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Saturday, July 30, 2016

Vishwamitra=Kaushik=Vishrath=7th Saptarshi=7th Brahmarshi is the founder of Globalization i.e. the Global World concept. He was unstable person and he always wondered here and there in the world by his chariot (rath that move on land, water and air too). >>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

Vishwamitra=Kaushik=Vishrath=7th Saptarshi=7th Brahmarshi is the founder of Globalization i.e. the Global World concept. He was unstable person and he always wondered here and there in the world by his chariot (rath that move on land, water and air too). >>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

तत्कालीन वरिष्ठ लोग जब अपना कर्तव्य नहीं निभा सके जो उम्र में बड़े थे मुझसे वरिष्ठ होने का और स्वयं मुझे सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु +महेश)/ब्रह्म बनाना ही पड़ा तो अब कनिष्ठ भाइयों का नाम लेकर नाम सहित उल्लेख मैं नहीं करना चाहता हूँ न करता हूँ की न वे मुझसे वरिष्ठ हैं और न हो सकते है क्योंकि न वे उतनी सहनसीलता रख सके हैं न रख सकते है| न मैं चाहता हूँ की मेरे रहते उनको या किशी को सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु +महेश)/ब्रह्म बनाना पडे(जिनको बराबर सामने लाया जा रहा है या वह नाम सामने बराबर लाये जा रहे है) यह उनके परिवार और शुभचिंतको के लिए भी हितकर होगा। केवल इतना निवेदन करता हूँ की इस संसार का हर सदस्य स्वविवेक से काम ले और यह सोचे की मृत्यु या मृत्यु से पहले ही "सत्यमेव जयते" की फाँस गले जरूर पड़ेगी और तब गलत कार्य पर अपार कष्ट होगा कोई धर्म या जाती या व्यक्ति या व्यक्ति समूह इससे आप को उबार नहीं पायेगा यहां तक की ईस्वर भी उसका सामना करने को आप से कहेगा। और इसलिए व्यवहार में "सत्यम शिवम् सुंदरम" पर चलते हुए "सत्यमेव जयते" का सामना करना सरल और हितकर रहेगा। जिनकी गलती से मुझे परमब्रह्म बनना पड़ा उसी शक्ति का आश्रय ले मेरा विरोध कर भी अब कोई मेरा कुछ नहीं करता सकता। क्योंकि जब परमब्रह्म अपने में पूर्ण होता है और वह पूर्ण बना दिए आप लोग तो अब हर किशी एक का अस्तित्व मुझसे ही संभव है उस समय मेरा विरोधी पक्ष भी क्यों न रहा हो? तो अपना समय और उस समय के मेरे विरोधी का समय और ऊर्जा जाया न कीजिये क्योंकि इस दुनिया की हर ऊर्जा मुझसे ही निहित है और उसका सकारात्मक/धनात्मक प्रयोग कीजिये मेरे विरोध से कुछ हांसिल नहीं होग। >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]|| *******जय हिन्द ((जम्बूद्वीप=यूरेशिया=यूरोप +एशिय) या कम से कम ईरान से लेकर सिंगापुर और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी)), जय भारत(अखंडभारत=भरतखंड=भारतवर्ष), जय श्रीराम/कृष्ण। https

तत्कालीन वरिष्ठ लोग जब अपना कर्तव्य नहीं निभा सके जो उम्र में बड़े थे मुझसे वरिष्ठ होने का और स्वयं मुझे सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु +महेश)/ब्रह्म बनाना ही पड़ा तो अब कनिष्ठ भाइयों का नाम लेकर नाम सहित उल्लेख मैं नहीं करना चाहता हूँ न करता हूँ की न वे मुझसे वरिष्ठ हैं और न हो सकते है क्योंकि न वे उतनी सहनसीलता रख सके हैं न रख सकते है| न मैं चाहता हूँ की मेरे रहते उनको या किशी को सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु +महेश)/ब्रह्म बनाना पडे(जिनको बराबर सामने लाया जा रहा है या वह नाम सामने बराबर लाये जा रहे है) यह उनके परिवार और शुभचिंतको के लिए भी हितकर होगा। केवल इतना निवेदन करता हूँ की इस संसार का हर सदस्य स्वविवेक से काम ले और यह सोचे की मृत्यु या मृत्यु से पहले ही "सत्यमेव जयते" की फाँस गले जरूर पड़ेगी और तब गलत कार्य पर अपार कष्ट होगा कोई धर्म या जाती या व्यक्ति या व्यक्ति समूह इससे आप को उबार नहीं पायेगा यहां तक की ईस्वर भी उसका सामना करने को आप से कहेगा। और इसलिए व्यवहार में "सत्यम शिवम् सुंदरम" पर चलते हुए "सत्यमेव जयते" का सामना करना सरल और हितकर रहेगा। जिनकी गलती से मुझे परमब्रह्म बनना पड़ा उसी शक्ति का आश्रय ले मेरा विरोध कर भी अब कोई मेरा कुछ नहीं करता सकता। क्योंकि जब परमब्रह्म अपने में पूर्ण होता है और वह पूर्ण बना दिए आप लोग तो अब हर किशी एक का अस्तित्व मुझसे ही संभव है उस समय मेरा विरोधी पक्ष भी क्यों न रहा हो? तो अपना समय और उस समय के मेरे विरोधी का समय और ऊर्जा जाया न कीजिये क्योंकि इस दुनिया की हर ऊर्जा मुझसे ही निहित है और उसका सकारात्मक/धनात्मक प्रयोग कीजिये मेरे विरोध से कुछ हांसिल नहीं होग। >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]|| *******जय हिन्द ((जम्बूद्वीप=यूरेशिया=यूरोप +एशिय) या कम से कम ईरान से लेकर सिंगापुर और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी)), जय भारत(अखंडभारत=भरतखंड=भारतवर्ष), जय श्रीराम/कृष्ण। 

जिसके लिए हर आइना ही अपना हो (कुछ को छोड़ कर अपवाद हर जगह होते हैं ) तो फिर उसे कोई आइना उठाकर दिखाया नहीं करते हैं कुछ नया देखने और दिखाने के लिए? जिसके लिए शीर्षस्थ से लेकर कनिष्ठ पदों तक जिसे देखिये वही अपना था रूप-रंग या नाम-काम से इसी प्रयागराज विश्विद्यालय या उससे बाहर भी तो उससे इस दुनिया में कुछ नया करने को रहता ही क्या? और रहा ही क्या? अतः जो वास्तव में हो चुका वह किसी को पता कैसे चलता? और पता भी नहीं चला। वास्तव में मुर्गे की जान भी जाय और खाने वाले स्वाद भी न पाएं यह तो हो ही नहीं सकता था? पर यह जरूर है की इसे खाने वाला अगर यह कह रहा है की उसे स्वाद नहीं मिला तो वह गलत हो सकता है और उसके मन में कलुष भरा है? >>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

जिसके लिए हर आइना ही अपना हो (कुछ को छोड़ कर अपवाद हर जगह होते हैं ) तो फिर उसे कोई आइना उठाकर दिखाया नहीं करते हैं कुछ नया देखने और दिखाने के लिए? जिसके लिए शीर्षस्थ से लेकर कनिष्ठ पदों तक जिसे देखिये वही अपना था रूप-रंग या नाम-काम से इसी प्रयागराज विश्विद्यालय या उससे बाहर भी तो उससे इस दुनिया में कुछ नया करने को रहता ही क्या? और रहा ही क्या? अतः जो वास्तव में हो चुका वह किसी को पता कैसे चलता? और पता भी नहीं चला। वास्तव में मुर्गे की जान भी जाय और खाने वाले स्वाद भी न पाएं यह तो हो ही नहीं सकता था? पर यह जरूर है की इसे खाने वाला अगर यह कह रहा है की उसे स्वाद नहीं मिला तो वह गलत हो सकता है और उसके मन में कलुष भरा है? >>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज में ब्रह्मा सम्पूर्ण विश्व के कल्याण हेतु तत्पर रहने वाले और हर जाति/धर्म/सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले जो किसी भी जाति/धर्म/सम्प्रदाय से रहे हो ऐसे बहुत से मेढकों को तौल रहे थे जिसमे एक तराजू पर पूरी दुनिया और दूसरी पर कुछ गिने चुने हर जाति/धर्म/देश का प्रतिनिधित्व करने वाले कर्णधार मेढको का समूह था पर जब तौल अपने चरम पर पँहुचा तो हर मेढक अपने-अपने निहित स्वार्थ और वाह्य समाज के ही लोगों के दबाव और कुचक्र में फँसकर एक एक कर उतरने लगा यहाँ तक की ब्रह्मा भी तराजू छोड़ दिए या उनसे भी तराजू छोड़ावा लिया गया पर एक मेढक उस तराजू पर बैठा ही रहा जब तक की दुनिया के वजन को अकेले तौल नहीं लिया और यही नहीं अकेले भारी पड़ने के वावजूद इस दुनिया को अभय जीवन दान दिया और आज उसके लिए प्रतिस्पर्धी मेढक फिर उसी मेढकों में से खोजा जा रहा है जिनको पूरी दुनिया के साथ ही साथ अभय जीवन दान दिया गया था उसी दुनिया का वजन बढ़ाने हेतु जो उस एकल मेढक को छोड़ दिया था। तो वह एकल मेढक स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश अकेले बन ब्रह्मा के तराजू पर बैठा था और तभी इस पूरी दुनिया को इसी प्रयागराज में तौल लिया लेकिन यह गुरु और पितृ-कृपा ही है की दोनों एक साथ उसपर थी वह थे उसके परमगुरु परमपिता परमेश्वर स्वयं उसके गुरु और मामा जी श्रध्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) और परमपिता परमेश्वर स्वयं उसके ताऊजी और प्रेरणाश्रोत डॉ प्रेमचंद (शिव) और संयोग यह की ब्रह्मा भी इन दोनों के गुरु निकले तो फिर श्रीधर और डॉ प्रेमचंद की कृपा जिसपर रही हो तो वह सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्म+विष्णु+महेश)/ब्रह्म कैसे न हो पाता और फिर परमब्रह्म का प्रतिस्पर्धी उन मेढकों में से कौन होगा जो तराजू से उतर कर दोलनगति कर रहे थे। यह अलग बात है की इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी लोगों की झुण्ड में सामान्य मानवीय व्यवहार करते दिखे हो और लोगों को सामान्य जन लगे हो। भौतिक सम्पन्नता और पद प्रतिष्ठा की चाहत और उसकी प्रतिस्पर्धा के चक्कर में रहने वाला इस संसार का कोई भी यात्री जिसको तराजू पर तौल सम्पूर्ण संसार के साथ अभय जीवन दान जिसने दिया है उन सभी मानव के जीवन का आधार स्वयं तराजू पर स्थिर रहने वाला मेढक ही है और इस प्रकार जो स्वयं सबकी संजीवनी हो उसकी प्रतिस्पर्धा में कौन आ सकता है? सहनसीलता उस समय जिसकी जबाब दी होगी उस तराजू पर बैठे रह पाने में जिसपर ब्रह्मा ने कहा था तो फिर और सहन शक्ति हेतु ऊर्जा उतनी या उससे ज्यादा कहाँ से आ जायेगी? सांसारिक जीवन हेतु उसको कोई भी इकाई स्वीकार है लेकिन सांसारिक व्यवहार भी कुछ होता है जिसे चलायमान रखना है तो ऐसे में यह उस एकल मेढक की अपनी जीवन लीला है जो कुछ भी व्यवहारिक तौर दुनिया को सुसंचालित और सुव्यवस्थित दिखने हेतु कर रहा है वह संसार को रोचक बनाये रखने हेतु ही कर रहा है जो 2057 तक चलेगी जब तह की उसका भौतिक शरीर रहने की संभावना है। --- >>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

प्रयागराज विश्विद्यालय, प्रयागराज में ब्रह्मा सम्पूर्ण विश्व के कल्याण हेतु तत्पर रहने वाले और हर जाति/धर्म/सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले जो किसी भी जाति/धर्म/सम्प्रदाय से रहे हो ऐसे बहुत से मेढकों को तौल रहे थे जिसमे एक तराजू पर पूरी दुनिया और दूसरी पर कुछ गिने चुने हर जाति/धर्म/देश का प्रतिनिधित्व करने वाले कर्णधार मेढको का समूह था पर जब तौल अपने चरम पर पँहुचा तो हर मेढक अपने-अपने निहित स्वार्थ और वाह्य समाज के ही लोगों के दबाव और कुचक्र में फँसकर एक एक कर उतरने लगा यहाँ तक की ब्रह्मा भी तराजू छोड़ दिए या उनसे भी तराजू छोड़ावा लिया गया पर एक मेढक उस तराजू पर बैठा ही रहा जब तक की दुनिया के वजन को अकेले तौल नहीं लिया और यही नहीं अकेले भारी पड़ने के वावजूद इस दुनिया को अभय जीवन दान दिया और आज उसके लिए प्रतिस्पर्धी मेढक फिर उसी मेढकों में से खोजा जा रहा है जिनको पूरी दुनिया के साथ ही साथ अभय जीवन दान दिया गया था उसी दुनिया का वजन बढ़ाने हेतु जो उस एकल मेढक को छोड़ दिया था। तो वह एकल मेढक स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश अकेले बन ब्रह्मा के तराजू पर बैठा था और तभी इस पूरी दुनिया को इसी प्रयागराज में तौल लिया लेकिन यह गुरु और पितृ-कृपा ही है की दोनों एक साथ उसपर थी वह थे उसके परमगुरु परमपिता परमेश्वर स्वयं उसके गुरु और मामा जी श्रध्धेय श्री श्रीधर(विष्णु) और परमपिता परमेश्वर स्वयं उसके ताऊजी और प्रेरणाश्रोत डॉ प्रेमचंद (शिव) और संयोग यह की ब्रह्मा भी इन दोनों के गुरु निकले तो फिर श्रीधर और डॉ प्रेमचंद की कृपा जिसपर रही हो तो वह सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्म+विष्णु+महेश)/ब्रह्म कैसे न हो पाता और फिर परमब्रह्म का प्रतिस्पर्धी उन मेढकों में से कौन होगा जो तराजू से उतर कर दोलनगति कर रहे थे। यह अलग बात है की इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी लोगों की झुण्ड में सामान्य मानवीय व्यवहार करते दिखे हो और लोगों को सामान्य जन लगे हो। भौतिक सम्पन्नता और पद प्रतिष्ठा की चाहत और उसकी प्रतिस्पर्धा के चक्कर में रहने वाला इस संसार का कोई भी यात्री जिसको तराजू पर तौल सम्पूर्ण संसार के साथ अभय जीवन दान जिसने दिया है उन सभी मानव के जीवन का आधार स्वयं तराजू पर स्थिर रहने वाला मेढक ही है और इस प्रकार जो स्वयं सबकी संजीवनी हो उसकी प्रतिस्पर्धा में कौन आ सकता है? सहनसीलता उस समय जिसकी जबाब दी होगी उस तराजू पर बैठे रह पाने में जिसपर ब्रह्मा ने कहा था तो फिर और सहन शक्ति हेतु ऊर्जा उतनी या उससे ज्यादा कहाँ से आ जायेगी? सांसारिक जीवन हेतु उसको कोई भी इकाई स्वीकार है लेकिन सांसारिक व्यवहार भी कुछ होता है जिसे चलायमान रखना है तो ऐसे में यह उस एकल मेढक की अपनी जीवन लीला है जो कुछ भी व्यवहारिक तौर दुनिया को सुसंचालित और सुव्यवस्थित दिखने हेतु कर रहा है वह संसार को रोचक बनाये रखने हेतु ही कर रहा है जो 2057 तक चलेगी जब तह की उसका भौतिक शरीर रहने की संभावना है। --- >>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

Thursday, July 28, 2016

सभी पार्टीयों या सभी मतों/संगठनों/जाति/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलंबन के राष्ट्रवादी और मानवतावादी व्यक्ति या जन नायक जो "सत्यमेव जयते" में आस्था रखते हैं और अपने व्यवहारिक कार्यों द्वारा पूर्ण सत्य तक पंहुचने का प्रयास करते है और स्थानीय मानवीय जीवन और उसके आधार पर वैश्विक मानवीय जीवन को उन्नत बनाये रखने और जारी रखने का कार्य करते है और इस प्रकार वैश्विक मानवता को समर्पित थे और आज भी हैं या आगे भी रहने की संभावना है उनके नैतिक कर्तव्य पालन को देखते हुए तो ऐसे में पार्टी/मत/संगठन/जाती/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलंबन से ऊपर उठाकर उनका सम्मान और उनको श्रध्दांजलि देना किसी पार्टी/मत/संगठन/जाती/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलंबन की नीतिगत अनुशासन हीनता की सीमा या अविश्वास की परिधि में नहीं आता है बल्कि यह मानवतावाद में आता है जिसमे एक समाज को संचालित करने वाली एक धनात्मक ऊर्जा वाला व्यक्ति दूसरी धनात्मक ऊर्जा वाले व्यक्ति के कार्यों को श्रेय देते हुए उसके मानवता वादी कार्य को अपने पार्टी/मत/संगठन/जाती/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलंबन के माध्यम से पूरा करने का व्रत लेता है। >>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म

सभी पार्टीयों या सभी मतों/संगठनों/जाति/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलंबन के राष्ट्रवादी और मानवतावादी व्यक्ति या जन नायक जो "सत्यमेव जयते" में आस्था रखते हैं और अपने व्यवहारिक कार्यों द्वारा पूर्ण सत्य तक पंहुचने का प्रयास करते है और स्थानीय मानवीय जीवन और उसके आधार पर वैश्विक मानवीय जीवन को उन्नत बनाये रखने और जारी रखने का कार्य करते है और इस प्रकार वैश्विक मानवता को समर्पित थे और आज भी हैं या आगे भी रहने की संभावना है उनके नैतिक कर्तव्य पालन को देखते हुए तो ऐसे में पार्टी/मत/संगठन/जाती/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलंबन से ऊपर उठाकर उनका सम्मान और उनको श्रध्दांजलि देना किसी पार्टी/मत/संगठन/जाती/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलंबन की नीतिगत अनुशासन हीनता की सीमा या अविश्वास की परिधि में नहीं आता है बल्कि यह मानवतावाद में आता है जिसमे एक समाज को संचालित करने वाली एक धनात्मक ऊर्जा वाला व्यक्ति दूसरी धनात्मक ऊर्जा वाले व्यक्ति के कार्यों को श्रेय देते हुए उसके मानवता वादी कार्य को अपने पार्टी/मत/संगठन/जाती/धर्म/सम्प्रदाय/मतावलंबन के माध्यम से पूरा करने का व्रत लेता है। >>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म

Wednesday, July 27, 2016

प्रयागराज विश्विद्यालय के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवम महासागर अध्धयन केंद्र में 7 फरवरी, 2003 को प्रयागराज विश्वविद्यालय में शोध हेतु नामांकित होने के साथ सैद्धांतिक और व्यवहारिक रूप से केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवम महासागर अध्धयन केंद्र को प्रयागराज विश्विद्यालय का केंद्र बना दिया था और मार्च, 2007 में पूर्ण शोधग्रंथ जमा करने, 11 सितम्बर, 2007 को उसकी मौखिक परिक्षा उत्तीर्ण करने के साथ तो इसे प्रयाग विश्विद्यालय का केंद्र होने से कोई अगर मना कर सकता था तो 18 सितम्बर, 2007 को विश्विद्यालय स्वयं अपने इसी केंद्र से स्वयं शैक्षिक शोध उपाधि देते हुए प्रथम शोध अध्येता मान ही लिया। और इस बीच मई, 2006 में मेरे जो पत्राचार किसी भी सरकारी विभाग से हुए उसमे मैंने जो भी माँगी गयी कागजी जानकारी विश्विद्यालय के सभी एक दर्जन नए अस्थायी केंद्र की दी थी उसके साथ मेरे इसी केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवम महासागर अध्धयन केंद्र से प्रयागराज विश्विद्यालय का शोध छात्र होने और इसी के स्थायी करने के उद्देश्य से किया था यह अलग बात है की दाता लोग महान थे और 2006 दिसंबर जाते जाते लगभग 7 दहाई लोगों के भाग्य के साथ लगभग एक दर्जन केंद्र/विभाग के लिए इस विश्विद्यालय में हरियाली की नयी किरण आयी। तो कोई गुरुजन गुढली न गिने आम खाएं और यह न कहें की केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवम महासागर अध्धयन केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय का केंद्र नहीं और वायुमंडलीय एवम महासागर विज्ञान के 7 स्थाई शिक्षक पद किसी और केंद्र या विभाग के लिए है या यह दो केंद्रों के लिए पद है। ऐसी राजनीती से अच्छी बात तब होती जब ये गुरुजन अपनी काबिलियत उस विषय में दिखला उस विषय विशेष के केंद्र में पद लाएं और दूसरी बात की जब एक विषय का कोई केंद्र उपलब्ध है तो उसी विषय का दूसरा केंद्र या विभाग किस नियम के तहत खोला जाएगा या मान्यता पायेगा? >>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

प्रयागराज विश्विद्यालय के केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवम महासागर अध्धयन केंद्र में 7 फरवरी, 2003 को प्रयागराज विश्वविद्यालय में शोध हेतु नामांकित होने के साथ सैद्धांतिक और व्यवहारिक रूप से केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवम महासागर अध्धयन केंद्र को प्रयागराज विश्विद्यालय का केंद्र बना दिया था और मार्च, 2007 में पूर्ण शोधग्रंथ जमा करने, 11 सितम्बर, 2007 को उसकी मौखिक परिक्षा उत्तीर्ण करने के साथ तो इसे प्रयाग विश्विद्यालय का केंद्र होने से कोई अगर मना कर सकता था तो 18 सितम्बर, 2007 को विश्विद्यालय स्वयं अपने इसी केंद्र से स्वयं शैक्षिक शोध उपाधि देते हुए प्रथम शोध अध्येता मान ही लिया। और इस बीच मई, 2006 में मेरे जो पत्राचार किसी भी सरकारी विभाग से हुए उसमे मैंने जो भी माँगी गयी कागजी जानकारी विश्विद्यालय के सभी एक दर्जन नए अस्थायी केंद्र की दी थी उसके साथ मेरे इसी केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवम महासागर अध्धयन केंद्र से प्रयागराज विश्विद्यालय का शोध छात्र होने और इसी के स्थायी करने के उद्देश्य से किया था यह अलग बात है की दाता लोग महान थे और 2006 दिसंबर जाते जाते लगभग 7 दहाई लोगों के भाग्य के साथ लगभग एक दर्जन केंद्र/विभाग के लिए इस विश्विद्यालय में हरियाली की नयी किरण आयी। तो कोई गुरुजन गुढली न गिने आम खाएं और यह न कहें की केदारेश्वर बनर्जी वायुमंडलीय एवम महासागर अध्धयन केंद्र, प्रयागराज विश्विद्यालय का केंद्र नहीं और वायुमंडलीय एवम महासागर विज्ञान के 7 स्थाई शिक्षक पद किसी और केंद्र या विभाग के लिए है या यह दो केंद्रों के लिए पद है। ऐसी राजनीती से अच्छी बात तब होती जब ये गुरुजन अपनी काबिलियत उस विषय में दिखला उस विषय विशेष के केंद्र में पद लाएं और दूसरी बात की जब एक विषय का कोई केंद्र उपलब्ध है तो उसी विषय का दूसरा केंद्र या विभाग किस नियम के तहत खोला जाएगा या मान्यता पायेगा? >>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

Tuesday, July 26, 2016

घनघोर अंधेरे में जिसे हमेशा एक-एक कर रास्ता सूझता गया वह न तो अज्ञान था, न मूंढ था, न इस दुनिया में किसी से कम तेज दिमाग का था अगर परिस्थितिया एक समान हुईं हो क्योंकि एक समान परिस्थिति अवश्य आयी थी जिसमें वह जब लक्ष्य के प्रति अडिग रहा और किसी भी प्रकार के त्याग, बलिदान और तप के लिए तैयार रहा और किया भी तो बाकी रास्ते बदल लिए और उसी परिश्थिति के सामना करने का प्रत्यक्ष प्रमाण स्वयं उसका भौतिक अस्तित्व, उसकी जीविका और उसकी जीविका का केंद्र और परोक्ष प्रमाण है संभावित अतिशय विनाश से उसके इसी प्रयागराज में केंद्रित हो जाने से संरक्षित की हुई और तब भी और आज भी संजीदगी से चलाती हुई सृष्टि। तो जब सीता ही सृष्टि और राम उसके प्राण तो इस सृष्टि=सीता का संरक्षण किसी राम ने अपने को इसी प्रयागराज के केंद्रित करते हुए अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर और परमपिता परमेश्वर के निर्देशन पर अपने मान, स्वाभिमान और तन, मन, धन और लगभग 14 वर्ष समय को यही लगाकर किया, जबकि वह स्वयं के प्रति वर्तमान मान-अपमान की परिणामी परिस्थियों से अपने गुरु और पिता दोनों को आगाह किया था पर इस सृष्टि मतलब सीता की रक्षा हेतु परमगुरु परमपिता परमेश्वर औरपरमपिता परमेश्वर के निर्देशों का पालन करना उसका परम कर्तव्य जो ठहराया। तो अगर सीता मतलब सृष्टि का संरक्षण ही गुरु और पिता का निर्देश था तो फिर सीता जगत जननी हुई की नहीं जगदम्बा दुर्गा के समान ही और फिर वे भी सशरीर त्रिदेवी (सरस्वती+लक्ष्मी+गौरी:सती:पारवती:गिरिजा:अपर्णा:उमा:सती:सिध्दिदात्री) हुई की नहीं। तो अगर राम अपने में ही सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म मतलब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों के ही उद्भव के स्रोत तो फिर सीता भी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की उद्भव श्रोत है। लेकिन जब राम की वजह से सृष्टि=सीता संरक्षित रही हैं तो जाहिर सी बात है की राम निर्विवादित रूप से श्रेष्ठ हुए इसके लिए वाद-विवाद होना ही राम के प्रति व्यावहारिक और सैध्दांतिक अन्याय है मतलब राम द्वारा इसी सृष्टि मतलब सीता का संरक्षण और स्वयं राम का सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म होना यह सिद्ध करता है की राम से ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती का भी उद्भव है और इस प्रकार सृष्टि और उस सृष्टि के प्राण दोनों का उद्भव राम से ही है यह अकाट्य सत्य है। मतलब राम ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्वोच्च ऊर्जा के स्वयं स्रोत हैं जिससे स्वयं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और इनके चर-अचर का प्रादुर्भाव होता है। और उसमे सरस्वती की विशेष रूप से अथाह महिमा की वही राम उनको माँ के रूप में स्वीकार करते हैं और इस प्रकार राम सरस्वती के जेष्ठ मानस पुत्र बन जाते हैं। तो क्या यह सृष्टि को सम्मान और उसके प्रति संरक्षण भाव नहीं है और क्या यह सृष्टि के सञ्चालन हेतु एक पारिवारिक संस्कार और सांस्कृतिक नियम में बध्ध होने को हमें प्रेरित नहीं करता है या हम हमेशा अधिकार मांगकर कर ही उसके प्रणेता बने रहना चाहते हैं। तो फिर सरस्वती के ज्येष्ठ मानसपुत्र नामतः विवेक:त्रिनेत्र:त्रिलोचन:त्रयम्बक (जो शिव और शिवा की आतंरिक सुरक्षा शक्ति हैं) जग जाहिर है तो फिर राम कौन हैं? उत्तर है की विवेक ही राम हैं और विवेक=राम ही महाशिव हैं जो शिव और शिवा:गौरी:सती:पारवती:गिरिजा:अपर्णा:उमा:सती:सिध्दिदात्री के लिए भी शिव (कल्याणकारी) हैं। अतः विवेक को शिवरामकृष्ण=श्रीरामकृष्ण=रामकृष्ण=श्रीराम=राम (महाशिव) कहा जाय तो कुछ अतिशयोक्ति नहीं है। >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

घनघोर अंधेरे में जिसे हमेशा एक-एक कर रास्ता सूझता गया वह न तो अज्ञान था, न मूंढ था, न इस दुनिया में किसी से कम तेज दिमाग का था अगर परिस्थितिया एक समान हुईं हो क्योंकि एक समान परिस्थिति अवश्य आयी थी जिसमें वह जब लक्ष्य के प्रति अडिग रहा और किसी भी प्रकार के त्याग, बलिदान और तप के लिए तैयार रहा और किया भी तो बाकी रास्ते बदल लिए और उसी परिश्थिति के सामना करने का प्रत्यक्ष प्रमाण स्वयं उसका भौतिक अस्तित्व, उसकी जीविका और उसकी जीविका का केंद्र और परोक्ष प्रमाण है संभावित अतिशय विनाश से उसके इसी प्रयागराज में केंद्रित हो जाने से संरक्षित की हुई और तब भी और आज भी संजीदगी से चलाती हुई सृष्टि। तो जब सीता ही सृष्टि और राम उसके प्राण तो इस सृष्टि=सीता का संरक्षण किसी राम ने अपने को इसी प्रयागराज के केंद्रित करते हुए अपने परमगुरु परमपिता परमेश्वर और परमपिता परमेश्वर के निर्देशन पर अपने मान, स्वाभिमान और तन, मन, धन और लगभग 14 वर्ष समय को यही लगाकर किया, जबकि वह स्वयं के प्रति वर्तमान मान-अपमान की परिणामी परिस्थियों से अपने गुरु और पिता दोनों को आगाह किया था पर इस सृष्टि मतलब सीता की रक्षा हेतु परमगुरु परमपिता परमेश्वर औरपरमपिता परमेश्वर के निर्देशों का पालन करना उसका परम कर्तव्य जो ठहराया। तो अगर सीता मतलब सृष्टि का संरक्षण ही गुरु और पिता का निर्देश था तो फिर सीता जगत जननी हुई की नहीं जगदम्बा दुर्गा के समान ही और फिर वे भी सशरीर त्रिदेवी (सरस्वती+लक्ष्मी+गौरी:सती:पारवती:गिरिजा:अपर्णा:उमा:सती:सिध्दिदात्री) हुई की नहीं। तो अगर राम अपने में ही सशरीर परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म मतलब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों के ही उद्भव के स्रोत तो फिर सीता भी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की उद्भव श्रोत है। लेकिन जब राम की वजह से सृष्टि=सीता संरक्षित रही हैं तो जाहिर सी बात है की राम निर्विवादित रूप से श्रेष्ठ हुए इसके लिए वाद-विवाद होना ही राम के प्रति व्यावहारिक और सैध्दांतिक अन्याय है मतलब राम द्वारा इसी सृष्टि मतलब सीता का संरक्षण और स्वयं राम का सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म होना यह सिद्ध करता है की राम से ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती का भी उद्भव है और इस प्रकार सृष्टि और उस सृष्टि के प्राण दोनों का उद्भव राम से ही है यह अकाट्य सत्य है। मतलब राम ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्वोच्च ऊर्जा के स्वयं स्रोत हैं जिससे स्वयं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और इनके चर-अचर का प्रादुर्भाव होता है। और उसमे सरस्वती की विशेष रूप से अथाह महिमा की वही राम उनको माँ के रूप में स्वीकार करते हैं और इस प्रकार राम सरस्वती के जेष्ठ मानस पुत्र बन जाते हैं। तो क्या यह सृष्टि को सम्मान और उसके प्रति संरक्षण भाव नहीं है और क्या यह सृष्टि के सञ्चालन हेतु एक पारिवारिक संस्कार और सांस्कृतिक नियम में बध्ध होने को हमें प्रेरित नहीं करता है या हम हमेशा अधिकार मांगकर कर ही उसके प्रणेता बने रहना चाहते हैं। तो फिर सरस्वती के ज्येष्ठ मानसपुत्र नामतः विवेक:त्रिनेत्र:त्रिलोचन:त्रयम्बक (जो शिव और शिवा की आतंरिक सुरक्षा शक्ति हैं) जग जाहिर है तो फिर राम कौन हैं? उत्तर है की विवेक ही राम हैं और विवेक=राम ही महाशिव हैं जो शिव और शिवा:गौरी:सती:पारवती:गिरिजा:अपर्णा:उमा:सती:सिध्दिदात्री के लिए भी शिव (कल्याणकारी) हैं। अतः विवेक को शिवरामकृष्ण=श्रीरामकृष्ण=रामकृष्ण=श्रीराम=राम (महाशिव) कहा जाय तो कुछ अतिशयोक्ति नहीं है। >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

राम नाम सनातन संस्कृति का नाम है जिसमे से रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय राम सर्व व्यापक सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म हैं। और राम वह है जो शिव की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) को जाला दे या विष्णु की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) का नाश कर हमें निर्मल और सज्जन बना दे। तो राम शब्द में ही शिव और विष्णु दोनों के गुण अपने आप में निहित है तो रह जाती है ब्रह्मा की बात तो इसके पीछे तथ्य है की इस श्रिष्टि में केवल राम ही अपने में पूर्णतः विवेक मतलब आदि त्रिदेवी मतलब त्रिदेवियों में आद्या मतलब सरस्वती के ज्येष्ठ मानस पुत्र कहे जाने से सभी त्रिदेवों के गुण इनमे अपने आप में समाहित हो जाता है। तो हम कह सकते हैं की राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नाम ऐसे ही रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय दसरथ के कुलगुरु वशिष्ठ ने ऐसे ही नहीं दिए थे वरन ये नाम अपने में ही सनातन नाम हैं और उन नामों में ही उनके गुण छुपे हैं। अगर सीता श्रिष्टि तो राम उस श्रिष्टि के प्राण है और इस प्रकार अगर सीता और राम दोनों इस संसार में अस्तित्व में हैं तो दोनों एक दूसरे के पूरक है इससे ज्यादा मैं कह ही क्या सकता हूँ। >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

राम नाम सनातन संस्कृति का नाम है जिसमे से रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय राम सर्व व्यापक सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म हैं। और राम वह है जो शिव की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) को जाला दे या विष्णु की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) का नाश कर हमें निर्मल और सज्जन बना दे। तो राम शब्द में ही शिव और विष्णु दोनों के गुण अपने आप में निहित है तो रह जाती है ब्रह्मा की बात तो इसके पीछे तथ्य है की इस श्रिष्टि में केवल राम ही अपने में पूर्णतः विवेक मतलब आदि त्रिदेवी मतलब त्रिदेवियों में आद्या मतलब सरस्वती के ज्येष्ठ मानस पुत्र कहे जाने से सभी त्रिदेवों के गुण इनमे अपने आप में समाहित हो जाता है। तो हम कह सकते हैं की राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नाम ऐसे ही रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय दसरथ के कुलगुरु वशिष्ठ ने ऐसे ही नहीं दिए थे वरन ये नाम अपने में ही सनातन नाम हैं और उन नामों में ही उनके गुण छुपे हैं। अगर सीता श्रिष्टि तो राम उस श्रिष्टि के प्राण है और इस प्रकार अगर सीता और राम दोनों इस संसार में अस्तित्व में हैं तो दोनों एक दूसरे के पूरक है इससे ज्यादा मैं कह ही क्या सकता हूँ। >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

Monday, July 25, 2016

The learned people of a world renowned Institute/University who tolled himself the devotee of Lord Ram/Krishna and wanted a centre in an institute/University having exact name of Ravana's son then they should be identified and rewarded for his a long time struggle due to their dual behavior.>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

The learned people of a world renowned Institute/University who tolled himself the devotee of Lord Ram/Krishna and wanted a centre in an institute/University having exact name of Ravana's son then they should be identified and rewarded for his a long time struggle due to their dual behavior.>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

When there was water and water and water was every where in this world then the Lord Shiva appears in his oldest form of Mud (Kichad=Kedar in Hindi) at Kashi and called Kedareshwar i.e. why Kedareshwar is also called the Aadi Shankar or Adyyashankar or Adya=Oldest God(in male while Adya in Female is Goddess Saraswati in TINITY Goddess means Saraswati is the Aadya=Aadidevi=Oldest Goddess among the Saraswati, Lakshmi and Sati:Parvati:Girijia:Aparna:Uma:Gauri:Sidhdhidaatri) and after this he transformed him in Mahamrityunjay and then Vishveshwar (Vishvanath)| Thus 1st place of Lord Shiva is fist City Kashi and his first form is Kedareshwar=Aadishankar =Aadyashankar=Aadya then Mahamrityunjay and then Vishveshwar= Vishvanath and after these three all his forms and places of Lord Shiva comes in all over the world it may be Amar Nath or Kailash.>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

When there was water and water and water was every where in this world then the Lord Shiva appears in his oldest form of Mud (Kichad=Kedar in Hindi) at Kashi and called Kedareshwar i.e. why Kedareshwar is also called the Aadi Shankar or Adyyashankar or Adya=Oldest God(in male while Adya in Female is Goddess Saraswati in TINITY Goddess means Saraswati is the Aadya=Aadidevi=Oldest Goddess among the Saraswati, Lakshmi and Sati:Parvati:Girijia:Aparna:Uma:Gauri:Sidhdhidaatri) and after this he transformed him in Mahamrityunjay and then Vishveshwar (Vishvanath)| Thus 1st place of Lord Shiva is fist City Kashi and his first form is Kedareshwar=Aadishankar =Aadyashankar=Aadya then Mahamrityunjay and then Vishveshwar= Vishvanath and after these three all his forms and places of Lord Shiva comes in all over the world it may be Amar Nath or Kailash.>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

Sunday, July 24, 2016

स्वयं रावण और रावण की भक्ति में फंसे लोगों के जीवन के आधार रामनाथ (न कि रमानाथ) मतलब रामेश्वर मतलब राम के ईस्वर शिव मतलब केदारेश्वर ही है और इसी रामनाथ मतलब रामेश्वर मतलब शिव के ईस्वर स्वयं राम और विष्णु हैं तो आप रावण के भक्त और रावण कब तक बनकर जी सकते हैं वह इसी राम और विष्णु पर निर्भर करेगा? रामेश्वर=रामनाथ=शिव=केदारेश्वर की परिभासा>>>>>रामस्य ईश्वरः सह=रामः यस्य ईश्वरः सह। मतलब वह जो राम का ईस्वर है या जिसके ईस्वर राम हैं वही रामेश्वर=रामनाथ=शिव= केदारेश्वर है। व्यापक अर्थों में>>>>शिव के इस्वर विष्णु और विष्णु के ईस्वर शिव। >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

स्वयं रावण और रावण की भक्ति में फंसे लोगों के जीवन के आधार रामनाथ (न कि रमानाथ) मतलब रामेश्वर मतलब राम के ईस्वर शिव मतलब केदारेश्वर ही है  और इसी रामनाथ मतलब रामेश्वर मतलब शिव के ईस्वर स्वयं राम और विष्णु हैं तो आप रावण के भक्त और रावण कब तक बनकर जी सकते हैं वह इसी राम और विष्णु पर निर्भर करेगा? रामेश्वर=रामनाथ=शिव=केदारेश्वर की परिभासा>>>>>रामस्य ईश्वरः सह=रामः यस्य ईश्वरः सह। मतलब वह जो राम का ईस्वर है या जिसके ईस्वर राम हैं वही   रामेश्वर=रामनाथ=शिव= केदारेश्वर है। व्यापक अर्थों में>>>>शिव के इस्वर विष्णु और विष्णु के ईस्वर शिव। >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||
Ramapur
Bishunpur-Jaunpur
Saha Institute of Nuclear Physics but not Megh Nad Saha Institute of Nuclear Physics
Kedareshwar_Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies
Vivek_Kumar_Pandey

Everyone will go under the wheel of “SATYAMEV JAYATE”, hence we should not show a dual behavior: -----I have many in depth knowledge but one most important point is became the need of time to disclose at this stage: Some people and forces and their agent opposes a group of Brahmans because some of person in those Brahmans group have sympathy with Ravan and his descendants. That person who opposes such Brahmans group himself needed a permanent center of education in a institute by an exact similar name as that of Ravan's son's name. Even an Indian state full of Marxism/Congress oriented public did not given such name to a Institute on same persons honor but they given only that name to that institute in his honor which is the surname of such honorable person. How a dual nature people can justify that they followed the perfect truth and they done final and resultant effort for any given aim and how their stand is right on such important issue. [I also know how and how much these Brahmans opposes (at the point of his personal selfishness they forget this) those Brahmans who have sympathy with Ravan's Kul, so they need not show the Dong and Ponga Panthi] >>>>>>>>>>>A person have taken energy of Brahma has worked according him but a person have taken the all energy of S D M (Vishnu) and also safely got the reserved place of S D M (Vishnu) too by the great devotees of S D M (Vishnu) but his activity was always anti S D M (Vishnu) group, anti S D M (Vishnu) supporter and anti S D M (Vishnu) work culture; means he worked according Ravana's Kul and also he has faith in Ravana's Kul too>It may be his idiocy but according to him he is one of the top intelligent person of the world. But according to me such person and his supporters and the group of persons who use this person for their own selfishness should take the responsibilities of the most destructive events occurred in the world. >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

Everyone will go under the wheel of “SATYAMEV JAYATE”, hence we should not show a dual behavior: -----I have many in depth knowledge but one most important point is became the need of time to disclose at this stage: Some people and forces and their agent opposes a group of Brahmans because some of person in those Brahmans group have sympathy with Ravan and his descendants. That person who opposes such Brahmans group himself needed a permanent center of education in a institute by an exact similar name as that of Ravan's son's name. Even an Indian state full of Marxism/Congress oriented public did not given such name to a Institute on same persons honor but they given only that name to that institute in his honor which is the surname of such honorable person. How a dual nature people can justify that they followed the perfect truth and they done final and resultant effort for any given aim and how their stand is right on such important issue. [I also know how and how much these Brahmans opposes (at the point of his personal selfishness they forget this) those Brahmans who have sympathy with Ravan's Kul, so they need not show the Dong and Ponga Panthi] >>>>>>>>>>>A person have taken energy of Brahma has worked according him but a person have taken the all energy of S D M (Vishnu) and also safely got the reserved place of S D M (Vishnu) too by the great devotees of S D M (Vishnu) but his activity was always anti S D M (Vishnu) group, anti S D M (Vishnu) supporter and anti S D M (Vishnu) work culture; means he worked according Ravana's Kul and also he has faith in Ravana's Kul too>It may be his idiocy but according to him he is one of the top intelligent person of the world. But according to me such person and his supporters and the group of persons who use this person for their own selfishness should take the responsibilities of the most destructive events occurred in the world.  >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||
Kedareshwar_Banerjee_Centre_of_Atmospheric_and_Ocean_Studies
Ramapur
Bishunpur-Jaunpur
Vivek_Kumar_Pandey
Saha Institute of Nuclear Physics but not Megh Nad Saha Institute of Nuclear Physics

Tuesday, July 12, 2016

शायद कुछ शेष नही बचा है "Vivekanand and Modern Tradition" में लिखने हेतु पर अब भी कुछ जिज्ञासा और शंका किसी को होगी तो पुनः उसका समाधान हो जाएगा मेरी लेखनी और कर्मावलोचन द्वारा। राम और रावण के युध्ध के समय श्रीराम और लक्ष्मण को रात में सोते हुए रावण के भाई और विश्व के सबसे बड़े माफिया अहिरावण द्वारा उठा ले जाने और उनको सोते हुए बलि देने से अहिरावण श्रीराम से भी ज्यादा पुरुषार्थी और महिमावान नहीं हो जाता है पर उस सोते हुए श्रीराम लक्ष्मण की रक्षा हेतु आये हुए उन्ही के भक्त हनुमान उस क्षण विशेष के लिए ज्यादा महिमावान जरूर हो जाते हैं लेकिन इससे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की मर्यादा और उनके पुरुषार्थ पर हनुमान भारी नहीं माने जा सकते हैं। वैसे हनुमान अपने को श्रीराम का भक्त ही केवल अवश्य मानते थे पर श्रीराम उनको अपने भाई भरत के समान ही मानते थे (तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई)। तो इसी प्रकार एक दो सन्दर्भ में मलिन बस्ती में निवास करने वाले काशीराम के कुछ कदम आगे हो जाने से रामप्रसाद की सार्वभौमिक श्रेष्ठता जाती नहीं है? मुख्य बस्ती में जीना सायद और अधिक सांस्कृतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व और प्रतिबंधित जीवन जीने की दृंढ निष्ठा वाला होता है जिसकी अपनी एक विशेष गरिमा और मर्यादा होती है जिसका सनातन काल से सतत पालन करते रहना और उसे आगे भी बनाए रहने की प्रतिबध्धता उसे और अधिक सार्वभौमिक श्रेष्ठता प्रदान करती है। जो घर के मुख्य आँगन पर अगर सौभाग्य वस उसके हिस्से में आ चुका है (अगर उसके हिस्से में नही आया है तो कोई बात नहीं ) और वह आज भी दिया जला रहा है वह उत्तरदायित्वों के नाते और पारिवारिक मर्यादा का पालन वह आज भी कर रहा है तो उसको कैसे न अधिक महत्व दिया जाय? >>>>>>>>>मुझे जहाँ तक ज्ञांत है की भृगु ऋषि; और काशिराज दक्ष प्रजापति (ब्रह्मा और सरस्वती की एक मात्र भौतिक संतान) जो नारी जगत के स्रोत और नारी जगत के परमपिता हैं:- इन दोनों के सबसे बड़े पूज्य (ईस्ट देव) सच्चिदानन्दघन चतुर्भुज भगवान विष्णु (श्रीधर=श्रीकांत=श्रीप्रकाश=लक्ष्मीनारायण) ही हैं जो देवाधिदेव महादेव शिवशंकर के भी ईस्ट देव है और स्वयं यही देवाधिदेव महादेव शिवशंकर उसी सच्चिदानन्दघन चतुर्भुज भगवान विष्णु (रमानाथ=श्रीधर=श्रीकांत= श्रीप्रकाश=लक्ष्मीनारायण) के ही ईस्ट देव हैं। तो महादेव (शिव), विष्णु और ब्रह्मा के चक्रीय क्रम से कोई बच नहीं सका है और न बचेगा भी। तो जो श्रीराम/कृष्ण बन महादेव (शिव), विष्णु और ब्रह्मा जैसी तीनो शक्तियों मतलब सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म अवस्था को धारण किया हो तथा इस परीक्षा और विस्वाश में खरा उतरते हुए अपने को प्रमाणित किया हो उसकी परिक्षा तो केवल वही ले सकता है या उसको केवल वही समझ सकता है पूर्ण रूप से जिसने उस पर विशवास किया हो या जिसमे उसके प्रति अटूट आस्था हो या वह ही समझ और परीक्षा ले सकता है जो स्वयं ऐसी तीन शक्तियों को एक साथ धारण किया हो? लेकिन जिसने तीनो शक्तियों को सशरीर धारण किया है तो वह सम्पूर्ण मानवता का आधार बन चुका है तो फिर वह बचता कौन है जो उसकी परीक्षा ले सकता है या उसे पूर्णतां समझ सकता है? तो वह हैं स्वयं शिव और विष्णु जिन्होंने उस पर विश्वास किया था श्रिष्टि को बचाने और अधिकतम संरक्षण और संवर्धन करने के उद्देश्य से और इस प्रकार ब्रह्मा का कार्य पूर्ण करने के उद्देश्य से और सृष्टि सञ्चालन का कार्य पटरी पर लाने के लिए? तो जब विभीषिका टल गयी हो तो यह दुनिया उसी को तौलने का निरर्थक प्रयास कर रही है उसके सामान्य सज्जन जीवन में पुनः पाकर उसको दुर्बल समझते हुए। तो जो सम्पूर्ण मानव जगत का आधार बना था स्वयं शिव, विष्णु और ब्रह्मा मतलब त्रिदेव को धारण कर और इस सम्पूर्ण मानव जगत का आधार बना था उसके प्रति मतिभ्रम में मत रहिये। --------हे मानव जगत आप की मतिभ्रम को दूर कर ईस्वर आप लोगों का कल्याण करे। >>>>>>>>क्या यह नहीं हो सकता है की कोई पूर्ण ब्राह्मण, पूर्ण क्षत्रिय और पूर्ण वैश्य तीनों में पूर्णता को प्राप्त हो अपने पुरुषार्थ द्वारा तो क्या वह पूर्ण ब्राह्मण नहीं हुआ? क्या वह पूर्ण क्षत्रिय नहीं हुआ? और क्या वह पूर्ण वैश्य नहीं हुआ? अगर ऐसा नहीं होता तो सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म अवश्था कोई इस ब्रह्माण्ड में कैसे प्राप्त कर सकता? हाँ संभव है पर उसके लिए असीमित सहन शक्ति और पुरुषार्थ चाहिए और इसी लिए ऐसा होता है की कुछ सामान्य ब्राह्मण लोग किसी श्रेष्ठतम ब्राह्मण को गैर ब्राह्मण सिध्ध करने लगते हैं। >>>>>>>>>>>>>>>यह श्रेष्ठ है उससे और वह श्रेष्ठ है उससे का का चक्कर चलता रहता है उसका कोई अन्त नहीं होता पर जिस तथ्य का विश्व्यापक प्रमाण उपलब्ध है इसी प्रयागराज/इला आवास/इला आबाद/अल्लाह आबाद/अल्लाहाबाद/त्रिसंगम/त्रिवेणी/प्राक्यज्ञ स्थल जहाँ पर ब्रह्मा द्वारा आहूत और त्रिदेव (शिव+विष्णु+ब्रह्मा) द्वारा किये गए श्रिष्टि के प्राचीनतम यज्ञ में सप्तर्षि प्रकट हुए जिसे प्रक्रिष्ठा यज्ञ स्थल भी कहते है, वहाँ पर एक मात्र आजीवन अखण्ड ब्रह्मचारी और तद्नुरूप ब्रह्मवत श्रेष्ठतम आचरण करने वाला और अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहने वाला कोई ब्राह्मण अवश्य आया था और मौजूद भी हैं 15 वर्ष से अनवरत अभी भी जिसके सामने सब ब्राह्मण कुमार बौने पड़ गए पूर्ण ब्रह्मवत आचरण के मानक और त्याग-तपश्या-बलिदान में तो जाहिर सी बात है की बहुमत उस ब्राह्मण कुमार के साथ नहीं रहेगा और शेष लोग उसे गैर ब्राह्मण शिध्ध कर ही सकते हैं ( जो केवल मूक दर्शी बने रहे या मार्ग से हट गए निहित स्वार्थ में या आधे अधूरे मन से शामिल रहे) क्योंकि वह श्रेष्ठतम ब्राह्मण कुमार वह अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहा और उसे प्राप्त कर ही रहा। तो सीधी सी बात अगर उसे कोई उसका लक्ष्य प्राप्त करने से नहीं रोक सका तो कोई भी बहुमत उसे पराजित भी नहीं कर सकता क्योंकि सत्य को केवल परेशान किया जा सकता है पराजित नहीं किया जा सकता। यह जरूरी है वह किसी-किसी जीती हुयी बाजी के लिए ही संघर्ष करा रहा क्योंकि समाज को मर्यादित और संयमित जीवन सिखा रहा है और जीवन में सत्य के लिए संघर्ष करना शिखा रहा है।>>>>>>>>>>>>>> क्या यह नहीं हो सकता है की कोई पूर्ण ब्राह्मण, पूर्ण क्षत्रिय और पूर्ण वैश्य तीनों में पूर्णता को प्राप्त हो अपने पुरुषार्थ द्वारा तो क्या वह पूर्ण ब्राह्मण नहीं हुआ? क्या वह पूर्ण क्षत्रिय नहीं हुआ? और क्या वह पूर्ण वैश्य नहीं हुआ? अगर ऐसा नहीं होता तो सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म अवश्था कोई इस ब्रह्माण्ड में कैसे प्राप्त कर सकता? हाँ संभव है पर उसके लिए असीमित सहन शक्ति और पुरुषार्थ चाहिए और इसी लिए ऐसा होता है की लोग किसी श्रेष्ठतम ब्राह्मण को गैर ब्राह्मण सिध्ध करने लगते हैं। >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

शायद कुछ शेष नही बचा है "Vivekanand and Modern Tradition" में लिखने हेतु पर अब भी कुछ जिज्ञासा और शंका किसी को होगी तो पुनः उसका समाधान हो जाएगा मेरी लेखनी और कर्मावलोचन द्वारा। राम और रावण के युध्ध के समय श्रीराम और लक्ष्मण को रात में सोते हुए रावण के भाई और विश्व के सबसे बड़े माफिया अहिरावण द्वारा उठा ले जाने और उनको सोते हुए बलि देने से अहिरावण श्रीराम से भी ज्यादा पुरुषार्थी और महिमावान नहीं हो जाता है पर उस सोते हुए श्रीराम  लक्ष्मण की रक्षा हेतु आये हुए उन्ही के भक्त हनुमान उस क्षण विशेष के लिए ज्यादा महिमावान जरूर हो जाते हैं लेकिन इससे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की मर्यादा और उनके पुरुषार्थ पर हनुमान भारी नहीं माने जा सकते हैं।  वैसे हनुमान अपने को श्रीराम का भक्त ही केवल अवश्य मानते थे पर श्रीराम उनको अपने भाई भरत के समान ही मानते थे  (तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई)।  तो इसी प्रकार एक दो सन्दर्भ में मलिन बस्ती में निवास करने वाले काशीराम के कुछ कदम आगे हो जाने से रामप्रसाद की सार्वभौमिक श्रेष्ठता जाती नहीं है? मुख्य बस्ती में जीना सायद और अधिक सांस्कृतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व और प्रतिबंधित जीवन जीने की दृंढ निष्ठा वाला होता है जिसकी अपनी एक विशेष गरिमा और मर्यादा होती है जिसका सनातन काल से सतत पालन करते रहना और उसे आगे भी बनाए रहने की प्रतिबध्धता उसे और अधिक सार्वभौमिक श्रेष्ठता प्रदान करती है।  जो घर के मुख्य आँगन पर अगर सौभाग्य वस उसके हिस्से में आ चुका है (अगर उसके हिस्से में नही आया है तो कोई बात नहीं ) और वह आज भी दिया जला रहा है वह उत्तरदायित्वों के नाते और पारिवारिक मर्यादा का पालन वह आज भी कर रहा है तो उसको कैसे न अधिक महत्व दिया जाय?  >>>>>>>>>मुझे जहाँ तक ज्ञांत है की भृगु ऋषि; और काशिराज दक्ष प्रजापति (ब्रह्मा और सरस्वती की एक मात्र भौतिक संतान) जो नारी जगत के स्रोत और नारी जगत के परमपिता हैं:- इन दोनों के सबसे बड़े पूज्य (ईस्ट देव) सच्चिदानन्दघन चतुर्भुज भगवान विष्णु (श्रीधर=श्रीकांत=श्रीप्रकाश=लक्ष्मीनारायण) ही हैं जो देवाधिदेव महादेव शिवशंकर के भी ईस्ट देव है और स्वयं यही देवाधिदेव महादेव शिवशंकर उसी सच्चिदानन्दघन चतुर्भुज भगवान विष्णु (रमानाथ=श्रीधर=श्रीकांत= श्रीप्रकाश=लक्ष्मीनारायण) के ही ईस्ट देव हैं। तो महादेव (शिव), विष्णु और ब्रह्मा के चक्रीय क्रम से कोई बच नहीं सका है और न बचेगा भी। तो जो श्रीराम/कृष्ण बन महादेव (शिव), विष्णु और ब्रह्मा जैसी तीनो शक्तियों मतलब सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म अवस्था को धारण किया हो तथा इस परीक्षा और विस्वाश में खरा उतरते हुए अपने को प्रमाणित किया हो उसकी परिक्षा तो केवल वही ले सकता है या उसको केवल वही समझ सकता है पूर्ण रूप से जिसने उस पर विशवास किया हो या जिसमे उसके प्रति अटूट आस्था हो या वह ही समझ और परीक्षा ले सकता है जो स्वयं ऐसी तीन शक्तियों को एक साथ धारण किया हो? लेकिन जिसने तीनो शक्तियों को सशरीर धारण किया है तो वह सम्पूर्ण मानवता का आधार बन चुका है तो फिर वह बचता कौन है जो उसकी परीक्षा ले सकता है या उसे पूर्णतां समझ सकता है? तो वह हैं स्वयं शिव और विष्णु जिन्होंने उस पर विश्वास किया था श्रिष्टि को बचाने और अधिकतम संरक्षण और संवर्धन करने के उद्देश्य से और इस प्रकार ब्रह्मा का कार्य पूर्ण करने के उद्देश्य से और सृष्टि सञ्चालन का कार्य पटरी पर लाने के लिए? तो जब विभीषिका टल गयी हो तो यह दुनिया उसी को तौलने का निरर्थक प्रयास कर रही है उसके सामान्य सज्जन जीवन में पुनः पाकर उसको दुर्बल समझते हुए। तो जो सम्पूर्ण मानव जगत का आधार बना था स्वयं शिव, विष्णु और ब्रह्मा मतलब त्रिदेव को धारण कर और इस सम्पूर्ण मानव जगत का आधार बना था उसके प्रति मतिभ्रम में मत रहिये। --------हे मानव जगत आप की मतिभ्रम को दूर कर ईस्वर आप लोगों का कल्याण करे। >>>>>>>>क्या यह नहीं हो सकता है की कोई पूर्ण ब्राह्मण, पूर्ण क्षत्रिय और पूर्ण वैश्य तीनों में पूर्णता को प्राप्त हो अपने पुरुषार्थ द्वारा तो क्या वह पूर्ण ब्राह्मण नहीं हुआ? क्या वह पूर्ण क्षत्रिय नहीं हुआ? और क्या वह पूर्ण वैश्य नहीं हुआ? अगर ऐसा नहीं होता तो सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म अवश्था कोई इस ब्रह्माण्ड में कैसे प्राप्त कर सकता? हाँ संभव है पर उसके लिए असीमित सहन शक्ति और पुरुषार्थ चाहिए और इसी लिए ऐसा होता है की कुछ सामान्य ब्राह्मण लोग किसी श्रेष्ठतम ब्राह्मण को गैर ब्राह्मण सिध्ध करने लगते हैं। >>>>>>>>>>>>>>>यह श्रेष्ठ है उससे और वह श्रेष्ठ है उससे का का चक्कर चलता रहता है उसका कोई अन्त नहीं होता पर जिस तथ्य का विश्व्यापक प्रमाण उपलब्ध है इसी प्रयागराज/इला आवास/इला आबाद/अल्लाह आबाद/अल्लाहाबाद/त्रिसंगम/त्रिवेणी/प्राक्यज्ञ स्थल जहाँ पर ब्रह्मा द्वारा आहूत और त्रिदेव (शिव+विष्णु+ब्रह्मा) द्वारा किये गए श्रिष्टि के प्राचीनतम यज्ञ में सप्तर्षि प्रकट हुए जिसे प्रक्रिष्ठा यज्ञ स्थल भी कहते है, वहाँ पर एक मात्र आजीवन अखण्ड ब्रह्मचारी और तद्नुरूप ब्रह्मवत श्रेष्ठतम आचरण करने वाला और अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहने वाला कोई ब्राह्मण अवश्य आया था और मौजूद भी हैं 15 वर्ष से अनवरत अभी भी जिसके सामने सब ब्राह्मण कुमार बौने पड़ गए पूर्ण ब्रह्मवत आचरण के मानक और त्याग-तपश्या-बलिदान में तो जाहिर सी बात है की बहुमत उस ब्राह्मण कुमार के साथ नहीं रहेगा और शेष लोग उसे गैर ब्राह्मण शिध्ध कर ही सकते हैं ( जो केवल मूक दर्शी बने रहे या मार्ग से हट गए निहित स्वार्थ में या आधे अधूरे मन से शामिल रहे) क्योंकि वह श्रेष्ठतम ब्राह्मण कुमार वह अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहा और उसे प्राप्त कर ही रहा। तो सीधी सी बात अगर उसे कोई उसका लक्ष्य प्राप्त करने से नहीं रोक सका तो कोई भी बहुमत उसे पराजित भी नहीं कर सकता क्योंकि सत्य को केवल परेशान किया जा सकता है पराजित नहीं किया जा सकता। यह जरूरी है वह किसी-किसी जीती हुयी बाजी के लिए ही संघर्ष करा रहा क्योंकि समाज को मर्यादित और संयमित जीवन सिखा रहा है और जीवन में सत्य के लिए संघर्ष करना शिखा रहा है।>>>>>>>>>>>>>> क्या यह नहीं हो सकता है की कोई पूर्ण ब्राह्मण, पूर्ण क्षत्रिय और पूर्ण वैश्य तीनों में पूर्णता को प्राप्त हो अपने पुरुषार्थ द्वारा तो क्या वह पूर्ण ब्राह्मण नहीं हुआ? क्या वह पूर्ण क्षत्रिय नहीं हुआ? और क्या वह पूर्ण वैश्य नहीं हुआ? अगर ऐसा नहीं होता तो सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म अवश्था कोई इस ब्रह्माण्ड में कैसे प्राप्त कर सकता? हाँ संभव है पर उसके लिए असीमित सहन शक्ति और पुरुषार्थ चाहिए और इसी लिए ऐसा होता है की लोग किसी श्रेष्ठतम ब्राह्मण को गैर ब्राह्मण सिध्ध करने लगते हैं।  >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

देवकाली (महासरस्वती+महालक्ष्मी+महागौरी:पारवती:सती मतलब तीनो की तीनों महादेवियों की सम्मिलित शक्ति) जिसकी कुल देवी हो मतलब वह देवी दुर्गा का स्वरुप जिसमे वे दैत्यों के अत्याचार से क्रोधित हो विकराल रूप धारण करती हैं और क्रोध के कारन उत्पन्न हुई अतिरिक्त ऊर्जा से जिनका शरीर काला पड़ गया हो और वे दुर्गा से देवकाली कहलाई हों| वह देवी देवकाली जिसकी कुल देवी हों उस पर नारी अपमान और नारी शोषण या नारी समाज के साथ व्यभिचार का आरोप लगा या उसपर रंगभेद का आरोप लगाते हुए कोई भी अघोषित युध्ध कर जीत हांसिल नहीं कर सकते हैं। और यह भी की वह न तो किसी भी गोरे या काले पर किसी के भी द्वारा अनावश्यक किसी भी प्रकार का व्यापक रूपों में बल प्रयोग होने देगा चाहे वह संख्याबल(बाहुबल), धनबल या बुध्धिबल किसी भी रूप में हो और यह भी की दूसरे की संम्पत्ति और इज्जत पर कागदृष्टि डालने वालों की भी सुधि वह ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के समाज को "सत्यमेव जयते" की कसौटी पर कसते हुए लेगा। टिप्पणी: देवकाली ही रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय राम की भी कुल देवी हैं जो सर्वविदित है इस मानव जगत में। >>>>>> पंचमुखी महादेव : महादेव की शिवलिंग रूप में ही पूजा की जाती है| परन्तु देवाधिदेव महादेव के प्रतीकात्मक रूप से पाँच मुख हैं तथा, दुर्वासा ऋषि द्वारा रचित शैवागम शास्त्रों में इनकी विस्तृत व्याख्या है! महादेव के ये पांचो मुख हमारी प्रकृति के मूल पाँच तत्वों के प्रतीक हैं:-सद्योजात (जल); वामदेव (वायु); अघोर (आकाश); तत्पुरुष (अग्नि); एवं ईशान (पृथ्वी)|>>>>>>>>> पंचमुखी हनुमान जी: श्रीराम और रावण युद्ध में भाई रावण की मदद के लिए अहिरावण ने ऐसी माया रची कि सारी सेना गहरी निद्रा में सो गई। तब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण करके उन्हें निद्रावस्था में पाताल लोक ले गया। इस विपदा के समय में सभी ने संकट मोचन हनुमानजी का स्मरण किया। हनुमान जी तुरंत पाताल लोक पहुंचे और द्वार पर रक्षक के रूप में तैनात मकरध्वज से युद्घ कर उसे परास्त किया। जब हनुमानजी पातालपुरी के महल में पहुंचे तो श्रीराम और लक्ष्मण बंधक अवस्था में थे। हनुमान ने देखा कि वहां चार दिशाओं में पांच दीपक जल रहे थे और मां भवानी के सम्मुख श्रीराम एवं लक्ष्मण की बलि देने की पूरी तैयारी थी। अहिरावण का अंत करना है तो इन पांच दीपकों को एक साथ एक ही समय में बुझाना था। रहस्य पता चलते ही हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धरा। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरूड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। सारे दीपकों को बुझाकर उन्होंने अहिरावण का अंत किया।>>>>>>>>>>>>पंचमुखी और दशभुजी गायत्री की देवी सविता है। सविता का अर्थ है सूर्य-प्रकाश पुञ्ज मतलब सूर्य की आभा तो जिस प्रकार पुरुष की आभा स्रोत उसकी भार्या और उस भार्या का स्रोत उसका पति उसी तथ्य के आधार पर सूर्य की पत्नी गायत्री/सविता कही गयी है मतलब सूर्य की ऊर्जा का स्रोत हैं गायत्री/सावता| गायत्री के पाँच मुख हमें बताते हैं कि जीव सत्ता के साथ पाँच सशक्त देवता, उसके लक्ष्य प्रयोजनों को पूर्ण करने के लिए मिले हुए हैं। वे निद्रा ग्रस्त हो जाने के कारण मृत्युतुल्य पड़े रहते हैं और किसी काम नहीं आते। फलतः जीव दीन दुर्बल बना रहता है। यदि इन सशक्त सहायकों को जगाया जा सके उनकी सामर्थ्य का उपयोग किया जा सके तो मनुष्य सामान्य न रहकर असामान्य बनेगा। दुर्दशा ग्रस्त स्थिति से उबरने और अपने महान गौरव के अनुरूप जीवन- यापन का अवसर मिलेगा। शरीरगत पाँच तत्वों का उल्लेख पाँच देवताओं के रूप में इस प्रकार किया गया है – "आकाशस्याधिपो विष्णुरग्नेश्चैव महेश्वरी। दायोः सूर्यः क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिपः।।" - कपिलतन्त्र आकाश के अधिपति हैं विष्णु। अग्नि की अधिपति महेश्वरी शक्ति हैं। वायु- अधिपति सूर्य हैं। पृथ्वी के स्वामी शिव हैं और जल के अधिपति गणपति गणेश जी हैं। इस प्रकार पंच देव शरीर के पंचतत्वों की ही अधिपति- सत्तायें हैं। पाँच तत्वों से बने इस शरीर में उसके सत्व गुण चेतना के पाँच उभारों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं (१) मन, माइण्ड (२) बुद्धि, इण्टिलैक्ट (३) इच्छा, विल (४) चित्त, माइण्ड स्टफ (५) अहंकार, ईगो। पाँच तत्वों (फाइव ऐलीमेण्ट्स) के राजस तत्व से पाँच प्राण (वाइटल फोर्सेज) उत्पन्न होते हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ उन्हीं के आधार पर अपने विषयों का उत्तरदायित्व निबाहती हैं। तत्वों के तमस भाग से काय कलेवर का निर्माण हुआ है। (१) रस (२) रक्त (३) माँस (४) अस्थि (५) मज्जा के रूप में उन्हें क्रिया निरत काया में देखा जा सकता है। मस्तिष्क, हृदय, आमाशय, फुफ्फुस और गुर्दे यह पाँचों विशिष्ट अवयव, तथा पाँच कर्मेन्द्रियों को उसी क्षेत्र का उत्पादन कह सकते हैं। जीव सत्ता के सहयोग के लिए मिले पाँच देवताओं को पाँच कोश कहा जाता है। यों दीखने में शरीर एक ही दिखाई पड़ता है, फिर भी उनकी सामर्थ्य क्रमशः एक से एक बढ़ी- चढ़ी है। ऐसे ही पाँच शरीरों को यह जीव धारण किए हुए है। अंग में एक ही शरीर दीखता है, शेष चार प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होते, फिर भी उनकी सामर्थ्य क्रमशः एक से एक की बढ़ी- चढ़ी है। न दीखते हुए भी वे इतने शक्ति सम्पन्न हैं कि उनकी क्षमताओं को जगाया जा सकना सम्भव हो सके तो मनुष्य तुच्छ से महान और आत्मा से परमात्मा बन सकता है। जीव पर चढ़े हुए पाँच आवरणों, पाँच कोशों के नाम हैं (१) अन्नमय- कोश (२) प्राणमय कोश (३) मनोमय कोश (४) विज्ञानमय कोश (५) आनन्दमय कोश। तैत्तिरीय उपनिषद् में अन्नमय के भीतर प्राणमय का, प्राणमय के भीतर मनोमय का, मनोमय के भीतर विज्ञानमय का और विज्ञानमय के भीतर आनन्दमय कोष का वर्णन है। इनमें बहुत कुछ साम्य और बहुत कुछ अन्तर है। इसकी चर्चा इस प्रकार हुई है। '' स वा एष पुरूषोsन्नरसमयः। तसएदमेव शिरः। अयं दक्षिणः पक्षः अयमुत्तरः पक्षः। अयमात्मा। इदं पुच्छं प्रतिष्ठा ।' तै० उ० २| १ | १ मनुष्य अन्न रसमय है। यही उसका शिर है यही उसका दक्षिण पक्ष है। यही उसका उत्तर पक्ष है। यह आत्मा है। यह पुच्छ तन्त्र मेरुदण्ड पर प्रतिष्ठित है।>>>>>>>>>गायत्री के पाँच मुख जीव के ऊपर लिपटे हुए पंच कोश- पाँच आवरण हैं। और दस भुजाएँ, दस सिद्धियाँ एवं अनुभूतियाँ हैं, पाँच भुजाएँ बाईं ओर पाँच दाहिनी ओर हैं उसका संकेत गायत्री महाशक्ति के साथ जुड़ी हुई पाँच भौतिक और पाँच शक्तियों एवं सिद्धियों की ओर है। इस महाशक्ति का अवतरण जहाँ भी होगा वहाँ वे दस अनुभूतियाँ- विशेषतायें सम्पदायें निश्चित रूप से परिलक्षित होंगी। साधना का अर्थ एक नियत पूजा स्थान पर बैठकर अमुक क्रिया- कलाप पूरा कर लेना मात्र ही नहीं है, वरन समस्त जीवन को साधनामय बनाकर अपने गुण कर्म स्वभाव को इतने उत्कृष्ट स्तर का बनाना है कि उसमें वे विभूतियाँ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने लगें, जिनका संकेत पंचमुखी माता की प्रतिमा में दस भुजायें दिखाकर किया जाता है। भुजायें, शक्तियाँ एवं सामर्थ्य की प्रतीक हैं साधना का उद्देश्य शक्ति प्राप्त करना है। दस शक्तियाँ, दस सिद्धियाँ जीवन साधना के द्वारा जब प्राप्त की जाने लगें तो समझना चाहिए कि कोई गायत्री उपासक उच्चस्तरीय साधन, पथ पर सफलता पूर्वक अग्रसर हो रहा है | >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

देवकाली (महासरस्वती+महालक्ष्मी+महागौरी:पारवती:सती मतलब तीनो की तीनों महादेवियों की सम्मिलित शक्ति) जिसकी कुल देवी हो मतलब वह देवी दुर्गा का स्वरुप जिसमे वे दैत्यों के अत्याचार से क्रोधित हो विकराल रूप धारण करती हैं और क्रोध के कारन उत्पन्न हुई अतिरिक्त ऊर्जा से जिनका शरीर काला पड़ गया हो और वे दुर्गा से देवकाली कहलाई हों| वह देवी देवकाली जिसकी कुल देवी हों उस पर नारी अपमान और नारी शोषण या नारी समाज के साथ व्यभिचार का आरोप लगा या उसपर रंगभेद का आरोप लगाते हुए कोई भी अघोषित युध्ध कर जीत हांसिल नहीं कर सकते हैं। और यह भी की वह न तो किसी भी गोरे या काले पर किसी के भी द्वारा अनावश्यक किसी भी प्रकार का व्यापक रूपों में बल प्रयोग होने देगा चाहे वह संख्याबल(बाहुबल), धनबल या बुध्धिबल किसी भी रूप में हो और यह भी की दूसरे की संम्पत्ति और इज्जत पर कागदृष्टि डालने वालों की भी सुधि वह ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के समाज को "सत्यमेव जयते" की कसौटी पर कसते हुए लेगा। टिप्पणी: देवकाली ही रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय राम की भी कुल देवी हैं जो सर्वविदित है इस मानव जगत में। >>>>>> पंचमुखी महादेव : महादेव की शिवलिंग रूप में ही पूजा की जाती है| परन्तु देवाधिदेव महादेव के प्रतीकात्मक रूप से पाँच मुख हैं तथा, दुर्वासा ऋषि द्वारा रचित शैवागम शास्त्रों में इनकी विस्तृत व्याख्या है! महादेव के ये पांचो मुख हमारी प्रकृति के मूल पाँच तत्वों के प्रतीक हैं:-सद्योजात (जल); वामदेव (वायु); अघोर (आकाश); तत्पुरुष (अग्नि); एवं ईशान (पृथ्वी)|>>>>>>>>> पंचमुखी हनुमान जी: श्रीराम और रावण युद्ध में भाई रावण की मदद के लिए अहिरावण ने ऐसी माया रची कि सारी सेना गहरी निद्रा में सो गई। तब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण करके उन्हें निद्रावस्था में पाताल लोक ले गया। इस विपदा के समय में सभी ने संकट मोचन हनुमानजी का स्मरण किया। हनुमान जी तुरंत पाताल लोक पहुंचे और द्वार पर रक्षक के रूप में तैनात मकरध्वज से युद्घ कर उसे परास्त किया। जब हनुमानजी पातालपुरी के महल में पहुंचे तो श्रीराम और लक्ष्मण बंधक अवस्था में थे। हनुमान ने देखा कि वहां चार दिशाओं में पांच दीपक जल रहे थे और मां भवानी के सम्मुख श्रीराम एवं लक्ष्मण की बलि देने की पूरी तैयारी थी। अहिरावण का अंत करना है तो इन पांच दीपकों को एक साथ एक ही समय में बुझाना था। रहस्य पता चलते ही हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धरा। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरूड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। सारे दीपकों को बुझाकर उन्होंने अहिरावण का अंत किया।>>>>>>>>>>>>पंचमुखी और दशभुजी गायत्री की देवी सविता है। सविता का अर्थ है सूर्य-प्रकाश पुञ्ज मतलब सूर्य की आभा तो जिस प्रकार पुरुष की आभा स्रोत उसकी भार्या और उस भार्या का स्रोत उसका पति उसी तथ्य के आधार पर सूर्य की पत्नी गायत्री/सविता कही गयी है मतलब सूर्य की ऊर्जा का स्रोत हैं गायत्री/सावता| गायत्री के पाँच मुख हमें बताते हैं कि जीव सत्ता के साथ पाँच सशक्त देवता, उसके लक्ष्य प्रयोजनों को पूर्ण करने के लिए मिले हुए हैं। वे निद्रा ग्रस्त हो जाने के कारण मृत्युतुल्य पड़े रहते हैं और किसी काम नहीं आते। फलतः जीव दीन दुर्बल बना रहता है। यदि इन सशक्त सहायकों को जगाया जा सके उनकी सामर्थ्य का उपयोग किया जा सके तो मनुष्य सामान्य न रहकर असामान्य बनेगा। दुर्दशा ग्रस्त स्थिति से उबरने और अपने महान गौरव के अनुरूप जीवन- यापन का अवसर मिलेगा। शरीरगत पाँच तत्वों का उल्लेख पाँच देवताओं के रूप में इस प्रकार किया गया है –
"आकाशस्याधिपो विष्णुरग्नेश्चैव महेश्वरी।
दायोः सूर्यः क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिपः।।"
- कपिलतन्त्र
आकाश के अधिपति हैं विष्णु। अग्नि की अधिपति महेश्वरी शक्ति हैं। वायु- अधिपति सूर्य हैं। पृथ्वी के स्वामी शिव हैं और जल के अधिपति गणपति गणेश जी हैं। इस प्रकार पंच देव शरीर के पंचतत्वों की ही अधिपति- सत्तायें हैं। पाँच तत्वों से बने इस शरीर में उसके सत्व गुण चेतना के पाँच उभारों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं (१) मन, माइण्ड (२) बुद्धि, इण्टिलैक्ट (३) इच्छा, विल (४) चित्त, माइण्ड स्टफ (५) अहंकार, ईगो। पाँच तत्वों (फाइव ऐलीमेण्ट्स) के राजस तत्व से पाँच प्राण (वाइटल फोर्सेज) उत्पन्न होते हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ उन्हीं के आधार पर अपने विषयों का उत्तरदायित्व निबाहती हैं। तत्वों के तमस भाग से काय कलेवर का निर्माण हुआ है। (१) रस (२) रक्त (३) माँस (४) अस्थि (५) मज्जा के रूप में उन्हें क्रिया निरत काया में देखा जा सकता है। मस्तिष्क, हृदय, आमाशय, फुफ्फुस और गुर्दे यह पाँचों विशिष्ट अवयव, तथा पाँच कर्मेन्द्रियों को उसी क्षेत्र का उत्पादन कह सकते हैं। जीव सत्ता के सहयोग के लिए मिले पाँच देवताओं को पाँच कोश कहा जाता है। यों दीखने में शरीर एक ही दिखाई पड़ता है, फिर भी उनकी सामर्थ्य क्रमशः एक से एक बढ़ी- चढ़ी है। ऐसे ही पाँच शरीरों को यह जीव धारण किए हुए है। अंग में एक ही शरीर दीखता है, शेष चार प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होते, फिर भी उनकी सामर्थ्य क्रमशः एक से एक की बढ़ी- चढ़ी है। न दीखते हुए भी वे इतने शक्ति सम्पन्न हैं कि उनकी क्षमताओं को जगाया जा सकना सम्भव हो सके तो मनुष्य तुच्छ से महान और आत्मा से परमात्मा बन सकता है। जीव पर चढ़े हुए पाँच आवरणों, पाँच कोशों के नाम हैं (१) अन्नमय- कोश (२) प्राणमय कोश (३) मनोमय कोश (४) विज्ञानमय कोश (५) आनन्दमय कोश। तैत्तिरीय उपनिषद् में अन्नमय के भीतर प्राणमय का, प्राणमय के भीतर मनोमय का, मनोमय के भीतर विज्ञानमय का और विज्ञानमय के भीतर आनन्दमय कोष का वर्णन है। इनमें बहुत कुछ साम्य और बहुत कुछ अन्तर है। इसकी चर्चा इस प्रकार हुई है।
'' स वा एष पुरूषोsन्नरसमयः। तसएदमेव शिरः। अयं दक्षिणः पक्षः अयमुत्तरः पक्षः। अयमात्मा। इदं पुच्छं प्रतिष्ठा ।'
तै० उ० २| १ | १
मनुष्य अन्न रसमय है। यही उसका शिर है यही उसका दक्षिण पक्ष है। यही उसका उत्तर पक्ष है। यह आत्मा है। यह पुच्छ तन्त्र मेरुदण्ड पर प्रतिष्ठित है।>>>>>>>>>गायत्री के पाँच मुख जीव के ऊपर लिपटे हुए पंच कोश- पाँच आवरण हैं। और दस भुजाएँ, दस सिद्धियाँ एवं अनुभूतियाँ हैं, पाँच भुजाएँ बाईं ओर पाँच दाहिनी ओर हैं उसका संकेत गायत्री महाशक्ति के साथ जुड़ी हुई पाँच भौतिक और पाँच शक्तियों एवं सिद्धियों की ओर है। इस महाशक्ति का अवतरण जहाँ भी होगा वहाँ वे दस अनुभूतियाँ- विशेषतायें सम्पदायें निश्चित रूप से परिलक्षित होंगी। साधना का अर्थ एक नियत पूजा स्थान पर बैठकर अमुक क्रिया- कलाप पूरा कर लेना मात्र ही नहीं है, वरन समस्त जीवन को साधनामय बनाकर अपने गुण कर्म स्वभाव को इतने उत्कृष्ट स्तर का बनाना है कि उसमें वे विभूतियाँ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने लगें, जिनका संकेत पंचमुखी माता की प्रतिमा में दस भुजायें दिखाकर किया जाता है। भुजायें, शक्तियाँ एवं सामर्थ्य की प्रतीक हैं साधना का उद्देश्य शक्ति प्राप्त करना है। दस शक्तियाँ, दस सिद्धियाँ जीवन साधना के द्वारा जब प्राप्त की जाने लगें तो समझना चाहिए कि कोई गायत्री उपासक उच्चस्तरीय साधन, पथ पर सफलता पूर्वक अग्रसर हो रहा है | >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

राम नाम सनातन संस्कृति का नाम है जिसमे से रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय राम सर्व व्यापक सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म हैं। और राम वह है जो शिव की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) को जाला दे या विष्णु की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) का नाश कर हमें निर्मल और सज्जन बना दे। तो राम शब्द में ही शिव और विष्णु दोनों के गुण अपने आप में निहित है तो रह जाती है ब्रह्मा की बात तो इसके पीछे तथ्य है की इस श्रिष्टि में केवल राम ही अपने में पूर्णतः विवेक मतलब आदि त्रिदेवी मतलब त्रिदेवियों में आद्या मतलब सरस्वती के ज्येष्ठ मानस पुत्र कहे जाने से सभी त्रिदेवों के गुण इनमे अपने आप में समाहित हो जाता है। तो हम कह सकते हैं की राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नाम ऐसे ही रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय दसरथ के कुलगुरु वशिष्ठ ने ऐसे ही नहीं दिए थे वरन ये नाम अपने में ही सनातन नाम हैं और उन नामों में ही उनके गुण छुपे हैं। अगर सीता श्रिष्टि तो राम उस श्रिष्टि के प्राण है और इस प्रकार अगर सीता और राम दोनों इस संसार में अस्तित्व में हैं तो दोनों एक दूसरे के पूरक है इससे ज्यादा मैं कह ही क्या सकता हूँ। >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

राम नाम सनातन संस्कृति का नाम है जिसमे से रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय राम सर्व व्यापक सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म हैं। और राम वह है जो शिव की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) को जाला दे या विष्णु की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) का नाश कर हमें निर्मल और सज्जन बना दे। तो राम शब्द में ही शिव और विष्णु दोनों के गुण अपने आप में निहित है तो रह जाती है ब्रह्मा की बात तो इसके पीछे तथ्य है की इस श्रिष्टि में केवल राम ही अपने में पूर्णतः विवेक मतलब आदि त्रिदेवी मतलब त्रिदेवियों में आद्या मतलब सरस्वती के ज्येष्ठ मानस पुत्र कहे जाने से सभी त्रिदेवों के गुण इनमे अपने आप में समाहित हो जाता है। तो हम कह सकते हैं की राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नाम ऐसे ही रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय दसरथ के कुलगुरु वशिष्ठ ने ऐसे ही नहीं दिए थे वरन ये नाम अपने में ही सनातन नाम हैं और उन नामों में ही उनके गुण छुपे हैं। अगर सीता श्रिष्टि तो राम उस श्रिष्टि के प्राण है और इस प्रकार अगर सीता और राम दोनों इस संसार में अस्तित्व में हैं तो दोनों एक दूसरे के पूरक है इससे ज्यादा मैं कह ही क्या सकता हूँ।  >>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

सम्पूर्ण नारी जगत ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज (दक्षप्रजापति) की पुत्रियों से ही जनित है जिसमे से सती:पार्वती:शिवा/शिव:शंकर के अलावा अन्य सभी 13 बहनों का विवाह कश्यप ऋषी से हुआ था। तो नारी जगत के प्रथम पिता काशिराज (दक्षप्रजापति) ही हैं और यही काशी नारी जगत का मूल स्रोत हैं|>>>>>>> >>>>>>>>>>>>>> >>>>>>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]|| >>>>>>जिसके परमगुरु परमपिता परमेश्वर उसके स्वयं के मामा जी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण श्रीधर(विष्णु) और जिसके परमपिता परमेश्वर उसके ताऊजी मतलब सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण डॉ प्रेमचंद (शिव)। >>>>>>>सम्पूर्ण नारी जगत ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज (दक्षप्रजापति) की पुत्रियों से ही जनित है जिसमे से सती:पार्वती:शिवा/शिव:शंकर के अलावा अन्य सभी 13 बहनों का विवाह कश्यप ऋषी से हुआ था। तो नारी जगत के प्रथम पिता काशिराज (दक्षप्रजापति) ही हैं और यही काशी नारी जगत का मूल स्रोत हैं।

सम्पूर्ण नारी जगत ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज (दक्षप्रजापति) की पुत्रियों से ही जनित है जिसमे से सती:पार्वती:शिवा/शिव:शंकर के अलावा अन्य सभी 13 बहनों का विवाह कश्यप ऋषी से हुआ था। तो नारी जगत के प्रथम पिता काशिराज (दक्षप्रजापति) ही हैं और यही काशी नारी जगत का मूल स्रोत हैं|>>>>>>> >>>>>>>>>>>>>> >>>>>>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]|| >>>>>>जिसके परमगुरु परमपिता परमेश्वर उसके स्वयं के मामा जी सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण श्रीधर(विष्णु) और जिसके परमपिता परमेश्वर उसके ताऊजी मतलब सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण डॉ प्रेमचंद (शिव)। >>>>>>>सम्पूर्ण नारी जगत ब्रह्मा और सरस्वती के भौतिक पुत्र काशिराज (दक्षप्रजापति) की पुत्रियों से ही जनित है जिसमे से सती:पार्वती:शिवा/शिव:शंकर के अलावा अन्य सभी 13 बहनों का विवाह कश्यप ऋषी से हुआ था। तो नारी जगत के प्रथम पिता काशिराज (दक्षप्रजापति) ही हैं और यही काशी नारी जगत का मूल स्रोत हैं।

उतर प्रदेश से हूँ तो अंतिम प्रश्न का भी उत्तर दे ही देता हूँ संख्याबल(बाहुबल)/धनबल/बुध्धिबल की बात करने वालों को की अपने अभीष्ट लक्ष्य को हांसिल करने के अलावा "मैं कौन सा ख़याल हूँ/था/रहूँगा"। >>>>पुरुष समाज की हर तरह की मदांधता जिसमे की वे मुझे पहचान नहीं सके उनकी ज्यादती के आगे हार गयी समकालीन देवियों से प्रेरित भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर, कर्णाटक, भारतवर्ष की भारत के लगभग हर भाग से अध्यनरत देवियों का एक समूह मेरे इस प्रयागराज में ही 2001-2007 तक में ही 11/18 सितंबर, 2007 में ही अभीष्ट लक्ष्य/कठोर व्रत के पूर्ण होने पर मेरे वहाँ 23 अक्टूबर, 2007 पहुंचने के दो माह के भीतर 2008 के प्रारम्भ से पहले मेरे द्वारा वहां की किसी भी देवी को भी वरण करने पर वैवाहिक लगन करा देने को तैयार थीं (मेरे प्रति उनका अप्रतिम विश्वास की मेरे द्वारा वर्णित सम्बन्ध सामाजिक आदर्श की सीमा के अंदर ही होगा), तो फिर मेरा यह उत्तर की "मैं स्वयं वरण किया जाता हूँ किसी का वरण स्वयं नहीं करता हूँ और यह भी की मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा जी, परम श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु)अब जहां कहेंगे और अभी अवध क्षेत्र में जहां तय करने जा रहे हैं वही से मेरा सम्बन्ध होगा", तो क्या समकालीन देवी समूह और छल द्वारा विवस कर उनको हार जाने को विवस करने वाले पुरुष समूह पर मेरी विजय नहीं हुई थी और क्या मेरे अवध क्षेत्र से सम्बन्ध हो जाने की बात से गुरु श्रेष्ठता की स्वीकरोति नहीं होती वैसे अगर वह गुरु भृगुवंशी क्षेत्र जमदग्निपुर/जौनपुर से हो तो उससे बड़ा सौभाग्य और भी कुछ होगा क्या जिस क्षेत्र के लिए वैश्विक स्तर का सुरक्षा कवच सप्तर्षि भृगु की मूल भृगुवंशी भूमि बलिया सतत कार्यरत है।>>>>>> उतर प्रदेश से हूँ तो अंतिम प्रश्न का भी उत्तर दे ही देता हूँ संख्याबल(बाहुबल)/धनबल/बुध्धिबल की बात करने वालों को की अपने अभीष्ट लक्ष्य को हांसिल करने के अलावा "मैं कौन सा ख़याल हूँ/था/रहूँगा"।>>>>>>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

उतर प्रदेश से हूँ तो अंतिम प्रश्न का भी उत्तर दे ही देता हूँ संख्याबल(बाहुबल)/धनबल/बुध्धिबल की बात करने वालों को की अपने अभीष्ट लक्ष्य को हांसिल करने के अलावा "मैं कौन सा ख़याल हूँ/था/रहूँगा"। >>>>पुरुष समाज की हर तरह की मदांधता जिसमे की वे मुझे पहचान नहीं सके उनकी ज्यादती के आगे हार गयी समकालीन देवियों से प्रेरित भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर, कर्णाटक, भारतवर्ष की भारत के लगभग हर भाग से अध्यनरत देवियों का एक समूह मेरे इस प्रयागराज में ही 2001-2007 तक में ही 11/18 सितंबर, 2007 में ही अभीष्ट लक्ष्य/कठोर व्रत के पूर्ण होने पर मेरे वहाँ 23 अक्टूबर, 2007 पहुंचने के दो माह के भीतर 2008 के प्रारम्भ से पहले मेरे द्वारा वहां की किसी भी देवी को भी वरण करने पर वैवाहिक लगन करा देने को तैयार थीं (मेरे प्रति उनका अप्रतिम विश्वास की मेरे द्वारा वर्णित सम्बन्ध सामाजिक आदर्श की सीमा के अंदर ही होगा), तो फिर मेरा यह उत्तर की "मैं स्वयं वरण किया जाता हूँ किसी का वरण स्वयं नहीं करता हूँ और यह भी की मेरे परमगुरु परमपिता परमेश्वर मेरे मामा जी, परम श्रद्धेय श्री श्रीधर(विष्णु)अब जहां कहेंगे और अभी अवध क्षेत्र में जहां तय करने जा रहे हैं वही से मेरा सम्बन्ध होगा", तो क्या समकालीन देवी समूह और छल द्वारा विवस कर उनको हार जाने को विवस करने वाले पुरुष समूह पर मेरी विजय नहीं हुई थी और क्या मेरे अवध क्षेत्र से सम्बन्ध हो जाने की बात से गुरु श्रेष्ठता की स्वीकरोति नहीं होती वैसे अगर वह गुरु भृगुवंशी क्षेत्र जमदग्निपुर/जौनपुर से हो तो उससे बड़ा सौभाग्य और भी कुछ होगा क्या जिस क्षेत्र के लिए वैश्विक स्तर का सुरक्षा कवच सप्तर्षि भृगु की मूल भृगुवंशी भूमि बलिया सतत कार्यरत है।>>>>>> उतर प्रदेश से हूँ तो अंतिम प्रश्न का भी उत्तर दे ही देता हूँ संख्याबल(बाहुबल)/धनबल/बुध्धिबल की बात करने वालों को की अपने अभीष्ट लक्ष्य को हांसिल करने के अलावा "मैं कौन सा ख़याल हूँ/था/रहूँगा"।>>>>>>>>>>>>>>>विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी क्षत्रिय परिवार) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म तिथि: 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]||

प्रश्न है की क्या महाकाल के अवतार और त्रिदेव की शक्तियों से सम्पन्न ऋषि दुर्वाशा जिनको कृष्णात्रेय भी कहते थे और जिनका प्रथम निवास/आश्रम आजमगढ़ और द्वितीय निवास/आश्रम प्रयागराज है (मतलब वह कृष्ण जो सप्तर्षि अत्री और उनकी पत्नी सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर आज तक की परम सती अनुसुइया के पुत्र) उनको तथा श्रीराम भक्त हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर को आतंकवादी कहा जा सकता है? जिसमे से दुर्वाशा अयोध्या/कौशलपुर को जला देने की धमकी शेषनाग अवतार लक्ष्मण को दे चुके थे और लोग उनके थर थर कांपते रहते थे की उनके सामने हमारे में ही कोई गलती वे न पा जाय और दूसरे हनुमान तो स्वयं महाबली और महा प्रतापी राजा रावण के रहते हुए भी उसकी लंका को जलाकर तमाशा तो देख ही चुके है और रावण के भाई पाताललोक(वर्तमान का सबसे तथाकथित महाशक्ति देश: जिसको स्वयं पर ग्रहण लगने का ख़तरा महसूस होता रहता है) के राजा और तत्कालीन विश्व के सबसे बड़े माफिआ अहिरावण की भुजा उखाड़ते हुए मारकर, श्रीराम और लक्षमण को छुड़ाते हुए अपने पुत्र मकरदध्वज को श्रीराम की इक्षा पर ही सिंहासनारूढ़ वे कर ही चुके है।>>>>>>>तो फिर प्रश्न यही है की क्या ये दोनों लोग आतंकवादी है? और अगर इनको आतंकवादी कहा भी जाय तो क्या ये ईमान और धर्म पर रहने वालों के लिए आतंक के पर्याय थे? निश्चित तौर पर ये आतंकवादी नहीं थे और ईमान और धर्म पर रहने वाले को इनसे कुछ भी डर नहीं था मतलब उनके लिए ये आतंक के पर्याय नहीं थे और जिनको डर था भी तो ये वह लोग थे जो व्यहारिक तौर पर भी गलत थे। उनको इनका डर और आतंक हमेशा था, है और हमेशा रहेगा।

प्रश्न है की क्या महाकाल के अवतार और त्रिदेव की शक्तियों से सम्पन्न ऋषि दुर्वाशा जिनको कृष्णात्रेय भी कहते थे और जिनका प्रथम निवास/आश्रम आजमगढ़ और द्वितीय निवास/आश्रम प्रयागराज है (मतलब वह कृष्ण जो सप्तर्षि अत्री और उनकी पत्नी सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर आज तक की परम सती अनुसुइया के पुत्र) उनको तथा श्रीराम भक्त हनुमान/अम्बवादेकर/अम्बेडकर को आतंकवादी कहा जा सकता है? जिसमे से दुर्वाशा अयोध्या/कौशलपुर को जला देने की धमकी शेषनाग अवतार लक्ष्मण को दे चुके थे और लोग उनके थर थर कांपते रहते थे की उनके सामने हमारे में ही कोई गलती वे न पा जाय और दूसरे हनुमान तो स्वयं महाबली और महा प्रतापी राजा रावण के रहते हुए भी उसकी लंका को जलाकर तमाशा तो देख ही चुके है और रावण के भाई पाताललोक(वर्तमान का सबसे तथाकथित महाशक्ति देश: जिसको स्वयं पर ग्रहण लगने का ख़तरा महसूस होता रहता है) के राजा और तत्कालीन विश्व के सबसे बड़े माफिआ अहिरावण की भुजा उखाड़ते हुए मारकर, श्रीराम और लक्षमण को छुड़ाते हुए अपने पुत्र मकरदध्वज को श्रीराम की इक्षा पर ही सिंहासनारूढ़ वे कर ही चुके है।>>>>>>>तो फिर प्रश्न यही है की क्या ये दोनों लोग आतंकवादी है? और अगर इनको आतंकवादी कहा भी जाय तो क्या ये ईमान और धर्म पर रहने वालों के लिए आतंक के पर्याय थे? निश्चित तौर पर ये आतंकवादी नहीं थे और ईमान और धर्म पर रहने वाले को इनसे कुछ भी डर नहीं था मतलब उनके लिए ये आतंक के पर्याय नहीं थे और जिनको डर था भी तो ये वह लोग थे जो व्यहारिक तौर पर भी गलत थे। उनको इनका डर और आतंक हमेशा था, है और हमेशा रहेगा।

Monday, July 11, 2016

निहित स्वार्थ और आनुवंशिक परिष्कार हेतु चरितहीनता को समाज में बढ़ाते हो तो फिर आतंक से क्यों डरते हो यह आतंक तो चरित्रहीनता से ही बढ़ रहा है न। कामसूत्र शास्त्र की विद्या को अपने स्वार्थ्य में वर्तमान के सफल प्रयोग करने वालों के लिए विशेष रूप से यह टिप्पणी है। Everyone will go under the wheel of “SATYAMEV JAYATE”, hence we should not show a dual behavior: -----I have many in depth knowledge but one most important point is became the need of time to disclose at this stage: Some people and forces and their agent opposes a group of Brahmans because some of person in those Brahmans group have sympathy with Ravan and his descendants. That person who opposes such Brahmans group himself needed a permanent center of education in a institute by an exact similar name as that of Ravan's son's name. Even an Indian state full of Marxism/Congress oriented public did not given such name to a Institute on same persons honor but they given only that name to that institute in his honor which is the surname of such honorable person. How a dual nature people can justify that they followed the perfect truth and they done final and resultant effort for any given aim and how their stand is right on such important issue. [I also know how and how much these Brahmans opposes (at the point of his personal selfishness they forget this) those Brahmans who have sympathy with Ravan's Kul, so they need not show the Dong and Ponga Panthi]

निहित स्वार्थ और आनुवंशिक परिष्कार हेतु चरितहीनता को समाज में बढ़ाते हो तो फिर आतंक से क्यों डरते हो यह आतंक तो चरित्रहीनता से ही बढ़ रहा है न। कामसूत्र शास्त्र की विद्या को अपने स्वार्थ्य में वर्तमान के सफल प्रयोग करने वालों के लिए विशेष रूप से यह टिप्पणी है। Everyone will go under the wheel of “SATYAMEV JAYATE”, hence we should not show a dual behavior: -----I have many in depth knowledge but one most important point is became the need of time to disclose at this stage: Some people and forces and their agent opposes a group of Brahmans because some of person in those Brahmans group have sympathy with Ravan and his descendants. That person who opposes such Brahmans group himself needed a permanent center of education in a institute by an exact similar name as that of Ravan's son's name. Even an Indian state full of Marxism/Congress oriented public did not given such name to a Institute on same persons honor but they given only that name to that institute in his honor which is the surname of such honorable person. How a dual nature people can justify that they followed the perfect truth and they done final and resultant effort for any given aim and how their stand is right on such important issue. [I also know how and how much these Brahmans opposes (at the point of his personal selfishness they forget this) those Brahmans who have sympathy with Ravan's Kul, so they need not show the Dong and Ponga Panthi]

I will certainly acknowledge the cooperation of each and every human from any caste/religion/category/male or female at the reasonable occasion at time to time, who became direct and indirect base/supporter in any form during 15 years of world wide challenging journey of my life started from my family/old combined family members/closed relatives/member of my villages and maternal village.

I will certainly acknowledge the cooperation of each and every human from any caste/religion/category/male or female at the reasonable occasion at time to time, who became direct and indirect base/supporter in any form during 15 years of world wide challenging journey of my life started from my family/old combined family members/closed relatives/member of my villages and maternal village.

Sunday, July 10, 2016

Allahabad University Alumni Association (AUAA), Registered Under Society Act 1860 (Reg. no. 407/2000):--इस दुनिया में बिना कुछ दिए भीख भी नहीं मिलाती और माँगने पर मौत भी नहीं मिलाती है वरन भींख के बदले दुआ आप स्वयं दो या न दो पर भीख जो देता है दुआ उसको आप से अपने आप मिल ही जाती है; और आप अपने दुर्दिन से खिन्न हो मौत भी ईस्वर से मांगते हैं तो वह तभी मिलाती है जब आप के पूर्व और इस जन्म के पाप कट जाते है आप की दीन-हीन दशा और कस्ट सहने से(बिना पूर्व जन्म के पाप काटे सुदामा को भी अपने मित्र भगवान श्रीकृष्ण के यहां जाने को सुशीला भी प्रेरित न कर सकी यह जानते हुए भी की श्रीकृष्ण और सुदामा में बहुत ही गहरी दोस्ती है): तो स्वयं मुझ समेत इन 42 महानुभाव में कुछ दम और सामजिक और वैज्ञानिक योगदान नजर आया ही होगा जो इनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय का गौरवशाली पुराछात्रों में स्थान दिया था सम्बंधित लोगों ने:

Allahabad University Alumni Association (AUAA), Registered Under Society Act 1860 (Reg. no. 407/2000):--इस दुनिया में बिना कुछ दिए भीख भी नहीं मिलाती और माँगने पर मौत भी नहीं मिलाती है वरन भींख के बदले दुआ आप स्वयं दो या न दो पर भीख जो देता है दुआ उसको आप से अपने आप मिल ही जाती है; और आप अपने दुर्दिन से खिन्न हो मौत भी ईस्वर से मांगते हैं तो वह तभी मिलाती है जब आप के पूर्व और इस जन्म के पाप कट जाते है आप की दीन-हीन दशा और कस्ट सहने से(बिना पूर्व जन्म के पाप काटे सुदामा को भी अपने मित्र भगवान श्रीकृष्ण के यहां जाने को सुशीला भी प्रेरित न कर सकी यह जानते हुए भी की श्रीकृष्ण और सुदामा में बहुत ही गहरी दोस्ती है): तो स्वयं मुझ समेत इन 42 महानुभाव में कुछ दम और सामजिक और वैज्ञानिक योगदान नजर आया ही होगा जो इनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय का गौरवशाली पुराछात्रों में स्थान दिया था सम्बंधित लोगों ने:
Allahabad University Proud Past Alumni
A U Proud Past Alumni 42 in number
http://archive.is/NAet
http://archive.is/Mn8Oe
http://auaa.in/ 

परमब्रह्म/ब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/सर्वोच्च सत्ता/सर्वोच्च-असीमित ऊर्जा निकाय का स्वरुप अगर सशरीर अस्तित्व में माना गया है और इस ऋषि भूमि भारत में संभव होता रहा है श्रीराम और श्रीकृष्ण सरीखे/तुल्य तो यह सब प्रमाणित करता है की प्रकृति का अस्तित्व समाप्त हो भी जाय (जब की केवल सशरीर बात हो रही है वास्तविकता है की प्रकृति उसी सशरीर पुरुष परमब्रह्म में समाहित हो जाती है पर उसका स्वयं का अस्तित्व निराकार ही सही संरक्षित रहता है) तो भी पुरुष का अस्तित्व सशरीर संभव है और उस सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/सर्वोच्च सत्ता/सर्वोच्च-असीमित ऊर्जा निकाय पुरुष से पुनः पुनः सशरीर पुरुष और सशरीर प्रकृति का जन्म होता रहता है। तो फिर जहाँ का समाज पुरुष प्रधान है उस समाज पर एक वर्ग/इकाई विशेष के अंतरधार्मिक/जातीय विवाह से परोक्ष रूप से कुछ सामजिक असर तो जरूर पड़ता है समाज के वर्ग विन्यास पर लेकिन उसका अन्त इससे हो जाएगा या बहुत क्षीण हो जाएगा यह सत्य नहीं क्योंकि यह अन्योन्याश्रित और उभयपक्षीय सामाजिक क्रिया है तो ऐसे में एक उपाय है की जो आप के स्वयं के घर/जाति/धर्म/सम्प्रदाय/पंथ/मार्ग व्यवस्था में आता हो तो यथा संभव आप भी स्वागत कीजिये।

परमब्रह्म/ब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/सर्वोच्च सत्ता/सर्वोच्च-असीमित ऊर्जा निकाय का स्वरुप अगर सशरीर अस्तित्व में माना गया है और इस ऋषि भूमि भारत में संभव होता रहा है श्रीराम और श्रीकृष्ण सरीखे/तुल्य तो यह सब प्रमाणित करता है की प्रकृति का अस्तित्व समाप्त हो भी जाय (जब की केवल सशरीर बात हो रही है वास्तविकता है की प्रकृति उसी सशरीर पुरुष परमब्रह्म में समाहित हो जाती है पर उसका स्वयं का अस्तित्व निराकार ही सही संरक्षित रहता है) तो भी पुरुष का अस्तित्व सशरीर संभव है और उस सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/सर्वोच्च सत्ता/सर्वोच्च-असीमित ऊर्जा निकाय पुरुष से पुनः पुनः सशरीर पुरुष और सशरीर प्रकृति का जन्म होता रहता है। तो फिर जहाँ का समाज पुरुष प्रधान है उस समाज पर एक वर्ग/इकाई विशेष के अंतरधार्मिक/जातीय विवाह से परोक्ष रूप से कुछ सामजिक असर तो जरूर पड़ता है समाज के वर्ग विन्यास पर लेकिन उसका अन्त इससे हो जाएगा या बहुत क्षीण हो जाएगा यह सत्य नहीं क्योंकि यह अन्योन्याश्रित और उभयपक्षीय सामाजिक क्रिया है तो ऐसे में एक उपाय है की जो आप के स्वयं के घर/जाति/धर्म/सम्प्रदाय/पंथ/मार्ग व्यवस्था में आता हो तो यथा संभव आप भी स्वागत कीजिये। 

Saturday, July 9, 2016

संत ह्रदय नवनीत समाना। कह कबिहिन पर कहई न जाना।। निज परिताप द्रवहिं नवनीते। पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ संत का ह्रदय नवनीत(मक्खन) के समान कोमल होता है इस बात को कवि लोग कहते हैं पर वे कहना ही नहीं जानते हैं मतलब ठीक-ठीक नहीं वर्णन कर पाते हैं। क्योंकि नवनीत तो स्वयं को बाहर से ताप दिए जाने से द्रवित होता है पर संत तो वे पावन लोग हैं जो परमार्थ जीवन धारण करते हैं और समाज में दूसरों के दुःख को दूर कर सुख प्रदान करने के प्रयास में दुःख के भागीदार होते हैं।

Re-संत ह्रदय नवनीत समाना। कह कबिहिन पर कहई न जाना।। निज परिताप द्रवहिं नवनीते। पर दुःख द्रवहिं संत पुनीते॥ संत का ह्रदय नवनीत(मक्खन) के समान कोमल होता है इस बात को कवि लोग कहते हैं पर वे कहना ही नहीं जानते हैं मतलब ठीक-ठीक नहीं वर्णन कर पाते हैं। क्योंकि नवनीत तो स्वयं को बाहर से ताप दिए जाने से द्रवित होता है पर संत तो वे पावन लोग हैं जो परमार्थ जीवन धारण करते हैं और समाज में दूसरों के दुःख को दूर कर सुख प्रदान करने के प्रयास में दुःख के भागीदार होते हैं।

जो हमारी प्राकृतिक जाति/धर्म/सम्प्रदाय/पंथ/मार्ग में पहले से है या शामिल हुआ था या शामिल हुआ है या आगे भी शामिल होगा उसका हम हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करते हैं और यथा संभव उसका सम्मान और संरक्षण भी कर रहे हैं और करेंगे पर जो हमारी जाति/धर्म/सम्प्रदाय/पंथ/मार्ग व्यवस्था से अलग हुआ उसको भी इस चेतावनी के साथ साधुवाद की मेरा यह प्राकृतिक जाति/धर्म/सम्प्रदाय/पंथ/मार्ग ही उसको राह सुझाएगा और संरक्षण देगा जब उसको हर जगह से ठोकर लगेगी और कोई मार्ग दिखाई नहीं देगा या जब उसके जीवन का अंतिम समय होगा तो भी यही प्राकृतिक धर्म और यही प्रकृति उसको अपने आँचल में पनाह देगा।

जो हमारी प्राकृतिक जाति/धर्म/सम्प्रदाय/पंथ/मार्ग में पहले से है या शामिल हुआ था या शामिल हुआ है या आगे भी शामिल होगा उसका हम हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करते हैं और यथा संभव उसका सम्मान और संरक्षण भी कर रहे हैं और करेंगे पर जो हमारी जाति/धर्म/सम्प्रदाय/पंथ/मार्ग व्यवस्था से अलग हुआ उसको भी इस चेतावनी के साथ साधुवाद की मेरा यह प्राकृतिक जाति/धर्म/सम्प्रदाय/पंथ/मार्ग ही उसको राह सुझाएगा और संरक्षण देगा जब उसको हर जगह से ठोकर लगेगी और कोई मार्ग दिखाई नहीं देगा या जब उसके जीवन का अंतिम समय होगा तो भी यही प्राकृतिक धर्म और यही प्रकृति उसको अपने आँचल में पनाह देगा।

ऐसी समरसता जिसमे की हमारे स्वयं का अस्तित्व भवसागर में गोता खाने लगे और इस प्रकार सम्पूर्ण मानवता के अस्तित्व पर वज्रपात हो जाय तो उस समरसता से निर्गुट जीवन ही श्रेष्कर है वह कैसी भी जाति/धर्म/सांप्रदायिक/पंथ का जीवन हो कम से कम हम उस स्थिति में अपने को मानव तो समझ सकते हैं न और उस नारकीय अमानवीय जीवन को तो नहीं जीना पडेगा और न हम स्वयं के लिए आत्मघाती हो सम्पूर्ण मानवता को आत्मघाती बनने देने के सहभागी होंगे?

ऐसी समरसता जिसमे की हमारे स्वयं का अस्तित्व भवसागर में गोता खाने लगे और इस प्रकार सम्पूर्ण मानवता के अस्तित्व पर वज्रपात हो जाय तो उस समरसता से निर्गुट जीवन ही श्रेष्कर है वह कैसी भी जाति/धर्म/सांप्रदायिक/पंथ का जीवन हो कम से कम हम उस स्थिति में अपने को मानव तो समझ सकते हैं न और उस नारकीय अमानवीय जीवन को तो नहीं जीना पडेगा और न हम स्वयं के लिए आत्मघाती हो सम्पूर्ण मानवता को आत्मघाती बनने देने के सहभागी होंगे?  

Wednesday, July 6, 2016

जो लोग अपना निम्न संस्कार/संस्कृति छोड़ हमारा उच्च संस्कार/संस्कृति/वाणी(भाषा) नहीं अपनाना चाहते है उनके लिए हम अपने संस्कार/संस्कृति/वाणी(भाषा) छोड़ते हुए अपना पतन करें यह कहाँ की समरसता है। हम अपने संस्कार/संस्कृति छोड़ते हुए अपना पतन करें तो इसे तो संसार की उच्च्तम संस्कार/संस्कृति का पतन और इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व समाज की सामूहिक संस्कार/संस्कृति का पतन समझा जाएगा। उन लोगों की संख्या समाज में निरन्तर बढ़ती जा रही है जो दृढ़तापूर्वक अपने विचारों और संस्कारों/संस्कृति को संरक्षित नहीं कर पा रहे हैं। ये लोग तो अपने उच्च्तम संस्कार/संस्कृति को छोड़ निम्न संस्कार/संस्कृति सामान्य अल्पकालिक और अस्थायी स्वार्थ हेतु बहुत तीव्र गति से अपना रहे है तो उसी का परिणाम है सम्पूर्ण मानवता में व्याप्त संस्कार/संस्कृति/वाणी(भाषा) अवमूल्यन अवस्था जिसमे हम अपने सम्बन्धों की पवित्रता और विष्वसनीयता खोते हुए मानवीय जीवन आधार सहित जी नहीं रहे हैं वरन तैर रहे हैं और पता नहीं कौन सा झोंका आये और हमें किस किनारे खींच ले जाए हमें स्वयं नहीं पता है। आज भी इस मानवीय दुनिया का अस्तित्व इसीलिए बना हुआ है की समाज का कुछ प्रतिसत उच्च्तम संस्कार/संस्कृति युक्त मानव अपने उच्च्तम संस्कार/संस्कृति को दृढ़ता पूर्वक संरक्षित कर अन्य निम्नतम सांस्कारिक/संस्कृतियुक्त समाज को संतुलित कर रहे हैं अन्यथा यह मानवीय श्रिष्टि किसी भी समय अपना अस्तित्व खो देती और संतुलन न बना रहा तो अस्तित्व समाप्त हो भी सकता है?

जो लोग अपना निम्न संस्कार/संस्कृति छोड़ हमारा उच्च संस्कार/संस्कृति/वाणी(भाषा) नहीं अपनाना चाहते है उनके लिए हम अपने संस्कार/संस्कृति/वाणी(भाषा) छोड़ते हुए अपना पतन करें यह कहाँ की समरसता है। हम अपने संस्कार/संस्कृति छोड़ते हुए अपना पतन करें तो इसे तो संसार की उच्च्तम संस्कार/संस्कृति का पतन और इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व समाज की सामूहिक संस्कार/संस्कृति का पतन समझा जाएगा। उन लोगों की संख्या समाज में निरन्तर बढ़ती जा रही है जो दृढ़तापूर्वक अपने विचारों और संस्कारों/संस्कृति को संरक्षित नहीं कर पा रहे हैं। ये लोग तो अपने उच्च्तम संस्कार/संस्कृति को छोड़ निम्न संस्कार/संस्कृति सामान्य अल्पकालिक और अस्थायी स्वार्थ हेतु बहुत तीव्र गति से अपना रहे है तो उसी का परिणाम है सम्पूर्ण मानवता में व्याप्त संस्कार/संस्कृति/वाणी(भाषा) अवमूल्यन अवस्था जिसमे हम अपने सम्बन्धों की पवित्रता और विष्वसनीयता खोते हुए मानवीय जीवन आधार सहित जी नहीं रहे हैं वरन तैर रहे हैं और पता नहीं कौन सा झोंका आये और हमें किस किनारे खींच ले जाए हमें स्वयं नहीं पता है। आज भी इस मानवीय दुनिया का अस्तित्व इसीलिए बना हुआ है की समाज का कुछ प्रतिसत उच्च्तम संस्कार/संस्कृति युक्त मानव अपने उच्च्तम संस्कार/संस्कृति को दृढ़ता पूर्वक संरक्षित कर अन्य निम्नतम सांस्कारिक/संस्कृतियुक्त समाज को संतुलित कर रहे हैं अन्यथा यह मानवीय श्रिष्टि किसी भी समय अपना अस्तित्व खो देती और संतुलन न बना रहा तो अस्तित्व समाप्त हो भी सकता है?

स्थानीय और भौगोलिक परिस्थितियां यदि ऐसा प्रभावीय परिणाम का उद्भव दिखाती हों की आंशिक या पूर्णतः हिन्दी भाषा स्थानीय निवासियों द्वारा स्वीकार न किये जाने से ही वहाँ के निवासियों का कल्याण और नियंत्रण श्रेष्ठतम ढंग से किया जा सकता हो तो यह उस स्थानीय राज्य और संघ शासकीय व्यवस्था के लिए सर्वोपरि विकल्प है पर इसे उस स्थानीय शासकीय राज्य की महत्ता या बड़ाई नहीं वरन मजबूरी ही कहा जा सकता है की आंशिक या पूर्णतः हिन्दी भाषा की स्वीकारता स्थानीय निवासियों द्वारा स्वीकार न किये जाने में ही उसका और संघीय शासन का सर्वोपरि हित निहित है और यही वहाँ की स्थानीय निवासियों की मौलिक पहचान/व्यवहार का यही निहितार्थ मेरे द्वारा सार्वजनिक करना ही मेरे वहां के पांच दिन के निवास के शोध का परिणाम है। टिप्पणी: वह राज्य या स्थानीय शासकीय व्यवस्था और संघ शासकीय व्यवस्था कौन है आप अच्छे से समझ सकते हैं।

स्थानीय और भौगोलिक परिस्थितियां यदि ऐसा प्रभावीय परिणाम का उद्भव दिखाती हों की आंशिक या पूर्णतः हिन्दी भाषा स्थानीय निवासियों द्वारा स्वीकार न किये जाने से ही वहाँ के निवासियों का कल्याण और नियंत्रण श्रेष्ठतम ढंग से किया जा सकता हो तो यह उस स्थानीय राज्य और संघ शासकीय व्यवस्था के लिए सर्वोपरि विकल्प है पर इसे उस स्थानीय शासकीय राज्य की महत्ता या बड़ाई नहीं वरन मजबूरी ही कहा जा सकता है की आंशिक या पूर्णतः हिन्दी भाषा की स्वीकारता स्थानीय निवासियों द्वारा स्वीकार न किये जाने में ही उसका और संघीय शासन का सर्वोपरि हित निहित है और यही वहाँ की स्थानीय निवासियों की मौलिक पहचान/व्यवहार का यही निहितार्थ मेरे द्वारा सार्वजनिक करना ही मेरे वहां के पांच दिन के निवास के शोध का परिणाम है। 
टिप्पणी: वह राज्य या स्थानीय शासकीय व्यवस्था और संघ शासकीय व्यवस्था कौन है आप अच्छे से समझ सकते हैं।

Tuesday, July 5, 2016

इस दुनिया में कुछ अनाड़ी और भोले भाले लोग उससे भी ज्यादा पुरुषार्थी, कुशाग्र बुध्धि, मेधा शक्ति और प्रतिभावान होने की होड़ में लग जाते हैं जिसका सब कुछ इस दुनिया की गति भांपने और नियंत्रित करने में सबसे तेज चला हो। जो स्वयं त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम हो उससे पांडव बनाम कौरव मतलब संख्याबल की लड़ाई नहीं करते है एक न एक को लगातार उत्तेजित करने हेतु भेजते हुए अन्यथा परिणाम भयंकर हो चुके हैं और आगे भी हो सकते है। जरा इतिहास उठाकर देख लीजिएगा। जो स्वयं जगत आधार मतलब सृस्टि के सञ्चालन करता हो और जिसकी इक्षा पर सृस्टि स्वयं चलती और थमती हो या विनष्ट हो सकती हो और इस प्रकार अगर उसकी ही सहन शक्ति पर सृष्टि चल पडी हो तो यह मान लीजिए की वह सृष्टि सञ्चालन के प्रति बचन बध्ध है और उसकी प्रतिभा, मेधा, विद्या, प्रज्ञा और पुरुषार्थ सब इस लोकनायक समूह में समांगी विलयन की तरह वितरित हो चुकी है और सफलता पूर्वक श्रिष्टि सञ्चालन ही उसकी प्रतिभा, मेधा, विद्या, प्रज्ञा और पुरुषार्थ का मापक है जिसके सञ्चालन को असुर समाज अपने कृत्यों से सदा-सदा से अवरुध्द करता रहा है? >>>>>>विवेक>>>>>>विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम और जिसका आतंरिक शक्तिनाम मतलब राशिनाम गिरिधर(गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) ।

इस दुनिया में कुछ अनाड़ी और भोले भाले लोग उससे भी ज्यादा पुरुषार्थी, कुशाग्र बुध्धि, मेधा शक्ति और प्रतिभावान होने की होड़ में लग जाते हैं जिसका सब कुछ इस दुनिया की गति भांपने और नियंत्रित करने में सबसे तेज चला हो। जो स्वयं त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र/विवेक/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम हो उससे पांडव बनाम कौरव मतलब संख्याबल की लड़ाई नहीं करते है एक न एक को लगातार उत्तेजित करने हेतु भेजते हुए अन्यथा परिणाम भयंकर हो चुके हैं और आगे भी हो सकते है। जरा इतिहास उठाकर देख लीजिएगा। जो स्वयं जगत आधार मतलब सृस्टि के सञ्चालन करता हो और जिसकी इक्षा पर सृस्टि स्वयं चलती और थमती हो या विनष्ट हो सकती हो और इस प्रकार अगर उसकी ही सहन शक्ति पर सृष्टि चल पडी हो तो यह मान लीजिए की वह सृष्टि सञ्चालन के प्रति बचन बध्ध है और उसकी प्रतिभा, मेधा, विद्या, प्रज्ञा और पुरुषार्थ सब इस लोकनायक समूह में समांगी विलयन की तरह वितरित हो चुकी है और सफलता पूर्वक श्रिष्टि सञ्चालन ही उसकी प्रतिभा, मेधा, विद्या, प्रज्ञा और पुरुषार्थ का मापक है जिसके सञ्चालन को असुर समाज अपने कृत्यों से सदा-सदा से अवरुध्द करता रहा है? >>>>>>विवेक>>>>>>विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन/महाशिव/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम और जिसका आतंरिक शक्तिनाम मतलब राशिनाम गिरिधर(गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु)) ।

Monday, July 4, 2016

महर्षि बाल्मीकि सप्तर्षि=ब्रह्मर्षि कश्यप के पुत्र वरुणदेव के पुत्र थे जो किन्ही कारणों से घर से दूर जाकर जंगली जीवन धारण किये थे और वही बाल्मीकि भगवान विष्णु के प्रभाव में आकर अपना परिष्कार कर जब ब्रह्मर्षि बाल्मीकि बने तो उनका नाम उपनाम/सरनेम/जाति प्रतीक नाम भले बन गया पर महर्षि बाल्मीकि पारिवारिक रूप से सप्तर्षि=ब्रह्मर्षि कश्यप के पुत्र वरुणदेव के पुत्र थे न की जंगली जातियों से थे जिस नाम को लोग बाल्मीकि सरनेम/जाति प्रतीक नाम/उपनाम बना लिए और जंगली जाती कहलाए। टिप्पणी: बाल्मीकि ने जहाँ भगवान् श्रीराम की कथा श्रीराम और सीता के समतुल्य भातृ भाव से लिखी है वही तुलसी में श्रीराम कथा मातृ-पितृ भाव से लिखी है और जहाँ तक तुलसी के नारी अपमान की बात की जाती है तो लोगों को ज्ञांत होना चाहिए की प्रसंग की बात हो तो अलग कुछ हो सकता है पर सीता माँ के प्रति उनका प्रेम इतना था की वे भगवान श्रीराम से सीता का सदैव अलग होना बर्दास्त नहीं हुआ और अंतिम सोपान सीता का राम से विलग हो धरती में समाहित होना या विलुप्त होना उनके द्वारा लिखा नहीं गया और वे यही समझते थे की सीता स्वयं राममय और राम स्वयं सीतामय थे, हैं और रहेंगे तो उनके विरह वियोग नहीं वर्णन किया है जबकि बाल्मीकि ने ऐसा किया है।

महर्षि बाल्मीकि सप्तर्षि=ब्रह्मर्षि कश्यप के पुत्र वरुणदेव के पुत्र थे जो किन्ही कारणों से घर से दूर जाकर जंगली जीवन धारण किये थे और वही बाल्मीकि भगवान विष्णु के प्रभाव में आकर अपना परिष्कार कर जब ब्रह्मर्षि बाल्मीकि बने तो उनका नाम उपनाम/सरनेम/जाति प्रतीक नाम भले बन गया पर महर्षि बाल्मीकि पारिवारिक रूप से सप्तर्षि=ब्रह्मर्षि कश्यप के पुत्र वरुणदेव के पुत्र थे न की जंगली जातियों से थे जिस नाम को लोग बाल्मीकि सरनेम/जाति प्रतीक नाम/उपनाम बना लिए और जंगली जाती कहलाए। टिप्पणी: बाल्मीकि ने जहाँ भगवान् श्रीराम की कथा श्रीराम और सीता के समतुल्य भातृ भाव से लिखी है वही तुलसी में श्रीराम कथा मातृ-पितृ भाव से लिखी है और जहाँ तक तुलसी के नारी अपमान की बात की जाती है तो लोगों को ज्ञांत होना चाहिए की प्रसंग की बात हो तो अलग कुछ हो सकता है पर सीता माँ के प्रति उनका प्रेम इतना था की वे भगवान श्रीराम से सीता का सदैव अलग होना बर्दास्त नहीं हुआ और अंतिम सोपान सीता का राम से विलग हो धरती में समाहित होना या विलुप्त होना उनके द्वारा लिखा नहीं गया और वे यही समझते थे की सीता स्वयं राममय और राम स्वयं सीतामय थे, हैं और रहेंगे तो उनके विरह वियोग नहीं वर्णन किया है जबकि बाल्मीकि ने ऐसा किया है।   

एक ब्रह्मर्षि से अवनत हो ऋषी बने विश्वामित्र=विश्वरथ=कौसिक स्वयं देवराज इंद्र के साजिसन भेजी गयी मेनका के रूप-रंग से प्रभावित हो कितना भी गिरेंगे तो शकुंतला नामक श्रेष्ठ कन्या ही जन्म लेगी और उस कन्या का पुत्र भरत सम्पूर्ण बृहत्तर भारत ~ अखण्ड भारत को आर्यावर्त(श्रेष्ठजन जो प्रगतिशील सच्चाई के समर्थक हैं न की कटु सत्य को ही अपने स्वार्थ हेतु बारम्बार भुनाते रहें और स्थिर हो जाएँ) बनाने की क्षमता कम से कम रखेगा। तो इसका मतलब यह नहीं होता की हर व्यक्ति सामान्य परिस्थिति में भी ऐसा करता रहे और अपना बोझ दूसरे के मथ्थे पर डालता रहे।

एक ब्रह्मर्षि से अवनत हो ऋषी बने विश्वामित्र=विश्वरथ=कौसिक स्वयं देवराज इंद्र के साजिसन भेजी गयी मेनका के रूप-रंग से प्रभावित हो कितना भी गिरेंगे तो शकुंतला नामक श्रेष्ठ कन्या ही जन्म लेगी और उस कन्या का पुत्र भरत सम्पूर्ण बृहत्तर भारत ~ अखण्ड भारत को आर्यावर्त(श्रेष्ठजन जो प्रगतिशील सच्चाई के समर्थक हैं न की कटु सत्य को ही अपने स्वार्थ हेतु बारम्बार भुनाते रहें और स्थिर हो जाएँ) बनाने की क्षमता कम से कम रखेगा। तो इसका मतलब यह नहीं होता की हर व्यक्ति सामान्य परिस्थिति में भी ऐसा करता रहे और अपना बोझ दूसरे के मथ्थे पर डालता रहे।  

मुझे अपने आनुवांशिक समानता के उन भाई और बहनो को किसी तथाकथित दलित, तथाकथित पिछड़े, तथाकथित ईसाई और तथाकथित इस्लाम अनुयायी के यहाँ देखकर विशेष प्रेम तो अवश्य जाग्रत होता है पर अगर वे वहाँ रहने का लाभ ले रहे हैं तो मुझे गम किस बात का जब मैं ब्राह्मण/सर्वण होने की भरपाई बचपन से ही करता आ रहा हूँ सामाजिक समरसता के आधुनिक परिभाषा आरक्षण को स्वीकार कर उनको इसका लाभ देते रहने के अनुसार। आरक्षण से बड़ी और कौन सामाजिक समरसता है? पर उसके अलावा जिसे आप समझ रहे हैं उसी की वजह से नैतिक पतन और चरित्रहीनता की अति समाज में व्याप्त हो रही है और एकाकी परिवार भी टूट रहे हैं क्योंकि जिस परिवार की संस्कृति हम नहीं समझ सके हैं उनको अपने घर में घुसाए जा रहे हैं दैहिक और भौतिक पिपासा के बसी भूत हो जिसको प्रेम नहीं स्वार्थ कहते हैं। मैं अपनी राह पर चलकर उनके और उनके समूह के कृत्यों को बदल तो नहीं सकता जिसे वे कर गुजरे और न मैं उनकी राह पर चल सकता हूँ पर यह जरूर है की कहीं वे मुझे समझ कर मेरी ही राह पर चल पढ़ें और अपना और अपने समूह का परिष्कार स्वयं प्रारम्भ कर दें और बैसाखी पर चलना छोड़ दे। 2057 तक मुझे भौतिक संसार में दृष्टिगत होना है तो देखूंगा की कैसे और कितनी जल्दी हमारी और उनकी बराबरी हो जाएगी और उनके दिल हमारे दिल से स्वाभाविक रूप से जुड़ सकेंगे?

मुझे अपने आनुवांशिक समानता के उन भाई और बहनो को किसी तथाकथित दलित, तथाकथित पिछड़े, तथाकथित ईसाई और तथाकथित इस्लाम अनुयायी के यहाँ देखकर विशेष प्रेम तो अवश्य जाग्रत होता है पर अगर वे वहाँ रहने का लाभ ले रहे हैं तो मुझे गम किस बात का जब मैं ब्राह्मण/सर्वण होने की भरपाई बचपन से ही करता आ रहा हूँ सामाजिक समरसता के आधुनिक परिभाषा आरक्षण को स्वीकार कर उनको इसका लाभ देते रहने के अनुसार। आरक्षण से बड़ी और कौन सामाजिक समरसता है? पर उसके अलावा जिसे आप समझ रहे हैं उसी की वजह से नैतिक पतन और चरित्रहीनता की अति समाज में व्याप्त हो रही है और एकाकी परिवार भी टूट रहे हैं क्योंकि जिस परिवार की संस्कृति हम नहीं समझ सके हैं उनको अपने घर में घुसाए जा रहे हैं दैहिक और भौतिक पिपासा के बसी भूत हो जिसको प्रेम नहीं स्वार्थ कहते हैं। मैं अपनी राह पर चलकर उनके और उनके समूह के कृत्यों को बदल तो नहीं सकता जिसे वे कर गुजरे और न मैं उनकी राह पर चल सकता हूँ पर यह जरूर है की कहीं वे मुझे समझ कर मेरी ही राह पर चल पढ़ें और अपना और अपने समूह का परिष्कार स्वयं प्रारम्भ कर दें और बैसाखी पर चलना छोड़ दे। 2057 तक मुझे भौतिक संसार में दृष्टिगत होना है तो देखूंगा की कैसे और कितनी जल्दी हमारी और उनकी बराबरी हो जाएगी और उनके दिल हमारे दिल से स्वाभाविक रूप से जुड़ सकेंगे?

जब जमीनी लड़ाई और छोटे स्तर की लड़ाई होती है तो किनारे वाला ज्यादा प्रभावित होता है पर जब चौतरफा हर तरह का वार होता है तो नाभि सबसे ज्यादा प्रभावी होता है और सहस्राब्दी परिवर्तन हेतु विश्व में सारभौमिक क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई में संस्कृति लड़ाई की बाजी जीतते हुए सांस्कृतिक क्षेत्र में सिरमौर बने रहने हेतु संस्कृति और धार्मिक युध्ध विशेसग्य पंडितों को विशेष प्रयास करने पड़े और भारत उसमे आज भी विश्व विजेता बना हुआ है नाना प्रकार के वैश्विक सडयन्त्रो के बावजूद तो भारत का वह भाग जो इस सांस्कृतिक और धार्मिक विधा का केंद्र बिंदु है वह प्रयागराज-काशी आज भी विश्व पटल पर भारतीय संस्कृति और धर्म शास्त्र को सर्वोच्च्तम स्थान बनाये रखने में मूर्धन्य स्थान रखता है और यही उस दौर में सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है और यहां के नियंत्रण कर्ता समूह का प्रयास और पुरुषार्थ अनन्य है। इस कार्य को सम्पादित करने का प्रयास कोई संगठन विशेष ही नहीं किया इसे तो वे लोग किये हैं जिनके नियम और नीतियां गुप्त और अति तीव्र तथा प्रभावी होती हैं नहीं तो संगठन विशेष की नीतियों की सूचना तो बहुत से भारत में छुपे विदेशी गुप्तचर समूह भारतीय नागरिक ही होते है उनको हो जाती है और कार्य निष्प्रभावी हो जाता है।

जब जमीनी लड़ाई और छोटे स्तर की लड़ाई होती है तो किनारे वाला ज्यादा प्रभावित होता है पर जब चौतरफा हर तरह का वार होता है तो नाभि सबसे ज्यादा प्रभावी होता है और सहस्राब्दी परिवर्तन हेतु विश्व में सारभौमिक क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई में संस्कृति लड़ाई की बाजी जीतते हुए सांस्कृतिक क्षेत्र में सिरमौर बने रहने हेतु संस्कृति और धार्मिक युध्ध विशेसग्य पंडितों को विशेष प्रयास करने पड़े और भारत उसमे आज भी विश्व विजेता बना हुआ है नाना प्रकार के वैश्विक सडयन्त्रो के बावजूद तो भारत का वह भाग जो इस सांस्कृतिक और धार्मिक विधा का केंद्र बिंदु है वह प्रयागराज-काशी आज भी विश्व पटल पर भारतीय संस्कृति और धर्म शास्त्र को सर्वोच्च्तम स्थान बनाये रखने में मूर्धन्य स्थान रखता है और यही उस दौर में सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है और यहां के नियंत्रण कर्ता समूह का प्रयास और पुरुषार्थ अनन्य है। इस कार्य को सम्पादित करने का प्रयास कोई संगठन विशेष ही नहीं किया इसे तो वे लोग किये हैं जिनके नियम और नीतियां गुप्त और अति तीव्र तथा प्रभावी होती हैं नहीं तो संगठन विशेष की नीतियों की सूचना तो बहुत से भारत में छुपे विदेशी गुप्तचर समूह भारतीय नागरिक ही होते है उनको हो जाती है और कार्य निष्प्रभावी हो जाता है।

जो यह मानता है की सम्पूर्ण विश्व प्राथमिकतयः सनातन हिन्दू है और उसके बाद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य तथा उनसे सृजित जाति/धर्म/पंथ/सम्प्रदाय समूह के हिन्दू (3:संख्या में तीन लेकिन इकाई एक) और इस्लाम अनुयायी (1:संख्या में एक) और ईसाइयत (1:संख्या में एक) सब है तो ऐसे में जो पञ्च भूतों (सामूहिक रूप से संख्या में पांच) को मानते हुए इस तरह सबकी उत्पत्ति ही सनातन हिन्दू से माना है तो उसे केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा उनसे सृजित जाति/धर्म/पंथ/सम्प्रदाय में ही पुनः सीमित क्यों किया जा रहा है? अगर वह सीमित हो भी रहा है तो केवल और केवल इसलिए ही कि अगर वर्तमान हिन्दू समाज मजबूत होगा तो सम्पूर्ण मानवता मजबूत होगी और जिन स्थानों पर ईसाइयत और इस्लाम जरूरी है और यह भी की जहां से उनका उद्भव हुआ है व्यवहारिक रूप में प्राकृतिक संरचना के साथ वहां वे पंथ भी मजबूत होंगे (सैद्धांतिक विचार तो भारत में भी संभावित रूप से रहे होंगे अन्यथा उन स्थानों पर वह उदित कैसे हुए जब मानवता का मूल स्थान भारत में प्रयागराज/त्रिवेणी/त्रिसंगम/इला आवास/इला आबाद/अल्लाह आबाद/अल्लाहबाद/इलाहाबाद-काशी/वाराणसी ही है ) और इस प्रकार जाति/धर्म/पंथ/सम्प्रदाय के मजबूत होने से मानवता मजबूत होगी। तो लक्ष्य मानवता कल्याण को लेकर ही वह अपने को सीमित किया होगा केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा उनसे सृजित जाति/धर्म में ही तो इसमें किसी भी जाति/धर्म/पंथ/सम्प्रदाय से सम्बन्धित मानव मात्र का कोई अहित निहित नहीं होगा।

जो यह मानता है की सम्पूर्ण विश्व प्राथमिकतयः सनातन हिन्दू है और उसके बाद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैस्य तथा उनसे सृजित जाति/धर्म/पंथ/सम्प्रदाय समूह के हिन्दू (3:संख्या में तीन लेकिन इकाई एक) और इस्लाम अनुयायी (1:संख्या में एक) और ईसाइयत (1:संख्या में एक) सब है तो ऐसे में जो पञ्च भूतों (सामूहिक रूप से संख्या में पांच) को मानते हुए इस तरह सबकी उत्पत्ति ही सनातन हिन्दू से माना है तो उसे केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा उनसे सृजित जाति/धर्म/पंथ/सम्प्रदाय में ही पुनः सीमित क्यों किया जा रहा है? अगर वह सीमित हो भी रहा है तो केवल और केवल इसलिए ही कि अगर वर्तमान हिन्दू समाज मजबूत होगा तो सम्पूर्ण मानवता मजबूत होगी और जिन स्थानों पर ईसाइयत और इस्लाम जरूरी है और यह भी की जहां से उनका उद्भव हुआ है व्यवहारिक रूप में प्राकृतिक संरचना के साथ वहां वे पंथ भी मजबूत होंगे (सैद्धांतिक विचार तो भारत में भी संभावित रूप से रहे होंगे अन्यथा उन स्थानों पर वह उदित कैसे हुए जब मानवता का मूल स्थान भारत में प्रयागराज/त्रिवेणी/त्रिसंगम/इला आवास/इला आबाद/अल्लाह आबाद/अल्लाहबाद/इलाहाबाद-काशी/वाराणसी ही है ) और इस प्रकार जाति/धर्म/पंथ/सम्प्रदाय के मजबूत होने से मानवता मजबूत होगी। तो लक्ष्य मानवता कल्याण को लेकर ही वह अपने को सीमित किया होगा केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा उनसे सृजित जाति/धर्म में ही तो इसमें किसी भी जाति/धर्म/पंथ/सम्प्रदाय से सम्बन्धित मानव मात्र का कोई अहित निहित नहीं होगा।

जो परमब्रह्म/ब्रह्म (ब्रह्मा+ विष्णु+महेश=विष्णुकांत=विष्णुस्वामी) की अवस्था को प्राप्त हो चुका हो सशरीर तो वह संयुक्त रास्त्र का महासचिव या विश्व के किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष या इस दुनिया के किसी अन्य पद को प्राप्ति हेतु कोई लालसा नहीं रखता पर हाँ सामान्य सज्जन व्यक्ति का जीवन उसकी न्यूनतम ऊंचाई अवश्य होगी अगर वह इस संसार को चलायमान रखने में सहयोग करना चाहता है और कुछ कुटिल लोग इस दुनिया के सुचारु रूप से संचालन हेतु आवश्यक गूढ़ रहश्य से पर्दा उठाने हेतु उसे बाध्य न करें तो समाज के सर्वाधिक हित हेतु एक सामान्य सज्जन व्यक्ति या उससे ऊपर कोई भी छोटे से छोटा से लेकर उच्च्तम जीवन स्तर को भी वह जी सकने की सामर्थ्य रखता है। और अगर कोई सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म (ब्रह्मा+ विष्णु+महेश=विष्णुकांत=विष्णुस्वामी) की अवस्था को प्राप्त हो चुका हो तो उसका बारम्बार पुनः परीक्षण नहीं करते हैं यह भी इस दुनिया को पता होना चाहिए क्योंकि वह समय याद होना चाहिए जब पूरी दुनिया (पक्ष और विपक्ष) एक तरफ और वह स्वयं दूसरे पलड़े पर अकेला रहकर जीवन जिया हो किसी कार्य सिध्धि के निम्मित्त तप=योग=उद्यम में रहते हुए और सत्य को भौतिक और सैद्धांतिक रूप में प्रमाणिक करने हेतु स्वयं को मन, कर्म, वाणी, समय और जीवन समर्पित करते हुए। तो मित्रों सत्य हेतु बलिदान, त्याग और तप=योग=उद्यम करने पर वही सत्य दूसरे स्वरुप ही सही अवश्य मिलता तो है न तो इसमें असफलता क्यों मिलेगी और इस तथ्य को कौन नकार सकता है जब स्वयं भौतिक प्रमाण मिल गया है? और जब भौतिक प्रमाण मिल गया है तो जो नकारे वह फिर तो अपने अस्तित्व ही मिटा रहा होता है न?

जो परमब्रह्म/ब्रह्म (ब्रह्मा+ विष्णु+महेश=विष्णुकांत=विष्णुस्वामी) की अवस्था को प्राप्त हो चुका हो सशरीर तो वह संयुक्त रास्त्र का महासचिव या विश्व के किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष या इस दुनिया के किसी अन्य पद को प्राप्ति हेतु कोई लालसा नहीं रखता पर हाँ सामान्य सज्जन व्यक्ति का जीवन उसकी न्यूनतम ऊंचाई अवश्य होगी अगर वह इस संसार को चलायमान रखने में सहयोग करना चाहता है और कुछ कुटिल लोग इस दुनिया के सुचारु रूप से संचालन हेतु आवश्यक गूढ़ रहश्य से पर्दा उठाने हेतु उसे बाध्य न करें तो समाज के सर्वाधिक हित हेतु एक सामान्य सज्जन व्यक्ति या उससे ऊपर कोई भी छोटे से छोटा से लेकर उच्च्तम जीवन स्तर को भी वह जी सकने की सामर्थ्य रखता है। और अगर कोई सशरीर परमब्रह्म/ब्रह्म (ब्रह्मा+ विष्णु+महेश=विष्णुकांत=विष्णुस्वामी) की अवस्था को प्राप्त हो चुका हो तो उसका बारम्बार पुनः परीक्षण नहीं करते हैं यह भी इस दुनिया को पता होना चाहिए क्योंकि वह समय याद होना चाहिए जब पूरी दुनिया (पक्ष और विपक्ष) एक तरफ और वह स्वयं दूसरे पलड़े पर अकेला रहकर जीवन जिया हो किसी कार्य सिध्धि के निम्मित्त तप=योग=उद्यम में रहते हुए और सत्य को भौतिक और सैद्धांतिक रूप में प्रमाणिक करने हेतु स्वयं को मन, कर्म, वाणी, समय और जीवन समर्पित करते हुए। तो मित्रों सत्य हेतु बलिदान, त्याग और तप=योग=उद्यम करने पर वही सत्य दूसरे स्वरुप ही सही अवश्य मिलता तो है न तो इसमें असफलता क्यों मिलेगी और इस तथ्य को कौन नकार सकता है जब स्वयं भौतिक प्रमाण मिल गया है? और जब भौतिक प्रमाण मिल गया है तो जो नकारे वह फिर तो अपने अस्तित्व ही मिटा रहा होता है न?  

शान्ति मन्त्र: तेजस्विनावधीतमस्तु = May our studies be radiantly glorious! THIS PART OF SHANTI PATH IS FROM श्वेताश्वतरोपनिशद (Shvetashvatara Upanishad) |


शान्ति मन्त्र वेदों के वे मंत्र हैं जो शान्ति की प्रार्थना करते हैं। प्राय: हिन्दुओं के धार्मिक कृत्यों के आरम्भ और अन्त में इनका पाठ किया जाता है।
तैतरीय उपनिषद, कठोपनिषद, माण्डुक्योपनिषद तथा श्वेताश्वतरोपनिशद
ॐ सह नाववतु ।
सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
OM. Let us both protect each other together!
May both of us enjoy together!
May both of us put our energies together!
May our studies be radiantly glorious!
May there be no hatred between us!
OM Peace, Peace, Peace!

मुण्डक उपनिषद, माण्डूक्य उपनिषद तथा प्रश्नोपनिषद
ॐ भद्रं कर्णेभिः श्रुणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरन्ङ्गैस्तुष्टुवागं सस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितम् यदायुः ।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो ब्रिहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
OM O gods! Let us hear good (auspicious) things from our ears! O worshipful ones! let us see good (auspicious) things with our eyes! May our organs and body be stable, healthy and strong! May we do in the life span allotted to us by gods what pleases them.
May Indra (who is) extolled profusely in the scriptures do good to us!
May Pushan (who is) knower of world do good to us!
May Taarkshya (who) destroyer of enemies do good to us!
May Brihaspati establish good in us!
OM Peace, Peace, Peace.

वृहदारण्यक उपनिषद तथा ईशावास्य उपनिषद
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
That Creator is Absolute, Complete and Full. This Universe is Absolutely Complete and Full. Only Absolutely Complete springs off That Absolute!
From That Absolute, even if Whole Absolute is taken out, only Absolute does remain!
OM Peace, Peace, Peace.
तैतरीय उपनिषद
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः।
शं नो भवत्वर्यमा।
शं न इन्द्रो वृहस्पतिः।
शं नो विष्णुरुरुक्रमः।
नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वामेव प्रत्यक्षम् ब्रह्म वदिष्यामि।
ॠतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि।
तन्मामवतु।
तद्वक्तारमवतु।
अवतु माम्।
अवतु वक्तारम्।
''ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
OM may Mitra do good to us, may Varuna do good to us,
May Aryama do good to us,
May Indra do good to us, may Brihaspati do good to us,
May Vishnu-who has vast coverage-do good to us,
(I) Salute O Brahma!,
Salutations to you O Vayu!,
Only you (Vayu) are the visible Brahman.
I say only you (Vayu) are the visible Brahman,
I say rta (divine law),
I say truth,
May that (truth) protect me,
May that (truth) protect teacher,
May it protect me,
May it protect teacher,
OM Peace, Peace, Peace.
केन उपनिषद तथा छान्द्योग्य उपनिषद
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः
श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि।
सर्वम् ब्रह्मौपनिषदम् माऽहं ब्रह्म
निराकुर्यां मा मा ब्रह्म
निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणम् मेऽस्तु।
तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते
मयि सन्तु ते मयि सन्तु।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
OM may my organs, speech, Prana, eyes and ears be nourished and be well, so should all (my) senses become strong. Upanishad says all this (world) is Brahman. I don't reject Brahman, may Brahma not reject me. Let there be no rejection, let there be no rejection at all in me, let me be concentrated on Self, all those ways of righteous living told in Upanishads be in me! Be in me, OM Peace, Peace, Peace.
ऐतरेय उपनिषद
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता
मनो मे वाचि प्रतिष्ठित-मावीरावीर्म एधि।
वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्
संदधाम्यृतम् वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु
तद्वक्तारमवत्ववतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
OM let my speech be established in (my) mind, and (my) mind be established in my speech, May Brahman (Supreme Reality) reveal itself to me! May I be able to grasp the truths of the Vedas! Let not what I have heard (studied) forsake me! May I spend both day and night in study! I say rta (divine law), I'll say the Truth; may that (truth) protect me! May that (truth) protect the teacher! May it protect me; and may it protect the speaker as well! OM Peace, Peace, Peace.

अन्य स्रोतो से

There are various Other sources of Shanti Mantras, of which some of the most famous are:
ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥
OM! Lead us from the unreal to the real!
Lead us from darkness to light!
Lead us from death to immortality!!
Om may peace, peace and peace be there in material, physical and spiritual existences!!
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष शान्ति:
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥
May peace radiate there in the whole sky, as well as in the vast ethereal space everywhere!
May peace reign all over this earth, in waters and in all herbs, trees and creepers!
May peace flow over the whole universe!
May peace flow in from the Supreme Being Brahman!
May there always exist peace in everything!
It should be peace and peace alone!
May that peace reach me too!
Om May peace, peace and peace be there in material, physical and spiritual existences!
(Translation by Swami Abhedananda, Ramakrishna Vedanta Math, India. Edited by Dr. Veda Vrata Aalok on 31st Jan. 2013.)

Source: Wikipedia and Others