Google+ Followers

Thursday, March 31, 2016

प्रोफेसर जोशी जी आप उत्तर प्रदेश के उत्तराखंड/उत्तररांचल क्षेत्र से हैं और मैं हर दृष्टि से विष्वगुरू क्षेत्र जौनपुर(जमदग्निपुर)/आज़मगढ़(प्रथम दुर्वाशा क्ष्रेत्र:आर्यमगढ) क्षेत्र से हूँ । जब विष्वगुरू गुरु अपनी गुरुता 2001 से आज तक दिखा रहा है तो आप अपने चेलों से कहिये की वे ज्यादा कुटिलता और कुचक्र न रचें जो कहना हो सीधे से कहे मैं आप के नाते उनको यह अधिकार देता हूँ और यह आप के चेलों के साथ ही साथ मानवता के भी हित में होगा। मुझे क्या करना है मुझे मालूम है और वह है मानवता की अभीष्ठ सेवा तो उसके लिए मैं कुछ भी बन सकता हूँ समय पड़ने पर उसकी अभीष्ठ पूर्ती के लिए जिसे पहले से परिभाषित करने की जरूरत नहीं। तो अभी सब लोगों द्वारा अपनी क्षमता से आशानुरूप कार्यकर रहे हैं उन्हें करने दिया जाय जब मेरी जरूरत आएगी तब आप के सीधे निर्देश का पालन होगा आप के चेलों से अलग हमारा आप का सीधा पूर्व सम्बन्ध है। रही बात वरिष्ठ और कनिष्ठ की तो मेरा वरिष्ठ कोई रह ही नहीं गया है मैं तो जहां रहता हूँ उम्र में अपने से वरिष्ठ वालों को केवल सम्मान दे रहा हूँ और मानव जीवन जी रहा हूँ।

प्रोफेसर जोशी जी आप उत्तर प्रदेश के उत्तराखंड/उत्तररांचल क्षेत्र से हैं और मैं हर दृष्टि से विष्वगुरू क्षेत्र जौनपुर(जमदग्निपुर)/आज़मगढ़(प्रथम दुर्वाशा क्ष्रेत्र:आर्यमगढ) क्षेत्र से हूँ । जब विष्वगुरू गुरु अपनी गुरुता 2001 से आज तक दिखा रहा है तो आप अपने चेलों से कहिये की वे ज्यादा कुटिलता और कुचक्र न रचें जो कहना हो सीधे से कहे मैं आप के नाते उनको यह अधिकार देता हूँ और यह आप के चेलों के साथ ही साथ मानवता के भी हित में होगा। मुझे क्या करना है मुझे मालूम है और वह है मानवता की अभीष्ठ सेवा तो उसके लिए मैं कुछ भी बन सकता हूँ समय पड़ने पर उसकी अभीष्ठ पूर्ती के लिए जिसे पहले से परिभाषित करने की जरूरत नहीं। तो अभी सब लोगों द्वारा अपनी क्षमता से आशानुरूप कार्यकर रहे हैं उन्हें करने दिया जाय जब मेरी जरूरत आएगी तब आप के सीधे निर्देश का पालन होगा आप के चेलों से अलग हमारा आप का सीधा पूर्व सम्बन्ध है। रही बात वरिष्ठ और कनिष्ठ की तो मेरा वरिष्ठ कोई रह ही नहीं गया है मैं तो जहां रहता हूँ उम्र में अपने से वरिष्ठ वालों को केवल सम्मान दे रहा हूँ और मानव जीवन जी रहा हूँ।

कैलाश नारायण (भूधर:Mountain नारायण) जी कम से कम आप के इतने पूण्य हैं वह निकृष्ठ आप की संतान किसी जन्म में नहीं हो सकता और आप मोहरा बनाये जा रहे है परन्तु आप यह जान बूझकर कर रहे हों तो फिर आप अपने किये का भुगतेंगे अगले जन्म में भी इस जन्म में तो भुगत रहे ही हैं और वह जिस ईसाई दलित नरसिंघा बांदुगुला /बलराज (भीम) का असली पुत्र है वही आप को यमराजलोक और आंध्रलोक(धृतराष्ट्रलोक) से श्रापित/अभिश्रपित करेंगा आप द्वारा या आप के माध्यम द्वारा अपना पृतित्व कलंकित किये जाने से कुपित हो।

कैलाश नारायण (भूधर:Mountain नारायण)  जी कम से कम आप के इतने पूण्य हैं वह निकृष्ठ आप की संतान किसी जन्म में नहीं हो सकता और आप मोहरा बनाये जा रहे है परन्तु आप यह जान बूझकर कर रहे हों तो फिर आप अपने किये का भुगतेंगे अगले जन्म में भी इस जन्म में तो भुगत रहे ही हैं और वह जिस ईसाई दलित नरसिंघा बांदुगुला /बलराज (भीम) का असली पुत्र है वही आप को यमराजलोक और आंध्रलोक(धृतराष्ट्रलोक) से श्रापित/अभिश्रपित करेंगा आप द्वारा या आप के माध्यम द्वारा अपना पृतित्व कलंकित किये जाने से कुपित हो।

अगर चरित्रहीनता नहीं रुकी और व्यवहारिक स्तर से घटते हुए मानवमूल्यों का स्तर पुनः न्यूनतम हुआ तो सम्पूर्ण विश्व की सम्पूर्ण सम्प्रभुता एक आठवें भाग में बटेगी जिसे हर काली प्रसाद को मंजूर होना चाहिए विश्व मानवता के मूल केंद्र प्रयागराज से प्रारम्भकर विश्व के कोने कोने तक : >>>>>>>विवाह न करने से कोई पूर्ण ब्रह्मचर्य हो जाता है (हनुमान जी भी जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी ही थे न की आजीवन अखण्ड ब्रह्मचारी) और काला होने से कोई दुष्चरित्र हो जाता है या गोरा होने से कोई चरित्रवान महादेव हो जाता है जिसको हर सती:पार्वती हर जन्म में पाना चाहती है तो ऐसा भी मैं नहीं मानता हूँ और मैं एक तरफ से अपने द्वारा जानने और समझने वाली काले पुरुषों और स्त्रियों एक बड़ी संख्या अपने खानदान, गाँव व् ननिहाल से प्रारम्भकर गुरुकुल तक गिनाऊंगा जिनको मैंने अपनी सूली/पैमाने पर कसा है जिनके सदाचार, धर्मभीरुता और नैतिकबल के सामने बहुत बड़े-बड़े नामी गिरामी गोरे लोग भी पीछे छूट जाएंगे और लोग सोचने को मजबूर हो जाएंगे और हम अपनी सूली पर कसे हुए केवल उन्ही जैसे लोगों के आधार पर ही इस संसार की सम्पूर्ण सम्प्रभुता का एक आठवाँ भाग देने को तैयार हूँ और वे अपने उस एक आठवें भाग से चाहे जितने को अपना अंशदान करें और परिणामतः सु-समृद्ध या दरिद्रता और अभावग्रस्त जीवन जीते रहें।>>>>>>>>>>>इस तथ्य को जानते और पालन करते हुए भी की हमारी कुल देवी, देवकाली(महालक्ष्मी+महासरस्वती+ महागौरी:सती:पारवती) है उसके बाद भी मैं केवल सद्चरित्र काली प्रशाद और अगस्त्य ऋषि और जामवन्त को एक आठवाँ भाग ही देने को तैयार हूँ उनके साथ संख्याबल बढ़ाने हेतु चाहे जितने दुश्चरित्र काली प्रसाद शामिल हों। मेरे तथ्य को जानने और समझने के लिए देवकाली(महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी:सती:पारवती) की उत्त्पत्ति और उनका स्रोत समझना पडेगा और वह यह है की देवकाली प्रारम्भ में काले रूप-रंग में नहीं थीं वरन वह तीनशुभ्र रूप-रंगदारी (महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी:सती:पारवती) शक्तियों का सम्मिलित स्वरुप थीं जो असुरदल की उद्दण्डता (कम शक्तिशाली होने पर भी अपराध को बढ़ावा और उसके शक्ति श्रोत बने रहना)) को देखकर कुपित हो गयी थीं और तत्परिनामतह अपनी उसी असीमित ऊर्जा को स्वयं में ही समाहित कर काली पड़ गयी थी तथा उस काले स्वरुप में असुरदल का विनास की थीं। तो उनका स्रोत भी शुभ्र ही हुआ की नहीं। तो स्रोत ही तो सर्व श्रेष्ठ है किसी परिणामी शक्ति से तो हम शुभ्र स्रोत को ही सर्वश्रेष्ठ नहीं तो क्या कहेंगे? या की कहेंगे की सर्श्रेष्ठ शक्ति स्रोत काले रंग का व्यक्ति या स्त्री ही होगी अगर ऐसा कहता हूँ तो यह सर्वदा गलत है। फिर भी हम देवकाली का काला मानते भी हैं तो फिर वह क्या चरित्रहीनता और अनैतिकता को समर्थन करने वाला उनका चरित्र होगा जो असुरदल के रावण और भस्मासुर के कृत्य का समर्थन करता हो?>>>>>>विवाह न करने से कोई पूर्ण ब्रह्मचर्य नहीं हो जाता है (हनुमान जी भी जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी ही थे न की आजीवन अखण्ड ब्रह्मचारी) और काला होने से कोई दुष्चरित्र हो जाता है या गोरा होने से कोई चरित्रवान महादेव हो जाता है जिसको हर सती:पार्वती हर जन्म में पाना चाहती है तो ऐसा भी मैं नहीं मानता हूँ और मैं एक तरफ से अपने द्वारा जानने और समझने वाली काले पुरुषों और स्त्रियों एक बड़ी संख्या अपने खानदान, गाँव व् ननिहाल से प्रारम्भकर गुरुकुल तक गिनाऊंगा जिनको मैंने अपनी सूली/पैमाने पर कसा है जिनके सदाचार, धर्मभीरुता और नैतिकबल के सामने बहुत बड़े-बड़े नामी गिरामी गोरे लोग भी पीछे छूट जाएंगे और लोग सोचने को मजबूर हो जाएंगे और हम अपनी सूली पर कसे हुए केवल उन्ही जैसे लोगों के आधार पर ही इस संसार की सम्पूर्ण सम्प्रभुता का एक आठवाँ भाग देने को तैयार हूँ और वे अपने उस एक आठवें भाग से चाहे जितने को अपना अंशदान करें और परिणामतः सु-समृद्ध या दरिद्रता और अभावग्रस्त जीवन जीते रहें।

अगर चरित्रहीनता नहीं रुकी और व्यवहारिक स्तर से घटते हुए मानवमूल्यों का स्तर पुनः न्यूनतम हुआ तो सम्पूर्ण विश्व की सम्पूर्ण सम्प्रभुता एक आठवें भाग में बटेगी जिसे हर काली प्रसाद को मंजूर होना चाहिए विश्व मानवता के मूल केंद्र प्रयागराज से प्रारम्भकर विश्व के कोने कोने तक : >>>>>>>विवाह न करने से कोई पूर्ण ब्रह्मचर्य हो जाता है (हनुमान जी भी जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी ही थे न की आजीवन अखण्ड ब्रह्मचारी) और काला होने से कोई दुष्चरित्र हो जाता है या गोरा होने से कोई चरित्रवान महादेव हो जाता है जिसको हर सती:पार्वती हर जन्म में पाना चाहती है तो ऐसा भी मैं नहीं मानता हूँ और मैं एक तरफ से अपने द्वारा जानने और समझने वाली काले पुरुषों और स्त्रियों एक बड़ी संख्या अपने खानदान, गाँव व् ननिहाल से प्रारम्भकर गुरुकुल तक गिनाऊंगा जिनको मैंने अपनी सूली/पैमाने पर कसा है जिनके सदाचार, धर्मभीरुता और नैतिकबल के सामने बहुत बड़े-बड़े नामी गिरामी गोरे लोग भी पीछे छूट जाएंगे और लोग सोचने को मजबूर हो जाएंगे और हम अपनी सूली पर कसे हुए केवल उन्ही जैसे लोगों के आधार पर ही इस संसार की सम्पूर्ण सम्प्रभुता का एक आठवाँ भाग देने को तैयार हूँ और वे अपने उस एक आठवें भाग से चाहे जितने को अपना अंशदान करें और परिणामतः सु-समृद्ध या दरिद्रता और अभावग्रस्त जीवन जीते रहें।>>>>>>>>>>>इस तथ्य को जानते और पालन करते हुए भी की हमारी कुल देवी, देवकाली(महालक्ष्मी+महासरस्वती+ महागौरी:सती:पारवती) है उसके बाद भी मैं केवल सद्चरित्र काली प्रशाद और अगस्त्य ऋषि और जामवन्त को एक आठवाँ भाग ही देने को तैयार हूँ उनके साथ संख्याबल बढ़ाने हेतु चाहे जितने दुश्चरित्र काली प्रसाद शामिल हों। मेरे तथ्य को जानने और समझने के लिए देवकाली(महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी:सती:पारवती)   की उत्त्पत्ति और उनका स्रोत समझना पडेगा और वह यह है की देवकाली प्रारम्भ में काले रूप-रंग में नहीं थीं वरन वह तीनशुभ्र रूप-रंगदारी (महालक्ष्मी+महासरस्वती+महागौरी:सती:पारवती) शक्तियों का सम्मिलित स्वरुप थीं जो असुरदल की उद्दण्डता (कम शक्तिशाली होने पर भी अपराध को बढ़ावा और उसके शक्ति श्रोत बने रहना)) को देखकर कुपित हो गयी थीं और तत्परिनामतह अपनी उसी असीमित ऊर्जा को स्वयं में ही समाहित कर काली पड़ गयी थी तथा उस काले स्वरुप में असुरदल का विनास की थीं। तो उनका स्रोत भी शुभ्र ही हुआ की नहीं। तो स्रोत ही तो सर्व श्रेष्ठ है किसी परिणामी शक्ति से तो हम शुभ्र स्रोत को ही सर्वश्रेष्ठ नहीं तो क्या कहेंगे? या की कहेंगे की सर्श्रेष्ठ शक्ति स्रोत काले रंग का व्यक्ति या स्त्री ही होगी अगर ऐसा कहता हूँ तो यह सर्वदा गलत है। फिर भी हम देवकाली का काला मानते भी हैं तो फिर वह क्या चरित्रहीनता और अनैतिकता को समर्थन करने वाला उनका चरित्र होगा जो असुरदल के रावण और भस्मासुर के कृत्य का समर्थन करता हो?>>>>>>विवाह न करने से कोई पूर्ण ब्रह्मचर्य नहीं हो जाता है (हनुमान जी भी जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी ही थे न की आजीवन अखण्ड ब्रह्मचारी) और काला होने से कोई दुष्चरित्र हो जाता है या गोरा होने से कोई चरित्रवान महादेव हो जाता है जिसको हर सती:पार्वती हर जन्म में पाना चाहती है तो ऐसा भी मैं नहीं मानता हूँ और मैं एक तरफ से अपने द्वारा जानने और समझने वाली काले पुरुषों और स्त्रियों एक बड़ी संख्या अपने खानदान, गाँव व् ननिहाल से प्रारम्भकर गुरुकुल तक गिनाऊंगा जिनको मैंने अपनी सूली/पैमाने पर कसा है जिनके सदाचार, धर्मभीरुता और नैतिकबल के सामने बहुत बड़े-बड़े नामी गिरामी गोरे लोग भी पीछे छूट जाएंगे और लोग सोचने को मजबूर हो जाएंगे और हम अपनी सूली पर कसे हुए केवल उन्ही जैसे लोगों के आधार पर ही इस संसार की सम्पूर्ण सम्प्रभुता का एक आठवाँ भाग देने को तैयार हूँ और वे अपने उस एक आठवें भाग से चाहे जितने को अपना अंशदान करें और परिणामतः सु-समृद्ध या दरिद्रता और अभावग्रस्त जीवन जीते रहें।

आप लोगों का हाँथ गलत जगह लग गया था और आदत भी आप की गलत ही है की जिसके कृतज्ञ है आप उसी को आभार जताने के लिए तिकड़म रच रहे हैं आप से मैं बोल दिया हूँ की मैं इस संसार में किसी व्यक्ति या संस्था का कृतज्ञ हूँ और रहूँगा भी अपने जीवन भर तो केवल और केवल अपने परमगुरु परमिता परमेश्वर, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर(विष्णु) और परमिता परमेश्वर, मेरे ताऊजी डॉ. प्रेमचंद(शिव) का जिनके मान सम्मान के लिए प्रयागराज में मैं अपने को स्थिर किया हूँ 2001 से। बाकी लोगों का कृतज्ञ न हूँ, न रहूँगा केवल व्यवहारिक सांसारिक औपचारिकता भर सामान्य मानव की तरह अपने श्रेष्ठ जनो से निभाना है और ऐसा क्या है मेरे परमगुरु परमिता परमेश्वर, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर(विष्णु) और परमिता परमेश्वर, मेरे ताऊजी डॉ. प्रेमचंद(शिव) में यह तो यह संसार देखा चुका है जब जोशी जी (ब्रह्मा) के समझ और नियंत्रण में भी कुछ नहीं रह गया था और तब मुझे उतरना पड़ा था मेरे परमगुरु परमिता परमेश्वर, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर(विष्णु) और परमिता परमेश्वर, मेरे ताऊजी डॉ. प्रेमचंद(शिव) के आदेश पर। तो परमगुरु परमिता परमेश्वर, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर(विष्णु) और परमिता परमेश्वर, मेरे ताऊजी डॉ. प्रेमचंद(शिव) का कौन सा रूप था वह जिसमे वे लोग मुझे दांव पर लगा दिए थे तो उसे वह जरूर समझेगा जो मात्र सृष्टि विनाश ही सृष्टि कल्याण समझता था और आप लोग उसी व्यक्ति और संगठन से पूँछिये?

आप लोगों का हाँथ गलत जगह लग गया था और आदत भी आप की गलत ही है की जिसके कृतज्ञ है आप उसी को आभार जताने के लिए तिकड़म रच रहे हैं आप से मैं बोल दिया हूँ की मैं इस संसार में किसी व्यक्ति या संस्था का कृतज्ञ हूँ और रहूँगा भी अपने जीवन भर तो केवल और केवल अपने परमगुरु परमिता परमेश्वर, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर(विष्णु) और  परमिता परमेश्वर, मेरे ताऊजी डॉ. प्रेमचंद(शिव) का जिनके मान सम्मान के लिए प्रयागराज में मैं अपने को स्थिर किया हूँ 2001 से।  बाकी लोगों का कृतज्ञ न हूँ, न रहूँगा केवल व्यवहारिक सांसारिक औपचारिकता भर सामान्य मानव की तरह अपने श्रेष्ठ जनो से निभाना है और ऐसा क्या है मेरे परमगुरु परमिता परमेश्वर, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर(विष्णु) और  परमिता परमेश्वर, मेरे ताऊजी डॉ. प्रेमचंद(शिव) में यह तो यह संसार देखा चुका है जब जोशी जी (ब्रह्मा) के समझ और नियंत्रण में भी कुछ नहीं रह गया था और तब मुझे उतरना पड़ा था मेरे परमगुरु परमिता परमेश्वर, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर(विष्णु) और  परमिता परमेश्वर, मेरे ताऊजी डॉ. प्रेमचंद(शिव) के आदेश पर।  तो  परमगुरु परमिता परमेश्वर, मेरे मामा जी श्रीश्रीधर(विष्णु) और  परमिता परमेश्वर, मेरे ताऊजी डॉ. प्रेमचंद(शिव) का कौन सा रूप था वह जिसमे वे लोग मुझे दांव पर लगा दिए थे तो उसे वह जरूर समझेगा जो मात्र सृष्टि विनाश ही सृष्टि कल्याण समझता था और आप लोग उसी व्यक्ति और संगठन से पूँछिये? 

मुझे जो कहना था कह दिया ईसाइयत विचारधारा से ओतप्रोत तमिल समर्थित रंगभेदी(गोरे और काले) लड़ाई के बारे में और आप स्वयं भी अपने परिवार/घर से बाहर तक की पूरी दुनिया को पूरी निगाह से देख लीजिए और तब ईसाइयत विचारधारा से ओतप्रोत तमिल समर्थित रंगभेदी(गोरे और काले) लड़ाई का शिकार हो इस लड़ाई के परिणाम को भुगतने हेतु इसमें शामिल होइए और समर्थन करिये जिसका की परिणाम दैहिक सुख की पिपासा बनकर रह गया है और चरित्र विहीन समाज का निर्माण हो गया है। जो व्यक्ति सामान्य सहन सीलता की विशेष से बहुत ज्यादा समाजिक, पारिवारिक और वैचारिक अति दबाव तथा कुपोषण का शिकार होगा उसकी उर्वराशक्ति, प्रजनन क्षमता और पुरुषार्थ अपने आप ही प्रभावित होगा दुनिया में वह किसी भी पेशे वाला हो या सामान्य नागरिक हो इसमें वैज्ञानिक तथ्य व्याप्त है शारीरिक और मानसिक विज्ञान के आधार पर और आप इसे रंग(गोरे और काले) भेद के सहारे ख़त्म करना चाह रहे है मतलब उर्वराशक्ति, प्रजनन क्षमता (संख्याबल) और पुरुषार्थ प्राप्ति की गणित के लिए अविवेकपूर्ण बुध्धि, धन और बल के सहारे किसी अज्ञात ईस्वर के भरोसे (जो संभावित रूप से प्रभावित पक्ष वाला सहनसील व्यक्ति ही होगा) मानवीय मूल्य और सामाजिक-नैतिक नियमों को तोड़ अनैतिक पारिवारिक सम्बन्ध बना अनावश्यक असहनीय सामाजिक संघर्ष को स्वयं उत्पन्न कर मानवता को तिलांजलि दे अपने विनाश को बुलावा दे रहे हैं।

मुझे जो कहना था कह दिया ईसाइयत विचारधारा से ओतप्रोत तमिल समर्थित रंगभेदी(गोरे और काले) लड़ाई के बारे में और आप स्वयं भी अपने परिवार/घर से बाहर तक की पूरी दुनिया को पूरी निगाह से देख लीजिए और तब ईसाइयत विचारधारा से ओतप्रोत तमिल समर्थित रंगभेदी(गोरे और काले) लड़ाई का शिकार हो इस लड़ाई के परिणाम को भुगतने हेतु इसमें शामिल होइए और समर्थन करिये जिसका की परिणाम दैहिक सुख की पिपासा बनकर  रह गया है और चरित्र विहीन समाज का निर्माण हो गया है। जो व्यक्ति  सामान्य सहन सीलता की  विशेष से बहुत ज्यादा  समाजिक, पारिवारिक और वैचारिक अति दबाव तथा  कुपोषण का शिकार होगा उसकी उर्वराशक्ति, प्रजनन क्षमता और पुरुषार्थ अपने आप ही प्रभावित होगा दुनिया में वह किसी भी पेशे वाला हो या सामान्य नागरिक हो इसमें वैज्ञानिक तथ्य व्याप्त है शारीरिक और मानसिक विज्ञान के आधार पर और आप  इसे रंग(गोरे और काले) भेद के सहारे ख़त्म करना चाह  रहे है मतलब उर्वराशक्ति, प्रजनन क्षमता (संख्याबल) और  पुरुषार्थ प्राप्ति  की गणित के लिए अविवेकपूर्ण बुध्धि, धन और बल के सहारे किसी अज्ञात ईस्वर के भरोसे (जो संभावित रूप से प्रभावित पक्ष वाला सहनसील व्यक्ति ही होगा)  मानवीय मूल्य और सामाजिक-नैतिक नियमों को तोड़ अनैतिक पारिवारिक सम्बन्ध बना अनावश्यक असहनीय सामाजिक संघर्ष को स्वयं उत्पन्न कर मानवता को तिलांजलि दे अपने विनाश को बुलावा दे रहे हैं। 

Wednesday, March 30, 2016

नव सहस्राब्दी में प्रवेश करने के संक्रमण काल में स्थिती कुछ ऐसी बनी की हनुमान और गणेश ही व्यवस्था बना सकने में सक्षम नहीं रहे तो नियंत्रण उच्च दर्जा प्राप्त त्रिदेव स्तर के लोगों तक इसका प्रभाव जाना ही था और उनके स्तर पर ही जाकर नियंत्रित हो सका तो ऐसे में मुझे प्रभावित हो प्रभावी भूमिका निभाना ही था। जांमवन्त (तार्किक विद्या, कूटनीति और भेद शास्त्र के विशेसग्य) और मलय (तमिल/केरल) देश में सातों सप्तर्षियों की सम्मिलित शक्ति से जन्मे आठवें ऋषि अगस्त्य/कुम्भज (सप्तर्षि से आगे भी अगर माने तो आठवें ऋषि मतलब अष्टक ऋषि परम्परा के आठवें ऋषि) स्वयं संभावित बुध्धि और युक्ति बताने से ज्यादा कुछ किये हैं क्या किसी कार्य को मूर्त/भौतिक रूप देने के लिए? सृजन और नवनिर्माण कार्य इनके वश का है ही नहीं, और अगर है तो किसी दूसरी शक्ति (अदृश्य नर/नारी शक्ति) के माध्यम से जो सामान्यजन को दृतिगोचर नहीं हो पा रहा है। अगस्त्य:कुम्भज ऋषि सभी सातों महासागरों को सुखाते रहे चमत्कारिक रूप से पर सप्तर्षि श्रेणी या अष्टक ऋषि श्रेणी में प्रथम ऋषि मतलब कश्यप ऋषि के पुत्र वरुणदेव उसको भरते ही रहेंगे तो अगस्त्य ऋषी के सबसे चमत्कारित कार्य से बड़ा कारनामा दिखाने के लिए कश्यप को एक ही देव पुत्र पर्याप्त है। इसी लिए मैं एक आठवाँ भाग उनको देने के लिए बोला था और बोल रहा हूँ। त्रिदेव स्तर पर कार्य हो जाने के बाद उससे बाद की स्थिति में कश्यप ऋषि पुत्र पवनदेव के पुत्र हनुमान (शंकर सुमन/केशरी नंदन/मारुती/आंजनेय) व्यवस्था नियंत्रण के प्रयोजन हेतु और महादेव पुत्र विनायक:गणेश:कपिल(न की कपिल ऋषि): गजानन: गजाधर सृजन: नवनिर्माण:मांगलिक कार्यप्रयोजन हेतु और कष्यप पुत्र विश्वकर्मा महाराज अभियांत्रिक नवनिर्माण कार्य प्रयोजन हेतु जिम्मेदार होते है जो अपना कार्य स्वयं सम्पादित करने की क्षमता रखते है। लेकिन नव सहस्राब्दी में प्रवेश करने के संक्रमण काल में स्थिती कुछ ऐसी बनी की हनुमान और गणेश ही व्यवस्था बना सकने में सक्षम नहीं रहे तो नियंत्रण उच्च दर्जा प्राप्त त्रिदेव स्तर के लोगों तक इसका प्रभाव जाना ही था और उनके स्तर पर ही जाकर नियंत्रित हो सका तो ऐसे में मुझे प्रभावित हो प्रभावी भूमिका निभाना ही था।

नव सहस्राब्दी में प्रवेश करने के संक्रमण काल में स्थिती कुछ ऐसी बनी की हनुमान और गणेश  ही व्यवस्था बना सकने में सक्षम नहीं रहे तो नियंत्रण उच्च दर्जा प्राप्त त्रिदेव स्तर के लोगों तक इसका प्रभाव जाना ही था और उनके स्तर पर ही जाकर नियंत्रित हो सका तो ऐसे में मुझे प्रभावित हो प्रभावी भूमिका निभाना ही था। जांमवन्त (तार्किक विद्या, कूटनीति और भेद शास्त्र के विशेसग्य) और मलय (तमिल/केरल) देश में सातों सप्तर्षियों की सम्मिलित शक्ति से जन्मे आठवें ऋषि अगस्त्य/कुम्भज (सप्तर्षि से आगे भी अगर माने तो आठवें ऋषि मतलब अष्टक ऋषि परम्परा के आठवें ऋषि) स्वयं संभावित बुध्धि और युक्ति बताने से ज्यादा कुछ किये हैं क्या किसी कार्य को मूर्त/भौतिक रूप देने के लिए? सृजन और नवनिर्माण कार्य इनके वश का है ही नहीं, और अगर है तो किसी दूसरी शक्ति (अदृश्य नर/नारी शक्ति)  के माध्यम से जो सामान्यजन को दृतिगोचर नहीं हो पा रहा है। अगस्त्य:कुम्भज ऋषि सभी सातों महासागरों को  सुखाते रहे चमत्कारिक रूप से पर सप्तर्षि श्रेणी या अष्टक ऋषि श्रेणी में प्रथम ऋषि मतलब कश्यप ऋषि के पुत्र वरुणदेव उसको भरते ही रहेंगे तो अगस्त्य ऋषी के सबसे चमत्कारित कार्य से बड़ा कारनामा दिखाने के लिए कश्यप को एक ही देव पुत्र पर्याप्त है। इसी लिए मैं एक आठवाँ भाग उनको देने के लिए बोला था और बोल रहा हूँ। त्रिदेव स्तर पर कार्य हो जाने के बाद उससे बाद की स्थिति में कश्यप ऋषि पुत्र पवनदेव के पुत्र हनुमान (शंकर सुमन/केशरी नंदन/मारुती/आंजनेय) व्यवस्था नियंत्रण के प्रयोजन हेतु और महादेव पुत्र विनायक:गणेश:कपिल(न की कपिल ऋषि): गजानन: गजाधर सृजन: नवनिर्माण:मांगलिक कार्यप्रयोजन हेतु और कष्यप पुत्र विश्वकर्मा महाराज अभियांत्रिक नवनिर्माण कार्य प्रयोजन हेतु जिम्मेदार होते है जो अपना कार्य स्वयं सम्पादित करने की क्षमता रखते है।  लेकिन नव सहस्राब्दी में प्रवेश करने के संक्रमण काल में स्थिती कुछ ऐसी बनी की हनुमान और गणेश  ही व्यवस्था बना सकने में सक्षम नहीं रहे तो नियंत्रण उच्च दर्जा प्राप्त त्रिदेव स्तर के लोगों तक इसका प्रभाव जाना ही था और उनके स्तर पर ही जाकर नियंत्रित हो सका तो ऐसे में मुझे प्रभावित हो प्रभावी भूमिका निभाना ही था। 

रामापुर-223225, आजमगढ़ के मेरे ही खानदानीघर से आद्याशंकर=आदिशंकर=केदारेश्वर[+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर:विश्व्नाथ] (जिनका ननिहाल जगदीशपुर, पत्तिनरेंद्रपुर था/है जो बिशुनपुर-223103 से मात्र 7 किलोमीटर दूर है) बाबा के पास से कोई जैसे उठता था चाहे वह उनका कितना बढ़ा रिस्तेदार या मित्र रहा हो उसके बारे में उसके जीवन की ऋणात्मक टिप्पणी तुरंत करते थे पर बिशुनपुर-223103 के गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्र रामानन्द कुल के मेरे नाना रमानाथ(विष्णु) के बारे में कभी ऋणात्मक टिप्पणी कभी नहीं किया किसी के सामने भी । कारन क्या था मुझे नहीं पता ?

रामापुर-223225, आजमगढ़ के मेरे ही खानदानीघर से आद्याशंकर=आदिशंकर=केदारेश्वर[+महामृत्युंजय+विश्वेश्वर:विश्व्नाथ] (जिनका ननिहाल जगदीशपुर, पत्तिनरेंद्रपुर था/है जो बिशुनपुर-223103 से मात्र 7 किलोमीटर दूर है)  बाबा के पास से कोई जैसे उठता था चाहे वह उनका कितना बढ़ा रिस्तेदार या मित्र रहा हो उसके बारे में उसके जीवन की ऋणात्मक टिप्पणी तुरंत करते थे पर बिशुनपुर-223103 के गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्र रामानन्द कुल के मेरे नाना रमानाथ(विष्णु) के बारे में कभी ऋणात्मक टिप्पणी कभी नहीं किया किसी के सामने भी ।  कारन क्या था मुझे नहीं पता ? 

केरल/तमिल के नारायणन का खानदान या कलाम गुरुदेव या सिम्हाद्रि(नरसिंघा) का खानदान है जिन लोगों के समय से यह युद्ध भारत में विश्व्व्यापक स्तर पर चला गया है और चरित्रहीनता पर्याय बन गया है देह सुख की संतुस्ती के नाम पर और यह पूर्ण सत्य है की अपने निहित स्वार्थ के लिए सनातन हिन्दू समाज को नष्ट करने की साजिस के तहत जिस ईसाइयत मानसिकता वाले समाज ने इसे स्वयं प्रारम्भ किया था वही नियतंत्रण के लिए मुझे 2001 में यहाँ लगा दिया। और जब सब कुछ नियंत्रण सीमा में आ गया तो फिर स्वयं अपनी ही ताल ठोंक सूर वीरता क्यों दिखा रहे हो? अभी भी आप नहीं सम्भाल पाएंगे है की नहीं? >>>>>>>>>>उर्वरा और पुरुषार्थी संतति जन्म देने के लिए गोरे और काले का युद्ध कर ईसाइयत मत फैलाइये और न यह समझिए की यह संसार आधा काला होने जा रहा है और उनको एक आठवाँ ही मिलना है संसार में काले लोगों से डरने न लगिए उनको अपनी इज्जत(सीता, सावित्री, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, गायत्री) नीलाम न कर दीजिये, क्योंकि ईसाइयत आप को सम्भाल नहीं पाया था और विश्व मानवता के केंद्र, प्रयागराज/अल्लाहबाद/अल्लाह आवास/अल्लाह आबाद/इला आवास/इला आबाद/त्रिवेणी/त्रिसंगम/तीर्थराज प्रयाग में मई ही नियंत्रणकर्ता था न की केरल/तमिल के नारायणन का खानदान या कलाम गुरुदेव या सिम्हाद्रि(नरसिंघा) का खानदान है जिन लोगों के समय से यह युद्ध भारत में विश्व्व्यापक स्तर पर चला गया है और चरित्रहीनता पर्याय बन गया है देह सुख की संतुस्ती के नाम पर और यह पूर्ण सत्य है की अपने निहित स्वार्थ के लिए सनातन हिन्दू समाज को नष्ट करने की साजिस के तहत जिस ईसाइयत मानसिकता वाले समाज ने इसे स्वयं प्रारम्भ किया था वही नियतंत्रण के लिए मुझे 2001 में यहाँ लगा दिया। और जब सब कुछ नियंत्रण सीमा में आ गया तो फिर स्वयं अपनी ही ताल ठोंक सूर वीरता क्यों दिखा रहे हो? अभी भी आप नहीं सम्भाल पाएंगे है की नहीं?

केरल/तमिल के नारायणन का  खानदान या कलाम गुरुदेव या सिम्हाद्रि(नरसिंघा) का खानदान है जिन लोगों के समय से यह युद्ध भारत में विश्व्व्यापक स्तर पर चला गया है और चरित्रहीनता  पर्याय बन गया है देह सुख की संतुस्ती के नाम पर और यह पूर्ण सत्य है की अपने निहित स्वार्थ के लिए सनातन हिन्दू समाज को नष्ट करने की साजिस के तहत जिस ईसाइयत मानसिकता वाले समाज ने इसे स्वयं प्रारम्भ किया था वही नियतंत्रण के लिए मुझे 2001 में यहाँ लगा दिया। और जब सब कुछ नियंत्रण सीमा में आ गया तो फिर स्वयं अपनी ही ताल ठोंक सूर वीरता क्यों दिखा रहे हो? अभी भी आप नहीं सम्भाल पाएंगे है की नहीं? >>>>>>>>>>उर्वरा और पुरुषार्थी संतति जन्म देने के लिए गोरे और काले का युद्ध कर ईसाइयत मत फैलाइये और न यह  समझिए की यह संसार आधा काला होने जा रहा है और उनको एक आठवाँ ही मिलना है संसार में काले लोगों से डरने न लगिए उनको अपनी इज्जत(सीता, सावित्री, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, गायत्री) नीलाम न कर दीजिये, क्योंकि ईसाइयत आप को सम्भाल नहीं पाया था और विश्व मानवता के केंद्र, प्रयागराज/अल्लाहबाद/अल्लाह आवास/अल्लाह आबाद/इला आवास/इला आबाद/त्रिवेणी/त्रिसंगम/तीर्थराज प्रयाग में मई ही नियंत्रणकर्ता था न की केरल/तमिल के नारायणन का  खानदान या कलाम गुरुदेव या सिम्हाद्रि(नरसिंघा) का खानदान है जिन लोगों के समय से यह युद्ध भारत में विश्व्व्यापक स्तर पर चला गया है और चरित्रहीनता  पर्याय बन गया है देह सुख की संतुस्ती के नाम पर और यह पूर्ण सत्य है की अपने निहित स्वार्थ के लिए सनातन हिन्दू समाज को नष्ट करने की साजिस के तहत जिस ईसाइयत मानसिकता वाले समाज ने इसे स्वयं प्रारम्भ किया था वही नियतंत्रण के लिए मुझे 2001 में यहाँ लगा दिया। और जब सब कुछ नियंत्रण सीमा में आ गया तो फिर स्वयं अपनी ही ताल ठोंक सूर वीरता क्यों दिखा रहे हो? अभी भी आप नहीं सम्भाल पाएंगे है की नहीं? 

सिया या सिया + री (सिया=सीता को सम्बोधन) या सीता या जानकी>>>>>>>रामा मे सम्पूर्ण ब्रह्मण्डों की शक्तियाँ समाहित होती है जिससे शिव और शक्ति दोनों का उद्भव होता है। अतः रामा=रामजानकी=राम (जिनके अस्तित्व के साथ ही सीता का अस्तित्व स्वयं ही निहित होता है) अपने में ही महाशिव है। इस लिए कोई सिया या सिया + री (सम्बोधन) या सीता या जानकी स्वयं चाह कर भी राम से अलग अपना अस्तित्व खोजने पर भी पा ही नहीं सकती है। इसीलिये मैंने कहा था की मैं ही आधार हूँ आप सभी का और मेरे बिना किसी शक्ति का भी अस्तित्व नहीं और मुझे आप ने ही आधार अपना बनाया है तो पक्ष और विपक्ष में पक्ष को तो अब नहीं लेकिन विपक्ष को सोचना पडेगा अमर्यादित आचरण न्यूनतम करने के लिए।>>>>>>>>>>>रामा=वह नाम जिसमे स्वयं एक साथ सीता और राम दोनों का बोध हो और जिसमे सीता को जानने और समझने के लिए राम को पहले जानना पड़ता है न की सीता से ही राम की शक्ति का आंकलन आप कर लेंगे= रामजानकी=सत्यनारायण=आदित्यनाथ=प्रदीप=सूर्यनाथ=सूर्यकांत=लक्ष्मीनारायण=सूर्यस्वामी; जबकि सिया मतलब केवल सीता होता है जो इस श्रिष्टि की एक अर्धांश शक्ति ही हैं। तो एकल अवस्था में रामा=वह नाम जिसमे स्वयं एक साथ सीता और राम दोनों का बोध हो और जिसमे सीता को जानने और समझने के लिए राम को पहले जानना पड़ता है न की केवल सीता को आरूध्द या बध्ध कर लेने से ही राम की शक्ति का आंकलन आप कर लेंगे= रामजानकी=सत्यनारायण=आदित्यनाथ=प्रदीप=सूर्यनाथ=सूर्यकांत= लक्ष्मीनारायण=सुर्यस्वामी होने का अप्रतिम गौरव व् अप्रतिम कष्ट सीता होने के गौरव और कष्ट से कहीं ज्यादा होता है क्योंकि रामा अपने में ही परमब्रह्म/ब्रह्म अवस्था है और पूर्णांश शक्ति अवस्था है जिससे सम्पूर्ण ब्रह्मण्डों के चर-अचर का उद्भव व् समन दोनों होता है।>>>>>>>>>>मतलब उसमे सम्पूर्ण ब्रह्मण्डों की शक्तियाँ समाहित होती है जिससे शिव और शक्ति दोनों का उद्भव होता है। अतः रामा=रामजानकी=राम (जिनके अस्तित्व के साथ ही सीता का अस्तित्व स्वयं ही निहित होता है) अपने में ही महाशिव है। इस लिए कोई सिया या सीता या जानकी स्वयं चाह कर भी राम से अलग अपना अस्तित्व खोजने पर भी पा ही नहीं सकती है। इसीलिये मैंने कहा था की मैं ही आधार हूँ आप सभी का और मेरे बिना किसी शक्ति का भी अस्तित्व नहीं और मुझे आप ने ही आधार अपना बनाया है तो पक्ष और विपक्ष में पक्ष को तो अब नहीं लेकिन विपक्ष को सोचना पडेगा अमर्यादित आचरण न्यूनतम करने के लिए।

सिया या सिया + री (सिया=सीता को सम्बोधन) या सीता या जानकी>>>>>>>रामा मे सम्पूर्ण ब्रह्मण्डों की शक्तियाँ समाहित होती है जिससे शिव और शक्ति दोनों का उद्भव होता है। अतः रामा=रामजानकी=राम (जिनके अस्तित्व के साथ ही सीता का अस्तित्व स्वयं ही निहित होता है) अपने में ही महाशिव है। इस लिए कोई सिया या सिया + री (सम्बोधन) या सीता या जानकी स्वयं चाह कर भी राम से अलग अपना अस्तित्व खोजने पर भी पा ही नहीं सकती है। इसीलिये मैंने कहा था की मैं ही आधार हूँ आप सभी का और मेरे बिना किसी शक्ति का भी अस्तित्व नहीं और मुझे आप ने ही आधार अपना बनाया है तो पक्ष और विपक्ष में पक्ष को तो अब नहीं लेकिन विपक्ष को सोचना पडेगा अमर्यादित आचरण न्यूनतम करने के लिए।>>>>>>>>>>>रामा=वह नाम जिसमे स्वयं एक साथ सीता और राम दोनों का बोध हो और जिसमे सीता को जानने और समझने के लिए राम को पहले जानना पड़ता है न की सीता से ही राम की शक्ति का आंकलन आप कर लेंगे= रामजानकी=सत्यनारायण=आदित्यनाथ=प्रदीप=सूर्यनाथ=सूर्यकांत=लक्ष्मीनारायण=सूर्यस्वामी; जबकि सिया मतलब केवल सीता होता है जो इस श्रिष्टि की एक अर्धांश शक्ति ही हैं। तो एकल अवस्था में रामा=वह नाम जिसमे स्वयं एक साथ सीता और राम दोनों का बोध हो और जिसमे सीता को जानने और समझने के लिए राम को पहले जानना पड़ता है न की केवल सीता को आरूध्द या बध्ध कर लेने से ही राम की शक्ति का आंकलन आप कर लेंगे= रामजानकी=सत्यनारायण=आदित्यनाथ=प्रदीप=सूर्यनाथ=सूर्यकांत= लक्ष्मीनारायण=सुर्यस्वामी होने का अप्रतिम गौरव व् अप्रतिम कष्ट सीता होने के गौरव और कष्ट से कहीं ज्यादा होता है क्योंकि रामा अपने में ही परमब्रह्म/ब्रह्म अवस्था है और पूर्णांश शक्ति अवस्था है जिससे सम्पूर्ण ब्रह्मण्डों के चर-अचर का उद्भव व् समन दोनों होता है।>>>>>>>>>>मतलब उसमे सम्पूर्ण ब्रह्मण्डों की शक्तियाँ समाहित होती है जिससे शिव और शक्ति दोनों का उद्भव होता है। अतः रामा=रामजानकी=राम (जिनके अस्तित्व के साथ ही सीता का अस्तित्व स्वयं ही निहित होता है) अपने में ही महाशिव है। इस लिए कोई सिया या सीता या जानकी स्वयं चाह कर भी राम से अलग अपना अस्तित्व खोजने पर भी पा ही नहीं सकती है। इसीलिये मैंने कहा था की मैं ही आधार हूँ आप सभी का और मेरे बिना किसी शक्ति का भी अस्तित्व नहीं और मुझे आप ने ही आधार अपना बनाया है तो पक्ष और विपक्ष में पक्ष को तो अब नहीं लेकिन विपक्ष को सोचना पडेगा अमर्यादित आचरण न्यूनतम करने के लिए।

Tuesday, March 29, 2016

दक्षिणी मधुबन के ऋषिकेश भाई सपत्नीक अपनी बहन के पास पातालपुरी और राजा भैया दिल्ली पहुंच गए है और इससे ज्यादा शुभ-शुभ क्या हो सकता था की मैं दोनों को उस दक्षिण के मधुबन में 2008 में ही पहचान लिया था और दोनों मेरे सहयोगी रहे वहां पर किसी किसी रूप में।

दक्षिणी मधुबन के ऋषिकेश भाई सपत्नीक अपनी बहन के पास पातालपुरी और राजा भैया दिल्ली पहुंच गए है और इससे ज्यादा शुभ-शुभ क्या हो सकता था की मैं दोनों को उस दक्षिण के मधुबन में 2008 में ही पहचान लिया था और दोनों मेरे सहयोगी रहे वहां पर किसी  किसी रूप में।

Monday, March 28, 2016

मित्रों उस दो गाँवों (बिशुनपुर-223103 और रामापुर-223225) से हूँ और वहाँ जीवन भी व्यतीत किया हूँ जहां आधुनिक जगत के मंगल पांडेय, रानी लक्ष्मीबाई, नाना जी, नेताजी, आज़ाद, भगत जैसे अनगिनत क्रांतिकारियों; राजेंद्र प्रसाद, राधाकृष्णन जैसे विद्वान लोगों; तिलक, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, टैगोर, विवेकानंद जैसे विचारको की चर्चा से कुछ कम ज्यादा नेहरू, गांधी, पटेल और कलाम और उनके युग के बाद जोशी, अटल और आडवाणी तथा अटल जी की दुर्गा इंदिरा जी का स्थान था और समाजवादी विचारको को सब लोग अपने घर का और चेलाही का समझते थे और हर समाजवादी की कमियां और अच्छाइया गिनाई जाती थीं पर नेहरू, गांधी और पटेल युग के बाद जोशी, अटल और आडवाणी तथा अटल जी की दुर्गा इंदिरा जी में लाखों कमिया रही हो पर उनको आदर्श माना जाता रहा है। संख्याबल की राजनीती से ऊपर उठें तो जिन लोगों को लोग चर्चा में लाने से बचते है कहीं कोई तथाकथित दलित जातीवादी और मनुवादी करार दे मुकदमा न ठोंक दे तो बताते चले की जगजीवन राम को काशीराम और अम्बेडकर से कुछ भी कम नहीं माना जाता रहा है उन दिनों में जिस जगजीवन राम में धर्म भीरुता और धार्मिक उदारवाद दोनों समाया हुआ पाया जाता था और आज भी उनके परिवार में यह है भी।

मित्रों उस दो गाँवों (बिशुनपुर-223103 और रामापुर-223225) से हूँ और वहाँ जीवन भी व्यतीत किया हूँ जहां आधुनिक जगत के मंगल पांडेय, रानी लक्ष्मीबाई, नाना जी, नेताजी, आज़ाद, भगत जैसे अनगिनत क्रांतिकारियों; राजेंद्र प्रसाद, राधाकृष्णन जैसे विद्वान लोगों;  तिलक, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, टैगोर, विवेकानंद जैसे विचारको की चर्चा से कुछ कम ज्यादा नेहरू, गांधी, पटेल और कलाम और उनके युग के बाद जोशी, अटल और आडवाणी तथा अटल जी की दुर्गा इंदिरा जी का स्थान था और समाजवादी विचारको को सब लोग अपने घर का और चेलाही का समझते थे और हर समाजवादी की कमियां और अच्छाइया गिनाई जाती थीं पर नेहरू, गांधी और पटेल युग के बाद जोशी, अटल और आडवाणी तथा अटल जी की दुर्गा इंदिरा जी में लाखों कमिया रही हो पर उनको आदर्श माना जाता रहा है। संख्याबल की राजनीती से ऊपर उठें तो जिन लोगों को लोग चर्चा में लाने से बचते है कहीं कोई तथाकथित दलित जातीवादी और मनुवादी करार दे मुकदमा न ठोंक दे तो बताते चले की जगजीवन राम को काशीराम और अम्बेडकर से कुछ भी कम नहीं माना जाता रहा है उन दिनों में जिस जगजीवन राम में धर्म भीरुता और धार्मिक उदारवाद दोनों समाया हुआ पाया जाता था और आज भी उनके परिवार में यह है भी।

जिस सती:पारवती:उमा:गिरिजा:अपर्णा:गौरी, सीता=जानकी और राधा-रुक्मिणी ने वरण किया अगर वही स्वयं अटल नहीं रही तो प्रश्न उनसे पूंछा जाना चाहिए मैं तो ऐसा हूँ की अज्ञानता में सूर्पनखा तक वरण कर लेती है पर यह तो मेरा सदाचार है की मैं सती:पारवती:उमा:गिरिजा:अपर्णा:गौरी, सीता=जानकी और राधा-रुक्मिणी का मान और स्वाभिमान रखता हूँ की अपने सदाचार पर अटल हूँ, अटल था और अटल रहूँगा। उन देवियों को सत सत नमन जिन्होंने असुरों के सामने उन सती:पारवती:उमा:गिरिजा:अपर्णा:गौरी, सीता=जानकी और राधा-रुक्मिणी को हारा हुआ पाया और मेरे अवध क्षेत्र से विवाह की सूचना की भनक पाते ही 2007 के अंत और 2008 के प्रारम्भ में भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलोरे में मुझसे समूह बनाकर मिलकर कहा था की यहाँ जो भी रुचिकर लगे आप उसका वरण कर लीजिए उसका लगन यही आप से हो जाएगा तो मैंने कहा था मैं वरन नहीं करता वरन किया जाता हूँ पर मेरे लिए अब वही मान्य होगा जिसे मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर और में स्वयं में मेरे आधुनिक शिक्षा के भी गुरु मेरे मामा श्रद्धेय श्रीश्रीधर सुनिश्चित करेंगे और वही हुआ भी। उनके प्रति अगाध स्नेह में ही 30-09-2010 को जन्मे मेरे बड़े पुत्र का नाम विष्णुकांत/विष्णुस्वामी/सशरीर परमब्रह्म:ब्रह्म/ब्रह्मा+विष्णु+महेश=महाशिव= राम रखा जो विष्णु नाम से प्रारम्भ होता है। 28-08-2013 को जन्मे द्वितीय पुत्र का नाम भी समानार्थक परन्तु भौतिक सांसारिक नाम कृष्णकान्त रखा जो नाम उन नायकों को समर्पित है जिन्होंने मेरा परीक्षण किया था 30 जनवरी, 2012 को प्रयागराज से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जाते समय सीतामढ़ी जाने वाले रास्ते और गोपीगंज के मध्य में। तो जगत आधार हूँ की नहीं जिसकी कमी हो मुझसे पूरा कर लीजिए पर मात्र व्यवहारिक न्याय भी तो मेरे साथ हो और आप को यह भान रखने रहे हर स्थिति में की मैं ही अटल आधार हूँ और आप का अभिनय मेरी सहनशीलता तक ही सीमित है तो मेरा सहन सीलता टूट जाने का दर आप पालिये।<<<<<बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))।

जिस सती:पारवती:उमा:गिरिजा:अपर्णा:गौरी, सीता=जानकी और राधा-रुक्मिणी ने वरण किया अगर वही स्वयं अटल नहीं रही तो प्रश्न उनसे पूंछा जाना चाहिए मैं तो ऐसा हूँ की अज्ञानता में सूर्पनखा तक वरण कर लेती है पर यह तो मेरा सदाचार है की मैं सती:पारवती:उमा:गिरिजा:अपर्णा:गौरी, सीता=जानकी और राधा-रुक्मिणी का मान और स्वाभिमान रखता हूँ की अपने सदाचार पर अटल हूँ, अटल था और अटल रहूँगा। उन देवियों को सत सत नमन जिन्होंने असुरों के सामने उन सती:पारवती:उमा:गिरिजा:अपर्णा:गौरी, सीता=जानकी और राधा-रुक्मिणी को हारा हुआ पाया और मेरे अवध क्षेत्र से विवाह की सूचना की भनक पाते ही 2007 के अंत और 2008 के प्रारम्भ में भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलोरे में मुझसे समूह बनाकर मिलकर कहा था की यहाँ जो भी रुचिकर लगे आप उसका वरण कर लीजिए उसका लगन यही आप से हो जाएगा तो मैंने कहा था मैं वरन नहीं करता वरन किया जाता हूँ पर मेरे लिए अब वही मान्य होगा जिसे मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर और में स्वयं में मेरे आधुनिक शिक्षा के भी गुरु मेरे मामा श्रद्धेय श्रीश्रीधर सुनिश्चित करेंगे और वही हुआ भी। उनके प्रति अगाध स्नेह में ही 30-09-2010 को जन्मे मेरे बड़े पुत्र का नाम विष्णुकांत/विष्णुस्वामी/सशरीर परमब्रह्म:ब्रह्म/ब्रह्मा+विष्णु+महेश=महाशिव= राम रखा जो विष्णु नाम से प्रारम्भ होता है। 28-08-2013 को जन्मे द्वितीय पुत्र का नाम भी समानार्थक परन्तु भौतिक सांसारिक नाम कृष्णकान्त रखा जो नाम उन नायकों को समर्पित है जिन्होंने मेरा परीक्षण किया था 30 जनवरी, 2012 को प्रयागराज से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जाते समय सीतामढ़ी जाने वाले रास्ते और गोपीगंज के मध्य में। तो जगत आधार हूँ की नहीं जिसकी कमी हो मुझसे पूरा कर लीजिए पर मात्र व्यवहारिक न्याय भी तो मेरे साथ हो और आप को यह भान रखने रहे हर स्थिति में की मैं ही अटल आधार हूँ और आप का अभिनय मेरी सहनशीलता तक ही सीमित है तो मेरा सहन सीलता टूट जाने का दर आप पालिये।<<<<<बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))। 

कोई संगठन/रास्त्र/प्रजातंत्र/जनतंत्र/गणतंत्र जिसका कोई उच्च आदर्श और जीवन दर्शन नहीं वह संगठन/रास्त्र/प्रजातंत्र/जनतंत्र/गणतंत्र नहीं केवल एक भींडतन्त्र है और वह कब बिखर जाय और मानवता की मूल भावना उसमे से लुप्त हो जाय इसका कोई ठिकाना नहीं।>>>>>>क्योंकि ईस्वर सत्य है, सत्य ही शिव(कल्याणकारी) है और शिव ही सुन्दर है तो सत्यम शिवम् सुंदरम में सतयमेव जयते को दृतिगोचर करना और कराना है। अतएव अगर मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम और सत्य हरिश्चन्द्र नहीं बन सकते हैं तो कम से कम प्रेम पूर्वक व्यवहारिक जीवन स्वयं आचरित कीजिये मानवता को बनाये रखने हेतु और दूसरों को भी व्यवहारिक जीवन (न की शूद्रता पूर्वक बिना किसी सीमारेखा के अमर्यादित जीवन) जीने दीजिये। जिससे की आप को सत्यम शिवम् सुंदरम में सतयमेव जयते नजर आये। गलत तो मेरे साथ हुआ ही एक दो नहीं तीनो पीढ़ियों तक पर उसके बाद भी अगर हम पक्ष और विपक्ष दोनों को क्षमा कर व्यवहारिक जीवन जीना चाहते है तो आप अपनी बहुत बड़ी वीरता (बाहुबल), बुध्धिबल (तिकड़म) और धनबल दिखाने लगते हैं तो निश्चित ही आप को भी कष्ट होगा और हमको भी होगा कटु सत्य बोलने में आप की उद्दण्डता और आप के अनर्गल प्रलाप का समाज पर प्रभाव रोकने के लिए। मैंने दोनों प्रकार से मानवता नियन्त्रीय करने वालों को सम्मान दिया है चाहे सामान्य से लेकर प्रयागराज के सम्मानित नागरिक या प्रयागराज विश्विद्यालय के भद्र जन शिक्षक हो या इसकी सीमा से बाहर के धनबल और बाहुबल वाले हो। मतलब मैं अपनी सीमा समझता हूँ एक व्यवहारिक सामान्य शिक्षक के कर्तव्य निर्वहन में सामान्यतः आने वाली समस्याओं से दो चार हो और विश्विद्यालय से मिले अन्य शिक्षणेत्तर दायित्वों के निर्वहन और उस हेतु छात्र नियतंत्रण के सन्दर्भ में व्यवहारिक द्रिस्तिकोन अपनाने तक। कभी टकराहट महसूस नहीं होने दिया और एक सीमा तक कठोर हो समझौता किया हूँ और दबाब भी स्वीकार किया हूँ, पर दबाव कहाँ से आये वह शक्ति श्रोत (मेरे परीक्षण और मुझे वेवस दिखवाने हेतु और इस बहाने अपनी कतार में शामिल करने हेतु वरिष्ठजन से) भी पता हुए पर झुका और न भी झुकता तो क्या होता मेरा? कोई बलात कुछ करवा सकता था क्या? और बलात प्रयास भी करता तो उसका परिणाम भी उसे पता पहले से होता की नहीं? लेकिन मानव सभ्यता की व्यवस्था संचालन में उनका भी योगदान है इसे मैं इसे कभी नहीं भूलता क्योंकि उन्होंने यह जीवन बिना अनुभव के नहीं जिए है। अगर ये सभी मेरा परीक्षण कर चुके हों और मानवता की स्थापना और संचालन में अपने साथ मुझे भी रत पाते हो अपने साथ तो अब उन लोगों को मुझे अपवाद मान लेना चाहिए और मेरे लिए जो जिम्मेदारी हो उसमे व्यवस्था बनाने में मेरा सहयोग और सहायता करनी चाहिए तथा अनावश्यक टकराहट छोड़ देनी चाहिए जो उनके और मेरे दोनों लोगों के हित में है।>>>>>>> कोई संगठन/रास्त्र/प्रजातंत्र/जनतंत्र/गणतंत्र जिसका कोई उच्च आदर्श और जीवन दर्शन नहीं वह संगठन/रास्त्र/प्रजातंत्र/जनतंत्र/गणतंत्र नहीं केवल एक भींडतन्त्र है और वह कब बिखर जाय और मानवता की मूल भावना उसमे से लुप्त हो जाय इसका कोई ठिकाना नहीं।

कोई संगठन/रास्त्र/प्रजातंत्र/जनतंत्र/गणतंत्र जिसका कोई उच्च आदर्श और जीवन दर्शन नहीं वह संगठन/रास्त्र/प्रजातंत्र/जनतंत्र/गणतंत्र नहीं केवल एक भींडतन्त्र है और वह कब बिखर जाय और मानवता की मूल भावना उसमे से लुप्त हो जाय इसका कोई ठिकाना नहीं।>>>>>>क्योंकि ईस्वर सत्य है, सत्य ही शिव(कल्याणकारी) है और शिव ही सुन्दर है तो सत्यम शिवम् सुंदरम में सतयमेव जयते को दृतिगोचर करना और कराना है। अतएव अगर मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम और सत्य हरिश्चन्द्र नहीं बन सकते हैं तो कम से कम प्रेम पूर्वक व्यवहारिक जीवन स्वयं आचरित कीजिये मानवता को बनाये रखने हेतु और दूसरों को भी व्यवहारिक जीवन (न की शूद्रता पूर्वक बिना किसी सीमारेखा के अमर्यादित जीवन) जीने दीजिये। जिससे की आप को सत्यम शिवम् सुंदरम में सतयमेव जयते नजर आये। गलत तो मेरे साथ हुआ ही एक दो नहीं तीनो पीढ़ियों तक पर उसके बाद भी अगर हम पक्ष और विपक्ष दोनों को क्षमा कर व्यवहारिक जीवन जीना चाहते है तो आप अपनी बहुत बड़ी वीरता (बाहुबल), बुध्धिबल (तिकड़म) और धनबल दिखाने लगते हैं तो निश्चित ही आप को भी कष्ट होगा और हमको भी होगा कटु सत्य बोलने में आप की उद्दण्डता और आप के अनर्गल प्रलाप का समाज पर प्रभाव रोकने के लिए। मैंने दोनों प्रकार से मानवता नियन्त्रीय करने वालों को सम्मान दिया है चाहे सामान्य से लेकर प्रयागराज के सम्मानित नागरिक या प्रयागराज विश्विद्यालय के भद्र जन शिक्षक हो या इसकी सीमा से बाहर के धनबल और बाहुबल वाले हो। मतलब मैं अपनी सीमा समझता हूँ एक व्यवहारिक सामान्य शिक्षक के कर्तव्य निर्वहन में सामान्यतः आने वाली समस्याओं से दो चार हो और विश्विद्यालय से मिले अन्य शिक्षणेत्तर दायित्वों के निर्वहन और उस हेतु छात्र नियतंत्रण के सन्दर्भ में व्यवहारिक द्रिस्तिकोन अपनाने तक। कभी टकराहट महसूस नहीं होने दिया और एक सीमा तक कठोर हो समझौता किया हूँ और दबाब भी स्वीकार किया हूँ, पर दबाव कहाँ से आये वह शक्ति श्रोत (मेरे परीक्षण और मुझे वेवस दिखवाने हेतु और इस बहाने अपनी कतार में शामिल करने हेतु वरिष्ठजन से) भी पता हुए पर झुका और न भी झुकता तो क्या होता मेरा? कोई बलात कुछ करवा सकता था क्या? और बलात प्रयास भी करता तो उसका परिणाम भी उसे पता पहले से होता की नहीं? लेकिन मानव सभ्यता की व्यवस्था संचालन में उनका भी योगदान है इसे मैं इसे कभी नहीं भूलता क्योंकि उन्होंने यह जीवन बिना अनुभव के नहीं जिए है। अगर ये सभी मेरा परीक्षण कर चुके हों और मानवता की स्थापना और संचालन में अपने साथ मुझे भी रत पाते हो अपने साथ तो अब उन लोगों को मुझे अपवाद मान लेना चाहिए और मेरे लिए जो जिम्मेदारी हो उसमे व्यवस्था बनाने में मेरा सहयोग और सहायता करनी चाहिए तथा अनावश्यक टकराहट छोड़ देनी चाहिए जो उनके और मेरे दोनों लोगों के हित में है।>>>>>>> कोई संगठन/रास्त्र/प्रजातंत्र/जनतंत्र/गणतंत्र जिसका कोई उच्च आदर्श और जीवन दर्शन नहीं वह संगठन/रास्त्र/प्रजातंत्र/जनतंत्र/गणतंत्र नहीं केवल एक भींडतन्त्र है और वह कब बिखर जाय और मानवता की मूल भावना उसमे से लुप्त हो जाय इसका कोई ठिकाना नहीं।

My Blog "Vivekanand and Modern Tradition" has ~ 75000 Visits since August, 2013 to till date from all over World in which 1st Indian, 2nd United States of American, 3rd United Arab Emirate, 4rth Austrailian and other countries. Its has multiple visits, if we accounting visits on facebook too. Near about Similar Matter were posted on Orkut which transferred to this blog while I was at Indian Institute of Science Bangalore 2007-2009. Those posts were deleted in June, 2013.

My Blog "Vivekanand and Modern Tradition" has ~ 75000 Visits since August, 2013 to till date from all over World in which 1st Indian, 2nd United States of American, 3rd United Arab Emirate, 4rth Austrailian and other countries. Its has multiple visits, if we accounting visits on facebook too. Near about Similar Matter were posted on Orkut which transferred to this blog while I was at Indian Institute of Science Bangalore 2007-2009. Those posts were deleted in June, 2013.

Sunday, March 27, 2016

दो -दो भारतीय राज्यों के मेडिकल एसोसिएशन में एक साथ नामांकन कराने वाले कब तक टिकते और वही हुआ और मेरा कुछ पोस्ट डिलीट कर दिया गया। वैसे मैं उसे नहीं लिखूंगा पुनः। लेकिन यह देखिये की मेरा ऑब्जरवेशन कितना सटीक है और आप लोग किसी न किसी को मेरा विकल्प बनाने के लिए पकड़ लाते है उसको घतरा बताए बिना और उसी का आप सहारा भी लेकर मेरा सामना कर रहे है तो आप अपनी वीरता समझ जाइये केवल वरिष्ठ को कनिष्ठ और कनिष्ठ को वरिष्ठ सर्व सिध्ध नियमों को तोड़कर अपनी पूर्ण ऊर्जा और मायाजाल का दबाब दिखा इसी आधार पर बनाते जाइये की कोई मर्यादा का उल्लंघन किसी कीमत पर नहीं करेगा पर आप के कर्मो का आइना मैं दिखाऊंगा ही।

दो -दो भारतीय राज्यों के मेडिकल एसोसिएशन में एक साथ नामांकन कराने वाले कब तक टिकते और वही हुआ और मेरा कुछ पोस्ट डिलीट कर दिया गया।  वैसे मैं उसे नहीं लिखूंगा पुनः। लेकिन यह देखिये की मेरा ऑब्जरवेशन कितना सटीक है और आप लोग किसी न किसी को मेरा विकल्प बनाने के लिए पकड़ लाते है उसको घतरा बताए बिना और उसी का आप सहारा भी लेकर मेरा सामना कर रहे है तो आप अपनी वीरता समझ जाइये केवल वरिष्ठ को कनिष्ठ और कनिष्ठ को वरिष्ठ सर्व सिध्ध नियमों को तोड़कर अपनी पूर्ण ऊर्जा और मायाजाल का दबाब दिखा इसी आधार पर बनाते जाइये की कोई मर्यादा का उल्लंघन किसी कीमत पर नहीं करेगा पर आप के कर्मो का आइना मैं  दिखाऊंगा ही। 

जिन तथाकथित बड़े-बड़े देशों के समाज सेवियों को यह लगता हो की भारत में बहुत बड़ा सामाजिक अन्याय होता है तो वे अपनी सरकारों से कहें के वे भारत के सामान्य लोगों को भी अपने यहाँ आने और सेवा का अवसर पाने के लिए वीसा और आरक्षण दें न की केवल कुशल भारतीयों को ही वीसा और विशेष निमंत्रण पत्र दें। अगर वे ऐसा करने हैं तो भारत से वहां जाने वालों की बहुत बड़ी संख्या प्राप्त होगी और दबे कुचले भारतीयों को परोक्ष रूप से सामाजिक अन्याय से मुक्ति भी मिलेगी। यह बहुत ही अनूठा और उदारता पूर्वक कृत्य उनका विश्व मानव समाज और विशेष रूप से भारतीय और भारतीय उपमहाद्वीप वालों के लिए होगा। और उनकी इक्षा प्रयोगवादी हो जाएगी इस महाद्वीप के लोगों के सामाजिक उत्थान और इस प्रकार सामाजिक अन्याय से बचाने की।

जिन तथाकथित बड़े-बड़े देशों के समाज सेवियों को यह लगता हो की भारत में बहुत बड़ा सामाजिक अन्याय होता है तो वे अपनी सरकारों से कहें के वे भारत के सामान्य लोगों को भी अपने यहाँ आने और सेवा का अवसर पाने के लिए वीसा और आरक्षण दें न की केवल कुशल भारतीयों को ही वीसा और विशेष निमंत्रण पत्र दें। अगर वे ऐसा करने हैं तो भारत से वहां जाने वालों की बहुत बड़ी संख्या प्राप्त होगी और दबे कुचले भारतीयों को परोक्ष रूप से सामाजिक अन्याय से मुक्ति भी मिलेगी। यह बहुत ही अनूठा और उदारता पूर्वक कृत्य उनका विश्व मानव समाज और विशेष रूप से भारतीय और भारतीय उपमहाद्वीप वालों के लिए होगा। और उनकी इक्षा प्रयोगवादी हो जाएगी इस महाद्वीप के लोगों के सामाजिक उत्थान और इस प्रकार सामाजिक अन्याय से बचाने की।

डॉ. ऋषिकेश पाण्डेय (देवरिया) और डॉ. अभिषेक(ऋषि) शुक्ला (कर्णपुर) के रंग के आधार पर रंगभेद चलाएंगे तो फिर हो चुका आधे गोरे और आधे काले से इस सृस्टि की सुंदरता तो रगंभेद के आधार पर काली माई से डॉ. अभिषेक शुक्ला का विवाह भी होना चाहिए न की गौरा पार्वती से ? दुर्गा (लक्ष्मी+पार्वती+सरस्वती) के नौ अवतार में केवल एक में काली माई हुई है तो यह है प्राकृतिक स्त्री अनुपात और त्रिदेवों में कोई नहीं काला तो त्रिदेव तक किसी को आप काला पाते है तो केवल काली अवतार में ही। सप्तर्षि सभ्यता और उनसे मानव सभ्यता में जाने पर पुरुषों में क्या हुआ उसे भी आप प्रकृति पर छोड़ दीजिये और मुझसे गोरे और काले का भी युध्ध समाप कीजिये क्योंकि ये डॉ. ऋषिकेश पांडेय और डॉ. अभिषेक शुक्ला दोनों मोहरों को जो प्रयोग कर रहे है ये सब मेरे बच्चे के सामान है और इनके भरोसे मेरा कुछ नहीं क्र सकते हैं आप। अतः इनको आप स्वयं अपना और दलित ईसाईयों का मोहरा विदेश पोषित नीति के तहत न बनने दीजिये और इनको अपना निजी जीवन जीने दीजिय। जो असली गुनाहगार है इस प्रकार उसको पोषित मत करिये परोक्ष रूप से। शूद्रता को त्याग कर या व्यवहारिक रूप में ही कम करके मेरे पास आइये हम एक थाली में भोजन करेंगे लेकिन इसका मतलब यह नहीं की सामाजिक व्यवस्था को धता बताते हुए आप के घर अव्यवहारिक रूप से विवाह सम्बन्ध स्थापित कर लेंगे आप के किसी जातिवादी/धर्मवादी/पंथवादी/ऊंच-नीच वादे आरोप के डर से। यह मेरा ही नहीं सामूहिक निर्णय से होगा या परिस्थितजन्य कारणों से ही कुछ हो सकेगा तो उस ऊंच-नीच कृत्य को हम स्वीकार भी करेंगे न की उसे सार्वत्रिक आदर्श स्थापित करवाने की कोशिश करेंगे।>>>>>जोशी जी मैं निःसन्देह तिवारी गुरूजी को भी पहचानता हूँ पर बात यह है की मेरे निर्देश और स्पष्ट सूचना के बाजजूद मेरी सलाह की अवमानना और मेरे स्वाभिमान (आत्म-गौरव) की अवमानना जो मित्रकुल और ईसाई दलित कर दिया क्या वह क्षमा प्रार्थी है? क्या वह भौतिक रूप में अपनी समझ में संसाधनों में कमजोर है या उसके पोषणकर्ता भौतिक रूप में अपने को कमजोर हैं समझते हैं? अगर किसी सुनियोजित प्रक्रिया के तहत ऐसे कार्य नारायणन के समय से विदेशी इसारे पर जो किये जा रहे हैं क्या वह सब मुझसे या आम भारतीय नागरिक या किसी पिछड़े समाज के भी दया के पात्र हैं? या ये किसी सरकारी सहायता के पात्र हैं? अगर ये आप लोगों की सलाह के अनुसार सामाजिक मर्यादा और विश्वमानवता को ध्यान में रखकर क्षमा भी किये गए तो क्या ये इतने सक्षम अपने को समझते हैं (भौतिक रूप से और तथाकथित मानवीय मूल्य को धृणित तरीके से आधार मानकर जरूर है सक्षम है पर वास्तव में हैं नहीं) की और सरकार के पास क्या कोई अपना संचित धन है? या यह सामान्यजन की गाढ़ी कमाई से सेवाकर या आयकर के रूप में वसूला हुआ धन है? और उस धन का उपयोग विदेशी संस्कृति और विदेशी देश के लिए कार्य करने वाले को शिक्षा और सेवा देने के लिए प्रयोग होना किसी प्रकार उचित है? जिसकी एक एक साँस को आधार मानकर एक समय मानवजीवन की आयु बढ़ाई जा रही थी और बढ़ी क्या उससे ये बदला लेने योग्य हैं जिसके आधार पर इनकी स्वयं की भी जीवन आधार रेखा टिकी हुई है? दुनिआ में पाँच हजार वर्ष या सृस्टि के प्रारम्भ से आज तक कौन जिया है की किसी अमुक घर/ जाती/धर्म/देश/समुदाय विशेष में की की अमुक घर/ जाती/धर्म/देश/समुदाय वालों का घर ही उनका घर है तो 70-80 वर्ष के अधिकतम आयु का मानव अगर 5 हजार वर्ष या एक करोड़ वर्ष के बदले की बात करे तो उस समाजविज्ञानी या समाज सेवी या समाजवादी को महामूर्ख कहते है विवेक नहीं कहते हैं। जितनी शक्ति मेरे विरोध में लगी उतनी यदि दलित उध्धार में लगी होती तो सायद इस मानव समाज से शूद्रता अधिकांशतः मिट गयी होती तो जिसके भरोसे मानव जीवन चल रहा है उससे आप क्या बदला लेंगे पहले अपने को शूद्रता मुक्त बनाइये सब जातिवाद/धर्मवाद/क्षेत्रवाद/रंगभेद मिट जाएगा। मैं शूद्रता हर जाति/धर्म में पाता हूँ किसी में कम और किसी में ज्यादा तो उसके लिए किसी जाती विशेष के नाम का प्रयोग न करता हूँ न करूंगा पर समाज में शूद्रता जिस दिन तक व्यापक पैमाने पर व्याप्त रहेगी जातिवाद/धर्मवाद और आतंकवाद से मुक्ति स्वयं भगवान भी नहीं दे सकते है कोई सत्ता या शासन क्या दे देगा तो उसमे कभी का एक मात्र उपाय है विश्व जन मानस और भारतीय जनमानस से शूद्रता का अधिकतम सफाया।

 डॉ. ऋषिकेश पाण्डेय (देवरिया) और डॉ. अभिषेक(ऋषि) शुक्ला (कर्णपुर)  के रंग के आधार पर रंगभेद चलाएंगे तो फिर हो चुका आधे गोरे और आधे काले से इस सृस्टि की सुंदरता तो रगंभेद के आधार पर काली माई से डॉ. अभिषेक शुक्ला का विवाह भी होना चाहिए न की गौरा पार्वती से ? दुर्गा (लक्ष्मी+पार्वती+सरस्वती) के नौ अवतार में केवल एक में काली माई हुई है तो यह है प्राकृतिक स्त्री अनुपात और त्रिदेवों में कोई नहीं काला तो त्रिदेव तक किसी को आप काला पाते है तो केवल काली अवतार में ही। सप्तर्षि सभ्यता और उनसे मानव सभ्यता में जाने पर पुरुषों में क्या हुआ उसे भी आप प्रकृति पर छोड़ दीजिये और मुझसे गोरे और काले का भी युध्ध समाप कीजिये क्योंकि ये डॉ. ऋषिकेश पांडेय और डॉ. अभिषेक शुक्ला दोनों मोहरों को जो प्रयोग कर रहे है ये सब मेरे बच्चे के सामान है और इनके भरोसे मेरा कुछ नहीं क्र सकते हैं आप। अतः इनको आप स्वयं अपना और दलित ईसाईयों का मोहरा विदेश पोषित नीति के तहत न बनने दीजिये और इनको अपना निजी जीवन जीने दीजिय। जो असली गुनाहगार है इस प्रकार उसको पोषित मत करिये परोक्ष रूप से। शूद्रता को त्याग कर या व्यवहारिक रूप में ही कम करके मेरे पास आइये हम एक थाली में भोजन करेंगे लेकिन इसका मतलब यह नहीं की सामाजिक व्यवस्था को धता बताते हुए आप के घर अव्यवहारिक रूप से विवाह सम्बन्ध स्थापित कर लेंगे आप के किसी जातिवादी/धर्मवादी/पंथवादी/ऊंच-नीच वादे आरोप के डर से। यह मेरा ही नहीं सामूहिक निर्णय से होगा या परिस्थितजन्य कारणों से ही कुछ हो सकेगा तो उस ऊंच-नीच कृत्य को हम स्वीकार भी करेंगे न की उसे सार्वत्रिक आदर्श स्थापित करवाने की कोशिश करेंगे।>>>>>जोशी जी मैं निःसन्देह तिवारी गुरूजी को भी पहचानता हूँ पर बात यह है की मेरे निर्देश और स्पष्ट सूचना के बाजजूद मेरी सलाह की अवमानना और मेरे स्वाभिमान (आत्म-गौरव) की अवमानना जो मित्रकुल और ईसाई दलित कर दिया क्या वह क्षमा प्रार्थी है? क्या वह भौतिक रूप में अपनी समझ में संसाधनों में कमजोर है या उसके पोषणकर्ता भौतिक रूप में अपने को कमजोर हैं समझते हैं? अगर किसी सुनियोजित प्रक्रिया के तहत ऐसे कार्य नारायणन के समय से विदेशी इसारे पर जो किये जा रहे हैं क्या वह सब मुझसे या आम भारतीय नागरिक या किसी पिछड़े समाज के भी दया के पात्र हैं? या ये किसी सरकारी सहायता के पात्र हैं? अगर ये आप लोगों की सलाह के अनुसार सामाजिक मर्यादा और विश्वमानवता को ध्यान में रखकर क्षमा भी किये गए तो क्या ये इतने सक्षम अपने को समझते हैं (भौतिक रूप से और तथाकथित मानवीय मूल्य को धृणित तरीके से आधार मानकर जरूर है सक्षम है पर वास्तव में हैं नहीं) की और सरकार के पास क्या कोई अपना संचित धन है?  या यह सामान्यजन की गाढ़ी कमाई से सेवाकर या आयकर के रूप में वसूला हुआ धन है? और उस धन का उपयोग विदेशी संस्कृति और विदेशी देश के लिए कार्य करने वाले को शिक्षा और सेवा देने के लिए प्रयोग होना किसी प्रकार उचित है? जिसकी एक एक साँस को आधार मानकर एक समय मानवजीवन की आयु बढ़ाई जा रही थी और बढ़ी क्या उससे ये बदला लेने योग्य हैं जिसके आधार पर इनकी स्वयं की भी जीवन आधार रेखा टिकी हुई है? दुनिआ में पाँच हजार वर्ष या सृस्टि के प्रारम्भ से आज तक कौन जिया है की किसी अमुक घर/ जाती/धर्म/देश/समुदाय विशेष में की की अमुक घर/ जाती/धर्म/देश/समुदाय वालों का घर ही उनका घर है तो 70-80 वर्ष के अधिकतम आयु का मानव अगर 5 हजार वर्ष या एक करोड़ वर्ष के बदले की बात करे तो उस समाजविज्ञानी या समाज सेवी या समाजवादी को महामूर्ख कहते है विवेक नहीं कहते हैं। जितनी शक्ति मेरे विरोध में लगी उतनी यदि दलित उध्धार में लगी होती तो सायद इस मानव समाज से शूद्रता अधिकांशतः मिट गयी होती तो जिसके भरोसे मानव जीवन चल रहा है उससे आप क्या बदला लेंगे पहले अपने को शूद्रता मुक्त बनाइये सब जातिवाद/धर्मवाद/क्षेत्रवाद/रंगभेद मिट जाएगा। मैं शूद्रता हर जाति/धर्म में पाता हूँ किसी में कम और किसी में ज्यादा  तो उसके लिए किसी जाती विशेष के नाम का प्रयोग न करता हूँ न करूंगा पर समाज में शूद्रता जिस दिन तक व्यापक पैमाने पर व्याप्त रहेगी जातिवाद/धर्मवाद और आतंकवाद से मुक्ति स्वयं भगवान भी नहीं दे सकते है कोई सत्ता या शासन क्या दे देगा तो उसमे कभी का एक मात्र उपाय है विश्व जन मानस और भारतीय जनमानस से शूद्रता का अधिकतम सफाया।

अंत में इतना तो जान लीजिए की 2001 में कोई भाई भतीजावाद नहीं हुआ था मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूँ सबके बारे में प्राप्त जानकारी अनुसार की पाण्डेयजी (पणजी:पंजिम) और प्रयागराज दोनों महत्वपूर्ण जगह मुझ मंगल का विकल्प आप के पास नहीं था जो आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य रहा हो तो दोनों जगह तो मानवता के अभीष्ट कार्य हेतु केवल इस 25 वर्षीय युवक का प्रयोग हुआ था दोनों स्थानों पर इससे ज्यादा आप कुछ नहीं कहा सकते है और न मेरी मेरिट पर प्रश्नचिन्ह उठा सकते है क्योंकि जो विकल्प रहा हो उसको मेरे सामने प्रस्तुत कीजिये मैं बताऊंगा की वह उस अवधि के दौरान तक आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य नहीं रह सका था (हनुमान:अम्बेडकर की तरह केवल जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी नहीं)। <<<<<बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))।

अंत में इतना तो जान लीजिए की 2001 में कोई भाई भतीजावाद नहीं हुआ था मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूँ सबके बारे में प्राप्त जानकारी अनुसार की पाण्डेयजी (पणजी:पंजिम) और प्रयागराज दोनों महत्वपूर्ण जगह मुझ मंगल का विकल्प आप के पास नहीं था जो आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य रहा हो तो दोनों जगह तो मानवता के अभीष्ट कार्य हेतु केवल इस 25 वर्षीय युवक का प्रयोग हुआ था दोनों स्थानों पर इससे ज्यादा आप कुछ नहीं कहा सकते है और न मेरी मेरिट पर प्रश्नचिन्ह उठा सकते है क्योंकि जो विकल्प रहा हो उसको मेरे सामने प्रस्तुत कीजिये मैं बताऊंगा की वह उस अवधि के दौरान तक आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य नहीं रह सका था (हनुमान:अम्बेडकर की तरह केवल जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी नहीं)। <<<<<बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))।

*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण। मेरा तो केवल इतना कहना था की:---मनु या आदम मतलब कश्यप ऋषी मतलब कम से कम सामाजिक जीवन में दशरथ और वशुदेव होता है। हिन्दू जिनको मनु (से मानव का आविर्भाव मानते हैं जिसमे मानवता हो न की राक्षसपना तो शूद्र कम से कम अमानवीय नहीं माना जा सकता मतलब उसमे सभ्य समाज से थोड़ा कम मानवता हो ऐसे को आंकते हैं) कहते हैं>>>>>>>>>>> तो प्रकृति आधारित धर्म वाले इस्लाम और ईसाइयत उनको आदम (से आदमी का आविर्भाव मानते हैं जिसमे इंसानियत हो न की दरिंदा तो शूद्र कम से कम दरिंदा नहीं माना जा सकता मतलब उसमे सभ्य समाज से थोड़ा कम की इंसानियत हो ऐसे को आंकते हैं) कहते हैं।>>>>>>तो जो नाम से वशुदेव पुत्र कृष्ण या दशरथ पुत्र राम हो या उनके समान नाम अर्थी हो उसको आप मनु स्मृति जलाते हुए या जलवाते हुए या जलाने और जलवाने का षड्यंत्र रचते और रचाते हुए पाएं तो क्या सोचेंगे और क्या कहेंगे?>>>>>>इस्लामियत और ईसाइयत के आदम:प्रथम आदमी और सनातन हिन्दू धर्म के मनु:प्रथम मानव जब कश्यप ऋषि ही थे मतलब दशरथ और वशुदेव ही थे तो मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किये हुए 5 प्रमुख तथ्य पूर्णतः सत्य हैं (इस्लाम राम के सामानांतर जरूर चलता पर राम का दुश्मन नहीं और ईसाइयत कृष्ण के सामानांतर जरूर चलता है पर वह कृष्ण का दुश्मन नहीं क्योंकि दोनों नहीं चाहते हैं की रामकृष्ण का अंत हो बल्कि वे इन्हे अपना आधार मानते हैं) १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है| 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।
मेरा तो केवल इतना कहना था की:---मनु या आदम मतलब कश्यप ऋषी मतलब कम से कम सामाजिक जीवन में दशरथ और वशुदेव होता है। हिन्दू जिनको मनु (से मानव का आविर्भाव मानते हैं जिसमे मानवता हो न की राक्षसपना तो शूद्र कम से कम अमानवीय नहीं माना जा सकता मतलब उसमे सभ्य समाज से थोड़ा कम मानवता हो ऐसे को आंकते हैं) कहते हैं>>>>>>>>>>> तो प्रकृति आधारित धर्म वाले इस्लाम और ईसाइयत उनको आदम (से आदमी का आविर्भाव मानते हैं जिसमे इंसानियत हो न की दरिंदा तो शूद्र कम से कम दरिंदा नहीं माना जा सकता मतलब उसमे सभ्य समाज से थोड़ा कम की इंसानियत हो ऐसे को आंकते हैं) कहते हैं।>>>>>>तो जो नाम से वशुदेव पुत्र कृष्ण या दशरथ पुत्र राम हो या उनके समान नाम अर्थी हो उसको आप मनु स्मृति जलाते हुए या जलवाते हुए या जलाने और जलवाने का षड्यंत्र रचते और रचाते हुए पाएं तो क्या सोचेंगे और क्या कहेंगे?>>>>>>इस्लामियत और ईसाइयत के आदम:प्रथम आदमी और सनातन हिन्दू धर्म के मनु:प्रथम मानव जब कश्यप ऋषि ही थे मतलब दशरथ और वशुदेव ही थे तो मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किये हुए 5 प्रमुख तथ्य पूर्णतः सत्य हैं (इस्लाम राम के सामानांतर जरूर चलता पर राम का दुश्मन नहीं और ईसाइयत कृष्ण के सामानांतर जरूर चलता है पर वह कृष्ण का दुश्मन नहीं क्योंकि दोनों नहीं चाहते हैं की रामकृष्ण का अंत हो बल्कि वे इन्हे अपना आधार मानते हैं)

१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|

२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है|

3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।

4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.

5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

आज से इस दुनिया को पूर्णतः स्पस्ट रूप से ज्ञात हो मंगलवार केवल और केवल बृहस्पति/गुरुवार/विष्णुवार/श्रीधरवार/श्रीकांतवार, रविवार/सूर्यवार और शनिवार/शिववार/महादेववार से पीछे हो सकता है समान परिस्थितियों में पर किसी भी हालत में समान परिस्थितियों में सोमवार/चंद्र(महादेव जिससे प्रेम करते है और शिखर पर रखते हैं)वार, बुधवार और शुक्रवार से नहीं।>>>>>>>अगर अधिकांश कष्यप के पुत्र वरुण के पुत्र बाल्मिकी के शिष्य भारद्वाज(आंगिरस पुत्र) के शिष्य गर्ग कूटनीतिक चाल विशेष में शामिल न हो केवल स्थान विशेष के गर्ग (प्रयागराज और कर्णपुर) तथा आंध्रा(धृतराष्ट्र) के लोग ही शामिल हो तो उनको मेरी सलाह है की मैं अर्जुन और अभिमन्यु नहीं हूँ और वे अपनी कुटिल नीति कहीं और प्रयोग करें इसी में उनकी भलाई है और मानवमात्र की भलाई है। तथाकथित सामान्यतः ज्ञात विश्वमहाशक्ति को तो देख लिया गया है। <<<<<बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))।

आज से इस दुनिया को पूर्णतः स्पस्ट रूप से ज्ञात हो मंगलवार केवल और केवल बृहस्पति/गुरुवार/विष्णुवार/श्रीधरवार/श्रीकांतवार, रविवार/सूर्यवार और शनिवार/शिववार/महादेववार से पीछे हो सकता है समान परिस्थितियों में पर किसी भी हालत में समान परिस्थितियों में सोमवार/चंद्र(महादेव जिससे प्रेम करते है और शिखर पर रखते हैं)वार, बुधवार और शुक्रवार से नहीं।>>>>>>>अगर अधिकांश कष्यप के पुत्र वरुण के पुत्र बाल्मिकी के शिष्य भारद्वाज(आंगिरस पुत्र) के शिष्य गर्ग कूटनीतिक चाल विशेष में शामिल न हो केवल स्थान विशेष के गर्ग (प्रयागराज और कर्णपुर) तथा आंध्रा(धृतराष्ट्र) के लोग ही शामिल हो तो उनको मेरी सलाह है की मैं अर्जुन और अभिमन्यु नहीं हूँ और वे अपनी कुटिल नीति कहीं और प्रयोग करें इसी में उनकी भलाई है और मानवमात्र की भलाई है। तथाकथित सामान्यतः ज्ञात विश्वमहाशक्ति को तो देख लिया गया है। <<<<<बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))।

Saturday, March 26, 2016

X-Ray स्पेक्ट्रा ही नहीं न्यूक्लियर मैगनेटिक स्पेक्ट्रा की तरह हर दिव्य दर्शन हुए थे की 1991 के बाद कैसी बौखलाहट में मुझसे ईर्ष्या, द्वेष, डरे, भयातुर लोग किस-किस प्रकार अज्ञानता वस से मेरी कागजी मेरिट से लेकर सजीव मेरिट इस दुनिया से मिटाने की असम्भव कोशिश किये तो जिन लोगों को मेरे केवल वैज्ञानिक बन जाने से ईर्ष्या थी वे लोग मुझे सहायक आचार्य/आचार्य बना दिए वह भी प्रयागराज जैसे विश्व्मानवता के केंद्र बिंदु पर 42 लोगों की सूची में गौरवान्वित छात्र सम्मान के साथ। तो आप लोगों का प्रयास कितना धनात्मक और कितना ऋणात्मक रहा आप लोगों की ही इक्षा शक्ति के लक्ष्य में अनुसार मतलब आप अपनी ऊर्जा समाप्त कर प्रयास भी किये और नकारात्मक परिणाम भी पाये तो अगर सकारात्मक जगह लगाते तो उसका परिणाम आप के लिए हितकर होता। तो जितना विरोध करोगे उतना ही पीछे जाओगे कम से कम अब भी समझ आ जाय आप लोगों को। व्यक्ति या समस्त मानवता हेतु परोपकारी भावना से किया हुआ कार्य कभी कभी हार नहीं देता है इतना मैं समझता हूँ और मेरे साथ वही हो रहा आप लोगों के लाख प्रयास करने से भी मेरे साथ धनात्मक शक्ति और विजय ही जुड़ रही है।

X-Ray स्पेक्ट्रा ही नहीं न्यूक्लियर मैगनेटिक स्पेक्ट्रा की तरह हर दिव्य दर्शन हुए थे की 1991 के बाद कैसी बौखलाहट में मुझसे ईर्ष्या, द्वेष, डरे, भयातुर लोग किस-किस प्रकार अज्ञानता वस से मेरी कागजी मेरिट से लेकर सजीव मेरिट इस दुनिया से मिटाने की असम्भव कोशिश किये तो जिन लोगों को मेरे केवल वैज्ञानिक बन जाने से ईर्ष्या थी वे लोग मुझे सहायक आचार्य/आचार्य बना दिए वह भी प्रयागराज जैसे विश्व्मानवता के केंद्र बिंदु पर 42 लोगों की सूची में गौरवान्वित छात्र सम्मान के साथ। तो आप लोगों का प्रयास कितना धनात्मक और कितना ऋणात्मक रहा आप लोगों की ही इक्षा शक्ति के लक्ष्य में अनुसार मतलब आप अपनी ऊर्जा समाप्त कर प्रयास भी किये और नकारात्मक परिणाम भी पाये तो अगर सकारात्मक जगह लगाते तो उसका परिणाम आप के लिए हितकर होता। तो जितना विरोध करोगे उतना ही पीछे जाओगे कम से कम अब भी समझ आ जाय आप लोगों को। व्यक्ति या समस्त मानवता हेतु परोपकारी भावना से किया हुआ कार्य कभी कभी हार नहीं देता है इतना मैं समझता हूँ और मेरे साथ वही हो रहा आप लोगों के लाख प्रयास करने से भी मेरे साथ धनात्मक शक्ति और विजय ही जुड़ रही है।
Proud Past Alumni List of 42 personalities of University of Allahabad-1 
Proud Past Alumni List of 42 personalities of University of Allahabad-2 

2001 से लेकर आज (2016) तक जिन हस्तियों के अल्पज्ञ समर्थकों को अपनी कुटिल नीति से विदेशी दुनिया के सर्थकों/अभिकर्ताओं ने मेरे परीक्षण में प्रयोग किया गया वे क्रमसः यह हैं: नारायणन, काशीराम, जॉर्ज, कलाम गुरुदेव जी, अटल जी, और अब अंतिम बार जोशी जी। और इनमे जोशी जी के अलावा अन्य सबका अंतिम जीवन कैसा रहा इसपर ध्यान देने की जरूरत है।

2001 से लेकर आज (2016) तक जिन हस्तियों के अल्पज्ञ समर्थकों को अपनी कुटिल नीति से विदेशी दुनिया के सर्थकों/अभिकर्ताओं ने मेरे परीक्षण में प्रयोग किया गया वे क्रमसः यह हैं: नारायणन, काशीराम, जॉर्ज, कलाम गुरुदेव जी, अटल जी, और अब अंतिम बार जोशी जी। और इनमे जोशी जी के अलावा अन्य सबका अंतिम जीवन कैसा रहा इसपर ध्यान देने की जरूरत है।

जिन लोगों ने मेरे ऊपर रंगभेदी, परिवारभेदी, जातिभेदी, धर्मभेदी, भूखण्ड भेदी राजनीती का आरोप लगाई उनसे घृणित तरीके से रंगभेदी, परिवार भेदी, जातिभेदी, धर्मभेदी, भूखण्ड भेदी राजनीती कोई नहीं किया यहां तक की रावण और भस्मासुर भी तो उनका क्या ख्याल है अपने सम्बन्ध में? इस दुनिया से जातिवाद और आतंकवाद मिट जाय इसका मैं समर्थन करता हूँ पर उससे पहले शूद्रवाद, संख्याबलवाद, और चारित्रिक और नैतिक पतन करवा दूसरों को अपमानित करने और करवाने की कुटिल राजनीती पहले स्वयं मिटा दी जाय जो स्वयं में एक जातिवाद है और सामाजिक पतन का कारक अपने में ही है, अन्यथा आर्यव्रत जीवन जीने के लिए हर तरह का त्याग, बलिदान, तपश्या/कर्म करने वाला भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अपनी हर एक गणित करता ही रहेगा अपना जीवन जीने के लिए। जब दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय ठीकेदारी द्वारा आर्यव्रत जीवन समाप्ति को होगा तो आर्यव्रत जीवन की परिकल्पना को बनाये रखने वाला जो आर्यजीवन ही जी सकता है वह ऐसा कोई चुप कैसे बैठेगा?>>>>>>>>>प्रयागराज-कर्णपुर से लेकर दुनिया के कोने कोने में फैले गर्ग गोत्रियों मेरे लिए कोई चक्रव्यूह काम नहीं करता है और न लाक्षागृह| आप के चक्रव्यूह और लाक्षागृह में मैं इसलिए रह लेता हूँ क्योंकि यह दुनिया एक रंगमंच है और उस दुनियाँ का सबसे बड़ा सम्बल जो मानव जगत को चलाए मान बनाए रखना चाहता है अगर वही उस लाक्षागृह और चक्रव्यूह के अंदर अपने को नहीं दिखाएगा तो मानवता इस मायामयी दुनिया को क्यों बनाए रखना चाहेगी। दुर्वाशा=कृष्णात्रेय की प्रथम कर्म भूमि आजमगढ़=आर्यमगढ (द्वितीय कर्म भूमि प्रयागराज जिसमे भारद्वाज के सहकर्मी रहे है) की संतान जो जौनपुर=जमदग्निपुर में जन्म लिया हो उस पर केरल, कोंकण, गोवा, मराठवाड़ा (महारास्ट्र), विदर्भ, कच्छ (गुजरात) और उत्तराँचल=उत्तराखंड तथा प्रयागराज-कर्णपुर का चक्रव्यूह और लाक्षागृह वैसे भी काम नहीं करता है तो उसपर चन्द्रवंशीय आंध्रा (धृतराष्ट्र) का क्या असर होगा? लिजिए मैं बता देता हूँ की कैसे आप का लाक्षागृह और चक्रव्यूह तोड़ना मेरी इक्षा पर था पर गुरु और पितृ मर्यादा में सब कुछ 14 वर्ष चला और उसे ही आप और आगे ले जाना चाह रहे हैं तो अब वह संभव नहीं क्योंकि अब में अवध क्षेत्र का समबन्धी बन चुका हूँ। प्रयागराज में स्थित प्रयागराज विश्विद्यालय में केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्ययन केंद्र पर जब मैं मार्च 2001 में प्रवेश लिया था तो मेरी दिव्यदृस्ति की प्रथम झलक में प्रतापगढ़ के श्रीवास्तव गुरूजी, बिहार/बंगाल/ओडीशा के दास गुरूजी निःसन्देह नाना और मामा लगे; और प्रतापगढ़ के द्विवेदी जी पर परमात्मा मामा और श्रीधर मामा में से किसी एक के होने का संदेह था पर जब 2004 में उनको एस डी सर नाम दिया गया लोगों द्वारा तो मैं समझने लगा की यह एस डी एम सर की ही तर्ज है पर इनका ज्ञानदर्शन और तेजी श्रीधर मामा से ज्यादा मिलता था (माध्यम दिमागी तेजी या मंद दिमागी तेजी वाले परमात्मा मामा से कम मिलता था/है) पर धैर्यशीलता और विनम्रता की कमी रही इनके एस डी एम सर होने को पूर्णता देने में वैयक्तिक रूप से और शायद यही बात है की बड़े भैया विष्णु प्रताप इस समय "राधे-राधे" कहने को मजबूर हुए हैं आज के दिनों में नहीं तो "जानकी जान की न छोड़ू जानकी " कहते होते आज। और आगे चलूँ तो मेरे कश्यप गोत्रीय बड़े भैया और गुरु जी से मेरा परिचय उनके छोटे भाई के रूप में मेरे परमपिता परमेश्वर मेरे ताऊ जी और मेरे परम गुरु परमपिता परमेश्वर में मामा जी श्रीश्रीधर ही करवाए थे 2003 में जिनको मैं एक जीजा जी के रूप में जनता और पहचानता था। वर्तमान में इस केंद्र में मौजूद लोगों में मैं तीसरा व्यक्ति था जो इस केंद्र पर आया था मतलब गुरूजी और बड़े भैया के बाद द्विवेदी जी और उनके बाद मैं और इसी क्रम में हम इस केंद्र में स्थायी शिक्षक भी नियुक्त हुए। इन चारों के बाद आजमगढ़=आर्यमगढ के बड़े भाई पंकज श्रीवास्तव जी का नंबर आता है जो यहाँ मुझे मार्च, 2001 में मिले थे तो जब श्रीवास्तव गुरूजी का परिचय दे दिया तो फिर गृह जनपद के इस बड़े भैया का परिचय देना जरूरी नहीं उनको बड़ा भाई मान ही लीजिए। आप लोगों की रंगभेदी, परिवार भेदी, जातिभेदी, धर्मभेदी, भूखण्ड भेदी राजनीती यही समाप्त हो जाती है की इन सबकुछ के बावजूद गलाकाट प्रतियोगिता का समय होने के बावजूद दूसरों के लिए दूसरों के ही सहारे हो सकने वाले कार्य को करने हेतु मैं रुका भी रहा और वह कार्य सैद्धांतिक रूप से 2007 में पूर्ण भी हुआ उसके बावजूद आप लोग यही दिखते रहे की हम दूध के धोए है और अभी कार्य नहीं पूर्ण हुआ अरे भाई मेरे 16 मई, 2006 के निवेदन को स्वीकार कर ही 69 स्थाई पद स्वीकृत हुए थे वर्ष 2006 के अंतिम दिनों तक जाते जाते और वह निवेदन इसी केंद्र को विशेष रूप से स्थाई पद स्वीकृत कर इस केंद्र को प्रयागराज विश्विद्यालय का स्थाई केंद्र बनाने हेतु ही किया गया था। मेरा मानना है की रावणकुल राम कुल में ही समाहित हुआ था तो केदारेश्वर में मेघनाद को समाहित अगर किसी को मानना हो तो माने अन्यथा मेघनाद के लिए प्रयास करे केदारेश्वर तो स्थाई हो चुके हैं और मेरा कार्य भी पूर्ण हो चुका है। वैसे मेघनाद के सम्मान में ही सही केवल साहा नाम से ही कोई संस्थान/केंद्र उनके गृह प्रदेश पश्चिम बंगाल में खोला जा सका है न की मेघनाद साहा नाम से यह संस्थान/केंद् बना सका है जिसे प्रयागराज के लोगों की जानकारी में मैं ड़ाल देता हूँ। फिर भी जिस धर्म भीरु या अधर्मी को मेघनाद के लिए संघर्ष करना हो करे मेरा कार्य पूर्ण हुआ है मेरे दृस्टिगत तथ्यों और वैचारिक नियमावली के अनुसार तो मेघनाद के लिए अब वे संघर्ष अपना जारी रखे खुले आम मेरी तरह जैसा की मैेन केदारेश्वर के लिए किया था जिससे की हानि-लाभ दोनों उनके खाते में दर्ज हो न की मेरे बहाने छुप-छुप के वार करे वह।>>>>>>> जिन लोगों ने मेरे ऊपर रंगभेदी, परिवारभेदी, जातिभेदी, धर्मभेदी, भूखण्ड भेदी राजनीती का आरोप लगाई उनसे घृणित तरीके से रंगभेदी, परिवार भेदी, जातिभेदी, धर्मभेदी, भूखण्ड भेदी राजनीती कोई नहीं किया यहां तक की रावण और भस्मासुर भी तो उनका क्या ख्याल है अपने सम्बन्ध में? इस दुनिया से जातिवाद और आतंकवाद मिट जाय इसका मैं समर्थन करता हूँ पर उससे पहले शूद्रवाद, संख्याबलवाद, और चारित्रिक और नैतिक पतन करवा दूसरों को अपमानित करने और करवाने की कुटिल राजनीती पहले स्वयं मिटा दी जाय जो स्वयं में एक जातिवाद है और सामाजिक पतन का कारक अपने में ही है, अन्यथा आर्यव्रत जीवन जीने के लिए हर तरह का त्याग, बलिदान, तपश्या/कर्म करने वाला भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अपनी हर एक गणित करता ही रहेगा अपना जीवन जीने के लिए। जब दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय ठीकेदारी द्वारा आर्यव्रत जीवन समाप्ति को होगा तो आर्यव्रत जीवन की परिकल्पना को बनाये रखने वाला जो आर्यजीवन ही जी सकता है वह ऐसा कोई चुप कैसे बैठेगा?

जिन लोगों ने मेरे ऊपर रंगभेदी, परिवारभेदी, जातिभेदी, धर्मभेदी, भूखण्ड भेदी राजनीती का आरोप लगाई उनसे घृणित तरीके से रंगभेदी, परिवार भेदी, जातिभेदी, धर्मभेदी, भूखण्ड भेदी राजनीती कोई नहीं किया यहां तक की रावण और भस्मासुर भी तो उनका क्या ख्याल है अपने सम्बन्ध में? इस दुनिया से जातिवाद और आतंकवाद मिट जाय इसका मैं समर्थन करता हूँ पर उससे पहले शूद्रवाद, संख्याबलवाद, और चारित्रिक और नैतिक पतन करवा दूसरों को अपमानित करने और करवाने की कुटिल राजनीती पहले स्वयं मिटा दी जाय जो स्वयं में एक जातिवाद है और सामाजिक पतन का कारक अपने में ही है, अन्यथा आर्यव्रत जीवन जीने के लिए हर तरह का त्याग, बलिदान, तपश्या/कर्म करने वाला भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अपनी हर एक गणित करता ही रहेगा अपना जीवन जीने के लिए। जब दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय ठीकेदारी द्वारा आर्यव्रत जीवन समाप्ति को होगा तो आर्यव्रत जीवन की परिकल्पना को बनाये रखने वाला जो आर्यजीवन ही जी सकता है वह ऐसा कोई चुप कैसे बैठेगा?>>>>>>>>>प्रयागराज-कर्णपुर से लेकर दुनिया के कोने कोने में फैले गर्ग गोत्रियों मेरे लिए कोई चक्रव्यूह काम नहीं करता है और न लाक्षागृह| आप के चक्रव्यूह और लाक्षागृह में मैं इसलिए रह लेता हूँ क्योंकि यह दुनिया एक रंगमंच है और उस दुनियाँ का सबसे बड़ा सम्बल जो मानव जगत को चलाए मान बनाए रखना चाहता है अगर वही उस लाक्षागृह और चक्रव्यूह के अंदर अपने को नहीं दिखाएगा तो मानवता इस मायामयी दुनिया को क्यों बनाए रखना चाहेगी। दुर्वाशा=कृष्णात्रेय की प्रथम कर्म भूमि आजमगढ़=आर्यमगढ (द्वितीय कर्म भूमि प्रयागराज जिसमे भारद्वाज के सहकर्मी रहे है) की संतान जो जौनपुर=जमदग्निपुर में जन्म लिया हो उस पर केरल, कोंकण, गोवा, मराठवाड़ा (महारास्ट्र), विदर्भ, कच्छ (गुजरात) और उत्तराँचल=उत्तराखंड तथा प्रयागराज-कर्णपुर का चक्रव्यूह और लाक्षागृह वैसे भी काम नहीं करता है तो उसपर चन्द्रवंशीय आंध्रा (धृतराष्ट्र) का क्या असर होगा? लिजिए मैं बता देता हूँ की कैसे आप का लाक्षागृह और चक्रव्यूह तोड़ना मेरी इक्षा पर था पर गुरु और पितृ मर्यादा में सब कुछ 14 वर्ष चला और उसे ही आप और आगे ले जाना चाह रहे हैं तो अब वह संभव नहीं क्योंकि अब में अवध क्षेत्र का समबन्धी बन चुका हूँ। प्रयागराज में स्थित प्रयागराज विश्विद्यालय में केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवं महासागर अध्ययन केंद्र पर जब मैं मार्च 2001 में प्रवेश लिया था तो मेरी दिव्यदृस्ति की प्रथम झलक में प्रतापगढ़ के श्रीवास्तव गुरूजी, बिहार/बंगाल/ओडीशा के दास गुरूजी निःसन्देह नाना और मामा लगे; और प्रतापगढ़ के द्विवेदी जी पर परमात्मा मामा और श्रीधर मामा में से किसी एक के होने का संदेह था पर जब 2004 में उनको एस डी सर नाम दिया गया लोगों द्वारा तो मैं समझने लगा की यह एस डी एम सर की ही तर्ज है पर इनका ज्ञानदर्शन और तेजी श्रीधर मामा से ज्यादा मिलता था (माध्यम दिमागी तेजी या मंद दिमागी तेजी वाले परमात्मा मामा से कम मिलता था/है) पर धैर्यशीलता और विनम्रता की कमी रही इनके एस डी एम सर होने को पूर्णता देने में वैयक्तिक रूप से और शायद यही बात है की बड़े भैया विष्णु प्रताप इस समय "राधे-राधे" कहने को मजबूर हुए हैं आज के दिनों में नहीं तो "जानकी जान की न छोड़ू जानकी " कहते होते आज। और आगे चलूँ तो मेरे कश्यप गोत्रीय बड़े भैया और गुरु जी से मेरा परिचय उनके छोटे भाई के रूप में मेरे परमपिता परमेश्वर मेरे ताऊ जी और मेरे परम गुरु परमपिता परमेश्वर में मामा जी श्रीश्रीधर ही करवाए थे 2003 में जिनको मैं एक जीजा जी के रूप में जनता और पहचानता था। वर्तमान में इस केंद्र में मौजूद लोगों में मैं तीसरा व्यक्ति था जो इस केंद्र पर आया था मतलब गुरूजी और बड़े भैया के बाद द्विवेदी जी और उनके बाद मैं और इसी क्रम में हम इस केंद्र में स्थायी शिक्षक भी नियुक्त हुए। इन चारों के बाद आजमगढ़=आर्यमगढ के बड़े भाई पंकज श्रीवास्तव जी का नंबर आता है जो यहाँ मुझे मार्च, 2001 में मिले थे तो जब श्रीवास्तव गुरूजी का परिचय दे दिया तो फिर गृह जनपद के इस बड़े भैया का परिचय देना जरूरी नहीं उनको बड़ा भाई मान ही लीजिए। आप लोगों की रंगभेदी, परिवार भेदी, जातिभेदी, धर्मभेदी, भूखण्ड भेदी राजनीती यही समाप्त हो जाती है की इन सबकुछ के बावजूद गलाकाट प्रतियोगिता का समय होने के बावजूद दूसरों के लिए दूसरों के ही सहारे हो सकने वाले कार्य को करने हेतु मैं रुका भी रहा और वह कार्य सैद्धांतिक रूप से 2007 में पूर्ण भी हुआ उसके बावजूद आप लोग यही दिखते रहे की हम दूध के धोए है और अभी कार्य नहीं पूर्ण हुआ अरे भाई मेरे 16 मई, 2006 के निवेदन को स्वीकार कर ही 69 स्थाई पद स्वीकृत हुए थे वर्ष 2006 के अंतिम दिनों तक जाते जाते और वह निवेदन इसी केंद्र को विशेष रूप से स्थाई पद स्वीकृत कर इस केंद्र को प्रयागराज विश्विद्यालय का स्थाई केंद्र बनाने हेतु ही किया गया था। मेरा मानना है की रावणकुल राम कुल में ही समाहित हुआ था तो केदारेश्वर में मेघनाद को समाहित अगर किसी को मानना हो तो माने अन्यथा मेघनाद के लिए प्रयास करे केदारेश्वर तो स्थाई हो चुके हैं और मेरा कार्य भी पूर्ण हो चुका है। वैसे मेघनाद के सम्मान में ही सही केवल साहा नाम से ही कोई संस्थान/केंद्र उनके गृह प्रदेश पश्चिम बंगाल में खोला जा सका है न की मेघनाद साहा नाम से यह संस्थान/केंद् बना सका है जिसे प्रयागराज के लोगों की जानकारी में मैं ड़ाल देता हूँ। फिर भी जिस धर्म भीरु या अधर्मी को मेघनाद के लिए संघर्ष करना हो करे मेरा कार्य पूर्ण हुआ है मेरे दृस्टिगत तथ्यों और वैचारिक नियमावली के अनुसार तो मेघनाद के लिए अब वे संघर्ष अपना जारी रखे खुले आम मेरी तरह जैसा की मैेन केदारेश्वर के लिए किया था जिससे की हानि-लाभ दोनों उनके खाते में दर्ज हो न की मेरे बहाने छुप-छुप के वार करे वह।>>>>>>> जिन लोगों ने मेरे ऊपर रंगभेदी, परिवारभेदी, जातिभेदी, धर्मभेदी, भूखण्ड भेदी राजनीती का आरोप लगाई उनसे घृणित तरीके से रंगभेदी, परिवार भेदी, जातिभेदी, धर्मभेदी, भूखण्ड भेदी राजनीती कोई नहीं किया यहां तक की रावण और भस्मासुर भी तो उनका क्या ख्याल है अपने सम्बन्ध में? इस दुनिया से जातिवाद और आतंकवाद मिट जाय इसका मैं समर्थन करता हूँ पर उससे पहले शूद्रवाद, संख्याबलवाद, और चारित्रिक और नैतिक पतन करवा दूसरों को अपमानित करने और करवाने की कुटिल राजनीती पहले स्वयं मिटा दी जाय जो स्वयं में एक जातिवाद है और सामाजिक पतन का कारक अपने में ही है, अन्यथा आर्यव्रत जीवन जीने के लिए हर तरह का त्याग, बलिदान, तपश्या/कर्म करने वाला भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अपनी हर एक गणित करता ही रहेगा अपना जीवन जीने के लिए। जब दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय ठीकेदारी द्वारा आर्यव्रत जीवन समाप्ति को होगा तो आर्यव्रत जीवन की परिकल्पना को बनाये रखने वाला जो आर्यजीवन ही जी सकता है वह ऐसा कोई चुप कैसे बैठेगा?

मेरे मामा जी लोग व्याशी (वशिष्ठ ऋषी के वंसज और विद्वता में सर्वश्रेष्ठ ऋषि, व्याश) मिश्र गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण और मैं सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (विलवा=बेलपत्र मतलब शिव और शिवा:सती:पार्वती:उमा:गिरिजा:गौरी:अपर्णा पर अर्पणेय/अर्पण्य, भोज्य/आहार और अगर शेष बचा/अक्षुण्य रहा तो स्वयं महाशिव/शिव बना) पांडेय तो व्याशी गौतम गोत्रीय मिश्र ब्राह्मण में व्याशी (वशिष्ठ ऋषी के वंसज और विद्वता में सर्वश्रेष्ठ ऋषि, व्याश) शब्द और उसका आसय मेरे मामा जी लोगों को प्रतिभा में मुझसे श्रेष्ठ और पूज्य बना देता है जैसा की कश्यप गोत्रीय के लिए वशिष्ठ या वशिष्ठ का वंसज शब्द ही प्रतिभा में और महानता में किसी को भी कश्यप का पूज्य बना देता है। तो मेरे मामा लोग प्रतिभा में और गुणों में हमसे उच्च हुए। तो जैसा की जिसकी माँ उच्च कुल की होती हैं वह वर्मा कहा जाता है तो उस तर्ज पर हम भी वर्मा ही हुए ब्राह्मणों में ही सही (जबकि ब्राह्मणो में शर्मा को उच्च कहा जाता है जिसका अर्थ होता है मूर्धन्य विद्वान और ब्राह्मण और उसके कुल के लोगों का नाम वैवाहिक कार्य में शर्मा शब्द के साथ ही लिये जाता है)। जिन परिस्थितयों का सामना मेरे श्रीधर मामा ने किया है आज तक और उस रामानन्द कुल की मूल जमीन पर रहकर वह मेरे लिए भी अति गर्व का विषय है जिस हेतु उनको मैं अपना परमगुरु परमपिता परमेश्वर मानता हूँ और इसीलिए मैं उसी गाँव के उसी पुण्य भूमि पर वासिंदों की संतान बनने की एक मात्र ललक पाले हूँ और वह मेरा सर्वश्रेष्ठ जन्म होगा।

मेरे मामा जी लोग व्याशी (वशिष्ठ ऋषी के वंसज और विद्वता में सर्वश्रेष्ठ ऋषि, व्याश) मिश्र गौतम गोत्रीय सनातन ब्राह्मण और मैं सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (विलवा=बेलपत्र मतलब शिव और शिवा:सती:पार्वती:उमा:गिरिजा:गौरी:अपर्णा पर अर्पणेय/अर्पण्य, भोज्य/आहार और अगर शेष बचा/अक्षुण्य रहा तो स्वयं महाशिव/शिव बना) पांडेय तो व्याशी गौतम गोत्रीय मिश्र ब्राह्मण में व्याशी (वशिष्ठ ऋषी के वंसज और विद्वता में सर्वश्रेष्ठ ऋषि, व्याश) शब्द और उसका आसय मेरे मामा जी लोगों को प्रतिभा में मुझसे श्रेष्ठ और पूज्य बना देता है जैसा की कश्यप गोत्रीय के लिए वशिष्ठ या वशिष्ठ का वंसज शब्द ही प्रतिभा में और महानता में किसी को भी कश्यप का पूज्य बना देता है। तो मेरे मामा लोग प्रतिभा में और गुणों में हमसे उच्च हुए। तो जैसा की जिसकी माँ उच्च कुल की होती हैं वह वर्मा कहा जाता है तो उस तर्ज पर हम भी वर्मा ही हुए ब्राह्मणों में ही सही (जबकि ब्राह्मणो में शर्मा को उच्च कहा जाता है जिसका अर्थ होता है मूर्धन्य विद्वान और ब्राह्मण और उसके कुल के लोगों का नाम वैवाहिक कार्य में शर्मा शब्द के साथ ही लिये जाता है)। जिन परिस्थितयों का सामना मेरे श्रीधर मामा ने किया है आज तक और उस रामानन्द कुल की मूल जमीन पर रहकर वह मेरे लिए भी अति गर्व का विषय है जिस हेतु उनको मैं अपना परमगुरु परमपिता परमेश्वर मानता हूँ और इसीलिए मैं उसी गाँव के उसी पुण्य भूमि पर वासिंदों की संतान बनने की एक मात्र ललक पाले हूँ और वह मेरा सर्वश्रेष्ठ जन्म होगा।

हम रामापुर-223225 समस्त कुलवाशी देवकाली (महासरस्वती+महालक्ष्मी+महागौरी:पार्वती) स्त्रीशक्ति के पूजक और ननिहाल कुल वाशी महादेव (गाँव: बिशुनपुर-223103 का नाम विष्णु को समर्पित पर पूरे गाँव के अभीष्ट देव गौरीशंकर महादेव शिव शंकर) के पूजक तो इस दुनिआ में कौन था जो प्रत्यक्ष रूप में मुझे क्षति पहुंचा सकता था ? परोक्ष रूप से मेरी कागजी प्रतिभा को भले कम किया हो ईर्ष्यावश, भयवश और द्वेषवस या ऐसा अभी भी जारी हो या आगे भी कर सकता हो? तो 2001 में मुझे मानवता के अभीष्ट कार्यहेतु समर्पित कर दिए जाने के बाद उसी समय से पक्ष और विपक्ष को हथियार उसी तरह ड़ालकर अभीष्ट कार्य की पूर्ती हेतु मेरा सहयोग करना चाहिए था जिस तरह आज वे दोनों निःहस्तप्रभ हो मुझे देख रहे हैं और मुझसे ही अस्तित्व पाये लव-कुश को पाल रहे हैं। मतलब दोनों पक्ष को मेरी जरूरत है या कहिये दोनों मुझी से ही अस्तित्व में हैं। लेकिन मुझे भी दोनों का ही अस्तित्व प्रियकर लग रहा है। अतः दोनों चिरंजीवी हों पर पुनः ऐसी विश्वमहाविनाश का कुचक्र मत पालिएगा की मुझे ही दाँव पर लगा दिया जाय चौदह वर्ष के लिए (2001 से -2015 तक )। <<<<<बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))।

हम रामापुर-223225 समस्त कुलवाशी देवकाली (महासरस्वती+महालक्ष्मी+महागौरी:पार्वती) स्त्रीशक्ति के पूजक और ननिहाल कुल वाशी महादेव (गाँव: बिशुनपुर-223103 का नाम विष्णु को समर्पित पर पूरे गाँव के अभीष्ट देव गौरीशंकर महादेव शिव शंकर) के पूजक तो इस दुनिआ में कौन था जो प्रत्यक्ष रूप में मुझे क्षति पहुंचा सकता था ? परोक्ष रूप से मेरी कागजी प्रतिभा को भले कम किया हो ईर्ष्यावश, भयवश और द्वेषवस या ऐसा अभी भी जारी हो या आगे भी कर सकता हो? तो 2001 में मुझे मानवता के अभीष्ट कार्यहेतु समर्पित कर दिए जाने के बाद उसी समय से पक्ष और विपक्ष को हथियार उसी तरह ड़ालकर अभीष्ट कार्य की पूर्ती हेतु मेरा सहयोग करना चाहिए था जिस तरह आज वे दोनों निःहस्तप्रभ हो मुझे देख रहे हैं और मुझसे ही अस्तित्व पाये लव-कुश को पाल रहे हैं। मतलब दोनों पक्ष को मेरी जरूरत है या कहिये दोनों मुझी से ही अस्तित्व में हैं। लेकिन मुझे भी दोनों का ही अस्तित्व प्रियकर लग रहा है। अतः दोनों चिरंजीवी हों पर पुनः ऐसी विश्वमहाविनाश का कुचक्र मत पालिएगा की मुझे ही दाँव पर लगा दिया जाय चौदह वर्ष के लिए (2001 से -2015 तक )। <<<<<बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))। 
Vivek Kumar Pandey
Vivek Kumar Pandey
Vivek Kumar Pandey
K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies
KBCAOS
KBCAOS
K._Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies (KBCAOS)
KBCAOS
Bishunpur-223103
Ramapur-223225

Monday, March 21, 2016

आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति ॥ (As all the water fallen from the skies goes to the sea, similarly salutations to any God finally reach Keshava means one who is endowed with divine powers of Brahma, Vishnu and Siva menas Krishna means Ram:जिस प्रकार से आकाश से गिरने वाला पानी समुद्र में ही जाता है उसी तरह किशी भी देवता को किया हुआ वंदन/नमन/अभिवादन केशव मतलब वह जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनो की पूर्ण शक्तियों से सम्पन्न हो उसको मतलब कृष्ण मतलब राम को ही जाता है)

आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति ॥ (As all the water fallen from the skies goes to the sea, similarly salutations to any God finally reach Keshava means one who is endowed with divine powers of Brahma, Vishnu and Siva menas Krishna means Ram:जिस प्रकार से आकाश से गिरने वाला पानी समुद्र में ही जाता है उसी तरह किशी भी देवता को किया हुआ वंदन/नमन/अभिवादन केशव मतलब वह जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनो की पूर्ण शक्तियों से सम्पन्न हो उसको मतलब कृष्ण मतलब राम को ही जाता है)

Saturday, March 19, 2016

सज्जनस्य हृदयं नवनीतं यद्वदन्ति कवयस्तदलीकम् । अन्यदेहविलसत्परितापात् सज्जनो द्रवति, नो नवनीतम् ॥ संत ह्रदय नवनीत समाना, कहई कविंह पर कहई न जाना। स्व परिताप द्रवहिं नवनीते, पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ (Poets say that the heart of a good man is like butter, but that is not correct. The heat (frustration/sorrow/ etc.) residing in another body does not melt butter, but it does melt the good man.)

सज्जनस्य हृदयं नवनीतं यद्वदन्ति कवयस्तदलीकम् । अन्यदेहविलसत्परितापात् सज्जनो द्रवति, नो नवनीतम् ॥
संत ह्रदय नवनीत समाना, कहई कविंह पर कहई न जाना। 
स्व परिताप द्रवहिं नवनीते, पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ 
(Poets say that the heart of a good man is like butter, but that is not correct. The heat (frustration/sorrow/ etc.) residing in another body does not melt butter, but it does melt the good man.)

मेरे बेटे, बेटी, रक्तगत/आनुवंशिक सम्बन्धियों का जीवन गर्त में जाने वाला है ऐसी आहट या ऐसी पूर्व निर्धारित लक्षण के आधार पर चिंता तो पशु समाज को भी होती है मतलब अपने बेटे बेटियों और रक्तगत/आनुवंशिक सम्बन्धियों की चिंता तो जरूर होती है और करनी चाहिए पर बंधु-बांधव, सखी-सखा और मानव समाज/संस्कृति/संस्कार गर्त में जाने वाला है इसकी पूर्व सूचना या पूर्व आहट या गर्त में चले जाने पर भी उससे बाहर लाने की चिंता तो केवल संत समाज को ही होती है और जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को गर्त में जाने से बचाये और उसे नित नूतन जिंदगी दे उस परम संत को परमेश्वर/ईस्वर/परमब्रह्म/ब्रह्म/ईसनारायण//गॉड/अल्लाह/परमात्मा/सच्चिदानंदघन, भगवान विष्णु (श्रीधर) का परमब्रह्म स्वरूप कहते है। जोशी(ब्रह्मा) जी के मायामयी संसार की अभीष्ट कार्यपूर्ती में किशी प्रकार की बाधा न पड़े इस हेतु शिशुपाल की तरह हजारों बार सहनशीलता की सीमाएं लांघने के बावजूद किशी सहज मानव स्वरूप व्यवहार करने वाले इंसान का कोई प्रतिकार मै नहीं किया जिसके बारे में मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, श्रीधर (विष्णु) ने कहा था की कुछ भी हो जाय उसका प्रतिकार मत करना, कभी नहीं करना है। तो क्या है परमात्मा=श्रीधर(विष्णु) सम्बन्ध उस सहज मानव से तो इसे स्वयं बिशुनपुर-223103 वाले स्वयं जानते होंगे मुझे नहीं पता और पता भी है तो मै बता नहीं सकता। तो यह बता हूँ की जोशी(ब्रह्म) जी के कार्य पूर्ती हेतु इसी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण गाँव बिशुनपुर-223103 का तीन बार दौड़ा कर इसे श्रीधर(विष्णु) का आशीर्वाद लिया गया था मेरे परमपिता परमेश्वर प्रेमचंद (शिव) द्वारा। तो ऐसा कौन सा व्यक्तिगत प्रशासनिक, वैज्ञानिक, राजनैतिक या अन्य भौतिक पद प्रशासन का काम था की बिशुनपुर जाना अनिवार्य था अपने से पद में छोटे और उम्र में भी छोटे रामानंद कुल ((श्रीधर(विष्णु)) का आशीर्वाद रामापुर-223225 के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (शिव और शिवा:पारवती:सती:उमा:गौरी:गिरिजा:अपर्णा का आहार/भोज्य/अर्पनेया/अक्षुण:साबित रहा तो शिव स्वयं हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण सारंगधर(चंद्रशेखर)/---/देवव्रत(गंगापुत्र)/---/गजाधर(विनायक:गणेश) कुल के प्रेमचंद(शिव) को लेना अनिवार्य हो गया था ? तो निश्चित रूप से यह मानवता का कार्य था और यह की हमेशा की तरह विष्णु को सक्रीय जिम्मेदारी यहाँ महामानवता यज्ञ पूर्ती के कार्य का नहीं दिया गया था तो वे स्थायित्व अवस्था में परोक्ष शक्तिदाता/आशीर्वाद दाता थे जैसा सामान्यतः शिव स्थायित्व भूमिका में विष्णु अवतार के सहयोग हेतु रहते हैं पर यहां कार्यरत विष्णु (श्रीधर) नहीं शिव (प्रेमचंद) थे। तो यह कहा जाय की शिव ने त्रिमूर्ति का सम्मिलित स्वरुप धारण किया था तो इसमे अतिसयोक्ति कुछ क्यों नजर आती है किशी को और अगर आती है तो स्वयं बिशनपुर-223103 वालों से ही क्यों न पूंछ लिया जाय? वैसे त्रिमूर्ति का सम्मिलित स्वरुप (परमब्रह=ब्रह्म=ब्रह्मा+विष्णु+महेश) तो तीनो शक्तियों की पूर्ण समान सहभागिता निश्चित करता है मतलब रामानंद कुल वालों से ही पूंछ लिया जाय की किसकी सक्रीय भागीदारी रही और कौन आशीर्वाद रूपी शक्तिदाता रहा है? इतना तो जरूर है की सब कुछ समाप्ति के बाद ब्रह्मा और विष्णु का अधिकार सूत समेत (मानवकल्याण और मानवसंरक्षण और मानवसृजन के साथ) उनको सहर्ष वापस किया हूँ जो संसार के सामने है सशरीर परमब्रह्म विष्णुकांत और कृष्णकांत स्वरुप में और इसमे उनको कोई संदेह नहीं होना चाहिए और न किशी और को भी संदेह होना चाहिए की कि मै ब्रह्मा और विष्णु का अधिकार लिया हूँ। अगर अधिकार लिया गया था तो मानवता हेतु अभीष्ट लक्ष्य पूर्ती हेतु जो उनकी भी नैतिक जिम्मेदारी थी, है और आगे भी रहेगी और अभीष्ट लक्ष्य पूर्ती काल तक के लिए ही व्यवहारिक दायित्व निर्वहन हेतु ही वह सब लिया गया था।

मेरे बेटे, बेटी, रक्तगत/आनुवंशिक सम्बन्धियों का जीवन गर्त में जाने वाला है ऐसी आहट या ऐसी पूर्व निर्धारित लक्षण के आधार पर चिंता तो पशु समाज को भी होती है मतलब अपने बेटे बेटियों और रक्तगत/आनुवंशिक सम्बन्धियों की चिंता तो जरूर होती है और करनी चाहिए पर बंधु-बांधव, सखी-सखा और मानव समाज/संस्कृति/संस्कार गर्त में जाने वाला है इसकी पूर्व सूचना या पूर्व आहट या गर्त में चले जाने पर भी उससे बाहर लाने की चिंता तो केवल संत समाज को ही होती है और जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को गर्त में जाने से बचाये और उसे नित नूतन जिंदगी दे उस परम संत को परमेश्वर/ईस्वर/परमब्रह्म/ब्रह्म/ईसनारायण//गॉड/अल्लाह/परमात्मा/सच्चिदानंदघन, भगवान विष्णु (श्रीधर) का परमब्रह्म स्वरूप कहते है। जोशी(ब्रह्मा) जी के मायामयी संसार की अभीष्ट कार्यपूर्ती में किशी प्रकार की बाधा न पड़े इस हेतु शिशुपाल की तरह हजारों बार सहनशीलता की सीमाएं लांघने के बावजूद किशी सहज मानव स्वरूप व्यवहार करने वाले इंसान का कोई प्रतिकार मै नहीं किया जिसके बारे में मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, श्रीधर (विष्णु) ने कहा था की कुछ भी हो जाय उसका प्रतिकार मत करना, कभी नहीं करना है।  तो क्या है परमात्मा=श्रीधर(विष्णु) सम्बन्ध उस सहज मानव से तो इसे स्वयं बिशुनपुर-223103 वाले स्वयं जानते होंगे मुझे नहीं पता और पता भी है तो मै बता नहीं सकता। तो यह बता हूँ की जोशी(ब्रह्म) जी के कार्य पूर्ती हेतु इसी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्रा ब्राह्मण गाँव बिशुनपुर-223103 का तीन बार दौड़ा कर इसे श्रीधर(विष्णु) का आशीर्वाद लिया गया था मेरे परमपिता परमेश्वर प्रेमचंद (शिव) द्वारा। तो ऐसा कौन सा व्यक्तिगत प्रशासनिक, वैज्ञानिक, राजनैतिक या अन्य भौतिक पद प्रशासन का काम था की बिशुनपुर जाना अनिवार्य था अपने से पद में छोटे और उम्र में भी छोटे रामानंद कुल ((श्रीधर(विष्णु)) का आशीर्वाद रामापुर-223225 के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (शिव और शिवा:पारवती:सती:उमा:गौरी:गिरिजा:अपर्णा का आहार/भोज्य/अर्पनेया/अक्षुण:साबित रहा तो शिव स्वयं हुआ)  पाण्डेय ब्राह्मण सारंगधर(चंद्रशेखर)/---/देवव्रत(गंगापुत्र)/---/गजाधर(विनायक:गणेश) कुल के प्रेमचंद(शिव) को लेना अनिवार्य हो गया था ? तो निश्चित रूप से यह मानवता का कार्य था और यह की हमेशा की तरह विष्णु को सक्रीय जिम्मेदारी यहाँ महामानवता यज्ञ पूर्ती के कार्य का नहीं दिया गया था तो वे स्थायित्व अवस्था में परोक्ष शक्तिदाता/आशीर्वाद दाता थे जैसा सामान्यतः शिव स्थायित्व भूमिका में विष्णु अवतार के सहयोग हेतु रहते हैं पर यहां कार्यरत विष्णु (श्रीधर) नहीं शिव (प्रेमचंद) थे।  तो यह कहा जाय की शिव ने त्रिमूर्ति का सम्मिलित स्वरुप धारण किया था तो इसमे अतिसयोक्ति कुछ क्यों नजर आती है किशी को और अगर आती है तो स्वयं बिशनपुर-223103  वालों से ही क्यों न पूंछ लिया जाय? वैसे त्रिमूर्ति का सम्मिलित स्वरुप (परमब्रह=ब्रह्म=ब्रह्मा+विष्णु+महेश) तो तीनो शक्तियों की पूर्ण समान सहभागिता निश्चित करता है मतलब रामानंद कुल वालों से ही पूंछ लिया जाय की किसकी सक्रीय भागीदारी रही और कौन आशीर्वाद रूपी शक्तिदाता रहा है? इतना तो जरूर है की सब कुछ समाप्ति के बाद ब्रह्मा और विष्णु का अधिकार सूत समेत (मानवकल्याण और मानवसंरक्षण और मानवसृजन के साथ) उनको सहर्ष वापस किया हूँ जो संसार के सामने है सशरीर परमब्रह्म विष्णुकांत और कृष्णकांत स्वरुप में और इसमे उनको कोई संदेह नहीं होना चाहिए और न किशी और को भी संदेह होना चाहिए की कि मै ब्रह्मा और विष्णु का अधिकार लिया हूँ। अगर अधिकार लिया गया था तो मानवता हेतु अभीष्ट लक्ष्य पूर्ती हेतु जो उनकी भी नैतिक जिम्मेदारी थी,  है और आगे भी रहेगी और अभीष्ट लक्ष्य पूर्ती काल तक के लिए ही व्यवहारिक दायित्व निर्वहन हेतु ही वह सब लिया गया था।

Friday, March 18, 2016

खाला तिरंगा फाड के, ---------जा झारिके। तो 1998-2000 के दिनों में जब तिरंगा को ब्रांड बनाया जा रहा था मादक पदार्थों के और उनके दो अर्थी के बहाने तिरंगा(राष्ट्र ध्वज) को फाड़ा जा रहा था तो सबको तिरंगे की सुधि क्यों नहीं आ रही थी गोविंदाचार्य और उनको समर्थको को विशेष रूप से और उसे तिरंगे मतलब बब्लू भाई(राष्ट्रध्वज) को डॉन (भगवाभाई:धर्मध्वज) ही बचा सकता था तो डॉन भाई ने बब्लू भाई को सलाम/नमस्कार/नमस्ते/नमन/शिष्टाचार कर दिया और राष्ट्रध्वज को संजीवनी मिल गयी।

खाला तिरंगा फाड के, ---------जा झारिके। तो 1998-2000 के दिनों में जब तिरंगा को ब्रांड बनाया जा रहा था मादक पदार्थों के और उनके दो अर्थी के बहाने तिरंगा(राष्ट्र ध्वज) को फाड़ा जा रहा था तो सबको तिरंगे की सुधि क्यों नहीं आ रही थी गोविंदाचार्य और उनको समर्थको को विशेष रूप से और उसे तिरंगे मतलब बब्लू भाई(राष्ट्रध्वज) को डॉन (भगवाभाई:धर्मध्वज) ही बचा सकता था तो डॉन भाई ने बब्लू भाई को सलाम/नमस्कार/नमस्ते/नमन/शिष्टाचार कर दिया और राष्ट्रध्वज को संजीवनी मिल गयी।

थोड़ा ठन्डे दिमाग से काम लीजिये और यह सोचिये की मै पागल बनकर जिऊंगा तो सब पागल ही होंगे मेरे लिए तुलनात्मक रूप से बहुत सामान्य सा तार्किक सन्दर्भ बता रहा हूँ और मै स्वाभाविक समय तक नहीं रहा अस्तित्व में तो कोई नहीं रहेगा अस्तित्व में और सब मुझमे ही विलीन होंगे।>>>>>>>>>गोविंदाचार्य जी और उनके अनुसायियों के गोरे और काले का युद्ध मेरे द्वारा बंद करा दिए जाने पर उनको उस देश (भारत के अंदर एक काल्पनिक देश ऐसा है और अन्य देश भी हो सकते है) में जाना ही पडेगा जहां गोरे और काले का धंधा बहुत जोरों पर चलता है और उस धंधे की आंड में मानवता और सनातन संस्कृति के विनाश का भी धंधा चलता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तर में उनका धंधा अब मंदा पड़ गया है और यह और अधिक मंदा पड़ जाएगा आगे। वैसे उनको अभी भी अफ्रीका और फ्रांस जाने की सबसे ज्यादा जरूरत है क्योंकि उनके 14 वर्ष के धंधे पर पानी फिर गया मेरे समतल में आते ही। क्योंकि मै ही सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/विष्णुकांत/कृष्णकांत मतलब मै ही शिव भी था, मै ही राम भी था और मै ही कृष्ण भी था और मै पूर्ण काला नहीं हूँ केवल अंग्रेजियत में जीने वालों के लिए मै काला मतलब नीलाम्बुज/घनश्याम हूँ और इस प्रकार शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव/विवेक(सरस्वती माँ का जेष्ठ मानस पुत्र) मै ही था और वह शक्ति संग्रह हुआ था राशिनाम गिरिधर से जिसका जितना भी अर्थ लगाओं लग जाएगा वैसे मैंने यह अर्थ लगाए हैं: गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण (परमब्रह्म) /11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))। तो जब किशी नामतः मानव रूप धारी नारायण, मानवरूपधारी हंशदेव/ब्रह्मा और मानवरूपधारी महादेव से कम नहीं तो फिर नामतः किस भूधर(आत्माविहीन स्थूल पर्वत/नग) नारायण से आंकलन का निरर्थक प्रयास कर रहे थे/हैं गोविंदाचार्य और उनके अनुयायी?>>>>>>> थोड़ा ठन्डे दिमाग से काम लीजिये और यह सोचिये की मै पागल बनकर जिऊंगा तो सब पागल ही होंगे मेरे लिए तुलनात्मक रूप से बहुत सामान्य सा तार्किक सन्दर्भ बता रहा हूँ और मै स्वाभाविक समय तक नहीं रहा अस्तित्व में तो कोई नहीं रहेगा अस्तित्व में और सब मुझमे ही विलीन होंगे।

थोड़ा ठन्डे दिमाग से काम लीजिये और यह सोचिये की मै पागल बनकर जिऊंगा तो सब पागल ही होंगे मेरे लिए तुलनात्मक रूप से बहुत सामान्य सा तार्किक सन्दर्भ बता रहा हूँ और मै स्वाभाविक समय तक नहीं रहा अस्तित्व में तो कोई नहीं रहेगा अस्तित्व में और सब मुझमे ही विलीन होंगे।>>>>>>>>>गोविंदाचार्य जी और उनके अनुसायियों के गोरे और काले का युद्ध मेरे द्वारा बंद करा दिए जाने पर उनको उस देश (भारत के अंदर एक काल्पनिक देश ऐसा है और अन्य देश भी हो सकते है) में जाना ही पडेगा जहां गोरे और काले का धंधा बहुत जोरों पर चलता है और उस धंधे की आंड में मानवता और सनातन संस्कृति के विनाश का भी धंधा चलता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तर में उनका धंधा अब मंदा पड़ गया है और यह और अधिक मंदा पड़ जाएगा आगे। वैसे उनको अभी भी अफ्रीका और फ्रांस जाने की सबसे ज्यादा जरूरत है क्योंकि उनके 14 वर्ष के धंधे पर पानी फिर गया मेरे समतल में आते ही। क्योंकि मै ही सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/विष्णुकांत/कृष्णकांत मतलब मै ही शिव भी था, मै ही राम भी था और मै ही कृष्ण भी था और मै पूर्ण काला नहीं हूँ केवल अंग्रेजियत में जीने वालों के लिए मै काला मतलब नीलाम्बुज/घनश्याम हूँ और इस प्रकार शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव/विवेक(सरस्वती माँ का जेष्ठ मानस पुत्र) मै ही था और वह शक्ति संग्रह हुआ था राशिनाम गिरिधर से जिसका जितना भी अर्थ लगाओं लग जाएगा वैसे मैंने यह अर्थ लगाए हैं: गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण (परमब्रह्म) /11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))। तो जब किशी नामतः मानव रूप धारी नारायण, मानवरूपधारी हंशदेव/ब्रह्मा और मानवरूपधारी महादेव से कम नहीं तो फिर नामतः किस भूधर(आत्माविहीन स्थूल पर्वत/नग) नारायण से आंकलन का निरर्थक प्रयास कर रहे थे/हैं गोविंदाचार्य और उनके अनुयायी?>>>>>>> थोड़ा ठन्डे दिमाग से काम लीजिये और यह सोचिये की मै पागल बनकर जिऊंगा तो सब पागल ही होंगे मेरे लिए तुलनात्मक रूप से बहुत सामान्य सा तार्किक सन्दर्भ बता रहा हूँ और मै स्वाभाविक समय तक नहीं रहा अस्तित्व में तो कोई नहीं रहेगा अस्तित्व में और सब मुझमे ही विलीन होंगे।

Thursday, March 17, 2016

तेरा मन दर्पण कहलाये।तेरा मन दर्पण कहलाये।। जग से चाहे भाग ले प्राणी। मन से भाग न पाये।। भले बुरे सारे कर्मो को। देखे और दिखाए।। किसने चलती हुई नाव को डुबोने वालों का सहयोग किया था और उससे कूदकर दूसरी नाव पर सवारी की थी यह उसका मन अवश्य बतला सकता है| पर मुझे कलुष नहीं लेकिन इतना जरूर है की जिसने नाव को किनारे लगाया और जिसने नाव मझधार को पार करने लक्ष्य को ध्यान में रख कर तैयार किया और जिसने नाव कुछ समय के लिए खेया उसे उचित सम्मान अवश्य मिले यही मेरा ध्येय था और वह पूरा हुआ। मुझे मेरे घर में ही, खानदान में , रिस्तेदार/सगे-सम्बन्धियों में , गुरु-गुरुकुल में और शिक्षण/शोध संस्थागत सहकर्मियों/मित्रों/लोगों के माध्यम से घेरने और राजनीती करने से सत्य नहीं बदलता है। और न मै बदलने वाला था और न बदला पर मानवता हित और गुरुजन और पितृजन और श्रेष्ठजन के आग्रह को मै प्रारंभिक जीवन के दिनों से स्वीकार करता था, करता भी और उसे स्वीकार करता हूँ और आगे भी करता रहूँगा और अगर उनका आग्रह किशी मानवमूल्य के लिए हितकर तथ्य को लेकर था/है/होगा तो वह मुझे सर्वदा स्वीकार है। लेकिन अन्य लोग मुझसे लड़ाई कर उस लड़ाई को जीत हांसिल नहीं कर सकते, क्योंकि मै वह लड़ाई लड़ता ही नहीं जो मुझे सत्यगत न लगे। समय विशेष के दौरान मैं मानवता हित और गुरुजन और पितृजन और श्रेष्ठजन के आग्रह को जब स्वीकार ही कर लिया था तो मुझसे श्रेष्ठता, वरिष्ठता और समानता क्यों स्थापित करने का निरर्थक प्रयास चल रहा है? लेकिन वह समय विशेष मानवता के पुनरनीव/संरक्षण की नीव की ईंट अवस्था थी जिसको सामान्य जन कर ही नहीं सकता तो सामान्यजन से मेरी श्रेष्ठता, वरिष्ठता और समानता क्यों स्थापित करने का निरर्थक प्रयास चल रहा है? और आप जानकारी के लिए बता दूँ की अब मै समतल में हूँ इसका आप को ध्यान रहे जो आप के हित के लिए अत्यंत उपयोगी होगा।

तेरा मन दर्पण कहलाये।तेरा मन दर्पण कहलाये।। जग से चाहे भाग ले प्राणी। मन से भाग न पाये।। भले बुरे सारे कर्मो को। देखे और दिखाए।। किसने चलती हुई नाव को डुबोने वालों का सहयोग किया था और उससे कूदकर दूसरी नाव पर सवारी की थी यह उसका मन अवश्य बतला सकता है| पर मुझे कलुष नहीं लेकिन इतना जरूर है की जिसने नाव को किनारे लगाया और जिसने नाव मझधार को पार करने लक्ष्य को ध्यान में रख कर तैयार किया और जिसने नाव कुछ समय के लिए खेया उसे उचित सम्मान अवश्य मिले यही मेरा ध्येय था और वह पूरा हुआ। मुझे मेरे घर में ही, खानदान में , रिस्तेदार/सगे-सम्बन्धियों में , गुरु-गुरुकुल में और शिक्षण/शोध संस्थागत सहकर्मियों/मित्रों/लोगों के माध्यम से घेरने और राजनीती करने से सत्य नहीं बदलता है। और न मै बदलने वाला था और न बदला पर मानवता हित और गुरुजन और पितृजन और श्रेष्ठजन के आग्रह को मै प्रारंभिक जीवन के दिनों से स्वीकार करता था, करता भी और उसे स्वीकार करता हूँ और आगे भी करता रहूँगा और अगर उनका आग्रह किशी मानवमूल्य के लिए हितकर तथ्य को लेकर था/है/होगा तो वह मुझे सर्वदा स्वीकार है। लेकिन अन्य लोग मुझसे लड़ाई कर उस लड़ाई को जीत हांसिल नहीं कर सकते, क्योंकि मै वह लड़ाई लड़ता ही नहीं जो मुझे सत्यगत न लगे। समय विशेष के दौरान मैं मानवता हित और गुरुजन और पितृजन और श्रेष्ठजन के आग्रह को जब स्वीकार ही कर लिया था तो मुझसे श्रेष्ठता, वरिष्ठता और समानता क्यों स्थापित करने का निरर्थक प्रयास चल रहा है? लेकिन वह समय विशेष मानवता के पुनरनीव/संरक्षण  की नीव की ईंट अवस्था थी जिसको सामान्य जन कर ही नहीं सकता तो सामान्यजन से मेरी श्रेष्ठता, वरिष्ठता और समानता क्यों स्थापित करने का निरर्थक प्रयास चल रहा है? और आप  जानकारी के लिए बता दूँ की अब मै समतल में हूँ इसका आप को ध्यान रहे जो आप के हित के लिए अत्यंत उपयोगी होगा। 

K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS) 
KBCAOS 
KBCAOS 
KBCAOS 
KBCAOS 
KBCAOS 
Dr. Vivek Kumar Pandey 

जैसे ब्रह्मास्त्र के प्रहार से दुनिया ही नहीं इस ब्रह्माण्ड के किशी कोने में हो कोई तो बच नहीं सकता वैसे मेरे भाष्य/कथन से किशी देश का वासी या उसमे शरण लिया हुआ बच नहीं सकता क्योंकि इस प्रयागराज में जो कुछ हुआ हर देश से प्रभावित होकर ही सम्प्पन्न हुआ और जिसने फल सहित यज्ञानुष्ठान को पूर्णाहुति दी वह भी उससे प्रभावित होते हुए ही सत्य, प्रेम, निष्ठा और यत्न तथा अनुराग से पूर्ण किया है। तो कोई भी स्वयंभू /तथाकथित विश्वमहाशक्ति रहा हो उसके अस्तित्व पूर्ण उपस्थिति को चुनौती देते हुए ही सब कुछ किया गया है।

K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studiesजैसे ब्रह्मास्त्र के प्रहार से दुनिया ही नहीं इस ब्रह्माण्ड के किशी कोने में हो कोई तो बच नहीं सकता वैसे मेरे भाष्य/कथन से किशी देश का वासी या उसमे शरण लिया हुआ बच नहीं सकता क्योंकि इस प्रयागराज में जो कुछ हुआ हर देश से प्रभावित होकर ही सम्प्पन्न हुआ और जिसने फल सहित यज्ञानुष्ठान को पूर्णाहुति दी वह भी उससे प्रभावित होते हुए ही सत्य, प्रेम, निष्ठा और यत्न तथा अनुराग से पूर्ण किया है। तो कोई भी स्वयंभू /तथाकथित विश्वमहाशक्ति रहा हो उसके अस्तित्व पूर्ण उपस्थिति को चुनौती देते हुए ही सब कुछ किया गया है।
Bishunpur-223103
Vivek Kumar Pandey
Ramapur-223225
K._Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS)
KBCAOS
KBCAOS
Proud Past Alumni List of 42 persanalities of the Allahabad University Alumni Association
Proud Past Alumni list of 42 personalities of the Allahabad University Alumni Association

प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज को विदित हो की 2004 में प्रयागराज विश्वविद्यालय शिरोमणि को स्वयं प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वाले ही सदा सदा के लिए रास्ता दिखा दिया उस समय उनके भक्त कहाँ थे ? और देश से उनकी सरकार जाने के साथ उस शिरोमणि द्वारा प्रारम्भित यज्ञ कुण्ड में असीमित जलप्लावन कर (स्वार्थी लोगों को बन्दर बाँट कर) यज्ञ को बिना किशी फल के आये ही पूर्णाहुति देने की पूर्ण घृणित योजना को जिसने/उस यज्ञ को पूर्ण करने की जिम्मेदारी जिनपर थी उन लोगों ने ऐसे कुचक्र को असफल किया और ऐसे उस यज्ञ के स्वप्न साकार रूप देने वाले/वालों के साथ जो जो राजनीती हो रही है प्रारंभिक दिनों, 2001 से लेकर आज तक तो क्या वह उसी कार्यपूर्ती से मिले सम्मान की कीमत वसूलने और रह-रह कर उत्तेजित करने की घृणित राजनीती नहीं है? और उस सम्मान की कीमत वसूलने का अधिकार उनको किस प्रकार है इस प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज की तरफ से ? और अगर है तो उस सम्मान को बचाये रखने की प्रक्रिया के तहत अगर आक्रामक न भी हुआ तो क्या उसका व्यवहारिक स्वरुप भी सामने आ सकता है? जरूरत इसी बात की थी की प्रतिक्रिया पाने के लिए कुछ ऐसे लोग उतावले है जिनमे अपनी जिम्मेदारी तथा बात पर अटल रहने और दमदार प्रतिक्रिया सहन करने की क्षमता उनमे सर्वविदित रूप से न कभी रही ही है और न है और अगर रही भी है तो दूसरों को जमीदोज कर उस पक्की नीव पर इमारत खड़े करने जैसे ही रही है। कुचक्र रचने और रचाने से वह कौशल हाशिल नहीं हो सकता जिसके लिए न आपने तप किया है, न बलिदान दिया है और न त्याग किया है। तो जो आप से संभव था सब आपने किया। तो जो बोया है सो काटिये और जो हुनर है उसे ही जारी रखिये अगर भविष्य उज्जवल बनाना है क्योंकी जो कर गुजर गए वह तो भरना ही पडेगा। अगर मानवता हित के किशी उच्च उद्देश्य के लिए किया है पारिस्थितक विवसता की वजह से और ग्लानि है उस गलत किये की वजह से तो उसका उद्धार हम और हम जैसे स्वयं करने की जिम्मेदारी लेंगे इसके प्रति इसकी चिंता हमपर छोड़ दीजिये। वे वजह और बिना आधार की समानता मत स्थापित कीजिये केवल समता ला सको तो लाइए स्वेक्षा से जहां तक हो सके अपना या समूह विशेस का परोपकार, अधिकार और शक्ति दूसरों में स्थान्तरित करते हुए।

प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज को विदित हो की 2004 में प्रयागराज विश्वविद्यालय शिरोमणि को स्वयं प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज वाले ही सदा सदा के लिए रास्ता दिखा दिया उस समय उनके भक्त कहाँ थे ? और देश से उनकी सरकार जाने के साथ उस शिरोमणि द्वारा प्रारम्भित यज्ञ कुण्ड में असीमित जलप्लावन कर (स्वार्थी लोगों को बन्दर बाँट कर) यज्ञ को बिना किशी फल के आये ही पूर्णाहुति देने की पूर्ण घृणित योजना को जिसने/उस यज्ञ को पूर्ण करने की जिम्मेदारी जिनपर थी उन लोगों ने ऐसे कुचक्र को असफल किया और ऐसे उस यज्ञ के स्वप्न साकार रूप देने वाले/वालों के साथ जो जो राजनीती हो रही है प्रारंभिक दिनों, 2001 से लेकर आज तक तो क्या वह उसी कार्यपूर्ती से मिले सम्मान की कीमत वसूलने और रह-रह कर उत्तेजित करने की घृणित राजनीती नहीं है? और उस सम्मान की कीमत वसूलने का अधिकार उनको किस प्रकार है इस प्रयागराज विश्विद्यालय और प्रयागराज की तरफ से ? और अगर है तो उस सम्मान को बचाये रखने की प्रक्रिया के तहत अगर आक्रामक न भी हुआ तो क्या उसका व्यवहारिक स्वरुप भी सामने आ सकता है? जरूरत इसी बात की थी की प्रतिक्रिया पाने के लिए कुछ ऐसे लोग उतावले है जिनमे अपनी जिम्मेदारी तथा बात पर अटल रहने और दमदार प्रतिक्रिया सहन करने की क्षमता उनमे सर्वविदित रूप से न कभी रही ही है और न है और अगर रही भी है तो दूसरों को जमीदोज कर उस पक्की नीव पर इमारत खड़े करने जैसे ही रही है। कुचक्र रचने और रचाने से वह कौशल हाशिल नहीं हो सकता जिसके लिए न आपने तप किया है, न बलिदान दिया है और न त्याग किया है। तो जो आप से संभव था सब आपने किया।  तो जो बोया है सो काटिये और जो हुनर है उसे ही जारी रखिये अगर भविष्य उज्जवल बनाना है क्योंकी जो कर गुजर गए वह तो भरना ही पडेगा। अगर मानवता हित के किशी उच्च उद्देश्य के लिए किया है पारिस्थितक विवसता की वजह से और ग्लानि है उस गलत किये की वजह से तो उसका उद्धार हम और हम जैसे स्वयं करने की जिम्मेदारी लेंगे इसके प्रति इसकी चिंता हमपर छोड़ दीजिये। वे वजह और बिना आधार की समानता मत स्थापित कीजिये केवल समता ला सको तो लाइए स्वेक्षा से जहां तक हो सके अपना या समूह विशेस का परोपकार, अधिकार और शक्ति दूसरों में स्थान्तरित करते हुए। 

Wednesday, March 16, 2016

प्रिय भाइयों, मै आप सब लोगों माध्यम से कहना चाह रहा हूँ की जिनको संशय था की शायद गुरु बड़ा होता है को मैंने गुरु बड़ा होता है सिद्ध किया। पर यह मेरी समझ नही आ रहा है और पूर्णरूप में समझ में आ भी रहा है की, कश्यप के पुत्र, वरुणदेव के पुत्र, वाल्मीकि के शिष्य, अांगिरास पुत्र भारद्वाज को; और उसी भारद्वाज के शिष्य, गर्ग ( सर्वगोत्र/जाती/धर्म के शिष्य जिनको भारद्वाज ने अपना पुत्र माना था और गर्ग गोत्र चल गया) को कश्यप से ऊपर सिद्ध करने की असंभव कोशिस नाकाम होने पर भी सदा-सदा के लिए नाकाम होने वाली कोशिस हो रही है उसी प्रयागराज में जहाँ की प्रथम संतान कश्यप ऋषि ही हैं और अब मै बता देता हूँ की भारद्वाज/आंगिरस, दुर्वाशा/कृष्णात्रेय (जिनका प्रथम निवाश/आश्रम फूलपुर, आजमगढ़ पास दूसरा स्वयं प्रयागराज है) साथ कश्यप ही नहीं सभी सप्तर्षि अपने अपने स्थान से प्रयागराज आकर अपने एक सातवें अधिकार साथ रहेंगे और अब यह दुनिया एक सातवे भाग में ही बंटेगी न की काले और गोरे में और जो कृष्ण और राम (वास्तव में न राम काले थे न कृष्ण काले थे वरन वे नाम से ही केवल कृष्ण थे जिस तरह हर अंग्रेज के सामने गोरा भारतीय भी घनश्याम लगता है मतलब वे नीलाम्बुज समान घनश्याम थे जो पूर्ण काला शायद ही कभी हो जाता हो और जिन त्रिदेवो की वजह से उनका अस्तित्व रहा उसमे कोई काले रूप में न था और न काला रूप उनका कहीं वर्णित है) को आधार बना कर इस संसार को गोरे और काले में कुछ लोग बांटना चाहे है, चाह रहे है और आगे भी चाहेंगे उनको केवल आठवाँ भाग मिलेगा मतलब सातों ऋषियों के सम्मिलित गुण में मलयदेश(तमिल/केरल) प्रकट होने वाले अगस्त्य/कुम्भज की तरह हर ऋषि से एक-अंश मिलाकर प्राप्त हिस्से भर। मतलब सप्तर्षियों जनित उनकी सम्मिलित/वाह्य संतान अगस्त्य/कुम्भज की तरह उनका हिस्सा सप्तर्षियों इक्षा पर निर्भर करेगा। इस दुनिया में सनातन हिन्दू धर्म से बाहर जाते समय सबसे अधिक सहन सीलता का परिचय देकर उसमे सबको बनाये रखने हेतु विकल्प देने वाले कश्यप गोत्र के मध्ययम से ही सनातन हिन्दू धर्म में पुनः प्रवेश कश्यप गोत्र माध्यम से ही होता है पूर्ण परिक्षा साथ जितना की उसमे बनाये रखने हेतु शिथिलता वरती गयी थी (भारद्वाज के गर्ग जैसा सर्व जाती/धर्म/गोत्र का चरित्र है न कश्यप का पर हां सनातन कश्यप गोत्रीय उसकी रीढ़ जरूर है)। तो कश्यप की सहनशीलता, शिष्टाचार और कठोरता ही कश्यप को शक्ति देता है उसको सनातन हिन्दू धर्म का प्रथम द्वार बने रहने हेतु। तो कश्यप पर विजय पा सको तो पा लो पर अब ध्यान रहे की प्रयागराज और यह संसार एक सातवे में बँट चुका है (कश्यप , गौतम, वशिष्ठ, आंगिरस, भृगु, अत्रि, विश्वामित्र:कौशिक:विश्वरथ) सृष्टि के प्रारंभिक दिनों की तरह और बचा है वह भी बांटेगा। [जिसको गांधी बना रहे हो वह न गांधी है और जिसे आप फिरोज समझ रहे है वह न फिरोज है तो जिसने गोत्रकुल, कुल, गुरुकुल, राष्ट्रकुल और मित्रकूल को स्वान्तः सुखाय शर्मसार किया उसके लिए क्यों गोत्र कुल और कुल वाले व्यर्थ लड़ रहे हैं। उससे तो केवल मानवता का सम्बन्ध रखना ही श्रेष्कर है न की उसके लिए विश्वयुद्ध लड़ना या विश्वयुद्ध को हवा देना तब जब आप सबकुछ गँवा ही दिए है माया मोह में हारकर। माया मोह आप में है मानवता आधारित तो ठीक है पर मायामोह में दूसरे पर तलवार खींचने से से गौरव कभी वापस नहीं आ सकता]

प्रिय भाइयों, मै आप सब लोगों माध्यम से कहना चाह रहा हूँ की जिनको संशय था की शायद गुरु बड़ा होता है को मैंने गुरु बड़ा होता है सिद्ध किया। पर यह मेरी समझ नही आ रहा है और पूर्णरूप में समझ में आ भी रहा है की, कश्यप के पुत्र, वरुणदेव के पुत्र, वाल्मीकि के शिष्य, अांगिरास पुत्र भारद्वाज को; और उसी भारद्वाज के शिष्य, गर्ग ( सर्वगोत्र/जाती/धर्म के शिष्य जिनको भारद्वाज ने अपना पुत्र माना था और गर्ग गोत्र चल गया) को कश्यप से ऊपर सिद्ध करने की असंभव कोशिस नाकाम होने पर भी सदा-सदा के लिए नाकाम होने वाली कोशिस हो रही है उसी प्रयागराज में जहाँ की प्रथम संतान कश्यप ऋषि ही हैं और अब मै बता देता हूँ की भारद्वाज/आंगिरस, दुर्वाशा/कृष्णात्रेय (जिनका प्रथम निवाश/आश्रम फूलपुर, आजमगढ़ पास दूसरा स्वयं प्रयागराज है) साथ कश्यप ही नहीं सभी सप्तर्षि अपने अपने स्थान से प्रयागराज आकर अपने एक सातवें अधिकार साथ रहेंगे और अब यह दुनिया एक सातवे भाग में ही बंटेगी न की काले और गोरे में और जो कृष्ण और राम (वास्तव में न राम काले थे न कृष्ण काले थे वरन वे नाम से ही केवल कृष्ण थे जिस तरह हर अंग्रेज के सामने गोरा भारतीय भी घनश्याम लगता है मतलब वे नीलाम्बुज समान घनश्याम थे जो पूर्ण काला शायद ही कभी हो जाता हो और जिन त्रिदेवो की वजह से उनका अस्तित्व रहा उसमे कोई काले रूप में न था और न काला रूप उनका कहीं वर्णित है) को आधार बना कर इस संसार को गोरे और काले में कुछ लोग बांटना चाहे है, चाह रहे है और आगे भी चाहेंगे उनको केवल आठवाँ भाग मिलेगा मतलब सातों ऋषियों के सम्मिलित गुण में मलयदेश(तमिल/केरल) प्रकट होने वाले अगस्त्य/कुम्भज की तरह हर ऋषि से एक-अंश मिलाकर प्राप्त हिस्से भर। मतलब सप्तर्षियों जनित उनकी सम्मिलित/वाह्य संतान अगस्त्य/कुम्भज की तरह उनका हिस्सा सप्तर्षियों इक्षा पर निर्भर करेगा। इस दुनिया में सनातन हिन्दू धर्म से बाहर जाते समय सबसे अधिक सहन सीलता का परिचय देकर उसमे सबको बनाये रखने हेतु विकल्प देने वाले कश्यप गोत्र के मध्ययम से ही सनातन हिन्दू धर्म में पुनः प्रवेश कश्यप गोत्र माध्यम से ही होता है पूर्ण परिक्षा साथ जितना की उसमे बनाये रखने हेतु शिथिलता वरती गयी थी (भारद्वाज के गर्ग जैसा सर्व जाती/धर्म/गोत्र का चरित्र है न कश्यप का पर हां सनातन कश्यप गोत्रीय उसकी रीढ़ जरूर है)। तो कश्यप की सहनशीलता, शिष्टाचार और कठोरता ही कश्यप को शक्ति देता है उसको सनातन हिन्दू धर्म का प्रथम द्वार बने रहने हेतु। तो कश्यप पर विजय पा सको तो पा लो पर अब ध्यान रहे की प्रयागराज और यह संसार एक सातवे में बँट चुका है (कश्यप , गौतम, वशिष्ठ, आंगिरस, भृगु, अत्रि, विश्वामित्र:कौशिक:विश्वरथ) सृष्टि के प्रारंभिक दिनों की तरह और बचा है वह भी बांटेगा। [जिसको गांधी बना रहे हो वह न गांधी है और जिसे आप फिरोज समझ रहे है वह न फिरोज है तो जिसने गोत्रकुल, कुल, गुरुकुल, राष्ट्रकुल और मित्रकूल को स्वान्तः सुखाय शर्मसार किया उसके लिए क्यों गोत्र कुल और कुल वाले व्यर्थ लड़ रहे हैं। उससे तो केवल मानवता का सम्बन्ध रखना ही श्रेष्कर है न की उसके लिए विश्वयुद्ध लड़ना या विश्वयुद्ध को हवा देना तब जब आप सबकुछ गँवा ही दिए है माया मोह में हारकर। माया मोह आप में है मानवता आधारित तो ठीक है पर मायामोह में दूसरे पर तलवार खींचने से से गौरव कभी वापस नहीं आ सकता]

Friday, March 11, 2016

तो मै ही वह हूँ जिसको 2008 में रामापुर-223225 में बैल खरीदकर हल चलाना सहन नहीं था (जैसा की भारतीय विज्ञानं संस्थान बैंगलोर में मै कह चुका था पागल उपाधी छोड़ने हेतु) डॉन(भगवा) भाई और बबलू (तिरंगा) भाई को मेरे इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय अध्ययन केंद्र से प्रथम शोध उपाधि लेने के बाद और मेरे लिए और इस बौद्धिक जगत के लिए विश्वव्यापक व्यवस्था कर दी गयी और मुझे ही डॉन(भगवा:धर्मध्वज) बना दिया गया और अब बबलू(राष्ट्रध्वज:तिरंगा) भाई कौन है यह निर्धारण मेरा कार्य नहीं ब्रह्मा का कार्य है वे करें| तो मै वरिष्ठ हूँ (क्योंकि भगवा:सूर्य की प्रथम आभा:अरुणिमा:सूर्य से हर ज्योति और ऊर्जा निकलती है) मै इसे पूर्ण रूप में जनता हूँ कागज का कमाल इतना है की अधम जल भी पड़ा तो भी वह गल गया आग की क्या जरूरत उसे ख़त्म करने के लिए।>>>>>>>>प्रोफेसर जोशी (ब्रह्मा) जी आप के अभीष्ट कार्यपूर्ती हेतु जिस 25 वर्षीय आजीवन अखंड ब्रह्मचारी युवक को लगाया गया था वह गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती; और बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा पुत्र सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) था। जो केवल एक पीढ़ी ही नहीं तीन पीढ़ियों की आशा और आकांछा को आप के कार्य पूर्ती हेतु लगा दिया गया था (उसकी दो पीढ़िया, युवावस्था और बचपन दूसरों की अज्ञानता और उसके समन में ही बीत गयी थी और जिसने अपने जीवन में अपनी इक्षा से किशी बसंत और फाल्गुन की होली भी नहीं खेली थी कौमार्य भंग न हो जाय इसी नियंत्रण में)। यही नहीं विवाह 18 अप्रैल, 2008 को किया और उसके बाद भी जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी ही रहा अम्बवादेकर/अम्बेडकर/हनुमान की तर्ज पर और इस प्रकार 11-09-2001 से 10-09-2015 तक आप के सब कार्य पूर्ण कर दिए जो मेरे मामा(श्रीधर:विष्णु) और ताउजी(प्रेमचंद:शिव) ने आप के लिए करने को कहा था और जिसको मै स्वयं मेरे लिए अकरणीय और अनुपयुक्त बताया था लेकिन दुनिया एक तरफ और मै एक तरफ मतलब एक समय आया की मै ही जान रहा था की मै उस लक्ष्य के हेतु क्या कर रहा हूँ मतलब वह सत्य मै ही समझ रहा था पर मामा और ताऊ जी भी उसे मेरा पागलपन बताने लगे थे। और वह भी समय याद है भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर का जब मई भी कह दिया था की अब सहन सीमा से बाहर जा रहा है भाइयों की करामात और अन्याय डॉन(भगवा) भाई और बबलू(तिरंगा) भाई विध्वंश दो सभी शिक्षण और शोध संस्थानों को और मै गाँव रामापुर-223225 जा रहा हूँ और एक जोड़ी बैल खरीदूंगा और खेती करूंगा और यह दुनिया आदिमानव युग में चली जाना चाहती है तो चली जाय मुझे क्या करना अन्यथा ये जो करना चाहते है उनको उसे करने के उपयुक्त स्थान पर भी दिया जाय वैश्विक नियंत्र हो एक केंद्रीय वैश्विक व्यवस्था के तहत क्योंकि ये जैसा जीवन जीना चाहते हैं मै भारत भूमि पर वैसा नहीं होने दूंगा।>>>>>>तो मै ही वह हूँ जिसको 2008 में रामापुर-223225 में बैल खरीदकर हल चलाना सहन नहीं था (जैसा की भारतीय विज्ञानं संस्थान बैंगलोर में मै कह चुका था पागल उपाधी छोड़ने हेतु) डॉन(भगवा) भाई और बबलू (तिरंगा) भाई को मेरे इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय अध्ययन केंद्र से प्रथम शोध उपाधि लेने के बाद और मेरे लिए और इस बौद्धिक जगत के लिए विश्वव्यापक व्यवस्था कर दी गयी और मुझे ही डॉन(भगवा:धर्मध्वज) बना दिया गया और अब बबलू(राष्ट्रध्वज:तिरंगा) भाई कौन है यह निर्धारण मेरा कार्य नहीं ब्रह्मा का कार्य है वे करें| तो मै वरिष्ठ हूँ (क्योंकि भगवा:सूर्य की प्रथम आभा:अरुणिमा:सूर्य से हर ज्योति और ऊर्जा निकलती है) मै इसे पूर्ण रूप में जनता हूँ कागज का कमाल इतना है की अधम जल भी पड़ा तो भी वह गल गया आग की क्या जरूरत उसे ख़त्म करने के लिए।

तो मै ही वह हूँ जिसको 2008 में रामापुर-223225 में बैल खरीदकर हल चलाना सहन नहीं था (जैसा की भारतीय विज्ञानं संस्थान बैंगलोर में मै कह चुका था पागल उपाधी छोड़ने हेतु) डॉन(भगवा) भाई और बबलू (तिरंगा) भाई को मेरे इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय अध्ययन केंद्र से प्रथम शोध उपाधि लेने के बाद और मेरे लिए और इस बौद्धिक जगत के लिए विश्वव्यापक व्यवस्था कर दी गयी और मुझे ही डॉन(भगवा:धर्मध्वज) बना दिया गया और अब बबलू(राष्ट्रध्वज:तिरंगा) भाई कौन है यह निर्धारण मेरा कार्य नहीं ब्रह्मा का कार्य है वे करें| तो मै वरिष्ठ हूँ (क्योंकि भगवा:सूर्य की प्रथम आभा:अरुणिमा:सूर्य से हर ज्योति और ऊर्जा निकलती है) मै इसे पूर्ण रूप में जनता हूँ कागज का कमाल इतना है की अधम जल भी पड़ा तो भी वह गल गया आग की क्या जरूरत उसे ख़त्म करने के लिए।>>>>>>>>प्रोफेसर जोशी (ब्रह्मा) जी आप के  अभीष्ट कार्यपूर्ती हेतु जिस 25 वर्षीय आजीवन अखंड ब्रह्मचारी युवक को लगाया गया था वह गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती; और बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा पुत्र सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) था। जो केवल एक पीढ़ी ही नहीं तीन पीढ़ियों की आशा और आकांछा को आप के कार्य पूर्ती हेतु लगा दिया गया था (उसकी दो पीढ़िया, युवावस्था और बचपन दूसरों की अज्ञानता और उसके समन में ही बीत गयी थी और जिसने अपने जीवन में अपनी इक्षा से किशी बसंत और फाल्गुन की होली भी नहीं खेली थी कौमार्य भंग न हो जाय इसी नियंत्रण में)। यही नहीं विवाह 18 अप्रैल, 2008 को किया और उसके बाद भी जिसकी एक नारी सदा ब्रह्मचारी ही रहा अम्बवादेकर/अम्बेडकर/हनुमान की तर्ज पर और इस प्रकार 11-09-2001 से 10-09-2015 तक आप के सब कार्य पूर्ण कर दिए जो मेरे मामा(श्रीधर:विष्णु) और ताउजी(प्रेमचंद:शिव) ने आप के लिए करने को कहा था और जिसको मै स्वयं मेरे लिए अकरणीय और अनुपयुक्त बताया था लेकिन दुनिया एक तरफ और मै एक तरफ मतलब एक समय आया की मै ही जान रहा था की मै उस लक्ष्य के हेतु क्या कर रहा हूँ मतलब वह सत्य मै ही समझ रहा था पर मामा और ताऊ जी भी उसे मेरा पागलपन बताने लगे थे। और वह भी समय याद है भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर का जब मई भी कह दिया था की अब सहन सीमा से बाहर जा रहा है भाइयों की करामात और अन्याय डॉन(भगवा) भाई और बबलू(तिरंगा) भाई विध्वंश कर दो सभी शिक्षण और शोध संस्थानों को और मै गाँव रामापुर-223225 जा रहा हूँ और एक जोड़ी बैल खरीदूंगा और खेती करूंगा और यह दुनिया आदिमानव युग में चली जाना चाहती है तो चली जाय मुझे क्या करना अन्यथा ये जो करना चाहते है उनको उसे करने के उपयुक्त स्थान पर भी दिया जाय वैश्विक नियंत्र हो एक केंद्रीय वैश्विक व्यवस्था के तहत क्योंकि ये जैसा जीवन जीना चाहते हैं मै भारत भूमि पर वैसा नहीं होने दूंगा।>>>>>>तो मै ही वह हूँ जिसको 2008 में रामापुर-223225 में बैल खरीदकर हल चलाना सहन नहीं था (जैसा की भारतीय विज्ञानं संस्थान बैंगलोर में मै कह चुका था पागल उपाधी छोड़ने हेतु) डॉन(भगवा) भाई और बबलू (तिरंगा) भाई को मेरे इस केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय अध्ययन केंद्र से प्रथम शोध उपाधि लेने के बाद और मेरे लिए और इस बौद्धिक जगत के लिए विश्वव्यापक व्यवस्था कर दी गयी और मुझे ही डॉन(भगवा:धर्मध्वज) बना दिया गया और अब बबलू(राष्ट्रध्वज:तिरंगा) भाई कौन है यह निर्धारण मेरा कार्य नहीं ब्रह्मा का कार्य है वे करें| तो मै वरिष्ठ हूँ (क्योंकि भगवा:सूर्य की प्रथम आभा:अरुणिमा:सूर्य से हर ज्योति और ऊर्जा निकलती है) मै इसे पूर्ण रूप में जनता हूँ कागज का कमाल इतना है की अधम जल भी पड़ा तो भी वह गल गया आग की क्या जरूरत उसे ख़त्म करने के लिए।

मै 1st decades of this millennium में उस सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) अवस्था में सशरीर पूर्ण चैतन्य अवस्था में कार्य कर रहे लोगों के साथ सामान्य विषय वस्तु पर कार्यरत दिख रहा था, जो सम्पूर्ण मानवता ही नहीं वरन सम्पूर्ण जड़ और चेतन(समस्त सजीव व् निर्जीव वनस्पतियाँ व् प्राणी जगत) को अपने में समाहित किये हुए सबके संरक्षण की कल्पना के साथ, संवर्धन और दृष्टिगत सतत चहुमुखी समृद्धि का बीज था। जो तत्कालीन परिस्थिति जन्य विश्वमहापरिवर्तन और विश्व संक्रमण और विश्व घोर अनर्थ का काल था मानवता और इस सृस्टि के लिए जो की वर्तमान सामान्य परिस्थिति में किशी को होने की जरूरत ही नहीं है। तो आप ही बताइये की मेरा वरिष्ठ कोई हो सकता है क्या मै कोई भौतिक पद, विषयगत प्रकासन संख्या और प्रतिष्ठा न भी पाऊं तो क्या ?

मै 1st decades of this millennium में  उस सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) अवस्था में सशरीर पूर्ण चैतन्य अवस्था में कार्य कर रहे लोगों के साथ सामान्य विषय वस्तु पर कार्यरत दिख रहा था, जो सम्पूर्ण मानवता ही नहीं वरन सम्पूर्ण जड़ और चेतन(समस्त सजीव व् निर्जीव वनस्पतियाँ व् प्राणी जगत)  को अपने में समाहित किये हुए सबके संरक्षण की कल्पना के साथ, संवर्धन और दृष्टिगत सतत चहुमुखी समृद्धि का बीज था। जो तत्कालीन परिस्थिति जन्य विश्वमहापरिवर्तन और विश्व संक्रमण और विश्व घोर अनर्थ का काल था मानवता और इस सृस्टि के लिए जो की वर्तमान सामान्य परिस्थिति में किशी को होने की जरूरत ही नहीं है। तो आप ही बताइये की मेरा वरिष्ठ कोई हो सकता है क्या मै कोई भौतिक पद, विषयगत प्रकासन संख्या और प्रतिष्ठा न भी पाऊं तो क्या ?  

इतना भी ना गिरो, इससे भी ज्यादा क्या गिरोगे कि अपनी हारी हुई बाजी जीतने के लिए कम से कम इतना आप गिर ही चुके हैं की अपनी शक्ति का प्रयोग कर आप लोगों ने भानु प्रताप को दाँव पर लगा प्रताप भानु (राक्षस कुल में शामिल करा ही दिया और उन्हें हमें ही पावन बनाना है) बना दिया। सायद मई क्या कह रहा हूँ उसे आप लोग समझ रहे होंगे। मै तो इतना सरल की पद, प्रकासन संख्या और प्रतिष्ठा का ध्यान किये बिना अनवरत आप लोगों की सेवा में हूँ निःस्वार्थ भाव से पर आप मुझे लगातार दबाने की कोशिस किये जा रहे हैं उम्र में बड़े होकर पर मेरे साथ मुझसे छोटे ने जो किया अगर वह मै आप के साथ कर दूँ तो यह ब्रह्माण्ड विध्वंश हो जाए मतलब इस दुनिया में सीता, रुक्मिणी-राधा और सती/उमा/पार्वती/अपर्णा/गिरिजा/गौरी इस दुनिआ को तहस नहस कर दें। तो ज़रा सोच समझ लीजिये कुछ करने से पहले की जो सब कुछ आप लोगों को सामान्य दिखा, दिखाई दे रहा और देगा भी वह केवल मेरे भरोसे के विवेक स्वयं में विवेक था अभी तक विवेक है और आगे भी विवेक ही रहेगा। अतः आप की दूकान चलती रही "ऐसा कोई सगा नहीं जिसको मैंने ठगा नहीं" की तर्ज पर तो यह ताल ठोकना और अपना गुणगान करना कम से कम बंद कर दीजिये।

इतना भी ना गिरो, इससे भी ज्यादा क्या गिरोगे कि अपनी हारी हुई बाजी जीतने के लिए कम से कम इतना आप गिर ही चुके हैं की अपनी शक्ति का प्रयोग कर आप लोगों ने भानु प्रताप को दाँव पर लगा प्रताप भानु (राक्षस कुल में शामिल करा ही दिया और उन्हें हमें ही पावन बनाना है) बना दिया। सायद मई क्या कह रहा हूँ उसे आप लोग समझ रहे होंगे। मै तो इतना सरल की पद, प्रकासन संख्या और प्रतिष्ठा का ध्यान किये बिना अनवरत आप लोगों की सेवा में हूँ निःस्वार्थ भाव से पर आप मुझे लगातार दबाने की कोशिस किये जा रहे हैं उम्र में बड़े होकर पर मेरे साथ मुझसे छोटे ने जो किया अगर वह मै आप के साथ कर दूँ तो यह ब्रह्माण्ड विध्वंश हो जाए मतलब इस दुनिया में सीता, रुक्मिणी-राधा और सती/उमा/पार्वती/अपर्णा/गिरिजा/गौरी इस दुनिआ को तहस नहस कर दें। तो ज़रा सोच समझ लीजिये कुछ करने से पहले की जो सब कुछ आप लोगों को सामान्य दिखा, दिखाई दे रहा और देगा भी वह केवल मेरे भरोसे के विवेक स्वयं में विवेक था अभी तक विवेक है और आगे भी विवेक ही रहेगा। अतः आप की दूकान चलती रही "ऐसा कोई सगा नहीं जिसको मैंने ठगा नहीं" की तर्ज पर तो यह ताल ठोकना और अपना गुणगान करना कम से कम बंद कर दीजिये।

मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा श्रद्धेय श्रीश्रीधर(विष्णु) मुझ रामापुर-223225, आजमगढ़ निवाशी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण कुल का मै, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) के परमगुरु परमपिता परमेश्वर हैं इसमें कोई सक किशी को वैसे ही नहीं होना चाहिए जैसे रामापुर-223225, आजमगढ़ निवाशी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण मेरे ताउजी श्रद्धेय डॉ प्रेमचंद(शिव) को मेरे द्वारा परमपिता परमेश्वर कहे जाने पर कोई शक नहीं होना चाहिए। दोनों ने मुझे मेरे शोध के गुरु और बड़े भैया कश्यप गोत्रीय पाण्डेय जी से परिचित कराया और बताया की तुम विशेष प्रयोजन हेतु उनके सानिध्य में रहो और उनका साथ दो और दीक्षा और शिक्षा लो वे भी कश्यप गोत्रीय ही हैं। प्रारंभिक दौर से स्नातक तक के घरेलू गुरु मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण छोटे मामा श्रद्धेय भानु प्रताप रहे तो सूर्य और चन्द्रमा दोनों मेरे गुरु रह चुके हैं और दोनों से उनका गुण-दोष शीख चुका हूँ तो निवेदन है की गोरे और काले का युद्ध मुझसे न लड़ा जाय और काले होने पर नस्ल भेद के किशी भी आरोप के डर से मै आप को गलत करने की इजाजत दे दूंगा ऐसा न समझियेगा और गोरे होने पर प्रोत्साहित करूंगा आप के गलत करने पर यह भी नहीं है। सत्कर्म और सतउद्द्योग कीजिये और सदाचार अपनाइये व्यवहारिक रूप में ही सही हम आप का सम्मान करेंगे और उसका आप अच्छा परिणाम आज नहीं तो कल जरूर पाएंगे पर अगर आँख दिखाएंगे तो फिर ठीक नहीं।

मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा श्रद्धेय श्रीश्रीधर(विष्णु) मुझ रामापुर-223225, आजमगढ़ निवाशी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण कुल का मै, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) के परमगुरु परमपिता परमेश्वर हैं इसमें कोई सक किशी को वैसे ही नहीं होना चाहिए जैसे रामापुर-223225, आजमगढ़ निवाशी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण मेरे ताउजी श्रद्धेय डॉ प्रेमचंद(शिव) को मेरे द्वारा परमपिता परमेश्वर कहे जाने पर कोई शक नहीं होना चाहिए।  दोनों ने मुझे मेरे शोध के गुरु और बड़े भैया कश्यप गोत्रीय पाण्डेय जी से परिचित कराया और बताया की तुम विशेष प्रयोजन हेतु उनके सानिध्य में रहो और उनका साथ दो और दीक्षा और शिक्षा लो वे भी कश्यप गोत्रीय ही हैं। प्रारंभिक दौर से स्नातक तक के घरेलू गुरु मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण छोटे मामा श्रद्धेय भानु प्रताप रहे तो सूर्य और चन्द्रमा दोनों मेरे गुरु रह चुके हैं और दोनों से उनका गुण-दोष शीख चुका हूँ तो निवेदन है की गोरे और काले का युद्ध मुझसे न लड़ा जाय और काले होने पर नस्ल भेद के किशी भी आरोप के डर से मै आप को गलत करने की इजाजत दे दूंगा ऐसा न समझियेगा और गोरे होने पर प्रोत्साहित करूंगा आप के गलत करने पर यह भी नहीं है। सत्कर्म और सतउद्द्योग कीजिये और सदाचार अपनाइये व्यवहारिक रूप में ही सही हम आप का सम्मान करेंगे और उसका आप अच्छा परिणाम आज नहीं तो कल जरूर पाएंगे पर अगर आँख दिखाएंगे तो फिर ठीक नहीं।


रामापुर-223225, आजमगढ़ निवाशी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र:बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण कुल का मै, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) स्वयं जब किशी नामतः मानव रूप धारी नारायण, मानवरूपधारी हंशदेव/ब्रह्मा और मानवरूपधारी महादेव से कम नहीं तो फिर नामतः किशी भूधर(आत्माविहीन स्थूल पर्वत/नग) नारायण से किस प्रकार कम हूँ?

रामापुर-223225, आजमगढ़ निवाशी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र:बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण कुल का मै, विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) स्वयं जब किशी नामतः मानव रूप धारी नारायण, मानवरूपधारी हंशदेव/ब्रह्मा और मानवरूपधारी महादेव से कम नहीं तो फिर नामतः किशी भूधर(आत्माविहीन स्थूल पर्वत/नग) नारायण से किस प्रकार कम हूँ?

इस्लामियत और ईसाइयत के आदम:प्रथम आदमी और सनातन हिन्दू धर्म के मनु:प्रथम मानव जब कश्यप ऋषि ही थे मतलब दशरथ और वशुदेव ही थे तो मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किये हुए 5 प्रमुख तथ्य पूर्णतः सत्य हैं (इस्लाम राम के सामानांतर जरूर चलता पर राम का दुश्मन नहीं और ईसाइयत कृष्ण के सामानांतर जरूर चलता है पर वह कृष्ण का दुश्मन नहीं क्योंकि दोनों नहीं चाहते हैं की रामकृष्ण का अंत हो बल्कि वे इन्हे अपना आधार मानते हैं)|

मेरा तो केवल इतना कहना था की:---मनु या आदम मतलब कश्यप ऋषी मतलब कम से कम सामाजिक जीवन में दशरथ और वशुदेव होता है। हिन्दू जिनको मनु (से मानव का आविर्भाव मानते हैं जिसमे मानवता हो न की राक्षसपना तो शूद्र कम से कम अमानवीय नहीं माना जा सकता मतलब उसमे सभ्य समाज से थोड़ा कम मानवता हो ऐसे को आंकते हैं) कहते हैं>>>>>>>>>>> तो प्रकृति आधारित धर्म वाले इस्लाम और ईसाइयत उनको आदम (से आदमी का आविर्भाव मानते हैं जिसमे इंसानियत हो न की दरिंदा तो शूद्र कम से कम दरिंदा नहीं माना जा सकता मतलब उसमे सभ्य समाज से थोड़ा कम की इंसानियत हो ऐसे को आंकते हैं) कहते हैं।>>>>>>तो जो नाम से वशुदेव पुत्र कृष्ण या दशरथ पुत्र राम हो या उनके समान नाम अर्थी हो उसको आप मनु स्मृति जलाते हुए या जलवाते हुए या जलाने और जलवाने का षड्यंत्र रचते और रचाते हुए पाएं तो क्या सोचेंगे और क्या कहेंगे?>>>>>>इस्लामियत और ईसाइयत के आदम:प्रथम आदमी और सनातन हिन्दू धर्म के मनु:प्रथम मानव जब कश्यप ऋषि ही थे मतलब दशरथ और वशुदेव ही थे तो मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किये हुए 5 प्रमुख तथ्य पूर्णतः सत्य हैं (इस्लाम राम के सामानांतर जरूर चलता पर राम का दुश्मन नहीं और ईसाइयत कृष्ण के सामानांतर जरूर चलता है पर वह कृष्ण का दुश्मन नहीं क्योंकि दोनों नहीं चाहते हैं की रामकृष्ण का अंत हो बल्कि वे इन्हे अपना आधार मानते हैं)

१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|

२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है|

3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।

4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.

5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

Thursday, March 10, 2016

दिल्ली तो बहुत दूर है रावण जैसे राक्षस कुल के असली समर्थक तो इस प्रयागराज में ही ब्राह्मण और वैश्य कुल में ही बैठे है जिनको रावणकुल की चिंता महादेव (केदारेश्वर) से भी ज्यादा रहती है। ये रावण की भी शोभायात्रा निकलवाते हैं और उसकी भी आरती करते है फिर भी कहते हैं की मेरी अभिलाषा और मेरा कार्य अभी 14 वर्ष तक पूर्ण नहीं हुआ जबकि 14 वर्ष तो मेरे 10 सितम्बर, 2015 (11-09-2001 to 10-09-2015) में ही पूर्ण हो गए थे और आप का कार्य भी पूर्ण हो गया था (आप पूंछेंगे कैसे?) । जैसे रावण कुल राम में समाहित हो गया था उसी प्रकार वह रावणकुल यहां प्रयागराज में केदारेश्वर(महादेव) में समाहित हो गया और आप की अज्ञानता है की राम और केदारेश्वर(महादेव) स्वयं किशी रावणकुल में समाहित होंगे और अगर आप का यह ख्याल अभी जीवित है आप के अंदर तो वह ख्याली पुलाव मन ही मन में पकाते रहिये ? और तो और शिवरामकृष्ण भी श्रीरामकृष्ण>रामकृष्ण>श्रीराम> राम(महाशिव) हो गए अपने लिए निर्धारित लक्ष्य की कार्यपूर्ती/प्राप्ति के साथ।

दिल्ली तो बहुत दूर है रावण जैसे राक्षस कुल के असली समर्थक तो इस प्रयागराज में ही ब्राह्मण और वैश्य कुल में ही बैठे है जिनको रावणकुल की चिंता महादेव (केदारेश्वर) से भी ज्यादा रहती है। ये रावण की भी शोभायात्रा निकलवाते हैं और उसकी भी आरती करते है फिर भी कहते हैं की मेरी अभिलाषा और मेरा कार्य अभी 14 वर्ष तक पूर्ण नहीं हुआ जबकि 14 वर्ष तो मेरे 10 सितम्बर, 2015 (11-09-2001 to 10-09-2015) में ही पूर्ण हो गए थे और आप का कार्य भी पूर्ण हो गया था (आप पूंछेंगे कैसे?) । जैसे रावण कुल राम में समाहित हो गया था उसी प्रकार वह रावणकुल यहां प्रयागराज में केदारेश्वर(महादेव) में समाहित हो गया और आप की अज्ञानता है की राम और केदारेश्वर(महादेव) स्वयं किशी रावणकुल में समाहित होंगे और अगर आप का यह ख्याल अभी जीवित है आप के अंदर तो वह ख्याली पुलाव मन ही मन में पकाते रहिये ? और तो और शिवरामकृष्ण भी श्रीरामकृष्ण>रामकृष्ण>श्रीराम> राम(महाशिव) हो गए अपने लिए निर्धारित लक्ष्य की कार्यपूर्ती/प्राप्ति के साथ।
बालकाण्ड छठा विश्राम (प्रतापभानु की कथा)
चौपाई :
* सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी॥
बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥1॥
भावार्थ:-हे मुनि! वह पवित्र और प्राचीन कथा सुनो, जो शिवजी ने पार्वती से कही थी। संसार में प्रसिद्ध एक कैकय देश है। वहाँ सत्यकेतु नाम का राजा रहता (राज्य करता) था॥1॥
* धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना॥
तेहि कें भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा॥2॥
भावार्थ:-वह धर्म की धुरी को धारण करने वाला, नीति की खान, तेजस्वी, प्रतापी, सुशील और बलवान था, उसके दो वीर पुत्र हुए, जो सब गुणों के भंडार और बड़े ही रणधीर थे॥2॥
* राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रतापभानु अस ताही॥
अपर सुतहि अरिमर्दन नामा। भुजबल अतुल अचल संग्रामा॥3॥
भावार्थ:-राज्य का उत्तराधिकारी जो बड़ा लड़का था, उसका नाम प्रतापभानु था। दूसरे पुत्र का नाम अरिमर्दन था, जिसकी भुजाओं में अपार बल था और जो युद्ध में (पर्वत के समान) अटल रहता था॥3॥
* भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती॥
जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा॥4॥
भावार्थ:-भाई-भाई में बड़ा मेल और सब प्रकार के दोषों और छलों से रहित (सच्ची) प्रीति थी। राजा ने जेठे पुत्र को राज्य दे दिया और आप भगवान (के भजन) के लिए वन को चल दिए॥4॥
दोहा :
* जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस।
प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस॥153॥
भावार्थ:-जब प्रतापभानु राजा हुआ, देश में उसकी दुहाई फिर गई। वह वेद में बताई हुई विधि के अनुसार उत्तम रीति से प्रजा का पालन करने लगा। उसके राज्य में पाप का कहीं लेश भी नहीं रह गया॥153॥
चौपाई :
* नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना॥
सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा॥1॥
भावार्थ:-राजा का हित करने वाला और शुक्राचार्य के समान बुद्धिमान धर्मरुचि नामक उसका मंत्री था। इस प्रकार बुद्धिमान मंत्री और बलवान तथा वीर भाई के साथ ही स्वयं राजा भी बड़ा प्रतापी और रणधीर था॥1॥
* सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा॥
सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना॥2॥
भावार्थ:-साथ में अपार चतुरंगिणी सेना थी, जिसमें असंख्य योद्धा थे, जो सब के सब रण में जूझ मरने वाले थे। अपनी सेना को देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और घमाघम नगाड़े बजने लगे॥2॥
* बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई॥
जहँ तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआईं॥3॥
भावार्थ:-दिग्विजय के लिए सेना सजाकर वह राजा शुभ दिन (मुहूर्त) साधकर और डंका बजाकर चला। जहाँ-तहाँ बहुतसी लड़ाइयाँ हुईं। उसने सब राजाओं को बलपूर्वक जीत लिया॥3॥
* सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हे॥
सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला॥4॥
भावार्थ:-अपनी भुजाओं के बल से उसने सातों द्वीपों (भूमिखण्डों) को वश में कर लिया और राजाओं से दंड (कर) ले-लेकर उन्हें छोड़ दिया। सम्पूर्ण पृथ्वी मंडल का उस समय प्रतापभानु ही एकमात्र (चक्रवर्ती) राजा था॥4॥
दोहा :
* स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।
अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु॥154॥
भावार्थ:-संसारभर को अपनी भुजाओं के बल से वश में करके राजा ने अपने नगर में प्रवेश किया। राजा अर्थ, धर्म और काम आदि के सुखों का समयानुसार सेवन करता था॥154॥
चौपाई :
* भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई॥
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी॥1॥
भावार्थ:-राजा प्रतापभानु का बल पाकर भूमि सुंदर कामधेनु (मनचाही वस्तु देने वाली) हो गई। (उनके राज्य में) प्रजा सब (प्रकार के) दुःखों से रहित और सुखी थी और सभी स्त्री-पुरुष सुंदर और धर्मात्मा थे॥1॥
* सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती॥
गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा॥2॥
भावार्थ:-धर्मरुचि मंत्री का श्री हरि के चरणों में प्रेम था। वह राजा के हित के लिए सदा उसको नीति सिखाया करता था। राजा गुरु, देवता, संत, पितर और ब्राह्मण- इन सबकी सदा सेवा करता रहता था॥2॥
*भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने॥
दिन प्रति देइ बिबिध बिधि दाना। सुनइ सास्त्र बर बेद पुराना॥3॥
भावार्थ:-वेदों में राजाओं के जो धर्म बताए गए हैं, राजा सदा आदरपूर्वक और सुख मानकर उन सबका पालन करता था। प्रतिदिन अनेक प्रकार के दान देता और उत्तम शास्त्र, वेद और पुराण सुनता था॥3॥
* नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा॥
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह विचित्र बनाए॥4॥
भावार्थ:-उसने बहुत सी बावलियाँ, कुएँ, तालाब, फुलवाड़ियाँ सुंदर बगीचे, ब्राह्मणों के लिए घर और देवताओं के सुंदर विचित्र मंदिर सब तीर्थों में बनवाए॥4॥
दोहा :
* जहँ लजि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।
बार सहस्र सहस्र नृप किए सहित अनुराग॥155॥
भावार्थ:-वेद और पुराणों में जितने प्रकार के यज्ञ कहे गए हैं, राजा ने एक-एक करके उन सब यज्ञों को प्रेम सहित हजार-हजार बार किया॥155॥
चौपाई :
* हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना॥
करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी॥1॥
भावार्थ:-(राजा के) हृदय में किसी फल की टोह (कामना) न थी। राजा बड़ा ही बुद्धिमान और ज्ञानी था। वह ज्ञानी राजा कर्म, मन और वाणी से जो कुछ भी धर्म करता था, सब भगवान वासुदेव को अर्पित करते रहता था॥1॥
* चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा॥
बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ॥2॥
भावार्थ:-एक बार वह राजा एक अच्छे घोड़े पर सवार होकर, शिकार का सब सामान सजाकर विंध्याचल के घने जंगल में गया और वहाँ उसने बहुत से उत्तम-उत्तम हिरन मारे॥2॥
* फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥
बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोध बस उगिलत नाहीं॥3॥
भावार्थ:-राजा ने वन में फिरते हुए एक सूअर को देखा। (दाँतों के कारण वह ऐसा दिख पड़ता था) मानो चन्द्रमा को ग्रसकर (मुँह में पकड़कर) राहु वन में आ छिपा हो। चन्द्रमा बड़ा होने से उसके मुँह में समाता नहीं है और मानो क्रोधवश वह भी उसे उगलता नहीं है॥3॥
* कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई॥
घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ॥4॥
भावार्थ:-यह तो सूअर के भयानक दाँतों की शोभा कही गई। (इधर) उसका शरीर भी बहुत विशाल और मोटा था। घोड़े की आहट पाकर वह घुरघुराता हुआ कान उठाए चौकन्ना होकर देख रहा था॥4॥
दोहा :
* नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु॥156॥
भावार्थ:-नील पर्वत के शिखर के समान विशाल (शरीर वाले) उस सूअर को देखकर राजा घोड़े को चाबुक लगाकर तेजी से चला और उसने सूअर को ललकारा कि अब तेरा बचाव नहीं हो सकता॥156॥
चौपाई :
* आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी॥
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना॥1॥
भावार्थ:-अधिक शब्द करते हुए घोड़े को (अपनी तरफ) आता देखकर सूअर पवन वेग से भाग चला। राजा ने तुरंत ही बाण को धनुष पर चढ़ाया। सूअर बाण को देखते ही धरती में दुबक गया॥1॥
* तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा॥
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ सँग लागा॥2॥
भावार्थ:-राजा तक-तककर तीर चलाता है, परन्तु सूअर छल करके शरीर को बचाता जाता है। वह पशु कभी प्रकट होता और कभी छिपता हुआ भाग जाता था और राजा भी क्रोध के वश उसके साथ (पीछे) लगा चला जाता था॥2॥
* गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू॥
अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू॥3॥
भावार्थ:-सूअर बहुत दूर ऐसे घने जंगल में चला गया, जहाँ हाथी-घोड़े का निबाह (गमन) नहीं था। राजा बिलकुल अकेला था और वन में क्लेश भी बहुत था, फिर भी राजा ने उस पशु का पीछा नहीं छोड़ा॥3॥
* कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा॥
अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई॥4॥
भावार्थ:-राजा को बड़ा धैर्यवान देखकर, सूअर भागकर पहाड़ की एक गहरी गुफा में जा घुसा। उसमें जाना कठिन देखकर राजा को बहुत पछताकर लौटना पड़ा, पर उस घोर वन में वह रास्ता भूल गया॥4॥
दोहा :
*खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।
खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत॥157॥
भावार्थ:-बहुत परिश्रम करने से थका हुआ और घोड़े समेत भूख-प्यास से व्याकुल राजा नदी-तालाब खोजता-खोजता पानी बिना बेहाल हो गया॥157॥
चौपाई :
* फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा॥
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई॥1॥
भावार्थ:- वन में फिरते-फिरते उसने एक आश्रम देखा, वहाँ कपट से मुनि का वेष बनाए एक राजा रहता था, जिसका देश राजा प्रतापभानु ने छीन लिया था और जो सेना को छोड़कर युद्ध से भाग गया था॥1॥
* समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी॥
गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी॥2॥
भावार्थ:-प्रतापभानु का समय (अच्छे दिन) जानकर और अपना कुसमय (बुरे दिन) अनुमानकर उसके मन में बड़ी ग्लानि हुई। इससे वह न तो घर गया और न अभिमानी होने के कारण राजा प्रतापभानु से ही मिला (मेल किया)॥2॥
* रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा॥
तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहिं तब चीन्हा॥3॥
भावार्थ:-दरिद्र की भाँति मन ही में क्रोध को मारकर वह राजा तपस्वी के वेष में वन में रहता था। राजा (प्रतापभानु) उसी के पास गया। उसने तुरंत पहचान लिया कि यह प्रतापभानु है॥3॥
* राउ तृषित नहिं सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा॥4॥
भावार्थ:-राजा प्यासा होने के कारण (व्याकुलता में) उसे पहचान न सका। सुंदर वेष देखकर राजा ने उसे महामुनि समझा और घोड़े से उतरकर उसे प्रणाम किया, परन्तु बड़ा चतुर होने के कारण राजा ने उसे अपना नाम नहीं बताया॥4॥
दोहा :
* भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरू दीन्ह देखाइ।
मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ॥158॥
भावार्थ:-राजा को प्यासा देखकर उसने सरोवर दिखला दिया। हर्षित होकर राजा ने घोड़े सहित उसमें स्नान और जलपान किया॥158॥
चौपाई :
* गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ॥
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी॥1॥
भावार्थ:-सारी थकावट मिट गई, राजा सुखी हो गया। तब तपस्वी उसे अपने आश्रम में ले गया और सूर्यास्त का समय जानकर उसने (राजा को बैठने के लिए) आसन दिया। फिर वह तपस्वी कोमल वाणी से बोला- ॥1॥
*को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें॥
चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें॥2॥
भावार्थ:-तुम कौन हो? सुंदर युवक होकर, जीवन की परवाह न करके वन में अकेले क्यों फिर रहे हो? तुम्हारे चक्रवर्ती राजा के से लक्षण देखकर मुझे बड़ी दया आती है॥2॥
* नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा॥
फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बड़ें भाग देखेउँ पद आई॥3॥
भावार्थ:-(राजा ने कहा-) हे मुनीश्वर! सुनिए, प्रतापभानु नाम का एक राजा है, मैं उसका मंत्री हूँ। शिकार के लिए फिरते हुए राह भूल गया हूँ। बड़े भाग्य से यहाँ आकर मैंने आपके चरणों के दर्शन पाए हैं॥3॥
* हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा॥
कह मुनि तात भयउ अँधिआरा। जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा॥4॥
भावार्थ:-हमें आपका दर्शन दुर्लभ था, इससे जान पड़ता है कुछ भला होने वाला है। मुनि ने कहा- हे तात! अँधेरा हो गया। तुम्हारा नगर यहाँ से सत्तर योजन पर है॥4॥
दोहा :
* निसा घोर गंभीर बन पंथ न सुनहु सुजान।
बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान॥159 (क)॥
भावार्थ:-हे सुजान! सुनो, घोर अँधेरी रात है, घना जंगल है, रास्ता नहीं है, ऐसा समझकर तुम आज यहीं ठहर जाओ, सबेरा होते ही चले जाना॥159 (क)॥
* तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥159(ख)॥
भावार्थ:-तुलसीदासजी कहते हैं- जैसी भवितव्यता (होनहार) होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है। या तो वह आप ही उसके पास आती है या उसको वहाँ ले जाती है॥159 (ख)॥
चौपाई :
* भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा॥
नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य सराही॥1॥
भावार्थ:-हे नाथ! बहुत अच्छा, ऐसा कहकर और उसकी आज्ञा सिर चढ़ाकर, घोड़े को वृक्ष से बाँधकर राजा बैठ गया। राजा ने उसकी बहुत प्रकार से प्रशंसा की और उसके चरणों की वंदना करके अपने भाग्य की सराहना की॥1॥
* पुनि बोलेउ मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई॥
मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी॥2॥
भावार्थ:-फिर सुंदर कोमल वाणी से कहा- हे प्रभो! आपको पिता जानकर मैं ढिठाई करता हूँ। हे मुनीश्वर! मुझे अपना पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम (धाम) विस्तार से बतलाइए॥2॥
* तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुहृद सो कपट सयाना॥
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥3॥
भावार्थ:-राजा ने उसको नहीं पहचाना, पर वह राजा को पहचान गया था। राजा तो शुद्ध हृदय था और वह कपट करने में चतुर था। एक तो वैरी, फिर जाति का क्षत्रिय, फिर राजा। वह छल-बल से अपना काम बनाना चाहता था॥3॥
* समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती॥
ससरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना॥4॥
भावार्थ:-वह शत्रु अपने राज्य सुख को समझ करके (स्मरण करके) दुःखी था। उसकी छाती (कुम्हार के) आँवे की आग की तरह (भीतर ही भीतर) सुलग रही थी। राजा के सरल वचन कान से सुनकर, अपने वैर को यादकर वह हृदय में हर्षित हुआ॥4॥
दोहा :
* कपट बोरि बानी मृदल बोलेउ जुगुति समेत।
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेत॥160॥
भावार्थ:-वह कपट में डुबोकर बड़ी युक्ति के साथ कोमल वाणी बोला- अब हमारा नाम भिखारी है, क्योंकि हम निर्धन और अनिकेत (घर-द्वारहीन) हैं॥160॥
चौपाई :
* कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना॥
सदा रहहिं अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ॥1॥
भावार्थ:-राजा ने कहा- जो आपके सदृश विज्ञान के निधान और सर्वथा अभिमानरहित होते हैं, वे अपने स्वरूप को सदा छिपाए रहते हैं, क्योंकि कुवेष बनाकर रहने में ही सब तरह का कल्याण है (प्रकट संत वेश में मान होने की सम्भावना है और मान से पतन की)॥1॥
* तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें॥
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा॥2॥
भावार्थ:-इसी से तो संत और वेद पुकारकर कहते हैं कि परम अकिंचन (सर्वथा अहंकार, ममता और मानरहित) ही भगवान को प्रिय होते हैं। आप सरीखे निर्धन, भिखारी और गृहहीनों को देखकर ब्रह्मा और शिवजी को भी संदेह हो जाता है (कि वे वास्तविक संत हैं या भिखारी)॥2॥
* जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी॥
सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी॥3॥
भावार्थ:-आप जो हों सो हों (अर्थात्‌ जो कोई भी हों), मैं आपके चरणों में नमस्कार करता हूँ। हे स्वामी! अब मुझ पर कृपा कीजिए। अपने ऊपर राजा की स्वाभाविक प्रीति और अपने विषय में उसका अधिक विश्वास देखकर॥2॥
* सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई॥
सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला॥4॥
भावार्थ:-सब प्रकार से राजा को अपने वश में करके, अधिक स्नेह दिखाता हुआ वह (कपट-तपस्वी) बोला- हे राजन्‌! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, मुझे यहाँ रहते बहुत समय बीत गया॥4॥
दोहा :
* अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।
लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु॥161 क॥
भावार्थ:-अब तक न तो कोई मुझसे मिला और न मैं अपने को किसी पर प्रकट करता हूँ, क्योंकि लोक में प्रतिष्ठा अग्नि के समान है, जो तप रूपी वन को भस्म कर डालती है॥161 (क)॥
सोरठा :
* तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥161 ख॥
भावार्थ:-तुलसीदासजी कहते हैं- सुंदर वेष देखकर मूढ़ नहीं (मूढ़ तो मूढ़ ही हैं), चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं। सुंदर मोर को देखो, उसका वचन तो अमृत के समान है और आहार साँप का है॥161 (ख)॥
चौपाई :
* तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं॥
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाए। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ॥1॥
भावार्थ:-(कपट-तपस्वी ने कहा-) इसी से मैं जगत में छिपकर रहता हूँ। श्री हरि को छोड़कर किसी से कुछ भी प्रयोजन नहीं रखता। प्रभु तो बिना जनाए ही सब जानते हैं। फिर कहो संसार को रिझाने से क्या सिद्धि मिलेगी॥1॥
* तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें॥
अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही॥2॥
भावार्थ:-तुम पवित्र और सुंदर बुद्धि वाले हो, इससे मुझे बहुत ही प्यारे हो और तुम्हारी भी मुझ पर प्रीति और विश्वास है। हे तात! अब यदि मैं तुमसे कुछ छिपाता हूँ, तो मुझे बहुत ही भयानक दोष लगेगा॥2॥
* जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी॥3॥
भावार्थ:-ज्यों-ज्यों वह तपस्वी उदासीनता की बातें कहता था, त्यों ही त्यों राजा को विश्वास उत्पन्न होता जाता था। जब उस बगुले की तरह ध्यान लगाने वाले (कपटी) मुनि ने राजा को कर्म, मन और वचन से अपने वश में जाना, तब वह बोला- ॥3॥
* नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोलेउ पुनि सिरु नाई॥
कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी॥4॥
भावार्थ:-हे भाई! हमारा नाम एकतनु है। यह सुनकर राजा ने फिर सिर नवाकर कहा- मुझे अपना अत्यन्त (अनुरागी) सेवक जानकर अपने नाम का अर्थ समझाकर कहिए॥4॥
दोहा :
* आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि॥162॥
भावार्थ:-(कपटी मुनि ने कहा-) जब सबसे पहले सृष्टि उत्पन्न हुई थी, तभी मेरी उत्पत्ति हुई थी। तबसे मैंने फिर दूसरी देह नहीं धारण की, इसी से मेरा नाम एकतनु है॥162॥
चौपाई :
*जनि आचरजु करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं॥
तप बल तें जग सृजइ बिधाता। तप बल बिष्नु भए परित्राता॥1॥
भावार्थ:-हे पुत्र! मन में आश्चर्य मत करो, तप से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, तप के बल से ब्रह्मा जगत को रचते हैं। तप के ही बल से विष्णु संसार का पालन करने वाले बने हैं॥1॥
* तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा॥
भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा॥2॥
भावार्थ:-तप ही के बल से रुद्र संहार करते हैं। संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तप से न मिल सके। यह सुनकर राजा को बड़ा अनुराग हुआ। तब वह (तपस्वी) पुरानी कथाएँ कहने लगा॥2॥
* करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका॥
उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी॥3॥
भावार्थ:-कर्म, धर्म और अनेकों प्रकार के इतिहास कहकर वह वैराग्य और ज्ञान का निरूपण करने लगा। सृष्टि की उत्पत्ति, पालन (स्थिति) और संहार (प्रलय) की अपार आश्चर्यभरी कथाएँ उसने विस्तार से कही॥3॥
* सुनि महीप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहन तब लयउ॥
कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही॥4॥
भावार्थ:-राजा सुनकर उस तपस्वी के वश में हो गया और तब वह उसे अपना नाम बताने लगा। तपस्वी ने कहा- राजन ! मैं तुमको जानता हूँ। तुमने कपट किया, वह मुझे अच्छा लगा॥4॥
सोरठा :
* सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप।
मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव॥163॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! सुनो, ऐसी नीति है कि राजा लोग जहाँ-तहाँ अपना नाम नहीं कहते। तुम्हारी वही चतुराई समझकर तुम पर मेरा बड़ा प्रेम हो गया है॥163॥
चौपाई :
* नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा॥1॥
भावार्थ:-तुम्हारा नाम प्रतापभानु है, महाराज सत्यकेतु तुम्हारे पिता थे। हे राजन्‌! गुरु की कृपा से मैं सब जानता हूँ, पर अपनी हानि समझकर कहता नहीं॥1॥
* देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई॥
उपजि परी ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें॥2॥
भावार्थ:-हे तात! तुम्हारा स्वाभाविक सीधापन (सरलता), प्रेम, विश्वास और नीति में निपुणता देखकर मेरे मन में तुम्हारे ऊपर बड़ी ममता उत्पन्न हो गई है, इसीलिए मैं तुम्हारे पूछने पर अपनी कथा कहता हूँ॥2॥
* अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं॥
सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना॥3॥
भावार्थ:-अब मैं प्रसन्न हूँ, इसमें संदेह न करना। हे राजन्‌! जो मन को भावे वही माँग लो। सुंदर (प्रिय) वचन सुनकर राजा हर्षित हो गया और (मुनि के) पैर पकड़कर उसने बहुत प्रकार से विनती की॥3॥
* कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें॥
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी॥4॥
भावार्थ:-हे दयासागर मुनि! आपके दर्शन से ही चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) मेरी मुट्ठी में आ गए। तो भी स्वामी को प्रसन्न देखकर मैं यह दुर्लभ वर माँगकर (क्यों न) शोकरहित हो जाऊँ॥4॥
दोहा :
* जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।
एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ॥164॥
भावार्थ:-मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दुःख से रहित हो जाए, मुझे युद्ध में कोई जीत न सके और पृथ्वी पर मेरा सौ कल्पतक एकछत्र अकण्टक राज्य हो॥164॥
चौपाई :
* कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ॥
कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा॥1॥
भावार्थ:-तपस्वी ने कहा- हे राजन्‌! ऐसा ही हो, पर एक बात कठिन है, उसे भी सुन लो। हे पृथ्वी के स्वामी! केवल ब्राह्मण कुल को छोड़ काल भी तुम्हारे चरणों पर सिर नवाएगा॥1॥
* तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा॥
जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा॥2॥
भावार्थ:-तप के बल से ब्राह्मण सदा बलवान रहते हैं। उनके क्रोध से रक्षा करने वाला कोई नहीं है। हे नरपति! यदि तुम ब्राह्मणों को वश में कर लो, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तुम्हारे अधीन हो जाएँगे॥2॥
* चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई॥
बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहिं कवनेहुँ काला॥3॥
भावार्थ:-ब्राह्मण कुल से जोर जबर्दस्ती नहीं चल सकती, मैं दोनों भुजा उठाकर सत्य कहता हूँ। हे राजन्‌! सुनो, ब्राह्मणों के शाप बिना तुम्हारा नाश किसी काल में नहीं होगा॥3॥
* हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू॥
तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्बकाल कल्याना॥4॥
भावार्थ:-राजा उसके वचन सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ और कहने लगा- हे स्वामी! मेरा नाश अब नहीं होगा। हे कृपानिधान प्रभु! आपकी कृपा से मेरा सब समय कल्याण होगा॥4॥
दोहा :
* एवमस्तु कहि कपट मुनि बोला कुटिल बहोरि।
मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि॥165॥
भावार्थ:-‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर वह कुटिल कपटी मुनि फिर बोला- (किन्तु) तुम मेरे मिलने तथा अपने राह भूल जाने की बात किसी से (कहना नहीं, यदि) कह दोगे, तो हमारा दोष नहीं॥165॥
चौपाई :
* तातें मैं तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा॥
छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी॥1॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! मैं तुमको इसलिए मना करता हूँ कि इस प्रसंग को कहने से तुम्हारी बड़ी हानि होगी। छठे कान में यह बात पड़ते ही तुम्हारा नाश हो जाएगा, मेरा यह वचन सत्य जानना॥1॥
* यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा॥
आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं॥2॥
भावार्थ:-हे प्रतापभानु! सुनो, इस बात के प्रकट करने से अथवा ब्राह्मणों के शाप से तुम्हारा नाश होगा और किसी उपाय से, चाहे ब्रह्मा और शंकर भी मन में क्रोध करें, तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी॥2॥
* सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा॥
राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥3॥
भावार्थ:-राजा ने मुनि के चरण पकड़कर कहा- हे स्वामी! सत्य ही है। ब्राह्मण और गुरु के क्रोध से, कहिए, कौन रक्षा कर सकता है? यदि ब्रह्मा भी क्रोध करें, तो गुरु बचा लेते हैं, पर गुरु से विरोध करने पर जगत में कोई भी बचाने वाला नहीं है॥3॥
* जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें॥
एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा॥4॥
भावार्थ:-यदि मैं आपके कथन के अनुसार नहीं चलूँगा, तो (भले ही) मेरा नाश हो जाए। मुझे इसकी चिन्ता नहीं है। मेरा मन तो हे प्रभो! (केवल) एक ही डर से डर रहा है कि ब्राह्मणों का शाप बड़ा भयानक होता है॥4॥
दोहा :
* होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।
तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउ॥166॥
भावार्थ:-वे ब्राह्मण किस प्रकार से वश में हो सकते हैं, कृपा करके वह भी बताइए। हे दीनदयालु! आपको छोड़कर और किसी को मैं अपना हितू नहीं देखता॥166॥
चौपाई :
* सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं॥
अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परन्तु एक कठिनाई॥1॥
भावार्थ:-(तपस्वी ने कहा-) हे राजन्‌ !सुनो, संसार में उपाय तो बहुत हैं, पर वे कष्ट साध्य हैं (बड़ी कठिनता से बनने में आते हैं) और इस पर भी सिद्ध हों या न हों (उनकी सफलता निश्चित नहीं है) हाँ, एक उपाय बहुत सहज है, परन्तु उसमें भी एक कठिनता है॥1॥
* मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई॥
आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ॥2॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! वह युक्ति तो मेरे हाथ है, पर मेरा जाना तुम्हारे नगर में हो नहीं सकता। जब से पैदा हुआ हूँ, तब से आज तक मैं किसी के घर अथवा गाँव नहीं गया॥2॥
* जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू॥
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी॥3॥
भावार्थ:-परन्तु यदि नहीं जाता हूँ, तो तुम्हारा काम बिगड़ता है। आज यह बड़ा असमंजस आ पड़ा है। यह सुनकर राजा कोमल वाणी से बोला, हे नाथ! वेदों में ऐसी नीति कही है कि- ॥3॥
* बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥4॥
भावार्थ:-बड़े लोग छोटों पर स्नेह करते ही हैं। पर्वत अपने सिरों पर सदा तृण (घास) को धारण किए रहते हैं। अगाध समुद्र अपने मस्तक पर फेन को धारण करता है और धरती अपने सिर पर सदा धूलि को धारण किए रहती है॥4॥
दोहा :
* अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल।
मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल॥167॥
भावार्थ:-ऐसा कहकर राजा ने मुनि के चरण पकड़ लिए। (और कहा-) हे स्वामी! कृपा कीजिए। आप संत हैं। दीनदयालु हैं। (अतः) हे प्रभो! मेरे लिए इतना कष्ट (अवश्य) सहिए॥167॥
चौपाई :
* जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना॥
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही॥1॥
भावार्थ:-राजा को अपने अधीन जानकर कपट में प्रवीण तपस्वी बोला- हे राजन्‌! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, जगत में मुझे कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥1॥
* अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा॥
जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ॥2॥
भावार्थ:-मैं तुम्हारा काम अवश्य करूँगा, (क्योंकि) तुम, मन, वाणी और शरीर (तीनों) से मेरे भक्त हो। पर योग, युक्ति, तप और मंत्रों का प्रभाव तभी फलीभूत होता है जब वे छिपाकर किए जाते हैं॥2॥
* जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई॥3॥
भावार्थ:-हे नरपति! मैं यदि रसोई बनाऊँ और तुम उसे परोसो और मुझे कोई जानने न पावे, तो उस अन्न को जो-जो खाएगा, सो-सो तुम्हारा आज्ञाकारी बन जाएगा॥3॥
* पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू॥4॥
भावार्थ:-यही नहीं, उन (भोजन करने वालों) के घर भी जो कोई भोजन करेगा, हे राजन्‌! सुनो, वह भी तुम्हारे अधीन हो जाएगा। हे राजन्‌! जाकर यही उपाय करो और वर्षभर (भोजन कराने) का संकल्प कर लेना॥4॥
दोहा :
* नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिं करबि जेवनार॥168॥
भावार्थ:-नित्य नए एक लाख ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमंत्रित करना। मैं तुम्हारे सकंल्प (के काल अर्थात एक वर्ष) तक प्रतिदिन भोजन बना दिया करूँगा॥168॥
चौपाई :
* एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥
करिहहिं बिप्र होममख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥1॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! इस प्रकार बहुत ही थोड़े परिश्रम से सब ब्राह्मण तुम्हारे वश में हो जाएँगे। ब्राह्मण हवन, यज्ञ और सेवा-पूजा करेंगे, तो उस प्रसंग (संबंध) से देवता भी सहज ही वश में हो जाएँगे॥1॥
* और एक तोहि कहउँ लखाऊ। मैं एहिं बेष न आउब काऊ॥
तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया॥2॥
भावार्थ:-मैं एक और पहचान तुमको बताए देता हूँ कि मैं इस रूप में कभी न आऊँगा। हे राजन्‌! मैं अपनी माया से तुम्हारे पुरोहित को हर लाऊँगा॥2॥\
* तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना॥
मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा॥3॥
भावार्थ:-तप के बल से उसे अपने समान बनाकर एक वर्ष यहाँ रखूँगा और हे राजन्‌! सुनो, मैं उसका रूप बनाकर सब प्रकार से तुम्हारा काम सिद्ध करूँगा॥3॥
* गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे॥
मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचैहउँ सोवतहि निकेता॥4॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! रात बहुत बीत गई, अब सो जाओ। आज से तीसरे दिन मुझसे तुम्हारी भेंट होगी। तप के बल से मैं घोड़े सहित तुमको सोते ही में घर पहुँचा दूँगा॥4॥
दोहा :
* मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि।
जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि॥169॥
भावार्थ:-मैं वही (पुरोहित का) वेश धरकर आऊँगा। जब एकांत में तुमको बुलाकर सब कथा सुनाऊँगा, तब तुम मुझे पहचान लेना॥169॥
चौपाई :
* सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी॥
श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई॥1॥
भावार्थ:-राजा ने आज्ञा मानकर शयन किया और वह कपट-ज्ञानी आसन पर जा बैठा। राजा थका था, (उसे) खूब (गहरी) नींद आ गई। पर वह कपटी कैसे सोता। उसे तो बहुत चिन्ता हो रही थी॥1॥
* कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा॥
परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा॥2॥
भावार्थ:-(उसी समय) वहाँ कालकेतु राक्षस आया, जिसने सूअर बनकर राजा को भटकाया था। वह तपस्वी राजा का बड़ा मित्र था और खूब छल-प्रपंच जानता था॥2॥
* तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई॥
प्रथमहिं भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे॥3॥
भावार्थ:-उसके सौ पुत्र और दस भाई थे, जो बड़े ही दुष्ट, किसी से न जीते जाने वाले और देवताओं को दुःख देने वाले थे। ब्राह्मणों, संतों और देवताओं को दुःखी देखकर राजा ने उन सबको पहले ही युद्ध में मार डाला था॥3॥
* तेहिं खल पाछिल बयरु सँभारा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा॥
जेहिं रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ॥4॥
भावार्थ:-उस दुष्ट ने पिछला बैर याद करके तपस्वी राजा से मिलकर सलाह विचारी (षड्यंत्र किया) और जिस प्रकार शत्रु का नाश हो, वही उपाय रचा। भावीवश राजा (प्रतापभानु) कुछ भी न समझ सका॥4॥
दोहा :
* रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।
अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु॥170॥
भावार्थ:-तेजस्वी शत्रु अकेला भी हो तो भी उसे छोटा नहीं समझना चाहिए। जिसका सिर मात्र बचा था, वह राहु आज तक सूर्य-चन्द्रमा को दुःख देता है॥170॥
* तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी॥
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई॥1॥
भावार्थ:-तपस्वी राजा अपने मित्र को देख प्रसन्न हो उठकर मिला और सुखी हुआ। उसने मित्र को सब कथा कह सुनाई, तब राक्षस आनंदित होकर बोला॥1॥
* अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥
परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई॥2॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! सुनो, जब तुमने मेरे कहने के अनुसार (इतना) काम कर लिया, तो अब मैंने शत्रु को काबू में कर ही लिया (समझो)। तुम अब चिन्ता त्याग सो रहो। विधाता ने बिना ही दवा के रोग दूर कर दिया॥2॥
* कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथें दिवस मिलब मैं आई॥
तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी॥3॥
भावार्थ:-कुल सहित शत्रु को जड़-मूल से उखाड़-बहाकर, (आज से) चौथे दिन मैं तुमसे आ मिलूँगा। (इस प्रकार) तपस्वी राजा को खूब दिलासा देकर वह महामायावी और अत्यन्त क्रोधी राक्षस चला॥3॥
* भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता॥
नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई॥4॥
भावार्थ:-उसने प्रतापभानु राजा को घोड़े सहित क्षणभर में घर पहुँचा दिया। राजा को रानी के पास सुलाकर घोड़े को अच्छी तरह से घुड़साल में बाँध दिया॥4॥
दोहा :
* राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।
लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि॥171॥
भावार्थ:-फिर वह राजा के पुरोहित को उठा ले गया और माया से उसकी बुद्धि को भ्रम में डालकर उसे उसने पहाड़ की खोह में ला रखा॥171॥
चौपाई :
* आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा॥
जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना॥1॥
भावार्थ:-वह आप पुरोहित का रूप बनाकर उसकी सुंदर सेज पर जा लेटा। राजा सबेरा होने से पहले ही जागा और अपना घर देखकर उसने बड़ा ही आश्चर्य माना॥1॥
* मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहिं जेहिं जान न रानी॥
कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं॥2॥
भावार्थ:-मन में मुनि की महिमा का अनुमान करके वह धीरे से उठा, जिसमें रानी न जान पावे। फिर उसी घोड़े पर चढ़कर वन को चला गया। नगर के किसी भी स्त्री-पुरुष ने नहीं जाना॥2॥
* गएँ जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा॥
उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोक सुमिरि सोइ काजा॥3॥
भावार्थ:-दो पहर बीत जाने पर राजा आया। घर-घर उत्सव होने लगे और बधावा बजने लगा। जब राजा ने पुरोहित को देखा, तब वह (अपने) उसी कार्य का स्मरणकर उसे आश्चर्य से देखने लगा॥3॥
* जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी॥
समय जान उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा॥4॥
भावार्थ:-राजा को तीन दिन युग के समान बीते। उसकी बुद्धि कपटी मुनि के चरणों में लगी रही। निश्चित समय जानकर पुरोहित (बना हुआ राक्षस) आया और राजा के साथ की हुई गुप्त सलाह के अनुसार (उसने अपने) सब विचार उसे समझाकर कह दिए॥4॥
दोहा :
* नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।
बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत॥172॥
भावार्थ:-(संकेत के अनुसार) गुरु को (उस रूप में) पहचानकर राजा प्रसन्न हुआ। भ्रमवश उसे चेत न रहा (कि यह तापस मुनि है या कालकेतु राक्षस)। उसने तुरंत एक लाख उत्तम ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमंत्रण दे दिया॥172॥
चौपाई :
* उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई॥
मायामय तेहिं कीन्हि रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई॥1॥
भावार्थ:-पुरोहित ने छह रस और चार प्रकार के भोजन, जैसा कि वेदों में वर्णन है, बनाए। उसने मायामयी रसोई तैयार की और इतने व्यंजन बनाए, जिन्हें कोई गिन नहीं सकता॥1॥
* बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा॥
भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए॥2॥
भावार्थ:-अनेक प्रकार के पशुओं का मांस पकाया और उसमें उस दुष्ट ने ब्राह्मणों का मांस मिला दिया। सब ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलाया और चरण धोकर आदर सहित बैठाया॥2॥
* परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला॥
बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू॥3॥
भावार्थ:-ज्यों ही राजा परोसने लगा, उसी काल (कालकेतुकृत) आकाशवाणी हुई- हे ब्राह्मणों! उठ-उठकर अपने घर जाओ, यह अन्न मत खाओ। इस (के खाने) में बड़ी हानि है॥3॥
* भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू॥
भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस न आव मुख बानी॥4॥
भावार्थ:-रसोई में ब्राह्मणों का मांस बना है। (आकाशवाणी का) विश्वास मानकर सब ब्राह्मण उठ खड़े हुए। राजा व्याकुल हो गया (परन्तु), उसकी बुद्धि मोह में भूली हुई थी। होनहारवश उसके मुँह से (एक) बात (भी) न निकली॥4॥
दोहा :
*बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।
जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार॥173॥
भावार्थ:-तब ब्राह्मण क्रोध सहित बोल उठे- उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया- अरे मूर्ख राजा! तू जाकर परिवार सहित राक्षस हो॥173॥
चौपाई :
* छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई॥
ईश्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा॥1॥
भावार्थ:-रे नीच क्षत्रिय! तूने तो परिवार सहित ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें नष्ट करना चाहा था, ईश्वर ने हमारे धर्म की रक्षा की। अब तू परिवार सहित नष्ट होगा॥1॥
* संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ॥
नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा॥2॥
भावार्थ:-एक वर्ष के भीतर तेरा नाश हो जाए, तेरे कुल में कोई पानी देने वाला तक न रहेगा। शाप सुनकर राजा भय के मारे अत्यन्त व्याकुल हो गया। फिर सुंदर आकाशवाणी हुई-॥2॥
* बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा॥
चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी॥3॥
भावार्थ:-हे ब्राह्मणों! तुमने विचार कर शाप नहीं दिया। राजा ने कुछ भी अपराध नहीं किया। आकाशवाणी सुनकर सब ब्राह्मण चकित हो गए। तब राजा वहाँ गया, जहाँ भोजन बना था॥3॥
* तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा॥
सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई॥4॥
भावार्थ:-(देखा तो) वहाँ न भोजन था, न रसोइया ब्राह्मण ही था। तब राजा मन में अपार चिन्ता करता हुआ लौटा। उसने ब्राह्मणों को सब वृत्तान्त सुनाया और (बड़ा ही) भयभीत और व्याकुल होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा॥4॥
दोहा :
* भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।
किएँ अन्यथा दोइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर॥174॥
भावार्थ:-हे राजन! यद्यपि तुम्हारा दोष नहीं है, तो भी होनहार नहीं मिटता। ब्राह्मणों का शाप बहुत ही भयानक होता है, यह किसी तरह भी टाले टल नहीं सकता॥174॥
चौपाई :
* अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए॥
सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिरचत हंस काग किए जेहीं॥1॥
भावार्थ:-ऐसा कहकर सब ब्राह्मण चले गए। नगरवासियों ने (जब) यह समाचार पाया, तो वे चिन्ता करने और विधाता को दोष देने लगे, जिसने हंस बनाते-बनाते कौआ कर दिया (ऐसे पुण्यात्मा राजा को देवता बनाना चाहिए था, सो राक्षस बना दिया)॥1॥
* उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई॥
तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए॥2॥
भावार्थ:-पुरोहित को उसके घर पहुँचाकर असुर (कालकेतु) ने (कपटी) तपस्वी को खबर दी। उस दुष्ट ने जहाँ-तहाँ पत्र भेजे, जिससे सब (बैरी) राजा सेना सजा-सजाकर (चढ़) दौड़े॥2॥
* घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई॥
जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी॥3॥
भावार्थ:-और उन्होंने डंका बजाकर नगर को घेर लिया। नित्य प्रति अनेक प्रकार से लड़ाई होने लगी। (प्रताप भानु के) सब योद्धा (शूरवीरों की) करनी करके रण में जूझ मरे। राजा भी भाई सहित खेत रहा॥3॥
* सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा॥
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई॥4॥
भावार्थ:-सत्यकेतु के कुल में कोई नहीं बचा। ब्राह्मणों का शाप झूठा कैसे हो सकता था। शत्रु को जीतकर नगर को (फिर से) बसाकर सब राजा विजय और यश पाकर अपने-अपने नगर को चले गए॥4॥
रावणादि का जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार
दोहा :
* भरद्वाज सुनु जाहि जब होई बिधाता बाम।
धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥175॥
भावार्थ:-(याज्ञवल्क्यजी कहते हैं-) हे भरद्वाज! सुनो, विधाता जब जिसके विपरीत होते हैं, तब उसके लिए धूल सुमेरु पर्वत के समान (भारी और कुचल डालने वाली), पिता यम के समान (कालरूप) और रस्सी साँप के समान (काट खाने वाली) हो जाती है॥175॥
चौपाई:
* काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा॥1॥
भावार्थ:-हे मुनि! सुनो, समय पाकर वही राजा परिवार सहित रावण नामक राक्षस हुआ। उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं और वह बड़ा ही प्रचण्ड शूरवीर था॥1॥
* भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥2॥
भावार्थ:-अरिमर्दन नामक जो राजा का छोटा भाई था, वह बल का धाम कुम्भकर्ण हुआ। उसका जो मंत्री था, जिसका नाम धर्मरुचि था, वह रावण का सौतेला छोटा भाई हुआ ॥2॥
* नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥
रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे॥3॥
भावार्थ:-उसका विभीषण नाम था, जिसे सारा जगत जानता है। वह विष्णुभक्त और ज्ञान-विज्ञान का भंडार था और जो राजा के पुत्र और सेवक थे, वे सभी बड़े भयानक राक्षस हुए॥3॥
* कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥
कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी॥4॥
भावार्थ:-वे सब अनेकों जाति के, मनमाना रूप धारण करने वाले, दुष्ट, कुटिल, भयंकर, विवेकरहित, निर्दयी, हिंसक, पापी और संसार भर को दुःख देने वाले हुए, उनका वर्णन नहीं हो सकता॥4॥
दोहा :
* उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥176॥
भावार्थ:-यद्यपि वे पुलस्त्य ऋषि के पवित्र, निर्मल और अनुपम कुल में उत्पन्न हुए, तथापि ब्राह्मणों के शाप के कारण वे सब पाप रूप हुए॥176॥
चौपाई :
* कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥
गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥1॥
भावार्थ:-तीनों भाइयों ने अनेकों प्रकार की बड़ी ही कठिन तपस्या की, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। (उनका उग्र) तप देखकर ब्रह्माजी उनके पास गए और बोले- हे तात! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो॥1॥
* करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥
हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें॥2॥
भावार्थ:-रावण ने विनय करके और चरण पकड़कर कहा- हे जगदीश्वर! सुनिए, वानर और मनुष्य- इन दो जातियों को छोड़कर हम और किसी के मारे न मरें। (यह वर दीजिए)॥2॥
* एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥
पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥3॥
भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं कि-) मैंने और ब्रह्मा ने मिलकर उसे वर दिया कि ऐसा ही हो, तुमने बड़ा तप किया है। फिर ब्रह्माजी कुंभकर्ण के पास गए। उसे देखकर उनके मन में बड़ा आश्चर्य हुआ॥3॥
* जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू॥
सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी॥4॥
भावार्थ:-जो यह दुष्ट नित्य आहार करेगा, तो सारा संसार ही उजाड़ हो जाएगा। (ऐसा विचारकर) ब्रह्माजी ने सरस्वती को प्रेरणा करके उसकी बुद्धि फेर दी। (जिससे) उसने छह महीने की नींद माँगी॥4॥
दोहा :
* गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।
तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु॥177॥
भावार्थ:-फिर ब्रह्माजी विभीषण के पास गए और बोले- हे पुत्र! वर माँगो। उसने भगवान के चरणकमलों में निर्मल (निष्काम और अनन्य) प्रेम माँगा॥177॥
चौपाई :
* तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए॥
मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा॥1॥
भावार्थ:-उनको वर देकर ब्रह्माजी चले गए और वे (तीनों भाई) हर्षित हेकर अपने घर लौट आए। मय दानव की मंदोदरी नाम की कन्या परम सुंदरी और स्त्रियों में शिरोमणि थी॥1॥
* सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी॥
हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई॥2॥
भावार्थ:-मय ने उसे लाकर रावण को दिया। उसने जान लिया कि यह राक्षसों का राजा होगा। अच्छी स्त्री पाकर रावण प्रसन्न हुआ और फिर उसने जाकर दोनों भाइयों का विवाह कर दिया॥2॥
* गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥
सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनि भवन अपारा॥3॥
भावार्थ:-समुद्र के बीच में त्रिकूट नामक पर्वत पर ब्रह्मा का बनाया हुआ एक बड़ा भारी किला था। (महान मायावी और निपुण कारीगर) मय दानव ने उसको फिर से सजा दिया। उसमें मणियों से जड़े हुए सोने के अनगिनत महल थे॥3॥
* भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा॥
तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका॥4॥
भावार्थ:-जैसी नागकुल के रहने की (पाताल लोक में) भोगावती पुरी है और इन्द्र के रहने की (स्वर्गलोक में) अमरावती पुरी है, उनसे भी अधिक सुंदर और बाँका वह दुर्ग था। जगत में उसका नाम लंका प्रसिद्ध हुआ॥4॥
दोहा :
* खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।
कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥178 क॥
भावार्थ:-उसे चारों ओर से समुद्र की अत्यन्त गहरी खाई घेरे हुए है। उस (दुर्ग) के मणियों से जड़ा हुआ सोने का मजबूत परकोटा है, जिसकी कारीगरी का वर्णन नहीं किया जा सकता॥178 (क)॥
* हरि प्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ।
सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ॥178 ख॥
भावार्थ:-भगवान की प्रेरणा से जिस कल्प में जो राक्षसों का राजा (रावण) होता है, वही शूर, प्रतापी, अतुलित बलवान्‌ अपनी सेना सहित उस पुरी में बसता है॥178 (ख)॥
चौपाई :
* रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे॥
अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे॥1॥
भावार्थ:-(पहले) वहाँ बड़े-बड़े योद्धा राक्षस रहते थे। देवताओं ने उन सबको युद्द में मार डाला। अब इंद्र की प्रेरणा से वहाँ कुबेर के एक करोड़ रक्षक (यक्ष लोग) रहते हैं॥1॥
*दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई॥
देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई॥2॥
भावार्थ:-रावण को कहीं ऐसी खबर मिली, तब उसने सेना सजाकर किले को जा घेरा। उस बड़े विकट योद्धा और उसकी बड़ी सेना को देखकर यक्ष अपने प्राण लेकर भाग गए॥2॥
* फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा॥
सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी॥3॥
भावार्थ:-तब रावण ने घूम-फिरकर सारा नगर देखा। उसकी (स्थान संबंधी) चिन्ता मिट गई और उसे बहुत ही सुख हुआ। उस पुरी को स्वाभाविक ही सुंदर और (बाहर वालों के लिए) दुर्गम अनुमान करके रावण ने वहाँ अपनी राजधानी कायम की॥3॥
* जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हें॥
एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा॥4॥
भावार्थ:-योग्यता के अनुसार घरों को बाँटकर रावण ने सब राक्षसों को सुखी किया। एक बार वह कुबेर पर चढ़ दौड़ा और उससे पुष्पक विमान को जीतकर ले आया॥4॥
दोहा :
* कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।
मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ॥179॥
भावार्थ:-फिर उसने जाकर (एक बार) खिलवाड़ ही में कैलास पर्वत को उठा लिया और मानो अपनी भुजाओं का बल तौलकर, बहुत सुख पाकर वह वहाँ से चला आया॥179॥
चौपाई :
* सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥
नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥1॥
भावार्थ:-सुख, सम्पत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, जय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई- ये सब उसके नित्य नए (वैसे ही) बढ़ते जाते थे, जैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढ़ता है॥1॥
* अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता॥
करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहूँ पुर त्रासा॥2॥
भावार्थ:-अत्यन्त बलवान्‌ कुम्भकर्ण सा उसका भाई था, जिसके जोड़ का योद्धा जगत में पैदा ही नहीं हुआ। वह मदिरा पीकर छह महीने सोया करता था। उसके जागते ही तीनों लोकों में तहलका मच जाता था॥2॥
* जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई॥
समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना॥3॥
भावार्थ:-यदि वह प्रतिदिन भोजन करता, तब तो सम्पूर्ण विश्व शीघ्र ही चौपट (खाली) हो जाता। रणधीर ऐसा था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। (लंका में) उसके ऐसे असंख्य बलवान वीर थे॥3॥
* बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू॥
जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई॥4॥
भावार्थ:- मेघनाद रावण का बड़ा लड़का था, जिसका जगत के योद्धाओं में पहला नंबर था। रण में कोई भी उसका सामना नहीं कर सकता था। स्वर्ग में तो (उसके भय से) नित्य भगदड़ मची रहती थी॥4॥
दोहा :
* कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय।
एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय॥180॥
भावार्थ:-(इनके अतिरिक्त) दुर्मुख, अकम्पन, वज्रदन्त, धूमकेतु और अतिकाय आदि ऐसे अनेक योद्धा थे, जो अकेले ही सारे जगत को जीत सकते थे॥180॥
चौपाई :
* कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥1॥
भावार्थ:-सभी राक्षस मनमाना रूप बना सकते थे और (आसुरी) माया जानते थे। उनके दया-धर्म स्वप्न में भी नहीं था। एक बार सभा में बैठे हुए रावण ने अपने अगणित परिवार को देखा-॥1॥
* सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती॥
सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥2॥
भावार्थ:-पुत्र-पौत्र, कुटुम्बी और सेवक ढेर-के-ढेर थे। (सारी) राक्षसों की जातियों को तो गिन ही कौन सकता था! अपनी सेना को देखकर स्वभाव से ही अभिमानी रावण क्रोध और गर्व में सनी हुई वाणी बोला-॥2॥
* सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा॥
ते सनमुख नहिं करहिं लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई॥3॥
भावार्थ:-हे समस्त राक्षसों के दलों! सुनो, देवतागण हमारे शत्रु हैं। वे सामने आकर युद्ध नहीं करते। बलवान शत्रु को देखकर भाग जाते हैं॥3॥
* तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई॥
द्विजभोजन मख होम सराधा। सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा॥4॥
भावार्थ:-उनका मरण एक ही उपाय से हो सकता है, मैं समझाकर कहता हूँ। अब उसे सुनो। (उनके बल को बढ़ाने वाले) ब्राह्मण भोजन, यज्ञ, हवन और श्राद्ध- इन सबमें जाकर तुम बाधा डालो॥4॥
दोहा :
* छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ।
तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ॥181॥
भावार्थ:-भूख से दुर्बल और बलहीन होकर देवता सहज ही में आ मिलेंगे। तब उनको मैं मार डालूँगा अथवा भलीभाँति अपने अधीन करके (सर्वथा पराधीन करके) छोड़ दूँगा॥181॥
चौपाई :
* मेघनाद कहूँ पुनि हँकरावा। दीन्हीं सिख बलु बयरु बढ़ावा॥
जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना॥1॥
भावार्थ:-फिर उसने मेघनाद को बुलवाया और सिखा-पढ़ाकर उसके बल और देवताओं के प्रति बैरभाव को उत्तेजना दी। (फिर कहा-) हे पुत्र ! जो देवता रण में धीर और बलवान्‌ हैं और जिन्हें लड़ने का अभिमान है॥1॥
* तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँघी॥
एहि बिधि सबही अग्या दीन्हीं। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही॥2॥
भावार्थ:-उन्हें युद्ध में जीतकर बाँध लाना। बेटे ने उठकर पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया। इसी तरह उसने सबको आज्ञा दी और आप भी हाथ में गदा लेकर चल दिया॥2॥
* चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर रवनी॥
रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा॥3॥
भावार्थ:-रावण के चलने से पृथ्वी डगमगाने लगी और उसकी गर्जना से देवरमणियों के गर्भ गिरने लगे। रावण को क्रोध सहित आते हुए सुनकर देवताओं ने सुमेरु पर्वत की गुफाएँ तकीं (भागकर सुमेरु की गुफाओं का आश्रय लिया)॥3॥
* दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए॥
पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी॥4॥
भावार्थ:-दिक्पालों के सारे सुंदर लोकों को रावण ने सूना पाया। वह बार-बार भारी सिंहगर्जना करके देवताओं को ललकार-ललकारकर गालियाँ देता था॥4॥
* रन मद मत्त फिरइ गज धावा। प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा॥
रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी॥5॥
भावार्थ:-रण के मद में मतवाला होकर वह अपनी जोड़ी का योद्धा खोजता हुआ जगत भर में दौड़ता फिरा, परन्तु उसे ऐसा योद्धा कहीं नहीं मिला। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, वरुण, कुबेर, अग्नि, काल और यम आदि सब अधिकारी,॥5॥
* किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा॥
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी॥6॥
भावार्थ:-किन्नर, सिद्ध, मनुष्य, देवता और नाग- सभी के पीछे वह हठपूर्वक पड़ गया (किसी को भी उसने शांतिपूर्वक नहीं बैठने दिया)। ब्रह्माजी की सृष्टि में जहाँ तक शरीरधारी स्त्री-पुरुष थे, सभी रावण के अधीन हो गए॥6॥
* आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता॥7॥
भावार्थ:-डर के मारे सभी उसकी आज्ञा का पालन करते थे और नित्य आकर नम्रतापूर्वक उसके चरणों में सिर नवाते थे॥7॥
दोहा :
* भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।
मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र॥182 क॥
भावार्थ:-उसने भुजाओं के बल से सारे विश्व को वश में कर लिया, किसी को स्वतंत्र नहीं रहने दिया। (इस प्रकार) मंडलीक राजाओं का शिरोमणि (सार्वभौम सम्राट) रावण अपनी इच्छानुसार राज्य करने लगा॥182 (क)॥
* देव जच्छ गंधर्ब नर किंनर नाग कुमारि।
जीति बरीं निज बाहु बल बहु सुंदर बर नारि॥182 ख॥
भावार्थ:-देवता, यक्ष, गंधर्व, मनुष्य, किन्नर और नागों की कन्याओं तथा बहुत सी अन्य सुंदरी और उत्तम स्त्रियों को उसने अपनी भुजाओं के बल से जीतकर ब्याह लिया॥182 (ख)॥
चौपाई :
* इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ॥
प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा॥1॥
भावार्थ:-मेघनाद से उसने जो कुछ कहा, उसे उसने (मेघनाद ने) मानो पहले से ही कर रखा था (अर्थात्‌ रावण के कहने भर की देर थी, उसने आज्ञापालन में तनिक भी देर नहीं की।) जिनको (रावण ने मेघनाद से) पहले ही आज्ञा दे रखी थी, उन्होंने जो करतूतें की उन्हें सुनो॥1॥
* देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी॥
करहिं उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया॥2॥
भावार्थ:-सब राक्षसों के समूह देखने में बड़े भयानक, पापी और देवताओं को दुःख देने वाले थे। वे असुरों के समूह उपद्रव करते थे और माया से अनेकों प्रकार के रूप धरते थे॥2॥
* जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला॥
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं॥3॥
भावार्थ:-जिस प्रकार धर्म की जड़ कटे, वे वही सब वेदविरुद्ध काम करते थे। जिस-जिस स्थान में वे गो और ब्राह्मणों को पाते थे, उसी नगर, गाँव और पुरवे में आग लगा देते थे॥3॥
* सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरु मान न कोई॥
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहु सुनिअ न बेद पुराना॥4॥
भावार्थ:-(उनके डर से) कहीं भी शुभ आचरण (ब्राह्मण भोजन, यज्ञ, श्राद्ध आदि) नहीं होते थे। देवता, ब्राह्मण और गुरु को कोई नहीं मानता था। न हरिभक्ति थी, न यज्ञ, तप और ज्ञान था। वेद और पुराण तो स्वप्न में भी सुनने को नहीं मिलते थे॥4॥
छन्द :
* जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा॥
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना।
तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना॥
भावार्थ:-जप, योग, वैराग्य, तप तथा यज्ञ में (देवताओं के) भाग पाने की बात रावण कहीं कानों से सुन पाता, तो (उसी समय) स्वयं उठ दौड़ता। कुछ भी रहने नहीं पाता, वह सबको पकड़कर विध्वंस कर डालता था। संसार में ऐसा भ्रष्ट आचरण फैल गया कि धर्म तो कानों में सुनने में नहीं आता था, जो कोई वेद और पुराण कहता, उसको बहुत तरह से त्रास देता और देश से निकाल देता था।
सोरठा :
* बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।
हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति॥183॥
भावार्थ:-राक्षस लोग जो घोर अत्याचार करते थे, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। हिंसा पर ही जिनकी प्रीति है, उनके पापों का क्या ठिकाना॥183॥