता है तो दुनिया भर की वेवकूफी में क्यों तुम पड़े हो? तो गुरु जी दुनिया में बेवकूफों की अधिकता हो गयी थी/है भारतीय और वैश्विक समाज में तो 1992 से ही वेवकूफी का शिकार हो समता के माध्यम से समानता लाने में ही मेरी मेधाशक्ति और ऊर्जा लगी है। लेकिन अब ज्यादा दिन बेवकूफी का शिकार नहीं रहूँगा ऐसी आस और विश्वास जगी है क्योंकि अब अधिकार मांगने वालों को कर्तव्य निर्वह भी करना होगा और उनकी भी मेधाशक्ति का उपयोग भी बेवकूफी में प्रयोग होगा समता लाने के लिए।

देवीकुल अपनी मेरिट/मेधा शक्ति और समय पहले दलित ईसाई को दलित फिर वैश्य/क्षत्रिय/ब्राह्मण बनाने में लगाए तब रामानंद/--/रामप्रशाद और सारंगधर(चंद्रशेखर)/../देवव्रत/--/रामप्रशाद कुल की बराबरी करे।>>>>>>>स्नातक के गुरुदेव डॉ गिरिजाशंकर दुबे कहते थे की जब सब तुमको सब कुछ पता है तो दुनिया भर की वेवकूफी में क्यों तुम पड़े हो? तो गुरु जी दुनिया में बेवकूफों की अधिकता हो गयी थी/है भारतीय और वैश्विक समाज में तो 1992 से ही वेवकूफी का शिकार हो समता के माध्यम से समानता लाने में ही मेरी मेधाशक्ति और ऊर्जा लगी है। लेकिन अब ज्यादा दिन बेवकूफी का शिकार नहीं रहूँगा ऐसी आस और विश्वास जगी है क्योंकि अब अधिकार मांगने वालों को कर्तव्य निर्वह भी करना होगा और उनकी भी मेधाशक्ति का उपयोग भी बेवकूफी में प्रयोग होगा समता लाने के लिए।

Saturday, February 27, 2016

स्नातक के गुरुदेव डॉ गिरिजाशंकर दुबे कहते थे की जब सब तुमको सब कुछ पता है तो दुनिया भर की वेवकूफी में क्यों तुम पड़े हो? तो गुरु जी दुनिया में बेवकूफों की अधिकता हो गयी थी/है भारतीय और वैश्विक समाज में तो 1992 से ही वेवकूफी का शिकार हो समता के माध्यम से समानता लाने में ही मेरी मेधाशक्ति और ऊर्जा लगी है। लेकिन अब ज्यादा दिन बेवकूफी का शिकार नहीं रहूँगा ऐसी आस और विश्वास जगी है क्योंकि अब अधिकार मांगने वालों को कर्तव्य निर्वह भी करना होगा और उनकी भी मेधाशक्ति का उपयोग भी बेवकूफी में प्रयोग होगा समता लाने के लिए।

स्नातक के गुरुदेव डॉ  गिरिजाशंकर दुबे कहते थे की जब सब तुमको सब कुछ पता है तो दुनिया भर की वेवकूफी में क्यों तुम पड़े हो? तो गुरु जी दुनिया में बेवकूफों की अधिकता हो गयी थी/है भारतीय और वैश्विक समाज में तो 1992 से ही वेवकूफी का शिकार हो समता के माध्यम से समानता लाने में ही मेरी मेधाशक्ति और ऊर्जा लगी है। लेकिन अब ज्यादा दिन बेवकूफी का शिकार नहीं रहूँगा ऐसी आस और विश्वास जगी है क्योंकि अब अधिकार मांगने वालों को कर्तव्य निर्वह भी करना होगा और उनकी भी मेधाशक्ति का उपयोग भी बेवकूफी में प्रयोग होगा समता लाने के लिए। 

मेरा पुनः निवेदन है की समता लाइए और केवल व्यवहारिक सत्य ही अपना लीजिए मेरी मेधाशक्ति/मेरिट और हैसियत पर न जाइए क्योंकि समानता लाना स्वयं इस्वर के वस में नहीं आप इसे कहाँ से ला सकते है? दलित ईसाई को सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण से ऊपर बना दिया आपने या उससे तुलना करते हैं या दलित ईसाई सन्दर्भ की तुलना उससे करते हैं जिसने क्षत्रिय से ब्राह्मण परिवार में जाकर अपना उन्नयन किया है (वह व्यक्ति, जाती धर्म जो सनातन हिन्दू धर्म में स्थापित सभी देवी, देवता और संस्कृति के रीती रिवाज को नहीं मानता है समूह सहित या समूह से अपने को अलग कर ऐसी स्थिति के पूर्व उसके साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी सम्मिलित संतानो/जातियों/धर्मो का विवाह सनातन हिन्दू संस्कृति शास्त्रीय विवाह की पद्धति से मान्य नहीं हो सकता है और न इसे कोई व्यक्ति /क़ानून/समाज बलात मनवा सकता है तो जो व्यक्ति /क़ानून/समाज इसे मान्यता दिया वह स्वयं गलत है तो मेरे जैसे व्यक्ति (जिसने जाति की भी सीमा नहीं तोड़ी धर्म की तो बहुत दूर की बात है) से प्रश्न करने का उसको हक नहीं पर सम्पूर्ण विश्व सहमत हो और अपने को प्रयागराज से जन्मी मूल संतान और मूल संस्कृति का मानता हो तो पहले विश्व व्यापक नियम और परिभाषा बनाई जाय तब मेरी मेरिट/मेधा शक्ति देखी जाय) जबकि स्वयं कोई ब्राह्मण भी सनातन ब्राह्मण अपने इसी जन्म में नहीं हो सकता और कोई सनातन ब्राह्मण स्वयं सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण भी इस जन्म में नहीं हो सकता मेरा यह अकाट्य मत है जबकि मै भी व्यवहारिकता में मानव मात्र को समान समझता हूँ और वैसा ही आचरण करता हूँ और यह भी मानता हूँ की मौलिक मानवीय अधिकार सबके बराबर हैं तो कर्तव्य भी अगर बराबर कर दिया जाय तो समान कार्य में ब्राह्मणोचित आचरण कर ब्राह्मण बना व्यक्ति, मौलिक ब्राह्मण, सनातन ब्राह्मण, सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण क्रमिक रूप से ऊर्जा में और सृजन में सबसे आगे रहेंगे ही उनको केवल किशी संस्था, सांगठनिक कार्य सामूहिक कार्य में संस्थागत रूप से शामिल कर उनको उस हेतु उपयोगी बना सबके लिए समानता का कार्य लेकर आप समतामूलक समाज की स्थापना भले कर लीजिये। अतः सत्य अपने में सत्य ही होता है इसे कोई व्यक्ति/व्यक्ति समूह/ संस्था/संगठन बदल नहीं सकता तो व्यवहारिक सत्य तक ही सीमित रहिये समता लाइए और केवल व्यवहारिक सत्य ही अपना लीजिए मेरी मेधाशक्ति/मेरिट और हैसियत पर न जाइए।

मेरा पुनः निवेदन है की समता लाइए और केवल व्यवहारिक सत्य ही अपना लीजिए मेरी मेधाशक्ति/मेरिट और हैसियत पर न जाइए क्योंकि समानता लाना स्वयं इस्वर के वस में नहीं आप इसे कहाँ से ला सकते है? दलित ईसाई को सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण से ऊपर बना दिया आपने या  उससे तुलना करते हैं या दलित ईसाई सन्दर्भ की तुलना  उससे करते हैं जिसने क्षत्रिय से  ब्राह्मण परिवार में जाकर अपना उन्नयन किया है (वह व्यक्ति, जाती धर्म जो सनातन हिन्दू धर्म में स्थापित सभी देवी, देवता  और संस्कृति   के रीती रिवाज को नहीं मानता है समूह सहित या समूह से अपने को अलग कर ऐसी स्थिति के पूर्व उसके साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी सम्मिलित संतानो/जातियों/धर्मो का विवाह सनातन हिन्दू संस्कृति शास्त्रीय विवाह की पद्धति से मान्य नहीं हो सकता है और न इसे कोई व्यक्ति /क़ानून/समाज बलात मनवा सकता है तो जो व्यक्ति /क़ानून/समाज  इसे मान्यता दिया वह स्वयं गलत है तो मेरे जैसे व्यक्ति (जिसने जाति की भी सीमा नहीं तोड़ी धर्म की तो बहुत दूर की बात है) से प्रश्न करने का उसको हक नहीं पर सम्पूर्ण विश्व सहमत हो और अपने को प्रयागराज से जन्मी मूल संतान और मूल संस्कृति का मानता हो तो पहले विश्व व्यापक नियम और परिभाषा बनाई जाय तब मेरी मेरिट/मेधा शक्ति देखी जाय)   जबकि स्वयं कोई ब्राह्मण भी सनातन ब्राह्मण अपने इसी जन्म में नहीं हो सकता और कोई सनातन ब्राह्मण स्वयं सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण भी इस जन्म में नहीं हो सकता मेरा यह अकाट्य मत है जबकि मै भी व्यवहारिकता में मानव मात्र को समान समझता हूँ और वैसा ही आचरण करता हूँ और यह भी मानता हूँ की मौलिक मानवीय अधिकार सबके बराबर हैं तो कर्तव्य भी अगर बराबर कर दिया जाय तो समान कार्य में ब्राह्मणोचित आचरण कर ब्राह्मण बना व्यक्ति, मौलिक  ब्राह्मण, सनातन ब्राह्मण, सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण क्रमिक रूप से ऊर्जा में और सृजन में सबसे आगे रहेंगे ही उनको केवल किशी संस्था, सांगठनिक कार्य  सामूहिक कार्य में संस्थागत रूप से शामिल कर उनको उस हेतु उपयोगी बना सबके लिए समानता का कार्य लेकर आप  समतामूलक समाज की स्थापना भले कर लीजिये।  अतः  सत्य अपने में सत्य ही होता है इसे कोई व्यक्ति/व्यक्ति समूह/ संस्था/संगठन बदल नहीं सकता तो व्यवहारिक सत्य तक ही सीमित रहिये समता लाइए और केवल व्यवहारिक सत्य ही अपना लीजिए मेरी मेधाशक्ति/मेरिट और हैसियत पर न जाइए। 

मेरा पुनः निवेदन है की समता लाइए और केवल व्यवहारिक सत्य ही अपना लीजिए मेरी मेधाशक्ति/मेरिट और हैसियत पर न जाइए क्योंकि समानता लाना स्वयं इस्वर के वस में नहीं आप इसे कहाँ से ला सकते है? दलित ईसाई को सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण से ऊपर बना दिया आपने या उससे तुलना करते हैं या दलित ईसाई सन्दर्भ की तुलना उससे करते हैं जिसने क्षत्रिय से ब्राह्मण परिवार में जाकर अपना उन्नयन किया है (वह व्यक्ति, जाती धर्म जो सनातन हिन्दू धर्म में स्थापित सभी देवी, देवता और संस्कृति के रीती रिवाज को नहीं मानता है समूह सहित या समूह से अपने को अलग कर ऐसी स्थिति के पूर्व उसके साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी सम्मिलित संतानो/जातियों/धर्मो का विवाह सनातन हिन्दू संस्कृति शास्त्रीय विवाह की पद्धति से मान्य नहीं हो सकता है और न इसे कोई व्यक्ति /क़ानून/समाज बलात मनवा सकता है तो जो व्यक्ति /क़ानून/समाज इसे मान्यता दिया वह स्वयं गलत है तो मेरे जैसे व्यक्ति से प्रश्न करने का उसको हक नहीं जिसने जाति की भी सीमा नहीं तोड़ी धर्म की तो बहुत दूर की बात है पर सम्पूर्ण विश्व सहमत हो और अपने को प्रयागराज से जन्मी मूल संतान और मूल संस्कृति का मानता हो तो पहले विश्व व्यापक नियम और परिभाषा बनाई जाय तब मेरी मेरिट/मेधा शक्ति देखी जाय) जबकि स्वयं कोई ब्राह्मण भी सनातन ब्राह्मण अपने इसी जन्म में नहीं हो सकता और कोई सनातन ब्राह्मण स्वयं सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण भी इस जन्म में नहीं हो सकता मेरा यह अकाट्य मत है जबकि मै भी व्यवहारिकता में मानव मात्र को समान समझता हूँ और वैसा ही आचरण करता हूँ और यह भी मानता हूँ की मौलिक मानवीय अधिकार सबके बराबर हैं तो कर्तव्य भी अगर बराबर कर दिया जाय तो समान कार्य में ब्राह्मणोचित आचरण कर ब्राह्मण बना व्यक्ति, मौलिक ब्राह्मण, सनातन ब्राह्मण, सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण क्रमिक रूप से ऊर्जा में और सृजन में सबसे आगे रहेंगे ही उनको केवल किशी संस्था, सांगठनिक कार्य सामूहिक कार्य में संस्थागत रूप से शामिल कर उनको उस हेतु उपयोगी बना सबके लिए समानता का कार्य लेकर आप समतामूलक समाज की स्थापना भले कर लीजिये। अतः सत्य अपने में सत्य ही होता है इसे कोई व्यक्ति/व्यक्ति समूह/ संस्था/संगठन बदल नहीं सकता तो व्यवहारिक सत्य तक ही सीमित रहिये समता लाइए और केवल व्यवहारिक सत्य ही अपना लीजिए मेरी मेधाशक्ति/मेरिट और हैसियत पर न जाइए।

मेरा पुनः निवेदन है की समता लाइए और केवल व्यवहारिक सत्य ही अपना लीजिए मेरी मेधाशक्ति/मेरिट और हैसियत पर न जाइए क्योंकि समानता लाना स्वयं इस्वर के वस में नहीं आप इसे कहाँ से ला सकते है? दलित ईसाई को सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण से ऊपर बना दिया आपने या  उससे तुलना करते हैं या दलित ईसाई सन्दर्भ की तुलना  उससे करते हैं जिसने क्षत्रिय से  ब्राह्मण परिवार में जाकर अपना उन्नयन किया है (वह व्यक्ति, जाती धर्म जो सनातन हिन्दू धर्म में स्थापित सभी देवी, देवता  और संस्कृति   के रीती रिवाज को नहीं मानता है समूह सहित या समूह से अपने को अलग कर ऐसी स्थिति के पूर्व उसके साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा इनकी सम्मिलित संतानो/जातियों/धर्मो का विवाह सनातन हिन्दू संस्कृति शास्त्रीय विवाह की पद्धति से मान्य नहीं हो सकता है और न इसे कोई व्यक्ति /क़ानून/समाज बलात मनवा सकता है तो जो व्यक्ति /क़ानून/समाज  इसे मान्यता दिया वह स्वयं गलत है तो मेरे जैसे व्यक्ति से प्रश्न करने का उसको हक नहीं जिसने जाति की भी सीमा नहीं तोड़ी धर्म की तो बहुत दूर की बात है पर सम्पूर्ण विश्व सहमत हो और अपने को प्रयागराज से जन्मी मूल संतान और मूल संस्कृति का मानता हो तो पहले  विश्व व्यापक नियम और परिभाषा बनाई जाय तब मेरी मेरिट/मेधा शक्ति देखी जाय)   जबकि स्वयं कोई ब्राह्मण भी सनातन ब्राह्मण अपने इसी जन्म में नहीं हो सकता और कोई सनातन ब्राह्मण स्वयं सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण भी इस जन्म में नहीं हो सकता मेरा यह अकाट्य मत है जबकि मै भी व्यवहारिकता में मानव मात्र को समान समझता हूँ और वैसा ही आचरण करता हूँ और यह भी मानता हूँ की मौलिक मानवीय अधिकार सबके बराबर हैं तो कर्तव्य भी अगर बराबर कर दिया जाय तो समान कार्य में ब्राह्मणोचित आचरण कर ब्राह्मण बना व्यक्ति, मौलिक  ब्राह्मण, सनातन ब्राह्मण, सप्तर्षि सनातन ब्राह्मण क्रमिक रूप से ऊर्जा में और सृजन में सबसे आगे रहेंगे ही उनको केवल किशी संस्था, सांगठनिक कार्य  सामूहिक कार्य में संस्थागत रूप से शामिल कर उनको उस हेतु उपयोगी बना सबके लिए समानता का कार्य लेकर आप  समतामूलक समाज की स्थापना भले कर लीजिये।  अतः  सत्य अपने में सत्य ही होता है इसे कोई व्यक्ति/व्यक्ति समूह/ संस्था/संगठन बदल नहीं सकता तो व्यवहारिक सत्य तक ही सीमित रहिये समता लाइए और केवल व्यवहारिक सत्य ही अपना लीजिए मेरी मेधाशक्ति/मेरिट और हैसियत पर न जाइए। 

इसीलिए सूर्य को शशिकांत/चंद्रकांत कहा गया है मै इस तथ्य से भी अवगत था की काशी हिन्दू विश्विद्यालय अर्धचंद्राकार क्षेत्र पर बसाया गया है तो सबसे सीधी दूरी व्यास ही होगा और इससे भी अवगत हो जाइए की उसे मदनमोहन मतलब श्रीकृष्ण ने ही बसाया है यह अब मुझसे सुन लीजिये। लेकिन वृष्णिवंशीय/यदुवंशीय/इलावंशीय/चन्द्रवंशीय/इक्शाकुवंशीय/सूर्यवंशीय कश्यप गोत्रीय देवकीनन्दन/वाशुदेवनन्दन-यशोदानंदन/नन्द नंदन कृष्ण स्वयं राम=राम=परमब्रह्म=ब्रह्म में ही मिलते है जैसे समस्त ब्रह्माण्ड राम=परमब्रह्म=ब्रह्म में ही मिलता है और ये ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनो राम में ही मिलते है या तीनों के मिलने से राम ही मिलते हैं तो राम सनातन और अनादि हैं और उसमे रघुवंशी/इक्शाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय दशरथ/कौशल्या नंदन सशरीर परमब्रह्म=ब्रह्म श्रीराम/राम वह हैं जिनको यह समाज देख और समझ सका तो उसी तरह कोई भी चन्द्र हो सूर्य के बिना उसका अस्तित्व संभव ही नहीं मतलब तेज विहीन है वह और इसीलिए सूर्य को शशिकांत/चंद्रकांत कहा गया है। तो मित्रों जो प्रदीप=सूर्यकांत=सूर्यस्वामी= सूर्यनाथ=आदित्यनाथ=सूर्य के भी ऊर्जा की आतंरिक स्वयंनिहित शक्ति = रामजानकी= सत्यनारायण जीवन भर रहा हो वह निह स्वार्थ भाव से वह कितनो को ऊर्जा दिया होगा इसको वही समझ सकता है जो रामजानकी मतलब रामा मतलब राम और सीता दोनों का एकल स्वरूप कम से कम कुछ दिनों तक रहा हो।

इसीलिए सूर्य को शशिकांत/चंद्रकांत  कहा गया है मै इस तथ्य से भी अवगत था की काशी हिन्दू विश्विद्यालय अर्धचंद्राकार क्षेत्र पर बसाया गया है तो सबसे सीधी दूरी व्यास ही होगा और इससे भी अवगत हो जाइए की उसे मदनमोहन मतलब श्रीकृष्ण ने ही बसाया है यह अब मुझसे सुन लीजिये।  लेकिन वृष्णिवंशीय/यदुवंशीय/इलावंशीय/चन्द्रवंशीय/इक्शाकुवंशीय/सूर्यवंशीय कश्यप गोत्रीय देवकीनन्दन/वाशुदेवनन्दन-यशोदानंदन/नन्द नंदन कृष्ण स्वयं राम=राम=परमब्रह्म=ब्रह्म में ही मिलते है जैसे समस्त  ब्रह्माण्ड राम=परमब्रह्म=ब्रह्म में ही मिलता है और ये ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनो राम में ही मिलते है या तीनों के मिलने से राम ही मिलते हैं तो राम सनातन और अनादि हैं और उसमे रघुवंशी/इक्शाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय दशरथ/कौशल्या नंदन सशरीर परमब्रह्म=ब्रह्म श्रीराम/राम वह हैं जिनको यह समाज देख और समझ सका तो उसी तरह कोई भी चन्द्र हो सूर्य के बिना उसका अस्तित्व संभव ही नहीं मतलब तेज विहीन है वह और इसीलिए सूर्य को शशिकांत/चंद्रकांत कहा गया है।  तो मित्रों जो प्रदीप=सूर्यकांत=सूर्यस्वामी= सूर्यनाथ=आदित्यनाथ=सूर्य के भी ऊर्जा की आतंरिक स्वयंनिहित शक्ति = रामजानकी= सत्यनारायण जीवन भर रहा हो वह निह स्वार्थ भाव से वह कितनो को ऊर्जा दिया होगा इसको वही समझ सकता है जो रामजानकी मतलब रामा मतलब राम और सीता दोनों का एकल स्वरूप कम से कम कुछ दिनों तक रहा हो।      

विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)): परमब्रह्म श्रीकृष्ण का अर्जुन को दिया भाष्य व्यासः ऋषी अपनी सुदूर संवेदी शक्ति से सुने और उसे वह कलम बद्ध किये न की श्रीकृष्ण पर मै इस मानव समाज को अर्जुन/भारत (जिसमे इस्वर के प्रति आस्था हो) मान अपने ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" में संकलित किया हूँ इस आशा के साथ की अतीव शीघ्रता के साथ जो सामाजिक परिवर्तन जो हो रहे थे और आगे भी होने जा रहे हैं उसमे मानव जीवन के लिए यह हितकारी हो विशेष कर विश्व की सभी संस्कृतियों/मानवता के केंद्र बिंदु प्रयागराज/अल्लाहबाद/अल्लाह आवास/अल्लाह आबााद/इला-आवास/इला-आबाद/संगम(गंगा+जमुना+सरस्वती)/त्रिवेणी/सप्त ऋषियों:सप्तर्षियों:सात ब्रह्मर्षियों के प्राकट्य हेतु हुए सृस्टि के प्राचीनतम प्रकृष्टा यज्ञ के स्थान प्रयागराज से निकल कर:>>>>> मानव समाज के आगे लगातार 2006-2016 तक पहले ऑरकुट और उसी को ब्लॉग और फिर उसी केंद्रित विचार को पुनः प्रयागराज में फेसबुक और फिर उसी को ब्लॉग पर उतारते हुए प्रयागराज विश्विद्यालय से भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर और पुनः प्रयागराज की यात्रा सामान्य जीवन जीते हुए और सामान्य व्यक्ति की तरह भ्रमण करते हुए भी जो हर किशी से सम्भव नहीं अगर वह मेरी जैसी उस परिस्थिति से गुजरा हो जिसका सामना कर मानवता हित में बिना किशी स्थायित्व पाने से पूर्व ही त्याग, बलिदान और तप का श्रेष्ठ प्रदर्शन कर उस मानवता संहार की भयावह विभीषिका लोगों को निकला हो जिसका गुनाह वही मानव समाज किया हो तो वह शक्ति थी गुरुभक्ति में और ऐसे व्यक्तित्व वाला मै ही था जिसके परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा, श्रीधर(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, डॉ. प्रेमचंद(शिव) थे और जिनसे मेरे द्वारा मेरे लिए न करने योग्य कर्म और इसमे शामिल लोगों के द्वारा किशी भी प्रकार न संभव हो पाने वाला कार्य भी बताने के बावजूद उन दोनों के गुरु प्रोफेसर जोशी जी(ब्रह्मा) की इक्षापूर्ति हेतु इस कार्य को संपादित करने हेतु लगना पड़ा था। तो मेरी मेरिट क्या थी इस पर पुनः विचार होना चाहिए?

विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)): परमब्रह्म श्रीकृष्ण का अर्जुन को दिया भाष्य व्यासः ऋषी अपनी सुदूर संवेदी शक्ति से सुने और उसे वह कलम बद्ध किये न की श्रीकृष्ण पर मै इस मानव समाज को अर्जुन/भारत (जिसमे इस्वर के प्रति आस्था हो) मान अपने ब्लॉग "Vivekanand and Modern Tradition" में संकलित किया हूँ इस आशा के साथ की अतीव शीघ्रता के साथ जो सामाजिक परिवर्तन जो हो रहे थे और आगे भी होने जा रहे हैं उसमे मानव जीवन के लिए यह हितकारी हो विशेष कर विश्व की सभी संस्कृतियों/मानवता के केंद्र बिंदु प्रयागराज/अल्लाहबाद/अल्लाह आवास/अल्लाह आबााद/इला-आवास/इला-आबाद/संगम(गंगा+जमुना+सरस्वती)/त्रिवेणी/सप्त ऋषियों:सप्तर्षियों:सात ब्रह्मर्षियों के प्राकट्य हेतु हुए सृस्टि के प्राचीनतम प्रकृष्टा यज्ञ के स्थान प्रयागराज से निकल कर:>>>>> मानव समाज के आगे लगातार 2006-2016 तक पहले ऑरकुट और उसी को ब्लॉग और फिर उसी केंद्रित विचार को पुनः प्रयागराज में फेसबुक और फिर उसी को ब्लॉग पर उतारते हुए प्रयागराज विश्विद्यालय से भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर और पुनः प्रयागराज की यात्रा सामान्य जीवन जीते हुए और सामान्य व्यक्ति की तरह भ्रमण करते हुए भी जो हर किशी से सम्भव नहीं अगर वह मेरी जैसी उस परिस्थिति से गुजरा हो जिसका सामना कर मानवता हित में बिना किशी स्थायित्व पाने से पूर्व ही त्याग, बलिदान और तप का श्रेष्ठ प्रदर्शन कर उस मानवता संहार की भयावह विभीषिका लोगों को निकला हो जिसका गुनाह वही मानव समाज किया हो तो वह शक्ति थी गुरुभक्ति में और ऐसे व्यक्तित्व वाला मै ही था जिसके परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा, श्रीधर(विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पाण्डेय ब्राह्मण, डॉ. प्रेमचंद(शिव) थे और जिनसे मेरे द्वारा मेरे लिए न करने योग्य कर्म और इसमे शामिल लोगों के द्वारा किशी भी प्रकार न संभव हो पाने वाला कार्य भी बताने के बावजूद उन दोनों के गुरु प्रोफेसर जोशी जी(ब्रह्मा) की इक्षापूर्ति हेतु इस कार्य को संपादित करने हेतु लगना पड़ा था। तो मेरी मेरिट क्या थी इस पर पुनः विचार होना चाहिए?

Thursday, February 25, 2016

रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम। ---------------||------------ईस्वर अल्ला तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान। ।

प्रयागराज/अल्लाहबाद/अल्लाह आवास/अल्लाह आबााद/इला-आवास/इला-आबाद/संगम(गंगा+जमुना+सरस्वती)/त्रिवेणी/सप्त ऋषियों:सप्तर्षियों:सात ब्रह्मर्षियों के प्राकट्य हेतु हुए सृस्टि के प्राचीनतम प्रकृष्टा यज्ञ का स्थान प्रयागराज:->>>>>>>>> God is only Truth or Truth is only God: But this is the Prayagraj Society who himself ruined the God means ruining the Truth being selfish even then if there is no destruction but construction, conservation, reproduction/ production and progress was/is continually going on, they still want to affect the dignity of that GOD means Truth and they do not think that its only word "Guru" which controlled the GOD=Truth (That God means Truth is still alive means embodied Ram=Param Brahm =Brahm=Ishvar= Allah =GOD is still alive because of the Truth/God is immortal being the house of the SOUL/SPIRIT of all living human)|--------------------- रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम। ---------------|-------------||------------ईस्वर अल्ला तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान। ।

Saturday, February 20, 2016

प्रयागराज/अल्लाहबाद/अल्लाह आवास/अल्लाह आबााद/इला-आवास/इला-आबाद/संगम(गंगा+जमुना+सरस्वती)/त्रिवेणी/सप्त ऋषियों:सप्तर्षियों:सात ब्रह्मर्षियों के प्राकट्य हेतु हुए सृस्टि के प्राचीनतम प्रकृष्टा यज्ञ का स्थान प्रयागराज:->>>>>>>>> God is only Truth or Truth is only God: But this is the Prayagraj Society who himself ruined the God means ruining the Truth being selfish even then if there is no destruction but construction, conservation, reproduction/ production and progress was/is continually going on, they still want to affect the dignity of that GOD means Truth and they do not think that its only word "Guru" which controlled the GOD=Truth (That God means Truth is still alive means embodied Ram=Param Brahm =Brahm=Ishvar= Allah =GOD is still alive because of the Truth/God is immortal being the house of the SOUL/SPIRIT of all living human)|

प्रयागराज/अल्लाहबाद/अल्लाह आवास/अल्लाह आबााद/इला-आवास/इला-आबाद/संगम(गंगा+जमुना+सरस्वती)/त्रिवेणी/सप्त ऋषियों:सप्तर्षियों:सात ब्रह्मर्षियों के प्राकट्य हेतु हुए सृस्टि के प्राचीनतम प्रकृष्टा यज्ञ का स्थान प्रयागराज:->>>>>>>>> God is only Truth or Truth is only God: But this is the Prayagraj Society who himself ruined the God means ruining the Truth being selfish even then if there is no destruction but construction, conservation, reproduction/ production and progress was/is continually going on, they still want to affect the dignity of that GOD means Truth and they do not think that its only word "Guru" which controlled the GOD=Truth (That God means Truth is still alive means embodied Ram=Param Brahm =Brahm=Ishvar= Allah =GOD is still alive because of the Truth/God is immortal being the house of the SOUL/SPIRIT of all living human)|


Thursday, February 18, 2016

संस्कृत व्याकरण व् साहित्य के मर्मज्ञ पर कर्मकांड का ज्ञान होंने पर भी व्यवहारिक कर्मकांड व् पूजा-पाठ तक ही सीमित तथा चारित्रिक रूप से महत्तम कुलीनता के लिए जाने जाने वाले दाढ़ी वाले पंडित जी जो प्रयागराज/अल्लाहबाद/अल्लाह आवास/अल्लाह आबााद/इला-आवास/इला-आबाद/संगम(गंगा+जमुना+सरस्वती)/त्रिवेणी/सप्त ऋषियों:सप्तर्षियों:सात ब्रह्मर्षियों के प्राकट्य हेतु हुए सृस्टि के प्राचीनतम प्रकृष्टा यज्ञ के स्थान प्रयागराज के ही गुरुकुल में ही शास्त्रीय की परिक्षा में गुरुकुलों में प्रथम स्थान पाये थे तो रामानंद/रामप्रसाद कुल में जन्मे ऐसे सनातन गौतम गोत्रीय व्याषी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के श्री रमानाथ(विष्णु) परिवार के विष्णु कुल (श्रीकांत+श्रीधर+श्रीप्रकाश) के भांजे ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम और जिसका आतंरिक शक्तिनाम मतलब राशिनाम गिरिधर(गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) को विष्णु और लक्ष्मी तथा ब्रह्मा और सरस्वती के निवास स्थल प्रयागराज से कौन डिगा सकता था, है और देगा। जिस रमानाथ के आगे उनके छोटे भाई पारसनाथ(शिव) और उनकी अर्धांगिनी(कैलाशी) सदा नतमस्तक रहती थीं जो पारसनाथ(शिव) इस प्रयागराज में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा जी ( अटल जी की दुर्गा) द्वारा लगाई गयी आपातकाल के अभूतपूर्व साहसिक कार्य नैनी जेल में प्रथम दिन की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की की शाखा लगवाने से लेकर जीवन के अंतिम दिन तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्वहिंदू परिषद, विद्यार्थी परिषद और बजरंगदल में अपनी छाप छोड़ने वाले थे।

संस्कृत व्याकरण व् साहित्य  के मर्मज्ञ पर कर्मकांड का ज्ञान होंने पर भी व्यवहारिक कर्मकांड व् पूजा-पाठ तक ही सीमित तथा चारित्रिक रूप से महत्तम कुलीनता के लिए जाने जाने वाले दाढ़ी वाले पंडित जी  जो प्रयागराज/अल्लाहबाद/अल्लाह आवास/अल्लाह आबााद/इला-आवास/इला-आबाद/संगम(गंगा+जमुना+सरस्वती)/त्रिवेणी/सप्त ऋषियों:सप्तर्षियों:सात ब्रह्मर्षियों के प्राकट्य हेतु हुए सृस्टि के प्राचीनतम प्रकृष्टा यज्ञ के स्थान प्रयागराज के ही गुरुकुल में ही शास्त्रीय की परिक्षा में गुरुकुलों में प्रथम स्थान पाये थे तो रामानंद/रामप्रसाद कुल में जन्मे ऐसे सनातन गौतम गोत्रीय व्याषी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के श्री रमानाथ(विष्णु) परिवार के विष्णु कुल (श्रीकांत+श्रीधर+श्रीप्रकाश) के भांजे ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम और जिसका आतंरिक शक्तिनाम मतलब राशिनाम गिरिधर(गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))  को विष्णु और लक्ष्मी तथा ब्रह्मा और सरस्वती के निवास स्थल प्रयागराज से कौन डिगा सकता था, है और देगा।  जिस रमानाथ के आगे उनके छोटे भाई पारसनाथ(शिव) और उनकी अर्धांगिनी(कैलाशी) सदा नतमस्तक रहती थीं जो पारसनाथ(शिव)  इस प्रयागराज में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा जी ( अटल जी की दुर्गा) द्वारा लगाई गयी आपातकाल के अभूतपूर्व साहसिक कार्य नैनी जेल में प्रथम दिन की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की की शाखा लगवाने से लेकर जीवन के अंतिम दिन तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्वहिंदू परिषद, विद्यार्थी परिषद और बजरंगदल में अपनी छाप छोड़ने वाले थे।
K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies
Ramapur
Bishunpur
KBCAOS
KBCAOS
K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies 

मेरा इतना कहना तो मानना पडेगा ही की दुनिया व्यवहारिक रूप से रोमांचकारी और रुचिकर लगे और किशी को अत्यंत नीरस न लगे की जीवन से वह निरास हो जाय सामाजिक कारणों से तो इसका मतलब यह नहीं इसको कुछ लोगों के लिए इतना रोमांचकारी और रुचिकर बना दीजिये की वह भोगविलास से ऐसा आसक्त हो जाय की सत्य से उसका साक्षात्कार होना ही सम्भव ही न हो सके और दूसरे उसे देख या उसका अनुचित लाभ उठा स्वाभाविक रूप से अपने जीवन में अनियंत्रित या उनका का जीवन नीरस हो जाय या किशी को नियंत्रित करने के लिए उसका जीवन इतना नीरस आप बना दीजिये की दूसरे उसकी नीरसता पर व्यंग कसें और अपने जीवन पर ऐसे इतराय की वह स्वयं में इतना चमत्कारिक लगे की वह रोमांचकारी और रुचिकर ही क्या भोगविलास से आसक्त होने की अवस्था से कई गुना ज्यादा आमाद बढ़ा दे की अपने आप सामान्यजन के लये असहनीय हो जाय इसका यह भी मतलब नहीं की यह दुनिआ अधिकाँश लोगों को रोमांचकारी और रुचिकर न लगे और न तो किशी का जीवन नीरस हो क्योंकि नियति:ब्रह्म:परमब्रह्म// प्रकृति:सृजन को उसका कार्य वहन करने देना चाहिए।

मेरा इतना कहना तो मानना पडेगा ही की दुनिया व्यवहारिक रूप से रोमांचकारी और रुचिकर लगे और किशी को अत्यंत नीरस न लगे की जीवन से वह निरास हो जाय सामाजिक कारणों से तो इसका मतलब यह नहीं इसको कुछ लोगों के लिए इतना रोमांचकारी और रुचिकर बना दीजिये की वह भोगविलास से ऐसा आसक्त हो जाय की सत्य से उसका साक्षात्कार होना ही सम्भव ही न हो सके और दूसरे उसे देख या उसका अनुचित लाभ उठा स्वाभाविक रूप से अपने जीवन में अनियंत्रित या उनका का जीवन नीरस हो जाय या किशी को नियंत्रित करने के लिए उसका जीवन इतना नीरस आप बना दीजिये की दूसरे उसकी नीरसता पर व्यंग कसें और अपने जीवन पर ऐसे इतराय की वह स्वयं में इतना चमत्कारिक लगे की वह रोमांचकारी और रुचिकर ही क्या भोगविलास से आसक्त होने की अवस्था से कई गुना ज्यादा आमाद बढ़ा दे की अपने आप सामान्यजन के लये असहनीय हो जाय इसका यह भी मतलब नहीं की यह दुनिआ अधिकाँश लोगों को रोमांचकारी और रुचिकर न लगे और न तो किशी का जीवन नीरस हो क्योंकि नियति:ब्रह्म:परमब्रह्म// प्रकृति:सृजन को उसका कार्य वहन करने देना चाहिए।

Wednesday, February 17, 2016

विवेक>>>>>>विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम और जिसका आतंरिक शक्तिनाम मतलब राशिनाम गिरिधर(गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) । >>>>>>>>>संजय कौन तो संजय वह जिसके पास तीसरा नेत्र हो तो त्रिदेवों में 1) शिव (शरीर में ही निहित होता है जिससे सब ज्ञात होता रहता है पर आतंरिक और वाह्य सुरक्षा शक्ति की तरह आवश्यता पड़ने पर ही खुलता है ) और 2) ब्रह्मा(अपने ब्रह्म ज्ञान के आधार पर जिनका तीसरा नेत्र दिखाई नहीं देता पर सब कुछ जानते हैं)। तो फिर अलख निरंजन श्रीधर (विष्णु) क्यों नहीं हुए संजय जिन अलख निरंजन श्रीधर (विष्णु) की दुनिया में प्रत्यक्ष को ही सत्य मानते है दूर दृस्टि के आधार पर ही नहीं| लेकिन क्या ऐसा है की श्रीधर (विष्णु) अलखनिरंजन होते हुए भी तीसरे नेत्र विहीन हैं और नहीं हुए संजय? नहीं ये त्रिदेव ही नहीं त्रिदेविया आदिदेवी:महादेवी:त्रिदेवियों में आद्या:सरस्वती, लक्ष्मी और सती:उमा:अपर्णा: गौरा:पार्वती: (सरस्वती के नातिनी/पौत्री: ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशीराज दक्ष प्रजापति की पुत्री जो समस्त नारी जगत की बहन हैं जो क्योंकि काशीराज दक्षप्रजापति ही समस्त नारी जगत के स्रोत:पिता है जिसमे से सती से छोटी वे 13 बहने भी शामिल हैं जो प्रथम:आदिऋषि:जेष्ठ सप्तर्षि कश्यप की पत्निया थीं) भी त्रिनेत्रधारी:त्रयम्बक:त्रिलोचन ही हैं जो अपने भक्तों के संकट को सच्चे मन से दूर से ही जान लेती है। तो मित्रो जो प्रेमचंद (शिव) के रामापुर-223225 स्थित सारंगधर(चंद्रशेखर)/--/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/--/रामप्रसाद के दरवाजे और श्रीधर(विष्णु) के बिशुनपुर-223103 स्थित रामानंद/रामप्रसाद के दरवाजे पर आज तक व्यवहारिक रूप से आदर्श व्यवहार पर सत्य साबित हुआ हो उसे जोशी ब्रह्मा के प्रयागराज/अल्लाहबाद/अल्लाह आवास/अल्लाह आबााद/इला-आवास/इला-आबाद/संगम(गंगा+जमुना+सरस्वती)/त्रिवेणी/सप्त ऋषियों:सप्तर्षियों:सात ब्रह्मर्षियों के प्राकट्य हेतु हुए सृस्टि के प्राचीनतम प्रकृष्टा यज्ञ के स्थान प्रयागराज स्थित प्रयागराज विश्विद्यालय के नेहरू विज्ञान केंद्र स्थित केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र पर कोई व्यवहारिक रूप से आदर्श व्यवहार पर सत्य साबित होने से रोक नहीं सकता है कितना भी जोर आजमाईश कर ले।

विवेक>>>>>>विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम और जिसका आतंरिक शक्तिनाम मतलब राशिनाम गिरिधर(गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) । >>>>>>>>>संजय कौन तो संजय वह जिसके पास तीसरा नेत्र  हो तो त्रिदेवों में 1) शिव (शरीर में ही निहित होता है जिससे सब ज्ञात होता रहता है पर आतंरिक और वाह्य सुरक्षा शक्ति की तरह आवश्यता पड़ने पर ही खुलता है ) और 2) ब्रह्मा(अपने ब्रह्म ज्ञान के आधार पर जिनका तीसरा नेत्र दिखाई नहीं देता पर सब कुछ जानते हैं)। तो फिर अलख निरंजन श्रीधर (विष्णु) क्यों नहीं हुए संजय जिन अलख निरंजन श्रीधर (विष्णु) की दुनिया में प्रत्यक्ष को ही सत्य मानते है दूर दृस्टि के आधार पर ही नहीं|  लेकिन क्या ऐसा है की श्रीधर (विष्णु) अलखनिरंजन होते हुए भी तीसरे नेत्र विहीन हैं और नहीं हुए संजय? नहीं ये त्रिदेव ही नहीं त्रिदेविया आदिदेवी:महादेवी:त्रिदेवियों में आद्या:सरस्वती, लक्ष्मी और सती:उमा:अपर्णा: गौरा:पार्वती: (सरस्वती के नातिनी/पौत्री: ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशीराज दक्ष प्रजापति की पुत्री जो समस्त नारी जगत की बहन हैं जो क्योंकि काशीराज दक्षप्रजापति ही समस्त नारी जगत के स्रोत:पिता है जिसमे से सती से छोटी वे 13 बहने भी शामिल हैं जो प्रथम:आदिऋषि:जेष्ठ सप्तर्षि कश्यप की पत्निया थीं)  भी त्रिनेत्रधारी:त्रयम्बक:त्रिलोचन ही हैं जो अपने भक्तों के संकट को सच्चे मन से दूर से ही जान लेती है। तो मित्रो जो प्रेमचंद (शिव) के रामापुर-223225  स्थित सारंगधर(चंद्रशेखर)/--/देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/--/रामप्रसाद के दरवाजे और श्रीधर(विष्णु) के बिशुनपुर-223103 स्थित रामानंद/रामप्रसाद के दरवाजे पर आज तक व्यवहारिक रूप से आदर्श व्यवहार पर सत्य साबित हुआ हो उसे जोशी ब्रह्मा के प्रयागराज/अल्लाहबाद/अल्लाह आवास/अल्लाह आबााद/इला-आवास/इला-आबाद/संगम(गंगा+जमुना+सरस्वती)/त्रिवेणी/सप्त ऋषियों:सप्तर्षियों:सात ब्रह्मर्षियों के प्राकट्य हेतु हुए सृस्टि के प्राचीनतम प्रकृष्टा यज्ञ के स्थान प्रयागराज स्थित प्रयागराज विश्विद्यालय के नेहरू विज्ञान केंद्र स्थित केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागरीय अध्ययन केंद्र पर कोई व्यवहारिक रूप से आदर्श व्यवहार पर सत्य साबित होने से रोक नहीं सकता है कितना भी जोर आजमाईश कर ले।

इस दुनिया का हर व्यक्ति और हर वस्तु राम में ही समाहित हो जाती/जाता है जो स्वयं में ब्रह्म/परमब्रह्म हैं और इसीलिये सनातन हिन्दू संस्कृति में किशी के मरने पर राम नाम सत्य है ही बोलते हैं न की विष्णु नाम सत्य है, न की शिव नाम सत्य है और न की ब्रह्मा नाम सत्य है। तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इसी राम में ही समाहित होता है तो कृष्ण भी राम में ही मिलते है तो इसीलिये मैंने विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम अक्सर लिखता हूँ मतलब अंत में सीता भी राम में ही मिलाती है जिस सीता का एक नाम रामा है और प्रकार सीता इस नाम से अस्तित्व में बनी रह सकती है तो सीता का रामा नाम ही सीता को अस्तित्व में रखता है राम में समाहित होने से तो रामा में राम होने से यह निश्चित होता है की रामा पूर्ण नाम है जिसमे राम और सीता के लिए श्रीराम सम्बोधन की जरूरत नहीं रामा से ही राम और सीता दोनों के प्रति श्रद्धा भक्ति और निष्ठा प्रकट हो जाएगी।

इस दुनिया का हर व्यक्ति और हर वस्तु राम में ही समाहित हो जाती/जाता है जो स्वयं में ब्रह्म/परमब्रह्म हैं और इसीलिये सनातन हिन्दू संस्कृति में किशी के मरने पर राम नाम सत्य है ही बोलते हैं न की विष्णु नाम सत्य है, न की शिव नाम सत्य है और न की ब्रह्मा नाम सत्य है। तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इसी राम में ही समाहित होता है तो कृष्ण भी राम में ही मिलते है तो इसीलिये मैंने विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम अक्सर लिखता हूँ मतलब अंत में सीता भी राम में ही मिलाती है जिस सीता का एक नाम रामा है और प्रकार सीता इस नाम से अस्तित्व में बनी रह सकती है तो सीता का रामा नाम ही सीता को अस्तित्व में रखता है राम में समाहित होने से तो रामा में राम होने से यह निश्चित होता है की रामा पूर्ण नाम है जिसमे राम और सीता के लिए श्रीराम सम्बोधन की जरूरत नहीं रामा से ही राम और सीता दोनों के प्रति श्रद्धा भक्ति और निष्ठा प्रकट हो जाएगी।

जाहिर सी बात है ज्यादती को छुपाने के लिए ज्यादती दर ज्यादती उसी विवेक के साथ हो रही है जिसने सब के जीवन को संरक्षण दिया अपनी सहन सीलता के बल पर, सृजनात्मक संवर्धन और निरंतर अबाधित समृद्धि हेतु को अभूतपूर्व परिवर्तन को सामान्यजन के केवल कुछ लोगों के सामने आने दिया परिस्थितियाँ सामान्य होने पर ही सबको अवगत कराया गया। अब समय आ गया है की लोगों को सोचने के लिए मजबूर किया जाय की विवेक कभी क्रियात्मक रूप से प्रतिक्रियात्मक नहीं हुआ और होगा तो पुनः इस सृस्टि का संहार होगा जिसे बचाया गया है अभी तक अन्यथा व्यवहारिक सत्य जो "Vivekanand and Modern Tradition" के माध्यम से बताया गया है उसे अपना लिया जाय और विवेक को 24 वर्ष पूर्व की तरह पुनः काम करने दिया जाय चाहे परिस्थितिया आज जैसी ही क्यों न हो और तब उसकी मेरिट और समाज को प्रभावित करने वाला हर प्रकार का समायोजन देखा जाय ?>>>>>>>> श्रीराम और श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण ब्रह्म या तो कहे सम्पूर्ण पूर्ण परमब्रह्म है या कहें तो सशरीर सनिकाय साक्षात ब्रह्म/परमब्रह्म हैं और लोग तो ब्रह्म/परमब्रह्म से घबराते है अर्जुन, कौसल्या और देवकी तथा यशोदा की तरह पर मै तो दोनों को अपने पुत्र के रूप में (विष्णुकांत=विष्णु का स्वामी ब्रह्मा+विष्णु+महेश और कृष्णकांत=कृष्ण का स्वामी मतलब कृष्ण का गीता का उपदेश देते समय की परमब्रह्म/ब्रह्म=ब्रह्मा+विष्णु+महेश अवश्था) बुला लिया और कुछ भी नहीं डरा की कुछ भी व्यवहारिक गलती हुई तो मुझपर उसका असर स्वयम्भावी है तो इस दुनिया में किसका डर? डर तो केवल एक है की मेरे द्वारा या मेरे लिए किशी निर्दोष को किशी भी अवस्था में त्रासदी न झेलनी पड़े और यह भी की केवल एक के लिए अनेकों निर्दोषों का संहार किशी भी अवस्था में न हो उसे बचाया जा सके? वह विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम और जिसका आतंरिक शक्तिनाम मतलब राशिनाम गिरिधर(गिरिधर/गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर(मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) जो विष्णुकांत और कृष्णकांत को अपना पुत्र बना लिया उसके भविष्य निर्धारण में उसकी सहमति क्यों लेनी अनिवार्य नहीं समझी गयी? या उसकी समायोजन क्षमता पर संदेह था?>>>>>>>>> जाहिर सी बात है ज्यादती को छुपाने के लिए ज्यादती दर ज्यादती उसी विवेक के साथ हो रही है जिसने सब के जीवन को संरक्षण दिया अपनी सहन सीलता के बल पर, सृजनात्मक संवर्धन और निरंतर अबाधित समृद्धि हेतु को अभूतपूर्व परिवर्तन को सामान्यजन के केवल कुछ लोगों के सामने आने दिया परिस्थितियाँ सामान्य होने पर ही सबको अवगत कराया गया। अब समय आ गया है की लोगों को सोचने के लिए मजबूर किया जाय की विवेक कभी क्रियात्मक रूप से प्रतिक्रियात्मक नहीं हुआ और होगा तो पुनः इस सृस्टि का संहार होगा जिसे बचाया गया है अभी तक अन्यथा व्यवहारिक सत्य जो "Vivekanand and Modern Tradition" के माध्यम से बताया गया है उसे अपना लिया जाय और विवेक को 24 वर्ष पूर्व की तरह पुनः काम करने दिया जाय चाहे परिस्थितिया आज जैसी ही क्यों न हो और तब उसकी मेरिट और समाज को प्रभावित करने वाला हर प्रकार का समायोजन देखा जाय ?

जाहिर सी बात है ज्यादती को छुपाने के लिए ज्यादती दर ज्यादती उसी विवेक के साथ हो रही है जिसने सब के जीवन को संरक्षण दिया अपनी सहन सीलता के बल पर, सृजनात्मक संवर्धन और निरंतर अबाधित समृद्धि हेतु को अभूतपूर्व परिवर्तन को सामान्यजन के केवल कुछ लोगों के सामने आने दिया परिस्थितियाँ सामान्य होने पर ही सबको अवगत कराया गया। अब समय आ गया है की लोगों को सोचने के लिए मजबूर किया जाय की विवेक कभी क्रियात्मक रूप से प्रतिक्रियात्मक नहीं हुआ और होगा तो पुनः इस सृस्टि का संहार होगा जिसे बचाया गया है अभी तक अन्यथा व्यवहारिक सत्य जो "Vivekanand and Modern Tradition" के माध्यम से बताया गया है उसे अपना लिया जाय और विवेक को 24 वर्ष पूर्व की तरह पुनः काम करने दिया जाय चाहे परिस्थितिया आज जैसी ही क्यों न हो और तब उसकी मेरिट और समाज को प्रभावित करने वाला हर प्रकार का समायोजन देखा जाय ?>>>>>>>> श्रीराम और श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण ब्रह्म या तो कहे सम्पूर्ण पूर्ण परमब्रह्म है या कहें तो सशरीर सनिकाय साक्षात ब्रह्म/परमब्रह्म हैं और लोग तो ब्रह्म/परमब्रह्म से घबराते है अर्जुन, कौसल्या और देवकी तथा यशोदा की तरह पर मै तो दोनों को अपने पुत्र के रूप में (विष्णुकांत=विष्णु का स्वामी ब्रह्मा+विष्णु+महेश और कृष्णकांत=कृष्ण का स्वामी मतलब कृष्ण का गीता का उपदेश देते समय की परमब्रह्म/ब्रह्म=ब्रह्मा+विष्णु+महेश  अवश्था) बुला लिया और कुछ भी नहीं डरा की कुछ भी व्यवहारिक गलती हुई तो मुझपर उसका असर स्वयम्भावी है तो इस दुनिया में किसका डर? डर तो केवल एक है की मेरे द्वारा या मेरे लिए किशी निर्दोष को किशी भी अवस्था में त्रासदी न झेलनी पड़े और यह भी की केवल एक के लिए अनेकों निर्दोषों का संहार किशी भी अवस्था में न हो उसे बचाया जा सके?  वह विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम और जिसका आतंरिक शक्तिनाम मतलब राशिनाम गिरिधर(गिरिधर/गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर(मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) जो विष्णुकांत और कृष्णकांत को अपना पुत्र बना लिया उसके भविष्य निर्धारण में उसकी सहमति क्यों लेनी अनिवार्य नहीं समझी गयी? या उसकी समायोजन क्षमता पर संदेह था?>>>>>>>>> जाहिर सी बात है ज्यादती को छुपाने के लिए ज्यादती दर ज्यादती उसी विवेक के साथ हो रही है जिसने सब के जीवन को संरक्षण दिया अपनी सहन सीलता के बल पर, सृजनात्मक संवर्धन और निरंतर अबाधित समृद्धि हेतु को अभूतपूर्व परिवर्तन को सामान्यजन के केवल कुछ लोगों के सामने आने दिया परिस्थितियाँ सामान्य होने पर ही सबको अवगत कराया गया। अब समय आ गया है की लोगों को सोचने के लिए मजबूर किया जाय की विवेक कभी क्रियात्मक रूप से प्रतिक्रियात्मक नहीं हुआ और होगा तो पुनः इस सृस्टि का संहार होगा जिसे बचाया गया है अभी तक अन्यथा व्यवहारिक सत्य जो "Vivekanand and Modern Tradition" के माध्यम से बताया गया है उसे अपना लिया जाय और विवेक को 24 वर्ष पूर्व की तरह पुनः काम करने दिया जाय चाहे परिस्थितिया आज जैसी ही क्यों न हो और तब उसकी मेरिट और समाज को प्रभावित करने वाला हर प्रकार का समायोजन देखा जाय ?

Tuesday, February 16, 2016

अगर विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/राम स्वयं महाशिव, तो जो स्वयं आदिदेवी/देवियों में आद्या/महादेवी और आदिदेव/देवों में आद्या/महादेव, शिव और शिवा/पार्वती(सरस्वती की नातिनी/पौत्री) सबकी आतंरिक सुरक्षा शक्ति, तो राम नाम सनातन, चिरन्तर और आद्यतन हुआ की नहीं और यह राम नाम महामंत्र हुआ की नहीं ॐ से भी एक कदम आगे बढ़कर जिस ॐ को नाद आदिदेव/देवों में आद्या/महादेव, शिव ने दिया अपने डमरू की झंकार से काशी में केदारेश्वर(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर/विश्वनाथ) के रूप में सृजनकारी विश्वव्यापक महासागर में काशी रूपी स्थल (सृस्टि के प्रथम स्थल) पर प्राकट्य हो और आकृति/आकार आदिदेवी/देवियों में आद्या/महादेवी, सरस्वती ने दिया है।

अगर विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/राम स्वयं महाशिव, तो जो स्वयं आदिदेवी/देवियों में आद्या/महादेवी और आदिदेव/देवों में आद्या/महादेव, शिव और शिवा/पार्वती(सरस्वती की नातिनी/पौत्री) सबकी आतंरिक सुरक्षा शक्ति, तो राम नाम सनातन, चिरन्तर और आद्यतन हुआ की नहीं और यह राम नाम महामंत्र हुआ की नहीं ॐ से भी एक कदम आगे बढ़कर जिस ॐ को नाद आदिदेव/देवों में आद्या/महादेव, शिव ने दिया अपने डमरू की झंकार से काशी में केदारेश्वर(केदारेश्वर+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर/विश्वनाथ) के रूप में सृजनकारी विश्वव्यापक महासागर में काशी रूपी स्थल (सृस्टि के प्रथम स्थल) पर प्राकट्य हो और आकृति/आकार आदिदेवी/देवियों में आद्या/महादेवी, सरस्वती ने दिया है।

Monday, February 15, 2016

अतः समता लाइए और समता मूलक समाज की स्थापना कीजिये न की समानता का राग अलापिये क्योंकि अपनी पहचान बनाये रखने के लिए मैंने आप लोगों द्वारा सतत दिए जाने वाले आधारों को स्वीकार नहीं करता था और न करूंगा जिसकी कोई मर्यादा न हो पर जिसमे अपनी मर्यादा निहित है उन्हें मै स्वीकार न भी किया हूँ तो भी वह मुझे स्वीकार है, पर हर परिस्थिति में आदर्श व्यवहारिक जीवन जीते रहना ही मेरी प्रकृति है और उसमे मै कोई समझौता नही करूंगा और जो मुझे आधार मान्य थे और हैं उनके साथ अन्याय भी नहीं होने दूंगा।>>>>>>>मैंने देखा की देवियों के साथ जिन देवों और दैत्यों ने छल किया था देवियों ने भी उनके साथ छल किया है और इस प्रकार देवियों का हिंसाब बराबरी पर रहा पर उन देवों और दैत्यों ने जिन देवियों को मेरे साथ छल के लिए भेजा उसमे वे सफल नहीं हो सके वह सब मेरी ही होकर रह गई क्योंकि यह विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिस महादेवी/आदिदेवी सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र है उसके अस्तित्व के बिना उस आदिदेवी/महादेवी सरस्वती समेत समस्त देवियों का ही अस्तित्व संभव नहीं तो समानता लाने का प्रयास निरर्थक चल रहा है क्योंकि मुझे किशी भी मानवताहित के साँचे में आप लाएंगे मै उसे स्वीकार कर सकता हूँ पर वह सबके वश की बात नहीं जब तक की बिशुनपुर, जौनपुर-223103 में गोरखपुर(गोरक्षपुर) से आये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण निवाजीबाबा के रामानंद/.../रामप्रशाद मिश्रा कुल और रामापुर, आजमगढ़-223225 में बस्ती जनपद से आये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (शिव व् शिवा:पार्वती का भोज्य/आहार/अरपणेय/आर्पण्य/आभूषण) पाण्डेय ब्राह्मण सारंगधर(चंद्रशेखर) के देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/---/रामप्रशाद पाण्डेय कुल का संयोग न हो।>>>>>>> अतः समता लाइए और समता मूलक समाज की स्थापना कीजिये न की समानता का राग अलापिये क्योंकि अपनी पहचान बनाये रखने के लिए मैंने आप लोगों द्वारा सतत दिए जाने वाले आधारों को स्वीकार नहीं करता था और न करूंगा जिसकी कोई मर्यादा न हो पर जिसमे अपनी मर्यादा निहित है उन्हें मै स्वीकार न भी किया हूँ तो भी वह मुझे स्वीकार है, पर हर परिस्थिति में आदर्श व्यवहारिक जीवन जीते रहना ही मेरी प्रकृति है और उसमे मै कोई समझौता नही करूंगा और जो मुझे आधार मान्य थे और हैं उनके साथ अन्याय भी नहीं होने दूंगा। और इसी लिए आज से पहले ही मै उन देवियों जो इस विश्व व्यापक युद्ध में बिना समझे बूझे ही कूद पडी थी और जब स्थिति समझ में आयी तो मेरा सहयोग की थी और उस सहयोग के बदले ही नहीं उनकी अज्ञानता और नारी स्वभाव से जो कुछ संभव है उन गलतियों को अनदेखा करते हुए ज्ञान चछु खुलने की अवस्था में सत्य से साक्षात्कार होने पर सतर्क हो जिन लोगों ने उनके साथ छल किया उनके साथ छल का बदला छल से लेने के कारन ही उनका आभार व्यक्त कर पतित से पावन बना दिया था बहुत समय पूर्व ही।

अतः समता लाइए और समता मूलक समाज की स्थापना कीजिये न की समानता का राग अलापिये क्योंकि अपनी पहचान बनाये रखने के लिए मैंने आप लोगों द्वारा सतत दिए जाने वाले आधारों को स्वीकार नहीं करता था और न करूंगा जिसकी कोई मर्यादा न हो  पर जिसमे अपनी मर्यादा निहित है उन्हें मै स्वीकार न भी किया हूँ तो भी वह मुझे स्वीकार है, पर हर परिस्थिति में आदर्श व्यवहारिक जीवन जीते रहना ही मेरी प्रकृति है और उसमे मै कोई समझौता नही करूंगा और जो मुझे आधार मान्य थे और हैं उनके साथ अन्याय भी नहीं होने दूंगा।>>>>>>>मैंने देखा की देवियों के साथ जिन देवों और दैत्यों ने छल किया था देवियों ने भी उनके साथ छल किया है और इस प्रकार देवियों का हिंसाब बराबरी पर रहा पर उन देवों और दैत्यों ने जिन देवियों को मेरे साथ छल के लिए भेजा उसमे वे सफल नहीं हो सके वह सब मेरी ही होकर रह गई क्योंकि यह विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिस महादेवी/आदिदेवी सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र है उसके अस्तित्व के बिना उस आदिदेवी/महादेवी सरस्वती समेत समस्त देवियों का ही अस्तित्व संभव नहीं तो समानता लाने का प्रयास निरर्थक चल रहा है क्योंकि मुझे किशी भी मानवताहित के साँचे में आप लाएंगे मै उसे स्वीकार कर सकता हूँ पर वह सबके वश की बात नहीं जब तक की बिशुनपुर, जौनपुर-223103 में  गोरखपुर(गोरक्षपुर) से आये  सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण निवाजीबाबा के रामानंद/.../रामप्रशाद मिश्रा कुल और रामापुर, आजमगढ़-223225 में बस्ती जनपद से आये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (शिव व् शिवा:पार्वती का भोज्य/आहार/अरपणेय/आर्पण्य/आभूषण) पाण्डेय ब्राह्मण  सारंगधर(चंद्रशेखर) के देवव्रत(गंगापुत्र भीष्म)/---/रामप्रशाद पाण्डेय कुल  का संयोग न हो।>>>>>>> अतः समता लाइए और समता मूलक समाज की स्थापना कीजिये न की समानता का राग अलापिये क्योंकि अपनी पहचान बनाये रखने के लिए मैंने आप लोगों द्वारा सतत दिए जाने वाले आधारों को स्वीकार नहीं करता था और न करूंगा जिसकी कोई मर्यादा न हो  पर जिसमे अपनी मर्यादा निहित है उन्हें मै स्वीकार न भी किया हूँ तो भी वह मुझे स्वीकार है, पर हर परिस्थिति में आदर्श व्यवहारिक जीवन जीते रहना ही मेरी प्रकृति है और उसमे मै कोई समझौता नही करूंगा और जो मुझे आधार मान्य थे और हैं उनके साथ अन्याय भी नहीं होने दूंगा। और इसी लिए आज से पहले ही मै उन देवियों जो इस विश्व व्यापक युद्ध में बिना समझे बूझे ही कूद पडी थी और जब स्थिति समझ में आयी तो मेरा सहयोग की थी और उस सहयोग के बदले ही नहीं उनकी अज्ञानता और नारी स्वभाव से जो कुछ संभव है उन गलतियों को अनदेखा करते हुए ज्ञान चछु खुलने की अवस्था में सत्य से साक्षात्कार होने पर सतर्क हो जिन लोगों ने उनके साथ छल किया उनके साथ छल का बदला छल से लेने के कारन ही उनका  आभार व्यक्त कर पतित से पावन बना दिया था बहुत समय पूर्व ही।
https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur

हे अम्ब वीणा हाँथ ले फिर एक बार बजाई दे। मै मोह निद्रा में पड़ा हूँ आई मोही जगाई दे।।

हे अम्ब वीणा हाँथ ले फिर एक बार बजाई दे।  मै मोह निद्रा में पड़ा हूँ आई मोही जगाई दे।।

हे भरत वंशियों मै विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण//राम/महाशिव/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/महाशिव इस बात का प्रमाण दिया हूँ की मै सनातन हिन्दू धर्म के तीन क्रमानुसार निर्धारित मूल धर्म ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म का पूर्णतः पालन करते हुए जलवायु/पारिस्थितिक नियमो/कर्मो निर्धारित इस्लाम और ईसाइयत का भी पूर्ण जगत दर्शन  किये है प्रत्यक्ष में सनातन हिन्दू संस्कृति का पूर्ण निर्वहन करते हुए इसी सनातन संस्कृति की रक्षा हेतु तो इस्लाम और ईसाइयत समेत ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य धर्म और इनके पूरक/संंयोगी जाति/धर्म से ही निःसंदेह ही पूर्णता होती है सम्पूर्ण मानवता के होने वाले समस्त कार्यों में पारंगत होने से पर आप इसका मूल आधार केवल तीन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जाति/धर्म ही है तो आप केवल तीन धर्म का ही पूर्णतः  निर्वहन किये हैं तब भी पूर्ण है व्यापक सम्बन्ध में और यही नहीं ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जाति/धर्म में से केवल एक को ही पूर्णतः प्राप्त चुके हैं पूर्ण ईमानदारी के साथ तो भी आप पूर्ण है और आप का जगत दर्शन पूर्ण है।  पाँचों जाति/धर्मो का पूर्णतः पालन करने पर भी मैंने यही सब पाया और यह भी पाया की सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ जीवन यापन करने पर ऐसी गरिमामयी स्थितिज ऊर्जा के अपने में संचय के साथ सामाजिक जीवन और जीवन की महत्तम उपलब्धियों की प्राप्ति जितना आनंद कारी होता है उतना आनंद या हर्ष आप सनातन संस्कृति विहीन उच्श्रृंखल जीवन जीते हुए उससे भी अधिक चमत्कारिक उपलबधिया या विलासपूर्ण जीवन आप प्राप्त भी करते हैं तो वह न तो आप के लिए आनंदकारी होता है और न तो मानव समाज के लिए। अतः आप दूसरों पर आरोप तय करके बहुत जी लिए स्वयं नियम तोड़ते हुए अधिकार मांगकर और दूसरे की लिए प्रतिबन्ध और कर्तव्य बताकर पर आज आप और आप के लोग जो कर रहे है उससे सायद उससे भी ज्यादा दयनीय दशा समाज की हो गयी है जितने पहले भी कभी इतनी तेजी से नहीं हुई और न इतनी तेजी से गिरी है। कारन यही की अधिकार मांगे गए और लोग प्रतिबंधित किये गए उसी अधिकार को आप को दिलाने के लिए पर पहले जो लोग अधिकार लेकर सनातन भारतीय सांस्कृतिक के प्रति समर्पित भी थे वह समर्पण आप में नहीं रहा और वही सनातन भारतीय सांस्कृतिक के रक्षण के प्रति समर्पण का जिसमे भाव है वही ब्राह्मण है, जिसमे देश और रास्त्र की रक्षा के प्रति बलिदान देने का समर्पण है वही क्षत्रिय है, और जिसमे देश के वैभव और समृध्दि को जारी रखने और विकाश करने के लिए आशातीत रिस्क लेने की लगन और समर्पण है वही वैश्य है और भारतीय परिप्रेक्ष में इन सबमे पारिवारिक संस्कार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है अतएव मै जाति/धर्म शब्द का प्रयोग करता हूँ न की केवल धर्म का।  और इसके शिवा यह बताना  चाहता हूँ की इस्लाम और ईसाइयत विकल्प हैं इनको इतना अधिक प्रसार मत दीजिये की सनातन हिन्दू संस्कृति की रीढ़ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जाती/धर्म ही न टूट जाय असह्य बोझ से और आज तक यही हुआ है लो अब नहीं होना चाहिए अगर सच्चाई ज्ञात हो चुकी हैं की इस्लाम और ईसाइयत का भी वास्तविक बोझ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जाति/धर्म ही वहन कर रहे हैं।  और इस प्रकार  पुनः ध्यान रहे की इस्लाम और ईसाइयत विकल्प हैं  ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जाति/धर्म के अगर सीमा का उल्लंघन हुआ है निहित स्वार्थ में न की धर्म रक्षा में तो अंधानुकरण कर इस्लाम और ईसाइयत के लिए मदांध क्यों  हों हम? जब पता है की इस्लाम सामानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलता है श्रीकृष्ण के यह वही कह रहा जो श्रीरामकृष्ण मतलब रामकृष्ण मतलब श्रीराम मतलब राम मतलब /विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/महाशिव पाण्डेय (Hi Five introduced by Englishman) होते हुए स्वयं कह रहा है ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जाति/धर्म इस्लाम और ईसाइयत सभी का पूर्णतः परन्तु सनातन हिन्दू धर्म संस्कृति का पूर्णतः पालन करते हुए। मतलब इस्लाम और ईसाइयत दोनों रामकृष्ण को समाप्त/विलुप्त होने की अवस्था में स्वयं के विलुप्त होने के डर(समानांतर चलने वाली रेखा का अस्तित्व जरुरी होता है पहली रेखा को  नियंत्रण में बनाये रखने हेतु) से रामकृष्ण के अस्तित्व को बहाल किये कारन यह था की सनातन संस्कृति के मूल आधार ब्राह्मण, क्षत्रिय व् वैश्य धर्म के पालक कमजोर हुए थे और रामकृष्ण के विलुप्त होते ही सब कुछ समाप्त होता पर अगर अस्तित्व कायम रहा और कायम कराया गया परिवर्तन होना निश्चित था और वह होकर रहेगा और इस्लाम और और ईसाइयत का भी सहयोग इसमें अपेक्षित है। 

Friday, February 12, 2016

सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे॥
जग सिरमौर बनाएं भारत,
वह बल विक्रम दे। वह बल विक्रम दे॥
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे॥
साहस शील हृदय में भर दे,
जीवन त्याग-तपोमर कर दे,
संयम सत्य स्नेह का वर दे,
स्वाभिमान भर दे। स्वाभिमान भर दे॥1॥
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे॥
लव, कुश, ध्रुव, प्रहलाद बनें हम
मानवता का त्रास हरें हम,
सीता, सावित्री, दुर्गा मां,
फिर घर-घर भर दे। फिर घर-घर भर दे॥2॥
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे॥
Referenced from Original Sources

सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना
या कुंदेंदु तुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता |
या वीणावर दण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना ||
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता |
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ||
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमां आद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यान्धकारापाहां|
हस्ते स्फाटिक मालीकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदां|| 
सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः। 
वेद वेदान्त वेदांग विद्यास्थानेभ्यः एव च।।
सरस्वती महाभागे विद्ये कमाल लोचने। 
विद्यारूपी विशालाक्षी विद्याम देहि नमोस्तुते।।
हिंदी अनुवाद:
जो कुंद फूल, चंद्रमा और वर्फ के हार के समान श्वेत हैं, जो शुभ्र वस्त्र धारण करती हैं|
जिनके हाथ, श्रेष्ठ वीणा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमल पर आसन ग्रहण करती हैं||
ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदिदेव, जिनकी सदैव स्तुति करते हैं|
हे माँ भगवती सरस्वती, आप मेरी सारी (मानसिक) जड़ता को हरें||
English Translation
She, who is as fair as the Kunda flower, white as the moon, and a garland of white snow;and who is covered in white clothes; She, whose hands are adorned by the excellent veena, and whose seat is the pure white lotus; She, who is praised by Brahma, Vishnu, and Mahesh; and prayed to by the Devas; O Mother Goddess, remove my mental dullness!

From : Original Sources of Sanatan Sanskriti:--Saraswati Vandana

Thursday, February 11, 2016

सामाजिक परिवेश/पर्यावरण में ह्रास की वजह से ब्राह्मणत्व में क्षरण(और संस्कृति के ऐसे रक्षको में और उनके परिवार में क्षरण) होने की वजह से ब्राह्मणत्व के क्षरण के साथ सनातन संस्कृति में क्षरण हुआ है तो ऐसे में समालोचना होनी चाहिए की इस परिवर्तन के दौरान उनका और मेरा क्या गुण और दोष रहा? और कौन इस प्रयाग में श्रेष्ठतम ब्राह्मण की भूमिका निभायी मतलब किसने ब्राह्मणत्व के श्रेष्ठतम गुण त्याग का श्रेष्ठतम निर्वहन किया वह भी बलिदान और स्वयं तपो गुण के साथ? >>>>>>>मै वह व्यक्ति था 2001 से 2006 के बीच (18 सितम्बर, 2007 में ही मै स्वयं निर्धारित सैद्धांतिक लक्ष्य पूर्ण कर लिया था जो 29/30 अक्टूबर, 2009 को व्यवहारिक/क्रियात्मक स्वरुप लिया) जो अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर मामा जी, श्रीधर(विष्णु) (सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण) और अपने परमपिता परमेश्वर ताउजी, डॉ प्रेमचंद(शिव) से बराबर कहता रहा की ब्राह्मणों का नाश हो रहा है (मतलब भारतीय संस्कृति के संरक्षकों का नाश हो रहा है मतलब उनके नाश होने से भारतीय संस्कृति का नाश हो रहा है या ब्राह्मण परिवार स्वयं भारतीय संस्कृति छोड़ रहे हैं और दूसरी संस्कृति अपना रहे हैं), तो जबाब यही था की तुम प्रयागराज में ही बने रहो सब ठीक हो जायेगा तो इस दौरान वैश्विक परिवर्तन हुए तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उन तीनो की संयोगी संतानो मतलब सबको को स्वीकार होने चाहिए और ब्राह्मण समाज (सनातन संस्कृति की रक्षा के प्रति बचन बद्ध मानव समाज) यदि भारतीय संस्कृति की पूर्ण रक्षा करने में सक्षम नहीं रहा और स्वयं उनके परिवार ने दूसरी संस्कृति स्वीकार की या बढ़ावा दिया तो वह भी ब्राह्मणो के ही नाश का कारक और इस प्रकार भारतीय संस्कृति के नाश का कारक रहा तो उस ब्राह्मण समाज को भी यह परिवर्तन विशेष रूप से स्वीकार करना चाहिए और आगे से सतर्क रहने की प्रेरणा लेनी चाहिए।>>>>>सामाजिक परिवेश/पर्यावरण में ह्रास की वजह से ब्राह्मणत्व में क्षरण(और संस्कृति के ऐसे रक्षको में और उनके परिवार में क्षरण) होने की वजह से ब्राह्मणत्व के क्षरण के साथ सनातन संस्कृति में क्षरण हुआ है तो ऐसे में समालोचना होनी चाहिए की इस परिवर्तन के दौरान उनका और मेरा क्या गुण और दोष रहा? और कौन इस प्रयाग में श्रेष्ठतम ब्राह्मण की भूमिका निभायी मतलब किसने ब्राह्मणत्व के श्रेष्ठतम गुण त्याग का श्रेष्ठतम निर्वहन किया वह भी बलिदान और स्वयं तपो गुण के साथ?

सामाजिक परिवेश/पर्यावरण में ह्रास की वजह से ब्राह्मणत्व में क्षरण(और संस्कृति के ऐसे रक्षको में और उनके परिवार में क्षरण) होने की वजह से ब्राह्मणत्व के क्षरण के साथ सनातन संस्कृति में क्षरण हुआ है तो ऐसे में समालोचना होनी चाहिए की इस परिवर्तन के दौरान उनका और मेरा क्या गुण और दोष रहा? और कौन इस प्रयाग में श्रेष्ठतम ब्राह्मण की भूमिका निभायी मतलब किसने ब्राह्मणत्व के श्रेष्ठतम गुण त्याग का श्रेष्ठतम निर्वहन किया वह भी बलिदान और स्वयं तपो गुण के साथ? >>>>>>>मै वह व्यक्ति था 2001 से 2006 के बीच (18 सितम्बर, 2007 में ही मै स्वयं निर्धारित सैद्धांतिक लक्ष्य पूर्ण कर लिया था जो 29/30 अक्टूबर, 2009 को व्यवहारिक/क्रियात्मक स्वरुप लिया) जो अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर मामा जी, श्रीधर(विष्णु) (सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण) और अपने परमपिता परमेश्वर ताउजी, डॉ प्रेमचंद(शिव) से बराबर कहता रहा की ब्राह्मणों का नाश हो रहा है (मतलब भारतीय संस्कृति के संरक्षकों का नाश हो रहा है मतलब उनके नाश होने से भारतीय संस्कृति का नाश हो रहा है या ब्राह्मण परिवार स्वयं भारतीय संस्कृति छोड़ रहे हैं और दूसरी संस्कृति अपना रहे हैं), तो जबाब यही था की तुम प्रयागराज में ही बने रहो सब ठीक हो जायेगा तो इस दौरान वैश्विक परिवर्तन हुए तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उन तीनो की संयोगी संतानो मतलब सबको को स्वीकार होने चाहिए और ब्राह्मण समाज (सनातन संस्कृति की रक्षा के प्रति बचन बद्ध मानव समाज) यदि भारतीय संस्कृति की पूर्ण रक्षा करने में सक्षम नहीं रहा और स्वयं उनके परिवार ने दूसरी संस्कृति स्वीकार की या बढ़ावा दिया तो वह भी ब्राह्मणो के ही नाश का कारक और इस प्रकार भारतीय संस्कृति के नाश का कारक रहा तो उस ब्राह्मण समाज को भी यह परिवर्तन विशेष रूप से स्वीकार करना चाहिए और आगे से सतर्क रहने की प्रेरणा लेनी चाहिए।>>>>>सामाजिक परिवेश/पर्यावरण में ह्रास की वजह से ब्राह्मणत्व में क्षरण(और संस्कृति के ऐसे रक्षको में और उनके परिवार में क्षरण) होने की वजह से ब्राह्मणत्व के क्षरण के साथ सनातन संस्कृति में क्षरण हुआ है तो ऐसे में समालोचना होनी चाहिए की इस परिवर्तन के दौरान उनका और मेरा क्या गुण और दोष रहा? और कौन इस प्रयाग में श्रेष्ठतम ब्राह्मण की भूमिका निभायी मतलब किसने ब्राह्मणत्व के श्रेष्ठतम गुण त्याग का श्रेष्ठतम निर्वहन किया वह भी बलिदान और स्वयं तपो गुण के साथ?

I from Ramapur-223225, Azamgarh was waiting from a long time that S D Sir when becoming S D M Sir but it was not became true. I, therefore, call Vishnukant means Vishnu by name but embodied Parambrahm/Brahm (Vishnu+Brahma+Mahesh) in actual in those days. And after that Second one i.e. Krishnakant is also resemblance of the Parambrahm/Brahm (Vishnu+Brahma +Mahesh). Thus I taken the place of Sanatan Gautam Gotriy Vyasi Mishra Brahman's village Bishunpur-223103, Jaunpur/ Jamadagnipur too but it is extra charge for me. My senior Sanatan Gautam Gotriy Kshatriy Vishnu Bhai can take this place or he could support well to S D Sir in future if he slow down his over cleverness (superficially skillful nature/behavior).

I from Ramapur-223225, Azamgarh was waiting from a long time that S D Sir when becoming S D M Sir but it was not became true. I, therefore, call Vishnukant means Vishnu by name but embodied Parambrahm/Brahm (Vishnu+Brahma+Mahesh) in actual in those days. And after that Second one i.e. Krishnakant is also resemblance of the Parambrahm/Brahm (Vishnu+Brahma +Mahesh). Thus I taken the place of Sanatan Gautam Gotriy Vyasi Mishra Brahman's village Bishunpur-223103, Jaunpur/ Jamadagnipur too but it is extra charge for me. My senior Sanatan Gautam Gotriy Kshatriy Vishnu Bhai can take this place or he could support well to S D Sir in future if he slow down his over cleverness (superficially skillful nature/behavior).
https://en.wikipedia.org/wiki/Ramapur
https://en.wikipedia.org/wiki/Bishunpur-Jaunpur

हमारी स्वर्ण वर्षा से ही क्या लाभ जब हमारी छाया में जीवन यापन करने वाला सुन्दर वन ही मुरझा रहा हो तो उसी तरह समाज के बहुत से लोग ऐसे हैं जो ऐसा दिखाते हैं की पूरी दुनिया का भार उन्ही पर है और उसी वजह से उनकी व्यस्तता है पर वास्तविकता/सत्य इससे परे ही कुछ कहता है? सत्य तो यह है की उनके सद्कर्मो को भोगने वाले ही दुष्चरित्र लोग ज्यादा और सद्चरित्र लोग कम होते हैं तभी उन्ही दुष्चरित्र लोगों की भोगवादी मानसिकता के कारन उनका नेतृत्व पाप के बोझ के नाते दबा रहता है और उनका अतिसय व्यस्त जीवन भी उनको आनंदित नहीं कर सकता है।

हमारी स्वर्ण वर्षा से ही क्या लाभ जब हमारी छाया में जीवन यापन करने वाला सुन्दर वन ही मुरझा रहा हो तो उसी तरह समाज के बहुत से लोग ऐसे हैं जो ऐसा दिखाते हैं की पूरी दुनिया का भार उन्ही पर है और उसी वजह से उनकी व्यस्तता है पर वास्तविकता/सत्य इससे परे ही कुछ कहता है? सत्य तो यह है की उनके सद्कर्मो को भोगने वाले ही दुष्चरित्र लोग ज्यादा और सद्चरित्र लोग कम होते हैं तभी उन्ही दुष्चरित्र लोगों की भोगवादी मानसिकता के कारन उनका नेतृत्व पाप के बोझ के नाते दबा रहता है और उनका अतिसय व्यस्त जीवन भी उनको आनंदित नहीं कर सकता है।

Sri Bhagavan said

Sri Bhagavan said:
I would take care,
Of worries and cares of Him,
Who thinks and serves me,
Without any other Thoughts,
To take care of Dharma,
To protect those who are good,
And to destroy all who are bad.
I will be born from time to time.
If he who is worried,
If he who is sad,
If he who is broken,
If he who is afraid,
If he who is severely ill,
If he who has heard tidings bad,
Sings Vishnu and Vishnu,
All his cares would be taken care of.

सप्तश्लोकी दुर्गा

सप्तश्लोकी दुर्गा
अथ सप्तश्लोकी दुर्गा
शिव उवाच :
देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी ।
कलौ कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ॥
देव्युवाच :
श्रृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्ट्साधनम् ।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते ॥
विनियोग :
ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ॠषिः, अनुष्टुप
छन्दः, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः, श्री दुर्गाप्रीत्यथं
सप्तश्लोकी दुर्गापाठे विनियोगः ।
1 – ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ १ ॥
2 – दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥ २ ॥
3 – सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यंम्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते ॥ ३ ॥
4 – शरणागतदीनार्तपरित्राणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोस्तु ते ॥ ४ ॥
5 – सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते ॥ ५ ॥
6 – रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
7 – त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्र्यन्ति ॥ ६ ॥
सर्वबाधाप्रश्मनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्र्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥ ७ ॥
॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्ण ॥
शिव जी बोले - हे देवी तुम भक्तों के लिए सुलभ हो और समस्त कर्मों का विधान करने वाली हो | कलियुग में कामनाओं की सिद्धि हेतु यदि कोई उपाय हो तो उसे अपनी वाणी द्वारा सम्यक रूप से व्यक्त करो |
देवी ने कहा - हे देव |आपका मेरे उपर बहुत स्नेह है |कलियुग में समस्त कामनाओ को सिद्ध करनेवाला जो साधन है वह बताऊंगी सुनिए ! उसका नाम है "अम्बा-स्तुति " ||
ॐ इस दुर्गा सप्त श्लोकी स्तोत्र मन्त्र के नरायण ऋषि हैं, अनुष्टुप छंद है, श्री महाकाली, महालक्ष्मी, और महासरस्वती देवता हैं, श्री दुर्गा की प्रसन्नता के लिए सप्त श्लोकी दुर्गा पाठ में इसका विनियोग किया जाता है |
वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बल पूर्वक खींच कर मोह में ड़ाल देती हैं || १ ||
माँ दुर्गे ! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्वारा चिंतन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं | दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवी ! आपके सिवा दूसरी कौन हैं, जिसका चित सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयाद्र रहता हो || २ ||
नारायणी ! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करनेवाली मंगलमयी हो | कल्याणदायिनी शिवा हो | सब पुरुषार्थों को सिद्ध करनेवाली, शरणागत वत्सला , तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो | तुम्हे नमस्कार है || ३ ||
शरण में आये हुए दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवी! तुम्हे नमस्कार है|| ४ ||
सर्व स्वरुपा सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से संपन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवी ! सब भयों से हमारी रक्षा करो ; तुम्हे नमस्कार है || ५ ||
देवी तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों का नाश कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो |जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं , उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं | तुम्हारी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं ||६||
सर्वेश्वरी! तुम इसी प्रकार तीनो लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो ||७ ||

महा मृत्युंजय मंत्र

महा मृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम उर्वारुकमिव बंधनान मृत्योर मुक्षीय मा अमृतात ||
भावार्थ :- " हे त्र्यम्बक वेदरूप पुण्यात्मा परमेश्वर ! मृत्यु के पाश से हमको बचाओ, जन्म-मरण से हमें मुक्त करो और हमको अमृतत्व प्रदान करो."

गणेश गायत्री मंत्र

गणेश गायत्री मंत्र
।। ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तनो दन्ती प्रचोदयात ।।

गायत्री मंत्र

गायत्री मंत्र
|| ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्‌ ||

भावार्थ :- हम तीनों लोकों के उस वरण करने योग्य देवता की शक्तियों का ध्यान करते हैं, वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्
।। दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं ( विश्वसारतन्त्र ) ।।
ईश्वर उवाच
शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने ।
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती ।। १।।
ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी ।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी ।। २।।
पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः ।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः ।। ३।।
सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्द स्वरूपिणी ।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः ।। ४।।
शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा ।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ।। ५।।
अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती ।
पट्टाम्बर परीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी ।। ६।।
अमेयविक्रमा क्रुरा सुन्दरी सुरसुन्दरी ।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता ।। ७।।
ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा ।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः ।। ८।।
विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा ।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहन वाहना ।। ९।।
निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी ।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ।। १०।।
सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी ।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा ।। ११।।
अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी ।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः ।। १२।।
अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा ।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला ।। १३।।
अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी ।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी ।। १४।।
शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी ।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी ।। १५।।
य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम् ।
नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति ।। १६।।
धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च ।
चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम् ।। १७।।
कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम् ।
पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम् ।। १८।।
तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि ।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात् ।। १९।।
गोरोचनालक्तककुङ्कुमेव सिन्धूरकर्पूरमधुत्रयेण ।
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः ।। २०।।
भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते ।
विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् संपदां पदम् ।। २१।।
।। इति श्री विश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं समाप्तम् ।

शिवाष्टकं

शिवाष्टकं
॥ अथ श्री शिवाष्टकं ॥
प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजाम् ।
भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ १॥

गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं महाकालकालं गणेशाधिपालम् ।
जटाजूटभङ्गोत्तरङ्गैर्विशालं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ २॥
मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं महामण्डल भस्मभूषधरंतम् ।
अनादिह्यपारं महामोहहारं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ३॥
तटाधो निवासं महाट्टाट्टहासं महापापनाशं सदासुप्रकाशम् ।
गिरीशं गणेशं महेशं सुरेशं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ४॥
गिरिन्द्रात्मजासंग्रहीतार्धदेहं गिरौ संस्थितं सर्वदा सन्नगेहम् ।
परब्रह्मब्रह्मादिभिर्वन्ध्यमानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ५॥
कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं पदाम्भोजनम्राय कामं ददानम् ।
बलीवर्दयानं सुराणां प्रधानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ६॥
शरच्चन्द्रगात्रं गुणानन्द पात्रं त्रिनेत्रं पवित्रं धनेशस्य मित्रम् ।
अपर्णाकलत्रं चरित्रं विचित्रं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ७॥
हरं सर्पहारं चिता भूविहारं भवं वेदसारं सदा निर्विकारम् ।
श्मशाने वदन्तं मनोजं दहन्तं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ८॥
स्तवं यः प्रभाते नरः शूलपाणे पठेत् सर्वदा भर्गभावानुरक्तः ।
स पुत्रं धनं धान्यमित्रं कलत्रं विचित्रं समासाद्य मोक्षं प्रयाति ॥ ९॥

विश्वनाथाष्टकम्

|| विश्वनाथाष्टकम् ||
गङ्गातरंगरमणीयजटाकलापं
गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम् |
नारायणप्रियमनंगमदापहारं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
वाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपं
वागीशविष्णुसुरसेवितपादपीठम् |
वामेनविग्रहवरेणकलत्रवन्तं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
भूताधिपं भुजगभूषणभूषितांगं
व्याघ्राजिनांबरधरं जटिलं त्रिनेत्रम् |
पाशांकुशाभयवरप्रदशूलपाणिं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् |
शीतांशुशोभितकिरीटविराजमानं
भालेक्षणानलविशोषितपंचबाणम् |
नागाधिपारचितभासुरकर्णपूरं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
पंचाननं दुरितमत्तमतङ्गजानां
नागान्तकं दनुजपुंगवपन्नगानाम् |
दावानलं मरणशोकजराटवीनां
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
तेजोमयं सगुणनिर्गुणमद्वितीयं
आनन्दकन्दमपराजितमप्रमेयम् |
नागात्मकं सकलनिष्कलमात्मरूपं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
रागादिदोषरहितं स्वजनानुरागं
वैराग्यशान्तिनिलयं गिरिजासहायम् |
माधुर्यधैर्यसुभगं गरलाभिरामं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
आशां विहाय परिहृत्य परस्य निन्दां
पापे रतिं च सुनिवार्य मनः समाधौ |
आदाय हृत्कमलमध्यगतं परेशं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
वाराणसीपुरपतेः स्तवनं शिवस्य
व्याख्यातमष्टकमिदं पठते मनुष्यः |
विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं
सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ||
विश्वनाथाष्टकमिदं यः पठेच्छिवसन्निधौ |
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ||

दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम्

।। दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम् ।।
।। अथ श्री दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम् ।।
नारद उवाच -
कुमार गुणगम्भीर देवसेनापते प्रभो ।
सर्वाभीष्टप्रदं पुंसां सर्वपापप्रणाशनम् ।। १।।
गुह्याद्गुह्यतरं स्तोत्रं भक्तिवर्धकमञ्जसा ।
मङ्गलं ग्रहपीडादिशान्तिदं वक्तुमर्हसि ।। २।।
स्कन्द उवाच -
शृणु नारद देवर्षे लोकानुग्रहकाम्यया ।
यत्पृच्छसि परं पुण्यं तत्ते वक्ष्यामि कौतुकात् ।। ३।।
माता मे लोकजननी हिमवन्नगसत्तमात् ।
मेनायां ब्रह्मवादिन्यां प्रादुर्भूता हरप्रिया ।। ४।।
महता तपसाऽऽराध्य शङ्करं लोकशङ्करम् ।
स्वमेव वल्लभं भेजे कलेव हि कलानिधिम् ।। ५।।
नगानामधिराजस्तु हिमवान् विरहातुरः ।
स्वसुतायाः परिक्षीणे वसिष्ठेन प्रबोधितः ।। ६।।
त्रिलोकजननी सेयं प्रसन्ना त्वयि पुण्यतः ।
प्रादुर्भूता सुतात्वेन तद्वियोगं शुभं त्यज ।। ७।।
बहुरूपा च दुर्गेयं बहुनाम्नी सनातनी ।
सनातनस्य जाया सा पुत्रीमोहं त्यजाधुना ।। ८।।
इति प्रबोधितः शैलः तां तुष्टाव परां शिवाम् ।
तदा प्रसन्ना सा दुर्गा पितरं प्राह नन्दिनी ।। ९।।
मत्प्रसादात्परं स्तोत्रं हृदये प्रतिभासताम् ।
तेन नाम्नां सहस्रेण पूजयन् काममाप्नुहि ।। १०।।
इत्युक्त्वान्तर्हितायां तु हृदये स्फुरितं तदा ।
नाम्नां सहस्रं दुर्गायाः पृच्छते मे यदुक्तवान् ।। ११।।
मङ्गलानां मङ्गलं तद् दुर्गानाम सहस्रकम् ।
सर्वाभीष्टप्रदां पुंसां ब्रवीम्यखिलकामदम् ।। १२।।
दुर्गादेवी समाख्याता हिमवानृषिरुच्यते ।
छन्दोनुष्टुप् जपो देव्याः प्रीतये क्रियते सदा ।। १३।।
ऋषिच्छन्दांसि – अस्य श्रीदुर्गास्तोत्रमहामन्त्रस्य । हिमवान् ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । दुर्गाभगवती देवता । श्रीदुर्गाप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
श्रीभगवत्यै दुर्गायै नमः ।
देवीध्यानम्
ॐ ह्रीं कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां
शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम् ।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं
ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः ।।
श्री जयदुर्गायै नमः ।
ॐ शिवाऽथोमा रमा शक्तिरनन्ता निष्कलाऽमला ।
शान्ता माहेश्वरी नित्या शाश्वता परमा क्षमा ।। १।।
अचिन्त्या केवलानन्ता शिवात्मा परमात्मिका ।
अनादिरव्यया शुद्धा सर्वज्ञा सर्वगाऽचला ।। २।।
एकानेकविभागस्था मायातीता सुनिर्मला ।
महामाहेश्वरी सत्या महादेवी निरञ्जना ।। ३।।
काष्ठा सर्वान्तरस्थाऽपि चिच्छक्तिश्चात्रिलालिता ।
सर्वा सर्वात्मिका विश्वा ज्योतीरूपाऽक्षराऽमृता ।। ४।।
शान्ता प्रतिष्ठा सर्वेशा निवृत्तिरमृतप्रदा ।
व्योममूर्तिर्व्योमसंस्था व्योमधाराऽच्युताऽतुला ।। ५।।
अनादिनिधनाऽमोघा कारणात्मकलाकुला ।
ऋतुप्रथमजाऽनाभिरमृतात्मसमाश्रया ।। ६।।
प्राणेश्वरप्रिया नम्या महामहिषघातिनी ।
प्राणेश्वरी प्राणरूपा प्रधानपुरुषेश्वरी ।। ७।।
सर्वशक्तिकलाऽकामा महिषेष्टविनाशिनी ।
सर्वकार्यनियन्त्री च सर्वभूतेश्वरेश्वरी ।। ८।।
अङ्गदादिधरा चैव तथा मुकुटधारिणी ।
सनातनी महानन्दाऽऽकाशयोनिस्तथेच्यते ।। ९।।
चित्प्रकाशस्वरूपा च महायोगेश्वरेश्वरी ।
महामाया सदुष्पारा मूलप्रकृतिरीशिका ।। १०।।
संसारयोनिः सकला सर्वशक्तिसमुद्भवा ।
संसारपारा दुर्वारा दुर्निरीक्षा दुरासदा ।। ११।।
प्राणशक्तिश्च सेव्या च योगिनी परमाकला ।
महाविभूतिर्दुर्दर्शा मूलप्रकृतिसम्भवा ।। १२।।
अनाद्यनन्तविभवा परार्था पुरुषारणिः ।
सर्गस्थित्यन्तकृच्चैव सुदुर्वाच्या दुरत्यया ।। १३।।
शब्दगम्या शब्दमाया शब्दाख्यानन्दविग्रहा ।
प्रधानपुरुषातीता प्रधानपुरुषात्मिका ।। १४।।
पुराणी चिन्मया पुंसामिष्टदा पुष्टिरूपिणी ।
पूतान्तरस्था कूटस्था महापुरुषसंज्ञिता ।। १५।।
जन्ममृत्युजरातीता सर्वशक्तिस्वरूपिणी ।
वाञ्छाप्रदाऽनवच्छिन्नप्रधानानुप्रवेशिनी ।। १६।।
क्षेत्रज्ञाऽचिन्त्यशक्तिस्तु प्रोच्यतेऽव्यक्तलक्षणा ।
मलापवर्जिताऽऽनादिमाया त्रितयतत्त्विका ।। १७।।
प्रीतिश्च प्रकृतिश्चैव गुहावासा तथोच्यते ।
महामाया नगोत्पन्ना तामसी च ध्रुवा तथा ।। १८।।
व्यक्ताऽव्यक्तात्मिका कृष्णा रक्ता शुक्ला ह्यकारणा ।
प्रोच्यते कार्यजननी नित्यप्रसवधर्मिणी ।। १९।।
सर्गप्रलयमुक्ता च सृष्टिस्थित्यन्तधर्मिणी ।
ब्रह्मगर्भा चतुर्विंशस्वरूपा पद्मवासिनी ।। २०।।
अच्युताह्लादिका विद्युद्ब्रह्मयोनिर्महालया ।
महालक्ष्मी समुद्भावभावितात्मामहेश्वरी ।। २१।।
महाविमानमध्यस्था महानिद्रा सकौतुका ।
सर्वार्थधारिणी सूक्ष्मा ह्यविद्धा परमार्थदा ।। २२।।
अनन्तरूपाऽनन्तार्था तथा पुरुषमोहिनी ।
अनेकानेकहस्ता च कालत्रयविवर्जिता ।। २३।।
ब्रह्मजन्मा हरप्रीता मतिर्ब्रह्मशिवात्मिका ।
ब्रह्मेशविष्णुसम्पूज्या ब्रह्माख्या ब्रह्मसंज्ञिता ।। २४।।
व्यक्ता प्रथमजा ब्राह्मी महारात्रीः प्रकीर्तिता ।
ज्ञानस्वरूपा वैराग्यरूपा ह्यैश्वर्यरूपिणी ।। २५।।
धर्मात्मिका ब्रह्ममूर्तिः प्रतिश्रुतपुमर्थिका ।
अपांयोनिः स्वयम्भूता मानसी तत्त्वसम्भवा ।। २६।।
ईश्वरस्य प्रिया प्रोक्ता शङ्करार्धशरीरिणी ।
भवानी चैव रुद्राणी महालक्ष्मीस्तथाऽम्बिका ।। २७।।
महेश्वरसमुत्पन्ना भुक्तिमुक्ति प्रदायिनी ।
सर्वेश्वरी सर्ववन्द्या नित्यमुक्ता सुमानसा ।। २८।।
महेन्द्रोपेन्द्रनमिता शाङ्करीशानुवर्तिनी ।
ईश्वरार्धासनगता माहेश्वरपतिव्रता ।। २९।।
संसारशोषिणी चैव पार्वती हिमवत्सुता ।
परमानन्ददात्री च गुणाग्र्या योगदा तथा ।। ३०।।
ज्ञानमूर्तिश्च सावित्री लक्ष्मीः श्रीः कमला तथा ।
अनन्तगुणगम्भीरा ह्युरोनीलमणिप्रभा ।। ३१।।
सरोजनिलया गङ्गा योगिध्येयाऽसुरार्दिनी ।
सरस्वती सर्वविद्या जगज्ज्येष्ठा सुमङ्गला ।। ३२।।
वाग्देवी वरदा वर्या कीर्तिः सर्वार्थसाधिका ।
वागीश्वरी ब्रह्मविद्या महाविद्या सुशोभना ।। ३३।।
ग्राह्यविद्या वेदविद्या धर्मविद्याऽऽत्मभाविता ।
स्वाहा विश्वम्भरा सिद्धिः साध्या मेधा धृतिः कृतिः ।। ३४।।
सुनीतिः संकृतिश्चैव कीर्तिता नरवाहिनी ।
पूजाविभाविनी सौम्या भोग्यभाग् भोगदायिनी ।। ३५।।
शोभावती शाङ्करी च लोला मालाविभूषिता ।
परमेष्ठिप्रिया चैव त्रिलोकीसुन्दरी माता ।। ३६।।
नन्दा सन्ध्या कामधात्री महादेवी सुसात्त्विका ।
महामहिषदर्पघ्नी पद्ममालाऽघहारिणी ।। ३७।।
विचित्रमुकुटा रामा कामदाता प्रकीर्तिता ।
पिताम्बरधरा दिव्यविभूषण विभूषिता ।। ३८।।
दिव्याख्या सोमवदना जगत्संसृष्टिवर्जिता ।
निर्यन्त्रा यन्त्रवाहस्था नन्दिनी रुद्रकालिका ।। ३९।।
आदित्यवर्णा कौमारी मयूरवरवाहिनी ।
पद्मासनगता गौरी महाकाली सुरार्चिता ।। ४०।।
अदितिर्नियता रौद्री पद्मगर्भा विवाहना ।
विरूपाक्षा केशिवाहा गुहापुरनिवासिनी ।। ४१।।
महाफलाऽनवद्याङ्गी कामरूपा सरिद्वरा ।
भास्वद्रूपा मुक्तिदात्री प्रणतक्लेशभञ्जना ।। ४२।।
कौशिकी गोमिनी रात्रिस्त्रिदशारिविनाशिनी ।
बहुरूपा सुरूपा च विरूपा रूपवर्जिता ।। ४३।।
भक्तार्तिशमना भव्या भवभावविनाशिनी ।
सर्वज्ञानपरीताङ्गी सर्वासुरविमर्दिका ।। ४४।।
पिकस्वनी सामगीता भवाङ्कनिलया प्रिया ।
दीक्षा विद्याधरी दीप्ता महेन्द्राहितपातिनी ।। ४५।।
सर्वदेवमया दक्षा समुद्रान्तरवासिनी ।
अकलङ्का निराधारा नित्यसिद्धा निरामया ।। ४६।।
कामधेनुबृहद्गर्भा धीमती मौननाशिनी ।
निःसङ्कल्पा निरातङ्का विनया विनयप्रदा ।। ४७।।
ज्वालामाला सहस्राढ्या देवदेवी मनोमया ।
सुभगा सुविशुद्धा च वसुदेवसमुद्भवा ।। ४८।।
महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी भक्तिगम्या परावरा ।
ज्ञानज्ञेया परातीता वेदान्तविषया मतिः ।। ४९।।
दक्षिणा दाहिका दह्या सर्वभूतहृदिस्थिता ।
योगमाया विभागज्ञा महामोहा गरीयसी ।। ५०।।
सन्ध्या सर्वसमुद्भूता ब्रह्मवृक्षाश्रियाऽदितिः ।
बीजाङ्कुरसमुद्भूता महाशक्तिर्महामतिः ।। ५१।।
ख्यातिः प्रज्ञावती संज्ञा महाभोगीन्द्रशायिनी ।
हींकृतिः शङ्करी शान्तिर्गन्धर्वगणसेविता ।। ५२।।
वैश्वानरी महाशूला देवसेना भवप्रिया ।
महारात्री परानन्दा शची दुःस्वप्ननाशिनी ।। ५३।।
ईड्या जया जगद्धात्री दुर्विज्ञेया सुरूपिणी ।
गुहाम्बिका गणोत्पन्ना महापीठा मरुत्सुता ।। ५४।।
हव्यवाहा भवानन्दा जगद्योनिः प्रकीर्तिता ।
जगन्माता जगन्मृत्युर्जरातीता च बुद्धिदा ।। ५५।।
सिद्धिदात्री रत्नगर्भा रत्नगर्भाश्रया परा ।
दैत्यहन्त्री स्वेष्टदात्री मङ्गलैकसुविग्रहा ।। ५६।।
पुरुषान्तर्गता चैव समाधिस्था तपस्विनी ।
दिविस्थिता त्रिणेत्रा च सर्वेन्द्रियमनाधृतिः ।। ५७।।
सर्वभूतहृदिस्था च तथा संसारतारिणी ।
वेद्या ब्रह्मविवेद्या च महालीला प्रकीर्तिता ।। ५८।।
ब्राह्मणिबृहती ब्राह्मी ब्रह्मभूताऽघहारिणी ।
हिरण्मयी महादात्री संसारपरिवर्तिका ।। ५९।।
सुमालिनी सुरूपा च भास्विनी धारिणी तथा ।
उन्मूलिनी सर्वसभा सर्वप्रत्ययसाक्षिणी ।। ६०।।
सुसौम्या चन्द्रवदना ताण्डवासक्तमानसा ।
सत्त्वशुद्धिकरी शुद्धा मलत्रयविनाशिनी ।। ६१।।
जगत्त्त्रयी जगन्मूर्तिस्त्रिमूर्तिरमृताश्रया ।
विमानस्था विशोका च शोकनाशिन्यनाहता ।। ६२।।
हेमकुण्डलिनी काली पद्मवासा सनातनी ।
सदाकीर्तिः सर्वभूतशया देवी सतांप्रिया ।। ६३।।
ब्रह्ममूर्तिकला चैव कृत्तिका कञ्जमालिनी ।
व्योमकेशा क्रियाशक्तिरिच्छाशक्तिः परागतिः ।। ६४।।
क्षोभिका खण्डिकाभेद्या भेदाभेदविवर्जिता ।
अभिन्ना भिन्नसंस्थाना वशिनी वंशधारिणी ।। ६५।।
गुह्यशक्तिर्गुह्यतत्त्वा सर्वदा सर्वतोमुखी ।
भगिनी च निराधारा निराहारा प्रकीर्तिता ।। ६६।।
निरङ्कुशपदोद्भूता चक्रहस्ता विशोधिका ।
स्रग्विणी पद्मसम्भेदकारिणी परिकीर्तिता ।। ६७।।
परावरविधानज्ञा महापुरुषपूर्वजा ।
परावरज्ञा विद्या च विद्युज्जिह्वा जिताश्रया ।। ६८।।
विद्यामयी सहस्राक्षी सहस्रवदनात्मजा ।
सहस्ररश्मिःसत्वस्था महेश्वरपदाश्रया ।। ६९।।
ज्वालिनी सन्मया व्याप्ता चिन्मया पद्मभेदिका ।
महाश्रया महामन्त्रा महादेवमनोरमा ।। ७०।।
व्योमलक्ष्मीः सिंहरथा चेकितानाऽमितप्रभा ।
विश्वेश्वरी भगवती सकला कालहारिणी ।। ७१।।
सर्ववेद्या सर्वभद्रा गुह्या दूढा गुहारणी ।
प्रलया योगधात्री च गङ्गा विश्वेश्वरी तथा ।। ७२।।
कामदा कनका कान्ता कञ्जगर्भप्रभा तथा ।
पुण्यदा कालकेशा च भोक्त्त्री पुष्करिणी तथा ।। ७३।।
सुरेश्वरी भूतिदात्री भूतिभूषा प्रकीर्तिता ।
पञ्चब्रह्मसमुत्पन्ना परमार्थाऽर्थविग्रहा ।। ७४।।
वर्णोदया भानुमूर्तिर्वाग्विज्ञेया मनोजवा ।
मनोहरा महोरस्का तामसी वेदरूपिणी ।। ७५।।
वेदशक्तिर्वेदमाता वेदविद्याप्रकाशिनी ।
योगेश्वरेश्वरी माया महाशक्तिर्महामयी ।। ७६।।
विश्वान्तःस्था वियन्मूर्तिर्भार्गवी सुरसुन्दरी ।
सुरभिर्नन्दिनी विद्या नन्दगोपतनूद्भवा ।। ७७।।
भारती परमानन्दा परावरविभेदिका ।
सर्वप्रहरणोपेता काम्या कामेश्वरेश्वरी ।। ७८।।
अनन्तानन्दविभवा हृल्लेखा कनकप्रभा ।
कूष्माण्डा धनरत्नाढ्या सुगन्धा गन्धदायिनी ।। ७९।।
त्रिविक्रमपदोद्भूता चतुरास्या शिवोदया ।
सुदुर्लभा धनाध्यक्षा धन्या पिङ्गललोचना ।। ८०।।
शान्ता प्रभास्वरूपा च पङ्कजायतलोचना ।
इन्द्राक्षी हृदयान्तःस्था शिवा माता च सत्क्रिया ।। ८१।।
गिरिजा च सुगूढा च नित्यपुष्टा निरन्तरा ।
दुर्गा कात्यायनी चण्डी चन्द्रिका कान्तविग्रहा ।। ८२।।
हिरण्यवर्णा जगती जगद्यन्त्रप्रवर्तिका ।
मन्दराद्रिनिवासा च शारदा स्वर्णमालिनी ।। ८३।।
रत्नमाला रत्नगर्भा व्युष्टिर्विश्वप्रमाथिनी ।
पद्मानन्दा पद्मनिभा नित्यपुष्टा कृतोद्भवा ।। ८४।।
नारायणी दुष्टशिक्षा सूर्यमाता वृषप्रिया ।
महेन्द्रभगिनी सत्या सत्यभाषा सुकोमला ।। ८५।।
वामा च पञ्चतपसां वरदात्री प्रकीर्तिता ।
वाच्यवर्णेश्वरी विद्या दुर्जया दुरतिक्रमा ।। ८६।।
कालरात्रिर्महावेगा वीरभद्रप्रिया हिता ।
भद्रकाली जगन्माता भक्तानां भद्रदायिनी ।। ८७।।
कराला पिङ्गलाकारा कामभेत्त्री महामनाः ।
यशस्विनी यशोदा च षडध्वपरिवर्तिका ।। ८८।।
शङ्खिनी पद्मिनी संख्या सांख्ययोगप्रवर्तिका ।
चैत्रादिर्वत्सरारूढा जगत्सम्पूरणीन्द्रजा ।। ८९।।
शुम्भघ्नी खेचराराध्या कम्बुग्रीवा बलीडिता ।
खगारूढा महैश्वर्या सुपद्मनिलया तथा ।। ९०।।
विरक्ता गरुडस्था च जगतीहृद्गुहाश्रया ।
शुम्भादिमथना भक्तहृद्गह्वरनिवासिनी ।। ९१।।
जगत्त्त्रयारणी सिद्धसङ्कल्पा कामदा तथा ।
सर्वविज्ञानदात्री चानल्पकल्मषहारिणी ।। ९२।।
सकलोपनिषद्गम्या दुष्टदुष्प्रेक्ष्यसत्तमा ।
सद्वृता लोकसंव्याप्ता तुष्टिः पुष्टिः क्रियावती ।। ९३।।
विश्वामरेश्वरी चैव भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ।
शिवाधृता लोहिताक्षी सर्पमालाविभूषणा ।। ९४।।
निरानन्दा त्रिशूलासिधनुर्बाणादिधारिणी ।
अशेषध्येयमूर्तिश्च देवतानां च देवता ।। ९५।।
वराम्बिका गिरेः पुत्री निशुम्भविनिपातिनी ।
सुवर्णा स्वर्णलसिताऽनन्तवर्णा सदाधृता ।। ९६।।
शाङ्करी शान्तहृदया अहोरात्रविधायिका ।
विश्वगोप्त्री गूढरूपा गुणपूर्णा च गार्ग्यजा ।। ९७।।
गौरी शाकम्भरी सत्यसन्धा सन्ध्यात्रयीधृता ।
सर्वपापविनिर्मुक्ता सर्वबन्धविवर्जिता ।। ९८।।
सांख्ययोगसमाख्याता अप्रमेया मुनीडिता ।
विशुद्धसुकुलोद्भूता बिन्दुनादसमादृता ।। ९९।।
शम्भुवामाङ्कगा चैव शशितुल्यनिभानना ।
वनमालाविराजन्ती अनन्तशयनादृता ।। १००।।
नरनारायणोद्भूता नारसिंही प्रकीर्तिता ।
दैत्यप्रमाथिनी शङ्खचक्रपद्मगदाधरा ।। १०१।।
सङ्कर्षणसमुत्पन्ना अम्बिका सज्जनाश्रया ।
सुवृता सुन्दरी चैव धर्मकामार्थदायिनी ।। १०२।।
मोक्षदा भक्तिनिलया पुराणपुरुषादृता ।
महाविभूतिदाऽऽराध्या सरोजनिलयाऽसमा ।। १०३।।
अष्टादशभुजाऽनादिर्नीलोत्पलदलाक्षिणी ।
सर्वशक्तिसमारूढा धर्माधर्मविवर्जिता ।। १०४।।
वैराग्यज्ञाननिरता निरालोका निरिन्द्रिया ।
विचित्रगहनाधारा शाश्वतस्थानवासिनी ।। १०५।।
ज्ञानेश्वरी पीतचेला वेदवेदाङ्गपारगा ।
मनस्विनी मन्युमाता महामन्युसमुद्भवा ।। १०६।।
अमन्युरमृतास्वादा पुरन्दरपरिष्टुता ।
अशोच्या भिन्नविषया हिरण्यरजतप्रिया ।। १०७।।
हिरण्यजननी भीमा हेमाभरणभूषिता ।
विभ्राजमाना दुर्ज्ञेया ज्योतिष्टोमफलप्रदा ।। १०८।।
महानिद्रासमुत्पत्तिरनिद्रा सत्यदेवता ।
दीर्घा ककुद्मिनी पिङ्गजटाधारा मनोज्ञधीः ।। १०९।।
महाश्रया रमोत्पन्ना तमःपारे प्रतिष्ठिता ।
त्रितत्त्वमाता त्रिविधा सुसूक्ष्मा पद्मसंश्रया ।। ११०।।
शान्त्यतीतकलाऽतीतविकारा श्वेतचेलिका ।
चित्रमाया शिवज्ञानस्वरूपा दैत्यमाथिनी ।। १११।।
काश्यपी कालसर्पाभवेणिका शास्त्रयोनिका ।
त्रयीमूर्तिः क्रियामूर्तिश्चतुर्वर्गा च दर्शिनी ।। ११२।।
नारायणी नरोत्पन्ना कौमुदी कान्तिधारिणी ।
कौशिकी ललिता लीला परावरविभाविनी ।। ११३।।
वरेण्याऽद्भुतमहात्म्या वडवा वामलोचना ।
सुभद्रा चेतनाराध्या शान्तिदा शान्तिवर्धिनी ।। ११४।।
जयादिशक्तिजननी शक्तिचक्रप्रवर्तिका ।
त्रिशक्तिजननी जन्या षट्सूत्रपरिवर्णिता ।। ११५।।
सुधौतकर्मणाऽऽराध्या युगान्तदहनात्मिका ।
सङ्कर्षिणी जगद्धात्री कामयोनिः किरीटिनी ।। ११६।।
ऐन्द्री त्रैलोक्यनमिता वैष्णवी परमेश्वरी ।
प्रद्युम्नजननी बिम्बसमोष्ठी पद्मलोचना ।। ११७।।
मदोत्कटा हंसगतिः प्रचण्डा चण्डविक्रमा ।
वृषाधीशा परात्मा च विन्ध्या पर्वतवासिनी ।। ११८।।
हिमवन्मेरुनिलया कैलासपुरवासिनी ।
चाणूरहन्त्री नीतिज्ञा कामरूपा त्रयीतनुः ।। ११९।।
व्रतस्नाता धर्मशीला सिंहासननिवासिनी ।
वीरभद्रादृता वीरा महाकालसमुद्भवा ।। १२०।।
विद्याधरार्चिता सिद्धसाध्याराधितपादुका ।
श्रद्धात्मिका पावनी च मोहिनी अचलात्मिका ।। १२१।।
महाद्भुता वारिजाक्षी सिंहवाहनगामिनी ।
मनीषिणी सुधावाणी वीणावादनतत्परा ।। १२२।।
श्वेतवाहनिषेव्या च लसन्मतिररुन्धती ।
हिरण्याक्षी तथा चैव महानन्दप्रदायिनी ।। १२३।।
वसुप्रभा सुमाल्याप्तकन्धरा पङ्कजानना ।
परावरा वरारोहा सहस्रनयनार्चिता ।। १२४।।
श्रीरूपा श्रीमती श्रेष्ठा शिवनाम्नी शिवप्रिया ।
श्रीप्रदा श्रितकल्याणा श्रीधरार्धशरीरिणी ।। १२५।।
श्रीकलाऽनन्तदृष्टिश्च ह्यक्षुद्राऽऽरातिसूदनी ।
रक्तबीजनिहन्त्री च दैत्यसङ्गविमर्दिनी ।। १२६।।
सिंहारूढा सिंहिकास्या दैत्यशोणितपायिनी ।
सुकीर्तिसहिताच्छिन्नसंशया रसवेदिनी ।। १२७।।
गुणाभिरामा नागारिवाहना निर्जरार्चिता ।
नित्योदिता स्वयंज्योतिः स्वर्णकाया प्रकीर्तिता ।। १२८।।
वज्रदण्डाङ्किता चैव तथाऽमृतसञ्जीविनी ।
वज्रच्छन्ना देवदेवी वरवज्रस्वविग्रहा ।। १२९।।
माङ्गल्या मङ्गलात्मा च मालिनी माल्यधारिणी ।
गन्धर्वी तरुणी चान्द्री खड्गायुधधरा तथा ।। १३०।।
सौदामिनी प्रजानन्दा तथा प्रोक्ता भृगूद्भवा ।
एकानङ्गा च शास्त्रार्थकुशला धर्मचारिणी ।। १३१।।
धर्मसर्वस्ववाहा च धर्माधर्मविनिश्चया ।
धर्मशक्तिर्धर्ममया धार्मिकानां शिवप्रदा ।। १३२।।
विधर्मा विश्वधर्मज्ञा धर्मार्थान्तरविग्रहा ।
धर्मवर्ष्मा धर्मपूर्वा धर्मपारङ्गतान्तरा ।। १३३।।
धर्मोपदेष्ट्री धर्मात्मा धर्मगम्या धराधरा ।
कपालिनी शाकलिनी कलाकलितविग्रहा ।। १३४।।
सर्वशक्तिविमुक्ता च कर्णिकारधराऽक्षरा।
कंसप्राणहरा चैव युगधर्मधरा तथा ।। १३५।।
युगप्रवर्तिका प्रोक्ता त्रिसन्ध्या ध्येयविग्रहा ।
स्वर्गापवर्गदात्री च तथा प्रत्यक्षदेवता ।। १३६।।
आदित्या दिव्यगन्धा च दिवाकरनिभप्रभा ।
पद्मासनगता प्रोक्ता खड्गबाणशरासना ।। १३७।।
शिष्टा विशिष्टा शिष्टेष्टा शिष्टश्रेष्ठप्रपूजिता ।
शतरूपा शतावर्ता वितता रासमोदिनी ।। १३८।।
सूर्येन्दुनेत्रा प्रद्युम्नजननी सुष्ठुमायिनी ।
सूर्यान्तरस्थिता चैव सत्प्रतिष्ठतविग्रहा ।। १३९।।
निवृत्ता प्रोच्यते ज्ञानपारगा पर्वतात्मजा ।
कात्यायनी चण्डिका च चण्डी हैमवती तथा ।। १४०।।
दाक्षायणी सती चैव भवानी सर्वमङ्गला ।
धूम्रलोचनहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ।। १४१।।
योगनिद्रा योगभद्रा समुद्रतनया तथा ।
देवप्रियङ्करी शुद्धा भक्तभक्तिप्रवर्धिनी ।। १४२।।
त्रिणेत्रा चन्द्रमुकुटा प्रमथार्चितपादुका ।
अर्जुनाभीष्टदात्री च पाण्डवप्रियकारिणी ।। १४३।।
कुमारलालनासक्ता हरबाहूपधानिका ।
विघ्नेशजननी भक्तविघ्नस्तोमप्रहारिणी ।। १४४।।
सुस्मितेन्दुमुखी नम्या जयाप्रियसखी तथा ।
अनादिनिधना प्रेष्ठा चित्रमाल्यानुलेपना ।। १४५।।
कोटिचन्द्रप्रतीकाशा कूटजालप्रमाथिनी ।
कृत्याप्रहारिणी चैव मारणोच्चाटनी तथा ।। १४६।।
सुरासुरप्रवन्द्याङ्घ्रिर्मोहघ्नी ज्ञानदायिनी ।
षड्वैरिनिग्रहकरी वैरिविद्राविणी तथा ।। १४७।।
भूतसेव्या भूतदात्री भूतपीडाविमर्दिका ।
नारदस्तुतचारित्रा वरदेशा वरप्रदा ।। १४८।।
वामदेवस्तुता चैव कामदा सोमशेखरा ।
दिक्पालसेविता भव्या भामिनी भावदायिनी ।। १४९।।
स्त्रीसौभाग्यप्रदात्री च भोगदा रोगनाशिनी ।
व्योमगा भूमिगा चैव मुनिपूज्यपदाम्बुजा ।
वनदुर्गा च दुर्बोधा महादुर्गा प्रकीर्तिता ।। १५०।।
फलश्रुतिः
इतीदं कीर्तिदं भद्र दुर्गानामसहस्रकम् ।
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं तस्य लक्ष्मीः स्थिरा भवेत् ।। १।।
ग्रहभूतपिशाचादिपीडा नश्यत्यसंशयम् ।
बालग्रहादिपीडायाः शान्तिर्भवति कीर्तनात् ।। २।।
मारिकादिमहारोगे पठतां सौख्यदं नृणाम् ।
व्यवहारे च जयदं शत्रुबाधानिवारकम् ।। ३।।
दम्पत्योः कलहे प्राप्ते मिथः प्रेमाभिवर्धकम् ।
आयुरारोग्यदं पुंसां सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।। ४।।
विद्याभिवर्धकं नित्यं पठतामर्थसाधकम् ।
शुभदं शुभकार्येषु पठतां शृणुतामपि ।। ५।।
यः पूजयति दुर्गां तां दुर्गानामसहस्रकैः ।
पुष्पैः कुङ्कुमसम्मिश्रैः स तु यत्काङ्क्षते हृदि ।। ६।।
तत्सर्वं समवाप्नोति नास्ति नास्त्यत्र संशयः ।
यन्मुखे ध्रियते नित्यं दुर्गानामसहस्रकम् ।। ७।।
किं तस्येतरमन्त्रौघैः कार्यं धन्यतमस्य हि ।
दुर्गानामसहस्रस्य पुस्तकं यद्गृहे भवेत् ।। ८।।
न तत्र ग्रहभूतादिबाधा स्यान्मङ्गलास्पदे ।
तद्गृहं पुण्यदं क्षेत्रं देवीसान्निध्यकारकम् ।। ९।।
एतस्य स्तोत्रमुख्यस्य पाठकः श्रेष्ठमन्त्रवित् ।
देवतायाः प्रसादेन सर्वपूज्यः सुखी भवेत् ।। १०।।
इत्येतन्नगराजेन कीर्तितं मुनिसत्तम ।
गुह्याद्गुह्यतरं स्तोत्रं त्वयि स्नेहात् प्रकीर्तितम् ।। ११।।
भक्ताय श्रद्धधानाय केवलं कीर्त्यतामिदम् ।
हृदि धारय नित्यं त्वं देव्यनुग्रहसाधकम् ।। १२।। ।।
इति श्रीस्कान्दपुराणे स्कन्दनारदसंवादे दुर्गासहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

दुर्गा नाममाला

दुर्गा नाममाला
दुर्गा दुर्गार्तिशामिनी दुर्गापद्विनिवारिणी |
दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ||
दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहंत्री दुर्गमापहा |
दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ||

दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी |
दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविधया दुर्गमाश्रिता ||
दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी |
दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ||
दुर्गमासुरसहंत्री दुर्गमायुधधरिणी |
दुर्गमाङगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी||
दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्ग दारिणी |
नामावलिमिमां यस्तु दुर्गाया मम मानवः पठेत सर्व भयनुमुक्तो भविष्यति न संशयः ||

एक श्लोकी रामायण

एक श्लोकी रामायण
आदौ राम तपोवनादि गमनं , हत्वा मृगम कांचनम वैदेहि हरणं जटायु मरणं सुग्रीव सम भाषणं बाली निर्दलम समुद्र तरणं लंकापुरी दाहनं पश्चात् रावण कुम्भकरण हननम एताधि रामायणं ||

एक श्लोकी भागवत

एक श्लोकी भागवत
आदौं देवकी देव गर्भ जननं गोपी गृह वर्धनम माया श्वान जीव ताप हरणं गोवार्धनो धारणं कंस छेदन कौरावादी हननं कुंती सुतम पालनं एतद श्री मद भागवत कथितं श्री कृष्ण लीला अमृतं|

श्री-कृष्ण-सहस्त्रनाम-स्तोत्र

श्री-कृष्ण-सहस्त्रनाम-स्तोत्र
॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥
ध्यानम्
शिखिमुकुटविशेषं नीलपद्माङ्गदेशं
विधुमुखकृतकेशं कौस्तुभापीतवेशम् ।
मधुररवकलेशं शं भजे भ्रातुशेषं
व्रजजनवनितेशं माधवं राधिकेशम् ॥<B>
स्तोत्रम्
कृष्णः श्रीवल्लभः शार्ङ्गी विष्वक्सेनः स्वसिद्धिदः ।
क्षीरोदधामा व्यूहेशः शेषशायी जगन्मयः ॥ १ ॥
भक्तिगम्यस्‍त्रयीमूर्तिर्भारार्तवसुधास्तुतः ।
देवदेवो दयासिन्धुर्देवो देवशिखामणिः ॥ २ ॥
सुखभावः सुखाधारो मुकुन्दो मुदिताशयः ।
अविक्रियः क्रियामूर्तिरध्यात्मस्वस्वरूपवान् ॥ ३ ॥
शिष्टाभिलक्ष्यो भूतात्मा धर्मत्राणार्थचेष्टितः ।
अन्तर्यामी कलारूपः कालावयवसाक्षिकः ॥ ४ ॥
वसुधायासहरणो नारदप्रेरणोन्मुखः ।
प्रभूष्णुर्नारदोद्गीतो लोकरक्षापरायणः ॥ ५ ॥
रौहिणेयकृतानन्दो योगज्ञाननियोजकः ।
महागुहान्तर्निक्षिप्तः पुराणवपुरात्मवान् ॥ ६ ॥
शूरवंशैकधीः शौरिः कंसशंकाविषादकृत् ।
वसुदेवोल्लसच्छाक्तिर्देवक्यष्टमगर्भगः ॥ ७ ॥
वसुदेवसुतः श्रीमान् देवकीनन्दनो हरिः ।
आश्चर्यबालः श्रीवत्सलक्ष्मवक्षाश्चतुर्भुजः ॥ ८ ॥
स्वभावोत्कृष्टसद्भावः कृष्णाष्टम्यन्तसम्भवः ।
प्राजापत्यर्क्षसम्भूतो निशीथसमयोदितः ॥ ९ ॥
शंखचक्रगदापद्मपाणिः पद्मनिभेक्षणः ।
किरीटी कौस्तुभोरस्कः स्फुरन्मकरकुण्डलः ॥ १० ॥
पीतवासा घनश्यामः कुञ्चिताञ्चितकुन्तलः ।
सुव्यक्तव्यक्ताभरणः सूतिकागृहभूषणः ॥ ११ ॥
कारागारान्धकारघ्नः पितृप्राग्जन्मसूचकः ।
वसुदेवस्तुतः स्तोत्रं तापत्रयनिवारणः ॥ १२ ॥
निरवद्यः क्रियामूर्तिर्न्यायवाक्यनियोजकः ।
अदृष्टचेष्टः कूटस्थो धृतलौकिकविग्रहः ॥ १३ ॥
महर्षिमानसोल्लासो महीमङ्गलदायकः ।
संतोषितसुरव्रातः साधुचित्तप्रसादकः ॥ १४ ॥
जनकोपायनिर्देष्टा देवकीनयनोत्सवः ।
पितृपाणिपरिष्कारो मोहितागाररक्षकः ॥ १५ ॥
स्वशक्त्युद्धाटिताशेषकपाटः पितृवाहकः ।
शेषोरगफणाच्छत्रः शेषोक्ताख्यासहस्‍त्रकः ॥ १६ ॥
यमुनापूरविध्वंसी स्वभासोद्भासितव्रजः ।
कृतात्मविद्याविन्यासो योगमायाग्रसम्भवः ॥ १७ ॥
दुर्गानिवेदितोद्भावो यशोदातल्पशायकः ।
नन्दगोपोत्सवस्फूर्तिर्व्रजानन्दकरोदयः ॥ १८ ॥
सुजातजातकर्मश्रीर्गोपीभद्रोक्तिनिर्वृतः ।
अलीकनिद्रोपगमः पूतनास्तनपीडनः ॥ १९ ॥
स्तन्यात्तपूतनाप्राणः पूतनाक्रोशकारकः ।
विन्यस्तरक्षागोधूलिर्यशोदाकरलालितः ॥ २० ॥
नन्दाघ्रातशिरोमध्यः पूतनासुगतिप्रदः ।
बालः पर्यङ्कनिद्रालुर्मुखार्पितपदाङ्गुलिः ॥ २१ ॥
अञ्जनस्निग्धनयनः पर्यायाङ्करितस्मितः ।
लीलाक्षस्तरलालोक शकटासुरभञ्जनः ॥ २२ ॥
द्विजोदितस्वस्त्ययनो मन्त्रपूतजलाप्लुतः ।
यशोदोत्सङ्गपर्यङ्को यशोदामुखवीक्षकः ॥ २३ ॥
यशोदास्तन्यमुदितस्तृणावर्तादिदुःसहः ।
तृणावर्तासुरध्वंसी मातृविस्मयकारकः ॥ २४ ॥
प्रशस्तनामकरणो जानुचंक्रमणोत्सुकः ।
व्यालम्बिचूलिकारत्‍नो घोषगोपः प्रहर्षणः ॥ २५ ॥
स्वमुखप्रतिबिम्बार्थी ग्रीवाव्याघ्रनखोज्ज्वलः ।
पङ्कानुलेपरुचिरो मांसलोरुकटितटः ॥ २६ ॥
घृष्टजानुकरद्वन्द्वः प्रतिबिम्बानुकारकृत् ।
अव्यक्तवर्णवाग्वृत्तिः स्मितलक्ष्यरदोद्गमः ॥ २७ ॥
धात्रीकरसमालम्बी प्रस्खलच्चित्रचंक्रमः ।
अनुरूपवयस्याढ्यश्चारुकौमारचापलः ॥ २८ ॥
वत्सपुच्छसमाकृष्टो वत्सपुच्छविकर्षणः ।
विस्मारितान्यव्यापारो गोपगोपीमुदावहः ॥ २९ ॥
अकालवत्सनिर्मोक्ता व्रजव्याक्रोशसुस्मितः ।
नवनीतमहाचोरो दारकाहारदायकः ॥ ३० ॥
पीठोलूखलसोपानः क्षीरभाण्डविभेदनः ।
शिक्यभाण्डसमाकर्षी ध्वान्तागारप्रवेशकृत् ॥ ३१ ॥
भूषारत्‍नप्रकाशाढ्यो गोप्युपालम्भभर्त्सितः ।
परागधूसराकारो मृद्भक्षणकृतेक्षणः ॥ ३२ ॥
बालोक्तमृत्कथारम्भो मित्रान्तर्गूढविग्रहः ।
कृतसंत्रासलोलाक्षो जननीप्रत्ययावहः ॥ ३३ ॥
मातृदृश्यात्तवदनो वक्त्रलक्ष्यचराचरः ।
यशोदालालितस्वात्मा स्वयं स्वाच्छन्द्यमोहनः ॥ ३४ ॥
सवित्रीस्नेहसंश्‍लिष्टः सवित्रीस्तनलोलुपः ।
नवनीतार्थनाप्रह्वो नवनीतमहाशनः ॥ ३५ ॥
मृषाकोपप्रकम्पोष्ठो गोष्ठाङ्गणविलोकनः ।
दधिमन्थघटीभेत्ता किङ्किणीक्वाणसूचितः ॥ ३६ ॥
हैयङ्गवीनरसिको मृषाश्रुश्चौर्यशाङ्कितः ।
जननीश्रमविज्ञाता दामबन्धनियन्त्रितः ॥ ३७ ॥
दामाकल्पश्चलापाङ्गो गाढोलूखलबन्धनः ।
आकृष्टोलूखलोऽनन्तः कुबेरसुतशापवित् ॥ ३८ ॥
नारदोक्तिपरामर्शी यमलार्जुनभञ्जनः ।
धनदात्मजसंघुष्टो नन्दमोचितबन्धनः ॥ ३९ ॥
बालकोद्गीतनिरतो बाहुक्षेपोदितप्रियः ।
आत्मज्ञो मित्रवशगो गोपीगीतगुणोदयः ॥ ४० ॥
प्रस्थानशकटारूढो वृन्दावनकृतालयः ।
गोवत्सपालनैकाग्रो नानाक्रीडापरिच्छदः ॥ ४१ ॥
क्षेपणीक्षेपणः प्रीतो वेणुवाद्यविशारदः ।
वृषवत्सानुकरणो वृषध्वानविडम्बनः ॥ ४२ ॥
नियुद्धलीलासंह्रष्टः कूजानुकृतकोकिलः ।
उपात्तहंसगमनः सर्वजन्तुरुतानुकृत् ॥ ४३ ॥
भृङ्गानुकारी दध्यन्नचोरो वत्सपुरस्सरः ।
बली बकासुरग्राही बकतालुप्रदाहकः ॥ ४४ ॥
भीतगोपार्भकाहूतो बकचञ्चुविदारणः ।
बकासुरारिर्गोपालो बालो बालाद्भुतावहः ॥ ४५ ॥
बलभद्रसमाश्‍लिष्टः कृतक्रीडानिलायनः ।
क्रीडासेतुनिधानज्ञः प्लवङ्गोत्प्लवनोऽद्भुतः ॥ ४६ ॥
कन्दुकक्रीडनो लुप्तनन्दादिभववेदनः ।
सुमनोऽलंकृतशिराः स्वादुस्निग्धान्नशिक्यभृत् ॥ ४७ ॥
गुञ्जाप्रालम्बनच्छन्नः पिञ्छैरलकवेषकृत् ।
वन्याशनप्रियः श्रृङ्गरवाकारितवत्सकः ॥ ४८ ॥
मनोज्ञपल्लवोत्तंसपुष्पस्वेच्छात्तषट्‌पदः ।
मञ्जुशिज्ञितमञ्जीरचरणः करकङ्कणः ॥ ४९ ॥
अन्योन्यशासनः क्रीडापटुः परमकैतवः ।
प्रतिध्वानप्रमुदितः शाखाचतुरचंक्रमः ॥ ५० ॥
अघदानवसंहर्ता व्रजविघ्नविनाशनः ।
व्रजसञ्जीवनः श्रेयोनिधर्दानवमुक्तिदः ॥ ५१ ॥
कालिन्दीपुलिनासीनः सहभुक्तव्रजार्भकः ।
कक्षाजठरविन्यस्तवेणुर्वल्लवचेष्टितः ॥ ५२ ॥
भुजसन्ध्यन्तरन्यस्तश्रृङ्गवेत्रः शुचिस्मितः ।
वामपाणिस्थदध्यन्नकवलः कलभाषणः ॥ ५३ ॥
अङ्गुल्यन्तरविन्यस्तफलः परमपावनः ।
अदृश्यतर्णकान्वेषी वल्लवार्भकभीतिहा ॥ ५४ ॥
अदृष्टवत्सपव्रातो ब्रह्मविज्ञातवैभवः ।
गोवत्सवत्सपान्वेषी विराट्‌पुरुषविग्रहः ॥ ५५ ॥
स्वसंकल्पानुरूपार्थो वत्सवत्सपरूपधृक् ।
यथावत्सक्रियारूपो यथास्थाननिवेशनः ॥ ५६ ॥
यथाव्रजार्भकाकारो गोगोपीस्तन्यपः सुखी ।
चिराद्बलो हितो दान्तो ब्रह्मविज्ञातवैभवः ॥ ५७ ॥
विचित्रशक्तिर्व्यालीनः सृष्टगोवत्सवत्सपः ।
ब्रह्मत्रपाकरो धातृस्तुतः सर्वार्थसाधकः ॥ ५८ ॥
ब्रह्म ब्रह्ममयोऽव्यक्तस्तेजोरूपः सुखात्मकः ।
निरुक्तं व्याकृतिर्व्यक्तो निरालम्बनभावनः ॥ ५९ ॥
प्रभविष्णुरतन्त्रीको देवपक्षार्थरूपधृक् ।
अकामः सर्ववेदादिरणीयः स्थूलरूपवान् ॥ ६० ॥
व्यापी व्याप्यः कृपाकर्ता विचित्राचारसम्पतः ।
छेन्दोमयः प्रधानात्मा मूर्तामूर्तिद्वयाकृतीः ॥ ६१ ॥
अनेकमूर्तिरक्रोधः परः प्रकृतिरक्रमः ।
सकलावरणोपेतः सर्वदेवो महेश्वरः ॥ ६२ ॥
महाप्रभावनः पूर्ववत्सवत्सपदर्शकः ।
कृष्णयादवगोपालो गोपालोकनहर्षितः ॥ ६३ ॥
स्मितेक्षाहर्षितब्रह्मा भक्तवत्सलवाक्प्रियः ।
ब्रह्मानन्दाश्रुधौतांघ्रिर्लीलावैचित्र्यकोविदः ॥ ६४ ॥
बलभद्रैकह्रदयो नामकारितगोकुलः ।
गोपालबालको भव्यो रज्जुयज्ञोपवीतवान् ॥ ६५ ॥
वृक्षच्छायाहताशान्तिर्गोपोत्सङ्गपबर्हणः ।
गोपसंवाहितपदो गोपव्यजनवीजितः ॥ ६६ ॥
गोपगानसुखोन्निद्रः श्रीदामार्जितसौह्रदः ।
सुनन्दसुह्रदेकात्मा सुबलप्राणरञ्जनः ॥ ६७ ॥
तालीवनकृतक्रीडो बलपातितधेनुकः ।
गोपीसौभाग्यसम्भाव्यो गोधूलिच्छुरितालकः ॥ ६८ ॥
गोपीविरहसंतप्तो गोपिकाकृतमज्जनः ।
प्रलम्बबाहुरुत्फुल्लपुण्डरीकावतंसकः ॥ ६९ ॥
विलासललितस्मेरगर्भलीलावलोकनः ।
स्‍त्रग्भूषणानुलेपाढ्यो जनन्युपह्रतान्नभुक् ॥ ७० ॥
वरशय्याशयो राधप्रेमसल्लापनिर्वृतः ।
यमुनातटसंचारी विषार्तव्रजहर्षदः ॥ ७१ ॥
कालियक्रोधजनकः वृद्धाहिकुलवेष्टितः ।
कालियाहिफणारङ्गनटः कालियमर्दनः ॥ ७२ ॥
नागपत्‍नीस्तुतिप्रीतो नानावेषसमृद्धिकृत् ।
अविषाक्तदृगात्मेशः स्वदृगात्मास्तुतिप्रियः ॥ ७३ ॥
सर्वेश्वरः सर्वगुणः प्रसिद्धः सर्वसात्वतः ।
अकुण्ठधामा चन्द्रार्कदृष्टिराकाशनिर्मलः ॥ ७४ ॥
अनिर्देश्यगतिर्नागवनितापतिभैक्षदः ।
स्वांघ्रिमुद्राङ्कनागेन्द्रमूर्धा कालियसंस्तुतः ॥ ७५ ॥
अभयो विश्वतश्चक्षुः स्तुतोत्तमगुणः प्रभुः ।
अहमात्मा मरुत्प्राणः परमात्मा द्युशीर्षवान् ॥ ७६ ॥
नागोपायनह्रष्टात्मा ह्रदोत्सारितकालियः ।
बलभद्रसुखालापो गोपालिङ्गननिर्वृतः ॥ ७७ ॥
दावाग्निभीतगोपालगोप्ता दावाग्निनाशनः ।
नयनाच्छादनक्रीडलम्पटो नृपचेष्टितः ॥ ७८ ॥
काकपक्षधरः सौम्यो बलवाहककेलिमान् ।
बलघातितदुर्धर्षप्रलम्बो बलवत्सलः ॥ ७९ ॥
मुञ्जाटव्यग्निशमनः प्रावृट्‌कालविनोदवान् ।
शिलान्यस्तान्नभृद्दैत्यसंहर्ता शाद्वलासनः ॥ ८० ॥
सदाप्तगोपिकोद्गीतः कर्णिकारावतंसकः ।
नटवेषधरः पद्ममालाङ्को गोपिकावृतः ॥ ८१ ॥
गोपीमनोहरापाङ्गो वेणुवादनतत्परः ।
विन्यस्तवदनाम्भोजश्चारुशब्दकृताननः ॥ ८२ ॥
बिम्बाधरार्पितदारुवेणुर्विश्वविमोहनः ।
व्रजसंवर्णितः श्राव्यवेणुनादश्रुतिप्रियः ॥ ८३ ॥
गोगोपगोपीजन्मेप्सुर्ब्रह्मेन्द्राद्यभिवन्दितः ।
गीतस्‍त्रुतिसरित्पूरो नादनर्तितबर्हिणः ॥ ८४ ॥
रागपल्लवितस्थाणुर्गीतनमितपादपः ।
विस्मारिततृणग्रासमृगो मृगविलोभितः ॥ ८५ ॥
व्याघ्रादिहिंस्‍त्रसहजवैरहर्ता सुगायनः ।
गाढोदीरितगोवृन्दः प्रेमोत्कर्णिततर्णकः ॥ ८६ ॥
निष्पन्दयानब्रह्मादिवीक्षितो विश्ववन्दितः ।
शाखोत्कर्णशकुन्तौघश्‍छत्रायितवलाहकः ॥ ८७ ॥
प्रसन्नः परमानन्दश्चित्रायितचराचरः ।
गोपिकामदनो गोपीकुचकुङ्गममुद्रितः ॥ ८८ ॥
गोपकन्याजलक्रीडाह्रष्टो गोप्यंशुकापह्रत् ।
स्कन्धारोपितगोपस्‍त्रीवासाः कुन्दनिभस्मितः ॥ ८९ ॥
गोपीनेत्रोत्पलशशी गोपिकायाचितांशुकः ।
गोपीनमस्क्रियादेष्टा गोप्येककरवन्दितः ॥ ९० ॥
गोप्यञ्जलिविशेषार्थी गोपक्रीडाविलोभितः ।
शान्तवासस्फुरद्गोपीकृताञ्जलिरघापहः ॥ ९१ ॥
गोपीकेलिविलासार्थी गोपीसम्पूर्णकामदः ।
गोपस्‍त्रीवस्‍त्रदो गोपीचित्तचोरः कुतूहली ॥ ९२ ॥
वृन्दावनप्रियो गोपबन्धुर्यज्वान्नयाचिता ।
यज्ञेशो यज्ञभावज्ञो यज्ञपत्‍न्यभिवाञ्छितः ॥ ९३ ॥
मुनिपत्‍नीवितीर्णान्नतृप्तो मुनिवधूप्रियः ।
द्विजपत्न्यभिभावज्ञो द्विजपत्‍नीवरप्रदः ॥ ९४ ॥
प्रतिरुद्धसतीमोक्षप्रदो द्विजविमोहितः ।
मुनिज्ञानप्रदो यज्वस्तुतो वासवयागवित् ॥ ९५ ॥
पितृप्रोक्तक्रियारूपशक्रयागनिवारणः ।
शक्राऽमर्षकरः शक्रवृष्टिप्रशमनोन्मुख ॥ ९६ ॥
गोवर्धनधरो गोपगोवृन्दत्राणतत्परः ।
गोवर्धनगिरिछत्रचण्डदण्डभुजार्गलः ॥ ९७ ॥
सप्ताहविधृताद्रीन्द्रो मेघवाहनगर्वहा ।
भुजाग्रोपरिविन्यस्तक्ष्माधरक्ष्माभृदच्युतः ॥ ९८ ॥
स्वस्थानस्थापितगिरिर्गोपीदध्यक्षतार्चितः ।
सुमनः सुमनोवृष्टिह्रष्टो वासववन्दितः ॥ ९९ ॥
कामधेनुपयःपूराभिषिक्तः सुरभिस्तुतः ।
धरांघ्रिरोषधीरोमा धर्मगोप्ता मनोमयः ॥ १०० ॥
ज्ञानयज्ञप्रियः शास्त्रनेत्रः सर्वार्थसारथिः ।
ऎरावतकरानीतवियद्गङ्गाप्लुतो विभुः ॥ १०१ ॥
ब्रह्माभिषिक्तो गोगोप्ता सर्वलोकशुभंकरः ।
सर्ववेदमयो मग्ननन्दान्वेषिपितृप्रियः ॥ १०२ ॥
वरुणोदीरितात्मेक्षाकौतुको वरुणार्चितः ।
वरुणानीतजनको गोपज्ञातात्मवैभवः ॥ १०३ ॥
स्वर्लोकालोकसंह्रष्टगोपवर्गत्रिवर्गदः ।
ब्रह्मग्रद्गोपितो गोपद्रष्टा ब्रह्मपदप्रदः ॥ १०४ ॥
शरच्चन्द्रविहारोक्तः श्रीपतिर्वशकः क्षमः ।
भयापहो भर्तृरुद्धगोपिकाध्यानगोचरः ॥ १०५ ॥
गोपिकानयनास्वाद्यो गोपीनर्मोक्तिनिर्वृतः ।
गोपिकामनहरणो गोपिकाशतयूथपः ॥ १०६ ॥
वैजयन्तीस्त्रगाकल्पो गोपिकामानवर्धनः ।
गोपकान्तासुनिर्देष्टा कान्तो मन्मथमन्मथः ॥ १०७ ॥
स्वात्मास्यदत्तताम्बूलः फलितोत्कृष्टयौवनः ।
वल्लवीस्तनसक्ताक्षो वल्लवीप्रेमचालितः ॥ १०८ ॥
गोपीचेलांचलासीनो गोपीनेत्राब्जषट्‌पदः ।
रासक्रीडासमासक्तो गोपीमण्डलमण्डनः ॥ १०९ ॥
गोपीहेममणिश्रेणिमध्येन्द्रमनिरुज्जवलः ।
विद्याधरेन्दुशापघ्नः शंखचूडशिरोहरः ॥ ११० ॥
शंखचूडशिरोरत्‍नसम्प्रीणितबलोऽनघः ।
अरिष्टारिष्टकृद्दुष्टकेशिदैत्यनिषूदनः ॥ १११ ॥
सरसः सस्मितमुखः सुस्थिरो विरहाकुलः ।
संकर्षणार्पितप्रीतिरक्रूरध्यानगोचरः ॥ ११२ ॥
अक्रूरसंस्तुतो गूढो गुणवृत्त्युपलक्षितः ।
प्रमाणगम्यस्तन्मात्राऽवयवी बुद्धितत्परः ॥ ११३ ॥
सर्वप्रमाणप्रमथीसर्वप्रत्ययसाधकः ।
पुरुषश्च प्रधानात्मा विपर्यासविलोचनः ॥ ११४ ॥
मधुराजनसंवीक्ष्यो रजकप्रतिघातकः ।
विचित्राम्बरसंवीतो मालाकारवरप्रदः ॥ ११५ ॥
कुब्जावक्रत्वनिर्मोक्ता कुब्जायौवनदायकः ।
कुब्जाङ्गरागसुरभिः कंसकोदण्डखण्डनः ॥ ११६ ॥
धीरः कुवलयपीडमर्दनः कंसभीतिकृत् ।
दन्तिदन्तायुधो रङ्गत्रासको मल्लयुद्धवित् ॥ ११७ ॥
चाणूरहन्ता कंसारिर्देवकीहर्षदायकः ।
वसुदेवपदानम्रः पितृबन्धविमोचनः ॥ ११८ ॥
उर्वीभयापहो भूप उग्रसेनाधिपत्यदः ।
आज्ञास्थितशचीनाथः सुधर्मानयनक्षमः ॥ ११९ ॥
आद्यो द्विजातिसत्कर्ता शिष्टाचारप्रदर्शकः ।
सान्दीपनिकृताभ्यस्तविद्याभ्यासैकधीः सुधीः ॥ १२० ॥
गुर्वभीष्टक्रियादक्षः पश्चिमोदधिपूजितः ।
हतपञ्चजनप्राप्तपाञ्चजन्यो यमार्चितः ॥ १२१ ॥
धर्मराजजयानीतगुरुपुत्र उरुक्रमः ।
गुरुपुत्रपदः शास्ता मधुराजसभासदः ॥ १२२ ॥
जामदग्नयसमभ्यर्च्यो गोमन्तगिरिसंचरः ।
गोमन्तदावशमनो गरुडानीतभूषणः ॥ १२३ ॥
चक्राद्यायुधसंशोभी जरासन्धमदापहः ।
सृगालावनिपालघ्नः स्रृगालात्मजराज्यदः ॥ १२४ ॥
विध्वस्तकालयवनो मुचुकुन्दवरप्रदः ।
आज्ञापितमहाम्भोधिर्द्वारकापुरकल्पनः ॥ १२५ ॥
द्वारकानिलयो रुक्मिमानहन्ता यदुद्वहः ।
रुचिरो रुक्मिणिजानिः प्रद्युम्नजनकः प्रभुः ॥ १२६ ॥
अपाकृतत्रिलोकार्तिरनिरुद्धपितामहः ।
अनिरुद्धपदान्वेषी चक्री गरुडवाहनः ॥ १२७ ॥
बाणासुरपुरीरोद्धा रक्षाज्वल्नयन्त्रजित् ।
धूतप्रमथसंरम्भो जितमाहेश्वरज्वरः ॥ १२८ ॥
षट्‌चक्रशक्तिनिर्जेता भूतवेतालमोहकृत् ।
शम्भुत्रिशूलजिच्छम्भुजम्भणः शम्भुसंस्तुतः ॥ १२९ ॥
इन्द्रियात्मेन्दुह्रदयः सर्वयोगेश्वरेश्वरः ।
हिरण्यगर्भह्रदयो मोहावर्तनिवर्तनः ॥ १३० ॥
आत्मज्ञाननिधर्मेधाकोशस्तन्मात्ररूपवान् ।
इन्द्रोऽग्निवदनः कालनाभः सर्वागमाध्वगः ॥ १३१ ॥
तुरीयः सर्वधीसाक्षी द्वन्द्वाराम आत्मदूरगः ।
अज्ञातपारवश्यश्रीरव्याकृतविहारवान् ॥ १३२ ॥
आत्मप्रदीपो विज्ञानमात्रात्मा श्रीनिकेतनः ।
बाणबाहुवनच्छेत्ता महेन्द्रप्रीतिवर्धनः ॥ १३३ ॥
अनिरूद्धनिरोधज्ञो जलेशाह्रतगोकुलः ।
जलेशविजयी वीरः सत्राजिद्रत्नयाचकः ॥ १३४ ॥
प्रसेनान्वेषणोद्युक्तो जाम्बवद्धृतरत्नदः ।
जितर्क्षराजतनयाहर्ता जाम्बवतीप्रियः ॥ १३५ ॥
सत्यभामाप्रियः कामः शतधन्वशिरोहरः ।
कालिन्दीपतिरक्रूरबन्धुरक्रूररत्नदः ॥ १३६ ॥
कैकेयीरमणो भद्रभर्ता नाग्नजितीधवः ।
माद्रीमनोहरः शैब्याप्राणबन्धुरुरुक्रमः ॥ १३७ ॥
सुशीलादयितो मित्रविन्दानेत्रमहोत्सवः ।
लक्ष्मणावल्लभो रुद्धप्राग्ज्योतिषमहापुरः ॥ १३८ ॥
सुरपाशावृतिच्छेदी मुरारिः क्रूरयुद्धवित् ।
हयग्रीवशिरोहर्ता सर्वात्मा सर्वदर्शनः ॥ १३९ ॥
नरकासुरविच्छेत्ता नरकात्मजराज्यदः ।
पृथ्वीस्तुतः प्रकाशात्मा ह्रद्यो यज्ञफलप्रदः ॥ १४० ॥
गुणग्राही गुणद्रष्टा गूढस्वात्माविभूतिमान् ।
कविर्जगदुपद्रष्टा परमाक्षरविग्रहः ॥ १४१ ॥
प्रपन्नपालनो माली महद्ब्रह्मविवर्धनः ।
वाच्यवाचकशक्त्यर्थः सर्वव्याकृतसिद्धिदः ॥ १४२ ॥
स्वयम्प्रभुरनिर्वेद्यः स्वप्रकाशश्चिरन्तनः ।
नादात्मा मन्त्रकोटीशो नानावादनिरोधकः ॥ १४३ ॥
कन्दर्पकोटिलावण्यः परार्थैकप्रयोजकः ।
अमरीकृतदेवौघः कन्यकाबन्धमोचनः ॥ १४४ ॥
षोडशस्‍त्रीसहस्‍त्रेशः कान्तः कान्तामनोभवः ।
क्रीडारत्नाचलाहर्ता वरुणच्छत्रशोभितः ॥ १४५ ॥
शक्राभिवन्दितः शक्रजननीकुण्डलप्रदः ।
अदितिप्रस्तुतस्तोत्रो ब्राह्मणोद्धुष्टचेष्टनः ॥ १४६ ॥
पुराणः संयमी जन्मालिप्तः षड्‌विंशकोऽर्थदः ।
यशस्यनीतिराद्यन्तरहितः सत्कथाप्रियः ॥ १४७ ॥
ब्रह्मबोधः परानन्दः पारिजातापहारकः ।
पौण्ड्रकप्राणहरणः काशिराजनिषूदनः ॥ १४८ ॥
कृत्यागर्वप्रशमनो विचक्रवधदीक्षितः ।
हंसविध्वंसनः साम्बजनको डिम्भकार्दनः ॥ १४९ ॥
मुनिर्गोप्ता पितृवरप्रदः सवनदीक्षितः ।
रथी सारथ्यनिर्देष्टा फाल्गुनः फाल्गुनिप्रियः ॥ १५० ॥
सप्ताब्धिस्तम्भनोद्भुतो हरिः सप्ताब्धिभेदनः ।
आत्मप्रकाशः पूर्णश्रीरादिनारायणेक्षितः ॥ १५१ ॥
विप्रपुत्रप्रदश्चैव सर्वमातृसुतप्रदः ।
पार्थविस्मयकृत्पार्थप्रणवार्थप्रबोधनः ॥ १५२ ॥
कैलासयात्रासुमुखो बदर्याश्रमभूषणः ।
घण्टाकर्णाक्रियमौढ्यतोषितो भक्तवत्सलः ॥ १५३ ॥
मुनिवृन्दादिभिर्ध्येयो घण्टाकर्णवरप्रदः ।
तपश्चर्यापरश्चीरवासाः पिङ्गजटाधरः ॥ १५४ ॥
प्रत्यक्षीकृतभूतेशः शिवस्तोता शिवस्तुतः ।
कृष्णास्वयंवरालोककौतुकी सर्वसम्मतः ॥ १५५ ॥
बलसंरम्भशमनो बलदर्शितपाण्डवः ।
यतिवेषार्जुनाभीष्टदायी सर्वात्मगोचरः ॥ १५६ ॥
सुभद्राफाल्गुनोद्वाहकर्ता प्रीणितफाल्गुनः ।
खाण्डवप्रीणितार्चिष्मान् मयदानवमोचनः ॥ १५७ ॥
सुलभो राजसूयार्हो युधिष्ठिरनियोजकः ।
भीमार्दितजरासन्धो मागधात्मजराज्यदः ॥ १५८ ॥
राजबन्धननिर्मोक्ता राजसूयाग्रपूजनः ।
चैद्याद्यसहनो भीष्मस्तुतः सात्वतपूर्वजः ॥ १५९ ॥
सर्वात्मार्थसमाहर्ता मन्दराचलधारकः ।
यज्ञावतारः प्रह्लादप्रतिज्ञापरिपालकः ॥ १६० ॥
बलियज्ञसभाध्वंसी दृप्तक्षत्रकुलान्तकः ।
दशग्रीवान्तको जेता रेवतीप्रेमवल्लभः ॥ १६१ ॥
सर्वावताराधिष्ठाता वेदबाह्यविमोहनः ।
कलिदोषनिराकर्ता दशनामा दृढव्रतः ॥ १६२ ॥
अमेयात्मा जगत्स्वामी वाग्मी चैद्यशिरोहरः ।
द्रौपदीरचितस्तोत्रः केशवः पुरुषोत्तमः ॥ १६३ ॥
नारायणो मधुपतिर्माधवो दोषवर्जितः ।
गोविन्दः पुण्डरीकाक्षो विष्णुश्च मधुसूदनः ॥ १६४ ॥
त्रिविक्रमस्‍त्रिलोकेशो वामनः श्रीधरः पुमान् ।
ह्रषीकेशो वासुदेवः पद्मनाभो महाह्रदः ॥ १६५ ॥
दामोदरश्चतुर्व्यूहः पाञ्चालीमानरक्षणः ।
शाल्वघ्नः समरश्‍लाघी दन्तवक्त्रनिबर्हणः ॥ १६६ ॥
दामोदरप्रियसखः पृथुकास्वादनप्रियः ।
घृणी दामोदरः श्रीदो गोपीपुनरवेक्षकः ॥ १६७ ॥
गोपिकामुक्तिदो योगी दुर्वासस्तृप्तिकारकः ।
अविज्ञातव्रजाकीर्णपाण्डवालोकनो जयी ॥ १६८ ॥
पार्थसारथ्यनिरतः प्राज्ञः पाण्डवदौत्यकृत् ।
विदुरातिथ्यसंतुष्टः कुन्तीसंतोशदायकः ॥ १६९ ॥
सुयोधनतिरस्कर्ता दुर्योधनविकारवित्‌ ।
विदुराभिष्टुतो नित्यो वार्ष्णेयो मङ्गलात्मकः ॥ १७० ॥
पञ्चविंशतितत्त्वेशश्चतुर्विंशतिदेहभाक्‌ ।
सर्वानुग्राहकः सर्वदाशार्हसततार्चितः ॥ १७१ ॥
अचिन्त्यो मधुरालापः साधुदर्शी दुरासदः ।
मनुष्यधर्मानुगतः कौरवेन्द्रक्षयेक्षितः ॥ १७२ ॥
उपेन्द्रो दानवारातिरुरुगीतो महाद्युतिः ।
ब्रह्मण्यदेवः श्रुतिमान्‍ गोब्राह्मणहिताशयः ॥ १७३ ॥
वरशीलः शिवारम्भः सुविज्ञानविमूर्तिमान् ।
स्वभावशुद्धः सन्मित्रः सुशरण्यः सुलक्षणः ॥ १७४ ॥
धृतराष्ट्रगतो दृष्टिप्रदः कर्णविभेदनः ।
प्रतोदधृग्विश्वरूपविस्मारितधनञ्जयः ॥ १७५ ॥
सामगानप्रियो धर्मधेनुर्वणोत्तमोऽव्ययः ।
चतुर्युगक्रियाकर्ता विश्वरूपप्रदर्शकः ॥ १७६ ॥
ब्रह्मबोधपरित्रातपार्थो भीष्मार्थचक्रभृत् ।
अर्जुनायासविध्वंसी कालदंष्ट्राविभूषणः ॥ १७७ ॥
सुजातानन्तमहिमा स्वप्रव्यापारितार्जुनः ।
अकालसन्ध्याघटनश्चक्रान्तरितभास्करः ॥ १७८ ॥
दुष्टप्रमथनः पार्थप्रतिज्ञापरिपालकः ।
सिन्धुराजशिरःपातस्थानवक्ता विवेकदृक ॥ १७९ ॥
सुभद्राशोकहरणो द्रोणोत्सेकादिविस्मितः ।
पार्थमन्युनिराकर्ता पाण्डवोत्सवदायकः ॥ १८० ॥
अङ्गुष्ठाक्रान्तकौन्तेयरथचक्रोऽहिशीर्षजित् ।
कालकोपप्रशमनो भीमसेनजयप्रदः ॥ १८१ ॥
अश्वत्थमवधायासत्रातपाण्डुसुतः कृती ।
इषीकास्‍त्रप्रशमनो द्रौणिरक्षाविचक्षणः ॥ १८२ ॥
पार्थापहारितद्रौणिचूडामणिरभंगुरः ।
धृतराष्ट्रपरमृष्टभीमप्रतिकृतिस्मयः ॥ १८३ ॥
भीष्मबुद्धिप्रदः शान्तः शरच्चन्द्रनिभाननः ।
गदाग्रजन्मा पाञ्चालीप्रतिज्ञापरिपालकः ॥ १८४ ॥
गान्धारीकोपदृग्गुप्तधर्मसूनुरनामयः ।
प्रपन्नार्तिभयच्छेत्ता भीष्मशल्यव्यथापहः ॥ १८५ ॥
शान्तः शान्तनवोदीर्णः सर्वधर्मसमाहितः ।
स्मारितब्रह्मविद्यार्थप्रीतपार्थो महास्त्रवित् ॥ १८६ ॥
प्रसादपरमोदारो गाङ्गेयसुगतिप्रदः ।
विपक्षपक्षक्षयकृत्परीक्षित्प्राणरक्षणः ॥ १८७ ॥
जगद्गुरुर्धर्मसूनोर्वाजिमेधप्रवर्तकः ।
विहितार्थ आप्तसत्कारो मासकात्परिवर्तदः ॥ १८८ ॥
उत्तङ्कहर्षदात्मीयदिव्यरूपप्रदर्शकः ।
जनकावगतस्वोक्तभारतः सर्वभावनः ॥ १८९ ॥
असोढ्यादवोद्रेको विहिताप्तादिपूजनः ।
समुद्रस्थापिताश्चर्यमुसलो वृष्णिवाहकः ॥ १९० ॥
मुनिशापायुधः पद्मासनादित्रिदशार्थितः ।
सृष्टिप्रत्यवहारोत्कटस्वधामगमनोत्सुकः ॥ १९१ ॥
प्रभासालोकनोद्युक्तो नानाविधनिमित्तकृत्‌ ।
सर्वयादवसंसेव्यः सर्वोत्कृष्टपरिच्छदः ॥ १९२ ॥
वेलाकाननसंचारी वेलानिलह्रतश्रमः ।
कालत्मा यादवोऽनन्तः स्तुतिसंतुष्टमानसः ॥ १९३ ॥
द्विजालोकनसंतुष्टः पुण्यतीर्थमहोत्सवः ।
सत्काराह्लादिताशेषभूसुरः सुरवल्लभः ॥ १९४ ॥
पुण्यतीर्थाप्लुतः पुण्यः पुण्यदस्तीर्थपावनः ।
विप्रसात्कृतगोकोटिः शतकोटिसुवर्णदः ॥ १९५ ॥
स्वमायामोहोताऽशेषव्रुष्णिवीरो विशेषवित् ।
जलजायुधनिर्देष्टा स्वात्मावेशितयादवः ॥ १९६ ॥
देवताभीष्टवरदः कृतकृत्यः प्रसन्नधीः ।
स्थिरशेषायुतबलः सहस्त्रफणिवीक्षणः ॥ १९७ ॥
ब्रह्मवृक्षवरच्छायासीनः पद्मासनस्थितः ।
प्रत्यगात्मा स्वभावार्थः प्रणिधानपरायणः ॥ १९८ ॥
व्याधेषुविद्धपूज्यांघ्रिर्निषादभयमोचनः ।
पुलिन्दस्तुतिसंतुष्टः पुलिन्दसुगतिप्रदः ॥ १९९ ॥
दारुकार्पितपार्थादिकरणीयोक्तिरीशिता ।
दिव्यदुन्दुभिसंयुक्तः पुष्पवृष्टिप्रपूजितः ॥ २०० ॥
पुराणः परमेशानः पूर्णभूमा परिष्टुतः ।
पतिराद्यः परं ब्रह्म परमात्मा परात्परः ॥ २०१ ॥
॥ श्रीपरमात्मा परात्पर ॐ नम इति ॥
॥ फलश्रुतिः ॥
इदं सहस्त्रं कृष्णस्य नाम्नां सर्वार्थदायकम् ।
अनन्तरूपी भगवान् व्याख्यातादौ स्वयम्भुवे ॥ २०२ ॥
तेने प्रोक्तं वसिष्ठाय ततो लब्ध्वा परशरः ।
व्यासाय तेन सम्प्रोक्तं शुको व्यासादवाप्तवान् ॥ २०३ ॥
तच्छिष्यैर्बहुभिर्भूमौ ख्यापितं द्वापरे युगे ।
कृष्णाज्ञया हरिहरः कलौ प्रख्यापयद्विभुः ॥ २०४ ॥
इदं पठति भक्त्या यः शृणोति च समाहितः ।
स्वसिद्ध्यै प्रार्थयन्त्येनं तीर्थक्षेत्रादिदेवताः ॥ २०५ ॥
प्रायश्चित्तान्यशेषाणि नालं यानि व्यपिहितुम् ।
तानि पापानि नश्यन्ति सकृदस्य प्रशंसनात् ॥ २०६ ॥
ऋणत्रयविमुक्तस्य श्रौतस्मार्तानुवर्तिनः ।
ऋषेस्त्रिमूर्तिरूपस्य फलं विन्देदिदं पठन् ॥ २०७ ॥
इदं नामसहस्त्रम यः पठत्येतच्छृणोति च ।
शिवलिङ्गसहस्त्रस्य स प्रतिष्ठाफलं लभेत् ॥ २०८ ॥
इदं किरीटी संजप्य जयी पाशुपतास्त्रभाक् ।
कृष्णस्य प्राणभूतः सन् कृष्णं सारथिमाप्तवान् ॥ २०९ ॥
द्रौपद्या दमयन्त्या च सावित्र्या च सुशीलया ।
दुरितानि जितान्येतज्जपादाप्तं च वाञ्छितम् ॥ २१० ॥
किमिदं बहुना शंसन्मानवो मोदनिर्भरः ।
ब्रह्मनन्दमवाप्यान्ते कृष्णसायुज्यमाप्नुयात् ॥ २११ ॥
॥ इति श्रीविष्णुधर्मोत्तरपुराणे श्रीकृष्णसहस्त्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री विष्णु सहस्त्रनामस्तोत्र

श्री विष्णु सहस्त्रनामस्तोत्र

ध्यान
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् ।
सहारवक्षः स्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥
स्तोत्र
यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
नमः समस्तभुतानामादिभुताय भूभृते ।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ॥ ९ ॥
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १० ॥
यतः सर्वाणि भुतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
यस्मिश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ ११ ॥
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
विष्णोर्नामसहस्त्रं मे श्रृणु पापभयापहम् ॥ १२ ॥
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १३ ॥
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्‍कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १४ ॥
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ १५ ॥
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान्केशवः पुरुषोत्तमः ॥ १६ ॥
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ १७ ॥
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरत्तमः ॥ १८ ॥
अप्रमेयो ह्रषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ १९ ॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतिस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ २० ॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ २१ ॥
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ २२ ॥
सुरेशः शरण शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ २३ ॥
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगाविनिःसृतः ॥ २४ ॥
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ २५ ॥
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतः स्थाणूर्वरारोहो महातपाः ॥ २६ ॥
सर्वगः सर्वविद्भनुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्‍ कविः ॥ २७ ॥
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्युहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ २८ ॥
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ २९ ॥
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ ३० ॥
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ ३१ ॥
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ ३२ ॥
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदाम पतिः ॥ ३३ ॥
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ ३४ ॥
अमृत्युः सर्वदृक्‍ सिंहः सन्धाता सन्धिमान्सिथरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ ३५ ॥
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्त्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ ३६ ॥
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान्न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्त्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात् ॥ ३७ ॥
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ ३८ ॥
सुप्रसादः प्रसनात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ ३९ ॥
असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ ४० ॥
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ ४१ ॥
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ ४२ ॥
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ४३ ॥
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ४४ ॥
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ४५ ॥
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्योऽव्यक्तरूपश्च सहस्त्रजिदनन्तजित् ॥ ४६ ॥
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ४७ ॥
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपां निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ४८ ॥
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥ ४९ ॥
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ ५० ॥
पद्मभानोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्द्धिऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ ५१ ॥
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिञ्ञयः ॥ ५२ ॥
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ ५३ ॥
उद्भवः क्षोभणॊ देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ ५४ ॥
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ ५५ ॥
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नेयोऽनय ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ ५६ ॥
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ ५७ ॥
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ५८ ॥
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ५९ ॥
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ ६० ॥
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ६१ ॥
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुह्रत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ६२ ॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ६३ ॥
धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्त्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ६४ ॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्‌गुरुः ॥ ६५ ॥
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद्बोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ ६६ ॥
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ॥ ६७ ॥
जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ ६८ ॥
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ ६९ ॥
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्याक्षो महाश्रृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ७० ॥
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ७१ ॥
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ७२ ॥
भगवान्‍ भगहानन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ७३ ॥
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिविस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ ७४ ॥
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ ७५ ॥
शुभाङ्ग शान्तिदः स्त्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ ७६ ॥
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीनिवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ॥ ७७ ॥
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ ७८ ॥
स्वक्षः स्वङ्ग शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वर्ह ।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ ७९ ॥
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ ८० ॥
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ ८१ ॥
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकशः केशवः केशिहा हरिः ॥ ८२ ॥
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनंजयः ॥ ८३ ॥
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्‍ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद्‍ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ ८४ ॥
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ ८५ ॥
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ ८६ ॥
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ ८७ ॥
सद्‍गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ ८८ ॥
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ ८९ ॥
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्थ शतमूर्तिः शताननः ॥ ९० ॥
एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ९१ ॥
सुर्वणोवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ९२ ॥
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ ९३ ॥
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश्रृङ्गो गदाग्रजः ॥ ९४ ॥
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ९५ ॥
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ ९६ ॥
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ ९७ ॥
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः श्रृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ ९८ ॥
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागिश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ ९९ ॥
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ १०० ॥
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ १०१ ॥
सहस्त्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ १०२ ॥
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ १०३ ॥
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ १०४ ॥
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्तानियमोऽयमः ॥ १०५ ॥
सत्त्ववान्सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः ॥ १०६ ॥
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ १०७ ॥
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ १०८ ॥
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरप्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ १०९ ॥
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ ११० ॥
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ १११ ॥
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ ११२ ॥
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरस्त्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ ११३ ॥
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ ११४ ॥
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ ११५ ॥
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ ११६ ॥
भूर्भुवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ ११७ ॥
यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ ११८ ॥
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्त्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ ११९ ॥
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ १२० ॥
॥ सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ॥
॥ फलश्रुतिः ॥
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्त्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १२१ ॥
य इदं श्रृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ १२२ ॥
वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥ १२३ ॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्प्रजाम् ॥ १२४ ॥
भक्तिमान्यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्त्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ १२५ ॥
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ १२६ ॥
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥ १२७ ॥
रोगार्तो मुच्यते रोगाद्‍ बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ १२८ ॥
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्त्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ १२९ ॥
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १३० ॥
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ १३१ ॥
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १३२ ॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३३ ॥
द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।
वासुदेवस्य वीर्ये विधृतानि महात्मनः ॥ १३४ ॥
ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १३५ ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्व्म तेजो बलं धृतिः ।
वासुदेआत्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १३६ ॥
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ १३७ ॥
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ १३८ ॥
योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्याः शिल्पादि कर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥ १३९ ॥
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रील्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ १४० ॥
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयःप्राप्तुः सुखानि च ॥ १४१ ॥
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ १४२ ॥
॥ ॐ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्रयां संहितायां वैयासिक्यामानुशासनिके पर्वणि भीष्मयुधिष्ठिरसंवादे श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्त्रनामस्तोत्रम् ॥