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Tuesday, August 1, 2017

अब भी मूर्धन्य पंडित जी लोगों के समझ में आ जाय की जो राम/कृष्ण(परमब्रह्म:ब्रह्म=ब्रह्मा+विष्णु+महेश) हो चुका हो वह पूर्ण ब्राह्मण, पूर्ण क्षत्रिय और पूर्ण वैश्य अपने आप हो चुका है और जब पूर्ण ब्राह्मण, पूर्ण क्षत्रिय और पूर्ण वैश्य हो चुका है तो फिर इस तीन और इनके व्युत्पन्न से जनित पाँच:- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इस्लामिक और इसायते सबका प्रतिनिधि हो चुका है और प्रकार समाज के हर अंग का प्रतिनिधि हो चुका है पूर्ण सनातन ब्राह्मण (+ पूर्ण सनातन क्षत्रिय और पूर्ण सनातन वैश्य) ही रहते हुए।>>>>>>>> राम नाम सनातन संस्कृति का नाम है जिसमे से रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय राम सर्व व्यापक सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म हैं। और राम वह है जो शिव की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) को जाला दे या विष्णु की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) का नाश कर हमें निर्मल और सज्जन बना दे। तो राम शब्द में ही शिव और विष्णु दोनों के गुण अपने आप में निहित है तो रह जाती है ब्रह्मा की बात तो इसके पीछे तथ्य है की इस श्रिष्टि में केवल राम ही अपने में पूर्णतः विवेक मतलब आदि त्रिदेवी मतलब त्रिदेवियों में आद्या मतलब सरस्वती के ज्येष्ठ मानस पुत्र कहे जाने से सभी त्रिदेवों के गुण इनमे अपने आप में समाहित हो जाता है। तो हम कह सकते हैं की राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नाम ऐसे ही रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय दसरथ के कुलगुरु वशिष्ठ ने ऐसे ही नहीं दिए थे वरन ये नाम अपने में ही सनातन नाम हैं और उन नामों में ही उनके गुण छुपे हैं। अगर सीता श्रिष्टि तो राम उस श्रिष्टि के प्राण है और इस प्रकार अगर सीता और राम दोनों इस संसार में अस्तित्व में हैं तो दोनों एक दूसरे के पूरक है इससे ज्यादा मैं कह ही क्या सकता हूँ।

अब भी मूर्धन्य पंडित जी लोगों के समझ में आ जाय की जो राम/कृष्ण(परमब्रह्म:ब्रह्म=ब्रह्मा+विष्णु+महेश) हो चुका हो वह पूर्ण ब्राह्मण, पूर्ण क्षत्रिय और पूर्ण वैश्य अपने आप हो चुका है और जब पूर्ण ब्राह्मण, पूर्ण क्षत्रिय और पूर्ण वैश्य हो चुका है तो फिर इस तीन और इनके व्युत्पन्न से जनित पाँच:- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इस्लामिक और इसायते सबका प्रतिनिधि हो चुका है और प्रकार समाज के हर अंग का प्रतिनिधि हो चुका है पूर्ण सनातन ब्राह्मण (+ पूर्ण सनातन क्षत्रिय और पूर्ण सनातन वैश्य) ही रहते हुए।>>>>>>>> राम नाम सनातन संस्कृति का नाम है जिसमे से रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय राम सर्व व्यापक सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म हैं। और राम वह है जो शिव की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) को जाला दे या विष्णु की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) का नाश कर हमें निर्मल और सज्जन बना दे। तो राम शब्द में ही शिव और विष्णु दोनों के गुण अपने आप में निहित है तो रह जाती है ब्रह्मा की बात तो इसके पीछे तथ्य है की इस श्रिष्टि में केवल राम ही अपने में पूर्णतः विवेक मतलब आदि त्रिदेवी मतलब त्रिदेवियों में आद्या मतलब सरस्वती के ज्येष्ठ मानस पुत्र कहे जाने से सभी त्रिदेवों के गुण इनमे अपने आप में समाहित हो जाता है। तो हम कह सकते हैं की राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नाम ऐसे ही रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय दसरथ के कुलगुरु वशिष्ठ ने ऐसे ही नहीं दिए थे वरन ये नाम अपने में ही सनातन नाम हैं और उन नामों में ही उनके गुण छुपे हैं। अगर सीता श्रिष्टि तो राम उस श्रिष्टि के प्राण है और इस प्रकार अगर सीता और राम दोनों इस संसार में अस्तित्व में हैं तो दोनों एक दूसरे के पूरक है इससे ज्यादा मैं कह ही क्या सकता हूँ। >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>.जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी)--- जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड)-- जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>.Reproduced Fact: इस्लामियत और ईसाइयत के आदम:प्रथम आदमी और सनातन हिन्दू (मूल जो मूलतः ब्राह्मण, क्षत्रिय व् वैश्य जाती/धर्म व् इन तीनों के ही अनेकोनेक व्युत्पन्न है) धर्म के मनु:प्रथम मानव जब कश्यप ऋषि ही थे मतलब दशरथ और वशुदेव ही थे तो मेरे द्वारा (As per English men E-Mails time to time, Hi! five:5:PANDEY द्वारा ) सिद्ध किये हुए 5 प्रमुख तथ्य पूर्णतः सत्य हैं (इस्लाम राम के सामानांतर जरूर चलता पर राम का दुश्मन नहीं और ईसाइयत कृष्ण के सामानांतर जरूर चलता है पर वह कृष्ण का दुश्मन नहीं क्योंकि दोनों नहीं चाहते हैं की रामकृष्ण का अंत हो बल्कि वे इन्हे अपना आधार मानते हैं)
१)हिन्द=जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी और भारत=भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत|
२) इस्लाम समानांतर चलता है श्रीराम के और ईसाइयत सामानांतर चलती है श्रीकृष्ण के और जिस प्रकार श्रीराम बड़े हैं श्रीकृष्ण के उसी प्रकार इस्लाम बड़ा भाई है ईसाइयत का।दलित समाज श्रीहनुमान के समानांतर चलता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है|
3) हिन्द भूमि(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी) न की केवल भारतवर्ष भूमि(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत) कई बार आर्यावर्त हो चुका है हस्तिनापुर राजा भरत के भारतवर्ष को आर्यावर्त घोषित करने के पहले तो आइये हम विश्व महासंघ को भी आर्यावर्त बनाये मतलब विश्व का हर नागरिक श्रेष्ठ(आर्य) हो(आर्य प्रगतिशील सच्चाई का अनुयायी ही आर्य है)।
4) श्रीराम के समानांतर इस्लाम और श्रीकृष्ण के समानांतर ईसाइयत संचालन ही सिद्ध करता है की तुम (इस्लाम और ईसाइयत) मेरे हो मतलब आप दोनों की उपज भी सनातन धर्मी ही है। यह अलग की गाय, गंगा, गीता, गायत्री और गौरी (नारी समाज का प्रतीक नाम: नारी समाज के प्रति आचरण) पर मतभेद रह गया है। Origin in the different climatic system may causes these differences.
5) इस संसार को चलाने के लिए सनातन हिन्दू संस्कृति के साथ ही साथ अन्य धर्म की शिक्षा-संस्कृति और परम्पराओं की भी जरूरत है भौगोलिक जलवायु खंड को ध्यान में रखते हुए पर इसका मतलब यह नहीं की ये सनातन संस्कृति की सीमा से परे हैं।*******जय हिन्द(जम्बूद्वीप =यूरेसिआ=यूरोप+एशिया= या कम से कम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी), जय भारत(भारतवर्ष=भरत-खंड=अखंड भारत), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>>>>>अगर इस्लाम(जो श्रीराम के सामानांतर चलता है और श्रीराम के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) को श्रीराम की चाहत है तो श्रीराम बनकर दिखला दो वह आप का हो जाएगा और यदि ईसाइयत(जो श्रीकृष्ण के सामानांतर चलता है और श्रीकृष्ण के न रहने अनियंत्रित हो जाता है) श्रीकृष्ण की चाहत है तो श्रीकृष्ण बनकर दिखला दीजिये वह आप का हो जाएगा और यदि दलित समाज (जो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान के समानांतर चलता है और आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान के न रहने पर अनियंत्रित हो जाता है पर अब तो आम्बेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान का नाम जाप करता है पर यही नही जानता की इन्द्रिय नियंत्रण इन्ही से शीखते है) को आंबेडकर/अम्बवादेकर/श्रीहनुमान की चाहत है तो फिर श्रीहनुमान बनकर दिखला दो तो वह आप का हो जाएगा।>>>>>>>>सनातन गौतम(न्याय-दर्शन के प्रणेता) गोत्रीय ब्राह्मण परिवार का नाती हूँ मै अतः मुझे पता है की: गौतम गोत्रीय शाक्य(शाकाहारी व् अहिंसक) वंशीय क्षत्रिय सिद्धार्थ गौतम ही गौतम बुद्ध है जो की हिन्दू समाज में एक पंथ का निर्माण किये जो बौद्ध मत है और जिसकी सभी पाण्डु लिपिया हिन्दू ग्रन्थ को ही निरूपित करती हैं पर बौद्ध मत के अनुसार कही-कही उनको परिवर्तित किया गया है। अतः उन सबका स्रोत सनातन हिन्दू धर्म के ग्रन्थ ही हैं। उसी तरह काशी और काबा का सम्बन्ध है जिसमे काशी पुरातन संस्कृति हैकाबा की संस्कृति से। और जब मुस्लिम संस्कृति स्वयं ईसाइयत से पुरानी संस्कृति है तो काशी की संस्कृति ईसाइयत (यरूसलेम) की संस्कृति से भी पुरानी अपने में है ही इसमे दो राय कहाँ। मेरा मत यही की किशी को अपना धर्म परिवर्तन किये बिना ही सनातन हिन्दू संस्कृति से यदि जोड़ा जाता है तो वह उससे ज्यादा अच्छा कदम होगा जिसमे किशी को अपना धर्म त्यागकरवा सनातन हिन्दू धर्म से जोड़ा जाता है। क्योंकि सनातन हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति है अतः उसे यथा संभव अपनाते हुए कोई अपने नए धर्म में बना रहता है देश, काल, जलवायु और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तो इसमे कोई गलत नहीं है। एक और भी अच्छाई है भारत में सभी धर्मो के पाये जाने से की कि जब कोई भारतीय विदेश में कहीं जाता है तो उसे बताना नहीं पड़ता की वहा के विभिन्न धर्म अनुयायियों के साथ कौन सा व्यवहार स्वयं उस भारतीय के लिए सम्बन्ध बिगाड़ने वाला साबित हो सकता है और कौन सा व्यवहार उनको उस भारतीय के करीब ला सकता है। लेकिन इसके साथ की भारत की आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।*******जय हिन्द(जंम्बूद्वीप = यूरेशिया=यूरोप +एशिया या न्यूनतम ईरान से सिंगापुर और कश्मीर से कन्याकुमारी, जय भारत(भारतवर्ष=अखंड-भारत=भरतखण्ड), जय श्रीराम/कृष्ण।>>>>>>>>>>>>>>राम नाम सनातन संस्कृति का नाम है जिसमे से रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय राम सर्व व्यापक सशरीर परमब्रह्म (ब्रह्मा+विष्णु+महेश)/ब्रह्म हैं। और राम वह है जो शिव की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) को जाला दे या विष्णु की तरह भव सागर के पापों(कुकृत्यों) का नाश कर हमें निर्मल और सज्जन बना दे। तो राम शब्द में ही शिव और विष्णु दोनों के गुण अपने आप में निहित है तो रह जाती है ब्रह्मा की बात तो इसके पीछे तथ्य है की इस श्रिष्टि में केवल राम ही अपने में पूर्णतः विवेक मतलब आदि त्रिदेवी मतलब त्रिदेवियों में आद्या मतलब सरस्वती के ज्येष्ठ मानस पुत्र कहे जाने से सभी त्रिदेवों के गुण इनमे अपने आप में समाहित हो जाता है। तो हम कह सकते हैं की राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नाम ऐसे ही रघुवंशीय/इक्षाकुवंशीय/सूर्यवंशीय/कश्यप गोत्रीय दसरथ के कुलगुरु वशिष्ठ ने ऐसे ही नहीं दिए थे वरन ये नाम अपने में ही सनातन नाम हैं और उन नामों में ही उनके गुण छुपे हैं। अगर सीता श्रिष्टि तो राम उस श्रिष्टि के प्राण है और इस प्रकार अगर सीता और राम दोनों इस संसार में अस्तित्व में हैं तो दोनों एक दूसरे के पूरक है इससे ज्यादा मैं कह ही क्या सकता हूँ।>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>सामाजिक, धार्मिक, संवैधानिक वैध नियमों को स्वयं तोड़ने वालों के साथ भी विनम्रता से व्यवहार क्या व्यक्तित्व की विशालता में नहीं आता? अगर ऐसे व्यक्ति परहित जीवन छोड़ तुछ्य मानशिकता वालों के प्रतिशोध का जबाब गंभीर प्रतिशोधात्मक कार्यों से देते तो इस प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज, भारतवर्ष और विश्व एक गाँव तथा विश्व मानवता का भविष्य कैसा होता?>>>>>>>>>>टिप्पणी:>>>>>>>>>>>>>>>>>>अंतर्धार्मिक और दलित समाज से शास्त्रीय हिन्दू विवाह वैध नहीं और वैध तब जब विवाह पूर्व वर अपने को सामजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का का स्वीकार कर लिया हो मतलब उसे उस समय(विवाह के पूर्व) तक सनातन धर्म के पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत समस्त अधिकतम देवी, देवता और नियम-क़ानून मान्य हो क्योंकि शास्त्रीय हिन्दू विवाह एक ऐसा कर्म-कांड है जिसमे पञ्चदेव (अग्नि, वरुण, पवन, आकाश, पृथ्वी) समेत लगभग समस्त अधिकतम देवी, देवता का आह्वान होता है अग्निदेव(ऊर्जा/प्रकाश) को शाक्षी मान हुए विवाह पध्धति के परिपालन में। और अगर वह विवाह पूर्व वर अपने को सामाजिक, संवैधानिक और धार्मिक रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या इन तीनों के व्युत्पन्न जाती/धर्म का स्वीकार कर लिया है तो फिर वह दलित या अन्य दूसरे धर्म का कहलाने का अधिकारी नहीं रह जाएगा मतलब दलित या अन्यधर्म के तहत लाभ से वंचित हो जाएगा और जब वह धर्मान्तरण करेगा तभी दूसरे धर्म में जा सकता है। इसके इतर कोई भी अन्य विधि से विवाह कर सकता है पर वह धर्म-पति/पत्नी नहीं कहे जा सकेंगे|>>>>>>>>>>>>>> विवेक/त्रयम्बक/त्रिनेत्र/त्रिलोचन (शिव और शिवा:सती:पारवती की आतंरिक सुरक्षा शक्ति) [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)]] ((बस्ती जनपद से आकर रामापुर-223225 (आजमगढ़ स्थित) समेत 5 गाँव ((ओरिल: रामापुर (500 बीघा मूल क्षेत्र) +गुमकोठी+बागबहार+लग्गुपुर+औराडार)) को एक मुस्लिम(इस्लाम अनुयायी गौतम गोत्रीय क्षत्रिय परिवार)) जागीरदार से दान में पाये सनातन कश्यप गोत्रीय त्रिफला(बेलपत्र: बिल्वपत्र:शिव और शिवा का आभूषण/आहार/अरपणेय/अर्पण्य/अस्तित्व रहा तो स्वयं शिव बना) पाण्डेय ब्राह्मण बाबा सारंगधर:चंद्रशेखर:महादेव:शिव कुल के देवव्रत(गंगापुत्र)/.../रामप्रसाद/बचनराम(बेचनराम)/प्रदीप:सूर्यकांत:सूर्यस्वामी: आदित्यनाथ:सत्यनारायण: रामजानकी:रामा का पुत्र और गोरखपुर/गोरक्षपुर से आकर बिशुनपुर-223103 (जौनपुर स्थित) जैसे मूलतः 300 बीघे के एक गाँव को एक क्षत्रिय जागीरदार से दान में पाये सनातन गौतम गोत्रीय व्याशी(वशिष्ठ कुल के व्यासः से व्याशी तो कश्यप का गुरु हो सकता है) मिश्रा ब्राह्मण निवाजी बाबा के रामानंद/----/रामप्रसाद/ रमानाथ:विष्णु (+पारसनाथ:शिव)/श्रीकांत(+श्रीधर:विष्णु+श्रीप्रकाश) कुल का नाती, विवेक(सरस्वती का ज्येष्ठ मानस पुत्र)/त्रयम्बक/त्रिलोचन/त्रिनेत्र /सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम/महाशिव (शिव व् शिवा:सती:पार्वती की भी आतंरिक सुरक्षा शक्ति) जिसकी आंतरिक शक्ति राशिनाम गिरिधर/ गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण/11 शिवावतार धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/धरणीधर शेषनाग(लक्ष्मण)/मरुधर (मदिराचलधारी) कुर्मावतारी विष्णु))|| [[ विवेक ((विवेक/सरस्वती का जेष्ठ मानस पुत्र/शिवरामकृष्ण/श्रीरामकृष्ण/रामकृष्ण/श्रीराम/राम(महाशिव)) Born (Actual) on 11-11-1975, 9.15 AM,Tuesday (मंगलवार, कार्तिक शुक्ल पक्ष अस्टमी=गोपा/गोपी/गोवर्धन/गिरिधर/गिरिधारी:इंद्रजीत अस्टमी) ११ नवम्बर विशेष दिन: राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, नक्षत्र: धनिष्ठा, राशि: 1/2 कुम्भ, 1/2 मकर राशि और राशिनाम: गिरिधर((गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण, मेरु:मदिराचलधारी कुर्मावतारी विष्णु, धरणीधर शेषनाग((लक्ष्मण)), धौलागिरी(हिमालय) धारी हनुमान/11th शिव अवतार)) शासकीय प्रमाणपत्र में जन्म दिन तिथि: रविवार, 1-08-1976 (तथाकथित दलित गुरु, श्री धनराज हरिजन (धंजू)द्वारा दी गयी जन्म तिथि)]]|| >>****** जय हिन्द(जम्बूद्वीप=यूरेशिया =यूरोप+एशिया या कम से कम ईरान से सिंगापूर और कश्मीर से कन्याकुमारी , जय भारत(अखंड भारत=भरतखंड), जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।>>>>>>>>>>>>
जो स्वयं परमब्रह=ब्रह्म है वह ब्रह्मा से भी बड़ा ब्राह्मण है की नहीं? अतः विश्व का सबसे बड़े ब्राह्मण ब्रह्मा नहीं हैं परमब्रह्म(ब्रह्मा+विष्णु+महेश) हैं जिसे आप ब्रह्म कहते है तथा जिससे ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश का भी सृजन होता है और उस अवस्था को सशरीर प्राप्त कर सकने वाले आज तक केवल भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण ही हुए है और दोनों अस्त्रधारी हैं तो शंख, चक्र, पद्म(कमल), गदाधारी हमारा भगवान विष्णु स्वयं धनुर्धारी तथा सुदर्शन चक्रधारी होते हुए भी निरस्त्र सशरीर परमब्रह्म=ब्रह्म की अवस्था को प्राप्त हुए। मतलब श्रेष्ठतम कार्य त्याग और उपदेश के समय अस्त्र-सत्र धारी होते हुए उसका उपयोग नहीं किया वह अवस्था थी राजधर्म की मर्यादा हेतु भी प्रेम और सत्य की परिक्षा में उत्तीर्ण श्रीसीता का भी त्याग; अन्नय और श्रेष्ठतम प्रिय श्रीराधा का त्यागकर कंश वध हेतु जाना और महाभारत में समय को शून्य कर अर्जुन को उपदेश। इन सबमें क्या सस्त्र का उपयोग हुआ था? लेकिन जब शत्रु सामने खड़ा हो ललकारे तो गौतम बुध बन उसकी पूजा की जाय? तो रावण और कंश के साथ वह ही किया गया जो उचित था।

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