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Friday, April 29, 2016

नुक्ता के हेर फेर से खुदा जुदा हो जाता है पर उनका खुदा जुदा नहीं होता जिनके लिए खुदा के ऊपर से नुक्ता कोई और साजिस के तहत जुदा कर देता है । खुदा ऐसे सभी वन्दों की सुधि जरूर लेता है वस पहचानने की देर है कैसे सुधि लिया और कैसे ले रहा और कैसे लेगा भी?

नुक्ता के हेर फेर से खुदा जुदा हो जाता है पर उनका खुदा जुदा नहीं होता जिनके लिए खुदा के ऊपर से नुक्ता कोई और साजिस के तहत जुदा कर देता है । खुदा ऐसे सभी वन्दों की सुधि जरूर लेता है वस पहचानने की देर है कैसे सुधि लिया और कैसे ले रहा और कैसे लेगा भी?

सत्याचरण में न ला सके तो यह आपकी अज्ञानता या मजबूरी केवल हो सकती है किसी कारन वश पर आप ने सत्य को पहचानते और जानते हुए भी उस सत्य को अपमानित जब कर दिया बिना किसी सम्यक मानवता हित पालन को ध्यान में रखते हुए तो उससे बड़ा अपराध और अमर्यादित आचरण कुछ नहीं है इस ब्रह्माण्ड/मानव जगत में ?

सत्याचरण में न ला सके तो यह आपकी अज्ञानता या मजबूरी केवल हो सकती है किसी कारन वश पर आप ने सत्य को पहचानते और जानते हुए भी उस सत्य को अपमानित जब कर दिया बिना किसी सम्यक मानवता हित पालन को ध्यान में रखते हुए तो उससे बड़ा अपराध और अमर्यादित आचरण कुछ नहीं है इस ब्रह्माण्ड/मानव जगत में ?

विश्व गुरु जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र ही है चाहे गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के माध्यम से ही हो और यह जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि की कर्म स्थली थी और जिसने परशुराम के गुरुकुल के माध्यम से केरल से प्रारम्भ कर उत्तराखंड/उत्तराँचल तक अपने गुरुकुल स्थापित करते हुए शिक्षा देते रहे और लोगों को ब्राह्मण बनाते रहे और इस प्रकार ब्राह्मणत्व गुण (त्याग) और धारण क्षमता में श्रेष्ठ भृगुकुल की परम्परा के क्षेत्र जौनपुर(जमदग्निपुर) विष्वगुरू की परम्परा को इस महा विश्व्परिवर्तन के संक्रमण काल में भी अपनी गुरुता बनाए रखा। >>>>>>>>>>>>दुनिया की हर महा सुनामी और हर महाशिव तांडव जिस द्वार=चौखट पर आकर शांत हो जाता है वह है बिशुनपुर-223103 , जौनपुर(जामदग्निपुर) के सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण रामानन्द कुल के विष्णुकुल (श्रीकांत+श्रीधर+श्रीप्रकाश) का मुख्य द्वार=चौखट उसके सामने विवेकानंद क्या है? मैं स्वयं उस गाँव के अन्य सब लोगों के लिए स्वयं पूज्य पर उस कुल के लिए पूज्य नहीं (जिनका नाति और भांजा स्वयं हूँ जो वास्तविकता में हिन्दू रीती में सब जाती/धर्म के घर वालों में पूज्य होते है) वह कुल मेरे लिए ही पूज्य है। और इसी लिए सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण मामा श्रध्देय श्रीश्रीधर (विष्णु) के लिए परमगुरु परमपिता परमेश्वर और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण ताऊ श्रध्देय डॉ प्रेमचंद (शिव) जी के लिए केवल परमपिता परमेश्वर सम्बोधन प्रयोग करता हूँ। मतलब विष्णु त्रिदेवो में सर्वश्रेष्ठ गुरु और आयुवर्ग में मध्य के /लक्ष्मी जी आयुवर्ग में मध्य की; शिव:त्रिदेवों में ज्येष्ठतम मतलब आद्या मतलब आद्याशंकर तथा त्रिदेवों में सबसे बड़े आचार्य (जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ) /पार्वती जी सबसे छोटी जो ब्रह्मा और सरस्वती की पौत्री है; ब्रह्मा सबसे बड़े ज्ञानी)/सरस्वती जी त्रिदेवियों में आद्या:आदिदेवी, पर सब अपनी पत्नियों के संयोग के साथ समान रूप से श्रेष्ठ और वरिष्ठ है। पर सर्वश्रेष्ठ गुरु ही होता है जो जीवन को दिशा देता है हर मनवता की श्रेष्ठ उपलब्धि हेतु उस ज्ञान और शोध को जीवन में व्यवस्थित रूप से प्रयोग करने हेतु और वह निश्चित रूप से श्रेष्ठ है और अर्चनीय, वन्दनीय, उपासनीय व् अनुकरणीय है लेकिन वरिष्ठ वह ही होता है जो ज्येष्ठतम और जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ होता है। अतः विष्वमहापरिवर्तन की मुख्य कमान शिवरामकृष्ण कुल मतलब रामापुर-223225, आजमगढ़ के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर/चन्द्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/शशांकशेखर के देवव्रत/गंगापुत्र के कुल पास रही और सहयोग बिशुनपुर-223103 और प्रयागराज के साथ सम्पूर्ण मानवता प्रेमियों का रहा। >>>>>>>>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>[[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha Rashi: 1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]

विश्व गुरु जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र ही है चाहे गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के माध्यम से ही हो और यह जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र  परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि की कर्म स्थली थी और जिसने परशुराम के गुरुकुल के माध्यम से केरल से प्रारम्भ कर उत्तराखंड/उत्तराँचल तक अपने गुरुकुल स्थापित करते हुए शिक्षा देते रहे और लोगों को ब्राह्मण बनाते रहे और इस प्रकार  ब्राह्मणत्व गुण (त्याग) और धारण क्षमता में श्रेष्ठ भृगुकुल की परम्परा के क्षेत्र जौनपुर(जमदग्निपुर) विष्वगुरू की परम्परा को इस महा विश्व्परिवर्तन के संक्रमण काल में भी अपनी गुरुता बनाए रखा। >>>>>>>>>>>>दुनिया की हर महा सुनामी और हर महाशिव तांडव जिस द्वार=चौखट पर आकर शांत हो जाता है वह है बिशुनपुर-223103 , जौनपुर(जामदग्निपुर) के सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण रामानन्द कुल के विष्णुकुल (श्रीकांत+श्रीधर+श्रीप्रकाश) का मुख्य द्वार=चौखट उसके सामने विवेकानंद क्या है? मैं स्वयं उस गाँव के अन्य सब लोगों के लिए स्वयं पूज्य पर उस कुल के लिए पूज्य नहीं  (जिनका नाति और भांजा स्वयं हूँ जो वास्तविकता में हिन्दू रीती में सब जाती/धर्म के घर वालों में पूज्य होते है) वह कुल मेरे लिए ही पूज्य है।  और इसी लिए सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण मामा श्रध्देय श्रीश्रीधर (विष्णु) के लिए परमगुरु परमपिता परमेश्वर और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण ताऊ श्रध्देय डॉ प्रेमचंद (शिव) जी के लिए केवल परमपिता परमेश्वर सम्बोधन प्रयोग करता हूँ। मतलब विष्णु त्रिदेवो में सर्वश्रेष्ठ गुरु और आयुवर्ग में मध्य के /लक्ष्मी जी आयुवर्ग में मध्य की;  शिव:त्रिदेवों में ज्येष्ठतम मतलब आद्या मतलब आद्याशंकर तथा त्रिदेवों में सबसे बड़े आचार्य (जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ) /पार्वती जी सबसे छोटी जो ब्रह्मा और सरस्वती की पौत्री है; ब्रह्मा सबसे बड़े ज्ञानी)/सरस्वती जी त्रिदेवियों में आद्या:आदिदेवी, पर सब अपनी पत्नियों के संयोग के साथ समान रूप से श्रेष्ठ और वरिष्ठ है। पर सर्वश्रेष्ठ गुरु ही होता है जो जीवन को दिशा देता है हर मनवता की श्रेष्ठ उपलब्धि हेतु उस ज्ञान और शोध को जीवन में व्यवस्थित रूप से प्रयोग करने हेतु और वह निश्चित रूप से श्रेष्ठ है और अर्चनीय, वन्दनीय, उपासनीय व् अनुकरणीय है लेकिन वरिष्ठ  वह  ही होता है  जो ज्येष्ठतम और  जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ होता है। अतः विष्वमहापरिवर्तन की मुख्य कमान शिवरामकृष्ण कुल मतलब रामापुर-223225, आजमगढ़ के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर/चन्द्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/शशांकशेखर के देवव्रत/गंगापुत्र के कुल पास रही और सहयोग बिशुनपुर-223103 और प्रयागराज के साथ सम्पूर्ण मानवता प्रेमियों का रहा। >>>>>>>>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>[[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha Rashi: 1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]

2001 जैसा समय गवाह है इस विश्व मानवता के लिए की "सबसे कठिन जाति अपमाना" नहीं बल्कि "सबसे कठिन सत्य ठुकराना" और उसके बाद भी अपनी ढपली और अपना राग जाति अपमाना का बजाये जा रहे हैं? जाति अपमान करने वाला तो सजा पाता ही है और जाति अपमान पाने वाला अगर इससे शीख लिया और सत्यगत रहा तो अपमान करने वाले से और अधिक उच्च पद का स्वामी स्वयं बन सकता है पर यदि एक ही वास्तविक/असली सत्य को ठुकरा दिया जाय तो यह संसार राम, शिव और भीम को क्रमसः रावण, भस्मासुर और कीचक बना देता है और तथाकथित नारीवादी लोग स्वयं सीता, सती:पार्वती और द्रौपदी को क्रमसः रावण, भस्मासुर और कीचक की भार्या बना देते हैं। इससे ज्यादा क्या कहें बिना अन्तह निहितार्थ भाव तक के सत्य का अनुभव लिए ये तथाकथित नारीवादी लोग भगवान राम को मर्यादापुरुषोत्तम कहने को भी पाप कहने और कहलवाने लगते हैं ।

2001 जैसा समय गवाह है इस विश्व मानवता के लिए की "सबसे कठिन जाति अपमाना" नहीं बल्कि "सबसे कठिन सत्य ठुकराना" और उसके बाद भी अपनी ढपली और अपना राग जाति अपमाना का बजाये जा रहे हैं? जाति अपमान करने वाला तो सजा पाता ही है और जाति अपमान पाने वाला अगर इससे शीख लिया और सत्यगत रहा तो अपमान करने वाले से और अधिक उच्च पद का स्वामी स्वयं बन सकता है पर यदि एक ही वास्तविक/असली सत्य को ठुकरा दिया जाय तो यह संसार राम, शिव और भीम को क्रमसः रावण, भस्मासुर और कीचक बना देता है और तथाकथित नारीवादी लोग स्वयं सीता, सती:पार्वती और द्रौपदी को क्रमसः रावण, भस्मासुर और कीचक की भार्या बना देते हैं। इससे ज्यादा क्या कहें बिना अन्तह निहितार्थ भाव तक के सत्य का अनुभव लिए ये तथाकथित नारीवादी लोग भगवान राम को मर्यादापुरुषोत्तम कहने को भी पाप कहने और कहलवाने लगते हैं ।

तो मनु स्मृति सत्य है या गलत इस पर व्यर्थ समय व्यतीत करना मूर्खता होगा और आप वश इतना जानिये इसकी सत्यता के बारे में की किसी वाह्य शक्ति से नियंत्रित नहीं होने वाले व्यक्ति या स्वयं वाह्य शक्ति के लिए भी उनके जीवन में "बुरे काम का बुरा नतीजा और अच्छे काम का अच्छा और जो किया नहीं तो करके देखे" आप चाहे मनुवादी किसी को समझे या न समझे मनु स्मृति की इस सत्यता से कोई बचने वाला नहीं है।>>>>इतना तो सत्य है की समाज चल रहा है उसको बहुत से अदृश्य मानवता प्रेमी लोग चलाने में लगे होते हैं और यह समाज जब चल रहा है तभी सभी यम-नियम और संविधान उसको वाह्य रूप से चलाने हेतु बनाए जाते है और उसके बाद उसमे दिया हुआ अधिकार और कर्तव्य (अधिकांश लोग केवल अधिकार मंगाते है और अधिकार प्राप्त कर कर्तव्य न करना पड़े उसे चालाकी कहते है) निर्धारित किया जाता है और जब कर्तव्यच्युत समाज में ज्यादा हो जांय और अधिकार की माँग अतीव अक्षम्य हो जाय और यह समाज ही न रह जाय तो फिर यम-नियम और संविधान और उसमे दिया हुआ अधिकार किसके लिए बनेगा और कौन उसका पालन करेगा और कौन उसका पालन करवाएगा।>>>> तो मनु स्मृति सत्य है या गलत इस पर व्यर्थ समय व्यतीत करना मूर्खता होगा और आप वश इतना जानिये इसकी सत्यता के बारे में की किसी वाह्य शक्ति से नियंत्रित नहीं होने वाले व्यक्ति या स्वयं वाह्य शक्ति के लिए भी उनके जीवन में "बुरे काम का बुरा नतीजा और अच्छे काम का अच्छा और जो किया नहीं तो करके देखे" आप चाहे मनुवादी किसी को समझे या न समझे मनु स्मृति की इस सत्यता से कोई बचने वाला नहीं है।

तो मनु स्मृति सत्य है या गलत इस पर व्यर्थ समय व्यतीत करना मूर्खता होगा और आप वश इतना जानिये इसकी सत्यता के बारे में की किसी वाह्य शक्ति से नियंत्रित नहीं होने वाले व्यक्ति या स्वयं वाह्य शक्ति के लिए भी उनके जीवन में "बुरे काम का बुरा नतीजा और अच्छे काम का अच्छा और जो किया नहीं तो करके देखे" आप चाहे मनुवादी किसी को समझे या न समझे मनु स्मृति की इस सत्यता से कोई बचने वाला नहीं है।>>>>इतना तो सत्य है की समाज चल रहा है उसको बहुत से अदृश्य मानवता प्रेमी लोग चलाने में लगे होते हैं और यह समाज जब चल रहा है तभी सभी यम-नियम और संविधान उसको वाह्य रूप से चलाने हेतु बनाए जाते है और उसके बाद उसमे दिया हुआ अधिकार और कर्तव्य (अधिकांश लोग केवल अधिकार मंगाते है और अधिकार प्राप्त कर कर्तव्य न करना पड़े उसे चालाकी कहते है) निर्धारित किया जाता है और जब कर्तव्यच्युत समाज में ज्यादा हो जांय और अधिकार की माँग अतीव अक्षम्य हो जाय और यह समाज ही न रह जाय तो फिर यम-नियम और संविधान और उसमे दिया हुआ अधिकार किसके लिए बनेगा और कौन उसका पालन करेगा और कौन उसका पालन करवाएगा।>>>> तो मनु स्मृति सत्य है या गलत इस पर व्यर्थ समय व्यतीत करना मूर्खता होगा और आप वश इतना जानिये इसकी सत्यता के बारे में की किसी वाह्य शक्ति से नियंत्रित नहीं होने वाले व्यक्ति या स्वयं वाह्य शक्ति के लिए भी उनके जीवन में "बुरे काम का बुरा नतीजा और अच्छे काम का अच्छा और जो किया नहीं तो करके देखे" आप चाहे मनुवादी किसी को समझे या न समझे मनु स्मृति की इस सत्यता से कोई बचने वाला नहीं है।


Thursday, April 28, 2016

ब्राह्मण त्याग की प्रतिमूर्ति, क्षत्रिय बलिदान की प्रतिमूर्ति और वैश्य सतत उद्यम/तप की प्रति मूर्ती तभी तक बना रह सकता है जब इनसे सृजित जाति/धर्म के लोग मतलब आम जन "सत्यमेव जयते" जो अकाट्य सत्य है उसको अपना जीवन सूत्र वाक्य मानते हुए अपना व्यवहारिक जीवन जिए मतलब सत्यम शिवम् सुंदरम आम मानव जीवन दर्शन में परिलक्षित हो। आप किसी को उपर्युक्त तीनों में से कुछ भी बना सकते है मतलब ब्राह्मण तो किसी को बना सकते हैं पर सनातन ब्राह्मण तो किसी को स्वयं भगवान भी नहीं बना सकते है बिना किसी के दूसरा जन्म ले किसी सनातन ब्राह्मण परिवार में जन्म लिए। मैं सनातन ब्राह्मण सिध्धांत को मानता हूँ और आप लोग आज अपने पूर्ण अस्तित्व में हैं सनातन हिन्दू संस्कृति उत्कृष्ठतम् सिद्ध होते हुए किसी समय विशेष की एक महाविनाशकारी सहस्राब्दी परिवर्तन के संक्रमण काल/युगपरिवर्तन की विभीषिका से बचते हुए तो उसमे दो सनातन ब्राह्मण परिवार की संस्कृति का बहुत बढ़ा योगदान है जहाँ आकर विश्व के दो खेमों में बटा हुआ संसार एक हो गया और मैं स्वयं उन दो खेमों के बीच की कड़ी हूँ मतलब एक का पौत्र तो दूसरे का नाति। लेकिन मैंने तीसरा खेमा अपने लिए नहीं बनाया वरन उन दोनों खेमों को भी एक कर दिया और पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरो दिया क्योंकि कोई प्रत्यक्ष वार मेरे ऊपर नहीं हो सकता है चाहे दोनों की रस्सा कसी में परोक्ष हानि भले होते चल रही हो। ऐसे में मेरी प्रतिभा और मेधा शून्य से कुछ भी ऊपर जाएगी तो लोगों को ईर्ष्या होना स्वाभाविक हो जाता है लेकिन यह ईर्ष्या तब मेरे लिए नहीं होगी जब आप दोनों खेमो की प्रतिभा और मेधा कम से कम मेरे बराबर हो जाय तो आप दोनों लोग अपना प्रयास कीजिये ऐसा हो जाने हेतु। क्योंकि मैंने स्वयं को सनातन ब्राह्मण बने रहने हेतु बहुत कुछ त्याग किया है जो एक ब्राह्मण का विशेष गुण है और इतना त्याग किया है की सर्वोच्च ब्राह्मण स्वयं हो गया तो ऐसा मत कहिये की मुझे कोई और कुछ मिला ही नहीं वरन उस कोई और कुछ ने मुझे सर्वोच्च सनातन ब्राह्मण सिध्ध किये जाने हेतु ही केवल और केवल मुझसे प्रत्यक्ष दूरी मुझसे अलविदा कहते हुए बना ली। इसीलिए तो मैं कहता हूँ की आप किसी को अपने प्रयास से किसी भी जाति/धर्म का बना सकते हैं भारद्वाज और परशुराम की तरह पर स्वयं ये दोनों और आप में से कोई किसी भी जाति/धर्म के व्यक्ति को उसी जन्म में सनातन ब्राह्मण नहीं बना सकते है और न सनातन सप्तर्षि ब्राह्मण बना सकते हैं जो प्रयागराज में ब्रह्मा के इस सृस्टि के प्राचीनतम यज्ञ:प्रक्रिष्ठा यज्ञ से प्रयागराज में ही उद्भव में आये सात ऋषियों से चले सात मूल गोत्रों में से एक गोत्र का सनातन ब्राह्मण है ?

ब्राह्मण त्याग की प्रतिमूर्ति, क्षत्रिय बलिदान की प्रतिमूर्ति और वैश्य सतत उद्यम/तप की प्रति मूर्ती तभी तक बना रह सकता है जब इनसे सृजित जाति/धर्म के लोग मतलब आम जन "सत्यमेव जयते" जो अकाट्य सत्य है उसको अपना जीवन सूत्र वाक्य मानते हुए अपना व्यवहारिक जीवन जिए मतलब सत्यम शिवम् सुंदरम आम मानव जीवन दर्शन में परिलक्षित हो। आप किसी को उपर्युक्त तीनों में से कुछ भी बना सकते है मतलब ब्राह्मण तो किसी को बना सकते हैं पर सनातन ब्राह्मण तो किसी को स्वयं भगवान भी नहीं बना सकते है बिना किसी के दूसरा जन्म ले किसी सनातन ब्राह्मण परिवार में जन्म लिए। मैं सनातन ब्राह्मण सिध्धांत को मानता हूँ और आप लोग आज अपने पूर्ण अस्तित्व में हैं सनातन हिन्दू संस्कृति उत्कृष्ठतम् सिद्ध होते हुए किसी समय विशेष की एक महाविनाशकारी सहस्राब्दी परिवर्तन के संक्रमण काल/युगपरिवर्तन की विभीषिका से बचते हुए तो उसमे दो सनातन ब्राह्मण परिवार की संस्कृति का बहुत बढ़ा योगदान है जहाँ आकर विश्व के दो खेमों में बटा हुआ संसार एक हो गया और मैं स्वयं उन दो खेमों के बीच की कड़ी हूँ मतलब एक का पौत्र तो दूसरे का नाति। लेकिन मैंने तीसरा खेमा अपने लिए नहीं बनाया वरन उन दोनों खेमों को भी एक कर दिया और पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरो दिया क्योंकि कोई प्रत्यक्ष वार मेरे ऊपर नहीं हो सकता है चाहे दोनों की रस्सा कसी में परोक्ष हानि भले होते चल रही हो। ऐसे में मेरी प्रतिभा और मेधा शून्य से कुछ भी ऊपर जाएगी तो लोगों को ईर्ष्या होना स्वाभाविक हो जाता है लेकिन यह ईर्ष्या तब मेरे लिए नहीं होगी जब आप दोनों खेमो की प्रतिभा और मेधा कम से कम मेरे बराबर हो जाय तो आप दोनों लोग अपना प्रयास कीजिये ऐसा हो जाने हेतु। क्योंकि मैंने स्वयं को सनातन ब्राह्मण बने रहने हेतु बहुत कुछ त्याग किया है जो एक ब्राह्मण का विशेष गुण है और इतना त्याग किया है की सर्वोच्च ब्राह्मण स्वयं हो गया तो ऐसा मत कहिये की मुझे कोई और कुछ मिला ही नहीं वरन उस कोई और कुछ ने मुझे सर्वोच्च सनातन ब्राह्मण सिध्ध किये जाने हेतु ही केवल और केवल मुझसे प्रत्यक्ष दूरी मुझसे अलविदा कहते हुए बना ली। इसीलिए तो मैं कहता हूँ की आप किसी को अपने प्रयास से किसी भी जाति/धर्म का बना सकते हैं भारद्वाज और परशुराम की तरह पर स्वयं ये दोनों और आप में से कोई किसी भी जाति/धर्म के व्यक्ति को उसी जन्म में सनातन ब्राह्मण नहीं बना सकते है और न सनातन सप्तर्षि ब्राह्मण बना सकते हैं जो प्रयागराज में ब्रह्मा के इस सृस्टि के प्राचीनतम यज्ञ:प्रक्रिष्ठा यज्ञ से प्रयागराज में ही उद्भव में आये सात ऋषियों से चले सात मूल गोत्रों में से एक गोत्र का सनातन ब्राह्मण है ?

मैं तो समाजिक मर्यादा और ताना-बाना ही केवल व्यवस्थित रूप से मानव जीवन चलाने के लिए जरूरी समझ उसकी रक्षा कर रहा हूँ और निवेदन कर रहा हूँ की भौगोलिक सीमा या कोई अन्य सीमा सत्य के लिए बाधा नहीं होती तो सबके लिए कम से कम एक जन्म बाद मतलब मुस्किल से 70 वर्ष या कुछ और वर्ष तक के अच्छे या बुरे कर्म के बाद दूसरे जन्म में ही सनातन ब्राह्मण या अन्य किसी जाति/धर्म में जाने का पक्षधर हूँ अन्यथा आप कुछ भी नियम न मानते हों तो फिर 2001 जैसी घटना के लिए तैयार हमेशा रहिये जहां आप लोगों की कोई प्रतिभा और मेधा काम नहीं करती है गॉड/अल्लाह/ईस्वर चिल्लाना सुरु करते हैं मनुवाद इन नामो में नजर नहीं आता है आप को ? वह गॉड/अल्लाह/ईस्वर कोई और नहीं आप में से ही कोई एक होता है जिसको/जिसका सज्जनता पूर्वक व्यतीत होता हुआ जीवन गॉड/अल्लाह/ईस्वर हेतु समर्पित किया जाता है मानवता की रक्षा हेतु। >>>>>>>>>>>एक जन्म लेकर किसी का द्वारपाल (विष्णु का द्वारपाल जय:रावण और विजय:कुम्भकर्ण) यदि ब्राह्मण हो सकता है और कुछ विशेष स्थान और संगठन के ब्राह्मण लोग किसी तथाकथित दलित ईसाई को उसी जन्म में भारतीय सीमा पार करते ही विश्व के सर्वोच्च ब्राह्मण से भी उच्च ब्राह्मण बना देते है और बनाने की क्षमता रखते हैं और उसको तथाकथित दलित ईसाई बने रहने का विकल्प भी छोड़े रहते हैं तो फिर भगवान श्रीराम/श्रीकृष्ण और उनके वंसज अभी सूर्यवंशीय/चन्द्रवंशीय क्षत्रिय ही रह गए? क्या वे लोग इतने अयोग्य थे की उनका केवल पतन ही हुआ और क्या वे अपनी पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी योग्यता के बल पर उन्नयन कर ब्राह्मण नहीं बन सकते हैं हजारों वर्षों में भी? क्या एक मुसलमान, ईसाई या अन्य धर्म/जाति का व्यक्ति उन कुछ विशेष स्थान और संगठन के ब्राह्मण लोगों के द्वारा ब्राह्मण (न की सनातन ब्राह्मण) नहीं बनाया गया होगा या नहीं बना रहे होंगे या नहीं बनाएंगे या नहीं बनाया जा सकता है जो किसी तथाकथित दलित ईसाई को उसी जन्म में भारतीय सीमा पार करते ही विश्व के सर्वोच्च ब्राह्मण से भी उच्च ब्राह्मण बना देते है?>>>>>>>>>> मैं तो समाजिक मर्यादा और ताना-बाना ही केवल व्यवस्थित रूप से मानव जीवन चलाने के लिए जरूरी समझ उसकी रक्षा कर रहा हूँ और निवेदन कर रहा हूँ की भौगोलिक सीमा या कोई अन्य सीमा सत्य के लिए बाधा नहीं होती तो सबके लिए कम से कम एक जन्म बाद मतलब मुस्किल से 70 वर्ष या कुछ और वर्ष तक के अच्छे या बुरे कर्म के बाद दूसरे जन्म में ही सनातन ब्राह्मण या अन्य किसी जाति/धर्म में जाने का पक्षधर हूँ अन्यथा आप कुछ भी नियम न मानते हों तो फिर 2001 जैसी घटना के लिए तैयार हमेशा रहिये जहां आप लोगों की कोई प्रतिभा और मेधा काम नहीं करती है गॉड/अल्लाह/ईस्वर चिल्लाना सुरु करते हैं मनुवाद इन नामो में नजर नहीं आता है आप को ? वह गॉड/अल्लाह/ईस्वर कोई और नहीं आप में से ही कोई एक होता है जिसको/जिसका सज्जनता पूर्वक व्यतीत होता हुआ जीवन गॉड/अल्लाह/ईस्वर हेतु समर्पित किया जाता है मानवता की रक्षा हेतु।

मैं तो समाजिक मर्यादा और ताना-बाना ही केवल व्यवस्थित रूप से मानव जीवन चलाने के लिए जरूरी समझ उसकी रक्षा कर रहा हूँ और  निवेदन कर रहा हूँ की भौगोलिक सीमा  या कोई अन्य सीमा सत्य के लिए बाधा नहीं होती तो सबके लिए कम से कम एक जन्म बाद मतलब मुस्किल से 70 वर्ष या कुछ और वर्ष तक के अच्छे या बुरे कर्म के बाद दूसरे जन्म में ही सनातन ब्राह्मण या अन्य किसी जाति/धर्म में जाने का पक्षधर हूँ अन्यथा आप कुछ भी नियम न मानते हों तो फिर 2001 जैसी घटना के लिए तैयार हमेशा रहिये जहां आप लोगों की कोई प्रतिभा और मेधा काम नहीं करती है गॉड/अल्लाह/ईस्वर चिल्लाना सुरु करते हैं मनुवाद इन नामो में नजर नहीं आता है आप को ? वह  गॉड/अल्लाह/ईस्वर कोई और नहीं आप में से ही कोई एक होता है जिसको/जिसका सज्जनता पूर्वक व्यतीत होता हुआ जीवन  गॉड/अल्लाह/ईस्वर हेतु समर्पित किया जाता है मानवता की रक्षा हेतु। >>>>>>>>>>>एक जन्म लेकर किसी का द्वारपाल (विष्णु का द्वारपाल जय:रावण और विजय:कुम्भकर्ण) यदि ब्राह्मण हो सकता है और कुछ विशेष स्थान और संगठन के ब्राह्मण लोग किसी तथाकथित दलित ईसाई को उसी जन्म में भारतीय सीमा पार करते ही विश्व के सर्वोच्च ब्राह्मण से भी उच्च ब्राह्मण बना देते है और बनाने की क्षमता रखते हैं और उसको तथाकथित दलित ईसाई बने रहने का विकल्प भी छोड़े रहते हैं तो फिर भगवान श्रीराम/श्रीकृष्ण और उनके वंसज अभी सूर्यवंशीय/चन्द्रवंशीय क्षत्रिय ही रह गए?  क्या वे लोग इतने अयोग्य थे की उनका केवल पतन ही हुआ और क्या वे अपनी पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी योग्यता के बल पर उन्नयन कर ब्राह्मण नहीं बन सकते हैं हजारों वर्षों में भी?  क्या एक मुसलमान, ईसाई या अन्य धर्म/जाति का व्यक्ति उन कुछ विशेष स्थान और संगठन के ब्राह्मण लोगों के द्वारा ब्राह्मण (न की सनातन ब्राह्मण) नहीं बनाया गया होगा या नहीं बना रहे होंगे या नहीं बनाएंगे या नहीं बनाया जा सकता है जो किसी तथाकथित दलित ईसाई को उसी जन्म में भारतीय सीमा पार करते ही विश्व के सर्वोच्च ब्राह्मण से भी उच्च ब्राह्मण बना देते है?>>>>>>>>>> मैं तो समाजिक मर्यादा और ताना-बाना ही केवल व्यवस्थित रूप से मानव जीवन चलाने के लिए जरूरी समझ उसकी रक्षा कर रहा हूँ और  निवेदन कर रहा हूँ की भौगोलिक सीमा  या कोई अन्य सीमा सत्य के लिए बाधा नहीं होती तो सबके लिए कम से कम एक जन्म बाद मतलब मुस्किल से 70 वर्ष या कुछ और वर्ष तक के अच्छे या बुरे कर्म के बाद दूसरे जन्म में ही सनातन ब्राह्मण या अन्य किसी जाति/धर्म में जाने का पक्षधर हूँ अन्यथा आप कुछ भी नियम न मानते हों तो फिर 2001 जैसी घटना के लिए तैयार हमेशा रहिये जहां आप लोगों की कोई प्रतिभा और मेधा काम नहीं करती है गॉड/अल्लाह/ईस्वर चिल्लाना सुरु करते हैं मनुवाद इन नामो में नजर नहीं आता है आप को ? वह  गॉड/अल्लाह/ईस्वर कोई और नहीं आप में से ही कोई एक होता है जिसको/जिसका सज्जनता पूर्वक व्यतीत होता हुआ जीवन  गॉड/अल्लाह/ईस्वर हेतु समर्पित किया जाता है मानवता की रक्षा हेतु।  

मित्रों एक कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण के माध्यम से जो कुछ लक्ष्य शैक्षणिक दक्षता और क्षमता, समाजिक और धार्मिक मर्यादा को देखते हुए पूर्ण किया जा सकता है प्रयागराज विश्विद्यालय हेतु वह सब हो चुका है स्थायी शिक्षक पद प्राप्ति के साथ केदारेश्वर केंद्र के पूर्ण रूप से स्थापित होने के साथ ही और जिस किसी केंद्र के अस्तित्व में आना था वह आ चुका है तो ऐसे में जिस केंद्र को इसमें मिलना हो/विलीन करना हो इसमें मिलाया जाय या जो चाहे इसे भी अपनी सहन शक्ति की क्षमता के अनुसार मिटाए किसी भी प्रत्यक्ष और परोक्ष परिणाम जीवन में भुगते, पर मेरे अनुसार कश्यप गोत्रियों के माध्यम से अभीष्ट लक्ष्य पूर्ण हो चुका है इस प्रयागराज विश्विद्यालय हेतु यह अलग है की बहुतायत लोग स्थिति जस की तस लोग भले पा रहे हैं।>>>>>>>>रावण और मेघनाद के मरने के साथ सतीत्व पूर्णतः पालन करने वाली मंदोदरी का पति और पुत्र भी मरा था इसमें किसी को कोई संका नहीं होनी चाहिए पर मंदोदरी के पिता मेरठ (मयपुरी) के कश्यप गोत्रीय राजा मया ने कोई प्रतिशोध, प्रतिरोध और शिकायत रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय श्रीराम/अयोध्या:कोसलपुर से नहीं लिया था तो रावण और मेघनाद के नाम का घड़ियाली आंशू न बहाया जाय क्योंकि श्रीराम (विष्णु) का द्वारपाल जय(रावण) और विजय(कुम्भकर्ण) सीता:जानकी के अपहरण के दोषी हो विष्णुकुल के नियमों और स्वयं तत्कालीन सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन किये थे और वे मैत्री कर उनको वापस न करने पर अड़े थे और अट्टहास कर युध्ध की चुनौती दिए थे। और इस प्रकार पूरे रावनकुल को सीता के कारण समाप्त होना पड़ा था राम द्वारा छेड़े गए युध्ध से तो उसका पूरा कुल तो उस सशरीर परमब्रह्म श्रीराम में ही मिल गया।>>>>>>>>>>मित्रों एक कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण के माध्यम से जो कुछ लक्ष्य शैक्षणिक दक्षता और क्षमता, समाजिक और धार्मिक मर्यादा को देखते हुए पूर्ण किया जा सकता है प्रयागराज विश्विद्यालय हेतु वह सब हो चुका है स्थायी शिक्षक पद प्राप्ति के साथ केदारेश्वर केंद्र के पूर्ण रूप से स्थापित होने के साथ ही और जिस किसी केंद्र के अस्तित्व में आना था वह आ चुका है तो ऐसे में जिस केंद्र को इसमें मिलना हो/विलीन करना हो इसमें मिलाया जाय या जो चाहे इसे भी अपनी सहन शक्ति की क्षमता के अनुसार मिटाए किसी भी प्रत्यक्ष और परोक्ष परिणाम जीवन में भुगते, पर मेरे अनुसार कश्यप गोत्रियों के माध्यम से अभीष्ट लक्ष्य पूर्ण हो चुका है इस प्रयागराज विश्विद्यालय हेतु यह अलग है की बहुतायत लोग स्थिति जस की तस लोग भले पा रहे हैं।

मित्रों एक कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण के माध्यम से जो कुछ लक्ष्य शैक्षणिक दक्षता और क्षमता, समाजिक और धार्मिक मर्यादा को देखते हुए पूर्ण किया जा सकता है प्रयागराज विश्विद्यालय हेतु वह सब हो चुका है स्थायी शिक्षक पद प्राप्ति के साथ केदारेश्वर केंद्र के पूर्ण रूप से स्थापित होने के साथ ही और जिस किसी केंद्र के अस्तित्व में आना था वह आ चुका है तो ऐसे में जिस केंद्र को इसमें मिलना हो/विलीन करना हो इसमें मिलाया जाय या जो चाहे इसे भी अपनी सहन शक्ति की क्षमता के अनुसार मिटाए किसी भी प्रत्यक्ष और परोक्ष परिणाम जीवन में भुगते, पर मेरे अनुसार कश्यप गोत्रियों के माध्यम से अभीष्ट लक्ष्य पूर्ण हो चुका है इस प्रयागराज विश्विद्यालय हेतु यह अलग है की बहुतायत लोग स्थिति जस की तस लोग भले पा रहे हैं।>>>>>>>>रावण और मेघनाद के मरने के साथ सतीत्व पूर्णतः पालन करने वाली मंदोदरी का पति और पुत्र भी मरा था इसमें किसी को कोई संका नहीं होनी चाहिए पर मंदोदरी के पिता मेरठ (मयपुरी) के कश्यप गोत्रीय राजा मया ने कोई प्रतिशोध, प्रतिरोध और शिकायत रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय श्रीराम/अयोध्या:कोसलपुर से नहीं लिया था तो रावण और मेघनाद के नाम का घड़ियाली आंशू न बहाया जाय क्योंकि श्रीराम (विष्णु) का द्वारपाल जय(रावण) और विजय(कुम्भकर्ण) सीता:जानकी के अपहरण के दोषी हो विष्णुकुल के नियमों और स्वयं तत्कालीन सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन किये थे और वे मैत्री कर उनको वापस न करने पर अड़े थे और अट्टहास कर युध्ध की चुनौती दिए थे। और इस प्रकार पूरे रावनकुल को सीता के कारण समाप्त होना पड़ा था राम द्वारा छेड़े गए युध्ध से तो उसका पूरा कुल तो उस सशरीर परमब्रह्म श्रीराम में ही मिल गया।>>>>>>>>>>मित्रों एक कश्यप गोत्रीय सनातन ब्राह्मण के माध्यम से जो कुछ लक्ष्य शैक्षणिक दक्षता और क्षमता, समाजिक और धार्मिक मर्यादा को देखते हुए पूर्ण किया जा सकता है प्रयागराज विश्विद्यालय हेतु वह सब हो चुका है स्थायी शिक्षक पद प्राप्ति के साथ केदारेश्वर केंद्र के पूर्ण रूप से स्थापित होने के साथ ही और जिस किसी केंद्र के अस्तित्व में आना था वह आ चुका है तो ऐसे में जिस केंद्र को इसमें मिलना हो/विलीन करना हो इसमें मिलाया जाय या जो चाहे इसे भी अपनी सहन शक्ति की क्षमता के अनुसार मिटाए किसी भी प्रत्यक्ष और परोक्ष परिणाम जीवन में भुगते, पर मेरे अनुसार कश्यप गोत्रियों के माध्यम से अभीष्ट लक्ष्य पूर्ण हो चुका है इस प्रयागराज विश्विद्यालय हेतु यह अलग है की बहुतायत लोग स्थिति जस की तस लोग भले पा रहे हैं।

Wednesday, April 27, 2016

जब मैं स्वयं सबकी गलती देख चुका हूँ और देख भी रहा हूँ तो फिर मुझे सही कार्य में गलत सिध्ध करने का प्रयास यही बताता है की ऐसे लोग सब कुछ सही होने के पक्ष में नहीं हैं और ऐसे लोगों के कार्यों से उपजे पाप के कारण मानवता को संचालित रखने हेतु मेरे जैसे कुछ लोगों के जीवन को समर्पित किया जाता रहा है युगों युगों से और कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकतर गलत तथ्यों को सही न सिद्ध किया जाता इस संसार में तो मेरे जैसे लोगों का जीवन इस मानवता को संचालित करने हेतु समर्पित करने का प्रयोग बारम्बार न किया जाता। मुझको सब ज्ञांत होते हुए भी कानून क्यों पढ़ाया जा रहा है उन लोगों के लिए जो अपने जीवन का पूरा लुत्फ उठाये हैं, मेरे ही लक्ष्य पूर्ती के कार्य को बिगाड़ने के पूरे प्रयास के साथ अपने आंका को अधिकतम लाभ पंहुचाये हैं और केवल अवसर के रूप में जो स्थान चुने वहाँ उनको अवसर और स्थायित्व भी मिला तो जो उनके लिए संयोग बना वह उन्हें स्वीकार तो मुझे पूर्ण रूप से हर सम्बंधित वास्तु का समर्पण कर देने फलस्वरूप जो कुछ मिला और जो प्रसिद्धी मिली मेरे अभीष्ट लक्ष्य और कार्य पूर्ती से और जो स्थायित्व मिला उन्हें भी स्वीकार होना चाहिए। क्योंकि जहां हर तरह की प्रतिभा और मेधा शक्ति का प्रयोग होना था वहाँ सब कुछ हुआ तो जो संयोग जिसके साथ रहा और है वह उसे स्वीकार होना चाहिए और अगर सब कुछ संयोग ही है तो वही संयोग की पूर्ती हेतु ही या उसे सम्पादित कराने हेतु ही मेरी कागजी मेरिट हमेशा कम की जाती रही है। मैं त्रि अवस्था में से दो अवस्था छोड़ने को तैयार हूँ और रेखांकित भी किया हूँ जिसमे पूर्ण समर्पण भाव हो तैयार हो जाय मैं एक में ही पूर्ण रहूँगा पर मुझे नहीं लगता की पूर्ण समर्पित भाव वाला कोई तैयार करा पाएंगे आप लोग वर्तमान और आगे आने वाले समय के लिए भी? उस पर जबरदस्ती यह की मैं कही भी नहीं तो परिणाम भुगतिएगा जब तीनों छोडूंगा अभी कोई नहीं छोड़ा हूँ केवल दो छोड़ने की कोशिश में ही हूँ और आप लोगों को लगा की मैं सब कुछ छोड़ चुका और आप लोग सब सम्भाल लिए हैं तीन को तैयार करके? पर याद रहे की दो के बाद एक सदा मेरे ही पास रहेगा?

जब मैं स्वयं सबकी गलती देख चुका हूँ और देख भी रहा हूँ तो फिर मुझे सही कार्य में गलत सिध्ध करने का प्रयास यही बताता है की ऐसे लोग सब कुछ सही होने के पक्ष में नहीं हैं और ऐसे लोगों के कार्यों से उपजे पाप के कारण मानवता को संचालित रखने हेतु मेरे जैसे कुछ लोगों के जीवन को समर्पित किया जाता रहा है युगों युगों से और कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकतर गलत तथ्यों को सही न सिद्ध किया जाता इस संसार में तो मेरे जैसे लोगों का जीवन इस मानवता को संचालित करने हेतु समर्पित करने का प्रयोग बारम्बार न किया जाता। मुझको सब ज्ञांत होते हुए भी कानून क्यों पढ़ाया जा रहा है उन लोगों के लिए जो अपने जीवन का पूरा लुत्फ उठाये हैं, मेरे ही लक्ष्य पूर्ती के कार्य को बिगाड़ने के पूरे प्रयास के साथ अपने आंका को अधिकतम लाभ पंहुचाये हैं और केवल अवसर के रूप में जो स्थान चुने वहाँ उनको अवसर और स्थायित्व भी मिला तो जो उनके लिए संयोग बना वह उन्हें स्वीकार तो मुझे पूर्ण रूप से हर सम्बंधित वास्तु का समर्पण कर देने फलस्वरूप जो कुछ मिला और जो प्रसिद्धी मिली मेरे अभीष्ट लक्ष्य और कार्य पूर्ती से और जो स्थायित्व मिला उन्हें भी स्वीकार होना चाहिए। क्योंकि जहां हर तरह की प्रतिभा और मेधा शक्ति का प्रयोग होना था वहाँ सब कुछ हुआ तो जो संयोग जिसके साथ रहा और है वह उसे स्वीकार होना चाहिए और अगर सब कुछ संयोग ही है तो वही संयोग की पूर्ती हेतु ही या उसे सम्पादित कराने हेतु ही मेरी कागजी मेरिट हमेशा कम की जाती रही है। मैं त्रि अवस्था में से दो अवस्था छोड़ने को तैयार हूँ और रेखांकित भी किया हूँ जिसमे पूर्ण समर्पण भाव हो तैयार हो जाय मैं एक में ही पूर्ण रहूँगा पर मुझे नहीं लगता की पूर्ण समर्पित भाव वाला कोई तैयार करा पाएंगे आप लोग वर्तमान और आगे आने वाले समय के लिए भी? उस पर जबरदस्ती यह की मैं कही भी नहीं तो परिणाम भुगतिएगा जब तीनों छोडूंगा अभी कोई नहीं छोड़ा हूँ केवल दो छोड़ने की कोशिश में ही हूँ और आप लोगों को लगा की मैं सब कुछ छोड़ चुका और आप लोग सब सम्भाल लिए हैं तीन को तैयार करके? पर याद रहे की दो के बाद एक सदा मेरे ही पास रहेगा?
Kedareshwar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies

Self assessment of seniority in the direct appointment in the same cadre in the same selection committee at the same time in the same Centre/Department in the same Faculty, if you join earlier than others, according to the till date status of ACT/STATUTE and Ordinance of University of Allahabad and UGC Regulation 2010 (effective since 31 December, 2008 in this matter): These rule say that seniority shall be determined on the continuous length of service on that post since you join the post/service. If continuous length of service is same or 1 or more faculty members were join with you only then order of merit or other rule will be applied. Thus a person joined before others in the above said condition is senior by these basic bone documents responsible for governing the University. I have join in the same condition at least 19 days and more days before than this against others then one can easily guess about the seniority in my case on natural justice. For rest am waiting and expecting for the same natural justice from the same body and other body of this world since my joining the service here.

Self assessment of seniority in the direct appointment in the same cadre in the same selection committee at the same time in the same Centre/Department in the same Faculty, if you join earlier than others, according to the till date status of ACT/STATUTE and Ordinance of University of Allahabad and UGC Regulation 2010 (effective since 31 December, 2008 in this matter): These rule say that seniority shall be determined on the continuous length of service on that post since you join the post/service. If continuous length of service is same or 1 or more faculty members were join with you only then order of merit or other rule will be applied. Thus a person joined before others in the above said condition is senior by these basic bone documents responsible for governing the University. I have join in the same condition at least 19 days and more days before than this against others then one can easily guess about the seniority in my case on natural justice. For rest am waiting and expecting for the same natural justice from the same body and other body of this world since my joining the service here.


जो इस ब्रह्माण्ड की तीनो मूल अवस्था को एक साथ जीते हुए या तीनो की एकल सम्मिलित शक्ति स्वयं रहते हुए विश्व मानवता के केंद्र प्रयागराज में आम समाज के अंदर ही आम मानव व्यक्तित्व जैसा या आम लक्ष्य के प्रति उद्यमशील व्यक्तित्व से एकदम अलग का ही जीवन स्वयं को निर्धारित कर्तव्यों का निर्वहन समाजिक रूप से करते हुए जिया हो उसे तीनों मूल अवस्थाओं की शक्ति और भक्ति और सम्मान सब पता होता है। इसमें मैं शिव के केदारेश्वर:आदिशंकर:आदिशिव, महामृत्युंजय और विश्वेश्वर:विश्वनाथ जैसे त्रिशूल शक्ति की ही बात नहीं कर रहा वरन प्रयागराज के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा काशी के अनुसार शिव (शिव तीनो त्रिशूल शक्तिगत रूपों समेत), विष्णु और ब्रह्मा के तीनो त्रिदेव शक्ति को एकल व्यक्तित्व द्वारा धारण करने वाले व्यक्तित्व की बात कर रहा हूँ जो विश्व मानवता के केंद्र प्रयागराज में आम समाज के अंदर ही आम मानव व्यक्तित्व जैसा या आम लक्ष्य के प्रति उद्यमशील व्यक्तित्व से एकदम अलग का ही जीवन स्वयं को निर्धारित कर्तव्यों का निर्वहन समाजिक रूप से करते हुए जिया हो और यदि उससे कहा जाय की किसी एक क्षण केवल एक जैसा या एक का ही व्यवहार करे तो उस समय ऐसे दो व्यक्तित्वों को समर्पित दो व्यक्तित्वों को तैयार करना होता है और वही नहीं हो रहा है इस आम समाज से तो उससे एक जैसा व्यवहार करने की अपेक्षा कैसे की जा रही है? मूलत: केवल शिव के केदारेश्वर:आदिशंकर:आदिशिव, महामृत्युंजय और विश्वेश्वर:विश्वनाथ जैसे त्रिशूल शक्ति से एक जैसा व्यवहार करने की अपेक्षा की जा सकती है|

जो इस ब्रह्माण्ड की तीनो मूल अवस्था को एक साथ जीते हुए या तीनो की एकल सम्मिलित शक्ति स्वयं रहते हुए विश्व मानवता के केंद्र प्रयागराज में आम समाज के अंदर ही आम मानव व्यक्तित्व जैसा या आम लक्ष्य के प्रति उद्यमशील व्यक्तित्व से एकदम अलग का ही जीवन स्वयं को निर्धारित कर्तव्यों का निर्वहन समाजिक रूप से करते हुए जिया हो उसे तीनों मूल अवस्थाओं की शक्ति और भक्ति और सम्मान सब पता होता है। इसमें मैं शिव के केदारेश्वर:आदिशंकर:आदिशिव, महामृत्युंजय और विश्वेश्वर:विश्वनाथ जैसे त्रिशूल शक्ति की ही बात नहीं कर रहा वरन प्रयागराज के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा काशी के अनुसार शिव (शिव तीनो त्रिशूल शक्तिगत रूपों समेत), विष्णु और ब्रह्मा के तीनो त्रिदेव शक्ति को एकल व्यक्तित्व द्वारा धारण करने वाले व्यक्तित्व की बात कर रहा हूँ जो विश्व मानवता के केंद्र प्रयागराज में आम समाज के अंदर ही आम मानव व्यक्तित्व जैसा या आम लक्ष्य के प्रति उद्यमशील व्यक्तित्व से एकदम अलग का ही जीवन स्वयं को निर्धारित कर्तव्यों का निर्वहन समाजिक रूप से करते हुए जिया हो और यदि उससे कहा जाय की किसी एक क्षण केवल एक जैसा या एक का ही व्यवहार करे तो उस समय ऐसे दो व्यक्तित्वों को समर्पित दो व्यक्तित्वों को तैयार करना होता है और वही नहीं हो रहा है इस आम समाज से तो उससे एक जैसा व्यवहार करने की अपेक्षा कैसे की जा रही है? मूलत: केवल शिव के केदारेश्वर:आदिशंकर:आदिशिव, महामृत्युंजय और विश्वेश्वर:विश्वनाथ जैसे त्रिशूल शक्ति से एक जैसा व्यवहार करने की अपेक्षा की जा सकती है|

जो सम्पूर्ण जगत जीवन का ही आधार और अवलम्बन स्वयं हो स्वयं अपने आधार को भी आधार दिया हो उसके उस आधार को ही उस जगत नियन्ता का आधार सिध्ध करना चाहता है यह जगत यह तो असम्भव है चाहे यह जगत उसी जगत नियन्ता में पुनः क्यों न शामिल हो जाय और निकायहींन परमब्रह्म/ब्रह्म ही ब्रह्माण्ड में केवल व्याप्त हो जाय?

जो सम्पूर्ण जगत जीवन का ही आधार और अवलम्बन स्वयं हो स्वयं अपने आधार को भी आधार दिया हो उसके उस आधार को ही उस जगत नियन्ता का आधार सिध्ध करना चाहता है यह जगत यह तो असम्भव है चाहे यह जगत उसी जगत नियन्ता में पुनः क्यों न शामिल हो जाय और निकायहींन परमब्रह्म/ब्रह्म ही ब्रह्माण्ड में केवल व्याप्त हो जाय?
Kedareshwar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies
AUAA Proud Past Alumni of University of Allahabad
AUAA Proud Past Alumni of University of Allahabad
Vivek Kumar Pandey

मेरी एक बार नहीं अनगिनत बार विनती और प्रार्थना है गौरवर्णीय देवी दुर्गा (महासरस्वती+महालक्ष्मी+महागौरी) के उस स्वरुप से जिसमे की वे उदंड (सर्वोच्च शक्ति न होने पर भी दृष्टता पूर्ण व्यवहार) दानव समाज पर उपजे अपने क्रोध ही क्रोध से काली हो दानवों का संहार करती है और देवकाली (महासरस्वती+महालक्ष्मी+महागौरी) कहलाती है, मैं ऐसी मेरे गांव रामापुर-223225, आजमगढ़ की कुल देवी, देवकाली (महासरस्वती+महालक्ष्मी+महागौरी) और स्वयं कृष्णकाय ऋषी कपिल ऋषि (न की कपिल=गणेश=विनायक) और मलय क्षेत्र में प्रयागराज के सातों सप्तर्षि के अंश से जन्मे ऋषि, श्यामवर्णीय अगस्त्य ऋषी (क्षेत्र विस्तार आंध्रा/तमिल/केरल) से प्रार्थना करूंगा की वे स्वयं आधे गोरे और आधे काले की अनैतिक और आधारहीन लड़ाई का अंत करें जिसकी ओट =आंड ले या जिसको ढाल बनाकर कुत्सित रूप से भारतीय और वैश्विक समाज में गैरजिम्मेदार दाम्पत्य पूर्ण जीवन, कलह पूर्ण वातावरण, परस्पर अविश्वास और द्वेष से ग्रसित भावनावेश में बहते और तैरते समाज, अनैतिक, चरित्रहीन संस्कृति और चरित्रहीन संस्कार युक्त ज्ञानवान परन्तु अधः पतित समाज का निर्माण अतिसय द्वितिगति/ तेजी से हो रहा है विगत 2-3 दसक से।

मेरी एक बार नहीं अनगिनत बार विनती और प्रार्थना है गौरवर्णीय देवी दुर्गा (महासरस्वती+महालक्ष्मी+महागौरी) के उस स्वरुप से जिसमे की वे उदंड (सर्वोच्च शक्ति न होने पर भी दृष्टता पूर्ण व्यवहार) दानव समाज पर उपजे अपने क्रोध ही क्रोध से काली हो दानवों का संहार करती है और देवकाली (महासरस्वती+महालक्ष्मी+महागौरी) कहलाती है, मैं ऐसी मेरे गांव रामापुर-223225, आजमगढ़ की कुल देवी, देवकाली (महासरस्वती+महालक्ष्मी+महागौरी) और स्वयं कृष्णकाय ऋषी कपिल ऋषि (न की कपिल=गणेश=विनायक) और मलय क्षेत्र में प्रयागराज के सातों सप्तर्षि के अंश से जन्मे ऋषि, श्यामवर्णीय अगस्त्य ऋषी (क्षेत्र विस्तार आंध्रा/तमिल/केरल) से प्रार्थना करूंगा की वे स्वयं आधे गोरे और आधे काले की अनैतिक और आधारहीन लड़ाई का अंत करें जिसकी ओट =आंड ले या जिसको ढाल बनाकर कुत्सित रूप से भारतीय और वैश्विक समाज में गैरजिम्मेदार दाम्पत्य पूर्ण जीवन, कलह पूर्ण वातावरण, परस्पर अविश्वास और द्वेष से ग्रसित भावनावेश में बहते और तैरते समाज, अनैतिक,  चरित्रहीन संस्कृति और चरित्रहीन संस्कार युक्त ज्ञानवान परन्तु अधः पतित समाज का निर्माण अतिसय द्वितिगति/ तेजी से हो रहा है विगत 2-3 दसक से। 

Tuesday, April 26, 2016

विश्व गुरु जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र ही है चाहे गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के माध्यम से ही हो और यह जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि की कर्म स्थली थी और जिसने परशुराम के गुरुकुल के माध्यम से केरल से प्रारम्भ कर उत्तराखंड/उत्तराँचल तक अपने गुरुकुल स्थापित करते हुए शिक्षा देते रहे और लोगों को ब्राह्मण बनाते रहे और इस प्रकार ब्राह्मणत्व गुण (त्याग) और धारण क्षमता में श्रेष्ठ भृगुकुल की परम्परा के क्षेत्र जौनपुर(जमदग्निपुर) विष्वगुरू की परम्परा को इस महा विश्व्परिवर्तन के संक्रमण काल में भी अपनी गुरुता बनाए रखा। >>>>>>>>>>>>दुनिया की हर महा सुनामी और हर महाशिव तांडव जिस द्वार=चौखट पर आकर शांत हो जाता है वह है बिशुनपुर-223103 , जौनपुर(जामदग्निपुर) के सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण रामानन्द कुल के विष्णुकुल (श्रीकांत+श्रीधर+श्रीप्रकाश) का मुख्य द्वार=चौखट उसके सामने विवेकानंद क्या है? मैं स्वयं उस गाँव के अन्य सब लोगों के लिए स्वयं पूज्य पर उस कुल के लिए पूज्य नहीं (जिनका नाति और भांजा स्वयं हूँ जो वास्तविकता में हिन्दू रीती में सब जाती/धर्म के घर वालों में पूज्य होते है) वह कुल मेरे लिए ही पूज्य है। और इसी लिए सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण मामा श्रध्देय श्रीश्रीधर (विष्णु) के लिए परमगुरु परमपिता परमेश्वर और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण ताऊ श्रध्देय डॉ प्रेमचंद (शिव) जी के लिए केवल परमपिता परमेश्वर सम्बोधन प्रयोग करता हूँ। मतलब विष्णु त्रिदेवो में सर्वश्रेष्ठ गुरु और आयुवर्ग में मध्य के /लक्ष्मी जी आयुवर्ग में मध्य की; शिव:त्रिदेवों में ज्येष्ठतम मतलब आद्या मतलब आद्याशंकर तथा त्रिदेवों में सबसे बड़े आचार्य (जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ) /पार्वती जी सबसे छोटी जो ब्रह्मा और सरस्वती की पौत्री है; ब्रह्मा सबसे बड़े ज्ञानी)/सरस्वती जी त्रिदेवियों में आद्या:आदिदेवी, पर सब अपनी पत्नियों के संयोग के साथ समान रूप से श्रेष्ठ और वरिष्ठ है। पर सर्वश्रेष्ठ गुरु ही होता है जो जीवन को दिशा देता है हर मनवता की श्रेष्ठ उपलब्धि हेतु उस ज्ञान और शोध को जीवन में व्यवस्थित रूप से प्रयोग करने हेतु और वह निश्चित रूप से श्रेष्ठ है और अर्चनीय, वन्दनीय, उपासनीय व् अनुकरणीय है लेकिन वरिष्ठ वह ही होता है जो ज्येष्ठतम और जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ होता है। अतः विष्वमहापरिवर्तन की मुख्य कमान शिवरामकृष्ण कुल मतलब रामापुर-223225, आजमगढ़ के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर/चन्द्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/शशांकशेखर के देवव्रत/गंगापुत्र के कुल पास रही और सहयोग बिशुनपुर-223103 और प्रयागराज के साथ सम्पूर्ण मानवता प्रेमियों का रहा। >>>>>>>>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>[[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha Rashi: 1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]

विश्व गुरु जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र ही है चाहे गौतम गोत्रीय व्यासी मिश्रा ब्राह्मण परिवार के माध्यम से ही हो और यह जौनपुर(जमदग्निपुर) क्षेत्र  परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि की कर्म स्थली थी और जिसने परशुराम के गुरुकुल के माध्यम से केरल से प्रारम्भ कर उत्तराखंड/उत्तराँचल तक अपने गुरुकुल स्थापित करते हुए शिक्षा देते रहे और लोगों को ब्राह्मण बनाते रहे और इस प्रकार  ब्राह्मणत्व गुण (त्याग) और धारण क्षमता में श्रेष्ठ भृगुकुल की परम्परा के क्षेत्र जौनपुर(जमदग्निपुर) विष्वगुरू की परम्परा को इस महा विश्व्परिवर्तन के संक्रमण काल में भी अपनी गुरुता बनाए रखा। >>>>>>>>>>>>दुनिया की हर महा सुनामी और हर महाशिव तांडव जिस द्वार=चौखट पर आकर शांत हो जाता है वह है बिशुनपुर-223103 , जौनपुर(जामदग्निपुर) के सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण रामानन्द कुल के विष्णुकुल (श्रीकांत+श्रीधर+श्रीप्रकाश) का मुख्य द्वार=चौखट उसके सामने विवेकानंद क्या है? मैं स्वयं उस गाँव के अन्य सब लोगों के लिए स्वयं पूज्य पर उस कुल के लिए पूज्य नहीं  (जिनका नाति और भांजा स्वयं हूँ जो वास्तविकता में हिन्दू रीती में सब जाती/धर्म के घर वालों में पूज्य होते है) वह कुल मेरे लिए ही पूज्य है।  और इसी लिए सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण मामा श्रध्देय श्रीश्रीधर (विष्णु) के लिए परमगुरु परमपिता परमेश्वर और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण ताऊ श्रध्देय डॉ प्रेमचंद (शिव) जी के लिए केवल परमपिता परमेश्वर सम्बोधन प्रयोग करता हूँ। मतलब विष्णु त्रिदेवो में सर्वश्रेष्ठ गुरु और आयुवर्ग में मध्य के /लक्ष्मी जी आयुवर्ग में मध्य की;  शिव:त्रिदेवों में ज्येष्ठतम मतलब आद्या मतलब आद्याशंकर तथा त्रिदेवों में सबसे बड़े आचार्य (जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ) /पार्वती जी सबसे छोटी जो ब्रह्मा और सरस्वती की पौत्री है; ब्रह्मा सबसे बड़े ज्ञानी)/सरस्वती जी त्रिदेवियों में आद्या:आदिदेवी, पर सब अपनी पत्नियों के संयोग के साथ समान रूप से श्रेष्ठ और वरिष्ठ है। पर सर्वश्रेष्ठ गुरु ही होता है जो जीवन को दिशा देता है हर मनवता की श्रेष्ठ उपलब्धि हेतु उस ज्ञान और शोध को जीवन में व्यवस्थित रूप से प्रयोग करने हेतु और वह निश्चित रूप से श्रेष्ठ है और अर्चनीय, वन्दनीय, उपासनीय व् अनुकरणीय है लेकिन वरिष्ठ  वह  ही होता है  जो ज्येष्ठतम और  जीवन में शोधगत ज्ञान व् अनुभव में श्रेष्ठ होता है। अतः विष्वमहापरिवर्तन की मुख्य कमान शिवरामकृष्ण कुल मतलब रामापुर-223225, आजमगढ़ के सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (बेलपत्र:बिलवापत्र: शिव व् शिवा पर अर्पणेय/आभूषण/आहार/भोज्य और जो शेष बचा तो स्वयं शिव हुआ) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर/चन्द्रशेखर/राकेशधर/शशिधर/शशांकशेखर के देवव्रत/गंगापुत्र के कुल पास रही और सहयोग बिशुनपुर-223103 और प्रयागराज के साथ सम्पूर्ण मानवता प्रेमियों का रहा। >>>>>>>>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>[[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha Rashi: 1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]

दिनांक 16, मई माह, 2006 में मुझ स्वयं समर्पित द्वारा किसी अनजाने भीष्म की भीष्म प्रतिज्ञा को सत्य साबित करने वाले पत्राचार (स्वयं समर्पित स्वयं अस्त्र धारी बना) जिसका परिणाम 2006 के अंत तक ही आ गया था और औपचारिकताएं 2007 (सैद्धांतिक विजय दृस्टिगत हुई) , 2008 (में विशेष सम्मान सहित चिन्हित किया गया) और 2009 में मेरे यहाँ स्थायी रूप से उपस्थिति और श्रेष्ठता व् वरिष्ठता की अमिट विजय लकीर बनी, उस विजय को ही समाज से प्रमाण लेने हेतु पुनः पुनः संघर्ष रत स्वयं को दिखाना क्या समाजवाद, बहुजन समाजवाद, साम्यवाद(मार्क्सवाद= अंकवाद=संख्यबलवाद) या अन्य-अन्य वाद के समक्ष भगवान श्रीराम की तरह समाज को साक्ष्य प्रस्तुत करना नहीं है? क्या यह मानव जीवन लीला से पग-पग हारते और पुनः जीतते और जीवन आशा रेखा को संजोए रख ब्रह्मा के सृस्टि को संचालित रखने हेतु जीवन पिपासा को जारी रखने वालों को शीख और संघर्ष की शक्ति देने जैसा नहीं है? मैं वह जन्मजात कृष्ण से बना हुआ शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम (महाशिव) हूँ जो मानवता के कल्याण हेतु ही 2006, 2007, 2008, 2009 में ही हुई पहली परिणामी उपहार और पहली जीत को ही प्रमाणित करवा रहा हूँ 2014 से|

दिनांक 16, मई माह, 2006 में मुझ स्वयं समर्पित द्वारा किसी अनजाने भीष्म की भीष्म प्रतिज्ञा को सत्य साबित करने वाले पत्राचार (स्वयं समर्पित स्वयं अस्त्र धारी बना) जिसका परिणाम 2006 के अंत तक ही आ गया था और औपचारिकताएं 2007 (सैद्धांतिक विजय दृस्टिगत हुई) , 2008 (में विशेष सम्मान सहित चिन्हित किया गया) और 2009 में मेरे यहाँ स्थायी रूप से उपस्थिति और श्रेष्ठता व् वरिष्ठता की अमिट विजय लकीर बनी, उस विजय को ही समाज से प्रमाण लेने हेतु पुनः पुनः संघर्ष रत स्वयं को दिखाना क्या समाजवाद, बहुजन समाजवाद, साम्यवाद(मार्क्सवाद= अंकवाद=संख्यबलवाद) या अन्य-अन्य वाद के समक्ष भगवान श्रीराम की तरह समाज को साक्ष्य प्रस्तुत करना नहीं है? क्या यह मानव जीवन लीला से पग-पग हारते और पुनः जीतते और जीवन आशा रेखा को संजोए रख ब्रह्मा के सृस्टि को संचालित रखने हेतु जीवन पिपासा को जारी रखने वालों को शीख और संघर्ष की शक्ति देने जैसा नहीं है? मैं वह जन्मजात कृष्ण से बना हुआ शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम (महाशिव) हूँ जो मानवता के कल्याण हेतु ही 2006, 2007, 2008, 2009 में ही हुई पहली परिणामी उपहार और पहली जीत को ही प्रमाणित करवा रहा हूँ 2014 से|

Vivek Kumar Pandey official CV

आजमगढ़ में राजभर और दलित समाज तमिल/केरल/आंध्रा/कर्णाटक की तर्ज पर गोरे और काले की राजनीती करता चला आ रहा है मुझे यह मुझे बचपन से ज्ञात था पर प्रयागराज में भारद्वाज ऋषी के चिराग तले भी यह चरम पर युगों-युगों से जारी है यह विगत 16 वर्षों में मुझे पूर्ण रूप से ज्ञात हो चुका है: पर मेरा प्रश्न यही है की अधिकाँश को जब गोरी पत्नियां पसंद हैं तो आधा काला और आधा गोरा जैसा आजमगढ़ और तमिल/केरल/आंध्रा/कर्णाटक का फार्मूला क्या पूरे भारत पर आप लागू कर सकते हैं और अगर नहीं कर सकते हैं तो विश्वमानवता के केंद्र प्रयागराज में आधा गोरा और आधा काला का आधार क्यों तैयार किया जा रहा है पिछले दो तीन दशकों से? मैं यह सब इसलिए कह रहा हूँ की मैं जौनपुर (जमदग्नि ऋषि के क्षेत्र जमदग्निपुर) में जन्म लिया हूँ आजमगढ़ का होकर भी और उस जौनपुर में आधा गोरा और आधा काला की राजनीति सफल नहीं हो सकती और वह आधा गोरा और आधा काला की राजनीति बेईमानी है वहां जहां काले लोग बहुत कम हैं भारतीय जलवायु के अनुसार। उसी तरह अन्य भारतीय भाग की परिकल्पना कर लीजिए तो अब बताइये की पूरे भारत और पूरे विश्व के केंद्र प्रयागराज/प्राक्यज्ञ/इला आवास/इला आबाद/अल्लाह-आबाद/अल्लाह आवास/त्रिवेणी/संगम/दो(त्रि)अाब में:--- इलाहाबाद (शेषभारत) और हैदराबाद (तमिल/केरल/आंध्रा/कर्णाटक) की तर्ज पर आधे गोरे और आधी काले की राजनीति हैं सही है क्या? और क्या यह स्वयं भारतवर्ष के लिए और पूरे विश्व के लिए कल्याणकारी है ? मेरा उत्तर और अनुभव है की यह भारतीय मूल अनुसार काले लोगों के लिए अतिहानिकारक और शेष के लिए भी हानिकारक है जिसमे की इस मिली जुली संस्कृति और संस्कार वाले लोगों को अपनी ही संतान और परिवार पर संदेह बढ़ता है और चरित्रहीनता को बढ़ावा मिलता है और सामाजिक समस्याएं जन्म लेती है और लोग परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने हेतु अनैतिकता भरे शब्दों का सहारा लेते हैं जिनसे समाज के विनाशकारी शक्तियों को राजनीती करने का सम्बल मिलता है। अतः विनम्र निवेदन है प्रयागराज वासियों और भारतवर्ष वासियो से की कम से कम आप इस लड़ाई को जितनी जल्द हो त्याग दीजिये जिससे आप का परिवार और आप की गौरवमयी संस्कृति और संस्कार नीलाम न किये जा सके किसी की भी चाल से।

आजमगढ़ में राजभर और दलित समाज तमिल/केरल/आंध्रा/कर्णाटक की तर्ज पर गोरे और काले की राजनीती करता चला आ रहा है मुझे यह मुझे बचपन से ज्ञात था पर प्रयागराज में भारद्वाज ऋषी के चिराग तले भी यह चरम पर युगों-युगों से जारी है यह विगत 16 वर्षों में मुझे पूर्ण रूप से ज्ञात हो चुका है: पर मेरा प्रश्न यही है की अधिकाँश को जब गोरी पत्नियां पसंद हैं तो आधा काला और आधा गोरा जैसा आजमगढ़ और तमिल/केरल/आंध्रा/कर्णाटक का फार्मूला क्या पूरे भारत पर आप लागू कर सकते हैं और अगर नहीं कर सकते हैं तो विश्वमानवता के केंद्र प्रयागराज में आधा गोरा और आधा काला का आधार क्यों तैयार किया जा रहा है पिछले दो तीन दशकों से?  मैं यह सब इसलिए कह रहा हूँ की मैं जौनपुर (जमदग्नि ऋषि के क्षेत्र जमदग्निपुर) में जन्म लिया हूँ आजमगढ़ का होकर भी और उस जौनपुर में आधा गोरा और आधा काला की राजनीति सफल नहीं हो सकती और वह आधा गोरा और आधा काला की राजनीति बेईमानी है वहां जहां काले लोग बहुत कम हैं भारतीय जलवायु के अनुसार। उसी तरह अन्य भारतीय भाग की परिकल्पना कर लीजिए तो अब बताइये की पूरे भारत और पूरे विश्व के केंद्र प्रयागराज/प्राक्यज्ञ/इला आवास/इला आबाद/अल्लाह-आबाद/अल्लाह आवास/त्रिवेणी/संगम/दो(त्रि)अाब में:---  इलाहाबाद (शेषभारत) और हैदराबाद (तमिल/केरल/आंध्रा/कर्णाटक) की तर्ज पर आधे गोरे और आधी काले की राजनीति हैं सही है क्या? और क्या यह स्वयं भारतवर्ष के लिए और पूरे विश्व  के लिए कल्याणकारी है ?  मेरा उत्तर और अनुभव है की यह भारतीय मूल अनुसार काले लोगों के लिए अतिहानिकारक और शेष के लिए भी हानिकारक है जिसमे की  इस मिली जुली संस्कृति और संस्कार वाले लोगों को अपनी ही संतान और परिवार पर संदेह बढ़ता है और चरित्रहीनता को बढ़ावा मिलता है और सामाजिक समस्याएं जन्म लेती है और लोग परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने हेतु अनैतिकता भरे शब्दों का सहारा लेते हैं जिनसे समाज के विनाशकारी शक्तियों को राजनीती करने का सम्बल मिलता है। अतः विनम्र निवेदन है प्रयागराज वासियों और भारतवर्ष  वासियो से की कम से कम आप इस लड़ाई को जितनी जल्द हो त्याग दीजिये जिससे आप का परिवार और आप की गौरवमयी संस्कृति और संस्कार नीलाम न किये जा सके किसी की भी चाल से। 

किसी सज्जन और ब्राह्मण के लिए उसके जीने योग्य वातावरण तैयार करोगे तो तब न वह सज्जन और ब्राह्मण बनेगा न और जब आप रन और संघर्ष पर विश्वास करेंगे तो उससे यह सब करेंगे तो वह ब्राह्मण तब पाण्डेय (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इस्लामिक और ईसाइयतन) ही तो बनेगा न की बिशुनपुर-223103 के सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश) मिश्र ब्राह्मण रामानन्द कुल जैसा ब्राह्मण बनेगा और जब वह पाण्डेय बनेगा तो आप उसको मात नहीं दे सकते है किसी भी स्थिति में और वह आप पर नियंत्रण स्थापित करके ही रहेगा और वही हुआ मेरे जैसा अतीव सज्जन ब्राह्मण कभी हिन्दू आतंकवादी कहलाया कुछ पश्चिमी मानशिकता से दबे हुए उत्तर भारतीयों और दक्षिण भारतीयों द्वारा जिसकी प्रत्यक्ष रिप्लिका मेरे पास पंहुची थी लोगों द्वारा 2007-2009 के दौरान किसी गुरुकुल में।

किसी सज्जन और ब्राह्मण  के लिए उसके जीने योग्य वातावरण तैयार करोगे तो तब न वह सज्जन और ब्राह्मण बनेगा न और जब आप रन और संघर्ष पर विश्वास करेंगे तो उससे यह सब करेंगे तो वह ब्राह्मण तब पाण्डेय (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इस्लामिक और ईसाइयतन)  ही तो बनेगा न की बिशुनपुर-223103 के सनातन गौतम  गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्याश)  मिश्र ब्राह्मण रामानन्द कुल जैसा ब्राह्मण बनेगा और जब वह पाण्डेय बनेगा तो आप उसको मात नहीं दे सकते है किसी भी स्थिति में और वह आप पर नियंत्रण स्थापित करके ही रहेगा और वही हुआ मेरे जैसा अतीव सज्जन ब्राह्मण कभी हिन्दू आतंकवादी कहलाया कुछ पश्चिमी मानशिकता से दबे हुए उत्तर भारतीयों और दक्षिण भारतीयों द्वारा जिसकी प्रत्यक्ष रिप्लिका मेरे पास पंहुची थी लोगों द्वारा 2007-2009 के दौरान किसी गुरुकुल में।   

मुझे घेरने वाले जिन लोगों की प्रतिभा शून्य हो गयी थी विगत लगभग एक-दो दसक पूर्व सहस्राब्दी परिवर्तन से संक्रमण के दौरान उस विकराल स्थिति जब गांधार विमान अपहरण करने का समर्थन करने वाले इस्लाम अनुयायी कम्प्यूटर एप्लीकेशन परास्नातक छात्र की आवाज बंद कराने में काशी के काशी हिन्दू विश्विद्यालय जैसे स्थान पर और वहाँ मैं उसको शांत कर समर्थन करना बंद कराया था 1 जनवरी, 2000 को तो उस समय न कोई बाबा साहब सामने आ रहे थे और न काका साहब और उस महाविनाश काल में मुझे 2001 में उस लड़ाई के समन हेतु इस प्रयागराज जो विश्व मानवता का केंद्र और पाँचों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य, इस्लाम, ईसाइयत) शक्तियों का भी केंद्र है वहां लगा दिया गया मतलब कोई हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर या उनका अनुयायी ऐसी विश्व्व्यापक विनाश की परिस्थिति में काम नहीं आया, तो ऐसे में मुझे घेरने वाली शक्तियों के समर्थन से कुछ लोगों की प्रतिभा पुनः जग गयी है उनके लिए मैं बताता चलूँ>>>>>>जिस कागजी प्रतिभा (अंक) और भौतिक प्रतिभा (उद्द्योग आधारित समृध्दी) को लोग प्रतिभा कहते है, अगर मैं, विवेक एक सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (शिव व् शिवा:पारवती:सती:उमा: गिरिजा: गौरी:अपर्णा को अर्पणेय/भोज्य/अाभूषण/आहार और शेष बचा तो स्वयं शिव बना) ब्राह्मण परिवार की हर एक मर्यादा को बचपन से लेकर आज तक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में (सहस्राब्दी परिवर्तन से संक्रमण के दौरान मतलब आज तक) होने की हर मर्यादा को अक्षर सह न निभाना होता तो, दुनिया की कोई ऐसी प्रतिभा नहीं है, थी और होगी, कोई व्यक्तित्व नहीं था जिसकी कद उसके क्षेत्र में न नाप लेता वामन भगवान भगवान "विष्णु" की तरह। लेकिन ब्राह्मणों के घर से ही किसी कारन वश बाहर गए मलिन बस्ती या अन्य बस्ती का हाँथ थामे नर और नारी ही ऐसा कुचक्र रचे थे जिसको तोड़ने में पूरे 16 वर्ष नहीं वरन मेरे जीवन के पूरे 40 वर्ष लग गए (11-11 -1975 से 11-11-2015)। >>>>>>>[[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha Rashi: 1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]] >>>>>>>>>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||

मुझे घेरने वाले जिन लोगों की प्रतिभा शून्य हो गयी थी विगत लगभग एक-दो दसक पूर्व सहस्राब्दी परिवर्तन से संक्रमण के दौरान उस विकराल स्थिति जब गांधार विमान अपहरण करने का समर्थन करने वाले इस्लाम अनुयायी कम्प्यूटर एप्लीकेशन परास्नातक छात्र  की आवाज बंद कराने में काशी के काशी हिन्दू विश्विद्यालय जैसे स्थान पर और वहाँ मैं उसको शांत कर समर्थन करना बंद कराया था 1 जनवरी, 2000 को तो उस समय न कोई बाबा साहब सामने आ रहे थे और न काका साहब और उस महाविनाश काल में मुझे 2001 में उस लड़ाई के समन हेतु इस प्रयागराज जो विश्व मानवता का केंद्र और पाँचों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैस्य, इस्लाम, ईसाइयत) शक्तियों का भी केंद्र है वहां लगा दिया गया मतलब कोई हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर या उनका अनुयायी ऐसी विश्व्व्यापक विनाश की परिस्थिति में काम नहीं आया, तो ऐसे में मुझे घेरने वाली शक्तियों के समर्थन से कुछ लोगों की प्रतिभा पुनः जग गयी है उनके लिए मैं बताता चलूँ>>>>>>जिस कागजी प्रतिभा (अंक)  और भौतिक प्रतिभा (उद्द्योग आधारित समृध्दी) को लोग प्रतिभा कहते है, अगर मैं, विवेक एक सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला (शिव व् शिवा:पारवती:सती:उमा: गिरिजा: गौरी:अपर्णा को अर्पणेय/भोज्य/अाभूषण/आहार और शेष बचा तो स्वयं शिव बना) ब्राह्मण परिवार की हर एक मर्यादा को बचपन से लेकर आज तक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में (सहस्राब्दी परिवर्तन से संक्रमण के दौरान मतलब आज तक)  होने की हर मर्यादा को अक्षर सह न निभाना होता तो, दुनिया की कोई ऐसी प्रतिभा नहीं है, थी और होगी, कोई व्यक्तित्व नहीं था जिसकी कद उसके क्षेत्र में न नाप लेता वामन भगवान भगवान "विष्णु" की तरह। लेकिन ब्राह्मणों के घर से ही किसी कारन वश बाहर गए मलिन बस्ती या अन्य बस्ती का हाँथ थामे नर और नारी ही ऐसा कुचक्र रचे थे जिसको तोड़ने में पूरे 16 वर्ष नहीं वरन मेरे जीवन के पूरे 40 वर्ष लग गए (11-11 -1975 से 11-11-2015)। >>>>>>>[[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस Nakshatra: Dhanistha Rashi: 1/2 of Kumbh and 1/2 of Makar Rashi Rashi Name:Giridhari ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) Date of Birth Official: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]  >>>>>>>>>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||

Allahabad University Alumni Association 42 Proud Past Alumni
Allahabad University Alumni Association 42 Proud Past Alumni
Bishunpur-Jaunpur
Ramapur
K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies



Monday, April 25, 2016

विष्णु अवतार परशुराम स्वयं विष्णु अवतार तक ही सीमित रहे वे परमब्रह्म अवस्था में नहीं जा सके अपने क्रोध पर नियंत्रण न कर पाने की वजह से तो और वे स्वयं शिव के शिष्य थे तो इस प्रकार शिवातार सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/सशरीर ब्रह्म अवस्था को प्राप्त कैसे हो सकते थे? लेकिन त्रिदेव शक्ति से सम्पन्न एक ऋषि अवतार इस जगत में विद्यमान रहता है जिसको कभी राजयोग प्राप्त नहीं वरन ऋषि योग में ही यह शक्ति प्राप्त है (यही विडम्बना है इनकी) और जिनके आतप से कोई नहीं बच सकता है और वह अपने में ही महाकाल और त्रिदेव शक्ति संपन्न परम सती अनुसूइया और सप्तर्षियों में से एक ऋषि, अत्री के पुत्र कृष्णात्रेय (वह कृष्ण जो अत्री/अनुसूइया के पुत्र हों मतलब दुर्वाशा) जिनका प्रथम स्थान आजमगढ़ और द्वितीय स्थान स्वयं यह प्रयागराज है जो प्रयागराज में भारद्वाज ऋषी के सह-निवास करता हैं।

विष्णु अवतार परशुराम स्वयं विष्णु अवतार तक ही सीमित रहे वे परमब्रह्म अवस्था में नहीं जा सके अपने क्रोध पर नियंत्रण न कर पाने की वजह से तो और वे स्वयं शिव के शिष्य थे तो इस प्रकार शिवातार सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/सशरीर ब्रह्म अवस्था को प्राप्त कैसे हो सकते थे? लेकिन त्रिदेव शक्ति से सम्पन्न एक ऋषि अवतार इस जगत में विद्यमान रहता है जिसको कभी राजयोग प्राप्त नहीं वरन ऋषि योग में ही यह शक्ति प्राप्त है (यही विडम्बना है इनकी) और जिनके आतप से कोई नहीं बच सकता है और वह अपने में ही महाकाल और त्रिदेव शक्ति संपन्न परम सती अनुसूइया और सप्तर्षियों में से एक ऋषि, अत्री के पुत्र कृष्णात्रेय (वह कृष्ण जो अत्री/अनुसूइया के पुत्र हों मतलब दुर्वाशा) जिनका प्रथम स्थान आजमगढ़ और द्वितीय स्थान स्वयं यह प्रयागराज है जो प्रयागराज में भारद्वाज ऋषी के सह-निवास करता हैं।  

Sunday, April 24, 2016

सामान्य मानव के क्रिया कलाप से लगता है की अभीष्ट कार्य पूर्णता प्राप्त कर चुका है और बहुत सारे स्वयं भू कष्ट निवारकों के विवाद को त्रिशक्ति में निरूपित करते हुए बताते चलें की उस सहस्राब्दी महापरिवर्तन की स्थिति इतनी भयानक थी की तीब्रतम महाविनाश की स्थिति पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु शिव ही राम/कृष्ण (ब्रह्मा+विष्णु+महेश=सशरीर परमब्रह्म=सशरीर ब्रह्म) बन गए विष्णु और ब्रह्मा की शक्ति अर्जित करते हुए और विष्णु सर्वदानन्द तथा ब्रह्मा युगदष्ट्रा बने रहे:---चाहे विष्णु (बिशुनपुर-223203) की शक्ति द्विवेदी जी को समर्पित हो और ब्रह्मा (प्रयागराज) की शक्ति चाहे तो बड़े भाई साहब पाण्डेय जी को समर्पित हो और वे अपनी स्वेक्षा से अपनी शक्ति चाहे तो राय साहब को समर्पित करे पर मेरी शक्ति (रामापुर-223225) तो उसी को समर्पित होगी जो मेरे विश्वास पर गुणात्मक रूप से कम से कम औसतन सत्य तो साबित हो और उस मेरे विश्वास पर गुणात्मक रूप से कम से कम औसतन सत्य में तो राय साहब कम से कम नहीं ही आते है अब यह पूर्ण रूपेण सर्वसिद्ध हो चुका है।>>>>>>>विष्णु अवतार परशुराम स्वयं विष्णु अवतार तक ही सीमित रहे वे परमब्रह्म अवस्था में नहीं जा सके अपने क्रोध पर नियंत्रण न कर पाने की वजह से तो और वे स्वयं शिव के शिष्य थे तो इस प्रकार शिवातार सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/सशरीर ब्रह्म अवस्था को प्राप्त कैसे हो सकते थे? लेकिन त्रिदेव शक्ति से सम्पन्न एक ऋषि अवतार इस जगत में विद्यमान रहता है जिसको कभी राजयोग प्राप्त नहीं वरन ऋषि योग में ही यह शक्ति प्राप्त है (यही विडम्बना है इनकी) और जिनके आतप से कोई नहीं बच सकता है और वह अपने में ही महाकाल और त्रिदेव शक्ति संपन्न परम सती अनुसूइया और सप्तर्षियों में से एक ऋषि, अत्री के पुत्र कृष्णात्रेय (वह कृष्ण जो अत्री/अनुसूइया के पुत्र हों मतलब दुर्वाशा) जिनका प्रथम स्थान आजमगढ़ और द्वितीय स्थान स्वयं यह प्रयागराज है जो प्रयागराज में भारद्वाज ऋषी के सह-निवास करता हैं।>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||

सामान्य मानव के क्रिया कलाप से लगता है की अभीष्ट कार्य पूर्णता प्राप्त कर चुका है और बहुत सारे स्वयं भू कष्ट निवारकों के विवाद को त्रिशक्ति में निरूपित करते हुए बताते चलें की उस सहस्राब्दी महापरिवर्तन की स्थिति इतनी भयानक थी की तीब्रतम महाविनाश की स्थिति पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु शिव ही राम/कृष्ण (ब्रह्मा+विष्णु+महेश=सशरीर परमब्रह्म=सशरीर ब्रह्म) बन गए विष्णु और ब्रह्मा की शक्ति अर्जित करते हुए और विष्णु सर्वदानन्द तथा ब्रह्मा युगदष्ट्रा बने रहे:---चाहे विष्णु (बिशुनपुर-223203) की शक्ति द्विवेदी जी को समर्पित हो और ब्रह्मा (प्रयागराज) की शक्ति चाहे तो बड़े भाई साहब पाण्डेय जी को समर्पित हो और वे अपनी स्वेक्षा से अपनी शक्ति चाहे तो राय साहब को समर्पित करे पर मेरी शक्ति (रामापुर-223225) तो उसी को समर्पित होगी जो मेरे विश्वास पर गुणात्मक रूप से कम से कम औसतन सत्य तो साबित हो और उस मेरे विश्वास पर गुणात्मक रूप से कम से कम औसतन सत्य में तो राय साहब कम से कम नहीं ही आते है अब यह पूर्ण रूपेण सर्वसिद्ध हो चुका है।>>>>>>>विष्णु अवतार परशुराम स्वयं विष्णु अवतार तक ही सीमित रहे वे परमब्रह्म अवस्था में नहीं जा सके अपने क्रोध पर नियंत्रण न कर पाने की वजह से तो और वे स्वयं शिव के शिष्य थे तो इस प्रकार शिवातार सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/सशरीर ब्रह्म अवस्था को प्राप्त कैसे हो सकते थे? लेकिन त्रिदेव शक्ति से सम्पन्न एक ऋषि अवतार इस जगत में विद्यमान रहता है जिसको कभी राजयोग प्राप्त नहीं वरन ऋषि योग में ही यह शक्ति प्राप्त है (यही विडम्बना है इनकी) और जिनके आतप से कोई नहीं बच सकता है और वह अपने में ही महाकाल और त्रिदेव शक्ति संपन्न परम सती अनुसूइया और सप्तर्षियों में से एक ऋषि, अत्री के पुत्र कृष्णात्रेय (वह कृष्ण जो अत्री/अनुसूइया के पुत्र हों मतलब दुर्वाशा) जिनका प्रथम स्थान आजमगढ़ और द्वितीय स्थान स्वयं यह प्रयागराज है जो प्रयागराज में भारद्वाज ऋषी के सह-निवास करता हैं।>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||
K. Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS)
Ramapur
Bishunpur-Jaunpur

Saturday, April 23, 2016

जब मैं विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति); मतलब शिव भी है, राम भी है और कृष्ण भी है और इस प्रकार शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) मतलब सनातन राम इस समस्त नारी जगत और पुरुष जगत से श्रेष्ठ और वरिष्ठ हो जाने पर भी सरस्वती का मानस पुत्र हो सकता हो मतलब उनको माँ मानते हुए शीश झुका सकता हूँ तो बहनो के आगे भी नतमस्तक हो उन अपनी बहनों के इसारे पर स्वनियंत्रित अवस्था धारण कर सकता हूँ।>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||

जब मैं विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति); मतलब शिव भी है, राम भी है और कृष्ण भी है और इस प्रकार शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) मतलब सनातन राम इस समस्त नारी जगत और पुरुष जगत से श्रेष्ठ और वरिष्ठ हो जाने पर भी सरस्वती का मानस पुत्र हो सकता हो मतलब उनको माँ मानते हुए शीश झुका सकता हूँ तो बहनो के आगे भी नतमस्तक हो उन अपनी बहनों के इसारे पर स्वनियंत्रित अवस्था धारण कर सकता हूँ।>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||  

तो जो स्वयं में ही विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति); मतलब शिव भी है, राम भी है और कृष्ण भी है और इस प्रकार शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) मतलब सनातन राम हो तो उसका ज्येष्ठ और वरिष्ठ कौन हो सकता है? पर हाँ दो लोग अवश्य ही श्रेष्ठ है एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी ( वशिष्ठ जी के पौत्र व्यास से व्यासी) मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा जी श्रीश्रीधर (विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण मेरे ताऊजी डॉ प्रेमचंद(शिव) जिन्होंने मुझको स्वयं की पहचान दी और उनकी कृपा से उनके समान मैं भी इस लोक व्यवहार में आम मानवता में जेष्ठ और वरिष्ठ की समझ जारी रख सका हूँ।>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||

तो जो स्वयं में ही विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति); मतलब शिव भी है, राम भी है और कृष्ण भी है और इस प्रकार शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) मतलब सनातन राम हो तो उसका ज्येष्ठ और वरिष्ठ कौन हो सकता है?  पर हाँ दो लोग अवश्य ही श्रेष्ठ है एक मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी ( वशिष्ठ जी के पौत्र व्यास से व्यासी) मिश्रा ब्राह्मण मेरे मामा जी  श्रीश्रीधर (विष्णु) और मेरे परमपिता परमेश्वर,  सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण मेरे ताऊजी डॉ प्रेमचंद(शिव) जिन्होंने मुझको स्वयं की पहचान दी और उनकी कृपा से उनके समान मैं भी इस लोक व्यवहार में आम मानवता में जेष्ठ और वरिष्ठ की समझ जारी रख सका हूँ।>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||  

विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||>>>>>>>सम्पूर्ण नारी जगत ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज (दक्षप्रजापति) की पुत्रियों से ही जनित है जिसमे से सती:पार्वती:शिवा/शिव:शंकर के अलावा अन्य सभी 13 बहनों का विवाह कश्यप ऋषी से हुआ था। तो नारी जगत के प्रथम पिता काशिराज (दक्षप्रजापति) ही हैं और यही काशी नारी जगत का मूल स्रोत हैं।

विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||>>>>>>>सम्पूर्ण नारी जगत ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज (दक्षप्रजापति) की पुत्रियों से ही जनित है जिसमे से सती:पार्वती:शिवा/शिव:शंकर के अलावा अन्य सभी 13 बहनों का विवाह कश्यप ऋषी से हुआ था। तो नारी जगत के प्रथम पिता काशिराज (दक्षप्रजापति) ही हैं और यही काशी नारी जगत का मूल स्रोत हैं। 

बहुजन समाज के मसीहा, रामबहादुर/काशीराम रामापुर-223225 में और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण विवेक((विवेक/प्रदीप(रामजानकी)/बेचनराम))/रामप्रसाद रामापुर-223225 में, रामबहादुर/काशीराम रामापुर-223225 के पक्षकारों द्वारा विवेक को नियंत्रित करने हेतु हर एक मोर्चे पर उन्ही की बहनों को उतार दिया गया है। पर यह विश्व जनमानस को बताना चाहूंगा की एक दिन पूरी दुनिया एक तरफ थी और बहनों समेत सभी शुभेक्षु और सम्बन्धी भी उसी तरफ थे (अज्ञानता में अँधेरे में तीर मारा जा रहा था बिना मेरे सौहाद्र भाव की अतीव और असीमित सीमा को जाने और पहचाने) और मैं अकेला था और उस दिन को देखने वाला मैं स्वयं आज सार्वजानिक जीवन में है अपना लक्ष्य हांसिल करते हुए तो बहनों को मानना पडेगा की वे मुझसे छोटी हैं और मैं बड़ा वे चाहे जिसके यहाँ और चाहे जो जीवन जी है (आतंरिक और वाह्य रूप से उनके साथ अच्छा व्यवहार रहा होगा) पर जो अकेले लड़ाई मैं लड़ा ब्राह्मण सर्वोपरि होने की और उसे सिध्ध भी किया तो उससे इस संसार के हर एक ब्राह्मण से और हर एक बहन से ज्येष्ठ और वरिष्ठ मैं स्वयं हुआ कि नहीं और फिर उन बहनों की छाया में मुझसे विचार द्वन्द करने वाला समाज और स्वयं रामबहादुर/काशीराम रामापुर-223225 से मैं ज्येष्ठ और वरिष्ठ हुआ की नहीं। हर समाजवाद और साम्यवाद की धज्जी उड़ जाएगी अगर मेरे घर से प्रयागराज तक के संसाधनों पर और 16 वर्ष तक के धनार्जन पर विचार किया जाएगा तुलनात्मक रूप से अनेकों बार एक एक कर भेजे गए व्यक्तित्वों की भौतिक सम्पन्नता और सम्प्रभुता का पूर्ण आंकलन करते हुए और स्वयं रामबहादुर/काशीराम रामापुर-223225 की सम्पन्नता और सम्प्रभुता का पूर्ण आंकलन विशेष रूप से कर लिया जाय? उसके बाद भी किश शक्ति और सम्पन्नता के आधार पर आज भी मैं कहता हूँ की मैं सबसे श्रेष्ठ और वरिष्ठ मैं ही था, हूँ और रहूँगा इस दुनिया में केवल रामबहादुर/काशीराम रामापुर-223225 के बात ही छोड दीजिये तो इस तथ्य पर विचार किया जाना चाहिए। इसी लिए कहता हूँ की समता लाइए समानता कभी भी स्थापित नहीं हो सकती है किसी भी शक्तिशाली से शक्तिशाली संगठन और शक्ति द्वारा और जिस दिन पूर्ण समानता शक्ति के बल पर आभासीय रूप से स्थापित हुई (वास्तव में जो हो ही नहीं सकता है) समाज शून्य और जड़ हो जाएगा। >>>>>द्वारा -- विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||

बहुजन समाज के मसीहा, रामबहादुर/काशीराम रामापुर-223225 में और सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण विवेक((विवेक/प्रदीप(रामजानकी)/बेचनराम))/रामप्रसाद रामापुर-223225 में, रामबहादुर/काशीराम रामापुर-223225 के पक्षकारों द्वारा विवेक को नियंत्रित करने हेतु हर एक मोर्चे पर उन्ही की बहनों को उतार दिया गया है। पर यह विश्व जनमानस को बताना चाहूंगा की एक दिन पूरी दुनिया एक तरफ थी और बहनों समेत सभी शुभेक्षु और सम्बन्धी भी उसी तरफ थे (अज्ञानता में अँधेरे में तीर मारा जा रहा था बिना मेरे सौहाद्र भाव की अतीव और असीमित सीमा को जाने और पहचाने) और मैं अकेला था और उस दिन को देखने वाला मैं स्वयं आज सार्वजानिक जीवन में है अपना लक्ष्य हांसिल करते हुए तो बहनों को मानना पडेगा की वे मुझसे छोटी हैं और मैं बड़ा वे चाहे जिसके यहाँ और चाहे जो जीवन जी है (आतंरिक और वाह्य रूप से उनके साथ अच्छा व्यवहार रहा होगा) पर जो अकेले लड़ाई मैं लड़ा ब्राह्मण सर्वोपरि होने की और उसे सिध्ध भी किया तो उससे इस संसार के हर एक ब्राह्मण से और हर एक बहन से ज्येष्ठ और वरिष्ठ मैं स्वयं हुआ कि नहीं और फिर उन बहनों की छाया में मुझसे विचार द्वन्द करने वाला समाज और स्वयं रामबहादुर/काशीराम रामापुर-223225 से मैं ज्येष्ठ और वरिष्ठ हुआ की नहीं। हर समाजवाद और साम्यवाद की धज्जी उड़ जाएगी अगर मेरे घर से प्रयागराज तक के संसाधनों पर और 16 वर्ष तक के धनार्जन पर विचार किया जाएगा तुलनात्मक रूप से अनेकों बार एक एक कर भेजे गए व्यक्तित्वों की भौतिक सम्पन्नता और सम्प्रभुता का पूर्ण आंकलन करते हुए और स्वयं रामबहादुर/काशीराम रामापुर-223225 की सम्पन्नता और सम्प्रभुता का पूर्ण आंकलन विशेष रूप से कर लिया जाय? उसके बाद भी किश शक्ति और सम्पन्नता के आधार पर आज भी मैं कहता हूँ की मैं सबसे श्रेष्ठ और वरिष्ठ मैं ही था, हूँ और रहूँगा इस दुनिया में केवल रामबहादुर/काशीराम रामापुर-223225 के बात ही छोड दीजिये तो इस तथ्य पर विचार किया जाना चाहिए। इसी लिए कहता हूँ की समता लाइए समानता कभी भी स्थापित नहीं हो सकती है किसी भी शक्तिशाली से शक्तिशाली संगठन और शक्ति द्वारा और जिस दिन पूर्ण समानता शक्ति के बल पर आभासीय रूप से स्थापित हुई (वास्तव में जो हो ही नहीं सकता है) समाज शून्य और जड़ हो जाएगा। >>>>>द्वारा -- विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| 

जिस तरह से जनता से संचित निधि की के धन का उपयोग कर योजनाबध्द लक्ष्य प्राप्ति या लक्ष्य में असफला हेतु बड़े-बड़े राजनेता जिम्मेदार होते है उसी प्रकार किसी जाति/धर्म/समाज/देश/राष्ट्र/कबीले/पंथ/समान वैचरिक, व्यवहारिक व् संस्कृतिक के मानव समूह में वास करने वाली मानवता की आशाओं, आकांछाओं व शुभकामनाओं को प्राप्त करते हुए और तद्नुरूप उसके ही संशाधनों का स्वयं भू ठीकेदार बन कोई योजनाबध्द कपोल कल्पित लक्ष्य देकर (परन्तु तद्नुरूप सार्थक प्रयास न करते हुए) उस लक्ष्य प्राप्ति में असफल हो जाने पर ऐसे जन संसाधनों का पूर्ण रूप से दोहन करने वाले स्वयंभू लोगों को भी स्वयं द्वारा की हुयी गलतियों के लिए प्रायश्चित करना चाहिए और उसमे सुधार लाना चाहिए जिससे भविष्य में ऐसी गलतियां न हो जिससे उस समाज के नुक्सान के साथ अन्योन्य रूप से अन्य मानव समाज का नुक्सान न हो। पर यहाँ तो लोग सत्य का गला घोंटने पर लग जाते है पर यह नहीं समझते हैं की कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिनका पालन न हुआ तो समाज में उसकी बारम्बारता होने पर व्यापक हानिकारक असर अपने आप परिलक्षित होता है और तब उस सत्य का गला घोंटना उनके बस में नहीं रह जाता है और वह सत्य उजागर होकर ही रहता है चाहे सामजिक मर्यादा को बनाए रखने हेतु परदे के अंदर ही रह जाता हो।

जिस तरह से जनता से संचित निधि की के धन का उपयोग कर योजनाबध्द लक्ष्य प्राप्ति या लक्ष्य में असफला हेतु बड़े-बड़े राजनेता जिम्मेदार होते है उसी प्रकार किसी जाति/धर्म/समाज/देश/राष्ट्र/कबीले/पंथ/समान वैचरिक, व्यवहारिक व् संस्कृतिक के मानव समूह में वास करने वाली मानवता की आशाओं, आकांछाओं व शुभकामनाओं को प्राप्त करते हुए और तद्नुरूप उसके ही संशाधनों का स्वयं भू ठीकेदार बन कोई योजनाबध्द कपोल कल्पित लक्ष्य देकर (परन्तु तद्नुरूप सार्थक प्रयास न करते हुए) उस लक्ष्य प्राप्ति में असफल हो जाने पर ऐसे जन संसाधनों का पूर्ण रूप से दोहन करने वाले स्वयंभू लोगों को भी स्वयं द्वारा की हुयी गलतियों के लिए प्रायश्चित करना चाहिए और उसमे सुधार लाना चाहिए जिससे भविष्य में ऐसी गलतियां न हो जिससे उस समाज के नुक्सान के साथ अन्योन्य रूप से अन्य मानव समाज का नुक्सान न हो। पर यहाँ तो लोग सत्य का गला घोंटने पर लग जाते है पर यह नहीं समझते हैं की कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिनका पालन न हुआ तो समाज में उसकी बारम्बारता होने पर व्यापक हानिकारक असर अपने आप परिलक्षित होता है और तब उस सत्य का गला घोंटना उनके बस में नहीं रह जाता है और वह सत्य उजागर होकर ही रहता है चाहे सामजिक मर्यादा को बनाए रखने हेतु परदे के अंदर ही रह जाता हो। 

Thursday, April 21, 2016

रामपुर ख़ास लगता है 2000 के अंतर्राष्ट्रीय परिवर्तन के दौर में सो रहा था? या बहुत बड़े बोझ के नीचे दबा था? और रामापुर-223225 को न समझ रहा था न उचित महत्त्व दे रहा था स्वयम्भू ब्राह्मण समाज का भाग्य विधाता बनकर? पर वह रामपुर ख़ास मेरी भी सुन ले की "ब्राह्मण की लडकिया" जब किसी कारन बस (वह पूर्ण साजिस के तहत ही हो रहा है मुझे ज्ञात है) ब्राह्मण के घर से जाती रहेंगी तो दबंगई काम नही आती उससे ब्राह्मण कमजोर होता है और ब्राह्मण कमजोर हुआ तो सम्पूर्ण हिन्दू समाज कमजोर होता है और हिन्दू समाज कमजोर होता है तो सम्पूर्ण धर्म और तत्परिनाम स्वरुप विश्व समाज कमजोर होता है? और भी सुन लीजिए आपके और नेताजी और लक्ष्मणपुर के बड़े भाई साहब के सब योध्दाओं को मैंने देख और परख लिया है कोई नहीं चल पाएंगे अगर न रहूँ तो फिर भी आप लोगों का सम्मान करता हूँ तो जो भी स्थानीय मान मिलता है स्वीकार करते चल रहा हूँ और विरोध करू तो अब तक की सब महिमा मिट जाय।

रामपुर ख़ास लगता है 2000 के अंतर्राष्ट्रीय परिवर्तन के दौर में सो रहा था? या बहुत बड़े बोझ के नीचे दबा था? और रामापुर-223225 को न समझ रहा था न उचित महत्त्व दे रहा था स्वयम्भू ब्राह्मण समाज का भाग्य विधाता बनकर? पर वह रामपुर ख़ास मेरी भी सुन ले की "ब्राह्मण की लडकिया" जब किसी कारन बस (वह पूर्ण साजिस के तहत ही हो रहा है मुझे ज्ञात है) ब्राह्मण के घर से जाती रहेंगी तो दबंगई काम नही आती उससे ब्राह्मण कमजोर होता है और ब्राह्मण कमजोर हुआ तो सम्पूर्ण हिन्दू समाज कमजोर होता है और हिन्दू समाज कमजोर होता है तो सम्पूर्ण धर्म और तत्परिनाम स्वरुप विश्व समाज कमजोर होता है? और भी सुन लीजिए आपके और नेताजी और लक्ष्मणपुर के बड़े भाई साहब के सब योध्दाओं को मैंने देख और परख लिया है कोई नहीं चल पाएंगे अगर न रहूँ तो फिर भी आप लोगों का सम्मान करता हूँ तो जो भी स्थानीय मान मिलता है स्वीकार करते चल रहा हूँ और विरोध करू तो अब तक की सब महिमा मिट जाय।

जब मैं स्वयं एक मात्र अजेय और अतुल तो मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण रामानन्द कुल के मेरे मामा जी श्रध्देय श्रीश्रीधर(विष्णु) कौन हो सकते है यह आप भली प्रकार समझ सकते है? और जिस विष्णु को समर्पित जिस पूरे बिशुनपुर-223103 गाँव के अभीष्ट देव त्रिदेवों में महादेव हों तो मुझ दुर्वाशा क्षेत्र आज़मगढ़ मूल वासी और जौनपुर=जमदग्निपुर में जन्म कर्ता मुझ विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) स्वयं में ही बिशुनपुर और रामापुर से सम्बंधित किस व्यक्ति का षड़यंत्र और आतप मैं समाप्त नहीं कर सकता था? पर वास्तविक कहानी तो कुछ और ही थी चरित्रहीन समाज के कुकर्मों का खुलासा और उसका नियंत्रण और उनके उद्देश्य का अंत और जिनका खुलासा कर वास्तविक अंत का रास्ता आज सुलझाया गया और उस युग का वास्तविक अंत आज ही हुआ है?

जब मैं स्वयं एक मात्र अजेय और अतुल तो मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण रामानन्द कुल के मेरे मामा जी श्रध्देय श्रीश्रीधर(विष्णु) कौन हो सकते है यह आप भली प्रकार समझ सकते है? और जिस विष्णु को समर्पित जिस पूरे बिशुनपुर-223103 गाँव के अभीष्ट देव त्रिदेवों में महादेव हों तो मुझ दुर्वाशा क्षेत्र आज़मगढ़ मूल वासी और जौनपुर=जमदग्निपुर में जन्म कर्ता मुझ विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद/रमानाथ(+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) स्वयं में ही बिशुनपुर और रामापुर से सम्बंधित किस व्यक्ति का षड़यंत्र और आतप मैं समाप्त नहीं कर सकता था? पर वास्तविक कहानी तो कुछ और ही थी चरित्रहीन समाज के कुकर्मों का खुलासा और उसका नियंत्रण और उनके उद्देश्य का अंत और जिनका खुलासा कर वास्तविक अंत का रास्ता आज सुलझाया गया और उस युग का वास्तविक अंत आज ही हुआ है?

प्राप्यापदं न व्यथते कदाचि- दुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सप्तनाः।। अर्थ: जो धुरंधर महापुरुष आपत्ति पड़ने पर कभी दुखी नहीं होता, बल्कि सावधानी के साथ उद्योग का आश्रय लेता है तथा समयपर दुःख सहता है, उसके शत्रु तो पराजित ही हैं।

प्राप्यापदं न व्यथते कदाचि- दुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सप्तनाः।। अर्थ: जो धुरंधर महापुरुष आपत्ति पड़ने पर कभी दुखी नहीं होता, बल्कि सावधानी के साथ उद्योग का आश्रय लेता है तथा समयपर दुःख सहता है, उसके शत्रु तो पराजित ही हैं।

ॐ शुक्लांबरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजं प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्र्वाधारम् गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् || लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् || सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् | सहारवक्ष:स्थलशोभिकौस्तुभम् नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् || यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् | विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ||

ॐ शुक्लांबरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजं प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्र्वाधारम् गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् || लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् || सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् | सहारवक्ष:स्थलशोभिकौस्तुभम् नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् || यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् | विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ||

त्रिदेव और ब्राह्मण स्वयं मेरे आदर्श हो सकते हैं पर उनके लडके-लड़कियां और दास-भक्त तभी हमारे आदर्श होंगे जब वे त्रिदेव और ब्राह्मण तुल्य आदर्शों और निर्देशों का पालन, उनके जैसे कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे और उनके समान ही हमें अपनी संचित ऊर्जा से अभिसिंचित कर सुयोग्य जीवन देंगे तथा इसके साथ ही साथ चरित्रवान भारतीय/विश्व मानव समाज को बनाये रखने में अपना अमूल्य योगदान देंगे। यथार्थ यही की स्वयं मेरे लिए कोई ऐसा उनके लडके-लड़कियां और दास-भक्त में त्रिदेव और ब्राह्मण नहीं बचा तो फिर अतुल और अजेय कौन हुआ और कैसा व्यक्ति होगा? मैंने कभी नहीं सोचा था की मेरे विरोधी 2005/6 में पूर्णतः हार के बाद मुझसे कुछ कहवाएंगे पर वे महाशूद्रपन किये और उसके बाद भी अपने शूद्रपन से नहीं माने और 2006 से मुझे उनकी सब करतूति लिखनी ही पडी पर ठीक ही हुआ बहुत से लोगों को अपने किये का आईना मिल गया केवल त्रिदेव और ब्राह्मण के लडके लड़कियों और दास-दासियों को ही नहीं बल्कि हर जाति/धर्म/सम्प्रदाय/पंथ/कबीला/गणतंत्र/प्रजतन्त्र/रास्त्र/देश/राज्य/जनपद/तहसील/विकाशखण्ड/पंचायत/जिलापंचायत/नगर पंचायत/महानगर/नगर/कस्बा/गाँव/पुरवा/खानदान/परिवार के लोगों के लिए। मैंने ऑरकुट पर लिखा था 2008 में की मैं शूद्रता का नास कर शूद्रविहीन समाज की स्थापना करूंगा पर उधर से ही (नाम और जबाब छोड़े गए विचार से स्पष्ट था) जबाब आया की ऐसा कभी नहीं होगा कोई न कोई तो शूद्र बनाता रहेगा तो फिर जिसको संख्याबल चाहिए वह स्वयं एक नया शूद्र बन शूद्रता को बढ़ावा दे पर हम ऐसे लोगों के कुकृत्य को उजागर कर शूद्रता समाप्त करने का प्रयास जारी रखेंगे। तथाकथित पार्वती जी का क्या विचार है? मैंने केवल नाम की वकालत नहीं की है उस अनुरूप कार्य की भी बात की है पर सामान परिश्थिति और समान समाज में समान कार्य होते हुए भी नाम अच्छा हो तो औरों को भी पावन बनाता है पर यह जरूर है की त्रिदेवों/त्रिदेविओं और देवी/देवताओं का नाम रखकर घृणित कार्य कोई करे तो वह उस गुनाह से कई गुना पाप का भागीदार बनाता है।

त्रिदेव और ब्राह्मण स्वयं मेरे आदर्श हो सकते हैं पर उनके लडके-लड़कियां और दास-भक्त तभी हमारे आदर्श होंगे जब वे त्रिदेव और ब्राह्मण तुल्य आदर्शों और निर्देशों का पालन, उनके जैसे कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे और उनके समान ही हमें अपनी संचित ऊर्जा से अभिसिंचित कर सुयोग्य जीवन देंगे तथा इसके साथ ही साथ चरित्रवान भारतीय/विश्व मानव समाज को बनाये रखने में अपना अमूल्य योगदान देंगे। यथार्थ यही की स्वयं मेरे लिए कोई ऐसा उनके लडके-लड़कियां और दास-भक्त में त्रिदेव और ब्राह्मण नहीं बचा तो फिर अतुल और अजेय कौन हुआ और कैसा व्यक्ति होगा? मैंने कभी नहीं सोचा था की मेरे विरोधी 2005/6 में पूर्णतः हार के बाद मुझसे कुछ कहवाएंगे पर वे महाशूद्रपन किये और उसके बाद भी अपने शूद्रपन से नहीं माने और 2006 से मुझे उनकी सब करतूति लिखनी ही पडी पर ठीक ही हुआ बहुत से लोगों को अपने किये का आईना मिल गया केवल त्रिदेव और ब्राह्मण के लडके लड़कियों और दास-दासियों को ही नहीं बल्कि हर जाति/धर्म/सम्प्रदाय/पंथ/कबीला/गणतंत्र/प्रजतन्त्र/रास्त्र/देश/राज्य/जनपद/तहसील/विकाशखण्ड/पंचायत/जिलापंचायत/नगर पंचायत/महानगर/नगर/कस्बा/गाँव/पुरवा/खानदान/परिवार के लोगों के लिए। मैंने ऑरकुट पर लिखा था 2008 में की मैं शूद्रता का नास कर शूद्रविहीन समाज की स्थापना करूंगा पर उधर से ही (नाम और जबाब छोड़े गए विचार से स्पष्ट था) जबाब आया की ऐसा कभी नहीं होगा कोई न कोई तो शूद्र बनाता रहेगा तो फिर जिसको संख्याबल चाहिए वह स्वयं एक नया शूद्र बन शूद्रता को बढ़ावा दे पर हम ऐसे लोगों के कुकृत्य को उजागर कर शूद्रता समाप्त करने का प्रयास जारी रखेंगे। तथाकथित पार्वती जी का क्या विचार है? मैंने केवल नाम की वकालत नहीं की है उस अनुरूप कार्य की भी बात की है पर सामान परिश्थिति और समान समाज में समान कार्य होते हुए भी नाम अच्छा हो तो औरों को भी पावन बनाता है पर यह जरूर है की त्रिदेवों/त्रिदेविओं और देवी/देवताओं का नाम रखकर घृणित कार्य कोई करे तो वह उस गुनाह से कई गुना पाप का भागीदार बनाता है।  

Wednesday, April 20, 2016

पूरी दुनियाँ ने मेरी अवकात तय कर दी थी तो मैं उसी दुनिया को मैं बता दूँ की मेरी उस अवकात का मूल्य केवल और केवल मातृ-पितृप्रेम (परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला ((बेलपत्र:विलवापत्र= शिव और शिवा:पार्वती:सती पर अपनेय=आहार=भोज्य और ऐसे में अक्षुण्य रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण मेरे ताऊजी डॉ प्रेमचंद:शिव)) और गुरुप्रेम (परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी (वशिष्ठ पौत्र व्यास से व्याशी: तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्र ब्राह्मण मेरे मामा श्रीश्रीधर:विष्णु) है जिससे बड़ी शक्ति इस संसार को चलाने वाली इस सृष्टि के इतिहास में कभी प्रकट ही हुई है अभी तक। मेरा इस प्रेम से अलग अपना कोई प्रेम ही नहीं रहा क्योकि पूरी मानवता इसी मातृ-पितृप्रेम और गुरुप्रेम से नियंत्रित होती है। जो लोग अविवाहित होने को बहुत बड़ा आदर्श मानते है उनके लिए बता दूँ की मैं कभी भी अपने लिए शादी अनिवार्य नहीं समझा था और न किसी से आदर्श मित्रवत प्रेम (जिसका एक किनारा काशी प्रान्त मूल निवासी सनातन भारद्वाज गोत्रीय पाण्डेय ब्राह्मण डॉ विनय शंकर पाण्डेय-NIT देलही आज प्रमाण स्वरुप हैं) में उसका पारितोषिक चाहिए था शादी के रूप में पर जब आज यह प्रमाणित हो गया है की मैं मानवता हेतु सब कुछ दांव पर लगा सकता हूँ तो जो जिससे आदर्श मित्रवत प्रेम रहा हो उसका जीवन स्तर सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से उच्च जरूर चाहता हूँ और इसी लिए 25 वर्ष तक (2001 तक पूर्ण अखण्ड ब्रह्मचर्य रहा और आगे भी 18 अप्रैल, 2008 तक ऐसे ही रहा)) पूर्ण अखण्ड ब्रह्मचर्य रहा पर जिसकी तीसरी पीढ़ी ऐसे ही समाप्त होने वाली हो और दो नारियों ने उसी वंश को चलाने और जारी रहने हेतु अपना कष्टतम जीवन जिया हो और उसकी बात मानना और उसे मूर्तरूप देना स्वयं ईश्वर भी टाल सकता था? फिर भी एक अवस्था ऐसी आयी थी की मई, 2006 (जब सैद्धांतिक रूप में कार्यपूर्ति और फल दोनों हाँथ में आ चुका था 2006 के अंत आते आते और मेरे शोध परिणाम का पूर्णतः सत्यापन भी हो चुका था दिसम्बर 2006 तक) के बाद की मैं टाल चुका था फिर सनातन वशिष्ठ गोत्रीय मिश्रा मामा (पिता जी के मामा) लोगों से फ़ोन करवाया गया जिनके यहाँ मैं जन्म लिया था तो मैंने कहा जहाँ चाहिए मेरा विवाह कर दीजिये तो अवध क्षेत्र से मेरा सम्बन्ध पक्का कर दिया गया 18 अप्रैल, 2008 तो तब से पूरा अवध क्षेत्र ही मुझ दुर्वाशा क्षेत्र आज़मगढ़ मूल वासी और जौनपुर=जमदग्निपुर में जन्म कर्ता, विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /शिव और शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु) की (मेरी) ससुराल हो गयी। मेरे लिए जिन महत्वपूर्ण सामाजिक रूप से समृद्धतम लोगों द्वारा सम्बन्ध आया था मैं उनको साधुवाद देता हूँ और उन देवियों का सादर प्रणाम करता हूँ और जिनको भी अपने आत्मसम्मान में चोट आयी हो उनको विशेष साधुवाद की उनको जो कुछ भी कष्ट हुआ वह मेरे स्वयं के कारणों से नहीं और न मैं दिल फ़ेंक व्यक्ति था वरन प्रेम का जबाब प्रेम से देना मुझे आता था जो उस प्रेम का काबिल नहीं था इसे समझना था जो मेरी हिम्मत पर व्यंग कसा था। लेकिन 2001 में जो समाप्त हुआ मुझे प्रयागराज बुलाकर कुछ लोग मेरी अवकात और हिम्मत तय करने हेतु वही रील बारम्बार चलाते रह गए अपने स्वार्थ में पर शिकस्त उनको मिलनी ही थी और 2005/2006 तक जाते जाते शर्मसार हो गए स्वयं ही (बिना मेरे किसी सटीक समयनिष्ठ सूचना सार्वजनिक किये ही) और फिर वही तुरप का पत्ता तथाकथित दलित अस्त्र चला रहे तो वह दलित अस्त्र तथाकथित पार्वती जी को तथाकथित दलितों के हाँथ बेचकर पुनः चल पायेगा क्या? अगर तथाकथित पार्वती जी तथाकथित दलितों के हाँथ की कठपुतली नहीं हैं तो फिर मेरी तरह तथाकथित दलितों का जबाब क्यों नहीं देती हैं? कहाँ गयी उनकी शक्ति ? मैं तो सम्पूर्ण तथाकथित दलित समाज को आइना दिखा दिया की मैं मिटाया जा रहा तो पूरा संसार मिट रहा था पर अब मैं मिटाया जाऊंगा तो तथाकथित दलित ही केवल मिटेंगे क्योंकि वे 7-7 की निशान देही पर है मतलब 7 वीडियो कैमरे उनके चारों तरफ लगे है मतलब 7/8 का सम्बन्ध चल रहा है मतलब 1:7 =अगस्त्य (सप्तर्षियों के अंश से मयल क्षेत्र, तमिल/केरल में जन्मे कुम्भज:अगस्त्य ऋषि) : सातों सप्तर्षि का सम्बन्ध ?

पूरी दुनियाँ ने मेरी अवकात तय कर दी थी तो मैं उसी दुनिया को मैं बता दूँ की मेरी उस अवकात का मूल्य केवल और केवल मातृ-पितृप्रेम (परमपिता परमेश्वर, सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला ((बेलपत्र:विलवापत्र= शिव और शिवा:पार्वती:सती पर अपनेय=आहार=भोज्य और ऐसे में अक्षुण्य रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण मेरे ताऊजी डॉ प्रेमचंद:शिव)) और गुरुप्रेम (परमगुरु परमपिता परमेश्वर, सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी (वशिष्ठ पौत्र व्यास से व्याशी: तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्र ब्राह्मण मेरे मामा श्रीश्रीधर:विष्णु) है जिससे बड़ी शक्ति इस संसार को चलाने वाली इस सृष्टि के इतिहास में कभी प्रकट ही हुई है अभी तक। मेरा इस प्रेम से अलग अपना कोई प्रेम ही नहीं रहा क्योकि पूरी मानवता इसी मातृ-पितृप्रेम और गुरुप्रेम से नियंत्रित होती है। जो लोग अविवाहित होने को बहुत बड़ा आदर्श मानते है उनके लिए बता दूँ की मैं कभी भी अपने लिए शादी अनिवार्य नहीं समझा था और न किसी से आदर्श मित्रवत प्रेम (जिसका एक किनारा काशी प्रान्त मूल निवासी सनातन भारद्वाज गोत्रीय पाण्डेय ब्राह्मण डॉ विनय शंकर पाण्डेय-NIT देलही आज प्रमाण स्वरुप हैं) में उसका पारितोषिक चाहिए था शादी के रूप में पर जब आज यह प्रमाणित हो गया है की मैं मानवता हेतु सब कुछ दांव पर लगा सकता हूँ तो जो जिससे आदर्श मित्रवत प्रेम रहा हो उसका जीवन स्तर सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से उच्च जरूर चाहता हूँ और इसी लिए 25 वर्ष तक (2001 तक पूर्ण अखण्ड ब्रह्मचर्य रहा और आगे भी 18 अप्रैल, 2008 तक ऐसे ही रहा)) पूर्ण अखण्ड ब्रह्मचर्य रहा पर जिसकी तीसरी पीढ़ी ऐसे ही समाप्त होने वाली हो और दो नारियों ने उसी वंश को चलाने और जारी रहने हेतु अपना कष्टतम जीवन जिया हो और उसकी बात मानना और उसे मूर्तरूप देना स्वयं ईश्वर भी टाल सकता था? फिर भी एक अवस्था ऐसी आयी थी की मई, 2006 (जब सैद्धांतिक रूप में कार्यपूर्ति और फल दोनों हाँथ में आ चुका था 2006 के अंत आते आते और मेरे शोध परिणाम का पूर्णतः सत्यापन भी हो चुका था दिसम्बर 2006 तक) के बाद की मैं टाल चुका था फिर सनातन वशिष्ठ गोत्रीय मिश्रा मामा (पिता जी के मामा) लोगों से फ़ोन करवाया गया जिनके यहाँ मैं जन्म लिया था तो मैंने कहा जहाँ चाहिए मेरा विवाह कर दीजिये तो अवध क्षेत्र से मेरा सम्बन्ध पक्का कर दिया गया  18 अप्रैल, 2008 तो तब से पूरा अवध क्षेत्र ही मुझ दुर्वाशा क्षेत्र आज़मगढ़ मूल वासी और जौनपुर=जमदग्निपुर में जन्म कर्ता, विवेक/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /शिव और शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु) की (मेरी) ससुराल हो गयी। मेरे लिए जिन महत्वपूर्ण सामाजिक रूप से समृद्धतम लोगों द्वारा सम्बन्ध आया था मैं उनको साधुवाद देता हूँ और उन देवियों का सादर प्रणाम करता हूँ और जिनको भी अपने आत्मसम्मान में चोट आयी हो उनको विशेष साधुवाद की उनको जो कुछ भी कष्ट हुआ वह मेरे स्वयं के कारणों से नहीं और न मैं दिल फ़ेंक व्यक्ति था वरन प्रेम का जबाब प्रेम से देना मुझे आता था जो उस प्रेम का काबिल नहीं था इसे समझना था जो मेरी हिम्मत पर व्यंग कसा था। लेकिन 2001 में जो समाप्त हुआ मुझे प्रयागराज बुलाकर कुछ लोग मेरी अवकात और हिम्मत तय करने हेतु वही रील बारम्बार चलाते रह गए अपने स्वार्थ में पर शिकस्त उनको मिलनी ही थी और 2005/2006 तक जाते जाते शर्मसार हो गए स्वयं ही (बिना मेरे किसी सटीक समयनिष्ठ सूचना सार्वजनिक किये ही) और फिर वही तुरप का पत्ता तथाकथित दलित अस्त्र चला रहे तो वह दलित अस्त्र तथाकथित पार्वती जी को तथाकथित दलितों के हाँथ बेचकर पुनः चल पायेगा क्या? अगर  तथाकथित पार्वती जी तथाकथित दलितों के हाँथ की कठपुतली नहीं हैं तो फिर मेरी तरह तथाकथित दलितों का जबाब क्यों नहीं देती हैं? कहाँ गयी उनकी शक्ति ? मैं तो सम्पूर्ण तथाकथित दलित समाज को आइना दिखा दिया की मैं मिटाया जा रहा तो पूरा संसार मिट रहा था पर अब मैं मिटाया जाऊंगा तो तथाकथित दलित ही केवल मिटेंगे क्योंकि वे 7-7 की निशान देही पर है मतलब 7 वीडियो कैमरे उनके चारों तरफ लगे है मतलब 7/8 का सम्बन्ध चल रहा है मतलब 1:7 =अगस्त्य (सप्तर्षियों के अंश से मयल क्षेत्र, तमिल/केरल में जन्मे कुम्भज:अगस्त्य ऋषि) : सातों सप्तर्षि का सम्बन्ध ?

सिम्हाद्रि(नरसिंघा)/नारायणन(विष्णु) आप मुझे दण्ड देने योग्य अपने इस जन्म में नहीं हो सकते थे (आप को केवल लगा था की गलती मुझसे हुयी थी तो मुझसे ही पूंछ लेते बुलाकर और आप को अपने अपराध शास्त्र/विज्ञान और पद का मद था और आप उसपर चले गए पर व्यवहारिकता पर नहीं गए)। क्योंकि आप का अपराध शास्त्र/विज्ञान गलत भी हो सकता है और इसके कई कारण है जिसमे की एक तथ्य से मैं सबको अवगत करा दूँ:- आप लोगों के अपराध शास्त्र/विज्ञान ने जिस शर्मनाक घटना का गुनाहगार अंतः निहित समाज में अघोषित रूप से किसी व्यक्ति विशेस को माना था वह सत्य नहीं है और न सत्य वह मुझसे छुपा सकता था/है/हो रहा होगा वल्कि उस घटना का मूल अपराधी सायद ही कोई अनुज रहा हो उसकी बात ही छोड़ दीजिये बल्कि मुझे लगता है वह कोई अज्ञात था/है जो प्रभावित परिवार के पारिवारिक पृष्ठभूमि (सगे, सम्बन्धी, अन्य मित्र मंडली) का हो सकता है?

सिम्हाद्रि(नरसिंघा)/नारायणन(विष्णु) आप मुझे दण्ड देने योग्य अपने इस जन्म में नहीं हो सकते थे (आप को केवल लगा था की गलती मुझसे हुयी थी तो मुझसे ही पूंछ लेते बुलाकर और आप को अपने अपराध शास्त्र/विज्ञान और पद का मद था और आप उसपर चले गए पर व्यवहारिकता पर नहीं गए)। क्योंकि आप का अपराध शास्त्र/विज्ञान गलत भी हो सकता है और इसके कई कारण है जिसमे की एक तथ्य से मैं सबको अवगत करा दूँ:- आप लोगों के अपराध शास्त्र/विज्ञान ने जिस शर्मनाक घटना का गुनाहगार अंतः निहित समाज में अघोषित रूप से किसी व्यक्ति विशेस को माना था वह सत्य नहीं है और न सत्य वह मुझसे छुपा सकता था/है/हो रहा होगा वल्कि उस घटना का मूल अपराधी सायद ही कोई अनुज रहा हो उसकी बात ही छोड़ दीजिये बल्कि मुझे लगता है वह कोई अज्ञात था/है जो प्रभावित परिवार के पारिवारिक पृष्ठभूमि (सगे, सम्बन्धी, अन्य मित्र मंडली) का हो सकता है?

जिस तथाकथित दलित स्वाभिमान के नाम पर 2000/2001 से पूरे विश्व को महा नर संहार से बचाया जा चुका है और उसके बाद से भी जिन लोगों की आँख नहीं खुली हो तो उससे भी इस संसार को बचाने के साथ उनकी आँख खोलने का प्रयास जारी है लेकिन उनकी उद्दण्डता पर निगाह रखी जा रही है। और यदि ऐसे में तथाकथित पारबती, लक्ष्मी और सरस्वती उनके भी घरों में जा चुकी हैं तो उनका तथाकथित दलित का सिक्का अब चलने वाला नहीं है। क्योंकि अब उनके लिए भी यही तथाकथित पारवती, लक्ष्मी और सरस्वती उनके घर में भी लाक्षागृह तैयार कर चुकी है जो हमारे घरों में लाक्षागृह तैयार करते थे कालीमाई के द्वारा। मैं इस संसार में मानवता प्रेमियों के द्वारा इस तथाकथित दलित सिक्कों को पुनः चलाने वालों पर कड़ी निगाह रखने का आह्वान करता हूँ। और 2000/2001 के सन्दर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि तथाकथित दलित स्वाभिमान के नाम पर निहित स्वार्थ हेतु अंदर ही अंदर खेल-खेलने वाली तथाकथित विष्वमहाशक्ति जो इस्लामिक सत्ता का धुर विरोध कर रहा था उसी तथाकथित विष्वमहाशक्ति पर इस्लामिक मूल का व्यक्ति एक दशक से शासन कर रहा है। इससे ज्यादा मैं तथाकथित विष्वमहाशक्ति द्वारा तथाकथित दलित का सिक्का भारतवर्ष में चलवाने के दुष्परिणाम के सन्दर्भ में कुछ नहीं कहूंगा न अपने सन्दर्भ में कुछ कहूंगा और कहूंगा इतना की कि सत्य की पहचान कीजिये उसे मिटाने की शक्ति किसी भी वास्तविक महाशक्ति को भी नहीं है।

जिस तथाकथित दलित स्वाभिमान के नाम पर 2000/2001 से पूरे विश्व को महा नर संहार से बचाया जा चुका है और उसके बाद से भी जिन लोगों की आँख नहीं खुली हो तो उससे भी इस संसार को बचाने के साथ उनकी आँख खोलने का प्रयास जारी है लेकिन उनकी उद्दण्डता पर निगाह रखी जा रही है। और यदि ऐसे में तथाकथित पारबती, लक्ष्मी और सरस्वती उनके भी घरों में जा चुकी हैं तो उनका तथाकथित दलित का सिक्का अब चलने वाला नहीं है। क्योंकि अब उनके लिए भी यही तथाकथित पारवती, लक्ष्मी और सरस्वती उनके घर में भी लाक्षागृह तैयार कर चुकी है जो हमारे घरों में लाक्षागृह तैयार करते थे कालीमाई के द्वारा। मैं इस संसार में मानवता प्रेमियों के द्वारा इस तथाकथित दलित सिक्कों को पुनः चलाने वालों पर कड़ी निगाह रखने का आह्वान करता हूँ। और 2000/2001 के सन्दर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि तथाकथित दलित स्वाभिमान के नाम पर निहित स्वार्थ हेतु अंदर ही अंदर खेल-खेलने वाली तथाकथित विष्वमहाशक्ति जो इस्लामिक सत्ता का धुर विरोध कर रहा था उसी तथाकथित विष्वमहाशक्ति पर इस्लामिक मूल का व्यक्ति एक दशक से शासन कर रहा है। इससे ज्यादा मैं तथाकथित विष्वमहाशक्ति द्वारा तथाकथित दलित का सिक्का भारतवर्ष में चलवाने के दुष्परिणाम के सन्दर्भ में कुछ नहीं कहूंगा न अपने सन्दर्भ में कुछ कहूंगा और कहूंगा इतना की कि सत्य की पहचान कीजिये उसे मिटाने की शक्ति किसी भी वास्तविक महाशक्ति को भी नहीं है।

मेरे यहाँ डिजिटल लेखों के कुछ लिखने और पढ़ने से किसी जाती/धर्म/पंथ/रूप/रंग/भाषा/लिंग/राष्ट्र/संगठन/दल के किसी सज्जन व्यक्ति पर कोई गलत असर नहीं होगा (कुछ लोगों पर जरूर इसका असर होगा वे पक्ष और विपक्ष जहाँ भी खड़े होंगे क्योंकि मैं पक्ष और विपक्ष दोनों से हूँ और दोनों को आइना दिखा रहा हूँ जो चाहे इस आईने में सत्य से निःशुल्क साक्षात्कार कर ले) क्योंकि सन्मार्ग पर चलने वालों के सहयोग हेतु मैं समर्पित हूँ और उन्ही को प्रोत्साहित करता हूँ और यह की धनबल, बहुबल, और बुध्धिबल के कुप्रभाव में ये सज्जन न आएं, न झुकें और न प्रभावित हों और ऐसे आम समाज को वाह्य रूप से नियंत्रित करने वाले सज्जन समाज तथा निम्न, मध्यम, सामान्य भौतिक जीवन से लेकर उच्च्स्थ भौतिक जीवन जीते हुए स्वयंनियन्त्रीय तथा दूसरों को भी नियंत्रित करने का प्रयास करने वाले सज्जन=संत समाज की संख्या वृध्धि भी मेरा परम उद्देश्य रहा है डिजिटल लेखों के माध्यम से। पर हर सत्यम शिवम् सुंदरम के सिध्धांत के पालक को भगवान श्रीकृष्ण की तर्ज पर ही सही "सतयमेव जयते" की पूर्ण प्राप्ति हेतु ही पूर्ण सत्य से केवल किसी-किसी सन्दर्भ (केवल अत्यल्प सन्दर्भ में ही) में विरत होना चाहिए न की पूर्ण सत्य प्राप्ति के झूंठे आडम्बर को खड़ा करते हुए स्वयं तथा दूसरों को इस भव-सागर में डुबोते रहे भविष्य में पूर्ण सत्य=ईस्वर प्राप्ति का झूंठा भरोसा देते हुए।

मेरे यहाँ डिजिटल लेखों के कुछ लिखने और पढ़ने से किसी जाती/धर्म/पंथ/रूप/रंग/भाषा/लिंग/राष्ट्र/संगठन/दल के किसी सज्जन व्यक्ति पर कोई गलत असर नहीं होगा (कुछ लोगों पर जरूर इसका असर होगा वे पक्ष और विपक्ष जहाँ भी खड़े होंगे क्योंकि मैं पक्ष और विपक्ष दोनों से हूँ और दोनों को आइना दिखा रहा हूँ जो चाहे इस आईने में सत्य से निःशुल्क साक्षात्कार कर ले)  क्योंकि सन्मार्ग पर चलने वालों के सहयोग हेतु मैं समर्पित हूँ और उन्ही को प्रोत्साहित करता हूँ और यह की  धनबल, बहुबल, और बुध्धिबल के कुप्रभाव में ये सज्जन न आएं, न झुकें और न प्रभावित हों और ऐसे आम समाज को वाह्य रूप से नियंत्रित करने वाले सज्जन समाज तथा निम्न, मध्यम, सामान्य भौतिक जीवन से लेकर उच्च्स्थ भौतिक जीवन जीते हुए स्वयंनियन्त्रीय तथा दूसरों को भी नियंत्रित करने का प्रयास करने वाले सज्जन=संत समाज की संख्या वृध्धि भी मेरा परम उद्देश्य रहा है डिजिटल लेखों के माध्यम से।  पर हर सत्यम शिवम् सुंदरम के सिध्धांत के पालक को भगवान श्रीकृष्ण की तर्ज पर ही सही "सतयमेव जयते" की पूर्ण प्राप्ति हेतु ही पूर्ण सत्य से केवल किसी-किसी सन्दर्भ (केवल अत्यल्प सन्दर्भ में ही)  में विरत होना चाहिए न की पूर्ण सत्य प्राप्ति के झूंठे आडम्बर को खड़ा करते हुए स्वयं तथा दूसरों को इस भव-सागर में डुबोते रहे भविष्य में पूर्ण सत्य=ईस्वर प्राप्ति का झूंठा भरोसा देते हुए।

Tuesday, April 19, 2016

केवल प्रतिशोध करने हेतु किसी को वरिष्ठ/कनिष्ठ बनाया जाता है तो फिर "जहाँ कुमति तह विपति निधाना" वाला समीकरण हो जता है "जहाँ सुमति वहँ संपत्ति नाना" नहीं रह जाता है लेकिन जब किसी ऐसे व्यक्ति जो अधिकांश मामले में योग्य हो उसको नियमानुसार कनिष्ठ बनाना हो वहाँ उस कनिष्ठ का भी सम्मान किया जाना चाहिए चाहे अन्य किसी कनिष्ठ का सम्मान आप करें या न करें। यहाँ तो जिस धरती पर लोग चलते हैं उसी को ठोकर मारते हैं मतलब जिस कश्यप की दी हुई नींव पर अपना आसियाना बनाये हुए है उसी कश्यप को कुर्मावतारी शक्ति से धमकाया जा रहा है प्रत्यक्ष(जो जो अंतः व् वाह्य सब कुछ देख और समझ सकता है उसके लिए प्रत्यक्ष)/परोक्ष (जो केवल सामने का ही क्रिया कलाप देख और समझ सकता है उसके लिए अदृश्य मतलब परोक्ष) रूप से तो मैं उसका शालीनता से जबाब भी दे रहा हूँ ? क्योंकि जिस तरह यह डिजिटल लेख सत्य है उसी तरह उनकी रणनीति को बनाने में प्रयुक्त हुई आवाज जिस आत्मायुक्त शरीर से निकली है वह भी सत्य है और कुछ विशेष लोग उससे बात करके ही समझ लेते हैं।

केवल प्रतिशोध करने हेतु किसी को वरिष्ठ/कनिष्ठ बनाया जाता है तो फिर "जहाँ कुमति तह विपति निधाना" वाला समीकरण हो जता है "जहाँ सुमति वहँ संपत्ति नाना" नहीं रह जाता है लेकिन जब किसी ऐसे व्यक्ति जो अधिकांश मामले में योग्य हो उसको नियमानुसार कनिष्ठ बनाना हो वहाँ उस कनिष्ठ का भी सम्मान किया जाना चाहिए चाहे अन्य किसी कनिष्ठ का सम्मान आप करें या न करें। यहाँ तो जिस धरती पर लोग चलते हैं उसी को ठोकर मारते हैं मतलब जिस कश्यप की दी हुई नींव पर अपना आसियाना बनाये हुए है उसी कश्यप को कुर्मावतारी शक्ति से धमकाया जा रहा है प्रत्यक्ष(जो जो अंतः व् वाह्य सब कुछ देख और समझ सकता है उसके लिए प्रत्यक्ष)/परोक्ष (जो केवल सामने का ही क्रिया कलाप देख और समझ सकता है उसके लिए अदृश्य मतलब परोक्ष) रूप से तो मैं उसका शालीनता से जबाब भी दे रहा हूँ ? क्योंकि जिस तरह यह डिजिटल लेख सत्य है उसी तरह उनकी रणनीति को बनाने में प्रयुक्त हुई आवाज जिस आत्मायुक्त शरीर से निकली है वह भी सत्य है और कुछ विशेष लोग उससे बात करके ही समझ लेते हैं।

मैं प्रयागराज और प्रयागराज विश्विद्यालय या दुनिया के किसी भी विद्वान और योगी, ऋषी और महर्षि का सम्मान क्या करता जब मेरे सभी आदर्शों जो अतुल्य थे/हैं/रहेंगे, को इस दुनिया को चलाने का दम भरने वाले नीचा दिखा रहे अपनी रणनीति के कुचक्र की चाल को परिणाम देने के लिए और आप की जानकारी के लिए आज तक उन आदर्शों से ऊंचा आदर्श प्रस्तुत नहीं कर सके इस दुनिया वाले। मैं अपने कश्यप गोत्रीय बड़े भाई साहब को भी अपना शोध गुरु नहीं मान रहा था और शोध गुरु माना तब जब मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्यास से व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा श्रध्देय श्रीश्रीधर(विष्णु) और परमपिता परमेश्वर, मेरे खानदानी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र:बिल्वपत्र:शिव और शिवा पर अर्पणेय/भोज्य/भोजन/आहार) पाण्डेय ब्राह्मण ताऊजी श्रध्देय डॉ प्रेमचंद(शिव) का विशेष आदेश हुआ उनकी पूरी पहचान बताते हुए (जिनके रहते हुए भी अभीष्ठ कार्य को मैं असम्भव बता चुका था मेरे समर्पित हो जाने के बावजूद भी और कुछ हद तक यह सत्य भी साबित हुआ स्वयं मुझ स्वयं समर्पित को भी समर्पण की मूर्त अवस्था से लड़ाई के मैदान में स्वयं उतरना पड़ा 16 मई, 2006 को अभिष्ठतम लक्ष्य प्राप्ति को पूर्णता देने वाले वार के लिए और वह पूर्ण भी हुआ और मूर्त रूप मिला 2007, 2008 के क्रम से आगे जाते हुए 2009 में)। मैं क्या करता विकल्प स्वरुप यह तभी बताऊंगा जब पहले जैसी स्थिति किसी में लाने की शक्ति हो तभी जो संभव नहीं है। तो कौन मेरा वरिष्ठ हुआ जब स्वयं मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्यास से व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा श्रध्देय श्रीश्रीधर(विष्णु) और परमपिता परमेश्वर, मेरे खानदानी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र:बिल्वपत्र:शिव और शिवा पर अर्पणेय/भोज्य/भोजन/आहार) पाण्डेय ब्राह्मण ताऊजी श्रध्देय डॉ प्रेमचंद(शिव)द्वारा मेरा समर्पण हुआ? ऐसे शिव (प्रेमचंद) व विष्णु(श्रीधर) के आदर्शो के अनुरूप मैं जिसे जो मान ही लिया था और यदि वे उस योग्य थे/नहीं थे/हैं या किसी द्वारा नियंत्रित भी हुए हो और उनको वह मानने पर मेरा जो हानि लाभ हुआ उसकी चिंता मैं नहीं करता और इस प्रकार उनको अपने से वरिष्ठ मानने में कोई आतंरिक या वाह्य प्रतिरोध नहीं। पर जो प्राथमिक नियमों पर ही नहीं उचित बैठते तो उनको कौन वरिष्ठ मनेगा?

मैं प्रयागराज और प्रयागराज विश्विद्यालय या दुनिया के किसी भी विद्वान और योगी, ऋषी और महर्षि का सम्मान क्या करता जब मेरे सभी आदर्शों जो अतुल्य थे/हैं/रहेंगे, को इस दुनिया को चलाने का दम भरने वाले नीचा दिखा रहे अपनी रणनीति के कुचक्र की चाल को परिणाम देने के लिए और आप की जानकारी के लिए आज तक उन आदर्शों से ऊंचा आदर्श प्रस्तुत नहीं कर सके इस दुनिया वाले। मैं अपने कश्यप गोत्रीय बड़े भाई साहब को भी अपना शोध गुरु नहीं मान रहा था और शोध गुरु माना तब जब मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्यास से व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा श्रध्देय श्रीश्रीधर(विष्णु) और परमपिता परमेश्वर, मेरे खानदानी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र:बिल्वपत्र:शिव और शिवा पर अर्पणेय/भोज्य/भोजन/आहार) पाण्डेय ब्राह्मण ताऊजी श्रध्देय डॉ प्रेमचंद(शिव) का विशेष आदेश हुआ उनकी पूरी पहचान बताते हुए (जिनके रहते हुए भी अभीष्ठ कार्य को मैं असम्भव बता चुका था मेरे समर्पित हो जाने के बावजूद भी और कुछ हद तक यह सत्य भी साबित हुआ स्वयं मुझ स्वयं समर्पित को भी समर्पण की मूर्त अवस्था से लड़ाई के मैदान में स्वयं उतरना पड़ा 16 मई, 2006 को अभिष्ठतम लक्ष्य प्राप्ति को पूर्णता देने वाले वार के लिए और वह पूर्ण भी हुआ और मूर्त रूप मिला 2007, 2008 के क्रम से आगे जाते हुए 2009 में)। मैं क्या करता विकल्प स्वरुप यह तभी बताऊंगा जब पहले जैसी स्थिति किसी में लाने की शक्ति हो तभी जो संभव नहीं है। तो कौन मेरा वरिष्ठ हुआ जब स्वयं मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्यासी (वशिष्ठ के पौत्र व्यास से व्याशी मिश्रा ब्राह्मण मामा श्रध्देय श्रीश्रीधर(विष्णु) और परमपिता परमेश्वर, मेरे खानदानी सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र:बिल्वपत्र:शिव और शिवा पर अर्पणेय/भोज्य/भोजन/आहार) पाण्डेय ब्राह्मण ताऊजी श्रध्देय डॉ प्रेमचंद(शिव)द्वारा मेरा समर्पण हुआ?  ऐसे शिव (प्रेमचंद) व विष्णु(श्रीधर) के आदर्शो के अनुरूप मैं जिसे जो मान ही लिया था और यदि वे उस योग्य थे/नहीं थे/हैं या किसी द्वारा नियंत्रित भी हुए हो और उनको वह मानने पर मेरा जो हानि लाभ हुआ उसकी चिंता मैं नहीं करता और इस प्रकार उनको अपने से वरिष्ठ मानने में कोई आतंरिक या वाह्य प्रतिरोध नहीं। पर जो प्राथमिक नियमों पर ही नहीं उचित बैठते तो उनको कौन वरिष्ठ मनेगा? 

जो स्वयं गिरिधर ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) और विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) हो वह किसी हिन्दू या मुस्लिम या ईसाई या अन्य कोई धर्मी या अन्य किसी पंथ के नामी गिरामी कुर्मावतारी चेहरे को अपना दाहिना हाँथ बना उसके भरोसे इस प्रयागराज में या कहीं भी या कभी भी जीवन नही जीता है, तो भ्रम किसी को हो की कुर्मावतारी ही प्रयागराज में सर्वश्रेष्ठ हथियार हैं तो वह भ्रम अब दूर कर लिया जाय। गिरिधर-विवेक 2001 से अनवरत इस प्रयागराज और विश्व मानवता को अपनी अतुल्य सेवा दे रहा है मतलब सीत युध्ध का जबाब सीत युध्ध से और अन्य-युद्ध का जबाब अन्य युध्ध से और महत्तम लक्ष्य एक और केवल एक है और वह है मानवता की किसी भी प्रकार अभीष्ट सेवा बिना किसी पारितोषिक के, बिना डर और भय दिखाये, और बिना किसी का डर और भय महसूस किये।

जो स्वयं गिरिधर ((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) और विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) हो वह किसी हिन्दू या मुस्लिम या ईसाई या अन्य कोई धर्मी या अन्य किसी पंथ के नामी गिरामी कुर्मावतारी चेहरे को अपना दाहिना हाँथ बना उसके भरोसे इस प्रयागराज में या कहीं भी या कभी भी जीवन नही जीता है, तो भ्रम किसी को हो की कुर्मावतारी ही प्रयागराज में सर्वश्रेष्ठ हथियार हैं तो वह भ्रम अब दूर कर लिया जाय। गिरिधर-विवेक 2001 से अनवरत इस प्रयागराज और विश्व मानवता को अपनी अतुल्य सेवा दे रहा है मतलब सीत युध्ध का जबाब सीत युध्ध से और अन्य-युद्ध का जबाब अन्य युध्ध से और महत्तम लक्ष्य एक और केवल एक है और वह है मानवता की किसी भी प्रकार अभीष्ट सेवा बिना किसी पारितोषिक के, बिना डर और भय दिखाये, और बिना किसी का डर और भय महसूस किये।

अम्बेडकर=अम्बवादेकर=हनुमान=महावीर के जीवन दर्शन से भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा प्रबुध्द वर्ग कुछ सीखा या नहीं सीखा है पर इतना जो जरूर सीखा है भारतीय सीमा के अंदर या बाहर जाकर अपने मायालाज में ब्राह्मणो और सवर्णो की लड़कियों को फंसा कर उनसे दो-चार दी के लिए ही सही जन्मजन्मांतर के लिए जाने जाने वाले बलात्कार हेतु विवाह करो और उनसे पांच हजार वर्ष का प्रतिशोध लो जो एक सदी या 60/70 वर्ष पहले किस घर में थे पता ही नहीं है और उसके लिए समाज को कितना भी अष्लीलता युक्त क्यों न बनाना पड़े वह उन्हें मान्य है। लेकिन उनको पता होना चाहिए की अष्लीलता युक्त समाज बहुजन को ज्यादा हानि पहुंचाता है अल्पजन जो सदियों से अनुभवी हैं उनको कम और उससे यदि आप के स्वयं की आधी आबादी मदमाती हुई बर्बाद हुयी तो घर वास्तव में घर नहीं स्मशान/मरघट बन जाएंगे और फिर भूतों का डेरा लगेगा वहां। तो क्या ऐसी दुष्कर्मी सोच वाला प्रबुद्ध वर्ग दया का पात्र है?

अम्बेडकर=अम्बवादेकर=हनुमान=महावीर के जीवन दर्शन से भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा प्रबुध्द वर्ग कुछ सीखा या नहीं सीखा है पर इतना जो जरूर सीखा है भारतीय सीमा के अंदर या बाहर जाकर अपने मायालाज में ब्राह्मणो और सवर्णो की लड़कियों को फंसा कर उनसे दो-चार दी के लिए ही सही जन्मजन्मांतर के लिए जाने जाने वाले बलात्कार हेतु विवाह करो और उनसे पांच हजार वर्ष का प्रतिशोध लो जो एक सदी या 60/70 वर्ष पहले किस घर में थे पता ही नहीं है और उसके लिए समाज को कितना भी अष्लीलता युक्त क्यों न बनाना पड़े वह उन्हें मान्य है। लेकिन उनको पता होना चाहिए की अष्लीलता युक्त समाज बहुजन को ज्यादा हानि पहुंचाता है अल्पजन जो सदियों से अनुभवी हैं उनको कम और उससे यदि आप के स्वयं की आधी आबादी मदमाती हुई बर्बाद हुयी तो घर वास्तव में घर नहीं स्मशान/मरघट बन जाएंगे और फिर भूतों का डेरा लगेगा वहां। तो क्या ऐसी दुष्कर्मी सोच वाला प्रबुद्ध वर्ग दया का पात्र है?

Monday, April 18, 2016

चन्द्रमा की चांदनी में स्वप्न तभी तक देखे जा सकते थे जब तक की भोर में सूर्य नहीं निकला हो और अगर भोर में सूर्य निकल आने पर भी स्वप्न नजर आएं तो फिर उसे दिवा स्वप्न कहते हैं और ये दोनों अवस्थाएं आभासीय हैं तो वास्तविकता से आप सबको परिचित करा दिया मैं की असली विष्वमहाशक्ति इस संसार में कौन है? आधुनिक मानवजगत के श्रेष्ठतम मनीषी स्वामी विवेकानंद जी से स्वयं उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने इस तथ्य को इंगित किया था की वास्तविक विश्वमहाशक्ति कौन है अगर हम अपनी वाह्य और आतंरिक चछु से इस चराचर जगत का वास्तविक दर्शन कर पाते हों। और वह यह है की हरदृष्टि से अपने में ही पूर्ण ब्राह्मण समाज ही इस मानव जगत का असली विश्वमहाशक्ति है। तो आप लोग कितना प्रयास जारी रखे है अधिकतम संख्या में हर दृष्टि से अपने में ही पूर्ण ब्राह्मण समाज के संवर्धन और उन्नयन हेतु? हमे तो यह लगता है की भारतीय सांस्कृतिक अवनति के साथ ब्राह्मणों की भी अवनति असीमित रफ्तार से जारी है जिसके जिम्मेदार अकेले स्वयं ब्राह्मण नहीं है वरण ब्राह्मणो द्वारा जनित निम्न, मध्यम, और अभिजात्य प्रबुद्ध मानव समाज भी है। उस समय की परिकल्पना को यह संसार शायद ही भुला सके जब श्रेष्ठतम ब्राह्मण का अनादर और अपमान हुआ और समूल विनाश के डर से थर्रा रहा संसार स्वयं उसी से उसके कर्तव्य पालन (ब्राह्मण का परम कर्तव्य ब्रह्मा के सृष्टि की रक्षा और उसका विकाश है पर श्रिष्टि में असुर साम्राज्य अपने चरम पर चला जाय लोगों की आँख में धुल झोंकते हुए और कुचक्र से ब्रह्मा का वरदान हांसिल करते हुए और डर वस वह ब्राह्मण उस दानव दल से दलित श्रिष्टि का समर्थन कदापि करे यह उसका कार्य नहीं नहीं) का पाठ पढ़ाकर उसे दृढप्रतिज्ञ कर इस प्रयागराज के यज्ञ में समर्पित कर दिया गया अविरल, अनवरत समृद्धि जारी रखते हुए महाविनाश को रोकना, नवसृजन, और संवर्धन जारी रखने हेतु। 2001 से जितने लोगों को सतह पर ला उनमे खयाली पुलाव पाले गए व्यक्ति/संगठन/समूह विशेस द्वारा अपना उल्लू सीधा करने के प्रयास के तहत उनको मैं ये बताना चाहूंगा की जिनको सतह पर लाया गया आप के द्वारा वे सब प्राथमिक नियम में ही उस श्रेणी में नहीं हैं और न उस श्रेणी में इस जन्म में जा सकते है वे तो केवल आप की दृष्टि में रहे हैं और बुनियादी नियमोंनुसार हर प्रकार से संसाधनों के दृष्टिगत प्रयोग द्वारा संस्थागत समर्थन पर केवल सतह पर चले है जबकि कोई भारी विरोध और असहयोग बीच अपना कार्य जारी रखा कुछ सीमित सम्पर्को और सुविधाओं के बल पर और ये बताना चाहूंगा की जिनको सतह पर लाया गया आप के द्वारा सभी अवकाश मिलाकर उनका 2001 से आज तक इस प्रयागराज से दूर किसी शहर और देश में प्रवास कोई दो वर्ष से कम नहीं है उन लोगों का भी।

चन्द्रमा की चांदनी में स्वप्न तभी तक देखे जा सकते थे जब तक की भोर में सूर्य नहीं निकला हो और अगर भोर में सूर्य निकल आने पर भी स्वप्न नजर आएं तो फिर उसे दिवा स्वप्न कहते हैं और ये दोनों अवस्थाएं आभासीय हैं तो वास्तविकता से आप सबको परिचित करा दिया मैं की असली विष्वमहाशक्ति इस संसार में कौन है? आधुनिक मानवजगत के श्रेष्ठतम मनीषी स्वामी विवेकानंद जी से स्वयं उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने इस तथ्य को इंगित किया था की वास्तविक विश्वमहाशक्ति कौन है अगर हम अपनी वाह्य और आतंरिक चछु से इस चराचर जगत का वास्तविक दर्शन कर पाते हों। और वह यह है की हरदृष्टि से अपने में ही पूर्ण ब्राह्मण समाज ही इस मानव जगत का असली विश्वमहाशक्ति है। तो आप लोग कितना प्रयास जारी रखे है अधिकतम संख्या में हर दृष्टि से अपने में ही पूर्ण ब्राह्मण समाज के संवर्धन और उन्नयन हेतु? हमे तो यह लगता है की भारतीय सांस्कृतिक अवनति के साथ ब्राह्मणों की भी अवनति असीमित रफ्तार से जारी है जिसके जिम्मेदार अकेले स्वयं ब्राह्मण नहीं है वरण ब्राह्मणो द्वारा जनित निम्न, मध्यम, और अभिजात्य प्रबुद्ध मानव समाज भी है। उस समय की परिकल्पना को यह संसार शायद ही भुला सके जब श्रेष्ठतम ब्राह्मण का अनादर और अपमान हुआ और समूल विनाश के डर से थर्रा रहा संसार स्वयं उसी से उसके कर्तव्य पालन (ब्राह्मण का परम कर्तव्य ब्रह्मा के सृष्टि की रक्षा और उसका विकाश है पर श्रिष्टि में असुर साम्राज्य अपने चरम पर चला जाय लोगों की आँख में धुल झोंकते हुए और कुचक्र से ब्रह्मा का वरदान हांसिल करते हुए और डर वस वह ब्राह्मण उस दानव दल से दलित श्रिष्टि का समर्थन कदापि करे यह उसका कार्य नहीं नहीं) का पाठ पढ़ाकर उसे दृढप्रतिज्ञ कर इस प्रयागराज के यज्ञ में समर्पित कर दिया गया अविरल, अनवरत समृद्धि जारी रखते हुए महाविनाश को रोकना, नवसृजन, और संवर्धन जारी रखने हेतु। 2001 से जितने लोगों को सतह पर ला उनमे खयाली पुलाव पाले गए व्यक्ति/संगठन/समूह विशेस द्वारा अपना उल्लू सीधा करने के प्रयास के तहत उनको मैं ये बताना चाहूंगा की जिनको सतह पर लाया गया आप के द्वारा वे सब प्राथमिक नियम में ही उस श्रेणी में नहीं हैं और न उस श्रेणी में इस जन्म में जा सकते है वे तो केवल आप की दृष्टि में रहे हैं और बुनियादी नियमोंनुसार हर प्रकार से संसाधनों के दृष्टिगत प्रयोग द्वारा संस्थागत समर्थन पर केवल सतह पर चले है जबकि कोई भारी विरोध और असहयोग बीच अपना कार्य जारी रखा कुछ सीमित सम्पर्को और सुविधाओं के बल पर और ये बताना चाहूंगा की जिनको सतह पर लाया गया आप के द्वारा सभी अवकाश मिलाकर उनका 2001 से आज तक इस प्रयागराज से दूर किसी शहर और देश में प्रवास कोई दो वर्ष से कम नहीं है उन लोगों का भी। Kedaeshwar Banerjee Centre of Atmospheric and Ocean Studies (KBCAOS)
Ramapur 
Bishunpur  

Saturday, April 16, 2016

नेहरू (शाब्दिक अर्थ नेह=प्रेम करने वाला और मानवता के सबसे बड़े आदर्शों में सबसे बड़े प्रेमी शिव जी का प्रथम और उसके बाद श्रीराम/कृष्ण का स्थान है ) जी का पूरा सारस्वत (सरस्वती पुत्र) ब्राह्मण गोत्र और कुल जिसको 70 वर्षों में पूर्ण रूप से ऊपर नहीं उठा सका और स्वयं डूब गया उसे भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का कश्यप गोत्र भी क्या उठा पायेगा ( जिसको हर जाति और हर धर्म के लोगों को उठाना होता है), जबतक की ऐसे लोग कम से कम व्यवहारिक रूप में ही केवल सद्चरित्र (पूर्ण आदर्श सद्चरित्र न बन सके तो न सही) नही बनेंगे जिसमे केवल आत्मबल लगता है और एक नया पैसा नहीं लगता है। उस पर स्वयं सारस्वत ब्राह्मण शारदा कबीर/सविता अम्बेडकर और स्वयं भीमराव राम जी अम्बेडकर=अम्बवादेकर=हनुमान से कितनी आशा की जाय?

नेहरू (शाब्दिक अर्थ नेह=प्रेम करने वाला और मानवता के सबसे बड़े आदर्शों में सबसे बड़े प्रेमी शिव जी का प्रथम और उसके बाद श्रीराम/कृष्ण का स्थान है ) जी का पूरा सारस्वत (सरस्वती पुत्र) ब्राह्मण गोत्र और कुल जिसको 70 वर्षों में पूर्ण रूप से ऊपर नहीं उठा सका और स्वयं डूब गया उसे भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का कश्यप गोत्र भी क्या उठा पायेगा ( जिसको हर जाति और हर धर्म के लोगों को उठाना होता है), जबतक की ऐसे लोग कम से कम व्यवहारिक रूप में ही केवल सद्चरित्र (पूर्ण आदर्श सद्चरित्र न बन सके तो न सही) नही बनेंगे जिसमे केवल आत्मबल लगता है और एक नया पैसा नहीं लगता है। उस पर स्वयं सारस्वत ब्राह्मण शारदा कबीर/सविता अम्बेडकर और स्वयं भीमराव राम जी अम्बेडकर=अम्बवादेकर=हनुमान से कितनी आशा की जाय?

लाक्षागृह में मैं रहता था, हूँ और आगे भी रहूँगा (स्वयं मुझपर और मेरे लोगों पर मेरा स्नेह है की उनपर आंच नहीं आएगी कभी) लेकिन अब आप लोगों के लिए भी लाक्षागृह तैयार हो चुका है तो ज़रा सम्भल के रहिएगा आगे से:----संख्याबल से मेरी अवकात तय की जा रही थी घर-रिस्तेदार से लेकर बाहर तक के लोगों द्वारा और आज भी घर-रिस्तेदार से लेकर बाहर तक मेरी अवकात तय की जा चुकी है सब कुछ ठीक होते ही और वह अवकात मेरी उतना नहीं तय हुयी है जितना आज से 16 वर्ष पहले मेरी अवकात थी वरन उससे भी कम तय की जा चुकी है और वास्तव में उससे भी कम इस लिए क्योंकि उस समय मेरी युवावस्था थी और मैं अपने लक्ष्यानुरूप कुछ भी करने को स्वतंत्र था और उस युवा के भी सपने कुछ ऐसे थे जो मानवता के इतिहास में किसी भी महापुरुष से भी आगे निकल जाने की शक्ति मुझमे रखते थे पर स्वाभाविक क्षमता (न की मार्क्सवाद:अंकवाद :---मनोबल और तत परिणाम स्वरुप तेजस्व कम और ज्यादा करने हेतु अमुक व्यक्ति का परिक्षा अंक घटा दो और बढ़ा दो समाजिक तिकड़म और तकनीति के आधार पर और फिर उसको नियंत्रित करो या विपरीत सामाजिक परिश्थिति उत्पन्न करो परोक्ष रूप से और फिर उसे नियंत्रित करो की तर्ज पर: जैसा की मेरे साथ कई बार हुआ है) के आधार पर एक स्थाई पहचान बनाने की देर थी वह कितनी भी छोटे से स्तर पर होती| मेरी वह असीमित ऊर्जा जिस समाज के लिए लगाया आज वह समाज ही मेरा अपना नहीं दिख रहा और हमें बेगाना समझ लिया पर इतना याद रहे उस नादान समाज को की उसकी हर स्वाँस मेरे ही दम पर चल रही है और आगे भी तभी तक चलेगी जब तक की मैं सब कुछ आप सहन करने योग्य छोड़े रहेंगे और मैं स्वयं उसे सहन करते हुए उसे आगे बढ़ाना चाहूंगा। मैं किसी भी संस्था, संगठन और राष्ट्र के साथ खड़ा रहता रहा हूँगा, हूँ या आगे भी खड़ा रहूँगा सांसारिक रूप में तो क्या मेरी निष्ठा, भक्ति और शक्ति सभी सैध्दांतिक और व्यवहारिक पहलुओं पर यम-नियम के आधार पर सुविचारित पूर्ण सत्य के आचरण वालों के साथ ही रहेगी, न की वाह्य आडम्बर करने वाले या क्षुद्र स्वार्थ हेतु कल-बल-छल करने वाले या मानव संख्याबल के आधार पर सत्य का गला घोंटने वाले के साथ। मेरी सत्य-निष्ठा, भक्ति और शक्ति किसी भी रूप में प्रगतिशील सच्चाई को मानते हुए सत्यानुसरन करने वाले के साथ ही होगी हर समय और हर काल में।

लाक्षागृह में मैं रहता था, हूँ और आगे भी रहूँगा (स्वयं मुझपर और मेरे लोगों पर मेरा स्नेह है की उनपर आंच नहीं आएगी कभी) लेकिन अब आप लोगों के लिए भी लाक्षागृह तैयार हो चुका है तो ज़रा सम्भल के रहिएगा आगे से:----संख्याबल से मेरी अवकात तय की जा रही थी घर-रिस्तेदार से लेकर बाहर तक के लोगों द्वारा और आज भी घर-रिस्तेदार से लेकर बाहर तक मेरी अवकात तय की जा चुकी है सब कुछ ठीक होते ही और वह अवकात मेरी उतना नहीं तय हुयी है जितना आज से 16 वर्ष पहले मेरी अवकात थी वरन उससे भी कम तय की जा चुकी है और वास्तव में उससे भी कम इस लिए क्योंकि उस समय मेरी युवावस्था थी और मैं अपने लक्ष्यानुरूप कुछ भी करने को स्वतंत्र था और उस युवा के भी सपने कुछ ऐसे थे जो मानवता के इतिहास में किसी भी महापुरुष से भी आगे निकल जाने की शक्ति मुझमे रखते थे पर स्वाभाविक क्षमता (न की मार्क्सवाद:अंकवाद :---मनोबल और तत परिणाम स्वरुप तेजस्व कम और ज्यादा करने हेतु अमुक व्यक्ति का परिक्षा अंक घटा दो और बढ़ा दो समाजिक तिकड़म और तकनीति के आधार पर और फिर उसको नियंत्रित करो या विपरीत सामाजिक परिश्थिति उत्पन्न करो परोक्ष रूप से और फिर उसे नियंत्रित करो की तर्ज पर: जैसा की मेरे साथ कई बार हुआ है) के आधार पर एक स्थाई पहचान बनाने की देर थी वह कितनी भी छोटे से स्तर पर होती| मेरी वह असीमित ऊर्जा जिस समाज के लिए लगाया आज वह समाज ही मेरा अपना नहीं दिख रहा और हमें बेगाना समझ लिया पर इतना याद रहे उस नादान समाज को की उसकी हर स्वाँस मेरे ही दम पर चल रही है और आगे भी तभी तक चलेगी जब तक की मैं सब कुछ आप सहन करने योग्य छोड़े रहेंगे और मैं स्वयं उसे सहन करते हुए उसे आगे बढ़ाना चाहूंगा। मैं किसी भी संस्था, संगठन और राष्ट्र के साथ खड़ा रहता रहा हूँगा, हूँ या आगे भी खड़ा रहूँगा सांसारिक रूप में तो क्या मेरी निष्ठा, भक्ति और शक्ति सभी सैध्दांतिक और व्यवहारिक पहलुओं पर यम-नियम के आधार पर सुविचारित पूर्ण सत्य के आचरण वालों के साथ ही रहेगी, न की वाह्य आडम्बर करने वाले या क्षुद्र स्वार्थ हेतु कल-बल-छल करने वाले या मानव संख्याबल के आधार पर सत्य का गला घोंटने वाले के साथ। मेरी सत्य-निष्ठा, भक्ति और शक्ति किसी भी रूप में प्रगतिशील सच्चाई को मानते हुए सत्यानुसरन करने वाले के साथ ही होगी हर समय और हर काल में।

Friday, April 15, 2016

एक तरफ कुआँ दूसरी तरफ खाई पर भ्रम में मत आइये यह कुआँ और खाईं सत्य ने ही रची है आप की हर हाल में परिक्षा के लिए: बौद्धिस्ट बन कर सनातन धर्म में वापस आते हो (आना तो पडेगा ही किसी न किसी रूप में क्योंकि यमराज/धर्मराज का सामना को करना पडेगा हर किसी को जन्म के अंतिम दिनों में न और वह यमराज/धर्मराज किसी अन्यधर्म के अन्य-अन्य नहीं होते है वह तो सनातन हिन्दू धर्म के ही यमराज/धर्मराज सबके लिए एक ही हैं)गौतम गोत्रीय क्षत्रिय विष्णु भाई के पग चिन्हों का सामना करना पडेगा जैसा की उनके लिए कूट चक्र रचे थे आप लोग; और इससे भी आगे इस्लामिक, ईसाइयत समेत अन्य सभी पंथों और धर्मो को धारण कर सनातन धर्म में आओगे तो मुझ सनातन कश्यप(सर्व शक्तिशाली गोत्र जो महाविलायक है और हर किसी की हर तरह की परिक्षा लेने में पूर्ण समर्थ है:कश्यप/मारीच, गौतम, व्यास/वशिष्ठ, भारद्वाज/अांगिरास, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय:दुर्वाशा/दत्तात्रेय/सोमात्रेय/अत्री, कौशिक=विश्वरथ=विषमित्र ही प्रिमिटिव या मूल सप्तर्षि है जिसमे कश्यप सबसे वरिष्ठ, सबसे समर्थ, और अबसे जेष्ठ होने के कारन ही महाविलायक गोत्र है +और आठवें कुम्भज:अगस्त्य ऋषी है जो मलय क्षेत्र मतलब आधुनिक आंशिक आंध्रा/तमिल/केरल क्षेत्र में सभी सातों सप्तर्षियों के अंश से जन्मे और अपना कार्यक्षेत्र बनाये ) ब्राह्मण के पग चिन्हों का सामना करना पडेगा जिस क्रूर कूट चक्र को मेरे लिए रचा गया था आप लोगों द्वारा। और वह क्रूर कूटचक्र उस समय आप का चला था जब मैं किसी लक्ष्य हेतु समर्पित भाव में था (कहा जाता है की जो नवनिर्माण, सृजन, संवर्धन, संरक्षण और सुरक्षा में होता है उसके लिए दो दूनी चार ही सत्य नहीं होता है और उसपर कोई यम-नियम बिना किसी दार्शनिक भाव और वस्तु स्थिति को समझे हुए लागू नहीं किया जा सकएक तरफ कुआँ दूसरी तरफ खाई पर भ्रम में मत आइये यह कुआँ और खाईं सत्य ने ही रची है आप की हर हाल में परिक्षा के लिए: बौद्धिस्ट बन कर सनातन धर्म में वापस आते हो (आना तो पडेगा ही किसी न किसी रूप में क्योंकि यमराज/धर्मराज का सामना को करना पडेगा हर किसी को जन्म के अंतिम दिनों में न और वह यमराज/धर्मराज किसी अन्यधर्म के अन्य-अन्य नहीं होते है वह तो सनातन हिन्दू धर्म के ही यमराज/धर्मराज सबके लिए एक ही हैं)गौतम गोत्रीय क्षत्रिय विष्णु भाई के पग चिन्हों का सामना करना पडेगा जैसा की उनके लिए कूट चक्र रचे थे आप लोग; और इससे भी आगे इस्लामिक, ईसाइयत समेत अन्य सभी पंथों और धर्मो को धारण कर सनातन धर्म में आओगे तो मुझ सनातन कश्यप(सर्व शक्तिशाली गोत्र जो महाविलायक है और हर किसी की हर तरह की परिक्षा लेने में पूर्ण समर्थ है:कश्यप/मारीच, गौतम, व्यास/वशिष्ठ, भारद्वाज/अांगिरास, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय:दुर्वाशा/दत्तात्रेय/सोमात्रेय/अत्री, कौशिक=विश्वरथ=विषमित्र ही प्रिमिटिव या मूल सप्तर्षि है जिसमे कश्यप सबसे वरिष्ठ, सबसे समर्थ, और अबसे जेष्ठ होने के कारन ही महाविलायक गोत्र है +और आठवें कुम्भज:अगस्त्य ऋषी है जो मलय क्षेत्र मतलब आधुनिक आंशिक आंध्रा/तमिल/केरल क्षेत्र में सभी सातों सप्तर्षियों के अंश से जन्मे और अपना कार्यक्षेत्र बनाये ) ब्राह्मण के पग चिन्हों का सामना करना पडेगा जिस क्रूर कूट चक्र को मेरे लिए रचा गया था आप लोगों द्वारा। और वह क्रूर कूटचक्र उस समय आप का चला था जब मैं किसी लक्ष्य हेतु समर्पित भाव में था (कहा जाता है की जो नवनिर्माण, सृजन, संवर्धन, संरक्षण और सुरक्षा में होता है उसके लिए दो दूनी चार ही सत्य नहीं होता है और उसपर कोई यम-नियम बिना किसी दार्शनिक भाव और वस्तु स्थिति को समझे हुए लागू नहीं किया जा सकता पर आप दो दूनी चार का सत्य भी लागू किये जा रहे थे और यह उसी पर जिसकी ही सहन सीलता आप को सुरक्षित, सृजित, संरक्षित और संवर्धित किये जा रही थी) और अभीष्ठ विशेष लक्ष्य पूर्ती (11 सितम्बर, 2007) के बावजूद उसे खींचे चले जा रहे थे अभी 2016 अप्रैल तक दैत्यकुल के दबाव में अपने निहित स्वारथ्य हेतु उसे सार्वजनिक रूप से अमान्य करते हुए।>>>>>>>>>>> दया धर्म का मूल है और सत्य धर्म और दया दोनों का आधार है मतलब सत्य जाने बिना आप यदि दया भी करते है तो वह अधर्म भी हो सकता है यह आप को ज्ञान रहे और ये दोनों तथ्य उसी तरह सत्य हैं जैसे की गौतम और कश्यप अपने में सत्य हैं तो रास्ता यही है की जिसपर दया की जाय वह भी सत्य स्वीकार कम से कम करे और प्रायश्चित करे तो?>>>>>>>हाँ कश्यप गोत्र सराय है दुनिया के सभी जाती और धर्म के लोगों का जिनका की कोई गोत्र नहीं हैं और न उनको गोत्र ज्ञात है पर इसी कष्यप गोत्र में राम, कृष्ण और स सूर्य, चन्द्र, इंद्र, अरुण, वरुण, पवन, अग्नि, अंतरिक्ष देव, भूदेव और विश्वकर्मा समेत समस्त देवता जन्म लिए है मानव, दानव/दैत्य, किन्नर वंशी, गन्धर्व वंशी, नागवंशी पर इसके साथ सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भी जन्म लिए है जो धर्म की रक्षा हेतु सत्य की रक्षा को सर्वोपरि सिध्ध किया है मतलब धर्म का आधार ही सत्य है सत्य के बिना धर्म का अस्तित्व नहीं तो सबसे धर्म का पालन करवाना भी कश्यप का दायित्व है सबको आपने में शामिल कर महविलायक का खिताब अर्जित करने के पश्चात तो यह न समझिए की कश्यप अगर शरण देगा तो आप को धर्म/सत्य मानने से छूट मिल जाएगी या मार्ग त्यागने का प्रायश्चित नहीं करना पडेगा।>>>>>>>> दया धर्म का मूल है और सत्य धर्म और दया दोनों का आधार है मतलब सत्य जाने बिना आप यदि दया भी करते है तो वह अधर्म भी हो सकता है यह आप को ज्ञान रहे और ये दोनों तथ्य उसी तरह सत्य हैं जैसे की गौतम और कश्यप अपने में सत्य हैं तो रास्ता यही है की जिसपर दया की जाय वह भी सत्य स्वीकार कम से कम करे और प्रायश्चित करे तो?ता पर आप दो दूनी चार का सत्य भी लागू किये जा रहे थे और यह उसी पर जिसकी ही सहन सीलता आप को सुरक्षित, सृजित, संरक्षित और संवर्धित किये जा रही थी) और अभीष्ठ विशेष लक्ष्य पूर्ती (11 सितम्बर, 2007) के बावजूद उसे खींचे चले जा रहे थे अभी 11 अप्रैल, 2016 तक दैत्यकुल के दबाव में अपने निहित स्वारथ्य हेतु उसे सार्वजनिक रूप से अमान्य करते हुए।>>>>>>>>>>> दया धर्म का मूल है और सत्य धर्म और दया दोनों का आधार है मतलब सत्य जाने बिना आप यदि दया भी करते है तो वह अधर्म भी हो सकता है यह आप को ज्ञान रहे और ये दोनों तथ्य उसी तरह सत्य हैं जैसे की गौतम और कश्यप अपने में सत्य हैं तो रास्ता यही है की जिसपर दया की जाय वह भी सत्य स्वीकार कम से कम करे और प्रायश्चित करे तो?>>>>>>>हाँ कश्यप गोत्र सराय है दुनिया के सभी जाती और धर्म के लोगों का जिनका की कोई गोत्र नहीं हैं और न उनको गोत्र ज्ञात है पर इसी कष्यप गोत्र में राम, कृष्ण और स सूर्य, चन्द्र, इंद्र, अरुण, वरुण, पवन, अग्नि, अंतरिक्ष देव, भूदेव और विश्वकर्मा समेत समस्त देवता जन्म लिए है मानव, दानव/दैत्य, किन्नर वंशी, गन्धर्व वंशी, नागवंशी पर इसके साथ सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भी जन्म लिए है जो धर्म की रक्षा हेतु सत्य की रक्षा को सर्वोपरि सिध्ध किया है मतलब धर्म का आधार ही सत्य है सत्य के बिना धर्म का अस्तित्व नहीं तो सबसे धर्म का पालन करवाना भी कश्यप का दायित्व है सबको आपने में शामिल कर महविलायक का खिताब अर्जित करने के पश्चात तो यह न समझिए की कश्यप अगर शरण देगा तो आप को धर्म/सत्य मानने से छूट मिल जाएगी या मार्ग त्यागने का प्रायश्चित नहीं करना पडेगा।>>>>>>>> दया धर्म का मूल है और सत्य धर्म और दया दोनों का आधार है मतलब सत्य जाने बिना आप यदि दया भी करते है तो वह अधर्म भी हो सकता है यह आप को ज्ञान रहे और ये दोनों तथ्य उसी तरह सत्य हैं जैसे की गौतम और कश्यप अपने में सत्य हैं तो रास्ता यही है की जिसपर दया की जाय वह भी सत्य स्वीकार कम से कम करे और प्रायश्चित करे तो?

एक तरफ कुआँ दूसरी तरफ खाई पर भ्रम में मत आइये यह कुआँ और खाईं सत्य ने ही रची है आप की हर हाल में परिक्षा के लिए: बौद्धिस्ट बन कर सनातन धर्म में वापस आते हो (आना तो पडेगा ही किसी न किसी रूप में क्योंकि यमराज/धर्मराज का सामना को करना पडेगा हर किसी को जन्म के अंतिम दिनों में न और वह यमराज/धर्मराज किसी अन्यधर्म के अन्य-अन्य नहीं होते है वह तो सनातन हिन्दू धर्म के ही यमराज/धर्मराज सबके लिए एक ही हैं)गौतम गोत्रीय क्षत्रिय विष्णु भाई के पग चिन्हों का सामना करना पडेगा जैसा की उनके लिए कूट चक्र रचे थे आप लोग; और इससे भी आगे इस्लामिक, ईसाइयत समेत अन्य सभी पंथों और धर्मो को धारण कर सनातन धर्म में आओगे तो मुझ सनातन कश्यप(सर्व शक्तिशाली गोत्र जो महाविलायक है और हर किसी की हर तरह की परिक्षा लेने में पूर्ण समर्थ है:कश्यप/मारीच, गौतम, व्यास/वशिष्ठ, भारद्वाज/अांगिरास, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय:दुर्वाशा/दत्तात्रेय/सोमात्रेय/अत्री, कौशिक=विश्वरथ=विषमित्र ही प्रिमिटिव या मूल सप्तर्षि है जिसमे कश्यप सबसे वरिष्ठ, सबसे समर्थ, और अबसे जेष्ठ होने के कारन ही महाविलायक गोत्र है +और आठवें कुम्भज:अगस्त्य ऋषी है जो मलय क्षेत्र मतलब आधुनिक आंशिक आंध्रा/तमिल/केरल क्षेत्र में सभी सातों सप्तर्षियों के अंश से जन्मे और अपना कार्यक्षेत्र बनाये ) ब्राह्मण के पग चिन्हों का सामना करना पडेगा जिस क्रूर कूट चक्र को मेरे लिए रचा गया था आप लोगों द्वारा। और वह क्रूर कूटचक्र उस समय आप का चला था जब मैं किसी लक्ष्य हेतु समर्पित भाव में था (कहा जाता है की जो नवनिर्माण, सृजन, संवर्धन, संरक्षण और सुरक्षा में होता है उसके लिए दो दूनी चार ही सत्य नहीं होता है और उसपर कोई यम-नियम बिना किसी दार्शनिक भाव और वस्तु स्थिति को समझे हुए लागू नहीं किया जा सकएक तरफ कुआँ दूसरी तरफ खाई पर भ्रम में मत आइये यह कुआँ और खाईं सत्य ने ही रची है आप की हर हाल में परिक्षा के लिए: बौद्धिस्ट बन कर सनातन धर्म में वापस आते हो (आना तो पडेगा ही किसी न किसी रूप में क्योंकि यमराज/धर्मराज का सामना को करना पडेगा हर किसी को जन्म के अंतिम दिनों में न और वह यमराज/धर्मराज किसी अन्यधर्म के अन्य-अन्य नहीं होते है वह तो सनातन हिन्दू धर्म के ही यमराज/धर्मराज सबके लिए एक ही हैं)गौतम गोत्रीय क्षत्रिय विष्णु भाई के पग चिन्हों का सामना करना पडेगा जैसा की उनके लिए कूट चक्र रचे थे आप लोग; और इससे भी आगे इस्लामिक, ईसाइयत समेत अन्य सभी पंथों और धर्मो को धारण कर सनातन धर्म में आओगे तो मुझ सनातन कश्यप(सर्व शक्तिशाली गोत्र जो महाविलायक है और हर किसी की हर तरह की परिक्षा लेने में पूर्ण समर्थ है:कश्यप/मारीच, गौतम, व्यास/वशिष्ठ, भारद्वाज/अांगिरास, जमदग्नि/भृगु, कृष्णात्रेय:दुर्वाशा/दत्तात्रेय/सोमात्रेय/अत्री, कौशिक=विश्वरथ=विषमित्र ही प्रिमिटिव या मूल सप्तर्षि है जिसमे कश्यप सबसे वरिष्ठ, सबसे समर्थ, और अबसे जेष्ठ होने के कारन ही महाविलायक गोत्र है +और आठवें कुम्भज:अगस्त्य ऋषी है जो मलय क्षेत्र मतलब आधुनिक आंशिक आंध्रा/तमिल/केरल क्षेत्र में सभी सातों सप्तर्षियों के अंश से जन्मे और अपना कार्यक्षेत्र बनाये ) ब्राह्मण के पग चिन्हों का सामना करना पडेगा जिस क्रूर कूट चक्र को मेरे लिए रचा गया था आप लोगों द्वारा। और वह क्रूर कूटचक्र उस समय आप का चला था जब मैं किसी लक्ष्य हेतु समर्पित भाव में था (कहा जाता है की जो नवनिर्माण, सृजन, संवर्धन, संरक्षण और सुरक्षा में होता है उसके लिए दो दूनी चार ही सत्य नहीं होता है और उसपर कोई यम-नियम बिना किसी दार्शनिक भाव और वस्तु स्थिति को समझे हुए लागू नहीं किया जा सकता पर आप दो दूनी चार का सत्य भी लागू किये जा रहे थे और यह उसी पर जिसकी ही सहन सीलता आप को सुरक्षित, सृजित, संरक्षित और संवर्धित किये जा रही थी) और अभीष्ठ विशेष लक्ष्य पूर्ती (11 सितम्बर, 2007) के बावजूद उसे खींचे चले जा रहे थे अभी 2016 अप्रैल तक दैत्यकुल के दबाव में अपने निहित स्वारथ्य हेतु उसे सार्वजनिक रूप से अमान्य करते हुए।>>>>>>>>>>> दया धर्म का मूल है और सत्य धर्म और दया दोनों का आधार है मतलब सत्य जाने बिना आप यदि दया भी करते है तो वह अधर्म भी हो सकता है यह आप को ज्ञान रहे और ये दोनों तथ्य उसी तरह सत्य हैं जैसे की गौतम और कश्यप अपने में सत्य हैं तो रास्ता यही है की जिसपर दया की जाय वह भी सत्य स्वीकार कम से कम करे और प्रायश्चित करे तो?>>>>>>>हाँ कश्यप गोत्र सराय है दुनिया के सभी जाती और धर्म के लोगों का जिनका की कोई गोत्र नहीं हैं और न उनको गोत्र ज्ञात है पर इसी कष्यप गोत्र में राम, कृष्ण और स सूर्य, चन्द्र, इंद्र, अरुण, वरुण, पवन, अग्नि, अंतरिक्ष देव, भूदेव और विश्वकर्मा समेत समस्त देवता जन्म लिए है मानव, दानव/दैत्य, किन्नर वंशी, गन्धर्व वंशी, नागवंशी पर इसके साथ सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भी जन्म लिए है जो धर्म की रक्षा हेतु सत्य की रक्षा को सर्वोपरि सिध्ध किया है मतलब धर्म का आधार ही सत्य है सत्य के बिना धर्म का अस्तित्व नहीं तो सबसे धर्म का पालन करवाना भी कश्यप का दायित्व है सबको आपने में शामिल कर महविलायक का खिताब अर्जित करने के पश्चात तो यह न समझिए की कश्यप अगर शरण देगा तो आप को धर्म/सत्य मानने से छूट मिल जाएगी या मार्ग त्यागने का प्रायश्चित नहीं करना पडेगा।>>>>>>>> दया धर्म का मूल है और सत्य धर्म और दया दोनों का आधार है मतलब सत्य जाने बिना आप यदि दया भी करते है तो वह अधर्म भी हो सकता है यह आप को ज्ञान रहे और ये दोनों तथ्य उसी तरह सत्य हैं जैसे की गौतम और कश्यप अपने में सत्य हैं तो रास्ता यही है की जिसपर दया की जाय वह भी सत्य स्वीकार कम से कम करे और प्रायश्चित करे तो?ता पर आप दो दूनी चार का सत्य भी लागू किये जा रहे थे और यह उसी पर जिसकी ही सहन सीलता आप को सुरक्षित, सृजित, संरक्षित और संवर्धित किये जा रही थी) और अभीष्ठ विशेष लक्ष्य पूर्ती (11 सितम्बर, 2007) के बावजूद उसे खींचे चले जा रहे थे अभी 11 अप्रैल, 2016 तक दैत्यकुल के दबाव में अपने निहित स्वारथ्य हेतु उसे सार्वजनिक रूप से अमान्य करते हुए।>>>>>>>>>>> दया धर्म का मूल है और सत्य धर्म और दया दोनों का आधार है मतलब सत्य जाने बिना आप यदि दया भी करते है तो वह अधर्म भी हो सकता है यह आप को ज्ञान रहे और ये दोनों तथ्य उसी तरह सत्य हैं जैसे की गौतम और कश्यप अपने में सत्य हैं तो रास्ता यही है की जिसपर दया की जाय वह भी सत्य स्वीकार कम से कम करे और प्रायश्चित करे तो?>>>>>>>हाँ कश्यप गोत्र सराय है दुनिया के सभी जाती और धर्म के लोगों का जिनका की कोई गोत्र नहीं हैं और न उनको गोत्र ज्ञात है पर इसी कष्यप गोत्र में राम, कृष्ण और स सूर्य, चन्द्र, इंद्र, अरुण, वरुण, पवन, अग्नि, अंतरिक्ष देव, भूदेव और विश्वकर्मा समेत समस्त देवता जन्म लिए है मानव, दानव/दैत्य, किन्नर वंशी, गन्धर्व वंशी, नागवंशी पर इसके साथ सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भी जन्म लिए है जो धर्म की रक्षा हेतु सत्य की रक्षा को सर्वोपरि सिध्ध किया है मतलब धर्म का आधार ही सत्य है सत्य के बिना धर्म का अस्तित्व नहीं तो सबसे धर्म का पालन करवाना भी कश्यप का दायित्व है सबको आपने में शामिल कर महविलायक का खिताब अर्जित करने के पश्चात तो यह न समझिए की कश्यप अगर शरण देगा तो आप को धर्म/सत्य मानने से छूट मिल जाएगी या मार्ग त्यागने का प्रायश्चित नहीं करना पडेगा।>>>>>>>> दया धर्म का मूल है और सत्य धर्म और दया दोनों का आधार है मतलब सत्य जाने बिना आप यदि दया भी करते है तो वह अधर्म भी हो सकता है यह आप को ज्ञान रहे और ये दोनों तथ्य उसी तरह सत्य हैं जैसे की गौतम और कश्यप अपने में सत्य हैं तो रास्ता यही है की जिसपर दया की जाय वह भी सत्य स्वीकार कम से कम करे और प्रायश्चित करे तो?

Thursday, April 14, 2016

हर बात के लिए मैं ही गलत तो सत्य सुन लिया जाय चाहे कोई भी साथ रहे या साथ छोड़ दे सत्य न पचा पाने के कारन:----लक्ष्मणपुर के बड़े भाई साहब अखिलेश भी सुन लें की लक्ष्मीशंकर मतलब लक्ष्मी के उद्भव/धारणकर्ता जिसका शाब्दिक अर्थ है श्रीधर जिसका मतलब है विष्णु और ये मेरे ननिहाल के अनुसार घरेलू सम्बन्ध में नाना लगते थे और भारतीय परिभाषा अनुसार एक दम गोरे चिट्टे थे, तो बिशुनपुर चौराहे पर इनकी उपस्थिति में ही दक्षिण भारत की तर्ज पर उनकी काली मूर्ती क्यों लगाई गयी थी? क्या सफेद की संगमरमर पत्थर की मूर्ती नहीं मिल रही थी या उसका इस संसार में अकाल पड गया था ? मेरे बड़े भैया आप लोग मेरे बिना चल नहीं पा रहे थे और उस पर भी कनिष्ठ बनाने वालों का सहयोग करते जा रहे हो? तो मेरा ऑब्जरवेशन की नारायणन जी के समय से ही आर-पार की लड़ाई लड़ी गयी है गोरे और काले की पूरे भारत से शुरुआत कर पूरे विश्व में तो कुछ गलत नहीं और गलत आदमी के मन में चोर छिपा होता है तो जो गोरे और काले मिश्रित परिवार रहे हो वे न प्रभावित हुए हो पर अन्य तो खूब प्रभावित हुए है इससे इंकार नहीं किया जा सकता पर क्या करें ये लोग ईस्वर से ही हार गए जब इनके घर में भी गौरी और गौरी संकर जन्म ले लिए अपने घर के लिए चक्र-कुचक्र से छली और चोरी की हुई गौरी लोगों से ?

हर बात के लिए मैं ही गलत तो सत्य सुन लिया जाय चाहे कोई भी साथ रहे या साथ छोड़ दे सत्य न पचा पाने के कारन:----लक्ष्मणपुर के बड़े भाई साहब अखिलेश भी सुन लें की लक्ष्मीशंकर मतलब लक्ष्मी के उद्भव/धारणकर्ता जिसका शाब्दिक अर्थ है श्रीधर जिसका मतलब है विष्णु और ये मेरे ननिहाल के अनुसार घरेलू सम्बन्ध में नाना लगते थे और भारतीय परिभाषा अनुसार एक दम गोरे चिट्टे थे, तो बिशुनपुर चौराहे पर इनकी उपस्थिति में ही दक्षिण भारत की तर्ज पर उनकी काली मूर्ती क्यों लगाई गयी थी? क्या सफेद की संगमरमर पत्थर की मूर्ती नहीं मिल रही थी या उसका इस संसार में अकाल पड गया था ? मेरे बड़े भैया आप लोग मेरे बिना चल नहीं पा रहे थे और उस पर भी कनिष्ठ बनाने वालों का सहयोग करते जा रहे हो? तो मेरा ऑब्जरवेशन की नारायणन जी के समय से ही आर-पार की लड़ाई लड़ी गयी है गोरे और काले की पूरे भारत से शुरुआत कर पूरे विश्व में तो कुछ गलत नहीं और गलत आदमी के मन में चोर छिपा होता है तो जो गोरे और काले मिश्रित परिवार रहे हो वे न प्रभावित हुए हो पर अन्य तो खूब प्रभावित हुए है इससे इंकार नहीं किया जा सकता पर क्या करें ये लोग ईस्वर से ही हार गए जब इनके घर में भी गौरी और गौरी संकर जन्म ले लिए अपने घर के लिए चक्र-कुचक्र से छली और चोरी की हुई गौरी लोगों से ?

एक सरसरी निगाह में राधाकांत=राधेकृष्ण=राधेमोहन=राधेश्याम= कृष्ण और रामजानकी=सीताराम= रामा=राम में कोई अंतर नहीं पर जब लोक मर्यादा के आधार पर सर्वमान्य आदर्श जीवन की बात आती है तो उस समय मेरे जैसे व्यक्ति को 11 सितंबर, 2007 (सिद्धांततः लक्ष्य पूर्ती हो चुका) से 11 अप्रैल, 2016 तक का समय लग गया और रामजानकी=सीताराम= रामा=राम के स्थान को यह मानव समाज खाली पा रहा था इसी को भांपते हुए ( काशी हिन्दू विश्विद्यालय में फरवरी माह के प्रथम शनिवार (4/5), 2012 को विरला विश्वनाथ मंदिर के सामने बिहारी की चाय की दूकान के सामने चाय पीते वाक्य (लगभग एक सप्ताह पूर्व मेरा परीक्षण भी हुआ था) को भाई डॉ अखिलेश सिंह की उपस्थिति में डॉ विनय शंकर पांडेय भाई (जो कोरिया से अपने घर काशी उसी समय आये थे और मुजहसे मिलने काशी हिन्दू विश्विद्यालय आये थे) से कहा था की सब लोग कृष्ण बनते हुए चले जा रहे हो वर्तमान पीढ़ी को कोई विश्व्यापक श्रीराम =राम नहीं दे पा रहे हो ((वैसे आने वाले समय के लिए तो श्रीराम=राम=विष्णुकांत: विष्णुस्वामी:ब्रह्म:परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश) तो मेरे पुत्र के रूप में 30-09-2010 को सुरक्षित हो चुके है)), ऐसे में कृष्ण के कार्यभार से मुक्त हुआ श्रीकृष्णजन्मास्टमी, बुधवार, 28-08, 2013 को कृष्ण्कांत को जन्म दे और तब से मैं सतत प्रयास करते हुए और अपने से जुड़े बहुत कुछ का त्याग, बलिदान करते हुए 11 अप्रैल, 2016 तक की सर्वमान्य अवस्था तक पहुंचा जब 11 सितंबर, 2007 (सिद्धांततः लक्ष्य पूर्ती हो चुका) को ही हुए मेरे कार्य पूर्ती को भौतिक रूप से सामाजिक मान्यता और आदर्श अनुसार सत्य समझा गया।

मित्रो हिंदी व्याकरण और शास्त्र निति के अनुसार पुष्प का मतलब फूल होता है वह नर हो या मादा पुष्प केवल से ही नर और मादा दोनों फूलों का बोध हो जता है पर यदि पुष्पा कहा गया तो शास्त्र निति के अनुसार निश्चित ही उस देवी के मान का मतलब पुष्प पर आशीन देवीयों से ही होता है मतलब जितनी देवियाँ पुष्प=फूल को अपना आसन बनाये हुए मान्य हैं इस जगत में वे सभी देवियाँ एक साथ:-जिसमे 1) सरस्वती, 2) लक्ष्मी, 3)  नौ दुर्गा का नावां रूप सिध्ध्दात्री जो अपने साथ अन्य सभी अष्ट दुर्गा स्वरुप का फल देने की शक्ति हांसिल है और  4 ) पांच गायत्री देवियों का स्वरुप मतलब जिन पांच देवियो को सूर्य की पत्नी:सूर्य की शक्ति कहा गया है और पञ्च गायत्री मतलब पञ्च सविता नाम दिया गया है।  यहाँ आप पाएंगे की सभी मूलतः तीन देवियाँ सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती सभी एक साथ एक शक्ति जिनको ब्रह्म शक्ति कह सकते है ब्रह्म(ब्रह्म+विष्णु+महेश)/परमब्रह्म को जगत नियन्ता मानने वाले; और प्राकृतिक धर्म में सूर्य को सर्वशक्तिमान स्रोत मानने वालों के लिए (सूर्य को जगत नियन्ता शक्ति का स्रोत मानने वालों के लिए) सूर्य की शक्ति श्रोत पञ्च गायत्री/सविता अपने आप एक ही नाम में  समाहित हो एक साथ दोनों मतावलम्बियों हेतु पूर्ण शक्ति स्रोत का द्योतक नाम अपने में ही बना देता है।  वैसे मेरे स्वयं के अनुसार ब्रह्म सर्वशक्तिमान है क्योंकि सूर्य स्वामी=सूर्यनाथ= आदित्यनाथ स्वयं प्रदीप हैं जो स्वान्तः सर्वोच्च शक्तिस्रोत है और ऐसे जगत नियन्ता को हम रामजानकी=सीताराम=रामा==राधाकांत=राधेकृष्ण कहते है और विष्णु का वह स्वरुप श्रीकांत=श्रीधर=श्रीप्रकाश=रमाकांत= रमानाथ=लक्ष्मीनारायण=लक्ष्मीकांत है जिसमे स्त्रीजगत को आधार बना हम उस पुरुषजगत को परिभाषित करते है और संयोग स्थिति का बोध होता है। मित्रों शिव का भी वह नामपुंज है गिरिजाशंकर=गौरीशंकर=उमाशंकर जिसमे स्त्रीजगत को आधार बना हम उस पुरुषजगत को परिभाषित करते है। मतलब वैसे तो कोई एक त्रिदेव अपने में अधूरा ब्रह्म है पर संयोग की स्थिति में वह पूर्ण ब्रह्म स्वयं हो जाता है उसके लिए ब्रह्मा+विष्णु+महेश संयोग की जरूरत नहीं। तो फिर ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशीराज दक्षप्रजापति के विश्व्विदित/सर्वव्यापक होते हुए भी  इनकी संयोग स्थिति क्यों जरूरी नहीं समझी गयी और दोनों के कई प्रचलित नाम क्यों नहीं दिए गए जिस संयोग स्थिति से पूर्ण ब्रह्म का ज्ञान होता जो सूर्य को बौना बना देता? शायद इस पर और कुछ समझने की जरूरत तब नहीं होगी जब त्रिदेवियों में आदिदेवी मतलब आद्या सरस्वती देवी की महिमा को लोग पूर्ण रूप में लोग समझ सकेंगे जिनके आधार पर त्रिदेवों में सबसे छोटे ब्रह्मा संयोग की स्थिति में त्रिदेवो में आद्या=आदि त्रिदेव=आद्याशंकर की संयोग स्थिति से किसी माने में कम नहीं पाये जाए है जहां की ये दोनों लोग त्रिदेवो और त्रिदेवियों में मध्य लक्ष्मी और विष्णु  के  संयोग स्थिति के समक्ष हो जाते है (सरस्वती की नातिनी थीं सती:उमा:अपर्णा:गौरी:गिरिजा:गायत्री और त्रिदेवों में आदिदेव होने के बावजूद शंकर जी का विवाह सबसे अंत में हुआ था। अतः त्रिदेवो में आदि देव शिव सामान्य अर्थों में त्रिदेवों में जेष्ठ और वरिष्ठ है पर तीनों की संयोग स्थिति में सभी आपस में समतुल्य है)।>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> एक सरसरी निगाह में राधाकांत=राधेकृष्ण=राधेमोहन=राधेश्याम= कृष्ण और रामजानकी=सीताराम= रामा=राम में कोई अंतर नहीं पर जब लोक मर्यादा के आधार पर सर्वमान्य आदर्श जीवन की बात आती है तो उस समय मेरे जैसे व्यक्ति को 11 सितंबर, 2007 (सिद्धांततः लक्ष्य पूर्ती हो चुका) से 11 अप्रैल, 2016 तक का समय लग गया और रामजानकी=सीताराम= रामा=राम के स्थान को यह मानव समाज खाली पा रहा था इसी को भांपते हुए ( काशी हिन्दू विश्विद्यालय में फरवरी माह के प्रथम शनिवार (4/5), 2012 को विरला विश्वनाथ मंदिर के सामने बिहारी की चाय की दूकान के सामने चाय पीते वाक्य (लगभग एक सप्ताह पूर्व मेरा परीक्षण भी हुआ था) को भाई डॉ अखिलेश सिंह की उपस्थिति में डॉ विनय शंकर पांडेय भाई (जो कोरिया से अपने घर काशी उसी समय आये थे और मुजहसे मिलने काशी हिन्दू विश्विद्यालय आये थे) से कहा था की सब लोग कृष्ण बनते हुए चले जा रहे हो वर्तमान पीढ़ी को कोई विश्व्यापक श्रीराम =राम नहीं दे पा रहे हो ((वैसे आने वाले समय के लिए तो श्रीराम=राम=विष्णुकांत: विष्णुस्वामी:ब्रह्म:परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश) तो मेरे पुत्र के रूप में 30-09-2010 को सुरक्षित हो चुके है)), ऐसे में कृष्ण के कार्यभार से मुक्त हुआ श्रीकृष्णजन्मास्टमी, बुधवार, 28-08, 2013 को कृष्ण्कांत को जन्म दे और तब से मैं सतत प्रयास करते हुए और अपने से जुड़े बहुत कुछ का त्याग, बलिदान करते हुए 11 अप्रैल, 2016 तक की सर्वमान्य अवस्था तक पहुंचा जब 11 सितंबर, 2007 (सिद्धांततः लक्ष्य पूर्ती हो चुका) को ही हुए मेरे कार्य पूर्ती को भौतिक रूप से सामाजिक मान्यता और आदर्श अनुसार सत्य समझा गया।>>>>>>>>>>>>>>>>>>>| 

Wednesday, April 13, 2016

Being a perfect Brahmin/Perfect Sanatan Hindu, I remained Brahmina, Kshatriya, Vaishya, Islamic and Christian. Is it not possible? I answer that it possible when your aim is to conserved the humanity i.e. the conservation of humanity is your relgion/Dharm and you give the proper respect to the all form of religion/way of life by work and also by climatic conditional too. But in all respect you find that the Sanatan Hindu Dharm played the role of Lord Shiva means gives base to each and every religion/way of life by work and also by climatic conditional too. And if it is so, then Sanatan Saptarshi=Seven Primitive Rishis (Kashyap/Marich, Gautam, Vyash/Vashishtha, Bhrigu, Angiras/Bharadwaj, Atri/Krishnatrey:Durvasha /Dattatrey/Samatrey, Kaushik/Vishvarath/Vishvamitra) Brahmin are the source of Agustya:Kumbhaj Rishi Brahmin, who came in existence at Malay region now known as Tamil/Keral and formed the Ashtak Rishi Brahmin culture. Thus how this humanity will work now, will not be only based on the benefit of Kumbhaj:Agastya Rishi but will be based in the benefit of Saptarshi:Seven primitive Rishi who originated at Prayagraj (all the Saptarshi originated from the ancient Yagya:Prak Yagya organised by/called by Lord Brahma and performed by Lord Shiva and Lord Vishnu) . Also now in Prayagraj the way of human life and functioning of humanity will not be decided only on the benefit of the Bharadwaj/Angiraas but on the benefit of all seven primitive Rishis=Saptarshi. Because the mots bad situation/condition of humanity came due to over loaded burden and pressure on the Bharadwaj/Angiraas which was not shared by him to others being a confidential according to him, while these were/are in the Public Interest.

Being a perfect Brahmin/Perfect Sanatan Hindu, I remained Brahmina, Kshatriya, Vaishya, Islamic and Christian. Is it not possible? I answer that it possible when your aim is to conserved the humanity i.e. the conservation of humanity is your relgion/Dharm and you give the proper respect to the all form of religion/way of life by work and also by climatic conditional too. But in all respect you find that the Sanatan Hindu Dharm played the role of Lord Shiva means gives base to each and every religion/way of life by work and also by climatic conditional too. And if it is so, then Sanatan Saptarshi=Seven Primitive Rishis (Kashyap/Marich, Gautam, Vyash/Vashishtha, Bhrigu, Angiras/Bharadwaj, Atri/Krishnatrey:Durvasha /Dattatrey/Samatrey, Kaushik/Vishvarath/Vishvamitra) Brahmin are the source of Agustya:Kumbhaj Rishi Brahmin, who came in existence at Malay region now known as Tamil/Keral and formed the Ashtak Rishi Brahmin culture. Thus how this humanity will work now, will not be only based on the benefit of Kumbhaj:Agastya Rishi but will be based in the benefit of Saptarshi:Seven primitive Rishi who originated at Prayagraj (all the Saptarshi originated from the ancient Yagya:Prak Yagya organised by/called by Lord Brahma and performed by Lord Shiva and Lord Vishnu) . Also now in Prayagraj the way of human life and functioning of humanity will not be decided only on the benefit of the Bharadwaj/Angiraas but on the benefit of all seven primitive Rishis=Saptarshi. Because the mots bad situation/condition of humanity came due to over loaded burden and pressure on the Bharadwaj/Angiraas which was not shared by him to others being a confidential according to him, while these were/are in the Public Interest.

*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण। मेरा तो केवल इतना कहना था की:---मनु या आदम मतलब कश्यप ऋषी मतलब कम से कम सामाजिक जीवन में दशरथ और वशुदेव होता है। हिन्दू जिनको मनु (से मानव का आविर्भाव मानते हैं जिसमे मानवता हो न की राक्षसपना| तो शूद्र कम से कम अमानवीय नहीं माना जा सकता मतलब उसमे सभ्य समाज से थोड़ा कम मानवता हो ऐसे को आंकते हैं) कहते हैं>>>>>>>>>>> तो प्रकृति आधारित धर्म वाले इस्लाम और ईसाइयत उनको आदम (से आदमी का आविर्भाव मानते हैं जिसमे इंसानियत हो न की दरिंदा| तो शूद्र कम से कम दरिंदा नहीं माना जा सकता मतलब उसमे सभ्य समाज से थोड़ा कम की इंसानियत हो ऐसे को आंकते हैं) कहते हैं।>>>>>>तो जो नाम से वशुदेव पुत्र कृष्ण या दशरथ पुत्र राम हो या उनके समान नाम अर्थी हो उसको आप मनु स्मृति जलाते हुए या जलवाते हुए या जलाने और जलवाने का षड्यंत्र रचते और रचाते हुए पाएं तो क्या सोचेंगे और क्या कहेंगे?>>>>>>इस्लामियत और ईसाइयत के आदम:प्रथम आदमी और सनातन हिन्दू धर्म के मनु:प्रथम मानव जब कश्यप ऋषि ही थे मतलब दशरथ और वशुदेव ही थे तो मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किये हुए 5 प्रमुख तथ्य पूर्णतः सत्य हैं (इस्लाम राम के सामानांतर जरूर चलता पर राम का दुश्मन नहीं और ईसाइयत कृष्ण के सामानांतर जरूर चलता है पर वह कृष्ण का दुश्मन नहीं क्योंकि दोनों नहीं चाहते हैं की रामकृष्ण का अंत हो बल्कि वे इन्हे अपना आधार मानते हैं) १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है| 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।

*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण। मेरा तो केवल इतना कहना था की:---मनु या आदम मतलब कश्यप ऋषी मतलब कम से कम सामाजिक जीवन में दशरथ और वशुदेव होता है। हिन्दू जिनको मनु (से मानव का आविर्भाव मानते हैं जिसमे मानवता हो न की राक्षसपना| तो शूद्र कम से कम अमानवीय नहीं माना जा सकता मतलब उसमे सभ्य समाज से थोड़ा कम मानवता हो ऐसे को आंकते हैं) कहते हैं>>>>>>>>>>> तो प्रकृति आधारित धर्म वाले इस्लाम और ईसाइयत उनको आदम (से आदमी का आविर्भाव मानते हैं जिसमे इंसानियत हो न की दरिंदा| तो शूद्र कम से कम दरिंदा नहीं माना जा सकता मतलब उसमे सभ्य समाज से थोड़ा कम की इंसानियत हो ऐसे को आंकते हैं) कहते हैं।>>>>>>तो जो नाम से वशुदेव पुत्र कृष्ण या दशरथ पुत्र राम हो या उनके समान नाम अर्थी हो उसको आप मनु स्मृति जलाते हुए या जलवाते हुए या जलाने और जलवाने का षड्यंत्र रचते और रचाते हुए पाएं तो क्या सोचेंगे और क्या कहेंगे?>>>>>>इस्लामियत और ईसाइयत के आदम:प्रथम आदमी और सनातन हिन्दू धर्म के मनु:प्रथम मानव जब कश्यप ऋषि ही थे मतलब दशरथ और वशुदेव ही थे तो मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किये हुए 5 प्रमुख तथ्य पूर्णतः सत्य हैं (इस्लाम राम के सामानांतर जरूर चलता पर राम का दुश्मन नहीं और ईसाइयत कृष्ण के सामानांतर जरूर चलता है पर वह कृष्ण का दुश्मन नहीं क्योंकि दोनों नहीं चाहते हैं की रामकृष्ण का अंत हो बल्कि वे इन्हे अपना आधार मानते हैं) १)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत| २) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है| 3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)। 4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गौरी पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences. 5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज(श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।