Google+ Followers

Thursday, June 30, 2016

रूप/रंग(आकर्षक या विभत्स्य)/नेत्र सुख, रस(मीठा, कड़वा और खट्टा)/जिह्वा सुख, स्पर्श (सुमधुर या कष्टकारी)/स्पर्शेन्द्रिय सुख, गंध(सुगंध या दुर्गन्ध)/नासिका सुख, स्वर (मधुर या कर्कस वाणी)/कर्ण सुख किस मानव को प्रभावित नहीं करते पर जो इस सब के प्रभाव के बावजूद संतुलन स्थापित कर सामान्य जीवन जी सकता है वह व्यक्ति या समाज या समष्टि ईष्वरीय गुण को धारण करता हो वह अक्षुण्य रहता है और अगर असंतुलन हुआ तो वह व्यक्ति या समाज या समष्टि अवनति को प्राप्त होता है। श्रीमद्भागवत गीता द्वारा महर्षि वेदव्यास स्रोत योगयोगेस्वर श्रीकृष्ण।*******Jai Hind (Jamboo Dweep:Euresia =Europe+Asia or at least Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari), Jai Bharat(Bharatkhand= Akhand Bharat), Jai Sriram/Krishna|

रूप/रंग(आकर्षक या विभत्स्य)/नेत्र सुख, रस(मीठा, कड़वा और खट्टा)/जिह्वा सुख, स्पर्श (सुमधुर या कष्टकारी)/स्पर्शेन्द्रिय सुख, गंध(सुगंध या दुर्गन्ध)/नासिका सुख, स्वर (मधुर या कर्कस वाणी)/कर्ण सुख किस मानव को प्रभावित नहीं करते पर जो इस सब के प्रभाव के बावजूद संतुलन स्थापित कर सामान्य जीवन जी सकता है वह व्यक्ति या समाज या समष्टि ईष्वरीय गुण को धारण करता हो वह अक्षुण्य रहता है और अगर असंतुलन हुआ तो वह व्यक्ति या समाज या समष्टि अवनति को प्राप्त होता है। श्रीमद्भागवत गीता द्वारा महर्षि वेदव्यास स्रोत योगयोगेस्वर श्रीकृष्ण।*******Jai Hind (Jamboo Dweep:Euresia =Europe+Asia or at least Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari), Jai Bharat(Bharatkhand= Akhand Bharat), Jai Sriram/Krishna|

Vivek Kumar Pandey

(#1) (अंत:करण- 4 ) मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार; (#2) (ज्ञानेन्द्रियाँ- 5) नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण; (#3) (तन्मात्रायें- 5) गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द; (#4) (कर्मेन्द्रियाँ -5) पाद, हस्त, उपस्थ (nursing), पायु (मलद्वार|गुदा), वाक् (बोलने कि प्रक्रिया); (#5) ( महाभूत- 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश| इन 24 तत्वों से आत्मा-शरीर-समाज प्रभावित होता है और आत्मा-शरीर-समाज से इस्वर प्रभावित होता है| अतः इन सभी २४ तत्वों में संतुलन अति आवश्यक है शरीर, समाज, आत्मा और इस्वर को शांति और संतुलन में रखने के लिए| श्रीमद्भागवत गीता द्वारा महर्षि वेदव्यास स्रोत योगयोगेस्वर श्रीकृष्ण| *******Jai Hind (Jamboo Dweep:Euresia=Europe+Asia or at least Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari), Jai Bharat(Bharatkhand=Akhand Bharat), Jai Sri Ram/Krishna|

(#1) (अंत:करण- 4 ) मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार; (#2) (ज्ञानेन्द्रियाँ- 5) नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण; (#3) (तन्मात्रायें- 5) गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द; (#4) (कर्मेन्द्रियाँ -5) पाद, हस्त, उपस्थ (nursing), पायु (मलद्वार|गुदा), वाक् (बोलने कि प्रक्रिया); (#5) ( महाभूत- 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश| इन 24 तत्वों से आत्मा-शरीर-समाज प्रभावित होता है और आत्मा-शरीर-समाज से इस्वर प्रभावित होता है| अतः इन सभी २४ तत्वों में संतुलन अति आवश्यक है शरीर, समाज, आत्मा और इस्वर को शांति और संतुलन में रखने के लिए| श्रीमद्भागवत गीता द्वारा महर्षि वेदव्यास स्रोत योगयोगेस्वर श्रीकृष्ण| *******Jai Hind (Jamboo Dweep:Euresia=Europe+Asia or at least Iran to Singapur and Kashmir to Kanyakumari), Jai Bharat(Bharatkhand=Akhand Bharat), Jai Sri Ram/Krishna|

Wednesday, June 29, 2016

समाज के सञ्चालन मतलब राजनैतिक रूप से मानव समाज संचालन से बहुत ही कठिन है मानवजीवन के अस्तित्व का संचालन>>>>>>>मैं इसी लिए हर क्षेत्र में संख्याबलवाद/संख्यातन्त्रवाद/भींडतन्त्रवाद का पक्षधर नहीं और न चाहता हूँ की कोई लोकत्रंत्र/प्रजातंत्र इसका पक्षधर हो पर हाँ मौलिक मानवाधिकार संरक्षण हर हाल से जरूरी किया जा सकता है : >>>>>>व्यवहारिकता में हम एक दूसरे को पूर्ण रूप से भले न समझपाते हो पर एक और आधे (डेढ़) दसक पूर्व एक ऐसा समय जरूर गुजरा है जब हर मानवता प्रेमी चाहे किसी भी जाति/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलम्बी से रहा हो उसका केवल एकमेव उद्देश्य था की किसी भी प्रकार जो लोग इस संसार को चलाने में अपने को असमर्थ पा इसके विनाश को ही एक मात्र मानवता कल्याण मान रहे हैं उनके हाँथ से मानवता का नियंत्रण अपने हाँथ ले उसको संरक्षित, संवर्धित और अबाधगति से उसका सञ्चालन जारी रखा जाय। ऐसी स्थिति में कोई यह नहीं देखता या देख सकता की केवल मेरी जाति/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलम्बी ही संरक्षित रहें वरन उदेश्य केवल यह रहता है की ब्रह्मा का वरदान यह श्रिष्टि चलती रहे कोई भी तो संरक्षित रहे? तो मानवता के संचालन और राजनैतिक रूप से मानव समाज संचालन दोनों में जो रह चुका हो उसकी परिक्षा तो केवल वही ले सकता है जो दोनों में शामिल रहा हो तो फिर उसकी परिक्षा किसी एक अवस्था में जीवन जी सकने वाले से लिए जाने का व्यर्थ प्रयास क्यों किया जा रहा है लोगों द्वारा?>>>>>>>मैं इसी लिए हर क्षेत्र में संख्याबलवाद/संख्यातन्त्रवाद/भींडतन्त्रवाद का पक्षधर नहीं और न चाहता हूँ की कोई लोकत्रंत्र/प्रजातंत्र इसका पक्षधर हो पर हाँ मौलिक मानवाधिकार संरक्षण हर हाल से जरूरी किया जा सकता है।

समाज के सञ्चालन मतलब राजनैतिक रूप से मानव समाज संचालन से बहुत ही कठिन है मानवजीवन के अस्तित्व का संचालन>>>>>>>मैं इसी लिए हर क्षेत्र में संख्याबलवाद/संख्यातन्त्रवाद/भींडतन्त्रवाद का पक्षधर नहीं और न चाहता हूँ की कोई लोकत्रंत्र/प्रजातंत्र इसका पक्षधर हो पर हाँ मौलिक मानवाधिकार संरक्षण हर हाल से जरूरी किया जा सकता है : >>>>>>व्यवहारिकता में हम एक दूसरे को पूर्ण रूप से भले न समझपाते हो पर एक और आधे  (डेढ़) दसक   पूर्व एक ऐसा समय जरूर गुजरा है जब हर मानवता प्रेमी चाहे किसी भी जाति/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलम्बी से रहा हो उसका केवल एकमेव उद्देश्य था की किसी भी प्रकार जो लोग इस संसार को चलाने में अपने को असमर्थ पा इसके विनाश को ही एक मात्र मानवता कल्याण मान रहे हैं उनके हाँथ से मानवता का नियंत्रण अपने हाँथ ले उसको संरक्षित, संवर्धित और अबाधगति से उसका सञ्चालन जारी रखा जाय। ऐसी स्थिति में कोई यह नहीं देखता या देख सकता की केवल मेरी जाति/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलम्बी ही संरक्षित रहें वरन उदेश्य केवल यह रहता है की ब्रह्मा का वरदान यह श्रिष्टि चलती रहे कोई भी तो संरक्षित रहे? तो मानवता के संचालन और राजनैतिक रूप से मानव समाज संचालन दोनों में जो रह चुका हो उसकी परिक्षा तो केवल वही ले सकता है जो दोनों में शामिल रहा हो तो फिर उसकी परिक्षा किसी एक अवस्था में जीवन जी सकने वाले से लिए जाने का व्यर्थ प्रयास क्यों किया जा रहा है लोगों द्वारा?>>>>>>>मैं इसी लिए हर क्षेत्र में संख्याबलवाद/संख्यातन्त्रवाद/भींडतन्त्रवाद का पक्षधर नहीं और न चाहता हूँ की कोई लोकत्रंत्र/प्रजातंत्र इसका पक्षधर हो पर हाँ मौलिक मानवाधिकार संरक्षण हर हाल से जरूरी किया जा सकता है। 

जिसने अतीव समुचित समय पर इसी प्रयागराज में अपने को अवस्थित कर इस विश्व समाज को अपने त्याग, बलिदान, तप:योग:उद्यम से विश्व महाविनाश की भावी परिस्थितियों से संरक्षित किया हो, समय के साथ संक्रमण काल तक संवर्धित भी किया हो और इसके साथ ही साथ अबाधगति से सुसंचालित भी किया हो तो अगर आम विश्व मानव समाज और प्रयागराज विश्विद्यालय/ प्रयागराज वाले उसको नहीं पहचान सके और उसकी प्रतिभा और मेधा को नहीं पढ़ सके तो फिर आम मानव जीवन में ऐसे असंख्य अतीव मानवीय गुण से सुसज्जित सज्जन लोग गुजर जाते होंगे उनको कौन समझेगा और पहचानेगा?

जिसने अतीव समुचित समय पर इसी प्रयागराज में अपने को अवस्थित कर इस विश्व समाज को अपने त्याग, बलिदान, तप:योग:उद्यम से विश्व महाविनाश की भावी परिस्थितियों से संरक्षित किया हो, समय के साथ संक्रमण काल तक संवर्धित भी किया हो और इसके साथ ही साथ अबाधगति से सुसंचालित भी किया हो तो अगर आम विश्व मानव समाज और प्रयागराज विश्विद्यालय/ प्रयागराज वाले उसको नहीं पहचान सके और उसकी प्रतिभा और मेधा को नहीं पढ़ सके तो फिर आम मानव जीवन में ऐसे असंख्य अतीव मानवीय गुण से सुसज्जित सज्जन लोग गुजर जाते होंगे उनको कौन समझेगा और पहचानेगा?

जिस लोकतंत्र/प्रजातंत्र का मतलब केवल संख्यातंत्रवादी/भींडतंत्रवादी/संख्याबलवादी केवल होता है वह पूर्णसत्य तो क्या व्यवहारिक सत्य से कोसों दूर या असत्य का पोषक होता है वह लोकतंत्र/प्रजातंत्र तीव्रगति से क्षीण हो अपने विनाश को प्राप्त होता है। मैं लोकतंत्र/प्रजातंत्र को सैद्धांतिक रूप से जरूर मानता हूँ पर अगर यह संख्यातंत्रवादी/भींडतंत्रवादी/संख्याबलवादी हो जाय तो उससे व्यवहारिक और वैचारिक दूरी बना सत्यमेव जयते का पक्षधर हो अपनी शक्ति संवर्धन, संरक्षण और संचय में लीन हो जाता हूँ और उस संख्यातंत्रवादी/भींडतंत्रवादी/संख्याबलवादी समाज से संघर्ष कर उसे सदमार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करता हूँ जिससे की उसे सत्यम शिवम् सुंदरम से होते हुए "सत्यमेव जयते" के उद्देश तक पंहुचाया जा सके।

जिस लोकतंत्र/प्रजातंत्र का मतलब केवल संख्यातंत्रवादी/भींडतंत्रवादी/संख्याबलवादी केवल होता है वह पूर्णसत्य तो क्या व्यवहारिक सत्य से कोसों दूर या असत्य का पोषक होता है वह लोकतंत्र/प्रजातंत्र तीव्रगति से क्षीण हो अपने विनाश को प्राप्त होता है। मैं लोकतंत्र/प्रजातंत्र को सैद्धांतिक रूप से जरूर मानता हूँ पर अगर यह संख्यातंत्रवादी/भींडतंत्रवादी/संख्याबलवादी हो जाय तो उससे व्यवहारिक और वैचारिक दूरी बना सत्यमेव जयते का पक्षधर हो अपनी शक्ति संवर्धन, संरक्षण और संचय में लीन हो जाता हूँ और उस संख्यातंत्रवादी/भींडतंत्रवादी/संख्याबलवादी समाज से संघर्ष कर उसे सदमार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करता हूँ जिससे की उसे सत्यम शिवम् सुंदरम से होते हुए "सत्यमेव जयते" के उद्देश तक पंहुचाया जा सके।

राजनीति सत्य को प्राप्त करने की होनी चाहिए न की सत्य के अस्तित्व को समाप्त करने हेतु राजनीती हो। क्योंकि सत्य को राजनीती या किसी विधि से समाप्त नहीं किया जा सकता है, तो जो लोग सत्य के विपरीत या सत्य को पराजित करने की राजनीती कर रहे हैं वे अपना समय व्यर्थ में ही गँवा रहे है और उनको असफलता ही हाँथ लगेगी। सनातन हिन्दू धर्म के सभी 24 मानक ऋषियों वाला धर्म चक्र=अशोकचक्र=समयचक्र=कालचक्र जिसकी रक्षा स्वयं महादेव शिव शंकर करते हैं और जिसके धारणकर्ता स्वयंसच्चिदानंदघन विष्णु(श्रीधर=श्रीकांत) हैं और जिसके विधिवेत्ता स्वयं ज्ञानियों में अग्रगणीय ब्रह्मा हो तो उसे धारण किये हुए तिरंगे (त्रिदेव सम्मिलित शक्ति त्याग:सत्यनिष्ठा:संयम; शौर्य:बलिदान; तप:योग:उद्यम के सम्मिलत गुण के माध्यम से परम ऊर्जा स्रोत परमब्रह्म परमेश्वर के अस्तित्व का बोध कराता हो) की रक्षा करना और उसकी छाया तले जीवन व्यतीत करना; और सनातन हिन्दू संस्कृति का प्रतीक सनातन धर्म ध्वजा जो सूर्य की सतरंगी प्रकाश की अरुणिमामय ज्योति के माध्यम से सम्पूर्ण ब्रह्मण्डों को नियंत्रित करने की परम ऊर्जा स्रोत परमब्रह्म परमेश्वर के अस्तित्व का बोध कराता हो उस भगवा(डॉन=अरुणोदय ज्योति पुंज प्रतीक) की भी रक्षा और उसकी छाया अंतर्गत जीवन मेरा परमध्येय है। इस प्रकार ऐसे दोनों आयामों तिरंगा और भगवा(डॉन=अरुणोदय ज्योति पुंज प्रतीक) के प्रति सम्मान और आस्था और तद हेतु तन, मन, धन, जीवन और मान, स्वाभिमान और समय का भी समर्पण मेरा सर्वोच्च ध्येय है। ऐसे किसी संस्था/संगठन/मानवीय जीवन सम्बंधित किसी भी छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी इकाई के किसी समूह विशेष के नीचे से लेकर उच्चस्थ पद पर आसीन व्यक्ति या व्यक्ति समूह को कोई राजनीती सूझ रही हो तो वे कम से कम तिरंगा और भगवा को अपना ध्वज मानना छोड़ दे और तब पाएंगे की मेरी छाया भी वहां नहीं जाएगी मेरा जाना या जुड़े रहना बड़े दूर की बात है तो तिरंगा और भगवा(डॉन=अरुणोदय ज्योति पुंज प्रतीक) के प्रति सम्मान और आस्था और तद हेतु तन, मन, धन, जीवन और मान, स्वाभिमान और समय का भी समर्पण मेरा जो हो रहा वह किसी व्यक्ति विशेष के कारन नहीं हो रहा है वरन उस तिरंगे और भगवा धारणकर्ता का भाव मुझे उस संस्था/संगठन/मानवीय जीवन सम्बंधित किसी भी छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी इकाई और उससे जुड़े व्यक्तियों से जोड़ रहा है| इन दोनों की उपस्थित जिस दिन से वहां नहीं रही उनका कोई आदेश और नियम तभी मुझे मान्य होगा जब वह सत्य की कसौटी पर मेरे अनुसार खरा उतरेगा लेकिन तिरंगा और भगवा के अधीन अगर कुछ हो रहा है तो आशा यही रहती है की हर परिश्थिति का सकारात्मक असर भविष्य के जीवन पर होगा ही और वे लोग जो किसी भी प्रकार की राजनीती जारी किये हुए हैं उनको परम सत्य का दर्शन और साक्षात्कार अवश्यम्भावी होगा ही होगा और उनकी अवधारणा त्रुटि विहीन और वास्तविक समतामूलक बनेगी जिसके कर्मठ और संयमी व्यक्तित्व को भी समुचित महत्त्व मिल सके न की संख्याबल और मत्स्य न्याययुक्त समता उनकी जारी रह पाये।

राजनीति सत्य को प्राप्त करने की होनी चाहिए न की सत्य के अस्तित्व को समाप्त करने हेतु राजनीती हो। क्योंकि सत्य को राजनीती या किसी विधि से समाप्त नहीं किया जा सकता है, तो जो लोग सत्य के विपरीत या सत्य को पराजित करने की राजनीती कर रहे हैं वे अपना समय व्यर्थ में ही गँवा रहे है और उनको असफलता ही हाँथ लगेगी। सनातन हिन्दू धर्म के सभी 24 मानक ऋषियों वाला धर्म चक्र=अशोकचक्र=समयचक्र=कालचक्र जिसकी रक्षा स्वयं महादेव शिव शंकर करते हैं और जिसके धारणकर्ता स्वयंसच्चिदानंदघन विष्णु(श्रीधर=श्रीकांत) हैं और जिसके विधिवेत्ता स्वयं ज्ञानियों में अग्रगणीय ब्रह्मा हो तो उसे धारण किये हुए तिरंगे (त्रिदेव सम्मिलित शक्ति त्याग:सत्यनिष्ठा:संयम; शौर्य:बलिदान; तप:योग:उद्यम के सम्मिलत गुण के माध्यम से परम ऊर्जा स्रोत परमब्रह्म परमेश्वर के अस्तित्व का बोध कराता हो) की रक्षा करना और उसकी छाया तले जीवन व्यतीत करना; और सनातन हिन्दू संस्कृति का प्रतीक सनातन धर्म ध्वजा जो सूर्य की सतरंगी प्रकाश की अरुणिमामय ज्योति के माध्यम से सम्पूर्ण ब्रह्मण्डों को नियंत्रित करने की परम ऊर्जा स्रोत परमब्रह्म परमेश्वर के अस्तित्व का बोध कराता हो उस भगवा(डॉन=अरुणोदय ज्योति पुंज प्रतीक) की भी रक्षा और उसकी छाया अंतर्गत जीवन मेरा परमध्येय है। इस प्रकार ऐसे दोनों आयामों तिरंगा और भगवा(डॉन=अरुणोदय ज्योति पुंज प्रतीक) के प्रति सम्मान और आस्था और तद हेतु तन, मन, धन, जीवन और मान, स्वाभिमान और समय का भी समर्पण मेरा सर्वोच्च ध्येय है। ऐसे किसी संस्था/संगठन/मानवीय जीवन सम्बंधित किसी भी छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी इकाई के किसी समूह विशेष के नीचे से लेकर उच्चस्थ पद पर आसीन व्यक्ति या व्यक्ति समूह को कोई राजनीती सूझ रही हो तो वे कम से कम तिरंगा और भगवा को अपना ध्वज मानना छोड़ दे और तब पाएंगे की मेरी छाया भी वहां नहीं जाएगी मेरा जाना या जुड़े रहना बड़े दूर की बात है तो तिरंगा और भगवा(डॉन=अरुणोदय ज्योति पुंज प्रतीक) के प्रति सम्मान और आस्था और तद हेतु तन, मन, धन, जीवन और मान, स्वाभिमान और समय का भी समर्पण मेरा जो हो रहा वह किसी व्यक्ति विशेष के कारन नहीं हो रहा है वरन उस तिरंगे और भगवा धारणकर्ता का भाव मुझे उस संस्था/संगठन/मानवीय जीवन सम्बंधित किसी भी छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी इकाई और उससे जुड़े व्यक्तियों से जोड़ रहा है| इन दोनों की उपस्थित जिस दिन से वहां नहीं रही उनका कोई आदेश और नियम तभी मुझे मान्य होगा जब वह सत्य की कसौटी पर मेरे अनुसार खरा उतरेगा लेकिन तिरंगा और भगवा के अधीन अगर कुछ हो रहा है तो आशा यही रहती है की हर परिश्थिति का सकारात्मक असर भविष्य के जीवन पर होगा ही और वे लोग जो किसी भी प्रकार की राजनीती जारी किये हुए हैं उनको परम सत्य का दर्शन और साक्षात्कार अवश्यम्भावी होगा ही होगा और उनकी अवधारणा त्रुटि विहीन और वास्तविक समतामूलक बनेगी जिसके कर्मठ और संयमी व्यक्तित्व को भी समुचित महत्त्व मिल सके न की संख्याबल और मत्स्य न्याययुक्त समता उनकी जारी रह पाये।

Thursday, June 23, 2016

Anand Bhavan/Prayagraj/Triveni/Tri Sangam/Allahabad/Uttar Pradesh to Sriperumbudur /Chennai/Tamil Nadu>>>>>Today, on Friday, 24th June, 2016 I visited the place of The Rajiv Gandhi Memorial built at Sriperumbudur, near about 40 Km from Chennai,Tamil Nadu, India where he was assassinated as a result of a suicide bombing on 21 May 1991. I payed my heartily tribute to him as in my childhood called him Rajeev Bhaiya as he was an attractive personality among all the Indian leaders in those days. As a youth leader and man he was the best human being according to us in those day.

Anand Bhavan/Prayagraj/Triveni/Tri Sangam/Allahabad/Uttar Pradesh to Sriperumbudur /Chennai/Tamil Nadu>>>>>Today, on Friday, 24th June, 2016 I visited the place of The Rajiv Gandhi Memorial built at Sriperumbudur, near about 40 Km from Chennai,Tamil Nadu, India where he was assassinated as a result of a suicide bombing on 21 May 1991. I payed my heartily tribute to him as in my childhood called him Rajeev Bhaiya as he was an attractive personality among all the Indian leaders in those days. As a youth leader and man he was the best human being according to us in those day.

जब मै स्वयं सशरीर पूर्णाति पूर्ण सत्य "सत्यमेव जयते" मतलब विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव हूँ मतलब शिव की भी आंतरिक रक्षा शक्ति मै ही हूँ जिसे आप शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/श्रीराम कह सकते है, तो मुझे किशी न्यायालय में जाने की क्या जरूरत अपनी वरिष्ठता सिद्ध करने हेतु परन्तु गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) की महिमा पर और इस प्रकार मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, श्रीश्रीधर(विष्णु) मामा और परमपिता परमेश्वर, डॉ प्रेमचंद(शिव)ताउजी की महिमा कोई आंच न आये और मानवता का विश्वास गुरु और न्यायलय पर बना रहे और यह मानवता चलती रहे और नयी संतति को नया स्वर्णिम सवेरा मिले इस हेतु जग माया विस्तार दिखाने हेतु मै न्यायालय गया हूँ अन्यथा केवल श्रीकृष्ण होता तो आज स्थिति कुछ और होती जो भी सत्य था उसे सबके सामने हाँथ पकड़ लिखवा लेता और कोई कुछ न कर पाता और जाती/धर्म आडम्बर मिटा देता उस सत्य के बल पर। लेकिन क्या इससे समाज एक कदम भी आगे चल पाता? समाज चलना है तो ईस्वर किशी को बनना होता है न तो कोई तो सशरीर है जो परमब्रह्म की अवस्था में जीवित हो न| तो पूर्ण सत्य और पूर्णाति सत्य महाशिव जरूर है लेकिन प्रकृति भी कुछ है जो मै आज न्यायालय को उसका कार्यभार दिया हूँ। तो इसका मतलब माया मतलब लक्ष्मी मतलब जानकी जी का इस दुनिया में जरूर सशरीर अस्तित्व हैं?

जब मै स्वयं सशरीर पूर्णाति पूर्ण सत्य "सत्यमेव जयते" मतलब विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव हूँ मतलब शिव की भी आंतरिक रक्षा शक्ति मै ही हूँ जिसे आप शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/श्रीराम कह सकते है, तो मुझे किशी न्यायालय में जाने की क्या जरूरत अपनी वरिष्ठता सिद्ध करने हेतु परन्तु गुरुदेव जोशी(ब्रह्मा) की महिमा पर और इस प्रकार मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर, श्रीश्रीधर(विष्णु) मामा और परमपिता परमेश्वर, डॉ प्रेमचंद(शिव)ताउजी की महिमा कोई आंच न आये और मानवता का विश्वास गुरु और न्यायलय पर बना रहे और यह मानवता चलती रहे और नयी संतति को नया स्वर्णिम सवेरा मिले इस हेतु जग माया विस्तार दिखाने हेतु मै न्यायालय गया हूँ अन्यथा केवल श्रीकृष्ण होता तो आज स्थिति कुछ और होती जो भी सत्य था उसे सबके सामने हाँथ पकड़ लिखवा लेता और कोई कुछ न कर पाता और जाती/धर्म आडम्बर मिटा देता उस सत्य के बल पर। लेकिन क्या इससे समाज एक कदम भी आगे चल पाता? समाज चलना है तो ईस्वर किशी को बनना होता है न तो कोई तो सशरीर है जो परमब्रह्म की अवस्था में जीवित हो न| तो पूर्ण सत्य और पूर्णाति सत्य महाशिव जरूर है लेकिन प्रकृति भी कुछ है जो मै आज न्यायालय को उसका कार्यभार दिया हूँ। तो इसका मतलब माया मतलब लक्ष्मी मतलब जानकी जी का इस दुनिया में जरूर सशरीर अस्तित्व हैं?

Wednesday, June 22, 2016

हमारे देश के 18 57 से लेकर 1947 तक के शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने अखण्ड भारत के प्रति अप्रतिम प्रेम के कारन पूरे अखण्ड भारत की स्वतंत्रा हेतु अप्रतिम त्याग, बलिदान और तप/योग किया था तो 14 अगस्त, 1947 को जब विभाजित स्वतंत्र भारत ही उनके हाँथ में आया तो यह कहा जाय की अखण्ड भारत भूमि के प्रति उनके प्रेम में रंचमात्र कमी थी ? अगर कोई कहता है की शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने अखण्ड भारत के प्रति प्रेम में कोई कमी थी तो यह उन शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अप्रतिम त्याग, बलिदान और तप/योग की जघन्य ह्त्या है तो हर जगह "जेहि पर जाकर सत्य सनेहु, ता तेहिं मिलई न कछु संदेहु" के आधार पर ही उन शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अप्रतिम त्याग, बलिदान और तप/योग और उनके अखण्ड स्वतंत्र भारत के प्रति अप्रतिम सत्य प्रेम (स्नेह) पर संदेह करना एक जघन्य अपराध ही होगा। गोस्वामी तुलसी दास की चौपाई की सत्यता पर भी हम संदेह नहीं करते हैं पर कुछ सन्दर्भ में अपवाद भी हो सकता है मतलब इसे कुछ हद तह हम इसे छोड़ सकते है। 14 अगस्त, 1947 को अखण्ड भारत के टुकड़े हुए हैं भौगोलिक दृस्टि से तो क्या यह स्वतंत्र तो हुआ है लेकिन इसे भौगोलिक रूप से पुनः जोड़ा जा सकता है और यदि भौगोलिक रूप से ऐसा नहीं किया जा सकता है तो 14 अगस्त, 1947 को हुए अखण्ड भारत के भौगोलिक टुकड़े को जोड़ने के लिए सम्पूर्ण भूभाग के लोगों के दिलों को जोड़ने का ऐसा प्रयास होना चाहिए की 2057 तक भौगोलिक सीमा महत्वहीेन हो जाय? और इस प्रकार जो 14 अगस्त को अलग हुआ हो वह जुड़ जा।

हमारे देश के 18 57 से लेकर 1947 तक के शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने अखण्ड भारत के प्रति अप्रतिम प्रेम के कारन पूरे अखण्ड भारत की स्वतंत्रा हेतु अप्रतिम त्याग, बलिदान और तप/योग किया था तो 14 अगस्त, 1947 को जब विभाजित स्वतंत्र भारत ही उनके हाँथ में आया तो यह कहा जाय की अखण्ड भारत भूमि के प्रति उनके प्रेम में रंचमात्र कमी थी ? अगर कोई कहता है की शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने अखण्ड भारत के प्रति प्रेम में कोई कमी थी तो यह उन शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अप्रतिम त्याग, बलिदान और तप/योग की जघन्य ह्त्या है तो हर जगह "जेहि पर जाकर सत्य सनेहु, ता तेहिं मिलई न कछु संदेहु" के आधार पर ही उन शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अप्रतिम त्याग, बलिदान और तप/योग और उनके अखण्ड स्वतंत्र भारत के प्रति अप्रतिम सत्य प्रेम (स्नेह) पर संदेह करना एक जघन्य अपराध ही होगा। गोस्वामी तुलसी दास की चौपाई की सत्यता पर भी हम संदेह नहीं करते हैं पर कुछ सन्दर्भ में अपवाद भी हो सकता है मतलब इसे कुछ हद तह हम इसे छोड़ सकते है। 14 अगस्त, 1947 को अखण्ड भारत के टुकड़े हुए हैं भौगोलिक दृस्टि से तो क्या यह स्वतंत्र तो हुआ है लेकिन इसे भौगोलिक रूप से पुनः जोड़ा जा सकता है और यदि भौगोलिक रूप से ऐसा नहीं किया जा सकता है तो 14 अगस्त, 1947 को हुए अखण्ड भारत के भौगोलिक टुकड़े को जोड़ने के लिए सम्पूर्ण भूभाग के लोगों के दिलों को जोड़ने का ऐसा प्रयास होना चाहिए की 2057 तक भौगोलिक सीमा महत्वहीेन हो जाय? और  इस प्रकार जो 14 अगस्त को अलग हुआ हो वह जुड़ जा।

Tuesday, June 21, 2016

वैसे तो इस दुनिया में सृष्टि के प्रारम्भ से जो जन्म लिया है उसका कोई न कोई गोत्र होता पर हाँ जिसको अपना गोत्र ज्ञांत नहीं हो उसका गोत्र कश्यप गोत्र ही होता यह कश्यप गोत्र की विशालता और मजबूती की मिशाल है जिसमे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और योग योगेश्वर श्रीकृष्ण समेत अधिकतम विष्णु अवतार का जन्म हुआ हो जिनके वंसज इंद्र, विष्वकर्मा समेत अन्य मूल पञ्च देव (अग्नि, वरुण, भूदेव/धरनी, अंतरिक्ष/निलय, पवन/अनिल) और सूर्यदेव/सूर्यबल/सूर्यवंश, चन्द्रदेव/चन्द्र बल/चन्द्रवंश), अरुण(सूर्य आभा=सूर्यसरथी) और गरुण (विष्णु वाहन)) समेत अन्य सभी देव तथा नार, नागवंश, किन्नर वंश, गन्धर्व वंश, और दानव तक हुए है। तो ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशीनरेश दक्ष प्रजापति जो नारी जाती के मुख्य श्रोत हैं की प्रथम कन्या, सती:पारवती:अपर्णा:उमा:गिरिजा:गौरी/महादेव शिव शंकर विश्वनाथ के अलावा अन्य 13 कन्याओं का विवाह ब्रह्मा के अनुरोध पर कश्यप ऋषि के पिता मारीच ने अपने एकलौते पुत्र कश्यप से किया था तो उन 13 से जनित उपर्युक्त सभी प्रकार के संताने है जिसमे से द्वीतीय पत्नी अदिति से जन्मे आदित्य से सभी देवता और सूर्यदेव/सूर्यबल/सूर्यवंश, सावर्ण ऋषि (जिनकी इक्षा थी की मेरी सभी संतान केवल ब्राह्मण धर्म का ही पालन करेंगे) , चन्द्रदेव/चन्द्र बल/चन्द्रवंश)। दानव संतति भी इससे जन्म ली है यही कारन रहा की जो दानवों को भी नियंत्रित कर लेता और मानव जीवन को चलायमान रखता है तो प्रशासनिक गुण में इसे महारत हांसिल है परप्रशासनिक क्षमता एक कमी इसको दे जाती है की सप्तर्षियों में जेष्ठ और श्रेष्ठ [कश्यप,वशिष्ठ)/पारासर/व्यास/उपमन्यु ,गौतम, आंगिरस/देवताओं के गुरु बृहस्पति/भारद्वाज/धन्वन्तरि, भृगु/जमदग्नि/(परशुराम)/दधीचि, अत्री/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय (चन्द्र प्रभाव से जन्म लिए जरूर थे पर चन्द्र वंश इनसे नहीं चला है), कौशिक(विश्वामित्र/विश्वरथ)]; होने पर भी मानवता के दृष्टिकोण से इसे तीसरा स्थान प्राप्त है [गौतम, वशिष्ठ(पुरोहिती में अर्जित पाप की भीगीदारी इन्हे दूसरे स्थान पर लाती है)/पारासर/व्यास/उपमन्यु , कश्यप, आंगिरस/देवताओं के गुरु बृहस्पति/भारद्वाज/धन्वन्तरि, भृगु/जमदग्नि/(परशुराम)/दधीचि, अत्री/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय (चन्द्र प्रभाव से जन्म लिए जरूर थे पर चन्द्र वंश इनसे नहीं चला है), कौशिक(विश्वामित्र/विश्वरथ)। अतः आप सभी निर्णय स्वयं कर लीजिए की जिसका कोई गोत्र नहीं मतलब जिसको प्राथमिक सात विस्तार कर लगभग 105 गोत्रों में से अपना गोत्र पता नहीं उसको कौन गोत्र शरण दे सकता है अगर कश्यप गोत्र शरण नहीं देता है ऐसी स्थिति में ? पर हाँ सनातन कश्यप गोत्रीय की अपनी पहचान और शक्ति इससे जरूर प्रभावित होती है तो ऐसे में जिस जाती और धर्म के लोग हिन्दू धर्म में कस्यप गोत्र के माध्यम से नए सदस्य बनें या हिन्दू धर्म के वे लोग जो अपने को कश्यप गोत्रीय कहें वे इस बात का ध्यान रखें अन्यथा मेरे जैसा सनातन कश्यप गोत्रीय सभी की अच्छी खबर लेगा और सम्पूर्ण मानवता प्रभावित होती और "सत्यमेव जयते" की कसौटी पर सबको कसा जाएगा जीवन के किसी न किसी क्षण में अगर मेरे जैसा सनातन कश्यप गोत्रीय सभी के दुराचरण से अनायास प्रभावित होता है। जो कश्यप गोत्र हिन्दू धर्म का प्रथम द्वार है वही अंतिम द्वार बनकर आप को हिन्दू धर्म में बने रहने की शरण स्थली भी है अगर आप आम समाज से अलग भी किये गए हैं अपने कुकृत्यों या समाज की ही अज्ञानता से तो कम से कम इस कश्यप गोत्र के प्रति प्रेम और आस्था भी रखिये की अगर ब्रह्मा के वरदान स्वरुप यह श्रिष्टि चलाई जा रही है अनेकोनेक लोगों के त्याग, बलिदान और तप से तो उसमे सहयोग करें और विघ्न न डालें अपने कुकृत्यों से अन्यता आप इसी जन्म में जीते हुए सब हिंसाब चुकता करके जाएंगे सत्य के साक्षात्कार का और न समझ आये तो जो लोग साक्षात्कार कर चुके हैं उनसे पूंछ लीजिए?

वैसे तो इस दुनिया में सृष्टि के प्रारम्भ से जो जन्म लिया है उसका कोई न कोई गोत्र होता पर हाँ जिसको अपना गोत्र ज्ञांत नहीं हो उसका गोत्र कश्यप गोत्र ही होता यह कश्यप गोत्र की विशालता और मजबूती की मिशाल है जिसमे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और योग योगेश्वर श्रीकृष्ण समेत अधिकतम विष्णु अवतार का जन्म हुआ हो जिनके वंसज इंद्र, विष्वकर्मा समेत अन्य मूल पञ्च देव (अग्नि, वरुण, भूदेव/धरनी, अंतरिक्ष/निलय, पवन/अनिल) और सूर्यदेव/सूर्यबल/सूर्यवंश, चन्द्रदेव/चन्द्र बल/चन्द्रवंश), अरुण(सूर्य आभा=सूर्यसरथी) और गरुण (विष्णु वाहन)) समेत अन्य सभी देव तथा नार, नागवंश, किन्नर वंश, गन्धर्व वंश, और दानव तक हुए है। तो ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशीनरेश दक्ष प्रजापति जो नारी जाती के मुख्य श्रोत हैं की प्रथम कन्या, सती:पारवती:अपर्णा:उमा:गिरिजा:गौरी/महादेव शिव शंकर विश्वनाथ के अलावा अन्य 13 कन्याओं का विवाह ब्रह्मा के अनुरोध पर कश्यप ऋषि के पिता मारीच ने अपने एकलौते पुत्र कश्यप से किया था तो उन 13 से जनित उपर्युक्त सभी प्रकार के संताने है जिसमे से द्वीतीय पत्नी अदिति से जन्मे आदित्य से सभी देवता और सूर्यदेव/सूर्यबल/सूर्यवंश, सावर्ण ऋषि (जिनकी इक्षा थी की मेरी सभी संतान केवल ब्राह्मण धर्म का ही पालन करेंगे) , चन्द्रदेव/चन्द्र बल/चन्द्रवंश)। दानव संतति भी इससे जन्म ली है यही कारन रहा की जो दानवों को भी नियंत्रित कर लेता और मानव जीवन को चलायमान रखता है तो प्रशासनिक गुण में इसे महारत हांसिल है परप्रशासनिक क्षमता एक कमी इसको दे जाती है की सप्तर्षियों में जेष्ठ और श्रेष्ठ [कश्यप,वशिष्ठ)/पारासर/व्यास/उपमन्यु ,गौतम, आंगिरस/देवताओं के गुरु बृहस्पति/भारद्वाज/धन्वन्तरि, भृगु/जमदग्नि/(परशुराम)/दधीचि, अत्री/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय (चन्द्र प्रभाव से जन्म लिए जरूर थे पर चन्द्र वंश इनसे नहीं चला है), कौशिक(विश्वामित्र/विश्वरथ)]; होने पर भी मानवता के दृष्टिकोण से इसे तीसरा स्थान प्राप्त है [गौतम, वशिष्ठ(पुरोहिती में अर्जित पाप की भीगीदारी इन्हे दूसरे स्थान पर लाती है)/पारासर/व्यास/उपमन्यु , कश्यप, आंगिरस/देवताओं के गुरु बृहस्पति/भारद्वाज/धन्वन्तरि, भृगु/जमदग्नि/(परशुराम)/दधीचि, अत्री/कृष्णात्रेय(दुर्वाशा)/दत्तात्रेय/सोमात्रेय (चन्द्र प्रभाव से जन्म लिए जरूर थे पर चन्द्र वंश इनसे नहीं चला है), कौशिक(विश्वामित्र/विश्वरथ)। अतः आप सभी निर्णय स्वयं कर लीजिए की जिसका कोई गोत्र नहीं मतलब जिसको प्राथमिक सात विस्तार कर लगभग 105 गोत्रों में से अपना गोत्र पता नहीं उसको कौन गोत्र शरण दे सकता है अगर कश्यप गोत्र शरण नहीं देता है ऐसी स्थिति में ? पर हाँ सनातन कश्यप गोत्रीय की अपनी पहचान और शक्ति इससे जरूर प्रभावित होती है तो ऐसे में जिस जाती और धर्म के लोग हिन्दू धर्म में कस्यप गोत्र के माध्यम से नए सदस्य बनें या हिन्दू धर्म के वे लोग जो अपने को कश्यप गोत्रीय कहें वे इस बात का ध्यान रखें अन्यथा मेरे जैसा सनातन कश्यप गोत्रीय सभी की अच्छी खबर लेगा और सम्पूर्ण मानवता प्रभावित होती और "सत्यमेव जयते" की कसौटी पर सबको कसा जाएगा जीवन के किसी न किसी क्षण में अगर मेरे जैसा सनातन कश्यप गोत्रीय सभी के दुराचरण से अनायास प्रभावित होता है। जो कश्यप गोत्र हिन्दू धर्म का प्रथम द्वार है वही अंतिम द्वार बनकर आप को हिन्दू धर्म में बने रहने की शरण स्थली भी है अगर आप आम समाज से अलग भी किये गए हैं अपने कुकृत्यों या समाज की ही अज्ञानता से तो कम से कम इस कश्यप गोत्र के प्रति प्रेम और आस्था भी रखिये की अगर ब्रह्मा के वरदान स्वरुप यह श्रिष्टि चलाई जा रही है अनेकोनेक लोगों के त्याग, बलिदान और तप से तो उसमे सहयोग करें और विघ्न न डालें अपने कुकृत्यों से अन्यता आप इसी जन्म में जीते हुए सब हिंसाब चुकता करके जाएंगे सत्य के साक्षात्कार का और न समझ आये तो जो लोग साक्षात्कार कर चुके हैं उनसे पूंछ लीजिए?

Monday, June 20, 2016

मैं ब्राह्मण बस्ती में रहने वाले सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र=विलवापत्र=शिव और शिवा को समर्पित होने वाला=शिव पर अर्पणेय=शिवा:पार्वती का आहार=शिव और शिवा का भोज्य शेष बचा तो स्वयं शिव बनने वाला) पांडेय ब्राह्मण रामप्रशाद पांडेय का वंसज दलित/मलिन बस्ती में निवास करने काशीराम से सब कुछ साझा कर सकता हूँ और किया हूँ मतलब वास्तव में मूल रूप से समता जिसे कहते हैं उसे स्वीकार कर चुका हूँ और आगे भी जारी रहेगा पर जब तक वे स्वयं के प्रयास से अपने को और अपने समूह को संस्कारिक रूप से सामूहिक आचरण में मेरे समान संस्कारिक आचरण नहीं करते है उनका मेरा वैवाहिक सम्बन्ध कभी भी और किसी कीमत (किसी भी विश्व महाशक्ति के दबाव के बल पर वैसे मैं विश्व की महाशक्ति केवल और केवल पूर्ण ब्राह्मण को ही मानता हूँ) पर स्थापित नहीं हो सकता है। और भी मेरी संस्कृति में वैवाहिक सम्बन्ध दो समानं संस्कारित परिवारों का मिलन माना जाता है तो इस दृस्टि से सनातन काल से यही परम्परा चली आ रही है की बिना स्वयं का परिष्कार किये सप्तर्षि वशिष्ठ के वंसज परासर के पुत्र महर्षि वेदव्यास को भी ब्राह्मण समाज द्वारा स्वीकार नहीं किया गया और इस प्रकार महर्षि व्यास ने अपना परिष्कार स्वयं कर महर्षि की उपाधि अर्जित की और तब वे ब्रह्मा की प्रेरणा से 4 वेद , 18 पुराण और अनेकानेक धार्मिक ग्रन्थ लिखे और पाण्डव उनको गुरुदेव मानकर स्वयं श्रीकृष्ण समेत जाकर हर मुस्किल में उनसे सुझाव लेने जाते रहे थे। >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||>>>>>>>सम्पूर्ण नारी जगत ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज (दक्षप्रजापति) की पुत्रियों से ही जनित है जिसमे से सती:पार्वती:शिवा/शिव:शंकर के अलावा अन्य सभी 13 बहनों का विवाह कश्यप ऋषी से हुआ था। तो नारी जगत के प्रथम पिता काशिराज (दक्षप्रजापति) ही हैं और यही काशी नारी जगत का मूल स्रोत हैं।

मैं ब्राह्मण बस्ती में रहने वाले सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र=विलवापत्र=शिव और शिवा को समर्पित होने वाला=शिव पर अर्पणेय=शिवा:पार्वती का आहार=शिव और शिवा का भोज्य शेष बचा तो स्वयं शिव बनने वाला) पांडेय ब्राह्मण रामप्रशाद पांडेय का वंसज दलित/मलिन बस्ती में निवास करने काशीराम से सब कुछ साझा कर सकता हूँ और किया हूँ मतलब वास्तव में मूल रूप से समता जिसे कहते हैं उसे स्वीकार कर चुका हूँ और आगे भी जारी रहेगा पर जब तक वे स्वयं के प्रयास से अपने को और अपने समूह को संस्कारिक रूप से सामूहिक आचरण में मेरे समान संस्कारिक आचरण नहीं करते है उनका मेरा वैवाहिक सम्बन्ध कभी भी और किसी कीमत (किसी भी विश्व महाशक्ति के दबाव के बल पर वैसे मैं विश्व की महाशक्ति केवल और केवल पूर्ण ब्राह्मण को ही मानता हूँ) पर स्थापित नहीं हो सकता है। और भी मेरी संस्कृति में वैवाहिक सम्बन्ध दो समानं संस्कारित परिवारों का मिलन माना जाता है तो इस दृस्टि से सनातन काल से यही परम्परा चली आ रही है की बिना स्वयं का परिष्कार किये सप्तर्षि वशिष्ठ के वंसज परासर के पुत्र महर्षि वेदव्यास को भी ब्राह्मण समाज द्वारा स्वीकार नहीं किया गया और इस प्रकार महर्षि व्यास ने अपना परिष्कार स्वयं कर महर्षि की उपाधि अर्जित की और तब वे ब्रह्मा की प्रेरणा से 4 वेद , 18 पुराण और अनेकानेक धार्मिक ग्रन्थ लिखे और पाण्डव उनको गुरुदेव मानकर स्वयं श्रीकृष्ण समेत जाकर हर मुस्किल में उनसे सुझाव लेने जाते रहे थे। >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>विवेक (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से रामापुर-223225, आजमगढ़ समेत 5 गाँव को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी:आदित्यनाथ: सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से बिशुनपुर-223103, जौनपुर गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----रामप्रसाद रमानाथ (+पराशनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरीधारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))||>>>>>>>सम्पूर्ण नारी जगत ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज (दक्षप्रजापति) की पुत्रियों से ही जनित है जिसमे से सती:पार्वती:शिवा/शिव:शंकर के अलावा अन्य सभी 13 बहनों का विवाह कश्यप ऋषी से हुआ था। तो नारी जगत के प्रथम पिता काशिराज (दक्षप्रजापति) ही हैं और यही काशी नारी जगत का मूल स्रोत हैं।

Re:Re:Re: For my Elder brothers in politics and every citizen of the HINDUSHTHAAN: Referenced with Lord Shri Ram there are words of Lord Shiva-Mahadev to Devi Parwati, which is a direction of moral duties for the social person according him(quoted from Shri Ramcharit Manas by Goswami Tulasi Das): सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।।नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।।सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।।धन्य देस सो जहँ सुरसरी बहइ । धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।।धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।।सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।। धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत।।127।। Note: धन्य सो भूप नीति जो करई(नीतियों और नियमों के अनुसार शासन करे) , धन्य सो विप्र(ब्राह्मण) निज धर्म न टरई(धर्म से कभी भी विरट न हो)। सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (जिस कुल में सम्पूर्ण जगत के पूज्य पवित्रता से श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का जन्म हुआ हो मतलब शूर्यवंश/इक्शाकुवंश/रघुवंश धन्य है ) । श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत(उस रघुबीर श्रीराम का प्रेमी ह्रदय वही है जिसमे विनीत का जन्म हो या जिसमे विनम्रता और विनयशीलता हो) ॥ ------------------------------------------------------------------------श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गायत्री-गौरी (स्त्री जगत के प्रति आदर और सम्मान) पर मतभेद रह गया है।*******जय हिन्द(जम्बू द्वीप= यूरेशिया=यूरोप +एशिया; या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्ड), जयश्रीराम/कृष्ण।>>>JAI HIND(JAMBOO DWEEP:EURESIA:EUROP+ASIA OR HIND= JAMBOO DWEEP MEANT BY AT LEAST IRAN TO SINGAPUR & KASHMIR TO KANYAKUMARI), JAI BHARAT(AKHAND BHARAT:BHARATAKHAND), JAI SHRI RAM/KRISHNA.---------For an Indian it is better to say Jai Hind-Jai Bharat than to say Jai Bharat only.

Re:Re:Re: For my Elder brothers in politics and every citizen of the HINDUSHTHAAN:
Referenced with Lord Shri Ram there are words of Lord Shiva-Mahadev to Devi Parwati, which is a direction of moral duties for the social person according him(quoted from Shri Ramcharit Manas by Goswami Tulasi Das):
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।।नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।।सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।।धन्य देस सो जहँ सुरसरी बहइ । धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।।धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।।सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।।
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत।।127।।

Note:
धन्य सो भूप नीति जो करई(नीतियों और नियमों के अनुसार शासन करे) , धन्य सो विप्र(ब्राह्मण) निज धर्म न टरई(धर्म से कभी भी विरट न हो)। सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत (जिस कुल में सम्पूर्ण जगत के पूज्य पवित्रता से श्रेष्ठ भगवान श्रीराम का जन्म हुआ हो मतलब शूर्यवंश/इक्शाकुवंश/रघुवंश धन्य है ) । श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत(उस रघुबीर श्रीराम का प्रेमी ह्रदय वही है जिसमे विनीत का जन्म हो या जिसमे विनम्रता और विनयशीलता हो) ॥ ------------------------------------------------------------------------श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय-गंगा-गीता-गायत्री-गौरी (स्त्री जगत के प्रति आदर और सम्मान) पर मतभेद रह गया है।*******जय हिन्द(जम्बू द्वीप= यूरेशिया=यूरोप +एशिया; या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(अखंड भारत=भरतखण्ड), जयश्रीराम/कृष्ण।>>>JAI HIND(JAMBOO DWEEP:EURESIA:EUROP+ASIA OR HIND= JAMBOO DWEEP MEANT BY AT LEAST IRAN TO SINGAPUR & KASHMIR TO KANYAKUMARI), JAI BHARAT(AKHAND BHARAT:BHARATAKHAND), JAI SHRI RAM/KRISHNA.---------For an Indian it is better to say Jai Hind-Jai Bharat than to say Jai Bharat only.

ब्राह्मणों के बेटे और शिष्य अभी इतने सयाने नहीं हुए हैं की उनके बिना कोई वैश्विक बाजीगरी का युद्ध जीत सकें तो ब्राह्मणों को ब्राह्मण बने रहने दीजिये जरूरत हर समय पड़ेगी और हर युग में पड़ेगी उनकी और ब्राह्मण भी ब्रह्म/परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) की सत्ता के साथ छेंड छाड न करें अपनी कर्त्तव्य और अधिकार की परिधि में रहें और मानवता का कल्याण करें उसी में उनका और उनके पुत्रों और शिष्यों की चैतन्यता और चिरायु निहित है।

ब्राह्मणों के बेटे और शिष्य अभी इतने सयाने नहीं हुए हैं की उनके बिना कोई वैश्विक बाजीगरी का युद्ध जीत सकें तो ब्राह्मणों को ब्राह्मण बने रहने दीजिये जरूरत हर समय पड़ेगी और हर युग में पड़ेगी उनकी और ब्राह्मण भी ब्रह्म/परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) की सत्ता के साथ छेंड छाड न करें अपनी कर्त्तव्य और अधिकार की परिधि में रहें और मानवता का कल्याण करें उसी में उनका और उनके पुत्रों और शिष्यों की चैतन्यता और चिरायु निहित है।

अगर हम दूसरी संस्कृतियों का प्रतिकार करते हुए अपनी संस्कृति के ही अस्तित्व को स्वयं मिटा दें तो फिर वह प्रतिकार और उद्यम किस काम का? अतः मानवीय मूल्य और मानवीय मौलिक अधिकार को संरक्षित रखते हुए अगर कोई अपनी पहचान सबसे अलग बनाये हुए है अपनी क्रियाशीलता और उच्च संस्कार के बल पर तो उस पर आधुनिक समानता का नियम नहीं लागू करते है वरन उसकी उस विशेष पहचान को अपना आदर्श बनाते हुए अपने समाज का भी उन्नयन करते हैं उसके कार्यपध्धति का अनुसरण करते हुए न की उसपर सांस्कृतिक या भौतिक वार करते हुए इतना नीचे खींचते हैं जितना के मेरा स्वयं का निम्न और महत्तम कद जिसमे ये दोनों उस विशेष पहचान वाले से कम हों।

अगर हम दूसरी संस्कृतियों का प्रतिकार करते हुए अपनी संस्कृति के ही अस्तित्व को स्वयं मिटा दें तो फिर वह प्रतिकार और उद्यम किस काम का? अतः मानवीय मूल्य और मानवीय मौलिक अधिकार को संरक्षित रखते हुए अगर कोई अपनी पहचान सबसे अलग बनाये हुए है अपनी क्रियाशीलता और उच्च संस्कार के बल पर तो उस पर आधुनिक समानता का नियम नहीं लागू करते है वरन उसकी उस विशेष पहचान को अपना आदर्श बनाते हुए अपने समाज का भी उन्नयन करते हैं उसके कार्यपध्धति का अनुसरण करते हुए न की उसपर सांस्कृतिक या भौतिक वार करते हुए इतना नीचे खींचते हैं जितना के मेरा स्वयं का निम्न और महत्तम कद जिसमे ये दोनों उस विशेष पहचान वाले से कम हों।

पर याद रहे जिस दिन से उस जाती/धर्म ने कुछ ही ढील दी है उसी दिन से इस संस्कृति और समाज का यह हाल है की दो जून की रोटी नसीब होने पर (पेट भर भोजन सबको मिलने पर भी) भी लोग मानसिक रूप से भिखारी बन गए है उनमे मानसिक विकृति आ गयी गया जिसका परिणाम है दूषित सांस्कृतिक परिवेश और जिस दिन वे पूर्ण रूप से अपना घर सबके लिए खोल देंगे उस दिन न यह सनातन संस्कृति रहेगी और न विश्व मानव समुदाय नजर आयेगा। क्या समरसता सदाचार और सत्य का गला घोंटकर स्थापित की जा सकती है जिस सदाचार और सत्य का गला घोंटने के परिणाम स्वरुप यह मानवता समाप्त हो सकती है? >>>>>>>मैंने व्यक्तिगत अभीष्ठ वार सहे हैं विश्व मानवता के केंद्र बिंदु प्रयागराज में केंद्रित में रहकर सर्वोच्च मानवीय संसाधनों के बीच अभीष्ठ हिन्दू संस्कृति की रक्षा के लिए विदेशी संस्कृति के पोषक अभिकर्ताओं के द्वारा घर, परिवार, निवास स्थान, गाँव, समाज से लेकर भारत में जिन जिन स्थानों का एकल भ्रमण किया हूँ शोध और शिक्षा हेतु। यह दुनिया कालिदास से बढ़कर है जो उस डाली को काटती है जिस पर बैठी है और जो स्वयं खाई में झुकी हुई भी है। जिस सनातन हिन्दू संस्कृति की बदौलत यह दुनिया टिकी है उसी सनातन हिन्दू संस्कृति पर वार करती है और हिन्दू समाज के 80 प्रतिसत लोग आज जिस समाज के मालिक हैं वह स्वयं समरस समाज की स्थापना नहीं कर पा रहे है और सनातन हिन्दू संस्कृति के चिरकालीन संरक्षण करता जाती/धर्म वाला जिसकी अब पकड़ समाज पर नहीं उसी से कहते है की आप समरसता हेतु अपनी संस्कृति छोड़ दीजिये और अपने घर के दरवाजे सबके लिए खोल दीजिये।>>>>> पर याद रहे जिस दिन से उस जाती/धर्म ने कुछ ही ढील दी है उसी दिन से इस संस्कृति और समाज का यह हाल है की दो जून की रोटी नसीब होने पर (पेट भर भोजन सबको मिलने पर भी) भी लोग मानसिक रूप से भिखारी बन गए है उनमे मानसिक विकृति आ गयी गया जिसका परिणाम है दूषित सांस्कृतिक परिवेश और जिस दिन वे पूर्ण रूप से अपना घर सबके लिए खोल देंगे उस दिन न यह सनातन संस्कृति रहेगी और न विश्व मानव समुदाय नजर आयेगा। क्या समरसता सदाचार और सत्य का गला घोंटकर स्थापित की जा सकती है जिस सदाचार और सत्य का गला घोंटने के परिणाम स्वरुप यह मानवता समाप्त हो सकती है?

पर याद रहे जिस दिन से उस जाती/धर्म ने कुछ ही ढील दी है उसी दिन से इस संस्कृति और समाज का यह हाल है की दो जून की रोटी नसीब होने पर (पेट भर भोजन सबको मिलने पर भी) भी लोग मानसिक रूप से भिखारी बन गए है उनमे मानसिक विकृति आ गयी गया जिसका परिणाम है दूषित सांस्कृतिक परिवेश और जिस दिन वे पूर्ण रूप से अपना घर सबके लिए खोल देंगे उस दिन न यह सनातन संस्कृति रहेगी और न विश्व मानव समुदाय नजर आयेगा। क्या समरसता सदाचार और सत्य का गला घोंटकर स्थापित की जा सकती है जिस सदाचार और सत्य का गला घोंटने के परिणाम स्वरुप यह मानवता समाप्त हो सकती है? >>>>>>>मैंने व्यक्तिगत अभीष्ठ वार सहे हैं विश्व मानवता के केंद्र बिंदु प्रयागराज में केंद्रित में रहकर सर्वोच्च मानवीय संसाधनों के बीच अभीष्ठ हिन्दू संस्कृति की रक्षा के लिए विदेशी संस्कृति के पोषक अभिकर्ताओं के द्वारा घर, परिवार, निवास स्थान, गाँव, समाज  से लेकर भारत में जिन जिन स्थानों का एकल भ्रमण किया हूँ शोध और शिक्षा हेतु। यह दुनिया कालिदास से बढ़कर है जो उस डाली को काटती है जिस पर बैठी है और जो स्वयं खाई में झुकी हुई भी है। जिस सनातन हिन्दू संस्कृति की बदौलत यह दुनिया टिकी है उसी सनातन हिन्दू संस्कृति पर वार करती है और हिन्दू समाज के 80 प्रतिसत लोग आज जिस समाज के मालिक हैं वह स्वयं समरस समाज की स्थापना नहीं कर पा रहे है और सनातन हिन्दू संस्कृति के चिरकालीन संरक्षण करता जाती/धर्म वाला जिसकी अब पकड़ समाज पर नहीं उसी से कहते है की आप समरसता हेतु अपनी संस्कृति छोड़ दीजिये और अपने घर के दरवाजे सबके लिए खोल दीजिये।>>>>> पर याद रहे जिस दिन से उस जाती/धर्म ने कुछ ही ढील दी है उसी दिन से इस संस्कृति और समाज का यह हाल है की दो जून की रोटी नसीब होने पर (पेट भर भोजन सबको मिलने पर भी) भी लोग मानसिक रूप से भिखारी बन गए है उनमे मानसिक विकृति आ गयी गया जिसका परिणाम है दूषित सांस्कृतिक परिवेश और जिस दिन वे पूर्ण रूप से अपना घर सबके लिए खोल देंगे उस दिन न यह सनातन संस्कृति रहेगी और न विश्व मानव समुदाय नजर आयेगा। क्या समरसता सदाचार और सत्य का गला घोंटकर स्थापित की जा सकती है जिस सदाचार और सत्य का गला घोंटने के परिणाम स्वरुप यह मानवता समाप्त हो सकती है? 

राम से बड़ा राम का नाम इसी प्रयागराज में साबित हुआ है पर इस प्रयागराज में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो राम नाम को अब भी चुनौती देने से बाज नहीं आते है सौ पछाड़ खाने के बाजूद ऐसे रावण बंशीय लोग सदा रहे हैं और सदा रहेंगे ही तो ऐसे में सबसे समरसता कैसे स्थापित की जा सकती है जिसमे एक राम भक्त और दूसरे व्यभिचारी लोग हों जो रावण से भी ज्यादा गिरे हो मतलब जिसके साथ व्यभिचार करते है उसकी ही लाश (लाश इस लिए क्योंकि जिसके साथ व्यभिचार हुआ हो वह अगर उसी के लिए छाया या कवच के समान प्रयोग में आये तो वह लाश ही है तो कायर लोग ही उसे शिखण्डी जैसा कवच मानेंगे पर जो विवेकशील होंगे वह ऐसे व्यभिचारी को समाप्त करने में देर नहीं लगाएंगे क्योंकि जो कवच लास का हो वह कभी उसकी रक्षा नहीं कर सकती जो उसे धारण किये हुए है) की कीमत पर युद्ध भी करते है: - सहस्राब्दी परिवर्तन के दौरान आने वाले समय के लिए अपने अपने अधिकार सुरक्षित कर लेने की होड़ के दौरान हर धर्म की संस्कृति और उनके अनुसांगिक देश और उन देशों के हर देश में उपस्थित अभिकर्ता/एजेंट के क्रियाकलाप से उत्पन्न विश्व महाविनाश की विभीषिका को शीघ्राति शीघ्र नियंत्रित करने के दो केंद्रीय कर्णधार जो ब्रह्मा और उनके शिष्यों और समर्थकों की गलती के बावजूद इस विश्व के केंद्र बिंदु प्रयागराज में मुझ मानवीय संसाधन को एक प्रत्यक्ष और परोक्ष नियंत्रक यंत्र के रूप में स्थापित कर इसे नियंत्रण का केंद्र बिंदु बनाए रहे स्थिति को नियंत्रण में आने तक इसी प्रयागराज में जमाये रहे ऐसे रणनीतिकार को अगर श्रेय न दिया जाय केवल उस कार्य का श्रीगणेश मात्र करने वाले ब्रह्मा को श्रेय दिया जाय तो उन दोनों के साथ अन्याय ही होगा जिनकी व्यक्तिगत शक्तियाँ और समर्थन और उनके सुभेक्षुजन उनकी प्रतिष्ठा को बचाने हेतु पूर्ण सफलता दिलाने तक लगे उन दोनों का व्यक्तिगत नाम इस कार्य में मेरे माध्यम से जुड़ने के परिणाम स्वरुप जो लगा हुआ था और यह अन्य दो कर्णधार थे मेरे बिशुनपुर-223103, जौनपुर(जमदग्निपुर) निवासी परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण मेरे मामा जी श्रध्देय श्री श्रीधर(विष्णु) और रामापुर-223225, आजमगढ़ निवासी मेरे परमपिता परमेश्वर मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पांडेय ब्राह्मण मेरे ताऊजी श्रध्देय डॉ प्रेमचंद(शिव)।

राम से बड़ा राम का नाम इसी प्रयागराज में साबित हुआ है पर इस प्रयागराज में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो राम नाम को अब भी चुनौती देने से बाज नहीं आते है सौ पछाड़ खाने के बाजूद ऐसे रावण बंशीय लोग सदा रहे हैं और सदा रहेंगे ही तो ऐसे में सबसे समरसता कैसे स्थापित की जा सकती है जिसमे एक राम भक्त और दूसरे व्यभिचारी लोग हों जो रावण से भी ज्यादा गिरे हो मतलब जिसके साथ व्यभिचार करते है उसकी ही लाश (लाश इस लिए क्योंकि जिसके साथ व्यभिचार हुआ हो वह अगर उसी के लिए छाया या कवच के समान प्रयोग में आये तो वह लाश ही है तो कायर लोग ही उसे शिखण्डी जैसा कवच मानेंगे पर जो विवेकशील होंगे वह ऐसे व्यभिचारी को समाप्त करने में देर नहीं लगाएंगे क्योंकि जो कवच लास का हो वह कभी उसकी रक्षा नहीं कर सकती जो उसे धारण किये हुए है) की कीमत पर युद्ध भी करते है: - सहस्राब्दी परिवर्तन के दौरान आने वाले समय के लिए अपने अपने अधिकार सुरक्षित कर लेने की होड़ के दौरान हर धर्म की संस्कृति और उनके अनुसांगिक देश और उन देशों के हर देश में उपस्थित अभिकर्ता/एजेंट के क्रियाकलाप से उत्पन्न विश्व महाविनाश की विभीषिका को शीघ्राति शीघ्र नियंत्रित करने के दो केंद्रीय कर्णधार जो ब्रह्मा और उनके शिष्यों और समर्थकों की गलती के बावजूद इस विश्व के केंद्र बिंदु प्रयागराज में मुझ मानवीय संसाधन को एक प्रत्यक्ष और परोक्ष नियंत्रक यंत्र के रूप में स्थापित कर इसे नियंत्रण का केंद्र बिंदु बनाए रहे स्थिति को नियंत्रण में आने तक इसी प्रयागराज में जमाये रहे ऐसे रणनीतिकार को अगर श्रेय न दिया जाय केवल उस कार्य का श्रीगणेश मात्र करने वाले ब्रह्मा को श्रेय दिया जाय तो उन दोनों के साथ अन्याय ही होगा जिनकी व्यक्तिगत शक्तियाँ और समर्थन और उनके सुभेक्षुजन उनकी प्रतिष्ठा को बचाने हेतु पूर्ण सफलता दिलाने तक लगे उन दोनों का व्यक्तिगत नाम इस कार्य में मेरे माध्यम से जुड़ने के परिणाम स्वरुप जो लगा हुआ था और यह अन्य दो कर्णधार थे मेरे बिशुनपुर-223103, जौनपुर(जमदग्निपुर) निवासी परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी मिश्र ब्राह्मण मेरे मामा जी श्रध्देय श्री श्रीधर(विष्णु) और रामापुर-223225, आजमगढ़ निवासी मेरे परमपिता परमेश्वर मेरे सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला पांडेय ब्राह्मण मेरे ताऊजी श्रध्देय डॉ प्रेमचंद(शिव)।

भारत= भा(भान=ज्ञान=बोध) + रत (युक्त) और वह ज्ञान जो "असतो मा सदगमय" हो मतलब जिस ज्ञान मे मदांधता नही हो मतलब वह ज्ञान संस्कार युक्त और विकार मुक्त ज्ञान मे रत हों जो लोग. केवल संस्कार युक्त ज्ञान ही हमे असत्य से सत्य सत्य की दिशा मे ले जा सकता है या अंधकार से प्रकाश की दिशा मे ले जा सकता है| और ऐसे संस्कारयुक्त अऊर कलुषमुक्त ज्ञान से रत रहने वाला हमारा देश भारत है और इस देश की अपनी अनादी कालीन संस्कृति (इसके अधिकतम परिवार श्रेष्ठ संस्कार वाले हैं जिनसे एक एक कर एकाकार होन से देश की सामूहिक संस्कृति का निर्माण होता है और उसी संस्कार से इस सनातन संस्कृति का निर्माण हुअा भी है) है जिसको सनातन हिन्दू संस्कृति कहते हैं जिसमे संपूर्ण विश्व की सभी संस्कृतियां समाहित हो जाती हैं तो इसी लिए हम इसे सनातन हिन्दू राष्ट्र (देश/राज्य जो अपनी स्वयं की संस्कृति से युक्त हो) कहते है| तो भारत ही नही अखंड भारत एक हिन्दू राष्ट्र ही तो है, इसमे कौन सा प्रश्नवाचक शब्द?

भारत= भा(भान=ज्ञान=बोध) + रत (युक्त) और वह ज्ञान जो "असतो मा सदगमय" हो मतलब जिस ज्ञान मे मदांधता नही हो मतलब वह ज्ञान संस्कार युक्त और विकार मुक्त ज्ञान मे रत हों जो लोग. केवल संस्कार युक्त ज्ञान ही हमे असत्य से सत्य सत्य की दिशा मे ले जा सकता है या अंधकार से प्रकाश की दिशा मे ले जा सकता है| और ऐसे संस्कारयुक्त अऊर कलुषमुक्त ज्ञान से रत रहने वाला हमारा देश भारत है और इस देश की अपनी अनादी कालीन संस्कृति (इसके अधिकतम परिवार श्रेष्ठ संस्कार वाले हैं जिनसे एक एक कर एकाकार होन से देश की सामूहिक संस्कृति का निर्माण होता है और उसी संस्कार से इस सनातन संस्कृति का निर्माण हुअा भी है) है जिसको सनातन हिन्दू संस्कृति कहते हैं जिसमे संपूर्ण विश्व की सभी संस्कृतियां समाहित हो जाती हैं तो इसी लिए हम इसे सनातन हिन्दू राष्ट्र (देश/राज्य जो अपनी स्वयं की संस्कृति से युक्त हो) कहते है| तो भारत ही नही अखंड भारत एक हिन्दू राष्ट्र ही तो है, इसमे कौन सा प्रश्नवाचक शब्द?

भारत=भा(भगवान) + आ (आदर)) + रत (प्रेमयुक्त) मतलब भारत वह देश (या शरीरधारी=शरीर=काया=निकाय) है जिसमे भगवान के प्रति आदर, सम्मान, आस्था और प्रेम हो| इसी लिए श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत में अर्जुन (शरीरधारी=धनञ्जय) को भारत शब्द से सम्बोधित किया है| क्योंकि अर्जुन को श्रीकृष्ण में अटूट आस्था, आदर, सम्मान और प्रेम था| इसी भगवत गुण में आगर होने मतलब भगवान के प्रति आदर, सम्मान, आस्था और प्रेम के कारन भारत ऋषी भूमि कहा जाता है| क्योंकि ऋषी समाज स्वयं के जीवन में भगवान में अगाध आस्था, सम्मान, आदर और प्रेमयुक्त रहते हुए जीवन रत बना रहता है और अन्य मानव के लिए आदर्श प्रस्तुत करता है।


भारत=भा(भगवान) + आ (आदर)) + रत (प्रेमयुक्त) मतलब भारत वह देश (या शरीरधारी=शरीर=काया=निकाय) है जिसमे भगवान के प्रति आदर, सम्मान, आस्था और प्रेम हो| इसी लिए श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत में अर्जुन (शरीरधारी=धनञ्जय) को भारत शब्द से सम्बोधित किया है| क्योंकि अर्जुन को श्रीकृष्ण में अटूट आस्था, आदर, सम्मान और प्रेम था| इसी भगवत गुण में आगर होने मतलब भगवान के प्रति आदर, सम्मान, आस्था और प्रेम के कारन भारत ऋषी भूमि कहा जाता है| क्योंकि ऋषी समाज स्वयं के जीवन में भगवान में अगाध आस्था, सम्मान, आदर और प्रेमयुक्त रहते हुए जीवन रत बना रहता है और अन्य मानव के लिए आदर्श प्रस्तुत करता है।